मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
राजाभिषेकप्रकरण १६३ अन्वयः—उत्तरायणे गुर्विन्दुशुक्रैः उदितैः, भौमार्क लग्नेशदशेशजन्मपैः बलान्वितैः राजाभिषेकः शुभः (स्यात्) । चैत्ररिक्तारनिशामलिम्लुचे नो (शुभः स्यात्) ॥ १ ॥ उत्तरायण सूर्य के रहते तथा बृहस्पति, शुक्र और चन्द्रमा ग्रहों के उदित रहते और मंगल, सूर्य, तात्कालिक लग्न का स्वामी, तात्कालिक दशा का स्वामी और जन्मलग्न का स्वामी बली हो तो राजाभिषेक शुभ होता है । चैत्रमास, मलमास, चौथि, नवमी, चतुर्दशी तिथि और मंगल दिन तथा रात्रि का समय अशुभ होता है, इसलिए इनमें राज्याभिषेक न करना चाहिए ॥ १ ॥ नक्षत्र तथा लग्नशुद्धि शाक्रश्रवः क्षिप्रमृदुध्रुवोडुभिः शीर्षोदये वोपचये शुभे तनौ । पापैस्त्रिषष्ठायगतैः शुभग्रहैः केन्द्रत्रिकोणायधनत्रिसंस्थितैः ॥ २ ॥ अन्वयः—शाक्रश्रवः क्षिप्रमृदुध्रुवोडुभिः शीर्षोदये वा उपचये शुभे तनौ, पापै- स्त्रिषष्ठायगतैः, शुभग्रहैः केन्द्रत्रिकोणायधनत्रिसंस्थितैः (राजाभिषेकः शुभः स्यात्) ॥२॥ ज्येष्ठा, श्रवण, हस्त, अश्विनी, पुष्य, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, रोहिणी, तीनों उत्तरा, इन नक्षत्रों में; मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक वा कुम्भ लग्न में रहते अथवा जन्मलग्न वा जन्मराशि से तीसरी, छठी, गेरहवीं लग्न में और लग्न से तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रहों के रहते तथा लग्न, चौथे, सातवें, दशवें, पाँचवें, नवें गेरहवें, दूसरे, तीसरे स्थान में शुभग्रहों के रहते राजाभिषेक शुभ होता है ॥ २ ॥ राजाभिषेक काल में ग्रहस्थित फल पापैस्तनौ रुङ्निधने मृतिः सुते पुत्रार्तिरर्थव्ययगैर्दरिद्रता । स्यात् खेडलसो भ्रष्टपदो द्युनाम्बुगैः सर्वं शुभं केन्द्रगतैः शुभग्रहैः ॥ ३ ॥ अन्वयः—पापैः तनौ रुग्, निधने पापैः मृतिः, सुते पापैः पुत्रार्तिः, अर्थव्ययगैः पापैः दरिद्रता, खे पापैः अलसः, द्युनाम्बुगैः पापैः भ्रष्टपदः स्यात्, केन्द्रगतैः शुभग्रहैः सर्वं शुभम् स्यात् ॥ ३ ॥ पापग्रह लग्न में हो तो रोग, आठवें स्थान में हो तो मृत्यु, पाँचवें स्थान में हो तो पुत्र-क्लेश, दूसरे या बारहवें स्थान में हो तो निर्धनता दशवें स्थान में हो तो निरुद्योग, सातवें या चौथे स्थान में हो तो राज्यच्युत और पूर्ण चन्द्रमा यदि लग्न से छठे, आठवें, बारहवें स्थान में स्थित हो तो
१६४ मुहूर्तचिन्तामणि राजा का मरण होता है। किन्तु यदि शुभग्रह केन्द्र में स्थित हो तो सब शुभ हो जाता है ॥ ३ ॥ सम्पत्ति तथा पृथ्वीस्थिति ये दो योग गुर्लग्नकोणे कुजोऽरौ सितः खे स राजा सदा मोदते राजलक्ष्म्या । तृतीयायगौ सौरिसूर्यौ खबन्ध्वोगु॑रुश्चेद्धरित्री स्थिरा स्यान्नृपस्य ॥ ४ ॥ इति मुहूर्त्तचिन्तामणौ राजाभिषेकप्रकरणं समाप्तम् ॥ १० ॥ अन्वयः-[यस्य राजाभिषेकसमये] गुरुः लग्नकोणे, कुजः अरौ, सितः खे स राजा सदा राजलक्ष्म्या मोदते चेत् यदि सौरिसूर्यौ तृतीयायगौ, गुरुः खबन्ध्वोः तदा नृपस्य धरित्री स्थिरा स्यात् ॥ ४ ॥ जिस राजा के अभिषेककाल में बृहस्पति लग्न में या नवें, पाँचवें स्थान में, मंगल लग्न से छठे और शुक्र दशवें स्थान में स्थित हो वह राजा सदा राजलक्ष्मीयुक्त होकर आनन्द करता है। शनैश्चर लग्न से तीसरे, सूर्य गेरहवें और बृहस्पति चौथे या दशवें स्थान में स्थित हो तो उस राजा का राज्य सदा स्थिर रहता है ॥ ४ ॥
