भारतकोश
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मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

३१६ मीमांसादर्शनम् [ सू० परिच्छेदप्रदर्शनार्थं तत्रेति भाष्यं तत्प्रदर्शनासमर्थत्वेनाक्षिपति —तत्रेति । तत्रेतरेतराश्रयेऽ- न्यतः परिच्छेदस्य प्रतिज्ञातत्वात् स्फुटमत्यन्तव्यतिरिक्तं हेत्वन्तरं वाच्यम् । भाष्यकार- स्त्वेवमुक्त्वा तयोरेव श्रुतिस्मृत्योर्धर्ममेकं श्रुतिप्रामाण्यपरिच्छेदे क्लृप्तमूलत्वम्, स्मृतिप्रामाण्य- परिच्छेदे चैकं कल्प्यमूलत्वं हेतुमिह किं प्रमाणं किमप्रमाणमिति परिच्छेदवेलायामुक्तवा- नित्यर्थः । (श्रुतेः क्लृप्तमूलत्वम्, स्मृतेः कल्प्यमूलत्वं धर्ममुक्तवान् । न च सधर्मिणोऽन्यो धर्मधर्मिणोरभेदात् तेन नान्यतः परिच्छेदोऽयमित्याशयः) द्वितीयव्याख्याने तु श्रुतिप्रामाण्य- गतेतरेतराश्रयस्य सुपरिहरत्वपरिच्छेदे हेतुं क्लृप्तमूलत्वम् स्मृतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रयस्य दुष्परिहरत्वपरिच्छेदे कल्प्यमूलत्वम्, इह किं सुपरिहरं किं दुष्परिहरमिति परिच्छेद- वेलायामित्यर्थः । समाधत्ते —नैवेति । श्रुतिस्मृत्योर्विपरीतार्थत्वकृतमितरेतरविरोधित्वमितरेतराश्रयत्वं तु श्रुतिस्मृतिप्रामाण्याप्रामाण्ययोः स्वरूपकृतं समाहितं भाष्यं व्याचष्टे—स्वत इति । स्मृतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रयस्य दुष्परिहरत्वपरिच्छेदे कल्प्यमूलत्वस्य हेतुत्वमुपपादयति— ततश्चेति । नन्वात्मलाभाय स्मृतेर्मूलप्रमाणापेक्षत्वेऽप्यर्थप्रतिपादने निरपेक्षतया पुरुषवाक्य- वत्स्वतः प्रमाणत्वेन श्रुत्यप्रामाण्यानपेक्षत्वात्तत्परिग्रहपक्षे वैकल्पिकशास्त्रान्तरवच्छ्रुत्य- प्रामाण्याध्याहारारोपेऽपीतरेतराश्रयानापत्तिरित्याशङ्क्याह-न चेति । न तुल्यबलयोर्विकल्पः सम्भवतीत्याशयः । दृष्टान्तेनैतदेवोपपादयति — बलवन्तन्निति । स्मृतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रयस्य दुष्परिहरत्व- मुपसंहरति—एवं तावदिति । श्रुतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रयस्य सुपरिहरत्वपरिच्छेदे क्लृप्त- मूलत्वस्य हेतुत्वमुपपादयति—यदा त्विति । तदा पूर्वसिद्धस्मृतिप्रामाण्यलिप्सायां पूर्वानु- भवपारतन्त्र्यलक्षणस्मृतिस्वरूपाश्रयमप्रमाणत्वमादितः सिद्धमेव प्राप्य श्रुतिः प्रामाण्यमश्नुत- इत्यन्वयः । श्रुतेः स्वतः प्रामाण्यात्स्मृतिप्रामाण्यलिप्सानुपपत्तिमाशङ्क्य, तत्रापि श्रुतावपि निरपवादप्रामाण्यावधारणसिद्धेः—पराधीनत्वादित्युक्तम् । किं तत्परमित्यपेक्षिते—प्रति- पक्षेत्याद्युक्तम् । पर्यालोचनापेक्षानिवृत्त्यर्थं क्षणमात्रमपीत्युक्तम् उपसंहरति—तेनेति । अननुमितावस्थायामित्यनेनाद्ये पदक इति व्याख्यातम् । क्लृप्तकल्प्यमूलस्यान्यतः परिच्छेदहेतुत्वप्रतिपादनार्थत्वेन सोऽसाविति भाष्यं व्याचष्टे— इतीति । सर्वमेव वा ततश्चेत्याद्येतद्भाष्यव्याख्यानार्थं ततः क्लृप्तकल्प्यमूलत्वादुक्तेन प्रकारेणान्यतः परिच्छेद इत्यर्थः । उक्तमेव प्रकारं कल्प्यमूलत्वादित्यादिभाष्यारूढं कर्तुं संक्षिप्य यथाक्रमं दर्शयति—तेनेति । उक्तेन प्रकारेणैकत्र स्मृतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रये श्रुतेराद्यस्य स्वतः सिद्धस्य प्रामाण्यस्यापवादासम्भवेनापेक्षितश्रुत्यप्रामाण्यालाभाद् दुष्परि- हरत्वावसानं परिच्छेदो भवति । अवसीयत इति भावे लकारः । अन्यत्र श्रुतिप्रामाण्यगते- तरेतराश्रये स्मृत्यप्रामाण्यस्यापेक्षितस्य लाभात्सुपरिहरत्वस्यावसानमित्यर्थः । नन्वेवं सत्यपेक्षितस्मृत्यप्रामाण्यलाभमात्रेण श्रुतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रयस्य सुपरिहरत्वपरिच्छेदसिद्धेः किमर्थं भाष्यकृताऽनुपूर्वी दर्शितेत्याशङ्क्याह—कृत्वेति । अपेक्षितलाभालाभोपपादनार्थं-

३ ] .प्रथमाध्याये तृतीयपादः ३१७ मुभयत्राप्यानुपूर्वी दर्शनीयेत्याशयः । श्रुतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रयपरिहारायापेक्षितो यः स्मृत्यप्रामाण्यरूपोऽर्थः, तमाद्ये क्षणे दृढसिद्धत्वेनावधिं कृत्वा विरोधे स्मृत्यप्रामाण्याच्छ्र- त्यबाधः । श्रुत्यबाधाच्च तद्विरोधे स्मृतिमूलश्रुतिकल्पनानुपपत्तिर्यावत्तावद्गच्छेत्तावता ह्यपरश्रुतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रयपरिहारसाध्यः श्रुतिप्रामाण्यरूपोऽर्थः सिद्धयति । तथा स्मृतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रयस्यापरिहार्यतयापेक्षितो यः श्रुतिप्रामाण्यरूपोऽर्थः तमाद्ये क्षणे दृढसिद्धत्वेनावधिं कृत्वा विरोधे श्रुतिप्रामाण्यात् स्मृतिमूलश्रुत्यकल्पनम्, तदकल्पनाच्च स्मृतेर्भ्रान्त्यादिमूलत्वकल्पनं यावत्तावद् गच्छेत् तावता ह्यपरः स्मृतिप्रामाण्यगतेतरेतराश्रया- परिहार्यत्वसाध्यः स्मृत्यप्रामाण्यरूपोऽर्थः सिद्धयतीत्यर्थः । ननु भाष्यकृतैकविधानुपूर्विकथनादानुपूर्वीद्वयाभिधानं भाष्यव्याख्यानानुपयोगित्वाद- नर्थकं स्यादित्याशङ्कयाह—तदेकेनेति । उपलक्षणार्थमेकानुपूर्विकथनमित्याशयः । कीदृशी तर्हि द्वितीयानुपूर्वी दर्शनीयेत्यपेक्षायामाह—द्वितीयेति । स्वयं पूर्वोक्तस्याप्यस्य मार्गस्य भाष्योक्तापेक्षया द्वितीयत्वम् । नन्वित्याशङ्कापूर्वकं तुल्यबलविकल्पोपपत्तिप्रतिपादनार्थं भाष्यं व्याचष्टे—व्रीहीति । तस्माद्युक्तमिति सूत्रार्थोपसंहारभाष्यं व्याचष्टे—अत इति । ॥ इति वार्तिकव्याख्यायां सर्वानवद्याकारिण्यां द्वितीयं विरोधाधिकरणम् ॥ ३ ॥ भा० प्र०—पूर्वं अधिकरण में स्मृति का प्रामाण्य प्रतिष्ठापित किया गया है । प्रकृतमें यह विचारणीय है कि श्रुतिविरुद्ध स्मृति प्रमाण है या नहीं ? जैसे "औदुम्बरवृक्ष से निर्मित स्थूणा = स्तम्भ का समग्रभाव से वेष्टन करना चाहिए" यह स्मृति वाक्य "औ- दुम्बरीं स्पृष्ट्वा उद्गायेत्" अर्थात् उदुम्बर निर्मित स्तम्भ का स्पर्शंकर उद्गाता गान करे इस श्रुति वाक्य से विरुद्ध है । क्योंकि, स्मृति के अनुसार सम्पूर्ण का वस्त्र के द्वारा वेष्टन करने पर उनका स्पर्श सम्भव नहीं है अर्थात् स्तम्भ के साथ त्वचा का संयोग सम्भव नहीं है । इसी प्रकार "अष्टाचत्वारिंशद् वर्षाणि वेदब्रह्मचर्यं चरेत्" अड़तालीस वर्ष तक वेद के अध्ययन के लिए ब्रह्मचर्यंका अवलम्बन करे, यह स्मृतिवाक्य "जातपुत्रः कृष्णकेशः अग्नीनादधीत" अर्थात् जिसको पुत्र हो गया है ऐसा व्यक्ति कृष्णकेश की अवस्था में ही अर्थात् केशपकने से पूर्व ही अग्नि का आधान करे, इस श्रुतिवाक्य का विरोध है, कारण, अडतालीस वर्ष तक ब्रह्मचर्यं का पालनकर इसके बाद दश वर्ष से कम वर्ष की कन्याके साथ पाणिग्रहणपूर्वकं पुत्रकी उत्पत्ति पर्यन्त अपेक्षाकरने से पूर्व ही उसका केश पक जायगा, अतः बाल पकने से पूर्व अग्नि का आधान सम्भव नहीं है । इस प्रकार उपलभ्यमान श्रुति के विरुद्ध स्मृतियाँ प्रमाण है या अप्रामाण्य है पूर्व अधिकरण में उल्लिखित युक्ति के अनुसार श्रुति के समान स्मृति भी जब प्रमाण है, तब स्मृति के अप्रमाण होने की आशङ्का उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर सभी स्मृतियों का ही अप्रामाण्य प्राप्त होगा । अतः परस्पर विरुद्ध श्रुति वाक्यों में जिस प्रकार विकल्प का आश्रयण कर दोनों का ही प्रामाण्य माना जाता है, प्रकृत में भी ऐसी स्थिति में उसी के समान परस्पर विरुद्ध श्रुति और स्मृति में भी वैसा ही विकल्प मानना उचित है ।

