महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
जो लोग ब्राह्मणोंको, उनमें भी विशेषतः श्रोत्रियोंको अत्यन्त प्रसन्नताके साथ अच्छी प्रकारसे बनाये हुए उत्तम अन्नका भोजन कराते हैं, वे महात्मा पुरुष विचित्र विमानोंपर बैठकर यमलोककी यात्रा करते हैं। उस महान् पथमें सुन्दर स्त्रियाँ और अप्सराएँ उनकी सेवा करती रहती हैं ।।
ये च नित्यं प्रभाषन्ते सत्यं निष्कल्मषं वचः ।
ते च यान्त्यमलाभ्राभैर्विमानैर्वृषयोजितैः ॥
जो प्रतिदिन निष्कपटभावसे सत्यभाषण करते हैं, वे निर्मल बादलोंके समान बैल जुते हुए विमानोंद्वारा यमलोकमें जाते हैं ।।
कपिलाद्यानि पुण्यानि गोप्रदानानि ये नराः ।
ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छन्ति श्रोत्रियेभ्यो विशेषतः ॥
ते यान्त्यमलवर्णाभैर्विमानैर्वृषयोजितैः ।
वैवस्वतपुरं प्राप्य ह्याप्सरोभिर्निषेविताः ॥
जो ब्राह्मणोंको और उनमें भी विशेषतः श्रोत्रियोंको कपिला आदि गौओंका पवित्र दान देते रहते हैं, वे निर्मल कान्तिवाले बैल जुते हुए विमानोंमें बैठकर यमलोकको जाते हैं। वहाँ अप्सराएँ उनकी सेवा करती हैं ।।
उपानहौ च छत्रं च शयनान्यासनानि च ।
विप्रेभ्यो ये प्रयच्छन्ति वस्त्राण्याभरणानि च ॥
ते यान्त्यश्वैर्वृषैर्वापि कुञ्जरैरप्यलंकृताः ।
धर्मराजपुरं रम्यं सौवर्णच्छत्रशोभिताः ॥
जो ब्राह्मणोंको छाता, जूता, शय्या, आसन, वस्त्र और आभूषण दान करते हैं, वे सोनेके छत्र लगाये उत्तम गहनोंसे सज-धजकर घोड़े, बैल अथवा हाथीकी सवारीसे धर्मराजके सुन्दर नगरमें प्रवेश करते हैं ।।
ये फलानि प्रयच्छन्ति पुष्पाणि सुरभीणि च ।
हंसयुक्तैर्विमानैस्तु यान्ति धर्मपुरं नराः ॥
जो सुगन्धित फूल और फलका दान करते हैं, वे मनुष्य हंसयुक्त विमानोंके द्वारा धर्मराजके नगरमें जाते हैं ।।
ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यो विचित्रान्नं घृताप्लुतम् ।
ते व्रजन्त्यमलाभ्राभैर्विमानैर्वायुवेगिभिः ।
पुरं तत् प्रेतनाथस्य नानाजनसमाकुलम् ॥
जो ब्राह्मणोंको घीमें तैयार किये हुए भाँति-भाँतिके पकवान दान करते हैं, वे वायुके समान वेगवाले सफेद विमानोंपर बैठकर नाना प्राणियोंसे भरे हुए यमपुरकी यात्रा करते हैं ।।
पानीयं ये प्रयच्छन्ति सर्वभूतप्रजीवनम् ।
ते सुतृप्ताः सुखं यान्ति भवनैर्हंसचोदितैः ॥
जो समस्त प्राणियोंको जीवन देनेवाले जलका दान करते हैं, वे अत्यन्त तृप्त होकर हंस जुते हुए विमानोंद्वारा सुखपूर्वक धर्मराजके नगरमें जाते हैं॥
ये तिलं तिलधेनुं वा घृतधेनुमथापि वा ।
श्रोत्रियेभ्यः प्रयच्छन्ति सौम्यभावसमन्विताः ॥
सूर्यमण्डलसंकाशैर्यानैस्ते यान्ति निर्मलैः ।
गीयमानैस्तु गन्धर्वैर्वैवस्वतपुरं नृप ॥
राजन्! जो लोग शान्तभावसे युक्त होकर श्रोत्रिय ब्राह्मणको तिल अथवा तिलकी गौ या घृतकी गौका दान करते हैं, वे सूर्यमण्डलके समान तेजस्वी निर्मल विमानोंद्वारा गन्धर्वोंके गीत सुनते हुए यमराजके नगरमें जाते हैं॥
तेषां वाप्यश्च कूपाश्च तटाकानि सरांसि च ।
दीर्घिकाः पुष्करिण्यश्च सजलाश्च जलाशयाः ॥
यानैस्ते यान्ति चन्द्राभैर्दिव्यघण्टानिनादितैः ।
चामरैस्तालवृन्तैश्च वीज्यमानाः महाप्रभाः ।
नित्यतृप्ता महात्मानो गच्छन्ति यमसादनम् ॥
जिन्होंने इस लोकमें बावड़ी, कुएँ, तालाब, पोखरे, पोखरियाँ और जलसे भरे हुए जलाशय बनवाये हैं, वे चन्द्रमाके समान उज्ज्वल और दिव्य घण्टानादसे निनादित विमानोंपर बैठकर यमलोकमें जाते हैं; उस समय वे महात्मा नित्यतृप्त और महान् कान्तिमान् दिखायी देते हैं तथा दिव्यलोकके पुरुष उन्हें ताड़के पंखे और चँवर डुलाया करते हैं॥
येषां देवगृहाणीह चित्राण्यायतनानि च ।
मनोहराणि कान्तानि दर्शनीयानि भान्ति च ॥
ते व्रजन्त्यमलाभ्राभैर्विमानैर्वायुवेगिभिः ।
तत्पुरं प्रेतनाथस्य नानाजनपदाकुलम् ॥
जिनके बनवाये हुए देवमन्दिर यहाँ अत्यन्त चित्र-विचित्र, विस्तृत, मनोहर, सुन्दर और दर्शनीय रूपमें शोभा पाते हैं, वे सफेद बादलोंके समान कान्तिमान् एवं हवाके समान वेगवाले विमानोंद्वारा नाना जनपदोंसे युक्त यमलोककी यात्रा करते हैं॥
वैवस्वतं च पश्यन्ति सुखचित्तं सुखस्थितम् ।
यमेन पूजिता यान्ति देवसालोक्यतां ततः ॥
वहाँ जानेपर वे यमराजको प्रसन्नचित्त और सुखपूर्वक बैठे हुए देखते हैं तथा उनके द्वारा सम्मानित होकर देवलोकके निवासी होते हैं॥
काष्ठपादुकदा यान्ति तदध्वानं सुखं नराः ।
सौवर्णमणिपीठे तु पादं कृत्वा रथोत्तमे ॥
