मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय ६१ * | २६७ |
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| कथान्ते भीमसेनेन परिपृष्टः प्रतापवान्।<br>त्वया पृष्टस्य धर्मस्य रहस्यस्यास्य भेदकृत्॥ १२<br><br>भविता स तदा ब्रह्मन् कर्ता चैव वृकोदरः।<br>प्रवर्तकोऽस्य धर्मस्य पाण्डुपुत्रो महाबलः॥ १३<br><br>यस्य तीक्ष्णो वृको नाम जठरे हव्यवाहनः।<br>मया दत्तः स धर्मात्मा तेन चासौ वृकोदरः॥ १४<br><br>मतिमान् दानशीलश्च नागायुतबलो महान्।<br>भविष्यत्यजरः श्रीमान् कंदर्प इव रूपवान्॥ १५<br><br>धार्मिकस्याप्यशक्तस्य तीव्राग्नित्वादुपोषणे।<br>इदं व्रतमशेषाणां व्रतानामधिकं यतः॥ १६<br><br>कथयिष्यति विश्वात्मा वासुदेवो जगद्गुरुः।<br>अशेषयज्ञफलदमशेषाघविनाशनम् ॥ १७<br><br>अशेषदुष्टशमनमशेषसुरपूजितम् ।<br>पवित्राणां पवित्रं च मङ्गलानां च मङ्गलम्।<br>भविष्यं च भविष्याणां पुराणानां पुरातनम्॥ १८<br><br><center>वासुदेव उवाच</center><br>यद्यष्टमीचतुर्दश्योर्द्वादशीष्वथ भारत।<br>अन्येष्वपि दिनर्क्षेषु न शक्तस्त्वमुपोषितुम्॥ १९<br><br>ततः पुण्यां तिथिमिमां सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>उपोष्य विधिनानेन गच्छ विष्णोः परं पदम्॥ २०<br><br>माघमासस्य दशमी यदा शुक्ला भवेत् तदा।<br>घृतेनाभ्यञ्जनं कृत्वा तिलैः स्नानं समाचरेत्॥ २१<br><br>तथैव विष्णुमभ्यर्च्य नमो नारायणाय च।<br>कृष्णाय पादौ सम्पूज्य शिरः सर्वात्मने नमः॥ २२<br><br>वैकुण्ठायेति वै कण्ठमुरः श्रीवत्सधारिणे।<br>शङ्खिने चक्रिणे तद्वद् गदिने वरदाय वै।<br>सर्वं नारायणस्यैवं सम्पूज्या बाहवः क्रमात्॥ २३ | तब कथाकी समाप्तिपर भीमसेन प्रतापी श्रीकृष्णसे वैसा ही प्रश्न करेंगे, जो तुम्हारे द्वारा पूछा गया है और इस धर्मके रहस्यके भेदको प्रकट करनेवाला है। ब्रह्मन्! उस समय पाण्डुपुत्र महाबली भीमसेन इस धर्मके कर्ता एवं प्रवर्तक होंगे। उनके उदरमें मेरे द्वारा दिये गये वृक नामक तीक्ष्ण अग्निका निवास होगा, इसी कारण वे धर्मात्मा 'वृकोदर' नामसे विख्यात होंगे। वे श्रेष्ठ बुद्धिसम्पन्न, दानशील, दस हजार हाथियोंके सदृश बलशाली, महत्त्वयुक्त, जरारहित, लक्ष्मीवान् और कामदेव-सदृश सौन्दर्यशाली होंगे। भीमसेनके धर्मात्मा होनेपर भी उदरमें तीव्र अग्निके स्थित रहनेके कारण उपवासमें असमर्थ जानकर विश्वात्मा जगद्गुरु भगवान् वासुदेव उन्हें यह व्रत बतलायेंगे; क्योंकि यह सम्पूर्ण व्रतोंमें श्रेष्ठ है। यह समस्त यज्ञोंका फलदाता, सम्पूर्ण पापोंका विनाशक, अखिल दोषोंका शामक, समस्त देवताओंद्वारा सम्मानित, सम्पूर्ण पवित्र पदार्थोंमें परम पवित्र, निखिल मङ्गलोंमें श्रेष्ठ मङ्गलरूप, भविष्यमें सर्वाधिक भव्य और पुरातनोंमें विशेष पुरातन है॥ ५—१८॥<br><br>भगवान् वासुदेव कहेंगे— भारत! यदि तुम अष्टमी, चतुर्दशी, द्वादशी तिथियोंमें तथा अन्यान्य दिनों और नक्षत्रोंमें उपवास करनेमें असमर्थ हो तो मैं तुम्हें एक पापविनाशिनी तिथिका परिचय देता हूँ। उस दिन निम्नाङ्कित विधिसे उपवास कर तुम श्रीविष्णुके परम धामको प्राप्त करो। जिस दिन माघमासके शुक्लपक्षकी दशमी* तिथि आये, उस दिन (व्रतीको चाहिये कि) समस्त शरीरमें घी लगाकर तिलमिश्रित जलसे स्नान करे तथा 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रसे भगवान् श्रीविष्णुका पूजन करे। 'श्रीकृष्णाय नमः' कहकर दोनों चरणोंकी और 'सर्वात्मने नमः' कहकर मस्तककी पूजा करे। 'वैकुण्ठाय नमः' इस मन्त्रसे कण्ठकी और 'श्रीवत्सधारिणे नमः' इससे वक्षःस्थलकी अर्चा करे। फिर 'शङ्खिने नमः', 'चक्रिणे नमः', 'गदिने नमः', वरदाय नमः तथा 'सर्वं नारायणस्य' (सब कुछ नारायणका ही है)—ऐसा कहकर आवाहन आदिके क्रमसे भगवान्की बाहुओंकी पूजा करे॥ १९—२३॥ |
* अन्य पुराणोंमें तथा एकादशीमाहात्म्य आदिमें ज्येष्ठ शुक्ल ११को निर्जला या भीमसेनी एकादशी अथवा द्वादशी कहा गया है।
२६८ * मत्स्यपुराण *
| दामोदरायेत्युदरं मेढ्रं पञ्चशराय वै।<br>ऊरू सौभाग्यनाथाय जानुनी भूतधारिणे॥ २४<br><br>नमो नीलाय वै जङ्घे पादौ विश्वसृजे नमः।<br>नमो देव्यै नमः शान्त्यै नमो लक्ष्म्यै नमः श्रियै॥ २५<br><br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै धृष्ट्यै हृष्ट्यै नमो नमः।<br>नमो विहङ्गनाथाय वायुवेगाय पक्षिणे।<br>विषप्रमाथिने नित्यं गरुडं चाभिपूजयेत्॥ २६<br><br>एवं सम्पूज्य गोविन्दमुमापतिविनायकौ।<br>गन्धैर्माल्यैस्तथा धूपैर्भक्ष्यैर्नानाविधैरपि॥ २७<br><br>गव्येन पयसा सिद्धां कृसरामथ वाग्यतः।<br>सर्पिषा सह भुक्त्वा च गत्वा शतपदं बुधः॥ २८<br><br>न्यग्रोधं दन्तकाष्ठमथवा खादिरं बुधः।<br>गृहीत्वा धावयेद् दन्तानाचान्तः प्रागुदङ्मुखः॥ २९<br><br>ब्रूयात् सायंतनीं कृत्वा संध्यामस्तमिते रवौ।<br>नमो नारायणायेति त्वामहं शरणं गतः॥ ३० | 'इसके बाद 'दामोदराय नमः' कहकर उदरका, 'पञ्चशराय नमः' इस मन्त्रसे जननेन्द्रियका, 'सौभाग्यनाथाय नमः' इससे दोनों जंघोंका, 'भूतधारिणे नमः' से दोनों घुटनोंका, 'नीलाय नमः' इस मन्त्रसे पिंडलियों (घुटनेसे नीचेके भाग)-का और 'विश्वसृजे नमः' इससे पुनः दोनों चरणोंका पूजन करे। तत्पश्चात् 'देव्यै नमः', 'शान्त्यै नमः', 'लक्ष्म्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'पुष्ट्यै नमः', 'तुष्ट्यै नमः', 'धृष्ट्यै नमः', 'हृष्ट्यै नमः'—इन मन्त्रोंसे भगवती लक्ष्मीकी पूजा करे। इसके बाद 'विहङ्गनाथाय नमः', 'वायुवेगाय नमः', 'पक्षिणे नमः', 'विषप्रमाथिने नमः'—इन मन्त्रोंके द्वारा सदा गरुडकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार गन्ध, पुष्प, धूप तथा नाना प्रकारके पकवानोंद्वारा श्रीकृष्णकी, महादेवजीकी तथा गणेशजीकी भी पूजा करे। फिर गौके दूधकी बनी हुई खीर लेकर घीके साथ मौनपूर्वक भोजन करे। भोजनके अनन्तर विद्वान् पुरुष सौ पग चलकर बरगद अथवा खैरकी दाँतुन ले उसके द्वारा दाँतोंको साफ करे, फिर मुँह धोकर आचमन करे। सूर्यास्त होनेके बाद पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख बैठकर सायंकालीन संध्या करे। उसके अन्तमें यह कहे—'भगवान् श्रीनारायणको नमस्कार है। भगवन्! मैं आपकी शरणमें आया हूँ।' (इस प्रकार प्रार्थना करके रात्रिमें शयन करे।)॥ २४—३०॥ |
| एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य च केशवम्।<br>रात्रिं च सकलां स्थित्वा स्नानं च पयसा तथा॥ ३१<br><br>सर्पिषा चापि दहनं हुत्वा ब्राह्मणपुङ्गवैः।<br>सहैव पुण्डरीकाक्ष द्वादश्यां क्षीरभोजनम्॥ ३२<br><br>करिष्यामि यतात्माहं निर्विघ्नेनास्तु तच्च मे।<br>एवमुक्त्वा स्वपेद् भूमावितिहासकथां पुनः॥ ३३<br><br>श्रुत्वा प्रभाते संजाते नदीं गत्वा विशाम्पते।<br>स्नानं कृत्वा मुदा तद्वत् पाषण्डानभिवर्जयेत्॥ ३४<br><br>उपास्य संध्यां विधिवत् कृत्वा च पितृतर्पणम्।<br>प्रणम्य च हृषीकेशं समलोकैकमीश्वरम्॥ ३५<br><br>गृहस्य पुरतो भक्त्या मण्डपं कारयेद् बुधः।<br>दशहस्तमथाष्टौ वा करान् कुर्याद् विशांपते॥ ३६ | दूसरे दिन एकादशीको निराहार रहकर भगवान् केशवकी पूजा करे और रातभर बैठा रहकर प्रातःकाल दूध या जलसे स्नान करे। फिर अग्निमें घीकी आहुति देकर प्रार्थना करे—'पुण्डरीकाक्ष! मैं जितेन्द्रिय होकर द्वादशीको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ ही खीरका भोजन करूँगा। मेरा यह व्रत निर्विघ्नतापूर्वक पूर्ण हो।' यह कहकर इतिहास-पुराणकी कथा सुननेके पश्चात् भूमिपर शयन करे। राजन्! सबेरा होनेपर जाकर नदीमें प्रसन्नतापूर्वक स्नान करे। पाखण्डियोंके संसर्गसे दूर रहे। विधिपूर्वक संध्योपासन करके पितरोंका तर्पण करे। फिर सातों लोकोंके एकमात्र अधीश्वर भगवान् हृषीकेशको प्रणाम करके बुद्धिमान् व्रती घरके सामने भक्तिपूर्वक एक मण्डपका निर्माण कराये। राजन्! वह मण्डप दस अथवा आठ हाथ लम्बा-चौड़ा होना चाहिये। |
७१ अशून्यशयन (द्वितीया)-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ६१ * | २६९ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| चतुर्हस्तां शुभां कुर्याद् वेदीमरिनिषूदन।<br>चतुर्हस्तप्रमाणं च विन्यसेत् तत्र तोरणम्॥ ३७<br><br>आरोप्य कलशं तत्र दिक्पालान् पूजयेत् ततः।<br>छिद्रेण जलसम्पूर्णमथ कृष्णाजिनस्थितः।<br>तस्य धारां च शिरसा धारयेत् सकलां निशाम्॥ ३८<br><br>तथैव विष्णोः शिरसि क्षीरधारां प्रपातयेत्।<br>अरत्निमात्रं कुण्डं च कुर्यात् तत्र त्रिमेखलम्॥ ३९<br><br>योनिवक्त्रं च तत् कृत्वा ब्राह्मणैः यवसर्पिषी।<br>तिलांश्च विष्णुदैवत्यैर्मन्त्रैरेकाग्निवत् तदा॥ ४०<br><br>हुत्वा च वैष्णवं सम्यक् चरुं गोक्षीरसंयुतम्।<br>निष्पावार्धप्रमाणां वै धारामाज्यस्य पातयेत्॥ ४१ | शत्रुसूदन! उसके भीतर चार हाथकी सुन्दर वेदी बनवाये। वेदीके ऊपर चार हाथका तोरण लगाये। फिर (सुदृढ़ खम्भोंके आधारपर) एक कलश रखे और दिक्पालोंकी पूजा करे, उसमें नीचेकी ओर (उड़दके दानेके बराबर) छेद कर दे। तदनन्तर उसे जलसे भरे और स्वयं उसके नीचे काला मृगचर्म बिछाकर बैठ जाय। कलशसे गिरती हुई धाराको सारी रात अपने मस्तकपर धारण करे। उसी प्रकार भगवान् विष्णुके सिरपर दूधकी धारा गिराये। फिर उनके निमित्त एक कुण्ड बनवाये, जो हाथभर लंबा, उतना ही चौड़ा और उतना ही गहरा हो। उसके ऊपरी किनारेपर तीन मेखलाएँ बनवाये। उसमें यथास्थान योनि और मुखके चिह्न बनवाये। तदनन्तर ब्राह्मण (कुण्डमें अग्नि प्रज्वलित कर) एकाग्निक उपासककी तरह जौ, घी और तिलोंका श्रीविष्णु-सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा हवन करे। फिर गो-दुग्धसे बने हुए चरुका हवन करके विधिपूर्वक वैष्णवयागका सम्पादन करे। फिर कुण्डके मध्यमें मटरकी दालके बराबर मोटी घीकी धारा गिराये॥ ३१—४१॥ |
