माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २५७
अवस्त्वनुपलम्भं च लोकोत्तरमिति स्मृतम् ।
ज्ञानं ज्ञेयं च विज्ञेयं सदा बुद्धैः प्रकीर्तितम् ॥ ८८ ॥
जो वस्तु और उपलब्धि दोनोंसे रहित है वह अवस्था लोकोत्तर (सुषुप्ति) मानी गयी है। इस प्रकार विद्वानोंने सर्वदा ही [अवस्थात्रयरूप] ज्ञान और ज्ञेय तथा [तुरीयरूप] विज्ञेयका निरूपण किया है ॥८८॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| अवस्त्वनुपलम्भं च ग्राह्यग्रहणवर्जितमित्येतत्, लोकोत्तरम् अत एव लोकातीतम् । ग्राह्यग्रहणविषयो हि लोकस्तदभावात्सर्वप्रवृत्तिबीजं सुषुप्तमित्येतदेवं स्मृतम् ।<br><br>सोपायं परमार्थतत्त्वं लौकिकं शुद्धलौकिकं लोकोत्तरं च क्रमेण येन ज्ञानेन ज्ञायते तज्ज्ञानम् । ज्ञेयमेतान्येव त्रीणि । एतद्व्यतिरेकेण ज्ञेयानुपपत्तेः सर्वप्रावादुककल्पितवस्तुनोऽत्रैवान्तर्भावात् । विज्ञेयं परमार्थसत्यं तुर्याख्यमद्वयमजमात्मतत्त्वमित्यर्थः । सदा | अवस्तु और अनुपलब्भ अर्थात् ग्राह्य और ग्रहणसे रहित जो अवस्था है वह 'लोकोत्तर' अतएव 'लोकातीत' कहलाती है, क्योंकि ग्राह्य और ग्रहणका विषय ही लोक है। उसका अभाव होनेके कारण वह सुषुप्त अवस्था सम्पूर्ण प्रवृत्तियोंकी बीजभूता है—ऐसा माना गया है ।<br><br>उपायके सहित परमार्थतत्त्व तथा लौकिक, शुद्ध लौकिक और लोकोत्तर अवस्थाओंका जिस ज्ञानके द्वारा क्रमशः बोध होता है उसे 'ज्ञान' कहते हैं तथा ये तीनों अवस्थाएँ ही 'ज्ञेय' हैं, क्योंकि समस्त वादियोंकी कल्पना की हुई वस्तुओंका इन्हींमें अन्तर्भाव होनेके कारण इनके सिवा किसी अन्य ज्ञेयका होना सम्भव नहीं है । जो परमार्थ सत्य तुरीयसंज्ञक अद्वय अजन्मा आत्मतत्त्व है वही 'विज्ञेय' है । ऐसा इसका अभिप्राय है । |
| २५८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| सर्वदा एतल्लौकिकादिविज्ञेयान्तं बुद्धैः परमार्थदर्शिभिर्ब्रह्मविद्भिः प्रकीर्तितम् ॥ ८८ ॥ | उन लौकिकसे लेकर विज्ञेयपर्यन्त सम्पूर्ण वस्तुओंका परमार्थदर्शी विद्वानोंने सदा—सर्वदा ही निरूपण किया है ॥ ८८ ॥ |
त्रिविध ज्ञेय और ज्ञानका ज्ञाता सर्वज्ञ है
ज्ञाने च त्रिविधे ज्ञेये क्रमेण विदिते स्वयम् ।
सर्वज्ञता हि सर्वत्र भवतीह महाधियः ॥ ८९ ॥
ज्ञान और तीन प्रकारके ज्ञेयको क्रमशः जान लेनेपर इसलोकमें उस महाबुद्धिमान्को स्वयं ही सर्वत्र सर्वज्ञता हो जाती है ॥ ८९ ॥
| ज्ञाने च लौकिकादिविषये, ज्ञेये च लौकिकादौ त्रिविधे— पूर्वं लौकिकं स्थूलम्, तदभावेन पश्चाच्छुद्धं लौकिकम्, तदभावेन लोकोत्तरमित्येवं क्रमेण स्थानत्रयाभावेन परमार्थसत्ये तुर्येऽद्वयेऽजेऽभये विदिते स्वयमेवात्मस्वरूपमेव सर्वज्ञता सर्वश्चासौ ज्ञश्च सर्वज्ञस्तद्भावः सर्वज्ञता, इहास्मिँल्लोके भवति महाधियो महाबुद्धेः । सर्वलोकातिशयवस्तुविषयबुद्धित्वादेवंविदः सर्वत्र | लौकिकादिविषयक ज्ञान और लौकिकादि तीन प्रकारके ज्ञेयको जान लेनेपर, अर्थात् पहले स्थूल लौकिकको, फिर उसके अभावमें शुद्ध लौकिकको तथा उसके भी अभावमें लोकोत्तरको—इस प्रकार क्रमशः तीनों अवस्थाओंके अभाव-द्वारा परमार्थसत्य अद्वय, अजन्मा और अभयरूप तुरीयको जान लेनेपर, इस लोकमें उस महाबुद्धिको सर्वत्र यानी सर्वदा स्वयं आत्मस्वरूप ही सर्वज्ञता—जो सर्वरूप ज्ञ (ज्ञानी) हो उसे 'सर्वज्ञ' कहते हैं उसीकी भावरूपा सर्वज्ञता प्राप्त होती है, क्योंकि ऐसा जाननेवालेकी बुद्धि सम्पूर्ण लोकसे बढ़ी हुई वस्तुको विषय करनेवाली होती है । तात्पर्य |
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २५९
| सर्वदा भवति । सकृद्विदिते स्वरूपे व्यभिचाराभावादित्यर्थः ।<br><br>न हि परमार्थविदो ज्ञानोद्भवाभिभवौ स्तो यथाऽन्येषां प्रावादुकानाम् ॥ ८९ ॥ | यह है कि स्वरूपका एक बार ज्ञान हो जानेपर उसका कभी व्यभिचार न होनेके कारण [ उसकी सर्वज्ञता सर्वदा रहती है ], क्योंकि जिस प्रकार अन्य वादियोंके ज्ञानके उदय और अस्त होते रहते हैं उस प्रकार परमार्थवेत्ता ज्ञानीके ज्ञानके उदय और अस्त नहीं होते ॥ ८९ ॥ |
