महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
वपुस्तेजश्च कीदृग् वै तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ २६ ॥
विपुलने पूछा— मुने! इन्द्र जब आता है तब उसके कौन-कौन-से रूप होते हैं तथा उस समय उसका शरीर और तेज कैसा होता है? यह मुझे स्पष्टरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ २६ ॥
भीष्म उवाच
ततः स भगवांस्तस्मै विपुलाय महात्मने ।
आचचक्षे यथातत्त्वं मायां शक्रस्य भारत ॥ २७ ॥
भीष्मजी कहते हैं— भरतनन्दन! तदनन्तर भगवान् देवशर्माने महात्मा विपुलसे इन्द्रकी मायाको यथार्थरूपसे बताना आरम्भ किया ॥ २७ ॥
देवशर्मोवाच
बहुमायः स विप्रर्षे भगवान् पाकशासनः ।
तांस्तान् विकुरुते भावान् बहूनथ मुहुर्मुहुः ॥ २८ ॥
देवशर्माने कहा— ब्रह्मर्षे! भगवान् पाकशासन इन्द्र बहुत-सी मायाओंके जानकार हैं। वे बारंबार बहुत-से रूप बदलते रहते हैं ॥ २८ ॥
किरीटी वज्रधृग् धन्वी मुकुटी बद्धकुण्डलः ॥ २९ ॥
भवत्यथ मुहूर्तेन चाण्डालसमदर्शनः ।
शिखी जटी चीरवासाः पुनर्भवति पुत्रक ॥ ३० ॥
बेटा! वे कभी तो मस्तकपर किरीट-मुकुट, कानोंमें कुण्डल तथा हाथोंमें वज्र एवं धनुष धारण किये आते हैं और कभी एक ही मुहूर्तमें चाण्डालके समान दिखायी देते हैं; फिर कभी शिखा, जटा और चीरवस्त्र धारण करनेवाले ऋषि बन जाते हैं ॥ २९-३० ॥
बृहत् शरीरश्च पुनश्चीरवासाः पुनः कृशः ।
गौरं श्यामं च कृष्णं च वर्णं विकुरुते पुनः ॥ ३१ ॥
कभी विशाल एवं हृष्ट-पुष्ट शरीर धारण करते हैं तो कभी दुर्बल शरीरमें चिथड़े लपेटे दिखायी देते हैं। कभी गोरे, कभी साँवले और कभी काले रंगके रूप बदलते रहते हैं ॥ ३१ ॥
विरूपो रूपवांश्चैव युवा वृद्धस्तथैव च ।
ब्राह्मणः क्षत्रियश्चैव वैश्यः शूद्रस्तथैव च ॥ ३२ ॥
वे एक ही क्षणमें कुरूप और दूसरे ही क्षणमें रूपवान् हो जाते हैं। कभी जवान और कभी बूढ़े बन जाते हैं। कभी ब्राह्मण बनकर आते हैं तो कभी क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रका रूप बना लेते हैं ॥ ३२ ॥
प्रतिलोमोऽनुलोमश्च भवत्यथ शतक्रतुः ।
शुकवायसरूपी च हंसकोकिलरूपवान् ॥ ३३ ॥
वे इन्द्र कभी अनुलोम संकरका रूप धारण करते हैं तो कभी विलोम संकरका। वे तोते, कौए, हंस और कोयलके रूपमें भी दिखायी देते हैं ।। ३३ ।। सिंहव्याघ्रगजानां च रूपं धारयते पुनः । दैवं दैत्यमथो राज्ञां वपुर्धारयतेऽपि च ।। ३४ ।। सिंह, व्याघ्र और हाथीके भी रूप बारंबार धारण करते हैं। देवताओं, दैत्यों तथा राजाओंके शरीर भी धारण कर लेते हैं ।। ३४ ।। अकृशो वायुभग्नाङ्गः शकुनिर्विकृतस्तथा । चतुष्पाद् बहुरूपश्च पुनर्भवति बालिशः ।। ३५ ।। वे कभी हृष्ट-पुष्ट, कभी वातरोगसे भग्न शरीरवाले और कभी पक्षी बन जाते हैं। कभी विकृत वेश बना लेते हैं। फिर कभी चौपाया (पशु), कभी बहुरूपिया और कभी गँवार बन जाते हैं ।। ३५ ।। मक्षिकामशकादीनां वपुर्धारयतेऽपि च । न शक्यमस्य ग्रहणं कर्तुं विपुल केनचित् ।। ३६ ।। अपि विश्वकृता तात येन सृष्टमिदं जगत् । पुनरन्तर्हितः शक्रो दृश्यते ज्ञानचक्षुषा ।। ३७ ।। वे मक्खी और मच्छर आदिके भी रूप धारण करते हैं। विपुल! कोई भी उन्हें पकड़ नहीं सकता। तात! औरोंकी तो बात ही क्या है? जिन्होंने इस संसारको बनाया है वे विधाता भी उन्हें अपने काबूमें नहीं कर सकते। अन्तर्धान हो जानेपर इन्द्र केवल ज्ञानदृष्टिसे दिखायी देते हैं ।। ३६-३७ ।। वायुभूतश्च स पुनर्देवराजो भवत्युत । एवं रूपाणि सततं कुरुते पाकशासनः ।। ३८ ।। फिर वे वायुरूप होकर तुरंत ही देवराजके रूपमें प्रकट हो जाते हैं। इस तरह पाकशासन इन्द्र सदा नये-नये रूप धारण करता और बदलता रहता है ।। ३८ ।। तस्माद् विपुल यत्नेन रक्षेमां तनुमध्यमाम् । यथा रुचिं नावलिहेद् देवेन्द्रो भृगुसत्तम ।। ३९ ।। क्रतावुपहिते न्यस्तं हविः श्वेव दुरात्मवान् । भृगुश्रेष्ठ विपुल! इसलिये तुम यत्नपूर्वक इस तनुमध्यमा रुचिकी रक्षा करना जिससे दुरात्मा देवराज इन्द्र यज्ञमें रखे हुए हविष्यको चाटनेकी इच्छावाले कुत्तेकी भाँति मेरी पत्नी रुचिका स्पर्श न कर सके ।। एवमाख्याय स मुनिर्यज्ञकारोऽगमत् तदा ।। ४० ।। देवशर्मा महाभागस्ततो भरतसत्तम । भरतश्रेष्ठ! ऐसा कहकर महाभाग देवशर्मा मुनि यज्ञ करनेके लिये चले गये ।। ४० १/२ ।। विपुलस्तु वचः श्रुत्वा गुरोश्चिन्तामुपेयिवान् ।। ४१ ।।