| जलकुम्भान् महावीर्य स्थापयित्वा त्रयोदश।<br>भक्ष्यैर्नानाविधैर्युक्तान् सितवस्त्रैरलंकृतान्॥ ४२<br>युक्तानौदुम्बरैः पात्रैः पञ्चरत्नसमन्वितान्।<br>चतुर्भिर्बह्वृचैर्होमस्तत्र कार्य उदङ्मुखैः॥ ४३<br>रुद्रजाप्यंश्चतुर्भिश्च यजुर्वेदपरायणैः।<br>वैष्णवानि तु सामानि चतुरः सामवेदिनः।<br>अरिष्टवर्गसहितान्यभितः परिपाठयेत्॥ ४४<br>एवं द्वादश तान् विप्रान् वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।<br>पूजयेदङ्गुलीयैश्च कटकैर्हेमसूत्रकैः॥ ४५<br>वासोभिः शयनीयैश्च वित्तशाठ्यविवर्जितः।<br>एवं क्षपातिवाह्या च गीतमङ्गलनिःस्वनैः॥ ४६<br>उपाध्यायस्य च पुनर्द्विगुणं सर्वमेव तु।<br>ततः प्रभाते विमले समुत्थाय त्रयोदश॥ ४७<br>गां वै दद्यात् कुरुश्रेष्ठ सौवर्णमुखसंयुताः।<br>पयस्विनीः शीलवतीः कांस्यदोहसमन्विताः॥ ४८<br>रौप्यखुराः सवस्त्राश्च चन्दनेनाभिषेचिताः।<br>तास्तु तेषां ततो भक्त्या भक्ष्यभोज्यान्नतर्पितान्॥ ४९ | महावीर्य! फिर जलसे भरे हुए तेरह कलशोंकी स्थापना करे। वे नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थोंसे युक्त और श्वेत वस्त्रोंसे अलंकृत होने चाहिये। उनके साथ उदुम्बर-पात्र तथा पञ्चरत्नका होना भी आवश्यक है। वहाँ चार ऋग्वेदी ब्राह्मण उत्तरकी ओर मुख करके हवन करें, चार यजुर्वेदी विप्र रुद्राध्यायका पाठ करें तथा चार सामवेदी ब्राह्मण चारों ओरसे अरिष्टवर्गसहित वैष्णवसामका गान करते रहें। इस प्रकार उपर्युक्त बारह ब्राह्मणोंको वस्त्र, पुष्प, चन्दन, अँगूठी, कड़े, सोनेकी जंजीर, वस्त्र तथा शय्या आदि देकर उनका पूर्ण सत्कार करे। इस कार्यमें धनकी कृपणता न करे। इस प्रकार गीत और माङ्गलिक शब्दोंके साथ रात्रि व्यतीत करे। उपाध्याय (आचार्य या पुरोहित)-को सब वस्तुएँ अन्य ब्राह्मणोंकी अपेक्षा दूनी मात्रामें अर्पण करे। कुरुश्रेष्ठ! रात्रिके बाद जब निर्मल प्रभातका उदय हो, तब शयनसे उठकर (नित्यकर्मके पश्चात्) मुखपर सोनेके पत्रसे विभूषित की हुई तेरह गौएँ दान करनी चाहिये। वे सब-की-सब दूध देनेवाली और सीधी हों। उनके खुर चाँदीसे मँढ़े हुए हों तथा उन सबको वस्त्र ओढ़ाकर चन्दनसे विभूषित किया गया हो। गौओंके साथ काँसेका दोहनपात्र भी होना चाहिये। गोदानके पश्चात् उन सभी ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे |
| २७० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कृत्वा वै ब्राह्मणान् सर्वानन्नैर्नानाविधैस्तथा।<br>भुक्त्वा चाक्षारलवणमात्मना च विसर्जयेत्॥ ५० | तृप्त करके स्वयं भी क्षार लवणसे रहित अन्नका भोजन करके ब्राह्मणोंको विदा करे॥४२—५०॥ |
| अनुगम्य पदान्यष्टौ पुत्रभार्यासमन्वितः।<br>प्रीयतामत्र देवेशः केशवः क्लेशनाशनः॥ ५१ | पुत्र और स्त्रीके साथ आठ पगोंतक उनके पीछे-पीछे जाय और इस प्रकार प्रार्थना करे—'हमारे इस कार्यसे देवताओंके स्वामी भगवान् श्रीविष्णु, जो सबका क्लेश दूर करनेवाले हैं, प्रसन्न हों। |
| शिवस्य हृदये विष्णुर्विष्णोश्च हृदये शिवः।<br>यथान्तरं न पश्यामि तथा मे स्वस्ति चायुषः॥ ५२ | श्रीशिवके हृदयमें श्रीविष्णु हैं और श्रीविष्णुके हृदयमें श्रीशिव विराजमान हैं। मैं यदि इन दोनोंमें अन्तर न देखता होऊँ तो इस धारणासे मेरी आयु बढ़े तथा कल्याण हो।' यह कहकर |
| एवमुच्चार्य तान् कुम्भान् गाश्चैव शयनानि च।<br>वासांसि चैव सर्वेषां गृहाणि प्रापयेद् बुधः॥ ५३ | बुद्धिमान् व्रती उन कलशों, गौओं, शय्याओं तथा वस्त्रोंको सब ब्राह्मणके घर पहुँचा दे। |
| अभावे बहुशय्यानामेकामपि सुसंस्कृताम्।<br>शय्यां दद्याद् द्विजातेश्च सर्वोपस्करसंयुताम्॥ ५४ | अधिक शय्याएँ सुलभ न हों तो गृहस्थ पुरुष एक ही सुसज्जित एवं सभी उपकरणोंसे सम्पन्न शय्या ब्राह्मणको दान करे। |
| इतिहासपुराणानि वाचयित्वातिवाहयेत्।<br>तद्दिनं नरशार्दूल य इच्छेद् विपुलां श्रियम्॥ ५५ | नरसिंह! जिसे विपुल लक्ष्मीकी अभिलाषा हो, उसे वह दिन इतिहास और पुराणोंके श्रवणमें ही बिताना चाहिये। |
| तस्मात् त्वं सत्त्वमालम्ब्य भीमसेन विमत्सरः।<br>कुरु व्रतमिदं सम्यक् स्नेहात् तव मयेरितम्॥ ५६ | अतः भीमसेन! तुम भी सत्त्वगुणका आश्रय ले, मात्सर्यका त्यागकर इस व्रतका सम्यक् प्रकारसे अनुष्ठान करो। (यह बहुत गुप्त व्रत है, किंतु) स्नेहवश मैंने तुम्हें बता दिया है। |
| त्वया कृतमिदं वीर त्वन्नामाख्यं भविष्यति।<br>सा भीमद्वादशी ह्येषा सर्वपापहरा शुभा।<br>या तु कल्याणिनी नाम पुरा कल्पेषु पठ्यते॥ ५७ | वीर! तुम्हारे द्वारा इसका अनुष्ठान होनेपर यह व्रत तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगा। इसे लोग 'भीमद्वादशी' कहेंगे। यह भीमद्वादशी सब पापोंको नाश करनेवाली और शुभकारिणी होगी। प्राचीन कल्पोंमें इस व्रतको 'कल्याणिनी व्रत' कहा जाता था। |
| त्वमादिकर्ता भव सौकरेऽस्मिन्<br>कल्पे महावीरवरप्रधान।<br>यस्याः स्मरन् कीर्तनमप्यशेषं<br>विनष्टपापस्त्रिदशाधिपः स्यात्॥ ५८ | महान् वीरोंमें श्रेष्ठ वीर भीमसेन! इस वाराहकल्पमें तुम इस व्रतके सर्वप्रथम अनुष्ठानकर्ता बनो। इसका स्मरण और कीर्तनमात्र करनेसे मनुष्यका सारा पाप नष्ट हो जाता है और वह देवताओंका राजा इन्द्र बन जाता है॥५१–५८॥ |
| कृत्वा च यामप्सरसामधीशा<br>वेश्या कृता ह्यन्यभवान्तरेषु।<br>आभीरकन्यातिकुतूहलेन<br>सैवोर्वशी सम्प्रति नाकपृष्ठे॥ ५९ | जन्मान्तरमें एक अहीरकी कन्याने अत्यन्त कुतूहलवश इस व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके फलस्वरूप वह वेश्या अप्सराओंकी अधीश्वरी हुई। वही इस समय स्वर्गलोकमें उर्वशी नामसे विख्यात है। |
| जातातथवा वैश्यकुलोद्भवापि<br>पुलोमकन्या पुरूहूतपत्नी।<br>तत्रापि तस्याः परिचारिकेयं<br>मम प्रिया सम्प्रति सत्यभामा॥ ६० | इसी प्रकार वैश्यकुलमें उत्पन्न हुई एक दूसरी कन्याने भी इस व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके परिणामस्वरूप वह पुलोम (दानव)-की पुत्रीरूपमें उत्पन्न होकर इन्द्रकी पत्नी बनी। उसके अनुष्ठान-कालमें जो उसकी सेविका थी, |
७२ अङ्गारक-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
* अध्याय ६९ * <span style="float: right;">२७१</span>
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्नातः पुरा मण्डलमेष तद्वत्<br>तेजोमयं वेदशरीरमाप।<br>अस्यां च कल्याणतिथौ विवस्वान्<br>सहस्रधारेण सहस्ररश्मिः॥ ६१<br><br>इदमेव कृतं महेन्द्रमुख्यै-<br>र्वसुभिर्देवसुरारिभिस्तथा तु।<br>फलमस्य न शक्यतेऽभिवक्तुं<br>यदि जिह्वायुतकोटयो मुखे स्युः॥ ६२ | वही इस समय मेरी प्रिया सत्यभामा है। पूर्वकालमें इस कल्याणमयी तिथिको सहस्र किरणधारी सूर्यने हजारों धाराओंसे स्नान किया था, इसी कारण उन्हें उस प्रकारका तेजोमय मण्डल और वेदमय शरीर प्राप्त हुआ है। महेन्द्र आदि देवताओं, वसुओं तथा असुरोंने भी इस व्रतका अनुष्ठान किया है। यदि एक मुखमें दस हजार करोड़ जिह्वाएँ हों तो भी इसके फलका पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ५९-६२॥ |
| कलिकलुषविदारिणीमनन्ता-<br>मिति कथयिष्यति यादवेन्द्रसूनुः।<br>अपि नरकगतान् पितॄनशेषा-<br>नलमुद्धर्तुमिहैव यः करोति॥ ६३<br><br>य इदमघविदारणं शृणोति<br>भक्त्या परिपठतीह परोपकारहेतोः।<br>तिथिमिह सकलार्थभाङ्नरेन्द्र-<br>स्तव चतुरानन साम्यतामुपैति॥ ६४<br><br>कल्याणिनी नाम पुरा बभूव<br>या द्वादशी माघदिनेषु पूज्या।<br>सा पाण्डुपुत्रेण कृता भविष्य-<br>त्यनन्तपुण्यानघ भीमपूर्वा॥ ६५ | ब्रह्मन्! कलियुगके पापोंको नष्ट करनेवाली एवं अनन्त फल प्रदान करनेवाली इस कल्याणमयी तिथिकी महिमाका वर्णन यादवराजकुमार भगवान् श्रीकृष्ण अपने श्रीमुखसे करेंगे। जो इसके व्रतका अनुष्ठान करता है, उसके नरकमें पड़े हुए सम्पूर्ण पितरोंका भी यह उद्धार करनेमें समर्थ है। चतुरानन! जो अत्यन्त भक्तिके साथ इस पापनाशक व्रतकी कथाको सुनता तथा दूसरोंके उपकारके लिये पढ़ता है, वह इस लोकमें जनताका स्वामी और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंका भागी हो जाता है तथा परलोकमें आपकी समताको प्राप्त कर लेता है। पूर्वकल्पमें जो माघमासकी द्वादशी परम पूजनीय कल्याणिनी तिथिके नामसे प्रसिद्ध थी, वही पाण्डुनन्दन भीमसेनके व्रत करनेपर अनन्त पुण्यदायिनी 'भीमद्वादशी' के नामसे प्रसिद्ध होगी॥ ६३-६५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भीमद्वादशीव्रतं नामैकोनसप्ततितमोऽध्यायः॥ ६९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें भीमद्वादशी-व्रत नामक उनहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६९॥
| २७२ | * मत्स्यपुराण * |
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सत्तरवाँ अध्याय
पण्यस्त्री-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माजीने पूछा— |
|---|---|
