मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ३०६ | * मत्स्यपुराण * |
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छियासीवाँ अध्याय
सुवर्णाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br><br>अथ पापहरं वक्ष्ये सुवर्णाचलमुत्तमम्।<br>यस्य प्रदानाद् भवनं वैरिञ्च्यं याति मानवः॥ १<br><br>उत्तमः पलसाहस्रो मध्यमः पञ्चभिः शतैः।<br>तदर्धेनाधमस्तद्वदल्पवित्तोऽपि शक्तितः।<br>दद्यादेकपलादूर्ध्वं यथाशक्त्या विमत्सरः॥ २<br><br>धान्यपर्वतवत् सर्वं विदध्यान्मुनिपुङ्गव।<br>विष्कम्भशैलास्तद्वच्च ऋत्विग्भ्यः प्रतिपादयेत्॥ ३<br><br>नमस्ते ब्रह्मबीजाय ब्रह्मगर्भाय ते नमः।<br>यस्मादनन्तफलदस्तस्मात् पाहि शिलोच्चय॥ ४<br><br>यस्मादग्नेरपत्यं* त्वं यस्मात् तेजो जगत्पतेः।<br>हेमपर्वतरूपेण तस्मात् पाहि नगोत्तम॥ ५<br><br>अनेन विधिना यस्तु दद्यात् कनकपर्वतम्।<br>स याति परमं ब्रह्मलोकमानन्दकारकम्।<br>तत्र कल्पशतं तिष्ठेत् ततो याति परां गतिम्॥ ६ | ईश्वरने कहा— नारद! अब मैं पापहारी एवं श्रेष्ठ सुवर्णाचलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका दान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। एक हजार पलका सुवर्णाचल उत्तम, पाँच सौ पलका मध्यम और ढाई सौ पलका अधम (साधारण) माना गया है। अल्प वित्तवाला भी अपनी शक्तिके अनुसार गर्वरहित होकर एक पलसे कुछ अधिक सोनेका पर्वत बनवा सकता है। मुनिश्रेष्ठ! शेष सारे कार्योंका विधान धान्यपर्वतकी भाँति ही करना चाहिये। उसी प्रकार विष्कम्भपर्वतोंकी भी स्थापना कर उन्हें ऋत्विजोंको दान करनेका विधान है। (प्रार्थना-मन्त्र इस प्रकार है—) 'शिलोच्चय! तुम ब्रह्मके बीजरूप हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारे गर्भमें ब्रह्मा स्थित रहते हैं, अतः तुम्हें प्रणाम है। तुम अनन्त फलके दाता हो, इसलिये मेरी रक्षा करो। जगत्पति पर्वतोत्तम! तुम अग्निकी संतान और जगदीश्वर शिवके तेजःस्वरूप हो, अतः सुवर्णाचलके रूपसे मेरा पालन करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे सुवर्णाचलका दान करता है, वह परम आनन्ददायक ब्रह्मलोकमें जाता है और वहाँ सौ कल्पोंतक निवास करनेके पश्चात् परमगतिको प्राप्त होता है॥ १–६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सुवर्णाचलकीर्तनं नाम षडशीतितमोऽध्यायः॥ ८६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सुवर्णाचलकीर्तन नामक छियासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८६॥
* सुवर्णकी अग्नि-अपत्यता (अग्निकी पुत्रता) प्रसिद्ध है। इस विषयमें एक श्लोक सर्वत्र मिलता है, जो इस प्रकार है— 'अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णं भूर्वैष्णवी सूर्यसुताश्च गावः। लोकत्रयं तेन भवेत् प्रदत्तं यः काञ्चनं गां च महीं प्रदद्यात्॥'
९३- शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मों तथा नवग्रहशान्तिकी विधिका वर्णन
| * अध्याय ८८ * | ३०७ |
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सतासीवाँ अध्याय
तिलशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा—नारद! इसके बाद मैं तिलशैलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका विधिपूर्वक दान करनेसे मनुष्य सनातन विष्णुलोकको प्राप्त होता है। विप्रवर! दस द्रोण तिलका बना हुआ तिलशैल उत्तम, पाँच द्रोणका मध्यम और तीन द्रोणका कनिष्ठ बतलाया गया है। इसके चारों दिशाओंमें विष्कम्भपर्वतोंकी स्थापना तथा अन्यान्य सारा कार्य पूर्ववत् करना चाहिये। मुनिपुङ्गव! अब मैं दानके मन्त्रोंको यथार्थरूपसे बतला रहा हूँ। 'चूँकि मधुदैत्यके वधके समय भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुए पसीनेकी बूँदोंसे तिल, कुश और उड़दकी उत्पत्ति हुई थी, इसलिये तुम इस लोकमें मुझे शान्ति प्रदान करो। शैलेन्द्र तिलाचल! चूँकि देवताओंके हव्य और पितरोंके कव्य—दोनोंमें सम्मिलित होकर तिल ही सब ओरसे (भूत-प्रेतादिसे) रक्षा करता है, इसलिये तुम मेरा भवसागरसे उद्धार करो, तुम्हें नमस्कार है। इस प्रकार आमन्त्रित कर जो मनुष्य श्रेष्ठ तिलाचलका दान करता है, वह पुनरागमनरहित विष्णुपदको प्राप्त हो जाता है। उसे इस लोकमें दीर्घायुकी प्राप्ति होती है, वह पुत्र एवं पौत्रोंको प्राप्तकर उनके साथ आनन्द मनाता है तथा अन्तमें देवताओं, गन्धर्वों और पितरोंद्वारा पूजित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है॥ १—७॥ |
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| अतः परं प्रवक्ष्यामि तिलशैलं विधानतः।<br>यत्प्रदानान्नरो याति विष्णुलोकं सनातनम्॥ १<br><br>उत्तमो दशभिर्द्रोणैर्मध्यमः पञ्चभिः स्मृतः।<br>त्रिभिः कनिष्ठो विप्रेन्द्र तिलशैलः प्रकीर्तितः॥ २<br><br>पूर्ववच्चापरान् सर्वान् विष्कम्भानभितो गिरीन्।<br>दानमन्त्रान् प्रवक्ष्यामि यथावन्मुनिपुङ्गव॥ ३<br><br>यस्मान्मधुवधे विष्णोर्देहस्वेदसमुद्भवाः।<br>तिलाः कुशाश्च माषाश्च तस्माच्छान्त्यै भवन्त्विह॥ ४<br><br>हव्ये कव्ये च यस्माच्च तिलैरेवाभिरक्षणम्।<br>भवादुद्धर शैलेन्द्र तिलाचल नमोऽस्तु ते॥ ५<br><br>इत्यामन्त्र्य च यो दद्यात् तिलाचलमनुत्तमम्।<br>स वैष्णवं पदं याति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ ६<br><br>दीर्घायुष्यमवाप्नोति पुत्रपौत्रैश्च मोदते।<br>पितृभिर्देवगन्धर्वैः पूज्यमानो दिवं व्रजेत्॥ ७ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तिलाचलकीर्तनं नाम समाशीतितमोऽध्यायः॥ ८७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तिलाचलकीर्तन नामक सतासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८७॥
अठासीवाँ अध्याय
कार्पासाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा—नारद! इसके पश्चात् मैं श्रेष्ठ कार्पासाचलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका दान करनेसे मनुष्य धनवाला परमपदको प्राप्त कर लेता है। इस लोकमें बीस भार रूईसे बना हुआ कार्पासपर्वत उत्तम, |
|---|---|
| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि कार्पासाचलमुत्तमम्।<br>यत्प्रदानान्नरः श्रीमान् प्राप्नोति परमं पदम्॥ १<br><br>कार्पासपर्वतस्तद्वद् विंशद्भारैरिहोत्तमः। |
| ३०८ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दशभिर्मध्यमः प्रोक्तः पञ्चभिस्त्वधमः स्मृतः।<br>भारेणाल्पधनो दद्याद् वित्तशाठ्यविवर्जितः॥ २<br><br>धान्यपर्वतवत् सर्वमासाद्य मुनिपुङ्गव।<br>प्रभातायां तु शर्वर्यां दद्यादिदमुदीरयन्॥ ३<br><br>त्वमेवावरणं यस्माल्लोकानामिह सर्वदा।<br>कार्पासाद्र नमस्तुभ्यमघौघध्वंसनो भव॥ ४<br><br>इति कार्पासशैलेन्द्रं यो दद्याच्छर्वसंनिधौ।<br>रुद्रलोके वसेत् कल्पं ततो राजा भवेदिह॥ ५ | दस भारसे बना हुआ मध्यम और पाँच भारसे बना हुआ अधम (साधारण) कहा गया है। अल्प सम्पत्तिवाला मनुष्य कृपणता छोड़कर एक भार कपाससे बने हुए पर्वतका दान कर सकता है। मुनिश्रेष्ठ! धान्यपर्वतकी भाँति सारी सामग्री एकत्र कर रात्रिके व्यतीत होनेपर प्रातःकाल इसे दान करनेका विधान है। उस समय ऐसा मन्त्र उच्चारण करना चाहिये—‘कार्पासाचल! चूँकि इस लोकमें तुम्हीं सदा सभी लोगोंके शरीरके आच्छादन हो, इसलिये तुम्हें नमस्कार है। तुम मेरे पापसमूहका विनाश कर दो।’ इस प्रकार जो मनुष्य भगवान् शिवके संनिधानमें कार्पासाचलका दान करता है, वह एक कल्पतक रुद्रलोकमें निवास करनेके पश्चात् भूतलपर राजा होता है॥ १–५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कार्पासशैलकीर्तनं नामाष्टाशीतितमोऽध्यायः॥ ८८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कार्पासशैलकीर्तन नामक अठासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८८॥
नवासीवाँ अध्याय
घृताचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— |
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| अतः परं प्रवक्ष्यामि घृताचलमनुत्तमम्।<br>तेजोऽमृतमयं दिव्यं महापातकनाशनम्॥ १<br><br>विंशत्या घृतकुम्भानामुत्तमः स्याद् घृताचलः।<br>दशभिर्मध्यमः प्रोक्तः पञ्चभिस्त्वधमः स्मृतः॥ २<br><br>अल्पवित्तः प्रकुर्वीत द्वाभ्यामिह विधानतः।<br>विष्कम्भपर्वतांस्तद्वच्चतुर्थांशेन कल्पयेत्॥ ३<br><br>शालितण्डुलपात्राणि कुम्भोपरि निवेशयेत्।<br>कारयेत् संहतानुच्चान् यथाशोभं विधानतः॥ ४<br><br>वेष्टयेच्छुक्लवासोभिरिक्षुदण्डफलादिकैः।<br>धान्यपर्वतवच्छेषं विधानमिह पठ्यते॥ ५<br><br>अधिवासनपूर्वं च तद्वद्धोमसुरार्चनम्।<br>प्रभातायां तु शर्वर्यां गुरवे तन्निवेदयेत्।<br>विष्कम्भपर्वतांस्तद्वदृृत्विग्भ्यः शान्तमानसः॥ ६ | नारद! इसके बाद मैं दिव्य तेजसे सम्पन्न, अमृतमय और महान्-से-महान् पापोंके विनाशक श्रेष्ठ घृताचलका वर्णन कर रहा हूँ। बीस घड़े* घीसे बना हुआ घृताचल उत्तम, दससे मध्यम और पाँचसे अधम (साधारण) कहा गया है। अल्प वित्तवाला भी यदि करना चाहे तो वह दो ही घड़े घृतसे विधिपूर्वक घृताचलकी रचना करके दान कर सकता है। पुनः उसके चतुर्थांशसे विष्कम्भपर्वतोंकी भी कल्पना करनी चाहिये। उन सभी घड़ोंके ऊपर अगहनी चावलसे परिपूर्ण पात्र रखा जाय और उन्हें विधिपूर्वक शोभाका ध्यान रखते हुए एकके ऊपर एक रखकर ऊँचा कर दिया जाय। उन्हें श्वेत वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दिया जाय और उनके निकट गन्ना और फल आदि रख दिये जायें। इसमें शेष सारा विधान धान्यपर्वतकी ही भाँति बतलाया गया है। देवताओंकी स्थापना, हवन और देवार्चन भी उसी प्रकार करना चाहिये। रात्रिके व्यतीत होनेपर प्रातःकाल (यजमान) शान्तमनसे वह घृताचल गुरुको निवेदित कर दे। उसी प्रकार विष्कम्भपर्वतोंको ऋत्विजोंको दान कर देनेका विधान है। |