खड़ाऊँ और जल-दान करनेवाले मनुष्योंको उस मार्गमें सुख मिलता है। वे उत्तम रथपर बैठकर सोनेके पीढ़ेपर पैर रखे हुए यात्रा करते हैं ।। आरामान् वृक्षषण्डांश्च रोपयन्ति च ये नराः । संवर्धयन्ति चाव्यग्रं फलपुष्पोपशोभितम् ।। वृक्षच्छायासु रम्यासु शीतलासु स्वलंकृताः । यान्ति ते वाहनैर्दिव्यैः पूज्यमाना मुहुर्मुहुः ।। जो लोग बड़े-बड़े बगीचे बनवाते और उसमें वृक्षोंके पौधे रोपते हैं तथा शान्तिपूर्वक जलसे सींचकर उन्हें फल-फूलोंसे सुशोभित करके बढ़ाया करते हैं, वे दिव्य वाहनोंपर सवार हो आभूषणोंसे सज-धजकर वृक्षोंकी अत्यन्त रमणीय एवं शीतल छायामें होकर दिव्य पुरुषोंद्वारा बारंबार सम्मान पाते हुए यमलोकमें जाते हैं ।। अश्वयानं तु गोयानं हस्तियानमथापि वा । ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यो विमानैः कनकोपमैः ।। जो ब्राह्मणोंको घोड़े, बैल अथवा हाथीकी सवारी दान करते हैं, वे सोनेके समान विमानोंद्वारा यमलोकमें जाते हैं ।। भूमिदा यान्ति तं लोकं सर्वकामैः सुतर्पिताः । उदितादित्यसंकाशैर्विमानैर्वृषयोजितैः ।। भूमिदान करनेवाले लोग समस्त कामनाओंसे तृप्त होकर बैल जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंके द्वारा उस लोककी यात्रा करते हैं ।। सुगन्धागन्धसंयोगान् पुष्पाणि सुरभीणि च । प्रयच्छन्ति द्विजाग्र्येभ्यो भक्त्या परमया युताः ।। सुगन्धाः सुष्ठुवेषाश्च सुप्रभाः स्रग्विभूषणाः । यान्ति धर्मपुरं यानैर्विचित्रैरप्यलंकृताः ।। जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको अत्यन्त भक्तिपूर्वक सुगन्धित पदार्थ तथा पुष्प प्रदान करते हैं, वे सुगन्धपूर्ण सुन्दर वेश धारणकर उत्तम कान्तिसे देदीप्यमान हो सुन्दर हार पहने हुए विचित्र विमानोंपर बैठकर धर्मराजके नगरमें जाते हैं ।। दीपदा यान्ति यानैश्च द्योतयन्तो दिशो दश । आदित्यसदृशाकारैर्दीप्यमाना इवाग्नयः ।। दीप-दान करनेवाले पुरुष सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंसे दसों दिशाओंको देदीप्यमान करते हुए साक्षात् अग्निके समान कान्तिमान् स्वरूपसे यात्रा करते हैं ।। गृहावसथदातारो गृहैः काञ्चनवेदिकैः । व्रजन्ति बालसूर्याभैर्धर्मराजपुरं नराः ।। जो घर एवं आश्रयस्थानका दान करनेवाले हैं, वे सोनेके चबूतरोंसे युक्त और प्रातःकालीन सूर्यके समान कान्तिवाले गृहोंके साथ धर्मराजके नगरमें प्रवेश करते हैं ।।
पादाभ्यङ्गं शिरोऽभ्यङ्गं पानं पादोदकं तथा । ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्ते यान्त्यैश्वैर्यमालयम् ॥ जो ब्राह्मणोंको पैरोंमें लगानेके लिये उबटन, सिरपर मलनेके लिये तेल, पैर धोनेके लिये जल और पीनेके लिये शर्बत देते हैं, वे घोड़ेपर सवार होकर यमलोककी यात्रा करते हैं॥
विश्रामयन्ति ये विप्रान् श्रान्तानध्वनि कर्शितान् । चक्रवाकप्रयुक्तेन यान्ति यानेन तेऽपि च ॥ जो रास्तेके थके-माँदे दुर्बल ब्राह्मणोंको ठहरनेकी जगह देकर उन्हें आराम पहुँचाते हैं, वे चक्रवाकसे जुते हुए विमानपर बैठकर यात्रा करते हैं॥
स्वागतेन च यो विप्रान् पूजयेदासनेन च । स गच्छति तदध्वानं सुखं परमनिर्वृतः ॥ जो घरपर आये हुए ब्राह्मणोंको स्वागतपूर्वक आसन देकर उनकी विधिवत् पूजा करते हैं, वे उस मार्गपर बड़े आनन्दके साथ जाते हैं॥
नमः सर्वसहाभ्यश्चेत्यभिख्याय दिने दिने । नमस्करोति नित्यं गां स सुखं याति तत्पथम् ॥ जो प्रतिदिन ‘नमः सर्वसहाभ्यश्च’ ऐसा कहकर गौको नमस्कार करता है, वह यमपुरके मार्गपर सुखपूर्वक यात्रा करता है॥
नमोऽस्तु विप्रदत्तायेत्येवंवादी दिने दिने । भूमिमाक्रमते प्रातः शयनादुत्थितश्च यः ॥ सर्वकामैः स तृप्तात्मा सर्वभूषणभूषितः । याति यानेन दिव्येन सुखं वैवस्वतालयम् ॥ प्रतिदिन प्रातःकाल बिछौनेसे उठकर जो ‘नमोऽस्तु विप्रदत्तायै’ कहते हुए पृथ्वीपर पैर रखता है, वह सब कामनाओंसे तृप्त और सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित होकर दिव्य विमानके द्वारा सुखपूर्वक यमलोकको जाता है॥
अनन्तराशिनो ये तु दम्भानृतविवर्जिताः । तेऽपि सारसयुक्तेन यान्ति यानेन वै सुखम् ॥ जो सबेरे और शामको भोजन करनेके सिवा बीचमें कुछ नहीं खाते तथा दम्भ और असत्यसे बचे रहते हैं, वे भी सारसयुक्त विमानके द्वारा सुखपूर्वक यात्रा करते हैं॥
ये चाप्येकेन भुक्तेन दम्भानृतविवर्जिताः । हंसयुक्तैर्विमानैस्तु सुखं यान्ति यमालयम् ॥ जो दिन-रातमें केवल एक बार भोजन करते हैं और दम्भ तथा असत्यसे दूर रहते हैं, वे हंसयुक्त विमानोंके द्वारा बड़े आरामके साथ यमलोकको जाते हैं॥
चतुर्थेन च भुक्तेन वर्तन्ते ये जितेन्द्रियाः ।