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| लौकिकादीनां क्रमेण ज्ञेयत्वेन निर्देशादस्तित्वाशङ्का परमार्थतो मा भूदित्याह— | [ उपर्युक्त श्लोकमें ] लौकिकादिको क्रमशः ज्ञेयरूपसे बतलाये जानेके कारण उनके परमार्थतः अस्तित्वकी आशंका न हो जाय—इसलिये कहते हैं— |
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हेयज्ञेयाप्यपाक्यानि विज्ञेयान्यग्रयाणतः ।
तेषामन्यत्र विज्ञेयादुपलम्भस्त्रिषु स्मृतः ॥ ९० ॥
[ जाग्रदादि ] हेय, [ सत्यब्रह्मस्वरूप ] ज्ञेय, [ पाण्डित्यादि ] प्राप्तव्य साधन और [ राग-द्वेषादि ] प्रशमनीय दोष—ये सबसे पहले जानने योग्य हैं । इनमेंसे ज्ञेय (ब्रह्म) को छोड़कर शेष तीनोंमें तो केवल उपलम्भ ( अविद्याकल्पितत्व ) ही माना गया है ॥ ९० ॥
| हेयानि च लौकिकादीनि त्रीणि जागरितस्वप्नसुषुप्तान्यात्मन्यसत्त्वेन रज्ज्वां सर्पवद्द्वातव्यानीत्यर्थः । ज्ञेयमिह चतुष्कोटि- | लौकिकादि तीन हेय हैं । तात्पर्य यह है कि जागरित, स्वप्न और सुषुप्ति ये तीनों अवस्थाएँ रज्जुमें सर्पके समान आत्मामें असत् होनेके कारण त्यागने योग्य हैं । चारों कोटियोंसे रहित परमार्थतत्त्व |
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२६० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
वर्जितं परमार्थतत्त्वम् । आप्या-
न्याप्तव्यानीत्यक्तवाह्यैषणात्रयेण
भिक्षुणा पाण्डित्यबाल्यमौना-
ख्यानि साधनानि । पाक्यानि
रागद्वेषमोहादयो दोषाः कषाया-
ख्यानि पक्तव्यानि । सर्वाण्ये-
तानि हेयज्ञेयाप्यपाक्यानि विज्ञे-
यानि भिक्षुणोपायत्वेनेत्यर्थः,
अग्रयाणतः प्रथमतः ।
तेषां हेयादीनामन्यत्र विज्ञे-
यात्परमार्थसत्यं विज्ञेयं ब्रह्मैकं
वर्जयित्वा, उपलम्भमुपल-
म्भोऽविद्याकल्पनामात्रम् । हेया-
प्यपाक्येषु त्रिष्वपि स्मृतो ब्रह्म-
विद्भिर्न परमार्थसत्यता त्रयाणा-
मित्यर्थः ॥ ९० ॥
ही यहाँ ज्ञेय माना गया है । बाह्य तीनों एषणाओंको त्याग देनेवाले मुमुक्षुके लिये पाण्डित्य, बाल्य और मौन नामक तीन साधन ही आप्य—प्राप्तव्य हैं; तथा राग, द्वेष और मोह आदि कषायसंज्ञक दोष ही [उसके लिये] पाक्य—पाक (जीर्ण) करने योग्य हैं। तात्पर्य यह है कि मुमुक्षुको हेय, ज्ञेय, आप्य और पाक्य इन सबको ही अग्रयाणतः—सबसे पहले अपने साधनरूपसे जानना चाहिये ।
उन हेय आदिमेंसे केवल एक परमार्थ सत्य ज्ञेय ब्रह्मको छोड़कर शेष हेय, आप्य और पाक्य—इन तीनोंमें ब्रह्मवेत्ताओंने केवल उपलम्भ—उपलम्भन यानी अविद्यामय कल्पनामात्र ही माना है, अर्थात् इन तीनोंकी परमार्थ सत्यता स्वीकार नहीं की है ॥ ९० ॥
जीव आकाशके समान अनादि और अभिन्न हैं
परमार्थतस्तु—
वास्तवमें तो—
प्रकृत्याकाशवज्ज्ञेयाः सर्वे धर्मा अनादयः ।
विद्यते न हि नानात्वं तेषां क्वचन किंचन ॥ ९१ ॥
सम्पूर्ण जीवोंको स्वभावसे ही आकाशके समान और अनादि जानना चाहिये । उनका नानात्व कहीं कुछ भी नहीं है ॥ ९१ ॥
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २६१
| प्रकृत्या स्वभावत आकाश-वदाकाशतुल्याः सूक्ष्मनिरञ्जन-सर्वगतत्वैः सर्वे धर्मा आत्मानो ज्ञेया मुमुक्षुभिरनादयो नित्याः। बहुवचनकृतभेदाशङ्कां निरा-कुर्वन्नाह—क्वचन किंचन किंचि-दणुमात्रमपि तेषां न विद्यते नानात्वमिति ॥ ९१ ॥ | मुमुक्षुओंको सूक्ष्मत्व, निरञ्जनत्व और सर्वगतत्व आदिके कारण सभी धर्मों—जीवोंको प्रकृतिसे अर्थात् स्वभावतः आकाशवत्—आकाशके समान और अनादि यानी नित्य जानना चाहिये । यहाँ बहुवचनके कारण होनेवाले जीवात्माओंके भेदकी आशंकाका निराकरण करते हुए कहते हैं— 'उनका क्वचन—कहीं, किञ्चन—कुछ भी अर्थात् अणुमात्र भी नानात्व नहीं है' ॥ ९१ ॥ |