| वर्णाश्रमाणां प्रभवः पुराणेषु मया श्रुतः।<br>सदाचारस्य भगवन् धर्मशास्त्रविनिश्चयः।<br>पण्यस्त्रीणां सदाचारं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥ १॥ | भगवान्! मैं पुराणोंमें सभी वर्णों और आश्रमोंके सदाचारकी उत्पत्ति तथा धर्मशास्त्रके सिद्धान्तोंको तो सुन चुका, अब मैं पण्यस्त्रियों (मूल्यद्वारा खरीदी जानेवाली स्त्रियों)-के समुचित आचारको यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ*॥ १॥ |
| ईश्वर उवाच | भगवान् शंकरने कहा— |
| तस्मिन्नेव युगे ब्रह्मन् सहस्राणि तु षोडश।<br>वासुदेवस्य नारीणां भविष्यन्त्यम्बुजोद्भव॥ २ | कमलोद्भव ब्रह्मन्! उसी द्वापरयुगमें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी सोलह सहस्र पत्नियाँ होंगी। |
| ताभिर्वसन्तसमये कोकिलालिकुलाकुले।<br>पुष्पितोपवने फुल्लकह्लारसरस्तटे॥ ३ | एक बार वसन्त-ऋतुमें वे सभी नारियाँ खिले हुए पुष्पोंसे सुशोभित वनमें उत्फुल्ल कमल-पुष्पोंसे परिपूर्ण एक सरोवरके तटपर जायँगी। उस समय कोकिल कूज रहे होंगे, भ्रमर-समूह अपनी गुंजार चतुर्दिक् बिखेर रहे होंगे तथा शीतल-मन्द-सुगन्ध पवन बह रहा होगा। इसी समय वे निश्चिन्त रूपसे एकत्र होकर जलपान आदि कार्योंमें लीन होंगी। |
| निर्भरं सह पत्नीभिः प्रसक्ताभिरलङ्कृतः।<br>रमयिष्यति विश्वात्मा कृष्णो यदुकुलोद्वहः।<br>कुरङ्गनयनः श्रीमान् मालतीकृतशेखरः॥ ४ | उस समय यदुकुलके उद्धारक विश्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण भी उनके साथ वहाँ भ्रमण करेंगे। |
| गच्छन् समीपमार्गेण साम्बः परपुरञ्जयः।<br>साक्षात् कन्दर्परूपेण सर्वाभरणभूषितः॥ ५ | उसी समय शत्रु-नगरीको जीतनेवाले, अलंकारोंसे सुशोभित श्रीमान् साम्ब, जिनके नेत्र मृगनेत्रसरीखे होंगे, जिनका मस्तक मालतीकी मालासे सुशोभित होगा, जो सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित तथा रूपसे साक्षात् कामदेवके समान होंगे, उस सरोवरके समीपवर्ती मार्गसे जा निकलेंगे। |
| अनङ्गशरतप्ताभिः साभिलाषमवेक्षितः।<br>प्रवृद्धो मन्मथस्तासां भविष्यति यदात्मनि॥ ६ | उन्हें देखकर वे सभी (स्त्रियाँ) रागभरी दृष्टिसे उनकी ओर देखने लगेंगी। |
| तदावेक्ष्य जगन्नाथः सर्वतो ध्यानचक्षुषा।<br>शापं वक्ष्यति ताः सर्वा वो हरिष्यन्ति दस्यवः।<br>मत्परोक्षं यतः कामलौल्यादीदृग्विधं कृतम्॥ ७ | तब जगदीश्वर श्रीकृष्ण ध्यान-दृष्टिसे सारा वृत्तान्त जानकर उन्हें शाप दे देंगे—'चूँकि तुमलोगोंने मुझसे विश्वासघात किया; कामलोलुपतावश ऐसा जघन्य कार्य किया है, इसलिये चोर तुमलोगोंका अपहरण कर लेंगे।' |
| ततः प्रसादितो देव इदं वक्ष्यति शार्ङ्गभृत्।<br>ताभिः शापाभितप्ताभिर्भगवान् भूतभावनः॥ ८ | तत्पश्चात् शापसे संतप्त हुई उन स्त्रियोंद्वारा प्रसन्न किये जानेपर |
| उत्तारभूतं दाशत्वं समुद्राद् ब्राह्मणप्रियः।<br>उपदेक्ष्यत्यनन्तात्मा भाविकल्याणकारकम्॥ ९ | भगवान् श्रीकृष्ण जो अनन्तात्मा, ब्राह्मणोंके प्रेमी तथा प्राणियोंको भवसागरसे पार करनेवाले कर्णधार हैं, उन्हें भविष्यमें |
* इस अध्यायमें कृपालु भगवान्द्वारा—'मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ (गीता ९। ३२)-के भाव, पापयोनिकी व्याख्या तथा उनके कल्याणकी पद्धति निर्दिष्ट हुई हैं। यह अध्याय पद्म० खं० २३। ७४—१४६ तथा भविष्य० ४। १२०। १—७३ तकमें तो ज्यों-का-त्यों आता ही है।
| * अध्याय ७० * | २७३ |
|---|---|
| भवतीनामृषिर्दाल्भ्यो यद् व्रतं कथयिष्यति।<br>तदेवोत्तारणायालं दासीत्वेऽपि भविष्यति।<br>इत्युक्त्वा ताः परिष्वज्य गतो द्वारवतीश्वरः॥ १०<br>ततः कालेन महता भारावतरणे कृते।<br>निवृत्ते मौसले तद्वत् केशवे दिवमागते॥ ११<br>शून्ये यदुकुले सर्वैःशूरैरपि जितेऽर्जुने।<br>हृतासु कृष्णपत्नीषु दाशभोग्यासु चाम्बुधौ॥ १२<br>तिष्ठन्तीषु च दौर्गत्यसंतप्तासु चतुर्मुख।<br>आगमिष्यति योगात्मा दाल्भ्यो नाम महातपाः॥ १३<br>तास्तमर्घ्येण सम्पूज्य प्रणिपत्य पुनः पुनः।<br>लालप्यमाना बहुशो बाष्पपर्याकुलेक्षणाः॥ १४<br>स्मरन्त्यो विपुलान् भोगान् दिव्यमाल्यानुलेपनम्।<br>भर्तारं जगतामीशमनन्तमपराजितम्॥ १५<br>दिव्यभावां तां च पुरीं नानारत्नगृहाणि च।<br>द्वारकावासिनः सर्वान् देवरूपान् कुमारकान्।<br>प्रश्नमेवं करिष्यन्ति मुनेरभिमुखं स्थिताः॥ १६ | इस प्रकार कल्याणकारी मार्गका उपदेश करेंगे—'महर्षि दाल्भ्य तुमलोगोंको जो व्रत बतलायेंगे, वही दासीत्वावस्थामें भी तुमलोगोंका उद्धार करनेमें समर्थ होगा।' यों कहकर द्वारकाधीश वहाँसे चले जायेंगे। चतुर्मुख! इसके बहुत दिन बाद जब श्रीभगवान्द्वारा पृथ्वीका भार दूर करने, मौसलयुद्ध समाप्त होने—मूसलद्वारा यदुवंशियोंके विनाश होने, भगवान् श्रीकृष्णके वैकुण्ठ पधार जाने तथा यदुकुलके वीरोंसे शून्य हो जानेपर दस्युगण अर्जुनको पराजितकर श्रीकृष्णकी पत्नियोंका अपहरण कर लेंगे और उन्हें अपनी पत्नी बना लेंगे, तब अपनी दुर्गतिसे दुःखी हुई वे सभी समुद्रमें निवास करेंगी। उसी समय महान् तपस्वी योगात्मा महर्षि दाल्भ्य वहाँ आयेंगे। तब वे ऋषिकी अर्घ्यद्वारा पूजा करके बारंबार उनके चरणोंमें प्रणिपात करेंगी और आँखोंमें आँसू भरकर अनेकों प्रकारसे विलाप करेंगी। उस समय उनको प्रचुर भोगोंका, दिव्य पुष्पमाला और अनुलेपका, अनन्त एवं अपराजित जगदीश्वर पतिका, दिव्य भावोंसे संयुक्त द्वारकापुरीका, नाना प्रकारके रत्नोंसे निर्मित गृहोंका, द्वारकावासियोंका और देवरूपी सभी कुमारोंका स्मरण हो रहा होगा। तब वे मुनिके समक्ष खड़ी होकर इस प्रकार प्रश्न करेंगी॥ २—१६॥ |
| स्त्रिय ऊचुः<br>दस्युभिर्भगवन् सर्वाः परिभुक्ता वयं बलात्।<br>स्वधर्माच्च्यवनेऽस्माकमस्मिंस्त्वं शरणं भव॥ १७<br>आदिष्टोऽसि पुरा ब्रह्मन् केशवेन च धीमता।<br>कस्मादीशेन संयोगं प्राप्य वेश्यात्वमागताः॥ १८<br>वेश्यानामपि यो धर्मस्तं नो ब्रूहि तपोधन।<br>कथयिष्यत्यतस्तासां स दाल्भ्यश्चैकितायनः॥ १९ | स्त्रियाँ कहेंगी— भगवन्! डाकुओंने बलपूर्वक (हमलोगोंका अपहरण करके) अपने वशीभूत कर लिया है। इस प्रकार हम सभी अपने धर्मसे च्युत हो गयी हैं। अब इस विषयमें आप हमलोगोंके आश्रयदाता बनें। ब्रह्मन्! इसके लिये बुद्धिमान् श्रीकृष्णने पहले ही आपको आदेश दे दिया है। पता नहीं, किस घोर पाप-कर्मके कारण जगदीश्वर श्रीकृष्णका संयोग पाकर भी हमलोग कुधर्ममें आ पड़ी हैं। इसलिये तपोधन! पण्यस्त्रियोंके लिये भी जो धर्म कहे गये हैं, उन्हें हमें बताइये। उनके द्वारा यों पूछे जानेपर चेकितायन महर्षिके पुत्र दाल्भ्य उन्हें सारा वृत्तान्त बतलायेंगे॥ १७—१९॥ |
| दाल्भ्य उवाच<br>जलक्रीडाविहारेषु पुरा सरसि मानसे।<br>भवतीनां च सर्वासां नारदोऽभ्याशमागतः॥ २० | दाल्भ्य कहते हैं— नारियो! पूर्वकालमें तुमलोग अप्सराएँ थीं और सब-की-सब अग्निकी कन्याएँ थीं। एक बार जब तुमलोग मानस-सरोवरमें जलक्रीड़ाद्वारा मनोरंजन कर रही थीं, उसी समय तुमलोगोके निकट नारदजी आ पहुँचे। |
| २७४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|---|
| हुताशनसुताः सर्वा भवन्त्योऽप्सरसः पुरा।<br>अप्रणम्यावलेपेन परिपृष्टः स योगवित्।<br>कथं नारायणोऽस्माकं भर्ता स्यादित्युपादिश॥ २१<br><br>तस्माद् वरप्रदानं वः शापश्चायमभूत् पुरा।<br>शय्याद्वयप्रदानेन मधुमाधवमासयोः॥ २२<br><br>सुवर्णोपस्करोत्सर्गाद् द्वादश्यां शुक्लपक्षतः।<br>भर्ता नारायणो नूनं भविष्यत्यन्यजन्मनि॥ २३<br><br>यदकृत्वा प्रणामं मे रूपसौभाग्यमत्सरात्।<br>परिपृष्टोऽस्मि तेनाशु वियोगो वो भविष्यति।<br>चौरैरपहताः सर्वा वेश्यात्वं समवाप्स्यथ॥ २४<br><br>एवं नारदशापेन केशवस्य च धीमतः।<br>वेश्यात्वमागताः सर्वा भवन्त्यः काममोहिताः।<br>इदानीमपि यद् वक्ष्ये तच्छृणुध्वं वराङ्गनाः॥ २५<br><br>पुरा देवासुरे युद्धे हतेषु शतशः सुरैः।<br>दानवासुरदैत्येषु राक्षसेषु ततस्ततः॥ २६<br><br>तेषां व्रातसहस्राणि शतान्यपि च योषिताम्।<br>परिणीतानि यानि स्युर्बलाद् भुक्तानि यानि वै।<br>तानि सर्वाणि देवेशः प्रोवाच वदतां वरः॥ २७<br><br>इन्द्र उवाच<br><br>वेश्याधर्मेण वर्तध्वमधुना नृपमन्दिरे।<br>भक्तिमत्यो वरारोहास्तथा देवकुलेषु च॥ २८<br><br>राजानः स्वामिनस्तुल्याः सुता वापि च तत्समाः।<br>भविष्यति च सौभाग्यं सर्वासामपि शक्तितः॥ २९<br><br>यः कश्चिच्छुल्कमादाय गृहमेष्यति वः सदा।<br>निधनेनोपचार्यो वः स तदान्यत्र दाम्भिकात्॥ ३०<br><br>देवतानां पितॄणां च पुण्याहे समुपस्थिते।<br>गोभूहिरण्यधान्यानि प्रदेयानि स्वशक्तितः।<br>ब्राह्मणानां वरारोहाः कार्याणि वचनानि च॥ ३१<br><br>यच्चाप्यन्यद् व्रतं सम्यगुपदेक्ष्याम्यहं ततः।<br>अविचारेण सर्वाभिरनुष्ठेयं च तत् पुनः॥ ३२<br><br>संसारोत्तारणायालमेतद् वेदविदो विदुः। | उस समय तुमलोग गर्ववश उन्हें प्रणाम न कर उन योगवेत्तासे इस प्रकार प्रश्न कर बैठीं—'देवर्षे! भगवान् नारायण किस प्रकार हमलोगोंके पति हो सकते हैं, इसका उपाय बतलाइये।' उस समय तुमलोगोंको नारदजीसे वरदान और शाप दोनों प्राप्त हुए थे। (उन्होंने कहा था—) 'यदि तुमलोग चैत्र और वैशाखमासमें शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन स्वर्णनिर्मित उपकरणोंसहित दो शय्याएँ प्रदान करोगी तो निश्चय ही दूसरे जन्ममें भगवान् नारायण तुमलोगोंके पति होंगे। साथ ही सुन्दरता और सौभाग्यके अभिमानवश जो तुमलोगोंनें मुझे बिना प्रणाम किये ही मुझसे प्रश्न किया है, इस कारण तुमलोगोंका उनसे शीघ्र ही वियोग भी हो जायगा तथा डाकू तुमलोगोंका अपहरण कर लेंगे और तुम सभी कुधर्मको प्राप्त हो जाओगी।' इस प्रकार नारदजी एवं बुद्धिमान् भगवान् केशवके शापसे तुम सभी कामसे मोहित होकर कुधर्मको प्राप्त हो गयी हो। सुन्दरियो! इस समय मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसे भी तुमलोग ध्यान देकर सुनो। पूर्वकालमें घटित हुए सैकड़ों देवासुर-संग्रामोंमें देवताओंने समय-समयपर बहुत-से दानवो, असुरों, दैत्यों और राक्षसोंको मार डाला था, उनकी जो सैकड़ों-हजारों यूथ-की-यूथ पत्नियाँ थीं, जिन्हें अन्य राक्षसोंने बलपूर्वक (इसी प्रकार) ब्याह लिया था, उन सबसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवराज इन्द्रने कहा॥ २०—२७॥<br><br>**इन्द्र बोले—**भक्तिमती सुन्दरियो! तुमलोगोंको दाम्भिकोंसे सदा दूर रहना चाहिये। तुमलोगोंको देवताओं एवं पितरोंके पुण्य-पर्व आनेपर अपनी शक्तिके अनुसार गौ, पृथ्वी, स्वर्ण और अन्न आदिका दान करना तथा ब्राह्मणोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त मैं तुमलोगोंको जिस दूसरे व्रतका उपदेश दे रहा हूँ, उसका भी बिना आगा-पीछा सोचे तुम सभीको अनुष्ठान करना चाहिये। यह व्रत तुमलोगोंका संसारसे उद्धार करनेमें समर्थ है। इसे वेदवेत्तालोग ही जानते हैं॥ २८—३३ ½ ॥ |