रक्षां च परमां चक्रे देवराजान्महाबलात् । गुरुकी बात सुनकर विपुल बड़ी चिन्तामें पड़ गये और महाबली देवराजसे उस स्त्रीकी बड़ी तत्परताके साथ रक्षा करने लगे ॥ ४१ ½ ॥ किं नु शक्यं मया कर्तुं गुरुदाराभिरक्षणे ॥ ४२ ॥ मायावी हि सुरेन्द्रोऽसौ दुर्धर्षश्चापि वीर्यवान् । उन्होंने मन-ही-मन सोचा, 'मैं गुरुपत्नीकी रक्षाके लिये क्या कर सकता हूँ, क्योंकि वह देवराज इन्द्र मायावी होनेके साथ ही बड़ा दुर्धर्ष और पराक्रमी है ॥ नापिधायाश्रमं शक्यो रक्षितुं पाकशासनः ॥ ४३ ॥ उटजं वा तथा ह्यस्य नानाविधसरूपता । 'कुटी या आश्रमके दरवाजोंको बंद करके भी पाकशासन इन्द्रका आना नहीं रोका जा सकता; क्योंकि वे कई प्रकारके रूप धारण करते हैं ॥ ४३ ½ ॥ वायुरूपेण वा शक्रो गुरुपत्नीं प्रधर्षयेत् ॥ ४४ ॥ तस्मादिमां सम्प्रविश्य रुचिं स्थास्येऽहमद्य वै । सम्भव है, इन्द्र वायुका रूप धारण करके आये और गुरुपत्नीको दूषित कर डाले; इसलिये आज मैं रुचिके शरीरमें प्रवेश करके रहूँगा ॥ ४४ ½ ॥ अथवा पौरुषेणेयं न शक्या रक्षितुं मया ॥ ४५ ॥ बहुरूपो हि भगवान् श्रूयते पाकशासनः । सोऽहं योगबलादेनां रक्षिष्ये पाकशासनात् ॥ ४६ ॥ 'अथवा पुरुषार्थके द्वारा मैं इसकी रक्षा नहीं कर सकता; क्योंकि ऐश्वर्यवाली पाकशासन इन्द्र बहुरूपिया सुने जाते हैं। अतः योगबलका आश्रय लेकर ही मैं इन्द्रसे इसकी रक्षा करूँगा ॥ ४५-४६ ॥ गात्राणि गात्रैरस्याहं सम्प्रवेश्ये हि रक्षितुम् । यद्युच्छिष्टामिमां पत्नीमद्य पश्यति मे गुरुः ॥ ४७ ॥ शप्स्यत्यसंशयं कोपाद् दिव्यज्ञानो महातपाः । 'मैं गुरुपत्नीकी रक्षा करनेके लिये अपने सम्पूर्ण अंगोंसे इसके सम्पूर्ण अंगोंमें समा जाऊँगा। यदि आज मेरे गुरुजी अपनी इस पत्नीको किसी पर-पुरुषद्वारा दूषित हुई देख लेंगे तो कुपित होकर मुझे निस्संदेह शाप दे देंगे; क्योंकि वे महा तपस्वी गुरु दिव्यज्ञानसे सम्पन्न हैं ॥ ४७ ½ ॥ न चेयं रक्षितुं शक्या यथान्या प्रमदा नृभिः ॥ ४८ ॥ मायावी हि सुरेन्द्रोऽसावहो प्राप्तोऽस्मि संशयम् ।
'दूसरी युवतियोंकी तरह इस गुरुपत्नीकी भी मनुष्योंद्वारा रक्षा नहीं की जा सकती; क्योंकि देवराज इन्द्र बड़े मायावी हैं। अहो! मैं बड़ी संशयजनित अवस्थामें पड़ गया ।। ४८ १/२ ।।
अवश्यं करणीयं हि गुरोरिह हि शासनम् ॥ ४९ ॥ यदि त्वेतदहं कुर्यामाश्चर्यं स्यात् कृतं मया । 'यहाँ गुरुने जो आज्ञा दी है, उसका पालन मुझे अवश्य करना चाहिये। यदि मैं ऐसा कर सका तो मेरे द्वारा यह एक आश्चर्यजनक कार्य सम्पन्न होगा ।। ४९१/२ ।।
योगेनाथ प्रवेशो हि गुरुपत्न्याः कलेवरे ॥ ५० ॥ एवमेव शरीरेऽस्या निवत्स्यामि समाहितः । असक्तः पद्मपत्रस्थो जलबिन्दुर्यथाचलः ॥ ५१ ॥ 'अतः मुझे गुरुपत्नीके शरीरमें योगबलसे प्रवेश करना चाहिये। जिस प्रकार कमलके पत्तेपर पड़ी हुई जलकी बूँद उसपर निर्लिप्त भावसे स्थिर रहती है उसी प्रकार मैं भी अनासक्त भावसे गुरुपत्नीके भीतर निवास करूँगा ।। ५०-५१ ।।
निर्मुक्तस्य रजोरूपान्नापराधो भवेन्मम । यथा हि शून्यां पथिकः सभामध्यावसेत् पथि ॥ ५२ ॥ तथाद्यावासयिष्यामि गुरुपत्न्याः कलेवरम् । एवमेव शरीरेऽस्या निवत्स्यामि समाहितः ॥ ५३ ॥ 'मैं रजोगुणसे मुक्त हूँ; अतः मेरे द्वारा कोई अपराध नहीं हो सकता, जैसे राह चलनेवाला बटोही कभी किसी सूनी धर्मशालामें ठहर जाता है उसी प्रकार आज मैं सावधान होकर गुरुपत्नीके शरीरमें निवास करूँगा। इसी तरह इसके शरीरमें मेरा निवास हो सकेगा' ।। ५२-५३ ।।
इत्येवं धर्ममालोक्य वेदवेदांश्च सर्वशः । तपश्च विपुलं दृष्ट्वा गुरोरात्मन एव च ॥ ५४ ॥ इति निश्चित्य मनसा रक्षां प्रति स भार्गवः । अन्वतिष्ठत् परं यत्नं यथा तच्छृणु पार्थिव ॥ ५५ ॥ पृथ्वीनाथ! इस तरह धर्मपर दृष्टि डाल, सम्पूर्ण वेद-शास्त्रोंपर विचार करके अपनी तथा गुरुकी प्रचुर तपस्याको दृष्टिमें रखते हुए भृगुवंशी विपुलने गुरुपत्नीकी रक्षाके लिये अपने मनसे उपर्युक्त उपाय ही निश्चित किया और इसके लिये जो महान् प्रयत्न किया, वह बताता हूँ, सुनो— ।। ५४-५५ ।।
गुरुपत्नीं समासीनो विपुलः स महातपाः । उपासीनामनिन्द्याङ्गीं कथाभिः समलोभयत् ॥ ५६ ॥ 'महा तपस्वी विपुल गुरुपत्नीके पास बैठ गये और पास ही बैठी हुई निर्दोष अंगोंवाली उस रुचिको अनेक प्रकारकी कथा-वार्ता सुनाकर अपनी बातोंमें लुभाने लगे ।। ५६ ।।
नेत्राभ्यां नेत्रयोरस्या रश्मिं संयोज्य रश्मिभिः ।
विवेश विपुलः कायमाकाशं पवनो यथा ॥ ५७ ॥
‘फिर अपने दोनों नेत्रोंको उन्होंने उसके नेत्रोंकी ओर लगाया और अपने नेत्रोंकी किरणोंको उसके नेत्रोंकी किरणोंके साथ जोड़ दिया। फिर उसी मार्गसे आकाशमें प्रविष्ट होनेवाली वायुकी भाँति रुचिके शरीरमें प्रवेश किया’ ॥ ५७ ॥
लक्षणं लक्षणेनैव वदनं वदनेन च ।
अविचेष्टन्नतिष्ठद् वै छायेवान्तर्हितो मुनिः ॥ ५८ ॥
‘वे लक्षणोंसे लक्षणोंमें और मुखके द्वारा मुखमें प्रविष्ट हो कोई चेष्टा न करते हुए स्थिर भावसे स्थित हो गये। उस समय अन्तर्हित हुए विपुल मुनि छायाके समान प्रतीत होते थे’ ॥ ५८ ॥
