महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शपथविधिनामक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 827)
पञ्चनवतितमोऽध्यायः
छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप
युधिष्ठिर उवाच
यदिदं श्राद्धकृत्येषु दीयते भरतर्षभ ।
छत्रं चोपानहौ चैव केनैतत् सम्प्रवर्तितम् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भरतश्रेष्ठ! श्राद्धकर्मोंमें जिनका दान दिया जाता है, उन छत्र और उपानहोंके दानकी प्रथा किसने चलायी है? ॥ १ ॥
कथं चैतत् समुत्पन्नं किमर्थं चैव दीयते ।
न केवलं श्राद्धकृत्ये पुण्यकेष्वपि दीयते ॥ २ ॥
इनकी उत्पत्ति कैसे हुई और किसलिये इनका दान किया जाता है? केवल श्राद्धकर्ममें ही नहीं, अनेक पुण्यके अवसरोंपर भी इनका दान होता है ॥ २ ॥
बहुष्वपि निमित्तेषु पुण्यमाश्रित्य दीयते ।
एतद् विस्तरशो राजन् श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ३ ॥
बहुत-से निमित्त उपस्थित होनेपर पुण्यके उद्देश्यसे इन वस्तुओंके दानकी प्रथा देखी जाती है। अतः राजन्! मैं इस विषयको विस्तारके साथ यथावत् रूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
शृणु राजन्नवहितश्छत्रोपानहविस्तरम् ।
यथैतत् प्रथितं लोके यथा चैतत् प्रवर्तितम् ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! छाते और जूतेकी उत्पत्तिकी वार्ता मैं विस्तारके साथ बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो। संसारमें किस प्रकार इनके दानका आरम्भ हुआ और कैसे उस दानका प्रचार हुआ, यह सब श्रवण करो ॥ ४ ॥
यथा चाक्षय्यतां प्राप्तं पुण्यतां च यथा गतम् ।
सर्वमेतदशेषेण प्रवक्ष्यामि नराधिप ॥ ५ ॥
नरेश्वर! इन दोनों वस्तुओंका दान किस तरह अक्षय होता है, तथा ये किस प्रकार पुण्यकी प्राप्ति करानेवाली मानी गयी हैं। इन सब बातोंका मैं पूर्णरूपसे वर्णन
करूँगा॥ ५ ॥ जमदग्नेश्च संवादं सूर्यस्य च महात्मनः। पुरा स भगवान् साक्षाद्धनुषाक्रीडयत् प्रभो॥ ६ ॥ संधाय संधाय शरांश्चिक्षेप किल भार्गवः। तान् क्षिप्तान् रेणुका सर्वांस्तस्येषून्दीप्ततेजसः॥ ७ ॥ आनीय सा तदा तस्मै प्रादादसकृदच्युत। प्रभो! इस विषयमें महर्षि जमदग्नि और महात्मा भगवान् सूर्यके संवादका वर्णन किया जाता है। पूर्वकालकी बात है, एक दिन भृगुनन्दन भगवान् जमदग्निजी धनुष चलानेकी क्रीड़ा कर रहे थे। धर्मसे च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! वे बारंबार धनुषपर बाण रखकर उन्हें चलाते और उन चलाये हुए सम्पूर्ण तेजस्वी बाणोंको उनकी पत्नी रेणुका ला-लाकर दिया करती थीं॥ ६-७ १/२ ॥
अथ तेन स शब्देन ज्यायाश्चैव शरस्य च॥ ८ ॥ प्रहृष्टः सम्प्रचिक्षेप सा च प्रत्याजहार तान्। धनुषकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि और बाणके छूटनेकी सनसनाहटसे जमदग्नि मुनि बहुत प्रसन्न होते थे। अतः वे बार-बार बाण चलाते और रेणुका उन्हें दूरसे उठा-उठाकर लाया करती थीं॥ ८ १/२ ॥
ततो मध्याह्नमारूढे ज्येष्ठामूले दिवाकरे॥ ९ ॥ स सायकान् द्विजो मुक्त्वा रेणुकामिदमब्रवीत्। गच्छानय विशालाक्षि शरानेतान् धनुश्च्युतान्॥ १० ॥ यावदेतान् पुनः सुभ्रु क्षिपामीति जनाधिप। जनेश्वर! इस प्रकार बाण चलानेकी क्रीड़ा करते-करते ज्येष्ठ मासके सूर्य दिनके मध्यभागमें आ पहुँचे। विप्रवर जमदग्निने पुनः बाण छोड़कर रेणुकासे कहा—'सुभ्रु! विशाललोचने! जाओ, मेरे धनुषसे छूटे हुए इन बाणोंको ले आओ, जिससे मैं पुनः इन सबको धनुषपर रखकर छोड़ूँ'॥ ९-१० १/२ ॥
सा गच्छन्त्यन्तरा छायां वृक्षमाश्रित्य भामिनी॥ ११ ॥ तस्थौ तस्या हि सन्तप्तं शिरः पादौ तथैव च। मानिनी रेणुका वृक्षोंके बीचसे होकर उनकी छायाका आश्रय ले जाती हुई बीच-बीचमें ठहर जाती थी; क्योंकि उसके सिर और पैर तप गये थे॥ ११ १/२ ॥
स्थिता सा तु मुहूर्तं वै भर्तुः शापभयाच्छुभा॥ १२ ॥ ययावानयितुं भूयः सायकानसितेक्षणा। कजरारे नेत्रोंवाली वह कल्याणमयी देवी एक जगह दो ही घड़ी ठहरकर पतिके शापके भयसे पुनः उन बाणोंको लानेके लिये चल दी॥ १२ १/२ ॥
प्रत्याजगाम च शरांस्तानादाय यशस्विनी ॥ १३ ॥
सा वै खिन्ना सुचार्वङ्गी पद्भ्यां दुःखं नियच्छती ।
उपाजगाम भर्तारं भयाद् भर्तुः प्रवेपती ॥ १४ ॥
उन बाणोंको लेकर सुन्दर अंगोंवाली यशस्विनी रेणुका जब लौटी; उस समय वह बहुत खिन्न हो गयी थी। पैरोंके जलनेसे जो दुःख होता था, उसको किसी तरह सहती और पतिके भयसे थर-थर काँपती हुई उनके पास आयी ॥ १३-१४ ॥
स तामृषिस्तदा क्रुद्धो वाक्यमाह शुभाननाम् ।
रेणुके किं चिरेण त्वमागतेति पुनः पुनः ॥ १५ ॥
उस समय महर्षि कुपित होकर सुन्दर मुखवाली अपनी पत्नीसे बारंबार पूछने लगे—‘रेणुके! तुम्हारे आनेमें इतनी देर क्यों हुई?’ ॥ १५ ॥
रेणुकोवाच
शिरस्तावत् प्रदीप्तं मे पादौ चैव तपोधन ।
सूर्यतेजोनिरुद्धाहं वृक्षच्छायां समाश्रिता ॥ १६ ॥
