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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

दानेन च यथार्हेण सान्त्वेन विविधेन च ॥ ६२ ॥
राजेन्द्र! जब कोई अभीष्ट कार्य पूरा हो जाय तो उसमें सहयोग करनेवालोंका बहुत-से धन, यथायोग्य पुरस्कार तथा नाना प्रकारके सान्त्वनापूर्ण मधुर वचनके द्वारा सत्कार करना चाहिये ॥ ६२ ॥
निर्वेदयित्वा तु परं हत्वा वा कुरुनन्दन ।
ततोऽनृणो भवेद् राजा यथा शास्त्रे निदर्शितम् ॥ ६३ ॥
कुरुनन्दन! राजा शत्रुको ताड़ना आदिके द्वारा खिन्न करके अथवा उसका वध करके फिर उस वंशमें हुए राजाका जैसा शास्त्रोंमें बताया गया है, उसके अनुसार दान-मानादिद्वारा सत्कार करके उससे उऋण हो जाय ॥ ६३ ॥
राज्ञा सप्तैव रक्ष्याणि तानि चैव निबोध मे ।
आत्मामात्याश्च कोशाश्च दण्डो मित्राणि चैव हि ॥ ६४ ॥
तथा जनपदाश्चैव पुरं च कुरुनन्दन ।
एतत् सप्तात्मकं राज्यं परिपाल्यं प्रयत्नतः ॥ ६५ ॥
कुरुनन्दन! राजाको उचित है कि सात वस्तुओंकी अवश्य रक्षा करे। वे सात कौन हैं? यह मुझसे सुनो। राजाका अपना शरीर, मन्त्री, कोश, दण्ड (सेना), मित्र, राष्ट्र और नगर—से राज्यके सात अङ्ग हैं, राजाको इन सबका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये ॥ ६४-६५ ॥
षाड्गुण्यं च त्रिवर्गं च त्रिवर्गपरमं तथा ।
यो वेत्ति पुरुषव्याघ्र स भुङ्क्ते पृथिवीमिमाम् ॥ ६६ ॥
पुरुषसिंह! जो राजा छः गुण, तीन वर्ग और तीन परम वर्ग—इन सबको अच्छी तरह जानता है, वही इस पृथ्वीका उपभोग कर सकता है ॥ ६६ ॥
षाड्गुण्यमिति यत् प्रोक्तं तन्निबोध युधिष्ठिर ।
संधानासनमित्येव यात्रासंधानमेव च ॥ ६७ ॥
विगृह्यासनमित्येव यात्रां सम्परिगृह्य च ।
द्वैधीभावस्तथान्येषां संश्रयोऽथ परस्य च ॥ ६८ ॥
युधिष्ठिर! इनमेंसे जो छः गुण कहे गये हैं, उनका परिचय सुनो, शत्रुसे संधि करके शान्तिसे बैठ जाना, शत्रुपर चढ़ाई करना, वैर करके बैठे रहना, शत्रुको डरानेके लिये आक्रमणका प्रदर्शनमात्र करके बैठ जाना, शत्रुओंमें भेद डलवा देना तथा किसी दुर्ग या दुर्जय राजाका आश्रय लेना ॥ ६७-६८ ॥
त्रिवर्गश्चापि यः प्रोक्तस्तमिहैकमनाः शृणु ।
क्षयः स्थानं च वृद्धिश्च त्रिवर्गः परमस्तथा ॥ ६९ ॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च सेवितव्योऽथ कालतः ।
धर्मेण च महीपालश्चिरं पालयते महीम् ॥ ७० ॥

जिन वस्तुओंको त्रिवर्गके अन्तर्गत बताया गया है, उनको भी यहाँ एकचित्त होकर सुनो। क्षय, स्थान और वृद्धि—ये ही त्रिवर्ग हैं तथा धर्म, अर्थ और काम—इनको परम त्रिवर्ग कहा गया है। इन सबका समयानुसार सेवन करना चाहिये। राजा धर्मके अनुसार चले तो वह पृथ्वीका दीर्घकालतक पालन कर सकता है ।।

अस्मिन्नर्थे च श्लोकौ द्वौ गीतावङ्गिरसा स्वयम् ।
यादवीपुत्र भद्रं ते तावपि श्रोतुमर्हसि ।। ७१ ।।
पृथापुत्र युधिष्ठिर! तुम्हारा कल्याण हो। इस विषयमें साक्षात् बृहस्पतिजीने जो दो श्लोक कहे हैं, उन्हें भी तुम सुनो ।। ७१ ।।

कृत्वा सर्वाणि कार्याणि सम्यक् सम्पाल्य मेदिनीम् ।
पालयित्वा तथा पौरान् परत्र सुखमेधते ।। ७२ ।।
‘सारे कर्तव्योंको पूरा करके पृथ्वीका अच्छी तरह पालन तथा नगर एवं राष्ट्रकी प्रजाका संरक्षण करनेसे राजा परलोकमें सुख पाता है ।। ७२ ।।

किं तस्य तपसा राज्ञः किं च तस्याध्वरैरपि ।
सुपालितप्रजो यः स्यात् सर्वधर्मविदेव सः ।। ७३ ।।
‘जिस राजाने अपनी प्रजाका अच्छी तरह पालन किया है, उसे तपस्यासे क्या लेना है? उसे यज्ञोंका भी अनुष्ठान करनेकी क्या आवयकता है? वह तो स्वयं ही सम्पूर्ण धर्मोंका ज्ञाता है’ ।। ७३ ।।

(श्लोकाञ्छोशनसा गीतास्तान् निबोध युधिष्ठिर ।
दण्डनीतेश्च यन्मूलं त्रिवर्गस्य च भूपते ।।
भार्गवाङ्गिरसं कर्म षोडशाङ्गं च यद् बलम् ।
विषं माया च दैवं च पौरुषं चार्थसिद्धये ।।
प्रागुदक्प्रवणं दुर्गं समासाद्य महीपतिः ।
त्रिवर्गतत्रयसम्पूर्णमुपादाय तमुद्वहेत् ।।
युधिष्ठिर! इस विषयमें शुक्राचार्यके कहे हुए कुछ श्लोक हैं, उन्हें सुनो। राजन्! उन श्लोकोंमें जो भाव है, वह दण्डनीति तथा त्रिवर्गका मूल है। भार्गवाङ्गि-रसकर्म, षोडशाङ्ग बल, विष, माया, दैव और पुरुषार्थ—ये सभी वस्तुएँ राजाकी अर्थसिद्धिके कारण हैं। राजाको चाहिये, जिसमें पूर्व और उत्तर दिशाकी भूमि नीची हो तथा जो तीनों प्रकारके त्रिवर्गोंसे परिपूर्ण हो उस दुर्गका आश्रय ले राज्यकार्यका भार वहन करे ।।

षट् पञ्च च विनिर्जित्य दश चाष्टौ च भूपतिः ।
त्रिवर्गैर्दशभिर्युक्तः सुरैरपि न जीयते ।।
षड्वर्ग<sup></sup>, पञ्चवर्ग<sup></sup>, दस दोष<sup></sup> और आठ दोष<sup></sup>—इन सबको जीतकर त्रिवर्गयुक्त<sup></sup> एवं दस वर्गोंके<sup></sup> ज्ञानसे सम्पन्न हुआ राजा देवताओंद्वारा भी जीता नहीं जा सकता ।।