३१८ मीमांसादर्शनम् [ सू० विकल्प दो प्रकार का होता है—(१) इच्छा विकल्प (२) व्यवस्थित विकल्प । जिस स्थल में कर्ता अपनी इच्छा के अनुसार शास्त्र में उल्लिखित एक से अधिक पदार्थों में जिस किसी पक्ष का इच्छा से अनुसरण कर सकता है—वह इच्छा विकल्प है । जैसे—'व्रीहिभिर्यजेत यवैर्वा यजेत' अर्थात् व्रीहि के द्वारा याग करे या यव के द्वारा याग करे । इस स्थल में कर्ता का स्वातन्त्र्य है । व्रीहि या यव किसी के द्वारा भी याग कर सकता है । जिस स्थल में विकल्पित पदार्थ विशेष अधिकारी के मध्य में व्यवस्थित रहता है — उसको व्यवस्थित विकल्प कहते हैं । जैसे—"उदिते जुहोति" अनुदिते जुहोति" अर्थात् सूर्योदय होने पर अग्निहोत्र होम करे, एवं सूर्योदय होने से पूर्व अग्निहोत्र होम करे । इस स्थल में एक शाखा के व्यक्तियों के लिए उदित होम का विधान है, और अन्य शाखा के व्यक्तियों के लिए अनुदित होम व्यवस्थित है, इस शाखा के लिए उदित होम अकर्तव्य है । क्योंकि दोनों स्थलों में अर्थवाद वाक्य में निन्दा की गई है । प्रकृत में परस्पर विरुद्ध श्रुति और स्मृति में इच्छा का विकल्प होगा । इस प्रकार पूर्वपक्ष के उत्तर में सिद्धान्त के रूप में कहा गया है कि "विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्" श्रुति और स्मृति में विरोध रहने पर श्रुति ही प्रमाण है, स्मृति प्रमाण नहीं है । क्योंकि श्रुति शब्द प्रमाण है; वह स्वतः प्रमाण है और स्मृति का प्रामाण्य श्रुति सापेक्ष है । इसलिए, श्रुति बलवती है और स्मृति दुर्बल है । उपजीव्य और उपजीवक में विरोध होने पर उपजीव्य ही प्रमाण होता है, क्योंकि, उपजीवक उपजीव्य के आश्रित होने से उपजीव्य को छोड़कर अर्थात् अप्रमाण कर उपजीव्य स्थान नहीं पा सकता है, और न प्रमाण हो सकता है । प्रकृत में श्रुति उपजीव्य है और स्मृति उपजीवक है । अतः, स्मृति और श्रुति का समान बल नहीं है । समान बल में ही विकल्प होता है, इसलिए इन दोनों में विकल्प नहीं हो सकता है । पूर्वपक्षी के द्वारा प्रस्तुत विकल्प की चर्चा भी ठीक नहीं है, क्योंकि, विकल्प मानने पर आठ दोष होते हैं । अतः अन्य पक्ष सम्भव रहने पर आठ दोषों से युक्त विकल्प नहीं माना जाता है। जैसे 'व्रीहिभिर्यवैर्वा यजेत' व्रीहि या यव के द्वारा याग करे । इस विधि में व्रीहि और यव का समुच्चय निरर्थक होने से विकल्प माना गया है । इस विकल्प को मानने पर यव से यज्ञ करने पर (१) व्रीहि में शास्त्र के द्वारा प्राप्त प्रामाण्य का त्याग (२) अप्राप्त अप्रामाण्य का स्वीकार (३) व्रीहि के ग्रहण के समय यव शास्त्र का प्रामाण्य परित्यक्त हुआ था उसका पुनः उज्जीवन या पुनः स्वीकार । (४) प्राप्त अप्रामाण्य का हान या परित्याग करना होगा—इस प्रकार यव के पक्ष में चार दोष हैं और इसी प्रकार व्रीहि के द्वारा यज्ञ करने पर (१) यव- शास्त्र के पूर्वप्राप्त प्रामाण्य का परित्याग (१) अप्रामाण्य की कल्पना (३) यव के ग्रहण के समय व्रीहिशास्त्र का प्रामाण्य जो परित्यक्त हुआ था उसका पुन उज्जीवन, (४) प्राप्त अप्रामाण्य का परित्याग—इस प्रकार व्रीहिपक्ष में भी चार दोष होते हैं । इस प्रकार

आठ दोष की प्राप्ति विकल्प के पक्ष में होती है। अतः अन्य गति न रहने पर ही विकल्प स्वीकार किया जाता है, अन्यथा नहीं । विकल्प मानने पर श्रुति को प्रमाण मानने पर स्मृति अप्रमाण होगी । किन्तु स्मृति के प्रामाण्य का उपजीवन अन्य किसी के न रहने से स्मृति को प्रमाण और श्रुति के पक्ष में अप्रमाण नहीं कहा जा सकता है । इस प्रकार के स्थल में इतरेतराश्रय अर्थात् अन्योऽन्याश्रय दोष भी होगा, क्योंकि श्रुति का अप्रामाण्य स्मृतिप्रमाणत्वसापेक्ष है और स्मृति का प्रामाण्य श्रुति सापेक्ष है । इसलिए जिसका प्रामाण्य पूर्व से ही निरपेक्ष रूप में सिद्ध है, वह अनपेक्ष श्रुति अप्रमाण नहीं हो सकती है । अतः श्रुति के साथ स्मृति का विकल्प नहीं है। यदि यह कहा जाय कि उक्त स्मृति का क्या मूल है ? यह जिज्ञासा करने पर यही कहना होगा कि सम्यक् रूप से न सुनना या स्वप्न विज्ञान, या लाभ या मोह आदि ही उक्त स्मृति का मूल है ॥ ३ ॥ हेतुदर्शनाच्च ॥ ४ ॥ शा० भा०—लोभाद्वास आदित्समाना औदुम्बरीं कृत्स्नां वेष्टितवन्तः केचित् । तत्स्मृतेर्बीजम् । बुभुक्षमाणाः केचित्क्रीतराजकस्य भोजनमाचरितवन्तः । अपुंस्त्वं प्रच्छादयन्तश्चाष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि वेदब्रह्मचर्यं चरितवन्तः । तत एषा स्मृतिरित्यवगम्यते । अधिकरणान्तरं वा । ‘वैसर्जनहोमीयं वासोऽध्वर्युर्गृह्णाति’ इति ‘यूपहस्तिनो दानमाचरन्ति इति । तत्कर्तृसामान्यात् प्रमाणमिति प्राप्ते अप्रमाणं स्मृतिः । अत्रान्यन्मूलम् । लोभादाचरितवन्तः केचित् एषा स्मृतिः । उपपन्नतरं चैतत् । वैदिकवचनकल्पनात् ॥ ४ ॥ भा० वि० —अथ यदि हेतुदर्शनविशिष्टश्रुतिविरुद्धता व्याप्ता स्मृत्यप्रमाणता, हन्त तर्हि यत्र श्रुतिविरोधाभावः, तत्र सा न स्यादित्याशङ्क्य, हेत्वन्तरेणापि व्याप्तिं दर्शयितुमावृत्त्याऽधिकरणान्तरतयापीदं सूत्रं व्याकरोति —अधिकरणान्तरं वेति । आचारपक्षे त्वर्थसुखाद्यर्थानामाचाराणामविरोधात् कर्तृसामान्याच्च धर्म- प्रामाण्यमाशङ्क्य लोभादिहेत्वन्तरदर्शनेनाप्रामाण्यं साधयितुमारम्भः । तस्य विषयमाह —वैसर्जनेति । अग्नीषोमप्रणयनार्थविसर्जनहोम संबन्धि वासोऽध्वर्यु- र्हरति यूपहस्तिनः-यूपपरिवेष्टनवाससोऽध्वर्यवे दानमाचरन्तीति च श्रूयत इत्यर्थः । तत्रापि कर्तृसामान्यहेतुदर्शनाभ्यां धर्मे प्रामाण्याप्रामाण्यसन्देहे पूर्वपक्षमाह— तदिति । विचारप्रयोजनं तु श्रुत्यदर्शने दृष्टहेतुमूलस्मृत्यर्थाननुष्ठानम् । यथा शिष्टत्रैवर्णिकप्रणीततया तत्परिगृहीततया प्रत्यक्षवेदविरोधाभावेन चाष्टकादि- स्मृतयः प्रमाणम्, तद्वदियमपि स्वार्थानुष्ठापकतया प्रमाणमेवेत्यर्थः, अत्र च शब्द-

