भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

विवाहप्रकरण ११५

ज्ये०उ०फा०आ०श०मू०ह०पुन०पू०भा०अ०आ०ना०
पु०मृ०चित्राअनु०भ०ध०पू०षा०पू०फा०उ०भा०$\leftarrow$<br>म०नाड़ी
स्वातीकृ०आश्ले०उ०षा०वि०रो०म०श्रवणरे०अं०ना०
कन्या का जन्मनक्षत्र और वर का जन्मनक्षत्र यदि किसी एक नाडी में
हो तो विवाह अशुभ होता है और यदि उक्त दोनों नक्षत्र मध्य नाड़ी में हों
तो वर और कन्या की मृत्यु होती है ॥ ३४ ॥
एक अन्य प्रकार का वर्गकूट
अकचटतपयशवर्गाः खगेशमार्जारसिंहशुनाम् ।
सर्पाखुमृगावीनां निजं पञ्चमवैरिणामष्टौ ॥ ३५ ॥
**अन्वयः-**निजं पञ्चमवैरिणां खगेशमार्जारसिंहशुनां सर्पाखुमृगावीनां (क्रमात्)
अष्टौ अकचटतपयशवर्गाः (ज्ञेयाः) ॥ ३५ ॥
अ० क० च० ट० त० प० य० श० ये आठ वर्ग हैं। इनमें गरुड़ का
अवर्ग, बिलार का कवर्ग, सिंह का चवर्ग, कुत्ता का टवर्ग, साँप का तवर्ग,
मूस का पवर्ग, हरिण का यवर्ग और भेंड़ का शवर्ग है। इनमें प्रत्येक वर्ग
का पाँचवाँ वर्ग वैरी होता है। यथा गरुड़ का साँप, बिलार का मूस, सिंह
का हिरण, कुत्ता का भेंड़ इत्यादि। इन वर्गों का प्रयोजन यह है कि कन्या
के नाम का पहिला अक्षर जिस वर्ग में हो उससे वर के नाम का पहिला
अक्षर पाँचवें वर्ग में हो तो विवाह अशुभ होता है और कन्या और वर के
नाम का पहिला अक्षर एक ही वर्ग में हो अथवा उदासीन वर्ग में हो तो
विवाह शुभ होता है ॥ ३५ ॥
अवर्गादि चक्र
ईशवर्णवर्गवैरी
:---:---:---:---
गरुड़अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औअवर्गसाँप
बिलारक ख ग घ ङकवर्गमूस
सिंहच छ ज झ ञचवर्गहरिण
कुत्ताट ठ ड ढ णटवर्गभेंड़
साँपत थ द ध नतवर्गगरुड़
मूसप फ ब भ मपवर्गबिलार
हरिणय र ल वयवर्गसिंह
भेंड़श ष स हशवर्गकुत्ता

११६ मुहूर्तचिन्तामणि नक्षत्र और राशि एक वा भिन्न होने में विशेष राश्यैक्ये चेद्भिन्नमृक्षं द्वयोः स्यान्नक्षत्रैक्ये राशियुग्मं तथैव । नाडीदोषो नो गणानां च दोषो नक्षत्रैक्ये पादभेदे शुभं स्यात् ॥ ३६ ॥ अन्वयः—द्वयोः (कन्यावरयोः) राश्यैक्ये चेत् भिन्नं ऋक्षं तथैव नक्षत्रैक्ये राशियुग्म स्यात् तदा नाडीदोषो नो च गणानां दोषो नो (भवेत्) । तथा नक्षत्रैक्ये पादभेदे (सति) शुभं स्यात् ॥ ३६ ॥ यदि कन्या और वर की जन्मराशि एक हो और जन्मनक्षत्र भिन्न भिन्न हों, अथवा जन्मनक्षत्र एक हो और जन्मराशि भिन्न भिन्न हों तो नाड़ीदोष, गणदोष और तारादोष नहीं होता । एक राशि और भिन्न नक्षत्र का उदाहरण—शतभिष नक्षत्र में कन्या का जन्म और पूर्वाभाद्रपद के तीन पाद के अन्तर वर का जन्म हो तो नक्षत्र भिन्न भिन्न है और कुम्भ राशि एक ही है । एक नक्षत्र और भिन्न राशि का उदाहरण—पूर्वाभाद्रपद के तीन पाद के अन्तर कन्या का जन्म और चौथे पाद में वर का जन्म हो तो नक्षत्र एक ही है और राशि कुम्भ और मीन दो हैं । एक नक्षत्र और भिन्न पाद का उदाहरण—भरणी नक्षत्र के प्रथम पाद में वर का जन्म और द्वितीय पाद में कन्या का जन्म हो तो एक राशि और नक्षत्र होने पर भी शुभ है ॥ ३६ ॥ राशियों के स्वामी कुजशुक्रसौम्यशशिसूर्यचन्द्रजाः कविभौमजीवशनिसौरयो गुरुः । इह राशिपाः क्रियमृगास्यतौलिकेन्दुभतो नवांशविधिरुच्यते बुधैः ॥ ३७ ॥ अन्वयः—इह कुजशुक्रसौम्यशशिसूर्यचन्द्रजाः कविभौमजीवशनिसौरयः गुरुः (क्रमेण) राशिपाः (ज्ञेयाः) (तथा) क्रियमृगास्यतौलिकेन्दुभतः नवांशविधिः बुधैः उच्यते ॥ ३७ ॥ मेष राशि का मंगल, वृष का शुक्र, मिथुन का बुध, कर्क का चन्द्रमा, सिंह का सूर्य, कन्या का बुध, तुला का शुक्र, वृश्चिक का मंगल, धनु का बृहस्पति, मकर और कुम्भ का शनैश्चर और मीन राशि का बृहस्पति स्वामी है ॥ ३७ ॥ राशीश-चक्र

राशिमे०वृ०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०
स्वा०मं०शु०बु०चं०सूर्यबु०शुक्रमं०बृ०श०श०बृ०

विवाहप्रकरण ११७ अब नवांशविधि कहते हैं। प्रत्येक राशि में तीस अंश होते हैं और एक अंश में साठि कला होती हैं। तीन अंश बीस कलाओं का एक नवांश होता है। नव नवांश एक राशि में होते हैं। उनका क्रम यह है कि मेष राशि में मेष से लेकर धनुराशिपर्यन्त नव राशियों के नव नवांश, वृष राशि में मकर से लेकर कन्याराशिपर्यन्त नव राशियों के नव नवांश, मिथुन राशि में तुला से लेकर मिथुनराशिपर्यन्त नव राशियों के नव नवांश, कर्क राशि में कर्क से लेकर मीनराशिपर्यन्त नव राशियों के नव नवांश होते हैं। फिर सिंह राशि से वृश्चिक तक और धनु राशि से मीन तक इसी उक्त विधि से नवांशों का भोग होता है ॥ ३७ ॥ नवांश चक्र