* मदन, नीलकण्ठ आदि व्याख्याता यहाँ कुम्भसे पात्रका ही अर्थ लेते हैं—'कुम्भः पात्ररूप एव द्रवत्वेन धृतधारणयोग्यपरिमाणः।'
| * अध्याय ९० * | ३०९ |
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| संयोगाद् घृतमुत्पन्नं यस्मादमृततेजसोः ।<br>तस्माद् घृतार्चिर्विश्वात्मा प्रीयतामत्र शङ्करः ॥ ७<br><br>यस्मात् तेजोमयं ब्रह्म घृते तद्धिध्यवस्थितम् ।<br>घृतपर्वतरूपेण तस्मात् त्वं पाहि नोऽनिशम् ॥ ८<br><br>अनेन विधिना दद्याद् घृताचलमनुत्तमम् ।<br>महापातकयुक्तोऽपि लोकमाप्नोति शाम्भवम् ॥ ९<br><br>हंससारसयुक्तेन किङ्किणीजालमालिना ।<br>विमानेनाप्सरोभिश्च सिद्धविद्याधरैर्वृतः ।<br>विहरेत् पितृभिः सार्धं यावदाभूतसम्प्लवम् ॥ १० | (उस समय इस अर्थवाले मन्त्रका पाठ करना चाहिये—) 'चूँकि अमृत और अग्निके संयोगसे घृत उत्पन्न हुआ है, इसलिये अग्निस্বরূপ विश्वात्मा शङ्कर इस व्रतसे प्रसन्न हों। चूँकि ब्रह्म तेजोमय है और घीमें विद्यमान है, ऐसा जानकर तुम घृतपर्वतरूपसे रात-दिन हमारी रक्षा करो।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे इस श्रेष्ठ घृताचलका दान करता है, वह महापापी होनेपर भी शिवलोकको प्राप्त होता है। वहाँ वह हंस और सारस पक्षियोंकी चित्रकारी क्षुद्र घंटिका (किङ्किणीजाल)-से सुशोभित तथा विमानपर आरूढ़ होकर अप्सराओं, सिद्धों और विद्याधरोंसे घिरा हुआ पितरोंके साथ प्रलय-कालतक विहार करता है॥ १—१०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे घृताचलकीर्तनं नामैकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें घृताचलकीर्तन नामक नवासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ८९ ॥
नब्बेवाँ अध्याय
रत्नाचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि रत्नाचलमनुत्तमम् ।<br>मुक्ताफलसहस्रेण पर्वतः स्यादनुत्तमः ॥ १<br><br>मध्यमः पञ्चशतिकस्त्रिशतेनाधमः स्मृतः ।<br>चतुर्थांशेन विष्कम्भपर्वताः स्युः समंततः ॥ २<br><br>पूर्वेण वज्रगोमेदैर्दक्षिणेनेन्द्रनीलकैः ।<br>पद्मरागायुतः कार्यो विद्वद्भिर्गन्धमादनः ॥ ३<br><br>वैदूर्यविद्रुमैः पश्चात् सम्मिश्रो विपुलाचलः ।<br>पुष्परागैः ससौपर्णैरुत्तरेण च विन्यसेत् ॥ ४<br><br>धान्यपर्वतवत् सर्वमत्रापि परिकल्पयेत् ।<br>तद्वदावाहनं कुर्याद् वृक्षान् देवांश्च काननान् ॥ ५ | ईश्वरने कहा—नारद ! इसके पश्चात् मैं श्रेष्ठ रत्नाचलका वर्णन कर रहा हूँ। एक हजार मुक्ताफल (मोतियों)-द्वारा बना हुआ पर्वत उत्तम, पाँच सौसे बना हुआ मध्यम और तीन सौसे बना हुआ अधम (साधारण) माना गया है। कल्पित पर्वतके चतुर्थांशसे उसके चारों दिशाओंमें विष्कम्भपर्वतोंको स्थापित करना चाहिये। विद्वानोंको पूर्व दिशामें हीरा और गोमेदसे मन्दराचलकी, दक्षिणमें पद्मराग (माणिक्य) और इन्द्रनील (नीलम) मणिके संयोगसे गन्धमादनकी, पश्चिममें वैदूर्य और मूँगेके सम्मिश्रणसे विपुलाचलकी और उत्तरमें गारुत्मतमणिसहित पुष्पराग (पोखराज) मणिसे सुपार्श्व पर्वतकी स्थापना करनी चाहिये।* इस दानमें भी धान्यपर्वतकी तरह सारे उपकरणोंकी कल्पना करे। उसी प्रकार स्वर्णमय देवताओं, वनों और वृक्षोंका स्थापन एवं आवाहन करे |
* इन रत्नोंकी स्थापनामें नारदपुराण १।५६।२८२, शुक्रनी० ४।२ आदिमें निर्दिष्ट दिक्पालों तथा दिगीश ग्रहोंके प्रिय रत्नोंका भी ध्यान रखा गया है।
३१० * मत्स्यपुराण *
| पूजयेत् पुष्पगन्धाद्यैः प्रभाते च विमत्सरः।<br>पूर्ववद् गुरुमृत्विग्भ्य इमान् मन्त्रानुदीरयेत्॥ ६<br>यदा देवगणाः सर्वे सर्वरत्नेष्ववस्थिताः।<br>त्वं च रत्नमयो नित्यं नमस्तेऽस्तु सदाचल॥ ७<br>यस्माद् रत्नप्रदानेन तुष्टिं प्रकुरुते हरिः।<br>सदा रत्नप्रदानेन तस्मान्नः पाहि पर्वत॥ ८<br>अनेन विधिना यस्तु दद्याद् रत्नमयं गिरिम्।<br>स याति विष्णुसालोक्यममरेश्वरपूजितः॥ ९<br>यावत्कल्पशतं साग्रं वसेच्चेह नराधिप।<br>रूपारोग्यगुणोपेतः सप्तद्वीपाधिपो भवेत्॥ १०<br>ब्रह्महत्यादिकं किंचिद् यदत्रामुत्र वा कृतम्।<br>तत् सर्वं नाशमायाति गिरिर्वज्रहतो यथा॥ ११ | तथा पुष्प, गन्ध आदिसे उनका पूजन करे। प्रातःकाल मत्सररहित होकर वह सारा सामान गुरु और ऋत्विजोंको दान कर दे। उस समय इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—'अचल! जब सभी देवगण सम्पूर्ण रत्नोंमें निवास करते हैं, तब तुम तो नित्य रत्नमय ही हो; अतः तुम्हें सदा हमारा नमस्कार प्राप्त हो। पर्वत! चूँकि सदा रत्नका दान करनेसे श्रीहरि संतुष्ट हो जाते हैं, अतः तुम हमारी रक्षा करो।' नराधिप! जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे रत्नमय पर्वतका दान करता है, वह इन्द्रसे सत्कृत हो विष्णु-सालोक्यको प्राप्त कर लेता है और वहाँ सौ कल्पोंसे भी अधिक कालतक निवास करता है। पुनः इस लोकमें जन्म लेनेपर वह सौन्दर्य, नीरोगता और सद्गुणोंसे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है। साथ ही उसके द्वारा इहलोक अथवा परलोकमें जो कुछ भी ब्रह्महत्या आदि पाप किये गये होते हैं, वे सभी उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे वज्रद्वारा प्रहार किया गया हुआ पर्वत॥ १—११॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे रत्नाचलकीर्तनं नाम नवतितमोऽध्यायः॥ ९०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें रत्नाचलकीर्तन नामक नब्बेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९०॥
इक्यानबेवाँ अध्याय
रजताचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि रौप्याचलमनुत्तमम्।<br>यत्प्रदानान्नरो याति सोमलोकमनुत्तमम्॥ १<br>दशभिः पलसाहस्रैरुत्तमो रजताचलः।<br>पञ्चभिर्मध्यमः प्रोक्तस्तदर्धेनाधमः स्मृतः॥ २<br>अशक्तो विंशतेरूर्ध्वं कारयेच्छक्तितस्तदा।<br>विष्कम्भपर्वतांस्तद्वत् तुरीयांशेन कल्पयेत्॥ ३<br>पूर्ववद् राजतान् कुर्वन् मन्दरादीन् विधानतः।<br>कलधौतमयांस्तद्वल्लोकेशानर्चयेद् बुधः॥ ४<br>ब्रह्मविष्ण्वर्कवान् कार्यो नितम्बोऽत्र हिरण्मयः।<br>रजतं स्याद् यदन्येषां कार्यं तदिह काञ्चनम्॥ ५ | ईश्वरने कहा—नारद! इसके बाद मैं सर्वश्रेष्ठ रौप्याचल अर्थात् रजतशैलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका दान करनेसे मनुष्य सर्वश्रेष्ठ चन्द्रलोकको प्राप्त करता है। दस हजार पल चाँदीसे बना हुआ रजताचल उत्तम, पाँच हजार पलसे बना हुआ मध्यम और ढाई हजार पलसे बना हुआ अधम कहा गया है। यदि दाता ऐसा करनेमें असमर्थ हो तो उसे अपनी शक्तिके अनुसार बीस पलसे कुछ अधिक चाँदीद्वारा पर्वतका निर्माण कराना चाहिये। उसी प्रकार प्रधान पर्वतके चतुर्थांशसे विष्कम्भपर्वतोंकी भी कल्पना करनेका विधान है। पहलेकी तरह चाँदीके द्वारा मन्दर आदि पर्वतोंका निर्माण कर उनके नितम्बभागको सोनेसे सुशोभित कर दे। उनपर लोकपालोंकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित कर उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और सूर्यकी मूर्तियोंसे भी संयुक्त कर दे। तत्पश्चात् बुद्धिमान् दाता इन सबकी विधिपूर्वक अर्चना करे। सारांश यह है कि अन्य पर्वतोंमें जो उपकरण चाँदीके होते हैं, वे सभी इसमें सुवर्णके होने चाहिये। |
* अध्याय ९२ * ३११
| शेषं तु पूर्ववत् कुर्याद्धोमजागरणादिकम्।<br>दद्यात् ततः प्रभाते तु गुरवे रौप्यपर्वतम्॥ ६<br><br>विष्कम्भशैलानृत्विग्भ्यः पूज्य वस्त्रविभूषणैः*।<br>इमं मन्त्रं पठन् दद्याद् दर्भपाणिर्विमत्सरः॥ ७<br><br>पितॄणां वल्लभो यस्माद्धरीन्द्राणां शिवस्य च।<br>पाहि रजत तस्मान्नः शोकंसंसारसागरात्॥ ८<br><br>इत्थं निवेद्य यो दद्याद् रजताचलमुत्तमम्।<br>गवामयुतदानस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ९<br><br>सोमलोके स गन्धर्वैः किन्नराप्सरसां गणैः।<br>पूज्यमानो वसेद् विद्वान् यावदाभूतसम्प्लवम्॥ १० | शेष हवन, जागरण आदि सारे कार्य धान्यपर्वतकी भाँति ही करे। तत्पश्चात् प्रातःकाल वस्त्र और आभूषण आदिके द्वारा गुरु और ऋत्विजोंका पूजन कर रजताचल गुरुको और विष्कम्भपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे। उस समय मत्सररहित हो हाथमें कुश लेकर इस मन्त्रका पाठ करे—'रजताचल! तुम पितरोंको तथा श्रीहरि, सूर्य, इन्द्र और शिवको परम प्रिय हो, इसलिये शोकरूपी संसार-सागरसे मेरी रक्षा करो।' जो मानव इस प्रकार निवेदन कर श्रेष्ठ रजताचलका दान करता है, वह दस हजार गो-दानका फल प्राप्त करता है। वह विद्वान् चन्द्रलोकमें गन्धर्वों, किन्नरों और अप्सराओंके समूहोंसे पूजित होकर प्रलयकालतक निवास करता है॥ १—१०॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे रौप्याचलकीर्तनं नामैकनवतितमोऽध्यायः॥ ९१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें रौप्याचलकीर्तन नामक इक्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९१॥