आत्मतत्त्वनिरूपण
| ज्ञेयतापि धर्माणां संवृत्यैव न परमार्थत इत्याह— | आत्माओंकी जो ज्ञेयता है वह भी व्यावहारिक ही है परमार्थतः नहीं—इसी अभिप्रायसे कहते हैं— |
आदिबुद्धाः प्रकृत्यैव सर्वे धर्माः सुनिश्चिताः ।
यस्यैवं भवति क्षान्तिः सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ ९२ ॥
सम्पूर्ण आत्मा स्वभावसे ही नित्य बोधस्वरूप और सुनिश्चित हैं—जिसे ऐसा समाधान हो जाता है वह अमरत्व ( मोक्ष ) प्राप्तिमें समर्थ होता है ॥ ९२ ॥
| यस्मादादौ बुद्धा आदिबुद्धाः प्रकृत्यैव स्वभावत एव यथा नित्यप्रकाशस्वरूपः सवितैवं नित्यबोधस्वरूपा इत्यर्थः सर्वे धर्माः सर्व आत्मानः । न च | क्योंकि जिस प्रकार सूर्य नित्य प्रकाशस्वरूप है उसी प्रकार सम्पूर्ण धर्म यानी आत्मा प्रकृति—स्वभावसे ही आदिबुद्ध—आरम्भमें ही जाने हुए अर्थात् नित्य बोधस्वरूप हैं। उनका |
| २६२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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तेषां निश्चयः कर्त्तव्यो नित्य-निश्चितस्वरूपा इत्यर्थः। न संदिह्यमानस्वरूपा एवं नैवं चेति।|निश्चय भी नहीं करना है; अर्थात् वे नित्यनिश्चितस्वरूप हैं—'ऐसे हैं अथवा नहीं हैं' इस प्रकार सन्दिग्धस्वरूप नहीं हैं। यस्य मुमुक्षोरेवं यथोक्तप्रकारेण सर्वदा बोधनिश्चयनिरपेक्षतात्मार्थं परार्थं वा यथा सविता नित्यं प्रकाशान्तरनिरपेक्षः स्वार्थं परार्थं चेत्येवं भवति क्षान्तिबोधकर्त्तव्यतानिरपेक्षता सर्वदा स्वात्मनि सोऽमृतत्वायामृतभावाय कल्पते मोक्षाय समर्थो भवतीत्यर्थः ॥९२॥|जिस मुमुक्षुको इस तरह—उपर्युक्त प्रकारसे अपने अथवा पराये-लिये सर्वदा बोधनिश्चय-सम्बन्धिनी निरपेक्षता है; जिस प्रकार सूर्य अपने अथवा पराये लिये सदा ही प्रकाशान्तरकी अपेक्षा नहीं करता उसी प्रकार जिसे सर्वदा अपने आत्मामें क्षान्ति-बोधकर्त्तव्यताकी निरपेक्षता रहती है वह अमृतत्व-अमृतभाव अर्थात् मोक्षके लिये समर्थ होता है ॥९२॥
तथा नापि शान्तिकर्त्तव्यतात्मनीत्याह—|इसी प्रकार आत्मामें शान्तिकर्त्तव्यता भी नहीं है—इसी आशयसे कहते हैं—
आदिशान्ता ह्यनुत्पन्नाः प्रकृत्यैव सुनिर्वृताः ।
सर्वे धर्माः समाभिन्ना अजं साम्यं विशारदम् ॥ ९३ ॥
सम्पूर्ण आत्मा नित्यशान्त, अजन्मा, स्वभावसे ही अत्यन्त उपरत तथा सम और अभिन्न हैं। [इस प्रकार क्योंकि] आत्मतत्त्व अज, समतारूप और विशुद्ध है [इसलिये उसकी शान्ति अथवा मोक्ष कर्तव्य नहीं है] ॥९३॥
| शां०भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | २६३ |
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| यस्मादादिशान्ता नित्यमेव शान्ता अनुत्पन्ना अजाश्च प्रकृत्यैव सुनिर्वृताः सुष्टूपरतस्वभावा इत्यर्थः, सर्वे धर्माः समाश्चाभिन्नाश्च समाभिन्नाः, अजं साम्यं विशारदं विशुद्धमात्मतत्त्वं यस्मात्तस्माच्छान्तिर्मोक्षो वा नास्ति कर्तव्य इत्यर्थः, न हि नित्यैकस्वभावस्य कृतं किंचिदर्थवत्स्यात् ॥ ९३ ॥ | क्योंकि सम्पूर्ण धर्म आदिशान्त-सर्वदा ही शान्तस्वरूप, अनुत्पन्न-अजन्मा, स्वभावसे ही सुनिर्वृत अर्थात् अत्यन्त उपरत स्वभाववाले हैं; तथा सम और अभिन्न हैं; इस प्रकार, क्योंकि आत्मतत्त्व अजन्मा, समतारूप और विशुद्ध है इसलिये उसकी शान्ति अथवा मोक्ष कर्तव्य नहीं है—यह इसका अभिप्राय है, क्योंकि उस नित्य एकस्वभावके लिये कुछ भी करना सार्थक नहीं हो सकता ॥ ९३ ॥ |
आत्मज्ञ ही अकृपण हैं
| ये यथोक्तं परमार्थतत्त्वं प्रतिपन्नास्ते एवाकृपणा लोके कृपणा एवान्य इत्याह— | जो लोग उपर्युक्त परमार्थतत्त्वको समझते हैं लोकमें वे ही अकृपण हैं, उनके सिवा और सब तो कृपण ही हैं—इसी भावको लेकर कहते हैं— |
वैशारद्यं तु वै नास्ति भेदे विचरतां सदा ।
भेदनिम्नाः पृथग्वादास्तस्मात्ते कृपणाः स्मृताः ॥ ९४ ॥