यान्ति ते धर्मनगरं यानैर्बर्हिणयोजितैः ॥ जो जितेन्द्रिय होकर केवल चौथे वक्त अन्न ग्रहण करते हैं अर्थात् एक दिन उपवास करके दूसरे दिन शामको भोजन करते हैं, वे मयूरयुक्त विमानोंके द्वारा धर्मराजके नगरमें जाते हैं ।। तृतीयदिवसेनेह भुज्यते ये जितेन्द्रियाः । तेऽपि हस्तिरथैर्यान्ति तत्पथं कनकोज्ज्वलैः ॥ जो जितेन्द्रिय पुरुष यहाँ तीसरे दिन भोजन करते हैं, वे भी सोनेके समान उज्ज्वल हाथीके रथपर सवार हो यमलोक जाते हैं ।। षष्ठान्नकालिको यस्तु वर्षमेकं तु वर्तते । कामक्रोधविनिर्मुक्तः शुचिर्नित्यं जितेन्द्रियः । स याति कुञ्जरस्थैस्तु जयशब्दरवैर्युतः ॥ जो एक वर्षतक छः दिनोंके बाद भोजन करता है और काम-क्रोधसे रहित, पवित्र तथा सदा जितेन्द्रिय रहता है, वह हाथीके रथपर बैठकर जाता है, रास्तेमें उसके लिये जय-जयकारके शब्द होते रहते हैं ।। पक्षोपवासिनो यान्ति यानैः शार्दूलयोजितैः । धर्मराजपुरं रम्यं दिव्यस्त्रीगणसेवितम् ॥ एक पक्ष उपवास करनेवाले मनुष्य सिंह-जुते हुए विमानके द्वारा धर्मराजके उस रमणीय नगरको जाते हैं, जो दिव्य स्त्रीसमुदायसे सेवित है ।। ये च मासोपवासं वै कुर्वते संयतेन्द्रियाः । तेऽपि सूर्योदयप्रख्यैर्यान्ति यानैर्यमालयम् ॥ जो इन्द्रियोंको वशमें रखकर एक मासतक उपवास करते हैं, वे भी सूर्योदयकी भाँति प्रकाशित विमानोंके द्वारा यमलोकमें जाते हैं ।। गोकृते स्त्रीकृते चैव हत्वा विप्रकृतेऽपि च । ते यान्त्यमरकन्याभिः सेव्यमाना रविप्रभाः ॥ जो गौओंके लिये, स्त्रीके लिये और ब्राह्मणके लिये अपने प्राण दे देते हैं, वे सूर्यके समान कान्तिमान् और देवकन्याओंसे सेवित हो यमलोककी यात्रा करते हैं ।। ये यजन्ति द्विजश्रेष्ठाः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । हंससारससंयुक्तैर्यानैस्ते यान्ति तत्पथम् ॥ जो श्रेष्ठ द्विज अधिक दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, वे हंस और सारसोंसे युक्त विमानोंके द्वारा उस मार्गपर जाते हैं ।। परपीडामकृत्वैव भृत्यान् बिभ्रति ये नराः । तत्पथं ससुखं यान्ति विमानैः काञ्चनोज्ज्वलैः ॥
जो दूसरोंको कष्ट पहुँचाये बिना ही अपने कुटुम्बका पालन करते हैं, वे सुवर्णमय विमानोंके द्वारा सुखपूर्वक यात्रा करते हैं ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[जल-दान, अन्न-दान और अतिथि-सत्कारका माहात्म्य]
[जल-दान, अन्न-दान और अतिथि-सत्कारका माहात्म्य]
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा यमपुराध्वानं जीवानां गमनं तथा ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यमपुरके मार्गका वर्णन तथा वहाँ जीवोंके (सुखपूर्वक) जानेका उपाय सुनकर राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और भगवान् श्रीकृष्णसे फिर बोले— ॥
देवदेवेश दैत्यघ्न ऋषिसंघैरभिष्टुत ।
भगवन् भवहन् श्रीमन् सहस्रादित्यसंनिभ ॥
‘देवदेवेश्वर! आप सम्पूर्ण दैत्योंका वध करनेवाले हैं, ऋषियोंके समुदाय सदा आपकी ही स्तुति करते हैं, आप षडैश्वर्यसे युक्त, भवबन्धनसे मुक्ति देनेवाले, श्रीसम्पन्न और हजारों सूर्योंके समान तेजस्वी हैं ॥
सर्वसम्भव धर्मज्ञ सर्वधर्मप्रवर्तक ।
सर्वदानफलं सौम्य कथयस्व ममाच्युत ॥
‘धर्मज्ञ! आपहीसे सबकी उत्पत्ति हुई है और आप ही सम्पूर्ण धर्मोंके प्रवर्तक हैं। शान्तस्वरूप अच्युत! मुझे सब प्रकारके दानोंका फल बतलाइये ॥
एवमुक्तो हृषीकेशो धर्मपुत्रेण धीमता ।
उवाच धर्मपुत्राय पुण्यान् धर्मान् महोदयान् ॥
बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिरके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्ण धर्मपुत्रके प्रति महान् उन्नति करनेवाले पुण्यमय धर्मोंका वर्णन करने लगे— ॥
पानीयं परमं लोके जीवानां जीवनं स्मृतम् ।
पानीयस्य प्रदानेन तृप्तिर्भवति पाण्डव ।
पानीयस्य गुणा दिव्याः परलोके गुणावहाः ॥
‘पाण्डुनन्दन! संसारमें जलको प्राणियोंका परम जीवन माना गया है, उसके दानसे जीवोंकी तृप्ति होती है। जलके गुण दिव्य हैं और वे परलोकमें भी लाभ पहुँचानेवाले हैं ॥
तत्र पुष्पोदकी नाम नदी परमपावनी ।
कामान् ददाति राजेन्द्र तोयदानां यमालये ॥
‘राजेन्द्र! यमलोकमें पुष्पोदकी नामवाली परम पवित्र नदी है। वह जल-दान करनेवाले पुरुषोंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करती है ॥
शीतलं सलिलं ह्यत्र ह्यक्षय्यममृतोपमम् ।
शीत्तोयप्रदातॄणां भवेन्नित्यं सुखावहम् ॥
'उसका जल ठण्डा, अक्षय और अमृतके समान मधुर है तथा वह ठंडे जलका दान करनेवाले लोगोंको सदा सुख पहुँचाता है ।। प्रणश्यत्यम्बुपानेन बुभुक्षा च युधिष्ठिर । तृषितस्य न चान्नेन पिपासाभिप्रणश्यति । तस्मात् तोयं सदा देयं तृषितेभ्यो विजानता ।। 'युधिष्ठिर! जल पीनेसे भूख भी शान्त हो जाती है; किंतु प्यासे मनुष्यकी प्यास अन्नसे नहीं बुझती, इसलिये समझदार मनुष्यको चाहिये कि वह प्यासेको सदा पानी पिलाया करे ।। अग्नेर्मूर्तिः क्षितेर्योनिरमृतस्य च सम्भवः । अतोऽम्भः सर्वभूतानां मूलमित्युच्यते बुधैः ।। 'जल अग्निकी मूर्ति है, पृथ्वीकी योनि (कारण) है और अमृतका उत्पत्ति स्थान है। इसलिये समस्त प्राणियोंका मूल जल है—ऐसा बुद्धिमान् पुरुषोंने कहा है ।। अद्भिः सर्वाणि भूतानि जीवन्ति प्रभवन्ति च । तस्मात् सर्वेषु दानेषु तोयदानं विशिष्यते ।। 