न बुद्धिं परिगृह्णीत स्त्रीणां मूर्खजनस्य च । दैवोपहतबुद्धीनां ये च वेदैर्विवर्जिताः ।। न तेषां शृणुयाद् राजा बुद्धिस्तेषां पराङ्मुखी । राजा कभी स्त्रियों और मूर्खोंसे सलाह न ले। जिनकी बुद्धि दैवसे मारी गयी है तथा जो वेदोंके ज्ञानसे शून्य हैं, उनकी बात राजा कभी न सुने; क्योंकि उन लोगोंकी बुद्धि नीतिसे विमुख होती है ।।

स्त्रीप्रधानानि राज्यानि विद्वद्भिर्वर्जितानि च ।। मूर्खामात्यप्रतप्तानि शुष्यन्ते जलबिन्दुवत् । जिन राज्योंमें स्त्रियोंकी प्रधानता हो और जिन्हें विद्वानोंने छोड़ रखा हो; वे राज्य मूर्ख मन्त्रियोंसे संतप्त होकर पानीकी बूँदके समान सूख जाते हैं ।।

विद्वांसः प्रथिता ये च ये चाप्ताः सर्वकर्मसु ।। युद्धेषु दृष्टकर्माणस्तेषां च शृणुयान्नृपः । जो अपनी विद्वत्ताके लिये विख्यात हों, सभी कार्योंमें विश्वासके योग्य हों तथा युद्धके अवसरोंपर जिनके कार्य देखे गये हों, ऐसे मन्त्रियोंकी ही बात राजाको सुननी चाहिये ।।

दैवं पुरुषकारं च त्रिवर्गं च समाश्रितः ।। दैवतानि च विप्रांश्च प्रणम्य विजयी भवेत् ।) दैव, पुरुषार्थ और त्रिवर्गका आश्रय ले देवताओं तथा ब्राह्मणोंको प्रणाम करके युद्धकी यात्रा करनेवाला राजा विजयी होता है ।।

युधिष्ठिर उवाच

दण्डनीतिश्च राजा च समस्तौ तावुभावपि । कस्य किं कुर्वतः सिद्ध्येत् तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ७४ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! दण्डनीति तथा राजा दोनों मिलकर ही कार्य करते हैं। इनमेंसे किसके क्या करनेसे कार्य-सिद्धि होती है? यह मुझे बताइये ॥ ७४ ॥

भीष्म उवाच

महाभाग्यं दण्डनीत्याः सिद्धैः शब्दैः सहेतुकैः । शृणु मे शंसतो राजन् यथावदिह भारत ॥ ७५ ॥ भीष्मजी बोले—राजन्! भरतनन्दन! दण्डनीतिसे राजा और प्रजाके जिस महान् सौभाग्यका उदय होता है, उसका मैं लोकप्रसिद्ध एवं युक्तियुक्त शब्दोंद्वारा वर्णन करता हूँ, तुम यथावत् रूपसे यहाँ उसे सुनो ॥ ७५ ॥

दण्डनीतिः स्वधर्मेभ्यश्चातुर्वर्ण्यं नियच्छति । प्रयुक्ता स्वामिना सम्यगधर्मेभ्यो नियच्छति ॥ ७६ ॥

यदि राजा दण्डनीतिका उत्तम रीतिसे प्रयोग करे तो वह चारों वर्णोंको अपने-अपने धर्ममें बलपूर्वक लगाती है और उन्हें अधर्मकी ओर जानेसे रोक देती है ।। चातुर्वर्ण्ये स्वकर्मस्थे मर्यादानामसंकरे । दण्डनीतिकृते क्षेमे प्रजानामकुतोभये ।। ७७ ।। स्वाम्ये प्रयत्नं कुर्वन्ति त्रयो वर्णा यथाविधि । तस्मादेव मनुष्याणां सुखं विद्धि समाहितम् ।। ७८ ।। इस प्रकार दण्डनीतिके प्रभावसे जब चारों वर्णोंके लोग अपने-अपने कर्मोंमें संलग्न रहते हैं, धर्ममर्यादामें संकीर्णता नहीं आने पाती और प्रजा सब ओरसे निर्भय एवं कुशलपूर्वक रहने लगती है, तब तीनों वर्णोंके लोग विधिपूर्वक स्वास्थ्य-रक्षाका प्रयत्न करते हैं। युधिष्ठिर! इसीमें मनुष्योंका सुख निहित है, यह तुम्हें ज्ञात होना चाहिये ।। ७७-७८ ।। कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् । इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम् ।। ७९ ।। काल राजाका कारण है अथवा राजा कालका, ऐसा संशय तुम्हें नहीं होना चाहिये। यह निश्चित है कि राजा ही कालका कारण होता है ।। ७९ ।। दण्डनीत्यां यदा राजा सम्यक् कार्त्स्न्येन वर्तते । तदा कृतयुगं नाम कालसृष्टं प्रवर्तते ।। ८० ।। जिस समय राजा दण्डनीतिका पूरा-पूरा एवं ठीक प्रयोग करता है, उस समय पृथ्वीपर पूर्णरूपसे सत्ययुगका आरम्भ हो जाता है। राजासे प्रभावित हुआ समय ही सत्ययुगकी सृष्टि कर देता है ।। ८० ।। ततः कृतयुगे धर्मो नाधर्मो विद्यते क्वचित् । सर्वेषामेव वर्णानां नाधर्मे रमते मनः ।। ८१ ।। उस सत्ययुगमें धर्म-ही-धर्म रहता है, अधर्मका कहीं नाम-निशान भी नहीं दिखायी देता तथा किसी भी वर्णकी अधर्ममें रुचि नहीं होती ।। ८१ ।। योगक्षेमाः प्रवर्तन्ते प्रजानां नात्र संशयः । वैदिकानि च सर्वाणि भवन्त्यपि गुणान्युत ।। ८२ ।। उस समय प्रजाके योगक्षेम स्वतः सिद्ध होते रहते हैं तथा सर्वत्र वैदिक गुणोंका विस्तार हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है ।। ८२ ।। ऋतवश्च सुखाः सर्वे भवन्त्युत निरामयाः । प्रसीदन्ति नराणां च स्वरवर्णमनांसि च ।। ८३ ।। सभी ऋतुएँ सुखदायिनी और आरोग्य बढ़ानेवाली होती हैं। मनुष्योंके स्वर, वर्ण और मन स्वच्छ एवं प्रसन्न होते हैं ।। ८३ ।। व्याधयो न भवन्त्यत्र नाल्पायुर्दृश्यते नरः । विधवा न भवन्त्यत्र कृपणो न तु जायते ।। ८४ ।।