जो लोग सर्वदा भेदमें ही विचरते रहते हैं, निश्चय ही उनकी विशुद्धि नहीं होती । द्वैतवादी लोग भेदकी ही ओर प्रवृत्त होनेवाले हैं; इसलिये वे कृपण ( दीन ) माने गये हैं ॥९४॥
२६४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| यस्माद्भेदनिष्ठा भेदानुयायिनः संसारानुगा इत्यर्थः, के? पृथग्वादाः पृथङ्नाना वस्तुत्वत्येवं वदनं येषां ते पृथग्वादा द्वैतिन इत्यर्थः, तस्मात्ते कृपणाः क्षुद्राः स्मृताः; यस्माद्वैशारद्यं विशुद्धिर्नास्ति तेषां भेदे विचरतां द्वैतमार्गेऽविद्याकल्पिते सर्वदा वर्तमानानामित्यर्थः । अतो युक्तमेव तेषां कार्पण्यमित्यभिप्रायः ॥ ९४ ॥ | क्योंकि वे भेदनिष्ठ-भेदानुयायी अर्थात् संसारके अनुगामी हैं, कौन लोग ? पृथक्वादी—'पृथक् अर्थात् नाना वस्तु है'—ऐसा जिनका कथन है वे पृथक्वादी अर्थात् द्वैतीलोग, इसलिये वे कृपण-क्षुद्र माने गये हैं; क्योंकि भेद अर्थात् अविद्यापरिकल्पित द्वैतमार्गमें सर्वदा विचरनेवाले उन लोगोंका वैशारद्य अर्थात् विशुद्धि नहीं होती । अतः उनका कृपण होना ठीक ही है—ऐसा इसका अभिप्राय है ॥ ९४ ॥ |
आत्मज्ञका महाज्ञानित्व
| यदिदं परमार्थतत्त्वममहात्मभिरपण्डितैर्वेदान्तबहिःष्ठैः क्षुद्रैरल्पप्रज्ञैरनवगाह्यमित्याह— | यह जो परमार्थतत्त्व है वह क्षुद्रचित्त अविवेकी तथा वेदान्तके अनधिकारी क्षुद्र और मन्दबुद्धि पुरुषोंकी समझमें नहीं आ सकता—इस आशयसे कहते हैं— |
अजे साम्ये तु ये केचिद्भविष्यन्ति सुनिश्चिताः ।
ते हि लोके महाज्ञानास्तच्च लोको न गाहते ॥ ९५ ॥
जो कोई उस अज और साम्यरूप परमार्थतत्त्वमें अत्यन्त निश्चित होंगे वे ही लोकमें परम ज्ञानी हैं । उस तत्त्वका सामान्य लोक अवगाहन नहीं कर सकता ॥९५॥
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण [ २६५
| अजे साम्ये परमार्थतत्त्व एवमेवेति ये केचित्स्त्र्यादयोऽपि सुनिश्चिता भविष्यन्ति चेत्त एव हि लोके महाज्ञाना निरतिशयतत्त्वविषयज्ञाना इत्यर्थः । | उस अज और साम्यरूप परमार्थतत्त्वमें जो कोई-स्त्री आदि भी 'यह ऐसा ही है' इस प्रकार पूर्णतया निश्चित होंगे वे ही लोकमें महाज्ञानी अर्थात् निरतिशय तत्त्वविषयक ज्ञानवाले हैं । |
| तच्च तेषां वर्त्म तेषां विदितं परमार्थतत्त्वं सामान्यबुद्धिरन्यो लोको न गाहते नावतरति न विषयीकरोतीत्यर्थः । “सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतहितेरतस्य च। देवा अपि मार्गे मुह्यन्त्यपदस्य पदैषिणः। शकुनीनामिवाकाशे गतिर्नैवोपलभ्यते” (महा० शा० २३९ । २३, २४) इत्यादिस्मरणात् ॥ ९५ ॥ | उस-उनके मार्ग अर्थात् उन्हें विदित हुए परमार्थतत्त्वमें अन्य साधारण बुद्धिवाला मनुष्य अवगाहन—अवतरण नहीं करता अर्थात् उसे विषय नहीं कर सकता । “जो सम्पूर्ण भूतोंका आत्मभूत और सब प्राणियोंका हितकारी है उस पदरहित (प्राप्य पुरुषार्थहीन) महात्माके पदको जाननेकी इच्छावाले देवता भी उसके मार्गमें मोहको प्राप्त हो जाते हैं तथा आकाशमें जैसे पक्षियोंका मार्ग नहीं मिलता उसी प्रकार उसकी गतिका पता नहीं चलता” इत्यादि स्मृतिसे भी यही प्रमाणित होता है ॥९५॥ |
| कथं महाज्ञानत्वमित्याह— | उनका महाज्ञानित्व किस प्रकार है ? सो बतलाते हैं— |
अजेष्वजमसंक्रान्तं धर्मेषु ज्ञानमिष्यते ।
यतो न क्रमते ज्ञानमसङ्गं तेन कीर्तितम् ॥ ९६ ॥
अजन्मा आत्माओंमें स्थित अज (नित्य) ज्ञान असंक्रान्त (अन्य विषयोंसे न मिलनेवाला) माना जाता है। क्योंकि वह ज्ञान अन्य विषयोंमें संक्रमित नहीं होता इसलिये उसे असंग बतलाया गया है ॥९६॥
