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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

७०४ मार्क्सवाद और रामराज्य तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ( बृहदा० ४ । ४ । १६ ) अन्तः पुरुषे ज्योतिः । ( छान्दो० ३ । १३ । ७ ) जैसे तत्त्वज्ञान बिना अविवेकी देहको ही आत्मा मानता है, वैसे ही अवि- वेकी बुद्धिको ही ज्ञानकर्ता कहता है । चिदाभासयुक्त बुद्धिवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, यही देखकर ज्ञानकी उत्पत्तिका व्यवहार होता है । जैसे प्रतिबिम्ब दर्पणानु- विधायी होता है वैसे ही चिदाभास भी बुद्धिधर्मका अनुविधायी होता है । चिदा- भाससे दीपित बुद्धिवृत्तियाँ विषयग्राहिका उसी तरह होती हैं, जैसे उल्मुकका दाहकत्व- व्यवहार । वे ग्राहिका वृत्तियाँ स्वयं भासित होती हैं, इसीलिये बौद्धोंने प्रत्ययोंके भासक साक्षीका अपलाप किया है, तथापि उनका आत्मा भासयुक्तबुद्धि प्रत्ययोंके भाव एवं अभाव जिस साक्षीसे विदित होते हैं वह साक्षी ही उनकी उत्पत्ति- विनाशको जानता है । साक्षीके रहनेपर भी चिदाभास आवश्यक है; क्योंकि वस्तु-स्फुरणके लिये वृत्तिव्याप्त वस्तुपर चिदाभास आवश्यक है । केवल साक्षीद्वारा यदि वस्तुका प्रकाश होता हो, तब तो वृत्तिके समान ही काष्ठ-पाषाणादिका भी स्फुरण होना चाहिये । प्रकाशस्वरूप आत्माके सम्बन्धसे ही अचेतनबुद्धि चेतन-सी प्रतीत होती है । फिर तो उसकी वृत्तियाँ भी चेतन-सी ही प्रतीत होती हैं । जैसे तप्त लौहपिण्डसे निकलनेवाले विस्फुलिङ्ग भी अग्निवत् प्रतीत होते हैं । वृत्ति-तदभाव, आभास तथा आभासाभावका ग्राहक तादृक् प्रत्यय नहीं हो सकता । अतः अत्यन्त विविक्त साक्षीसे ही वे भासित होते हैं । फिर भी जैसे लौहपिण्डमें अग्निकी संक्रान्ति होती है, वैसे बुद्धिमें चित्की विकाररूप संक्रान्ति नहीं होती । दर्पणमें प्रतिबिम्बके तुल्य ही बुद्धिमें चित्की संक्रान्ति होती है । जैसे लौहपिण्ड अग्न्याभास होता है, उसी तरह बुद्धि चेतनाभास प्रतीत होती है । चित्त ही चेतन है, यह वैसे ही असङ्गत है, जैसे देहको चेतन कहना । इसी तरह चक्षुरादिमें भी चेतनत्व कहना भ्रममूलक है । अहङ्कारसहित बुद्ध्यारूढ़ सभी वस्तु साक्षीसे ही भासित होते हैं । इसलिये अखण्डबोधरूप साक्षी सर्वाव- भासक कहलाता है । सुषुप्तिमें 'नाद्राक्षम्' इस रूपसे प्रत्ययका ही निषेध है, फिर भी भावरूप अज्ञान एवं प्रत्ययाभावका बोध तो रहता ही है । प्रमातृ-प्रमाण- प्रमेयादिरूप विशेष ग्राह्य नहीं अनुभूत होता । किंतु भाव-अभावका साक्षी चिद्रूप आत्मा एकरस है । शास्त्रोंके अनुसार प्रत्यय स्पष्ट ही उत्पत्ति-विनाशशील एवं कूटस्थ चैतन्य- स्वरूप अलुप्तदृक् है । प्रत्यगात्मा-नित्यज्योतिमें ही अहंका पर्यवसान है । अनुभवके आधारपर ही सब कुछ सिद्ध होता है । आत्मा अनुभवस्वरूप है । प्रत्यय और प्रत्ययी अन्तःकरण—दोनों ही जड़ हैं । नित्य चैतन्यसे ही इन सबका भान होता है । जैसे सेनाका जय राजामें आरोपित होता है, उसी तरह प्रमाणफल कूटस्थ साक्षीसे आरोपित होता है । अविकृत चिदात्माका अन्तःकरणमें प्रतिबिम्ब होता

है। वह प्रतिबिम्ब ही स्वोपाधिबुद्धिके व्यापारद्वारा प्रमाता बनता है । आभास भी परिणाम नहीं है, किंतु जैसे रज्जुके अज्ञानसे सर्पभ्रम होता है, जैसे दर्पणमें मुखाभासत्वकी प्रतीति होती है, उसी तरह बुद्धिमे आत्माभासत्वकी प्रतीति होती है । प्रत्यय और दृष्टिका भेद स्वप्नमें प्रसिद्ध ही है । वहाँ विषयाकाराकारित प्रत्ययका साक्षी आत्मा ही है । जिस चिद्रूप आत्माके आभाससे विषयाकार-प्रत्यय विदित होता है, वही आत्मा है । प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय—तीनोंका भासक साक्षी ही ब्रह्म है—‘त्रितयं तन्न यो वेद स भात्मा स्वाश्रयाश्रयः ।’ (श्रीमद्भा० २ । १० । ९) सम्यग्ज्ञान, संशयज्ञान, भ्रान्ति ज्ञानमें अवगति और बोध-आत्मा एक ही ढगका है । इन ज्ञानोंमें भेद केवल प्रत्ययोंका ही है । पुष्पादि उपाधिके वशसे स्फटिकादिमें भेद प्रतीत होता है, उसी तरह प्रत्ययरूप उपाधिके भेदसे अखण्डबोधमें भेद प्रतीत होता है । जाग्रत्काल, स्वप्नकालके प्रत्ययोंका स्फुरण नित्य-अपरोक्षभाव साक्षी आत्मासे ही होता है । जैसे प्रदीपसे घटादिका प्रकाश होता है, परंतु प्रदीपका भी प्रकाश द्रष्टासे ही होता है— तस्य भासा सर्वमिदं विभाति, ( कठोप० २ । १ । १५ ) अत्रायं पुरुषः स्वयञ्ज्योतिर्भवति । ( छान्दोग्योप० ) अन्य निषेधसे भी सर्वनिषेध साक्षी चेतन आत्मा प्रसिद्ध होता है । 'अज्ञा- सिषमिदं मां च' मैने इसे और अपने आपको जाना, इस प्रकारकी स्मृति प्रमाता, प्रमाण, प्रमेयके स्मरणसे तीनोका ही प्रकाश निश्चित होता है । एक प्रमाणज्ञानमें ग्राहक और ग्राह्य दोनोंका स्फुरण नहीं हो सकता । अतः बोधस्वरूप साक्षीसे ही स्फुरण होना उपपन्न होता है । बौद्ध कर्ता कर्म-विहीन प्रत्ययका स्वमहिमासे प्रकाश है ऐसा मानते हैं । परंतु फिर तो अनुभविताकी अपेक्षा ही न रहेगी । वैसे अनुभवितामें ही अनुभव इष्ट होता है । इसके अतिरिक्त अनुभविता भी तो अनुभव ही है । बुद्धि ही भ्रान्तिसे पुरुषोंको ग्राह्य-ग्राहक-भेदवान् होकर प्रतीत होती है । जिसके मतमें अनुभूति क्रिया है, वही कारक भी है । यदि इसका सत्त्व एवं क्षणिकत्व मान्य है तो दृष्टबलात् सकर्तृक भी मानना ठीक है । वस्तुतस्तु ग्राह्य नीलपीतादि वस्तु और वस्तु-प्रत्यय भासक साक्षी मान्य है, जैसे रूपादि ग्राह्य हैं उनके ग्राहक दीपादि हैं उसी तरह प्रत्यय भी ग्राह्य है, अतः उसका ग्राहक साक्षी मान्य होना चाहिये । व्यञ्जक होनेसे अवभासक अवभास्यसे अन्य होता है । जैसे घटादिका प्रकाशक दीपक होता है, उसी तरह प्रत्यय ग्राह्य है, उसका भी ग्राहक साक्षी पृथक् है । द्रष्टा और दृश्यका आध्यासिक ही सम्बन्ध होता है । जैसे घटादिपर आलोककी व्याप्ति होती है, वैसे ही घटादिपर बुद्धि-व्याप्ति होती है । जैसे आलोकस्थ घट आलोकारूढ़ कहा जाता है, वैसे ही बुद्धिस्थ घट बुद्ध्यारूढ़, कहा जाता है । बुद्धिव्याप्त घटादिपर, चित्प्रतिबिम्ब होता है, उसीसे घटादि प्रकाश होता है । मा० आ० ४५-