३२० मीमांसादर्शनम् [ सू० सूचितां प्रतिज्ञां व्याकुर्वन् सिद्धान्तमाह-अप्रमाणं वेति । एवेत्यर्थः यथाष्टकादि- स्मृतेः वेदातिरिक्तमूलं न दृश्यते, नैवमत्र, लोभादिमूलत्वदर्शनादिति हेतुभागं व्याचष्टे-स्मृतेरत्रेति । तदेव दर्शयति-लोभादिति । ततः-लोभाचरणात्, तदेवास्या मूलमित्यर्थः । ननु वेदमूलत्वस्यापि संभवात् कथं लोभादिमूलत्वनियम इत्याशङ्क्याह- उपपन्नतरं चेति । दृष्टे सत्यदृष्टकल्पनानुपपत्तेरित्यभिसन्धिः १ ॥ ४ ॥ त० वा०-इतश्च न प्रमाणत्वं मूलहेत्वन्तरेक्षणात् । व्यभिचारे हि नोत्पत्तिरर्थापत्त्यनुमानयोः ॥ १८३ श्रुतिविरोधभग्नप्रसरायां हि स्मृतौ पूर्वोक्तेन न्यायेन श्रुत्यनुमानप्रतिबन्धा- दाकाङ्क्षितमूलान्तरावश्यकल्पयितव्यत्वाच्च । क्वचिद् भ्रान्तिः क्वचिल्लोभः क्वचियुक्तिविकल्पनम् । प्रतिभाकारणत्वेन निराकर्तुं न शक्यते ॥ १८४ स्मृतेश्च श्रुतिमग्नायाः कारणान्तरसंभवः । न तु श्रुतेरतः सैव तद्विरोधे हि बाध्यते ॥ १८५ यथैव वेदमूलत्वमनेकान्तान्न लभ्यते । तथाऽन्यमूलताऽपीति तदाशङ्क्येदमुच्यते ॥ १८६ उपपन्नतरं चैतद्वेदावाक्यानुमानतः । दृष्टे हि सत्यदृष्टस्य कल्पना निष्प्रमाणिका ॥ १८७ भाष्यमतेन विरोधाधिकरणम् । अधिकरणान्तरं वेति । सर्वव्याख्याविकल्पानां द्वयमेव प्रयोजनम् । पूर्वत्रापरितोषो वा विषयव्याप्तिरेव वा ॥ १८८ अपरितोषस्तावत्प्रथमेनैव श्रुतिविरुद्धत्वहेतुना बलवता सिद्धे बाधे, नान्वा- चयहेतुरतीव प्रयोजनवान् । अधिकरणान्तरे पुनः पूर्वोक्तहेतुनिरपेक्षः पर्याप्त एवैकः स्मृतिबाधनायेति स्वतन्त्रत्वेन प्रदर्शनम् । विरोधेन च व्याप्तायाः स्मृतेरप्रमाण- तद्वचासौ नापवादान्तरोद्भवः । 'वैसर्जनहोमीयं वासोऽध्वर्युर्गृह्णाति' इत्यग्नीषोम- प्रणयनार्थं विसर्जनहोमकालसंबन्धियजमानाच्छादनं वासोऽध्वर्युर्हरति मुक्तकमेवैत- दावरणानुमितं स्मरणम् । एवं यूपहस्तिनो दानमाचरन्तीति यूपपरिव्यासशाटकं यूपहस्तिशब्देन निर्दिश्याध्वर्युहर्तव्यतयाऽऽचारानुमितयैव स्मृत्या प्रतिपादयन्ति । १. सर्वव्याख्याविकल्पानां द्वयमेव प्रयोजनम् । पूर्वत्रापरितोषो वा विषयव्याप्तिरेव वेतिवार्तिकमन्त्रानुसन्धेयम् ।

४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः १२१ तत्रापि वेदमूलत्वकल्पना नोपपद्यते । कर्तृसामान्यतः प्राप्ता लोभसंभवपूर्वकात् ॥ १८९ ऋत्विजो हि प्रयोगमध्यपतितं यजमानं प्रक्रान्तकर्मावश्यसमापनीयत्वनि- बद्धसमाप्त्युत्तरकालभावि स्वाच्छन्द्यं च विदित्वा कार्यवत्तावेलायामेव खलगत्- प्राधान्यविभागव्यावृत्तमूलकवत्स्वयमुत्पाद्योत्पाद्य तानि तान्यादेयकानि श्रद्धाजन- कार्थवादपुरःसरं याचन्ते । प्रत्यक्षश्रुतिविहितदेयान्तरनिदर्शनव्यामोहितश्च यज- मानः श्रद्दधानतया तथैव प्रतिपद्य तेभ्यः प्रयच्छतीति, तैरेषा स्मृतिः प्रवर्तिता स्यादित्याशङ्कायाम्, वेदमूलत्वं नानुमीयते । पूर्ववच्च लोभपूर्वकत्वकल्पनमेवोपपन्न- मिति निर्णयात्संदेहनिवृत्तिः । इदं च भाष्यकारेण प्रदर्शयता तुल्यकारणत्वात्पूर्व- त्रापि प्रदर्शितमेवेति योजयितव्यम् । ( भाष्यकारीयाधिकरणाक्षेपः । ) एतावत्त्विहाधिकरणद्वयेऽपि वक्तव्यम् । स्मृतीनां श्रुतिमूलत्वे दृढे पूर्वं निरूपिते । विरोधे सत्यपि ज्ञातुं शक्यं मूलान्तरं कथम् ॥ १९० शाखान्तरविप्रकीर्णानि हि पुरुषान्तरप्रत्यक्षाण्येव वेदवाक्यानि पुरुषधर्मा- नुष्ठानक्रमेणापठितानि वेदसाम्नायविनाशभयात्स्वरूपेणानुपन्यस्यार्थोपनिबन्धन- द्वारलभ्यानि विशिष्टध्वनिस्थानीयेन तेनैव परोक्षाण्यपि व्यज्यमानानि पिण्डीकृत्य स्मर्यन्ते । तत्र यथैवाऽऽप्तप्रत्ययादिदमङ् पठयत इति कथितमुच्चारितमनुच्चारितं वा शिष्याः प्रतिपद्यन्ते तथैव सूत्रकारवचनान्यध्यापकवचनस्थानीयानि स्वानुरू- पवेदवाक्यसमर्पणमात्रं कृत्वा निवृत्तव्यापाराणीति न ताल्वादिध्वनिप्रेरणवत्पौरुषे- यत्वेन परिभवितव्यानि । वेदो हीदृश एवायं पुरुषैर्यः प्रकाश्यते । स पठद्भिः प्रकाशेत स्मरद्भिर्वेति तुल्यभाक् ॥ १९१ अनुच्चारणकाले च संस्कारैरेव केवलैः । तत्कृतस्मरणैर्वाऽयं वेदोऽध्येतृषु तिष्ठति ॥ १९२ तेनार्थं कथयद्भिर्या स्मृतार्था कथ्यते श्रुतिः । पठिताभिः समानाऽसौ केन न्यायेन बाध्यते ॥ १९३ स्मृतिशास्त्रं च यच्चैकं भवेत्कृत्स्नमवैदिकम् । तन्मुक्तवैकं ततोऽन्यानि व्यवहाराङ्गतामियुः ॥ १९४ कठमैत्रायणीयादिपठितश्रुतिमूलिकाः।' दृश्यन्ते स्मृतयः सर्वा भद्रोपनयनादिषु ॥ १९५ २१

१२२ मीमांसादर्शनम् [ सू० तदा तन्मध्यपात्येकं वाक्यं किंचिदपस्मृतिः । मूलान्तरोद्भवं वक्तुं जिह्वा नो न प्रवर्त्तते ॥ १९६ बाधिता च स्मृतिर्भूत्वा काचिन्न्यायविदा यदा । श्रूयते न चिरादेव शाखान्तरगता श्रुतिः ॥ १९७ तदा का ते मुखच्छाया स्यान्नैयायिकमानिनः । बाधावाधानवस्थानं ध्रुवमेवं प्रसज्यते ॥ १९८ यच्चैतत्सर्ववेष्टनस्मरणं स्पर्शनश्रुतिविरुद्धत्वेनोदाह्रियते । एतज्जैमिनिनैव च्छान्दोग्यानुपादे शाट्यायनिब्राह्मणगतश्रुतिमूलत्वेनौदुम्बरीप्रकरणे च शाट्याया- निनां तामूर्ध्वदेशेनोभयत्र वाससी दर्शयतीति 'वैष्णुतं वै वासः श्रियै वासः श्रेयः सामे' इति दर्शिते तत्प्रसङ्गेनौदुम्बरीवेष्टनवाससोऽपि प्रकाशश्रुतिमूलत्वमेवा- न्वाख्यातम् । ततश्च श्रुतिमूलत्वाद्भाष्योदाहरणं न तत् । विकल्प एव हि न्याय्यस्तुल्यकक्षप्रमाणतः ॥ १९९ विरुद्धत्वे च बाधः स्यान्न चेहास्ति विरुद्धता । नहि वेष्टनमात्रं नः स्पर्शश्रुत्या विरुध्यते ॥ २०० यदि द्वित्राङ्गुलं मध्ये विमुच्योत्तरभागतः । वेष्ट्येतोदुम्बरो तत्र किं नाम न कृतं भवेत् ॥ २०१ सर्वा वेष्टयितव्येति न ह्येवं सूत्रकृद्वचः । न ह्यस्याः क्रियते कैश्चित्कर्णमूलेषु वेष्टनम् ॥ २०२ परिशब्दोऽपि यस्तव सर्वतो वेष्टनं वदेत् । तद्गार्तसमन्तत्वे सोऽर्थवानेव जायते ॥ २०३ लोभमूलं च यत्तस्याः कल्प्यते सर्ववेष्टनम् । तल्लोभः सुतरां सिध्येन्मूलाग्रपरिधानयोः ॥ २०४ अन्तरीयोत्तरीये हि योषितामिव वाससी । स्मरेत्कौशेयजातीये नोद्गातेकं गुणैर्विना ॥ २०५ प्राक् च लोभादिह स्पर्शः कुशैरेवान्तरीयते । वेष्टितेषा कुशैः पूर्वं वाससा परिवेष्ट्यते ॥ २०६ कुशवेष्टनवाक्ये च न किंचिद्धेतुदर्शनम् । नियमेऽपि च तद् दृष्टं नैवोर्ध्वदशवाससः ॥ २०७ दीक्षितान्नभोजनविचारः क्रीतराजकभोज्यान्नवाक्यं चाथर्ववैदिकम् । न च तस्याप्रमाणत्वे किंचिदप्यस्ति कारणम् ॥ २०८