बानबेवाँ अध्याय
शर्कराशैलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य तथा राजा धर्ममूर्तिके वृत्तान्त-प्रसङ्गमें लवणाचलदानका महत्त्व
| ईश्वर उवाच | भगवान् शंकरने कहा—नारदजी! इसके पश्चात् मैं |
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| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि शर्कराशैलमुत्तमम्।<br>यस्य प्रदानाद् विश्वार्करुद्रास्तुष्यन्ति सर्वदा॥ १<br><br>अष्टभिः शर्कराभारैरुत्तमः स्यान्महाचलः।<br>चतुर्भिर्मध्यमः प्रोक्तो भाराभ्यामवरः स्मृतः॥ २<br><br>भारेण वार्थभारेण कुर्याद् यः स्वल्पवित्तवान्।<br>विष्कम्भपर्वतान् कुर्यात् तुरीयांशेन मानवः॥ ३<br><br>धान्यपर्वतवत् सर्वमासाद्यामरसंयुक्तम्।<br>मेरोरुपरि तद्वच्च स्थाप्य हेमतरुत्रयम्॥ ४ | परमोत्तम शर्कराशैलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका दान करनेसे भगवान् विष्णु, रुद्र और सूर्य सदा संतुष्ट रहते हैं। आठ भार शक्करसे बना हुआ शर्कराचल उत्तम, चार भारसे बना हुआ मध्यम और दो भारसे बना हुआ अधम कहा गया है। जो मानव स्वल्प सम्पत्तिवाला हो, वह एक भार अथवा आधे भारसे भी शर्कराचल बनवा सकता है। प्रधान पर्वतके चतुर्थांशसे विष्कम्भपर्वतोंका भी निर्माण करना चाहिये। पुनः धान्यपर्वतकी तरह सारी सामग्री प्रस्तुत करके मेरु पर्वतकी भाँति इसके ऊपर भी स्वर्णमयी देवमूर्तिके साथ |
* हेमाद्रि, कल्पतरु, पद्मपुराणादिमें—यहाँ 'विलेपनैः' पाठ है।
३१२ * मत्स्यपुराण *
| मन्दारः पारिजातश्च तृतीयः कल्पपादपः।<br>एतद् वृक्षत्रयं मूर्ध्नि सर्वेष्वपि निवेशयेत्॥ ५<br>हरिचन्दनसंतानौ पूर्वपश्चिमभागयोः।<br>निवेश्यौ सर्वशैलेषु विशेषाच्छर्कराचले॥ ६<br>मन्दरे कामदेवस्तु प्रत्यग्वक्त्रः सदा भवेत्।<br>गन्धमादनशृङ्गे च धनदः स्यादुदङ्मुखः॥ ७<br>प्राङ्मुखो वेदमूर्तिंश्च हंसः स्याद् विपुलाचले।<br>हैमी सुपार्श्वे सुरभिर्दक्षिणाभिमुखी भवेत्॥ ८ | मन्दार, पारिजात और कल्पवृक्ष—इन तीनों वृक्षोंकी भी स्वर्णनिर्मित मूर्ति स्थापित करे। इन तीनों वृक्षोंको तो प्रायः सभी पर्वतोंपर स्थापित कर देना चाहिये। सभी पर्वतोंके पूर्व और पश्चिम भागमें हरिचन्दन और कल्पवृक्षको निविष्ट करना चाहिये। शर्कराचलमें तो इसका विशेषरूपसे ध्यान रखना चाहिये। मन्दराचलपर कामदेवकी मूर्ति सदा पश्चिमाभिमुखी, गन्धमादनके शिखरपर कुबेरकी मूर्ति उत्तराभिमुखी, विपुलाचलपर वेदमूर्ति—ब्रह्मा और हंसकी मूर्ति पूर्वाभिमुखी और सुपार्श्व पर्वतपर स्वर्णमयी गौकी मूर्ति दक्षिणाभिमुखी होनी चाहिये॥ १-८॥ |
| धान्यपर्वतवत् सर्वमावाहनविधानकम्।<br>कृत्वा तु गुरवे दद्यान्मध्यमं पर्वतोत्तमम्।<br>ऋत्विग्भ्यश्चतुरः शैलानिमान् मन्त्रानुदीरयन्॥ ९<br>सौभाग्यामृतसारोऽयं पर्वतः शर्करायुतः।<br>तस्मादानन्दकारी त्वं भव शैलेन्द्र सर्वदा॥ १०<br>अमृतं पिबतां ये तु निपेतुर्भुवि शीकराः।<br>देवानां तत्समुत्थस्त्वं पाहि नः शर्कराचल॥ ११<br>मनोभवधनुर्मध्यादुद्भूता शर्करा यतः।<br>तन्मयोऽसि महाशैल पाहि संसारसागरात्॥ १२<br>यो दद्याच्छर्कराशैलमनेन विधिना नरः।<br>सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः स याति परमं पदम्॥ १३<br>चन्द्रतारार्कसंकाशमधिरुह्यानुजीविभिः ।<br>सहैव यानमातिष्ठेत् तत्र विष्णुप्रचोदितः॥ १४<br>ततः कल्पशतान्ते तु सप्तद्वीपाधिपो भवेत्।<br>आयुरारोग्यसम्पन्नो यावज्जन्मार्बुदत्रयम्॥ १५<br>भोजनं शक्तितः दद्यात् सर्वशैलेष्वमत्सरः।<br>सर्वत्राक्षारलवणमश्रीयात् तदनुज्ञया।<br>पर्वतोपस्करान् सर्वान् प्रापयेद् ब्राह्मनालयम्॥ १६ | तत्पश्चात् आवाहन आदि सारा विधान धान्यपर्वतकी भाँति करके अन्तमें इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए बिचला प्रधान पर्वत गुरुको और चारों विष्कम्भपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे। (वे मन्त्र इस प्रकारके अर्थवाले हैं—) 'शैलेन्द्र! यह शक्करद्वारा निर्मित पर्वत सौभाग्य और अमृतका सार है, इसलिये तुम मेरे लिये सदा आनन्दकारक होओ। शर्कराचल! देवताओंके अमृत-पान करते समय जो बूँदें भूतलपर टपक पड़ी थीं, उन्हींसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई है; अतः तुम हमारी रक्षा करो। महाशैल! चूँकि शर्करा कामदेवके धनुषके मध्यभागसे प्रादुर्भूत हुई है और तुम शर्करामय हो, इसलिये संसारसागरसे मुझे बचाओ।' जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार शर्कराशैलका दान करता है, वह समस्त पापोंसे विमुक्त होकर परमपदको प्राप्त हो जाता है। वहाँ वह भगवान् विष्णुकी आज्ञासे अपने आश्रितोंके साथ ही सूर्य, चन्द्र और तारकाओंके समान कान्तिमान् विमानपर आरूढ़ होकर सुशोभित होता है। पुनः सौ कल्पोंके बाद तीन अरब जन्मोंतक भूतलपर दीर्घायु और नीरोगतासे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधिपति होता है। सभी पर्वतदानोंमें मत्सररहित होकर अपनी शक्तिके अनुसार भोजन करानेका विधान है। सर्वत्र गुरुकी आज्ञासे अपनी शक्तिके अनुकूल क्षार (नमक)-रहित भोजन करना चाहिये। पुनः पर्वतदानकी सारी सामग्री ब्राह्मणके घर स्वयं भेजवा देनी चाहिये॥ ९-१६॥ |
| ईश्वर उवाच<br><br>आसीत् पुरा बृहत्कल्पे धर्ममूर्तिर्जनाधिपः।<br>सुहृच्छक्रस्य निहता येन दैत्याः सहस्रशः॥ १७ | ईश्वरने कहा— नारद! पहले बृहत्कल्पमें धर्ममूर्ति नामक एक राजा हुआ था। उसके तेजके सामने सूर्य और चन्द्रमा आदि भी कान्तिहीन हो जाते थे। वह इन्द्रका मित्र था। उसने हजारों दैत्योंका वध किया था। |
* अध्याय ९२ * ३१३
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| सोमसूर्यादयो यस्य तेजसा विगतप्रभाः।<br>अभवञ्छतशो येन शत्रवश्च पराजिताः।<br>यथेच्छारूपधारी च मनुष्योऽप्यपराजितः॥ १८<br>तस्य भानुमती नाम भार्या त्रैलोक्यसुन्दरी।<br>लक्ष्मीवद् दिव्यरूपेण निर्जितामरसुन्दरी ॥ १९<br>राज्ञस्तस्याग्रमहिषी प्राणेभ्योऽपि गरीयसी।<br>दशनारीसहस्राणां मध्ये श्रीरिव राजते ॥ २०<br>नृपकोटिसहस्रेण न कदाचित् स मुच्यते।<br>कदाचिदास्थानगतं पप्रच्छ स पुरोधसम्।<br>विस्मयेनावृतो राजा वसिष्ठमृषिसत्तमम् ॥ २१ | वह इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाला मनुष्य होनेपर भी किसीसे परास्त नहीं हुआ था, अपितु उसके द्वारा सैकड़ों शत्रु पराजित हो चुके थे। उसकी पत्नीका नाम भानुमती था। वह त्रिलोकीमें सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी थी। उसने लक्ष्मीके समान अपने दिव्य रूपसे देवाङ्गनाओंको भी पराजित कर दिया था। वह दस हजार नारियोंके बीचमें लक्ष्मीकी तरह सुशोभित होती थी। राजा धर्ममूर्तिकी वह पटरानी उसे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। उसे असंख्य राजा सदा घेरे रहते थे। एक बार सभामण्डपमें आये हुए अपने पुरोहित महर्षि वसिष्ठसे उस राजाने विस्मयविमुग्ध हो ऐसा प्रश्न किया॥ १७-२१ ॥ |
| राजोवाच<br>भगवन् केन धर्मेण मम लक्ष्मीरनुत्तमा।<br>कस्माच्च विपुलं तेजो मच्छरीरे सदोत्तमम् ॥ २२ | **राजाने पूछा—**भगवन्! किस धर्मके प्रभावसे मुझे सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई है? तथा किस धर्मके फलस्वरूप मेरे शरीरमें सदा प्रचुरमात्रामें उत्तम तेज विराजमान रहता है?॥ २२ ॥ |
| वसिष्ठ उवाच<br>पुरा लीलावती नाम वेश्या शिवपरायणा।<br>तया दत्तश्चतुर्दश्यां गुरवे लवणाचलः।<br>हेमवृक्षादिभिः सार्धं यथावद् विधिपूर्वकम् ॥ २३<br>शूद्रः सुवर्णकारश्च नाम्ना शौण्डोऽभवत् तदा।<br>भृत्यो लीलावतीगेहे तेन हेम्ना विनिर्मिताः ॥ २४<br>तरवः सुरमुख्याश्च श्रद्धायुक्तेन पार्थिव।<br>अतिरूपेण सम्पन्ना घटयित्वा बिना भृतिम्।<br>धर्मकार्यमिति ज्ञात्वा न गृह्णाति कथञ्चन ॥ २५<br>उज्ज्वलिताश्च तत्पत्न्या सौवर्णामरपादपाः।<br>लीलावती गिरेः पार्श्वे परिचर्यां च पार्थिव ॥ २६<br>कृत्वा ताभ्यामशाठ्येन गुरुशुश्रूषणादिकम्।<br>सा च लीलावती वेश्या कालेन महतापि च ॥ २७<br>कालधर्ममनुप्राप्ता कर्मयोगेन नारद।<br>सर्वपापविनिर्मुक्ता जगाम शिवमन्दिरम् ॥ २८<br>योऽसौ सुवर्णकारस्तु दरिद्रोऽप्यतिसत्त्ववान्।<br>न मौल्यमादाद् वेश्यायाः स भवानिह साम्प्रतम् ॥ २९ | **वसिष्ठजीने कहा—**राजन्! पूर्वकालमें लीलावती नामकी एक वेश्या थी। वह शिवजीकी भक्ता थी। उसने चतुर्दशी तिथिके दिन विधिपूर्वक अपने गुरुको स्वर्णमय वृक्ष आदि उपकरणोंसहित लवणाचलका दान किया था। उन दिनों लीलावतीके घर एक शूद्रजातीय शौण्ड नामक सोनार नौकर था। भूपाल! उसने ही श्रद्धापूर्वक सुवर्णद्वारा वृक्षों और प्रधान देवताओंकी मूर्तियोंका निर्माण किया था। उसने बिना कुछ पारिश्रमिक लिये उन मूर्तियोंको गढ़कर अत्यन्त सुन्दर बनाया था और यह धर्मका कार्य है—ऐसा जानकर किसी भी प्रकारका कुछ वेतन भी नहीं लिया था। पृथ्वीपते! उस स्वर्णकारकी पत्नीने भी उन सुवर्णनिर्मित देवों एवं वृक्षोंकी मूर्तियोंको रगड़कर चमकीला बनाया था और लीलावतीके पर्वत-दानमें बड़ी परिचर्या की थी। उन दोनोंकी सहायतासे लीलावतीने गुरु-शुश्रूषा आदि कार्योंको सम्पन्न किया था। नारद! अधिक कालके व्यतीत होनेपर वह वेश्या लीलावती कर्मयोगके अनुसार जब कालधर्म (मृत्यु)-को प्राप्त हुई, तब समस्त पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको चली गयी। वह सोनार, जो दरिद्र होते हुए भी अत्यन्त सामर्थ्यशाली था और जिसने वेश्यासे कुछ भी मूल्य नहीं लिया था, इस समय इस जन्ममें तुम हो, |