ततो विष्टभ्य विपुलो गुरुपत्नयाः कलेवरम् ।
उवास रक्षणे युक्तो न च सा तमबुद्ध्यत ॥ ५९ ॥
‘विपुल गुरुपत्नीके शरीरको स्तम्भित करके उसकी रक्षामें संलग्न हो वहीं निवास करने लगे। परंतु रुचिको अपने शरीरमें उनके आनेका पता न चला ॥ ५९ ॥
यं कालं नागतो राजन् गुरुस्तस्य महात्मनः ।
क्रतुं समाप्य स्वगृहं तं कालं सोऽभ्यरक्षत ॥ ६० ॥
‘राजन्! जबतक महात्मा विपुलके गुरु यज्ञ पूरा करके अपने घर नहीं लौटे तबतक विपुल इसी प्रकार अपनी गुरुपत्नीकी रक्षा करते रहे’ ॥ ६० ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विपुलोपाख्याने चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विपुलका उपाख्यानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ६२ श्लोक हैं)
एकचत्वारिंशोऽध्यायः
विपुलका देवराज इन्द्रसे गुरुपत्नीको बचाना और गुरुसे वरदान प्राप्त करना
भीष्म उवाच
ततः कदाचित् देवेन्द्रो दिव्यरूपवपुर्धरः ।
इदमन्तरमित्येवमभ्यगात् तमथाश्रमम् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर किसी समय देवराज इन्द्र 'यही ऋषिपत्नी रुचिको प्राप्त करनेका अच्छा अवसर है'—ऐसा सोचकर दिव्य रूप एवं शरीर धारण किये उस आश्रममें आये ॥ १ ॥
रूपमप्रतिमं कृत्वा लोभनीयं जनाधिप ।
दर्शनीयतमो भूत्वा प्रविवेश तमाश्रमम् ॥ २ ॥
नरेश्वर! वहाँ इन्द्रने अनुपम लुभावना रूप धारण करके अत्यन्त दर्शनीय होकर उस आश्रममें प्रवेश किया ॥ २ ॥
स ददर्श तमासीनं विपुलस्य कलेवरम् ।
निश्चेष्टं स्तब्धनयनं यथा लेख्यगतं तथा ॥ ३ ॥
वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि विपुलका शरीर चित्रलिखितकी भाँति निश्चेष्ट पड़ा है और उनके नेत्र स्थिर हैं ॥ ३ ॥
रुचिं च रुचिरापाङ्गीं पीनश्रोणिपयोधराम् ।
पद्मपत्रविशालाक्षीं सम्पूर्णेन्दुनिभाननाम् ॥ ४ ॥
दूसरी ओर स्थूल नितम्ब एवं पीन पयोधरोंसे सुशोभित, विकसित कमलदलके समान विशाल नेत्र एवं मनोहर कटाक्षवाली पूर्णचन्द्रानना रुचि बैठी हुई दिखायी दी ॥ ४ ॥
सा तमालोक्य सहसा प्रत्युत्थातुमियेष ह ।
रूपेण विस्मिता कोऽसीत्यथ वक्तुमिवेच्छती ॥ ५ ॥
इन्द्रको देखकर वह सहसा उनकी अगवानीके लिये उठनेकी इच्छा करने लगी। उनका सुन्दर रूप देखकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ था, मानो वह उनसे पूछना चाहती थी कि आप कौन हैं? ॥ ५ ॥
उत्थातुकामा तु सती विष्टब्धा विपुलेन सा ।
निगृहीता मनुष्येन्द्र न शशाक विचेष्टितुम् ॥ ६ ॥
नरेन्द्र! उसने ज्यों ही उठनेका विचार किया त्यों ही विपुलने उसके शरीरको स्तब्ध कर दिया। उनके काबूमें आ जानेके कारण वह हिल भी न सकी ॥ ६ ॥
तामाबभाषे देवेन्द्रः साम्ना परमवल्गुना । त्वदर्थमागतं विद्धि देवेन्द्रं मां शुचिस्मिते ॥ ७ ॥ तब देवराज इन्द्रने बड़ी मधुर वाणीमें उसे समझाते हुए कहा—'पवित्र मुसकानवाली देवि! मुझे देवताओंका राजा इन्द्र समझो! मैं तुम्हारे लिये ही यहाँतक आया हूँ ॥ ७ ॥
क्लिश्यमानमनङ्गेन त्वत्संकल्पभवेन ह । तत् सम्प्राप्तं हि मां सुभ्रू पुरा कालोऽतिवर्तते ॥ ८ ॥ 'तुम्हारा चिन्तन करनेसे मेरे हृदयमें जो काम उत्पन्न हुआ है वह मुझे बड़ा कष्ट दे रहा है। इसीसे मैं तुम्हारे निकट उपस्थित हुआ हूँ। सुन्दरी! अब देर न करो, समय बीता जा रहा है' ॥ ८ ॥
तमेवंवादिनं शक्रं शुश्राव विपुलो मुनिः । गुरुपत्न्याः शरीरस्थो ददर्श त्रिदशाधिपम् ॥ ९ ॥ देवराज इन्द्रकी यह बात गुरुपत्नीके शरीरमें बैठे हुए विपुल मुनिने भी सुनी और उन्होंने इन्द्रको देख भी लिया ॥ ९ ॥
न शशाक च सा राजन् प्रत्युत्थातुमनिन्दिता । वक्तुं च नाशकद् राजन् विष्टब्धा विपुलेन सा ॥ १० ॥ राजन्! वह अनिन्द्य सुन्दरी रुचि विपुलके द्वारा स्तम्भित होनेके कारण न तो उठ सकी और न इन्द्रको कोई उत्तर ही दे सकी ॥ १० ॥
आकारं गुरुपत्न्यास्तु स विज्ञाय भृगूद्वहः । निजग्राह महातेजा योगेन बलवत् प्रभो ॥ ११ ॥ प्रभो! गुरुपत्नीका आकार एवं चेष्टा देखकर भृगुश्रेष्ठ विपुल उसका मनोभाव ताड़ गये थे; अतः उन महा तेजस्वी मुनिने योगद्वारा उसे बलपूर्वक काबूमें रखा ॥ ११ ॥
बबन्ध योगबन्धैश्च तस्याः सर्वेन्द्रियाणि सः । तां निर्विकारां दृष्ट्वा तु पुनरेव शचीपतिः ॥ १२ ॥ उवाच व्रीडितो राजंस्तां योगबलमोहिताम् । एह्येहीति ततः सा तु प्रतिवक्तुमियेष तम् ॥ १३ ॥ उन्होंने गुरुपत्नी रुचिकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको योग-सम्बन्धी बन्धनोंसे बाँध लिया था। राजन्! योगबलसे मोहित हुई रुचिको काम-विकारसे शून्य देख शचीपति इन्द्र लज्जित हो गये और फिर उससे बोले—'सुन्दरी! आओ, आओ।' उनका आवाहन सुनकर वह फिर उन्हें कुछ उत्तर देनेकी इच्छा करने लगी ॥ १२-१३ ॥