इस जगत्में उस समय रोग नहीं होते, कोई भी मनुष्य अल्पायु नहीं दिखायी देता, स्त्रियाँ विधवा नहीं होती हैं तथा कोई भी मनुष्य दीन-दुखी नहीं होता है ।। अकृष्टपच्या पृथिवी भवन्त्योषधयस्तथा । त्वक्पत्रफलमूलानि वीर्यवन्ति भवन्ति च ।। ८५ ।। पृथ्वीपर बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा होता है, ओषधियाँ भी स्वतः उत्पन्न होती हैं; उनकी छाल, पत्ते, फल और मूल सभी शक्तिशाली होते हैं ।। ८५ ।। नाधर्मो विद्यते तत्र धर्म एव तु केवलम् । इति कार्तयुगानेतान् धर्मान् विद्धि युधिष्ठिर ।। ८६ ।। सत्ययुगमें अधर्मका सर्वथा अभाव हो जाता है। उस समय केवल धर्म-ही-धर्म रहता है। युधिष्ठिर! इन सबको सत्ययुगके धर्म समझो ।। ८६ ।। दण्डनीत्यां यदा राजा त्रीनंशाननुवर्तते । चतुर्थमंशमुत्सृज्य तदा त्रेता प्रवर्तते ।। ८७ ।। अशुभस्य चतुर्थांशस्त्रीनंशाननुवर्तते । कृष्टपच्यैव पृथिवी भवन्त्योषधयस्तथा ।। ८८ ।। जब राजा दण्डनीतिके एक चौथाई अंशको छोड़कर केवल तीन अंशोंका अनुसरण करता है, तब त्रेतायुग प्रारम्भ हो जाता है। उस समय अशुभका चौथा अंश पुण्यके तीन अंशोंके पीछे लगा रहता है। उस अवस्थामें पृथ्वीपर जोतने-बोनेसे ही अन्न पैदा होता है। ओषधियाँ भी उसी तरह पैदा होती हैं ।। ८७-८८ ।। अर्धं त्यक्त्वा यदा राजा नीत्यर्धमनुवर्तते । ततस्तु द्वापरं नाम स कालः सम्प्रवर्तते ।। ८९ ।। जब राजा दण्डनीतिके आधे भागको त्यागकर आधेका अनुसरण करता है, तब द्वापर नामक युगका आरम्भ हो जाता है ।। ८९ ।। अशुभस्य यदा त्वर्धं द्वावंशावनुवर्तते । कृष्टपच्यैव पृथिवी भवत्यर्धफला तथा ।। ९० ।। उस समय पापके दो भाग पुण्यके दो भागोंका अनुसरण करते हैं। पृथ्वीपर जोतने-बोनेसे ही अनाज पैदा होता है; परंतु आधी फसलमें ही फल लगते हैं, आधी मारी जाती है ।। ९० ।। दण्डनीतिं परित्यज्य यदा कात्स्न्र्येन भूमिपः । प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन प्रवर्तेत तदा कलिः ।। ९१ ।। जब राजा समूची दण्डनीतिका परित्याग करके अयोग्य उपायोंद्वारा प्रजाको कष्ट देने लगता है, तब कलियुगका आरम्भ हो जाता है ।। ९१ ।। कलावधर्मो भूयिष्ठं धर्मो भवति न क्वचित् । सर्वेषामेव वर्णानां स्वधर्माच्च्यवते मनः ।। ९२ ।।

कलियुगमें अधर्म तो अधिक होता है; परंतु धर्मका पालन कहीं नहीं देखा जाता। सभी वर्णोंका मन अपने धर्मसे च्युत हो जाता है ॥ ९२ ॥ शूद्रा भैक्षेण जीवन्ति ब्राह्मणाः परिचर्यया । योगक्षेमस्य नाशश्च वर्तते वर्णसंकरः ॥ ९३ ॥ शूद्र भिक्षा माँगकर जीवन निर्वाह करते हैं और ब्राह्मण सेवा वृत्तिसे। प्रजाके योगक्षेमका नाश हो जाता है और सब ओर वर्णसंकरता फैल जाती है ॥ ९३ ॥ वैदिकानि च कर्माणि भवन्ति विगुणान्युत । ऋतवो न सुखाः सर्वे भवन्त्यामयिनस्तथा ॥ ९४ ॥ वैदिक कर्म विधिपूर्वक सम्पन्न न होनेके कारण गुणहीन हो जाते हैं। प्रायः सभी ऋतुएँ सुखरहित तथा रोग प्रदान करनेवाली हो जाती हैं ॥ ९४ ॥ ह्रसन्ति च मनुष्याणां स्वरवर्णमनांस्युत । व्याधयश्च भवन्त्यत्र म्रियन्ते च गतायुषः ॥ ९५ ॥ मनुष्योंके स्वर, वर्ण और मन मलिन हो जाते हैं। सबको रोग-व्याधि सताने लगती है और लोग अल्पायु होकर छोटी अवस्थामें ही मरने लगते हैं ॥ ९५ ॥ विधवाश्च भवन्त्यत्र नृशंसा जायते प्रजा । क्वचिद् वर्षति पर्जन्यः क्वचित् सस्यं प्ररोहति ॥ ९६ ॥ इस युगमें स्त्रियाँ प्रायः विधवा होती हैं, प्रजा क्रूर हो जाती है, बादल कहीं-कहीं पानी बरसाते हैं और कहीं-कहीं ही धान उत्पन्न होता है ॥ ९६ ॥ रसाः सर्वे क्षयं यान्ति यदा नेच्छति भूमिपः । प्रजाः संरक्षितुं सम्यग् दण्डनीतिसमाहितः ॥ ९७ ॥ जब राजा दण्डनीतिमें प्रतिष्ठित होकर प्रजाकी भली-भाँति रक्षा करना नहीं चाहता है, उस समय इस पृथ्वीके सारे रस ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ९७ ॥ राजा कृतयुगस्रष्टा त्रेताया द्वापरस्य च । युगस्य च चतुर्थस्य राजा भवति कारणम् ॥ ९८ ॥ राजा ही सत्ययुगकी सृष्टि करनेवाला होता है, और राजा ही त्रेता, द्वापर तथा चौथे युग कलिकी भी सृष्टिका कारण है ॥ ९८ ॥ कृतस्य करणाद् राजा स्वर्गमत्यन्तमश्नुते । त्रेतायाः करणाद् राजा स्वर्गं नात्यन्तमश्नुते ॥ ९९ ॥ सत्ययुगकी सृष्टि करनेसे राजाको अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति होती है। त्रेताकी सृष्टि करनेसे राजाको स्वर्ग तो मिलता है; परंतु वह अक्षय नहीं होता ॥ ९९ ॥ प्रवर्तनाद् द्वापरस्य यथाभागमुपाश्नुते । कलेः प्रवर्तनाद् राजा पापमत्यन्तमश्नुते ॥ १०० ॥

द्वापरका प्रसार करनेसे वह अपने पुण्यके अनुसार कुछ कालतक स्वर्गका सुख भोगता है; परंतु कलियुगकी सृष्टि करनेसे राजाको अत्यन्त पापका भागी होना पड़ता है॥ १००॥

ततो वसति दुष्कर्मा नरके शाश्वतीः समाः।
प्रजानां कल्मषे मग्नोऽकीर्तिं पापं च विन्दति॥ १०१॥

तदनन्तर वह दुराचारी राजा उस पापके कारण बहुत वर्षोंतक नरकमें निवास करता है। प्रजाके पापमें डूबकर वह अपयश और पापके फलस्वरूप दुःखका ही भागी होता है॥ १०१॥

दण्डनीतिं पुरस्कृत्य विजानन् क्षत्रियः सदा।
अनवाप्तं च लिप्सैत लब्धं च परिपालयेत्॥ १०२॥

अतः विज्ञ क्षत्रियनरेशको चाहिये कि वह सदा दण्डनीतिको सामने रखकर उसके द्वारा अप्राप्त वस्तुको पानेकी इच्छा करे और प्राप्त हुई वस्तुकी रक्षा करे। इसके द्वारा प्रजाके योगक्षेम सिद्ध होते हैं, इसमें संशय नहीं है॥
(योगक्षेमाः प्रवर्तन्ते प्रजानां नात्र संशयः।)