| ३१४ | * मत्स्यपुराण * |
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| सप्तद्वीपपतिर्जातः सूर्यायुतसमप्रभः।<br><br>यथा सुवर्णकारस्य तरवो हेमनिर्मिताः।<br><br>सम्यगुज्ज्वलिताः पत्न्या सेयं भानुमती तव॥ ३० | जो दस हजार सूर्योंके समान कान्तिमान् और सातों द्वीपोंके अधीश्वररूपसे उत्पन्न हुए हो। सोनारकी जिस पत्नीने स्वर्णनिर्मित वृक्षों एवं देव-मूर्तियोंको अत्यन्त चमकीला बनाया था, वही यह भानुमती तुम्हारी पटरानी है॥ २३-३०॥ | | उज्ज्वलनादुज्ज्वलरूपमस्याः<br>संजातमस्मिन् भुवनाधिपत्यम्।<br>यस्मात् कृतं तत् परिकर्म रात्रा-<br>वनुद्धताभ्यां लवणाचलस्य॥ ३१<br><br>तस्माच्च लोकेष्वपराजितत्व-<br>मारोग्यसौभाग्ययुता च लक्ष्मीः।<br>तस्मात्त्वमप्यत्र विधानपूर्वं<br>धान्याचलादीन् दशधा कुरुष्व॥ ३२<br><br>तथेति सत्कृत्य स धर्ममूर्ति-<br>र्वचो वसिष्ठस्य ददौ च सर्वान्।<br>धान्याचलादीञ्शतशो मुरारे-<br>र्लोकं जगामामरपूज्यमानः ॥ ३३<br><br>पश्येदपीमानधनोऽतिभक्त्या<br>स्पृशेन्मनुष्यैरपि दीयमानान्।<br>शृणोति भक्त्याथ मतिं ददाति<br>विकल्मषः सोऽपि दिवं प्रयाति॥ ३४<br><br>दुःस्वप्नं प्रशममुपैति पाठ्यमानैः<br>शैलेन्द्रैर्भवभयभेदनैर्मनुष्यैः ।<br>यः कुर्यात् किमु मुनिपुंगवेह सम्यक्<br>शान्तात्मा सकलगिरीन्द्रसम्प्रदानम्॥ ३५ | मूर्तियोंको उज्ज्वल करनेके कारण इसे इस जन्ममें सुन्दर गौरवर्णका शरीर और भुवनेश्वरीका पद प्राप्त हुआ है। चूँकि तुम दोनोंने दत्तचित्त होकर रात्रिमें लवणाचलके दान-प्रसंगमें सहायक रूपसे कर्म किया था, इसीलिये तुम्हें लोकमें अजेयता, नीरोगता और सौभाग्यसम्पन्नता लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई है। इस कारण तुम भी इस जन्ममें विधानपूर्वक दस प्रकारके धान्याचल आदि पर्वतोंका दान करो। तब राजा धर्ममूर्तिने 'तथेति—ऐसा ही करूँगा' कहकर वसिष्ठजीके वचनोंका आदर किया और सैकड़ों बार धान्याचल आदि सभी पर्वतोंका दान किया, जिसके फलस्वरूप देवगणोंद्वारा पूजित होकर भगवान् मुरारिके लोकको प्राप्त हुआ। निर्धन मनुष्य भी यदि उत्कृष्ट भक्तिपूर्वक इन पर्वत-दानोंको देखता है, मनुष्योंद्वारा दान करते समय उनका स्पर्श कर लेता है, उनकी कथाएँ सुनता है और उन्हें करनेके लिये सम्मति देता है तो वह भी पापरहित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है। मुनिपुंगव! जब इस लोकमें मनुष्यद्वारा भव-भयको विदीर्ण करनेवाले इन शैलेन्द्रोंके प्रसङ्गका पाठ करनेसे दुःस्वप्न शान्त हो जाते हैं, तब जो मनुष्य स्वयं शान्तचित्तसे विधिपूर्वक इन सम्पूर्ण पर्वतदानोंको करता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है?॥ ३१-३५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पर्वतप्रदानमाहात्म्यं नाम द्विनवतितमोऽध्यायः॥ ९२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पर्वतप्रदानमाहात्म्य नामक बानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९२॥
- अध्याय ९३ * ३१५ तिरानबेवाँ अध्याय शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मों तथा नवग्रह-शान्तिकी विधिका वर्णन * सूत उवाच सूतजी कहते हैं - ऋषियो ! पूर्वकालकी बात है, वैशम्पायनमासीनमपृच्छच्छौनकः पुरा । एक बार सुखपूर्वक बैठे हुए वैशम्पायनजीसे शौनक ने सर्वकामाप्तये नित्यं कथं शान्तिकपौष्टिकम् ॥ १ पूछा- 'महर्षे ! सम्पूर्ण कामनाओंकी अविचल सिद्धिके लिये शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मोंका अनुष्ठान किस प्रकार वैशम्पायन उवाच करना चाहिये ?' ॥ १ ॥ श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समारभेत् । वैशम्पायनजीने कहा- ब्रह्मन् ! लक्ष्मीकी कामनावाले अथवा शान्तिके अभिलाषी तथा वृष्टि, दीर्घायु और वृष्ट्यायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिवरन् पुनः । पुष्टिकी इच्छासे युक्त मनुष्यको ग्रहयज्ञका समारम्भ करना येन ब्रह्मन् विधानेन तन्मे निगदतः शृणु ॥ २ चाहिये। वह ग्रहयज्ञ जिस विधानसे करना चाहिये, उसे मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। मैं सम्पूर्ण शास्त्रोंका अवलोकन सर्वशास्त्राण्यनुक्रम्य संक्षिप्य ग्रन्थविस्तरम् । करनेके पश्चात् विस्तृत ग्रन्थको संक्षिप्तकर पुराणों एवं ग्रहशान्तिं प्रवक्ष्यामि पुराणश्रुतिचोदिताम् ॥ ३ श्रुतियोंद्वारा आदिष्ट इस ग्रहशान्तिका वर्णन कर रहा हूँ। पुण्येऽह्नि विप्रकथिते कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् । इसके लिये ज्योतिषी ब्राह्मणद्वारा बतलाये गये पुण्यमय दिनमें ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर ग्रहों एवं ग्रहान् ग्रहाधिदेवांश्च स्थाप्य होमं समारभेत् ॥ ४ ग्रहाधिदेवोंकी स्थापना करके हवन प्रारम्भ करना चाहिये। ग्रहयज्ञस्त्रिधा प्रोक्तः पुराणश्रुतिकोविदैः । पुराणों एवं श्रुतियोंके ज्ञाता विद्वानोंने तीन प्रकारका प्रथमोऽयुतहोमः स्याल्लक्षहोमस्ततः परम् ॥ ५ ग्रहयज्ञ बतलाया है। पहला दस हजार आहुतियोंका, उससे बढ़कर दूसरा एक लाख आहुतियोंका तथा सम्पूर्ण तृतीयः कोटिहोमस्तु सर्वकामफलप्रदः । कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला तीसरा एक करोड़ अयुतेनाहुतीनां च नवग्रहमखः स्मृतः ॥ ६ आहुतियोंका होता है। दस हजार आहुतियोंवाला ग्रहयज्ञ नवग्रहयज्ञ कहलाता है। इसकी विधिका, जो पुराणों एवं तस्य तावद्विधिं वक्ष्ये पुराणश्रुतिभाषितम् । श्रुतियोंमें बतलायी गयी है, मैं वर्णन कर रहा हूँ। गर्तस्योत्तरपूर्वेण वितस्तिद्वयविस्तृताम् ॥ ७ (यजमान मण्डपनिर्माणके बाद) हवनकुण्डकी पूर्वोत्तर दिशामें देवताओंकी स्थापनाके लिये एक वेदीका निर्माण वप्रद्वयावृतां वेदिं वितस्त्युच्छ्रितसम्मिताम् । कराये, जो दो बीता लम्बी-चौड़ी, एक बीता ऊँची, दो संस्थापनाय देवानां चतुरस्रामुदङ्मुखाम् ॥ ८ परिधियोंसे सुशोभित और चौकोर हो। उसका मुख अग्निप्रणयनं कृत्वा तस्यामावाहयेत् सुरान् । उत्तरकी ओर हो। पुनः कुण्डमें अग्निकी स्थापना करके उस वेदीपर देवताओंका आवाहन करे। इस प्रकार उसपर देवतानां ततः स्थाप्या विंशतिर्द्वादशाधिका ॥ ९ बत्तीस देवताओंकी स्थापना करनी चाहिये ॥ २-९ ॥ सूर्यः सोमस्तथा भौमो बुधजीवसितार्कजाः । सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहुः केतुरिति प्रोक्ता ग्रहा लोकहितावहाः ॥ १० राहु, केतु - ये लोगोंके हितकारी ग्रह कहे गये हैं।
- यह पाँच आथर्वण कल्पों - नक्षत्र, वैतान, संहितार्विध, अङ्गिरस एवं शान्तिकल्पमेंसे प्रथम एवं पाँचवें शान्तिकल्पका समन्वित रूप है और अथर्वपरिशिष्ट, याज्ञवल्क्यस्मृति १ । २९५-३०८, वृद्धपाराशर ११, पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड ८२-८६, नारदपुराण १। ५१, भविष्यपुराण, अग्निपुराण २६४-७४ आदिमें भी प्राप्त है। मत्स्यका पाठ बहुत अशुद्ध है। उपर्युक्त ग्रन्थोंकी सहायतासे इसे पूर्णतया शुद्ध कर लिया गया है। इनकी कई बातें शान्ति-संग्रहों और ज्योतिषग्रन्थोंमें भी आयी हैं।