७०६ मार्क्सवाद और रामराज्य कार्यकारणसंघातरूप प्राणीका जाग्रत्कालमें बैठना, चलना, काम करना आदि व्यवहार, आदित्य, चन्द्रमा, अग्निरूप ज्योति या प्रकाशके द्वारा सम्पन्न होता है । यहाँ सर्वत्र कार्यकारणावयवसंघातव्यतिरिक्त आदित्यादि ज्योतिसे ही व्यवहार चलता है । इसी तरह मेघाच्छन्न अमावस्याकी रात्रिमें जहाँ कोई भी ज्योति नहीं होती, अपना हाथ भी नही भासित होता, वहाँ भी दूरस्थ श्वान तथा गर्दभ आदिके-शब्दको सुनकर मनसे निश्चित करके उसी शब्दके सहारे प्राणी वहाँतक पहुँच जाता है । ऐसे ही गन्धके सहारे भी जिधरसे गन्ध आती है, उधर प्राणी पहुँच जाता है। यहाँ सर्वत्र देहादि-संघातभिन्न ज्योतिसे ही व्यवहार होता है । ठीक इसी तरह स्वप्न एवं सुषुप्तिकालमें स्वाप्निक-वस्तुओं तथा निद्रामें सौषुप्त अज्ञान एवं सुखका प्रकाश भी किसी संघातव्यतिरिक्त संघातप्रकाशक ज्योतिसे ही मानना उचित है । स्वप्नके बन्धु-संगम, देशान्तर- गमनादि व्यवहार देहादि-संघातव्यतिरिक्त देहादिभासक आत्मज्योतिसे मानना उचित है । स्वप्नादि व्यवहार भी संघातव्यतिरिक्त ज्योतिःपूर्वक है । व्यवहार होनेसे जाग्रत्-व्यवहारके तुल्य जैसे जाग्रतका व्यवहार देहातिरिक्त आदित्यादि ज्योतिर्मूलक हैं, वैसे ही स्वाप्निक व्यवहारको भी देहादिभिन्न ज्योतिर्मूलक मानना चाहिये । स्वप्नव्यवहारमें आदित्यादि ज्योतियोंका सम्बन्ध सम्भव ही नही । अतः कोई अन्तःस्थ आदित्यादि ज्योतिसे विलक्षण अभौतिक आत्मज्योति मानना उचित है । उसीसे स्वप्नका व्यवहार सम्भव हो सकता है । आदित्यादि ज्योति चक्षुरादिसे उपलब्ध होती है । परंतु स्वप्न-व्यवहारका हेतुभूत कोई बाह्यज्योति चक्षुरादिसे उपलब्ध नहीं होती, परंतु ज्योतिका कार्य-व्यवहार स्पष्ट उपलब्ध होता है । अतः संघातभिन्न अदृश्य अन्तःस्थ आदित्यादि विलक्षण अभौतिक ज्योति मानना आवश्यक है । इस सम्बन्धमें यह अनुमान है कि 'विमतं अन्तःस्थमतीन्द्रिय- त्वाद् व्यतिरेकेणादित्यादिवत् ।' विवादास्पद स्वप्नादिव्यवहार-हेतु ज्योति अन्तःस्थ है । अतीन्द्रिय या अदृश्य होनेसे जो अदृश्य नहीं, वह अन्तःस्थ नहीं, जैसे आदित्यादि । इस सम्बन्धमें भौतिकवादीका कहना है कि "उपकारी उपकारकभाव सजातीयमें ही देखा जाता है । जाग्रत-व्यवहार कारक-हेतुभूत आदित्यादि ज्योति देहादिके समान भौतिक ही है । उसी तरह स्वाप्निकव्यवहारके हेतुभूत संघातव्यतिरिक्त ज्योतिको भी संघातके समान भौतिक ही होना चाहिये । जैसे आदित्यादि उपकारक उपक्रियमाण देहादि-संघातके सजातीय होते हैं, वैसे ही स्वाप्निकव्यवहार हेतुभूत उपकारक ज्योतिको भी उपक्रियमाणका सजातीय ही होना चाहिये । अतः जैसे आदित्यादि उपकारक ज्योति भौतिक हैं, वैसे ही स्वाप्निकव्यवहारका उपकारक ज्योति भी भौतिक ही होना चाहिये ।

“जो कहा जाता है कि 'अतीन्द्रिय एव अदृश्य होनेसे वह ज्योति अभौतिक है', यह भी ठीक नहीं; क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रिय ज्योति भी अतीन्द्रिय तथा अदृश्य है । तो भी वे जैसे अभौतिक नहीं, भौतिक ही हैं, उसी तरह उस ज्योतिको भी भौतिक ही होना चाहिये । इसके अतिरिक्त देहादिसंघातके रहनेपर ही चैतन्यरूप अन्तःस्वज्योति रहती है । देहादिके न रहनेपर नहीं रहती । अतः उसे देहादिका ही धर्म मानना उचित है । जैसे रूपादि सघातके रहनेपर ही उपलब्ध होते हैं, अतः वे देहादिके ही धर्म हैं, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिये—'विमतं चैतन्यं शरीरधर्मस्तद्भावभाविन्त्वाद् रूपांदिवत् । विमतं ज्योतिः संघाताद्भिन्नं तद्भासकत्वादित्यादिवत् । विवादास्पद-चैतन्य संघातसे भिन्न है, संघातके भासक होनेसे आदित्यादिके तुल्य यह सामान्यतो दृष्ट-अनुमान व्यभिचारी होनेसे स्वयं अप्रमाण है । क्योंकि भौतिकवादीके मतानुसार देहका भासक होनेपर भी चक्षु देहसे भिन्न नहीं है, उसी तरह चैतन्य भी देहका भासक होनेपर भी देहसे भिन्न न होकर उससे अभिन्न उसका धर्म ही है । अनुमानके द्वारा प्रत्यक्षका बाध भी नहीं होता । मैं मनुष्य हूँ, मै देखता, सुनता और जानता हूँ, इस प्रकार प्रत्यक्ष ही देहादि-संघातमें द्रष्टृत्व, ज्ञातृत्वादि विदित होता है । फिर प्रत्यक्षके विरुद्ध अनुमान कैसे आदरणीय हो सकता है ? “कहा जा सकता है कि 'यदि देह ही आत्मा है और वही द्रष्टा, ज्ञाता आदि है तो अविकल रहनेपर भी वह क्यों कभी द्रष्टा, ज्ञाता होता है, कभी नहीं होता ?' किंतु यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि जो वस्तु जिस तरह प्रमाण- सिद्ध हो, उसको वैसी मानना उचित है । खद्योतमें प्रकाश, अप्रकाश दोनो ही देखा जाता है, अतः दोनों ही मान्य हैं । उसमें किसी कारणान्तरकी कल्पना नही की जाती । अग्निकी उष्णता, जलकी शीतलता जैसे स्वाभाविक है, वैसे ही देहमें कभी ज्ञातृत्व, द्रष्टृत्वादि होना, कभी न होना स्वाभाविक ही है । यदि प्राणियोके धर्माधर्मके कारण औष्ण्य, शैत्यादि माना जायगा, तब तो अनवस्था-दोष होगा ।” भौतिकवादीका उपर्युक्त कथन ठीक नहीं है, कारण कि स्वप्न एव स्मृतिके आधारपर यही सिद्ध होता है कि देहादि-संघातसे भिन्न अभौतिक आत्मा ही द्रष्टा होता है, देहादि नहीं । यह नियम है कि जाग्रत्-कालमें दृष्टका ही स्वप्नमें दर्शन होता है, इस तरह जाग्रत् और स्वप्नका द्रष्टा एक ही होता है । किंतु स्वप्नमें अनेक वस्तुओका दर्शन होता है, वहाँ देह या नेत्रादि नहीं होते । देहादि निर्व्यापार तथा नेत्र निमीलित ही रहते हैं । अतः स्वप्नके प्रपञ्चका द्रष्टा देह नहीं है । साथ ही यह भी स्पष्ट है कि अन्य दृष्टका स्वप्न-द्रष्टा अन्य नहीं

७०८ मार्क्सवाद और रामराज्य

होता अतः जो स्वप्नका द्रष्टा है, वही जाग्रत्का भी द्रष्टा है। यदि स्वप्नका द्रष्टा देहसे भिन्न सिद्ध हो गया तो जाग्रत्का द्रष्टा भी देहसे भिन्न ही मानना उचित है। जब कभी किसी प्राणीके नेत्र नष्ट हो जाते हैं तो वह अन्धावस्थामें भी पूर्वदृष्ट पदार्थोंको स्वप्नमें देखता है। स्पष्ट है कि स्वप्नके पदार्थोंका द्रष्टा देह नहीं है, क्योकि देहमें नेत्र हैं ही नहीं। तात्कालिक नवीन देह या नवीन नेत्र उत्पन्न होते हैं, उनसे स्वाप्निक पदार्थ दीखते हैं, यह कल्पना या संस्कारकी कल्पना भी भौतिकवादमें असङ्गत ही है। जिसने चक्षुके बिना भी स्वप्नमें पूर्वदृष्टका दर्शन किया, चक्षु रहनेपर भी उसीको प्रबोधकालमें द्रष्टा मानना उचित है। कहा जाता है कि स्वप्नमें पूर्वदृष्टके दर्शनका ही नियम नहीं; क्योंकि जन्मान्धोंको भी कभी-कभी स्वप्नमें विविधरूपोंके दर्शन होते हैं। परंतु यह ठीक नहीं, कारण कि जन्मान्धोंको भी जन्मान्तरानुभूतका ही स्वप्नमें दर्शन मानना उचित है, यही जन्मान्तरमें प्रमाण भी है। अतः स्वप्नमें पूर्वदृष्टका ही दर्शन होता है, यह नियम स्थिर है। इसी तरह स्मर्ता और द्रष्टाके भी एकत्वका नियम है। जो द्रष्टा होता है वही स्मर्ता होता है। यह देखा जाता है कि आँख मींचकर मनुष्य पूर्वदृष्टको स्मरण करता हुआ पूर्वदृष्टके समान ही देखता है। यहाँ भी जो नेत्र मीचनेपर पूर्वदृष्टको देख सकता है खुले नेत्र रहनेपर भी उसीको द्रष्टा मानना उचित है। साथ ही यह भी देखा जाता है कि मृत देहमें किसी प्रकारकी विकलता दृष्टिगोचर न होनेपर भी दर्शनादि क्रियाएँ नही होती। अतः मानना पड़ेगा कि जिसके न रहनेपर देहमें दर्शन आदि क्रियाएँ नही हो सकतीं, जिसके रहनेपर दर्शन आदि क्रियाएँ होती हैं, वही द्रष्टा है, देह नहीं। कुछ लोग कहते हैं कि 'चक्षुरादि इन्द्रियाँ ही दर्शनादि क्रियाओकी कर्ता हैं', किंतु यह भी ठीक नहीं। क्योंकि जो मैंने देखा है, वही मै स्पर्श कर रहा हूँ, इस प्रत्यभिज्ञाके अनुसार मालूम पड़ता है कि दर्शन तथा स्पर्शन क्रियाका कर्ता एक ही है। पर चक्षु स्पर्श नहीं कर सकता, त्वक् दर्शन नहीं कर सकता, अतः यही मानना ठीक है कि इन्द्रियोंसे भिन्न आत्मा ही चक्षुरादि विभिन्न इन्द्रियोसे देखने- सुननेवाला है। कुछ लोग कहते हैं कि मन ही द्रष्टा, श्रोता, मन्ता आदि है, किंतु यह भी ठीक नहीं। मन भी रूपादिके तुल्य विषय ही है, फिर वह द्रष्टा नहीं हो सकता। अतः आदित्यादिके समान अन्तःस्थ ज्योति-सघातसे अतिरिक्त है। कहा जाता है कि 'वह ज्योति कार्य-करण सघातका सजातीय ही होना चाहिये, क्योंकि जैसे आदित्यादिज्योति सजातीयके ही उपकारक होते हैं, उसी तरह अन्तर-ज्योति भी सजातीयके ही उपकारक होनेसे उपकार्य भौतिक प्रपञ्चके