लोकस्य सीमन्तकरी मर्यादा लोकभाविनी।
सम्यङ्नीता दण्डनीतिर्यथा माता यथा पिता॥ १०३॥

यदि दण्डनीतिका ठीक-ठीक प्रयोग किया जाय तो वह बालककी रक्षा करनेवाले माता-पिताके समान लोककी सुन्दर व्यवस्था करनेवाली और धर्ममर्यादा तथा जगत्की रक्षामें समर्थ होती है॥ १०३॥

यस्यां भवन्ति भूतानि तद् विद्धि मनुजर्षभ।
एष एव परो धर्मो यद् राजा दण्डनीतिमान्॥ १०४॥

नरश्रेष्ठ! तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिये कि समस्त प्राणी दण्डनीतिके आधारपर ही टिके हुए हैं। राजा दण्डनीतिसे युक्त हो उसीके अनुसार चले—यही उसका सबसे बड़ा धर्म है॥ १०४॥

तस्मात् कौरव्य धर्मेण प्रजाः पालय नीतिमान्।
एवं वृत्तः प्रजा रक्षन् स्वर्गं जेतासि दुर्जयम्॥ १०५॥

अतः कुरुनन्दन! तुम दण्डनीतिका आश्रय ले धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करो। यदि नीतियुक्त व्यवहारसे रहकर प्रजाकी रक्षा करोगे तो दुर्जय स्वर्गको जीत लोगे॥ १०५॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि एकोनसप्ततितमोऽध्यायः॥ ६९॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६९॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ११ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ११६ १/३ श्लोक हैं।)


* मत्त, उन्मत्त आदि दस प्रकारके अपराधियोंके नाम इस प्रकार हैं—१-मत्त, २-उन्मत्त, ३-दस्यु, ४-तस्कर, ५-प्रतारक, ६-शठ, ७-लम्पट, ८-जुआरी, ९-कृत्रिम लेखक (जालिया) और १०-घूसखोर।
१. काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य—इन छः आन्तरिक शत्रुओंके समुदायको षड्वर्ग कहते हैं। इनको पूर्णरूपसे जीत लेनेवाला नरेश ही सर्वत्र विजयी होता है।
२. श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण—इन पाँच इन्द्रियोंके समूहको ही पञ्चवर्ग कहते हैं। इन सबको क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन विषयोंमें आसक्त न होने देना ही इनपर विजय पाना है।
३. आखेट, जूआ, दिनमें सोना, दूसरोंकी निन्दा करना, स्त्रियोंमें आसक्त होना, मद्य पीना, नाचना, गाना, बाजा बजाना और व्यर्थ घूमना—से कामजनित दस दोष हैं, जिनपर राजाको विजय पाना चाहिये। इनको सर्वथा त्याग देना ही इनपर विजय पाना है।
४. चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, दोषदर्शन, अर्थदूषण, वाणीकी कठोरता और दण्डकी कठोरता—ये क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले आठ दोष राजाके लिए त्याज्य हैं।
५. धर्म, अर्थ और कामको अथवा उत्साहशक्ति, प्रभुशक्ति और मन्त्रशक्तिको त्रिवर्ग कहते हैं।
६. मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग, कोष और दण्ड—ये पाँच ही अपने और शत्रुवर्गके मिलाकर दस वर्ग कहलाते हैं। इनकी पूरी जानकारी रखनेपर राजाको अपने और शत्रुपक्षके बलाबलका पूर्ण ज्ञान होता है।

राजाको इहलोक और परलोकमें सुखकी प्राप्ति करानेवाले छत्तीस गुणोंका वर्णन

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सप्ततितमोऽध्यायः

राजाको इहलोक और परलोकमें सुखकी प्राप्ति करानेवाले छत्तीस गुणोंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

केन वृत्तेन वृत्तज्ञ वर्तमानो महीपतिः ।
सुखेनाथान् सुखोदर्कानिह च प्रेत्य चाप्नुयात् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**आचारके ज्ञाता पितामह! किस प्रकारका आचरण करनेसे राजा इहलोक और परलोकमें भी भविष्यमें सुख देनेवाले पदार्थोंको सुगमतापूर्वक प्राप्त कर सकता है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अयं गुणानां षट्त्रिंशत्षट्त्रिंशद्गुणसंयुतः ।
यान् गुणांस्तु गुणोपेतः कुर्वन् गुणमवाप्नुयात् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! दया और उदारता आदि गुणोंसे युक्त राजा जिन गुणोंको आचरणमें लाकर उत्कर्ष लाभ कर सकता है, वे छत्तीस प्रकारके गुण हैं। राजाको चाहिये कि वह इन छत्तीस गुणोंसे सम्पन्न होनेकी चेष्टा करे ॥ २ ॥
चरेद् धर्मानकटुको मुञ्चेत् स्नेहं न चास्तिकः ।
अनृशंसश्चरेदर्थं चरेत् काममनुद्धतः ॥ ३ ॥
(अब मैं क्रमशः उन गुणोंका वर्णन करता हूँ) १-धर्मका आचरण करे, किंतु कटुता न आने दे। २-आस्तिक रहते हुए दूसरोंके साथ प्रेमका बर्ताव न छोड़े। ३-क्रूरताका आश्रय लिये बिना ही अर्थ-संग्रह करे। ४-मर्यादाका अतिक्रमण न करते हुए ही विषयोंको भोगे ॥ ३ ॥
प्रियं ब्रूयादकृपणः शूरः स्यादविकत्थनः ।
दाता नापात्रवर्षी स्यात् प्रगल्भः स्यादनिष्ठुरः ॥ ४ ॥
५-दीनता न लाते हुए ही प्रिय भाषण करे। ६-शूरवीर बने, किंतु बढ़-बढ़कर बातें न बनावे। ७-दान दे, परंतु अपात्रको नहीं। ८-साहसी हो, किंतु निष्ठुर न हो ॥
संदधीत न चानार्यैर्विगृह्णीयान्न बन्धुभिः ।
नाभक्तं चारयेच्चारं कुर्यात् कार्यमपीडया ॥ ५ ॥
९-दुष्टोंके साथ मेल न करे। १०-बन्धुओंके साथ लड़ाई-झगड़ा न ठाने। ११-जो राजभक्त न हो, ऐसे गुप्तचरसे काम न ले। १२-किसीको कष्ट पहुँचाये बिना ही अपना कार्य करे ॥ ५ ॥

अर्थं ब्रूयान्न चासत्सु गुणान् ब्रूयान्न चात्मनः । आदद्यान्न च साधुभ्यो नासत्पुरुषमाश्रयेत् ॥ ६ ॥ १३-दुष्टोंसे अपना अभीष्ट कार्य न कहे। १४-अपने गुणोंका स्वयं ही वर्णन न करे। १५-श्रेष्ठ पुरुषोंसे उनका धन न छीने। १६-नीच पुरुषोंका आश्रय न ले ॥

नापरीक्ष्य नयेद् दण्डं न च मन्त्रं प्रकाशयेत् । विसृजेन्न च लुब्धेभ्यो विश्वसेन्नापकारिषु ॥ ७ ॥ १७-अपराधकी अच्छी तरह जाँच पड़ताल किये बिना ही किसीको दण्ड न दे। १८-गुप्त मन्त्रणाको प्रकट न करे। १९-लोभियोंको धन न दे। २०-जिन्होंने कभी अपकार किया हो, उनपर विश्वास न करे ॥ ७ ॥

