महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१०८-
अष्टाधिकशततमोऽध्यायः
मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता
युधिष्ठिर उवाच
यद् वरं सर्वतीर्थानां तन्मे ब्रूहि पितामह ।
यत्र चैव परं शौचं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जो सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ हो तथा जहाँ जानेसे परम शुद्धि हो जाती हो, उस तीर्थको मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सर्वाणि खलु तीर्थानि गुणवन्ति मनीषिणः ।
यत्तु तीर्थं च शौचं च तन्मे शृणु समाहितः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सब मनीषी पुरुषोंके लिए गुणकारी होते हैं; किंतु उन सबमें जो परम पवित्र और प्रधान तीर्थ हैं, उसका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २ ॥
अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोये धृतिह्रदे ।
स्नातव्यं मानसे तीर्थे सत्त्वमालम्ब्य शाश्वतम् ॥ ३ ॥
जिसमें धैर्यरूप कुण्ड और सत्यरूप जल भरा हुआ है तथा जो अगाध, निर्मल एवं अत्यन्त शुद्ध है, उस मानस तीर्थमें सदा परमात्माका आश्रय लेकर स्नान करना चाहिये ॥ ३ ॥
तीर्थशौचमनर्थित्वमार्जवं सत्यमार्दवम् ।
अहिंसा सर्वभूतानामानृशंस्यं दमः शमः ॥ ४ ॥
कामना और याचनाका अभाव, सरलता, सत्य, मृदुता, अहिंसा, समस्त प्राणियोंके प्रति क्रूरताका अभाव—दया, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह—ये ही इस मानस तीर्थके सेवनसे प्राप्त होनेवाली पवित्रताके लक्षण हैं ॥ ४ ॥
निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः ।
शुचयस्तीर्थभूतास्ते ये भैक्ष्यमुपभुञ्जते ॥ ५ ॥
जो ममता, अहंकार, राग-द्वेषादि द्वन्द्व और परिग्रहसे रहित एवं भिक्षासे जीवन निर्वाह करते हैं, वे विशुद्ध अन्तःकरणवाले साधु पुरुष तीर्थस्वरूप हैं ॥ ५ ॥
तत्त्ववित्तवनहंबुद्धिस्तीर्थप्रवरमुच्यते ।
(नारायणेऽथ रुद्रे वा भक्तिस्तीर्थं परं मता ।)
शौचलक्षणमेतत् ते सर्वत्रैवान्ववेक्षतः ॥ ६ ॥
किंतु जिसकी बुद्धिमें अहंकारका नाम भी नहीं है, वह तत्त्वज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ तीर्थ कहलाता है। भगवान् नारायण अथवा भगवान् शिवमें जो भक्ति होती है, वह भी उत्तम तीर्थ मानी गयी है। पवित्रताका यह लक्षण तुम्हें विचार करनेपर सर्वत्र ही दृष्टिगोचर होगा॥ ६॥
रजस्तमः सत्त्वमथो येषां निर्धौतमात्मनः।
शौचाशौचसमायुक्ताः स्वकार्यपरिमार्गिणः॥ ७॥
सर्वत्यागेष्वभिरताः सर्वज्ञाः समदर्शिनः।
शौचेन वृत्तशौचार्थास्ते तीर्थाः शुचयश्च ये॥ ८॥
जिनके अन्तःकरणसे तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण धुल गये हैं अर्थात् जो तीनों गुणोंसे रहित हैं, जो बाह्य पवित्रता और अपवित्रतासे युक्त रहकर भी अपने कर्तव्य (तत्त्वविचार, ध्यान, उपासना आदि) का ही अनुसंधान करते हैं। जो सर्वस्वके त्यागमें ही अभिरुचि रखते हैं, सर्वज्ञ और समदर्शी होकर शौचाचारके पालनद्वारा आत्मशुद्धिका सम्पादन करते हैं, वे सत्पुरुष ही परम पवित्र तीर्थस्वरूप हैं॥ ७-८॥
नोदकक्लिन्नगात्रस्तु स्नात इत्यभिधीयते।
स स्नातो यो दमस्नातः स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ ९॥
शरीरको केवल पानीसे भिगो लेना ही स्नान नहीं कहलाता है। सच्चा स्नान तो उसीने किया है, जिसने मन-इन्द्रियके संयमरूपी जलमें गोता लगाया है। वही बाहर और भीतरसे भी पवित्र माना गया है॥ ९॥
अतीतेष्वनपेक्षा ये प्राप्तेष्वर्थेषु निर्ममाः।
शौचमेव परं तेषां येषां नोत्पद्यते स्पृहा॥ १०॥
जो बीते या नष्ट हुए विषयोंकी अपेक्षा नहीं रखते, प्राप्त हुए पदार्थोंमें ममताशून्य होते हैं तथा जिनके मनमें कोई इच्छा पैदा ही नहीं होती, उन्हींमें परम पवित्रता होती है॥ १०॥
प्रज्ञानं शौचमेवेह शरीरस्य विशेषतः।
तथा निष्किंचनत्वं च मनसश्च प्रसन्नता॥ ११॥
इस जगत्में प्रज्ञान ही शरीर-शुद्धिका विशेष साधन है। इसी प्रकार अकिंचनता और मनकी प्रसन्नता भी शरीरको शुद्ध करनेवाले हैं॥ ११॥
वृत्तशौचं मनःशौचं तीर्थशौचमतः परम्।
ज्ञानोत्पन्नं च यच्छौचं तच्छौचं परमं स्मृतम्॥ १२॥
शुद्धि चार प्रकारकी मानी गयी है—आचारशुद्धि, मनःशुद्धि, तीर्थशुद्धि और ज्ञानशुद्धि; इनमें ज्ञानसे प्राप्त होनेवाली शुद्धि ही सबसे श्रेष्ठ मानी गयी है॥ १२॥
मनसा च प्रदीप्तेन ब्रह्मज्ञानजलेन च।
स्नाति यो मानसे तीर्थे तत्स्नानं तत्त्वदर्शिनः॥ १३॥
जो प्रसन्न एवं शुद्ध मनसे ब्रह्मज्ञानरूपी जलके द्वारा मानसतीर्थमें स्नान करता है, उसका वह स्नान ही तत्त्वदर्शी ज्ञानीका स्नान माना गया है ॥ १३ ॥
समारोपितशौचस्तु नित्यं भावसमाहितः ।
केवलं गुणसम्पन्नः शुचिरेव नरः सदा ॥ १४ ॥
जो सदा शौचाचारसे सम्पन्न, विशुद्ध भावसे युक्त और केवल सद्गुणोंसे विभूषित है, उस मनुष्यको सदा शुद्ध ही समझना चाहिये ॥ १४ ॥
शरीरस्थानि तीर्थानि प्रोक्तान्येतानि भारत ।
पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यानि शृणु तान्यपि ॥ १५ ॥