स तां वाचं गुरोः पत्न्या विपुलः पर्यवर्तयत् । भोः किमागपने कृत्यमिति तस्यास्तु निःसृता ॥ १४ ॥ यह देख विपुलने गुरुपत्नीकी उस वाणीको जिसे वह कहना चाहती थी, बदल दिया। उसके मुँहसे सहसा यह निकल पड़ा—'अजी! यहाँ तुम्हारे आनेका क्या प्रयोजन
है?' ।। १४ ।। वक्त्राच्छशाङ्कसदृशाद् वाणी संस्कारभूषणा । व्रीडिता सा तु तद्वाक्यमुक्त्वा परवशा तदा ।। १५ ।। उस चन्द्रोपम मुखसे जब यह संस्कृत वाणी प्रकट हुई तब वह पराधीन हुई रुचि वह वाक्य कह देनेके कारण बहुत लज्जित हुई ।। १५ ।। पुरन्दरश्च तत्रस्थो बभूव विमना भृशम् । स तद्वैकृतमालक्ष्य देवराजो विशाम्पते ।। १६ ।। अवैक्षत सहस्राक्षस्तदा दिव्येन चक्षुषा । स ददर्श मुनिं तस्याः शरीरान्तरगोचरम् ।। १७ ।। वहाँ खड़े हुए इन्द्र उसकी पूर्वोक्त बात सुनकर मन-ही-मन बहुत दुःखी हुए। प्रजानाथ! उसके मनोविकार एवं भाव-परिवर्तनको लक्ष्य करके सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्रने दिव्य दृष्टिसे उसकी ओर देखा। फिर तो उसके शरीरके भीतर विपुल मुनिपर उनकी दृष्टि पड़ी ।। १६-१७ ।। प्रतिबिम्बमिवादर्शे गुरुपत्न्याः शरीरगम् । स तं घोरेण तपसा युक्तं दृष्ट्वा पुरन्दरः ।। १८ ।। प्रावेपत सुसंत्रस्तः शापभीतस्तदा विभो । जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्ब दिखायी देता है उसी प्रकार वे गुरुपत्नीके शरीरमें परिलक्षित हो रहे थे। प्रभो! घोर तपस्यासे युक्त विपुल मुनिको देखते ही इन्द्र शापके भयसे संत्रस्त हो थर-थर काँपने लगे ।। १८ १/२ ।। विमुच्य गुरुपत्नीं तु विपुलः सुमहातपाः । स्वकलेवरमाविश्य शक्रं भीतमथाब्रवीत् ।। १९ ।। इसी समय महातपस्वी विपुल गुरुपत्नीको छोड़कर अपने शरीरमें आ गये और डरे हुए इन्द्रसे बोले— ।। १९ ।।
विपुल उवाच
अजितेन्द्रिय दुर्बुद्धे पापात्मक पुरन्दर । न चिरं पूजयिष्यन्ति देवास्त्वां मानुषास्तथा ।। २० ।। विपुलने कहा— 'पापात्मा पुरन्दर! तेरी बुद्धि बड़ी खोटी है। तू सदा इन्द्रियोंका गुलाम बना रहता है। यदि यही दशा रही तो अब देवता तथा मनुष्य अधिक कालतक तेरी पूजा नहीं करेंगे ।। २० ।। किं नु तद्विस्मृतं शक्र न तन्मनसि ते स्थितम् । गौतमेनासि यन्मुक्तो भगाङ्कपरिचिह्नितः ।। २१ ।।
इन्द्र! क्या तू उस घटनाको भूल गया? क्या तेरे मनमें उसकी याद नहीं रह गयी है? जब कि महर्षि गौतमने तेरे सारे शरीरमें भगके (हजार) चिह्न बनाकर तुझे जीवित छोड़ा था? ।। २१ ।।
जाने त्वां बालिशमतिमकृतात्मानमस्थिरम् । ममेयं रक्ष्यते मूढ गच्छ पाप यथागतम् ।। २२ ।। मैं जानता हूँ कि तू मूर्ख है, तेरा मन वशमें नहीं और तू महाचंचल है। पापी मूढ़! यह स्त्री मेरे द्वारा सुरक्षित है। तू जैसे आया है, उसी तरह लौट जा ।। २२ ।।
नाहं त्वामद्य मूढात्मन् दहेयं हि स्वतेजसा । कृपायमानस्तु न ते दग्धुमिच्छामि वासव ।। २३ ।। मूढचित्त इन्द्र! मैं अपने तेजसे तुझे जलाकर भस्म कर सकता हूँ। केवल दया करके ही तुझे इस समय जलाना नहीं चाहता ।। २३ ।।
स च घोरतमो धीमान् गुरुर्मे पापचेतसम् । दृष्ट्वा त्वां निर्दहेदद्य क्रोधदीप्तेन चक्षुषा ।। २४ ।। मेरे बुद्धिमान् गुरु बड़े भयंकर हैं। वे तुझ पापात्माको देखते ही आज क्रोधसे उदीप्त हुई दृष्टिद्वारा दग्ध कर डालेंगे ।। २४ ।।
नैवं तु शक्र कर्तव्यं पुनर्मान्याश्च ते द्विजाः । मा गमः ससुतामात्यः क्षयं ब्रह्मबलार्दितः ।। २५ ।। इन्द्र! आजसे फिर कभी ऐसा काम न करना। तुझे ब्राह्मणोंका सम्मान करना चाहिये, अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि तुझे ब्रह्मतेजसे पीड़ित होकर पुत्रों और मन्त्रियोंसहित कालके गालमें जाना पड़े ।। २५ ।।
अमरोऽस्मीति यद्बुद्धिं समास्थाय प्रवर्त्तसे । मावमंस्था न तपसा नसाध्यं नाम किंचन ।। २६ ।। मैं अमर हूँ—ऐसी बुद्धिका आश्रय लेकर यदि तू स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त हो रहा है तो (मैं तुझे सचेत किये देता हूँ) यों किसी तपस्वीका अपमान न किया कर; क्योंकि तपस्यासे कोई भी कार्य असाध्य नहीं है (तपस्वी अमरोंको भी मार सकता है) ।। २६ ।।
भीष्म उवाच
तत् श्रुत्वा वचनं शक्रो विपुलस्य महात्मनः । अकिंचिदुक्त्वा व्रीडार्तस्तत्रैवान्तरधीयत ।। २७ ।। भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! महात्मा विपुलका वह कथन सुनकर इन्द्र बहुत लज्जित हुए और कुछ भी उत्तर न देकर वहीं अन्तर्धान हो गये ।। २७ ।।
मुहूर्तयाते तस्मिंस्तु देवशर्मा महातपाः । कृत्वा यज्ञं यथाकाममाजगाम स्वमाश्रमम् ।। २८ ।।