अनीर्षुर्गूप्तदारः स्याच्चोक्षः स्यादघृणी नृपः । स्त्रियः सेवेत नात्यर्थं मृष्टं भुञ्जीत नाहितम् ॥ ८ ॥ २१-ईर्ष्यारहित होकर अपनी स्त्रीकी रक्षा करे। २२-राजा शुद्ध रहे; किंतु किसीसे घृणा न करे। २३-स्त्रियोंका अधिक सेवन न करे। २४-शुद्ध और स्वादिष्ट भोजन करे, परंतु अहितकर भोजन न करे ॥ ८ ॥

अस्तब्धः पूजयेन्मान्यान् गुरून् सेवेदमायया । अर्चैद् देवानदम्भेन श्रियमिच्छेदकुत्सिताम् ॥ ९ ॥ २५-उद्दण्डता छोड़कर विनीतभावसे माननीय पुरुषोंका आदर-सत्कार करे। २६-निष्कपटभावसे गुरु-जनोंकी सेवा करे। २७-दम्भहीन होकर देवताओंकी पूजा करे। २८-अनिन्दित उपायसे धन-सम्पत्ति पानेकी इच्छा करे ॥ ९ ॥

सेवेत प्रणयं हित्वा दक्षः स्यान्न त्वकालवित् । सान्त्वयेन्न च मोक्षाय अनुगृह्णन्न चाक्षिपेत् ॥ १० ॥ २९-हठ छोड़कर प्रीतिका पालन करे। ३०-कार्य-कुशल हो, किंतु अवसरके ज्ञानसे शून्य न हो। ३१-केवल पिण्ड छुड़ानेके लिये किसीको सान्त्वना या भरोसा न दे। ३२-किसीपर कृपा करते समय आक्षेप न करे ॥ १० ॥

प्रहरेन्न त्वविज्ञाय हत्वा शत्रून् न शोचयेत् । क्रोधं कुर्यान्न चाकस्मान्मृदुः स्यान्नापकारिषु ॥ ११ ॥ ३३-बिना जाने किसीपर प्रहार न करे। ३४-शत्रुओंको मारकर शोक न करे। ३५-अकस्मात् किसीपर क्रोध न करे तथा ३६-कोमल हो, परंतु अपकार करनेवालोंके लिये नहीं ॥ ११ ॥

एवं चरस्व राज्यस्थो यदि श्रेय इहेच्छसि । अतोऽन्यथा नरपतिर्भयमृच्छत्यनुत्तमम् ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर! यदि इस लोकमें कल्याण चाहते हो तो राज्यपर स्थित रहकर ऐसा ही बर्ताव करो; क्योंकि इसके विपरीत आचरण करनेवाला राजा बड़ी भारी विपत्ति या भयमें पड़

जाता है ।। १२ ।।
इति सर्वान् गुणानेतान् यथोक्तान् योऽनुवर्तते ।
अनुभूयेह भद्राणि प्रेत्य स्वर्गे महीयते ।। १३ ।।
जो राजा यथार्थरूपसे बताये गये इन सभी गुणोंका अनुवर्तन करता है, वह इस जगत्में कल्याणका अनुभव करके मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।।

वैशम्पायन उवाच

इदं वचः शान्तनवस्य शुश्रुवान्
युधिष्ठिरः पाण्डवमुख्यसंवृतः ।
तदा ववन्दे च पितामहं नृपो
यथोक्तमेतच्च चकार बुद्धिमान् ।। १४ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पितामह शान्तनुनन्दन भीष्मका यह उपदेश सुनकर पाण्डवोंसे और प्रधान राजाओंसे घिरे हुए बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरने उन्हें प्रणाम किया और उन्होंने जैसा बताया था, वैसा ही किया ।। १४ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सप्ततितमोऽध्यायः ।। ७० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७० ।।

धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ही राजाका महान् धर्म है, इसका प्रतिपादन

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एकसप्ततितमोऽध्यायः

धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ही राजाका महान् धर्म है, इसका प्रतिपादन

युधिष्ठिर उवाच

कथं राजा प्रजा रक्षन्नाधिबन्धेन युज्यते ।
धर्मेण नापराध्नोति तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! किस प्रकार प्रजाका पालन करनेवाला राजा चिन्तामें नहीं पड़ता और धर्मके विषयमें अपराधी नहीं होता, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

समासेनैव ते राजन् धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान् ।
विस्तरेणैव धर्माणां न जात्वन्तमवाप्नुयात् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! मैं संक्षेपसे ही तुम्हारे लिये सनातन राजधर्मोंका वर्णन करूँगा। विस्तारसे वर्णन आरम्भ करूँ तो उन धर्मोंका कभी अन्त ही नहीं हो सकता ॥ २ ॥

धर्मनिष्ठान् श्रुतवतो वेदव्रतसमाहितान् ।
अर्चयित्वा यजेथास्त्वं गृहे गुणवतो द्विजान् ॥ ३ ॥
प्रत्युत्थायोपसंगृह्य चरणावभिवाद्य च ।
अथ सर्वाणि कुर्वीथाः कार्याणि सपुरोहितः ॥ ४ ॥
जब घरपर वेदव्रतपरायण, शास्त्रज्ञ एवं धर्मिष्ठ गुणवान् ब्राह्मण पधारें, उस समय उन्हें देखते ही खड़े हो उनका स्वागत करो। उनके चरण पकड़कर प्रणाम करो और उनकी विधिपूर्वक अर्चन करके पूजा करो। तदनन्तर पुरोहितको साथ लेकर समस्त आवश्यक कार्य सम्पन्न करो ॥ ३-४ ॥

धर्मकार्याणि निर्वर्त्य मङ्गलानि प्रयुज्य च ।
ब्राह्मणान् वाचयेथास्त्वमर्थसिद्धिर्जयाशिषः ॥ ५ ॥
पहले संध्या-वन्दन आदि धार्मिक कृत्य पूर्ण करके माङ्गलिक वस्तुओंका दर्शन करनेके पश्चात् ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराओ और अर्थसिद्धि एवं विजयके लिये उनके आशीर्वाद ग्रहण करो ॥ ५ ॥

आर्जवेन च सम्पन्नो धृत्या बुद्ध्या च भारत ।
यथार्थं प्रतिगृह्णीयात् कामक्रोधौ च वर्जयेत् ॥ ६ ॥

भरतनन्दन! राजाको चाहिये कि वह सरल स्वभावसे सम्पन्न हो, धैर्य तथा बुद्धिके बलसे सत्यको ही ग्रहण करे और काम-क्रोधका परित्याग कर दे ।। ६ ।।

कामक्रोधौ पुरस्कृत्य योऽर्थं राजानुतिष्ठति । न स धर्मं न चाप्यर्थं प्रतिगृह्णाति बालिशः ।। ७ ।। जो राजा काम और क्रोधका आश्रय लेकर धन पैदा करना चाहता है, वह मूर्ख न तो धर्मको पाता है और न धन ही उसके हाथ लगता है ।। ७ ।।