४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः १२३ यदि यज्ञोपयोगित्वं नेहास्त्याथर्वणश्रुतेः । अर्थान्तरप्रमाणत्वं केनास्याः प्रतिहन्यते ॥ २०९ शान्तिपुष्ट्यभिचारार्था ह्येकब्रह्मर्त्विगाश्रिताः । क्रियास्तया प्रमीयन्तेऽत्राप्येवाऽऽत्मीयगोचराः ॥ २१० न चायमपि यज्ञाङ्गविधिः शान्त्यादिशास्त्रवत् । अतोऽस्यापि प्रमाणत्वं पुरुषार्थेन वार्यते ॥ २११ न ह्येतद्यजमानस्य र्त्विजामुपदिश्यते । सर्वेभ्यः पुरुषेभ्यो हि भोज्यान्नत्वमिदं श्रुतम् ॥ २१२ वाक्यान्तरैर्निषिद्धं यद्दीक्षितान्नस्य भोजनम् । तस्यैव श्रूयते पश्चादभ्यनुज्ञाविधिद्वयम् ॥ २१३ अग्नीषोमीयसंस्थायां क्रीते वा सति राजनि । सोऽयं कालविकल्पः स्यादाशौचच्छेदकालवत् ॥ २१४ ननु चाशौचकालोऽपि धर्मपीडाद्यपेक्षया । अतः समविकल्पत्वं नैव तस्यापि संमतम् ॥ २१५ यस्य ह्यल्पेन कालेन शुद्धिर्भोज्यान्नताऽपि वा । स कस्मात्तावता शुद्धो दीर्घकालत्वमाश्रयेत् ॥ २१६ एकरात्रे त्रिरात्रे वा शुद्धस्य ब्राह्मणस्य च । अशुद्धिरनुवर्तेत दशरात्रं कथं पुनः ॥ २१७ पापक्षयो हि शुद्धत्वं धर्मयोग्यत्वमेव वा । प्राग्दशाहात्कथं तस्य सदसद्भावकल्पना ॥ २१८ एवं प्राक् पशुसंस्थानाद्दीक्षितान्नविशुद्धता । अस्ति नास्तीति चेत्येवं सहते नावधारणम् ॥ २१९ स्यादेतद्येन यः कालः पुरस्तात्परिगृह्यते । तस्यासावेव होमस्य प्रागूर्ध्वोदयकालवत् ॥ २२० युक्तं समविकल्पत्वमुदितानुदितत्वयोः । न काचिदत्र पूर्वोक्ता सदसत्त्वविरोधिता ॥ २२१ न चानुदितहोमोक्तावुदितोक्तिरनर्थिका । क्लेशक्षयव्ययादीनां नातिरेकोऽत्र कश्चन ॥ २२२ इह त्वल्पेन कालेन शुद्धेर्या दीर्घकालता । न वर्धयेदघाहानि साऽनेनापि निवार्यते ॥ २२३ क्लेशप्रायं च तं पक्षं नाऽऽश्रयेतैव कश्चन । ततोऽनङ्गीकृते तस्मिन् स्यात्तद्वाक्यमनर्थकम् ॥ २२४

३२४ मीमांसादर्शनम् [ सू० तेनतैं विषयान्त्यत्वान्न विकल्पोऽवकल्पते । स चोक्तो धर्मपीडाख्यस्तत्र चाह्नामवर्धनम् ॥ २२५ दन्तजातानुजातान्यकृतचूडेषु च क्रमात् । चितिक्रिया त्र्यहैकाहास्तत्र चाह्नामवर्धनम् ॥ २२६ तथा गौतमेनाप्युक्तम्—राज्ञां च कार्याविघातार्थं ब्र'ह्मणानां च स्वाध्याया- निर्वृत्त्यर्थमिति । अथ वाऽन्तर्यदाऽऽशौचं निमित्तं किंचिदापतेत् । तत्र शेषेण या शुद्धिस्तच्छेषोऽयं भविष्यति ॥ २२७ न वर्धयेदथाहानि निमित्तादागतान्यपि । पूर्वस्यैव हि कालस्य प्रसङ्गेन तदङ्गता ॥ २२८ प्रवृत्तोऽनपवृत्तश्च दशरात्रादिकोऽवधिः । अन्तः पतितमाशौचं स व्याप्नोति स्वसंख्यया ॥ २२९ वितत्य दश संख्या हि तान्यहानि व्यवस्थिता । शक्नोत्येव परिच्छेतुमन्तराशौचमागतम् ॥ २३० शुद्धयशुद्धी ह्यदृष्टत्वाद्विजायेते यथाश्रुति । नन्वेवं भोजनस्यास्ति विषयावधिकारणम् ॥ २३१ तत्र दीर्घविधिर्व्यर्थः स्यादलपावध्यनुज्ञया । तस्मादिहापि वैषम्यहेतुर्वाच्योऽवधिद्वये ॥ २३२ अत्राप्यसंभवे तस्य दीक्षिते वा ददत्यपि । तन्नियुक्तकदत्तान्नं भोज्यं सोमक्रये कृते ॥ २३३ आपद्धर्मा यथैवान्ये मुख्यासंभवहेतुकाः । तथैव प्राणपीडायां क्रीतराजकभोजनम् ॥ २३४ हन्तैवमप्रमाणत्वमुक्तमन्यप्रकारकम् । जग्धवानापदि ह्यार्तो विश्वामित्रः श्वजाघनीम् ॥ २३५ उच्यते— एकं विनाऽप्यनुज्ञानात् क्रियते गत्यसंभवात् । क्रियतेऽनुज्ञया त्वन्यद्विशेषश्च तयोर्महान् ॥ २३६ सामान्येनाभ्यनुज्ञानाद्विशेषश्च विशिष्यते । विशेषोऽत्यन्तनिर्दोषः स्तोकदोषेतरक्रिया ॥ २३७ तथा च मनुनाऽप्युक्तमापद्धर्मगतं प्रति । तत्रत्यपापशेषाणामन्ते शौचं भविष्यति ॥ २३८

४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ३२५ कर्मणा येन केनेह मृदुना दारुणेन वा । उद्धरेद्दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ॥ इति । २३९ धर्मश्च प्रथमं तावत्प्रायश्चित्तात्मको भवेत् । ततस्तेन विशुद्धस्य फलार्थोऽन्यो भविष्यति ॥ २४० यत्तु क्रीतराजकभोज्यान्नत्ववचनं तद्गत्यन्तरासंभवे निर्दोषत्वज्ञापनाथमेव ज्ञायते । तत्रापि तु—प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पेन वर्तते । स नाऽऽप्नोति फलं तस्य परत्रेति विचारितम् ॥ २४१ इति निन्दितत्वान्न संभवद्भोज्यान्तरेणापि लोकयात्रादिवशेन भोक्तव्यम् । यदि वा कालवैषम्यादसत्समविकल्पयोः । अर्थभेदव्यवस्थानादविरोघोऽवधार्यते ॥ २४२ दीक्षितान्नमभोज्यं स्यादक्रीते राजनि ध्रुवम् । क्रीते त्वभोजनं नाम मनःकर्म नियम्यते ॥ २४३ यथैवाश्राद्धभोजित्वं यथा वाऽमांसभक्षणम् । श्रेयसे विहितं धर्म्यं न सर्वत्र निषिध्यते ॥ २४४ श्राद्धमन्तर्दशाहं हि नियोगेन निषिध्यते । एकोद्दिष्टं सदेकेषां न तु पित्र्यं कदाचन ॥ २४५ तत्राश्राद्धभोजितत्वनियमः स्वर्गायेति विज्ञायते । तथा षष्ठ्यष्टमीचतुर्दशी- पञ्चदशीषु मांसभक्षणमैथुनादिक्रियाप्रतिषेधाद् गृहस्थस्यान्यत्र कामचारे प्राप्ते तदकरणनियमः श्रेयसे विहितः । यथाऽऽह । न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने । प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ।॥ इति । २४६ ननु च वाक्यद्वयदर्शनात्तत्र संयोगपृथक्त्वं युक्तमिह त्वेकमेव दीक्षितान्नभोजन- प्रतिषेधवाक्यं कथं क्रयात्प्रतिषेधति तदुत्तरकालं च प्रागग्नीषोमीयसमाप्तेर्निः- श्रेयसेन नियच्छतीति । तदुच्यते— स्याद्वाक्यद्वयमेवैतदवधिद्वयकल्पितम् । यः पूर्वः प्रतिषेधोऽत्र संस्थितः क्रीतराजके ॥ २४७ परोऽवधिः पुनस्तस्य नैकत्वादवकल्पते । द्वितीयान्नादनानुज्ञादर्शनात्तेन गम्यते ॥ २४८

३२६ मीमांसादर्शनम् [ सू० अभोजनविधिर्नूनमस्त्यन्योऽप्यान्तरालिकः । न हि पूर्वमनुज्ञाते स्यादनुज्ञान्तरं पुनः ॥ २४९ वरणादभ्यनुज्ञाते निर्वापे किमनुज्ञया ॥ २५० यथाऽध्वर्योर्वरणवेलायामेव सर्वं यजमानेन यज्ञोपयोगि स्वयमनुज्ञातमेवेति निर्वापमन्त्रे प्रसवशब्देन तदानींतनयजमानानुज्ञाप्रकाशनं न क्रियते तथेह क्रीत- राजकावस्थानुज्ञातभोजनानुज्ञावचनमग्नीषोमीयसमाप्तौ पुनरुक्तमित्यवश्यं नियमेन प्रतिषेधान्तरेण वा वारितस्यानुज्ञानार्थमित्यवगम्यते । प्रतिषिद्धाभ्यनुज्ञा च विकल्पेनैव दूष्यते । पर्युदस्ताभ्यनुज्ञानं तस्मादिष्टं व्यवस्थया ॥ २५१ दीक्षितान्नविशिष्टाभोजननियमो हि श्रेयोर्थिभ्यो विधीयते । पाश्चात्यभोजनानुज्ञा नान्यथा ह्युपपद्यते । अदृष्टार्थप्रसङ्गित्वात्न विधिश्चायमिष्यते ॥ २५२ एवं विषयनानात्वादविरोधादबाधनम् । अष्टाचत्वारिंशदिति उदाहरणनिरासः अष्टाचत्वारिंशद्वर्षं वेदब्रह्मचर्यचरणस्यापि स्मृितावेव पक्षान्तरविकल्पापेक्ष- निबन्धनादाश्रमन्तरविषयत्वसंभवाद्वा विरोधाभावः । तथा हि— 'वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वाऽपि यथाक्रमम् ।' सामर्थ्याश्रमयोग्यत्वमङ्गीकृत्यैतदुच्यते ॥ २५३ गौतमेनापि द्वादशवर्षाण्येकवेदब्रह्मचर्यं चरेदिति प्रथमकल्पमाशु गार्हस्थ्य- प्रतिपत्त्यर्थमुक्तवा, द्वितीयकल्पे द्वादशप्रतिवेदं वा, सर्वेष्वित्यष्टाचत्वारिंशत्परि- ग्रहः कृतः । तत्रैवं शक्यते वक्तुं येऽन्धपङ्गवादयो नराः । गृहस्थत्वं न शक्ष्यन्ति कर्तुं तेषामयं विधिः ॥ २५४ नैष्ठिकब्रह्मचर्यं वा परिव्राजकताऽपि वा । तैरवश्यं ग्रहीतव्या तेनाऽदावेतदुच्यते ॥ २५५ उपकुर्वाणकेनैव याप्यः कालो बहुतस्ततः । संप्राप्य ज्ञानभूयस्त्वं पवित्रैः क्षीणकल्मषैः ॥ २५६ सर्वाश्रमातिरिक्तेन स्वाध्यायेनैव शोधितः । स्तोकेरप्याश्रमाचारैर्गतिमिष्टां गमिष्यति ॥ २५७

