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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

महाभारतमें सामाजिक अनुबन्ध ६९ 'आदि कृतयुगमें जिस तरह राज्य उत्पन्न हुआ वह सुनो, उस समय राज्य, राजा, दण्ड एवं दण्ड देनेवाला कुछ भी नहीं था। समस्त प्रजा धर्मके अनुसार चलती थी और उसी धर्मसे परस्पर रक्षा कर लेती थी। (उस समय अनन्त विद्याओंका उद्गमस्थान वेद तथा तदनुसारी आर्षशास्त्र सबको अभ्यस्त थे। अतः धर्म, अर्थ, काम, मोक्षकी उचित विवेकपूर्वक सभी व्यवस्थाएं चल रही थीं। सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञानकी उन्नति पराकाष्ठापर पहुंची थी। रूसो तथा मार्क्स आदिद्वारा कल्पित भविष्यके स्वर्णयुग उसके सामने नगण्य थे।) धर्मनीतिसे अन्योन्य-पालन-संलग्न प्रजा कालक्रमसे खेद या थकावटको प्राप्त हो गयी, फिर उसमें मोहका प्रवेश हुआ। मोहके कारण स्मृतिभ्रंश हुआ और फिर धर्मका लोप होने लगा। स्मृतिभ्रंश होनेसे लोग लोभके वश होकर विचारहीन हो गये और फिर रागकी प्रवृत्ति हुई और फिर कामका प्रादुर्भाव हुआ। उससे कार्याकार्यका ज्ञान भी न रहा, फिर तो अगम्यागमन, भक्ष्याभक्ष्य, वाच्यावाच्य, दोषादोषका विचार नष्ट हो गया। ऐसी दशामें वेद जो कण्ठस्थ हो गये थे, विस्मृत हो गये। वेदके विस्मरणसे वेदोक्त धर्मकर्मका भी लोप हो जाना स्वाभाविक था। (इससे स्पष्ट है कि पहले वेदादि शास्त्रों एवं तदुक्त धर्म-कर्म, विवेक-विज्ञानोंका पूर्णरूपसे प्रकाश था।) इस स्थितिको देखकर देवतालोग त्रस्त होकर ब्रह्माकी शरण गये और उस भयके दूर करनेका उपाय पूछा।' ब्रह्माजीने सोच-विचारकर सबके कल्याणार्थ धर्म, अर्थ, कामका बोधक तथा प्रापक एक लाख अध्यायोंका दण्डनीति-शास्त्र बनाकर देवताओंको दिया। उसे सर्वप्रथम शंकरजीने ग्रहण किया। उनसे बृहस्पति, शुक्र, इन्द्रादिने ग्रहण किया और उसका संक्षेप भी किया— ततोऽध्यायसहस्त्राणां शतं चक्रे स्वबुद्धिजम्। यत्र धर्मस्तथैवार्थः कामश्चैवाभिवर्णितः॥ उपकाराय लोकस्य त्रिवर्गस्थापनाय च। नवनीतं सरस्वत्या बुद्धिरैषा प्रभाविता॥ (शां० प० ५९।२९, ७७) यद्यपि यह शास्त्र भी वेदाभ्यासजन्य संस्कृत ब्रह्मबुद्धिसे प्रादुर्भूत होनेके कारण वेदमूलक ही था, फिर भी उस परिस्थितिके लोगोंमें विशेषरूपसे प्रभावशाली हुआ। प्रभुसम्मत वेदवाक्योंकी अपेक्षा सुहृद्-सम्मत वाक्योंके रूपमें व्यक्त होकर यह अधिक उपकारी सिद्ध हुआ। फिर भी इसे पूर्णरूपसे कार्यान्वित करनेके लिये दण्डकी अपेक्षा थी। दण्डसे युक्त होकर निग्रहानुग्रहद्वारा लोकरक्षणका हेतु बनकर ही यह दण्डनीति प्रचलित हो सकती थी। अतः योग्य समर्थ दण्डप्रणेता प्राप्त करनेके लिये देवता विष्णुके पास गये और उनसे श्रेष्ठ शासक माँगा। भगवान् नारायणने उन्हें श्रेष्ठ लोकपालोंके दिव्य

७० मार्क्सवाद और रामराज्य सद्गुणोसे सम्पन्न एक निर्दोष विरजा (रजोगुणसे रहित) राजा निर्माण करके दिया। ततः संचिन्त्य भगवान् देवो नारायणः प्रभुः। तैजसं वै विरजसं सोऽसृजन्मानसं सुतम्॥ (८८) वह राजा प्रभुत्व-निरपेक्ष होकर त्याग-वैराग्यकी ही ओर रुचि रखता था। उसका पुत्र कीर्तिमान् और पौत्र कर्दम हुआ। क्रमेण अग, फिर वेन राजा हुआ। वह उत्पथगामी था। इसीलिये ऋषियोंने उसे पदच्युत कर दिया और अभिमन्त्रित कुशोंसे मार डाला। उसका पुत्र पृथु हुआ। वह बहुत ही योग्य एवं धर्मात्मा हुआ। उसने ऋषियोंसे प्रार्थना की कि मुझे आपलोग आज्ञा दें, क्या करूँ। ऋषियोंने उससे प्रतिज्ञा करायी 'तुम नियत होकर, निःशङ्क होकर धर्मका आचरण करो। स्वयं प्रिय, अप्रिय छोड़कर सब काम-क्रोध, लोभ एवं मानको दूरसे ही त्यागकर सब प्राणियोंका समानरूपसे हिताचरण करो। जो भी धर्मसे विचलित हो शास्त्रधर्मके अनुसार उसका निग्रह करो और यह भी प्रतिज्ञा करो कि मन, वचन, कर्मसे तुम भौम ब्रह्म (पृथ्वीके ब्राह्मणो) की रक्षा करोगे। जो भी धर्मनीतियुक्त होगा, निःशङ्क होकर उसका पालन करोगे और मनमानी कुछ न करोगे। यह भी प्रतिज्ञा करो कि ब्राह्मणोंको प्राणदण्ड नहीं दोगे और सभी लोकोंको साङ्कर्यसे बचाओगे।' पृथुने वैसी ही प्रतिज्ञा की और कहा कि 'ब्राह्मण सदा ही हमारे नमस्य होंगे।' इस तरह परस्पर वचनबद्ध होकर राज्य व्यवस्थित किया गया। इसे ही 'सोशल कन्ट्राक्टस' कहा जा सकता है। शुक्राचार्य पृथुके पुरोहित हुए। बालखिल्य ऋषिगण मन्त्री हुए। देवताओ तथा इन्द्रके साथ विष्णुने पृथुका अभिषेक किया। पृथुने प्रजाका रञ्जन किया और इसलिये वे राजा कहे गये— तमब्रुवँस्तत्र देवास्ते ते चैव परमर्षयः। नियतो यत्र धर्मो वै तमशङ्कः समाचर॥ प्रियाप्रिये परित्यज्य समः सर्वेषु जन्तुषु। कामं क्रोधं च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरतः॥ यश्च धर्मात् प्रविचेलेल्लोके कश्चन मानवः। निग्राह्यस्ते स्वबाहुभ्यां शश्वद् धर्ममवेक्षता॥ प्रतिज्ञां चाविरोहेस्व मनसा कर्मणा गिरा। पालयिष्याम्यहं भौमं ब्रह्म इत्येव चासकृत्॥ यश्चात्र धर्मो नित्योक्तो दण्डनीतिव्यपाश्रयः। नमशङ्कः करिष्यामि स्ववशो न कदाचन॥ अदण्ड्या मे द्विजाश्चेति प्रतिजानीहि हे विभो। लोकं च सङ्करान् कृत्स्नं त्रातास्मीति परंतप॥

महाभारतमें सामाजिक अनुबन्ध ७१ पृथुरुवाच— ब्राह्मणा मे महाभागा नमस्या पुरुषर्षभाः । पुरोधाश्चाभवत् तस्य शुक्रो ब्रह्ममयो निधिः ॥ स विष्णुना च देवेन शक्रेण विबुधैः सह । ऋषिभिश्च प्रजापालैः ब्राह्मणैश्चाभिषेचितः । रञ्जिताश्च प्रजाः सर्वास्तेन राजेति शब्द्यते ॥ (महा० शां० प० ५९ । १०३-११०, ११६, १२५) कुछ लोग सत्ययुगके धर्मराज्यको लॉक या रूसोके प्राकृतिक युगसे तुलना करते हैं और कहते हैं कि 'उस समय राज्यकी परिपाटीका ज्ञान लोगोंको नहीं था । उस समयके मनुष्य राजनीतिक जीवनसे अनभिज्ञ थे ।' परंतु यह सर्वथा असंगत है । वस्तुतः भीष्मद्वारा वर्णित कृतयुगके राज्य-विहीन प्रजाका वर्णन अविवेक एवं अज्ञानमूलक न होकर धर्मज्ञानोत्कर्षमूलक था । रूसो एवं मार्क्स जिस स्वर्णयुगको उन्नतिकी पराकाष्ठा मानते हैं, उनमें भी उत्कृष्ट कोटिकी यह भीष्मोक्त स्थिति है । वह धर्मराज्य सर्वज्ञता, ब्रह्मनिष्ठताकी आधारभित्तिपर स्थित था और राजदण्डादिसे मुक्त था, क्योंकि सभी विवेकी थे, वेद उन्हें कण्ठस्थ थे । उन्हें कोई वस्तु अविदित थी, यह नहीं कहा जा सकता । शङ्का हो सकती है कि 'जब वे इतने ज्ञानसम्पन्न थे, तब इतने भीषण अनाचारी होकर मात्स्यन्यायके शिकार कैसे हो गये ? इस बातका समाधान लॉक एवं रूसोके मतसे भले न हो सके, किंतु धर्मवादी भीष्मके मतानुसार जीव अनादि होता है । उसके कर्मकी परम्परा भी अनादि है । उन्हीं कर्मोंके अनुसार सत्त्व, रज, तममें ह्रास-विकास होता रहता है । कालक्रमसे वैसे कर्मोंके उद्भूत होनेपर खेद, तम, मोह, प्रतिपत्ति, विनाश, राग, काम, धर्मलोप आदिका विस्तार हुआ और प्राणी पतित हो गया । आज भी हम देखते हैं कि कोई अच्छा आदमी भी परिस्थितियो, घटनाओ और कर्मके वश होकर खराब हो जाता है और कभी खराब आदमी अच्छा हो जाता है । जैसे मार्क्सके स्वर्णयुगकी कल्पनामें 'राजा—राज्यादि नहीं होते' यह अज्ञतामूलक नहीं, किंतु विज्ञतामूलक है । उसी तरह भीष्मके कृतयुगका राज्यादिविहीन धर्मराज्य अज्ञतामूलक नहीं था, किंतु विज्ञतामूलक था । सुतरां लॉकके 'सिविल गवर्नमेंट' पुस्तकमें वर्णित 'ओरिजिनल स्टेट आफ नेचर' और भीष्मके धर्मराज्यमें पर्याप्त अन्तर है । हॉब्सके प्राकृतिक युगसे तो इसका महान् भेद है ही । हाँ, हॉब्सके प्राकृतिक युगका भीष्मके विकृत युगके मात्स्यन्यायसे कथंचित् मेल बैठता है । रूसोके प्राकृत युगका मनुष्य भावुक था । विवेकहीन होनेके कारण उसे सुख-दुःख नहीं होता था । परंतु भीष्मका आदिम पुरुष पूर्ण विवेकी तथा