| २६६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| अजेष्वनुत्पन्नेष्वचलेषु धर्मे- <br> ष्वात्मस्वजमचलं च ज्ञानमिष्यते <br> सवितरीवौष्ण्यं प्रकाशश्च यतस्त- <br> स्मादसंक्रान्तमर्थान्तरे ज्ञानमज- <br> मिष्यते । यस्मान्न क्रमतेऽर्थान्तरे <br> ज्ञानं तेन कारणेनासङ्गं तत्कीर्ति- <br> तमाकाशकल्पमित्युक्तम् ॥९६॥ | क्योंकि अज-अनुत्पन्न यानी अचल धर्मों-आत्माओंमें सूर्यमें उष्णता और प्रकाशके समान अज अर्थात् अचल ज्ञान माना जाता है अतः अर्थान्तरमें असंक्रान्त (अननुप्रविष्ट) ज्ञानको अजन्मा (नित्य) स्वीकार किया जाता है । क्योंकि वह ज्ञान दूसरे विषयोंमें संक्रमित नहीं होता इसलिये उसे असंग कहा गया है; अर्थात् वह आकाशके समान है-ऐसा कहा है ॥९६॥ |
जातवादमें दोषप्रदर्शन
अणुमात्रेऽपि वैधर्म्ये जायमानेऽविपश्चितः ।
असङ्गता सदा नास्ति किमुतावरणच्युतिः ॥ ९७ ॥
[ अन्य वादियोंके मतानुसार ] किसी अणुमात्र भी विधर्मी वस्तुकी उत्पत्ति माननेपर तो अविवेकी पुरुषकी असंगता भी कभी नहीं हो सकती; फिर उसके आवरणनाशके विषयमें तो कहना ही क्या है ? ॥९७॥
| इतोऽन्येषां वादिनामणुमात्रे- <br> ऽपि वैधर्म्ये वस्तुनि बहिरन्तर्वा <br> जायमान उत्पाद्यमानेऽविपश्चि- <br> तोऽविवेकिनोऽसङ्गता असङ्गत्वं <br> सदा नास्ति किमुत वक्तव्यमावर- <br> णच्युतिर्बन्धननाशो नास्तीति।९७। | इससे भिन्न जो अन्य वादी हैं उनके मतानुसार अणुमात्र अर्थात् थोड़ी-सी भी विधर्मी वस्तुके बाहर या भीतर उत्पन्न होनेपर तो अविपश्चित्-अविवेकी पुरुषकी कभी असङ्गता भी नहीं हो सकती फिर उसकी आवरणच्युति अर्थात् बन्धनाश नहीं होता-इसके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ? ॥९७॥ |
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २६७
आत्माका स्वाभाविक स्वरूप
| तेषामावरणच्युतिर्नास्तीति ब्रुवतां स्वसिद्धान्तेऽभ्युपगतं तर्हि धर्माणामावरणम् । नेत्युच्यते । | उनकी आवरणच्युति नहीं होती—ऐसा कहकर तो तुमने अपने सिद्धान्तमें भी आत्माओंका आवरण स्वीकार कर लिया [–ऐसा यदि कोई कहे तो] इसपर हमारा कहना है—नहीं, |
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अलब्धावरणाः सर्वे धर्माः प्रकृतिनिर्मलाः ।
आदौ बुद्धास्तथा मुक्ता बुध्यन्त इति नायकाः ॥ ९८ ॥
समस्त आत्मा आवरणशून्य, स्वभावसे ही निर्मल तथा नित्य बुद्ध और मुक्त हैं । तथापि स्वामीलोग (वेदान्ताचार्यगण) 'वे जाने जाते हैं' ऐसा [उनके विषयमें कहते हैं] ॥९८॥
| अलब्धावरणाः—अलब्धम्-प्राप्तमावरणमविद्यादिबन्धनं येषां ते धर्मा अलब्धावरणा बन्धनरहिता इत्यर्थः, प्रकृतिनिर्मलाः स्वभावशुद्धा आदौ बुद्धास्तथा मुक्ता यस्मान्नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावाः । <br><br> यद्येवं कथं तर्हि बुध्यन्त इत्युच्यते ? <br><br> नायकाः स्वामिनः समर्था बोद्धुं बोधशक्तिमत्स्वभावा | 'अलब्धावरणाः'—जिन्हें आवरण अर्थात् अविद्यादिरूप बन्धन लाभ अर्थात् प्राप्त नहीं हुआ है वे धर्म अलब्धावरण अर्थात् बन्धनरहित, प्रकृति-निर्मल-स्वभावसे ही शुद्ध और आरम्भमें ही बोधको प्राप्त हुए तथा मुक्तस्वरूप हैं, क्योंकि वे नित्य शुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव हैं । <br><br> शंका—यदि ऐसी बात है तो उनके विषयमें 'वे जाने जाते हैं' ऐसा क्यों कहा जाता है ? <br><br> समाधान—नायक—स्वामी लोग—जाननेमें समर्थ अर्थात् बोधशक्ति- |
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२६८ [ गौ० का०
इत्यादि... लोग उनके विषयमें उस प्रकार ऐसा कहते हैं जैसे कि नित्य प्रकाशस्वरूप होनेपर भी सूर्यके विषयमें 'सूर्य प्रकाशमान है' ऐसा कहा जाता है तथा सर्वदा गतिशून्य होनेपर भी 'पर्वत खड़े हैं' ऐसा कहा जाता है ॥ ९८ ॥
इत्यर्थः, यथा स्वरूपोऽपि सन् प्रकाशत इत्युच्यते यथा वा नित्यनिवृत्तगतयोऽपि नित्यमेव शैलास्तिष्ठन्तीत्युच्यते तद्वत् ॥ ९८ ॥
अजातवाद बौद्धदर्शन नहीं है
क्रमते न हि बुद्धस्य ज्ञानं धर्मेषु तायिनः ।
सर्वे धर्मास्तथा ज्ञानं नैतद्बुद्धेन भाषितम् ॥ ९९ ॥