७३ शुक्र और गुरुकी पूजा-विधि
* अध्याय ७० * । २७५
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| यदा सूर्यदिने हस्तः पुष्यो वाथ पुनर्वसुः॥ ३३<br>भवेत् सर्वौषधीस्नानं सम्यङ्नारी समाचरेत्।<br>तदा पञ्चशरस्यापि संनिधातुत्वमेष्यति।<br>अर्चयेत् पुण्डरीकाक्षमङ्गस्यानुकीर्तनैः॥ ३४<br>कामाय पादौ सम्पूज्य जङ्घे वै मोहकारिणे।<br>मेढ्रं कंदर्पनिधये कटिं प्रीतिमते नमः॥ ३५<br>नाभिं सौख्यसमुद्राय रामाय च तथोदरम्।<br>हृदयं हृदयेशाय स्तनावाह्लादकारिणे॥ ३६<br>उत्कण्ठायेति वै कण्ठमास्यानन्दकारिणे।<br>वामाङ्गं पुष्पचापाय पुष्पबाणाय दक्षिणम्॥ ३७<br>मानसायेति वै मौलिं विलोलायेति मूर्धजम्।<br>सर्वात्मने च सर्वाङ्गं देवदेवस्य पूजयेत्॥ ३८<br>नमः शिवाय शान्ताय पाशाङ्कुशधराय च।<br>गदिने पीतवस्त्राय शङ्खचक्रधराय च॥ ३९<br>नमो नारायणायेति कामदेवात्मने नमः।<br>सर्वशान्त्यै नमः प्रीत्यै नमो रत्यै नमः श्रियै॥ ४०<br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै नमः सर्वार्थसम्पदे।<br>एवं सम्पूज्य देवेशमनङ्गात्मकमीश्वरम्।<br>गन्धैर्माल्यैस्तथा धूपैर्नैवेद्येन च कामिनी॥ ४१<br>तत आहूय धर्मज्ञं ब्राह्मणं वेदपारगम्।<br>अव्यङ्गावयवं पूज्य गन्धपुष्पार्चनादिभिः॥ ४२<br>शालेयतण्डुलप्रस्थं घृतपात्रेण संयुतम्।<br>तस्मै विप्राय सा दद्यान्माधवः प्रीयतामिति॥ ४३<br>यथेष्टाहारयुक्तं वै तमेव द्विजसत्तमम्।<br>रत्यर्थं कामदेवोऽयमिति चित्तेऽवधार्य तम्॥ ४४<br>यद् यदिच्छति विप्रेन्द्रस्तत्तत्कुर्याद् विलासिनी।<br>सर्वभावेन चात्मानमर्पयेत् स्मितभाषिणी॥ ४५ | जब रविवारको हस्त, पुष्य अथवा पुनर्वसु नक्षत्र आवे तो स्त्रीको सर्वौषधिमिश्रित जलसे भलीभाँति स्नान करना उचित है। ऐसा करनेसे उसे देवताकी संनिकटता प्राप्त होगी। फिर नामोंका कीर्तन करते हुए भगवान् पुण्डरीकाक्षकी यों अर्चना करनी चाहिये—'कामाय नमः' से दोनों चरणोंका, 'मोहकारिणे नमः' से जङ्घाओंका, 'कंदर्पनिधये नमः' से जननेन्द्रियका, 'प्रीतिमते नमः' से कटिका, 'सौख्यसमुद्राय नमः' से नाभिका, 'रामाय नमः' से उदरका, 'हृदयेशाय नमः' से हृदयका, 'आह्लादकारिणे नमः' से दोनों स्तनोंका, 'उत्कण्ठाय नमः' से कण्ठका, 'आनन्दकारिणे नमः'-से मुखका, 'पुष्पचापाय नमः' से वामाङ्गका, 'पुष्पबाणाय नमः' से दक्षिणाङ्गका, 'मानसाय नमः'-से ललाटका, 'विलोलाय नमः' से केशोंका और 'सर्वात्मने नमः' से देवाधिदेव पुण्डरीकाक्षके सर्वाङ्गका पूजन करना चाहिये। पुनः 'शिवाय नमः', 'शान्ताय नमः', 'पाशाङ्कुशधराय नमः', 'गदिने नमः', 'पीतवस्त्राय नमः', 'शङ्खचक्रधराय नमः', 'नारायणाय नमः', 'कामदेवात्मने नमः' से भगवान् विष्णुकी पूजा करके 'सर्वशान्त्यै नमः', 'प्रीत्यै नमः', 'रत्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'पुष्ट्यै नमः', 'तुष्ट्यै नमः', 'सर्वार्थसम्पदे नमः' से लक्ष्मीका भी पूजन करनेका विधान है। इस प्रकार व्रतिनी नारी चन्दन, पुष्पमाला, धूप और नैवेद्य आदिसे कामदेवस्वरूप देवेश्वर भगवान् विष्णुकी पूजा करे। तत्पश्चात् वह सुडौल अङ्गोंवाले, धर्मज्ञ एवं वेदज्ञ ब्राह्मणको बुलाकर चन्दन, पुष्प आदि पूजन-सामग्रीद्वारा उनकी पूजा करे और घीसे भरे हुए पात्रके साथ एक सेर अगहनी चावल उस ब्राह्मणको दान करे और कहे—'माधव मुझपर प्रसन्न हों।' फिर वह विलासिनी नारी उस द्विजवरको यथेष्ट भोजन करावे॥ ३३—४५॥ |
| एवमादित्यवारेण सर्वमेतत् समाचरेत्।<br>तण्डुलप्रस्थदानं च यावन्मासास्त्रयोदश॥ ४६<br>ततस्त्रयोदशे मासि सम्प्राप्ते तस्य भामिनी।<br>विप्रायोपस्करैर्युक्तां शय्यां दद्यात् विलक्षणाम्॥ ४७<br>सोपधानकविश्रामां सास्तरावरणां शुभाम्।<br>प्रदीपोपानहच्छत्रपादुकासनसंयुताम् ॥ ४८ | इस प्रकार रविवारसे प्रारम्भ करके यह सब कार्य करते रहना चाहिये। एक सेर चावलका दान तो तेरह मासतक करनेका विधान है। तेरहवाँ महीना आनेपर उस स्त्रीको चाहिये कि उपर्युक्त ब्राह्मणको समस्त उपकरणोंसे युक्त एक ऐसी विलक्षण शय्या प्रदान करे, जो गद्दा, चादर और विश्रामहेतु बने हुए तकियेसे युक्त एवं सुन्दर हो तथा उसके साथ दीपक, जूता, छाता, खड़ाऊँ और |
७४ कल्याणसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
२७६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सपत्नीकमलङ्कृत्य हेमसूत्राङ्गुलीयकैः।<br>सूक्ष्मवस्त्रैः सकटकैर्भूरिमाल्यानुलेपनैः ॥ ४९<br>कामदेवं सपत्नीकं गुडकुम्भोपरि स्थितम्।<br>ताम्रपात्रासनगतं हेमनेत्रपटावृतम् ॥ ५०<br>सकांस्यभाजनोपेतमिक्षुदण्डसमन्वितम् ।<br>दद्यादेतेन मन्त्रेण तथैकां गां पयस्विनीम् ॥ ५१<br>यथान्तरं न पश्यामि कामकेशवयोः सदा।<br>तथैव सर्वकामाप्तिरस्तु विष्णो सदा मम ॥ ५२<br>यथा न कमला देहात् प्रयाति तव केशव।<br>तथा ममापि देवेश शरीरं स्वीकुरु प्रभो ॥ ५३<br>तथा च काञ्चनं देवं प्रतिगृह्णन् द्विजोत्तमः।<br>क इदं कस्मादादिति वैदिकं मन्त्रमीरयेत् ॥ ५४<br>ततः प्रदक्षिणीकृत्य विसर्ज्य द्विजपुंगवम्।<br>शय्यासनादिकं सर्वं ब्राह्मणस्य गृहं नयेत् ॥ ५५<br>ततः प्रभृति यो विप्रो रत्यर्थं गृहमागतः।<br>स मान्यः सूर्यवारे च स मन्तव्यो भवेत् तदा ॥ ५६<br>एवं त्रयोदशं यावन्मासमेवं द्विजोत्तमान्।<br>तर्पयेत यथाकामं प्रोषितेऽन्यं समाचरेत् ॥ ५७<br>तदनुज्ञया रूपवान् यावदभ्यागतो भवेत्।<br>आत्मनोऽपि यथाविघ्नं गर्भभूतिकरं प्रियम् ॥ ५८<br>दैवं वा मानुषं वा स्यादनुरागेण वा ततः।<br>साचारानष्टपञ्चाशद् यथाशक्त्या समाचरेत् ॥ ५९<br>एतद्धि कथितं सम्यग् भवतीनां विशेषतः।<br>अधर्मोऽयं ततो न स्याद् वेश्यानामिह सर्वदा ॥ ६०<br>पुरुहूतेन यत् प्रोक्तं दानवीषु पुरा मया।<br>तदिदं साम्प्रतं सर्वं भवतीष्वपि युज्यते ॥ ६१<br>सर्वपापप्रशमनमनन्तफलदायकम् ।<br>कल्याणीनां च कथितं तत् कुरुध्वं वराननाः ॥ ६२<br>करोति याशेषमखण्डमेतत्<br>कल्याणिनी माधवलोकसंस्था ।<br>सा पूजिता देवगणैरशेषै-<br>रानन्दकृत् स्थानमुपैति विष्णोः ॥ ६३ | आसनी भी हो। उस समय उस सपत्नीक ब्राह्मणको महीन वस्त्र, सोनेकी जंजीर, अँगूठी, कड़ा, अधिकाधिक पुष्पमाला और चन्दनसे अलंकृत करके गुड़से भरे हुए कलशके ऊपर स्थापित ताम्रपात्रके आसनपर सपत्नीक कामदेवकी मूर्तिको रख दे, उसे स्वर्णनिर्मित नेत्राच्छादनसे ढक दे। उसके निकट कांसेका पात्र और गन्ना भी रख दे। फिर आगे कहे जानेवाले मन्त्रका उच्चारण करके समग्र उपकरणोंसहित उस मूर्तिका तथा एक दुधारू गौका उस ब्राह्मणको दान करे। (दानका मन्त्र इस प्रकार है—) 'केशव! जिस प्रकार लक्ष्मी आपके शरीरसे विलग होकर कहीं अन्यत्र नहीं जातीं, देवेश्वर प्रभो! उसी प्रकार आप मेरे शरीरको भी स्वीकार कर लें।' स्वर्णमय कामदेवकी मूर्तिको ग्रहण करते समय वे द्विजवर—'कोऽदात् कस्मा अदात् कामोऽदात् कामायादात्' इत्यादि—(वाजस० सं० ७। ४८) इस वैदिक मन्त्रका उच्चारण करें। तदनन्तर वह स्त्री उन द्विजवरकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा करे और शय्या, आसन आदि दानकी सभी वस्तुएँ उनके घर भिजवा दे। इस प्रकार इस दैवकर्मको अनुरागपूर्वक अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक अट्ठावन बार करना चाहिये। विशेषतः तुम्हीं लोगोंके लिये ही मैंने इस व्रतका सम्यक् प्रकारसे वर्णन किया है। ऐसा करनेसे पण्यस्त्रियोंको इस लोकमें कभी अधर्मका भागी नहीं होना पड़ेगा॥ ४६—६०॥<br><br>पूर्वकालमें इन्द्रने दानव-पत्नियोंके प्रति जिस व्रतका वर्णन किया था, वही सब इस समय तुमलोगोंको भी करना उचित है। सुन्दरियो! कल्याणी स्त्रियोंके समस्त पापोंको शान्त करनेवाले एवं अनन्त फलदायक जिस व्रतका मैंने वर्णन किया है, उसका तुमलोग अवश्य पालन करो। जो कल्याणमयी नारी इस व्रतका पूरा-पूरा अखण्डरूपसे पालन करती है, वह भगवान् विष्णुके लोकमें स्थित होती है और अखिल देवगणोंद्वारा पूजित होकर भगवान् विष्णुके आनन्ददायक स्थानको प्राप्त होती है॥ ६१—६३॥ |
* अध्याय ७१ * । २७७