रेणुका बोली—तपोधन! मेरा सिर तप गया, दोनों पैर जलने लगे और सूर्यके प्रचण्ड तेजने मुझे आगे बढ़नेसे रोक दिया। इसलिये थोड़ी देरतक वृक्षकी छायामें खड़ी होकर विश्राम लेने लगी थी ॥ १६ ॥
एतस्मात् कारणाद् ब्रह्मंश्चिरयैतत् कृतं मया ।
एतच्छ्रुत्वा मम विभो मा क्रुधस्त्वं तपोधन ॥ १७ ॥
ब्रह्मन्! इसी कारणसे मैंने आपका यह कार्य कुछ विलम्बसे पूरा किया है। तपोधन! प्रभो! मेरे इस बातपर ध्यान देकर आप क्रोध न करें ॥ १७ ॥
जमदग्निरुवाच
अद्यैनं दीप्तकिरणं रेणुके तव दुःखदम् ।
शरैर्निपातयिष्यामि सूर्यमस्त्राग्नितेजसा ॥ १८ ॥
जमदग्निने कहा—रेणुके! जिसने तुझे कष्ट पहुँचाया है, उस उद्दीप्त किरणोंवाले सूर्यको आज मैं अपने बाणोंसे, अपनी अस्त्राग्निके तेजसे गिरा दूँगा ॥ १८ ॥
भीष्म उवाच
स विस्फार्य धनुर्दिव्यं गृहीत्वा च शरान् बहून् ।
अतिष्ठत् सूर्यमभितो या तो याति ततो मुखः ॥ १९ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ऐसा कहकर महर्षि जमदग्निने अपने दिव्य धनुषकी प्रत्यंचा खींची और बहुत-से बाण हाथमें लेकर सूर्यकी ओर मुँह करके वे खड़े हो गये। जिस दिशाकी ओर सूर्य जा रहे थे, उसी ओर उन्होंने भी अपना मुँह कर लिया था ॥
अथ तं प्रेक्ष्य सन्नद्धं सूर्योऽभ्येत्य तथाब्रवीत् ।
द्विजरूपेण कौन्तेय किं ते सूर्योऽपराध्यते ॥ २० ॥
कुन्तीनन्दन! उन्हें युद्धके लिये तैयार देख सूर्यदेव ब्राह्मणका रूप धारण करके उनके पास आये और बोले—'ब्रह्मन्! सूर्यने आपका क्या अपराध किया है? ॥
आदत्ते रश्मिभिः सूर्यो दिवि तिष्ठंस्ततस्ततः ।
रसं हृतं वै वर्षासु प्रवर्षति दिवाकरः ॥ २१ ॥
'सूर्यदेव तो आकाशमें स्थित होकर अपनी किरणों-द्वारा वसुधाका रस खींचते हैं और बरसातमें पुनः उसे बरसा देते हैं ॥ २१ ॥
ततोऽन्नं जायते विप्र मनुष्याणां सुखावहम् ।
अन्नं प्राणा इति यथा वेदेषु परिपठ्यते ॥ २२ ॥
'विप्रवर! उसी वर्षासे अन्न उत्पन्न होता है, जो मनुष्योंके लिये सुखदायक है। अन्न ही प्राण है, यह बात वेदमें भी बतायी गयी है ॥ २२ ॥
अथाभ्रेषु निगूढश्च रश्मिभिः परिवारितः ।
सप्तद्वीपानिमान् ब्रह्मन् वर्षेणाभिप्रवर्षति ॥ २३ ॥
'ब्रह्मन्! अपने किरणसमूहसे घिरे हुए भगवान् सूर्य बादलोंमें छिपकर सातों द्वीपोंकी पृथ्वीको वर्षाके जलसे आप्लावित करते हैं ॥ २३ ॥
ततस्तदौषधीनां च वीरुधां पुष्पपत्रजम् ।
सर्वं वर्षाभिनिर्वृत्तमन्नं सम्भवति प्रभो ॥ २४ ॥
'उसीसे नाना प्रकारकी ओषधियाँ, लताएँ, पत्र-पुष्प, घास-पात आदि उत्पन्न होते हैं। प्रभो! प्रायः सभी प्रकारके अन्न वर्षाके जलसे उत्पन्न होते हैं ॥ २४ ॥
जातकर्माणि सर्वाणि व्रतोपनयनानि च ।
गोदानानि विवाहाश्च तथा यज्ञसमृद्धयः ॥ २५ ॥
शास्त्राणि दानानि तथा संयोगा वित्तसंचयाः ।
अन्नतः सम्प्रवर्तन्ते तथा त्वं वेत्थ भार्गव ॥ २६ ॥
'जातकर्म, व्रत, उपनयन, विवाह, गोदान, यज्ञ सम्पत्ति, शास्त्रीय दान, संयोग और धनसंग्रह आदि सारे कार्य अन्नसे ही सम्पादित होते हैं। भृगुनन्दन! इस बातको आप भी अच्छी तरह जानते हैं ॥ २५-२६ ॥
रमणीयानि यावन्ति यावदारम्भकाणि च ।
सर्वमन्नात् प्रभवति विदितं कीर्तयामि ते ॥ २७ ॥
'जितने सुन्दर पदार्थ हैं, अथवा जो भी उत्पादक पदार्थ हैं, वे सब अन्नसे ही प्रकट होते हैं। यह सब मैं ऐसी बात बता रहा हूँ जो आपको पहलेसे ही विदित हैं ॥ २७ ॥
सर्वं हि वेत्थ विप्र त्वं यदेतत् कीर्तितं मया ।
प्रसादये त्वां विप्रर्षे किं ते सूर्य निपात्य वै ॥ २८ ॥
'विप्रवर! ब्रह्मर्षे! मैंने जो कुछ भी कहा है, वह सब आप भी जानते हैं। भला, सूर्यको गिरानेसे आपको क्या लाभ होगा? अतः मैं प्रार्थनापूर्वक आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ (कृपया सूर्यको नष्ट करनेका संकल्प छोड़ दीजिये)' ।। २८ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि छत्रोपानहोत्पत्तिर्नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः ।। ९५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छत्र और उपानहकी उत्पत्तिनामक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९५ ।।
अध्याय (पृष्ठ 832)
षण्णवतितमोऽध्यायः
छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानकी प्रशंसा
युधिष्ठिर उवाच
एवं प्रयाचति तथा भास्करे मुनिसत्तमः ।
जमदग्निर्महातेजाः किं कार्यं प्रत्यपद्यत ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! जब सूर्यदेव इस प्रकार याचना कर रहे थे, उस समय महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ जमदग्निने कौन-सा कार्य किया? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
स तथा याचमानस्य मुनिरग्निसमप्रभः ।
जमदग्निः शमं नैव जगाम कुरुनन्दन ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— कुरुनन्दन! सूर्यदेवके इस तरह प्रार्थना करनेपर भी अग्निके समान तेजस्वी जमदग्नि मुनिका क्रोध शान्त नहीं हुआ ॥ २ ॥