अखण्ड प्रज्ञानवान् परमार्थदर्शीका ज्ञान धर्मों (विषयों) में संक्रमित नहीं होता और न [उसके मतमें] सम्पूर्ण धर्म (आत्मा) ही कहीं जाते हैं । परन्तु ऐसा ज्ञान बुद्धदेवने नहीं कहा [अर्थात् यह बौद्ध सिद्धान्त नहीं है, बल्कि औपनिषद दर्शन है] ॥ ९९ ॥
| यस्मान्न हि क्रमते बुद्धस्य परमार्थदर्शिनो ज्ञानं विषयान्तरेषु धर्मेषु धर्मसंस्थं सवितरीव प्रभा, तायिनः तायोऽस्यास्तीति तायी, संतानवतो निरन्तरस्याकाशकल्पस्येत्यर्थः, पूजावतो वा प्रज्ञावतो वा, सर्वे धर्मा आत्मानोऽपि तथा ज्ञानंवदेवाकाशकल्पत्वान्न क्रमन्ते क्वचिदप्यर्थान्तर इत्यर्थः । | तायी-जिसका ताय यानी (विस्तार) हो उसे तायी कहते हैं। क्योंकि तायी-सन्तानवान्-निरन्तर अर्थात् आकाशसदृश पूजावान् अथवा प्रज्ञावान् बुद्ध-परमार्थदर्शीका ज्ञान धर्मोंमें-विषयान्तरोंमें संक्रमित नहीं होता अपितु सूर्यमें प्रकाशकी भाँति आत्मनिष्ठ रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण धर्म अर्थात् आत्मा भी ज्ञानके समान ही आकाशसदृश होनेके कारण कभी अर्थान्तरमें संक्रमित नहीं होते अर्थात् नहीं जाते। |
| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | २६९ |
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| यदादावुपन्यस्तं ज्ञानेनाका-<br>शकल्पेनेत्यादि तदिदमाकाश-<br>कल्पस्य तायिनो बुद्धस्य तदनन्य-<br>त्वादाकाशकल्पं ज्ञानं न क्रमते<br>क्वचिदप्यर्थान्तरे । तथा धर्मा<br>इति । आकाशमिवाचलमविक्रियं<br>निरवयवं नित्यमद्वितीयमसङ्ग-<br>मदृश्यमग्राह्यमशनायाद्यतीतं ब्र-<br>ह्मात्मतत्त्वम् । “न हि द्रष्टुर्दृष्टे-<br>र्विपरिलोपो विद्यते” (बृ० उ०<br>४ । ३ । २३) इति श्रुतेः ।<br>ज्ञानज्ञेयज्ञातृभेदरहितं पर-<br>मार्थतत्त्वमद्वयम् एतन्न बुद्धेन<br>भाषितम् । यद्यपि बाह्यार्थनिरा-<br>करणं ज्ञानमात्रकल्पना चाद्वय-<br>वस्तुसामीप्यमुक्तम् । इदं तु<br>परमार्थतत्त्वमद्वैतं वेदान्तेष्वेव<br>विज्ञेयमित्यर्थः ॥ ९९ ॥ | ˙इस प्रकरणके आरम्भमें जिसका<br>‘ज्ञानेनाकाशकल्पेन’ इत्यादि<br>श्लोकद्वारा उपन्यास किया गया है,<br>आकाशसदृश निरन्तर बोधवान्का—<br>उससे अभिन्न होनेके कारण—वही<br>यह आकाशसदृश ज्ञान कभी<br>अर्थान्तरमें संक्रमित नहीं होता;<br>और ऐसे ही धर्म भी हैं अर्थात् वे<br>भी आकाशके समान अचल,<br>अविक्रिय, निरवयव, नित्य,<br>अद्वितीय, असंग, अदृश्य, अग्राह्य<br>और क्षुधा-पिपासादिसे रहित ब्रह्मा-<br>त्मतत्त्व ही हैं; जैसा कि “द्रष्टाकी<br>दृष्टिका लोप नहीं होता” इस श्रुति-<br>से सिद्ध होता है ।<br>ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाताके भेदसे<br>रहित इस अद्वय परमार्थतत्त्वका<br>बुद्धने निरूपण नहीं किया; यद्यपि<br>उसने बाह्यवस्तुका निराकरण और<br>केवल ज्ञानकी ही कल्पना—ये अद्वय<br>वस्तुके समीपवर्ती ही विषय कहे हैं;<br>तात्पर्य यह है कि इस अद्वैत<br>परमार्थतत्त्वको तो वेदान्तका ही<br>विषय जानना चाहिये ॥ ९९ ॥ |
२७० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
परमार्थपद-वन्दना
| शास्त्रसमाप्तौ परमार्थतत्त्व-स्तुत्यर्थं नमस्कार उच्यते— | अब शास्त्रकी समाप्ति होनेपर परमार्थतत्त्वकी स्तुतिके लिये नमस्कार कहा जाता है— |
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दुर्दर्शमतिगम्भीरमजं साम्यं विशारदम् ।
बुद्ध्वा पदमनानात्वं नमस्कुर्मो यथाबलम् ॥१००॥
दुर्दर्श, अत्यन्त गम्भीर, अज, निर्विशेष और विशुद्ध पदको भेदरहित जानकर हम उसे यथाशक्ति नमस्कार करते हैं ॥१००॥
| दुर्दर्शं दुःखेन दर्शनमस्येति दुर्दर्शम्, अस्ति नास्तीति चतुष्कोटिवर्जितत्वादुर्विज्ञेयमित्यर्थः । अत एवातिगम्भीरं दुष्प्रवेशं महासमुद्रवदकृतप्रज्ञैः, अजं साम्यं विशारदम्, ईदृशंपदमनानात्वं नानात्ववर्जितं बुद्ध्वावगम्य तद्भूताः सन्तो नमस्कुर्मस्तस्मै पदाय, अव्यवहार्यमपि व्यवहारगोचरतापाद्य यथाबलं यथाशक्तीत्यर्थः ॥ १०० ॥ | जिसका कठिनतासे दर्शन हो सकता है ऐसे दुर्दर्श अर्थात् अस्ति-नास्ति आदि चारों कोटियोंसे रहित होनेके कारण दुर्विज्ञेय, अतएव अति गम्भीर—मन्दबुद्धियोंके लिये महासमुद्रके समान दुष्प्रवेश्य तथा अजन्मा, साम्यरूप (निर्विशेष) और विशुद्ध—ऐसे पदको भेदरहित जानकर तद्रूप हो और उस अव्यवहार्य-पदको भी व्यवहारका विषय बनाकर हम उसको यथाबल–यथाशक्ति नमस्कार करते हैं ॥१००॥ |