समान भौतिक ही होना चाहिये', परंतु यह ठीक नहीं है । कारण कि उपकार्योप- कारकभाव सजातीयमें होनेका कोई नियम नहीं है । पार्थिव ईंधनसे—तृण-काष्ठादिसे, अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होता है, यहाँ अग्निका काष्ठादिसे कोई साजात्य नहीं है और यह भी नहीं कहा जा सकता कि पार्थिव तृणादिसे प्रज्वलनोपकार देखा गया है, अतः पार्थिवत्वादि जातीयसे ही अग्निका उपकार हो, क्योकि वैद्युत अग्नि एव जाठर अग्निका उपकार जलसे ही होता है । इस दृष्टिसे उपकार्योपकारक- भावमें सजातीयता-असजातीयताका कोई नियम नहीं है । अनेक बार देखा जाता है कि स्थावरों तथा पशु आदिकोसे मनुष्योंका उपकार होता है ।

जो कहा जाता है कि 'अदृश्यत्व अतीन्द्रियत्वके कारण कार्य-करण- सघातका भासक तथा उपकारक ज्योतिको अभौतिक नहीं कहा जा सकता, क्योकि चक्षुरादि अतीन्द्रिय एवं अदृश्य होनेपर अभौतिक नहीं, किंतु भौतिक ही हैं । इसी तरह कार्य-करणसघातकी भासक ज्योतिको सघातका ही धर्म मानना

यहाँके समान व्यतिरेक व्याप्ति नही निश्चित होती है; क्योंकि चैतन्य आकाशकी तरह व्यापक होनेसे वह केवलान्वयी है, अतः उसका व्यतिरेक नहीं कहा जा सकता । देहसे अतिरिक्त स्थलमें चैतन्य उपलब्ध न होनेपर भी यह नहीं कहा जा सकता कि 'वह नहीं है'। अभिव्यञ्जक न होनेसे भी अनुपलब्धि कही जा सकती है । जैसे गो व्यक्तिरूप अभिव्यञ्जक होनेसे व्यापक गोत्वजातिकी अभिव्यक्ति न होनेपर भी अनुपलब्धि उत्पन्न हो जाती है । वस्तुतः गोपाल कुटीरमें, हुक्कामें अग्नि बुझ जानेपर भी धूम रहता है । अतः अग्नि एवं धूमकी अभिन्नता या धर्म-धर्मीभाव भी असङ्गत ही है । वस्तुतः 'तद्भावे तद्भावः, तदुपलब्धौ उपलब्धिः ।' तद्भावमे तद्भाव एव तदुपलब्धिमें तदुपलब्धि होनेसे ही तदभिन्नता होती है । मृत्तिकाके भावमें ही घटादिका भाव होता है । मृत्तिकाके उपलम्भमें ही घटादिका उपलम्भ होता है । इसलिये मृत्तिकासे वटादिकी अभिन्नता सिद्ध होती है । अग्निके न रहनेपर भी गोपालकुटीर या हुक्कामें धूम रहता है, अग्निके उपलम्भ बिना भी धूमका उपलम्भ होता है । अतः अग्निसे धूमकी भिन्नता ही है । ठीक इस नियमकी कसौटीपर भूत तथा चैतन्यकी अभिन्नता ठीक नहीं उतरती । भूत रहनेपर भी चैतन्य नहीं रहता और भूतके उपलम्भमें चैतन्यका उपलम्भ नहीं होता है । अग्निकी जल तथा पार्थिव काष्ठादिसे अन्यत्र उपलब्धि न होनेपर भी यह नहीं कहा जा सकता कि अग्नि, जल या काष्ठादिका ही धर्म है । किंतु सर्वसम्मतिसे अग्नि स्वतन्त्र वस्तु है, जल काष्ठादिका धर्म नही । उसी तरह देह, दिल, दिमाग आदि नित्य सिद्ध व्यापक चैतन्यके अभिव्यञ्जक हैं, अतः उनके बिना चैतन्यका उपलम्भ नहीं । फिर चैतन्य देहादिका धर्म नहीं, किंतु वह उनसे भिन्न स्वतन्त्र ही है । सामान्यतो दृष्टानुमानसे ही प्राणियोंकी भोजन-पानादि प्रवृत्ति होती है । यदि उसकी मान्यता न होगी तब तो अभुक्त अपीत भोजनादिमें प्रवृत्ति ही नहीं होगी । खद्योत आदिमें पक्षके संकोच- विकाससे प्रकाश-अप्रकाश उपपन्न है । किंतु यदि देहका दृष्टत्व धर्म है, तो कभी उसका उपलम्भ कभी उसका अनुपलम्भकी व्यवस्था नही उपपन्न हो सकेगी । भूत रहनेपर भी चैतन्य नहीं रहता और भूतके उपलम्भमें भी चैतन्यका उपलम्भ नही होता । अतः भूत एवं चैतन्यका न अभेद ही सिद्ध होता है न धर्म-धर्मी-भाव ही सिद्ध होता है । [

श्रुतियोंसे ज्ञात होता है कि व्यष्टि-समष्टि, स्थूल-सूक्ष्म कार्य-कारणात्मक, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डावलि-स्वरूप अखिलप्रपञ्चके भानके पहले ही भासित होनेवाले अखिल निगमा- गमादि सच्छास्त्रोंके महातात्पर्यविषय अद्वय होते हुए भी अपरोक्ष होनेके कारण स्वप्रकाशरूप होनेसे भगवान् साक्षात् अपरोक्ष ही हैं। प्रमाता भी प्रमेयकी अवगतिके लिये ही प्रमाणकी अपेक्षा करता है, अपनी अवगतिके लिये नहीं । यदि कहा जाय कि 'एकहीको कर्म और कर्ता मानना विरुद्ध है, अतः प्रमाताकी अवगतिके लिये भी अन्य प्रमाताकी अपेक्षा है' तो यह ठीक नहीं। ऐसा माननेपर उस प्रमाताकी अवगतिके लिये किसी अन्य प्रमाताकी तथा उसकी अवगतिके लिये किसी दूसरे प्रमाताकी अपेक्षा होगी और इस तरह अनवस्था-दोष प्रसक्त होगा । साथ ही उसमें भ्रान्ति, संशय और अज्ञान भी नहीं दिखायी पड़ते हैं। जिसके अनुग्रहसे मातृ, मान और मेयका यथार्थ अवभास होता है, वह मातृ-मानकी अपेक्षा किये बिना संशय आदिका अविषय होकर साक्षात् अपरोक्ष हो तो क्या आश्चर्य ? फिर भी अनादि, अनिर्वाच्य, अचिन्त्य, महामहिमशालिनी भगवच्छ- क्तिभूत मायासे प्रत्यक्चैतन्याभिन्न, सजातीय-विजातीय स्वगतभेदशून्य, अद्वय आनन्दका अस्तित्व भी जब तिरोहित हो गया है, तब स्वप्रकाशता आदिका तो कहना ही क्या ? क्योंकि प्रत्यक्ष आदिसे स्फुरद्रूपप्रपञ्च ही सर्वत्र दिखायी पड़ रहा है । मायाके सम्बन्धमें श्रीमद्भागवतमें बतलाया गया है कि अर्थके बिना प्रतीत होती हुई भी जो आत्मामें प्रतीत नहीं होती, उसे ही आत्माकी माया समझना चाहिये—‘ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । तद् विद्यादात्मनो मायाम्’ (श्रीमद्भा० २।९।३३) ।