७२ मार्क्सवाद और रामराज्य सुखी था । भारतीय शास्त्रोंमें कहा गया है कि दो ही ढंगके पुरुष सुखी रह सकते हैं—एक अत्यन्त विवेकहीन मूढ, दूसरा परम विवेकी तत्त्ववेत्ता । दूसरे सभी लोग मध्यवर्ती दुःखी ही रहते हैं । यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परंगतः । द्वाविमौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥ (श्रीमद्भा० ३ । ७ । १७) रूसोका ‘प्राकृत पुरुष’ पहली कोटिका था, भीष्मका ‘कृतयुगी पुरुष’ दूसरी कोटिका । लॉक एवं रूसोका ‘प्राकृत स्वर्ण युगसे पतित, समाजके पुरुष’ तथा हाब्सका ‘प्राकृतिक पुरुष’ अपनी सुख-शान्तिके लिये आपसी विचारसे ही राज्यनिर्माण करते हैं, परंतु भीष्मके ‘धर्मराज्यसे पतित मनुष्य’ ब्रह्माकी शरण जाकर राजनीति शास्त्र प्राप्त करते हैं और विष्णुसे योग्य शासक प्राप्त करते हैं । फिर उससे समझौता करते हैं कि वह कभी भी नीतिशास्त्रके नियमोंका उल्लङ्घन नहीं करेगा । रूसोद्वारा कथित राज्यकी आधारशिला लोगोंकी ‘सामान्येच्छा’ है, किंतु भीष्मके राज्यकी आधारशिला ब्रह्मा- द्वारा निर्मित ‘विधिशास्त्र’ । इस तरह भीष्मके राज्यका आधार पवित्र एवं श्रेष्ठतम विधि है। भीष्मके दोनो ही वर्णनोंकी एकवाक्यता करके ही उनकी व्यवस्था समझी जा सकती है । दोनो वर्णनोंका दो अर्थ मानना सर्वथा असंगत है । दोनोकी एकवाक्यतासे यही निष्कर्ष निकलता है कि प्रथम कृतयुगमें वेदादि शास्त्र तथा तदुक्त ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न मनुष्य राजादि विहीन धर्मराज्यमें ही रहते थे । सब धर्म नियन्त्रित वेदज्ञ तथा धर्म-ब्रह्मज्ञ थे । सब सुखी, शान्त, सन्तुष्ट एवं विविध वैभवोंसे पूर्ण थे । कालक्रमसे प्राक्तन कर्मानुसार आसुरी वृत्तियोंका जागरण हुआ । दैवी वृत्तियोंके अभिभव हो जानेसे उनका पतन हुआ और फिर उस अवस्थासे खिन्न होकर पुनः धर्मनियन्त्रित राज्यकी स्थापनाके लिये ब्रह्माकी रायमें राजनीति-शास्त्र ग्रहण किया । फिर उसे पूर्णरूपसे कार्यान्वित करनेके लिये विष्णुसे राज्य प्राप्त किया और उसको तथा अपनेको वचनबद्ध करके सीमित शर्तोंके साथ सामाजिक समझौता या सोशल-कंट्राक्ट-थ्योरीके अनुसार धर्म-नियन्त्रित राजाका राज्य स्थापित किया । व्यक्तिवाद यद्यपि सभी सिद्धान्तोंमें व्यक्तिगत स्वतन्त्रताको महत्त्व दिया जाता है, किंतु व्यक्तिवादमें व्यक्तिको सर्वोच्च स्थान दिया गया है । इस मतमें न्याय एवं सुरक्षाके अतिरिक्त व्यक्तिकी स्वतन्त्रतामें समाज या राज्यका हस्तक्षेप ही नहीं होना चाहिये। इसीलिये व्यक्तिवादी राज्यमें व्यक्तिको निजी, सामाजिक तथा आर्थिक विषयोंमें स्वतन्त्र छोड़ देना चाहिये । इसीको ‘यद्भाव्य-नीति’ कहा जाता है । यह पूँजीवादियोंके संघर्षकी देन है । सामन्तशाही प्रतिबन्धोंके मिटाने, स्वतन्त्र

व्यक्तिवाद ७३ व्यापार करनेके लिये व्यक्तिवादके आधारपर व्यापारियोंने संघर्ष किया था । इंगलैंडमें इसके लिये एक बड़ी पूँजी देनी पड़ी थी । कहीं-कहीं लड़ाइयाँ भी लड़नी पड़ी थीं। दार्शनिकोंने भी यह प्रतिपादन किया कि आर्थिक प्रगतिके हेतु राज्यका आर्थिक एवं सामाजिक विषयोंमें हस्तक्षेप करना उचित नहीं । इन विषयोंमे व्यक्ति को पूर्ण स्वतन्त्रता मिलनी चाहिये । इसी आधारपर १९ वीं सदीमें ब्रिटेनमे औद्योगिक क्रान्ति हुई और उसके नेता पूँजीपति ही थे । ब्रिटेनमें उनका ही प्राधान्य था । सामन्तों एव श्रमिकोसे सघर्ष लेकर वे लोग सफल हुए थे । अर्थशास्त्र, उपयोगितावाद, मिलकी स्वतन्त्रता एव स्पेन्सरके जीवशास्त्रके आधारपर व्यक्तिवादका प्रचार बढा । ब्रिटेनमें अर्थशास्त्रके चार प्रमुख दार्शनिक हुए । आरम्भमें स्मिथ ( १७२३-९० ) हुए । उनकी पुस्तक 'राष्ट्रोंकी सम्पत्ति' पूँजीपतियोंके लिये बाइबिल-तुल्य हुई। इसमें व्यक्तिवादी अर्थशास्त्रका विश्लेषण है । माल्थस ( १७६६-१८४४ ) के 'जनसंख्यासम्बन्धी सिद्धान्त' का अर्थशास्त्रमें महत्त्वपूर्ण स्थान है । रिकार्डो ( १७७२-१८२३ ) के 'भूमिकर सिद्धान्त' का भी अर्थशास्त्रपर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पडा । स्टुअर्ट मिल ( १८७३-१८६६ ) के 'अर्थ- शास्त्रके सिद्धान्त' पुस्तकका भी बडा प्रभाव पडा । इन लोगोका अनेक विषयोंमे मतैक्य था । वे नैसर्गिक नियमोके समान ही अर्थशास्त्रके नियमोको भी अपरिवर्तनीय मानते थे । जैसे शीतके पश्चात् ग्रीष्म, ग्रीष्मके बाद वर्षा आनेका नियम तथा सूर्यका पूर्वमें उदय होकर पश्चिममें अस्त होनेका नियम नैसर्गिक एवं अपरिवर्तनीय है, तदनुसार प्राणीको जाड़ेमें गरम और गर्मीमें हल्के कपडे पहनने पड़ते हैं, उसी तरह अर्थशास्त्रके नियम भी अपरिवर्तनीय हैं। मनुष्यको उसके अनुकूल ही अपने-आपको बनाना पडता है । कहा जाता है कि यह सिद्धान्त पूँजीपतियोंके अनुकूल किंतु श्रमिकोंके लिये विष-तुल्य था । व्यक्तिवादी अर्थशास्त्रके सात नियम थे-१. निजी स्वार्थका नियम— इसके अनुसार 'मनुष्य तार्किक एव स्वार्थी है, वह स्वय अपना हित-अहित जानता है । सस्ता खरीदकर महँगा बेचता है । उसे स्वतन्त्रता मिलनेपर वह स्वय ही बढ़ जाता है । कहा जाता है कि इन्ही सिद्धान्तोके अनुसार 'लार्ड क्लाइव' 'वारेन हेस्टिग्ज' जैसे लोग साधारण श्रेणीसे उठकर भारतमें अग्रेजी राज्यके जन्मदाता बने और गवर्नर बने । इन लोगोंकी दृष्टिसे 'मनुष्यके हित एव समाजके हितमें विरोध नहीं है।' मनु, शुक्र, बृहस्पति आदिके मतसे कहा जा चुका है कि व्यक्तिके समुदायका नाम ही समाज है । सुतरा व्यक्तियोके सुखी हो जानेपर समाज सुखी होगा । एव समाजके सुखी होनेपर व्यक्तियोंका भी सुखी हो जाना स्वाभाविक है । २. स्वतन्त्र प्रतियोगिताका नियम- 'अपना हित-अहित समझकर