मा स्म लुब्धांश्च मूर्खांश्च कामार्थे च प्रयुयुजः । अलुब्धान् बुद्धिसम्पन्नान् सर्वकर्मसु योजयेत् ।। ८ ।। तुम लोभी और मूर्ख मनुष्योंको काम और अर्थके साधनमें न लगाओ। जो लोभरहित और बुद्धिमान् हों, उन्हींको समस्त कार्योंमें नियुक्त करना चाहिये ।। ८ ।।

मूर्खो ह्यधिकृतोऽर्थेषु कार्याणामविशारदः । प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन कामक्रोधसमन्वितः ।। ९ ।। जो कार्यसाधनमें कुशल नहीं है और काम तथा क्रोधके वशमें पड़ा हुआ है, ऐसे मूर्ख मनुष्यको यदि अर्थसंग्रहका अधिकारी बना दिया जाय तो वह अनुचित उपायसे प्रजाओंको क्लेश पहुँचाता है ।। ९ ।।

बलिषष्ठेन शुक्लेन दण्डेनाथापराधिनाम् । शास्त्रानीतेन लिप्सेथा वेतनेन धनागमम् ।। १० ।। प्रजाकी आयका छठा भाग करके रूपमें ग्रहण करके; उचित शुल्क या टैक्स लेकर, अपराधियोंको आर्थिक दण्ड देकर तथा शास्त्रके अनुसार व्यापारियोंकी रक्षा आदि करनेके कारण उनके दिये हुए वेतन लेकर इन्हीं उपायों तथा मार्गोंसे राजाको धन-संग्रहकी इच्छा रखनी चाहिये ।। १० ।।

दापयित्वा करं धर्म्यं राष्ट्रं नीत्या यथाविधि । तथैतं कल्पयेद् राजा योगक्षेममतन्द्रितः ।। ११ ।। प्रजासे धर्मानुकूल कर ग्रहण करके राज्यका नीतिके अनुसार विधिपूर्वक पालन करते हुए राजाको आलस्य छोड़कर प्रजावर्गके योगक्षेमकी व्यवस्था करनी चाहिये ।। ११ ।।

गोपायितारं दातारं धर्मनित्यमतन्द्रितम् । अकामद्वेषसंयुक्तमनुरज्यन्ति मानवाः ।। १२ ।। जो राजा आलस्य छोड़कर रण-द्वेषसे रहित हो सदा प्रजाकी रक्षा करता है, दान देता है तथा निरन्तर धर्म एवं न्यायमें तत्पर रहता है, उसके प्रति प्रजावर्गके सभी लोग अनुरक्त होते हैं ।। १२ ।।

मा स्माधर्मेण लोभेन लिप्सेथास्त्वं धनागमम् । धर्मार्थावध्रुवौ तस्य यो न शास्त्रपरो भवेत् ।। १३ ।।

राजन्! तुम लोभवश अधर्ममार्गसे धन पानेकी कभी इच्छा न करना; क्योंकि जो लोग शास्त्रके अनुसार नहीं चलते हैं, उनके धर्म और अर्थ दोनों ही अस्थिर एवं अनिश्चित होते हैं॥ १३॥ अपशास्त्रपरो राजा धर्मार्थान्नाधिगच्छति। अस्थाने चास्य तद् वित्तं सर्वमेव विनश्यति॥ १४॥ शास्त्रसे विपरीत चलनेवाला राजा न तो धर्मकी सिद्धि कर पाता है और न अर्थकी ही। यदि उसे धन मिल भी जाय तो वह सारा ही बुरे कामोंमें नष्ट हो जाता है॥ १४॥ अर्थमूलोऽपि हिंसां च कुरुते स्वयमात्मनः। करैरशास्त्रदृष्टैर्हि मोहात् सम्पीडयन् प्रजाः॥ १५॥ जो धनका लोभी राजा मोहवश प्रजासे शास्त्रविरुद्ध अधिक कर लेकर उसे कष्ट पहुँचाता है, वह अपने ही हाथों अपना विनाश करता है॥ १५॥ ऊधश्छिन्द्यात् तु यो धेन्वाः क्षीरार्थी न लभेत् पयः। एवं राष्ट्रमयोगेन पीडितं न विवर्धते॥ १६॥ जैसे दूध चाहनेवाला मनुष्य यदि गायका थन काट ले तो इससे वह दूध नहीं पा सकता, उसी प्रकार राज्यमें रहनेवाली प्रजाका अनुचित उपायसे शोषण किया जाय तो उससे राष्ट्रकी उन्नति नहीं होती॥ १६॥ यो हि दोग्ध्रीमुपास्ते च स नित्यं विन्दते पयः। एवं राष्ट्रमुपायेन भुञ्जानो लभते फलम्॥ १७॥ जो दूध देनेवाली गायकी प्रतिदिन सेवा करता है, वही दूध पाता है; इसी प्रकार उचित उपायसे राष्ट्रकी रक्षा करनेवाला राजा ही उससे लाभ उठाता है॥ १७॥ अथ राष्ट्रमुपायेन भुज्यमानं सुरक्षितम्। जनयत्यतुलां नित्यं कोशवृद्धिं युधिष्ठिर॥ १८॥ युधिष्ठिर! न्यायसंगत उपायसे राष्ट्रको सुरक्षित रखते हुए उसका उपभोग किया जाय अर्थात् करके रूपमें उससे धन लिया जाय तो वह सदा राजाके कोशकी अनुपम वृद्धि करता है॥ १८॥ दोग्ध्री धान्यं हिरण्यं च मही राज्ञा सुरक्षिता। नित्यं स्वेभ्यः परेभ्यश्च तृप्ता माता यथा पयः॥ १९॥ जैसे माता स्वयं तृप्त रहनेपर ही बालकको यथेष्ट दूध पिलाती है, उसी प्रकार राजासे सुरक्षित होनेपर ही यह दुधारू गायके समान पृथ्वी राजाके स्वजनों तथा दूसरे लोगोंको सदा अन्न एवं सुवर्ण देती है॥ १९॥ मालाकारोपमो राजन् भव माऽऽङ्गारिकोपमः। तथायुक्तश्चिरं राज्यं भोक्तं शक्ष्यसि पालयन्॥ २०॥

