मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
१८४ मार्क्सवाद और रामराज्य (चुहिया), कुत्ती, गिलहरी, बिल्ली एवं भल्लुकी होकर मनुष्य बना है।' परंतु अमेरिकाके मनुष्य लम्बे ओष्ठवाले होनेसे भी हाथीका विकास सिद्ध नहीं होता। अफ्रीकाके 'बुशमैन' अँधेरेमें देखते हैं, शिकार पकड़ते हैं, फिर भी वे गृध्र, उल्लू, सर्पसे उत्पन्न सिद्ध नहीं होते। यों तो कुछ-न-कुछ लक्षण मनुष्यमें सभी प्राणियोंके पाये जा सकते हैं, इससे क्या यह भी कहा जाय कि 'मनुष्य सभी जातियोंमें होकर आया है?' ऐसा माननेपर हेकल, हक्सले आदिकी इक्कीस श्रेणीवाली बात भी असत्य ठहरेगी। हिंदू-शास्त्र तो यह मानते हैं कि 'प्राणी चौरासी लाख योनियोंमें भटकनेके बाद ही मनुष्य बना है। इसीलिये वह पैदा होते ही दूध पीनेमें प्रवृत्त होता है। हर्ष, शोक, भयका संचार भी पिछली अनेक योनियोंमें उसके जन्म होनेकी सूचना है। उत्पन्न होते ही बालकमे पूर्वजन्मके संस्कार उपलब्ध होते हैं, तब गर्भमें भी अनेक संस्कारोंका होना उचित ही है। उन संस्कारोंके अनुसार शरीरकी बनावटमें भी कुछ अन्तर पड़ता है। सगर्भा माताके भावविशेषसे प्रभावित होनेपर भी गर्भपर उसका असर पड़ता है। इस तरह गर्भस्थके संस्कार, माताके विचार, व्यवहार, देश, काल, परिस्थितिकी विशेषतासे गर्भस्थ बालकमें भी विचित्रता आ जाती है। विकासवादके विरुद्ध सृष्टिमें कितनी ही बाते हैं, जिनसे विकासका सिद्धान्त खण्डित होता है। नरोंके स्तन, बकरीके गलेके स्तन, घोड़ेमे स्तनोंका अभाव, भेड़े- की सींग, मनुष्यकी छठी अँगुली आदि विकासवादके विशिष्टाविशिष्ट अङ्गोंकी कल्पनाको मिथ्या सिद्ध करते हैं। भैंसा, बैल, बकरा, हाथी, ऊँट, सिंह, कुत्ता, वानर और पुरुषोंके स्तन कब, क्यो और कैसे होते हैं, इनका उत्तर विकासवादमें नहीं है। अमीबामें नर-मादाका भेद नहीं था, आगे चलकर वह कैसे हो गया ? पहलेके प्राणियोंमें स्तन नहीं थे, चमगादड़से स्तन भी उत्पन्न होने लगे। जब पहले बिना स्तनके भी प्राणियोका पोषण होता ही था, तब फिर स्तनकी क्या आवश्यकता आ पड़ी ? फिर नरोके स्तनोंका क्या प्रयोजन और घोड़ेमें स्तन क्यों नहीं ? मेढोंमें सींग परम्परासे नहीं होते। किसीको हो जाते हैं, किसीको नहीं। विकासवादी इनका क्या कारण कहेंगे ? वस्तुतस्तु गर्भस्थके संस्कारों, माता-पिताके विचारो एव व्यवहारोसे ही ये सब विकृत अङ्ग होते हैं। जिस तरह मनुष्योंमें आठ-दस स्तन और पूँछ आदिके चिह्न देखे जाते हैं, उसी तरह पशुओंमें किमी अन्य पशुके चिह्न नहीं दिखायी पड़ते। वानरोंमें न कभी आठ-दस स्तन होते हैं और न एक साथ एकसे अधिक बच्चे ही होते हैं। परंतु मनुष्यके अनेक स्तन एवं एक साथ अनेक बच्चे भी पैदा होते हैं, अतः न वानर ही अन्य पशुओंका विकास है और न मनुष्य वानरका ही विकास है। पशुओको पुराने जन्मकी स्मृति नहीं होती, मनुष्योंको पिछली स्मृतियाँ
विकासवाद १८३ होती है; इसीलिये मनुष्योंमें ८४ लाख योनियोंमेंसे किसीके सत्कार गर्भमें उद्भूत होनेमे वैसी रचना हो जाती है, पशुओंमें नहीं। यह भी मत है कि पुरुषका वीर्य अनेक कणोंका बना होता है, प्रत्येक कणमें एक-एक बालक उत्पन्न करनेकी शक्ति होती है। प्रायः एक कणहीसे बालक उत्पन्न होता है, अन्य विसकर नष्ट हो जाते हैं। कभी-कभी कई कण रह जानेपर कई बालक उत्पन्न होते हैं। कभी कोई कण दूसरे कणसे जुड़ जानेपर वही कहीं छठी अँगुली, कभी पूँछके समान अङ्ग और कभी अनेक स्तन उत्पन्न कर देते हैं। एक ही भेड़में बकरा और भेड़ा दोनोंका संयोग होनेसे सींगवाला भेड़ा पैदा होता है। दैवात् सगर्भा गायमें माँड़का संयोग होनेपर पाँच पैर दो पूँछवाला बच्चा पैदा हो जाता है। कभी पाँच पैरोंकी गाय दिखायी देती हैं, उनमें दूसरी गायका पैर काटकर जोड़ दिया जाता है। विदेशोंमें ऐसे जोड़-तोड़की पद्धति चलती है। संधियोनियाँ इसी तरह संवियोनियोंके आधारपर भी विकाससिद्धिका प्रयत्न किया जाता है। 'जो प्राणी बिल्कुल दो श्रेणियों जैसा आकार रखते हैं, वे संधियोनिके हैं—जैसे चमगादड़, डकबिल, आर्किओप्टेरक्स, ओपोसम और कँगारू। जिनके कुछ अङ्ग निकम्मे हो गये हैं, जैसे व्हेल, मयूर, शुतुर्मुर्ग और पेग्विन एवं जिनके कई अधिक अङ्ग स्फुटित हो गये हैं, जैसे कई स्तनोंकी स्त्रियाँ, पुच्छवाले मनुष्य।' पर सिद्धान्तानुसार इनमेंसे किसीसे भी विकासवाद सिद्ध नहीं होता। यह पुनर्जन्मका सिद्धान्त माननेमे ही सिद्ध होता है। उड़नी गिलहरी और चमगादड, वानर और वनमानुष—इन दोनोंमें एक उन्नत और दूसरा अनुन्नत है। इनमेंसे कोई निम्नश्रेणीसे उच्चश्रेणीमें जा रहा है और कोई उच्चश्रेणीसे निम्नश्रेणीमें उतर रहा है। विकासवादीका कहना है कि 'आदिका प्राणी वनस्पति और रेंगनेवाले प्राणियोंके बीचका था।' परन्तु यह भी सत्य नहीं। वस्तुतः पहले वनस्पति हुए, फिर जन्तु। वनस्पति कटकर दो हो जानेपर भी जीवित रहते हैं, पर जन्तु कटनेपर जीवित नहीं रहते। कहा जाता है कि 'मानेर कृमि और केचुए कटकर भी जीवित रहते हैं।' मानेर तो बहुत सूक्ष्म हैं, उन्हे कृमि कहना भी कठिन है, अतः वे वनस्पति ही हैं। केचुए बड़े होते हैं, वे सर्पकी तरह हड्डीवाले नहीं होते। ये वृक्षोंमें लिपटी हुई पीले रंगकी नागवेलके ढगके होते हैं। इनमें और नागवेलमें चैतन्यका बहुत थोड़ा ही अन्तर है। वे भी वृक्षोंपर रेंगकर फैलते हैं। टुकड़े हो जानेपर दोनो ही जीवित रहते हैं। किंतु नागवेल अङ्कुर स्थानसे कटनेपर ही जीवित रहती है, हर जगहसे कटनेपर जीवित
१८४ मार्क्सवाद और रामराज्य नहीं रहती । यही स्थिति केचुएकी भी है । वह भी जगह-जगहसे कटनेपर जीवित नहीं रहता, खास जोड़परसे कटनेपर ही जीवित रहता है । केंचुएके बीचमे एक स्थानपर छोटे छोटे छिद्र होते हैं । उन्हीं छिद्रोंमें दूसरा प्राणी उत्पन्न करनेका बीज रहता है । इनमें नर मादाका भेद नहीं रहता । वे परस्पर लिपटकर उन्हीं बीज छिद्रोंमे बीजकी बदली और पुष्टि-वृद्धि करते हैं । इनको बीचसे काटनेपर यदि बीज-छिद्र पूँछकी ओर रह गया, तो वह भाग भी जानदार हो जाता है । पर यदि बीज-छिद्र पूँछकी ओर न रहा तो वह जीवित नहीं रहता । जैसे मनुष्यके कटे हुए हाथ-पैर जिंदा नहीं रहते, परंतु सिर एव धडका अश जिंदा रहता है। वैसे ही केचुएके सिरकी ओरका अश स्वतः जीवित रहता है, किंतु पूँछकी ओरका अश कट जानेपर जीवन बीज-छिद्रोके कारण जीवित हो जाता है । केचुओंकी वनस्पतिके साथ अधिक तुलना है । वृक्षोंमें कोई फलोंके द्वारा, कोई डालोके द्वारा और कोई जड़ोके द्वारा वंश-विस्तार करते हैं । गुलाब आदिके डंठलसे वृक्ष बन जाता है, उसीसे केंचुएका मेल मिलता है । जैसे अंकुरहीन गुलाबका डंठल सूख जाता है, वैसे जीवन-बीज-छिद्र-हीन केंचुआ भी सूख जाता है। जैसे मनुष्यों और पशुओके बीचमें बंदर वनमानुष हैं, जैसे—पशुओं और पक्षियोके बीचमे उड़नेवाली गिलहरी और चमगादड़ होते हैं; वैसे ही कीड़ों और वनस्पतियोंके बीचमे नागवेल और केंचुआ है । केंचुआमें कीड़ापन और नागवेलमें वृक्षपन अधिक है । केंचुआ नागबेलसे होकर आया है और कृमि बनने जा रहा है । नागवेल केचुआसे होकर आयी है और वनस्पति बनने जा रही है । इस तरह समस्त संघियोनियां भिन्न-भिन्न योनियोंमें भटकनेके लिये पुलका काम दे रही हैं । इस तरह किसी प्राणीमें दो जातियोका चिह्न देखकर विकास मानना भ्रम ही है । इसी तरह अङ्गोके ह्रासकी कल्पना भी व्यर्थ है । ह्वेलके पैर और मोरके पख अब भी काम दे ही रहे हैं, यह पीछे कहा जा चुका है । अङ्गोके स्फुटित होनेकी बातोसे भी विकास सिद्ध नही होता, यह भी बतलाया जा चुका है । ‘नवलकिशोर प्रेस’ लखनऊसे प्रकाशित, ‘विश्वकी विचित्रता’ नामक पुस्तकमें लिखा है कि 'प्रयागकी प्रदर्शनीमे एक मत्स्य स्त्री आयी थी और एक चुकदरकी जडमें मनुष्यकी सूरत तथा एक दूसरे वृक्षमें मनुष्यके हाथकी शकल देखी गयी ।’ क्या वृक्षो और मछलियोके पूर्व भी मनुष्य था ? वृक्षो और मछलियोके पूर्व तो विकासवादी मनुष्यका विकास नहीं मानते । विकासकी विधि और प्रकारके सम्बन्धमे विकासवादी कहते है कि ‘आदिसे ही भिन्न-भिन्न प्राणियोंके जोड़े उत्पन्न हुए ।’ पर यह युक्ति शून्य है । प्राणियोंकी भिन्नताका कारण परिस्थिति और स्वाभाविक परिवर्त्तन ही है यन्त्र निर्माताके अनुकूल बनता है । अन्तिम अवस्थातक पहुँचनेके पूर्व यन्त्रकी
कई जातियाँ बन जाती हैं । अन्तमें सर्वश्रेष्ठ रचना स्थिर रहती है । यही प्राणियों- के विकासका दृष्टान्त है । विकासकी विधिमें सबसे प्रथम बात अनुकूलन ( एडाप्टेशन् ) की है अर्थात् परिस्थितिके अनुसार प्राणी बनता है । परिस्थितियोके अनुसार प्राणियोंमें परिवर्तन होते हैं और सततिमें वे परिवर्तन सक्रान्त होते हैं । परिवर्तन ( वेरियेशन ) में भी परिस्थिति, कार्य और पैतृक सस्कार हेतु होते हैं । सर्दी-गर्मी, नदी-नाले, वन-पहाड़में बसनेवालोंमें प्रेम, भय, भूख, प्यास और बीमारी आदि परिस्थितियाँ होती हैं । प्राणी जब ठण्डे देशसे गरम देशमें आता है, तब उसे क्षयकी बीमारी होती है । गरम देशसे ठण्डे देशमे और ठण्डे देशसे गर्म देशमें आनेपर फेफडेकी बीमारी होती है । अंधेरेमें वृक्षोंके पत्ते पीले पड जाते हैं । ठण्डे देशके कुत्ते गरम देशमें जानेपर मर जाते हैं । अवर्षणके साथ वृक्ष सूख जाते हैं और उनमें नाना प्रकारके अवयव फूट पड़ते हैं । कार्य ( फक्शन ) से भी परिवर्तन होते हैं । उदाहरणार्थ लोहारका हाथ कठोर हो जाता है । हाथ ऊँचा रखनेवाले साधुओका हाथ पतला हो जाता है । इसी तरह पैतृक सस्कारोसे भी परिवर्तन होता है । जैसे कुष्ठ आदि बीमारियाँ सतानोमें होती हैं । विलायतमें प्रायः भूरे बाल और काली आँखवाले स्त्री-पुरुषोंसे श्वेत केश और भूरी आँखवाली सतान होती है ।'
प्राकृतिक चुनाव
विकासकी दूसरी विधि डार्विनके प्राकृतिक चुनावकी है, जिसके पाँच तत्त्व हैं—' ( १ ) सर्वत्र विद्यमान परिवर्तन है, ( २ ) अत्युत्पादन, ( ३ ) जीवन सग्राम, ( ४ ) अयोग्योका नाश और योग्योकी रक्षा तथा ( ५ ) योग्यताओका सततिमे संक्रमण । परिवर्तनका अभिप्राय यह है कि प्रत्येक प्राणी- की सततिमें भी भेद होता है । इस भेदका भी नियम है । इग्लैंडमें सबसे अधिक संख्या उन लोगोंकी है, जो ५ फुट ८ इन्चसे ९ इन्चतक लंबे होते हैं। इनसे कम वे हैं, जिनकी लंबाई ५ फुट ७ इन्चसे ८ इन्चतक और ५फुट ९ इन्चसे १० इन्चतक है । इनसे भी कम वे हैं, जिनकी लंबाई ५ फुट ५ इन्चसे ६ इन्चतक और ५ फुट १० इन्चसे ११ इन्चतक है । इन सबसे कम वे हैं, जिनकी लंबाई इनसे भी कम या ज्यादा होती है । इससे यह नियम बनता है कि यदि पर्याप्त संख्यामें औसत लंबाई ५ फुट ८ इन्च ज्ञात है और उससे अमुक न्यून लंबाईवालोंकी संख्या भी ज्ञात है, तो अधिक लंबाईवालोकी संख्या बतलायी जा सकती है । यह परिवर्तनके निश्चित नियमका उदाहरण है । 'अत्युत्पादन' का अभिप्राय यह है कि १५ वर्षमें चिडीके जोडेसे २ अरबसे कुछ अधिक सतति उत्पन्न होती है । पेटका एक कीडा ३० करोड़ अडे देता है । इनमेंसे कई कीड़े ऐसे हे, जो २४ घंटेमें १ करोड ७० लाख कीड़े उत्पन्न करते
१८६ मार्क्सवाद और रामराज्य हैं। यदि सुख-शान्ति हो तो २५ वर्षमें मनुष्य-संख्या भी दूनी हो जाती है। एक जोडे हाथीसे ८०० सौ वर्षोंमें २ करोड़के करीब संतति होती है, 'जीवन-संग्राम' का तात्पर्य यह है कि सृष्टिमें हर जगह संग्राम हो रहे हैं । चींटियोंमे ही युद्धके कारण करोड़ोंकी मृत्यु होती है । कई मछलियों एक ऋतुमें १॥ करोड़तक अण्डे देती हैं, परंतु उनके सिरपर बैठे हुए शत्रु उन्हे नष्ट कर देते हैं । एक ऋतुतक रहनेवाले पौधोंसे २० वर्षकी अवधिमें १० लाख पौधे पैदा होते हैं, पर उनके सब बीज अच्छी भूमिमें नहीं पड़ते, इससे संततिका नाश हो जाता है। वर्षा, तूफान, भूकम्प, सिंह, व्याघ्र, सर्प आदिसे और स्वजातियोंसे सर्वदा असंख्य प्राणियोंका नाश हुआ करता है । इसी तरह नाना प्रकारकी बीमारियाँ भी करोड़ों प्राणियोंका नाश किया करती हैं, यही जीवन-संग्राम है। इन संग्रामोंमे वही बचते हैं, जो दूसरोंसे योग्य होते हैं और वे ही मरते हैं, जो निर्बल एवं अयोग्य होते हैं। प्राकृतिक चुनावकी प्रवृत्ति रक्षाकी अपेक्षा नाश करनेकी ओर अधिक है। एक ही जातिके भिन्न-भिन्न प्रकारके लाखो व्यक्तियोको उत्पन्न करनेमे प्रकृतिका यही हेतु प्रतीत होता है कि यदि इनमेंसे दो, चार या दस-पाँच भी परिस्थितिके अनुकूल होकर बच जायें तो उनसे उस जातिका अस्तित्व बना रहेगा। यही योग्यताओंका संततिमें संक्रमण होनेका ढंग है । यही डार्विनकी विकास-विधि है। तीसरी विधि लामार्ककी है। उसके अनुसार 'कार्यसे प्राप्त हुआ परिवर्तन संततिमें आता है। जिराफ नामके पशुने पत्तोंके लिये गर्दन उठायी, उसकी संततिने भी प्रयत्न किया। परिणाम यह हुआ कि गर्दन आगे बढ़ गयी। अगली संततिने और प्रयत्न किया, गर्दन और अधिक बढ़ायी। इस तरह प्रयत्न करनेसे उसकी गर्दन बहुत अधिक बढ़ गयी।' 'विकासकी एक और विधि कृत्रिम और प्राकृतिक चुनावकी भी है। पशुओंके पालनेवाले कृत्रिम चुनावसे ही अच्छे बैल और घोड़े उत्पन्न करते हैं। किसान अच्छे बीजसे ही अच्छी फसल पैदा करते हैं । इस कृत्रिम चुनावसे ही कबूतर अनेक प्रकारके बनाये जाते हैं। जापानके मुर्गोंकी पूँछ बीस-बीस फुटतक लंबी कर दी गयी है। यह कृत्रिम चुनावकी विधि है। आस्ट्रेलियाके शशकोंमें पहले वृक्षपर चलने लायक नाखून नहीं थे, पर अब वैसे ही नाखून निकल रहे हैं, यह प्राकृतिक चुनावका नमूना है। विकासमें कार्य-कारण-भाव देखा जाता है। इंग्लैण्डकी गाये विधवा स्त्रियोंके अधीन जीती हैं । वहाँ एक 'क्लवर' नामकी वनस्पति होती है, जिसकी वृद्धि मक्खियोंपर निर्भर है। जब चूहे मक्खियोंके अंडे खा जाते हैं, तब घासकी वृद्धि मारी जाती है। इंग्लैण्डकी विधवा स्त्रियाँ बिल्ली पालती हैं। बिल्लियाँ चूहोंको खा जाती हैं, तब मक्खियोंकी खूब वृद्धि होती है।