७४ मार्क्सवाद और रामराज्य

मनुष्य बाजारसे एक वस्तुका क्रय-विक्रय अपने हितकी दृष्टिसे करता है। अपनी वस्तुका ज्यादा-से-ज्यादा दाम चाहता है। दूसरोकी वस्तु न्यूनतम मूल्यमें खरीदना चाहता है। राज्यको इस सम्बन्धमें नियम नहीं बनाना चाहिये। माँग और पूर्तिके आधारपर वस्तुओंके मूल्य निर्धारित हो जायेंगे। वस्तुकी माँग अधिक, पूर्ति कम होनेसे मूल्य बढता है। पूर्ति अधिक, माँग कम होनेसे मूल्य घटता है। स्वतन्त्र प्रतियोगिताद्वारा वस्तुओंका वितरण भी स्वयं ही हो जायगा। जहाँ वस्तुकी आवश्यकता होगी वहाँ व्यापारी पहुँचायेगा। जहाँ माँग न होगी वहाँ नहीं भेजेगा। इसी प्रकार अपना व्यवसाय भी प्रत्येक व्यक्ति स्वयं निर्धारित करेगा। किम कार्यके करनेसे उसे लाभ होगा, किससे हानि, इसे मनुष्य स्वयं ही जानता है। उसमे भी राज्यका हस्तक्षेप नही होना चाहिये। वेतन-निर्धारणमे भी राज्यका हस्तक्षेप अनुचित है, क्योकि प्रत्येक व्यक्तिको अपनी आवश्यकता- का ज्ञान है। वह अपना वेतन स्वय ही निर्धारण कर लेगा।'

रामराज्यवादीका मत है कि यदि सभी लोग शिक्षित हों तो अंशतः यह सिद्धान्त ठीक हो सकता है। जब संसारमें स्वार्थके लिये जाल, फरेब भी चलता ही है, तब अशिक्षित, अज्ञानी प्राणियोको धोखा हो सकता है। मोलतोल करना भी सबको नहीं आता। फिर सभी व्यक्ति क्रय, विक्रय व्यवहार भी नही समझ सकते। हीरा, पन्ना, पद्मराग आदि मणियों तथा अन्य रत्नोका गुण सब लोग नहीं समझ पाते। इसीलिये रत्न-परीक्षा-शास्त्र तथा विशेषज्ञोकी आवश्यकता होती है। अतएव सावधानीके लिये बोर्डोंपर सरकारी या गैरसरकारी तौरपर विभिन्न वस्तुओके मूल्य-निर्धारणोंका उल्लेख रहता है। नदी पार उतारनेवाले नौकावाहकों, मोटर टैक्सी आदिके भाडोंका सरकारी तौरपर निर्धारण मिलता है। सर्वसाधारणके अज्ञानका दुष्परिणाम देखकर ही यह सब किया जाता है। इसके अतिरिक्त कभी-कभी रुपयेकी आवश्यकता अधिक होनेसे गरीब किसानोको अपना गेहूँ, अन्न, कपास आदि सस्ते दाममें बेचनेके लिये बाध्य होना पड़ता है। ऐसी स्थितिमे उत्पादन एव आवश्यकता देखकर किसी सीमातक नियन्त्रण आवश्यक होगा। कहीं दरका नियन्त्रण करनेके लिये सरकारी दूकानें भी खोलनी पडती हैं। वेतन आदिके सम्बन्धमें भी यद्यपि सामान्यतया यही ठीक है कि नौकर और मालिक स्वयं ही आवश्यकतानुसार वेतनका निर्णय करे, तथापि नागरिकोंके निर्धारित जीवनस्तरके अनुसार वेतनकी भी कुछ सीमा निर्धारित करना आवश्यक है ही, अमुक अमुक काममे कम से कम वेतन कितना होना चाहिये— भले ही उससे ऊपर योग्यता एवं कामके अनुसार नौकरीमें कमी-वेशी हो सकती है। इसीलिये 'युक्ति-कल्पतरु' आदि ग्रन्थोंमें विभिन्न मणियों, रत्नोके गुणों एवं मूल्योंका निर्धारण किया गया है। वेतनके सम्बन्धमे भी स्मृतिग्रन्थोंमें इस प्रकार

व्यक्तिवाद ७५ उल्लेख है कि 'यदि मालिक और नौकरने बिना तय किये ही काम किया और कराया है तो वेतनके सम्बन्धमें विवाद उपस्थित होनेपर न्यायालयद्वारा कृषि, पशुपालनादि सम्बन्धमें लाभकी अमुक मात्रा नौकरको दिलानी चाहिये ।' हाँ, यह सब बात भले राज्यके द्वारा न होकर समाजके द्वारा हो । संसारमें रजोगुण, तमोगुणकी बहुतायत होती है । उस हालतमें 'दुर्लभो हि शुचिर्नरः' पवित्र लोग बहुत कम मिलते हैं । अतः बिना नियन्त्रणके अनेक ढंगसे शोषण चलेगा ही । शास्त्रानुसार तो बैलोंके भी कामके घण्टे नियत हैं और उनकी उच्चस्तरीय स्वस्थता- की जिम्मेदारी भी मालिकोंपर ही डाली गयी है। फिर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मनुष्य प्राणीके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या ? सुतरा उनके कामके घंटोंका नियम एव उचित वेतनकी व्यवस्था राज्य या सरकारद्वारा अवश्य ही होनी चाहिये । ३. जन-संख्याका नियम- जॉन माल्थसने बताया कि 'जनसंख्याकी वृद्धि ज्यामितिक ढंगसे २ से ४ (२×२) होती है और उपजकी वृद्धि अंकगणितके ढंग २ से ३ । इस नियमको भी अपरिवर्तनीय माना जाता है । अतः एक समय ऐसा आता है कि जब बढती हुई जनसंख्याके लिये देशकी उपज पर्याप्त नहीं होती । फलतः कई लोगोंको भूखा रहना पड़ता है । तब अकाल, युद्ध, भीषण बीमारियोंद्वारा जनसंख्याका घटना ही अस्थायी तौरपर समस्याका समाधान होता है ।' वस्तुतः इस तर्कद्वारा भी गरीबीको प्राकृतिक एव अनिवार्य बतलाकर राज्यके अहस्तक्षेपका ही समर्थन किया गया है । इसीलिये संतति-निरोधका भी प्रयत्न चलता है । वस्तुतः अब माल्थसका सिद्धान्त खण्डित हो गया है । उत्पादनके क्रममें घटाव, बढाव दोनो ही होते हैं । उचित उपचारो एव प्रबन्धोसे उत्पादनका विस्तार किया जा सकता है । खाद्यकी कमीके कारण मनुष्योकी संख्या घटानेका प्रयत्न अमानुषकि है । न्याय और भावनाके नाते मनुष्यकी लम्बाईके अनुसार पलंगकी लम्बाई बढानी चाहिये, न कि मनुष्यका पाँव काटकर उसे पलंगके अनुसार बनाना चाहिये । ठीक इसी तरह उत्पादन-प्रगतिद्वारा ही जनसंख्याकी समस्या हल करना उचित है । ४. पूर्ति-माँगके नियमानुसार 'पूर्ति माँगसे अधिक हो तो दाम घटता है । पूर्तिकी अपेक्षा माँग अधिक हो तो दाम बढ़ता है ।' यह नियम अवश्य ठीक है; परंतु यह भी सर्वथा अपरिवर्तनीय नहीं कहा जा सकता । उत्पादन और प्रति व्यक्तिकी आय एवं अनिवार्य आवश्यकताको ध्यानमें रखते हुए इसमें भी नियन्त्रण आवश्यक होगा । जैसे कभी माँग कम होनेपर लागत मूल्यसे भी कम दाममें वस्तु बेचनी पडती है, वैसे ही व्यक्तिसामान्यकी आय एव अनिवार्य आवश्यकताके अनुसार कई वस्तुओंका न्यूनतम, कईका अधिकतम मूल्य निर्धारण करना आवश्यक है ।