युधिष्ठिर! तुम मालीके समान बनो। कोयला बनानेवालेके समान न बनो (माली वृक्षकी जड़को सींचता और उसकी रक्षा करता है, तब उससे फल और फूल ग्रहण करता है, परंतु कोयला बनानेवाला वृक्षको समूल नष्ट कर देता है; उसी प्रकार तुम भी माली बनकर राज्यरूपी उद्यानको सींचकर सुरक्षित रखो और फल-फूलकी तरह प्रजासे न्यायोचित कर लेते रहो, कोयला बनानेवालेकी तरह सारे राज्यको जलाकर भस्म न करो), ऐसा करके प्रजापालनमें तत्पर रहकर तुम दीर्घकालतक राज्यका उपभोग कर सकोगे ।। २० ।।
परचक्राभियानेन यदि ते स्याद् धनक्षयः ।
अथ साम्नैव लिप्सेथा धनमब्राह्मणेषु यत् ।। २१ ।।
यदि शत्रुओंके आक्रमणसे तुम्हारे धनका नाश हो जाय तो भी सान्त्वनापूर्ण मधुर वाणीद्वारा ही ब्राह्मणेतर प्रजासे धन लेनेकी इच्छा रखो ।। २१ ।।
मा स्म ते ब्राह्मणं दृष्ट्वा धनस्थं प्रचलन्मनः ।
अन्त्यायामप्यवस्थायां किमु स्फीतस्य भारत ।। २२ ।।
भरतनन्दन! धनसम्पन्न अवस्थाकी तो बात ही क्या है? तुम अत्यन्त निर्धन अवस्थामें पड़ जाओ तो भी ब्राह्मणको धनी देखकर उसका धन लेनेके लिये तुम्हारा मन चञ्चल नहीं होना चाहिये ।। २२ ।।
धनानि तेभ्यो दद्यास्त्वं यथाशक्ति यथार्हतः ।
सान्त्वयन् परिरक्षंश्च स्वर्गमाप्स्यसि दुर्जयम् ।। २३ ।।
राजन्! तुम ब्राह्मणोंको सान्त्वना देते और उनकी रक्षा करते हुए उन्हें यथाशक्ति यथायोग्य धन देते रहना, इससे तुम्हें दुर्जय स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी ।। २३ ।।
एवं धर्मेण वृत्तेन प्रजास्त्वं परिपालय ।
स्वन्तं पुण्यं यशो नित्यं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ।। २४ ।।
कुरुनन्दन! इस प्रकार तुम धर्मानुकूल बर्ताव करते हुए प्रजाजनोंका पालन करो। इससे परिणाममें सुखद पुण्य तथा चिरस्थायी यश प्राप्त कर लोगे ।। २४ ।।
धर्मेण व्यवहारेण प्रजाः पालय पाण्डव ।
युधिष्ठिर यथा युक्तो नाधिबन्धेन योक्ष्यसे ।। २५ ।।
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! तुम धर्मानुकूल बर्ताव करते हुए प्रजाका पालन करते रहो, जिससे युक्त रहकर तुम्हें कभी भी चिन्ता या पश्चात्ताप न हो ।। २५ ।।
एष एव परो धर्मो यद् राजा रक्षति प्रजाः ।
भूतानां हि यथा धर्मो रक्षणं परमा दया ।। २६ ।।
राजा जो प्रजाकी रक्षा करता है, यही उसका सबसे बड़ा धर्म है। समस्त प्राणियोंकी रक्षा तथा उनके प्रति परम दया ही महान् धर्म है ।। २६ ।।
तस्मादेवं परं धर्मं मन्यन्ते धर्मकोविदाः ।
यो राजा रक्षणे युक्तो भूतेषु कुरुते दयाम् ।। २७ ।।

इसलिये जो राजा प्रजापालनमें तत्पर रहकर प्राणियोंपर दया करता है, उसके इस बर्तावको धर्मज्ञ पुरुष परम धर्म मानते हैं ॥ २७ ॥

यदह्ना कुरुते पापमरक्षन् भयत: प्रजा: ।
राजा वर्षसहस्रेण तस्यान्तमधिगच्छति ॥ २८ ॥
राजा प्रजाकी भयसे रक्षा न करनेके कारण एक दिनमें जिस पापका भागी होता है, उसका परिणाम उसे एक हजार वर्षोंतक भोगना पड़ता है ॥ २८ ॥

यदह्ना कुरुते धर्मं प्रजा धर्मेण पालयन् ।
दशवर्षसहस्राणि तस्य भुंक्ते फलं दिवि ॥ २९ ॥
और प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करनेके कारण राजा एक दिनमें जिस धर्मका भागी होता है, उसका फल वह दस हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें रहकर भोगता है ॥ २९ ॥

स्विष्टि: स्वधीति: सुतपा लोकाञ्जयति यावत: ।
क्षणेन तानवाप्नोति प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ ३० ॥
उत्तम यज्ञके द्वारा गृहस्थ-धर्मका, उत्तम स्वाध्यायके द्वारा ब्रह्मचर्यका तथा श्रेष्ठ तपके द्वारा वानप्रस्थ-धर्मका पालन करनेवाला पुरुष जितने पुण्यलोकोंपर अधिकार प्राप्त करता है, धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करनेवाला राजा उन्हें क्षणभरमें पा लेता है ॥ ३० ॥

एवं धर्मं प्रयत्नेन कौन्तेय परिपालय ।
तत: पुण्यफलं लब्ध्वा नाधिबन्धेन योक्ष्यसे ॥ ३१ ॥
कुन्तीनन्दन! इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक धर्मका पालन करो। इससे पुण्यका फल पाकर तुम कभी चिन्तामें नहीं पड़ोगे ॥ ३१ ॥

स्वर्गलोके सुमहतीं श्रियं प्राप्स्यसि पाण्डव ।
असम्भवश्च धर्मानामीदृशानामराजसु ॥ ३२ ॥
पाण्डुनन्दन! धर्मपालन करनेसे स्वर्गलोकमें तुम्हें बड़ी भारी सुख-सम्पत्ति प्राप्त होगी। जो राजा नहीं हैं, उन्हें ऐसे धर्मोंका लाभ मिलना असम्भव है ॥ ३२ ॥

तस्माद् राजैव नान्योऽस्ति यो धर्मफलमाप्नुयात् ।
स राज्यं धृतिमान् प्राप्य धर्मेण परिपालय ।
इन्द्रं तर्पय सोमेन कामैश्च सुहृदो जनान् ॥ ३३ ॥
इसलिये धर्मात्मा राजा ही ऐसे धर्मका फल पाता है, दूसरा नहीं। तुम धैर्यवान् तो हो ही। यह राज्य पाकर धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करो। यज्ञमें सोमरसद्वारा इन्द्रको तृप्त करो और मनोवांछित वस्तु प्रदान करके सुहृदोंको संतुष्ट करो ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि एकसप्ततितमोऽध्याय: ॥ ७१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७१ ।।

अध्याय (पृष्ठ 497)

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द्विसप्ततितमोऽध्यायः

राजाके लिये सदाचारी विद्वान् पुरोहितकी आवश्यकता तथा प्रजापालनका महत्त्व

भीष्म उवाच

य एव तु सतो रक्षेदसतःश्च निवर्तयेत् ।
स एव राज्ञः कर्तव्यो राजन् राजपुरोहितः ॥ १ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! राजाको चाहिये कि वह एक ऐसे विद्वान् ब्राह्मणको अपना पुरोहित बनाये, जो उसके सत्कर्मोंकी रक्षा करे और उसे असत् कर्मसे दूर रखे (तथा जो उसके शुभकी रक्षा और अशुभका निवारण करे) ॥ १ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
पुरूरवस ऐलस्य संवादं मातरिश्वनः ॥ २ ॥
इस विषयमें विद्वान् लोग इला कुमार पुरूरवा तथा वायुके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

पुरूरवा उवाच

कुतःस्विद् ब्राह्मणो जातो वर्णाश्चापि कुतस्त्रयः ।
कस्माच्च भवति श्रेष्ठस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥
**पुरूरवाने पूछा—**वायुदेव! ब्राह्मणकी उत्पत्ति किससे हुई है? अन्य तीनों वर्ण भी किससे उत्पन्न हुए हैं तथा ब्राह्मण उन सबसे श्रेष्ठ क्यों है? यह मुझे स्पष्टरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ ३ ॥

मातरिश्वोवाच

ब्राह्मणो मुखतः सृष्टो ब्रह्मणो राजसत्तम ।
बाहुभ्यां क्षत्रियः सृष्ट ऊरुभ्यां वैश्य एव च ॥ ४ ॥
**वायुने कहा—**नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीके मुखसे ब्राह्मणकी, दोनों भुजाओंसे क्षत्रियकी तथा दोनों ऊरुओंसे वैश्यकी सृष्टि हुई है ॥ ४ ॥