भारत! यह मैंने शरीरमें स्थित तीर्थोंका वर्णन किया; अब पृथ्वीपर जो पुण्यतीर्थ हैं, उनका महत्त्व भी सुनो ॥ १५ ॥
शरीरस्य यथोद्देशाः शुचयः परिकीर्तिताः ।
तथा पृथिव्या भागाश्च पुण्यानि सलिलानि च ॥ १६ ॥
जैसे शरीरके विभिन्न स्थान पवित्र बताये गये हैं, उसी प्रकार पृथ्वीके भिन्न-भिन्न भाग भी पवित्र तीर्थ हैं और वहाँका जल पुण्यदायक है ॥ १६ ॥
कीर्तनाच्चैव तीर्थस्य स्नानाच्च पितृतर्पणात् ।
धुनन्ति पापं तीर्थेषु ते प्रयान्ति सुखं दिवम् ॥ १७ ॥
जो लोग तीर्थोंके नाम लेकर तीर्थोंमें स्नान करके तथा उनमें पितरोंका तर्पण करके अपने पाप धो डालते हैं, वे बड़े सुखसे स्वर्गमें जाते हैं ॥ १७ ॥
परिग्रहाच्च साधूनां पृथिव्याश्चैव तेजसा ।
अतीव पुण्यभागास्ते सलिलस्य च तेजसा ॥ १८ ॥
पृथ्वीके कुछ भाग साधु पुरुषोंके निवाससे तथा स्वयं पृथ्वी और जलके तेजसे अत्यन्त पवित्र माने गये हैं ॥ १८ ॥
मनसश्च पृथिव्याश्च पुण्यास्तीर्थास्तथापरे ।
उभयोरेव यः स्नायात् स सिद्धिं शीघ्रमाप्नुयात् ॥ १९ ॥
इस प्रकार पृथ्वीपर और मनमें भी अनेक पुण्यमय तीर्थ हैं। जो इन दोनों प्रकारके तीर्थोंमें स्नान करता है, वह शीघ्र ही परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥ १९ ॥
यथा बलं क्रियाहीनं क्रिया वा बलवर्जिता ।
नेह साधयते कार्यं समायुक्ता तु सिध्यति ॥ २० ॥
एवं शरीरशौचेन तीर्थशौचेन चान्वितः ।
शुचिः सिद्धिमवाप्नोति द्विविधं शौचमुत्तमम् ॥ २१ ॥
जैसे क्रियाहीन बल अथवा बलरहित क्रिया इस जगत्में कार्यका साधन नहीं कर सकती। बल और क्रिया दोनोंके संयुक्त होनेपर ही कार्यकी सिद्धि होती है, इसी प्रकार
शरीरशुद्धि और तीर्थशुद्धिसे युक्त पुरुष ही पवित्र होकर परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त करता है। अतः दोनों प्रकारकी शुद्धि ही उत्तम मानी गयी है ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शौचानुपृच्छा नामाष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शुद्धिकी जिज्ञासानाम एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पावका १/३ श्लोक मिलाकर कुल २१ १/३ श्लोक हैं)
प्रत्येक मासकी द्वादशी तिथिको उपवास और भगवान् विष्णुकी पूजा करनेका विशेष माहात्म्य
नवाधिकशततमोऽध्यायः
प्रत्येक मासकी द्वादशी तिथिको उपवास और भगवान् विष्णुकी पूजा करनेका विशेष माहात्म्य
युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषामुपवासानां यच्छ्रेयः सुमहत्फलम् ।
यच्चाप्यसंशयं लोके तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**पितामह! समस्त उपवासोंमें जो सबसे श्रेष्ठ और महान् फल देनेवाला है तथा जिसके विषयमें लोगोंको कोई संशय नहीं है, वह आप मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
शृणु राजन् यथा गीतं स्वयमेव स्वयम्भुवा ।
यत् कृत्वा निर्वृतो भूयात् पुरुषो नाज संशयः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! स्वयम्भू भगवान् विष्णुने इस विषयमें जैसा कहा है, उसे बताता हूँ, सुनो। उसका अनुष्ठान करके पुरुष परम सुखी हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥
द्वादश्यां मार्गशीर्षे तु अहोरात्रेण केशवम् ।
अर्च्यश्वमेधं प्राप्नोति दुष्कृतं चास्य नश्यति ॥ ३ ॥
मार्गशीर्षमासमें द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके भगवान् केशवकी पूजा-अर्चा करनेसे मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पा लेता है और उसका सारा पाप नष्ट हो जाता है ॥ ३ ॥
तथैव पौषमासे तु पूज्यो नारायणेति च ।
वाजपेयमवाप्नोति सिद्धिं च परमां व्रजेत् ॥ ४ ॥
इसी प्रकार पौषमासमें द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक भगवान् नारायणकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाले पुरुषको वाजपेय यज्ञका फल मिलता है और वह परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ॥ ४ ॥
अहोरात्रेण द्वादश्यां माघमासे तु माधवम् ।
राजसूयमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ५ ॥
माघमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके भगवान् माधवकी पूजा करनेसे उपासकको राजसूय यज्ञका फल प्राप्त होता है और वह अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ५ ॥
तथैव फाल्गुने मासि गोविन्देति च पूजयन् । अतिरात्रमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥ ६ ॥ इसी तरह फाल्गुनमासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक गोविन्द नामसे भगवान्की पूजा करनेवाला पुरुष अतिरात्र यज्ञका फल पाता है और मृत्युके पश्चात् सोमलोकमें जाता है ॥ ६ ॥ अहोरात्रेण द्वादश्यां चैत्रे विष्णुरिति स्मरन् । पौण्डरीकमवाप्नोति देवलोकं च गच्छति ॥ ७ ॥ चैत्रमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके विष्णुनामसे भगवान्का चिन्तन करनेवाला मनुष्य पौण्डरीक यज्ञका फल पाता है और देवलोकमें जाता है ॥ ७ ॥ वैशाखमासे द्वादश्यां पूजयन् मधुसूदनम् । अग्निष्टोममवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥ ८ ॥ वैशाखमासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक भगवान् मधुसूदनका पूजन करनेवाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता और सोमलोकमें जाता है ॥ ८ ॥ अहोरात्रेण द्वादश्यां ज्येष्ठे मासि त्रिविक्रमम् । गवां मेधमवाप्नोति अप्सरोभिश्च मोदते ॥ ९ ॥ ज्येष्ठमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके जो भगवान् त्रिविक्रमकी पूजा करता है, वह गोमेधयज्ञका फल पाता और अप्सराओंके साथ आनन्द भोगता है ॥ आषाढे मासि द्वादश्यां वामनेति च पूजयन् । नरमेधमवाप्नोति पुण्यं च लभते महत् ॥ १० ॥ आषाढ़मासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक वामन नामसे भगवान्का पूजन करनेवाला पुरुष नरमेध यज्ञका फल पाता और महान् पुण्यका भागी होता है ॥ १० ॥ अहोरात्रेण द्वादश्यां श्रावणे मासि श्रीधरम् । पञ्चयज्ञानवाप्नोति विमानस्थश्च मोदते ॥ ११ ॥ श्रावणमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके जो भगवान् श्रीधरकी आराधना करता है, वह पंच महायज्ञोंका फल पाता और विमानपर बैठकर सुख भोगता है ॥ ११ ॥ तथा भाद्रपदे मासि हृषीकेशेति पूजयन् । सौत्रामणिमवाप्नोति पूतात्मा भवते च हि ॥ १२ ॥ भाद्रपदमासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक हृषीकेश नामसे भगवान्की पूजा करनेवाला मनुष्य सौत्रामणि यज्ञका फल पाता और पवित्रात्मा होता है ॥ द्वादश्यामाश्विने मासि पद्मनाभेति चार्चयन् । गोसहस्रफलं पुण्यं प्राप्नुयान्नात्र संशयः ॥ १३ ॥
आश्विनमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके पद्मनाभ नामसे भगवान्की पूजा करनेवाला पुरुष सहस्र गोदानका पुण्यफल पाता है, इसमें संशय नहीं है ।। १३ ।।
द्वादश्यां कार्तिके मासि पूज्य दामोदरेति च ।
गवां यज्ञमवाप्नोति पुमान् स्त्री वा न संशयः ।। १४ ।।
कार्तिकमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके भगवान् दामोदरकी पूजा करनेसे स्त्री हो या पुरुष गो-यज्ञका फल पाता है, इसमें संशय नहीं है ।। १४ ।।
अर्चयेत् पुण्डरीकाक्षमेवं संवत्सरं तु यः ।
जातिस्मरत्वं प्राप्नोति विन्द्याद् बहु सुवर्णकम् ।। १५ ।।
इस प्रकार जो एक वर्षतक कमलनयन भगवान् विष्णुका पूजन करता है, वह पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेवाला होता है और उसे बहुत-सी सुवर्ण-राशि प्राप्त होती है ।। १५ ।।
अहन्यहनि तद्भावमुपेन्द्रं योऽधिगच्छति ।
समाप्ते भोजयेद् विप्रानथवा दापयेद् घृतम् ।। १६ ।।
जो प्रतिदिन इसी प्रकार भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह विष्णुभावको प्राप्त होता है। यह व्रत समाप्त होनेपर ब्राह्मणोंको भोजन करावे अथवा उन्हें घृत दान करे ।। १६ ।।
अतः परं नोपवासो भवतीति विनिश्चयः ।
उवाच भगवान् विष्णुः स्वयमेव पुरातनम् ।। १७ ।।
इस उपवाससे बढ़कर दूसरा कोई उपवास नहीं है, इसे निश्चय समझना चाहिये। साक्षात् भगवान् विष्णुने ही इस पुरातन व्रतके विषयमें बताया है ।। १७ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विष्णोर्द्वादशकं नाम
नवाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भगवान् विष्णुका द्वादशी-व्रत नामक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०९ ।।
११०-
दशाधिकशततमोऽध्यायः
रूप-सौन्दर्य और लोकप्रियताकी प्राप्तिके लिये मार्गशीर्षमासमें चन्द्र-व्रत करनेका प्रतिपादन
वैशम्पायन उवाच
शरतल्पगतं भीष्मं वृद्धं कुरुपितामहम् ।
उपगम्य महाप्राज्ञः पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! महाज्ञानी युधिष्ठिरने बाणशय्यापर सोये हुए कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मजीके निकट जाकर इस प्रकार प्रश्न किया ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
अङ्गानां रूपसौभाग्यं प्रियं चैव कथं भवेत् ।
धर्मार्थकामसंयुक्तः सुखभागी कथं भवेत् ॥ २ ॥
युधिष्ठिर बोले— पितामह! मनुष्यके अंगोंको सुन्दर रूपका सौभाग्य कैसे प्राप्त होता है? मनुष्यमें लोकप्रियता कैसे आती है? धर्म, अर्थ और कामसे युक्त पुरुष किस प्रकार सुखका भागी हो सकता है? ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
मार्गशीर्षस्य मासस्य चन्द्रे मूलेन संयुते ।
पादौ मूलेन राजेन्द्र जङ्घायामथ रोहिणीम् ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— राजेन्द्र! मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको मूल नक्षत्रसे चन्द्रमाका योग होनेपर चन्द्रसम्बन्धी व्रत आरम्भ करे। चन्द्रमाके स्वरूपका इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये। देवता-सहित मूलनक्षत्रके द्वारा उनके दोनों चरणोंकी भावना करे और पिण्डलियोंमें रोहिणीको स्थापित करे ॥ ३ ॥
अश्विन्यां सक्थिनी चैव ऊरू चाषाढयोस्तथा ।
गुह्यं तु फाल्गुनी विद्यात् कृत्तिका कटिकास्तथा ॥ ४ ॥
जाँघोंमें अश्विनी नक्षत्र, ऊरुओंमें पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, गुह्य भागमें पूर्वाफाल्गुनी और उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र तथा कटिभागमें कृत्तिकाकी स्थिति समझे ॥ ४ ॥