३१६ * मत्स्यपुराण * मध्ये तु भास्करं विद्याल्लोहितं दक्षिणेन तु। उत्तरेण गुरुं विद्याद् बुधं पूर्वोत्तरेण तु॥ ११ पूर्वेण भार्गवं विद्यात् सोमं दक्षिणपूर्वक। पश्चिमेन शनिं विद्याद् राहुं पश्चिमदक्षिणे। पश्चिमोत्तरतः केतुं स्थापयेच्छुक्लतण्डुलैः ॥ १२ भास्करस्येश्वरं विद्यादुमां च शशिनस्तथा। स्कन्दमङ्गारकस्यापि बुधस्य च तथा हरिम् ॥ १३ ब्रह्माणं च गुरोर्विद्याच्छुक्रस्यापि शचीपतिम्। शनैश्चरस्य तु यमं राहोः कालं तथैव च ॥ १४ केतोर्वै चित्रगुप्तं च सर्वेषामधिदेवताः । अग्निरापः क्षितिर्विष्णुंरिन्द्र ऐन्द्री च देवता ॥ १५ प्रजापतिश्च सर्पाश्च ब्रह्मा प्रत्यधिदेवताः । विनायकं तथा दुर्गां वायुराकाशमेव च। आवाहयेद् व्याहृतिभिस्तथैवाश्विकुमारको ॥ १६ संस्मरेद् रक्तमादित्यमङ्गारकसमन्वितम्। सोमशुक्रौ तथा श्वेतौ बुधजीवौ च पिङ्गलौ। मन्दराहू तथा कृष्णौ धूम्रं केतुगणं विदुः ॥ १७ ग्रहवर्णानि देयानि वासांसि कुसुमानि च। धूपामोदोऽत्र सुरभिरुपरिष्टाद् वितानिकम्। शोभनं स्थापयेत् प्राज्ञः फलपुष्पसमन्वितम्॥ १८ गुडौदनं रवेर्दद्यात् सोमाय घृतपायसम्। अङ्गारकाय संयावं बुधाय क्षीरषष्टिकम् ॥ १९ दध्योदनं च जीवाय शुक्राय च घृतौदनम्। शनैश्चराय कृसरामजामांसं च राहवे। चित्रौदनं च केतुभ्यः सर्वैर्भक्ष्यैरथार्चयेत्॥ २० प्रागुत्तरेण तस्माच्च दध्यक्षतविभूषितम्। चूतपल्लवसंच्छन्नं फलवस्त्रयुगान्वितम् ॥ २१ पञ्चरत्नसमायुक्तं पञ्चभङ्गसमन्वितम्। स्थापयेदव्रणं कुम्भं वरुणं तत्र विन्यसेत् ॥ २२ गङ्गाद्याः सरितः सर्वाः समुद्रांश्च सरांसि च। गजाश्वरथ्यावल्मीकसङ्गमाद्ध्रदगोकुलात् ॥ २३ श्वेत चावलोंद्वारा वेदीके मध्यमें सूर्यकी, दक्षिणमें मंगलकी, उत्तरमें बृहस्पतिकी, पूर्वोत्तरकोणपर बुधकी, पूर्वमें शुक्रकी, दक्षिणपूर्वकोणपर चन्द्रमाकी, पश्चिममें शनिकी, पश्चिम-दक्षिणकोणपर राहुकी और पश्चिमोत्तरकोणपर केतुकी स्थापना करनी चाहिये। इन सभी ग्रहोंमें सूर्यके शिव, चन्द्रमाके पार्वती, मंगलके स्कन्द, बुधके भगवान् विष्णु, बृहस्पतिके ब्रह्मा, शुक्रके इन्द्र, शनैश्चरके यम, राहुके काल और केतुके चित्रगुप्त अधिदेवता माने गये हैं। अग्नि, जल, पृथ्वी, विष्णु, इन्द्र, ऐन्द्री देवता, प्रजापति, सर्प और ब्रह्मा-ये सभी क्रमशः प्रत्यधिदेवता हैं। इनके अतिरिक्त विनायक, दुर्गा, वायु, आकाश और अश्विनीकुमारोंका भी व्याहृतियोंके उच्चारणपूर्वक आवाहन करना चाहिये। उस समय मंगलसहित सूर्यको लाल वर्णका, चन्द्रमा और शुक्रको श्वेतवर्णका, बुध और बृहस्पतिको पीतवर्णका, शनि और राहुको कृष्णवर्णका तथा केतुको धूम्रवर्णका जानना और ध्यान करना चाहिये। बुद्धिमान् यज्ञकर्ता जो ग्रह जिस रंगका हो, उसे उसी रंगका वस्त्र और फूल समर्पित करे, सुगन्धित धूप दे, ऊपर सुन्दर चंदोवा लगा दे। पुनः फल, पुष्प आदिके साथ सूर्यको गुड़ और चावलसे बने हुए अन्न (खीर)-का, चन्द्रमाको घी और दूधसे बने हुए पदार्थका, मंगलको गोझियाका, बुधको क्षीरषष्टिक (दूधमें पके हुए साठीके चावल)-का, बृहस्पतिको दही- भातका, शुक्रको घी-भातका, शनैश्चरको खिचड़ीका, राहुको अजा नामक वृक्षके फलके गूदाका और केतुको विचित्र रंगवाले भातका नैवेद्य अर्पण करके सभी प्रकारके भक्ष्य पदार्थोंद्वारा पूजन करे ॥१०-२०॥ वेदीके पूर्वोत्तरकोणपर एक छिद्ररहित कलशकी स्थापना करे, उसे दही और अक्षतसे सुशोभित, आमके पल्लवसे आच्छादित और दो वस्त्रोंसे परिवेष्टित करके उसके निकट फल रख दे। उसमें पञ्चरत्न डाल दे और उसे पञ्चभंग (पीपल, बरगद, पाकड़, गूलर और आमके पल्लव)-से युक्त कर दे। उसपर वरुण, गङ्गा आदि नदियों, सभी समुद्रों और सरोवरोंका आवाहन तथा स्थापन करे। विप्रेन्द्र! धर्मज्ञ पुरोहितको चाहिये कि वह हाथीसार, घुड़शाल, चौराहे, बिमवट, नदीके संगम,
| * अध्याय ९३ * | ३१७ |
|---|
| मृदानीय विप्रेन्द्र सर्वौषधिजलान्विताम्।<br>स्नानार्थं विन्यसेत् तत्र यजमानस्य धर्मवित्॥ २४<br>सर्वे समुद्राः सरितः सरांसि जलदा नदाः।<br>आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः॥ २५<br>एवमावाहयेदेतानमरान् मुनिसत्तम।<br>होमं समारभेत् सर्पिर्यवव्रीहितिलादिभिः॥ २६<br>अर्कः पलाशखदिरावपामार्गोऽथ पिप्पलः।<br>औदुम्बरः शमी दूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात्॥ २७<br>एकैकस्याष्टकशतमुष्टाविंशतिरेव वा।<br>होतव्या मधुसर्पिर्भ्यां दध्ना चैव समन्विताः॥ २८<br>प्रादेशमात्रा अशिफा अशाखा अपलाशिनीः।<br>समिधः कल्पयेत् प्राज्ञः सर्वकर्मसु सर्वदा॥ २९<br>देवानापि सर्वेषामुपांशुः परमार्थवित्।<br>स्वेन स्वेनैव मन्त्रेण होतव्याः समिधः पृथक्॥ ३० | कुण्ड और गोशालेकी मिट्टी लाकर उसे सर्वौषधमिश्रित जलसे अभिषिक्त कर यजमानके स्नानके लिये वहाँ प्रस्तुत कर दे तथा 'यजमानके पापको नष्ट करनेवाले सभी समुद्र, नदी, नद, बादल और सरोवर यहाँ पधारें' यों कहकर इन देवताओंका आवाहन करे। मुनिसत्तम ! तत्पश्चात् घी, यव, चावल, तिल आदिसे हवन प्रारम्भ करे। मदार, पलाश, खैर, चिचिंडा, पीपल, गूलर, शमी, दूब और कुश—ये क्रमशः नवों ग्रहोंकी समिधाएँ हैं। इनमें प्रत्येक ग्रहके लिये मधु, घी और दहीसे युक्त एक सौ आठ अथवा अट्ठाईस आहुतियाँ हवन करनी चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको सदा सभी कर्मोंमें अँगूठेके सिरेसे तर्जनीके सिरेतककी मापवाली तथा बरोह, शाखा और पत्तोंसे रहित समिधाओंकी कल्पना करनी चाहिये। परमार्थवेत्ता यजमान सभी देवताओंके लिये उन-उनके पृथक्-पृथक् मन्त्रोंका मन्द स्वरसे उच्चारण करते हुए समिधाओंका हवन करे॥ २१—३०॥ | | होतव्यं च घृताभ्यक्तं चरुभक्षादिकं पुनः।<br>मन्त्रैर्दशाहुतीर्हुत्वा होमं व्याहृतिभिस्ततः॥ ३१<br><br>उदङ्मुखाः प्राङ्मुखा वा कुर्युर्ब्राह्मणपुंगवाः।<br>मन्त्रवन्तश्च कर्तव्याश्चरवः प्रतिदैवतम्॥ ३२<br><br>दत्त्वा च तांश्चरून् सम्यक् ततो होमं समाचरेत्।<br>आकृष्णेनेति सूर्याय होमः कार्यों द्विजन्मना॥ ३३<br><br>आप्यायस्वेति सोमाय मन्त्रेण जुहुयात् पुनः।<br>अग्निर्मूर्धा दिवो मन्त्र इति भौमाय कीर्तयेत्॥ ३४<br><br>अग्ने विवस्वदुषस इति सोमसुताय वै।<br>बृहस्पते परिदीया रथेनेति गुरोर्मतः॥ ३५<br><br>शुक्रं ते अन्यदिति च शुक्रस्यापि निगद्यते।<br>शनैश्चरायेति पुनः शं नो देवीति होमयेत्॥ ३६ | पुनः चरु आदि हवनीय पदार्थोंमें घी मिलाकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् व्याहृतियोंका उच्चारण करके घीकी दस आहुतियाँ अग्निमें डाले। पुनः श्रेष्ठ ब्राह्मण उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख बैठकर प्रत्येक देवताके मन्त्रोच्चारणपूर्वक चरु आदि पदार्थोंका हवन करें। इस प्रकार उन चरुओंका भलीभाँति हवन करनेके पश्चात् (प्रत्येक देवताके लिये उसके मन्त्रद्वारा) हवन करना चाहिये। ब्राह्मणको 'आकृष्णेन रजसा०'* (शुक्लयजुर्वाजसने० सं० ३३। ४३)—इस मन्त्रका उच्चारण कर सूर्यके लिये हवन करना चाहिये। पुनः 'आप्यायस्व०' (वही १२। ११४) इस मन्त्रसे चन्द्रमाके लिये आहुति डाले। मंगलके लिये 'अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्०' (वही० १३। १४) इस मन्त्रका पाठ करे। बुधके लिये 'अग्ने विवस्वदुषस०'—(ऋ० सं० १। ४४। १) और देवगुरु बृहस्पतिके लिये 'परिदीया रथेन०' (ऋक्० ५। ८३। ७)—ये मन्त्र माने गये हैं।* शुक्रके लिये 'शुक्रं ते अन्यद्०' (ऋ० सं० ६। ५८। १, कृष्णय० तैत्तिरी० सं० ४। १। ११। २)—यह मन्त्र बतलाया गया है। शनैश्चरके लिये 'शं नो देवीरभीष्टये०' (शुक्लयजु० वाज० ३६। १२३)—इस मन्त्रसे हवन करना |
* यहाँ ग्रहों और देवताओंके कुछ मन्त्र अन्य पुराणों, स्मृतियों तथा पद्धतियोंसे भिन्न निर्दिष्ट हुए हैं।
३१८ * मत्स्यपुराण *
| मूल संस्कृत (श्लोक) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| कयानश्चित्र आभुव इति राहोरुदाहृतः।<br>केतुं कृण्वन्नपि ब्रूयात् केतूनामपि शान्तये ॥ ३७ | चाहिये। राहुके लिये 'कया नश्चित्र आभुव०' (वही २७।३९)—यह मन्त्र कहा गया है तथा केतुकी शान्तिके लिये—'केतुं कृण्वन्०' (वही २९।३७) इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये॥ ३१—३७॥ |
| आवो राजेति रुद्रस्य बलिहोमं समाचरेत्।<br>आपो हिष्ठेत्युमायास्तु स्यो नेति स्वामिनस्तथा ॥ ३८<br><br>विष्णोरिदं विष्णुरिति तमीशेति स्वयम्भुवः।<br>इन्द्रमिद्धेवतायेति इन्द्राय जुहुयात् ततः ॥ ३९<br><br>तथा यमस्य चायं गौरिति होमः प्रकीर्तितः।<br>कालस्य ब्रह्म जज्ञानमिति मन्त्रः प्रशस्यते ॥ ४०<br><br>चित्रगुप्तस्य चाज्ञातमिति मन्त्रविदो विदुः।<br>अग्निं दूतं वृणीमह इति वह्नेरुदाहृतः ॥ ४१<br><br>उदुत्तमं वरुणमित्यपां मन्त्रः प्रकीर्तितः।<br>भूमेः पृथिव्यन्तरिक्षमिति वेदेषु पठ्यते ॥ ४२<br><br>सहस्रशीर्षा पुरुष इति विष्णोरुदाहृतः।<br>इन्द्रायेन्द्रो मरुत्वत इति शक्रस्य शस्यते ॥ ४३<br><br>उत्तानपर्णे सुभगे इति देव्याः समाचरेत्।<br>प्रजापतेः पुनर्होमः प्रजापतिरिति स्मृतः ॥ ४४<br><br>नमोऽस्तु सर्पेभ्य इति सर्पाणां मन्त्र उच्यते।<br>एष ब्रह्मा य ऋत्विग्भ्य इति ब्रह्मण उदाहृतः ॥ ४५<br><br>विनायकस्य चानूनमिति मन्त्रो बुधैः स्मृतः।<br>जातवेदसे सुनवामिति दुर्गेऽयमुच्यते ॥ ४६<br><br>आदिप्रत्नस्य रेतस आकाशस्य उदाहृतः।<br>क्राणा शिशुर्महीनां च वायोर्मन्त्रः प्रकीर्तितः ॥ ४७<br><br>एषो उषा अपूर्व्या इत्यश्विनोर्मन्त्र उच्यते।<br>पूर्णाहुतिस्तु मूर्धानं दिव इत्यभिपातयेत् ॥ ४८ | फिर 'आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रम्' (ऋक्सं० ४।३।१; कृष्णयजु० तै० सं० १।३।१४।१)—इस मन्त्रका उच्चारण कर रुद्रके लिये हवन और बलि देना चाहिये। तत्पश्चात् उमाके लिये 'आपो हि ष्ठा०' (वाजस-सं० ११।५०)—इस मन्त्रसे, स्वामिकार्तिकके लिये 'स्यो ना०'—इस मन्त्रसे, विष्णुके लिये 'इदं विष्णुः०' (शुक्लयजु० वाज० ५।१५)—इस मन्त्रसे, ब्रह्माके लिये 'तमीशानम्०' (वाजस० २५।