ततः सूर्यो मधुरया वाचा तमिदमब्रवीत् ।
कृताञ्जलिर्विप्ररूपी प्रणम्यैनं विशाम्पते ॥ ३ ॥
प्रजानाथ! तब विप्ररूपधारी सूर्यने हाथ जोड़ प्रणाम करके मधुर वाणीद्वारा यों कहा— ॥ ३ ॥
चलं निमित्तं विप्रर्षे सदा सूर्यस्य गच्छतः ।
कथं चलं भेत्स्यसि त्वं सदा यान्तं दिवाकरम् ॥ ४ ॥
‘विप्रर्षे! आपका लक्ष्य तो चल है, सूर्य भी सदा चलते रहते हैं। अतः निरन्तर यात्रा करते हुए सूर्यरूपी चंचल लक्ष्यका आप किस प्रकार भेदन करेंगे?’ ॥ ४ ॥
जमदग्निरुवाच
स्थिरं चापि चलं चापि जाने त्वां ज्ञानचक्षुषा ।
अवश्यं विनयाधानं कार्यमद्य मया तव ॥ ५ ॥
जमदग्नि बोले— हमारा लक्ष्य चंचल हो या स्थिर, हम ज्ञानदृष्टिसे पहचान गये हैं कि तुम्हीं सूर्य हो। अतः आज दण्ड देकर तुम्हें अवश्य ही विनययुक्त बनायेंगे ॥ ५ ॥
मध्याह्ने वै निमेषार्धं तिष्ठसि त्वं दिवाकर ।
तत्र भेत्स्यामि सूर्य त्वां न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ ६ ॥
दिवाकर! तुम दोपहरके समय आधे निमेषके लिये ठहर जाते हो! सूर्य! उसी समय तुम्हें स्थिर पाकर हम अपने बाणोंद्वारा तुम्हारे शरीरका भेदन कर डालेंगे। इस विषयमें मुझे कोई (अन्यथा) विचार नहीं करना है ॥
सूर्य उवाच असंशयं मां विप्रर्षे भेत्स्यसे धन्विनां वर । अपकारिणं मां विद्धि भगवन् शरणागतम् ॥ ७ ॥ **सूर्य बोले—**धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ विप्रर्षे! निस्संदेह आप मेरे शरीरका भेदन कर सकते हैं। भगवन्! यद्यपि मैं आपका अपराधी हूँ तो भी आप मुझे अपना शरणागत समझिये ॥ ७ ॥
भीष्म उवाच ततः प्रहस्य भगवान् जमदग्निरुवाच तम् । न भीः सूर्य त्वया कार्या प्रणिपातगतो ह्यसि ॥ ८ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! सूर्यदेवकी यह बात सुनकर भगवान् जमदग्नि हँस पड़े और उनसे बोले—'सूर्यदेव! अब तुम्हें भय नहीं मानना चाहिये; क्योंकि तुम मेरे शरणागत हो गये हो ॥ ८ ॥
ब्राह्मणेष्वार्जवं यच्च स्थैर्यं च धरणीतले । सौम्यतां चैव सोमस्य गाम्भीर्यं वरुणस्य च ॥ ९ ॥ दीप्तिमग्नेः प्रभां मेरोः प्रतापं तपनस्य च । एतान्यतिक्रमेद् यो वै स हन्याच्छरणागतम् ॥ १० ॥ 'ब्राह्मणोंमें जो सरलता है, पृथ्वीमें जो स्थिरता है, सोमका जो सौम्यभाव, सागरकी जो गम्भीरता, अग्निकी जो दीप्ति, मेरुकी जो चमक और सूर्यका जो प्रताप है—इन सबका वह पुरुष उल्लंघन कर जाता है, इन सबकी मर्यादाका नाश करनेवाला समझा जाता है जो शरणागतका वध करता है ॥ ९-१० ॥
भवेत् स गुरुतल्पी च ब्रह्महा च स वै भवेत् । सुरापानं स कुर्याच्च यो हन्याच्छरणागतम् ॥ ११ ॥ जो शरणागतकी हत्या करता है, उसे गुरुपत्नीगमन, ब्रह्महत्या और मदिरापानका पाप लगता है' ॥ ११ ॥
एतस्य त्वपनीतस्य समाधिं तात चिन्तय । यथा सुखगमः पन्था भवेत् त्वद्रश्मिभावितः ॥ १२ ॥ तात! इस समय तुम्हारे द्वारा जो यह अपराध हुआ है, उसका कोई समाधान—उपाय सोचो। जिससे तुम्हारी किरणोंद्वारा तपा हुआ मार्ग सुगमतापूर्वक चलने योग्य हो सके' ॥ १२ ॥
भीष्म उवाच एतावदुक्त्वा स तदा तूष्णीमासीद् भृगूत्तमः । अथ सूर्योऽददत् तस्मै छत्रोपानहमाशु वै ॥ १३ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! इतना कहकर भृगुश्रेष्ठ जमदग्नि मुनि चुप हो गये। तब भगवान् सूर्यने उन्हें शीघ्र ही छत्र और उपानह दोनों वस्तुएँ प्रदान कीं ।। १३ ।।
सूर्य उवाच
महर्षे शिरसस्त्राणं छत्रं मद्रश्मिनिवारणम् ।
प्रतिगृह्णीष्व पद्भ्यां च त्राणार्थं चर्मपादुके ॥ १४ ॥
**सूर्यदेवने कहा—**महर्षे! यह छत्र मेरी किरणोंका निवारण करके मस्तककी रक्षा करेगा तथा चमड़ेके बने ये एक जोड़े जूते हैं, जो पैरोंको जलनेसे बचानेके लिये प्रस्तुत किये गये हैं। आप इन्हें ग्रहण कीजिये ॥ १४ ॥
अद्यप्रभृति चैवेह लोके सम्प्रचरिष्यति ।
पुण्यकेषु च सर्वेषु परमक्षय्यमेव च ॥ १५ ॥
आजसे इस जगत्में इन दोनों वस्तुओंका प्रचार होगा और पुण्यके सभी अवसरोंपर इनका दान उत्तम एवं अक्षय फल देनेवाला होगा ॥ १५ ॥
भीष्म उवाच
छत्रोपानहमेतत् तु सूर्येणैतत् प्रवर्तितम् ।
पुण्यमेतदभिख्यातं त्रिषु लोकेषु भारत ॥ १६ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**भारत! छाता और जूता—इन दोनों वस्तुओंका प्राकट्य—छाता लगाने और जूता पहननेकी प्रथा सूर्यने ही जारी की है। इन वस्तुओंका दान तीनों लोकोंमें पवित्र बताया गया है ॥ १६ ॥
तस्मात् प्रयच्छ विप्रेषु छत्रोपानहमुत्तमम् ।
धर्मस्तेषु महान् भावी न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ १७ ॥
इसलिये तुम ब्राह्मणोंको उत्तम छाते और जूते दिया करो। उनके दानसे महान् धर्म होगा। इस विषयमें मुझे भी संदेह नहीं है ॥ १७ ॥
छत्रं हि भरतश्रेष्ठ यः प्रदद्याद् द्विजातये ।
शुभ्रं शतशलाकं वै स प्रेत्य सुखमेधते ॥ १८ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो ब्राह्मणको सौ शलाकाओंसे युक्त सुन्दर छाता दान करता है, वह परलोकमें सुखी होता है ॥