मे०वृ०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०
३।२०मे०म०तु०क०मे०म०तु०क०मे०म०तु०क०
६।४०वृ०कुं०वृ०सिं०वृ०कुं०वृ०सिं०वृ०कुं०वृ०सिं०
१०मि०मी०ध०कं०मि०मी०ध०कं०मि०मी०ध०कं०
१३।२०क०मे०म०तु०क०मे०म०तु०क०मे०म०तु०
१६।४०सिं०वृ०कुं०वृ०सिं०वृ०कुं०वृ०सिं०वृ०कुं०वृ०
२०कं०मि०मी०ध०कं०मि०मी०ध०क०मि०मी०ध०
२३।२०तु०क०मे०म०तु०क०मे०म०तु०क०मे०म०
२६।४०वृ०सिं०वृ०कुं०वृ०सिं०वृ०कं०वृ०सिं०वृ०कुं०
३०ध०क०मि०मी०ध०कं०मि०मी०ध०कं०मि०मी०
होरा
समगृहमध्ये शशिरविहोरा विषमभमध्ये रविशशिनोः सा ॥ ३८ ॥
अन्वयः—समगृहमध्ये (क्रमेण) शशिरविहोरा (भवति) विषमभमध्ये सा (होरा)
रविशशिनोः (क्रमेण) ज्ञेया ॥ ३८ ॥
पन्द्रह अंशों का एक होरा होता है। एक राशि में दो होरा होते हैं।
वृष-कर्कादि सम राशियों में पहिला चन्द्रमा का और दूसरा सूर्य का होरा
होता है और मेष-मिथुनादि विषम राशियों में पहिला सूर्य का और दूसरा
चन्द्रमा का होरा होता है ॥ ३८ ॥

११८ मुहूर्तचिन्तामणि त्रिंशांश शुक्रज्ञजीवशनिभूतनयस्य बाण- शैलाष्टपञ्चविशिखाः समराशिमध्ये । त्रिंशांशको विषमभे विपरीतमस्माद् द्रेष्काणकाः प्रथमपञ्चनवाधिपानाम् ॥ ३९ ॥ अन्वयः—समराशिमध्ये बाणशैलाष्टपञ्चविशिखाः (अंशाः) (क्रमेण) शुक्रज्ञजीव- शनिभूतनयस्य त्रिंशांशका (भवन्ति), विषमभे अस्मात् विपरीतं तथा प्रथमपञ्चन- वाधिपानां द्रेष्काणकाः (भवन्ति) ॥ ३६ ॥ वृष-कर्कादि सम राशियों में पहिले पाँच अंशों का स्वामी शुक्र, तदनन्तर सात अंशों का स्वामी बुध, तदनन्तर आठ अंशों का स्वामी बृहस्पति, तदनन्तर पाँच अंशों का स्वामी शनैश्चर, तदनन्तर पाँच अंशों का स्वामी मंगल होता है। मेष-मिथुनादि विषम राशियों में इससे विपरीत अर्थात् पहिले पाँच अंशों का स्वामी मंगल, तदनन्तर पाँच अंशों का स्वामी शनैश्चर, तदनन्तर आठ अंशों का स्वामी बृहस्पति, तदनन्तर सात अंशों का स्वामी बुध, तदनन्तर पाँच अंशों का स्वामी शुक्र होता है ॥ ३९ ॥ त्रिंशांश चक्र

ग्रहशु०बु०बृ०श०मं०ईश
समगृहअंश
ग्रहमं०श०बृ०बु०शु०ईश
विषमगृहअंश
द्रेष्काण
दश अंशों का एक द्रेष्काण होता है। एक राशि में तीन द्रेष्काण होते
हैं। जिस राशि में द्रेष्काण जानना हो उस राशि का स्वामी ही पहिले
द्रेष्काण का स्वामी होता है, और उससे पाँचवीं राशि का स्वामी दूसरे
द्रेष्काण का, और नवीं राशि का स्वामी तीसरे द्रेष्काण का स्वामी होता

विवाहप्रकरण ११९ है । उदाहरण—मेष राशि में पहला द्रेष्काण मंगल का, दूसरा सूर्य का और तीसरा द्रेष्काण बृहस्पति का होता है ॥ ३९ ॥ द्रेष्काण चक्र

अंशमे०वृ०मि०क०सिंहकं०तु०वृ०ध०म०कुं०मी०
१०मं०शु०बु०च०सू०बु०शु०मं०बृ०श०श०बृ०
२०सू०बु०शु०मं०बृ०श०श०बृ०मं०शु०बु०चं०
३०बृ०श०श०बृ०मं०शु०बु०चं०सू०बु०शु०मं०
द्वादशांश विधि
स्याद्द्वादशंश इह राशित एव गेहं
होराथ दृक्कनवमांशकसूर्यभागाः ।
त्रिंशांशकश्च षडिमे कथितास्तु वर्गाः
सौम्यैः शुभं भवति चाशुभमेव पापैः ॥ ४० ॥
अन्वयः—इह राशितः एव द्वादशांशः (स्यात्) अथ गेहं, होरा दृक्कनवमांशकसूर्य-
भागाः च त्रिंशांशकः इमे षड्वर्गाः कथिताः, (तत्र) सौम्यैः (षड्वर्गेः) शुभ पापैः च
अशुभं (फलं) भवति ॥ ४० ॥
दो अंश तीस कलाओं का एक द्वादशांश होता है । एक राशि में बारह
द्वादशांश होते हैं। उनका यह क्रम है कि जिस राशि में द्वादशांशों का
विचार करना हो उसी राशि से लेकर क्रम से बारह राशियों के द्वादशांश
होते हैं। यथा मेष राशि में पहिला द्वादशांश मेष ही का, दूसरा वृष
का, तीसरा मिथुन का, चौथा कर्क का, पाँचवाँ सूर्य का, छठा कन्या
का, सातवाँ तुला का, आठवाँ वृश्चिक का, नवाँ धनु का, दशवाँ मकर
का, गेरहवाँ कुम्भ का और बारहवाँ मीन का द्वादशांश होता है ।
ऐसे ही वृष राशि में पहिला द्वादशांश वृष का और दूसरा मिथुन का
इत्यादि ।