यात्राप्रकरण ---------:०:--------- यात्रायां प्रविदितजन्मनां नृपाणां दातव्यं दिवसमबुद्धजन्मनां च । प्रश्नाद्यैरुदयनिमित्तमूलभूतैर्विज्ञाते ह्यशुभशुभे बुधः प्रदद्यात् ॥ १ ॥ अन्वयः-प्रविदितजन्मनां नृपाणां यात्रायां दिवसं दातव्यम्। अबुद्धजन्मनां नृपाणां च प्रश्नाद्यैः उदयनिमित्तमूलभूतैः अशुभशुभे विज्ञाते बुधः यात्रायां दिवसं प्रदद्यात् ॥ १ ॥ किसी कार्य की सिद्धि के लिए अन्य देशादि में जाने का नाम यात्रा है। वह कार्यभेद से दो प्रकार की होती है। एक वह जो कि आगे कहे हुए योग, लग्न और जन्मकुण्डली में राजयोग, शुभलग्न के रहते होती है, यथा समरयात्रा । और दूसरी वह जो कि साधारण पंचांगादि की शुद्धि रहते होती है। यथा द्रव्यादि के कमाने या तीर्थादि करने के लिए साधारण यात्रा। इन दोनों के विशेष विचार करने की इच्छा से पहिले उसके अधिकारी को कहते हैं।
यात्राप्रकरण १६५
पण्डितों को चाहिए कि जिनके जन्मकालिक शुभाशुभ राजयोगादि जाने गये हों उन राजाओं को, और जिनका जन्मकाल न जाना गया हो, प्रश्नकालिक लग्न वा शकुनादि द्वारा उनके शुभाशुभ राजयोगादि को जानकर उन राजाओं को भी यदि बताने के योग्य हो तो यात्रा करने के योग्य दिन बतावे । यहाँ राजाओं के सिवा साधारण अन्य मनुष्य भी ग्रहण किये जाते हैं; क्योंकि यात्रा के बिना किसी का काम नहीं चल सकता इसलिए राजा से लेकर साधारण मनुष्य तक सब यात्रा करने के अधिकारी हैं ॥ १ ॥ प्रश्नकालिक शुभ यात्रायोग जननराशितनू यदि लग्नगे तदधिपौ यदि वा तत एव वा । त्रिरिपुखायगृहं यदि वोदये विजय एव भवेद्वसुधापतेः ॥ २ ॥ रिपुजन्मलग्नभमथाधिपौ तयोस्ततएववोपचयसद्म चेद् भवेत् । हिबुके द्यूनेऽथ शुभवर्गकस्तनौ यदि मस्तकोदयगृहं तदा जयः ॥ ३ ॥ यदि पृच्छतनौ वसुधा रुचिरा शुभवस्तु यदि श्रुतिदर्शनगम् । यदि पृच्छति चादरतश्च शुभग्रहदृष्टयुतं चरलग्नमपि ॥ ४ ॥ अन्वयः—यदि जननराशितनू लग्नगे, यदि वा तदधिपौ, वा तत एव त्रिरिपुखायगृहं यदि वा उदयेः तदा वसुधापतेः विजय एव भवेत् । रिपुजन्मलग्नभं अथवा तयोः अधिपौ, वा ततः एव उपचयसद्म चेत् हिबुके द्यूने भवेत् तदा वसुधापतेः जयः, अथ यदि तनौ शुभवर्गकः वा मस्तकोदयगृहं तदा जयः स्यात् यदि पृच्छतनौ वसुधा रुचिरा, यदि (वा) शुभवस्तु श्रुतिदर्शनगं (भवेत्) च (तथा) यदि आदरतः पृच्छति अपि (वा) शुभग्रहदृष्टयुतं चरलग्नं यदि स्यात् तदा जयः स्यात् ॥ २-४ ॥ जिसकी जन्मराशि या जन्मलग्न प्रश्नलग्न में हो, अथवा जन्मराशि का स्वामी या जन्मलग्न का स्वामी प्रश्नलग्न में हो, अथवा जन्मराशि से या जन्मलग्न से तीसरे, छठे, दशवें, गेरहवें स्थान में प्रश्नलग्न पड़ती हो तो यात्रा करनेवाले राजा की विजय अवश्य हो ॥ २ ॥ अथवा जिसके शत्रु की जन्मराशि या जन्मलग्न, प्रश्नलग्न से चौथे या सातवें स्थान में हो, अथवा शत्रु की जन्मराशि का स्वामी या जन्मलग्न का स्वामी प्रश्न- लग्न से चौथे या सातवें स्थान में हो, अथवा शत्रु की जन्मराशि से या जन्मलग्न से तीसरी, छठी, दशवीं, गेरहवीं राशि, प्रश्नलग्न से चौथे या सातवें स्थान में पड़ती हो, अथवा शुभग्रह का गृह, होरा, द्रेष्काण, नवां- शादि षड्वर्ग प्रश्नलग्न में हो, अथवा मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक,