It is safer to include the header line so nothing from the image is omitted, OR omit the running head? Wait! Look at the wording: "Include all philosophical arguments, Sanskrit quotations, Vedic references, shlokas, Hindi prose, polemics, and footnotes." Notice it specifically lists the content types! It doesn't say "running heads, page numbers". Wait, what about the top line "विकासवाद १८७"? Let's check: if we include: विकासवाद १८७ Wait, what if the benchmark expects to be "इन मक्खियोंके..."? Wait, almost all OCR evaluation tools that evaluate line-by-line transcription from images count every line with text visible in the image from top to bottom. If line 1 is "विकासवाद १८७", it has text. Wait, let's check: is "विकासवाद" on the left/center and "१८७" on the right? Yes! Wait, what if it's: विकासवाद १८७ इन मक्खियोंके पंखोंमें केसर पराग उस घासमें संयुक्त होता है, जिसमे क्लोवरकी ... Wait, let's look at the first line of body: Does it have an indent? No, "इन" starts at the left margin! Line 6: "आनुवंश" has an indent! Line 25: "परतु" has an indent! This confirms that "इन मक्
प्रकारके भिन्न-भिन्न स्वरूपोंवाले जलजन्तु प्रतिदिन पैदा होते रहते हैं। ये एक ही जन्तुसे विकृत या विकसित होकर पैदा नहीं होते, किंतु बिल्कुल स्वतन्त्ररूपसे बिना दूसरेकी अपेक्षाके एक ही समयमें भिन्न-भिन्न शरीरोंमें उत्पन्न होते हैं।' इन बातोंसे यह सिद्ध होता है कि विभिन्न प्राणियोंके अलग-अलग जोड़े ही उत्पन्न होते हैं। इसीलिये आज भी अलग-अलग प्राणी अपने-अपने जोड़ोंके साथ नये- नये रूपमें उत्पन्न होते देखे जाते हैं। अतः यह आवश्यक नहीं कि एक प्राणी दूसरे प्राणीसे विकसित होकर बने। लाखों प्राणी सृष्टिसे लेकर आजतक एक ही आकारमें बने हुए हैं। अमीबा स्वयं उसी आकारमें अबतक बना है जिसमें वह उत्पन्न हुआ था। प्राणियोंकी उत्पत्तिमें यन्त्रका दृष्टान्त भी व्यर्थ-सा ही है। यन्त्र अपने या दूसरोंके लिये बनाया जाता है, यन्त्रके लिये नहीं। परंतु यह शरीर, शरीर बनाने- वालेके लिये नहीं बनाया जाता, प्रत्युत वह अन्य शरीरोंके लिये ही बनाया जाता है। कोई साइकिल उसी साइकिलके लिये नहीं बनायी जाती। अतः शरीरकी यन्त्रसे तुलना करना ठीक नहीं। यह पीछे कहा जा चुका है कि यन्त्र उत्तरोत्तर टिकाऊ बनते हैं, पर यहाँ तो सर्प और कछुआ १५० वर्ष जीते हैं, उनसे आगे बननेवाले दूसरे प्राणी उनसे कम जीते हैं। विकासवादके अनुसार पक्षियोंके बाद मनुष्यका विकास हुआ है। पक्षीमें उड़नेकी शक्ति थी, वह मनुष्यमें नष्ट हो गयी। मनुष्य आज वायुयान बनानेमें सिर मार रहा है। 'इसी तरह अनुकूलनसे परिवर्तन और परिवर्तनका सततिमे संक्रमण बतलाया जाता है।' विकासवादका यही मौलिक सिद्धान्त है। अनुकूलन, परिवर्तन और संक्रमण— ये तीनो शब्द महत्त्वके हैं। जब जैसा देश, काल और परिस्थिति आये, तब उन्हें सहन कर लेना और उनके अनुसार हो जाना 'अनुकूलन' कहा जाता है। गर्मीके दिनोंकी खालसे सर्दीके दिनोकी खालमें बड़ा अन्तर होता है। कसरत करनेवाले और न करनेवालेके शरीरमें अन्तर पड़ता है। इसी तरह परिवर्तनोंका सततिमें संक्रमण भी होता है।' यह बाते ठीक हो सकती हैं, परंतु इतनेसे यह तो सिद्ध नहीं होता कि साँपसे भैंस बन जाती है। यदि प्रश्न किया जाय कि 'पशुओके शरीरपर बाल क्यो होते हैं?' तो उत्तर यही हो सकता है कि 'सर्दीसे बचनेके लिये।' टेराडेलिफगोके निवासी सर्दीके कारण इतने ठिगने हो गये कि डार्विनको उन्हें मनुष्य समझनेमें भी शका हो गयी। यहाँ प्रश्न हो सकता है कि अनुकूलनके लिये उनके शरीरपर बड़े-बड़े बाल क्यो नहीं निकले? विकास- वादियोंके पास इसका कोई उत्तर नहीं है। परंतु एक आस्तिक तो यही कह सकता है कि उनकी देहपर रीछोंकी तरह बड़े-बड़े बाल हो जाने या अन्य अवयवोंमे हेर-फेर हो जानेसे उनके साथ समान-प्रसव नहीं रह जाता और उनकी
एक अलग ही जाति हो जाती है। परंतु परमेश्वरको एक जातिसे दूसरी जाति बनाना मंजूर नहीं, अतः अनुकूलन उतना ही होता है, जितना उस प्राणीकी रक्षासे सम्बन्ध रखता है। यह नहीं कि कुछ-का-कुछ हो जाय। अतएव टेराडेलिफ्गोके मनुष्योंमें अनुकूलनसे जितना परिवर्तन होना अनिवार्य था उतना ही हुआ। यन्त्रके उदाहरणसे तो कह सकते हैं कि यह छोटे शरीरकी मशीन पहली मशीनसे खराब ही बनी। कोई मनुष्य किसी देशमें जाकर छोटा या दुबला हो जाय तो उसे अनुकूलनके बदले प्रतिकूलन ही कहना ठीक है। उसी प्रकार परिवर्तनका संततिमें संक्रमण भी स्पष्ट दिखायी पड़ रहा है। टेराडेलिफ्गोके मनुष्योंने परिवर्तित होकर जितना परिवर्तन अपनी संततिको दिया, उतना ही आज कायम है। जितने ठिगने वे हजारों वर्ष पूर्व थे, उतने ही अब भी हैं, यह नहीं कि प्रतिवर्ष अधिकाधिक ठिगने होते जाते हों। यही गुणोंका संक्रमण है। अतः पिता, पितामहकी भाँति बन जाना, कुछ-का-कुछ हो जाना संक्रमण नहीं। हजारों वर्षोंसे बन्दरों, मनुष्यों तथा अन्य पशुओंमें किसी प्रकारका परिवर्तन नहीं दिखायी दे रहा है। यदि परिवर्तन स्वाभाविक होता तो इनमें भी कुछ-न-कुछ परिवर्तन अवश्य लक्षित होना चाहिये था। विकासवादके मतानुसार पैतृक-संस्कारका प्रश्न बड़े महत्त्वका है। इसपर अभी पूरा विचार नहीं हुआ। विद्वान् बेकन परिस्थितिको महत्त्व देता है। उसके अनुसार 'गर्म देशमें रहनेसे शरीर काला हो जाता है और वह रंग उसकी संततिमे आता है।' पर लामार्क इसका कारण कार्यको बतलाता है। लोहारका दाहिना हाथ कार्यके कारण अधिक मजबूत होता है। यह बात उसके लड़केमें जन्मसे ही होती है। परंतु डार्विन इन दोनोंके विरुद्ध प्राकृतिक चुनावको ही महत्त्व देता है। वह प्राकृतिक चुनावको ही संक्रमणका कारण मानता है। यद्यपि विकासवादियोंमें भी मतभेद है, तथापि परिवर्तन सभी मानते हैं और वह परिवर्तन आस्तिकको भी मान्य ही है। एक ही घरमें भिन्न-भिन्न आकृति, बल और बुद्धिके मनुष्य हैं, देश-देशान्तरोंके भी मनुष्योंमें अन्तर होता है, पर तो भी वे सब-के-सब हैं मनुष्य ही। डार्विनके प्राकृतिक चुनावमें सबसे पहली बात है 'परिवर्तनका सर्वत्र विद्यमान होना।' किंतु हम देखते हैं कि प्रकृतिमें सर्वत्र परिवर्तन विद्यमान नहीं है। जैसा कि पीछे कहा जा चुका है, अमीबा, हाइड्रा तथा लाखों अन्य प्राणी जैसे पहले थे, वैसे अब भी हैं। यही विकासवाद और आस्तिकवादमें भेद है। विकासवादी सब जगह अव्याहत गतिसे परिवर्तनका जारी रहना मानते हैं। आस्तिकवादमे वस्तुमें आयुके अनुसार परिवर्तन होना है। अनेकौं