स शक्रलोके वसति पूज्यमानो द्विजातिभिः ।
अप्सरोभिश्च सततं देवैश्च भरतर्षभ ॥ १९ ॥
भरतभूषण! वह देवताओं, ब्राह्मणों और अप्सराओंद्वारा सतत सम्मानित होता हुआ इन्द्रलोकमें निवास करता है ॥ १९ ॥
दह्यमानाय विप्राय यः प्रयच्छत्युपानहौ ।
स्नातकाय महाबाहो संशिताय द्विजातये ॥ २० ॥
सोऽपि लोकानवाप्नोति दैवतैरभिपूजितान् ।
गोलोके स मुदा युक्तो वसति प्रेत्य भारत ॥ २१ ॥
महाबाहो! भरतनन्दन! जिसके पैर जल रहे हों ऐसे कठोर व्रतधारी स्नातक द्विजको जो जूते दान करता है, वह शरीर-त्यागके पश्चात् देववन्दित लोकोंमें जाता है और बड़ी प्रसन्नताके साथ गोलोकमें निवास करता है ॥
एतत् ते भरतश्रेष्ठ मया कार्त्स्न्येन कीर्तितम् ।
छत्रोपानहदानस्य फलं भरतसत्तम ॥ २२ ॥
भरतश्रेष्ठ! भरतसत्तम! यह मैंने तुमसे छातों और जूतोंके दानका सम्पूर्ण फल बताया है ॥ २२ ॥
[सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति]
युधिष्ठिर उवाच
शूद्राणामिह शुश्रूषा नित्यमेवानुवर्णिता ।
कैः कारणैः कतिविधा शुश्रूषा समुदाहृता ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! इस जगत्में शूद्रोंके लिये सदा द्विजातियोंकी सेवाको ही परम धर्म बताया गया है। वह सेवा किन कारणोंसे कितने प्रकारकी कही गयी है? ॥
के च शुश्रूषया लोका विहिता भरतर्षभ ।
शूद्राणां भरतश्रेष्ठ ब्रूहि मे धर्मलक्षणम् ॥
भरतभूषण! भरतरत्न! शूद्रोंको द्विजोंकी सेवासे किन लोकोंकी प्राप्ति बतायी गयी है? मुझे धर्मका लक्षण बताइये ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
शूद्राणामनुकम्पार्थं यदुक्तं ब्रह्मवादिना ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें ब्रह्मवादी पराशरने शूद्रोंपर कृपा करनेके लिये जो कुछ कहा है, उसी इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥
वृद्धः पराशरः प्राह धर्मं शुभ्रमनामयम् ।
अनुग्रहार्थं वर्णानां शौचाचारसमन्वितम् ॥
बड़े-बूढ़े पराशर मुनिने सब वर्णोंपर कृपा करनेके लिये शौचाचारसे सम्पन्न निर्मल एवं अनामय धर्मका प्रतिपादन किया ॥
धर्मोपदेशमखिलं यथावदनुपूर्वशः ।
शिष्यानध्यापयामास शास्त्रमर्थवदर्थवित् ॥
तत्त्वज्ञ पराशर मुनिने अपने सारे धर्मोपदेशको ठीक-ठीक आनुपूर्वीसहित अपने शिष्योंको पढ़ाया। वह एक सार्थक धर्मशास्त्र था।।
पराशर उवाच
क्षान्तेन्द्रियेण दान्तेन शुचिनाचापलेन वै ।
अदुर्बलेन धीरेण नोत्तरोत्तरवादिना ।।
अलुब्धेनानृशंसेन ऋजुना ब्रह्मवादिना ।
चारित्रतत्परेणैव सर्वभूतहितात्मना ।।
अरयः षड् विजेतव्या नित्यं स्वं देहमाश्रिताः ।
कामक्रोधौ च लोभश्च मानमोहौ मदस्तथा ।।
पराशरने कहा—मनुष्यको चाहिये कि वह जितेन्द्रिय, मनोनिग्रही, पवित्र, चंचलतारहित, सबल, धैर्यशील, उत्तरोत्तर वाद-विवाद न करनेवाला, लोभहीन, दयालु, सरल, ब्रह्मवादी, सदाचारपरायण और सर्वभूतहितैषी होकर सदा अपने ही देहमें रहनेवाले काम, क्रोध, लोभ, मान, मोह और मद—इन छः शत्रुओंको अवश्य जीते ।।
विधिना धृतिमास्थाय शुश्रूषुरनहंकृतः ।
वर्णत्रयस्यानुमतो यथाशक्ति यथाबलम् ।।
कर्मणा मनसा वाचा चक्षुषा च चतुर्विधम् ।
आस्थाय नियमं धीमान् शान्तो दान्तो जितेन्द्रियः ।।
बुद्धिमान् मनुष्य विधिपूर्वक धैर्यका आश्रय ले गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर, अहंकारशून्य तथा तीनों वर्णोंकी सहानुभूतिका पात्र होकर अपनी शक्ति और बलके अनुसार कर्म, मन, वाणी और नेत्र—इन चारोंके द्वारा चार प्रकारके संयमका अवलम्बन ले शान्तचित्त, दमनशील एवं जितेन्द्रिय हो जाय ।।
नित्यं दक्षजनान्वेषी शेषान्नकृतभोजनः ।
वर्णत्रयान्मधु यथा भ्रमरो धर्ममाचरन् ।।
दक्ष—ज्ञानीजनोंका नित्य अन्वेषण करनेवाला यज्ञशेष अमृतरूप अन्नका भोजन करे। जैसे भौंरा फूलोंसे मधुका संचय करता है, उसी प्रकार तीनों वर्णोंसे मधुकरी भिक्षाका संचय करते हुए ब्राह्मण भिक्षुको धर्मका आचरण करना चाहिये ।।
स्वाध्यायधनिनो विप्राः क्षत्रियाणां बलं धनम् ।
वणिक्कृषिश्च वैश्यानां शूद्राणां परिचारिका ।।
व्युच्छेदात् तस्य धर्मस्य निरयायोपपद्यते ।
ब्राह्मणोंका धन है वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय, क्षत्रियोंका धन है बल, वैश्योंका धन है व्यापार और खेती, तथा शूद्रोंका धन है तीनों वर्णोंकी सेवा। इस धर्मरूपी धनका उच्छेद करनेसे मनुष्य नरकमें पड़ता है ।।
ततो म्लेच्छा भवन्त्येते निर्गुणा धर्मवर्जिताः ।। पुनश्च निरयं तेषां तिर्यग्योनिश्च शाश्वती । नरकसे निकलनेपर ये धर्मरहित निर्दय मनुष्य म्लेच्छ होते हैं और म्लेच्छ होनेके बाद फिर पापकर्म करनेसे उन्हें सदाके लिये नरक और पशु-पक्षी आदि तिर्यक् योनिकी प्राप्ति होती है ।।