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भाष्यकारकर्तृक वन्दना
अजमपि जनियोगं प्रापदैश्वर्ययोगा-
द्गति च गतिमत्तां प्रापदेकं ह्यनेकम् ।
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २७१
विविधविषयधर्मग्राहिसुग्धेक्षणानां
प्रणतभयविहन्तृ ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ॥ १ ॥
जिसने अजन्मा होकर भी अपनी ईश्वरीयशक्तिके योगसे जन्म ग्रहण किया, गतिशून्य होनेपर भी गति स्वीकारकी तथा जो नाना प्रकारके विषयरूप धर्मोंको ग्रहण करनेवाले मूढदृष्टि लोगोंके विचारसे एक होकर भी अनेक हुआ है और जो शरणागतभयहारी है उस ब्रह्मको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
प्रज्ञावैशारद्यवेधक्षुभितजलनिधेर्वेदनाम्नोऽन्तरस्थं
भूतान्यालोक्य मग्नान्यविरतजननग्राहघोरे समुद्रे।
कारुण्यादुद्दधारामृतमिदममरैर्दुर्लभं भूतहेतो-
र्यस्तं पूज्याभिपूज्यं परमगुरुममुं पादपातैर्नतोऽस्मि ॥२॥
जो निरन्तर जन्म-जन्मान्तररूप ग्राहोंके कारण अत्यन्त भयानक है ऐसे संसारसागरमें जीवोंको डूबे हुए देखकर जिन्होंने करुणावश अपनी विशुद्ध बुद्धिरूप मन्थनदण्डके आघातसे क्षुभित हुए वेद नामक महासमुद्रके भीतर स्थित इस देवदुर्लभ अमृतको प्राणियोंके कल्याणके लिये निकाला है, उन पूजनीयोंके भी पूजनीय परम गुरु (श्रीगौडपादाचार्य) को मैं उनके चरणोंमें गिरकर प्रणाम करता हूँ ॥२॥
यत्प्रज्ञालोकभासा प्रतिहतिमगमत्स्वान्तमोहान्धकारो
मज्जन्मज्जच्च घोरे ह्यसकृदुपजनोदन्वति त्रासने मे।
यत्पादावाश्रितानां श्रुतिशमविनयप्राप्तिरग्र्या ह्यमोघा
तत्पादौ पावनीयौ भवभयविनुदौ सर्वभावैर्नमस्ये ॥३॥
जिनके ज्ञानालोककी प्रभासे मेरे अन्तःकरणका मोहरूप अन्धकार नाशको प्राप्त हुआ तथा इस भयङ्कर संसारसागरमें वारम्वार
२७२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
डूबना-उछलनारूप मेरी व्यथाएँ शान्त हो गयीं और जिनके चरणोंका आश्रय लेनेवालोंके लिये श्रुतिज्ञान, उपशम और विनयकी प्राप्ति अमोघ एवं पहले ही होनेवाली है उन ( श्रीगुरुदेवके ) भवभयहारी परम पवित्र चरण-युगलोंको मैं सर्वतोभावसे नमस्कार करता हूँ ॥३॥
इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य शङ्करभगवतः कृतौ गौडपादीयागमशास्त्रविवरणेऽलातशान्त्याख्यं चतुर्थ प्रकरणम् ॥ ४ ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
ॐ
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा ँ सस्तनूभि-
र्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
श्रीहरिः
गौडपादीयकारिकानुक्रमणिका
| कारिकाप्रतीकानि | प्रकरणाङ्कः | कारिकाङ्कः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| अकल्पकमजं ज्ञानम् | ३ | ३३ | १५७ |
| अकारो नयते विश्वम् | १ | २३ | ६० |
| अजः कल्पितसंवृत्या | ४ | ७४ | २४४ |
| अजमनिद्रमस्वप्नम् | ३ | ३६ | १६१ |
| अजमनिद्रमस्वप्नम् | ४ | ८१ | २५० |
| अजातं जायते यस्मात् | ४ | २९ | २१० |
| अजातस्यैव धर्मस्य | ४ | ६ | १८४ |
| अजातस्यैव भावस्य | ३ | २० | १४१ |
| अजातेस्त्रसतां तेषाम् | ४ | ४२ | २२१ |
| अजाद्वै जायते यस्य | ४ | १३ | १९० |
| अजेष्वजमसंक्रान्तम् | ४ | ९६ | २६५ |
| अजे साम्ये तु ये केचित् | ४ | ९५ | २६४ |
| अणुमात्रेऽपि वैधर्म्ये | ४ | ९७ | २६६ |
| अतो वक्ष्याम्यकार्पण्यम् | ३ | २ | ११० |
| अदीर्घत्वाच्च कालस्य | २ | २ | ६९ |
| अद्वयं च द्वयाभासम् | ३ | ३० | १५४ |