१२० मुहूर्तचिन्तामणि द्वादशांश चक्र

मे०वृ०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुम्भमी०
२।३०मे०वृ०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुम्भमी०
वृ०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुम्भमी०मे०
७।३०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुम्भमो०मे०वृ०
१०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुम्भमी०मे०वृ०मि०
१२।३०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुम्भमी०मे०वृ०मि०क०
१५कं०तु०वृ०ध०म०कुम्भमी०मे०वृ०मि०क०सिं०
१७।३०तु०वृ०ध०म०कुम्भमी०मे०वृ०मि०क०सिं०कं०
२०वृ०ध०म०कुम्भमी०मे०वृ०मि०क०सिंहकं०तु०
२२।३०ध०म०कुम्भमी०मे०वृ०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०
२५म०कुम्भमी०मे०वृ०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०
२७।३०कुम्भमी०मे०वृ०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०
३०मी०मे०वृ०मि०क०सिं०कं०तु०वृ०ध०म०कुम्भ
षड्वर्ग
राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश, और त्रिंशांश ये छः षड्वर्ग
कहे जाते हैं। षड्वर्ग शुभ ग्रहों से शुभ और पाप ग्रहों से अशुभ हो जाता
है, अर्थात् यदि शुभ ग्रह शुभ ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि में स्थित हो
तो शुभ फल होता है और शुभ ग्रह पाप ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि
में, अथवा पाप ग्रह शुभ ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि में स्थित हो तो
सम फल होता है। और पाप ग्रह पाप ग्रहों के राशि, होरा, द्रेष्काणादि में
स्थित हो तो अशुभ फल होता है ॥४०॥
नक्षत्रों की पूर्वार्द्धयोग आदि संज्ञा और उनका फल
पौष्णेशाक्राद्रससूर्यनन्दाः पूर्वार्द्धमध्यापरभागयुग्मम् ।
भर्त्ता प्रियःप्राग्युजिभे स्त्रियाः स्यान्मध्ये द्वयोः प्रेमपरे प्रिया स्त्री ॥ ४१ ॥
अन्वयः—पौष्णेशाक्रात् रससूर्यनन्दाः (क्रमात्) पूर्वार्द्धमध्यापरभागयुग्मं (स्यात्)
प्राग्युजिभे स्त्रियाः भर्त्ता प्रियः स्यात् । मध्ये द्वयोः प्रेम (भवति) परे (भर्तुः) स्त्री
प्रिया भवति ॥ ४१ ॥

विवाहप्रकरण १२१ रेवती नक्षत्र से लेकर छः, अर्थात् रेवती, अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, इन नक्षत्रों को पूर्वार्द्धयोगि कहते हैं। आर्द्रा से लेकर बारह, अर्थात् आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तरा- फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा इन नक्षत्रों को मध्ययोगि कहते हैं। ज्येष्ठा से लेकर नव, अर्थात् ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद इन नक्षत्रों को अपरभागयोगि कहते हैं। यदि पहिले-पहिल पुरुष-स्त्री का समागम पूर्वार्द्धयोगि नक्षत्रों में हो तो स्त्री को स्वामी प्रिय होता है। मध्ययोगि नक्षत्रों में हो तो स्त्री-पुरुष दोनों में परस्पर प्रीति होती है और अपरभागयोगि नक्षत्रों में हो तो स्वामी को स्त्री प्यारी होती है ॥ ४१ ॥ स्वामी और सेवक के जन्मनक्षत्र का विचार सेव्याधमर्णयुवतीनगरादिभं चेत् पूर्वंहि भृत्यधनिभर्तृ पुरादिसङ्गात् । सेवाविनाशधननाशनभर्तृ नाश- ग्रामादिसौख्यहृदिदं क्रमशः प्रदिष्टम्

१२२ मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—ज्येष्ठापौष्णभसार्पभान्त्यघटिकायुग्मं च (तथा) मूलाश्विनीपित्र्यादौ घटिकाद्वयं तद्द्वस्य गण्डान्तकं निगदितम्। कर्कल्यण्डजभान्ततः अर्द्धघटिका, सिंहाश्व- मेषादिगा (अर्द्धघटिका) तथा पूर्णान्ते घटिकात्मकं च (तथा) नन्दातिथेः आदिम- घटिकात्मकं गण्डान्तं अशुभदं (भवेत्) ॥ ४३ ॥ ज्येष्ठा, रेवती और आश्लेषा में अन्त के दो दण्ड तथा मूल, अश्विनी और मघा में आदि के दो दण्ड गंडान्त कहा जाता है। अर्थात् रेवती-अश्विनी आश्लेषा-मघा, ज्येष्ठा-मूल इन नक्षत्रों की सन्धि में चार-चार दंड गंडान्त होता है। कर्क, वृश्चिक और मीन लग्न में अन्त का आधा दण्ड तथा सिंह, धन और मेष में आदि का आधा दण्ड गंडान्त है। अर्थात् मीन-मेष, कर्क-सिंह, वृश्चिक-धनु इन लग्नों की सन्धि में एक-एक दंड गंडान्त होता है। पञ्चमी, दशमी, पूर्णमासी और अमावास्या में अंत का एक दण्ड तथा परीवा, छठि और एकादशी में आदि का एक दण्ड गंडान्त होता है। अर्थात् पूर्णमासी- परीवा, अमावास्या-परीवा, पंचमी-छठि, दशमी-एकादशी, इन तिथियों की सन्धि में दो-दो दंड गंडान्त होता है। गण्डान्त में विवाहादि शुभ कार्य न करना चाहिए। यदि अज्ञान से विवाह किया जाता है तो स्त्री शोक करने- वाली, वन्ध्या अथवा मृतवत्सा होती है। अभिजित्*संज्ञक मुहूर्त्त में विवाहादि शुभ कार्य करे तो गंडान्त दोष नहीं होता ॥ ४३ ॥ कर्तरी दोष लग्नात्पापावृज्वनृजू व्ययार्थस्थौ यदा तदा। कर्तरी नाम सा ज्ञेया मृत्युदारिद्र्यशोकदा ॥ ४४ ॥ अन्वयः—यदा ऋज्वनृजू पापौ लग्नात् व्ययार्थस्थौ (स्याताम्) तदा कर्तरीनाम ज्ञेया। सा मृत्युदारिद्र्यशोकदा (भवति) ॥ ४४ ॥ यदि पापग्रह मार्गी† होकर लग्न से बारहवें स्थान में और दूसरा पाप- ग्रह वक्री‡ होकर लग्न से दूसरे स्थान में स्थित हो तो इसे कर्तरी दोष कहते हैं। विवाहादि शुभ कार्यों में कर्तरी दोष मृत्यु, दारिद्र्य और शोक देने- वाला होता है। ऐसे ही कोई पापग्रह मार्गी होकर चन्द्रमा से बारहवें स्थान में और दूसरा पापग्रह वक्री होकर चन्द्रमा से दूसरे स्थान में स्थित हो तो इसे भी कर्तरी कहते हैं। यह भी पूर्वोक्त फल देनेवाली होती है। इसी रीति से सब भावों की कर्तरी होती है ॥ ४४ ॥ *आगे कहेंगे। †आगे को चलनेवाला। ‡पीछे को लौटनेवाला।