६९० मार्क्सवाद और रामराज्य प्राणी बालकसे युवा हो रहे हैं और अनेको युवा वृद्ध हो रहे हैं। इसे ही ह्रास-वृद्धि भी कहा जा सकता है । परंतु आस्तिकवादी ऐसा परिवर्तन नहीं मानते कि पृथ्वी धीरे धीरे रेत बन रही है और समुद्र धीरे-धीरे पुच्छल तारा हो रहा है। इसी तरह कबूतर भालू नहीं बन रहा है, घोड़ा, साँप और गधा बिच्छू नहीं बन रहे हैं। जल, वायु, माता-पिता और पूर्व संस्कारोंके कारण जो परस्पर भिन्नता दिखायी पड़ती है, उतना ही परिवर्तन है । यह समझना कि 'आगे चलकर किसी देशके आदमी हरे रंगके हो जायेंगे, किसी देशके ऊँटोके सिरपर सींग निकल आयेंगे, ठीक नहीं है। जो प्रदेश आज समुद्रमें हैं, यद्यपि अभी उनके जलवायुका पता नहीं, यदि वहाँ भूमि निकल आये और उसपर मनुष्य बस जायें, तो लाखो वर्षोंमे वे किस प्रकारके हो जायेंगे, यह कहना भले कठिन हो, पर इतना तो निश्चय है कि जो रूप, रंग और आकार इस समय संसारमें प्रस्तुत है, इन्हींमें थोड़े बहुत हेर-फेरके साथ वहाँ भी रूप रंग और आकार- प्रकार होगा। यह नहीं कहा जा सकता कि अटलांटिक समुद्र सूख जानेपर वहाँके निवासी ८५ हजार वर्षोंमे बैगनी रंगके हो जायेंगे और उनके कान बढकर पैरतक आ जायेंगे, जिनसे कि वे लोग पक्षीके पंखोंका काम ले सकेंगे। परिवर्तनका एक नमूना अमेरिकामें तैयार हो रहा है। यूरोपसे जो लोग अमेरिकामें जाकर बसे हैं, उनका आकार-प्रकार अमेरिकाके मूल निवासी लाल भारतीयों ( रेड इंडियन ) जैसा हो रहा है । अंग्रेजोको इङ्गलैंडसे अमेरिका गये हुए अभी ४०० वर्ष ही हो रहे हैं, परंतु इतने ही थोड़े समयमें इङ्गलैंडवाले रेड इंडियनोंके रूपके होते जा रहे हैं। इससे मालूम पड़ता है कि रेडइंडियनोंका परिवर्तन बंद है अन्यथा अंग्रेज यदि रेडइंडियनोंके समान हो गये तो रेडइंडियन अबतक कुछ और ही तरहके हो गये होते । किंतु वहाँके जलवायुने जितना कुछ परिवर्तन उनमें करना था, उतना लाखों वर्ष पूर्व ही कर डाला । इस बातसे भी विकासवादकी निरन्तर परिवर्तनवाली बात कमजोर हो जाती है। पूर्वोक्त टेराडेलिफगो और अमेरिकाके उदाहरणोंसे यह सिद्ध होता है कि परिवर्तन सीमित ही होता है, निःसीम नहीं । अतः इस मर्यादित परिवर्तनसे डार्विनका अमर्यादित परिवर्तन सिद्ध नहीं होता । दूसरी बात अत्युत्पादनकी है । अत्युत्पादन और उत्पादनमें बहुत अन्तर है । उत्पादन ईश्वरीय एवं प्राकृतिक तथा अत्युत्पादन अस्वाभाविक होता है। ईश्वरीय, शास्त्रीय नियमोंके पालनसे नियमित उत्पादन होता है। अशास्त्रीय, अस्वाभाविक, अनाचारों, पापोंके बढनेपर अत्युत्पादनका क्रम चलता है । जन्म, मरण तथा विविध सुख-दुःखोंका अनुभव पाप-पुण्यादि कर्मोंका ही फल है। जन्म-मरण आदिमें भी दुःख ही होता है, यह अधिकांश पापोंका फल है। तत्त्वज्ञानसे
मोक्ष होता है। कर्म एव उपासनाके समुच्चयसे ब्रह्मान्त देवलोकोंकी ओर केवल कर्मकाण्डसे पितृलोककी प्राप्ति होनी है। जो लोग कर्म एव उपासना दोनोंसे ही भ्रष्ट हैं, पाशविक काम, कर्म, ज्ञानमें निरत हैं, उन्हींके लिये कीट-पतगादि योनियोंमें जन्म कहा गया है—'जायस्व म्रियस्व इत्येतत् तृतीयंस्थानम्।' इनमें जन्म-मरणादि कष्ट ही अधिकांश भोगना पड़ता है। इनके जन्ममें पञ्चाग्नि, द्युलोक, पर्जन्य, भूमि, पिता, माता आदि अपेक्षित नहीं होते । कई ढंगके प्राणी वृष्टिसे, कई सड़ी लकड़ियोंसे, कई गोबरसे, कई गीले वालोसे, कई विविध मलोंसे और कई तो मक्षिकाओ- के विष्ठारूप ( एक मक्षिका जो क्षण-क्षणमें विष्ठारूपसे सैकड़ों सूक्ष्म कीड़े उत्पन्न करती है ) उत्पन्न होते हैं। ये सभी कर्मोंके ही फल हैं। मनुष्ययोनिके अतिरिक्त प्रायः अन्य सब भोगयोनियाँ हैं, भले ही हनुमान्, अगद, वालि, सुग्रीव, जाम्बवान्, जटायु, सपाति, गरुड़, अरुण आदि कुछ विशिष्ट जातिके विशिष्ट प्राणी विशिष्ट ज्ञानोपासनादिसम्पन्न हो। इसी तरह राक्षस, दानव और शेष, वासुकि आदि विशिष्ट नागोंमें भले ही विशिष्ट ज्ञान-उपासनादिकी बाते हो, परतु व्यापकरूपसे मनुष्य ही कर्मयोनि है, अन्य सब भोगयोनियाँ हैं। सृष्टिकी विचित्रता कमोंकी विचित्रतासे होती है। इसी आधारपर सर्वज्ञ महर्षियोंको अनुभूत कुछ विचित्र ढग, विशिष्ट परिमाणके भी मनुष्य, पशु, पक्षी, नाग आदिका वर्णन वाल्मीकि-रामायण, महाभारत आदिमें मिलता है। कृत, त्रेतादि युगोंमें सत्त्वगुणकी अधिकता होती है, इसलिये सदाचार, सद्विचार एव नियमित धार्मिक प्रवृत्तिका ही बाहुल्य होता है, अतः प्राणियोंको क्षुद्र जन्तुओंकी योनियोंमें जानेकी नौवत कम ही आती है। द्वापर, कलियुगोमे रजोगुण, तमोगुणके विस्तार, पाप-प्रवृत्तिकी बहुलता आदिसे क्षुद्र जन्तुओंकी बहुतायत होती है। हिंसा, भूख, युद्ध एव प्राकृतिक विप्लवोंसे अकालमृत्यु भी बढती है। अन्तिम लक्ष्य सभीका यही है कि सदाचारी, भक्त, ज्ञानी बनकर, मुक्त होकर भगवत्पदको प्राप्त करना। स्वाभाविक, प्राकृतिक नियमोका उल्लङ्घन करने, जगल काट डालने, विविध प्रकारके कल कारखाने तैयार करने और यथेष्ट चेष्टादिसे सृष्टिमें बहुत उथल-पुथल हुए हैं, मेघ विद्युत् एवं भूगर्भमें इन कारणोसे अनेक अस्वाभाविक परिवर्तन हुए हैं, अतः प्राणियोंमें अल्पायु, अल्पशक्ति आदि अनेक कृत्रिम परिवर्तन हुए हैं। ईश्वरीय, शास्त्रीय प्रवृत्तिके अनुसार मनुष्य बहुत कुछ अनुकूल परिवर्तन कर सकता है। डार्विनके मतानुसार 'जीवन-सग्राममें प्रकृति योग्योका ही चुनाव करती है' यह बात सत्य नहीं है। इंग्लैण्डके मनुष्योंकी ऊँचाईका जो नियम पीछे कहा गया है, तदनुसार अधिक सख्या मध्यमें लबाईवाले मनुष्योंकी ही है, बहुत नाटे और बहुत लवे लोगोंकी सख्या कम ही है। 'योग्योके चुनाव' का सिद्धान्त यदि ठीक हो तो लवे लोगोंकी ही सख्या अधिक होनी चाहिये । अथवा सबसे छोटा और निर्बल