'सब प्राणी जलसे पैदा होते हैं और जलसे ही जीवन धारण करते हैं। इसलिये जलदान सब दानोंसे बढ़कर माना गया है ।। ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्त्वन्नदानं सुसंस्कृतम् । तैस्तु दत्ताः स्वयं प्राणा भवन्ति भरतर्षभ ।। 'भरतश्रेष्ठ! जो लोग ब्राह्मणोंको सुपक्व अन्नदान करते हैं, वे मानो साक्षात् प्राण-दान करते हैं ।। अन्नाद् रक्तं च शुक्रं च अन्ने जीवः प्रतिष्ठितः । इन्द्रियाणि च बुद्धिश्च पुष्णन्त्यन्नेन नित्यशः । अन्नहीनानि सीदन्ति सर्वभूतानि पाण्डव ।। 'पाण्डुनन्दन! अन्नसे रक्त और वीर्य उत्पन्न होता है। अन्नमें ही जीव प्रतिष्ठित है। अन्नसे ही इन्द्रियोंका और बुद्धिका सदा पोषण होता है। बिना अन्नके समस्त प्राणी दुःखित हो जाते हैं ।। तेजो बलं च रूपं च सत्त्वं वीर्यं धृतिर्द्युतिः । ज्ञानं मेधा तथाऽऽयुश्च सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ।। 'तेज, बल, रूप, सत्त्व, वीर्य, धृति, द्युति, ज्ञान, मेधा और आयु—इन सबका आधार अन्न ही है ।। देवमानवतिर्यक्षु सर्वलोकेषु सर्वदा । सर्वकालं हि सर्वेषां अन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः ।।
'समस्त लोकोंमें सदा रहनेवाले देवता, मनुष्य और तिर्यक् योनिके प्राणियोंमें सब समय सबके प्राण अन्नमें ही प्रतिष्ठित हैं।। अन्नं प्रजापते रूपमन्नं प्रजननं स्मृतम् । सर्वभूतमयं चान्नं जीवश्चान्नमयः स्मृतः ॥ 'अन्न प्रजापतिकारूप है। अन्न ही उत्पत्तिका कारण है। इसलिये अन्न सर्वभूतमय है और समस्त जीव अन्नमय माने गये हैं।। अन्नेनाधिष्ठितः प्राण अपानो व्यान एव च । उदानश्च समानश्च धारयन्ति शरीरिणम् ॥ 'प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान—ये पाँचों प्राण अन्नके ही आधारपर रहकर देहधारियोंको धारण करते हैं।। शयनोत्थानगमनग्रहणाकर्षणानि च । सर्वसत्त्वकृतं कर्म चान्नादेव प्रवर्तते ॥ 'सम्पूर्ण प्राणियोंद्वारा किये जानेवाले सोना, उठना, चलना, ग्रहण करना, खींचना आदि कर्म अन्नसे ही चलते हैं।। चतुर्विधानि भूतानि जंगमानि स्थिराणि च । अन्नाद भवन्ति राजेन्द्र सृष्टिरेशा प्रजापतेः ॥ 'राजेन्द्र! चारों प्रकारके चराचर प्राणी, जो यह प्रजापतिकी सृष्टि है, अन्नसे ही उत्पन्न होते हैं।। विद्यास्थानानि सर्वाणि सर्वयज्ञाश्च पावनाः । अन्नाद यस्मात् प्रवर्तन्ते तस्मादन्नं परं स्मृतम् ॥ 'समस्त विद्यालय और पवित्र बनानेवाले सम्पूर्ण यज्ञ अन्नसे ही चलते हैं। इसलिये अन्न सबसे श्रेष्ठ माना गया है।। देवा रुद्रादयः सर्वे पितरोऽप्यग्नयस्तथा । यस्मादन्नेन तुष्यन्ति तस्मादन्नं विशिष्यते ॥ 'रुद्र आदि सभी देवता, पितर और अग्नि अन्नसे ही संतुष्ट होते हैं; इसलिये अन्न सबसे बढ़कर है।। यस्मादन्नात् प्रजाः सर्वाः कल्पे कल्पेऽसृजत् प्रभुः । तस्मादन्नात् परं दानं न भूतं न भविष्यति ॥ 'शक्तिशाली प्रजापतिने प्रत्येक कल्पमें अन्नसे ही सारी प्रजाकी सृष्टि की है; इसलिये अन्नसे बढ़कर न कोई दान हुआ है और न होगा।। यस्मादन्नात् प्रवर्तन्ते धर्मार्थौ काम एव च । तस्मादन्नात् परं दानं नामुत्रेह च पाण्डव ॥
'पाण्डुनन्दन! धर्म, अर्थ और कामका निर्वाह अन्नसे ही होता है। अतः इस लोक या परलोकमें अन्नसे बढ़कर कोई दान नहीं है।। यक्षरक्षोग्रहा नागा भूतान्यन्ये च दानवाः। तुष्यन्त्यन्नेन यस्मात् तु तस्मादन्नं परं भवेत्।। 'यक्ष, राक्षस, ग्रह, नाग, भूत और दानव भी अन्नसे ही संतुष्ट होते हैं; इसलिये अन्नका महत्त्व सबसे बढ़कर है।। ब्राह्मणाय दरिद्राय योऽन्नं संवत्सरं नृप। श्रोत्रियाय प्रयच्छेद् वै पाकभेदविवर्जितः।। दम्भानृतविमुक्तस्तु परां भक्तिमुपागतः। स्वधर्मेणार्जितफलं तस्य पुण्यफलं शृणु।। 'राजन्! जो मनुष्य दम्भ और असत्यका परित्याग करके मुझमें परम भक्ति रखकर रसोईमें भेद न करते हुए दरिद्र एवं श्रोत्रिय ब्राह्मणको एक वर्षतक अपने द्वारा धर्मपूर्वक उपार्जित अन्नका दान करता है, उसके पुण्यके फलको सुनो।। शतवर्षसहस्राणि कामगः कामरूपधृक्। मोदतेऽमरलोकस्थः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः।। ततश्चापि च्युतः कालान्न्रलोके द्विजो भवेत्।। 'वह एक लाख वर्षतक बड़े सम्मानके साथ देवलोकमें निवास करता है तथा वहाँ इच्छानुसार रूप धारण करके यथेष्ट विचरता रहता है एवं अप्सराओंका समुदाय उसका सत्कार करता है। फिर समयानुसार पुण्य क्षीण हो जानेपर वह जब स्वर्गसे नीचे उतरता है, तब मनुष्यलोकमें ब्राह्मण होता है।। अग्रभिक्षां च यो दद्याद् दरिद्राय द्विजातये। षण्मासान् वार्षिकं श्राद्धं तस्य पुण्यफलं शृणु।। 'जो छः महीने या वार्षिक श्राद्धपर्यन्त प्रतिदिनकी पहली भिक्षा दरिद्र ब्राह्मणको देता है, उसका पुण्यफल सुनो।। गोसहस्रप्रदानेन यत् पुण्यं समुदाहृतम्। तत् पुण्यफलमाप्नोति नरो वै नात्र संशयः।। 'एक हजार गोदानका जो पुण्यफल बताया गया है, वह उसी पुण्यके समान फल पाता है, इसमें संशय नहीं है।। अध्वश्रान्ताय विप्राय क्षुधितायान्नकाङ्क्षिणे। देशकालाभियाताय दीयते पाण्डुनन्दन।। 'पाण्डुनन्दन! देश-कालके अनुसार प्राप्त एवं रास्ता चलकर थके-माँदे आये हुए भूखे और अन्न चाहनेवाले ब्राह्मणको अन्न-दान करना चाहिये।। यस्तु पांसुलपादश्च दूराध्वश्रमकर्शितः।