सूत्रार्थोऽप्येवं योजयितव्यः—श्रौतस्मार्तविज्ञानविरोधे यदनपेक्षम् अपेक्षा-

४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ३२७ प्रसङ्गाद् बादरायणमतस्य निर्देशः द्वैपायनादयश्चाहुः— परिनिष्ठितकार्यस्तु स्वाध्यायेनैव हि द्विजः । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ २५८ यानि च प्रतिदिनप्रयुज्यमानर्क्सामयजुर्ब्राह्मणकल्पव्याख्यानादिब्रह्मयज्ञ- निमित्तानि फलानि ऋत्वधिकृतपुरुषेभ्योऽन्यानर्थक्यप्रसङ्गाद्व्यावृत्तानि जपध्यान- मात्राधिकृतब्रह्मचारिपरिव्राजकविषयत्वेनावतिष्ठन्ते तान्यपि स्वाध्यायविज्ञानभूय- स्त्वेन भूयिष्ठानि भविष्यन्तीति प्रतिवेदब्रह्मचर्योपदेशः । यो वा कश्चिन्मेधावितया शीघ्रमेव वेदचतुष्टयमप्यधीत्य यथोपपत्तिकालं तदर्थज्ञानाभियोगमपरित्यजन्ग्रहणान्तं वेत्येतत्पक्षाश्रयणेन गृहस्थो भवेत्तं प्रति द्वादशाष्टाचत्वारिंशद्वर्षपक्षावनेनैव स्मरणेन पूर्वपक्षकृताविति नातीव श्रुतिविरुद्ध- त्वेनोदाहर्तव्यौ । तेन नैव श्रुतिस्मृत्योर्विरोधोऽतीव दृश्यते । श्रुत्योरेव ह्यसौ दृष्टः क्वचिद्द्वा नैव विद्यते ॥ २५९ तेनात्र यदि वा कर्मप्रयोगोऽयं निरूप्यते । यदि वा बाध्यमानत्वमुक्तं बाह्यं स्मृतीः प्रति ॥ २६० अत्र जैमिनिमतस्योपन्यासः एतद्धि जैमिनिनाऽत्यन्तं हितोपदेशिना जिज्ञासुभ्यः प्रतिपाद्यते । यावदेकं श्रुतौ कर्म स्मृतौ वाऽन्यत्प्रतीयते । तावत्तयोरविरुद्धत्वे श्रौतानुष्ठानमिष्यते ॥ २६१ व्रीहियवादिश्वपि तावत्प्रत्यक्षश्रुतिविहितेषु यदि कश्चिद्यावज्जीवमप्येकमेव पक्षमाश्रित्य व्यवहरेन्न स कदाचिदप्युपालम्भास्पदं गच्छेत् । ततश्च तुल्यकक्षाऽपि यदि नाम स्मृतिर्भवेत् । तथाऽपि नैव दोषोऽस्ति श्रुत्यर्थमनुतिष्ठताम् ॥ २६२ यानि स्मृतिवचनान्यर्थमात्रमेव प्रतिपाद्य, मूलभूताः श्रुतीरनुदाहृत्य निवृत्त- व्यापाराणि तेषु श्रुत्यनुमानव्याजसापेक्षप्रामाण्येषु सत्सु वेदवचनमनपेक्षत्वात्प्रमाण- तरत्वेन सुतरां विश्रम्भणीयमिति, श्रद्धाविशेषेण ग्राह्यतरार्थं विज्ञायते । वार्तिकमतेन सूत्रार्थवर्णनम् सूत्रार्थोऽप्येवं योजयितव्यः—श्रौतस्मार्तविज्ञानविरोधे यदनपेक्षम् अपेक्षा- वर्जितम्, यस्य वाऽपेक्षणीयमन्यन्नास्तीत्येवं पाठद्वयेऽपि, पूर्वसूत्रात्प्रमाणशब्दमनु-

३२८ मीमांसादर्शनम् [ सू० षङ्गेन संवद्द्य यदनपेक्षं तत्तावत्प्रमाणं स्यादिति तदानींतनव्यवहारमात्रप्रति- पत्त्यर्थमेवोच्यते । ततश्च न तावच्छाखान्तरीयविद्यमानश्रुतिमूलत्वाशङ्कायां सत्यामेवात्यन्त- निराकरणपक्षः परिग्रहीष्यते । न च प्रत्यक्षश्रुत्यर्थानुष्ठानहानिः यदा तु क्वचिच्छाखान्तरे स्मरणमूलं श्रुतिरपि प्रत्यक्षीभविष्यति, तदोभयोस्तुल्यबल- त्वाद्विकल्पो भविष्यत्येव । नन्वनेनैव न्यायेन स्वशाखाविहितविरुद्धं शाखान्तरगतमप्यग्राह्यं स्यात् । सत्यम्— वार्तामात्रेण तद्यावत्तावन्नेव ग्रहीष्यते । यदा तु श्रवणं प्राप्तं तदाऽस्मान्न विशिष्यते ॥ २६३ अतश्चैवं श्रुतिस्मृत्योर्विशेषोऽनेन दर्शयते । नात्यन्तमेव बाध्यत्वं न चाप्यत्यन्ततुल्यता ॥ ५६४ (वार्तिकमतेन बाह्यग्रन्थानामप्रामाण्यनिरूपणम् ।) यद्वा—यान्येतानि त्रयीविद्भिर्न परिगृहीतानि, किंचित्तन्मिश्रधर्मकञ्चुकच्छा यापतितानि लोकोपसंग्रह-लाभ-पूजा-ख्यातिप्रयोजनपराणि त्रयीविपरीता- संबद्धदृष्टशोभादिप्रत्यक्षानुमानोपमानार्थापत्तिप्राययुक्तिमूलोपनिबद्धानि सांख्य- योगपाञ्चरात्रपाशुपतशाक्यग्रन्थपरिगृहीतधर्माधर्मनिबन्धनानि विषचिकित्सा- वशीकरणोच्चाटनोन्मादनादिसमर्थकतिपयमन्त्रौषधिकादाचित्कसिद्धिनिदर्शनबलेना- हिंसासत्यवचनदमादानदयादिश्रुतिस्मृतिसंवादिस्तोकार्थगन्धवासितजीविकाप्राया - र्थन्तरोपदेशीनि, यानि च बाह्यतराणि म्लेच्छाचारमिश्रकभोजनाचरणनिबन्ध- नानि, तेषामेवैतच्छुतिविरोधहेतुदर्शनाभ्यामनपेक्षणीयत्वं प्रतिपाद्यते । न चैतत्क्व- चिदधिकरणान्तरे निरूपितम्, न चावक्तव्यमेव गाव्यादिशब्दवाचकत्वबुद्धिवदति- प्रसिद्धत्वात् । यदि ह्यनादरेणैषां न कल्प्येताप्रमाणता । अशक्यैवेति मत्वाऽन्ये भवेयुः समदृष्टयः ॥ २६५ शोभासौकर्यहेतूक्तिकलिकालवशेन वा । यज्ञोकपशुहिंसादित्यागभ्रान्तिमवाप्नुयुः ॥ २६६ ब्राह्मणक्षत्रियप्रणीतत्वाविशेषेण वा मानवादिवदेव श्रुतिमूलत्वमाश्रित्य सचेतसोऽपि श्रुतिविहितैः सह विकल्पमेव प्रतिपद्येरन् । तेन यद्यपि लभ्येत स्मृतिः काचिद्विरोधिनी । मन्वाद्युक्ता तथाऽप्यस्मिन्नेतदेवोपयुज्यते ॥ २६७

४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ३२९ त्रयीमार्गस्य सिद्धस्य ये ह्यात्यन्तविरोधिनः । अनिराकृत्य तान्सर्वान्धर्मशुद्धिर्न लभ्यते ॥ २६८ महाजनगृहीतत्वं पित्राद्यनुगमादि च । तेऽपि द्वीपान्तरापेक्षं वदन्त्येव स्वदर्शने ॥ २६९ तत्र श्रद्धामात्रमेवैकं व्यवस्थानिमित्तं सर्वेषां स्वपितृपितामहादिचरितानुया- यित्वात् । यैश्च मानवादिस्मृतीनामप्युत्सन्नवेदशाखामूलत्वमभ्युपगतम्, तान्प्रति सुतरां शाक्यादिभिरपि शक्यं तन्मूलत्वमेव वक्तुम् । को हि शक्नुयादुत्सन्नानां वाक्यविषयेयत्तानियमं कर्तुम् । ततश्च यावत्किंचित्कियन्तमपि कालं कैश्चिदाद्रिय- माणं प्रसिद्धि गतं तत्प्रत्यक्षशाखाविसंवादेऽप्युत्सन्नशाखामूलत्वावस्थानमनुभव- तुल्यकक्षतया प्रतिभायात् । अत आह—विरोधे त्वनपेक्षं स्यादिति । पारतन्त्र्यं तावदेषां स्मर्यमाणपुरुषविशेषप्रणीतत्वात्तैरेव प्रतिपन्नं शब्दकृतकत्वादिप्रतिपा- दनादराच्च पार्श्वस्थैरपि ज्ञायते । शाक्यादिवचसां प्रायेण श्रुतिस्मृतिविरुद्धत्ववर्णनम् वेदमूलत्वं पुनस्ते तुल्यकक्षमूलत्वाक्षमयैव लज्जया च मातापितृद्वेषिदुष्टपुत्र वन्नाभ्युपगच्छन्ति । अन्यच्च स्मृतिवाक्यमेकमेकेन श्रुतिवचनेन विरुद्ध्येत । शाक्यादिवचनानि तु कतिपयदमदानादिवचनवर्जं सर्वाण्येव समस्तचतुर्दशविद्या- स्थानविरुद्धानि त्रयीमार्गव्युत्थितविरुद्धाचरणैश्च बुद्धादिभिः प्रणीतानि । त्रयी- बाह्येभ्यश्चतुर्थवर्णनिरवसितप्रायेभ्यो व्यामूढेभ्यः समर्पितानीति न वेदमूलत्वेन संभाव्यन्ते । स्वधर्मातिक्रमेण च येन क्षत्रियेण सता प्रवक्तृत्व-प्रतिग्रहौ प्रतिपन्नौ, स धर्ममविप्लुतमुपदेक्ष्यतीति कः समाश्वासः ? । उक्तं च—परलोकविरुद्धानि कुर्वाणं दूरतस्त्यजेत् । आत्मानं योऽतिसंधत्ते सोऽन्यस्मै स्यात्कथं हित इति ॥ २७० बुद्धादेः पुनरयमेव व्यतिक्रमोऽलंकारबुद्धौ स्थितः, येनैवमाह— कलिकलुषकृतानि यानि लोके । मयि निपतन्तु विमुच्यतां तु लोकः, इति । स किल लोकहितार्थं क्षत्रियधर्ममतिक्रम्य ब्राह्मणवृत्तं प्रवक्तृत्वं प्रतिपद्य, प्रतिषेधातिक्रमासमर्थैर्ब्राह्मणैरननुशिष्टं धर्मं बाह्यजनाननुशासद्धर्मपीडामप्यात्म- नोऽङ्गीकृत्य परानुग्रहं कृतवानित्येवंविधैरेव गुणैः स्तूयते, तदनुशिष्टानुसारिणश्च सर्व एव श्रुतिस्मृतिविहितधर्मातिक्रमेण व्यवहरन्तो विरुद्धाचारत्वेन ज्ञायन्ते । तेन प्रत्यक्षया श्रुत्या विरोधे ग्रन्थकारिणाम् । ग्रहीत्राचरितॄणां च ग्रन्थप्रामाण्यबाधनम् ॥ २७१