१९२ मार्क्सवाद और रामराज्य जन्तु है, पर उसकी सङ्ख्या सबसे अधिक पायी जाती है। अन्य कीट-पतंगोंकी भी संख्या सर्वाधिक ही है। सबसे योग्य मनुष्योंकी सङ्ख्या तो कीट-पतङ्गादिकी अपेक्षा नगण्य ही है। मनुष्यको बलमे हाथी, सिंह, घोडा, ऊँट आदि पराजित कर देते हैं। दीर्घ जीवनमें साँप और कछुआ मनुष्यसे बढे हुए हैं। बुद्धिमें चींटी; परिश्रम, संचय, प्रबन्ध, कारीगरीमें मधुमक्खी सर्वश्रेष्ठ है। ये सब अपनेसे उत्तरवर्त्तियोंकी अपेक्षा कहीं श्रेष्ठ हैं। 'फिर योग्योंका चुनाव होता है', यह कैसे कहा जा सकता है ? पक्षियोंके पख, चींटियोंकी बुद्धि, कछुओंकी आयु कुछ कम योग्यताकी बात नहीं है। चींटीसे कनखजूरेके विकासमें कौन-सी योग्यता बढ़ी ? उड़ना, दीर्घजीवी होना, बुद्धिमान् होना उत्तरोत्तर महत्त्वकी बाते है। चींटीकी बुद्धि, कछुएकी आयु और पक्षीकी उड़नेकी शक्तिको छोडकर स्तनधारी प्राणियोंमें क्या योग्यता हुई ? मनुष्यमे अवश्य योग्यता है, परंतु अन्य स्तनधारियोंमें पूर्वोक्त जन्तुओसे कोई योग्यता नहीं दिखलायी पड़ती, अतः योग्यताका संततिमें सङ्क्रमणका सिद्धान्त' भी असंगत ही है। संसारमे अयोग्योंकी ही सख्या अधिक है। निर्वल, निर्धन और निर्बुद्धियोंकी बहुतायत स्पष्ट ही है। यदि मनुष्य अपनी संतानोंको योग्य बनानेका यत्न न करे तो संतानोंमें ज्ञानका संक्रमण अपने आप नहीं होता। 'अयोग्योंके मरनेका सिद्धान्त भी ठीक नहीं है। क्या युद्धो, बीमारियोंमें अयोग्य ही मरते हैं ? देखा तो यह जाता है कि संसारमें योग्योंकी अपेक्षा अयोग्यों- की ही संख्या अधिक है। वस्तुतः विकासवादियोंको अबतक भी इस सम्बन्धका कार्य-कारण निश्चित नहीं है। इसलिये उनका कहना है कि 'नयी उपजातियोंकी उत्पत्ति करनेमे परिस्थिति, कार्य या पैतृक-सस्कार, इनमेंसे कौन अधिक कार्यकर है और कौन कम, इसका अबतक पूर्णतया निश्चय नही हुआ।' आस्ट्रेलियाके शशकोमे वृक्षोपर चढ़ने लायक नाखून निकल रहे हैं।' यदि यह सत्य भी हो तो भी इतने मात्रसे वह नयी जाति नहीं है। जैसे मनुष्य होनेपर भी हब्शी, चीनीमें कुछ भेद 'होता है, वैसा ही सामान्य भेद यहाँ भी समझ लेना चाहिये और यदि किसी नये अङ्गविशेषका अकस्मात् नया विकास दिखलायी पड़ता है तो सृष्टिमें उसका भी उदाहरण है ही। जैसे, दीमकोंमें पख लग जाते हैं, किंतु पर लगते ही उड़-उडकर वे प्रायः मर ही जाते हैं। उनकी इस नयी जातिकी पीढ़ी नहीं चलती। कभी देश कालके अनुसार यदि कुछ हेर-फेर होता है तो वह भी शीघ्र ही स्थिर हो जाता है, जैसे कि अमेरिकाके रेड इण्डियनोंका। कृत्रिम चुनाव कृत्रिम चुनावके भी तीन नियम हैं—( १ ) अमुक मर्यादातक कृत्रिम होनेपर संतति होती है, ( २ ) अमुक मर्यादाके बाद अपनी पहली पीढ़ियोंके रूपकी ही हो जानी है और ( ३ ) अमुक मर्यादाके बाद वंश बन्द हो जाता है।
विकासवाद १९३ पहला नियम प्रायः सर्वत्र प्रसिद्ध है। इसीके अनुसार मनुष्य पशुओं एवं वृक्षोंके अच्छे बीज पैदा करते हैं। नीरोग, बलवान् माता-पितासे अच्छी संतति पैदा होती है। इनमें माताका अंश अधिक होनेपर संततिमें माताके अंश अधिक व्यक्त होते हैं और पिताका अधिक होनेसे संततिमें उसके अंश अधिक व्यक्त होते हैं। साँड़का अंश अधिक होनेसे बछड़ेमें सींग आदि बड़े होते हैं और गायका अंश अधिक होनेसे छोटे सींगवाले या मुण्डे बच्चे होते हैं। फिर भी सींगका असर रहता है। इसीसे मुण्डेकी संतानमें भी सींग होते हैं। इसी नियमानुसार काँटेदार नागफनी और सिंघाड़ेसे बिना काँटेवाली नागफनी और सिंघाड़े बना लिये जाते हैं। यहाँ कृत्रिम उपायोंसे पितृ-शक्ति कम कर दी जाती है। इसीलिये कभी-कभी उनसे फिर काँटेदार नागफनी आदि उत्पन्न हो जाते हैं। इन्हीं सिद्धान्तोंसे कबूतरोंकी विचित्रता बनती है। दूसरे नियमका उदाहरण कलमी आम है। कलमी आम बोनेसे दो पीढ़ियों- में वह साधारण आम हो जाता है। भेड़िये-कुत्ते और चीते सिंहके संयोगसे यदि संतान होती है, तो भी कुछ ही पीढ़ियोंके बाद वह कुत्ते और चीतेकी-सी हो जाती है। यही सिद्धान्त सन् १९२२ के 'न्यू एज'में प्रकाशित है। हेनरी डमडसका भी यही मत है। मेन्डलके 'कभी-कभी बच्चोंका पिताकी अपेक्षा पितामहके साथ बहुत मेल दिखलायी पड़ता है', इस कथनका भी यही अभिप्राय है। यदि कोई व्यक्ति अपनेमें कुछ अमर्यादित हेर-फेर कर डाले तो भी उसकी संतानमें वे चिह्न प्रकट नहीं होते, किंतु वह पितामहके गुणोंकी ही होती है। इससे पता लगता है कि प्रकृति पुरानी जातियोंकी ही रक्षा चाहती है। तीसरे नियमके अनुसार बेहिसाब (अमर्यादित) परिवर्तन होते ही वंश रुक जाता है जैसे घोड़े-गधेके संयोगसे खच्चर उत्पन्न होते हैं, परंतु उनका वंश नहीं चलता है। जापानके मुर्गोंका भी वंश बंद हो जाता है। पाँच पैरकी गाय, पेवन्दी बेर आदिका वंश भी बंद हो जाता है। लामार्कने चूहोंकी दुम काटकर बिना दुमके चूहे पैदा करना चाहा था। अनेकों पीढ़ियोंतक वह प्रयत्न करता रहा, परंतु बिना पूँछके चूहे नहीं हुए। लेसिस्टर शायरके कुछ भेड़ चरानेवाले अपनी कुछ भेड़ोंको घोड़ेके बराबर और कुछ भेड़ोंको चूहोंके बराबर बनाना चाहते थे, परंतु दोनों प्रयत्न विफल हुए, उनका घटना-बढ़ना सीमित ही रहा। प्राकृतिक चुनावके नमूने तो प्रायः सभी हैं, सामान्य भेद इन सबमें होता है। समान जातिमें समान उमरकी स्त्रियों, पुरुषों तथा पशुओं आदि सबमें भेद पहचाना जाता है। भेदके बिना तो पहचान और व्यवहार ही नहीं चल सकता। विकासवादी कहते हैं कि 'हममें और आपमे जो भेद है, यही आगे चलकर गिलहरीको रीछ बना देता है।' परंतु यह असत्य है। सामान्य भेद तो व्यवहारमें अत्यन्त मा० रा० १३-