विवाहप्रकरण १२३ संग्रह × दोष चन्द्रे सूर्यादिसंयुक्ते दारिद्र्यं मरणं शुभम् । सौख्यं सापत्न्यवैराग्ये पापद्वययुते मृतिः ॥ ४५ ॥ अन्वयः—चन्द्रे सूर्यादिसंयुक्ते दारिद्र्यं, मरण, शुभं, सौख्यं (स्यात्) सापत्न्य- वैराग्ये (भवतः) तथा पापद्वययुते (चन्द्रे) मृतिः स्यात् ॥ ४५ ॥ विवाहकाल में चन्द्रमा यदि सूर्य के साथ हो तो स्त्री-पुरुष दरिद्र होते हैं, मंगल के साथ हो तो दोनों की मृत्यु, बुध के साथ हो तो शुभ, बृहस्पति के साथ हो तो सुख और शुक्र के साथ हो तो स्त्री के सौत आती है तथा शनैश्चर संयुक्त हो तो स्त्री-पुरुष में प्रीति नहीं होती है । यदि चन्द्रमा दो, तीन अथवा कई पापग्रहों से संयुक्त हो तो स्त्री-पुरुष की मृत्यु होती है । नारदजी ने बुध के योग में सन्तान-हानि, बृहस्पति के योग में भाग्य-हानि, शनैश्चर के योग में संन्यास, राहु के योग में स्त्री-पुरुष का परस्पर झगड़ा और केतु के योग में सदा कष्ट वा दरिद्रता कहा है । यदि चन्द्रमा अपनी उच्च राशि में, अपने मित्र की राशि में अथवा अपनी राशि में स्थित होकर शुभग्रह-संयुक्त हो तो शुभफलकारक और यदि इससे विपरीत हो तो अशुभ- फलकारक होता है ॥ ४५ ॥ अष्टमलग्न का दोष और परिहार जन्मलग्नभयोर्मृत्युराशौ नेष्टः करग्रहः । एकाधिपत्ये राशीशमैत्रे वा नैव दोषकृत् ॥ ४६ ॥ अन्वयः—जन्मलग्नभयोः मृत्युराशौ करग्रहः नेष्टः । एकाधिपत्ये वा राशीशमैत्रे नैव दोषकृत् ॥ ४६ ॥ स्त्री वा पुरुष की जन्मलग्न वा जन्मराशि से आठवीं लग्न में विवाह शुभ नहीं होता । यदि जन्मलग्न का स्वामी वा जन्मराशि का स्वामी जन्म- लग्न वा जन्मराशि से आठवीं लग्न का भी स्वामी हो अथवा आठवीं लग्न के स्वामी का मित्र हो तो उक्त दोष नहीं होता ॥ ४६ ॥ अन्य परिहार मीनोक्षकर्कलिमृगस्त्रियोऽष्टमं लग्नं यदा नाष्टमगेहदोषकृत् । अन्योन्यमित्रत्ववशेन सा वधूर्भवेत्सुतायुर्हृत्सौख्यभागिनी ॥ ४७ ॥ × चन्द्रमा के साथ एक राशि में अन्य ग्रहों के रहने का नाम ।

१२४ मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—मीनोक्षकर्कलिमृगस्त्रियः यदा अष्टमं लग्नं (भवेत्) तदा अष्टम- गेहदोषकृत् न (स्यात्) अन्योन्यमित्रत्ववशेन सा वधूः सुतायुर्गृहसौख्यभागिनी- भवेत् ॥ ४७ ॥ यदि स्त्री वा पुरुष की जन्मलग्न वा जन्मराशि से आठवीं लग्न मीन, वृष, कर्क, वृश्चिक, मकर और कन्या में से कोई हो तो आठवीं लग्न का दोष नहीं होता; क्योंकि ये दोनों परस्पर मित्र अथवा एक ही हैं। उदा- हरण—यथा स्त्री वा पुरुष की जन्मलग्न या जन्मराशि सिंह हो तो उससे आठवीं मीन हुई। सिंह के स्वामी सूर्य और मीन के स्वामी बृहस्पति की परस्पर मित्रता होने के कारण विवाह में दोष नहीं हो सकता। ऐसे ही तुला से आठवीं वृष होती है। तुला और वृष दोनों का स्वामी शुक्र है, इसलिये विवाह में कोई दोष नहीं हो सकता, ऐसे ही कर्कादि को भी जानना चाहिए। यदि ऐसे योग में विवाह हो तो वह स्त्री उत्तम पुत्र, आयु, उत्तम घर और सुख पाती है ॥ ४७ ॥ आठवीं राशि के नवांश और बारहवीं राशि का दोष मृतिभवनांशो यदि च विलग्ने तदधिपतिर्वा न शुभकरः स्यात् । व्ययभवनं वा भवति तदंशस्तदधिपतिर्वा कलहकरः स्यात् ॥ ४८ ॥ अन्वयः—मृतिभवनांशः वा तदधिपतिः यदि विलग्ने (भवेत्) तदा शुभकरः न स्यात् । यदि व्ययभवनं वा तदंशः वा तदधिपतिः यदि (विलग्ने) भवति तदा कलहकरः स्यात् ॥ ४८ ॥ स्त्री वा पुरुष की जन्मराशि से वा जन्मलग्न से आठवीं राशि का नवांश वा आठवीं राशि का स्वामी लग्न में स्थित हो तो विवाह शुभकारक नहीं होता। ऐसे ही बारहवीं राशि, बारहवीं राशि का नवांश वा बारहवीं राशि का स्वामी यदि लग्न में हो तो स्त्री-पुरुष में परस्पर झगड़ा होता है ॥ ४८ ॥ विषघटी-दोष खरामतो ३० न्यादितिवह्निपित्र्यभे खवेदतः ४० के रदत ३२ श्च सार्पभे । खबाणतो ५० श्वे धृतितो १८ र्यमाम्बुपे कृते २० र्भगत्वाष्ट्रभविश्वजीवभे ॥ ४९ ॥

विवाहप्रकरण १२५ मनो १४ द्विदैवानिलसौम्यशाक्रभे कुपक्षतः २१ शैवकरेऽष्टिट् १६ तोऽजभे । युगाश्वितो २४ बुघ्न्यभतोययाम्यभे खचन्द्रतो १० मित्रभवासवश्रुतौ ॥ ५० ॥ मूलेऽङ्गबाणा ५६ द्विषनाडिकाः कृताः वर्ज्या शुभेऽथो विषनाडिका ध्रुवाः । निघ्ना भभोगेन खतर्क ६० भाजिताः स्फुटा भवेयुर्विषनाडिकास्तथा ॥ ५१ ॥ अन्वयः—अन्त्यादितिवह्निपित्र्यभे खरामतः, के खवेदातः, सार्पभे रदतः, अश्वे खबाणतः, अर्यमाम्बुपये धृतितः, भगत्वाष्ट्रभविश्वजीवभे कृतेः, द्विदैवानिलसौम्यशाक्रभे मनोः, शैवकरे कुपक्षतः, अजभे अष्टिटः, बुघ्न्यभतोययाम्यभे युगाश्वितः, मित्रभवासवश्रुतौ खचन्द्रतः, मूले अङ्गबाणात् कृ