ये तु सत्पथमास्थाय वर्णाश्रमकृतं पुरा ।। सर्वान् विमार्गानुत्सृज्य स्वधर्मपथमाश्रिताः । सर्वभूतदयावन्तो दैवतद्विजपूजकाः ।। शास्त्रदृष्टेन विधिना श्रद्धया जितमन्यवः । तेषां विधिं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ।। उपादानविधिं कृत्स्नं शुश्रूषाधिगमं तथा । जो लोग प्राचीन वर्णाश्रमोचित सन्मार्गका आश्रय ले सारे विपरीत मार्गोंका परित्याग करके स्वधर्मके मार्गपर चलते हैं, समस्त प्राणियोंके प्रति दया रखते हैं और क्रोधको जीतकर शास्त्रोक्त विधिसे श्रद्धापूर्वक देवताओं तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, उनके लिये यथावत् रूपसे क्रमशः सम्पूर्ण धर्मोंके ग्रहणकी विधि तथा सेवाभावकी प्राप्ति आदिका वर्णन करता हूँ ।।
शौचकृत्यस्य शौचार्थान् सर्वानैव विशेषतः ।। महाशौचप्रभृतयो दृष्टास्तत्त्वार्थदर्शिभिः । जो विशेषरूपसे शौचका सम्पादन करना चाहते हैं, उनके लिये सभी शौचविषयक प्रयोजनोंका वर्णन करता हूँ। तत्त्वदर्शी विद्वानोंने शास्त्रमें महाशौच आदि विधानोंको प्रत्यक्ष देखा है ।।
तत्रापि शूद्रो भिक्षूणां मृदं शेषं च कल्पयेत् ।। वहाँ शूद्र भी भिक्षुओंके शौचाचारके लिये मिट्टी तथा अन्य आवश्यक पदार्थोंका प्रबन्ध करे ।।
भिक्षुभिः सुकृतप्रज्ञैः केवलं धर्ममाश्रितैः । सम्यग्दर्शनसम्पन्नैर्गताध्वनि हितार्थिभिः ।। अवकाशमिदं मेध्यं निर्मितं कामवीरुधम् । जो धर्मके ज्ञाता, केवल धर्मके ही आश्रित तथा सम्यक् ज्ञानसे सम्पन्न हैं, उन सर्वहितैषी संन्यासियोंको चाहिये कि वे सज्जनाचरित मार्गपर स्थित हो इस पवित्र कामलतास्वरूप स्थान (मलत्यागके योग्य क्षेत्र आदि) का निश्चय करे ।।
निर्जनं संवृतं बुद्ध्वा नियतात्मा जितेन्द्रियः ।। सजलं भाजनं स्थाप्यं मृत्तिकां च परीक्षिताम् । परीक्ष्य भूमिं मूत्रार्थी तत आसीत वाग्यतः ।।
मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह निर्जन एवं घिरे हुए स्थानको देखकर वहाँ सजल पात्र और देख-भाल कर ली हुई मृत्तिका रखे। फिर उस भूमिका भलीभाँति निरीक्षण करके मौन होकर मूत्र-त्यागके लिये बैठे ।। उदङ्मुखो दिवा कुर्याद् रात्रौ चेद् दक्षिणामुखः । अन्तर्हितायां भूमौ तु अन्तर्हितशिरास्तथा ।। यदि दिन हो तो उत्तरकी ओर मुँह करके और रात हो तो दक्षिणाभिमुख होकर मल या मूत्रका त्याग करे। मल त्याग करनेके पूर्व उस समय भूमिको तिनके आदिसे ढके रखना चाहिये तथा अपने मस्तकको भी वस्त्रसे आच्छादित किये रहना उचित है ।। असमाप्ते तथा शौचे न वाचं किंचिदीरयेत् । कृतकृत्यस्तथाऽऽचम्य गच्छन्नोदीरयेद् वचः ।। जबतक शौच-कर्म समाप्त न हो जाय तबतक मुँहसे कुछ न बोले, अर्थात् मौन रहे। शौच-कर्म पूरा करके भी आचमनके अनन्तर जाते समय मौन ही रहे ।। शौचार्थमुपतिष्ठंस्तु मृद्भाजनपुरस्कृतः । स्थाप्यं कमण्डलुं गृह्य पार्श्वोरुभ्यामथान्तरे ।। शौचं कुर्याच्छनैर्धीरो बुद्धिपूर्वमसंकरम् । शौचके लिये बैठा हुआ पुरुष अपने सामने मृत्तिका और जलपात्र रखे। धीर पुरुष कमण्डलुको हाथमें लिये हुए दाहिने पार्श्व और ऊरुके मध्यदेशमें रखे और सावधानीके साथ धीरे-धीरे मूत्र-त्याग करे, जिससे अपने किसी अंगपर उसका छींटा न पड़े ।। पाणिना शुद्धमुदकं संगृह्य विधिपूर्वकम् ।। विप्रुषश्च यथा न स्युर्यथा चोरू न संस्पृशेत् । तत्पश्चात् हाथसे विधिपूर्वक शुद्ध जल लेकर मूत्रस्थान (उपस्थ) को ऐसी सावधानीके साथ धोये, जिससे उसमें मूत्रकी बूँदें न लगी रह जायँ तथा अशुद्ध हाथसे दोनों जाँघोंका भी स्पर्श न करे ।। अपाने मृत्तिकास्तिस्रः प्रदेयास्त्वनुपूर्वशः ।। यथा घातो हि न भवेत् क्लेदजः परिधानके । यदि मल त्याग किया गया हो तो गुदाभागको धोते समय उसमें क्रमशः तीन बार मिट्टी लगाये। गुदाको शुद्ध करनेके लिये बारंबार इस प्रकार धोना चाहिये कि जलका आघात कपड़ेमें न लगे ।। सव्ये द्वादश देयाः स्युस्तिस्रस्तिस्रः पुनः पुनः । तत्पश्चात् बायें हाथमें बारह बार और दाहिनेमें कई बार तीन-तीन बार मिट्टी लगावे ।। मलोपहतचैलस्य द्विगुणं तु विधीयते ।। सहपादमथोरुभ्यां हस्तशौचमसंशयम् ।
जिसका कपड़ा मलसे दूषित हो गया है ऐसे पुरुषके लिये द्विगुण शौचका विधान है। उसे दोनों पैरों, दोनों जाँघों और दोनों हाथोंकी विशेष शुद्धि अवश्य करनी चाहिये ।। अवधीयमानस्य संदेह उपजायते । यथा यथा विशुद्ध्येत तत् तथा तदुपक्रमेत् ।। शौचका पालन न करनेसे शरीर-शुद्धिके विषयमें संदेह बना रहता है। अतः जिस-जिस प्रकारसे शरीर-शुद्धि हो वैसे-ही-वैसे कार्य करनेकी चेष्टा करे ।। क्षारौशराभ्यां वस्त्रस्य कुर्याच्छौचं मृदा सह ।। लेपगन्धापनयनममेध्यस्य विधीयते । मिट्टीके साथ क्षार और रेह मिलाकर उसके द्वारा वस्त्रकी शुद्धि करनी चाहिये। जिसमें कोई अपवित्र वस्तु लग गयी हो उस वस्त्रसे उस वस्तुका लेप मिट जाय और उसकी दुर्गन्ध दूर हो जाय, ऐसी शुद्धिका सम्पादन आवश्यक होता है ।। देयाश्चतस्रस्तिस्रो वा द्वे वाप्येकां तथाऽऽपदि ।। कालमासाद्य देशं च शौचस्य गुरुलाघवम् । आपत्तिकालमें चार, तीन, दो