अनधिगत अबाधित अर्थकी ज्ञानस्वरूप प्रमाकी उत्पत्तिके लिये उसके कारणभूत प्रमाणोंकी अपेक्षा हुआ करती है; क्योंकि प्रमाणोंके अधीन ही प्रमेयकी सिद्धि हुआ करती है । प्रत्यक्षमात्र प्रमाण माननेवाले चार्वाक और तदनुयायी अनात्माभिमुख साम्यवादी, समाजवादी आदि आधुनिक लोग आम्रसम्बन्धी बीजसे अङ्कुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पल्लव, पुष्प, फल और रसरूप परिणामकी तरह मस्तिष्क, मन, बुद्धि आदिकी तरह आत्माका भी परिणाम मानते हुए पृथिव्यादि चार भूतोंके अतिरिक्त तत्त्व तथा अर्थ, कामके अतिरिक्त पुरुषार्थ और प्रत्यक्षातिरिक्त प्रमाण नहीं मानते । इनमें कोई देहको, कोई चक्षुरादि इन्द्रियों और कोई प्राणको ही आत्मा मानते हैं ।

प्रतिपत्ति (बोध) का फल संशय, विपर्यय तथा अज्ञानकी निवृत्ति है । प्रतिपादयिता (वक्ता) प्रतिपित्सित (ज्ञातव्य) पदार्थकी प्रतिपिपादयिषा (प्रतिपादनेच्छा) से वाणीका प्रयोग किया करता है। अनुमान एवं वाक्यको

७१२ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रमाण न माननेवाले लोग परस्परके संशय, भ्रान्ति, अज्ञानको किस तरह जान सकेंगे, किस तरह उन्हे दूर करनेका प्रयत्न कर सकेंगे और किस तरह परप्रति- पित्सितको जाने बिना प्रेक्षावान् व्यक्ति अप्रतिपित्सित अर्थका उपदेश कर सकेंगे ? अतः अनुमान प्रमाण माने बिना 'अनुमान प्रमाण नहीं है' यह वचनप्रयोग भी अनुपपन्न है । साथ ही परप्रत्यक्षमें अनधिगत अबाधित तथा अनुमानमें उसका अभाव भी बिना अनुमान-प्रमाण माने कैसे जाना जा सकता है ? पशु-पक्षी भी मोदकादिका ग्रास हाथमें लिये हुए पुरुषोको देखकर उधर प्रवृत्त होते तथा दण्डादि देखकर अनिष्टकारणताका अनुमानकर उस ओरसे निवृत्त होते देखे जाते हैं। आत्मा इदंकारके आस्पद देह-इन्द्रिय, मन और विषयोंसे पृथक् 'मै' इस तरह असंदिग्ध अविपर्यस्तरूपसे अपरोक्ष अनुभवसिद्ध ही हैं, क्योकि 'मै हूँ या नहीं हूँ' अथवा 'नहीं हूँ' ऐसे संशयका अनुभव नहीं होता । 'मैं स्थूल हूँ, कृश हूँ, बोलता हूँ, जाता हूँ,' इत्यादि देहधर्मका सामानाधिकरण्य देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि अहंप्रत्यय देहविषयक होता है । यदि ऐसा ही मान ले तो बाल्य, यौवनादिका भेद होनेपर भी अहंप्रत्यालम्बनकी 'मै वही हूँ, जो बाल्य-यौवन आदिमें था', ऐसी प्रत्यभिज्ञा न हो सकेगी, किन्तु वैसी प्रत्यभिज्ञा होती है । अतः व्यावृत्त अनेक पुष्पोंमें अनुवृत्त एक सूत्रके समान बाल-युवा आदि अनेक व्यावृत्त शरीरोंमें अनुवृत्त एक अहंकारास्पद उन शरीरादिसे भिन्न आत्मवस्तु मानना अनिवार्य है । समस्त-व्यस्त बाह्य पृथिवी आदि भूतोमे चैतन्यका उपलम्भ न होनेके कारण चैतन्यको भूतोका धर्म भी नहीं कहा जा सकता । यदि कहा जाय कि 'मद्याकारसे परिणत यवादिकणोके अनुभूयमान मादक शक्तिके समान देहाकारसे परिणत भूतोंका ही धर्म चैतन्य शक्ति है' तो यह भी ठीक नहीं; क्योकि देहके रहनेपर भी मृतावस्थामें चैतन्यका उपलम्भ नहीं होता । संयोगादिके समान जबतक देह रहता है, तबतक चैतन्य रहता है—यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि चैतन्यको तब रूपादिके समान विशेष गुण मानना पड़ेगा और ऐसा माननेपर यावद्देहभावित्वेन चैतन्यकी उपपत्ति सङ्गत नहीं हो सकती; क्योंकि भूत जैसे रूपरहित नहीं होता, वैसे ही देहको कभी चैतन्यरहित होकर नहीं रहना चाहिये, यही बात इच्छादिके सम्बन्धमे समझ लेनी चाहिये । मृतावस्थामें प्राणचेष्टादि नहीं दिखायी पड़ते, अतः यह भी मान लेना चाहिये कि उक्त देहधर्म आत्माके अधिष्ठानसे ही व्यक्त होते हैं । रूप आदि देहसम्बन्धी धर्मोंके अन्य व्यक्तिद्वारा प्रत्यक्ष होनेपर भी ज्ञान, इच्छा आदि आत्मधर्म अन्यसे प्रत्यक्ष नहीं किये जाते, अपितु वे स्वप्रत्यक्ष ही हुआ करते हैं ।

मार्क्स और आत्मा ७१३ यदि समुदायभूत अवयवीको चेतयिता कहे तो एक भी अवयवके कट जानेपर अवयवी-समुदाय ही कट जायगा और इस तरह प्रेतत्वापत्ति होगी। इसे इष्टापत्ति भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अवयव कट जानेपर भी अवयवीमें चैतन्य उपलब्ध होता है। यदि प्रत्येक अवयवको चेतयिता माने तो बहुतोंका अन्योन्याभिमुख होकर रहना सदा सम्भव नहीं है। उन परस्पराभिमुखोंका स्वातन्त्र्य मानने या परस्पर प्रतिबद्ध सामर्थ्यवालोंका स्वातन्त्र्य अथवा विरुद्धदिशाकी ओर क्रिया करनेमे अभिमुखका स्वातन्त्र्य मानने किंवा परस्परका स्वातन्त्र्यपरस्परसे प्रतिबद्ध माननेपर या तो शरीर नष्ट हो जायगा या निष्क्रिय हो जायगा। देहके रहनेपर जीवित दशामें ज्ञान, इच्छा आदिके रहनेपर भी देहाभाव- दशामें उनकी सत्ता नहीं रहती, ऐसा नहीं कहा जा सकता। उनकी अनुपलब्धि होनेसे उनके असत्त्वका निर्णय नहीं किया जा सकता; क्योंकि विद्यमान रहनेपर भी व्यञ्जकके अभावमें उपलब्धि न होना सम्भव है। विभु ( व्यापक ) होनेके कारण जाति सर्वत्र विद्यमान रहनेपर भी व्यञ्जक व्यक्तिके अभावमे जैसे उसका उपलम्भ नहीं हुआ करता, वैसे ही व्यञ्जक देहके न रहनेपर चैतन्यका अनुपलम्भ उपपन्न हो सकता है। अथवा जैसे काष्ठ आदि अग्निके व्यञ्जक हैं, अतः उनके रहनेपर ही अग्निकी अभिव्यक्ति होती है, तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि काष्ठके अभावमें अग्निका अभाव होता है अथवा काष्ठ तथा अग्निका धर्म-धर्मिभाव है। धर्म धर्मिभावका निर्णय अन्वय-