वर्णानां परिचर्यार्थं त्रयाणां भरतर्षभ ।
वर्णश्चतुर्थः पश्चात् तु पद्भ्यां शूद्रो विनिर्मितः ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसके बाद इन तीनों वर्णोंकी सेवाके लिये ब्रह्माजीके दोनों पैरोंसे चौथे वर्ण शूद्रकी रचना हुई ॥ ५ ॥

ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यामनुजायते ।
ईश्वरः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये ॥ ६ ॥

ब्राह्मण जन्मकालसे ही भूतलपर धर्मकोशकी रक्षाके लिये अन्य सब वर्णोंका नियन्ता होता है ।। ६ ।। अतः पृथिव्या यन्तारं क्षत्रियं दण्डधारिणम् । द्वितीयं वर्णमकरोत् प्रजानामनुगुप्तये ।। ७ ।। तदनन्तर ब्रह्माजीने पृथ्वीपर शासन करनेवाले और दण्डधारणमें समर्थ दूसरे वर्ण क्षत्रियको प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये नियुक्त किया ।। ७ ।। वैश्यस्तु धनधान्येन त्रीन् वर्णान् विध्यादिमान् । शूद्रो ह्येतान् परिचरेदिति ब्रह्मानुशासनम् ।। ८ ।। वैश्य धन-धान्यके द्वारा इन तीनों वर्णोंका पोषण करे और शूद्र शेष तीनों वर्णोंकी सेवामें संलग्न रहे, यह ब्रह्माजीका आदेश है ।। ८ ।।

ऐल उवाच

द्विजस्य क्षत्रबन्धोर्वा कस्येयं पृथिवी भवेत् । धर्मतः सह वित्तेन सम्यग् वायो प्रचक्ष्व मे ।। ९ ।। पुरूरवाने पूछा—वायुदेव! धन-धान्यसहित यह पृथ्वी धर्मतः किसकी है? ब्राह्मणकी या क्षत्रियकी? यह मुझे ठीक-ठीक बताइये ।। ९ ।।

वायुरुवाच

विप्रस्य सर्वमेवैतद् यत्र किञ्चिज्जगतीगतम् । ज्येष्ठेनाभिजनेनेह तद्धर्मकुशला विदुः ।। १० ।। वायुदेवने कहा—राजन्! धर्मनिपुण विद्वान् ऐसा मानते हैं कि उत्तम स्थानसे उत्पन्न और ज्येष्ठ होनेके कारण इस पृथ्वीपर जो कुछ है, वह सब ब्राह्मणका ही है ।। १० ।। स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च । गुरुर्हि सर्ववर्णानां ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च वै द्विजः ।। ११ ।। ब्राह्मण अपना ही खाता, अपना ही पहनता और अपना ही देता है। निश्चय ही ब्राह्मण सब वर्णोंका गुरु, ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है ।। ११ ।। पत्यभावे यथैव स्त्री देवरं कुरुते पतिम् । आनन्तर्यात् तथा क्षत्रं पृथिवी कुरुते पतिम् । एष ते प्रथमः कल्प आपद्यन्यो भवेत् ततः ।। १२ ।। जैसे वाग्दानके अनन्तर पतिके मर जानेपर स्त्री देवरको पति बनाती है*, उसी प्रकार पृथ्वी ब्राह्मणके बाद ही क्षत्रियका पतिरूपमें वरण करती है, यह तुम्हें मैंने अनादि कालसे प्रचलित प्रथम श्रेणीका नियम बताया है। आपत्तिकालमें इसमें फेर-फार भी हो सकता है ।। १२ ।। यदि स्वर्गं परं स्थानं स्वधर्मं परिमार्गसि ।

यत् किञ्चिज्जयसे भूमिं ब्राह्मणाय निवेदय ।। १३ ।।
श्रुतवृत्तोपपन्नाय धर्मज्ञाय तपस्विने ।
स्वधर्मपरितृप्ताय यो न वित्तपरो भवेत् ।। १४ ।।
यदि तुम स्वधर्म-पालनके फलस्वरूप स्वर्गलोकमें उत्तम स्थानकी खोज कर रहे हो (चाहते हो) तो जितनी भूमिपर तुम विजय प्राप्त करो, वह सब शास्त्र और सदाचारसे सम्पन्न, धर्मज्ञ, तपस्वी तथा स्वधर्मसे संतुष्ट ब्राह्मणको पुरोहित बनाकर सौंप दो, जो कि धनोपार्जनमें आसक्त न हो ।। १३-१४ ।।
यो राजानं नयेद् बुद्ध्या सर्वतः परिपूर्णया ।
ब्राह्मणो हि कुले जातः कृतप्रज्ञो विनीतवान् ।। १५ ।।
श्रेयो नयति राजानं ब्रुवंश्चित्रां सरस्वतीम् ।
राजा चरति यद् धर्मं ब्राह्मणेन निदर्शितम् ।। १६ ।।
तथा जो सर्वतोभावसे परिपूर्ण अपनी बुद्धिके द्वारा राजाको सन्मार्गपर ले जा सके; क्योंकि जो ब्राह्मण उत्तम कुलमें उत्पन्न, विशुद्ध बुद्धिसे युक्त और विनयशील होता है, वह विचित्र वाणी बोलकर राजाको कल्याणके पथपर ले जाता है। जो ब्राह्मणका बताया हुआ धर्म है, उसीको राजा आचरणमें लाता है ।। १५-१६ ।।
शुश्रूषुरनहंवादी क्षत्रधर्मव्रते स्थितः ।
तावता सत्कृतः प्राज्ञश्चिरं यशसि तिष्ठति ।। १७ ।।
तस्य धर्मस्य सर्वस्य भागी राजपुरोहितः ।
क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाला, अहंकारशून्य तथा पुरोहितकी बात सुननेके लिये उत्सुक, उतनेसे ही सम्मानको प्राप्त हुआ विद्वान् नरेश चिरकालतक यशस्वी बना रहता है तथा राजपुरोहित उसके सम्पूर्ण धर्मका भागीदार होता है ।। १७ १/२ ।।
एवमेव प्रजाः सर्वा राजानमभिसंश्रिताः ।। १८ ।।
सम्यग्वृत्ताः स्वधर्मस्था न कुतश्चिद् भयान्विताः ।
इस प्रकार राजाके आश्रयमें रहकर सारी प्रजा सदाचारपरायण, अपने-अपने धर्ममें तत्पर और सब ओरसे निर्भय हो जाती है ।। १८ १/२ ।।
राष्ट्रे चरन्ति यं धर्मं राज्ञा साध्वभिरक्षिताः ।। १९ ।।
चतुर्थं तस्य धर्मस्य राजा भागं तु विन्दति ।
राजाके द्वारा भलीभाँति सुरक्षित हुए मनुष्य राज्यमें जिस धर्मका आचरण करते हैं, उसका एक चौथाई भाग राजा भी प्राप्त कर लेता है ।। १९ १/२ ।।
देवा मनुष्याः पितरो गन्धर्वोरगराक्षसाः ।। २० ।।
यज्ञमेवोपजीवन्ति नास्ति चेष्टमराजके ।