१२६ मुहूर्त्तचिन्तामणि तो सैंतीस दण्ड बत्तीस पल लब्ध हुए। इन्हीं सैंतीस दण्ड बत्तीस पल के बाद चार दण्ड विषनाड़ी होगी। ऐसे ही और भी जानना चाहिए ॥ ४९-५१ ॥ दिन के पन्द्रह मुहूर्त्त गिरिशभुजगमित्राः पित्र्यवस्वम्बुविश्वे- ऽभिजिदथ च विधातापीन्द्र इन्द्रानलौ च निर्ऋतिरुदकनाथोऽप्यर्यमाथो भगः स्यु क्रमशः इह मुहूर्त्ता वासरे बाणचन्द्राः ॥ ५२ ॥ अन्वयः—गिरिशभुजगमित्राः पित्र्यवस्वम्बुविश्वे अभिजित् अथ च विधाता अपि च इन्द्रः इन्द्रानलौ, निर्ऋतिः उदकनाथः, अपि (तथा) अर्यमा अथो भगः इमे बाणचन्द्राः (पञ्चदश) मुहूर्त्ताः क्रमशः वासरे स्युः ॥ ५२ ॥ दिन का जितना मान हो उसमें पन्द्रह का भाग देने से जो दण्ड पल लब्ध हों वही एक मुहूर्त्त का मान होता है। पहिले मुहूर्त्त का स्वामी महादेव, दूसरे का सर्प, तीसरे का मित्र नामक सूर्य, चौथे के पितर, पाँचवें के वसु, छठे का जल, सातवें के विश्वेदेव, आठवें का अभिजित्, नवें का विधाता, दशवें का इन्द्र, गेरहवें के इन्द्र और अग्नि, बारहवें का राक्षस, तेरहवें का वरुण, चौदहवें का अर्यमा नामक सूर्य और पन्द्रहवें का भग नामक सूर्य स्वामी है। क्रम से ये पन्द्रह मुहूर्त्त दिन में होते हैं ॥ ५२ ॥ रात्रि के मुहूर्त्त शिवोऽजपादादष्टौ स्युर्भेशा अदितिजीवकौ। विष्ण्वर्कत्वाष्ट्रमरुतो मुहूर्त्ता निशि कीर्तिताः ॥ ५३ ॥ अन्वयः—शिवः अजपादात् अष्टौ भेशाः अदितिजीवकौ विष्ण्वर्कत्वाष्ट्रमरुतः (एते) निशि [रात्रौ] मुहूर्त्ताः स्युः ॥ ५३ ॥ दिनमान को साठ में घटाने पर जो बाकी रहे वह रात्रिमान होता है। उसमें पन्द्रह का भाग देने से जो दण्ड-लब्ध हों वह रात्रि में एक मुहूर्त्त का मान होता है। रात्रि में पहिले मुहूर्त्त के स्वामी शिव और दूसरे मुहूर्त्त से लेकर नवें मुहूर्त्त पर्यन्त आठ मुहूर्त्तों के पूर्वभाद्रपद आदि आठ नक्षत्र स्वामी होते हैं, अर्थात् दूसरे मुहूर्त्त के स्वामी अजपाद नामक शिव, तीसरे मुहूर्त्त के अहिर्बुध्न्य नामक शिव, चौथे मुहूर्त्त के पूषा नामक सूर्य, पाँचवें मुहूर्त्त के अश्विनीकुमार, छठे मुहूर्त्त के यम, सातवें मुहूर्त्त के अग्नि, आठवें मुहूर्त्त के

विवाहप्रकरण १२७ ब्रह्मा, नवें मुहूर्त्त के चन्द्रमा, दशवें मुहूर्त्त के अदिति, गेरहवें मुहूर्त्त के बृहस्पति, बारहवें मुहूर्त्त के विष्णु, तेरहवें मुहूर्त्त के सूर्य, चौदहवें मुहूर्त्त के त्वष्टा अर्थात् विश्वकर्मा और पन्द्रहवें मुहूर्त्त का वायु स्वामी है । क्रम से ये पन्द्रह मुहूर्त्त रात्रि में होते हैं ॥ ५३ ॥ आदित्यादि वारों में निषिद्ध मुहूर्त्त रवावर्यमा ब्रह्मरक्षश्च सोमे कुजे वह्निपित्र्ये बुधे चाभिजित्स्यात् । गुरौ तोयरक्षौ भृगौ ब्राह्मपित्र्ये शनावीशसापौ मुहूर्त्ता निषिद्धाः ॥ ५४ ॥ अन्वयः—रवौ अर्यमा, सोमे ब्रह्मरक्षः, कुजे वह्निपित्र्ये, बुधे अभिजित्, गुरौ तोय- रक्षौ, भृगौ ब्राह्मपित्र्ये, शनौ ईशसार्पौ, (इमे) मुहूर्त्ताः निषिद्धाः (ज्ञेयाः) ॥ ५४ ॥ रविवार में अर्यमा नामक मुहूर्त्त, सोमवार में ब्रह्म और राक्षस दो मुहूर्त्त, मङ्गल में अग्नि और पितर दो मुहूर्त्त, बुधवार में अभिजित् नामक मुहूर्त्त, बृहस्पतिवार में जल और राक्षस दो मुहूर्त्त, शुक्रवार में ब्राह्म और पितर दो मुहूर्त्त, शनैश्चर में महादेव और सर्प दो मुहूर्त्त निषिद्ध होते हैं । इन दिनों के इन मुहूर्त्तों में कोई शुभ कार्य न करना चाहिए । इन मुहूर्त्तों का और भी यह प्रयोजन है कि किसी कार्य की आवश्यकता हो और जिस नक्षत्र में उस कार्य के करने को कहा है, वह नक्षत्र उस काल में नहीं है तो उस नक्षत्र के स्वामी के मुहूर्त्त में उस कार्य को कर ले ॥ ५४ ॥ विवाह के नक्षत्र और अभिजित् नक्षत्र का मान निर्वेधैः शशिकरमूलमैत्रपित्र्य- ब्राह्मान्त्योत्तरपवनैः शुभो विवाहः । रिक्तामारहिततिथौ शुभेऽह्नि वैश्व- प्रान्त्याङ्घ्रिः श्रुतितिथिभागतोऽभिजित्स्यात् ॥ ५५ ॥ अन्वयः—निर्वेधैः शशिकरमूलमैत्रपित्र्यब्राह्मान्त्योत्तरपवनैः, रिक्तामारहिततिथौ, शुभे अह्नि, विवाहः शुभः (स्यात्), तथा वैश्वप्रान्त्यांघ्रिः श्रुतितिथिभागतः अभिजित् स्यात् ॥ ५५ ॥ सूर्यादि ग्रहों से विद्ध* नक्षत्रों को छोड़ मृगशिरा, हस्त, मूल, अनुराधा, मघा, रोहिणी, रेवती, तीनों उत्तरा और स्वाती नक्षत्र में चौथ, नवमी, चतुर्दशी, अमावास्या को छोड़ अन्य तिथियों में और शुभ दिन अर्थात् *वेध का प्रकार आगे कहेंगे ।