७१४ मार्क्सवाद और रामराज्य जा सकता, अपितु उन्हें भूतपरिणामभेद ही कहना पड़ेगा । तथाच भूतधर्म रूपादि जड़ होनेके कारण जैसे विषय हैं, विषयी नहीं, वैसे ही भूतधर्म । जड़ होनेके कारण चैतन्यको भी विषय मानना पड़ेगा, विषयी नहीं । यदि कहा जाय कि 'भूतधर्म होनेपर भी किन्हींका विषयित्व भी मान्य है, तो यह उचित नहीं, क्योंकि अपने-आपमें वृत्तिरूप विरोध होगा, जैसा कि अभी कहा गया । लोकायतिक पृथिव्यादि चार भूतोंके अतिरिक्त अन्य किसी तत्त्वका अस्तित्व अङ्गीकार नहीं करते । भूत-भौतिक पदार्थोंके अनुभवको यदि चैतन्य वस्तु कहा जाय, तो वे विषय हैं, अतः अपने-आपमें क्रियाविरोधके कारण चैतन्यको उनका धर्म कहना उचित नहीं है । अग्नि दाहक होनेपर भी अपने-आपको नही जला सकता, सुशिक्षित भी नट अपने स्कन्धपर नहीं चढ सकता । इसी प्रकार चैतन्य यदि भूत- भौतिकधर्म हो, तो वह भूत-भौतिकोको विषय नहीं कर सकता । रूप आदि अपने और दूसरेके रूपको विषय नहीं कर सकते, किंतु बाह्य, आध्यात्मिक भूत-भौतिको- को चैतन्य विषय करता है । यदि भूतादिविषयक चैतन्यरूप उपलब्धिका अस्तित्व मान लिया जाता है, तो भूतव्यतिरिक्त पदार्थका अस्तित्व भी मान लेना पड़ेगा । तथाच उपलब्धिरूप आत्मा देहादिसे अतिरिक्त सिद्ध हो जाता है । 'मैने उसे देखा था' जिस प्रकार अवस्थान्तरमें भी उपलब्धिरूपसे प्रत्यभिज्ञान होने और स्मृति आदि उत्पन्न होनेके कारण उस स्वरूपात्माकी एकरूपता स्पष्ट है, अतः उसको नित्य माननेमे कोई आपत्ति नहीं । इस प्रकार दीपक आदिके रहनेपर यद्यपि उपलब्धि होती है, उसके अभावमें नहीं, तथापि उपलब्धिको जैसे दीपकका धर्म नहीं कहा जाता, वैसे ही देहके रहनेपर उपलब्धि होती है, उसके न रहनेपर नहीं, फिर भी उपलब्धिको देहका धर्म नहीं कहा जा सकता । दीपककी तरह केवल उपकरणमात्र मान लेनेसे भी देहका उपयोग उपपन्न हो जाता है । स्वप्नावस्थामें इस देहके निश्चेष्ट पड़े रहनेपर भी अनेक प्रकारकी उपलब्धियोंका होना अनुभव सिद्ध है, अतः यह स्पष्ट है कि चैतन्य भूत-भौतिकोका धर्म नहीं है । 'एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति' इत्यादिके अनुसार यह नहीं कहा जा सकता कि देहादिसे व्यतिरिक्त होता हुआ भी आत्मा उन देहादिको- के साथ ही उत्पन्न होता है और उनके साथ ही विनष्ट हो जाता है । जन्मान्तरीय अदृष्टको माने बिना न तो देहादिका वैलक्षण्य उपपन्न हो सकता है और न प्राक्तन संस्कारोंके अभावमें शिशुकी स्तन्यपानमें प्रवृत्ति ही बन सकती है । अतः देहादिसे अतिरिक्त नित्य आत्मा मानना अनिवार्य है । इन्द्रियोंको आत्मा माननेवालोके पक्षमे भी बहुत चेतन माननेवालोके पक्षमे बतलाये दोष उपस्थित होते हैं । 'मै देखता हूँ, सुनता हूँ, स्वाद लेता हूँ,

मार्क्स और आत्मा ७१५ सँघता हूँ, स्पर्श करता हूँ, इच्छा करता हूँ' इत्यादि रूपसे एक आत्मविषयक अनुभव होनेके कारण देखने, सुनने, सूँघने, स्पर्श आदि करनेवालोंको परस्पर भिन्न नहीं कहा जा सकता । यदि भिन्न कहें, तो उनका विरोध ध्रुव है । अतः मन तथा इन्द्रियोंकी अन्तर्बाह्यकरणता ही है, कर्तृत्व नहीं; क्योंकि 'कुठारसे छेदन करता हूँ, घोड़ेसे लाँघता हूँ इत्यादिके समान 'आँखसे देखता हूँ, कानसे सुनता हूँ' इत्यादि व्यवहार दृष्टिगोचर होते हैं । चक्षु, श्रोत्र आदि इन्द्रिय और मन, बुद्धि, अतीन्द्रिय होनेके कारण प्रत्यक्ष नहीं हैं । उपलभ्यमान नेत्र आदिको इन्द्रिय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे स्वयं इन्द्रिय नहीं, अपितु उनके गोलक हैं । इसलिये गोलकका उपघात न होनेपर भी इन्द्रियका उपघात होनेसे विषयका ग्रहण नहीं होता । दहनकर्ता होता हुआ भी अग्नि जैसे अपना दहन नहीं करता, अपितु काष्ठ आदिका ही दहन करता है, वैसे ही इन्द्रियाँ भी स्ववृत्तिविरोधके कारण अपने अवगममें अक्षम होती हैं । देखना, सुनना, सूँघना, चलना, सोचना, जानना आदि क्रिया होनेसे करणपूर्वक होते हैं, इत्यादि अनुमानसे इन इन्द्रियोंका ज्ञान होता है । युगपद् ज्ञानानुत्पत्तिरूप लिङ्गसे मन आदि भी उसी प्रकार अनुमानगम्य हैं, अतः बिना अनुमान-प्रमाण माने कैसे इन्द्रियादिकी सिद्धि हो सकती है और इन्द्रियादिकी सिद्धि हुए बिना इन्द्रियात्मवाद कैसे सिद्ध हो सकता है ? बल्कि अचेतनोंकी प्रवृत्ति चेतनाधिष्ठित हुआ करती है, जैसे रथ आदिकी प्रवृत्ति अश्व, सारथी आदि चेतनोंसे अधिष्ठित होती है । इस वैज्ञानिकयुगमें भी स्वयंचालित विभिन्न यन्त्रोंमें संयोजक और प्रथमप्रवर्तक चेतन ही अपेक्षित हुआ करता है। इसे चाहे स्वभाव कहा जाय, किंतु इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता, क्योंकि स्वभावको यदि असत् कहें तो वह कार्यकारणक्षम नहीं हो सकता । यदि सत् हो तो भी यदि वह अचेतन है तो उसकी भी वही स्थिति रहेगी । यदि स्वभाव चेतन है, तब तो नाममात्रका ही भेद हुआ । देहादिसंघात संघात होनेके कारण शय्या, प्रासाद आदिके समान परार्थ होता है । शय्या आदि पदार्थ जैसे अपनेसे विलक्षण किसी देवदत्त आदिके लिये होते हैं, वैसे ही देहादिसंघात भी अपनेसे विलक्षण आत्माके लिये ही हैं। देहादि- संघात जब कि अचेतन अनेकात्मक, अनित्य, दुःखरूप और अपूर्ण होते हैं, तब उनसे विलक्षण चेतन एक, असंहत, नित्य, पूर्ण, आनन्दरूप आत्मा सिद्ध होता है । साथ ही अचेतनोंकी प्रवृत्ति अचेतनके लिये नहीं, अपितु इष्टप्राप्ति तथा अनिष्टपरिहारके इच्छुक किसी चेतनके लिये ही होती है, यह मानना पड़ेगा । किसी भी अचेतन पदार्थमें न तो इष्टप्राप्ति तथा अनिष्ट-परिहारकी इच्छा दिखायी पड़ती है, न इष्ट अनिष्ट, सुख-दुःखकी प्राप्ति और परिहार ही ।

७१६ मार्क्सवाद और रामराज्य वैनाशिक बौद्ध (शून्यवादी) तीन प्रकारके होते हैं—(१) सर्वसत्तावादी, (२) विज्ञानमात्र सत्तावादी (३) और सर्वशून्यवादी। इनमें सर्वसत्तावादियोंके सिद्धान्तमें खरस्वभाव पार्थिव परमाणुओका सङ्घात पृथिवी, स्नेह, स्वभाव जलीय परमाणुओका सङ्घात जल, उष्णस्वभाव परमाणुओका सङ्घात तेज (अग्नि) और गतिस्वभाव वायवीय परमाणुओका सङ्घात वायु ये चार बाह्य पदार्थ हैं। इन्हें भूत भौतिकशब्दसे कहा जाता है। इसी प्रकार रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा और संस्कार ये पञ्चस्कन्ध अन्तर पदार्थ हैं। विषयसहित इन्द्रियाँ रूपस्कन्ध, विषयोंका ज्ञान-विज्ञान स्कन्ध, सुख-दुःखानुभव वेदनास्कन्ध, सविकल्पज्ञान संज्ञास्कन्ध और राग-द्वेषादि क्लेश संस्कार स्कन्ध हैं। इन्हें चित्त-चैत्तिक कहा जाता है। इन्हीं पाँच स्कन्धोंका सङ्घात ही आत्मा है। यद्यपि बौद्धोका परम तात्पर्य शून्यवादमें ही है, तथापि हीन, मध्यम और उच्च आदि बुद्धिभेदसे इनके तीन भेद हो जाते हैं। यह बात बोधिचित्तविवरणमें स्पष्ट की गयी है— देशना लोकनाथानां सत्त्वाशयवशानुगा। भिद्यते बहुधा लोक उपायैर्विविधैः पुनः॥ १॥ गम्भीरोत्तानभेदेन क्वचिच्चोभयलक्षणा। भिन्नाऽपि देशनाऽभिन्ना शून्यताऽद्वयलक्षणा॥ २॥ बुद्धोंके उपदेश शिष्योके अभिप्रायके ही अनुसार होते हैं। जैसे-जैसे शिष्य बढ़ते हैं, व्याख्या भी बढ़ती जाती है। कहीं अत्यन्त गम्भीर, कही उत्तान इस तरहका उपदेश होता है, परंतु सबका तात्पर्य सर्वशून्यमे ही होता है। इस तरह बाह्यभूत भौतिक और आध्यात्मिक चित्तचैत्तिक समुदाय ही वैभाषिक और सौत्रान्तिक बौद्धोके मतमें आत्मा है। बाह्यार्थको केवल अनुमेय मानकर प्रत्यक्ष न माननेवाले बौद्ध—'सौत्रान्तिक' कहे जाते हैं। किंतु आन्तर विज्ञानके समान ही बाह्यार्थको भी प्रत्यक्ष सिद्ध माननेवाले बौद्धको वैभाषिक कहते हैं। इससे अतिरिक्त नित्यचेतन आत्मा नहीं है। विचार करनेपर इन भूतभौतिको चित्तचैत्तिकोंका समुदाय नही बन सकता। कारण इनमें समुदाय अचेतन है। चेतन (ज्ञानवान्) कुलालादि ही मृत्तिका, चक्र, चीवर, आदि कारण कलाप एकत्रित कर समुदायी घटका निर्माता देखा गया है। मृत्तिका, चक्र, चीवर आदिके सञ्चालक चेतन कुलालादिके न रहनेपर अचेतन मृत्तिका दण्डादि स्वयं व्यापारवान् होकर घटकी रचना नहीं कर सकते। चेतनके न रहनेपर अचेतन तुरी-वेमा आदि कपड़ा स्वयं नहीं बुन लेते। इसलिये कार्योत्पादन क्षमतावाली सामग्री एकत्रित होनेपर ही कार्यकी उत्पत्ति होती है। कार्योत्पादनक्षम सामग्रीका एकत्रीकरण चेतन विचाराधीन है। यदि कहा जाय कि चित्त ही चेतन