नाभिं भाद्रपदे विद्याद् रेवत्यामक्षिमण्डलम् ।
पृष्ठमेव धनिष्ठासु अनुराधोत्तरास्तथा ॥ ५ ॥
नाभिमें पूर्वाभाद्रपदा और उत्तराभाद्रपदाको जाने, नेत्रमण्डलमें रेवती, पृष्ठभागमें धनिष्ठा, अनुराधा तथा उत्तराको स्थापित समझे ॥ ५ ॥
बाहुभ्यां तु विशाखासु हस्तौ हस्तेन निर्दिशेत् ।
पुनर्वस्वङ्गुली राजन्नाश्लेषासु नखास्तथा ॥ ६ ॥
राजन्! दोनों भुजाओंमें विशाखाका, हाथोंमें हस्तका, अंगुलियोंमें पुनर्वसुका तथा नखोंमें आश्लेषाकी स्थापना करे ॥ ६ ॥
ग्रीवां ज्येष्ठा च राजेन्द्र श्रवणेन तु कर्णयोः ।
मुखं पुष्येण दानेन दन्तौष्ठौ स्वातिरुच्यते ॥ ७ ॥
राजेन्द्र! ज्येष्ठा नक्षत्रसे ग्रीवाकी, श्रवणसे दोनों कानोंकी, पुष्य नक्षत्रकी स्थापनासे मुखकी तथा स्वाती नक्षत्रसे दाँतों और ओठोंकी भावना बतायी जाती है ॥
हासं शतभिषां चैव मघां चैवाथ नासिकाम् ।
नेत्रे मृगशिरो विद्याल्ललाटे मित्रमेव तु ॥ ८ ॥
शतभिषाको हास, मघाको नासिका, मृगशिराको नेत्र और मित्र (अनुराधा) को ललाट समझे ॥ ८ ॥
भरण्यां तु शिरो विद्यात् केशानाद्र्रां नराधिप ।
समाप्ते तु घृतं दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे ॥ ९ ॥
नरेश्वर! भरणीको सिर और आर्द्राको चन्द्रमाके केश समझे। (इस प्रकार विभिन्न अंगोंमें नक्षत्रोंकी स्थापना करके तत्सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा उन-उन अंगोंकी पूजा एवं जप) होम आदि प्रतिदिन करे। पौर्णमासीको व्रत समाप्त होनेपर वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको घृत दान करे ॥ ९ ॥
सुभगो दर्शनीयश्च ज्ञानभाग्यथ जायते ।
जायते परिपूर्णाङ्गः पौर्णमास्येव चन्द्रमाः ॥ १० ॥
ऐसा करनेसे मनुष्य पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति परिपूर्णांग सौभाग्यशाली, दर्शनीय तथा ज्ञानका भागी होता है ॥ १० ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥
बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः
बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
श्रोतुमिच्छामि मर्त्यानां संसारविधिमुत्तमम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! अब मैं मनुष्योंकी संसारयात्राके निर्वाहकी उत्तम विधि सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
केन वृत्तेन राजेन्द्र वर्तमाना नरा भुवि ।
प्राप्नुवन्त्युत्तमं स्वर्गं कथं च नरकं नृप ॥ २ ॥
राजेन्द्र! पृथ्वीपर रहनेवाले मनुष्य किस बर्तावसे उत्तम स्वर्गलोक पाते हैं? और नरेश्वर! कैसा बर्ताव करनेसे वे नरकमें पड़ते हैं? ॥ २ ॥
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः ।
प्रयान्त्यमुं लोकमितः को वै ताननुगच्छति ॥ ३ ॥
लोग अपने मृत शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेके समान छोड़कर जब यहाँसे परलोककी राह लेते हैं, उस समय उनके पीछे कौन जाता है? ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
अयमायाति भगवान् बृहस्पतिरुदारधीः ।
पृच्छैनं सुमहाभागमेतद् गुह्यं सनातनम् ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— वत्स! ये उदारबुद्धि भगवान् बृहस्पतिजी यहाँ पधार रहे हैं। इन्हीं महाभागसे इस सनातन गूढ़ विषयको पूछो ॥ ४ ॥
नैतदन्येन शक्यं हि वक्तुं केनचिदद्य वै ।
वक्ता बृहस्पतिसमो न ह्यन्यो विद्यते क्वचित् ॥ ५ ॥
आज दूसरा कोई इस विषयका प्रतिपादन नहीं कर सकता। बृहस्पतिजीके समान वक्ता दूसरा कोई कहीं भी नहीं है ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तयोः संवदतोरेवं पार्थगांगेययोस्तदा ।
आजगाम विशुद्धात्मा नाकपृष्ठाद् बृहस्पतिः ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर और गंगानन्दन भीष्म, इन दोनोंमें इस प्रकार बात हो ही रही थी कि विशुद्ध अन्तःकरणवाले बृहस्पतिजी स्वर्गलोकसे वहाँ आ पहुँचे ।। ६ ।।
ततो राजा समुत्थाय धृतराष्ट्रपुरोगमः ।
पूजामनुपमां चक्रे सर्वे ते च सभासदः ॥ ७ ॥
उन्हें देखते ही राजा युधिष्ठिर धृतराष्ट्रको आगे करके खड़े हो गये। फिर उन्होंने तथा उन सभी सभासदोंने बृहस्पतिजीकी अनुपम पूजा की ।। ७ ।।
ततो धर्मसुतो राजा भगवन्तं बृहस्पतिम् ।
उपगम्य यथान्यायं प्रश्नं पप्रच्छ तत्त्वतः ॥ ८ ॥
तदनन्तर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने भगवान् बृहस्पतिजीके समीप जाकर यथोचित रीतिसे यह तात्त्विक प्रश्न उपस्थित किया ।। ८ ।।
युधिष्ठिर उवाच
भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
मर्त्यस्य कः सहायो वै पिता माता सुतो गुरुः ॥ ९ ॥
ज्ञातिसम्बन्धिवर्गश्च मित्रवर्गस्तथैव च ।
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः ॥ १० ॥
गच्छन्त्यमुत्र लोकं वै क एनमनुगच्छति ।
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! आप सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता और सब शास्त्रोंके विद्वान् हैं; अतः बताइये, पिता, माता, पुत्र, गुरु, सजातीय सम्बन्धी और मित्र आदिमेंसे मनुष्यका सच्चा सहायक कौन है? जब सब लोग अपने मरे हुए शरीरको काठ और ढेलेके समान त्यागकर चले जाते हैं, तब इस जीवके साथ परलोकमें कौन जाता है? ।।