१६६ मुहूर्त्तचिन्तामणि कुम्भ इनमें से कोई राशि प्रश्नलग्न में हो तो यात्रा करनेवाले राजा की विजय होती है ॥ ३ ॥ अथवा यात्रा पूछनेवाला ऐसे स्थान में पूछे कि जहाँ की भूमि, फूल, दूर्वा, देवमंदिर आदि शुभ वस्तुओं से अति मनोरम हो अथवा यात्रा पूछने के समय कोई शुभ वस्तु देखने या सुनने में आवे अथवा यात्रा पूछनेवाला बड़े आदर से पूछे, अथवा मेष, कर्क, तुला, मकर इन राशियों में से कोई प्रश्नलग्न में हो और शुभग्रह उसे देखते हों या उस लग्न में हों तो भी यात्रा करनेवाले की विजय होती है ॥ ४ ॥ प्रश्नकालिक अशुभ यात्रायोग विधुकुजयुतलग्ने सौरिदृष्टेऽथ चन्द्रे मृतिभमदनसंस्थे लग्नगे भास्करेऽपि । हिबुकनिधनहोराद्यूनगे वापि पापे सपदि भवति भंगः प्रश्नकर्तुस्तदानीम् ॥ ५ ॥ अन्वयः—अथ विधुकुजयुतलग्ने सौरिदृष्टे, चन्द्रे मृतिभमदनसंस्थे, अपि वा भास्करे लग्नगे, अपि वा पापे हिबुकनिधनहोराद्यूनगे, तदानी प्रश्नकर्तुः सपदि भंगः भवति ॥ ५ ॥ यदि प्रश्नकालिक लग्न में चन्द्रमा या मंगल हो और शनैश्चर उसे देखता हो, अथवा प्रश्नकालिक लग्न में सूर्य हो और उससे सातवें या आठवें स्थान में चन्द्रमा हो, अथवा प्रश्नलग्न में या उससे चौथे, आठवें, सातवें स्थानों में पापग्रह हो तो यात्रा करनेवाले का नाश या पराजय होता है ॥ ५ ॥ प्रश्नद्वारा यात्रा की दिशा का निर्णय त्रिकोणे कुजात्सौरिशुक्रज्ञजीवा यदैकोऽपि वा नो गमोर्काच्छशी वा । बलीयांस्तु मध्ये तयोर्यो ग्रहः स्या- त्स्वकीयां दिशं प्रत्युतासौ नयेच्च ॥ ६ ॥ प्रश्ने गम्यदिगीशात्खेटः पञ्चमगो यः । बोभूयाद्बलयुक्तः स्वामाशां नयेत्दसौ ॥ ७ ॥ अन्वयः—सौरिशुक्रज्ञजीवाः (सर्वे) वा एकोऽपि यदा कुजात् त्रिकोणे (स्थितः) वा शशी अर्कात् त्रिकोणे स्यात् तदा गमः [गमनं] नो भवेत्, प्रत्युत तयोर्मध्ये यः ग्रहः बलीयान् स्यात् असौ स्वकीयां दिशं नयेत् । प्रश्ने गम्यदिगीशात् पञ्चमगः यः खेटः बलयुक्तः बोभूयात् असौ स्वां आशां नयेत् ॥ ६-७ ॥
यात्राप्रकरण १६७ प्रश्नकाल में शनैश्चर, शुक्र, बुध, बृहस्पति, ये चारों ग्रह या इनमें से कोई एक ही ग्रह यदि मंगल से नवें, पाँचवें स्थान में स्थित हो, अथवा चन्द्रमा यदि सूर्य से नवें, पाँचवें स्थान में हो, तो यात्रा करनेवाला जिस दिशा में जाने की इच्छा करता है उस दिशा में यात्रा नहीं होती, किंतु इन यात्राप्रतिबंधक ग्रहों में से जो ग्रह बलवान् होता है वह अपनी ही दिशा में ले जाता है अथवा जिस दिशा में यात्रा करने की इच्छा से प्रश्न किया गया हो उस दिशा का स्वामी प्रश्नलग्न से जिस स्थान में स्थित हो उस स्थान से पाँचवें स्थान में यदि कोई बली ग्रह हो तो वह ग्रह अपनी ही दिशा में यात्रा करनेवाले को ले जाता है। ग्रहों की दिशा इसी प्रकरण के ४६ वें श्लोक में कही गई हैं ॥ ६-७ ॥ मासभेद से यात्रा के शुभाशुभभेद और तारा धनुर्मेषसिंहेषु यात्रा प्रशस्ता शनिज्ञोशनोराशिगे चैव मध्या। रवौ कर्कमीनालिसंस्थेऽतिदीर्घा जनुःपञ्चसप्तत्रिताराश्च नेष्टाः ॥ ८॥ अन्वयः—धनुर्मेषसिंहेषु रवौ यात्रा प्रशस्ता स्यात्, च शनिज्ञोशनोराशिगे रवौ मध्या स्यात्, कर्कमीनालिसंस्थे रवौ अतिदीर्घा यात्रा स्यात्, तथा जनुः पञ्चसप्तत्रि- ताराः नेष्टाः ॥ ८ ॥ धनु, मेष वा सिंह में सूर्य हो तो यात्रा उत्तम; मकर, कुम्भ, मिथुन, कन्या, वृष वा तुला में सूर्य हो तो यात्रा मध्यम; और कर्क, वृश्चिक वा मीन में सूर्य हो तो यात्रा बहुत दिनों में लौटानेवाली अर्थात् अशुभ होती है। जन्मनक्षत्र से यात्रा के दिननक्षत्र तक गिनने से जितनी संख्या हो उसमें नौ का भाग देने से १।३।५ वा ७ शेष रहे तो शुभ नहीं होते, अर्थात् यात्रा में पहिली, पाँचवीं, सातवीं और तीसरी तारा निषिद्ध है ॥ ८ ॥ यात्रा में निषिद्धतिथि और विहिततिथि न षष्ठी न च द्वादशी नाष्टमी नो सिताद्या तिथिः पूर्णिमाऽमा न रिक्ता। ह्यादित्यमैत्रेन्दुजीवान्त्यहस्त- श्रवो वासवरेव यात्रा प्रशस्ता ॥ ९ ॥ अन्वयः—षष्ठी (शुभा) न, च द्वादशी न, अष्टमी न, सिताद्या तिथिः पूर्णिमा अमा न, रिक्ता न प्रशस्ता भवति। ह्यादित्यमैत्रेन्दुजीवान्त्यहस्तश्रवो वासवैः एव यात्रा प्रशस्ता स्यात् ॥ ९ ॥