| श्रीभगवानुवाच<br>तपोधनः सोऽप्यभिधाय चैवं<br>तदा च तासां व्रतमङ्गनानाम्।<br>स्वस्थानमेष्यत्यनु वै समस्ताः<br>व्रतं चरिष्यन्ति च वेदद्योने ॥ ६४ ॥ | **श्रीभगवान्ने कहा—**ब्रह्मन्! इस प्रकार तपस्वी दाल्भ्य उन स्त्रियोंसे वाराङ्गनाओंके व्रतका वर्णन करके अपने स्थानको चले जायँगे। उसके पश्चात् वे सभी उस व्रतका अनुष्ठान करेंगी ॥ ६४ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽनङ्गदानव्रतं नाम सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अनङ्गदानव्रत नामक सत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥
इकहत्तरवाँ अध्याय
अशून्यशयन (द्वितीया)-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ब्रह्मोवाच<br>भगवन् पुरुषस्येह स्त्रियाश्च विरहादिकम्।<br>शोकव्याधिभयं दुःखं न भवेद् येन तद् वद ॥ १<br><br>श्रीभगवानुवाच<br>श्रावणस्य द्वितीयायां कृष्णायां मधुसूदनः।<br>क्षीरार्णवे सपत्नीकः सदा वसति केशवः ॥ २<br><br>तस्यां सम्पूज्य गोविन्दं सर्वान् कामान् समश्रुते।<br>गोभूहिरण्यतानादि सप्तकल्पशतानुगम् ॥ ३<br><br>अशून्यशयना नाम द्वितीया सम्प्रकीर्तिता।<br>तस्यां सम्पूजयेद् विष्णुमेभिर्मन्त्रैर्विधानतः ॥ ४<br><br>श्रीवत्सधारिन् श्रीकान्त श्रीधामन् श्रीपतेऽव्यय।<br>गार्हस्थ्यं मा प्रणशं मे यातु धर्मार्थकामदम् ॥ ५<br><br>अग्नयो मा प्रणश्यन्तु देवताः पुरुषोत्तम।<br>पितरो मा प्रणश्यन्तु मास्तु दाम्पत्यभेदनम् ॥ ६ | **ब्रह्माजीने पूछा—**भगवन्! इस लोकमें जिसका अनुष्ठान करनेसे पुरुषको पत्नीवियोग अथवा स्त्रीको पतिवियोग न हो तथा शोक एवं रोगका भय और दुःख न हो, वह व्रत बतलाइये ॥ १ ॥<br><br>**श्रीभगवान्ने कहा—**ब्रह्मन्! श्रावणमासके कृष्ण-पक्षकी द्वितीया तिथिको मधुसूदनभगवान् केशव लक्ष्मीसहित सदा क्षीरसागरमें निवास करते हैं, अतः उस तिथिको जो मनुष्य भगवान् गोविन्दकी पूजा कर सात सौ कल्पोंतक फल देनेवाली गौ, पृथ्वी और सुवर्णका दान करता है, उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। यह द्वितीया अशून्यशयना* नामसे प्रसिद्ध है; इस दिन विधिपूर्वक भगवान् विष्णुका पूजन कर इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंद्वारा प्रार्थना करनी चाहिये—<br>‘लक्ष्मीकान्त! आप श्रीवत्सको धारण करनेवाले, धन-सम्पत्तिके निधि और सौन्दर्यके अधीश्वर हैं। अविनाशी भगवन्! मेरा धर्म, अर्थ और कामको सिद्ध करनेवाला गृहस्थ-आश्रम कभी विनाशको न प्राप्त हो। पुरुषोत्तम! मेरे गृहमें अग्नियों और इष्ट देवताओंका कभी अभाव न हो, मेरे पितरोंका विनाश न हो और दाम्पत्य—पति-पत्नी (रूप-व्यवहार)-में कभी भेद-भाव न उत्पन्न हो। |
* इस व्रतकी विस्तृत विधि वामनपुराणके १६ वें अध्यायमें है। पर यह वहाँ तथा पद्म, भविष्यादिमें कुछ अन्तरसे प्रायः इसी प्रकार निर्दिष्ट है।
७५ विशोकसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
२७८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लक्ष्मा वियुज्यते देव न कदाचिद् यथा भवान्।<br>तथा कलत्रसम्बन्धो देव मा मे वियुज्यताम्॥ ७<br>लक्ष्मा न शून्यं वरद यथा ते शयनं सदा।<br>शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथैव मधुसूदन॥ ८<br>गीतवादित्रनिर्घोषं देवदेवस्य कीर्तयेत्।<br>घण्टा भवेदशक्तस्य सर्ववाद्यमयी यतः॥ ९ | देवाधिदेव! जैसे आप कभी लक्ष्मीसे वियुक्त नहीं होते, उसी प्रकार मेरा भी स्त्री-सम्बन्ध कभी खण्डित न हो। वरदाता मधुसूदन! जिस प्रकार आपकी शय्या कभी लक्ष्मीसे शून्य नहीं रहती, उसी तरह मेरी भी शय्या स्त्रीसे शून्य न हो।' इस प्रकार प्रार्थना कर गाने-बजानेके माङ्गलिक शब्दोंके साथ-साथ देवाधिदेव भगवान् विष्णुके नामोंका कीर्तन करना चाहिये। जो गीत-वाद्यके आयोजनमें असमर्थ हो, उसे घण्टाका शब्द कराना चाहिये; क्योंकि घण्टा समस्त बाजोंके समान माना गया है॥ २-९॥ |
| एवं सम्पूज्य गोविन्दमश्नीयात् तैलवर्जितम्।<br>नक्तमक्षारलवणं यावत् तत् स्याच्चतुष्टयम्॥ १०<br>ततः प्रभाते संजाते लक्ष्मीपतिसमन्विताम्।<br>दीपान्नभाजनैर्युक्तां शय्यां दद्याद् विलक्षणाम्॥ ११<br>पादुकोपानहच्छत्रचामरासनसंयुताम् ।<br>अभीष्टोपस्करैर्युक्तां शुक्लपुष्पाम्बरावृताम्॥ १२<br>सोपधानकविश्रामां फलैर्नानाविधैर्युताम्।<br>तथाऽऽभरणधान्यैश्च यथाशक्त्या समन्विताम्॥ १३<br>अव्यङ्गाङ्गाय विप्राय वैष्णवाय कुटुम्बिने।<br>दातव्या वेदविदुषे भावेनापतिताय च॥ १४<br>तत्रोपवेश्य दाम्पत्यमलं कृत्य विधानतः।<br>पत्न्यास्तु भाजनं दद्याद् भक्ष्यभोज्यसमन्वितम्॥ १५<br>ब्राह्मणस्यापि सौवर्णीमुपस्करसमन्विताम्।<br>प्रतिमां देवदेवस्य सोदकुम्भां निवेदयेत्॥ १६ | इस प्रकार भगवान् गोविन्दकी पूजा करके रातमें एक बार तेल और क्षार नमकसे रहित अन्नका भोजन करे। ऐसा भोजन तबतक करे, जबतक इस व्रतकी चार आवृत्ति न हो जाय (चार मासतक ऐसा ही भोजन करना चाहिये)। तदनन्तर प्रातःकाल होनेपर एक विलक्षण शय्याका भी दान करनेका विधान है। वह शय्या गद्दा, श्वेत चादर और विश्रामोपयोगी तकियेसे सुशोभित हो; उसपर भगवान् लक्ष्मीपतिकी स्वर्णमयी प्रतिमा स्थापित हो; उसके निकट दीपक, अन्नके पात्र, खड़ाऊँ, जूता, छाता, चँवर और आसन रखे गये हों; वह अभीष्ट सामग्रियोंसे युक्त हो, उसपर श्वेत पुष्प बिखेरे गये हों, वह नाना प्रकारके ऋतुफलोंसे सम्पन्न हो तथा अपनी शक्तिके अनुसार आभूषण और अन्न आदिसे समन्वित हो। इस प्रकार वह शय्या ऐसे ब्राह्मणको देनी चाहिये, जिसका कोई अङ्ग विकृत न हो तथा जो विष्णु-भक्त, परिवारवाला, वेदज्ञ और आचरणसे पतित न हो। फिर उस शय्यापर द्विजदम्पतिको बैठाकर विधानके अनुसार उन्हें अलंकृत करे। उस समय पत्नीको भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थोंसे युक्त बर्तन दान करे और ब्राह्मणको सभी उपकरणोंसे युक्त देवाधिदेव विष्णुकी स्वर्णमयी प्रतिमा जलपूर्ण घटके साथ निवेदित करे। (तत्पश्चात् ब्राह्मणको विदा कर व्रत समाप्त करे) ॥ १०-१६॥ |
| एवं यस्तु पुमान् कुर्यादशून्यशयनं हरेः।<br>वित्तशाठ्येन रहितो नारायणपरायणः॥ १७<br>न तस्य पत्न्या विरहः कदाचिदपि जायते।<br>नारी वा विधवा ब्रह्मन् यावच्चन्द्रार्कतारकम्।<br>न विरूपौ न शोकार्तौ दम्पती भवतः क्वचित्॥ १८ | ब्रह्मन्! इस प्रकार जो पुरुष श्रीहरिके अशून्यशयनव्रतका अनुष्ठान करता है, उसे कभी पत्नी-वियोग नहीं होता तथा सधवा अथवा विधवा नारी नारायणपरायण होकर कृपणता छोड़कर इसका अनुष्ठान करती है, वह दम्पति सूर्य-चन्द्रमाके स्थितिपर्यन्त न तो कभी शोकसे दुःखी होते हैं और न उनका रूप ही विकृत होता है। साथ ही |
७६ फलसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ७२ * | २७९ |
|---|
| न पुत्रपशुरत्नानि क्षयं यान्ति पितामह।<br><br>समकल्पसहस्राणि समकल्पशतानि च।<br>कुर्वन्नशून्यशयनं विष्णुलोके महीयते॥ १९॥ | उनके पुत्र, पशु और धन आदिका विनाश नहीं होता। पितामह! अशून्यशयनव्रतका अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य सात हजार सात सौ कल्पोंतक विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ १७-१९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽशून्यशयनव्रतं नामैकसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अशून्यशयनव्रत नामक इकहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७१॥
बहत्तरवाँ अध्याय
अङ्गारक-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— |
|---|---|
| शृणु चान्यद् भविष्यं यद् रूपसम्पत्प्रदायकम्।<br>भविष्यति युगे तस्मिन् द्वापरान्ते पितामह।<br>पिप्पलादस्य संवादो युधिष्ठिरपुरःसरैः॥ १॥<br>वसन्तं नैमिषारण्ये पिप्पलादं महामुनिम्।<br>अभिगम्य तदा चैनं प्रश्नमेकं करिष्यति।<br>युधिष्ठिरो धर्मपुत्रो धर्मयुक्तस्तपोधनम्॥ २॥ | पितामह! अब भविष्यमें घटित होनेवाले एक अन्य व्रतके वृत्तान्तको सुनो, जो सुन्दरता और सम्पत्ति प्रदान करनेवाला है। उसी द्वापरयुगके अन्तमें युधिष्ठिर आदिके साथ महर्षि पिप्पलादका संवाद होगा। उस समय तपस्वी महामुनि पिप्पलादके नैमिषारण्यमें निवास करते समय धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिर उनके निकट जाकर एक प्रश्न करेंगे॥ १-२॥ |
| युधिष्ठिर उवाच | युधिष्ठिर पूछेंगे— |
| कथमारोग्यमैश्वर्यं मतिर्धर्मे गतिस्तथा।<br>अव्यङ्गता शिवे भक्तिर्वैष्णवो वा भवेत् कथम्॥ ३॥ | नीरोगता, ऐश्वर्य, धर्ममें बुद्धि तथा गति, अव्यङ्गता (शरीरके सभी अङ्गोंकी पूर्णता) तथा शिव एवं विष्णुमें अनुपम भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है?॥ ३॥ |
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— |
| तस्योत्तरमिदं ब्रह्मन् पिप्पलादस्य धीमतः।<br>शृणुष्व यद् वक्ष्यति वै धर्मपुत्राय धार्मिकः॥ ४॥ | ब्रह्मन्! (इस विषयमें) उन बुद्धिमान् पिप्पलादका वह उत्तर सुनो, जो वे धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिरसे कहेंगे॥ ४॥ |
| पिप्पलाद उवाच | पिप्पलाद कहेंगे— |