अथवा एक बार मृत्तिका लगानी चाहिये। देश और कालके अनुसार शौचाचारमें गौरव अथवा लाघव किया जा सकता है ।। विधिनानेन शौचं तु नित्यं कुर्यादतन्द्रितः ।। अविप्रेक्षन्नसम्भ्रान्तः पादौ प्रक्षाल्य तत्परः । इस विधिसे प्रतिदिन आलस्यका परित्याग करके शौच (शुद्धि) का सम्पादन करे तथा शुद्धिका सम्पादन करनेवाला पुरुष दोनों पैरोंको धोकर इधर-उधर दृष्टि न डालता हुआ बिना किसी घबराहटके चला जाय ।। सुप्रक्षालितपादस्तु पाणिमामणिबन्धनात् ।। अधस्तादुपरिष्टाच्च ततः पाणिमुपस्पृशेत् । पहले पैरोंको भलीभाँति धोकर फिर कलाईसे लेकर समूचे हाथको ऊपरसे नीचेतक धो डाले। इसके बाद हाथमें जल लेकर आचमन करे ।। मनोगतास्तु निश्शब्दा निश्शब्दं त्रिरपः पिबेत् ।। द्विर्मुखं परिमृज्याच्च खानि चोपस्पृशेद बुधः । आचमनके समय मौन होकर तीन बार जल पीये। उस जलमें किसी प्रकारकी आवाज न हो तथा आचमनके पश्चात् वह जल हृदयतक पहुँचे। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह अंगूठेके मूलभागसे दो बार मुँह पोंछे। इसके बाद इन्द्रियोंके छिद्रोंका स्पर्श करे ।। ऋग्वेदं तेन प्रीणाति प्रथमं यः पिबेदपः । द्वितीयं च यजुर्वेदं तृतीयं साम एव च ।। वह प्रथम बार जो जल पीता है, उससे ऋग्वेदको तृप्त करता है, द्वितीय बारका जल यजुर्वेदको और तृतीय बारका जल सामवेदको तृप्त करता है ।।
मृज्यते प्रथमं तेन अथर्वा प्रीतिमाप्नुयात् ।।
द्वितीयेनेतिहासं च पुराणस्मृतिदेवताः ।
पहली बार जो मुखका मार्जन किया जाता है, उससे अथर्ववेद तृप्त होता है और द्वितीय बारके मार्जनसे इतिहास-पुराण एवं स्मृतियोंके अधिष्ठाता देवता सन्तुष्ट होते हैं ।।
यच्चक्षुषि समाधत्ते तेनादित्यं तु प्रीणयेत् ।।
प्रीणाति वायुं घ्राणं च दिशश्चाप्यथ श्रोत्रयोः ।
मुखमार्जनके पश्चात् द्विज जो अंगुलियोंसे नेत्रोंका स्पर्श करता है, उसके द्वारा वह सूर्यदेवको तृप्त करता है। नासिकाके स्पर्शसे वायुको और दोनों कानोंके स्पर्शसे वह दिशाओंको संतुष्ट करता है ।।
ब्रह्माणं तेन प्रीणाति यन्मूर्धनि समालभेत् ।।
समुत्क्षिपति चापोर्ध्वमाकाशं तेन प्रीणयेत् ।
आचमन करनेवाला पुरुष अपने मस्तकपर जो हाथ रखता है, उसके द्वारा वह ब्रह्माजीको तृप्त करता है और ऊपरकी ओर जो जल फेंकता है, उसके द्वारा वह आकाशके अधिष्ठाता देवताको संतुष्ट करता है ।।
प्रीणाति विष्णुः पद्भ्यां तु सलिलं वै समादधत् ।।
प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि अन्तर्जानुरुपस्पृशेत् ।
सर्वत्र विधिरित्येष भोजनादिषु नित्यशः ।।
वह अपने दोनों पैरोंपर जो जल डालता है, इससे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। आचमन करनेवाला पुरुष पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके अपने हाथको घुटनेके भीतर रखकर जलका स्पर्श करे। भोजन आदि सभी अवसरोंपर सदा आचमन करनेकी यही विधि है ।।
अन्नेषु दन्तलग्नेषु उच्छिष्टः पुनराचमेत् ।
विधिरेष समुद्दिष्टः शौचे चाभ्युक्षणं स्मृतम् ।।
यदि दाँतोंमें अन्न लगा हो तो अपनेको जूठा मानकर पुनः आचमन करे, यह शौचाचारकी विधि बतायी गयी। किसी वस्तुकी शुद्धिके लिये उसपर जल छिड़कना भी कर्तव्य माना गया है ।।
शूद्रस्यैष विधिर्दृष्टो गृहान्निष्क्रमतः सतः ।
नित्यं चालुप्तशौचेन वर्तितव्यं कृतात्मना ।।
यशस्कामेन भिक्षुभ्यः शूद्रेणात्महितार्थिना ।।
(साधु-सेवाके उद्देश्यसे) घरसे निकलते समय शूद्रके लिये भी यह शौचाचारकी विधि देखी गयी है। जिसने मनको वशमें किया है तथा जो अपने हितकी इच्छा रखता है, ऐसे सुयशकामी शूद्रको चाहिये कि वह सदा शौचाचारसे सम्पन्न होकर ही संन्यासियोंके निकट जाय और उनकी सेवा आदिका कार्य करे ।।
क्षत्रा आरम्भयज्ञास्तु हविर्यज्ञा विशः स्मृताः ।
शूद्राः परिचारयज्ञा जपयज्ञास्तु ब्राह्मणाः ।।
क्षत्रिय आस्मभ (उत्साह) रूप यज्ञ करनेवाले होते हैं। वैश्योंके यज्ञमें हविष्य (हवनीय पदार्थ) की प्रधानता होती है, शूद्रोंका यज्ञ सेवा ही है, तथा ब्राह्मण जपरूपी यज्ञ करनेवाले होते हैं ।।
शुश्रूषाजीविनः शूद्रा वैश्या विपणजीविनः ।
अनिष्टनिग्रहाः क्षत्रा विप्राः स्वाध्यायजीविनः ।।
शूद्र सेवासे जीवननिर्वाह करनेवाले होते हैं, वैश्य व्यापारजीवी हैं, दुष्टोंका दमन करना क्षत्रियोंकी जीवनवृत्ति है और ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायसे जीवन-निर्वाह करते हैं ।।
तपसा शोभते विप्रो राजन्यः पालनादिभिः ।
आतिथ्येन तथा वैश्यः शूद्रो दास्येन शोभते ।।
क्योंकि ब्राह्मण तपस्यासे, क्षत्रिय पालन आदिसे, वैश्य अतिथि-सत्कारसे और शूद्र सेवावृत्तिसे शोभा पाते हैं ।।
यतात्मना तु शूद्रेण शुश्रूषा नित्यमेव तु ।
कर्तव्या त्रिषु वर्णेषु प्रायेणाश्रमवासिषु ।।
अपने मनको वशमें रखनेवाले शूद्रको सदा ही तीनों वर्णोंकी विशेषतः आश्रमवासियोंकी सेवा करनी चाहिये ।।
अशक्तेन त्रिवर्णस्य सेव्या ह्याश्रमवासिनः ।