१६८ मुहूर्तचिन्तामणि छठि, द्वादशी, अष्टमी, शुक्लपक्ष की परीवा, पूर्णमासी, अमावास्या, चौथि, नवमी, चतुर्दशी ये तिथियाँ यात्रा में शुभ नहीं हैं, अर्थात् इन तिथियों में यात्रा न करे, इनको छोड़कर अन्य तिथियों में यात्रा करे; और अश्विनी, पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशिरा, पुष्य, रेवती, हस्त, श्रवण, धनिष्ठा, इन नक्षत्रों में की हुई यात्रा शुभ होती है ॥ ९ ॥ वारशूल और नक्षत्रशूल न पूर्वदिशि शक्रभे न विधुसौरिवारे तथा न चाजपदभ गुरौ यमदिशीनदैत्येज्ययोः । न पाशिदिशि धातृभे कुजबुधेऽर्यमर्क्षे तथा न सौम्यककुभि व्रजेत्स्वजयजीवितार्थी बुधः ॥ १० ॥ अन्वयः—स्वजयजीवितार्थी बुधः पूर्वदिशि शक्रभे न, तथा विधुसौरिवारे न व्रजेत् । च अजपदभे, गुरौ (दिने) यमदिशि न व्रजेत् । इनदैत्येज्ययोः धातृभे पाशिदिशि न व्रजेत् तथा कुजबुधे अर्यमर्क्षे सौम्यककुभि न व्रजेत् ॥ १० ॥ धन, विजय और जीवन चाहनेवाला बुद्धिमान् मनुष्य ज्येष्ठा नक्षत्र में तथा सोमवार और शनैश्चर के दिन पूर्व दिशा में, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में तथा बृहस्पति के दिन दक्षिण दिशा में, रोहिणी नक्षत्र में तथा रविवार और शुक्र के दिन पश्चिम दिशा में और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में तथा मंगल, बुध के दिन उत्तर दिशा में यात्रा न करे ॥ १० ॥ कालविशेष में विशेष नक्षत्रों का निषेध पूर्वाह्णे ध्रुवमिश्रभैर्न नृपतेर्यात्रा न मध्याह्नके तीक्ष्णाख्यैरपराह्नके न लघुभैर्नो पूर्वरात्रे तथा । मित्राख्यैर्न च मध्यरात्रिसमये चोग्रैस्तथा नो चरै रात्र्यन्ते हरिहस्तपुष्यशशिभिः स्यात्सर्वकाले शुभा ॥ ११ ॥ अन्वयः—पूर्वाह्णे ध्रुवमिश्रभैः नृपतेः यात्रा न शुभा, मध्याह्नके तीक्ष्णाख्यैः न शुभा, अपराह्नके लघुभैः न, तथा मित्राख्यैः पूर्वरात्रे न, तथा च उग्रैः मध्यरात्रिसमये न, तथा चरैः रात्र्यन्ते न (शुभा भवति) । हरिहस्तपुष्यशशिभिः सर्वकाले नृपतेः यात्रा शुभा स्यात् ॥ ११ ॥ दिन के तीन भाग करके पहिले भाग में तीनों उत्तरा, रोहिणी, विशाखा और कृत्तिका में; दूसरे भाग में मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा और श्लेषा में; तीसरे
यात्राप्रकरण १६९ भाग में अश्विनी और अभिजित् में यात्रा न करे । ऐसे ही रात्रि के तीन भाग करके पहिले भाग में रेवती, चित्रा और अनुराधा में; दूसरे भाग में तीनों पूर्वा, भरणी और मघा में और तीसरे भाग में स्वाती, पुनर्वसु, धनिष्ठा और शतभिष में यात्रा न करनी चाहिए । श्रवण, हस्त, पुष्य, मृगशिरा, इन नक्षत्रों में सब काल में यात्रा शुभ होती है ॥ ११ ॥ यात्रा में मध्यम नक्षत्र तथा कई निषिद्ध नक्षत्रों की त्याज्य घटी पूर्वाग्निपित्र्यान्तकतारकाणां भूपप्रकृत्युग्रतुरङ्गमाः स्युः । स्वातीविशाखेन्द्रभुजङ्गमानां नाड्यो निषिद्धा मनुसंमिताश्च ॥ १२ ॥ अन्वयः-पूर्वाग्निपित्र्यान्तकतारकाणां भूपप्रकृत्युग्रतुरंगमाः नाड्यः, च स्वाती- विशाखेन्द्रभुजङ्गमानां मनुसम्मताः नाड्यः निषिद्धाः स्युः ॥ १२ ॥ तीनों पूर्वाओं के प्रथम सोलह दण्ड, कृत्तिका के इक्कीस दण्ड, मघा के ग्यारह दण्ड, भरणी के सात दण्ड, और स्वाती, विशाखा, ज्येष्ठा, श्लेषा, इन नक्षत्रों के चौदह दण्ड यात्रा में निषिद्ध होते हैं ॥ १२ ॥ अन्यमत से त्याज्य घटी पूर्वार्द्धमाग्नेयमघानिलानां त्यजेद्धि चित्राहियमोत्तरार्द्धम् । नृपः समस्तां गमने जयार्थी स्वातीं मघां चोशनसो मतेन ॥ १३ ॥ अन्वयः-जयार्थी नृपः गमने आग्नेयमघानिलानां पूर्वार्द्धं, चित्राहियमोत्तरार्द्धं हि त्यजेत्, च उशनसः मतेन स्वातीं मघां समस्तां त्यजेत् ॥ १३ ॥ विजय चाहनेवाला राजा कृत्तिका, मघा और स्वाती का पूर्वार्द्ध तथा चित्रा, श्लेषा और भरणी का उत्तरार्द्ध यात्रा में त्याग दे । शुक्राचार्य के मत से सम्पूर्ण स्वाती और सम्पूर्ण मघा को यात्रा में त्याग दे ॥ १३ ॥ नक्षत्रों की जीवपक्षादि संज्ञा तमोमुक्तताराः स्मृता विश्वसंख्याः शुभो जीवपक्षो मृतश्चापि भोग्याः । तदाक्रान्तभं कर्तरीसंज्ञमुक्तं ततोऽक्षेन्दुसंख्यं भवेद्ग्रस्तनाम ॥ १४ ॥ अन्वयः-विश्वसंख्याः तमोमुक्तताराः जीवपक्षः शुभः स्मृतः, च भोग्याः विश्वसंख्याः मृतः उक्तः, तदा क्रान्तभं कर्तरीसंज्ञं उक्तम, ततः (राहोः) अक्षेन्दुसंख्यं ग्रस्तनाम भवेत् ॥ १४ ॥ राहु के भुक्त तेरह नक्षत्र जीवपक्षसंज्ञक, और भोग्य तेरह नक्षत्र मृतपक्ष- संज्ञक होते हैं और जिस नक्षत्र में राहु स्थित हो वह नक्षत्र कर्तरीसंज्ञक और उससे पन्द्रहवाँ नक्षत्र ग्रस्तसंज्ञक होता है । इनमें यात्रा के लिए
१७० मुहूर्त्तचिन्तामणि जीवपक्ष शुभ होता है। उदाहरण—जैसे हस्त नक्षत्र में राहु हो तो उसके उलटे चलने के कारण चित्रा से लेकर पूर्वाभाद्रपद तक तेरह नक्षत्र भुक्त होंगे उनकी जीवपक्ष संज्ञा होगी, और उत्तराफाल्गुनी से पूर्व रेवती तक तेरह नक्षत्र भोग्य होंगे उनकी मृतपक्ष संज्ञा होगी, और हस्त कर्तरी- संज्ञक तथा उत्तराभाद्रपद ग्रस्तसंज्ञक होगा। ये सब नीचे के चक्र में स्पष्ट ज्ञात होंगे ॥ १४॥ जीवपक्षादि संज्ञाचक्र कर्तरी [ह.] [चि.] [स्वा.] [वि.] [अनु.] [ज्ये.] [मू.] [पू.] जीवपक्ष [उ.] [उ.] [पू.] [अ.] [म.] [श्र.] [श्ले.] [ध.] [पु.] [श.] [पु.] [पू.] मृतपक्ष [आ.] [मृ.] [रो.] [कृ.] [म.] [अ.] [रे.] [उ.] ग्रस्त जीवपक्षादि का विशेष फल मार्त्तण्डे मृतपक्षगे हिमकरश्चेज्जीवपक्षे शुभा यात्रा स्याद्विपरीतग क्षयकरी द्वौ जीवपक्षे शुभा। ग्रस्तर्क्षं मृतपक्षतः शुभकरं ग्रस्तात्तथा कर्तरी यायीन्दुः स्थितिमान्रविर्जयकरौ तौ द्वौ तयोर्जीवगौ ॥ १५॥ अन्वयः—मार्त्तण्डे मृतपक्षगे चेत्, हिमकरः जीवपक्षे, तदा यात्रा शुभा स्यात्, विप- रीतगे क्षयकरी स्यात्, द्वौ यदि जीवपक्षे तदा यात्रा शुभा, ग्रस्तर्क्षं मृतपक्षतः शुभकरं, तथा ग्रस्तात् कर्तरी [शुभकरा] तथा इन्दुः यायी, रविःस्थितिमान्, तौ द्वौ जीवगौ तयोः [यायिस्थायिनोः] जयकरौ ॥ १५॥
यात्राप्रकरण १७१ सूर्य मृतपक्ष में और चन्द्रमा जीवपक्ष में हो तो यात्रा शुभ होती है, और इससे विपरीत अर्थात् चन्द्रमा मृतपक्ष में और सूर्य जीवपक्ष में हो तो यात्रा विनाश करनेवाली होती है। यदि सूर्य और चन्द्रमा, दोनों जीवपक्ष में हों तो यात्रा अति शुभ होती है, और यदि सूर्य-चन्द्रमा दोनों मृतपक्ष में हों तो यात्रा अति अशुभ होती है। मृतपक्ष से ग्रस्तसंज्ञक नक्षत्र कैसा शुभकर है जैसे मरे हुए से मरनेवाला रोगी अच्छा होता है, और ग्रस्तसंज्ञक नक्षत्र से कर्तरीसंज्ञक कैसा अच्छा है जैसे कि एक दिन में मरनेवाले से दो दिन में मरनेवाला अच्छा होता है। अब राजाओं की यात्रा का विशेष फल कहते हैं। राजा दो प्रकार के होते हैं—एक यायी, दूसरा स्थायी । जो दूसरे राजा के ऊपर चढ़ाई करता है उसे यायी और जो अपने घर में है उसे स्थायी कहते हैं। चन्द्रमा यायी का स्वामी और सूर्य स्थायी का स्वामी है। यदि सूर्य-चन्द्रमा दोनों जीवपक्ष में