क्षुत्पिपासाश्रमश्रान्त आर्तः खिन्नगतिर्द्विजः । पृच्छन् वै ह्यन्नदातारं गृहमभ्येत्य याचयेत् । तं पूजयेत् तु यत्नेन सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥ तस्मिंस्तुष्टे नरश्रेष्ठ तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ ‘जो दूरका रास्ता तय करनेके कारण दुर्बल तथा भूख-प्यास और परिश्रमसे थका-माँदा हो, जिसके पैर बड़ी कठिनतासे आगे बढ़ते हों तथा जो बहुत पीड़ित हो रहा हो, ऐसा ब्राह्मण अन्नदाताका पता पूछता हुआ धूलभरे पैरोंसे यदि घरपर आकर अन्नकी याचना करे तो यत्नपूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि वह अतिथि स्वर्गका सोपान होता है। नरश्रेष्ठ! उसके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं॥
न तथा हविषा होमैर्न पुष्पैर्नानुलेपनैः । अग्नयः पार्थ तुष्यन्ति यथा ह्यतिथिपूजनात् ॥ ‘पार्थ! अतिथिकी पूजा करनेसे अग्निदेवको जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी हविष्यसे होम करने और फूल तथा चन्दन चढ़ानेसे भी नहीं होती॥
देवमाल्यापनयनं द्विजोच्छिष्टापमार्जनम् । श्रान्तसंवाहनं चैव तथा पादावसेचनम् ॥ प्रतिश्रयप्रदानं च तथा शय्यासनस्य च । एकैकं पाण्डवश्रेष्ठ गोप्रदानाद् विशिष्यते ॥ ‘पाण्डवश्रेष्ठ! देवताके ऊपर चढ़ी हुई पत्र-पुष्प आदि पूजन-सामग्रीको हटाकर उस स्थानको साफ करना, ब्राह्मणके जूठे किये हुए बर्तन और स्थानको माँज-धो देना, थके हुए ब्राह्मणका पैर दबाना, उसके चरण धोना, उसे रहनेके लिये घर, सोनेके लिये शय्या और बैठनेके लिये आसन देना—इनमेंसे एक-एक कार्यका महत्त्व गोदानसे बढ़कर है॥
पादोदकं पादघृतं दीपमन्नं प्रतिश्रयम् । ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यो नोपसर्पन्ति ते यमम् ॥ ‘जो मनुष्य ब्राह्मणोंको पैर धोनेके लिये जल, पैरमें लगानेके लिये घी, दीपक, अन्न और रहनेके लिये घर देते हैं, वे कभी यमलोकमें नहीं जाते॥
विप्रातिथ्ये कृते राजन् भक्त्या शुश्रूषितेऽपि च । देवाः शुश्रूषिताः सर्वे त्रयस्त्रिंशदरिंदम ॥ ‘शत्रुदमन! राजन्! ब्राह्मणका आतिथ्य सत्कार तथा भक्तिपूर्वक उसकी सेवा करनेसे समस्त तैंतीसों देवताओंकी सेवा हो जाती है॥
अभ्यागतो ज्ञातपूर्वो ह्यज्ञातोऽतिथिरुच्यते । तयोः पूजां द्विजः कुर्यादिति पौराणिकी श्रुतिः ॥ ‘पहलेका परिचित मनुष्य यदि घरपर आवे तो उसे अभ्यागत कहते हैं और अपरिचित पुरुष अतिथि कहलाता है। द्विजोंको इन दोनोंकी ही पूजा करनी चाहिये। यह पञ्चम वेद
—पुराणकी श्रुति है ।।
पादाभ्यङ्गान्नपानैस्तु योऽतिथिं पूजयेन्नरः ।
पूजितस्तेन राजेन्द्र भवामीह न संशयः ।।
'राजेन्द्र! जो मनुष्य अतिथिके चरणोंमें तेल मलकर, उसे भोजन कराकर और पानी पिलाकर उसकी पूजा करता है, उसके द्वारा मेरी भी पूजा हो जाती है—इसमें संशय नहीं है ।।
शीघ्रं पापाद् विनिर्मुक्तो मया चानुगृहीकृतः ।
विमानेनेन्दुकल्पेन मम लोकं स गच्छति ।।
'वह मनुष्य तुरंत सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है और मेरी कृपासे चन्द्रमाके समान उज्ज्वल विमानपर आरूढ़ होकर मेरे परमधामको पधारता है ।।
अभ्यागतं श्रान्तमनुव्रजन्ति
देवाश्च सर्वे पितरोऽग्नयश्च ।
तस्मिन् द्विजे पूजिते पूजिताः स्यु-
र्गते निराशाः पितरो व्रजन्ति ।।
'थका हुआ अभ्यागत जब घरपर आता है, तब उसके पीछे-पीछे समस्त देवता, पितर और अग्नि भी पदार्पण करते हैं। यदि उस अभ्यागत द्विजकी पूजा हुई तो उसके साथ उन देवता आदिकी भी पूजा हो जाती है और उसके निराश लौटनेपर वे देवता, पितर आदि भी हताश होकर लौट जाते हैं ।।
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते ।
पितरस्तस्य नाश्नन्ति दशवर्षाणि पञ्च च ।।
'जिसके घरसे अतिथिको निराश होकर लौटना पड़ता है, उसके पितर पंद्रह वर्षोंतक भोजन नहीं करते ।।
निर्वासयति यो विप्रं देशकालागतं गृहात् ।
पतितस्तत्क्षणादेव जायते नात्र संशयः ।।
'जो देश-कालके अनुसार घरपर आये हुए ब्राह्मणको वहाँसे बाहर कर देता है, वह तत्काल पतित हो जाता है—इसमें संदेह नहीं है ।।
चाण्डालोऽप्यतिथिः प्राप्तो देशकालेऽन्नकाङ्क्षया ।
अभ्युद्गभ्यो गृहस्थेन पूजनीयश्च सर्वदा ।।