बृहस्पतिरुवाच
एकः प्रसूयते राजन्नेक एव विनश्यति ॥ ११ ॥
एकस्तरति दुर्गाणि गच्छत्येकस्तु दुर्गतिम् ।
बृहस्पतिजीने कहा— राजन्! प्राणी अकेला ही जन्म लेता, अकेला ही मरता, अकेला ही दुःखसे पार होता तथा अकेला ही दुर्गति भोगता है ।। ११ ½ ।।
असहायः पिता माता तथा भ्राता सुतो गुरुः ॥ १२ ॥
ज्ञातिसम्बन्धिवर्गश्च मित्रवर्गस्तथैव च ।
पिता, माता, भाई, पुत्र, गुरु, जाति, सम्बन्धी तथा मित्रवर्ग—ये कोई भी उसके सहायक नहीं होते ।।
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः ॥ १३ ॥
मुहूर्तमिव रोदित्वा ततो यान्ति पराङ्मुखाः ।
लोग उसके मरे हुए शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेकी तरह फेंककर दो घड़ी रोते हैं और फिर उसकी ओरसे मुँह फेरकर चल देते हैं ।। १३ १/२ ।। तैस्तच्छरीरमुत्सृष्टं धर्म एकोऽनुगच्छति ।। १४ ।। तस्माद् धर्मः सहायश्च सेवितव्यः सदा नृभिः । वे कुटुम्बीजन तो उसके शरीरका परित्याग करके चले जाते हैं, किंतु एकमात्र धर्म ही उस जीवात्माका अनुसरण करता है; इसलिये धर्म ही सच्चा सहायक है। अतः मनुष्योंको सदा धर्मका ही सेवन करना चाहिये ।। प्राणी धर्मसमायुक्तो गच्छेत् स्वर्गगतिं पराम् ।। १५ ।। तथैवाधर्मसंयुक्तो नरकं चोपपद्यते । धर्मयुक्त प्राणी ही उत्तम स्वर्गमें जाता है और अधर्मपरायण जीव नरकमें पड़ता है ।। १५ १/२ ।। तस्मान्न्यायागतैरर्थैर्धर्मं सेवेत पण्डितः ।। १६ ।। धर्म एको मनुष्याणां सहायः पारलौकिकः । इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि न्यायसे प्राप्त हुए धनके द्वारा धर्मका अनुष्ठान करे। एकमात्र धर्म ही परलोकमें मनुष्योंका सहायक है ।। १६ १/२ ।। लोभान्मोहादनुक्रोशाद् भयाद् वाप्यबहुश्रुतः ।। १७ ।। नरः करोत्यकार्याणि परार्थे लोभमोहितः । जो बहुश्रुत नहीं है, वही मनुष्य लोभ और मोहके वशीभूत हो दूसरेके लिये लोभ, मोह, दया अथवा भयसे न करने योग्य पापकर्म कर बैठता है ।। १७ १/२ ।। धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रितयं जीविते फलम् ।। १८ ।। एतत् त्रयमवाप्तव्यमधर्मपरिवर्जितम् । धर्म, अर्थ और काम—ये तीन जीवनके फल हैं, अतः मनुष्यको अधर्मके त्यागपूर्वक इन तीनोंको उपलब्ध करना चाहिये ।। १८ १/२ ।।
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं भगवतो वाक्यं धर्मयुक्तं परं हितम् ।। १९ ।। शरीरनिचयं ज्ञातुं बुद्धिस्तु मम जायते । **युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! आपके मुँहसे मैंने धर्मयुक्त परम हितकर बात सुनी। अब शरीरकी स्थिति जाननेके लिये मेरा विचार हो रहा है ।। १९ १/२ ।। मृतं शरीरं हि नृणां सूक्ष्ममव्यक्ततां गतम् ।। २० ।। अचक्षुर्विषयं प्राप्तं कथं धर्मोऽनुगच्छति ।
मनुष्यका स्थूल शरीर तो मरकर यहीं पड़ा रह जाता है और उसका सूक्ष्म शरीर अव्यक्तभावको प्राप्त हो जाता है—नेत्रोंकी पहुँचसे परे है। ऐसी दशामें धर्म किस प्रकार उसका अनुसरण करता है? ॥ २० १/२ ॥
बृहस्पतिरुवाच
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिर्मनोऽन्तकः ॥ २१ ॥ बुद्धिरात्मा च सहिता धर्मं पश्यन्ति नित्यदा । बृहस्पतिजीने कहा—धर्मराज! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, यम, बुद्धि और आत्मा—ये सब सदा एक साथ मनुष्यके धर्मपर दृष्टि रखते हैं ॥ २१ १/२ ॥ प्राणिनामिह सर्वेषां साक्षिभूता निशानिशम् ॥ २२ ॥ एतैश्च सह धर्मोऽपि तं जीवमनुगच्छति । दिन और रात भी इस जगत्के सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मोंके साक्षी हैं। इन सबके साथ धर्म भी जीवका अनुसरण करता है ॥ २२ १/२ ॥ त्वगस्थिमांसं शुक्रं च शोणितं च महामते ॥ २३ ॥ शरीरं वर्जयन्त्येते जीवितेन विवर्जितम् । महामते! त्वचा, अस्थि, मांस, शुक्र और शोणित—ये सब धातु निष्प्राण शरीरका परित्याग कर देते हैं अर्थात् ये उस शरीरधारी जीवात्माका साथ छोड़ देते हैं, एक धर्म ही उसके साथ जाता है ॥ २३ १/२ ॥ ततो धर्मसमायुक्तः प्राप्नुते जीव एव हि ॥ २४ ॥ ततोऽस्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम् । देवताः पञ्चभूतस्थाः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २५ ॥ इसलिये धर्मयुक्त जीव ही परमगति प्राप्त करता है। फिर परलोकमें अपने कर्मोंका भोग समाप्त करके प्राणी जब दूसरा शरीर धारण करता है, उस समय उसके शरीरके पाँचों भूतोंमें स्थित अधिष्ठाता देवता उस जीवके शुभ और अशुभ कर्मोंको देखते हैं। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २४-२५ ॥ ततो धर्मसमायुक्तः स जीवः सुखमेधते । इहलोके परे चैव किं भूयः कथयामि ते ॥ २६ ॥ तदनन्तर धर्मयुक्त वह जीव इहलोक और परलोकमें सुखका अनुभव करता है। अब तुम्हें और क्या बताऊँ? ॥ २६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