उनके गये अभी एक ही मुहूर्त बीतने पाया था कि महा तपस्वी देवशर्मा इच्छानुसार यज्ञ पूर्ण करके अपने आश्रमपर लौट आये ॥ २८ ॥
आगतेऽथ गुरौ राजन् विपुलः प्रियकर्मकृत् । रक्षितां गुरवे भार्यां न्यवेदयदनिन्दिताम् ॥ २९ ॥ राजन्! गुरुके आनेपर उनका प्रिय कार्य करनेवाले विपुलने अपने द्वारा सुरक्षित हुई उनकी सती-साध्वी भार्या रुचिको उन्हें सौंप दिया ॥ २९ ॥
अभिवाद्य च शान्तात्मा स गुरुं गुरुवत्सलः । विपुलः पर्युपातिष्ठद् यथापूर्वमशङ्कितः ॥ ३० ॥ शान्त चित्तवाले गुरुप्रेमी विपुल गुरुदेवको प्रणाम करके पहलेकी ही भाँति निर्भीक होकर उनकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ ३० ॥
विश्रान्ताय ततस्तस्मै सहासीनाय भार्यया । निवेदयामास तदा विपुलः शक्रकर्म तत् ॥ ३१ ॥ जब गुरुजी विश्राम करके अपनी पत्नीके साथ बैठे, तब विपुलने इन्द्रकी वह सारी करतूत उन्हें बतायी ॥ ३१ ॥
तत् श्रुत्वा स मुनिस्तुष्टो विपुलस्य प्रतापवान् । बभूव शीलवृत्ताभ्यां तपसा नियमेन च ॥ ३२ ॥ यह सुनकर प्रतापी मुनि देवशर्मा विपुलके शील, सदाचार, तप और नियमसे बहुत संतुष्ट हुए ॥ ३२ ॥
विपुलस्य गुरौ वृत्तिं भक्तिमात्मनि तत्प्रभुः । धर्मे च स्थिरतां दृष्ट्वा साधु साध्वित्यभाषत ॥ ३३ ॥ विपुलकी गुरुसेवावृत्ति, अपने प्रति भक्ति और धर्मविषयक दृढ़ता देखकर गुरुने 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहकर उनकी प्रशंसा की ॥ ३३ ॥
प्रतिलभ्य च धर्मात्मा शिष्यं धर्मपरायणम् । वरेणच्छन्दयामास देवशर्मा महामतिः ॥ ३४ ॥ परम बुद्धिमान् धर्मात्मा देवशर्माने अपने धर्म-परायण शिष्य विपुलको पाकर उन्हें इच्छानुसार वर माँगनेको कहा ॥ ३४ ॥
स्थितिं च धर्मे जग्राह स तस्माद् गुरुवत्सलः । अनुज्ञातश्च गुरुणा चचारानुत्तमं तपः ॥ ३५ ॥ गुरुवत्सल विपुलने गुरुसे यही वर माँगा कि 'मेरी धर्ममें निरन्तर स्थिति बनी रहे।' फिर गुरुकी आज्ञा लेकर उन्होंने सर्वोत्तम तपस्या आरम्भ की ॥ ३५ ॥
तथैव देवशर्मापि सभार्यः स महातपाः । निर्भयो बलवृत्रघ्नाच्चचार विजने वने ॥ ३६ ॥
महा तपस्वी देवशर्मा भी बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्रसे निर्भय हो पत्नीसहित उस निर्जन वनमें विचरने लगे ।। ३६ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विपुलोपाख्याने एकचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विपुलका उपाख्यानविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४१ ।।
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः
विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना
भीष्म उवाच
विपुलस्त्वकरोत् तीव्रं तपः कृत्वा गुरोर्वचः ।
तपोयुक्तमथात्मानममन्यत स वीर्यवान् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! विपुलने गुरुकी आज्ञाका पालन करके बड़ी कठोर तपस्या की। इससे उनकी शक्ति बहुत बढ़ गयी और वे अपनेको बड़ा भारी तपस्वी मानने लगे ॥ १ ॥
स तेन कर्मणा स्पर्धन् पृथिवीं पृथिवीपते ।
चचार गतभीः प्रीतो लब्धकीर्तिर्वरो नृप ॥ २ ॥
पृथ्वीनाथ! विपुल उस तपस्याद्वारा मन-ही-मन गर्वका अनुभव करके दूसरोंसे स्पर्धा रखने लगे। नरेश्वर! उन्हें गुरुसे कीर्ति और वरदान दोनों प्राप्त हो चुके थे; अतः वे निर्भय एवं संतुष्ट होकर पृथ्वीपर विचरने लगे ॥ २ ॥
उभौ लोकौ जितौ चापि तथैवामन्यत प्रभुः ।
कर्मणा तेन कौरव्य तपसा विपुलेन च ॥ ३ ॥
कुरुनन्दन! शक्तिशाली विपुल उस गुरुपत्नी-संरक्षणरूपी कर्म तथा प्रचुर तपस्याद्वारा ऐसा समझने लगे कि मैंने दोनों लोक जीत लिये ॥ ३ ॥
अथ काले व्यतिक्रान्ते कस्मिंश्चित् कुरुनन्दन ।
रुच्या भगिन्या आदानं प्रभूतधनधान्यवत् ॥ ४ ॥
कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले युधिष्ठिर! तदनन्तर कुछ समय बीत जानेपर गुरुपत्नी रुचिकी बड़ी बहिनके यहाँ विवाहोत्सवका अवसर उपस्थित हुआ, जिसमें प्रचुर धन-धान्यका व्यय होनेवाला था ॥ ४ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु दिव्या काचिद् वराङ्गना ।
बिभ्रती परमं रूपं जगामाथ विहायसा ॥ ५ ॥
उन्हीं दिनों एक दिव्य लोककी सुन्दरी दिव्यांगना परम मनोहर रूप धारण किये आकाशमार्गसे कहीं जा रही थी ॥ ५ ॥
तस्याः शरीरात् पुष्पाणि पतितानि महीतले ।
तस्याश्रमस्याविदूरे दिव्यगन्धानि भारत ॥ ६ ॥
भारत! उसके शरीरसे कुछ दिव्य पुष्प, जिनसे दिव्य सुगन्ध फैल रही थी, देवशर्माके आश्रमके पास ही पृथ्वीपर गिरे ॥ ६ ॥
तान्यगृह्णात् ततो राजन् रुचिर्र्ललितलोचना ।
तदा निमन्त्रकस्तस्या अङ्गेभ्यः क्षिप्रमागमत् ॥ ७ ॥