| साधु पृष्टं त्वया भद्र इदानीं कथयामि ते।<br>अङ्गारव्रतमित्येतत् स वक्ष्यति महीपतेः॥ ५॥<br>अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।<br>विरोचनस्य संवादं भार्गवस्य च धीमतः॥ ६॥<br>प्रह्लादस्य सुतं दृष्ट्वा द्विरष्टपरिवत्सरम्।<br>रूपेणाप्रतिमं कान्त्या सोऽहसद् भृगुनन्दनः॥ ७॥<br>साधु साधु महाबाहो विरोचन शिवं तव।<br>तत् तथा हसितं तस्य पप्रच्छ सुरसूदनः॥ ८॥ | भद्र! आपने बड़ी उत्तम बात पूछी है, अब मैं आपको इस अङ्गारक-व्रतको बतला रहा हूँ। यों कहकर वे मुनि राजा युधिष्ठिरसे इस व्रतका (इस प्रकार) वर्णन करेंगे। महाराज युधिष्ठिर! इस विषयमें एक पुरातन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जो विरोचन और बुद्धिमान् शुक्राचार्यके संवाद (रूप)-में है। एक बार प्रह्लादके षोडशवर्षीय पुत्र विरोचनको देखकर, जो अनुपम सौन्दर्यशाली और कान्तिमान् था, भृगुनन्दन शुक्राचार्य हँस पड़े और उससे बोले—'महाबाहु विरोचन! तुम धन्य हो, तुम्हारा कल्याण हो।' उन्हें उस प्रकार हँसते देखकर देवशत्रु विरोचनने |
२८० * मत्स्यपुराण *
| ब्रह्मन् किमर्थमेतत् ते हास्यमाकस्मिकं कृतम्।<br>साधु साध्विति मामेवमुक्तवांस्त्वं वदस्व मे॥ ९<br><br>तमेवंवादिनं शुक्र उवाच वदतां वरः।<br>विस्मयाद् व्रतमाहात्म्याद्धास्यमेतत् कृतं मया॥ १०<br><br>पुरा दक्षविनाशाय कुपितस्य तु शूलिनः।<br>अथ तद्भीमवक्त्रस्य स्वेदबिन्दुर्ललाटजः॥ ११<br><br>भित्त्वा स सप्त पातालाानदहत् सप्त सागरान्।<br>अनेकवक्त्रनयनो ज्वलज्ज्वलनभीषणः॥ १२<br><br>वीरभद्र इति ख्यातः करपादायुतैर्युतः।<br>कृत्वासौ यज्ञमथनं पुनर्भूतलसम्भवः।<br>त्रिजगन्निर्दहन् भूयः शिवेन विनिवारितः॥ १३<br><br>कृतं त्वया वीरभद्र दक्षयज्ञविनाशनम्।<br>इदानीमलमेतेन लोकदाहेन कर्मणा॥ १४<br><br>शान्तिप्रदाता सर्वेषां ग्रहाणां प्रथमो भव।<br>प्रेक्षिष्यन्ते जनाः पूजां करिष्यन्ति वरान्मम॥ १५<br><br>अङ्गारक इति ख्यातिं गमिष्यसि धरात्मज।<br>देवलोकेऽद्वितीयं च तव रूपं भविष्यति॥ १६<br><br>ये च त्वां पूजयिष्यन्ति चतुर्थ्यां त्वद्दिने नराः।<br>रूपमारोग्यमैश्वर्यं तेष्वनन्तं भविष्यति॥ १७<br><br>एवमुक्तस्तदा शान्तिमगमत् कामरूपधृक्।<br>संजातस्तत्क्षणाद् राजन् ग्रहत्वमगमत् पुनः॥ १८<br><br>स कदाचिद् भवांस्तस्य पूजार्घ्यादिकमुत्तमम्।<br>दृष्टवान् क्रियमाणं च शूद्रेण च व्यवस्थितः॥ १९<br><br>तेन त्वं रूपवाञ्जातः सुरशत्रुकुलोद्वह।<br>विविधा च रुचिर्जाता यस्मात् तव विदूरगा॥ २०<br><br>विरोचन इति प्राहुस्तस्मात् त्वां देवदानवाः।<br>शूद्रेण क्रियमाणस्य व्रतस्य तव दर्शनात्।<br>ईदृशीं रूपसम्पत्तिं दृष्ट्वा विस्मितवानहम्॥ २१ | उनसे पूछा—'ब्रह्मन्! आपने किस प्रयोजनसे यह आकस्मिक हास्य किया है और मुझे 'साधु-साधु' (तुम धन्य हो) ऐसा कहा है? इसका कारण मुझे बतलाइये।' इस प्रकार पूछनेपर विरोचनसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ शुक्राचार्यने कहा—'व्रतके माहात्म्यसे आश्चर्यचकित होकर मैंने यह हास्य किया है। (उस प्रसङ्गको सुनो—) पूर्वकालमें दक्ष-यज्ञका विनाश करनेके लिये जब भयंकर मुखवाले त्रिशूलधारी भगवान् शंकर कुपित हो उठे, तब उनके ललाटसे पसीनेकी एक बूँद टपक पड़ी। वह स्वेदबिन्दु अनेकों मुखों, नेत्रों और दस सहस्र हाथ-पैरोंसे युक्त एक पुरुषाकारमें परिणत हो गया। वह प्रज्वलित अग्निके समान भयंकर पुरुष वीरभद्रके नामसे विख्यात हुआ। उसने सातों पातालोंका भेदन कर सातों सागरोंको भस्म कर दिया। पुनः दक्ष-यज्ञका विध्वंस कर वह भूतलपर आ धमका और त्रिलोकीको जला डालनेके लिये उद्यत हुआ। यह देखकर शिवजीने उसे रोक दिया॥ ५—१३॥<br><br>फिर उन्होंने उसे मना करते हुए कहा—'वीरभद्र! तुमने दक्ष-यज्ञका विनाश तो कर ही दिया, अब तुम अपने इस लोक-दहनरूप क्रूर कर्मको बंद कर दो। मेरे वरदानसे तुम सभी ग्रहोंके लिये शान्ति-प्रदायक बनो और सर्वप्रथम स्थान ग्रहण करो। लोग तुम्हारा दर्शन और पूजन करेंगे। पृथ्वीनन्दन! तुम अङ्गारक नामसे ख्याति प्राप्त करोगे और देवलोकमें तुम्हारा अनुपम रूप होगा। जो मनुष्य तुम्हारा जन्मदिन चतुर्थी तिथि आनेपर तुम्हारी पूजा करेंगे उन्हें अनन्त सौंदर्य, नीरोगता और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होगी।' शिवजीद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला वीरभद्र तुरंत शान्त हो गया। राजन्! पुनः उसी क्षण (पृथ्वीसे) उत्पन्न होकर उसने ग्रहका स्थान प्राप्त कर लिया। असुरकुलोद्वह! किसी समय शूद्रद्वारा व्यवस्थितरूपसे की जाती हुई उसकी अर्घ्य आदिसे सम्पन्न श्रेष्ठ पूजाको तुमने देख लिया था, इसी कारण तुम सुन्दररूपसे युक्त होकर पैदा हुए हो और तुम्हारी रुचि—प्रतिभा विभिन्न प्रकारके ज्ञानोंवाली और दूरगामिनी है। इसी कारण देवता और दानव तुम्हें विरोचन नामसे पुकारते हैं। शूद्रद्वारा किये जाते हुए व्रतके दर्शनसे प्राप्त हुई तुम्हारी इस प्रकारकी रूप- |
७७ शर्करासप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ७२ * | २८१ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| साधु साध्विति तेनोक्तमहो माहात्म्यमुत्तमम्।<br>पश्यतोऽपि भवेद् रूपमैश्वर्यं किमु कुर्वतः॥ २२<br>यस्माच्च भक्त्या धरणीसुतस्य<br>विनिन्द्यमानेन गवादिदानम्।<br>आलोकितं तेन सुरारिगर्भै<br>सम्भूतिरेषा तव दैत्य जाता॥ २३ | सम्पत्तिको देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया। इसी कारण मैंने 'साधु-साधु' (तुम धन्य हो) ऐसा कहा है। अहो! यह कैसा उत्तम माहात्म्य है कि जब देखनेवालेको भी ऐसी सुन्दरता और ऐश्वर्यकी प्राप्ति हो जाती है, तब करनेवालेकी तो बात ही क्या है। दितिवंशज! चूँकि तुमने पृथ्वीपुत्र वीरभद्रके व्रतमें भक्तिपूर्वक दिये जाते हुए गो-दान आदि दानोंको अवहेलनापूर्वक देखा था, इसीलिये तुम्हारी उत्पत्ति राक्षस-योनिमें हुई है॥ १४—२३॥ |
| ईश्वर उवाच<br>अथ तद् वचनं श्रुत्वा भार्गवस्य महात्मनः।<br>प्रह्लादनन्दनो वीरः पुनः पप्रच्छ विस्मितः॥ २४ | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! महात्मा शुक्राचार्यके उस वचनको सुनकर प्रह्लाद-नन्दन विरोचनने विस्मय-विमुग्ध हो पुनः प्रश्न किया॥ २४॥ |
| विरोचन उवाच<br>भगवंस्तद् व्रतं सम्यक् श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।<br>दीयमानं तु यद् दानं मया दृष्टं भवान्तरे॥ २५<br>माहात्म्यं च विधिं तस्य यथावद् वक्तुमर्हसि।<br>इति तद्वचनं श्रुत्वा कविः प्रोवाच विस्तरात्॥ २६ | विरोचनने पूछा— भगवन्! जन्मान्तरमें मैंने जिसके दिये जाते हुए दानको देखा था, उस व्रतको भलीभाँति आनुपूर्वी सुनना चाहता हूँ। आप मुझे उसके विधान और माहात्म्यको यथार्थ रूपसे बतलाइये। इस प्रकार विरोचनकी बात सुनकर शुक्राचार्यने विस्तारपूर्वक कहना प्रारम्भ किया॥ २५-२६॥ |
| शुक्र उवाच<br>चतुर्थ्यङ्गारकदिने यदा भवति दानव।<br>मृदा स्नानं तदा कुर्यात् पद्मरागविभूषितः॥ २७<br>अग्निर्मूर्धा दिवो मन्त्रं जपंस्तिष्ठेदूदङ्मुखः।<br>शूद्रस्तूष्णीं स्मरन् भौममास्ते भोगविवर्जितः॥ २८<br>अथास्तमित आदित्ये गोमयेनानुलेपयेत्।<br>प्राङ्गणं पुष्पमालाभिरक्षताभिः समंततः॥ २९<br>अभ्यर्च्यीभिलिखेत् पद्मं कुङ्कुमेनाष्टपत्रकम्।<br>कुङ्कुमस्याप्यभावे तु रक्तचन्दनमिष्यते॥ ३०<br>चत्वारः करकाः कार्या भक्ष्यभोज्यसमन्विताः।<br>तण्डुलै रक्तशालीयैः पद्मरागैश्च संयुताः॥ ३१<br>चतुष्कोणेषु तान् कृत्वा फलानि विविधानि च।<br>गन्धमाल्यादिकं सर्वं तथैव विनिवेशयेत्॥ ३२<br>सुवर्णशृङ्गीं कपिलामथार्च्य<br>रौप्यैः खुरैः कांस्यदुहां सवत्साम्।<br>धुरंधरं रक्तखुरं च सौम्यं<br>धान्यानि समाम्बरसंयुतानि॥ ३३ | शुक्र बोले— दानव! जब मंगलवारको चतुर्थी तिथि पड़ जाय तो उस दिन शरीरमें मिट्टी लगाकर स्नान करे और पद्मरागमणिकी अँगूठी आदि धारण करके उत्तराभिमुख बैठकर 'अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्०—' इस मन्त्रका जप करता रहे। यदि व्रती शूद्र हो तो उसे भोगसे दूर रहकर चुपचाप मंगलका स्मरण करते हुए दिन बिताना चाहिये। फिर सूर्यास्त हो जानेपर आँगनको गोबरसे लीपकर सर्वाङ्गसुन्दर पुष्पमाला आदिसे चारों ओर पूजा कर दे। आँगनके मध्यमें कुङ्कुमसे अष्टदल कमलकी रचना करे। कुङ्कुमका अभाव हो तो लाल चन्दनसे काम चलाना चाहिये। फिर आँगनके चारों कोनोंमें चार करवा स्थापित करे, जिन्हें लाल अगहनीके चावलसे भरकर उनके ऊपर पद्मरागमणि रख दे। वे भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे भी संयुक्त रहें। उनके निकट नाना प्रकारके ऋतुफल, चन्दन, पुष्पमाला आदि सभी पूजन-सामग्री भी प्रस्तुत कर दे। तत्पश्चात् बछड़ेसहित एक कपिला गौका पूजन करे, जिसके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों तथा उसके निकट काँसेकी दोहनी रखी हो। इसी प्रकार लाल खुरोंसे युक्त सौम्य स्वभाववाले हृष्ट-पुष्ट एक वृषभकी भी पूजा करे और उसके निकट |
७८ कमलसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
२८२ * मत्स्यपुराण *
| अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं तथैव सौवर्णमत्यायतबाहुदण्डम् ।<br>चतुर्भुजं हेममये निविष्टं पात्रे गुडस्योपरि सर्पिषा युतम् ॥ ३४ | सात वस्त्रोंसे युक्त धान्यराशि भी प्रस्तुत कर दे। फिर अँगुठेके बराबर लम्बाई-चौड़ाईवाली एक पुरुषाकार मूर्ति बनवाये, जो चार बड़ी भुजाओंसे संयुक्त हो। उसे गुड़के ऊपर रखे हुए स्वर्णमय पात्रमें स्थापित कर दे और उसके निकट घी भी प्रस्तुत कर दे। तत्पश्चात् | | सामस्वरज्ञाय जितेन्द्रियाय पात्राय शीलान्वयसंयुताय ।<br>दातव्यमेतत् सकलं द्विजाय कुटुम्बिने नैव तु दाम्भिकाय ।<br>समर्पयेद् विप्रवराय भक्त्या कृताञ्जलिः पूर्वमुदीर्य मन्त्रम् ॥ ३५ | मूर्तिसहित ये सारी वस्तुएँ ऐसे सुपात्र ब्राह्मणको दान करनी चाहिये, जो सामवेदके स्वर एवं अर्थका ज्ञाता, जितेन्द्रिय, सुशील, कुलीन और विशाल कुटुम्बवाला हो। दाम्भिकको कभी दान नहीं देना चाहिये। उस समय भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर वक्ष्यमाण मन्त्रका उच्चारण करते हुए ऐसे द्विजवरको सारा सामान समर्पित कर दे। | | भूमिपुत्र महातेजः स्वेदोद्भव पिनाकिनः ।<br>रूपार्थी त्वां प्रपन्नोऽहं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥ ३६ | (उस मन्त्रका भाव इस प्रकार है—) 'महातेजस्वी भूमिपुत्र! आप पिनाकधारी भगवान् शिवके स्वेदबिन्दुसे उद्भूत हुए हैं। मैं सौन्दर्यका अभिलाषी होकर आपकी शरणमें आया हूँ। आपको मेरा नमस्कार है। आप मेरे द्वारा दिया हुआ अर्घ्य ग्रहण कीजिये।' | | मन्त्रेणानेन दत्त्वार्घ्यं रक्तचन्दनवारिणा ।<br>ततोऽर्चयेद् विप्रवरं रक्तमाल्याम्बरादिभिः ॥ ३७ | इस मन्त्रके उच्चारणपूर्वक लाल चन्दनमिश्रित जलसे अर्घ्य देनेके पश्चात् लाल पुष्पोंकी माला और लाल रंगके वस्त्र आदि उपकरणोंसे उन द्विजवरकी अर्चना करे और | | दद्यात् तेनैव मन्त्रेण भौमं गोमिथुनान्वितम् ।<br>शय्यां च शक्तितो दद्यात् सर्वोपस्करसंयुताम् ॥ ३८ | इसी मन्त्रको पढ़कर गौ एवं वृषभसहित मङ्गलकी स्वर्णमयी मूर्तिको उन्हें दान कर दे। उस समय अपनी शक्तिके अनुसार समस्त उपकरणोंसे युक्त शय्याका भी दान करना चाहिये। | | यद् यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे ।<br>तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षय्यमिच्छता ॥ ३९ | साथ ही दाताको लोकमें जो-जो वस्तुएँ अधिक इष्ट हों तथा अपने घरमें भी जो अधिक प्रिय हों, उन सबको अक्षय्यरूपमें प्राप्त करनेकी अभिलाषासे गुणवान् (ब्राह्मण)-को देना चाहिये। | | प्रदक्षिणं ततः कृत्वा विसर्ज्य द्विजपुङ्गवम् ।<br>नक्तमक्षारलवणमश्नीयाद् घृतसंयुतम् ॥ ४० | तदनन्तर उन द्विजश्रेष्ठकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा कर दे तथा स्वयं रातमें एक बार क्षारनमकरहित एवं घृतयुक्त अन्नका भोजन करे। | | भक्त्या यस्तु पुनः कुर्याद्देवमङ्गारकाष्टकम् ।<br>चतुरो वाथवा तस्य यत् पुण्यं तद् वदामि ते ॥ ४१ | इस प्रकार जो मनुष्य भक्तिपूर्वक पुनः इस अङ्गारक-व्रतका आठ अथवा चार बार अनुष्ठान करता है, उसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। | | रूपसौभाग्यसम्पन्नः पुनर्जन्मनि जन्मनि ।<br>विष्णौ वाथ शिवे भक्तः सप्तद्वीपाधिपो भवेत् ॥ ४२ | वह मनुष्य प्रत्येक जन्ममें सुन्दरता और सौभाग्यसे सम्पन्न होकर विष्णु अथवा शिवकी भक्तिमें लीन होता है और सातों द्वीपोंका अधीश्वर हो जाता है | | सप्तकल्पसहस्त्राणि रुद्रलोके महीयते ।<br>तस्मात् त्वमपि दैत्येन्द्र व्रतमेतत् समाचर ॥ ४३ | तथा सात हजार कल्पोंतक रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसलिये दैत्येन्द्र! तुम भी इस व्रतका अनुष्ठान करो॥ २७—४३॥ | | पिप्पलाद उवाच | पिप्पलादने कहा— | | इत्येवमुक्त्वा भृगुनन्दनोऽपि<br>जगाम दैत्यश्च चकार सर्वम् । | राजन्! इस प्रकार व्रतका विधान बतलाकर शुक्राचार्य चले गये। तत्पश्चात् दैत्य विरोचनने पूरी विधिके साथ उस व्रतका अनुष्ठान किया। |
७९ मन्दारसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ७३ * | २८३ |
|---|
| त्वं चापि राजन् कुरु सर्वमेतद्<br>यतोऽक्षयं वेदविदो वदन्ति ॥ ४४ | इसलिये आप भी इन सारे विधानोंके साथ इस व्रतका अनुष्ठान कीजिये; क्योंकि वेदवेत्तालोग इसका फल अक्षय बतलाते हैं ॥ ४४ ॥ |
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! तब अद्भुत पराक्रमपूर्ण कर्मोंको करनेवाले युधिष्ठिरने 'तथेति—ऐसा ही करूँगा'—कहकर महर्षि पिप्पलादकी विधिवत् पूजा की और उनके वचनोंका पालन किया। जो मनुष्य अनन्यचित्तसे इस व्रत-विधानका श्रवण करता है, भगवान् उसकी सिद्धिका भी विधान करते हैं ॥ ४५ ॥ |
| तथेति सम्पूज्य स पिप्पलादं<br>वाक्यं चकाराद्भुतवीर्यकर्मा।<br>शृणोति यश्चैनमनन्यचेता-<br>स्तस्यापि सिद्धिं भगवान् विधत्ते ॥ ४५ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽङ्गारकव्रतं नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अङ्गारकव्रत नामक बहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥
तिहत्तरवाँ अध्याय
शुक्र और गुरुकी पूजा-विधि
| पिप्पलाद उवाच | पिप्पलादने कहा— |
|---|---|
| अथातः शृणु भूपाल प्रतिशुक्रं प्रशान्तये।<br>यात्रारम्भेऽवसाने च तथा शुक्रोदये त्विह ॥ १ | भूपाल! अब मैं विपरीत शुक्रकी* शान्तिके लिये विधान बतला रहा हूँ, सुनिये। इस लोकमें शुक्रके उदयकालमें यात्राके आरम्भ अथवा समाप्तिके अवसरपर शुक्रकी एक चाँदीकी मूर्ति बनवाये, उसे श्वेत मुक्ताफल (मोती)-के साथ श्वेत चावलसे परिपूर्ण सुवर्ण, चाँदी अथवा काँसेके पात्रके ऊपर स्थापित करके श्वेत पुष्प और श्वेत वस्त्रसे आच्छादित कर दे। फिर इस वक्ष्यमाण मन्त्रका उच्चारण कर वह सारा सामान सामवेदके ज्ञाता (सस्वर गान करनेवाले) ब्राह्मणको निवेदित कर दे। (वह मन्त्र इस प्रकार है—) 'सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर! आपको नमस्कार है। भृगुनन्दन! आपको प्रणाम है। कवे! मैं आपको अभिवादन करता हूँ। आप मेरी समस्त कामनाओंकी पूर्तिके लिये यह अर्घ्य ग्रहण करें।' भारत! जो मनुष्य शुक्रके विपरीत रहनेपर यात्रा आदि कार्योंमें इस प्रकार विधान करता है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और अन्तमें |
| राजते वाथ सौवर्णे कांस्यपात्रेऽथवा पुनः।<br>शुक्लपुष्पाम्बरयुते सिततण्डुलपूरिते ॥ २ | |
| विधाय रजतं शुक्रं शुचिमुक्ताफलान्वितम्।<br>मन्त्रेणानेन तत् सर्वं सामगाय निवेदयेत् ॥ ३ | |
| नमस्ते सर्वलोकेश नमस्ते भृगुनन्दन।<br>कवे सर्वार्थसिद्धयर्थं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥ ४ | |
| एवमस्योदये कुर्वन् यात्रादिषु च भारत।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोके महीयते ॥ ५ |
* ज्योतिषप्रकाश, रत्नमाला, गर्गसंहिता आदिमें शुक्रके सामने यात्रा अत्यन्त हानिकर कही गयी है। ज्योतिर्निबन्ध आदिमें प्रतिकूल शुक्र-शान्तिके लिये कई श्रेष्ठ स्तोत्र तथा 'रेवतीसे कृतिका'-तकमें उन्हें अन्धा बतलाकर यात्रा-विधान निर्दिष्ट है। वहाँ 'मत्स्यपुराण' के ही नामसे—'चतुःशालं चतुर्द्वारम्' आदि श्लोकको उद्धृत कर चार दरवाजेके मकानोंमें शुक्रदोष नहीं माना गया है। सम्भवतः वे श्लोक पहले मत्स्यपुराणमें यहाँ प्राप्त थे। ज्योतिर्निबन्धकी विषयवस्तु इससे बहुधा मिलती है। वहाँ १०वें श्लोकमें इसी प्रकार अर्घ्यदानकी बात आयी है।
२८४ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| यावच्छुक्रस्य न कृता पूजा संमाल्यकैः शुभैः।<br>वटकैः पूरिकाभिश्च गोधूमैश्चणकैरपि।<br>तावदन्नं न चाश्नीयात् त्रिभिः कामार्थसिद्धये ॥ ६<br><br>तद्वद् वाचस्पतेः पूजां प्रवक्ष्यामि युधिष्ठिर।<br>सुवर्णपात्रे सौवर्णममरेशपुरोहितम् ॥ ७<br><br>पीतपुष्पाम्बरयुतं कृत्वा स्नात्वाथ सर्षपैः।<br>पलाशाश्वत्थयोगेन पञ्चगव्यजलेन च॥ ८<br><br>पीताङ्गरागवसनो घृतहोमं तु कारयेत्।<br>प्रणम्य च गवा सार्धं ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ ९<br><br>नमस्तेऽङ्गिरसां नाथ वाक्पते च बृहस्पते।<br>क्रूरग्रहैः पीडितानाममृताय नमो नमः॥ १०<br><br>संक्रान्तावस्य कौन्तेय यात्रास्वभ्युदयेषु च।<br>कुर्वन् बृहस्पतेः पूजां सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ ११ | विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। शुक्रकी वह पूजा जबतक माङ्गलिक पुष्पमाला, बड़ा, पूरी, गेहूँ और चनाद्वारा सम्पन्न न कर ली जाय, तबतक धर्म, अर्थ और कामकी अभिलाषा रखनेवाले व्रतीको अपनी मनोरथ-सिद्धिके लिये भोजन नहीं करना चाहिये॥ १—६॥<br><br>युधिष्ठिर ! इसी प्रकार मैं बृहस्पतिकी भी पूजा-विधि बतला रहा हूँ। व्रतीको चाहिये कि वह सरसों, पलाश, पीपल और पञ्चगव्यसे युक्त जलसे स्नान करे, पीला वस्त्र पहनकर शरीरमें पीला अङ्गराग, चन्दन आदिका अनुलेप करे और ब्राह्मणद्वारा घीका हवन करावे। तत्पश्चात् मूर्तिको प्रणाम करके गौसहित उसे ब्राह्मणको दान कर दे। (उस समय ऐसी प्रार्थना करे—) 'वाणीके अधीश्वर ! आप अङ्गिरा-वंशियोंके स्वामी हैं। बृहस्पते ! क्रूर ग्रहोंसे पीड़ित प्राणियोंके लिये आप अमृततुल्य फलदाता हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है।' कुन्तीनन्दन ! सूर्यकी संक्रान्तिके दिन, यात्राओंमें तथा अन्यान्य आभ्युदयिक कार्योंके अवसरपर बृहस्पतिकी पूजा करनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ७—११॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे गुरुशुक्रपूजाविधिर्नाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शुक्र-गुरु-पूजाविधि नामक तिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७३॥
चौहत्तरवाँ अध्याय