१२८ मुहूर्त्तचिन्तामणि सोमवार, बुध, बृहस्पति, शुक्रवार में विवाह शुभ होता है। उत्तराषाढ़ नक्षत्र के चौथे चरण से लेकर श्रवण के चार दण्ड बीते तक अभिजित् नाम नक्षत्र कहा जाता है ॥ ५५ ॥ ग्रहों द्वारा नक्षत्रों का वेध वेधोऽन्योन्यमसौ विरिञ्च्यभिजितोर्याम्यानुराधक्षंयो- र्विश्वेन्द्रोर्हरिपित्र्ययोर्ग्रहकृतो हस्तोत्तराभाद्रयोः। स्वातीवारुणयोर्भवेन्निर्रऋतिभादित्यस्तथोपान्त्ययोः खेटे तत्र गते तुरीयचरणाद्योर्वा तृतीयद्वयोः ॥ ५६ ॥ अन्वयः—विरिञ्च्यभिजितोः, याम्यानुराधक्षंयोः, विश्वेन्द्रोः, हरिपित्र्ययोः, हस्तोत्तराभाद्रयोः, स्वातीवारुणयोः, निर्रऋतिभादित्ययोः, तथा उपान्त्ययोः ग्रहकृतः वेधः भवेत्। तत्र गते खेटे तुरीयचरणाद्योः वा (तथा) तृतीयद्वयोः वेधः भवेत् ॥ ५६ ॥ पाँच रेखा खड़ी खींचकर उन्हीं के ऊपर पाँच आड़ी रेखा और चारों कोनों में दो-दो तिरछी रेखा खींचे, तब जो आकार बन जाता है, उसे पञ्च- शलाका चक्र कहते हैं। इस चक्र में ऊपर बाईं ओर के कोने में खींची हुई दूसरी रेखा के छोर पर कृत्तिका नक्षत्र स्थापित करके फिर दाहिने क्रम से सब रेखाओं के छोरों पर रोहिणी से लेकर भरणी पर्यन्त सब नक्षत्र स्थापित किये जाते हैं। तब एक रेखा के दोनों छोरों पर जो नक्षत्र रहते हैं उन दोनों का परस्पर वेध होता है। उदाहरण—यथा रोहिणी और अभिजित् का, भरणी और अनुराधा का, उत्तराषाढ़ और मृगशिरा का, श्रवण और मघा का, हस्त और उत्तराभाद्रपद का, स्वाती और शतभिष का, मूल और पुनर्वसु का, उत्तराफाल्गुनी और रेवती का परस्पर वेध होता है। परन्तु यह वेध ग्रहकृत होता है, अर्थात् एक रेखा में स्थित दो नक्षत्रों में से किसी एक में जो ग्रह स्थित हो वह दूसरे को वेधता है। यथा रोहिणी में कोई ग्रह स्थित हो तो वह अभिजित् को वेधता है और अभिजित् में कोई ग्रह स्थित हो तो वह रोहिणी को वेधता है। ऐसा ही वेध सब नक्षत्रों में जानना चाहिये। इसी चक्र में पाद-वेध भी कहते हैं। उसकी रीति यह है कि एक रेखा में स्थित जिन दो नक्षत्रों का परस्पर वेध होता है उनमें से किसी नक्षत्र के चौथे पाद में ग्रह स्थित हो तो वह उसी रेखा में स्थित दूसरे नक्षत्र के पहिले पाद को वेधता है, यदि तीसरे पाद में स्थित हो तो दूसरे पाद को और दूसरे पाद में स्थित हो तो तीसरे पाद को और पहिले

विवाहप्रकरण १२९ पाद में स्थित हो तो चौथे पाद को वेधता है। यथा रोहिणी के पहिले पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के चौथे पाद को और रोहिणी के दूसरे पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के तीसरे पाद को और रोहिणी के दूसरे पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के तीसरे पाद को और रोहिणी के चौथे पाद में स्थित ग्रह अभिजित् के पहिले पाद को वेधता है। इसी तरह अन्यत्र भी पादवेध जानना चाहिए ॥ ५६ ॥ सप्तशलाका चक्र में ग्रहों द्वारा नक्षत्रों का वेध शाक्रेज्ये शतभानिले जलशिवे पौष्णार्यमर्क्षे वसु- द्वीशे वैश्वसुधांशुभे हयभगे सार्पानुराधे मिथः । हस्तोपान्तिमभे विधातृविधिभे मूलादिती त्वाष्ट्रभा- जाङ्घ्री याम्यमघे कृशानुहरिभे विद्धे कुभृद्रेखिके ॥ ५७ ॥ अन्वयः -कुभृद्रखिके (सप्तशलाके चक्रे) शाक्रेज्ये, शतभानिले, जलशिवे पौष्णार्य- मर्क्षे, वसुद्वीशे, वैश्वसुधांशुभे, हयभगे, सार्पानुराधे, हस्तोपान्तिमभे, विधातृविधिभे, मूलादिती, त्वाष्ट्रभाजांघ्री, याम्यमघे, कृशानुहरिभे, मिथः विद्धे (स्तः) ॥ ५७ ॥ सात रेखा खड़ी खींचकर उन्हीं के ऊपर सात रेखा आड़ी खींचने से जो आकार बन जाता है उसे सप्तशलाका चक्र कहते हैं। इस सप्तशलाका चक्र में ऊपर बाईं ओर खड़ी रेखा के छोर पर कृत्तिका नक्षत्र को स्थापित करके दाहिने क्रम से सब रेखाओं के छोरों पर रोहिणी आदि भरणीपर्यंत सब नक्षत्र स्थापित किये जाते हैं। तब जो एक रेखा के दोनों छोरों पर दो नक्षत्र रहते हैं उनका परस्पर वेध होता है। यथा ज्येष्ठा और पुष्य का, शतभिष और स्वाती का, पूर्वाषाढ़ और आर्द्रा का, रेवती और उत्तरा- फाल्गुनी का, धनिष्ठा और विशाखा का, उत्तराषाढ़ और मृगशिरा का, अश्विनी और पूर्वाफाल्गुनी का, आश्लेषा और अनुराधा का, हस्त और उत्तराभाद्रपद का, रोहिणी और अभिजित् का, मूल और पुनर्वसु का, चित्रा और पूर्वाभाद्रपद का, भरणी और मघा का कृत्तिका और श्रवण का परस्पर वेध होता है। यह वेध भी ग्रह के द्वारा होता है अर्थात् एक रेखा के दोनों छोरों पर स्थित दो नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वह ग्रह उसी रेखा के दूसरे छोर पर स्थित दूसरे नक्षत्र को वेधता है। यथा ज्येष्ठा नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वह पुष्य नक्षत्र को वेधता है, अथवा पुष्य ही नक्षत्र में कोई ग्रह स्थित हो तो वह ज्येष्ठा नक्षत्र को वेधता

१३० \t\t मुहूर्त्तचिन्तामणि है। इसी तरह इस सप्तशलाका चक्र में क्रूरग्रह* करके वेधा हुआ नक्षत्र और शुभग्रह करके वेधा हुआ नक्षत्र का एक पाद विवाहादि शुभ कार्यों में त्यागना चाहिए; क्योंकि दीपिका ग्रन्थ में कहा है कि जिस स्त्री के विवाह- काल में सप्तशलाका चक्र में पापग्रहों वा शुभग्रहों से चन्द्रमा विद्ध हो वह स्त्री विवाहकाल ही के वस्त्र पहने रोती हुई श्मशानभूमि को जाती है ॥ ५७ ॥ सप्तशलाका चक्र कृ. रो. मृ. आ. पु. पु. श्ले. भ. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── म. अ. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── पू. रे. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── उ. उ. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── ह. पू. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── चि. श. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── स्वा. ध. ──┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼── वि. श्र. अ. उ. पू. मू. ज्ये. अ. क्रूरग्रहों से विद्ध नक्षत्रों का दोष और उसका परिहार ऋक्षाणि क्रूरविद्धानि क्रूरमुक्तादिकानि च । भुक्त्वा चन्द्रेण मुक्तानि शुभार्हाणि प्रचक्षते ॥ ५८ ॥ अन्वयः—क्रूरविद्धानि क्रूरभुक्तादिकानि च ऋक्षाणि (तानि यदि) चन्द्रेण भुक्त्वा मुक्तानि (तदा) शुभार्हाणि प्रचक्षते ॥ ५८ ॥ जो नक्षत्र क्रूरग्रहों करके पंचशलाका या सप्तशलाका चक्र में वेधे गये हों और जिनको क्रूरग्रहों ने भोग करके शीघ्र ही छोड़ दिया हो और जिन नक्षत्रों में क्रूरग्रह स्थित हों और जिन नक्षत्रों में क्रूरग्रह जानेवाले हों और जिन नक्षत्रों में भौम, दैव, आन्तरिक्ष, इन तीन प्रकार के उत्पातों में से कोई उत्पात हुआ हो, वे सब नक्षत्र शुभ नहीं होते । इसलिए उन नक्षत्रों में विवाहादि शुभ कार्य नहीं करना चाहिए और उन्हीं नक्षत्रों को यदि चन्द्रमा ने भोग करके छोड़ दिया हो तो शुभ हो जाते हैं अर्थात् एक महीने के बाद वे सब नक्षत्र शुभ कार्य करने के लिए शुभ हो जाते हैं ॥ ५८ ॥ *सूर्य, क्षीण चन्द्रमा, मङ्गल, शनैश्चर, राहु और केतु ये क्रूर तथा पापग्रह कहे जाते हैं ।