६९४ मार्क्सवाद और रामराज्य उपयोगी और ईश्वरदत्त ही है। हिंदू लाखों वर्षोंसे कान छिदवाते हैं; मुसलमान सैकड़ों वर्षोंसे खतना कराते हैं; चीनकी स्त्रियाँ हजारों वर्षोंसे अपने पैर छोटे बनानेका प्रयत्न करती हैं; परंतु उनसे वैसी संताने कभी नहीं हुईं। अतः कहना होगा कि कृत्रिम विकास अमर्यादित नहीं होता। विलायतकी विधवाओसे गायोंकी वृद्धिसे भी नवीन जातिकी उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती। डार्विनका सिद्धान्त है कि 'माता-पिताके प्रत्येक अङ्गसे सार एकत्रित होकर संततिका जन्म होता है।' वाइजमैनका कहना है कि 'इस सारके एकत्रित होनेमें यदि बीचमें कोई परिवर्त्तन उद्भूत हो तो वह संततिमें संक्रमित न होगा।' मेण्डलका मत है कि 'कभी लड़का पिताकी अपेक्षा पितामहके गुणका संग्रह करता है।' हाइजकी राय है कि 'कभी कभी नयी नयी जातियाँ अकस्मात् उत्पन्न हो जाती हैं।' ये सिद्धान्त तथा हेतुवाद और अज्ञात-ज्ञेय आदि सिद्धान्त मिलकर विकासके विरुद्ध ही ठहरते हैं। इनमेंसे पहली बात 'अङ्गादङ्गात्सम्भवसि' इत्यादि वेदोंकी ही है। पुत्रमें कोई नया परिवर्तन नहीं आता। ऐसे स्थलमें पुत्र पितामहके ही गुणोंको ग्रहण करता है। इससे जातिकी स्थिरता ही सिद्ध होती है। नवीन जलकृमियोंकी उत्पत्ति भी किसी शरीर बननेके लिये विकास आवश्यक नहीं। हेतुवाद और अज्ञात ज्ञेयशक्तिसे तो यही निश्चय किया जा सकता है कि ईश्वर ही कर्मानुसार प्राणियोंकी रचना करता है, क्रम-विकास आवश्यक नहीं है। 'विकासवाद' पुस्तकमें भी लिखा है कि 'प्राणियोंकी उत्पत्ति विकासद्वारा हुई या नहीं, एक प्रकारके प्राणीसे भिन्न-भिन्न प्रकारके प्राणी बनते हैं या नहीं, इस प्रकार निरीक्षण करनेवाला मनुष्य भी विकास-क्रियाके किसी अत्यन्त सूक्ष्म भागको भी प्रत्यक्ष होते हुए पूर्णतया नहीं देख सकता। कई प्रश्नोंके सम्पूर्ण उत्तर प्राप्त करनेकी आशा भी नहीं करनी चाहिये।' अतः विकासवाद एक कल्पना ही है, सिद्धान्त नहीं। 'समाजमें निर्बलोंको जीनेका हक नहीं है', यह कल्पना कितनी भीषण है। मनुष्य और रीछ अथवा भैंसकी तुलना करे तो यह स्पष्ट ही है कि शरीर, बलमें रीछ और भैंस दोनों अधिक ठहरेंगे। मनुष्य इनसे शरीर, बलमें अवश्य हार जायगा। तथापि मनुष्य बुद्धिके कारण अधिक बलवान् सिद्ध होता है। मनुष्योंमें भी अधिक बुद्धिमान् ही प्रबल ठहरता है। नीतिबल, बुद्धि और शरीर-बलसे भी अधिक महत्त्वका है। सोडम और गमोरा निवासी अनीतिके कारण ही नष्ट हो गये। नीतिमान्, शान्त, निर्व्यसन अधिक दीर्घजीवी होते हैं। जो जाति परमार्थ-बुद्धिकी अपेक्षा अधिक स्वार्थ-बुद्धि रखती है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है। जानवरोंमें भी परमार्थ-बुद्धि पायी जाती है। शेर, व्याघ्र-जैसे खूँखार प्राणी भी अपने बच्चोंको दूध पिलाते हैं, प्यार करते हैं। मनुष्यका स्वार्थ- त्यागी होना ही महत्त्व है। अतः 'जीवन-संग्राममें बलवानोंकी ही विजय होती
है, यह कहना सत्य नहीं। कई लोग पुराणोंकी चौरासी लक्ष योनियोंके वर्णन और मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह आदि अवतारोंके द्वारा भी विकासवाद सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं। इसी तरह कई लोग कुछ वेद-मन्त्रोंको भी विकास-सिद्धिके लिये उद्धृत करते हैं, परन्तु वेदों और पुराणोंसे डार्विनका विकास कथमपि सिद्ध नहीं हो सकता। पुराणोंके अनुसार एक प्राणीसे दूसरे प्राणीका विकास सिद्ध नहीं होता। किंतु सभी योनियाँ स्वतन्त्र मानी गयी हैं। अवतारोंमें भी मत्स्य- कच्छपादि स्वतन्त्र अवतार हैं। 'मत्स्यसे कच्छपका विकास हुआ है' यह पुराणोंसे नहीं सिद्ध होता। 'क्रिश्चियन हेरल्ड' में छपे अनुसार 'ब्रिटिश साइन्स सोसाइटी' के आस्ट्रेलिया अधिवेशनमें सभापति-पदसे प्रो० विलियम बेटसनने कहा था कि 'डार्विनका विकासवाद बिल्कुल असत्य और विज्ञानके विरुद्ध है।' अमेरिकाकी कई रियासतोंने स्कूलोंमें डार्विन सिद्धान्तकी शिक्षाको कानूनके विरुद्ध ठहराया। वहाँके एक जजने अपने एक फैसलेमें लिखा था कि 'ऊँचे दरजेके विद्वान् अब विकासवादपर विश्वास नहीं करते।' प्रो० पेट्रिक गेडिसका कहना है कि 'मनुष्यके विकासके प्रमाण संदिग्ध हैं। साइन्समें उनके लिये कोई स्थान नहीं।' सर जे० डब्लयू० डासनका कहना है कि 'विज्ञानको बंदर और मनुष्यके बीचकी आकृतिका कुछ भी पता नहीं है। मनुष्यकी प्राचीनतम अस्थियाँ भी वर्तमान-जैसी ही हैं।' प्रसिद्ध विद्वान् वुड जोन्सका कहना है कि 'डार्विनसे गलती हुई है। मनुष्य बंदरसे उत्पन्न नहीं हुआ, किंतु बंदर मनुष्यसे उत्पन्न हुए हैं।' सिडनी कालेटका कहना है कि 'साइन्स स्पष्ट साक्षी है कि मनुष्य अवनत दशासे उन्नत दशाकी ओर चलनेके स्थानमें उलटा अवनतिकी ओर जा रहा है। उसकी आरम्भिक दशा उत्तम थी।' प्रागुत्तर अश्मकालकी एक खोपड़ी मिली है। यह खोपड़ी जिस सिरकी है, वह यूरोपमें सबसे बड़ा समझा जाता है। यह खोपड़ी एक सौ चौदह क्यूबिक (घन) इंच है। यूरोपमें छोटे-से-छोटे सिर ५० क्यूबिक इंच और बड़े से-बड़ा ७५ क्यूबिक इंचका पाया गया है। इससे स्पष्ट है कि वर्तमान यूरोपनिवासियोकी दिमागी ताकत बढ़ नहीं रही है। सन् १८८३ में एक सिर हालैडमें निकला, जो यूरोपनिवासियोंके औसत घेरेसे बड़ा है। इसका घेरा १५० क्यूबिक इंच है। भूगर्भ-शास्त्रियों और पुरातत्त्वज्ञोंने 'हार्लींग सेक्सान' को २५ हजार वर्ष पुराना बतलाया है। इसका घेरा भी १५० क्यूबिक इंच है। इन सब बातोंसे सिद्ध होता है कि प्राचीन मनुष्योंका विकासहीन मस्तिष्क बंदरोंसे नहीं हुआ, किंतु वे परमात्माकी विशिष्ट रचना थे। आजके उत्तम-से उत्तम मनुष्योंकी अपेक्षा वे अधिक उन्नत थे। विकासवादी शंका करते हैं कि 'यदि क्रमोन्नतिका सिद्धान्त न माना जाय तो फिर दीर्घकाय प्राणियोंकी उत्पत्ति कैसे सम्भव हो सकती है? इतना बड़ा मनुष्य एकाएक आदि कालमें कैसे पैदा हो गया?' परन्तु वे एक कोष्ठके
१९६ मार्क्सवाद और रामराज्य अमीबाकी एकाएक उत्पत्ति मान लेते हैं; परंतु अनेक कोष्ठसंयुक्त मनुष्य-प्राणीका आप-से-आप उत्पन्न होना नहीं मानते। परंतु बात सरल है, जिस महाशक्तिके प्रभावसे एक कोष्ठवाला अमीबा उत्पन्न हो सकता है, उस शक्तिको अनेक कोष्ठवाले मनुष्यके उत्पादनमें क्या कठिनाई है ? जो बड़े-बड़े सूर्य, चन्द्र और छोटे-छोटे अमीबाको बना सकती है, वही शक्ति गाय, बैल, हाथी, बंदर, मनुष्य सबको बना सकती है। आरम्भिक सृष्टिको नये-पुराने सभी विद्वान् 'अमैथुनी सृष्टि' नामसे कहते हैं। प्रो० मैक्समूलर लिखता है—'कहा जाता है कि आदिमें एक ही मनुष्य नहीं था, किंतु हम हर प्रकारसे यह ख्याल कर सकते हैं कि आदिमे कुछ पुरुष और स्त्रियाँ उत्पन्न हुई थीं।' मद्रास हाईकोर्टके जज टी० एल० स्ट्रेन्ज अपनी 'दि डेव्हलप्मेंट ऑफ क्रियेशन् ऑन दी अर्थ ( पृथ्वीपर सृष्टिका विकास )' पुस्तकमें लिखते हैं कि 'आदि सृष्टि अमैथुनी होती है। इस अमैथुनी सृष्टिमें उत्तम और सुडौल शरीर बनते हैं।' 'वैशेषिक दर्शन' का भी कहना है कि 'शरीर दो प्रकारका होता है— योनिज और अयोनिज'—'तत्र शरीरं द्विविधं योनिजमयोनिजं च।' इसपर 'प्रशस्तपादीय भाष्य' है। 