७६ मार्क्सवाद और रामराज्य ५. वेतनका नियम—'यदि श्रमिकोंकी संख्या आवश्यक नियुक्तिकी संख्यासे अधिक होगी तो वेतन घटेगा। यदि नियुक्तिकी संख्यासे श्रमिकोंकी संख्या कम होगी तो वेतन बढ़ेगा। यदि दो पूँजीपति एक श्रमिकके पीछे चलें तो वेतन बढ़ेगा। यदि दो श्रमिक एक पूँजीपतिके पीछे चलें अर्थात् उससे नौकरी देनेके लिये आग्रह करें तो वेतन घटेगा।' व्यक्तिवादियोंके मतानुसार, 'वेतन- निर्धारणमें राज्यको हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये।' सामान्यतया यह नियम ठीक है, परंतु अपरिवर्तनीय नहीं कहा जा सकता; क्योंकि अनिर्णीत अवस्थामें काम करनेपर न्यायालयको वेतनकी कोई-न-कोई दर निश्चित करनी पड़ेगी। इस तरह नागरिकोंका एक साधारण जीवनस्तर बनानेके लिये न्यूनतम मूल्यका निर्णय करना ही पड़ेगा। भारतीय शास्त्रोंने कृषि, गो-रक्षा, वाणिज्य आदिमें श्रमिकको लाभका छठा (आदि) भाग देना निश्चित किया है, जिसका विस्तार हम आगे दिखायेंगे। नौकरके कुटुम्बका पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षण और काम देखकर न्यूनतम उचित वेतनका निर्णय राज्य या समाजको अवश्य करना चाहिये। उसके ऊपर श्रमिक और नियुक्तिकी संख्याके अनुसार घटाव, बढ़ाव उचित हो सकता है। मिल आदि श्रमिकोंकी संख्या कम करके माँगपूर्तिके आधारपर ही वेतन बढ़ाना उचित मानते थे। वेतन कोषके सिद्धान्तानुसार प्रत्येक देशकी आयका एक भाग वेतनके लिये व्यय होता है। यह पूँजी निश्चित रहती है। श्रमिकोंकी संख्या अधिक होनेसे कम हिस्सा मिलेगा। कम रहनेसे अधिक हिस्सा मिलेगा। यदि राष्ट्रीय वेतन कोष १०० रुपया है और श्रमिकोंकी संख्या दस हो तो प्रत्येकको दस-दस मिलेगा। पाँच संख्या होगी तो बीस-बीस मिलेगा। निजी धन एकत्रित करनेके अभिप्रायसे ही मजदूरोंकी गरीबी दूर करनेका कोई प्रयत्न नहीं हुआ। धर्म-नियन्त्रित शासनतन्त्रसे यह सर्वथा विरुद्ध है। ६. भूमिकरका नियम—कहा जाता है कि यह नियम रिकार्डोकी देन है। उसके अनुसार 'भूमि या किसी वस्तुका कर स्वयं ही निर्धारित होता है। जैसे यदि 'अ' खेतकी उपज औसत उपज है। यदि 'ब' खेतकी उपज उस औसत उपजसे अधिक है तो वह अतिरिक्त उपज खेतका कर होगा।' यह भी अपरिवर्तनीय नियम माना जाता है। इस सम्बन्धमें भी भारतीय दृष्टिकोणसे श्रम और लाभके अनुसार भारतीय शास्त्रोंमें लाभका छठा, पाँचवाँ, चौथा, कहीं-कहीं नवाँ, दसवाँ भाग भी राज्यका कर निर्धारित किया गया है। वही ठीक प्रतीत होता है। ७. अन्ताराष्ट्रिय विनिमयका नियम—देशके आयात-निर्यातपर कर नहीं लगना चाहिये। जैसे देशके बाजारोंमें पूर्ति और माँगके नियमसे मूल्य और वितरण निर्धारित होता है, वैसे ही अन्ताराष्ट्रिय बाजारमें भी वस्तुओंका मूल्य और उनका आयात-निर्यात निश्चित हो सकता है। इसीको 'मुक्त व्यापार' भी कहते हैं।

उपयोगितावाद ७७ कहा जा सकता है कि 'नैपोलियनसे होनेवाले युद्धके समय (१८०२-१४) यूरोपके अनाजपर ब्रिटिश सरकारने आयात कर लगाया था। इससे ब्रिटेनके अनाजका मूल्य बढ़ा था। इसमें जमींदारोंका लाभ भी बढ़ा था। किंतु इससे जनसाधारण एवं श्रमिकोंका निर्वाह-व्यय बढ़ा। श्रमिकोंने वेतन-वृद्धिकी माँग की। वेतन- वृद्धिसे धनिकोंका लाभ घटता था। उस समय जनसाधारणकी सहायताके नामपर पूँजीपतियोंने मुक्त व्यापारकी माँग की। अन्नकर रद्द करनेका आन्दोलन हुआ। सङ्घर्षके पश्चात् अन्नकर हटाया गया। तभीसे मुक्त व्यापारकी प्रथा चली। अन्न सस्ता हुआ। श्रमिकोंकी वेतनवृद्धिकी माँग कुछ दिनोंके लिये रुक गयी। पूँजी- पतियों एवं सामन्तोंका लाभ हुआ। अन्ताराष्ट्रिय व्यापारमें भी इससे ब्रिटेनके व्यापारियोंका लाभ हुआ। ब्रिटेनमें ही सर्वप्रथम औद्योगिक क्रान्ति हुई थी। अतः अन्य देशोंकी वस्तुओंसे ब्रिटेनकी वस्तु अच्छी और सस्ती थी। यदि सर्वत्र मुक्त व्यापारकी प्रथा होती तो संसारभरके बाज़ारपर ब्रिटेनका ही अधिकार हो जाता। जहाँ उनका अधिकार था वहाँ सदियोंके देशी व्यापारोंका अन्त हो गया। साम्राज्यवादसे व्यापारमें वृद्धि एवं व्यापार-वृद्धिसे साम्राज्य विस्तार हुआ।' भारतीय राजनीतिसे यह भी विरुद्ध है। कारण, स्वार्थी लोग लाभके लिये देशका माल विदेशोंमें भेज देते हैं। देशके लिये उपयोगी वस्तुओंको महँगी कर देते हैं। इससे गरीबोंका जीवन सङ्कटमें पड़ जाता है। अतः सरकारोंका कर्तव्य है कि वह देशके उपयोगलायक पदार्थसे अतिरिक्त हो तभी वह बाहर जानेकी आज्ञा दे। इसी तरह जिससे अल्पमूल्यमें सबका कार्य चल सके और अपने देशके व्यापारकी वृद्धि हो इस दृष्टिसे विदेशी मालपर प्रतिबन्ध या उचित कर लगाया जाय। कौटल्य आदिने इस करका समर्थन किया है। जर्मनी आदि राज्योंने आयातकर लगाकर अपने राष्ट्रव्यवसायोको ब्रिटेनकी प्रतियोगितासे बचाया। ब्रिटेनने भी अमेरिकाकी वस्तुओंका एकाधिकार रोकनेके लिये १९३१ में रक्षित व्यापार-प्रथाको स्वीकार किया। इस दृष्टिसे उपर्युक्त नियम ग्रीष्मके अनन्तर वर्षाऋतुके आने या सूर्यका पूर्वमें उदय होकर पश्चिममें अस्त होनेके नियम-जैसे प्राकृतिक नियम नहीं हैं और न ये नियम ईश्वरीय शास्त्रोंसे ही समर्थित हैं। उपयोगितावाद बेन्थम (१७४८-१८३२) ने उपयोगितावादद्वारा भी व्यक्तिवादी प्रथाका समर्थन किया था। हेनरी-मेनके मतानुसार 'उस समयके वैधानिक सभी सुधारोंपर बेन्थमके विचारोंकी छाप है। उसके विचारोंके बड़े-बड़े ११ ग्रन्थ हैं। उसने फ्रांस, अमेरिका एवं भारतवर्षके लिये भी विधान बनाये थे। उसने प्रतियोगिताद्वारा कर्मचारियोंकी नियुक्ति, सरकारी विभागोंका सङ्घटन नोट

७८ मार्क्सवाद और रामराज्य मुद्रणकला, उपनिवेशसम्बन्धी मताधिकारके सम्बन्धमे विचार व्यक्त किये हैं। कहा जाता है वेन्थमको प्रीस्टलेका एक सूत्र मिला 'अधिकतम लोगोका अधिकतम हित'। प्रीस्टलेसे पूर्व फ्रांसिस एवं हचीसनने भी इसी सूत्रका अनुकरण राज्यका मुख्य ध्येय बताया था। ग्रीसके 'हिडनिजम दर्शन'के अनुसार मनुष्यके कार्य सुख-दुःखके मान- दण्डसे निर्धारित होते हैं।' उसने इस सिद्धान्तको उक्त सूत्रसे मिलाया और अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'न्याय और व्यवस्थाके सिद्धान्तोकी प्रस्तावना'में बताया कि 'प्रकृतिने मनुष्य-जातिको दो सत्ताधारी स्वामियो-सुख और दुःखके अधीन बनाया। मनुष्यके कार्य सुख-दुःखपर आश्रित हैं। जीवनका एकमात्र ध्येय सुख-प्राप्ति, दुःखनिवारण है। यही जीवनका सार है। जिसका जीवन इस सिद्धान्तद्वारा नहीं चालित होता, वह अज्ञानी है। सुख-दुःखका अर्थ उपयोगिता है। वही वस्तु उपयोगी है, जिससे सुख हो। आनन्द या आनन्द-कारण सुख है। क्लेश या क्लेश- कारण दुःख है।' वेन्थमके अनुसार 'मनुष्यके सभी भौतिक कार्य उपयोगितासे ही निर्धारित होते हैं। धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय, भलाई-बुराईकी परख उपयोगिताके ही आधारपर की जाती है। जीवन-उपयोगिता ही सत्ताधारी है।' उसके अनुसार 'नैसर्गिक, लौकिक, राजनीतिक और धार्मिक—ये चार सुख- दुःखके स्रोत हैं। जैसे किसीका मकान जल गया। यदि वह उसकी भूलसे जला तो नैसर्गिक स्रोतसे दुःख हुआ। यदि पड़ोसीकी बुरी भावनासे हुआ तो लौकिक स्रोतसे। सरकारी आदेशसे जलाया गया तो राजनीतिक स्रोतसे। यदि दैवी प्रकोप- से जला तो धार्मिक स्रोतसे दुःख हुआ।' 'वेन्थमके अनुसार'—सुख-दुःखकी मात्राकी परख तीव्रता, समयप्रसार, निश्चय, समीपता, उपजाऊपन, शुद्धता और विस्तार—इन सात विशेषताओद्वारा होती है। इन्हींके आधारपर वस्तुकी उपयोगिता निर्धारित होती है।' उसके अनुसार सुख-प्राप्ति और दुःख-निवृत्तिके लिये ही राज्यके सब नियम बनने चाहिये। अधिकतम लोगोका सुख ही राज्यका ध्येय होना चाहिये। व्यवस्थापक उक्त सात विशेषताओद्वारा ही इसकी जानकारी प्राप्त कर सकता है।' उपयोगिता एवं व्यक्तिवाद—उपयोगिताकी दृष्टिसे राज्यके नियम स्वतन्त्रताके बाधक होते हैं अतः नियम विकारतुल्य है। किंतु उनके बिना सभ्य जीवन-निर्वाह सम्भव नहीं। अतः वह आवश्यक विकार है। राज्यको कम-से-कम नियम बनाना चाहिये। जैसे 'आरोग्यता सर्वोत्तम है, परंतु अस्वस्थ होनेपर औषध आवश्यक है। स्वतन्त्रतापूर्ण जीवन उपयोगिताकी दृष्टिसे आदर्श जीवन है। परंतु चोरी, दुराचार आदि बाधाओके द्वारा स्वतन्त्रता-भंग होनेकी सम्भावना होती है। तब नियम ही औषधका काम करते हैं। राज्यका नियम बाधा तो अवश्य है परंतु आवश्यक है; क्योकि उससे अन्य असामाजिक बाधाएँ दूर होती हैं। औषधका प्रयोग जैसे कम-से-कम करना आवश्यक है, वैसे ही राजकीय नियमरूप बाधा