३३० मीमांसादर्शनम् [ सू० न ह्येषां पूर्वोक्तेन न्यायेन श्रुतिप्रतिबद्धानां स्वमूलश्रुत्यनुमानसामर्थ्यमस्ति । न च शाखान्तरोच्छेदः कदाचिदपि विद्यते । प्रागुक्ताद्वेदनित्यत्वान्न चैषां दृष्टमूलता ॥ २७२ न हि यथोपनयनादिस्मृतीनां शाखान्तरदृष्टश्रुतिसंवादः । एवं चैत्यकरण- तद्वन्दनशूद्रसंप्रदानकदानादीनां संवादः संभवति । मूलान्तरकल्पनं च प्रागेव प्रत्याख्यातम् । हेतुदर्शनेन शाक्यमतनिरासः । लोभादिकारणं चात्र बह्वेवान्यत्प्रतीयते । यस्मिन्सन्निहिते दृष्टे नास्ति मूलान्तरानुमा ॥ २७३ शाक्यादयश्च सर्वत्र कुर्वाणा धर्मदेशनाम् । हेतुजालविनिर्मुक्तां न कदाचन कुर्वते ॥ २७४ न च तैर्वेदमूलत्वमुच्यते गौतमादिवत् । हेतवश्चाभिधीयन्ते ये धर्मा दूरतः स्थिताः ॥ २७५ एत एव च ते येषां वाङ्मात्रेणापि नार्चनम् । पाखण्डिनो विकर्मस्था हैतुकाश्चैत एव हि ॥ २७६ एतदीया ग्रन्था एव च मन्वादिभि परिहार्यत्वेनोक्ताः । 'या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्चित्कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः प्रोक्तास्तमोनिष्ठा हि ताः स्मृता ॥ इति । २७७ तस्माद्धर्मं प्रति त्रयीबाह्यमेवंजातीयकं प्रामाण्येनानपेक्ष्यं स्यादिति सिद्धम् ॥ ४ ॥ न्या० सु०—सूत्रव्याख्यानार्थं लोभादित्यादिभाष्यं सर्ववेष्टनादिस्मृतीनां लोमकृन्त- पुंसकत्वप्रच्छादनप्रयोजनमूलत्वे प्रमाणाभावादयुक्तमाशङ्क्य श्रुत्यतिरिक्तसम्भवे, मूल- मात्रोपलक्षणार्थतया व्याचष्टे—इतश्चेति । विरोधो व्यभिचारशब्देनोक्तः । श्लोकं व्याचष्टे- श्रुतीति । ननु सत्यपि विरोधे भ्रान्त्यादिमूलत्वं विना बाध्यत्वायोगाद् बाध्यत्वेनैव भ्रान्त्यादिमूलकल्पनायामितरेतराश्रयं स्यात्, इत्याशङ्क्याह—स्मृतेश्चेति । विरोधपरि- हारायाऽवश्याङ्गीकार्येऽन्यतरस्य बाध्यत्वे स्मृतेरेव भ्रान्त्यादिमूलत्वनिश्चयापत्तेरितरेतरा- श्रयापत्तिरित्यशयः । उपपन्नतरं चैतदिति वक्ष्यमाणवर्णकभाष्यमिहापि योज्यमिति सूचयितुमाशङ्कोत्तर- त्वेन व्याचष्टे—यथैवेति । भाष्यकृतास्यैव सूत्रस्याधिकरणान्तरविषयत्वेन वर्णकान्तरं कृतम्, तत् पूर्वापरितोषविषयव्याप्तिव्यतिरेकेण क्वचिद्वर्णकान्तरस्य प्रयोजनान्तरा- दर्शनात्तयोश्चापरितोषकारणविषयान्तरादर्शनेनासम्भवादयुक्तमित्याक्षिपति—सर्वेति । न

४.] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ३३१ च तयोर्मध्येऽन्तरदप्यत्रास्तीति शेषः । समाधातुमपरितोषकारणं तावन्मन्दप्रयोजनत्वमाह — अपरितोषस्तावदिति । विषयव्याप्तिरप्यत्राविरुद्धस्मृतिविषयत्वादस्तीत्याह — विरोधेन चेति । सत्यप्यस्याविरुद्धस्मृतिविषयत्वे कारणान्तरेणापि केनचिदपवादान्तरोपपत्तेः कथं विषयव्याप्तिरित्याशङ्क्य, कारणान्तरासम्भवान्नापवादान्तरोद्भव इत्युक्तम् । वैसर्जनहोमीयमित्यादिविषयप्रदर्शनार्थं भाष्यं व्याचष्टे—वैसर्जनहोमीयमिति । श्रुत्य- विरुद्धानामपि स्मृतीनां लोभादिमूलत्वसम्भवेनाप्रामाण्याङ्गीकरणे दायधर्मादिस्मृतीनामप्य- प्रामाण्यं स्यादित्याशङ्क्य, मन्वादिमहर्षिनिबन्धनस्य वेदमूलत्वकल्पनाहेतोरविरोघे कल्पकत्वप्रतिबन्धाभावान्मूलान्तरकल्पनानुपपत्तावप्यविरुद्धानामाचारानुमितानामर्वाचीन - मनुष्यस्मृतीनां दृष्टमूलासम्भवेनैव वेदमूलत्वस्यापि वा कारणाग्रहणे प्रयुक्तानि प्रतीयेरन् १-३-७ इत्यत्र वक्ष्यमाणत्वात् सम्भवेऽपवादविषयत्वोपपादनार्थं मुक्तकमेवैतदित्युकम् । तत्कर्तृसामान्यादिति पूर्वपक्षसिद्धान्तभाष्यद्वयमेकहेलया व्याचष्टे—तत्रापीति । इदानीं धर्मबुद्ध्यानुष्ठानेऽपि पूर्वप्रवृत्तिकाले लोभादिमूलत्वसम्भवप्रदर्शनार्थं पूर्वग्रहणम् । लोमस्य मूलत्वसम्भवः पूर्वं कालान्तरे यस्मिन्कर्तृसामान्ये, तस्मादिति हेतुगर्भं विशेषणम् । लोभमूलत्वसम्भवमुपपादयति—ऋत्विजो हीति । आशङ्काशब्देन लोभमूलत्वानिश्चयेऽपि, वेदमूलत्वनिश्चयस्तावन्नास्तीति सूचितम् । ननु वेदमूलत्वस्यापि सम्भवात्कथमप्रामाण्य- निश्चय इत्याशङ्क्य, निराकरणार्थमुपपन्नतरं चेदिति भाष्यं व्याचष्टे—पूर्ववच्चेति । ननु वेदमूलत्वाभावनिश्चयाभिधानपरत्वेऽस्य भाष्यस्य पूर्वंलोभमूलत्वनिश्चयाभिधान- परत्वेन योजनमयुक्तं स्यादित्याशङ्क्याह—इदं चेति । दृष्टे सम्भवत्यदृष्टकल्पनमयुक्तमिति न्यायस्य वेदमूलत्वाभावान्यमूलत्वयोर्निश्चयकारणस्य तुल्यत्वादुभयत्रापि योजितमित्यर्थः । भाष्यकारीयाधिकरणक्षः यथाभाष्यमधिकरणद्वयं व्याख्याय दूषयितुं प्रतिजानीते—एतावत्स्विति । सर्ववेष्टन- स्मरणस्य लोभमूलत्वनिराकरणेन तुल्यन्यायतया यूपहस्तिदानादिस्मरणस्यालोभमूलत्व- निराकरणाद्धर्मबुद्ध्या चेदानीमनुष्ठीयमानानां दृष्टमूलत्वकल्पनासम्भवाद्—अधिकरण- द्वयेऽपीत्युक्तम् । प्रत्यक्षश्रुतिविरोधे हि स्मृतिमूलश्रुत्यभावः साधकाभावाद्वा स्याद् बाधक- सद्भावाद्वा तत्र त्रैवर्णिकदृढपरिग्रहादरस्य स्मृतिमूलश्रुतिसाधकस्य विरोधेऽप्यनपायात्साधका- भावस्तावन्नास्तीत्याह—स्मृतीनामिति । यत्तु जिज्ञासां विना प्रमाणप्रवृत्तेः साधकाभाव इत्युक्तम् । तत् एवं परिहर्त्तव्यम्, यद्यपि परिच्छिन्ने प्रमेये तत्परिच्छेदार्थं श्रुत्यनुमानं न प्रवर्त्तते, तथापि किमियं स्मृतिः प्रमाणमप्रमाणं वेति जिज्ञासायां तत्परिच्छेदार्थं श्रुत्यनुमानप्रवृत्तिर्न वारयितुं शक्यते । प्रमाणान्तरपरिच्छिन्नेऽपि शङ्खशौक्ल्ये शङ्कितपित्तोपघातस्य किं मे चक्षुर्दुष्टमदुष्टं वेति जिज्ञासया चक्षुर्विस्फुरणदर्शनात् परमाण्वादौ च कदाचिदनुपलब्धत्वाद्व्यवहारानानुपयोगित्वाच्च जिज्ञासितेऽप्युपलब्धस्थूलादिकार्यानुपपत्तिपरिहारार्थं प्रमाणप्रवृत्तिदर्शनाच्च जिज्ञासादरः ।