मार्क्स और आत्मा ७५७ है और इन्द्रियादि विषय सम्पर्क होनेपर स्वयं प्रदीप्त होकर यथायोग्य आवश्यकता- नुसार कारण चक्रको प्रकाशित करता हुआ अचेतन करणोंद्वारा कार्य सम्पादन करता है तो यह भी ठीक नहीं, कारण-समुदाय सिद्धिके बाद ही चित्तका अभिज्वलन सिद्ध होगा, और चित्त अभिज्वलनके बाद समुदाय-सिद्धि होगी। इस प्रकार यहाँ इतरेतराश्रय दोष दुष्परिहर हो जायगा। पहले जन्मकी चित्ताभिदीप्ति उत्तरकालिक समुदाय'का सङ्घटन करती है यह भी कहना ठीक नहीं, क्योंकि सङ्घटनके समयसे चित्तकी दीप्ति बहुत पहले ही बीत चुकी, अतः वह उत्तरकालिक सङ्घटनकी क्षमता नहीं रख सकती। कारण विन्यास-विशेषका जानकार ही कर्ता होता है। अन्वय-व्यतिरेकके बिना विन्यास- विशेष जाना नहीं जा सकता। अनवस्थायी क्षणिक चेतन अन्वय-व्यतिरेकका विज्ञाता हो नहीं सकता। भूतभौतिक-चित्त-चैत्तिक समुदायसे अतिरिक्त स्थिर सहन्ता- चेतन इस सिद्धान्तमें मान्य नहीं है। यदि माना जाय कि परस्परानपेक्ष असंनिहित कारण चेतन संनिधापयिताके बिना ही कार्योत्पादन करेंगे, तो फिर सदा ही कार्यप्रसक्ति बनी रहेगी। परंतु ऐसा है नहीं। यदि कहा जाय कि अहंकारास्पद आलयविज्ञान ही पूर्वापरका अनुसन्धान करनेवाला है वही प्रतिष्ठाता ( संनिहित करनेवाला ) हो जायगा, तो यह भी ठीक नहीं। कारण यदि आलय-विज्ञान एक और नित्य माना जाय तो वह नामान्तरसे आत्मा ही सिद्ध होगा और यदि वह क्षणिक विज्ञान रहा तो पूर्वोक्त दोष तदवस्थ रहेंगे। यदि कहे कि आलय-विज्ञान नहीं किंतु उसका संतान ( परम्परा ) कारणो- न्का संनिधापयिता होगा, तो वह भी उपेक्षणीय है; क्योंकि सतान यदि विज्ञानसे अभिन्न है तो क्षणिक होनेके कारण पूर्वोक्त दोष दुरुद्धर ही है, यदि भिन्न है तो नित्य-विज्ञान आत्मा ही सिद्ध हो गया तथा सभी पदार्थोंकी क्षणिकता माननेके कारण समुदायियोंकी प्रवृत्ति बन नहीं सकती। प्रवृत्तिके प्रथम क्षणमें तथा प्रवृत्ति- क्षणमें समुदायी रहे तभी उनकी प्रवृत्ति हो सकती है। क्षणिक होनेके कारण वे दो क्षण टिक नहीं सकते। भिन्नकालमें उनकी स्थिति मानी जाय तो आधाराधेयभाव नहीं बन सकता। इस तरह समुदायकी सिद्धि नहीं हो सकती और समुदायसिद्धि न होनेपर तदाश्रित लोकयात्रा भी न बन सकेगी। इन्हीं दुरुद्धर दोषोंके कारण आजकल बौद्धलोग एक नित्य कूटस्थ आत्मा माननेकी वात करने लगे हैं तथा क्षणिकता अनित्यताको ही मान लेते हैं। फिर भी बौद्धोंका कहना है कि यद्यपि बौद्धमतमें कोई स्थिरभोक्ता या प्रशासिता चेतन सामग्री सङ्घटन करनेवाला मान्य नहीं है, फिर भी अविद्यादि ही आपसमें एक-दूसरेके कारण होते हैं, अतः लोकयात्रा बन जाती है। लोकयात्रा उपपन्न हो जानेपर फिर और कुछ भी उपेक्षित नहीं है।

७१८ मार्क्सवाद और रामराज्य यहाँ संक्षेपमें बौद्धप्रक्रिया समझ लेनी आवश्यक है, बुद्धने प्रतीत्य-समुत्पाद- का वर्णन किया है । प्रतीत्य-समुत्पादके सूचक बुद्धसूत्र हैं—‘‘उप्पादावा तथा गतानम्, अनुप्पादावा तथागतानं ठिताव सा धातु धम्म द्वितता धम्म ( नियामकता इदप्पच्चयता इति रेवो भिक्खवे परिच्च समुप्पादोति संयुत’’ ( कल्पतरु २।१ । २६।) भामतीकार कल्पतरुकार आदिकोंने इन सूत्रोंकी स्पष्ट व्याख्या की है । सूत्रोंका संस्कृतरूप यह है--- उत्पादा तथागतानामनुत्पादाद्वा स्थितैवैषा धर्माणां धर्मता । धर्मस्थितिता धर्मनियामकता प्रतीत्य समुत्पादानुलोभता ॥’’ सार यह है कि प्रत्येक कार्यमें दो प्रकारसे कारण सम्बन्ध होता है, हेतूप- निबन्ध एवं प्रत्ययोपनिबन्ध । प्रथम एकैककारण सम्बन्ध होता है, दूसरा कारणसमुदाय सम्बन्ध होता है। एक बीजरूपी हेतुका अङ्कुररूपी कार्यसे सम्बन्ध हेतूपनिबन्ध है। पृथिवी, जल, तेज, वायु आदि अनेक कारणोंका अङ्कुरसे सम्बन्ध प्रत्ययोपनिबन्ध है। हेतुं हेतु प्रत्यन्ते इति प्रत्यया हेत्वन्तराणि मुख्य हेतुके प्रति सम्मिलित होनेवाले सहकारि कारण समूह प्रत्यय है ‘प्रत्ययाः सन्त्यस्मिन्निति प्रत्ययः’ अनेक प्रत्यय ( कारण ) जिस समवायमें हो वह प्रत्यय हेतुसमुदायका बोधक होता है ।

  • ‘‘इदं प्रत्ययफलम्—इदं कार्यं प्रत्ययस्य कारणसमुदायमात्रस्य फलं न चेतनस्य कस्यचिदित्यर्थः’’ । अर्थात् कार्य इतरसहकारियोंसे सम्मिलित मुख्य हेतुरूप प्रत्ययका फल है। सारांश यह है कि अनेक सहकारी कारणोसे युक्त मुख्य हेतु ही कार्यमात्रका कारण है । कोई चेतन या ईश्वर कारण नहीं है। हेतूपनिबन्धका सूचक है—उत्पादाद्वा तथा गतानामित्यादि’’ । ‘‘तथागतानां बुद्धानां मते धर्माणां कार्याणां कारणानाञ्च या धर्मता कार्यकारणभावरूपा एषा उत्पादाद्वा अनुत्पादाद्वा स्थिता, धत्ते इति धर्मः कारणम्, ध्रियते धर्मः कार्यम् यस्मिन्सति यदुत्पद्यते असति च नोत्पद्यते तत्तस्य कारणम् कार्यञ्च न क्वचित्कार्यसिद्धये चेतनोऽपेक्ष्यते । अर्थात् बुद्धोंके मतमें कार्य एवं कारणोंकी कार्यकारणभावरूप धर्मता उत्पाद एव अनुत्पादके अन्वय व्यतिरेकसे सिद्ध है। जिसके रहनेपर जो उत्पन्न होता है जिसके न रहनेपर जो नही उत्पन्न होता है वही कारण और कार्य है। जो उत्पन्न होता है वह कार्य है जिसके रहनेपर ही उत्पन्न होता है वही कारण है। धारण करनेवाला धर्म कारण है ध्रियमाण धर्म कार्य है। इस प्रकार यहाँ उत्पादाद्वा अनुत्पादाद्वा इन पदोंका अन्वय-व्यतिरेक अर्थ हुआ। धर्मस्थितिता कार्यता है; क्योकि कार्यरूप धर्म ही कारणको अतिक्रमण