राजन्! तब मनोहर नेत्रोंवाली रुचिने वे फूल ले लिये। इतनेमें ही अंगदेशसे उसका शीघ्र ही बुलावा आ गया ॥ ७ ॥
तस्या हि भगिनी तात ज्येष्ठा नाम्ना प्रभावती ।
भार्या चित्ररथस्याथ बभूवाङ्ङ्गेश्वरस्य वै ॥ ८ ॥
तात! रुचिकी बड़ी बहिन, जिसका नाम प्रभावती था, अंगराज चित्ररथको ब्याही गयी थी ॥ ८ ॥
पिनह्य तानि पुष्पाणि केशेषु वरवर्णिनी ।
आमन्त्रिता ततोऽगच्छद् रुचिरङ्गपतेर्गृहम् ॥ ९ ॥
उन दिव्य फूलोंको अपने केशोंमें गूँथकर सुन्दरी रुचि अंगराजके घर आमन्त्रित होकर गयी ॥ ९ ॥
पुष्पाणि तानि दृष्ट्वा तु तदाङ्गेन्द्रवराङ्गना ।
भगिनीं चोदयामास पुष्पार्थे चारुलोचना ॥ १० ॥
उस समय सुन्दर नेत्रोंवाली अंगराजकी सुन्दरी रानी प्रभावतीने उन फूलोंको देखकर अपनी बहिनसे वैसे ही फूल मँगवा देनेका अनुरोध किया ॥ १० ॥
सा भर्त्रे सर्वमाचष्ट रुचिः सुरुचिरानना ।
भगिन्या भाषितं सर्वमृषिस्तच्चाभ्यनन्दत ॥ ११ ॥
आश्रममें लौटनेपर सुन्दर मुखवाली रुचिने बहिनकी कही हुई सारी बातें अपने स्वामीसे कह सुनायीं। सुनकर ऋषिने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ॥ ११ ॥
ततो विपुलमानाय्य देवशर्मा महातपाः ।
पुष्पार्थे चोदयामास गच्छ गच्छेति भारत ॥ १२ ॥
भारत! तब महा तपस्वी देवशर्माने विपुलको बुलवाकर उन्हें फूल लानेके लिये आदेश दिया और कहा, ‘जाओ, जाओ’ ॥ १२ ॥
विपुलस्तु गुरोर्वाक्यमविचार्य महातपाः ।
स तथेत्यब्रवीद् राजंस्तं च देशं जगाम ह ॥ १३ ॥
यस्मिन् देशे तु तान्यासन् पतितानि नभस्तलात् ।
अम्लानान्यपि तत्रासन् कुसुमान्यपराण्यपि ॥ १४ ॥
राजन्! गुरुकी आज्ञा पाकर महा तपस्वी विपुल उसपर कोई अन्यथा विचार न करके ‘बहुत अच्छा’ कहते हुए उस स्थानकी ओर चल दिये जहाँ आकाशसे वे फूल गिरे थे। वहाँ और भी बहुत-से फूल पड़े हुए थे, जो कुम्हलाये नहीं थे ॥ १३-१४ ॥
स ततस्तानि जग्राह दिव्यानि रुचिराणि च ।
प्राप्तानि स्वेन तपसा दिव्यगन्धानि भारत ॥ १५ ॥
भारत! तदनन्तर अपने तपसे प्राप्त हुए उन दिव्य सुगन्धसे युक्त मनोहर दिव्य पुष्पोंको विपुलने उठा लिया ॥ १५ ॥
सम्प्राप्य तानि प्रीतात्मा गुरोर्वचनकारकः ।
तदा जगाम तूर्णं च चम्पां चम्पकमालिनीम् ॥ १६ ॥
गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाले विपुल उन फूलोंको पाकर मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और तुरंत ही चम्पाके वृक्षोंसे घिरी हुई चम्पा नगरीकी ओर चल दिये ॥ १६ ॥
स वने निर्जने तात ददर्श मिथुनं नृणाम् ।
चक्रवत् परिवर्तन्तं गृहीत्वा पाणिना करम् ॥ १७ ॥
तात! एक निर्जन वनमें आनेपर उन्होंने स्त्री-पुरुषके एक जोड़ेको देखा, जो एक-दूसरेका हाथ पकड़कर कुम्हारके चाकके समान घूम रहे थे ॥ १७ ॥
तत्रैकस्तूर्णमगमत् तत्पदे च विवर्तयन् ।
एकस्तु न तदा राजंश्चक्रतुः कलहं ततः ॥ १८ ॥
राजन्! उनमेंसे एकने अपनी चाल तेज कर दी और दूसरेने वैसा नहीं किया। इसपर दोनों आपसमें झगड़ने लगे ॥ १८ ॥
त्वं शीघ्रं गच्छसीत्येकोऽब्रवीन्नेति तथा परः ।
नेति नेति च तौ राजन् परस्परमथोचतुः ॥ १९ ॥
नरेश्वर! एकने कहा—‘तुम जल्दी-जल्दी चलते हो।’ दूसरेने कहा, ‘नहीं।’ इस प्रकार दोनों एक-दूसरेपर दोषारोपण करते हुए एक-दूसरेको ‘नहीं-नहीं’ कह रहे थे ॥ १९ ॥
तयोर्विस्पर्धतोरेवं शपथोऽयमभूत् तदा ।
सहसोद्दिश्य विपुलं ततो वाक्यमथोचतुः ॥ २० ॥
इस प्रकार एक-दूसरेसे स्पर्धा रखते हुए उन दोनोंमें शपथ खानेकी नौबत आ गयी। फिर तो सहसा विपुलको लक्ष्य करके वे दोनों इस प्रकार बोले— ॥
आवयोरनृतं प्राह यस्तस्याभूद् द्विजस्य वै ।
विपुलस्य परे लोके या गतिः सा भवेदिति ॥ २१ ॥
‘हमलोगोंमेंसे जो भी झूठ बोलता है उसकी वही गति होगी जो परलोकमें ब्राह्मण विपुलके लिये नियत हुई है’ ॥ २१ ॥
एतत् श्रुत्वा तु विपुलो विषण्णवदनोऽभवत् ।
एवं तीव्रतपाश्चाहं कष्टश्चायं परिश्रमः ॥ २२ ॥
यह सुनकर विपुलके मुँहपर विषाद छा गया। ‘मैं ऐसी कठोर तपस्या करनेवाला हूँ तो भी मेरी दुर्गति होगी। तब तो तपस्या करनेका वह घोर परिश्रम कष्टदायक ही सिद्ध हुआ ॥ २२ ॥
मिथुनस्यास्य किं मे स्यात् कृतं पापं यथा गतिः । अनिष्टा सर्वभूतानां कीर्तितानेन मेऽद्य वै ॥ २३ ॥ ‘मेरा ऐसा कौन-सा पाप है जिसके अनुसार मेरी वह दुर्गति होगी जो समस्त प्राणियोंके लिये अनिष्ट है एवं इस स्त्री-पुरुषके जोड़ेको मिलनेवाली है, जिसका इन्होंने आज मेरे समक्ष वर्णन किया है’ ॥ २३ ॥ एवं संचिन्तयन्नेव विपुलो राजसत्तम । अवाङ्मुखो दीनमना दध्यौ दुष्कृतमात्मनः ॥ २४ ॥ नृपश्रेष्ठ! ऐसा सोचते हुए ही विपुल नीचे मुँह किये दीनचित्त हो अपने दुष्कर्मका स्मरण करने लगे ॥ २४ ॥ ततः षडन्यान् पुरुषानक्षैः काञ्चनराजतैः । अपश्यद् दीव्यमानान् वै लोभहर्षान्वितांस्तथा ॥ २५ ॥ कुर्वतः शपथं तेन यः कृतो मिथुनेन तु । विपुलं वै समुद्दिश्य तेऽपि वाक्यमथाब्रुवन् ॥ २६ ॥ तदनन्तर विपुलको दूसरे छः पुरुष दिखायी पड़े, जो सोने-चाँदीके पासे लेकर जूआ खेल रहे थे और लोभ तथा हर्षमें भरे हुए थे। वे भी वही शपथ कर रहे थे जो पहले स्त्री-पुरुषके जोड़ेने की थी। उन्होंने विपुलको लक्ष्य करके कहा— ॥ २५-२६ ॥