कल्याणसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| ब्रह्मोवाच<br>भगवन् भवसंसारसागरोत्तारकारक।<br>किञ्चिद् व्रतं समाचक्ष्व स्वर्गारोग्यसुखप्रदम् ॥ १<br><br>ईश्वर उवाच<br>सौरं धर्मं प्रवक्ष्यामि नाम्ना कल्याणसप्तमीम्।<br>विशोकसप्तमीं तद्वत् फलाढ्यां पापनाशिनीम् ॥ २<br><br>शर्करासप्तमीं पुण्यां तथा कमलसप्तमीम्।<br>मन्दारसप्तमीं तद्वच्छुभदां शुभसप्तमीम् ॥ ३ | **ब्रह्माने पूछा—**भगवन् ! आप तो भवसागररूपी संसारसे उद्धार करनेवाले हैं, अतः कोई ऐसा व्रत बताइये जो स्वर्ग, नीरोगता और सुखका प्रदाता हो ॥ १ ॥<br><br>**ईश्वरने कहा—**ब्रह्मन् ! अब मैं सूर्यसे सम्बन्धित धर्म (व्रत)-का वर्णन कर रहा हूँ, जो लोकमें कल्याणसप्तमी, विशोकसप्तमी, पापनाशिनी फलसप्तमी, पुण्यदायिनी शर्करासप्तमी, कमलसप्तमी, मन्दारसप्तमी तथा मङ्गलप्रदायिनी शुभसप्तमीके नामसे प्रसिद्ध है। |
८० शुभसप्तमी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| * अध्याय ७४ * | २८५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सर्वानन्तफलाः प्रोक्ताः सर्वा देवर्षिपूजिताः।<br>विधानमासां वक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः॥ ४ | ये सभी सप्तमियाँ* देवर्षियोंद्वारा पूजित हैं तथा अनन्त फल देनेवाली कही गयी हैं। मैं इनके विधानको आनुपूर्वी यथार्थरूपसे वर्णन कर रहा हूँ॥२-४॥ |
| यदा तु शुक्लसप्तम्यादादित्यस्य दिनं भवेत्।<br>सा तु कल्याणिनी नाम विजया च निगद्यते ॥ ५<br><br>प्रातर्गव्येन पयसा स्नानमस्यां समाचरेत्।<br>ततः शुक्लाम्बरः पद्ममक्षताभिः प्रकल्पयेत्॥ ६<br><br>प्राङ्मुखोऽष्टदलं मध्ये तद्वद् वृत्तां च कर्णिकाम्।<br>पुष्पाक्षतैश्च देवेशं विन्यसेत् सर्वतः क्रमात्॥ ७<br><br>पूर्वेण तपनायेति मार्तण्डायेति चानले।<br>याम्ये दिवाकरायेति विधात्र इति नैर्ऋते ॥ ८<br><br>पश्चिमे वरुणायेति भास्करायेति चानिले।<br>सौम्ये विकर्तनायेति रवये चाष्टमे दले॥ ९<br><br>आदावन्ते च मध्ये च नमोऽस्तु परमात्मने।<br>मन्त्रैरेभिः समभ्यर्च्य नमस्कारान्तदीपितैः ॥ १०<br><br>शुक्लवस्त्रैः फलैर्भक्ष्यैर्धूपमाल्यानुलेपनैः।<br>स्थण्डिले पूजयेद् भक्त्या गुडेन लवणेन च॥ ११<br><br>ततो व्याहृतिमन्त्रेण विसृजे द्विजपुङ्गवान्।<br>शक्तितः पूजयेद् भक्त्या गुडक्षीरघृतादिभिः।<br>तिलपात्रं हिरण्यं च ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ १२<br><br>एवं नियमकृत् सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः।<br>कृतस्नानजपो विप्रैः सहैव घृतपायसम्॥ १३<br><br>भुक्त्वा च वेदविदुषे विडालव्रतवर्जिते।<br>घृतपात्रं सकनकं सोदकुम्भं निवेदयेत्॥ १४<br><br>प्रीयतामत्र भगवान् परमात्मा दिवाकरः।<br>अनेन विधिना सर्वं मासि मासि व्रतं चरेत् ॥ १५<br><br>ततस्त्रयोदशे मासि गा वै दद्यात् त्रयोदश।<br>वस्त्रालङ्कारसंयुक्ताः सुवर्णास्याः पयस्विनीः ॥ १६<br><br>एकामपि प्रदद्याद् वा वित्तहीनो विमत्सरः।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत यतो मोहात् पतत्यधः ॥ १७ | जब शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको रविवार पड़ जाय तो उस सप्तमीको कल्याणिनी (नामसे) कहा जाता है। उसीका दूसरा नाम विजया भी है। व्रतीको चाहिये कि वह उस दिन प्रातःकाल उठकर गोदुग्धयुक्त जलसे स्नान करनेके पश्चात् श्वेत वस्त्र धारण करे। फिर पूर्वाभिमुख हो चावलोंद्वारा अष्टदल कमल बनावे। उसके मध्यभागमें उसी आकारवाली कर्णिकाकी भी रचना करे। तत्पश्चात् पुष्प और अक्षतद्वारा क्रमशः सब ओर देवेश्वर सूर्यकी स्थापना करते हुए इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—'तपनाय नमः' से पूर्वदलपर, 'मार्तण्डाय नमः' से अग्निकोणस्थित दलपर, 'दिवाकराय नमः' से दक्षिणदलपर, 'विधात्रे नमः' से नैर्ऋत्यकोणके दलपर, 'वरुणाय नमः' से पश्चिमदलपर, 'भास्कराय नमः' से वायव्यकोणवाले दलपर, 'विकर्तनाय नमः' से उत्तरदलपर, 'रवये नमः' से ईशानकोणस्थित आठवें दलपर और 'परमात्मने नमः' से आदि, मध्य और अन्तमें सूर्यका आवाहन करके स्थापित कर दे। फिर नमस्कारान्तसे सुशोभित इन मन्त्रोंका उच्चारण कर श्वेत वस्त्र, फल, नैवेद्य, धूप, पुष्पमाला और चन्दनसे भलीभाँति पूजन करे। वेदीपर भी व्याहृति-मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक गुड़ और नमकसे भक्तिपूर्वक पूजा करनेका विधान है। इसके बाद विसर्जन करना चाहिये। फिर अपनी शक्तिके अनुसार भक्तिपूर्वक गुड़, दूध और घी आदिके द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करे और तिलसे भरा हुआ पात्र और सुवर्ण ब्राह्मणको दान कर दे। इस प्रकार विधानको पूरा करके व्रती मानव रात्रिमें शयन करे और प्रातःकाल उठकर स्नान-जप आदि नित्यकर्म पूरा करे। तत्पश्चात् उन ब्राह्मणोंके साथ ही घी और दूधसे बने हुए पदार्थोंका भोजन करे। अन्तमें विडालव्रत (छल-कपट)-से रहित वेदज्ञ ब्राह्मणको सुवर्णसहित घृतपूर्ण पात्र और जलसे भरा हुआ घट दान कर दे और उस समय इस प्रकार कहे—'मेरे इस व्रतसे परमात्मा भगवान् सूर्य प्रसन्न हों।' इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सभी व्रतोंका अनुष्ठान करना चाहिये। तदनन्तर तेरहवाँ महीना आनेपर तेरह गौ दान करनेका विधान है, जो सभी दुधारू हों, वस्त्र और अलंकार आदिसे सुसज्जित हों और जिनके मुखपर सोनेका पत्र लगा हुआ हो। यदि व्रती निर्धन हो तो वह अलंकाररहित होकर एक ही गौका दान करे, किंतु कृपणता न करे; क्योंकि मोहवश कंजूसी करनेसे अधःपतन हो जाता है॥५-१७॥ |
* प्रायः ये सभी सप्तमियाँ भविष्यपुराणमें अन्य कई अधिक सप्तमीव्रतोंके साथ उपदिष्ट हैं।
८१ विशोकद्वादशी-व्रतकी विधि
| २८६ | * मत्स्यपुराण * |
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| अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् कल्याणसप्तमीम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सूर्यलोके महीयते।<br>आयुरायोग्यमैश्वर्यमनन्तमिह जायते॥ १८<br>सर्वपापहरा नित्यं सर्वदैवतपूजिता।<br>सर्वदुष्टोपशमनी सदा कल्याणसप्तमी ॥ १९<br>इमामनन्तफलदां यस्तु कल्याणसप्तमीम्।<br>शृणोति पठते चेह सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २० | जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार इस कल्याणसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस लोकमें भी उसे अनन्त आयु, आरोग्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है; क्योंकि यह कल्याणसप्तमी सदा समस्त पापोंको हरनेवाली और सम्पूर्ण दुष्ट ग्रहोंका शमन करनेवाली है। सभी देवता नित्य इसकी पूजा करते हैं। जो मानव इस लोकमें इस अनन्त फलप्रदायिनी कल्याणसप्तमीकी चर्चा—कथाको सुनता अथवा पढ़ता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १८—२०॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कल्याणसप्तमीव्रतं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कल्याणसप्तमीव्रत नामक चौहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७४ ॥
पचहत्तरवाँ अध्याय
विशोकसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br>विशोकसप्तमीं तद्वद् वक्ष्यामि मुनिपुङ्गव।<br>यामुपोष्य नरः शोकं न कदाचिदिहाश्नुते॥ १<br>माघे कृष्णातिलैः स्नात्वा षष्ठ्यां वै शुक्लपक्षतः।<br>कृताहारः कृसरया दन्तधावनपूर्वकम्।<br>उपवासव्रतं कृत्वा ब्रह्मचारी भवेन्निशि॥ २<br>ततः प्रभात उत्थाय कृतस्नानजपः शुचिः।<br>कृत्वा तु काञ्चनं पद्ममर्कायेति च पूजयेत्।<br>करवीरेण रक्तेन रक्तवस्त्रयुगेन च॥ ३<br>यथा विशोकं भुवनं त्वयैवादित्य सर्वदा।<br>तथा विशोकता मेऽस्तु त्वद्भक्तिः प्रतिजन्म च॥ ४<br>एवं सम्पूज्य षष्ठ्यां तु भक्त्या सम्पूजयेद् द्विजान्।<br>सुप्त्वा सम्प्राश्य गोमूत्रमुत्थाय कृतनैत्यकः॥ ५<br>सम्पूज्य विप्रानन्नेन गुडपात्रसमन्वितम्।<br>तद्वस्त्रयुग्मं पद्मं च ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ ६ | ईश्वरने कहा—मुनिपुङ्गव! अब मैं उसी प्रकार विशोकसप्तमीव्रतका वर्णन कर रहा हूँ। जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य इस लोकमें कभी शोकको नहीं प्राप्त होता। व्रतीको चाहिये कि वह माघमासमें शुक्लपक्षकी षष्ठी तिथिको दातूनसे दाँतोंको साफ करनेके बाद काले तिलमिश्रित जलसे स्नान करे और (तिल-चावलकी) खिचड़ीका भोजन करे। फिर उपवासका व्रत लेकर ब्रह्मचर्यपूर्वक रातमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर स्नान, जप आदि नित्यकर्म करके पवित्र हो ले, फिर स्वनिर्मित कमलको स्थापित कर 'अर्काय नमः'—इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए लाल कनेरके पुष्प और दो लाल रंगके वस्त्रोंद्वारा सूर्यकी पूजा करे और ऐसा कहे—'आदित्य! जैसे आपके द्वारा यह सारा जगत् सदा शोकरहित बना रहता है, उसी प्रकार मुझे भी प्रत्येक जन्ममें विशोकता और आपकी भक्ति प्राप्त हो।' इस प्रकार षष्ठी तिथिको भगवान् सूर्यकी पूजा कर ब्राह्मणोंका भी भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये। फिर रात्रिमें गोमूत्रका प्राशन कर शयन करे और प्रातःकाल उठकर नित्यकर्मसे निवृत्त हो जाय। तत्पश्चात् अन्नद्वारा ब्राह्मणोंका पूजन करके दो वस्त्र और गुड़पूर्ण पात्रसहित वह स्वर्णमय कमल ब्राह्मणको निवेदित कर दे। |