क्रियं विना काल विशेषमे स्थिति होती हे । स्थिति शब्दसे स्वार्थमें ही तल् प्रत्यय होनेसे स्थिति अर्थमें स्थितताका प्रयोग है । धर्मनियामकता कारणता है । धर्म अर्थात् कारण कार्यके प्रति नियामक है । यदि कहा जाय कि इस प्रकारका कार्यकारणभाव विना चेतनके नहीं हो सकता है, तो इसका समाधान है कि 'प्रतीत्य समुत्पादानुलोभता कारणे सति तत्प्रतीत्य प्राप्य समुत्पादानुलोमता प्रतीत्य समुत्पादानुसारिता या सैव धर्मता सा चोत्पादा सा नु व्यादात्मा धर्माणा स्थिता । न चेतनः कश्चिदुपलभ्यते' । अर्थात् कारणके रहनेपर कारणको प्राप्त करके कार्य समुत्पादका अनुसरण करनेवाली धर्मता होती है । अन्वय-व्यतिरेकानुसारिणी कारण एव कार्यमें स्थित है । यह प्रतीत्य समुत्पाद दो कारणोंसे सिद्ध होता है । हेतूपनिवन्धसे तथा प्रत्ययोप- निवन्धसे । एक मुख्य कारणसे सम्वन्धित हेतूपनिवन्ध होता है, अनेक सहकारी कारणोसे सम्बन्धित प्रत्ययसमवाय सम्वन्धित प्रत्ययोपनिवन्ध है । उनके भी दो भेद हैं । ( १ ) बाह्य और ( २ ) आध्यात्मिक । ( १ ) बाह्य—बीजसे अङ्कुर, अङ्कुरसे पत्र, पत्रसे काण्ड, काण्डसे नाल, नालसे गर्भ, गर्भसे शूक, शूकसे पुष्प और पुष्पसे फल होता है । इसमें बीजको ज्ञान नहीं होता कि मै अङ्कुरको उत्पन्न कर रहा हूँ । इसी तरह अङ्कुर पत्र और पुष्प आदिको भी ज्ञान नहीं होता कि मै अपनेसे पश्चात् उत्पन्न होनेवालोको उत्पन्न कर रहा हूँ । इसी प्रकार अङ्कुर पुष्प फलादिको भी यह ज्ञान नहीं होता कि मुझे बीजने उत्पन्न किया है । यह बाह्य हेतूपनिवन्धका उदाहरण है । छः धातुओके समवायसे ही बीजसे अङ्कुर हो सकता है अन्यथा नहीं । इसमें पृथिवी धातु बीजका सग्रह करती है । जिससे अङ्कुर कठिन हो जाता है, जलधातु स्नेह व तेजधातु परिपाक करता है । वायुधातु बीजसे अङ्कुरको ऊपर फेकता है, और आकाश धातु बीजका अवयव अलग करता है । ऋतु भी बीजका परिपाक करता है । अविकल छः धातुओके समुदायसे ही बीज अङ्कुररूपमे परिणत होता है । इनमें न तो पृथिवी धातुको यह ज्ञान रहता है कि हमने बीजका सग्रह-कृत्य किया है और न तो ऋतुको ही ज्ञान होता हे कि हमने बीजका परिणाम किया है । साथ ही अङ्कुरको भी यह ज्ञान नहीं होता कि मुझे इन धातुओने बनाया है । यह बाह्य प्रत्ययोपनिवन्धका उदाहरण है । ( २ ) आध्यात्मिक—इसी तरह अविद्यासे संस्कार, सस्कारसे जन्म तथा जन्मसे जरा और मृत्यु होती है । अविद्याको ज्ञान नहीं होता कि मैने सस्कारको बनाया है और न सस्कारको ही ज्ञान होता है कि मुझे अविद्याने बनाया है । यह आध्यात्मिक हेतूपनिवन्धका उदाहरण है ।

७२० मार्क्सवाद और रामराज्य इसी तरह पृथिवीसे तेज, वायु, आकाश और विज्ञानधातुओके समवायसे शरीर बनता है । पृथिवी धातुसे शरीरकी कठिनता और जलसे शरीरका स्नेह होता है । तेजधातु भुक्त-पीतका परिपाक करता है, वायुधातु श्वास-प्रश्वासादि करता है, आकाश शरीरके भीतर अवकाश प्रदान करता है । विज्ञानधातु पञ्चज्ञानेन्द्रिय युक्त मनोविज्ञानको उत्पन्न करता है। यह आध्यात्मिक प्रत्ययोपनिबन्धका उदाहरण है । इन छः धातुओकी जो पिण्ड संज्ञा, पुद्गल संज्ञा ( परमाणुसंज्ञा ) मनुष्य संज्ञा, अहंकार-संज्ञा, ममकार-संज्ञा यह अविद्या है। यही अविद्या संसारका (अनर्थ सामग्रीका ) मूल कारण है। अविद्याजन्य राग-द्वेष-मोहात्मक संस्कार विषयोंमें प्रवृत्ति कराते हैं। वस्तु-विषयज्ञान ही विज्ञान है। इन सबको एक प्रकारसे नामरूप कह सकते हैं। शरीरकी कलल बुद्बुद आदि अवस्था और नामरूप मिश्रित इन्द्रियाँ षडायतन कही जाती हैं। नामरूप इन्द्रियोंका सम्बन्ध ही स्पर्श है। स्पर्शसे सुख-दुःखादि वेदना होती है। वेदनाके अनन्तर मुझे सुखप्राप्तिके लिये यह कार्य फिर करना चाहिये ऐसा निश्चय तृष्णा है । उसमें वाणी शरीरकी चेष्टा है, उसका नाम उपादान है। उससे धर्माधर्म होते हैं। उसका नाम भव है उसीसे जन्म होता है। जन्मसे ही जरा-मृत्यु होती है, उससे अन्तर्दाह शोक होता है, शोकसे विलाप, दुःख और दौर्मनस्य होता है। यह परस्परहेतुक अविद्यादि सार्वजनिक अनुभवसिद्ध हैं। इनका अपलाप नहीं किया जा सकता । ये जन्मादिहेतुक अविद्यादि और अविद्यादिहेतुक जन्मादि चक्र घटीयन्त्रके समान निरन्तर चलता रहता है, तथा यह सार्वजनिक अनुभवसिद्ध है। अतः इनका अपलाप भी नहीं हो सकता, क्योकि इनसे सङ्घातका अर्थतः आक्षेप हो जायगा । इस तरह बौद्धमतके अनुसार कोई अनुपपत्ति नहीं, परंतु बौद्धोंका यह कथन भी ठीक नहीं, कारण प्रत्ययोपनिबन्धमें नाना कारणोंका समवधान आवश्यक है । बिना किसी चेतनके अनेक कारणोंका एकत्र होना नहीं बन सकता । यदि कहा जाय अन्त्यक्षणप्राप्त क्षित्यादि अङ्कुरका उत्पादन करते हैं, उनका उपसर्पण स्वभाव है इसलिये समवधान भी हो जायगा तो फिर किसानको कृषि करनेकी क्या आवश्यकता है ? भण्डारमें रक्खे बीज अङ्कुरित हो जायेंगे और सारा कार्य बिना चेतनका ही हो जायगा, किंतु ऐसा होता नहीं । इसलिये बिना कर्ताके सङ्घातका बनना असम्भव है। जो कहते हैं कि अविद्यासे सङ्घातका अर्थात् आक्षेप हो जायगा इसका क्या तात्पर्य है ? यदि यह तात्पर्य है कि अविद्यादि बिना संघात टिक नहीं सकते—इसलिये उन्हे संघातकी अपेक्षा है; फिर तो संघातका निमित्त बतलाना चाहिये ।

यदि यह अभिप्राय हो कि अविद्यादि ही सघातके निमित्त हो जायेंगे तो सघातके ही सहारे टिकनेवाले सघातके निमित्त कैसे होगे । यदि ऐसा माना जाय कि ससारमे प्रवाहरूपसे सघात चले आ रहे हैं और उनके सहारे ही अविद्यादि रहते हैं, तो फिर यह प्रश्न होगा कि एक सघातसे जो दूसरा सघात उत्पन्न होता है, वह नियमतः उसके सदृश ही होता है, अथवा अनियमित विसदृश ? यदि नियमतः सदृश होता है तो मनुष्य पुद्गल ( मनुष्यपरमाणु ) कभी देवयोनि या तिर्यग्योनि नहीं बन सकती, यदि नियम नहीं है तो मनुष्य- पुद्गल कभी क्षणमे हाथी बनकर क्षणमे सिंह और क्षणमें पुन देवता एव क्षणमें फिर मनुष्य बन सकता है, परतु ऐसा नही होता—यह दोनो ही प्रकार लोकसिद्ध न्याय-विरुद्ध है । दूसरी बात यह है कि सुगत सिद्धान्तमें सघातका भोक्ता स्थिरजीव तो कोई होता नही, फिर तो भोग भोगके लिये, मोक्ष मोक्षके लिये ही होगा । किसी दूसरे पुरुषसे प्रार्थनीय पुरुषार्थ नहीं होगा । यदि भोग और मोक्ष दूसरेमे प्रार्थनीय माने जायें तो भोग मोक्षकालमे उनकी स्थिति रहनी चाहिये । फिर तो क्षणभङ्गुरवादका सिद्धान्त ही भङ्ग हो जायगा । अतः अविद्यामें भले ही परस्पर कार्यकारणभाव हो, परतु उनसे सघातसिद्धि नही हो सकती । सार यह है कि भले ही हेतूपनिबद्ध कार्य अन्यान्यपेक्ष केवल मुख्य हेतुके अधीन उत्पन्न होनेवाला होनेसे कथञ्चित् उत्पन्न हो जाय ( यद्यपि चेतनाधिष्ठित ही बीजसे अङ्कुर उत्पन्न होता है जैसे कुलालाधिष्ठित मृत्तिकासे घट ) फिर भी पञ्चस्कन्धसमुदाय तो प्रत्ययोपनिबद्ध है, वह एक हेतुमात्रके अधीन उत्पन्न नहीं होता है । किंतु उसमें नाना हेतुओका समवधान अपेक्षित होता है । चेतनके बिना नाना हेतुओका एकत्रीकरण नही हो सकता । बीजसे अङ्कुरोत्पत्ति भी धरणी अनिल जलादि सहकारी सापेक्ष होनेसे प्रत्ययोपनिबद्ध ही है, अतः वह पक्ष कुक्षिमें निक्षिप्त है । इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि चेतनानधिष्ठित बीजसे अङ्कुरोत्पत्तिके समान चेतनानधिष्ठित अचेतन अविद्या आदिसे उत्तरोत्तर कार्य उत्पन्न होगे, क्योकि बीजसे अङ्कुरोत्पत्ति भी पक्ष- कोटिमें ही है । वहाँ भी चेतनानधिष्ठितत्व सिषाधयिषित है, वह दृष्टान्त नही हो सकता । कुम्भकाराधिष्ठित मृत्तिकासे घटोत्पत्ति होती है यह दृष्टान्त निर्विवाद तथा वादि-प्रतिवादि उभयसम्मत है । परतु चेतनानधिष्ठित बीजसे अङ्कुरकी उत्पत्ति तो विवादास्पद एव संदिग्ध है । इसीलिये वह संदिग्ध साध्यवान् होनेसे पक्ष है, दृष्टान्त नही हो सकता । यदि पक्षको लेकर व्यभिचारका उद्भावन किया जाय तो अनुमान मात्राका उच्छेद हो जायगा । ऐसी स्थितिमे पर्वत पक्षमें ही धूमका वह्नि व्यभिचार