लोभमास्थाय योऽस्माकं विषमं कर्तुमुत्सहेत् । विपुलस्य परे लोके या गतिस्तामवाप्नुयात् ।। २७ ।। ‘हमलोगोंमेंसे जो लोभका आश्रय लेकर बेईमानी करनेका साहस करेगा, उसको वही गति मिलेगी, जो परलोकमें विपुलको मिलनेवाली है— ।। २७ ।।
एतत् श्रुत्वा तु विपुलो नापश्यद् धर्मसंकरम् । जन्मप्रभृति कौरव्य कृतपूर्वमथात्मनः ।। २८ ।। कुरुनन्दन! यह सुनकर विपुलने जन्मसे लेकर वर्तमान समयतकके अपने समस्त कर्मोंका स्मरण किया; किंतु कभी कोई धर्मके साथ पापका मिश्रण हुआ हो, ऐसा नहीं दिखायी दिया ।। २८ ।।
सम्प्रदध्यौ तथा राजन्नग्नावग्निरिवाहितः । दह्यमानेन मनसा शापं श्रुत्वा तथाविधम् ।। २९ ।। राजन्! परंतु अपने विषयमें वैसा शाप सुनकर जैसे एक आगमें दूसरी आग रख दी गयी हो और उसकी ज्वाला और भी बढ़ गयी हो, उसी प्रकार विपुलका हृदय शोकाग्निसे दग्ध होने लगा और उसी अवस्थामें वे पुनःअपने कार्योंपर विचार करने लगे ।। २९ ।।
तस्य चिन्तयतस्तात वह्व्यो दिननिशा ययुः ।
इदमासीन्मनसि स रुच्या रक्षणकारितम् ।। ३० ।।
तात! इस प्रकार चिन्ता करते हुए उनके कई दिन और कई रातें बीत गयीं। तब गुरुपत्नी रुचिकी रक्षाके कारण उनके मनमें ऐसा विचार उठा— ।। ३० ।।
लक्षणं लक्षणेनैव वदनं वदनेन च ।
विधाय न मया चोक्तं सत्यमेतद् गुरोस्तथा ।। ३१ ।।
‘मैंने जब गुरुपत्नीकी रक्षाके लिये उनके शरीरमें सूक्ष्मरूपसे प्रवेश किया था तब मेरी लक्षणेन्द्रिय उनकी लक्षणेन्द्रियसे और मुख उनके मुखसे संयुक्त हुआ था। ऐसा अनुचित कार्य करके भी मैंने गुरुजीको यह सच्ची बात नहीं बतायी’ ।। ३१ ।।
एतदात्मनि कौरव्य दुष्कृतं विपुलस्तदा ।
अमन्यत महाभाग तथा तच्च न संशयः ।। ३२ ।।
महाभाग कुरुनन्दन! उस समय विपुलने अपने मनमें इसीको पाप माना और निस्संदेह बात भी ऐसी ही थी ।। ३२ ।।
स चम्पां नगरीमेत्य पुष्पाणि गुरवे ददौ ।
पूजयामास च गुरुं विधिवत् स गुरुप्रियः ।। ३३ ।।
चम्पानगरीमें जाकर गुरुप्रेमी विपुलने वे फूल गुरुजीको अर्पित कर दिये और उनका विधिपूर्वक पूजन किया ।। ३३ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विपुलोपाख्याने
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विपुलका
उपाख्यानविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४२ ।।
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः
देवशर्माका विपुलको निर्दोष बताकर समझाना और भीष्मका युधिष्ठिरको स्त्रियोंकी रक्षाके लिये आदेश देना
भीष्म उवाच
तमागतमभिप्रेक्ष्य शिष्यं वाक्यमथाब्रवीत् ।
देवशर्मा महातेजा यत् तत् शृणु जनाधिप ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**नरेश्वर! अपने शिष्य विपुलको आया हुआ देख महातेजस्वी देवशर्माने उनसे जो बात कही, वही बताता हूँ, सुनो ॥ १ ॥
देवशर्मोवाच
किं ते विपुल दृष्टं वै तस्मिन् शिष्य महावने ।
ते त्वां जानन्ति विपुल आत्मा च रुचिरेव च ॥ २ ॥
**देवशर्माने पूछा—**मेरे प्रिय शिष्य विपुल! तुमने उस महान् वनमें क्या देखा था? वे लोग तो तुम्हें जानते हैं। उन्हें तुम्हारी अन्तरात्माका तथा मेरी पत्नी रुचिका भी पूरा परिचय प्राप्त है ॥ २ ॥
विपुल उवाच
ब्रह्मर्षे मिथुनं किं तत् के च ते पुरुषा विभो ।
ये मां जानन्ति तत्त्वेन यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ३ ॥
**विपुलने कहा—**ब्रह्मर्षे! मैंने जिसे देखा था, वह स्त्री-पुरुषका जोड़ा कौन था? तथा वे छः पुरुष भी कौन थे जो मुझे अच्छी तरह जानते थे और जिनके विषयमें आप भी मुझसे पूछ रहे हैं? ॥ ३ ॥
देवशर्मोवाच
यद् वै तन्मिथुनं ब्रह्मन्नहोरात्रं हि विद्धि तत् ।
चक्रवत् परिवर्तैत तत् ते जानाति दुष्कृतम् ॥ ४ ॥
ये च ते पुरुषा विप्र अक्षैर्दीव्यन्ति हृष्टवत् ।
ऋतूंस्तानभिजानीहि ते ते जानन्ति दुष्कृतम् ॥ ५ ॥
**देवशर्माने कहा—**ब्रह्मन्! तुमने जो स्त्री-पुरुषका जोड़ा देखा था उसे दिन और रात्रि समझो। वे दोनों चक्रवत् घूमते रहते हैं, अतः उन्हें तुम्हारे पापका पता है। विप्रवर! तथा जो अत्यन्त हर्षमें भरकर जूआ खेलते हुए छः पुरुष दिखायी दिये उन्हें छः ऋतु जानो; वे भी तुम्हारे पापको जानते हैं ॥ ४-५ ॥
न मां कश्चिद् विजानीत इति कृत्वा न विश्वसेत् ।