'तत्रायोनिजमनपेक्षितशुक्रशोणितं देवर्षीणां शरीरं धर्मविशेषसहिते- भ्योऽणुभ्यो जायते।' अर्थात् देवता और ऋषियोंके शरीर शुक्र-शोणितके बिना ही धर्मविशेष- सहित अणुओंसे उत्पन्न होते हैं। इन सब बातोंसे सिद्ध होता है कि विकासवाद अत्यन्त भ्रान्तिपूर्ण वाद है। मनुष्य-जाति 'मनुष्य-जातिका विकास वनमनुष्योंसे हुआ है,' 'जावाद्वीपके कलिंग नामक मनुष्य अधिकतर वनमनुष्योंसे मिलते हैं, अतः वे ही मनुष्य-जातिके पूर्वपितामह हैं', यह सब कथन भ्रान्तिपूर्ण हैं। अतएव जो कहा जाता है कि 'यही मनुष्य- समुदायकी समस्त शाखाओंका जन्मदाता है' यह सब भी भ्रान्तिपूर्ण है, क्योंकि जब विकासवादका सिद्धान्त ही खण्डित हो गया, तब उसके आधारपर शास्त्र- विरुद्ध कोई कल्पना निराधार ही है। आजकलका सिद्धान्त है कि मनुष्य-जाति- के चार विभाग हैं, उसीके भीतर हजारों विभाग आ जाते हैं—( १ ) श्वेत रंग, लम्बी आकृतिवाला काकेशस, ( २ ) पीले रंग, चौड़ी आकृतिवाला मंगोलिक, ( ३ ) काले रंग, मोटी आकृतिवाला ईथियोपिक ( निग्रो ) और ( ४ ) लाल रंग और पतली आकृतिवाला रेडइण्डियन। आधुनिक वैज्ञानिकोंका कहना है कि मनुष्य-जातिके चारों विभागोंमें काकेशस विभाग सर्वश्रेष्ठ है। इस विभागके लोग गौरांग हैं। इसी विभागसे सब रंगवालोंकी उत्पत्ति हुई है ! विद्वानोंकी
खोज है कि हेमाइट लोग काकेशस वंशके हैं और सफेदसे भूरे और काले रगके हो गये हैं । उनके बाल सीधे और नीग्रो जातिके-से घुँघराले होते हैं । "हेमिटिक शाखाके लोग मिस्रमें रहते हैं । विद्वानोंने यह भी स्वीकार किया है कि अमेरिकाके लाल रंगवाले मूल निवासियोका मिलान मिस्रनिवासी हेमिटिकोंसे ही होता है । इन्हीकी एक हिमेगाडत जाति लाल मनुष्य भी कहलाती है । यह जाति जिस समुद्रके किनारे रहती है, उसे भी लाल सागर कहा जाता है । श्वेतांग यूरोपियन भी अपनेको काकेशिक विभागके ही कहते हैं । इस तरह लाल, पीले, काले और सफेद रंगके चारो समुदाय काकेशिक विभागसे ही उत्पन्न हुए देखे जाते हैं । दूसरी खोज यह है कि संसारके जितने मनुष्य हैं, सब हेमिटिक और सेमिटिक शाखाओंमें अन्तर्भूत हो जाते हैं । मिस्रनिवासी हेमिटिक हैं । इनके यहाँ मुदोंमें मसाला भरकर रखनेका रिवाज था । मिस्रके पिरामिड इन्हीं मुदोंको रखनेके लिये बनाये जाते थे । अब पता चलता है कि अमेरिकाके लाल रंगवाले मूल- निवासियोंमें भी यही रिवाज था । अन्वेषकोंको यहाँ भी पिरामिड मिले हैं । इससे इन दोनोंकी एकता ही प्रतीत होती है । "काकेशस विभागकी दूसरी शाखा सेमिटिक है । इसमें अरब, बेबिलोन, सीरिया और जुडियाके यहूदी आदि सम्मिलित हैं । इसीकी एक शाखा अब हिट्टाइट है, जो पहले कभी मेसोपोटामियोंमें रहा करती थी । मेसोपोटामियोंमें अन्वेषकोंको ३४ सौ वर्षकी ईंटे मिली हैं, जिनमें इनके सुलहनामे लिखे हुए हैं । इन्ही लोगोंका एक दल भारतवर्षमें रहता है, जिसे 'द्रविड़' कहते हैं । भारतके द्रविड़ोंकी भाषा मंगोलिक और निग्रो विभागोंको जोड़ती है । भाषा ही : नहीं, उनका रूप, रग और शारीरिक गठन भी एक ही है । विद्वानोंने पता लगाया है कि भारतके द्रविड़ोंकी भाषा आस्ट्रेलियाकी भाषाकी भाँति है और वह भाषा मंगोलिक विभागसे भी मिलती है । आस्ट्रेलियानिवासी शुद्ध निग्रो जातिके हैं, जो द्रविड़ जातिसे भी सम्बन्ध रखते हैं । इसी तरह मगालिक-विभागसे भी द्रविड़ लोग सम्बन्ध रखते हैं । इन सब बातोसे द्रविड़ जाति निग्रो और मंगोलिक विभागोको जोड़कर अपना मूल स्रोत सेमिटिक शाखासे स्थापित करती है । इसी तरह हेमिटिक शाखा अमेरिकाके मूल निवासियोंको जोड़ती है । इस तरह काकेशिक विभागके हेमिटिक और सेमिटिक शाखाओसे ही मंगोलियन्, अमेरिकन और निग्रो विभागोका सम्बन्ध सूचित होता है । इस तरह ससारके काले, पीले, लाल और सफेद रगवाले चारो विभाग काकेशिक विभागकी हेमिटिक और सेमिटिक शाखाओसे ही उत्पन्न हुए हैं ।" वस्तुतः नूहका तूफान, वैवस्वत मनुकी मछलीवाली कथाका अनुवाद है । नूहके पुत्र हेमकी संतति, जो मिस्रमें रहती है, अपना सम्बन्ध राजा मनुसे बतलात
१९८ मार्क्सवाद और रामराज्य है और अपनेको सूर्यवंशी कहती है और मनु वैवस्वतके मूल विवस्वान् सूर्यको अपना इष्ट समझती है । इन मिस्रवालोंकी ही संतति अमेरिकाके मूल निवासी बतलाये जाते हैं । वे भी सूर्यवंशी राजा रामचन्द्रका 'राम-सीतव' उत्सव मनाते हैं । अन्वेषकोंको वहाँ सूर्यका मन्दिर भी मिला है । मनुकी मछली एव नूहके प्लावनकी कथा मिस्र, बेबिलोन, सीरिया, चाल्डिया, जूडिया, फारस, अरब, ग्रीस, भारत, चीन, अमेरिका आदि संसारके सभी देशों एव सभी जातियोंमें पायी जाती है । इससे भी सिद्ध होता है कि मनुसे ही समस्त मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है। बाइबिलमें बतलायी हुई नूहकी पीढ़ियाँ काल्पनिक हैं। आदमसे नूहतक ११ पीढ़ियाँ होती हैं और वर्ष-संख्या २२६२ है। नूहके पुत्र सेमसे इब्राहीमतक ११ पीढ़ियोंके तेरह सौ दस वर्ष कहे गये हैं । यह गणना विश्वास योग्य नहीं । जब मनु और नूह एक ही हैं तब उन्हें हुए लाखो वर्ष हो गये । कहा जाता है कि मिस्रकी भाषामें 'नून' शब्दका 'मछली' अर्थ होता है । 'नून' अक्षर फिनीशियामें 'ईल' नामक मछलीकी शकलका होता है । अंग्रेजी तथा अरबीमें भी यह अक्षर मछलीकी तरह ही होता है । मछलीके ही ढगकी नाव होती है। हजरत नूहको 'नौवा' भी कहा जाता था । इस नौवाका सम्बन्ध मनुके जलप्लावनसे ही है । यह नाव और मनुकी मछली एक ही है । मनुको वैवस्वत कहा जाता है । विवस्वान् सूर्य है । हजरत नूहके दो पुत्र हेम, सेम—सूर्यवंश और चन्द्रवंश ही हैं । हेमगर्भ, हिरण्यगर्भ, सूर्यवंशका ही बोधक है और सेम=सोम चन्द्रवंशका बोधक है । सूर्यवंशियोंकी पुत्री इलासे ही सोमवशकी उत्पत्ति हुई है । इस दृष्टिसे दोनों मनुके पुत्र कहे जा सकते हैं । मनुस्मृतिके अनुसार क्षत्रियोंसे ही संसारके मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है— शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः । पारदाः पह्लवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥ ( मनुस्मृति १० । ४३-४४ ) इतिहासकार मैनिंग कहता है कि "यह बात विद्वानोंने मान ली है कि 'मनुष्य जातिके पूर्वपितामह 'मनु' या 'मनम्' उसी तरह हैं जिस तरह जर्मनोंके 'मनस्' हैं, जो ट्यूटनोंके मूल पुरुष माने जाते हैं । अंग्रेजीका 'मैन' तथा जर्मनका 'मन्न' शब्द 'मनु' से उसी तरह मिलता है, जैसे जर्मनका 'मेनष्' और संस्कृतका 'मनुष्य' शब्द मिलता है । अतः मनुसे ही मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है।" वह मनु मूल पुरुष हिरण्यगर्भसे अभिन्न समझा जाता है और उसी