३३२ मीमांसादर्शनम् [ सू० किं च स्मृतेर्मूलप्रमाणोपस्थापनमात्रेण कृतार्थत्वान्नौदुम्बरी प्रमेया, तत्प्रमेयायाः श्रुतेः प्रत्यक्षश्रुत्यविषयत्वेन तया परिच्छेत्तुमशक्यत्वान्नानुमानप्रतिबन्धो युक्त इति । बाधकं तु स्मृतिमूलश्रुत्यभावव्याप्तं लिङ्गं विरुद्धश्रुतिदर्शनस्यानैकान्तिकत्वप्रतिपादनेन पूर्वपक्षवेलायामेव निरस्तम् । अनुपलब्धिस्त्वस्मदादीनां विप्रकीर्णशाखान्तरगतश्रुत्युप- लब्धाशक्तेः स्मर्तृप्रत्यक्षस्य च स्मृत्यधिकरणसाधितत्वेनेदानींतनपुरुपान्तरप्रत्यक्षत्वस्य चोपनयादिस्मृतिमूलश्रुतिदृष्टान्तेनानुमानोपपत्तेः, सर्वानप्रत्यसिद्धत्वान्नाभावसाधनायाऽल- मित्याह-शाखान्तरेति । न च स्मर्तृपुरुषाधीनप्रत्ययत्वमात्रेणानुमेयश्रुतिष्वनाश्वासः अध्यापक- पुरुषाधीनप्रत्यक्षत्वेनेतरास्वप्यनाश्वासापत्तेरित्याह-तत्रेति । नन्वग्निहोत्रादिश्रुतीनां प्रत्यक्षत्वान्न तास्वनाश्वासापत्तिरित्याशङ्क्य वर्णस्वरूपस्य प्रत्यक्षत्वेऽप्यनादिसम्प्रदायागतत्वस्य पुरुषाधीनत्वात्तुल्यतामाह-वेदो हीति । न च स्मरणार्थत्वेन पूर्वदृष्टघटादिवन्नित्यत्वानवधारणं शङ्कनीयमग्निहोत्रादिश्रुतिष्वप्यविशेषादि- त्याह-अनुच्चारणकालेति । उपसंहरति-तेनेति । ननु वेदविरोधेन स्मर्तुरनाप्तत्वान्न मूलश्रुत्यनुमानं सम्भवतीत्याशङ्क्य, प्रत्यक्ष- वेदमूलोपनयनादिस्मृतिप्रणेतृत्वेनावधारितत्वात्तदभावस्य सत्त्वादेरेकदेशविरोधेऽप्यनाप्तत्व- कल्पनं न युक्तमित्याह-स्मृतीति । किं च निष्ठानुमेयाया श्रुतेर्न्यायेन बाधो युज्येतापि, शाखान्तरपठितश्रुतिबाधे तु प्रत्यक्षविरोधाशङ्का दुःपरिहरेत्याह बाधिता चेति । उपरिष्टात्ते इति शब्ददर्शनात्तय्या न्यायविदा भूत्वेत्यध्याहारेण योज्यम् । न चिरादित्य- व्यानव्येऽपि नञो विभाषाधिकारे नञ्समासस्मरणान्न होतारं वृणीते इतिवदसमानान्न- लोपाभावो न दोषः । प्रत्यक्षविरोधाशङ्काया च त्वदुक्तस्य न्यायस्य सम्यक्त्वानवधारणा- न्यायाभासेन मूलश्रुत्यनुमानबाधाङ्गीकरणे मर्यादातिक्रमादिसर्वं पूर्वोक्तमपरिहार्यं स्यादित्याह-बाधेति । न्यायं दूषयित्वोदाहरणानि दूषयन्नाद्यं तावदुदाहरणं 'तामूर्ध्वदशेन' वा ससा परिवेष्ट- यन्तीति प्रत्यक्षश्रुतिमूलत्वाद् दूषयति-यच्चैतदिति । एतच्छान्दोग्यानुपपदे जैमिनिकृते सूत्रग्रन्थे जैमिनिनौदुम्बरीप्रकरणे चेत्यादिना दर्शयतीत्यन्तेन स्वग्रन्थेन शाट्यायनिब्राह्मण- गतश्रुतिमूलत्वेनान्वाख्यातमित्यन्वयः । शाट्यायनिनां शाखिनामौदुम्बरीप्रकरणे तामूर्ध्व- दशेनेति श्रुतिरुभयत्र विष्टुत्यामौदुम्बर्य्यां च वाससी दर्शयतीति जैमिनिग्रन्थस्यार्थः । उभयत्र शब्दः किं विषय इत्यपेक्षायां वैष्टुत इत्याद्युक्तं स्तोत्रीयपरिगणनार्थनामौदुम्बरीणां प्रादेश- मात्राणां कुशानां विष्टुतिशब्दवाच्यानां स्थापनार्थं वासो वैष्टुतमुच्यते । तस्मिन् शौर्वं वासः श्रीः सामेत्यर्थवादपुरःसरं प्रत्यक्षश्रुतिमूलत्वेन दर्शिते तत्प्रसङ्गेनौदुम्बरीवेष्टनवाससाऽपि प्रकाशश्रुतिमूलत्वमेवान्वाख्यातं तामूर्ध्वदेशेनेति प्रकृतौदुम्बरीपरामर्शप्रतीकोपन्यासेनेत्यर्थं । उपसंहरति-ततश्चेति । अविरोधादपीदं नोदाहरणं युक्तमित्याह-विरुद्धत्वे चेति । औदुम्बरी परिवेष्टयितव्येत्येतावन्मात्रं सूत्रकारेणोक्तम्, न सर्वेति तत्र ययोपनेष्यमाणमहतेन

४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ३३३ वाससा छादयन्तीति चक्षुर्मुखानाच्छेदनेऽपि शास्त्रार्थसम्पत्तिः प्रसिद्धा, तथात्रापि भवतीत्याशयः । ननु सर्वशब्दाभावेऽपि परिशब्देनापि सर्वशब्दार्थसम्पत्तेर्विरोध इत्याशङ्क्याह— यदीति । औदुम्बर्याद्युत्तरदेशे पृष्ठेन तां स्पृशतोदङ्मुखेनोपविष्टेनोद्गातव्यं तेन चौदुम्बरी- मध्यस्योत्तरभागे द्वित्राङ्गुलमात्रं स्पृश्यते तदनुरोधेन चोत्तरभागतो मध्ये द्वित्राङ्गुलं विमुच्यते, सर्ववेष्टनेऽपि परिशब्दार्थसम्पत्तेरविरोध इत्यर्थः । एतदेव श्लोकद्वयं यथाक्रमं श्लोकद्वयेन विवृणोति — सर्वेति । भाष्यकारेण गौरवात्कस्मिंश्चित्सूत्रे, कल्पे वा सर्वशब्दो भविष्यतीति कल्पनां निराकर्त्तुम्—न हीत्युक्तम् । सर्ववेष्टनवचने हि कर्णयोर्वेष्टनं कृत्वा वंशो निधेयः, मूलं च वेष्टयित्वा निखातव्यं स्यात्, न चैवं याज्ञिकाः कुर्वन्ति । परिशब्दस्तु समन्तार्थः सर्वतो देशवेष्टनं ब्रूते । न कृत्स्नाया इत्यौदुम्बरीमध्योत्तरभागा द्वित्राङ्गुलवर्ज्जित- सर्वौदुम्बरीवेष्टनेऽप्यर्थवानित्यर्थः । हेतुदर्शनोदाहरणत्वमप्यस्य न सम्भवतीत्याह — लोभमूलं चेति । यदि तर्हि शब्दार्थ- योर्यत्तदित्यव्यये मूलाग्रयोश्च वंशाधारयोः कर्णयोः परिधाने वेष्टने दीर्घवासोलाभाल्लोभमूले तदनुष्ठाने याज्ञिकाचारविरोधः स्यादित्यर्थः । अयं चापरोऽचारविरोधो लोभमूलत्वे प्रसज्येतेत्याह—अन्तरीयेति । पूर्वापरकाययो- रन्तरस्य, मध्यस्य परिधानार्थमधोवासो नान्तरीयकदेशस्य कल्पयित्वान्तरीयतामाचामे- दिति, प्रयोगदर्शनादन्तरीयशब्देनोच्यते । अधरीयोत्तरीय इत्यपि पाठे तदेवोक्तम् । कोशे- यस्य गुणाभावात्कार्पासस्य गुणराहित्यम् । लोभमूलत्वे च कुशवेष्टनपूर्वकत्वोर्ध्वदेशत्वनियमौ न स्यातामित्याह—प्राक्चेति । उदाहरणान्तरमपि दूषयति — किं चेति । अष्टाचत्वारिंशद्वर्षंब्रह्मचर्यंस्यचाष्टाचत्वारिंशद्वर्षं सर्वं वेदब्रह्मचर्यमित्यादि । अथ सर्वं वैदिकविहितत्वादनादाहरणता चकारसूचिता । पूर्वोक्त- बलाबलविशेषं निराकरोति—यदीति । किं तदर्थान्तरमित्यपेक्षायामाह—शान्तीति । न चास्यानारभ्याधीतन्यायेन दौर्बल्यम् । तस्य कल्प्यक्रतुसम्बन्धमनारभ्याधीतम्, कॢप्तं क्रतुसम्बन्धात्प्रकरणाधीताद् दुर्बलम्, क्रतुसम्बन्धविप्रकर्षादित्येवंरूपस्य क्रत्वङ्गविषयत्वादस्य च क्रत्वङ्गविषयत्वाभावादित्याह—न चेति । एतदेवोपपादयति—न हीति । विरोधपरि- हारस्तर्हि कथमित्यपेक्षयामाह—वाक्यान्तरैरिति । दशाहं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते । अर्वाक्सञ्चयनादस्थ्नां त्र्यहमेकाहमेव च ॥ इत्याशौचच्छेदकालानां यथा व्यवस्थितो विकल्पः, तथेहापि भविष्यतीति व्यवस्थित- विकल्पसूचनाय दृष्टान्ताभिधानपरत्वादाशौचकालानाम् । 'एकाहाच्छुद्ध्यते विप्रो योऽग्निवेदसमन्वितः । त्र्यहात्केवलवेदस्तु द्विहीनो दशभिर्दिनैः ॥' इति वचनान्तरेण ।