कम-से-कम होनी चाहिये । जैसे व्यक्ति स्वास्थ्य की दृष्टिसे आरोग्य स्थितिको ही चाहता है, वैसे ही उपयोगिताकी दृष्टिसे स्वच्छता, स्वतन्त्रता चाहता है। अतः सत्ताधारी उपयोगिताकी दृष्टिसे व्यवस्थापकको कम-से-कम नियम बनाने चाहिये ।' 'बेन्थम' के अनुसार व्यवस्थापकको नियम निर्माणके पूर्व इसपर विचार करना चाहिये कि नियमद्वारा जो कार्य रोके जाते हैं, वे समाजके लिये विकार हैं कि नहीं ? उदाहरणार्थ —चोरी । साथ ही प्रस्तावित नियम विकारात्मक कार्यसे कम विकार है या अधिक ? जैसे १००० रु० की चोरीके समक्ष तीन मासका कारागार कम विकार है या ज्यादा ? अतः केवल चोरी आदि रोकनेके लिये ही नियम ठीक है । यह नागरिक- की स्वतन्त्रतामें सहायक है । समाजके कुछ लोग स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करते हैं । वे ही आदर्शभूत स्वतन्त्र-परिस्थितिमें बाधक होते हैं । इसलिये राज्यको नियम- द्वारा उसका नियन्त्रण आवश्यक होता है । अतः राज्य आवश्यक है । परन्तु राज्य- का संचालन अपरिवर्तनशील तथा नैसर्गिक नियमोंद्वारा होना ठीक है । व्यक्तिके आर्थिक एवं सामाजिक विषयोंमें हस्तक्षेप करनेसे उपयोगिताकी वृद्धि सम्भव नहीं होती । प्राकृतिक बहुमूल्य उपयोगिता-वृद्धिके लिये शान्तिस्थापनके क्षेत्रमे ही राज्यको नियम-निर्माण करना चाहिये । इस विषयमें भी नियम-निर्माण उप- योगिताके मानदण्डसे ही होना चाहिये ।' वस्तुतः भारतीय दर्शनके अनुसार केवल लौकिक सुखप्राप्ति एव दुःख-निवृत्ति- की दृष्टिसे ही कार्य नहीं किया जाता है । नैयायिकोंने दुःख-निवृत्तिको ही अन्तिम ध्येय बताया है । सुख-प्राप्ति एव उसके रागको दुःख ही बतलाया है और कहा है कि कुपित फणी ( नाग ) के फणातपत्रकी छायामें विश्रामके तुल्य ही सुखमें विश्राम है । वेदान्तके अनुसार भी लौकिकप्रिय ( सुख ) अप्रिय (दुःख) से अतीत होनेसे परम पुरुषार्थस्वरूप अपवर्ग मिलता है । 'नैनं प्रियाप्रिये स्पृशतः' । तत्त्व- साक्षात्कारकी स्थितिमें प्राणीको प्रिय-अप्रिय दोनों स्पर्श नहीं करते । उसी अभिप्राय- से बुद्धिमान् संसार छोड़कर निरन्तर तपस्या करते हैं । परोपकारार्थ सब सुख छोड़कर विविध यातनाओ-दुःखोको सहते हैं । अन्तमे प्राणतक दे देते हैं । बहुतसे लोग परार्थको ही स्वार्थ मानते हैं । अतः उन्हे परोपकारमे ही सुख होता है । इसीलिये भारतीय शास्त्रोंने वास्तविक आत्महित एवं लोकहितको ही राज्यका ध्येय माना है । हित और सुखमें पर्याप्त अन्तर होता है । परोपकारार्थ कष्ट-सहन एव तपस्या सुख नही है, परंतु हित है । परदारपरवित्तापहरण सुखकर प्रतीत होते हुए भी अहित है । कटु औषध सेवन, कठोर पथ्य-पालन, कुपथ्य परिवर्जन दुःखकर प्रतीत होनेपर भी हित है । ज्वराक्रान्त प्राणीको उष्ण आतप सुखकर प्रतीत होता है, तक्रादि कुपथ्य रुचिकर प्रतीत होता है, फिर भी वह अहित है । स्वतन्त्रता यद्यपि प्राणीमात्रको अभीष्ट है । मनुष्य ही नही किन्तु प्रत्येक प्राणी

अपनी सत्ता या जीवनका प्रेमी होता है। ज्ञान एव आनन्दका भी प्रत्येक प्राणी भक्त होता है। ठीक उसी तरह स्वतन्त्रताकी भी प्राणीमात्र इच्छा करते हैं। एक चींटीको पकड़ते हैं तो वह छुटकाराके लिये प्रयत्नशील होती है। एक पक्षी स्वतन्त्र होकर खट्टा फल खाकर, खारा पानी पीकर रहना मजूर करता है, परंतु परतन्त्र रहकर पिंजड़ामें बद होकर मधुर फल एवं मधुर पक्वान्न खाकर रहना नहीं चाहता। इसी प्रकार शासन भी निम्न श्रेणीके लोगोसे आज्ञा-पालन कराना, उच्च श्रेणीके माता-पिता, गुरुजनोसे अनुरोध—प्रार्थना स्वीकार कराना चाहता है। इतना ही नहीं, सीमित सत्ता, ज्ञान, आनन्द, स्वतन्त्रता तथा शासनके बदले निस्सीम निरतिशय सत्ता, ज्ञान, आनन्द तथा निस्सीम निरतिशय स्वतन्त्रता, शासन-शक्ति चाहता है। तथापि महती स्वतन्त्रता प्राप्त करनेके लिये पर्याप्त स्वतन्त्रताका बलिदान करना पड़ता है। किसी भी राष्ट्रको स्वतन्त्रताके लिये दूसरे राष्ट्रद्वारा हमला होनेपर सैनिक संगठन करना पड़ता है और सैनिकोको सेनापतिके नियन्त्रणमें रहना ही पडता है। शिशुको माता-पिता तथा गुरुजनोके परतन्त्र रहकर

पाश्चात्त्य राजनीति ८१ होती है। वे सब अपने उपकारक हैं।' अतः उनमें प्रेम होता है। परन्तु यहाँ आत्मा शब्दका अर्थ देहादि संघातमात्र नहीं, किंतु देहादिभिन्न विशुद्ध आत्मा है। जो 'स्व' शब्दसे केवल देहादि संघात ही समझते हैं, उनके मतानुसार देहादि संघात- को भोजन, पान, वस्त्र, भूषण, वाहन, सम्पत्ति आदि मिलना ही स्वार्थ या आत्मार्थ है, परन्तु जो देहादि संघातसे भिन्न निर्विकार प्रत्यक्चैतन्याभिन्न आत्माको समझते हैं, उनका स्वार्थ या आत्मार्थ बहुत ऊँचा होता है। वहाँ तो परोपकार, धर्म, तपस्या, उपासना, तत्त्वसाक्षात्कार तथा सकलानर्थनिवृत्तिमय परमानन्दावाप्ति ही स्वार्थ या आत्मार्थ होता है, 'स्व' एवं समाज व्यष्टि एवं समष्टिका भेद समाप्त हो जाता है। इस दृष्टिसे उच्च कोटिकी उपयोगिता एवं स्वार्थमें परार्थ अन्तर्भूत हो जाता है। भले ही राजकीय नियम स्वल्प-से-स्वल्प हो, क्योंकि यह तो भारतीय शास्त्रोको भी सम्मत है। परंतु सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, विविध नियन्त्रण तो तबतक परम अपेक्षित होते हैं, जबतक प्राणी प्रत्यक्चेतन्याभिन्न परम तत्त्वका साक्षात्कार करके पूर्ण कृतार्थ नहीं हो जाता। इतना ही क्यो, उस कालमे भी जीवन्मुक्तोंको भी लोकसंग्रहार्थ बहुत से कर्तव्य-नियम पालन करने पड़ते हैं। विदेह-मुक्तिमें ही पूर्ण स्वतन्त्रता, नियमरहितता सम्भव होती है। स्टुअर्ट मिल भी 'उपयोगितावादी' था। उसने वेन्थमके उपयोगितावादमें संशोधन किया था। वह सुखके मात्रात्मक परिमाणके साथ-साथ गुणात्मक भेद भी मानता है। पहलेका उदाहरण हे—'जितना सुख वीणावादनमें होता है, उतना संगीतमें।' परंतु दूसरेको स्टुअर्ट मिलने बताया कि 'एक असंतुष्ट विद्वान् होना संतुष्ट मूर्खसे अच्छा है। उससे उपयोगिताकी परख केवल सुखकी मात्रापर नहीं किंतु गुणके आधारपर होती है।' किंतु गुणात्मक भेदसे उपयोगिताका मानदण्ड व्यक्ति भी होता है, केवल पदार्थ ही नहीं। वेन्थमने केवल पदार्थको ही मानदण्ड माना है। इसीलिये उसके आलोचक उसे 'संतुष्ट मूर्खका दर्शन' मानते हैं। इस तरह जब व्यक्तिगत दृष्टिकोणसे एक वस्तुकी उपयोगिता निर्धारित होती है, तब व्यक्तिकी रुचिका भी ध्यान रखना आवश्यक है। एवं शंकराचार्य-जैसे निःस्पृह त्यागी विद्वान्‌के हर्ष एवं सुखकी उपयोगिताका मानदण्ड एवं भौतिकवादी दार्शनिक हाब्स जैसे राजनीतिज्ञकी उपयोगिताका मानदण्ड भिन्न ही होता है। मनुष्य केवल सुख और स्वार्थका ही कठपुतला नहीं—मनुष्य केवल सुख-दुःखसे ही नहीं संचालित होता है। अन्य भावनाओंका भी जीवनमें महत्त्वपूर्ण स्थान है। देशभक्ति, नैतिक, आध्यात्मिक, संतुष्टि आदिकी भावनाओंसे ही मनुष्यके कार्य निर्धारित होते हैं। यदि मनुष्य-जाति उपयोगितावादके अनुसार ही चलती तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, शङ्कर, रामानुज, ईसा आदि-जैसे लोगोंका सम्भव ही न होता। उपयोगिता- वादके अनुसार वेन्थमको ही एक धनी वकील होना था, गरीब दार्शनिक नहीं। पा० रा० ६—