१८)—इस मन्त्रसे, और इन्द्रके लिये 'इन्द्रमिद्धेवताय०'—इस मन्त्रसे आहुति डाले। उसी प्रकार यमके लिये 'अयं गौः०' (वही ३।६)—इस मन्त्रसे हवन बतलाया गया है। कालके लिये—'ब्रह्मजज्ञानम्०' (वही १३।३) यह मन्त्र प्रशस्त माना गया है। मन्त्रवेत्तालोग चित्रगुप्तके लिये 'अज्ञातम्०'—यह मन्त्र बतलाते हैं। अग्निके लिये 'अग्निं दूतं वृणीमहे' (ऋक्सं० १।१२।१; अथर्व० २०।१०१।१)—यह मन्त्र बतलाया गया है। वरुणके लिये 'उदुत्तमं वरुणपाशम्' (ऋक्सं० १।२४।१५)—यह मन्त्र कहा गया है। वेदोंमें पृथ्वीके लिये 'पृथिव्यन्तरिक्षम्०'—इस मन्त्रका पाठ है। विष्णुके लिये 'सहस्रशीर्षा पुरुषः०' (वाजस० सं० ३१।१)—यह मन्त्र कहा गया है। इन्द्रके लिये 'इन्द्रायेन्द्रो मरुत्वत०'—यह मन्त्र प्रशस्त माना गया है। देवीके लिये 'उत्तानपर्णे सुभगे०'—यह मन्त्र जानना चाहिये। पुनः प्रजापतिके लिये 'प्रजापतिः०' (वाजस० सं० ३१।१७)—यह हवन-मन्त्र कहा जाता है। सर्पोंके लिये 'नमोऽस्तु सर्पेभ्यः०' (वही १३।६)—यह मन्त्र बतलाया जाता है। ब्रह्माके लिये 'एष ब्रह्मा य ऋत्विग्भ्यः०'—यह मन्त्र कहा गया है। विनायकके लिये विद्वानोंने 'अनूनम्०'—यह मन्त्र बतलाया है। 'जातवेदसे सुनवाम०' (ऋक्० १।९९।१)—यह दुर्गा-मन्त्र कहा जाता है। 'आदिप्रत्नस्य रेतस०'—यह आकाशका मन्त्र बतलाया जाता है। 'क्राणा शिशुर्महीनां च०'—यह वायुका मन्त्र कहा गया है। 'एषो उषाअपूर्व्यात्०'—यह अश्विनी-कुमारोंका मन्त्र कहा जाता है। 'मूर्धानं दिव०' (ऋक्० ६।७।१; वाज० ७।२४)—इस मन्त्रसे हवनकुण्डमें पूर्णाहुति डालनी चाहिये॥ ३८—४८॥ |
९४- नवग्रहोंके स्वरूपका वर्णन
३२०
* मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आयसं राहवे दद्यात् केतुभ्यश्छागमुत्तमम्।<br>सुवर्णेन समा कार्या यजमानेन दक्षिणा॥ ६२<br>सर्वेषामथवा गावो दातव्या हेमभूषिताः।<br>सुवर्णमथवा दद्याद् गुरुर्वा येन तुष्यति।<br>समन्त्रेणैव दातव्याः सर्वाः सर्वत्र दक्षिणाः॥ ६३ | राहुके लिये लोहेकी बनी हुई वस्तुका और केतुके लिये उत्तम बकरेका दान करे। यजमानको ये सारी दक्षिणाएँ सुवर्णके साथ अथवा स्वर्णनिर्मित मूर्तिके रूपमें देनी चाहिये अथवा जिस प्रकार गुरु (पुरोहित) प्रसन्न हों, उनके आज्ञानुसार सभी ब्राह्मणोंको सुवर्णसे अलंकृत गौएँ अथवा केवल सुवर्ण दान करना चाहिये। किंतु सर्वत्र मन्त्रोच्चारणपूर्वक ही इन सभी दक्षिणाओंके देनेका विधान है॥ ५८—६३॥ |
| कपिले सर्वदेवानां पूजनीयासि रोहिणी।<br>तीर्थदेवमयी यस्मादतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६४ | (दान देते समय सभी देय वस्तुओंसे पृथक्-पृथक् इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—) 'कपिले! तुम रोहिणीरूपा हो, तीर्थ एवं देवता तुम्हारे स्वरूप हैं तथा तुम सम्पूर्ण देवोंकी पूजनीया हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो।* |
| पुण्यस्त्वं शङ्ख पुण्यानां मङ्गलानां च मङ्गलम्।<br>विष्णुना विधृतश्चासि ततः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६५ | शङ्ख! तुम पुण्योंके भी पुण्य और मङ्गलोंके भी मङ्गल हो। भगवान् विष्णुने तुम्हें अपने हाथमें धारण किया है, इसलिये तुम मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्दकारक।<br>अष्टमूर्तेरधिष्ठानमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६६ | जगत्को आनन्दित करनेवाले वृषभ! तुम वृषरूपसे धर्म और अष्टमूर्ति शिवजीके वाहन हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| हिरण्यगर्भगर्भस्त्वं हेमबीजं विभावसोः।<br>अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६७ | सुवर्ण! तुम ब्रह्माके आत्मस्वरूप, अग्निके स्वर्णमय बीज और अनन्त पुण्यफलके प्रदाता हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| पीतवस्त्रयुगं यस्माद् वासुदेवस्य वल्लभम्।<br>प्रदानात् तस्य मे विष्णो ह्यतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६८ | दो पीला वस्त्र अर्थात् पीताम्बर भगवान् श्रीकृष्णको परम प्रिय हैं, इसलिये विष्णो! उसका दान करनेसे आप मुझे शान्ति प्रदान करें। |
| विष्णुस्त्वमश्वरूपेण यस्मादमृतसम्भवः।<br>चन्द्रार्कवाहनो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६९ | अश्व! तुम अश्वरूपसे विष्णु हो, अमृतसे उत्पन्न हुए हो तथा सूर्य एवं चन्द्रमाके नित्य वाहन हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| यस्मात् त्वं पृथिवी सर्वा धेनुः केशवसंनिभा।<br>सर्वपापहरा नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७० | पृथ्वी! तुम समस्त धेनुस्वरूपा, केशवके सदृश फलदायिनी और सदा सम्पूर्ण पापोंको हरण करनेवाली हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| यस्मादायसकर्माणि तवाधीनानि सर्वदा।<br>लाङ्गलाद्यायुधादीनि तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७१ | लौह! चूँकि विश्वके सभी सम्पादित होनेवाले लौह कर्म हल एवं अस्त्र आदि सारे कार्य सदा तुम्हारे ही अधीन हैं, इसलिये तुम मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| छाग त्वं सर्वयज्ञानामङ्गत्वेन व्यवस्थितः।<br>यानं विभावसोर्नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७२ | छाग! चूँकि तुम सम्पूर्ण यज्ञोंके मुख्य अङ्गरूपसे निर्धारित हो और अग्निदेवके नित्य वाहन हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| गवामङ्गेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश।<br>यस्मात् तस्माच्छ्रियै मे स्यादिह लोके परत्र च॥ ७३ | गौ! चूँकि गौओंके अङ्गोंमें चौदहों भुवन निवास करते हैं, इसलिये तुम मेरे लिये इहलोक एवं परलोकमें भी लक्ष्मी प्रदान करो। |
| यस्मादशून्यं शयनं केशवस्य च सर्वदा।<br>शय्या ममाप्यशून्यास्तु दत्ता जन्मनि जन्मनि॥ ७४ | जिस प्रकार भगवान् केशवकी शय्या सदा अशून्य (लक्ष्मीसे युक्त) रहती है, वैसे ही मेरे द्वारा भी दान की गयी शय्या जन्म-जन्ममें अशून्य बनी रहे। |
| यथा रत्नेषु सर्वेषु सर्वे देवाः प्रतिष्ठिताः।<br>तथा रत्नानि यच्छन्तु रत्नदानेन मे सुराः॥ ७५ | जैसे सभी रत्नोंमें समस्त देवता निवास करते हैं, वैसे ही रत्नदान करनेसे वे देवता मुझे भी रत्न प्रदान करें। |
* तुलनीय—'इडे रन्ते हव्ये काम्ये चन्द्रे' आदि (यजु० ८।४३ और उसके उव्वट-महीधरादिभाष्य)।
९५- माहेश्वर-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
- अध्याय ९३ * ३२१ यथा भूमिप्रदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्। दानान्यन्यानि मे शान्तिर्भूमिदानाद् भवत्विह ॥ ७६ एवं सम्पूजयेद् भक्त्या वित्तशाठ्येन वर्जितः। रत्नकाञ्चनवस्त्रौघैर्धूपमाल्यानुलेपनैः ॥ ७७ अनेन विधिना यस्तु ग्रहपूजां समाचरेत्। सर्वान् कामानवाप्नोति प्रेत्य स्वर्गे महीयते ॥ ७८ यस्तु पीडाकरो नित्यमल्पवित्तस्य वा ग्रहः। तं च यत्नेन सम्पूज्य शेषानप्यर्चयेद् बुधः ॥ ७९ ग्रहा गावो नरेन्द्राश्च ब्राह्मणाश्च विशेषतः। पूजिताः पूजयन्त्येते निर्दहन्त्यवमानिताः ॥ ८० यथा बाणप्रहाराणां कवचं भवति वारणम्। तद्वद् दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारिका ॥ ८१ तस्मान्न दक्षिणाहीनं कर्तव्यं भूतिमिच्छता। सम्पूर्णया दक्षिणया यस्माद् देवोऽपि तुष्यति ॥ ८२ सदैवायुतहोमोऽयं नवग्रहमखे स्थितः। विवाहोत्सवयज्ञेषु प्रतिष्ठादिषु कर्मसु ॥ ८३ निर्विघ्नार्थं मुनिश्रेष्ठ तथोद्वेगाद्भुतेषु च। कथितोऽयुतहोमोऽयं लक्षहोममतः शृणु ॥ ८४ सर्वकामाप्तये यस्माल्लक्षहोमं विदुर्बुधाः। पितॄणां वल्लभं साक्षाद् भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ ८५ ग्रहताराबलं लब्ध्वा कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्। गृहस्योत्तरपूर्वेण मण्डपं कारयेद् बुधः ॥ ८६ रुद्रायतनभूमौ वा चतुरस्रमुदङ्मुखम्। दशहस्तमथाष्टौ वा हस्तान् कुर्याद् विधानतः ॥ ८७ प्रागुदक्प्लवनां भूमिं कारयेद् यत्नतो बुधः। जिस प्रकार अन्य सभी दान भूमिदानकी सोलहवीं कलाकी भी समता नहीं कर सकते, अतः भूमि-दान करनेसे मुझे इस लोकमें शान्ति प्राप्त हो' ॥ ६४-७६ ॥ इस प्रकार कृपणता छोड़कर भक्तिपूर्वक रत्न, सुवर्ण, वस्त्रसमूह, धूप, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे ग्रहोंकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे ग्रहोंकी पूजा करता है, वह इस लोकमें सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा मरनेपर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यदि किसी निर्धन मनुष्यको कोई ग्रह नित्य पीड़ा पहुँचा रहा हो तो उस बुद्धिमान्को चाहिये कि उस ग्रहकी यत्नपूर्वक भलीभाँति पूजा करके तत्पश्चात् शेष ग्रहोंकी भी अर्चना करे; क्योंकि ग्रह, गौ, राजा और ब्राह्मण—ये विशेषरूपसे पूजित होनेपर रक्षा करते हैं, अन्यथा अवहेलना किये जानेपर जलाकर भस्म कर देते हैं। जैसे बाणोंके आघातका प्रतिरोध करनेवाला कवच होता है, उसी प्रकार दुर्दैवद्वारा किये गये उपघातोंको निवारण करनेवाली शान्ति (ग्रह-यज्ञ) होती है। इसलिये वैभवकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्यको दक्षिणासे रहित यज्ञ नहीं करना चाहिये; क्योंकि भरपूर दक्षिणा देनेसे (यज्ञका प्रधान) देवता भी संतुष्ट हो जाता है। मुनिश्रेष्ठ! नवग्रहोंके यज्ञमें यह दस हजार आहुतियोंवाला हवन ही होता है। इसी प्रकार विवाह, उत्सव, यज्ञ, देवप्रतिष्ठा आदि कर्मोंमें तथा चित्तकी उद्विग्रता एवं आकस्मिक विपत्तियोंमें भी यह दस हजार आहुतियोंवाला हवन ही बतलाया गया है। इसके बाद अब मैं एक लाख आहुतियोंवाला हवन बतला रहा हूँ, सुनिये। विद्वानोंने सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये लक्षहोमका विधान किया है; क्योंकि यह पितरोंको परम प्रिय और साक्षात् भोग एवं मोक्षरूपी फलका प्रदाता है। बुद्धिमान् यजमानको चाहिये कि ग्रहबल और ताराबलको अपने अनुकूल पाकर ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराये और अपने गृहके पूर्वोत्तर दिशामें अथवा शिवमन्दिरकी समीपवर्ती भूमिपर विधानपूर्वक एक मण्डपका निर्माण कराये, जो दस हाथ अथवा आठ हाथ लम्बा-चौड़ा चौकोर हो तथा उसका मुख (प्रवेशद्वार) उत्तर दिशाकी ओर हो। उसकी भूमिको यत्नपूर्वक पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू बना देना चाहिये ॥ ७७-८७ १/२ ॥
३२२ * मत्स्यपुराण *
| प्रागुत्तरं समासाद्य प्रदेशं मण्डपस्य तु॥ ८८ <br><br> शोभनं कारयेत् कुण्डं यथावल्लक्षणान्वितम्। <br> चतुरस्रं समंतात्तु योनिवक्त्रं समेखलम्॥ ८९ <br><br> चतुरङ्गुलविस्तारा मेखला तद्दुच्छ्रिता। <br> प्रागुदक्प्लवना कार्या सर्वतः समवस्थिता॥ ९० <br><br> शान्त्यर्थं सर्वलोकानां नवग्रहमखः स्मृतः। <br> मानहीनाधिकं कुण्डमनेकभयदं भवेत्। <br> यस्मात् तस्मात् सुसम्पूर्णं शान्तिकुण्डं विधीयते॥ ९१ <br><br> अस्माद् दशगुणः प्रोक्तो लक्षहोमः स्वयम्भुवा। <br> आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिस्तथैव च॥ ९२ <br><br> द्विहस्तविस्तृतं तद्वच्चतुर्हस्तायतं पुनः। <br> लक्षहोमे भवेत् कुण्डं योनिवक्त्रं त्रिमेखलम्॥ ९३ <br><br> तस्य चोत्तरपूर्वेण वितस्तित्रयसंस्थितम्। <br> प्रागुदक्प्लवनं तच्च चतुरस्रं समंततः॥ ९४ <br><br> विष्कम्भार्धोच्छ्रितं प्रोक्तं स्थण्डिलं विश्वकर्मणा। <br> संस्थापनाय देवानां वप्रत्रयसमावृतम्॥ ९५ <br><br> द्व्यङ्गुलो ह्युच्छ्रितो वप्रः प्रथमः स उदाहृतः। <br> अङ्गुलोच्छ्रयसंयुक्तं वप्रद्वयमथोपरि॥ ९६ <br><br> त्र्यङ्गुलस्य च विस्तारः सर्वेषां कथ्यते बुधैः। <br> दशाङ्गुलोच्छ्रिता भित्तिः स्थण्डिले स्यात् तथोपरि। <br> तस्मिन्नावाहयेद् देवान् पूर्ववत् पुष्पतण्डुलैः॥ ९७ <br><br> आदित्याभिमुखाः सर्वाः साधिप्रत्यधिदेवताः। <br> स्थापनीया मुनिश्रेष्ठ नोत्तरेण पराङ्मुखाः॥ ९८ <br><br> गरुत्मानधिकस्तत्र सम्पूज्यः श्रियमिच्छता। <br> सामध्वनिशरीरस्त्वं वाहनं परमेष्ठिनः। <br> विषपापहरो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ९९ | तदनन्तर मण्डपके पूर्वोत्तर भागमें यथार्थ लक्षणोंसे युक्त एक सुन्दर कुण्ड* तैयार कराये, जो चारों ओरसे चौकोर हो, जिसमें योनिरूप मुख बना हो और जो मेखलासे युक्त हो। यह मेखला चार अङ्गुल चौड़ी और उतनी ही ऊँची, कुण्डको चारों ओरसे घेरे हुए और पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू हो। सभी लोगोंके लिये ग्रह-शान्तिके निमित्त नवग्रह-यज्ञ बतलाया गया है। चूँकि उपर्युक्त परिमाणसे कम अथवा अधिक परिमाणमें बना हुआ कुण्ड अनेकों प्रकारका भय देनेवाला हो जाता है, इसलिये शान्तिकुण्डको परिमाणके अनुकूल ही बनाना चाहिये। ब्रह्माने लक्षहोमको अयुतहोमसे दस गुना अधिक फलदायक बतलाया है, इसलिये इसे प्रयत्नपूर्वक आहुतियों और दक्षिणाओंके द्वारा सम्पन्न करना चाहिये। लक्षहोममें कुण्ड चार हाथ लम्बा और दो हाथ चौड़ा होता है, उसके भी मुखस्थानपर योनि बनी होती है और वह तीन मेखलाओंसे युक्त होता है। विश्वकर्माने कुण्डके पूर्वोत्तर दिशामें तीन बित्तेकी दूरीपर देवताओंकी स्थापनाके लिये एक वेदीका भी विधान बतलाया है, जो चारों ओरसे चौकोर, पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू, विष्कम्भ (कुण्डके व्यास)-के आधे परिमाणके बराबर ऊँची और तीन परिधियोंसे युक्त हो। इनमें पहली परिधि दो अङ्गुल ऊँची तथा शेष दो एक अङ्गुल ऊँची होनी चाहिये। विद्वानोंने इन सबकी चौड़ाई तीन अङ्गुलकी बतलायी है। वेदीके ऊपर दस अङ्गुल ऊँची एक दीवाल बनायी जाय, उसीपर पहलेकी ही भाँति फूल और अक्षतोंसे देवताओंका आवाहन किया जाय। मुनिश्रेष्ठ! अधिदेवताओं एवं प्रत्यधिदेवताओंसहित सभी ग्रहोंको सूर्यके सम्मुख ही स्थापित करना चाहिये, उत्तराभिमुख अथवा पराङ्मुख नहीं। लक्ष्मीकामी मनुष्यको इस यज्ञमें (सभी देवताओंके अतिरिक्त) गरुड़की भी पूजा करनी चाहिये। (उस समय ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये—) ‘गरुड! तुम्हारे शरीरसे सामवेदकी ध्वनि निकलती रहती है, तुम भगवान् विष्णुके वाहन और नित्य विषरूप पापको हरनेवाले हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो'॥८८—९९॥ |
* कल्याण—अग्निपुराणाङ्क अ० २४ की टिप्पणीमें कुण्ड-मण्डप-निर्माणकी पूरी विधि द्रष्टव्य है।
| * अध्याय ९३ * | ३२३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पूर्ववत् कुम्भमामन्त्र्य तद्वद्धोमं समाचरेत्।<br>सहस्त्राणां शतं हुत्वा समित्संख्याधिकं पुनः।<br>घृतकुम्भवसोधारां पातयेदनलोपरि ॥ १००<br><br>औदुम्बरीं तथाऽर्द्रां च ऋज्वीं कोटरवर्जिताम्।<br>बाहुमात्रां स्रुचं कृत्वा ततः स्तम्भद्वयोपरि।<br>घृतधारां तया सम्यगग्नेरुपरि पातयेत् ॥ १०१<br><br>श्रावयेत् सूक्तमाग्नेयं वैष्णवं रौद्रमैन्दवम्।<br>महावैश्वानरं साम ज्येष्ठसाम च वाचयेत् ॥ १०२<br><br>स्नानं च यजमानस्य पूर्ववत् स्वस्तिवाचनम्।<br>दातव्या यजमानेन पूर्ववद् दक्षिणाः पृथक् ॥ १०३<br><br>कामक्रोधविहीनेन ऋत्विग्भ्यः शान्तचेतसा।<br>नवग्रहमखे विप्राश्चत्वारो वेदवेदिनः ॥ १०४<br><br>अथवा ऋत्विजौ शान्तौ द्वावेव श्रुतिकोविदौ।<br>कार्यावयुतहोमे तु न प्रसज्येत विस्तरे ॥ १०५ | तत्पश्चात् पहलेकी तरह कलशकी स्थापना करके हवन आरम्भ करे। एक लाख आहुतियोंसे हवन करनेके पश्चात् पुनः समिधाओंकी संख्याके बराबर और अधिक आहुतियाँ डाले। फिर अग्निके ऊपर घृतकुम्भसे वसोर्धारा गिराये। (वसोर्धाराकी विधि यह है—) भुजा-बराबर लम्बी गूलरकी लकड़ीसे, जो खोखली न हो तथा सीधी एवं गीली हो, स्रुवा बनवाकर उसे दो खम्भोंपर रखकर उसके द्वारा अग्निके ऊपर सम्यक् प्रकारसे घीकी धारा गिराये। उस समय अग्निसूक्त (ऋ० सं० १। १), विष्णुसूक्त (वाजसं० ५। १–२२), रुद्रसूक्त (वही १६) और इन्दु (सोम) सूक्त (ऋ० १। ९१) सुनाना चाहिये तथा महावैश्वानर साम और ज्येष्ठसामका पाठ कराना चाहिये। तदुपरान्त पूर्ववत् यजमान स्नानकर स्वस्तिवाचन कराये तथा काम-क्रोधरहित होकर शान्तचित्तसे पूर्ववत् ऋत्विजोंको पृथक्-पृथक् दक्षिणा प्रदान करे। नवग्रहयज्ञके अयुतहोममें चार वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको अथवा श्रुतिके जानकार एवं शान्तस्वभाववाले दो ही ऋत्विजोंको नियुक्त करना चाहिये। विस्तारमें नहीं फँसना चाहिये॥ १००–१०५॥ |
| तद्वच्च दश चाष्टौ च लक्षहोमे तु ऋत्विजः।<br>कर्त्तव्याः शक्तितस्तद्वच्चत्वारो वा विमत्सरः ॥ १०६<br><br>नवग्रहमखात् सर्वं लक्षहोमे दशोत्तरम्।<br>भक्ष्यान् दद्यान्मुनिश्रेष्ठ भूषणान्यपि शक्तितः ॥ १०७<br><br>शयनानि सवस्त्राणि हैमानि कटकानि च।<br>कर्णाङ्गुलिपवित्राणि कण्ठसूत्राणि शक्तिमान् ॥ १०८<br><br>न कुर्याद् दक्षिणाहीनं वित्तशाठ्येन मानवः।<br>अददन् लोभतो मोहात् कुलक्षयमवाप्नुते ॥ १०९<br><br>अन्नदानं यथाशक्त्या कर्तव्यं भूतिमिच्छता।<br>अन्नहीनः कृतो यस्माद् दुर्भिक्षफलदो भवेत् ॥ ११०<br><br>अन्नहीनो दहेद् राष्ट्रं मन्त्रहीनस्तु ऋत्विजः।<br>यष्टारं दक्षिणाहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः ॥ १११<br><br>न वाप्यल्पधनः कुर्याल्लक्षहोमं नरः क्वचित्।<br>यस्मात् पीडाकरो नित्यं यज्ञे भवति विग्रहः ॥ ११२ | उसी प्रकार लक्षहोममें अपनी सामर्थ्यके अनुकूल मत्सररहित होकर दस, आठ अथवा चार ऋत्विजोंको नियुक्त करना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ! सम्पत्तिशाली यजमानको यथाशक्ति भक्ष्य पदार्थ, आभूषण, वस्त्रोंसहित शय्या, स्वर्णनिर्मित कड़े, कुण्डल, अँगूठी और कण्ठसूत्र (हार) आदि सभी वस्तुएँ लक्षहोममें नवग्रह-यज्ञसे दस गुनी अधिक देनी चाहिये। मनुष्यको कृपणतावश दक्षिणारहित यज्ञ नहीं करना चाहिये। जो लोभ अथवा अज्ञानसे भरपूर दक्षिणा नहीं देता, उसका कुल नष्ट हो जाता है। समृद्धिकामी मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार अन्नका दान करना चाहिये; क्योंकि अन्नदानरहित किया हुआ यज्ञ दुर्भिक्षरूप फलका दाता हो जाता है। अन्नहीन यज्ञ राष्ट्रको, मन्त्रहीन ऋत्विज्को और दक्षिणारहित यज्ञकर्ताको जलाकर नष्ट कर देता है। इस प्रकार (विधिहीन) यज्ञके समान अन्य कोई शत्रु नहीं है। अल्प धनवाले मनुष्यको कभी लक्षहोम नहीं करना चाहिये; क्योंकि यज्ञमें (दक्षिणा आदिके लिये) प्रकट हुआ विग्रह सदाके लिये कष्टकारक हो जाता है। |