१३४ मीमांसादर्शनम् [ सू० (दन्तजातपदेन वर्द्धमानोपलक्षकः कुमारादनुजातपदेन वध्वोपलक्षकः, कृतचूडपदेन वर्षत्रयोपलक्षकः ।) 'दन्तजातेऽनुजाते च कृतचूडे च संस्थिते । अशुद्धा बान्धवाः सर्वे सूतके च तथोच्यते ॥' इत्युपक्रमानुसारेण वा व्यवस्थावगमान्न तद्दृष्टान्तेनेह विकल्पाङ्गीकरणं युक्तमित्य- गृहीताभिप्रायः शङ्कते—ननु चेति । अग्निवेदसमन्वितस्य दशाहाशौचानुवृत्तावुभयसाध्य- होमजपादिलोपाद् भूयसी धर्मपीडा स्यात्केवलवेदस्य तन्मात्रसाध्यजपादिलोपादल्पाद्विहीन- स्याल्पतरेति धर्मपीडाल्पत्वमहत्वापेक्षया आदिशब्दाज्जातदन्ताद्यपेक्षया चाशौचकालोऽपि व्यवस्थितविषय इत्यध्याहारेण योज्यम् । उभयत्र समविकल्पनाभ्रयणे कारणं पक्षयोरसाम्यं तावदाह - यस्य हीति । यस्तु विरोधं चापरं विकल्पानाश्रयणे कारणं दृष्टान्ते तावदाह— एकरात्र इति । दाष्ट्रान्तिकेऽप्याह—एवमिति । ननु योऽल्पेन कालेनाहं शुद्धः स्यामिति सङ्कल्पयति, तस्याल्पेन कालेन शुद्धिः बहुकालसङ्कल्पे तु बहुनेति परिग्रहव्यवस्थयाऽशौच- कालानामविरोधः । यश्चाहमक्रीतराजकस्य दीक्षितस्यान्नं न भोक्ष्य इति सङ्कल्पयति, तं प्रति तावत्कालम- भोज्यान्नता । पशुसंस्थावधिसङ्कल्पे तावत्कालीनेत्युभयत्रापि वस्तुविरोधपरिहारमाशङ्कते— स्यादेतदिति । यथा यः प्रागुदये-सूर्योदयोत्तरकालेऽग्निहोत्रं होष्यामीति सङ्कल्पयति, तं प्रत्युदयोत्तरकालोऽग्निहोत्राङ्गम् । यस्तूर्ध्वोदये सूर्योदयात्प्राक्काले होष्यामीति सङ्कल्पयति, तं प्रत्यसाविति परिग्राह्यव्यवस्थाय्रा प्रागूर्ध्वोदयोःकालयोरविरोधः तथैहापीत्यर्थः । प्रागूर्ध्वं चोदयो याभ्यामिति विग्रहः । सर्वेष्वपि वैकल्पिकेषु व्रीहियवादिषु परिग्रहव्यवस्थायै वाऽविरोध इति समविकल्पत्वाविघातः । आशङ्किता विकल्पे इमं परिहारं दूषयति—युक्तमिति । परिग्रहव्यवस्थया वस्तु- विरोधपरिहारो वाऽभिप्रेतः । अनुष्ठानविरोधपरिहारो वा । तत्र वस्तुस्वरूपस्य पुरुषेच्छा- धीनत्वान्न तद्वशेन वस्तुविरोधपरिहारः सम्भवति उदितानुदितहोमयोस्त्वनुष्ठानात्मकत्वा- द्वस्तुविरोधो नास्त्येनेन श्लोकेनोक्तम् । अथानुष्ठानविरोधपरिहारः परिग्रहव्यवस्थयानेन दृष्टान्तेनोच्यते । तदप्ययुक्तम् । पक्षद्वयस्य हि साम्ये सति पुरुषेच्छावशाद्विकल्पेनोभयानुष्ठानं युज्येत । दृष्टान्ते च पक्षद्वयसाम्यात्तद्युक्तमित्याह—न चेति । क्लेशः=शरीरायासः । क्षयो= न्यूनद्रव्यत्वम्, व्ययः=अत्यन्तनाशः । आदिशब्दात्तत्कालीनलौकिककार्यान्तरबाधः । दाष्ट्रान्तिके तु सिद्धे वस्तुनि सदसत्त्वविरोधस्यापरिहार्यत्वाद्विकल्पो—न सम्भवतीत्युक्तम् । न च दीर्घकालस्य परिग्रहः सम्भवत्याशौचावृद्धेर्निषिद्धत्वादित्याह—इह त्विति । न केवलं सदसत्त्वविरोधान्निवार्यते, किं त्वनेनापि मनुवचनेनेत्यपिशब्दार्थः । ननु दीक्षि- तान्नभोज्यत्वस्य दीर्घकालत्वनिषेधाभावात्परिग्रहव्यवस्थयाऽनुष्ठानविरोधपरिहारो भविष्य- तीत्याशङ्क्योभयत्राप्यल्पकालनिरोधेन कृतार्थस्य बहुकालनिरोधे प्रवृत्त्यसम्भवादीर्घकाल-

४ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ३३५ वाक्ययोरानर्थक्यमेवापद्येतेत्याह — श्लेषेति । उभयत्रापि समविकल्पासम्भवमुपसंहरति — तेनेति । वस्तुविरोधात्पक्षयोश्चासाम्याद्विषयान्यत्वमेव विरोधपरिहाराय वाच्यं न तु विकल्पो युक्त इत्यर्थः । स चान्यो विषयो दृष्टान्ते दर्शित इत्याह — स चेति । ननु यस्यापि धर्मपीडा नास्ति, तस्याप्याशौचाद्वृद्धेर्निषिद्धत्वान्नेयं विषयव्यवस्था युक्तेत्याशङ्क्य, निषेधोऽपि तद्विषय एवेत्याह — तत्र चेति । धर्मपीडाद्यपेक्षयेत्यादिशब्दसूचितमाशौचकालानां व्यवस्थान्तरमाह — दन्तेति । आहि- ताग्न्यादिपाठाज्जातशब्दस्य परनिपातः । मानवीयानुजातपदस्यानुपश्चाज्जातमपत्यं यस्मादिति व्याख्यानार्थोऽन्यशब्दप्रक्षेपः । चितिक्रियाशब्दश्चतुरहोपलक्षणार्थः । चितिक्रियात्र्यहैकाहा ये विहिताः ते दन्तजातादिविषया इत्यर्थः । पारिशेष्याद्दशाहं कृतचूड़े चेति चकारसूचितो- पनीतविषयो ज्ञायते । कथमेषा व्यवस्था प्रतीयत इत्यपेक्षायां — क्रमादित्युकम् । दन्तजाता- दिषु संस्थितेष्वशुद्धा बान्धवा इत्युक्ते कस्मिन्संस्थिते कियन्तं कालमशुद्धेत्यपेक्षायां दशाहादीनामुक्तत्वात्स्मृत्यन्तरपर्यालोचनया प्रातिलोम्यक्रमेणेयं व्यवस्था प्रतीयत इत्यर्थः । अस्मिंश्च पक्षे वृद्धिनिषेधोऽप्येकशास्त्रगतत्वादेतद्विषय एवेत्याह — तत्र चेति । नन्वस्तु प्रातिलोम्यक्रमेणैकाहादीनां दन्तजातादिविषयत्वम्, धर्मपीडाल्पत्वविषयत्वे तु किं कारणं दक्षवचनाच्चाग्निवेदसमन्वितादिमात्रविषयत्वं प्रतीयते, न चाग्निवेदसमन्वितत्वं धर्मभूयिष्ठत्वेन नियतम् । दाम्भिकादौ व्यभिचारदर्शनादित्याशङ्क्य दक्षवचनस्य धर्मपीडा- विषयत्वद्योतनार्थं गौतमवचनमुदाहरति — तथेति । कार्यशब्दस्य धर्मविषयत्वात् तत्साह- चर्य्येण च स्वाध्यायशब्दस्यापि स्वाध्यायसाध्यजपादिधर्मविषयत्वप्रतीतेः तद्विघातार्थं सद्यः शौचं विदधताऽल्पाशौचस्य धर्मपीडापरिहारार्थत्वद्योतनान्महत्यामापद्यग्निवेदसाध्यकर्मा- नुष्ठानं विना प्रतीकारासम्भवेऽनुष्ठान्तराभावे वा तत्प्रतीकारार्थकर्मानुष्ठानमात्रविषया- शौचाभावप्रतिपादनपरम् 'एकाहाच्छुद्धयते विप्र' इति दक्षवचनं व्याख्येयमिति भावः । यथा अस्माभिर्दक्षवचनस्य धर्मपीडापरिहारार्थत्वाङ्गीकरणेनाल्पाशौचकालानां — तद्विष- यत्वमुक्तम् । गौतमेनापि तथोक्तं द्योतितमित्यर्थः । नन्वेवं सति तत्कालमात्राशौचाभावप्रतिपादनपरत्वेनोत्तरकालानुवृत्तेरनुज्ञातत्वाज्जा- तदन्तादिविषयाणां चाशौचकालानां भिन्नविषयत्वेन वृद्धेरप्रसक्तत्वान्निषेधो न युक्त इत्याशङ्क्य विषयान्तरमाह — अथ वेति । अन्तर्दशाहात्स्यातां चेत्पुनर्मरणजन्मनी । तावत्स्यादशुचिर्विप्रो यावत्तत्स्यादनिर्दशम् ॥ इति पूर्वाशौचसमाप्तावाशौचान्तरनिमित्तसन्निपात्ते पूर्वाशौचकालशेषेण मनुना शुद्धिमुक्त्वा, निमित्तावृतौ नैमित्तिकाशौचानावृत्तिर्न्यायेत्याशङ्कानिराकरणार्थं पूर्वाशौच- परिच्छेदार्थंप्रवृत्तेन दशाहादिना प्रसङ्गेनान्तः पतितस्याशौचान्तरस्यापि परिच्छेतुं शक्य- त्वादाशौचानावृत्तेर्न्याय्यत्वं न वर्द्धयेदघाहा नीतिनेनोक्तमिति भावः ।