तद् दर्शितं भगवता यथा धर्मोऽनुगच्छति । एतत् तु ज्ञातुमिच्छामि कथं रेतः प्रवर्तते ॥ २७ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! धर्म जिस प्रकार जीवका अनुसरण करता है, वह तो आपने समझा दिया। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि इस शरीरमें वीर्यकी उत्पत्ति कैसे होती है? ।। २७ ।।
बृहस्पतिरुवाच
अन्नमश्नन्ति यद् देवाः शरीरस्था नरेश्वर ।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिर्मनस्तथा ।। २८ ।।
ततस्तृप्तेषु राजेन्द्र तेषु भूतेषु पञ्चसु ।
मनःषष्ठेषु शुद्धात्मन् रेतः सम्पद्यते महत् ।। २९ ।।
**बृहस्पतिजीने कहा—**शुद्धात्मन्! नरेश्वर! राजेन्द्र! इस शरीरमें स्थित पृथिवी, जल, अन्न, वायु, आकाश और मनके अधिष्ठाता देवता जो अन्न भक्षण करते हैं और उस अन्नसे मनसहित वे पाँचों भूत जब पूर्ण तृप्त होते हैं, तब महान् रेतस् (वीर्य) की उत्पत्ति होती है ।। २८-२९ ।।
ततो गर्भः सम्भवति श्लेषात् स्त्रीपुंसयोर्नृप ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं भूयः किं श्रोतुमिच्छसि ।। ३० ।।
राजन्! फिर स्त्री-पुरुषका संयोग होनेपर वही वीर्य गर्भका रूप धारण करता है। ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दीं। अब और क्या सुनना चाहते हो? ।। ३० ।।
युधिष्ठिर उवाच
आख्यातं मे भगवता गर्भः संजायते यथा ।
यथा जातस्तु पुरुषः प्रपद्यति तदुच्यताम् ।। ३१ ।।
**युधिष्ठिरने कहा—**भगवन्! गर्भ जिस प्रकार उत्पन्न होता है, वह आपने बताया। अब यह बताइये कि उत्पन्न हुआ पुरुष पुनः किस प्रकार बन्धनमें पड़ता है ।। ३१ ।।
बृहस्पतिरुवाच
आसन्नमात्रः पुरुषस्तैर्भूतैरभिभूयते ।
विप्रयुक्तश्च तैर्भूतैः पुनर्यात्यपरां गतिम् ।। ३२ ।।
**बृहस्पतिजीने कहा—**राजन्! जीव उस वीर्यमें प्रविष्ट होकर जब गर्भमें संनिहित होता है, तब वे पाँचों भूत शरीररूपमें परिणत हो उसे बाँध लेते हैं, फिर उन्हीं भूतोंसे विलग होनेपर वह दूसरी गतिको प्राप्त होता है ।।
सर्वभूतसमायुक्तः प्राप्नुते जीव एव हि ।
ततोऽस्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम् ।
देवताः पञ्चभूतस्थाः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।। ३३ ।।
शरीरमें सम्पूर्ण भूतोंसे युक्त हुआ वह जीव ही सुख या दुःख पाता है। उस समय पाँचों भूतोंमें स्थित उनके अधिष्ठाता देवता जीवके शुभ या अशुभ कर्मको देखते हैं। अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
त्वगस्थिमांसमुत्सृज्य तैश्च भूतैर्विवर्जितः ।
जीवः स भगवन् क्वस्थः सुखदुःखे समश्नुते ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! जीव त्वचा, अस्थि और मांसमय शरीरका त्याग करके जब पाँचों भूतोंके सम्बन्धसे पृथक् हो जाता है, तब कहाँ रहकर वह सुख-दुःखका उपभोग करता है? ॥ ३४ ॥
बृहस्पतिरुवाच
जीवः कर्मसमायुक्तः शीघ्रं रेतस्त्वमागतः ।
स्त्रीणां पुष्पं समासाद्य सूते कालेन भारत ॥ ३५ ॥
बृहस्पतिजीने कहा—भारत! जीव अपने कर्मोंसे प्रेरित होकर शीघ्र ही वीर्यभावको प्राप्त होता है और स्त्रीके रजमें प्रविष्ट होकर समयानुसार जन्म धारण करता है ॥ ३५ ॥
यमस्य पुरुषैः क्लेशं यमस्य पुरुषैर्वधम् ।
दुःखं संसारचक्रं च नरः क्लेशं स विन्दति ॥ ३६ ॥
(गर्भमें आनेके पहले सूक्ष्मशरीरमें स्थित होकर अपने दुष्कर्मोंके कारण) वह यमदूतोंद्वारा नाना प्रकारके क्लेश पाता, उनके प्रहार सहता और दुःखमय संसारचक्रमें भाँति-भाँतिके कष्ट भोगता है ॥ ३६ ॥
इहलोके च स प्राणी जन्मप्रभृति पार्थिव ।
सुकृतं कर्म वै भुङ्क्ते धर्मस्य फलमाश्रितः ॥ ३७ ॥
यदि धर्मं यथाशक्ति जन्मप्रभृति सेवते ।
ततः स पुरुषो भूत्वा सेवते नित्यदा सुखम् ॥ ३८ ॥
पृथ्वीनाथ! यदि प्राणी इस लोकमें जन्मसे ही पुण्यकर्ममें लगा रहता है तो वह धर्मके फलका आश्रय लेकर उसके अनुसार सुख भोगता है। यदि अपनी शक्तिके अनुसार बाल्यकालसे ही धर्मका सेवन करता है तो वह मनुष्य होकर सदा सुखका अनुभव करता है ।।
अथान्तरा तु धर्मस्याप्यधर्ममुपसेवते ।
सुखस्यानन्तरं दुःखं स जीवोऽप्यधिगच्छति ॥ ३९ ॥
किंतु धर्मके बीचमें यदि कभी-कभी वह अधर्मका भी आचरण कर बैठता है तो उसे सुखके बाद दुःख भी भोगना पड़ता है ॥ ३९ ॥
अधर्मेण समायुक्तो यमस्य विषयं गतः ।
महद् दुःखं समासाद्य तिर्यग्योनौ प्रजायते ॥ ४० ॥ अधर्मपरायण मनुष्य यमलोकमें जाता है और वहाँ महान् दुःख भोगकर यहाँ पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ४० ॥
कर्मणा येन येनेह यस्यां योनौ प्रजायते । जीवो मोहसमायुक्तस्तन्मे निगदतः शृणु ॥ ४१ ॥ जीव मोहके वशीभूत होकर जिस-जिस कर्मका अनुष्ठान करनेसे जैसी-जैसी योनिमें जन्म धारण करता है, उसे बता रहा हूँ, सुनो ॥ ४१ ॥
यदेतदुच्यते शास्त्रे सेतिहासे च छन्दसि । यमस्य विषयं घोरं मर्त्यो लोकः प्रपद्यते ॥ ४२ ॥ शास्त्र, इतिहास और वेदमें जो यह बात बतायी गयी है कि मनुष्य इस लोकमें पाप करनेपर मृत्युके पश्चात् यमराजके भयंकर लोकमें जाता है, यह सत्य ही है ॥