यथाशक्ति यथाप्रज्ञं यथाधर्मं यथाश्रुतम् ।।
विशेषेणैव कर्तव्या शुश्रूषा भिक्षुकाश्रमे ।।
त्रिवर्णकी सेवामें अशक्त हुए शूद्रको अपनी शक्ति, बुद्धि, धर्म तथा शास्त्रज्ञानके अनुसार आश्रमवासियोंकी सेवा करनी चाहिये। विशेषतः संन्यास-आश्रममें रहनेवाले भिक्षुकी सेवा उसके लिये परम कर्तव्य है ।।
आश्रमाणां तु सर्वेषां चतुर्णां भिक्षुकाश्मम् ।
प्रधानमिति मन्यन्ते शिष्टाः शास्त्रविनिश्चये ।।
शास्त्रोंके सिद्धान्त-ज्ञानमें निपुण शिष्ट पुरुष चारों आश्रमोंमें संन्यासको ही प्रधान मानते हैं ।।
यच्चोपदिश्यते शिष्टैः श्रुतिस्मृतिविधानतः ।
तथाऽऽस्थेयमशक्तेन स धर्म इति निश्चितः ।।
शिष्ट पुरुष वेदों और स्मृतियोंके विधानके अनुसार जिस कर्तव्यका उपदेश करें असमर्थ पुरुषको उसीका अनुष्ठान करना चाहिये। उसके लिये वही धर्म निश्चित किया गया है ।।
अतोऽन्यथा तु कुर्वाणः श्रेयो नाप्नोति मानवः ।
तस्माद् भिक्षुषु शूद्रेण कार्यमात्महितं सदा ॥
इसके विपरीत करनेवाला मानव कल्याणका भागी नहीं होता है, अतः शूद्रको संन्यासियोंकी सेवा करके सदा अपना कल्याण करना चाहिये ॥
इह यत् कुरुते श्रेयस्तत् प्रेत्य समुपाश्नुते ।
तच्चानसूयता कार्यं कर्तव्यं यद्धि मन्यते ॥
असूयता कृतस्येह फलं दुःखदवाप्यते ॥
मनुष्य इस लोकमें जो कल्याणकारी कार्य करता है, उसका फल मृत्युके पश्चात् उसे प्राप्त होता है। जिसे वह अपना कर्तव्य समझता है, उस कार्यको वह दोषदृष्टि न रखते हुए करे। दोषदृष्टि रखते हुए जो कार्य किया जाता है, उसका फल इस जगत्में बड़े दुःखसे प्राप्त होता है ॥
प्रियवादी जितक्रोधो वीततन्द्रिरमत्सरः ।
क्षमावान् शीलसम्पन्नः सत्यधर्मपरायणः ॥
आपद्भावेन कुर्याद्धि शुश्रूषां भिक्षुकाश्रमे ॥
शूद्रको चाहिये कि वह प्रिय वचन बोले, क्रोधको जीते, आलस्य दूर भगा दे, ईर्ष्या-द्वेषसे रहित हो जाय, क्षमाशील, शीलवान् तथा सत्यधर्ममें तत्पर रहे। आपत्तिकालमें वह संन्यासियोंके आश्रममें (जाकर) उनकी सेवा करे ॥
अयं मे परमो धर्मस्त्वनेनेदं सुदुस्तरम् ।
संसारसागरं घोरं तरिष्यामि न संशयः ॥
निर्भयो देहमुत्सृज्य यास्यामि परमां गतिम् ।
नातः परं ममास्त्यन्य एष धर्मः सनातनः ॥
एवं संचिन्त्य मनसा शूद्रो बुद्धिसमाधिना ।
कुर्यादविमना नित्यं शुश्रूषाधर्ममुत्तमम् ॥
'यही मेरा परम धर्म है, इसीके द्वारा मैं इस अत्यन्त दुस्तर घोर संसार-सागरसे पार हो जाऊँगा। इसमें संशय नहीं है। मैं निर्भय होकर इस देहका त्याग करके परमगतिको प्राप्त हो जाऊँगा। इससे बढ़कर मेरे लिये दूसरा कोई कर्तव्य नहीं है। यही सनातन धर्म है।' मन-ही-मन ऐसा विचार करके प्रसन्नचित्त हुआ शूद्र बुद्धिको एकाग्र करके सदा उत्तम शुश्रूषा-धर्मका पालन करे ॥
शुश्रूषानियमेनेह भाव्यं शिष्टाशिना सदा ।
शमान्वितेन दान्तेन कार्याकार्यविदा सदा ॥
शूद्रको चाहिये कि वह नियमपूर्वक सेवामें तत्पर रहे, सदा यज्ञशिष्ट अन्न भोजन करे। मन और इन्द्रियोंको वशमें रखे और सदा कर्तव्याकर्तव्यको जाने ॥
सर्वकार्येषु कृत्यानि कृतान्येव च दर्शयेत् ।
यथा प्रीतो भवेद् भिक्षुस्तथा कार्यं प्रसाधयेत् ॥
यदकल्पं भवेद् भिक्षोर्न तत् कार्यं समाचरेत् ।
सभी कार्योंमें जो आवश्यक कृत्य हों, उन्हें करके ही दिखावे। जैसे-जैसे संन्यासीको प्रसन्नता हो, उसी प्रकार उसका कार्य साधन करे। जो कार्य संन्यासीके लिये हितकर न हो, उसे कदापि न करे ।।
यदाश्रमस्याविरुद्धं धर्ममात्राभिसंहितम् ।।
तत् कार्यमविचारेण नित्यमेव शुभार्थिना ।
जो कार्य संन्यास-आश्रमके विरुद्ध न हो तथा जो धर्मके अनुकूल हो, शुभकी इच्छा रखनेवाले शूद्रको वह कार्य सदा बिना विचारे ही करना चाहिये ।।
मनसा कर्मणा वाचा नित्यमेव प्रसादयेत् ।।
स्थातव्यं तिष्ठमानेषु गच्छमानाननुव्रजेत् ।
आसीनेष्वासितव्यं च नित्यमेवानुवर्तिना ।।
मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा ही उन्हें संतुष्ट रखे। जब वे संन्यासी खड़े हों, तब सेवा करनेवाले शूद्रको स्वयं भी खड़ा रहना चाहिये तथा जब वे कहीं जा रहे हों, तब उसे स्वयं भी उनके पीछे-पीछे जाना चाहिये। यदि वे आसनपर बैठे हों तब वह स्वयं भी भूमिपर बैठे। तात्पर्य यह कि सदा ही उनका अनुसरण करता रहे ।।
नैशकार्याणि कृत्वा तु नित्यं चैवानुचोदितः ।
यथाविधिरुपस्पृश्य संन्यस्य जलभाजनम् ।।
भिक्षूणां निलयं गत्वा प्रणम्य विधिपूर्वकम् ।
ब्रह्मपूर्वान् गुरूस्तत्र प्रणम्य नियतेन्द्रियः ।।
तथाऽऽचार्यपुरोगाणामनुकुर्यान्नमस्क्रियाम् ।
स्वधर्मचारिणां चापि सुखं पृष्ट्वाभिवाद्य च ।।
यो भवेत् पूर्वसंसिद्धस्तुल्यधर्मा भवेत् सदा ।
तस्मै प्रणामः कर्तव्यो नेतरेषां कदाचन ।।