'यदि देश-कालके अनुसार अन्नकी इच्छासे चाण्डाल भी अतिथिके रूपमें आ जाय तो गृहस्थ पुरुषको सदा उसका सत्कार करना चाहिये ।।
मोघं ध्रुवं प्रोर्णयति मोघमस्य तु पच्यते ।
मोघमन्नं सदाश्नाति योऽतिथिं न च पूजयेत् ।।
'जो अतिथिका सत्कार नहीं करता, उसका ऊनी वस्त्र ओढ़ना, अपने लिये रसोई बनवाना और भोजन करना—सब कुछ निश्चय ही व्यर्थ है ।।
साङ्गोपाङ्गांस्तु यो वेदान् पठतीह दिने दिने ।
न चातिथिं पूजयति वृथा भवति स द्विजः ॥ ‘जो प्रतिदिन सांगोपांग वेदोंका स्वाध्याय करता है, किंतु अतिथिकी पूजा नहीं करता, उस द्विजका जीवन व्यर्थ है ॥
पाकयज्ञमहायज्ञैः सोमसंस्थाभिरेव च। ये यजन्ति न चार्चन्ति गृहेष्वतिथिमागतम् ॥ तेषां यशोऽभिकामानां दत्तमिष्टं च यद् भवेत्। वृथा भवति तत् सर्वमाशया हि तया हतम् ॥ ‘जो लोग पाक-यज्ञ, पञ्चमहायज्ञ तथा सोमयाग आदिके द्वारा यजन करते हैं, परंतु घरपर आये हुए अतिथिका सत्कार नहीं करते, वे यशकी इच्छासे जो कुछ दान या यज्ञ करते हैं, वह सब व्यर्थ हो जाता है। अतिथिकी मारी गयी आशा मनुष्यके समस्त शुभ-कर्मोंका नाश कर देती है ॥
देशं कालं च पात्रं च स्वशक्तिं च निरीक्ष्य च। अल्पं समं महद् वापि कुर्यादातिथ्यमाप्तवान् ॥ ‘इसलिये श्रद्धालु होकर देश, काल, पात्र और अपनी शक्तिका विचार करके अल्प, मध्यम अथवा महान् रूपमें अतिथि-सत्कार अवश्य करना चाहिये ॥’
सुमुखः सुप्रसन्नात्मा धीमानतिथिमागतम्। स्वागतेनासनेनाद्भिर्न्नाद्येन च पूजयेत् ॥ ‘जब अतिथि अपने द्वारपर आवे, तब बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह प्रसन्नचित्त होकर हँसते हुए मुखसे अतिथिका स्वागत करे तथा बैठनेको आसन और चरण धोनेके लिये जल देकर अन्न-पान आदिके द्वारा उसकी पूजा करे ॥
हितः प्रियो वा द्वेष्यो वा मूर्खः पण्डित एव वा। प्राप्तो यो वैश्वदेवान्ते सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥ ‘अपना हितैषी, प्रेमपात्र, द्वेषी, मूर्ख अथवा पण्डित—जो कोई भी बलिवैश्वदेवके बाद आ जाय, वह स्वर्गतक पहुँचानेवाला अतिथि है ॥
क्षुत्पिपासाश्रमार्ताय देशकालागताय च। सत्कृत्यान्नं प्रदातव्यं यज्ञस्य फलमिच्छता ॥ ‘जो यज्ञका फल पाना चाहता हो, वह भूख-प्यास और परिश्रमसे दुःखी तथा देश-कालके अनुसार प्राप्त हुए अतिथिको सत्कारपूर्वक अन्न प्रदान करे ॥
भोजयेदात्मनः श्रेष्ठान् विधिवद् हव्यकव्ययोः। अन्नं प्राणो मनुष्याणामन्नदः प्राणदो भवेत् ॥ तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता ॥ ‘यज्ञ और श्राद्धमें अपनेसे श्रेष्ठ पुरुषको विधिवत् भोजन कराना चाहिये। अन्न मनुष्योंका प्राण है, अन्न देनेवाला प्राणदाता होता है; इसलिये कल्याणकी इच्छा रखनेवाले
पुरुषको विशेषरूपसे अन्न-दान करना चाहिये ।।
अन्नदः सर्वकामैस्तु सुतृप्तः सुष्ठ्वलंकृतः ।
पूर्णचन्द्रप्रकाशेन विमानेन विराजता ।।
सेव्यमानो वरस्त्रीभिर्देवलोकं स गच्छति ।
'अन्न प्रदान करनेवाला मनुष्य सब भोगोंसे तृप्त होकर भलीभाँति आभूषणोंसे सम्पन्न हुआ पूर्ण चन्द्रमाके प्रकाशसे प्रकाशित विमानद्वारा देवलोकमें जाता है। वहाँ सुन्दर स्त्रियोंद्वारा उसकी सेवा की जाती है ।।
क्रीडित्वा तु ततस्तस्मिन् वर्षकोटिं यथामरः ।।
ततश्चापि च्युतः कालादिह लोके महायशाः ।
वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ।।
'वहाँ करोड़ वर्षोंतक देवताओंके समान भोग भोगनेके बाद समयपर वहाँसे गिरकर यहाँ महायशस्वी और वेदशास्त्रोंके अर्थ और तत्त्वको जाननेवाला भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है ।।
यथाश्रद्धं तु यः कुर्यान्मनुष्येषु प्रजायते ।
महाधनपतिः श्रीमान् वेदवेदाङ्गपारगः ।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ।।
'जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक अतिथि-सत्कार करता है, वह मनुष्योंमें महान् धनवान्, श्रीमान्, वेद-वेदांगका पारदर्शी, सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थ और तत्त्वका ज्ञाता एवं भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है ।।
सर्वातिथ्यं तु यः कुर्याद् वर्षमेकमकल्मषः ।
धर्मार्जितधनो भूत्वा पाकभेदविवर्जितः ।।
'जो मनुष्य धर्मपूर्वक धनका उपार्जन करके भोजनमें भेद न रखते हुए एक वर्षतक सबका अतिथि-सत्कार करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ।।
सर्वातिथ्यं तु यः कुर्याद् यथाश्रद्धं नरेश्वर ।
अकालनियमेनापि सत्यवादी जितेन्द्रियः ।।
सत्यसंधो जितक्रोधः शाखाधर्मविवर्जितः ।
अधर्मभीरुर्धर्मिष्ठो मायामात्सर्यवर्जितः ।।
श्रद्दधानः शुचिर्नित्यं पाकभेदविवर्जितः ।
स विमानेन दिव्येन दिव्यरूपी महायशाः ।।
पुरंदरपुरं याति गीयमानोऽप्सरोगणैः ।