इह स्थानानि पुण्यानि देवतुल्यानि भूपते । तिर्यग्योन्यतिरिक्तानि गतिमन्ति च सर्वशः ॥ ४३ ॥ भूपाल! इस यमलोकमें देवलोकके समान पुण्यमय स्थान भी हैं, जिनमें तिर्यक् (तथा कीट-पतंग आदि) योनिके प्राणियोंको छोड़कर समस्त पुण्यात्मा जंगम जीव जाते हैं ॥ ४३ ॥
यमस्य भवने दिव्ये ब्रह्मलोकसमे गुणैः । कर्मभिर्नियतैर्बद्धो जन्तुर्दुःखान्युपाश्नुते ॥ ४४ ॥ यमराजका भवन सौन्दर्य आदि गुणोंके कारण ब्रह्मलोकके समान दिव्य भी है। परंतु अपने नियत पापकर्मोंसे बँधा हुआ जीव वहाँ भी नरकमें पड़कर दुःख भोगता है ॥ ४४ ॥
येन येन तु भावेन कर्मणा पुरुषो गतिम् । प्रयाति परुषां घोरां तत्ते वक्ष्याम्यतः परम् ॥ ४५ ॥ मनुष्य जिस-जिस भाव और जिस-जिस कर्मसे निष्ठुरतापूर्ण भयंकर गतिको प्राप्त होता है, अब उसीको बता रहा हूँ ॥ ४५ ॥
अधीत्य चतुरो वेदान् द्विजो मोहसमन्वितः । पतितात् प्रतिगृह्याथ खरयोनौ प्रजायते ॥ ४६ ॥ जो द्विज चारों वेदोंका अध्ययन करनेके बाद भी मोहवश पतित मनुष्योंसे दान लेता है, उसका गदहेकी योनिमें जन्म होता है ॥ ४६ ॥
खरो जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत । खरो मृतो बलीवर्दः सप्त वर्षाणि जीवति ॥ ४७ ॥ भारत! गदहेकी योनिमें वह पंद्रह वर्षोंतक जीवित रहता है। उसके बाद मरकर बैल होता है। उस योनिमें वह सात वर्षोंतक जीवित रहता है ॥ ४७ ॥
बलीवर्दो मृतश्चापि जायते ब्रह्मराक्षसः ।
ब्रह्मराक्षसश्च मासांस्त्रींस्ततो जायति ब्राह्मणः ।। ४८ ।। जब बैलका शरीर छूट जाता है, तब वह ब्रह्मराक्षस होता है। तीन मासतक ब्रह्मराक्षस रहनेके बाद फिर वह ब्राह्मणका जन्म पाता है ॥ ४८ ॥ पतितं याजयित्वा तु कृमियोनौ प्रजायते । तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ।। ४९ ।। भारत! जो ब्राह्मण पतित पुरुषका यज्ञ कराता है, वह मरनेके बाद कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है और उस योनिमें पंद्रह वर्षोतक जीवित रहता है ॥ ४९ ॥ कृमिभावाद् विमुक्तस्तु ततो जायति गर्दभः । गर्दभः पञ्च वर्षाणि पञ्च वर्षाणि सूकरः ।। ५० ।। कुक्कुटः पञ्च वर्षाणि पञ्च वर्षाणि जम्बुकः । श्वा वर्षमेकं भवति ततो जायति मानवः ।। ५१ ।। कीड़ेकी योनिसे छूटनेपर वह गदहेका जन्म पाता है। पाँच वर्षतक गदहा रहकर पाँच वर्ष सूअर, पाँच वर्ष मुर्गा, पाँच वर्ष सियार और एक वर्ष कुत्ता होता है। उसके बाद वह मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है ।। उपाध्यायस्य यः पापं शिष्यः कुर्यादबुद्धिमान् । स जीव इह संसारांस्त्रीनाप्नोति न संशयः ।। ५२ ।। प्राक् श्वा भवति राजेन्द्र ततः क्रव्यात्ततः खरः । ततः प्रेतः परिक्लिष्टः पश्चाज्जायति ब्राह्मणः ।। ५३ ।। जो मूर्ख शिष्य अपने अध्यापकका अपराध करता है, वह यहाँ निम्नांकित तीन योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है, इसमें संशय नहीं है। राजेन्द्र! पहले तो वह कुत्ता होता है, फिर राक्षस और गदहा होता है। उसके बाद मरकर प्रेतावस्थामें अनेक कष्ट भोगनेके पश्चात् ब्राह्मणका जन्म पाता है ॥ ५२-५३ ॥ मनसापि गुरोर्भार्या यः शिष्यो याति पापकृत् । स उग्रान् प्रेति संसारानधर्मेणेह चेतसा ।। ५४ ।। जो पापाचारी शिष्य गुरुपत्नीके साथ समागमका विचार भी मनमें लाता है, वह अपने मानसिक पापके कारण भयंकर योनियोंमें जन्म लेता है ॥ ५४ ॥ श्वयोनौ तु स सम्भूतस्त्रीणि वर्षाणि जीवति । तत्रापि निधनं प्राप्तः कृमियोनौ प्रजायते ।। ५५ ।। कृमिभावमनुप्राप्तो वर्षमेकं तु जीवति । ततस्तु निधनं प्राप्तो ब्रह्मयोनौ प्रजायते ।। ५६ ।। पहले कुत्तेकी योनिमें जन्म लेकर वह तीन वर्षतक जीवन धारण करता है। उस योनिमें मृत्युको प्राप्त होकर वह कीड़ेकी योनिमें उत्पन्न होता है। कीटयोनिमें जन्म लेकर वह एक
वर्षतक जीवित रहता है। फिर मरनेके बाद उसका ब्राह्मण-योनिमें जन्म होता है ॥ ५५-५६ ॥
यदि पुत्रसमं शिष्यं गुरुर्हन्यादकारणे ।
आत्मनः कामकारेण सोऽपि हिंस्रः प्रजायते ॥ ५७ ॥
यदि गुरु अपने पुत्रके समान शिष्यको बिना कारणके ही मारता-पीटता है तो वह अपनी स्वेच्छा-चारिताके कारण हिंसक पशुकी योनिमें जन्म लेता है ॥
पितरं मातरं चैव यस्तु पुत्रोऽवमन्यते ।
सोऽपि राजन् मृतो जन्तुः पूर्वं जायेत गर्दभः ॥ ५८ ॥
राजन्! जो पुत्र अपने माता-पिताका अनादर करता है, वह भी मरनेके बाद पहले गदहा नामक प्राणी होता ॥ ५८ ॥
गर्दभत्वं तु सम्प्राप्य दश वर्षाणि जीवति ।
संवत्सरं तु कुम्भीरस्ततो जायेत मानवः ॥ ५९ ॥
गदहेका शरीर पाकर वह दस वर्षोंतक जीवित रहता है। फिर एक सालतक घड़ियाल रहनेके बाद मानवयोनिमें उत्पन्न होता है ॥ ५९ ॥
पुत्रस्य मातापितरौ यस्य रुष्टावुभावपि ।
गुर्वपध्यानतः सोऽपि मृतो जायति गर्दभः ॥ ६० ॥
जिस पुत्रके ऊपर माता और पिता दोनों ही रुष्ट होते हैं, वह गुरुजनोंके अनिष्टचिन्तनके कारण मृत्युके बाद गदहा होता है ॥ ६० ॥
खरो जीवति मासांस्तु दश श्वा च चतुर्दश ।
बिडालः सप्तमासांस्तु ततो जायति मानवः ॥ ६१ ॥
गदहेकी योनिमें वह दस मासतक जीवित रहता है। उसके बाद चौदह महीनोंतक कुत्ता और सात मासतक बिलाव होकर अन्तमें वह मनुष्यकी योनिमें जन्म ग्रहण करता है ॥ ६१ ॥
मातापितरावाक्रुश्य सारिकः सम्प्रजायते ।