९६- सर्वफलत्याग-व्रतका विधान और उसका माहात्म्य
| ३२४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तमेव पूजयेद् भक्त्या द्वौ वा त्रीन् वा यथाविधि ।<br>एकमप्यर्चयेद् भक्त्या ब्राह्मणं वेदपारगम् ।<br>दक्षिणाभिः प्रयत्नेन न बहूनल्पवित्तवान् ॥ ११३<br>लक्षहोमस्तु कर्तव्यो यदा वित्तं भवेद् बहु ।<br>यतः सर्वानवाप्नोति कुर्वन् कामान् विधानतः ॥ ११४<br>पूज्यते शिवलोके च वस्वादित्यमरुद्गणैः ।<br>यावत् कल्पशतान्यष्टावथ मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ११५<br>सकामो यस्त्विमं कुर्याल्लक्षहोमं यथाविधि ।<br>स तं काममवाप्नोति पदमानन्त्यमश्नुते ॥ ११६<br>पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी लभते धनम् ।<br>भार्यार्थी शोभनां भार्यां कुमारी च शुभं पतिम् ॥ ११७<br>भ्रष्टराज्यस्तथा राज्यं श्रीकामः श्रियमाप्नुयात् ।<br>यं यं प्रार्थयते कामं स वै भवति पुष्कलः ।<br>निष्कामः कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति ॥ ११८<br>अस्माच्छतगुणः प्रोक्तः कोटिहोमः स्वयम्भुवा ।<br>आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिः फलेन च ॥ ११९ | स्वल्प सम्पत्तिवाला मनुष्य केवल पुरोहितकी अथवा दो या तीन ब्राह्मणोंकी भक्तिके साथ विधिपूर्वक पूजा करे अथवा एक ही वेदज्ञ ब्राह्मणकी भक्तिके साथ दक्षिणा आदिसे प्रयत्नपूर्वक अर्चना करे, बहुतोंके चक्करमें न पड़े। अधिक सम्पत्ति होनेपर लक्षहोम करना चाहिये; क्योंकि यह अधिक लाभदायक है। इसका विधिपूर्वक अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। वह आठ सौ कल्पोंतक शिवलोकमें वसुगण, आदित्यगण और मरुद्गणोंद्वारा पूजित होता है तथा अन्तमें मोक्षको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य किसी विशेष कामनासे इस लक्षहोमको विधिपूर्वक सम्पन्न करता है, उसे उस कामनाकी प्राप्ति तो हो ही जाती है, साथ ही वह अविनाशी पदको भी प्राप्त कर लेता है। इसका अनुष्ठान करनेसे पुत्रार्थीको पुत्रकी प्राप्ति होती है, धनार्थी धन लाभ करता है, भार्यार्थी सुन्दरी पत्नी, कुमारी कन्या सुन्दर पति, राज्यसे भ्रष्ट हुआ राजा राज्य और लक्ष्मीका अभिलाषी लक्ष्मी प्राप्त करता है। इस प्रकार मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी अभिलाषा करता है, उसे वह प्रचुरमात्रामें प्राप्त हो जाती है। जो निष्कामभावसे इसका अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है॥ १०६-११८॥ |
| पूर्ववद् ग्रहदेवानामावाहनविसर्जनैः ।<br>होममन्त्रास्त एवोक्ताः स्नाने दाने तथैव च ।<br>कुण्डमण्डपवेदीनां विशेषोऽयं निबोध मे ॥ १२०<br>कोटिहोमे चतुर्हस्तं चतुरस्रं तु सर्वतः ।<br>योनिवक्त्रद्वयोपेतं तदप्याहुस्त्रिमेखलम् ॥ १२१<br>द्व्यङ्गुलाभ्युच्छ्रिता कार्या प्रथमा मेखला बुधैः ।<br>त्र्यङ्गुलाभ्युच्छ्रिता तद्वद् द्वितीया परिकीर्तिता ॥ १२२<br>उच्छ्रायविस्तराभ्यां च तृतीया चतुरङ्गुला ।<br>द्व्यङ्गुलश्चेति विस्तारः पूर्वयोरेव शस्यते ॥ १२३<br>वितस्तिमात्रा योनिःस्यात् षट्सप्ताङ्गुलविस्तृता ।<br>कूर्मपृष्ठोन्नता मध्ये पार्श्वयोश्चाङ्गुलोच्छ्रिता ॥ १२४<br>गजोष्ठसदृशी तद्वदायता छिद्रसंयुता ।<br>एतत् सर्वेषु कुण्डेषु योनिलक्षणमुच्यते ॥ १२५ | मुने! प्रयत्नपूर्वक दी गयी आहुतियों, दक्षिणाओं और फलकी दृष्टिसे ब्रह्माने कोटिहोमको इस लक्षहोमसे सौ गुना अधिक फलदायक बतलाया है। इसमें भी ग्रहों एवं देवोंके आवाहन, विसर्जन, स्नान तथा दानमें प्रयुक्त होनेवाले होममन्त्र पहलेके ही हैं। केवल कुण्ड, मण्डप और वेदीमें कुछ विशेषता है, वह मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। इस कोटिहोममें सब ओरसे चौकोर चार हाथके परिमाणवाला कुण्ड बनाना चाहिये। वह दो योनिमुखों और तीन मेखलाओंसे युक्त हो। विद्वानोंको पहली मेखला दो अङ्गुल ऊँची बनानी चाहिये। उसी प्रकार दूसरी मेखला तीन अङ्गुल ऊँची बतलायी गयी है और तीसरी मेखला ऊँचाई और चौड़ाईमें चार अङ्गुलकी होनी चाहिये। पहली दोनों मेखलाओंकी चौड़ाई तो दो अङ्गुलकी ही ठीक मानी गयी है। इनके ऊपर एक बित्ता लम्बी और छः-सात अङ्गुल चौड़ी योनि होनी चाहिये। उसका मध्य-भाग कछुवेकी पीठकी तरह ऊँचा और दोनों पार्श्वभाग एक अङ्गुल ऊँचा हो। वह हाथीके होंठके समान लम्बी और छिद्र (घी गिरनेका मार्ग) युक्त हो। सभी कुण्डोंमें यही योनिका लक्षण बतलाया जाता है। |
- अध्याय ९३ * ३२५
| मेखलोपरि सर्वत्र अश्वत्थदलसंनिभम्।<br>वेदी च कोटिहोमे स्याद् वितस्तीनां चतुष्टयम्॥ १२६<br>चतुरस्त्रा समन्ताच्य त्रिभिर्वप्रैस्तु संयुता।<br>वप्रप्रमाणं पूर्वोक्तं वेदीनां च तथोच्छ्रयः॥ १२७<br>तथा षोडशहस्तः स्यान्मण्डपश्च चतुर्मुखः।<br>पूर्वद्वारे च संस्थाप्य बह्वृचं वेदपारगम्॥ १२८<br>यजुर्विदं तथा याम्ये पश्चिमे सामवेदिनम्।<br>अथर्ववेदिनं तद्वदुत्तरे स्थापयेद् बुधः॥ १२९<br>अष्टौ तु होमकाः कार्या वेदवेदाङ्गवेदिनः।<br>एवं द्वादश विप्राः स्युर्वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।<br>पूर्ववत् पूजयेद् भक्त्या वस्त्रालङ्कारभूषणैः॥ १३०<br>रात्रिसूक्तं च रौद्रं च पावमानं सुमङ्गलम्।<br>पूर्वेतो बह्वृचः शान्तिं पठन्नास्ते ह्युदङ्मुखः॥ १३१<br>शाक्तं शाक्रं च सौम्यं च कौष्माण्डं शान्तिमेव च।<br>पाठयेद् दक्षिणद्वारि यजुर्वेदिनमुत्तमम्॥ १३२<br>सुपर्णमथ वैराजमाग्रेयं रुद्रसंहिताम्।<br>ज्येष्ठसाम तथा शान्तिं छन्दोगः पश्चिमे जपेत्॥ १३३<br>शान्तिसूक्तं च सौरं च तथा शाकुनकं शुभम्।<br>पौष्टिकं च महाराज्यमुत्तरेणाप्यथर्ववित्॥ १३४<br>पञ्चभिः सप्तभिर्वापि होमः कार्योऽत्र पूर्ववत्।<br>स्नाने दाने च मन्त्राः स्युस्त एव मुनिसत्तम॥ १३५<br>वसोर्धाराविधानं च लक्षहोमे विशिष्यते।<br>अनेन विधिना यस्तु कोटिहोमं समाचरेत्।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति ततो विष्णुपदं व्रजेत्॥ १३६<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि ग्रहयज्ञत्रयं नरः।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा पदमिन्द्रस्य गच्छति॥ १३७<br>अश्वमेधसहस्त्राणि दश चाष्टौ च धर्मवित्।<br>कृत्वा यत् फलमाप्नोति कोटिहोमात् तदश्नुते॥ १३८ | योनि सभी मेखलाओंके ऊपर पीपलके पत्तेके सदृश होनी चाहिये। कोटिहोममें चार बित्ता लम्बी, चारों ओरसे चौकोर और तीन परिधियोंसे युक्त एक वेदी होनी चाहिये। परिधियोंका प्रमाण तथा वेदियोंकी ऊँचाई पहले कही जा चुकी है। पुनः सोलह हाथ लम्बे-चौड़े मण्डपकी स्थापना करे, जिसमें चारों दिशाओंमें दरवाजे हों। बुद्धिसम्पन्न यजमान उसके पूर्वद्वारपर ऋग्वेदके पारगामी ब्राह्मणको, दक्षिण द्वारपर यजुर्वेदके ज्ञाताको, पश्चिमद्वारपर सामवेदीको और उत्तरद्वारपर अथर्ववेदीको नियुक्त करे। इनके अतिरिक्त वेद एवं वेदाङ्गोंके ज्ञाता आठ ब्राह्मणोंको हवन करनेके लिये नियुक्त करना चाहिये। इस प्रकार इस कार्यमें बारह ब्राह्मणोंको नियुक्त करनेका विधान है। इन सभी ब्राह्मणोंका वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला, चन्दन आदि सामग्रियोंद्वारा पूर्ववत् भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये॥ ११९—१३०॥<br><br>(कार्यारम्भ होनेपर) पूर्वद्वारपर स्थित ऋग्वेदी ब्राह्मण उत्तराभिमुख हो परम माङ्गलिक रात्रिसूक्त, रुद्रसूक्त, पवमानसूक्त तथा अन्यान्य शान्ति-सूक्तोंका पाठ करता रहे। दक्षिणद्वारपर स्थित श्रेष्ठ यजुर्वेदी ब्राह्मणसे शक्तिसूक्त, शक्रसूक्त, सोमसूक्त, कूष्माण्डसूक्त तथा शान्ति-सूक्तका पाठ करवाना चाहिये। पश्चिमद्वारपर स्थित सामवेदी ब्राह्मण सुपर्ण, वैराज, आग्नेय—इन ऋचाओं, रुद्रसंहिता, ज्येष्ठसाम तथा शान्तिपाठोंका गान करे। उत्तरद्वारपर नियुक्त अथर्ववेदी ब्राह्मण शान्ति (शांतातीय १९)-सूक्त, सूर्यसूक्त, माङ्गलिक शकुनिसूक्त, पौष्टिक एवं महाराज्य (सूक्त)-का पाठ करे। मुनिश्रेष्ठ ! इसमें भी पूर्ववत् पाँच अथवा सात ब्राह्मणोंद्वारा हवन कराना चाहिये। स्नान और दानके लिये वे ही पूर्वकथित मन्त्र इसमें भी हैं। लक्षहोममें केवल वसोर्धाराका विधान विशेष होता है। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे कोटिहोमका विधान करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और मरनेपर विष्णुलोकमें चला जाता है। जो मनुष्य तीनों प्रकारके ग्रहयज्ञोंका पाठ अथवा श्रवण करता है उसका आत्मा समस्त पापोंसे विशुद्ध हो जाता है और अन्तमें वह इन्द्रलोकमें चला जाता है। धर्मज्ञ मनुष्य अठारह हजार अश्वमेधयज्ञोंके अनुष्ठानसे जो फल प्राप्त करता है, वह फल कोटिहोम नामक यज्ञसे प्राप्त हो जाता |