| अद्वयं च द्वयाभासम् | ४ | ६२ | २३७ |
| अद्वैतं परमार्थो हि | ३ | १८ | १३८ |
| अनादिमायया सुप्तः | १ | १६ | ४८ |
| अनादेरन्तवत्त्वं च | ४ | ३० | २११ |
| अनिमित्तस्य चित्तस्य | ४ | ७७ | २४७ |
| अनिश्चिता यथा रज्जुः | २ | १७ | ८४ |
| अन्तःस्थानात्तु भेदानाम् | २ | ४ | ७१ |
| अन्यथा गृहतः स्वप्नः | १ | १५ | ४७ |
| अपूर्वं स्थानिधर्मो हि | २ | ८ | ७५ |
| अभावश्च रथादीनाम् | २ | ३ | ७० |
[ २ ]
| कारिकाप्रतीकानि | प्रकरणाङ्कः | कारिकाङ्कः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| अभूताभिनिवेशाद्धि | ४ | ७९ | २४८ |
| अभूताभिनिवेशोऽस्ति | ४ | ७५ | २४५ |
| अमात्रोऽनन्तमात्रश्च | १ | २९ | ६५ |
| अन्वग्धावरणाः सर्वे | ४ | ९८ | २६७ |
| अलाते स्पन्दमाने वै | ४ | ४९ | २२७ |
| अवस्त्वनुपलम्भं च | ४ | ८८ | २५७ |
| अव्यक्ता एव येऽन्तस्तु | २ | १५ | ८२ |
| अशक्तिरपरिज्ञानम् | ४ | १९ | १९४ |
| असज्जागरिते दृष्ट्वा | ४ | ३९ | २१७ |
| असतो मायया जन्म | ३ | २८ | १५३ |
| अस्ति नास्त्यस्ति नास्तीति | ४ | ८३ | २५१ |
| अस्पन्दमानमलातम् | ४ | ४८ | २२६ |
| अस्पर्शयोगो वै नाम | ३ | ३९ | १६७ |
| अस्पर्शयोगो वै नाम | ४ | २ | १८० |
| आत्मसत्यानुबोधेन | ३ | ३२ | १५६ |
| आत्मा ह्याकाशवज्जीवैः | ३ | ३ | ११२ |
| आदावन्ते च यन्नास्ति | ४ | ३१ | २१२ |
| आदावन्ते च यन्नास्ति | २ | ६ | ७२ |
| आदिबुद्धाः प्रकृत्यैव | ४ | ९२ | २६१ |
| आदिशान्ता ह्यनुत्पन्नाः | ४ | ९३ | २६२ |
| आश्रमास्त्रिविधा हीन० | ३ | १६ | १३५ |
| इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिः | १ | ८ | ३१ |
| उत्पादस्याप्रसिद्धत्वात् | ४ | ३८ | २१६ |
| उत्सेक उदधेर्यद्वत् | ३ | ४१ | १६९ |
| उपलम्भात्समाचारात् | ४ | ४२ | २२० |
| उपलम्भात्समाचारात् | ४ | ४४ | २२३ |
| उपायेन निगृह्णीयात् | ३ | ४२ | १७० |
| उपासनाश्रितो धर्मः | ३ | १ | १०८ |
| उभयोरपि वैतथ्यम् | २ | ११ | ७८ |
| उभे ह्यन्योन्यदृश्ये ते | ४ | ६७ | २३९ |
| ऋजुवक्रादिकाभासम् | ४ | ४७ | २२६ |
| एतैरेषोऽपृथग्भावैः | २ | ३० | ९१ |
| एवं न चित्तजा धर्माः | ४ | ५४ | २३० |
[ ३ ]
| कारिकाप्रतीकानि | प्रकरणाङ्कः | कारिकाङ्कः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| एवं न जायते चित्तम् | ४ | ४६ | २२५ |
| ओङ्कारं पादशो विद्यात् | १ | २८ | ६२ |
| कल्पयत्यात्मनात्मानम् | २ | १२ | ७९ |
| कारणं यस्य वै कार्यम् | ४ | ११ | १८८ |
| कारणाद्यद्यनन्यत्वम् | ४ | १२ | १८९ |
| कार्यकारणबद्धौ तौ | १ | ११ | ४३ |
| काल इति कालविदः | २ | २४ | ८८ |
| कोट्यश्चतस्र एतास्तु | ४ | ८४ | २५३ |
| क्रमते न हि बुद्धस्य | ४ | ९९ | २६८ |
| ख्याप्यमानामजातिं तैः | ४ | ५ | १८३ |
| ग्रहणाज्जागरितवत् | ४ | ३७ | २१५ |
| ग्रहो न तत्र नोत्सर्गः | ३ | ३८ | १६५ |
| घटादिषु प्रलीनेषु | ३ | ४ | ११३ |
| चरञ्जागरिते जाग्रत् | ४ | ६५ | २३८ |
| चित्तं न संस्पृशत्यर्थम् | ४ | २६ | २०६ |
| चित्तकाला हि येऽन्तस्तु | २ | १४ | ८१ |
| चित्तस्पन्दितमेवेदम् | ४ | ७२ | २४२ |
| जरामरणनिर्मुक्ताः | ४ | १० | १८५ |
| जाग्रच्चित्तेक्षणीयास्ते | ४ | ६६ | २३८ |
| जाग्रद्वृत्तावपि त्वन्तः | २ | १० | ७७ |
| जात्याभासं चलाभासम् | ४ | ४५ | २२४ |
| जीवं कल्पयते पूर्वम् | २ | १६ | ८३ |
| जीवात्मनोः पृथक्त्वं यत् | ३ | १४ | १२८ |
| जीवात्मनोरनन्यत्वम् | ३ | १३ | १२७ |
| ज्ञाने च त्रिविधे ज्ञेये | ४ | ८९ | २५८ |
| ज्ञानेनाकाशकल्पेन | ४ | १ | १७८ |
| तत्त्वमाध्यात्मिकं दृष्ट्वा | २ | ३८ | १०६ |
| तस्मादेवं विदित्वैनम् | २ | ३६ | १०४ |
| तस्मान्न जायते चित्तम् | ४ | २८ | २०८ |
| तैजसस्योत्वविज्ञाने | १ | २० | ५८ |
| त्रिषु धामसु यत्तुल्यम् | १ | २२ | ५९ |