८२ मार्क्सवाद और रामराज्य आज भी नैतिकताके नामपर कितने ही सज्जन सत्य बोलकर अपनेको संकटमे डालते हैं । एक देशभक्त सारा जीवन दुःखमय बिताता है । अतः यदि व्यवस्थापक उपयोगिताके आधारपर ही नियम बनायेगा तो वह अवश्य त्रुटिपूर्ण होगा । भारतीय वेदान्तके अनुसार पूर्ण स्वतन्त्रतापूर्ण सुख और आत्मा एक ही वस्तु है; परंतु बेन्थमका तो भौतिक सुख ही ध्येय है । बेन्थमके 'अधिक लोगोंके अधिकतम सुख' के सम्बन्धमें भी समालोचकोंने कहा है कि 'यह अव्यावहारिक है।' उदाहरणार्थ एक 'अ' नियमसे १२ मनुष्योंको दस मात्रा प्रतिमनुष्यके परिमाणसे सुख मिलनेकी सम्भावना है । पूर्ण सुख १२० मात्राका होगा । 'ब' नियमसे २० मनुष्योंको पाँच मात्रासे प्रतिमनुष्य सुख मिलनेकी आशा है । पूर्ण सुख १०० मात्राका होगा । ऐसी परिस्थितिमे व्यवस्थापक क्या करेगा ? 'अ' नियम अधिकतम सुख १२० मात्रासे सम्भव होगा । परंतु मनुष्योंकी संख्या कम (१२) होगी । 'ब' नियमद्वारा अधिकतम मनुष्योंको (२० को) सुख मिलता है, परंतु सुखकी मात्रा अल्प (५ मात्रा) होगी । अब यहाँ अधिकतम लोगोंके सुखकी दृष्टिसे 'ब' नियम बनाना चाहिये, परंतु अधिकतम सुखकी दृष्टिसे 'अ' नियम आवश्यक जान पडता है । ऐसी स्थितिमे न्यायपूर्ण नियम सम्भव नहीं कहा जाता । बेन्थमका उपयोगितावाद उस समयके पूँजीपतियोंके लिये उपयोगी था । पूँजीपति निजी सुख और लाभके हेतु मानवताको भूल जाता है। वह अपने अधिकतम सुखको ही अधिकतम मनुष्योंका सुख समझता है । एक मानवतावादी तो यही चाहेगा कि 'अधिकतम लोगोंको सम्भव हो तो अधिकतम सुख हो नहीं तो जितना भी सुख हो उतना अधिकतम लोगोंको सुख मिलना चाहिये ।' यह नहीं कि अल्प-से-अल्प लोगोंको अधिकाधिक सुख मिले । वैयक्तिक स्वतन्त्रता स्टुअर्टकी पुस्तक 'स्वतन्त्रता' (लिबर्टी, १८५९) व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका सर्वोत्कृष्ट समर्थन करनेवाली है । व्यक्तिकी स्वतन्त्रता एवं व्यक्तित्वके लिये 'मिल' ने व्यक्तिवादको आवश्यक बतलाया । उसका कहना था कि 'मानव- प्रगतिके लिये विचार एवं भाषणकी स्वतन्त्रता अत्यावश्यक है।' कहते हैं, वह सनकी लोगोंकी भी स्वतन्त्रताका समर्थक था । उसका कहना था कि 'इनमेंसे न जाने किसके विचारसे किसी नयी विचारधाराका जन्म हो जाय ।' अतः प्रगतिके लिये प्रत्येक व्यक्तिको विचार एवं भाषणका स्वातन्त्र्य प्राप्त होना चाहिये । मिलके विचारसे स्वतन्त्रता बिना प्रगतिमें बाधा पड़ती है। उसका कहना था कि 'जो विचारधारा एक समयमे प्रचलित है, वही सत्य है, ऐसा नहीं कहा जा सकता । उसके विपरीत किसी व्यक्तिकी विचारधाराका दमन नहीं करना चाहिये । हो सकता है कि वही विचारधारा सत्य हो । अतः विचार एव

पाश्चात्त्य राजनीति ८३

भाषणकी स्वतन्त्रताद्वारा किसीको भी अपनी विचारधाराका प्रचार करने देना चाहिये । ईसा एव सुकरातकी विचारधाराएँ प्रचलित विचारधाराओसे विपरीत थीं । सत्ताधारियोने उनके दमनका भरसक प्रयत्न किया । दोनोको प्राणदण्ड दिया गया । परंतु संसारको मानना पडा कि वे सनकी नहीं किंतु महापुरुष थे ।' इसीलिये मिलका कहना था कि 'आज हम जिन्हे सनकी कहते हैं, उनके अनोखे विचारोकी उपेक्षा करते हैं, वे ही भविष्यमे विशिष्ट बुद्धिवाले सिद्ध हो सकते हैं ।' डॉक्टर जानसनका कहना था कि 'दमनसे सच्चाई छिप नहीं सकती, सत्यकी दृढताके लिये दमन एक कठोर कसौटी है ।' परंतु मिल इस दमनको प्रगतिमें बाधक कहता था । मार्टिन लूथर (१४८३-१५४६) के पूर्व धर्मसुधार आन्दोलन बीस बार आरम्भ हुआ, परतु वह दमनद्वारा रोका गया । यदि ऐसा न होता तो सम्भव है कि यूरोपमे १६ वीं शतीसे पूर्व ही धर्मसुधार आरम्भ हुआ होता । लूथरके धर्मसुधार (१६ वीं शती) के फलस्वरूप कई महत्त्वपूर्ण विचारधाराओका बीजारोपण हुआ । यदि उसको पूर्व दमनसे रोका न गया होता तो उससे और अधिक प्रगति हुई होती । अवश्य सत्य अमर है । उसका दमनसे अन्त नही होता, परंतु दमनसे प्रचारमे विलम्ब किया ही जा सकता है । यह विलम्ब समाजके लिये हानिकारक होता है । अतः विचार एवं भाषणकी पूर्ण स्वाधीनता होनी चाहिये । मिलके अनुसार 'सत्यके कई पहलू होते है । वे एक दूसरेके बाधक नहीं किंतु परस्पर सहायक होते हैं । अतः एक पक्षके अनुयायीका दूसरोको सत्यविरोधी समझना ज्ञानवृद्धिमें बाधक है । सत्य किसी एक पक्षकी बपौती नही है । अन्य विचारधाराओमें भी सत्य हो सकता है । अतः विचार-प्रचारकी स्वाधीनता आवश्यक है । ऐसे वातावरणमे निश्चित सत्यका बोध सम्भव होता है । तर्कद्वारा सघर्षसे सत्य बलिष्ठ एव विजयी होता है । इससे अन्धविश्वासकी जड़ नही जमती ।' इस तरह मिलने विचारो, तर्कोंकी पूर्णस्वतन्त्रताके पक्षमे मत प्रकट किया था । ब्राउनके मतानुसार मिलने जीवशास्त्रके—जो योग्य है 'जीवित रहेगा' इस नियमको विचारोकी दुनियामें लागू किया; क्योकि मिलका कहना था कि 'जो विचार तर्क, सघर्षमे बलिष्ठ होता है, वही विचार सत्य सिद्ध होता है ।-अतः राज्यको भाषण, लेख, विचार, तर्ककी पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिये ।' मिलके मतानुसार 'समाजपर असर डालनेवाले चोरी-कलह आदि कार्योंपर तो राज्यको हस्तक्षेप करना चाहिये; परतु व्यक्तिगत कार्योंमे राज्यको हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये । जैसे कोई अपने घरमे रहकर चाहे रातभर पढे, चाहे मद्यपान करे उसे स्वतन्त्रता होनी चाहिये । परतु जोरसे गायन करनेसे दूसरोंके आराममे बाधा पड़ सकती है, अतः समाजके प्रतिकूल व्यक्तिगत कार्यपर प्रतिबन्ध ठीक है । परतु जिसका बुरा असर समाजपर नही पड़ता, ऐसे व्यक्तिगत कार्यक्रम