ताडयित्वा तु तावेव जायते कच्छपो नृप ॥ ६२ ॥
माता-पिताकी निन्दा करके अथवा उन्हें गाली देकर मनुष्य दूसरे जन्ममें मैना होता है। नरेश्वर! जो माता-पिताको मारता है, वह कछुआ होता है ॥ ६२ ॥
कच्छपो दश वर्षाणि त्रीणि वर्षाणि शल्यकः ।
व्यालो भूत्वा च षण्मासांस्ततो जायति मानुषः ॥ ६३ ॥
दस वर्षतक कछुआ रहनेके पश्चात् तीन वर्ष साही और छः महीनेतक सर्प होता है। उसके अनन्तर वह मनुष्यकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ६३ ॥
भर्तृपिण्डमुपाश्नन् यो राजद्विष्टानि सेवते ।
सोऽपि मोहसमापन्नो मृतो जायति वानरः ॥ ६४ ॥
जो पुरुष राजाके टुकड़े खाकर पलता हुआ भी मोहवश उसके शत्रुओंकी सेवा करता है, वह मरनेके बाद वानर होता है ।। ६४ ।।
वानरो दश वर्षाणि पञ्च वर्षाणि मूषिकः ।
श्वाथ भूत्वा तु षण्मासांस्ततो जायति मानुषः ।। ६५ ।।
दस वर्षोंतक वानर, पाँच वर्षोंतक चूहा और छः महीनोंतक कुत्ता होकर वह मनुष्यका जन्म पाता है ।।
न्यासापहर्ता तु नरो यमस्य विषयं गतः ।
संसाराणां शतं गत्वा कृमियोनौ प्रजायते ।। ६६ ।।
दूसरोंकी धरोहर हड़प लेनेवाला मनुष्य यमलोकमें जाता और क्रमशः सौ योनियोंमें भ्रमण करके अन्तमें कीड़ा होता है ।। ६६ ।।
तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ।
दुष्कृतस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानुषः ।। ६७ ।।
भारत! कीड़ेकी योनिमें वह पंद्रह वर्षोंतक जीवित रहता है और अपने पापोंका क्षय करके अन्तमें मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है ।। ६७ ।।
असूयको नरश्चापि मृतो जायति शार्ङ्गकः ।
विश्वासहर्ता तु नरो मीनो जायति दुर्मतिः ।। ६८ ।।
दूसरोंके दोष ढूँढ़नेवाला मनुष्य हरिणकी योनिमें जन्म लेता है तथा जो अपनी खोटी बुद्धिके कारण किसीके साथ विश्वासघात करता है, वह मनुष्य मछली होता है ।। ६८ ।।
भूत्वा मीनोऽष्ट वर्षाणि मृतो जायति भारत ।
मृगस्तु चतुरो मासांस्ततश्छागः प्रजायते ।। ६९ ।।
भारत! आठ वर्षोंतक मछली रहकर मरनेके बाद वह चार मासतक मृग होता है। उसके बाद बकरेकी योनिमें जन्म लेता है ।। ६९ ।।
छागस्तु निधनं प्राप्य पूर्णे संवत्सरे ततः ।
कीटः संजायते जन्तुस्ततो जायति मानुषः ।। ७० ।।
बकरा पूरे एक वर्षपर मृत्युको प्राप्त होनेके पश्चात् कीड़ा होता है। उसके बाद उस जीवको मनुष्यका जन्म मिलता है ।। ७० ।।
धान्यान् यवांस्तिलान् माषान् कुलत्थान् सर्षपांश्चणान् ।
कलापानथ मुद्गांश्च गोधूमानतसींस्तथा ।। ७१ ।।
सस्यस्यान्यस्य हर्ता च मोहाज्जन्तुरचेतनः ।
स जायते महाराज मूषिको निरपत्रपः ।। ७२ ।।
महाराज! जो पुरुष लज्जाका परित्याग करके अज्ञान और मोहके वशीभूत होकर धान, जौ, तिल, उड़द, कुलथी, सरसों, चना, मटर, मूँग, गेहूँ और तीसी तथा दूसरे-दूसरे अनाजोंकी चोरी करता है, वह मरनेके बाद पहले चूहा होता है ।। ७१-७२ ।।
ततः प्रेत्य महाराज मृतो जायति सूकरः । सूकरो जातमात्रस्तु रोगेण म्रियते नृप ॥ ७३ ॥ राजन्! फिर वह चूहा मृत्युके पश्चात् सूअर होता है। नरेश्वर! वह सूअर जन्म लेते ही रोगसे मर जाता है ।। ७३ ।। श्वा ततो जायते मूढः कर्मणा तेन पार्थिव । भूत्वा श्वा पञ्च वर्षाणि ततो जायति मानवः ॥ ७४ ॥ पृथ्वीनाथ! फिर उसी कर्मसे वह मूढ़ जीव कुत्ता होता है और पाँच वर्षतक कुत्ता रहकर अन्तमें मनुष्यका जन्म पाता है ।। ७४ ।। परदाराभिमर्शं तु कृत्वा जायति वै वृकः । श्वा शृगालस्ततो गृध्रो व्यालः कङ्को बकस्तथा ॥ ७५ ॥ परस्त्रीगमनका पाप करके मनुष्य क्रमशः भेड़िया, कुत्ता, सियार, गीध, साँप, कंक और बगुला होता है ।। ७५ ।। भ्रातृभार्यां तु पापात्मा यो धर्षयति मोहितः । पुंस्कोकिलत्वमाप्नोति सोऽपि संवत्सरं नृप ॥ ७६ ॥ नरेश्वर! जो पापात्मा मोहवश भाईकी स्त्रीके साथ बलात्कार करता है, वह एक वर्षतक कोयलकी योनिमें पड़ा रहता है ।। ७६ ।। सखिभार्यां गुरोर्भार्यां राजभार्यां तथैव च । प्रधर्षयित्वा कामाय मृतो जायति सूकरः ॥ ७७ ॥ जो कामनाकी पूर्तिके लिये मित्र, गुरु और राजाकी स्त्रीका सतीत्व भंग करता है, वह मरनेके बाद सूअर होता है ।। ७७ ।। सूकरः पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि श्वाविधः । बिडालः पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि कुक्कुटः ॥ ७८ ॥ पिपीलिकस्तु मासांस्त्रीन् कीटः स्यान्मासमेव तु । एतानासाद्य संसारान् कृमियोनौ प्रजायते ॥ ७९ ॥ पाँच वर्षतक सूअर रहकर दस वर्ष भेड़िया, पाँच वर्ष बिलाव, दस वर्ष मुर्गा, तीन महीने चींटी और एक महीने कीड़ेकी योनिमें रहता है। इन सभी योनियोंमें चक्कर लगानेके बाद वह पुनः कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है ।। ७८-७९ ।। तत्र जीवति मासांस्तु कृमियोनौ चतुर्दश । ततोऽधर्मक्षयं कृत्वा पुनर्जायति मानवः ॥ ८० ॥ उस कीट-योनिमें वह चौदह महीनोंतक जीवन धारण करता है। तदनन्तर पापक्षय करके वह पुनः मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है ।। ८० ।। उपस्थिते विवाहे तु यज्ञे दानेऽपि वा विभो । मोहात् करोति यो विघ्नं स मृतो जायते कृमिः ॥ ८१ ॥