मा० रा० ४६—

७२२ मार्क्सवाद और रामराज्य दिखाया जा सकता है । इस तरह अधिष्ठातारूप अर्थात् अनेक कारणोंके सन्निधायक रूपसे एक सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् चेतन कारणका मानना बौद्धोंके लिये अनिवार्य होगा । यद्यपि बौद्ध कहते हैं कि अनपेक्षित बीज एवं क्षित्यादि अन्त्यक्षणको प्राप्त होकर अङ्कुरका आरम्भ करते हैं । उपसर्पण प्रत्ययवशसे परस्पर समवधान होता है । यह नहीं कहा जा सकता कि एक ही कारणसे कार्यसिद्धि हो सकती है । यदि एक कारणसे कार्यसिद्धि हो जाय तो अन्य कारणोंकी अपेक्षा ही क्या रह जायगी । अतः कारणचक्रके अनन्तर ही कार्यकी उत्पत्ति होती है । अतः एक कारण कार्योत्पत्तिका साधक नही । जड़कारण स्वयं प्रेक्षावान् नही होते अतः वे यह नही सोच सकते कि हममेसे एक भी कार्य सम्पन्न कर सकता है फिर हम सबके सन्निधानसे क्या लाभ किंतु उपसर्पण प्रत्ययवशात् उनमें परस्पर सन्निधान उत्पन्न होता है । वे न तो असन्निहित रह सकते न अनुत्पादक रह सकते हैं । उन अनपेक्ष कारणोंको प्राप्त करके कार्य भी न उत्पन्न होनेमे असमर्थ ही रहता है । स्वमहिमासे सब कारण कार्योंका उत्पादन करते हुए भी नाना कार्योंका उत्पादन नहीं कर सकते । एक ही कार्यकी उत्पत्तिमे उनका सामर्थ्य होता है । बीजके द्वारा अङ्कुरजननमें ही मृत्तिका जलादिकी सहकारिता होती है । अतः उनके द्वारा भी उस अङ्कुरकी ही उत्पत्ति होती है,। कारणभेदसे कार्यभेद आवश्यक नहीं, क्योकि सामग्री एक होनेसे ही कार्य एक होता है । परंतु बौद्धोका यह कथन असंगत है, क्योकि यदि अन्त्यक्षणप्राप्त कारण स्वयं कार्यजननमे अनपेक्ष ही रहते हैं, अर्थात् किसीकी अपेक्षा नही रखते हैं तो इसी क्रमसे पूर्व पूर्वके कारण भी स्वक्रमजननमे अनपेक्ष ही रहेगे । कुसूलमे अङ्कुरजननोपयोगी बीजसन्ताननिर्वर्तक बीजक्षण और भक्षणादि उपयोगी बीजक्षण भी है । यद्यपि इस सम्बन्धमें यह विरोधी अनुमान नहीं किया जा सकता हे कि कुसूलगत विगतबीजक्षण ( अर्थात् अङ्कुरोपजननोपयोगी बीज- सन्ताननिर्वर्तकबीजक्षण ) अनपेक्ष होकर बीजक्षणका जनन नही करता । कुसूलस्थ होनेके कारण “जैसे तत्कालोद्धृतभक्षित बीजक्षण अनपेक्ष होकर बीजक्षण नही जनन करता है” । परंतु इस अनुमानमे अङ्गुरोपयोगि संतानानन्तःपातित्व उपाधि है । अनपेक्ष बीजक्षणाजनकत्वरूप साध्य तत्काल भक्षित बीजक्षणमे है । उसमे अङ्कुरो- पयोगि संतानानन्तः पातित्व है, कुसूलस्थत्वरूप साधन अङ्कुरोपयोगि संतान निर्वर्तक बीजक्षणमें है । परंतु वहाँ उपाधि नहीं है, अपितु अङ्कुरोत्पादनोपयोगि संतानानन्तः पातित्व ही है । अतः कुसूलस्थताकी समानता होनेपर भी जिस कुसूलस्थ बीजको स्वकार्यक्षण परम्परासे अङ्कुरोत्पत्ति समर्थ बीजक्षण जनन करता है, वह बीजक्षण स्वकार्यजननमें

अनपेक्ष ही रहेगा । फिर इसी तरह तदनन्तरानन्तरवर्ती सभी बीजक्षण अनपेक्ष ही रहेंगे फिर तो कुसूलनिहित बीजोंसे ही किसान कृतकार्य हो जायगा, पुनः दुःख बहुल कृषिकार्य करनेकी उसे क्या आवश्यकता ? क्योंकि जिस बीजक्षणको स्वक्षण परम्परासे अङ्कुर उत्पन्न करता है उसकी क्षण- परम्परा अनपेक्ष कुसूलमें ही अङ्कुरादि सम्पादन कर देगी, जब यह सर्वथा निरपेक्ष है तो उसे देशकालकी अपेक्षा ही क्यों होगी ? इसीलिये यह मानना आवश्यक है कि— अन्त्य मध्य या पूर्व क्षण स्वकार्य- जननमें परस्पर सापेक्ष ही रहते हैं। तदर्थ कारणोंका समवधान (एकत्रीकरण) आवश्यक है। वह प्रेक्षावान् चेतन ही हो सकता है। बौद्ध कहता है कि अविद्यादिके द्वारा ही सघातका आक्षेप होगा। यहाँपर उससे प्रश्न होता है कि आक्षेपका क्या अर्थ है ? उत्पादन या ज्ञापन ! पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योंकि कारण स्वयं अनुपपन्न होकर कार्यका उत्पादन नहीं कर सकता किंतु वह स्वसामर्थ्यसे ही कार्यका जनन करता है, अतः दूसरा ही पक्ष कहना पड़ेगा कि कारण सघातका आक्षेप करते हैं अर्थात् ज्ञापन करते हैं। तथा च ज्ञापित सघातका उत्पादक तो अन्य ही होना चाहिये। ज्ञापक ही उत्पादक नहीं होता। यदि वैशेषिकोंके स्थिर पक्षमें स्थिर भोक्ता आत्माके रहनेपर भी अधिष्ठाता चेतनके बिना संघातोत्पादन नहीं हो सकता तो फिर क्षणिकवादमें सघात कैसे बन सकेगा ? भोक्ताका भोग भी कभी सघातका कल्पक हो सकता है, परंतु क्षणिक विज्ञान आदि तो भोक्ता भी नही हो सकते। प्रत्ययोपनिबन्ध-पक्षमें अनेक कारण-उपकार्योपकारक भावसे अवस्थित होकर ही कार्यजनन करेंगे यह बौद्धोंको मानना पड़ेगा। परंतु क्षणिक पक्षमें उपकार्योप- कारकभाव हो ही नहीं सकता। कारण इस पक्षमे कोई स्थिर भाव मान्य नहीं है जो उपकारका आस्पद बने। क्षण इतना सूक्ष्म एव अभेद्य होता है कि क्षणिक-पदार्थमें उपकारकता या उपकार्यता कुछ बन ही नहीं सकती ! यदि कालभेद मानकर उपकार्योपकारकभावका उपपादन किया जाय तो अनेक कालावस्थायी होनेसे फिर वही क्षणभङ्ग भङ्ग होगा। बौद्ध कहते हैं कि यदि प्रत्ययोपनिबन्धन प्रतीत्य समुत्पाद माना जाय तो भले ही अधिष्ठाता चेतनकी अपेक्षा हो, परंतु हेतूपनिबन्धन प्रतीत्य समुत्पादमें तो अधिष्ठाताकी कोई आवश्यकता नहीं है तथा च अविद्यादि ही सघातके निमित्त होगे। हेतुस्वभावमे ही कार्य-सम्पादन कर देंगे। परंतु उनका यह भी कथन विचार सह नहीं है, क्योकि सघातके ही आधारपर सिद्ध होनेवाले अविद्यादि उसी संघातके निमित्त कैसे बन सकेंगे ? इसके अतिरिक्त हेतूपनिबन्ध कार्यमें भी चेतनाधिष्ठित ही अचेतन कारण कार्योत्पादक होता है। यह घटोत्पत्तिके उदाहरणसे कहा जा चुका है।