८४ मार्क्सवाद और रामराज्य स्वतन्त्रता ठीक है। यदि मद्यपायी अपने अनुभवसे मद्यपानको हानिकारक समझेगा तो उसे छोड़ देगा। राज्यके प्रतिबन्धसे भी मद्यपान छूट सकता है, परन्तु इसमे चारित्रिक सङ्घटन नही आता। जो निर्णय अपने अनुभवसे होता है, वही दृढ होता है ! राज्य-प्रतिबन्धसे छिपकर भी मनुष्य मद्य पीता रह सकता है। शिक्षा-प्रोत्साहन, चित्रप्रदर्शन आदि परोक्ष रीतियोद्वारा बुरे कामोके रोकनेका प्रयत्न अनुचित नही।' इसी तरह द्यूत खेलनेको भी वह प्रतिबन्धद्वारा रोकना ठीक नही समझता था। ये सब काम बुरे हैं सही, परन्तु आत्मसंघर्षसे ही उनका छूटना चरित्रबलका वर्धक होता है। वह सामाजिक परम्परागत रीति-रिवाजोके बन्धनको भी प्रगतिका बाधक समझता था। सामाजिक नियन्त्रणसे व्यक्तित्त्वका विकास नहीं हो पाता। मिल आविष्कार एवं नवमार्गदर्शक शक्तिको महत्त्वपूर्ण मानता था। उसके मतानुसार 'जनसाधारणकी मनोवृत्ति सामान्यताकी दर्शिका होती है।' परंतु वह इस मनोवृत्तिका विरोधी था। वह तो 'अपूर्व नवीन बुद्धिवालोको प्रोत्साहनसे नवीन विचारधाराकी सम्भावना होती है' ऐसा मानता था। वह अधिक कवियोका होना समाजकी उन्नतिका लक्षण मानता था। 'इससे रुचियोंकी विभिन्नता विदित होती है और यह स्वतन्त्र वातावरणमे ही सम्भव है। यदि एक कक्षाके विद्यार्थियोके प्रश्नोत्तरमे विभिन्नता होती है तो वह कक्षाकी प्रगति समझता था। जो जिसे हितकर प्रतीत हो उसे वैसा करनेकी छूट होनी चाहिये। एक ढंगसे जीवन-निर्वाहार्थ किसीको बाध्य करना उचित नही, इसीलिये शिक्षाके राज्यनियन्त्रित होनेका भी वह विरोधी था। हाँ, नागरिकोको अपने बच्चोको स्कूल भेजनेके लिये बाध्य करना राज्यका कर्तव्य है। इसके अतिरिक्त शिक्षापर राज्यका हस्तक्षेप न होना चाहिये। शिक्षा प्राप्त करनेकी स्वतन्त्रता नागरिकोको ही होनी चाहिये। विद्यालयमे बालक कैसी शिक्षा प्राप्त करे, यह नागरिकोकी रुचिपर ही छोड़ना चाहिये।' उसके मतानुसार 'व्यक्तिवादियोकी भाँति ही व्यक्तिगत लाभके लिये भी मनुष्य भलीभाँति अपना कार्य सचालन करता है। उसमे राज्यके हस्तक्षेप हितकर न होगे। सरकारी कर्मचारियोद्वारा होनेवाले कार्योंमे उनकी उतनी तत्परता नहीं होती जितनी किसीको व्यक्तिगत कार्योंमे तत्परता होती है। जब व्यक्ति कोई काम स्वयं करता है तो उसकी ज्ञानवृद्धि होती है। इसीलिये मनुष्यको स्वय ही अधिकाधिक कार्य करना चाहिये। हाँ, समाचार-पत्रोद्वारा अतीत कार्योंके अनुभवोंकी सूचना सरकारको देते रहना चाहिये। उससे लोग स्वयं सबक सीखेगे। चेतावनीद्वारा भी राज्य परोक्षरूपसे मार्गदर्शक हो सकता है। सरकारी कार्योकी व्यापकतासे नागरिक सदा ही राज्यकी ओर निहारते रहते हैं। इससे आलस्य, प्रमाद एवं प्रगतिका

अवरोध होता है । इससे व्यक्तित्वके विकासमे बाधा पडती है और नौकरशाही बढती है । इससे कोई कार्य भलीभाँति सम्पादित नहीं होता । राज्य हस्तक्षेप एक आवश्यक विचाररूपमे ही स्वतन्त्रताके लिये मानना चाहिये । नागरिक जीवनमें राज्यका न्यूनतम हस्तक्षेप ही व्यक्तिगत स्वतन्त्रताके लिये अपेक्षित है ।' समालोचक कहते हैं कि मिल 'ईस्ट इंडिया कम्पनी' के दफ्तरमें नौकर और राजनीतिक पत्रोंका लेखक था । १८५८ मे उसने कम्पनीके शासनके पक्षमें एक प्रार्थनापत्र लिखा था, जिसमें कम्पनीके शासनको न्यायसंगत कहा था और १८५९में उसकी 'स्वतन्त्रता' पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसमें उसने व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका पूर्ण समर्थन किया था । इस तरह उसके कार्य और विचार बेमेल थे । यह भी कहा जाता है कि १८३२ के पूर्व मध्यमवर्गके लोगोने सामन्तोंकी सत्ताका विरोध किया था । १९ वीं शतीमें सामन्तोंका ह्रास हुआ, परन्तु बुद्धिजीवी वर्गकी एक बढ़ती हुई जनशक्तिका विरोध इस आधारपर सम्भव नहीं था । पूँजीपतियो एव मध्यमवर्गीय उपयोगितामे जनताकी उपयोगिता भिन्न थी । अतः जनमतसे भयभीत बुद्धिजीवीके लिये अपेक्षित था कि वह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता- के नामपर जनमतके हस्तक्षेपसे बचे । उसी कार्यकी सिद्धि 'स्वतन्त्रता' पुस्तकद्वारा मिलने की । अब तो पूँजीपति एवं सर्वहारा श्रमिकोके बीच पडा मध्यम वर्ग शोचनीय दशामे है । न वह पूँजीपति ही है न तो सर्वहारा ही ! वह स्वयं व्यक्तिगत स्वतन्त्रता चाहता है । किसीका भी एकाधिकार नहीं चाहता । 'स्वतन्त्रता' पुस्तकमे इसी आवश्यकताकी पूर्ति की गयी है । समालोचकोंका यह भी कहना है कि 'मिलका धार्मिक जीवन ही परम्पराओंके विरुद्ध था । इसीलिये उसने व्यक्तिगत स्वतन्त्रताको दार्शनिक रूप दिया । हम पहले कह चुके हैं कि 'सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् ।' (मनु० । १६०)—पराधीनता ही दुःख और स्वाधीनता ही सुख है। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता अवश्य ही आदरकी वस्तु है, परंतु यदि मद्यपान, द्यूत आदिकी स्वतन्त्रता व्यक्तियोको होनी चाहिये, तब तो आत्महत्याकी भी स्वतन्त्रता होनी चाहिये ! इसी तरह यदि कोई स्वेच्छानुसार शराब, द्यूतसे परहेज न करे, माँ, बहन, बेटीसे भी शादी कर ले या मनमानी प्रेमसम्बन्ध करे तब तो मनुष्यता-पशुतामें कोई अन्तर ही नहीं रह जाता । आहार, निद्रा, भय, मैथुन मनुष्य एवं पशुका समान ही होता है । धर्म ही मनुष्यकी विशेषता है । धर्मविहीन स्वतन्त्रता स्वेच्छाचारिता या उच्छृङ्खलताके ही रूपमें परिणत हो जाती है । सर्वोपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्मात्मभाव प्राप्त होनेसे पहले प्राणीको अवश्य ही धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक विभिन्न नियन्त्रणोंके परतन्त्र रहना पडता है । वास्तविक पूर्ण स्वतन्त्रताके लिये प्राणीको पर्याप्त स्वतन्त्रताका बलिदान करना पड़ता है । अपौरुषेय वेद एव तदनुसारी शास्त्रोंके अनुसार विनिविहित

कार्यको ही धर्म कहा जाता है। भोजन, पान, शयन, विश्राम, सन्तानोत्पादनादि सभी कार्योंको शास्त्र-विधिके अनुसार करना ही धर्म है। धर्मनियन्त्रित जीवनसे ही पूर्ण स्वतन्त्रता-प्राप्ति सम्भव है। इसी प्रकार 'सनकी लोगोंके विचार एवं भाषणकी स्वतन्त्रता' भी उपहासास्पद है। अवश्य ही गुदड़ीसे भी लाल निकलते हैं, सनकियोंमेंसे भी कोई योग्य, लाभदायक सनकी निकल सकते हैं, परंतु सभी सनकियोंको पूर्ण स्वतन्त्रता दे देनेसे तो समाजकी शान्ति ही खतरेमे पड सकती है। इसी प्रकार तर्कका आदर अवश्य उपयोगी हो सकता है, परंतु कुछ नियमोंको मानकर ही तर्कका प्रयोग करना पडता है। फिर तर्कका कुछ अन्त भी नहीं है ! जीवनमे विश्वासका भी तो कहीं स्थान है। यदि बाजारमे खडे होकर राजद्रोहपर तर्क करनेकी स्वतन्त्रता दे दी जाय तो क्या शान्ति सुरक्षित रह सकेगी? इसी प्रकार बहुत-सी निश्चित वस्तुएँ भी हैं। माता, पिता, गुरुजनोद्वारा उन्हे जानकर प्राणी आगे बढता है। निश्चित वस्तुओमें भी तर्कका प्रयोग करके वह अपने समयका अपव्यय ही करेगा। वैज्ञानिकोको भी साम्राज्य तथा कुछ वैज्ञानिक नियमोको मानकर ही नयी खोजकी ओर बढना पड़ता है। पूर्वके अन्वेषणको ही अपने अनुभवसे अन्वेषण करना व्यर्थ ही होगा। यदि कोई अपने अनुभवपर ही संखियाके स्वाद और गुणके निर्णय करनेका हठ करेगा, तो उस-जैसे लक्षो व्यक्तियोको जीवनसे हाथ धोना पडेगा और लाभ कुछ न होगा। काले नागके काटने और उसके विषका परिणाम अनुभवद्वारा ही समझनेका प्रयत्न करना मूर्खता है। स्पष्ट है कि इस सम्बन्धमें शिष्टोंके अनुभवोका सदुपयोग करना उचित है। इसी प्रकार जिन दुराचारो, दुर्गुणो, पापोकी अग्राह्यता पूर्वजोके अनुभवोसे सिद्ध है उनपर विश्वास न करके पहले पाप, दुराचार करनेकी छूट देना अमानवता है। हिंदू विचारोके अनुसार मद्यपानसे ब्राह्मणका ब्राह्मणत्व ही नष्ट हो जाता है। फिर लौटना असम्भव ही होता है। इसी प्रकार एक बार पतिव्रताका सतीत्व चले जानेसे पुनः उसका लौटना सम्भव नहीं। अतः पापोका दुष्परिणाम देखनेके लिये पाप करनेकी छूट देना बुद्धिमानी नहीं। परम्पराके अनुसार एक ढंगका सस्कार बन जानेपर तद्विरुद्ध प्रवृत्ति होती ही नहीं। फिर विरुद्ध प्रवृत्ति कराकर दुष्परिणाम अनुभव करके उससे निवृत्त होनेकी व्यवस्था करनी वैसी ही होगी, जैसे कंटक चुभाकर पीडा अनुभव करके पुनः कंटक- निष्कासन-जन्य स्वास्थ्यका अनुभव करना। इसकी अपेक्षा अपनी बुद्धि एव समयको किसी अन्य उपयोगी काममे लगाना ही श्रेयस्कर है। जिनकी परम्पराओमे मद्य-मासका प्रचलन नहीं है, वहाँके बच्चोंको उस सम्बन्धके न तो संस्कार ही होते हैं, न इच्छा ही होती है। प्रत्युत निषेधके ही सस्कार होते हैं। उनके उस सस्कारको दृढ बनानेमे ही कल्याण है। अतितार्किकको सर्वतोऽभिशंकी हो जाना