'नरेश्वर! जो सत्यवादी जितेन्द्रिय पुरुष समयका नियम न रखकर सभी अतिथियोंकी श्रद्धापूर्वक सेवा करता है, जो सत्यप्रतिज्ञ है, जिसने क्रोधको जीत लिया है, जो शाखाधर्मसे रहित, अधर्मसे डरनेवाला और धर्मात्मा है, जो माया और मत्सरतासे रहित है,
जो भोजनमें भेद-भाव नहीं करता तथा जो नित्य पवित्र और श्रद्धासम्पन्न रहता है, वह दिव्य विमानके द्वारा इन्द्रलोकमें जाता है। वहाँ वह दिव्यरूपधारी और महायशस्वी होता है। अप्सराएँ उसके यशका गान करती हैं ।।
मन्वन्तरं तु तत्रैव क्रीडित्वा देवपूजितः ।
मानुष्यलोकमागम्य भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ।।
‘वह एक मन्वन्तरतक वहीं देवताओंसे पूजित होता है और क्रीड़ा करता रहता है। उसके बाद मनुष्यलोकमें आकर भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है’ ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
अध्याय (पृष्ठ 2127)
[भूमि-दान, तिल-दान और उत्तम ब्राह्मणकी महिमा]
श्रीभगवानुवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि भूमिदानमनुत्तमम् ॥
यः प्रयच्छति विप्राय भूमिं रम्यां सदक्षिणाम् ।
श्रोत्रियाय दरिद्राय साग्निहोत्राय पाण्डव ॥
स सर्वकामतृप्तात्मा सर्वरत्नविभूषितः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो दीप्यमानोऽर्कवत् तदा ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**पाण्डुनन्दन! अब मैं सबसे उत्तम भूमिदानका वर्णन करता हूँ। जो मनुष्य रमणीय भूमिको दक्षिणाके साथ श्रोत्रिय अग्निहोत्री दरिद्र ब्राह्मणको दान देता है, वह उस समय सभी भोगोंसे तृप्त, सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित एवं सब पापोंसे मुक्त हो सूर्यके समान देदीप्यमान होता है ॥
बालसूर्यप्रकाशेन विचित्रध्वजशोभिना ।
याति यानेन दिव्येन मम लोकं महायशाः ॥
वह महायशस्वी पुरुष प्रातःकालीन सूर्यके समान प्रकाशित, विचित्र ध्वजाओंसे सुशोभित दिव्य विमानके द्वारा मेरे लोकमें जाता है ॥
न हि भूमिप्रदानाद् वै दानमन्यद् विशिष्यते ।
न चापि भूमिहरणात् पापमन्यद् विशिष्यते ॥
क्योंकि भूमिदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है और भूमि छीन लेनेसे बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है ॥
दानान्यन्यानि हीयन्ते कालेन कुरुपुङ्गव ।
भूमिदानस्य पुण्यस्य क्षयो नैवोपपद्यते ॥
कुरुश्रेष्ठ! दूसरे दानोंके पुण्य समय पाकर क्षीण हो जाते हैं, किंतु भूमिदानके पुण्यका कभी भी क्षय नहीं होता ॥
सुवर्णमणिरत्नानि धनानि च वसूनि च ।
सर्वदानानि वै राजन् ददाति वसुधां ददत् ॥
राजन्! पृथ्वीका दान करनेवाला मानो सुवर्ण, मणि, रत्न, धन और लक्ष्मी आदि समस्त पदार्थोंका दान करता है ॥
सागरान् सरितः शैलान् समानि विषमाणि च ।
सर्वगन्धरसांश्चैव ददाति वसुधां ददत् ॥
भूमि-दान करनेवाला मनुष्य मानो समस्त समुद्रोंको, सरिताओंको, पर्वतोंको, सम-विषम प्रदेशोंको, सम्पूर्ण गन्ध और रसोंको देता है ॥
ओषधीः फलसम्पन्ना नानापुष्पसमन्विताः ।
कमलोत्पलषण्डांश्च ददाति वसुधां ददत् ।।
पृथ्वीका दान करनेवाला मनुष्य मानो नाना प्रकारके पुष्पों और फलोंसे युक्त वृक्षोंका तथा कमल और उत्पलोंके समूहोंका दान करता है ।।
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्यै यजन्ते सदक्षिणैः ।
न तत् फलं लभन्ते ते भूमिदानस्य यत् फलम् ।।
जो लोग दक्षिणासे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञोंके द्वारा देवताओंका यजन करते हैं, वे भी उस फलको नहीं पाते, जो भूमि-दानका फल है ।।
सस्यपूर्णां महीं यस्तु श्रोत्रियाय प्रयच्छति ।
पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदाभूतसम्प्लवम् ।।
जो मनुष्य श्रोत्रिय ब्राह्मणको धानसे भरे हुए खेतकी भूमि दान करता है, उसके पितर महाप्रलयकालतक तृप्त रहते हैं ।।
मम रुद्रस्य सवितुस्त्रिदशानां तथैव च ।
प्रीतये विद्धि राजेन्द्र भूमिर्दत्ता द्विजाय वै ।।
राजेन्द्र! ब्राह्मणको भूमि-दान करनेसे सब देवता, सूर्य, शंकर और मैं—ये सभी प्रसन्न होते हैं ऐसा समझो ।।
तेन पुण्येन पूतात्मा दाता भूमेर्युधिष्ठिर ।
मम सालोक्यमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ।।
युधिष्ठिर! भूमि-दानके पुण्यसे पवित्रचित्त हुआ दाता मेरे परम धाममें निवास करता है—इसमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है ।।
यत्किंचित् कुरुते पापं पुरुषो वृत्तिकर्शितः ।
स च गोकर्णमात्रेण भूमिदानेन शुद्ध्यति ।।
मनुष्य जीविकाके अभावमें जो कुछ पाप करता है, उससे गोकर्णमात्र भूमि-दान करनेपर भी छुटकारा पा जाता है ।।
मासोपवासे यत् पुण्यं कृच्छ्रे चान्द्रायणेऽपि च ।
भूमिगोकर्णमात्रेण तत् पुण्यं तु विधीयते ।।