नरो रहसि पापात्मा पापकं कर्म वै द्विज ॥ ६ ॥
ब्रह्मन्! पापात्मा मनुष्य एकान्तमें पापकर्म करके ऐसा विश्वास न करे कि कोई मुझे इस पापकर्ममें लिप्त नहीं जानता है॥ ६ ॥
कुर्वाणं हि नरं कर्म पापं रहसि सर्वदा ।
पश्यन्ति ऋतवश्चापि तथा दिननिशेऽप्युत ॥ ७ ॥
एकान्तमें पापकर्म करते हुए पुरुषको ऋतुएँ तथा रात-दिन सदा देखते रहते हैं॥ ७॥
तथैव हि भवेयुस्ते लोकाः पापकृतो यथा ।
कृत्वा नाचक्षतः कर्म मम तच्च यथाकृतम् ॥ ८ ॥
तुमने मेरी स्त्रीकी रक्षा करते समय जिस प्रकार वह पापकर्म किया था, उसे करके भी मुझे बताया नहीं था; अतः तुम्हें वे ही पापाचारियोंके लोक मिल सकते थे॥ ८॥
ते त्वां हर्षस्मितं दृष्ट्वा गुरोः कर्मानिवेदकम् ।
स्मारयन्तस्तथा प्राहुस्ते यथा श्रुतवान् भवान् ॥ ९ ॥
गुरुको अपना पापकर्म न बताकर हर्ष और अभिमानमें भरा देख वे पुरुष तुम्हें अपने कर्मकी याद दिलाते हुए वैसी बातें बोल रहे थे, जिन्हें तुमने अपने कानों सुना है॥ ९॥
अहोरात्रं विजानाति ऋतवश्चापि नित्यशः ।
पुरुषे पापकं कर्म शुभं वा शुभकर्मिणः ॥ १० ॥
पापीमें जो पापकर्म है और शुभकर्मी मनुष्यमें जो शुभकर्म है, उन सबको दिन, रात और ऋतुएँ सदा जानती रहती हैं॥ १०॥
तत् त्वया मम यत् कर्म व्यभिचाराद् भयात्मकम् ।
नाख्यातमिति जानन्तस्ते त्वामाहुस्तथा द्विज ॥ ११ ॥
ब्रह्मन्! तुमने मुझसे अपना वह कर्म नहीं बताया जो व्यभिचार-दोषके कारण भयरूप था। वे जानते थे, इसलिये उन्होंने तुम्हें बता दिया॥ ११॥
तेनैव हि भवेयुस्ते लोकाः पापकृतो यथा ।
कृत्वा नाचक्षतः कर्म मम यच्च त्वया कृतम् ॥ १२ ॥
पापकर्म करके न बतानेवाले पुरुषको, जैसा कि तुमने मेरे साथ किया है, वे ही पापाचारियोंके लोक प्राप्त होते हैं॥ १२॥
त्वयाशक्या च दुर्वृत्त्या रक्षितुं प्रमदा द्विज ।
न च त्वं कृतवान् किंचिदतः प्रीतोऽस्मि तेन ते ॥ १३ ॥
ब्रह्मन्! यौवनमदसे उन्मत्त रहनेवाली उस स्त्रीकी (उसके शरीरमें प्रवेश किये बिना) रक्षा करना तुम्हारे वशकी बात नहीं थी। अतः तुमने अपनी ओरसे कोई पाप नहीं किया; इसलिये मैं तुमपर प्रसन्न हूँ॥
(मनोदोषविहीनानां न दोषः स्यात् तथा तव ।
अन्यथाऽऽलिङ्ग्यते कान्ता स्नेहेन दुहितान्यथा ।। जो मानसिक दोषसे रहित हैं उन्हें पाप नहीं लगता। यही बात तुम्हारे लिये भी हुई है। अपनी प्राणवल्लभा पत्नीका आलिंगन और भावसे किया जाता है और अपनी पुत्रीका और भावसे; अर्थात् उसे वात्सल्यस्नेहसे गले लगाया जाता है ।। निष्कषायो विशुद्धस्त्वं रुच्यावेशान्न दूषितः ।) तुम्हारे मनमें राग नहीं है। तुम सर्वथा विशुद्ध हो, इसलिये रुचिके शरीरमें प्रवेश करके भी दूषित नहीं हुए हो ।। यदि त्वहं त्वां दुर्वृत्तमद्राक्षं द्विजसत्तम । शपेयं त्वामहं क्रोधान्न मेऽत्रास्ति विचारणा ।। १४ ।। द्विजश्रेष्ठ! यदि मैं इस कर्ममें तुम्हारा दुराचार देखता तो कुपित होकर तुम्हें शाप दे देता और ऐसा करके मेरे मनमें कोई अन्यथा विचार या पश्चात्ताप नहीं होता ।। १४ ।। सज्जन्ति पुरुषे नार्यः पुंसां सोऽर्थश्च पुष्कलः । अन्यथारक्षतः शापोऽभविष्यत् ते मतिश्च मे ।। १५ ।। स्त्रियाँ पुरुषमें आसक्त होती हैं और पुरुषोंका भी इसमें पूर्णतः वैसा ही भाव होता है। यदि तुम्हारा भाव उसकी रक्षा करनेके विपरीत होता तो तुम्हें शाप अवश्य प्राप्त होता और मेरा विचार तुम्हें शाप देनेका अवश्य हो जाता ।। १५ ।। रक्षिता च त्वया पुत्र मम चापि निवेदिता । अहं ते प्रीतिमांस्तात स्वस्थः स्वर्गं गमिष्यसि ।। १६ ।। बेटा! तुमने यथाशक्ति मेरी स्त्रीकी रक्षा की है और यह बात मुझे बतायी है, अतः मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तात! तुम स्वस्थ रहकर स्वर्गलोकमें जाओगे ।। इत्युक्त्वा विपुलं प्रीतो देवशर्मा महार्नृषिः । मुमोद स्वर्गमास्थाय सहभार्यः सशिष्यकः ।। १७ ।। विपुलसे ऐसा कहकर प्रसन्न हुए महर्षि देवशर्मा अपनी पत्नी और शिष्यके साथ स्वर्गमें जाकर वहाँका सुख भोगने लगे ।। १७ ।। इदमाख्यातवांश्चापि ममाख्यानं महामुनिः । मार्कण्डेयः पुरा राजन् गङ्गाकूले कथान्तरे ।। १८ ।। राजन्! पूर्वकालमें गंगाके तटपर कथा-वार्ताके बीचमें ही महामुनि मार्कण्डेयने मुझे यह आख्यान सुनाया था ।। १८ ।। तस्माद् ब्रवीमि पार्थ त्वां स्त्रियो रक्ष्याः सदैव च । उभयं दृश्यते तासु सततं साध्वसाधु च ।। १९ ।। अतः कुन्तीनन्दन! मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम्हें स्त्रियोंकी सदा ही रक्षा करनी चाहिये। स्त्रियोंमें भली और बुरी दोनों बातें हमेशा देखी जाती हैं ।। १९ ।। स्त्रियः साध्यो महाभागाः सम्मता लोकमातरः ।