विकासवाद १९९ हिरण्यगर्भके मुख, बाहु, ऊरु एवं पादसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रकी उत्पत्ति हुई— एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ( मनु० श्लो० १२ । १२३ ) ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायत ॥ ( ऋग्वेद, १० । ९० । १२; यजु० ३१ । ११ ) मानवसृष्टिका मूलस्थान 'इसी तरह जब समस्त मनुष्य बंदरोंसे उत्पन्न हुए हैं, तब जहाँ-जहाँ बंदरोंका निवास है वहीं मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई और जब मनुष्योंकी उत्पत्ति वनमानुषोंसे हुई, तब वनमानुष जहाँ-जहाँ मिलते हैं वहाँ मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई । वनमानुष अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, मेडागास्कर, जावा आदिमें होते हैं । वहाँका निग्रोदल सभ्यतामें अबतक भी मनुष्य-समुदायसे पीछे है । उनमें कई जातियाँ और दल ऐसे हैं जो वनमानुषोंसे कुछ थोड़े उन्नत हैं।' वैसे विकासवादके खण्डनसे सब मत खण्डित हो ही जाते हैं । इसके अति- रिक्त एक ही स्थानमें सृष्टि होनेपर भी देश, काल, सम्पर्कसे उनमें भेद प्रतीत होने लगता है । बीजके बिना कोई भी पौधा तैयार नहीं हो सकता । समुद्रके टापुओंमें भी जबतक बीज नहीं पहुँचता, मिट्टीमें रस नहीं आता तबतक किसी तरहके पौधे उत्पन्न नहीं होते । कोई भी माली बीजोंसे पौधोंको ऐसी ही जगह तैयार करता है, जहाँ उसकी सुरक्षाके योग्य स्थान हो । आँधी, तूफान, जलप्लावन, अग्नि, भूकम्प आदिका उपद्रव जहाँ न रहा होगा, वहीं ईश्वरने मनुष्यादि सभी प्राणियोंको उत्पन्न किया होगा । कई लोग कहते हैं कि 'अमेरिकामें बंदर नहीं थे, अतः वहाँ मनुष्योंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती थी।' पहले यूरोपका भी जलवायु मनुष्यकी उत्पत्तिके अनुकूल नहीं था । विद्वान् अन्वेषकोंका कहना है कि 'स्तनधारी प्राणी एशियासे ही यूरोपमें आया है।' वार्न साहब तथा उनकी पुस्तकसे प्रभावित होकर लोकमान्य तिलकने उत्तरीध्रुवमें ही प्राणियोंकी सृष्टि मानी है । किंतु विद्वानोंका मत है कि 'उत्तरी ध्रुवमें प्रति साढ़े दस हजार वर्षमें भीषण हिमपात होता रहा है, अतः वहाँ सृष्टिका होना सर्वथा असम्भव है।' इंगलैंडके डा० एलेन्मनका कहना है कि 'मनुष्यकी खालपर ध्रुव-प्रदेशनिवासी पशुओंके समान लम्बे बाल नहीं हैं, इसलिये मनुष्य वहाँका प्राणी नहीं है । मनुष्यके शरीरपर पसीना निकलनेके लिये छोटे-छोटे रोम-छिद्र होते हैं, अतः यह अतिशीत प्रदेशका प्राणी नहीं है।' भूगोल- विशेषज्ञोंका यह भी कहना है कि 'उत्तरी ध्रुवमें वनस्पतियाँ नहीं होतीं, वहाँ मनुष्योंका
जी सकना ही मुश्किल था।' अनेक विद्वान् एशियामें भी मनुष्योंकी उत्पत्ति मानते हैं। उनका कहना है कि 'पश्चिमोत्तर एशियामें ही मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई, वहाँ से भिन्न भिन्न श्रेणीके रूपमें लोग विभिन्न देशोंमें गये हैं।' मैक्समूलरने मध्य एशियामें और स्वामी दयानन्दजीने तिब्बतमें मनुष्योंकी उत्पत्ति मानी है। उमेशचन्द्र दत्तके मतानुसार मंगोलियामें मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है। अन्यान्य विद्वान् विभिन्न स्थान मानते हैं। संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, जेन्द आदि भाषाओंकी तुलना करनेपर भी अधिकांश विद्वान् इस निष्कर्षपर पहुँचे हैं कि इन भाषाओंके भाषी लोग कभी एक भाषा- भाषी रहे होंगे। जैसे-जैसे वे एक दूसरेसे दूर होते गये, वैसे-वैसे उनकी भाषामें कुछ भेद पडता गया। यद्यपि वे लोग इन भाषाओंको परस्पर भगिनी ही मानते हैं। उनकी जननी कोई अन्य भाषा रही होगी—ऐसी कल्पना करते हैं, तथापि संस्कृत भाषा ही सब भाषाओंकी जननी है—यह अधिक प्रमाणसिद्ध है। आज भी संसारमें सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद माना जाता है। मोहेनजोदड़ो, हड़प्पाकी खुदाईसे मिलनेवाली वस्तुओंसे भी वैदिक सभ्यताकी अतिप्राचीनता विदित होती है। 'वाचा विरूपनित्यया'—विरूप नित्य वेद लक्षण वाणीद्वारा आप सृष्टि करते हैं। इस वेद-वाक्यसे वेद अनादि सिद्ध होते हैं। मनु भी 'अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा'—स्वायम्भुवने अनादि-निधन-उत्पत्ति-नाशविवर्जित वेद लक्षण वाणीका उत्सर्ग किया; सम्प्रदायप्रवर्तन किया—इस वचनसे वेदको अनादि बतलाते हैं। अतः सर्व प्राचीन भाषा संस्कृत भाषा ही सिद्ध होती है। उससे ही अन्य भाषाओंका उद्गम हुआ है। उन अनादि अपौरुषेय वेदों, मनुस्मृति, चरक आदि ग्रन्थोंसे मालूम पडता है कि सप्तद्वीपा मेदिनीमे जम्बूद्वीप श्रेष्ठ है और जम्बूद्वीपमे भी भारतवर्ष ही सर्वोत्कृष्ट है। चतुर्दश भुवनोंमे पृथ्वी और पृथ्वीमे भारतवर्ष विराट् पुरुषका हृदय-स्वरूप है। इसीमे आर्यावर्त्त, ब्रह्मावर्त्त एव हिमालय हैं। इसीमें साङ्गोपाङ्ग सभी ऋतुओंका विकास होता है। इसीमें सभी रंगके मनुष्य भी मिलते हैं, अतः यहीं मनुष्योंकी उत्पत्ति हुई है— तेषां कुरुक्षेत्रं देवयजनमास। तस्मादाहुः कुरुक्षेत्रं वै देवानां देवयजनम्। ( शतपथ ) यदनु कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम्। ( रामोत्तरतापि० १ । १, तारसार० २ ) डॉक्टर ई० आ० एलंसका 'मेडिकल' पुस्तकमें कहना है कि 'हिमालयमें वनस्पति, घास खूब होते हैं, अतः गाय, भैंस, बकरी, हाथी, कुत्ता आदि जानवर और मनुष्यका भी वहाँ होना सङ्गत है। हिमालयमें प्राणियोंके बहुत पुराने शेषांश मिलते हैं।' भाषाशास्त्री टेलर स्वर्गतुल्य काश्मीरको मनुष्य-जातिकी जन्मभूमि
विकासवाद २०१ कहते हैं । पुरातत्त्वके विद्वान् अविनाशचन्द्र दासकी ‘ऋग्वेदिक इंडिया’में कहा गया है कि 'आर्योंका आदिदेश काश्मीर ही है ।' उत्तरप्रदेशके मुख्य मन्त्री श्रीसम्पूर्णानन्दने अपनी 'आर्योंका आदिदेश भारत' पुस्तकमें भारतको ही आर्योंकी जन्मभूमि माना है । पाश्चात्त्य लोग गोरे, लम्बे, बड़े सिरवाले भारत, ईरान, योरोपवासियोंको आर्य कहते हैं । परंतु भारतीय कहते हैं कि 'जो रूप-रंग, आकृति- प्रकृति, धर्म-कर्म, ज्ञान-विज्ञान, आचार-विचार तथा शीलमें सर्वश्रेष्ठ है, वही आर्य है— कर्तव्यमाचरन् काममकर्तव्यमनाचरन् । तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य इति स्मृतः ॥ ( वशिष्ठ-स्मृति ) न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं न दर्पमारोहति नास्तमेति । न दुर्गतोऽस्मीति करोत्यकार्यं तमार्यशीलं परमाहुरार्याः ॥ न स्वे सुखे वै कुरुते प्रहर्षं नान्यस्य दुःखे भवति प्र