पाश्चात्त्य राजनीति ८७

पड़ता है । फिर तो भोजनमें भी विषकी कल्पना होने लगती है । कई लोग बालकी खाल ही खींचते रहते हैं । वे अपने और दूसरोंका समय व्यर्थ ही अपव्यय करते रहते हैं । कितने ही जिद्दियोंको तर्क करनेकी स्वाधीनता देनेपर तत्त्व-निर्णय न होकर विवाद ही बढ़ता है । चरित्रोंकी भिन्नता एवं झक्कियोंकी वृद्धि समाजकी प्रगतिका लक्षण नहीं; किंतु निश्चित एवं उपयोगी गुणोंकी समृद्धि ही प्रगतिका लक्षण है । भिन्नताकी अपेक्षा गुणात्मक समृद्धिपर ही जोर देना आवश्यक है । योग्य वातावरण, उच्चकोटिकी शिक्षा एवं सदाचारके द्वारा ही उच्चकोटिका चारित्रिक संघटन होता है और यही राष्ट्रकी प्रगति है । झक्कियोंकी स्वतन्त्रतासे चरित्रमें भिन्नता भले ही आ जाय, परंतु चारित्रिक उच्चतामें कोई सहायता न मिलेगी । इसी प्रकार भले राजकीय नियम कम-से कम हों, परंतु धार्मिक, सामाजिक नियमोंद्वारा सदा ही व्यक्तियोंको उच्छृङ्खल जीवनसे बचाना अनिवार्य है । अवश्य ही रामराज्यकी दृष्टिसे सभी सम्पत्तियों एवं कार्योंका सरकारीकरण अनुचित है । तथापि विशिष्ट शिष्टों एवं शास्त्रोंका मार्ग-दर्शन समाजकी प्रगतिमे सदा ही सहायक होता है । प्रगतिके बाधक तत्त्वोंका निराकरण राज्यका अवश्य कर्तव्य है । विकास- वादियो एवं आधुनिक विचारकोंका सबसे बड़ा दोष यह है कि वे पूर्व-पूर्वके निर्णयों एवं सत्योंको निम्नस्तरका तथा उत्तरोत्तर निर्णयों एवं सत्योंको उच्चकोटिका मानते हैं । इसीलिये वे सदा ही निश्चित विषयमे भी खोजते रहते हैं । वे इसी दृष्टिसे झक्कियोंसे भी नवीन ज्ञानकी आशा रखते हैं और नयी-नयी व्यवस्थाओंकी खोजमें लगे रहते हैं । परंतु प्रमाणद्वारा प्रमित तत्त्व किसी भी कालान्तर या देशान्तर- में अन्यथा नहीं हो सकते । इस दृष्टिसे अपौरुषेय वेदों, तदनुसारी आर्ष ग्रन्थों तथा सर्वज्ञकल्प महर्षियों, राजर्षियोंने अपने ऋतम्भरा प्रज्ञा एवं सफल प्रयोगोंद्वारा . जिन नियमो, व्यवस्थाओंको समाजके लिये लाभदायक समझा, वे त्रिकालाबाध्य सत्य एवं उपयोगी हैं । उनका अनुसरण करना समाज एवं तद्घटक व्यक्तियोंका कर्तव्य है । शास्त्र एवं समाज स्थिर वस्तु है । उनका धार्मिक, सास्कृत स्वरूप एवं सभ्यता स्थिर वस्तु है और राज्यलक्ष्मी अस्थिर वस्तु । विशेषतया राज्यसत्ताको हथियानेके लिये सभी लोग प्रयत्नशील होते हैं । जिस ढगकी विचारधारावालोंका बहुमत होता है, उन्हींका शासन होता है । फलतः वे शासन, शिक्षा, सम्पत्ति, धर्म सभीको अपने हाथमे लेना चाहते हैं । कहना न होगा कि उक्त तीनो विषयोंमें सरकारी हस्तक्षेप होनेसे समाजकी संस्कृति, सभ्यता एवं धर्ममें सर्वथा रद्दोबदल हो जाता है, फिर समाजकी स्थिरता भी नष्ट हो जाती है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि 'अच्छे ही लोगोंके हाथमे शासन सत्ता जाती है ।' अनुभव तो यह है कि शान्तिप्रिय विचारक, गम्भीर विद्वान्, जाल-फरेब न करनेवाले पीछे रह

८८ मार्क्सवाद और रामराज्य जाते हैं। जाल-फरेबवाले अयोग्य लोग आगे आ जाते हैं । ऐसी स्थितिमें विभिन्न शासनोंके बदलनेके साथ यदि सभ्यता, संस्कृति, शिक्षामे भी रद्दोबदल होता जाय, तब तो समाजकी एकरूपता, स्थिरता असम्भव हो जायगी । बहुत-से लोग विकासवादी नियमानुसार उत्तरोत्तर प्रगतिका ही सिद्धान्त मानते हैं, परंतु इस मतमें फिर मनुष्यके प्रमाद, पुरुषार्थकी विशेषता नहीं रह जाती । परंतु वस्तुस्थिति यह है कि प्रमाद और सावधानीसे पतन एवं अभ्युदय स्पष्ट परिलक्षित होते हैं। अतः हर चीजका भार राज्यपर छोड़ देना उचित नहीं । सामाजिक एवं वैयक्तिक जीवनमें राज्यका कम-से-कम हस्तक्षेपवाला सिद्धान्त शास्त्र- सम्मत है । फिर भी धार्मिक, सामाजिक नियमोका पालन तो सबके लिये अपेक्षित होगा ही । न्याय, सुरक्षा, समष्टि-स्वास्थ्य, सुव्यवस्था, सफाई आदिका काम सरकार कर सकती है । आज तो राष्ट्रके प्रत्येक जीवन-क्षेत्रमे सरकार ही हावी होती जा रही है। व्यक्ति शासनयन्त्रका एक नगण्य कल-पुर्जा बनता चला जा रहा है । उसे व्यक्तिगत विकास-विचार आदिकी कोई भी स्वतन्त्रता नही । मिलकी दृष्टिसे 'मद्य-पान, द्यूत आदि व्यक्तिगत समझे जानेवाले कार्योंका भी समाजपर असर पड़ता ही है।' धन एव समयका यदि अनुचित कार्योंमें अपव्यय न कर किसी उचित कार्यमे व्यय किया जाय तो अवश्य ही उससे समाजका लाभ हो सकता है। एक व्यक्तिके भी दुराचारी होनेसे समाज दूषित होता है । अन्य लोगोपर भी उसके दुस्संस्कार पडते हैं, फिर जब व्यक्तियोका समुदाय ही समाज है, तब तो व्यक्तिके दूषित होनेसे समाज दूषित होगा ही । मिलके इस स्वतन्त्रता-प्रेमका भी आधार रूसोका यह वाक्य है कि 'मनुष्य स्वतन्त्र जन्मा है, किंतु सभी ओरसे बेड़ियोंसे जकड़ा हुआ।' इसका सार यही है कि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और सामाजिक बन्धन परस्पर विरोधी है । किंतु भारतीय भावनासे स्वतन्त्रता-प्रेम स्वाभाविक है और वह है परम ध्येय एवं प्राप्य, परंतु उसे पूर्णरूपसे प्राप्त करनेके लिये पर्याप्त स्वतन्त्रताका वलिदान कर धार्मिक एवं सामाजिक सभी बन्धनोको अंगीकार करना परमावश्यक है । अधिक मुनाफा पानेके लिये व्यापार आदिमें पर्याप्त धन व्यय करना पडता ही है । अतएव रूसो भी तो वास्तविक स्वतन्त्रता राज्य-नियन्त्रणसे मानता ही था । इस दृष्टिसे व्यक्ति एवं समाजका परस्पर पोष्य- पोषक भाव ही है, विरोध नहीं । लौकिक दृष्टिसे भी कई स्वतन्त्रताएँ परस्पर विरोधी होती हैं । वहाँ समझौतासे काम चलता है । सर्वथापि समष्टिहिताविरोधेन स्वतन्त्रताका उपयोग ही सदुपयोग है । विचार और भाषणकी स्वतन्त्रता बहुत आवश्यक है । भारतीय सिद्धान्तोमे उसका सदा ही अत्यन्त आदर था । इस देशमें चार्वाक, शून्यवाद, द्वैती, अद्वैती आदि अनेक प्रकारके परस्पर विरुद्ध दार्शनिक हुए हैं । उनमें विचार-संघर्ष