रात्रिके कार्य पूरे करके प्रतिदिन उनसे आज्ञा लेकर विधिपूर्वक स्नान करके उनके लिये जलसे भरा हुआ कलश ले आकर रखे। फिर संन्यासियोंके स्थानपर जाकर उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम करके इन्द्रियोंको संयममें रखकर ब्राह्मण आदि गुरुजनोंको प्रणाम करे। इसी प्रकार स्वधर्मका अनुष्ठान करनेवाले आचार्य आदिको नमस्कार एवं अभिवादन करे। उनका कुशल-समाचार पूछे। पहलेके जो शूद्र आश्रमके कार्यमें सिद्धहस्त हों, उनका स्वयं भी सदा अनुकरण करे, उनके समान कार्यपरायण हो। अपने समानधर्मा शूद्रको प्रणाम करे, दूसरे शूद्रोंको कदापि नहीं ।।
अनुक्त्वा तेषु चोत्थाय नित्यमेव यतव्रतः ।
सम्मार्जनमथो कृत्वा कृत्वा चाप्युपलेपनम् ।।
संन्यासियों अथवा आश्रमके दूसरे व्यक्तियोंको कहे बिना ही प्रतिदिन नियमपूर्वक उठे और झाडू देकर आश्रमकी भूमिको लीप-पोत दे ।। ततः पुष्पबलिं दद्यात् पुष्पाण्यादाय धर्मतः । निष्क्रम्यावसथात् तूर्णमन्यत् कर्म समाचरेत् ।। तत्पश्चात् धर्मके अनुसार फूलोंका संग्रह करके पूजनीय देवताओंकी उन फूलोंद्वारा पूजा करे। इसके बाद आश्रमसे निकलकर तुरंत ही दूसरे कार्यमें लग जाय ।। यथोपघातो न भवेत् स्वाध्यायेऽऽश्रमिणां तथा । उपघातं तु कुर्वाण एनसा सम्प्रयुज्यते ।। आश्रमवासियोंके स्वाध्यायमें विघ्न न पड़े, इसके लिये सदा सचेष्ट रहे। जो स्वाध्यायमें विघ्न डालता है, वह पापका भागी होता है ।। तथाऽऽत्मा प्रणिधातव्यो यथा ते प्रीतिमाप्नुयुः । परिचारिकोऽहं वर्णानां त्रयाणां धर्मतः स्मृतः ।। किमुताश्रमवृद्धानां यथालब्धोपजीविनाम् ।। अपने-आपको इस प्रकार सावधानीके साथ सेवामें लगाये रखना चाहिये, जिससे वे साधु पुरुष प्रसन्न हों। शूद्रको सदा इस प्रकार विचार करना चाहिये कि 'मैं तो शास्त्रोंमें धर्मतः तीनों वर्णोंका सेवक बताया गया हूँ। फिर जो संन्यास-आश्रममें रहकर जो कुछ मिल जाय, उसीसे निर्वाह करनेवाले बड़े-बूढ़े संन्यासी हैं, उनकी सेवाके विषयमें तो कहना ही क्या है? (उनकी सेवा करना तो मेरा परम धर्म है ही) ।। भिक्षूणां गतरागाणां केवलं ज्ञानदर्शिनाम् । विशेषेण मया कार्या शुश्रूषा नियतात्मना ।। 'जो केवल ज्ञानदर्शी, वीतराग संन्यासी हैं, उनकी सेवा मुझे विशेषरूपसे मनको वशमें रखते हुए करनी चाहिये ।। तेषां प्रसादात् तपसा प्राप्स्यामीष्टां शुभां गतिम् ।। एवमेतद् विनिश्चित्य यदि सेवेत भिक्षुकान् । विधिना यथोपदिष्टेन प्राप्नोति परमां गतिम् ।। 'उनकी कृपा और तपस्यासे मैं मनोवांछित शुभगति प्राप्त कर लूँगा।' ऐसा निश्चय करके यदि शूद्र पूर्वोक्त विधिसे संन्यासियोंका सेवन करे तो परम गतिको प्राप्त होता है ।। न तथा सम्प्रदानेन नोपवासादिभिस्तथा । इष्टां गतिमवाप्नोति यथा शुश्रूषकर्मणा ।। शूद्र सेवाकर्मसे जिस मनोवांछित गतिको प्राप्त कर लेता है, वैसी गति दान तथा उपवास आदिके द्वारा भी नहीं प्राप्त कर सकता ।। यादृशेन तु तोयेन शुद्धिं प्रकुरुते नरः । तादृग् भवति तद्धौतमुदकस्य स्वभावतः ।।
मनुष्य जैसे जलसे कपड़ा धोता है, उस जलकी स्वच्छताके अनुसार ही वह वस्त्र स्वच्छ होता है ।। शूद्रोऽप्येतेन मार्गेण यादृशं सेवते जनम् । तादृग् भवति संसर्गादचिरेण न संशयः ।। शूद्र भी इसी मार्गसे चलकर जैसे पुरुषका सेवन करता है, संसर्गवश वह शीघ्र वैसा हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ।। तस्मात् प्रयत्नतः सेव्या भिक्षवो नियतात्मना । अतः शूद्रको चाहिये कि अपने मनको वशमें करके प्रयत्नपूर्वक संन्यासियोंकी सेवा करे ।। अध्वना कर्शितानां च व्याधितानां तथैव च ।। शुश्रूषां नियतः कुर्यात् तेषामापदि यत्नतः । जो राह चलनेसे थके-माँदे कष्ट पा रहे हों तथा रोगसे पीड़ित हों, उन संन्यासियोंकी उस आपत्तिके समय यत्न और नियमके साथ विशेष सेवा करे ।। दर्भाजिनान्यवेक्षेत भैक्षभाजनमेव च ।। यथाकामं च कार्याणि सर्वाण्येवोपसाधयेत् । उनके कुशासन, मृगचर्म और भिक्षापात्रकी भी देखभाल करे तथा उनकी रुचिके अनुसार सारा कार्य करता रहे ।। प्रायश्चित्तं यथा न स्यात् तथा सर्वं समाचरेत् ।। व्याधितानां तु प्रयतः चैलप्रक्षालनादिभिः । प्रतिकर्मक्रिया कार्या भेषजानयनैस्तथा । सब कार्य इस प्रकार सावधानीसे करे, जिससे कोई अपराध न बनने पावे। संन्यासी यदि रोगग्रस्त हो जायें तो सदा उद्यत रहकर उनके कपड़े धोवे। उनके लिये ओषधि ले आवे तथा उनकी चिकित्साके लिये प्रयत्न करे ।। भिक्षाटनोऽभिगच्छेत भिषजश्च विपश्चितः । ततो विनिष्क्रियार्थानि द्रव्याणि समुपार्जयेत् ।। भिक्षुक बीमार होनेपर भी भिक्षाटनके लिये जाय। विद्वान् चिकित्सकोंके यहाँ उपस्थित हो तथा रोग-निवारणके लिये उपयुक्त विशुद्ध ओषधियोंका संग्रह करे ।। यश्च प्रीतमना दद्यादादद्याद् भेषजं नरः । अश्रद्धया हि दत्तानि तान्यभोज्याणि भिक्षुभिः ।। जो चिकित्सक प्रसन्नतापूर्वक ओषधि दे, उसीसे संन्यासीको औषध लेना चाहिये। अश्रद्धापूर्वक दी हुई ओषधियोंको संन्यासी अपने उपयोगमें न ले ।। श्रद्धया यदुपादत्तं श्रद्धया चोपपादितम् । तस्योपभोगाद् धर्मः स्याद् व्याधिभिश्च निवर्त्यते ।।