विवाहप्रकरण १३१ लत्तादोष ज्ञराहुपूर्णेन्दुसिताः स्वपृष्ठे भं सप्तगोजातिशरैर्मितं हि । संलत्तयन्तेऽर्कशनीज्यभौमाः सूर्याष्टतर्काग्निमितं पुरस्तात् ॥ ५९ ॥ अन्वयः—ज्ञराहुपूर्णेन्दुसिताः स्वपृष्ठे सप्तगोजातिशरैर्मितं भं संलत्तयन्ते । (तथा) अर्कशनीज्यभौमाः पुरस्तात् (अग्रे) सूर्याष्टतर्काग्निमितं भं संलत्तयन्ते ॥ ५६ ॥ बुध, राहु, पूर्ण चन्द्रमा, शुक्र ये ग्रह क्रम से अपने पिछले सातवें, नवें, बाइसवें, पाँचवें नक्षत्र को लतियाते हैं अर्थात् बुध जिस नक्षत्र में स्थित हो उससे पिछले सातवें नक्षत्र को, राहु नवें नक्षत्र को, पूर्ण चन्द्रमा बाइसवें नक्षत्र को और शुक्र पाँचवें नक्षत्र को लात से मारता है । परन्तु राहु सदा वक्री रहता है । इसलिए यदि वह अश्विनी नक्षत्र में स्थित हो तो उसका पिछला नवाँ नक्षत्र श्लेषा होता है । सूर्य, शनैश्चर, बृहस्पति, मङ्गल, ये ग्रह क्रम से अपने अगले बारहवें, आठवें, छठे, तीसरे नक्षत्र को लतियाते हैं, अर्थात् सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित होता है उससे अगले बारहवें नक्षत्र को, शनैश्चर आठवें नक्षत्र को, बृहस्पति छठे नक्षत्र को और मङ्गल तीसरे नक्षत्र को लात से मारता है । प्रयोजन यह है कि इन नक्षत्रों में विवाह नहीं करना चाहिए; क्योंकि सूर्य की लत्ता धन का नाश और चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, राहु इन ग्रहों की लत्ता वर-कन्या का नाश और बृहस्पति की लत्ता बंधु का नाश और शुक्र की लत्ता कार्य का नाश करती है, ऐसा वराहजी ने कहा है ॥ ५९ ॥ पातयोग हर्षणवैधृतिसाध्यव्यतिपातगण्डशूलयोगानाम् । अन्ते यन्नक्षत्रं पातेन निपातितं तत्स्यात् ॥ ६० ॥ अन्वयः—हर्षणवैधृतिसाध्यव्यतिपातगण्डशूलयोगानाम् अन्ते यत् नक्षत्रं तत् पातेन निपातितं स्यात् ॥ ६ ॥ हर्षण, वैधृति, साध्य, व्यतीपात, गंड, शूल इन योगों के समान काल में जो नक्षत्र हो वह पातदोष से दूषित किया जाता है । उदाहरण—यथा किसी दिन कृत्तिका नक्षत्र २२ दण्ड ५ पल है और हर्षण योग १९ दण्ड ९ पल है । अब यहाँ हर्षणयोग कृत्तिका नक्षत्र ही में समाप्त है, इस कारण कृत्तिका नक्षत्र पात से दूषित है । ऐसे नक्षत्र विवाहादि शुभ कार्यों में त्याज्य होते हैं । इसी पात-दोष को नारद और वशिष्ठजी ने अन्य प्रकार से कहा है

१३२ मुहूर्त्तचिन्तामणि कि सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित हो उस नक्षत्र से लेकर श्लेषा, मघा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, श्रवण इन नक्षत्रों तक गिनने से जितनी संख्या हो अश्विनी को लेकर उतनी ही संख्यावाला दिन नक्षत्र पातदोष से दूषित होता है । उदाहरण—यथा ज्येष्ठा में सूर्य है उससे लेकर श्रवण नक्षत्र तक गिनने से पाँच संख्या हुई। अब अश्विनी से पाँचवाँ मृगशिरा नक्षत्र हुआ । यही पात- दूषित हुआ । ऐसे ही और भी जानना चाहिए ॥ ६० ॥ क्रान्तिसाम्य योग पञ्चास्याजौ गोमृगौ तौलिकुम्भौ कन्यामीनौ कर्क्सली चापयुग्मे । तत्रान्योऽन्यं चन्द्रभान्वोनिरुक्तं क्रान्तेः साम्यं नो शुभं मङ्गलेषु ॥ ६१ ॥ अन्वयः—पञ्चास्याजौ, गोमृगौ, तौलिकुम्भौ, कन्यामीनौ, कर्क्सली, चापयुग्मे तत्र अन्योऽन्यं (स्थितयोः) चन्द्रभान्वोः क्रान्तेः साम्यं निरुक्तं (तत्) मंगलेषु नो शुभं स्यात् ॥ ६१ ॥ सिंह और मेष इन दोनों में से किसी एक में चन्द्रमा और दूसरे में सूर्य स्थित हो तो क्रान्तिसाम्य योग होता है । ऐसे ही वृष-मकर, तुला-कुम्भ, कन्या-मीन, कर्क-वृश्चिक और धनु-मिथुन, इन दो-दो राशियों में से किसी एक में सूर्य और दूसरी राशि में चन्द्रमा स्थित हो तो क्रान्तिसाम्य होता है । यह विवाहादि शुभ कार्यों में शुभ नहीं होता ॥ ६१ ॥ एकार्गल दोष व्याघातगण्डव्यतिपातपूर्वशूलान्त्यवज्रे परिघातिगण्डे । योगे विरुद्धे त्वभिजित्समेतः खार्जूरमर्काद्विषमे शशी चेत् ॥ ६२ ॥ अन्वयः—व्याघातगण्डव्यतिपातपूर्वशूलान्त्यवज्रे परिघातिगण्डे (अस्मिन्) विरुद्धे योगे चेत् (यदि) अभिजित्समेतः शशी अर्कात् विषमे (स्थितः) (तदा) खार्जूरं स्यात् ॥ ६२ ॥ जिस दिन व्याघात, गंड, व्यतीपात, विष्कुम्भ, शूल, वैधृति, वज्र, परिघ, अतिगंड इन योगों में से कोई योग हो और जिस नक्षत्र में सूर्य स्थित हो उस नक्षत्र से लेकर विषम नक्षत्र में चन्द्रमा स्थित हो उस दिन खार्जूर दोष होता है । यहाँ सम-विषम की गणना में अभिजित् का भी ग्रहण है । यह योग विवाहादि शुभ कार्यों में निन्दित होता है । उदाहरण— यथा द्वादशी, रविवार और मूल नक्षत्र व्याघात, योग है, और सूर्य