एक महीनेतक उपवास, कृच्छ्र और चान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान करनेसे जो पुण्य होता है, वह गोकर्णमात्र भूमि-दान करनेसे हो जाता है ।।
सर्वतीर्थाभिषेके च यत् पुण्यं समुदाहृतम् ।
भूमिगोकर्णमात्रेण तत् पुण्यं तु विधीयते ।।
सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, वह सारा पुण्य गोकर्णमात्र भूमिक दान करनेसे प्राप्त हो जाता है ।।
युधिष्ठिर उवाच
देवदेव नमस्तेऽस्तु वासुदेव सुरेश्वर । गोकर्णस्य प्रमाणं वै वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**देवेश्वर कृष्ण! आपको नमस्कार है। सुरेश्वर! मुझे गोकर्णमात्र भूमिकी ठीक-ठीक माप बतलानेकी कृपा कीजिये ॥
श्रीभगवानुवाच शृणु गोकर्णमात्रस्य प्रमाणं पाण्डुनन्दन । त्रिंशद्दण्डप्रमाणेन प्रमितं सर्वतो दिशम् ॥ प्रत्यक् प्रागपि राजेन्द्र तत् तथा दक्षिणोत्तरम् । गोकर्णं तद्विदः प्राहुः प्रमाणं धरणेर्नृप ॥ **श्रीभगवान् बोले—**नृपश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! गोकर्णमात्र भूमिका प्रमाण सुनो। पूर्वसे पश्चिम और उत्तरसे दक्षिण चारों ओर तीस-तीस दण्ड* नापनेसे जितनी भूमि होती है, उसको भूमिके तत्त्वको जाननेवाले पुरुष गोकर्णमात्र भूमिका माप बताते हैं ॥
सवृषं गोशतं यत्र सुख तिष्ठत्ययन्त्रितम् । सवत्सं कुरुशार्दूल तच्च गोकर्णमुच्यते ॥ कुरुश्रेष्ठ! जितनी भूमिमें खुली हुई सौ गौएँ बैलों और बछड़ोंके साथ सुखपूर्वक रह सकें, उतनी भूमिको भी गोकर्ण कहते हैं ॥
किंकरा मृत्युदण्डाश्च कुम्भीपाकाश्च दारुणाः । घोराश्च वारुणाः पाशा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ॥ निरया रौरवाद्याश्च तथा वैतरणी नदी । तीव्राश्च यातनाः कष्टा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ॥ भूमिका दान करनेवाले पुरुषके पास यमराजके दूत नहीं फटकने पाते। मृत्युके दण्ड, दारुण कुम्भीपाक, भयानक वरुणपाश, रौरव आदि नरक, वैतरणी नदी और कठोर यम-यातनाएँ भी भूमिदान करनेवालोंको नहीं सतातीं ॥
चित्रगुप्तः कलिः कालः कृतान्तो मृत्युरेव च । यमश्च भगवान् साक्षात् पूजयन्ति महीप्रदम् ॥ चित्रगुप्त, कलि, काल, कृतान्त मृत्यु और साक्षात् भगवान् यम भी भूमिदान करनेवालेका आदर करते हैं ॥
रुद्रः प्रजापतिः शक्रः सुरा ऋषिगणास्तथा । अहं च प्रीतिमान् राजन् पूजयामो महीप्रदम् ॥ राजन्! रुद्र, प्रजापति, इन्द्र, देवता, ऋषिगण और स्वयं मैं—ये सभी प्रसन्न होकर भूमिदाताका आदर करते हैं ॥
कृशभृत्यस्य कृशगोः कृशाश्वस्य कृतातिथेः ।
भूमिर्देया नरश्रेष्ठ स निधिः पारलौकिकः ॥ नरश्रेष्ठ! जिसके कुटुम्बके लोग जीविकाके अभावसे दुर्बल हो गये हों, जिसकी गौएँ और घोड़े भी दुबले-पतले दिखायी देते हों तथा जो सदा अतिथि-सत्कार करनेवाला हो, ऐसे ब्राह्मणको भूमि-दान देना चाहिये; क्योंकि वह परलोकके लिये खजाना है ॥
सीदमानकुटुम्बाय श्रोत्रियायाग्निहोत्रिणे । व्रतस्थाय दरिद्राय भूमिर्देया नराधिप ॥ नरेश्वर! जिसके कुटुम्बीजन कष्ट पा रहे हों—ऐसे श्रोत्रिय, अग्निहोत्री, व्रतधारी एवं दरिद्र ब्राह्मणको भूमि देनी चाहिये ॥
यथा हि धात्री क्षीरेण पुत्रं वर्धयति स्वयम् । दातारमनुगृह्णाति दत्ता ह्येवं वसुंधरा ॥ जैसे धाय अपना दूध पिलाकर पुत्रका पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार दानमें दी हुई भूमि दातापर अनुग्रह करती है ॥
यथा बिभर्ति गौर्र्वत्सं सृजन्ती क्षीरमात्मनः । तथा सर्वगुणोपेता भूमिर्वहति भूमिदम् ॥ जैसे गौ अपना दूध पिलाकर बछड़ेका पालन करती है, वैसे ही सर्वगुणसम्पन्न भूमि अपने दाताका कल्याण करती है ॥
यथा बीजानि रोहन्ति जलसिक्तानि भूपते । तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदस्य दिने दिने ॥ भूपाल! जिस प्रकार जलसे सींचे हुए बीज अंकुरित होते हैं, वैसे ही भूमिदाताके मनोरथ प्रतिदिन पूर्ण होते रहते हैं ॥
यथा तेजस्तु सूर्यस्य तमः सर्वं व्यपोहति । तथा पापं नरस्येह भूमिदानं व्यपोहति ॥ जैसे सूर्यका तेज समस्त अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार यहाँ भूमि-दान मनुष्यके सम्पूर्ण पापोंका नाश कर डालता है ॥
आश्रुत्य भूमिदानं तु दत्त्वा यो वा हरेत् पुनः । स बद्धो वारुणैः पाशैः क्षिप्यते पूयशोणिते ॥ कुरुश्रेष्ठ! जो भूमि-दानकी प्रतिज्ञा करके नहीं देता अथवा देकर फिर छीन लेता है, उसे वरुणके पाशसे बाँधकर पीब और रक्तसे भरे हुए नरक-कुण्डमें डाला जाता है ॥
स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरेत वसुन्धराम् । न तस्य नरकाद् घोराद् विद्यते निष्कृतिः क्वचित् ॥ जो अपने या दूसरेकी दी हुई भूमिका अपहरण करता है, उसके लिये नरकसे उद्धार पानेका कोई उपाय नहीं है ॥
दत्त्वा भूमिं द्विजेन्द्राणां यस्तामेवोपजीवति ।