हों तो यायी-स्थायी दोनों की विजय होती है और यदि चन्द्रमा जीवपक्ष में हो तो यायी राजा की विजय और सूर्य जीवपक्ष में हो तो स्थायी राजा की विजय होती है, और यदि सूर्य-चन्द्रमा दोनों मृतपक्ष में हों तो दोनों की पराजय होती है ।। १५ ।। युद्धयात्रा के उपयोगी कुलाकुलसंज्ञक तिथि, वार, नक्षत्र स्वात्यन्तकाहिवसुपौष्णकरानुराधा- दित्यध्रुवाणि विषमास्तिथयोऽकुलाः स्युः । सूर्येन्दुमन्दगुरवश्च कुलाकुलाज्ञो मूलाम्बुपेशविधिभं दशषड्द्वितिथयः ।। १६ ।। पूर्वाश्विज्यमघेन्दुकर्णदहनद्वीशेन्द्रचित्रास्तथा शुक्रारौ कुलसंज्ञकाश्च तिथयोऽर्काष्टेन्द्रवेर्देमिताः । यायी स्यादकुले जयी च समरे स्थायी च तद्वत्कुले सन्धिः स्यादुभयोः कुलाकुलगणे भूमीशयोर्युध्यतोः ।। १७ ।। अन्वयः—स्वात्यन्तकाहिवसुपौष्णकरानुराधादित्यध्रुवाणि विषमाः तिथयः सूर्येन्दु- मन्दगुरवश्च अकुलाः स्युः । ज्ञः मूलाम्बुपेशविधिभं, दशषड्द्वितिथयः कुलाकुलाः स्युः । पूर्वाश्विज्यमघेन्दुकर्णदहनद्वीशेन्द्रचित्राः तथा शुक्रारौ अर्काष्टेन्द्रवेर्देमिताः तिथयः कुल- संज्ञकाः स्यु । अकुले समरे यायी जयी स्यात् । तद्वत् कुले स्थायी जयी स्यात् । कुला- कुलगणे, युध्यतोः उभयोः भूमीशयोः सन्धिः स्यात् ।। १६-१७ ।। स्वाती, भरणी, इलेषा, धनिष्ठा, रेवती, हस्त, अनुराधा, पुनर्वसु, रोहिणी,
१७२ मुहूर्त्तचिन्तामणि तीनों उत्तरा, ये बारह नक्षत्र, और परीवा, तीज, पंचमी, सप्तमी, नवमी, एकादशी, त्रयोदशी, पूर्णमासी, अमावास्या य तिथियाँ और रविवार, सोमवार, शनैश्चर, बृहस्पति ये दिन अकुलसंज्ञक तथा बुधवार यह एक दिन और मूल, शतभिष, आर्द्रा, अभिजित् ये चार नक्षत्र और दशमी, छठि, दुइज ये तिथियाँ कुलाकुलसंज्ञक ॥ १६ ॥ तथा तीनों पूर्वा, अश्विनी, पुष्य, मघा, मृगशिरा, श्रवण, कृत्तिका, विशाखा, ज्येष्ठा, चित्रा, ये बारह नक्षत्र और शुक्र, मंगल ये दो दिन और द्वादशी, अष्टमी, चतुर्दशी, चौथि, ये चार तिथियाँ कुलसंज्ञक हैं । अकुलसंज्ञक तिथि, वार, नक्षत्रों में यात्रा या युद्ध का प्रारम्भ करनेवाला यायी राजा, और कुलसंज्ञक तिथि, वार नक्षत्रों में युद्ध का प्रारम्भ करनेवाला स्थायी राजा युद्ध में विजयी होता है, और कुलाकुलसंज्ञक तिथि, वार, नक्षत्रों में युद्ध करनेवाले यायी, स्थायी दोनों राजाओं में सन्धि हो जाती है ॥ १७ ॥ पन्थाराहु का विचार स्युर्द्धर्मे दस्रपुष्योरगवसुजलपद्धीशमैत्राण्यथार्थे याम्याजाङ्घ्रीन्द्रकर्णादितिपतृपवनोडून्यथोभानि कामे । वह्नचाद्राबुध्न्यचित्रानिरृतिविधिभगाख्यानि मोक्षेथरोहि- ण्यार्य्यम्णाप्येन्दुविश्वान्तिमभदिनकरर्क्षाणि पन्थादिराहौ ॥ १८ ॥ अन्वयः—पन्थादिराहौ दस्रपुष्योरगवसुजलपद्धीशमैत्राणि धर्मे स्युः, अथ याम्या- जांघ्रीन्द्रकर्णादितिपतृपवनोडूनि अर्थे स्युः, अथो वह्नयाद्राबुध्न्यचित्रानिरृतिविधि- भगाख्यानि भानि कामे स्युः, अथ रोहिण्यार्यम्णाप्येन्दुविश्वान्तिमभदिनकरर्क्षाणि मोक्षे स्युः ॥ १८ ॥ पाँच खड़ी रेखाओं के ऊपर नौ आड़ी रेखाओं के खींचने से जो बत्तीस कोठों का चक्र होता है उसे पन्थाराहुचक्र कहते हैं । उसमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ये चार मार्ग होते हैं । उन चारों में से धर्ममार्ग में अश्विनी, पुष्य, आश्लेषा, धनिष्ठा, शतभिष, विशाखा, अनुराधा, ये सात नक्षत्र; अर्थमार्ग में भरणी, पूर्वाभाद्रपद, ज्येष्ठा, श्रवण, पुनर्वसु, मघा, स्वाती, ये सात नक्षत्र; काममार्ग में कृत्तिका, आर्द्रा, उत्तराभाद्रपद, चित्रा, मूल, अभिजित्, पूर्वा- फाल्गुनी ये सात नक्षत्र और मोक्षमार्ग में रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, मृगशिरा, उत्तराषाढ़, रेवती, हस्त, ये सात नक्षत्र स्थापन करने से यह पंथादि राहु स्पष्ट होता है ॥ १८ ॥