विवाहप्रकरण १३३ उत्तराषाढ़ में है, इसलिए उत्तराषाढ़ से अभिजित्सहित मूल नक्षत्र तक सत्ताइस हुए। यहाँ सूर्य से चन्द्रमा विषम नक्षत्र में है, इसलिए एकार्गल दोष है। इस दिन विवाह करना अच्छा नहीं है। इस दोष को एकार्गल भी कहते हैं ।। ६२ ।। उपग्रह दोष शराष्टदिक्शक्रनगातिधृत्यस्तिथिर्धृतिश्च प्रकृतेश्च पञ्च । उपग्रहाः सूर्यभतोऽब्जताराः शुभा न देशे कुरुबाल्हिकानाम् ।। ६३ ।। अन्वयः—सूर्यभतः अब्जताराः (यदि) शराष्टदिक्शक्रनगातिधृत्यः तिथिः, धृतिः प्रकृतेः पञ्च (स्युः) (तदा) उपग्रहाः भवन्ति ते कुरुबाल्हिकानां देशे शुभाः न भवन्ति ।। ६३ ।। जिस नक्षत्र में सूर्य स्थित हो उस नक्षत्र से ५ । ८ । १० । १४ । ७ । १९ । १५ । १८ । २१ । २२ । २३ । २४ । २५ ये चन्द्रमा के तेरह नक्षत्र उपग्रह दोष से दूषित होते हैं। कुरु तथा बाह्लीक देशों में शुभ कार्य करने के लिये ये अशुभ गिने जाते हैं ।। ६३ ।। पातादि दोषों पर विशेष पातोपग्रहलत्तासु नेष्टोऽङ्घ्रिः खेटपत्समः । वारस्त्रिघ्नोऽष्टभिस्तष्टः सैकः स्यादर्द्धयामकः ।। ६४ ।। अन्वयः—पातोपग्रहलत्तासु खेटपत्समः अंघ्रिः नेष्टः स्यात् । (अथ) वारः त्रिघ्नः अष्टभिः तष्टः सैकः अर्द्धयामकः स्यात् ।। ६४ ।। पात, उपग्रह और लत्ता दोष में दोषकारक ग्रह जिस नक्षत्र के जिस चरण में स्थित हो उस नक्षत्र का वही चरण अशुभ होता है अर्थात् पात और उपग्रह में तो जिस नक्षत्र के जिस चरण में सूर्य स्थित हो उस नक्षत्र से पाँचवें आदि चन्द्रमा के नक्षत्र का वही चरण दूषित होता है। और लत्ता दोष में लत्ताकारक ग्रह, नक्षत्र के जिस चरण में स्थित होते हैं, चन्द्रमा के नक्षत्र का वही चरण दोषी होता है, सम्पूर्ण नक्षत्र दोषी नहीं होता। अब अर्द्धयाम दोष कहते हैं। दिनमान में आठ का भाग देने से जो दण्डपल लब्ध हों, उनको अर्द्धयाम कहते हैं। ऐसे आठ अर्द्धयाम एक दिन में होते हैं। उनमें एक अशुभ होता है। उसके जानने की यह रीति है कि जिस दिन उस अशुभ अर्द्धयाम को जानना हो, रविवार से उस दिन तक

१३४ मुहूर्त्तचिन्तामणि गिनने से जितनी संख्या हो उसे तीन से गुणा करके आठ का भाग देने से जो बाकी बचे उसमें एक और मिलाने से जितनी संख्या हो उतनी संख्या- वाला अर्द्धयाम अशुभ होता है। उदाहरण—यथा रविवार से मंगलवार तक की तीन संख्या को तीन से गुणा किया तो नव हुए । उसमें आठ का भाग दिया तो एक शेष रहा । उसमें एक और मिलाने पर दो हुए । इससे ज्ञात हुआ कि मंगलवार का दूसरा अर्द्धयाम अशुभ होता है । ऐसे ही अन्य दिनों में भी जानना चाहिए, सो चक्र में मैंने स्पष्ट कर दिया है ॥ ६४ ॥ अशुभ अर्द्धयाम चक्र

रविवारसोमवारमंगलवारबुधवारबृहस्पतिशुक्रवारशनैश्चरदिन
अशुभ अर्द्धयाम
कुलिक दोष
शक्रार्कंदिग्वसुरसाब्ध्यश्विनः कुलिका रखेः ।
रात्रौ निरेकास्तिथ्यंशाः शनौ चान्तेऽपि निन्दितः ॥ ६५ ॥
अन्वयः—रवेः [सकाशात् क्रमेण] शक्रार्कंदिग्वसुरसाब्ध्यश्विनः तिथ्यंशाः [मुहूर्त्ताः]
कुलिकाः स्युः (ते) निरेकाः रात्रौ कुलिकाः (ज्ञेयाः) च शनौ अन्त्येऽपि (मुहूर्त्तः)
निन्दितः स्यात् ॥ ६५ ॥
सूर्यादि वारों में १४ । १२ । १० । ८ । ६ । ४ । २ ये मुहूर्त्त कुलिक संज्ञक
होते हैं, अर्थात् दिनमान में पन्द्रह का भाग देने से जो दण्डपल लब्ध हों
उनको मुहूर्त्त कहते हैं । ऐसे पन्द्रह मुहूर्त्त एक दिन में होते हैं । उनमें
रविवार को चौदहवाँ, सोमवार को बारहवाँ, मंगल को दशवाँ, बुध को
आठवाँ, बृहस्पति को छठा, शुक्र को चौथा, शनैश्चर को दूसरा मुहूर्त्त कुलिक-
संज्ञक होता है । यही सब मुहूर्त्त एक हीन होकर इन्हीं दिनों की रात्रि में
कुलिक होते हैं अर्थात् रविवार की रात्रि में तेरहवाँ, सोमवार की रात्रि में
गेरहवाँ, मंगलवार की रात्रि में नवाँ, बुध की रात्रि में सातवाँ, बृहस्पति की
रात्रि में पाँचवाँ, शुक्र की रात्रि में तीसरा, शनैश्चर की रात्रि में पहिला तथा
पन्द्रहवाँ भी मुहूर्त्त कुलिकसंज्ञक होता है । ये मुहूर्त्त विवाहादि शुभ कार्यों में
अशुभ होते हैं ॥ ६५ ॥