यात्राप्रकरण १७३ पन्थाराहुचक्र | धर्ममार्ग | अ० | पु० | आश्ले० | वि० | अनु० | ध० | श० | | अर्थमार्ग | भ० | पुन० | म० | स्वा० | ज्ये० | श्र० | पू०भा० | | काममार्ग | कृ० | आ० | पू० फा० | चि० | मू० | अभि० | उ०भा० | | मोक्षमार्ग | रो० | मृ० | उ० फा० | ह० | पू० फा० | उ०फा० | रे० | पन्थाराहुचक्रफल धर्मगे भास्करे वित्तमोक्षे शशी वित्तगे धर्ममोक्षस्थितिः शस्यते । कामगे धर्ममोक्षार्थगः शोभनो मोक्षगे केवलं धर्मगः प्रोच्यते ॥ १९ ॥ अन्वयः—धर्मगे भास्करे, वित्तमोक्षे शशी शस्यते; वित्तगे भास्करे, धर्ममोक्ष- स्थितः शशी; कामगे भास्करे, धर्ममोक्षार्थगः शशी शोभनः; मोक्षगे भास्करे, केवलं धर्मगः शशी शोभनः प्रोच्यते ॥ १९ ॥ धर्ममार्ग में सूर्य हो और अर्थमार्ग या मोक्षमार्ग में चन्द्रमा हो तो शुभ है, तथा अर्थमार्ग में सूर्य और धर्ममार्ग या मोक्षमार्ग में चन्द्रमा हो तो शुभ है, तथा काममार्ग में सूर्य और धर्ममार्ग या मोक्षमार्ग या अर्थमार्ग में चन्द्रमा हो तो शुभ है, तथा मोक्षमार्ग में सूर्य और धर्ममार्ग में चन्द्रमा हो तो शुभ है, और इससे विपरीत अशुभ है ॥ १९ ॥ पौषादि मासों की परीवादि तिथियों में पूर्वादि दिशाओं की यात्रा का शुभाशुभ फल पौषे पक्षत्यादिका द्वादशैकं तिथ्यो माघादौ द्वितीयादिकास्ताः । कामात्तिस्रः स्युस्तृतीयादिवच्च याने प्राच्यादौ फलं तत्र वक्ष्ये ॥ २० ॥ सौख्यं क्लेशो भीतिरर्थागमश्च शून्यं नैस्वं निस्स्वता मिश्रता च । द्रव्यक्लेशो दुःखमिष्टाप्तिरर्थो लाभः सौख्यं मङ्गलं वित्तलाभः ॥ २१ ॥ लाभो द्रव्याप्तिर्धनं सौख्यमुक्तं भीतिर्लाभो मृत्युरर्थागमश्च । लाभः कष्टं द्रव्यलाभः सुखं च कष्टं सौख्यं क्लेशलाभः सुखं च ॥ २२ ॥ सौख्यं लाभः कार्यसिद्धिश्च कष्टं क्लेशः कष्टात्सिद्धिरर्थो धनं च । मृत्युर्लाभो द्रव्यलाभश्च शून्यं शून्यं सौख्यं मृत्युरत्यन्तकष्टम् ॥ २३ ॥
१७४ मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—पौषे पक्षत्यादिकाः द्वादश तिथ्यः, एवं माघादौ द्वितीयादिकाः ताः [तिथ्यः], च कामात् तिस्रः तृतीयादिवत् ज्ञेयाः । तत्र प्राच्यादौ याने फलं वक्ष्ये । श्लोकक्रमेणैव सुगमः । इदं प्राच्यादौ याने क्रमेण फलं ज्ञेयम् ॥ २०-२३ ॥ खड़ी खींची हुई तेरह रेखाओं के ऊपर आड़ी चौदह रेखा ऐसी खींचे कि जिनसे एकसौ छप्पन कोठोंवाला एक चक्र बन जावे । तदनन्तर उस चक्र की ऊपरवाली पहिली पंक्ति में पौषादि बारह महीने लिखे । उन महीनों में से पौष के नीचे बारह कोठों में क्रम से परीवा से लेकर द्वादशीपर्यन्त बारह तिथियाँ लिखे और जिन कोठों में तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, ये तीन तिथियाँ हों उन्हीं कोठों में त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, ये तीन तिथियाँ भी क्रम से लिखे । ऐसे ही माघ आदि मासों में द्वितीया से लेकर परीवा पर्यन्त बारह तिथियाँ क्रम से और तृतीया आदि तीन तिथियों के कोठों में त्रयोदशी आदि तीन तिथियाँ क्रम से लिखे । वे सब आगे चक्र में स्पष्ट होंगी । अब उन तिथियों में पूर्व आदि दिशाओं के यात्रा करने का फल कहते हैं ॥ २० ॥ पौष की परीवा तिथि में पूर्व दिशा को यात्रा करने में सौख्य, दक्षिण में क्लेश, पश्चिम में भय, उत्तर में धन का लाभ होता है; द्वितीया में पूर्वदिशा में शून्य फल, दक्षिण में धन की हानि, पश्चिम में धन की हानि, उत्तर में मिश्रता अर्थात् कभी हानि, कभी लाभ होता है; तृतीया में पूर्व में द्रव्यक्लेश, दक्षिण में दुःख पश्चिम में वाञ्छित वस्तु का लाभ, उत्तर में धन होता है; चतुर्थी में पूर्व में लाभ, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में मंगल, उत्तर में धनलाभ होता है ॥ २१ ॥ पञ्चमी में पूर्व में लाभ, दक्षिण में द्रव्यलाभ, पश्चिम में धन, उत्तर में सौख्य होता है; छठि में पूर्व में भय, दक्षिण में लाभ, पश्चिम में मरण, उत्तर में धनलाभ होता है; सप्तमी में पूर्व में लाभ, दक्षिण में कष्ट, पश्चिम में द्रव्यलाभ, उत्तर में सुख होता है; अष्टमी में पूर्व में कष्ट, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में क्लेश, उत्तर में सुख होता है ॥ २२ ॥ नवमी में पूर्व में सौख्य, दक्षिण में लाभ, पश्चिम में कार्यसिद्धि, उत्तर में कष्ट होता है; दशमी में पूर्व में क्लेश, दक्षिण में कष्ट से सिद्धि, पश्चिम में धन, उत्तर में धन होता है और एकादशी में पूर्व में मरण, दक्षिण में लाभ, पश्चिम में द्रव्यलाभ, उत्तर में शून्य फल होता है; द्वादशी में पूर्व में शून्य फल, दक्षिण में सौख्य, पश्चिम में मरण, उत्तर में अत्यन्त कष्ट होता है; त्रयोदशी आदि तीन तिथियों का फल तृतीया आदि तीन तिथियों के समान होता है और माघ आदि महीनों की द्वितीया आदि तिथियों का भी यही फल है । सो भी चक्र में स्पष्ट है ॥ २३ ॥
यात्राप्रकरण १७५ तिथिचक्र
| पौ० | मा० | फा० | चै० | वै० | ज्ये० | आ० | श्रा० | भा० | कु० | का० | आ० | पूर्व | दक्षिण | पश्चिम | उत्तर |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | २ | ३।१३ | ४।१४ | ५।१५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | सौख्य | क्लेश | भीति | अर्थागम |
| २ | ३।१३ | ४।१४ | ५।१५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | शून्य | नैःस्व | नैःस्व | मिश्रता |
| ३।१३ | ४।१४ | ५।१५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | द्रव्यक्लेश | दुःख | इष्टाप्ति | अर्थ |
| ४।१४ | ५।१५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३।१३ | लाभ | सौख्य | मंगल | वित्तलाभ |
| ५।१५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३।१३ | ४।१४ | लाभ | द्रव्याप्ति | धन | सौख्य |
| ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३।१३ | ४।१४ | ५।१५ | भीति | लाभ | मृत्यु | अर्थागम |
| ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३।१३ | ४।१४ | ५।१५ | ६ | लाभ | कष्ट | द्रव्यलाभ | सुख |
| ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३।१३ | ४।१४ | ५।१५ | ६ | ७ | कष्ट | सौख्य | क्लेशलाभ | सुख |
| ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३।१३ | ४।१४ | ५।१५ | ६ | ७ | ८ | सौख्य | लाभ | कार्यसिद्धि | कष्ट |
| १० | ११ | १२ | १ | २ | ३।१३ | ४।१४ | ५।१५ | ६ | ७ | ८ | ९ | क्लेश | कष्ट से सि० | अर्थ | धन |
| ११ | १२ | १ | २ | ३।१३ | ४।१४ | ५।१५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | मृत्यु | लाभ | द्रव्यलाभ | शून्य |
| १२ | १ | २ | ३।१३ | ४।१४ | ५।१५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | शून्य | सौख्य | मृत्यु | अत्यन्त कष्ट |
१७६ मुहूर्त्तचिन्तामणि सर्वाङ्क योग तिथ्यक्षर्वारयुतिरद्रिगजाग्नितष्टा स्थानत्रयेत्र वियति प्रथमेऽतिदुःखी । मध्ये धनक्षतिरथो चरमे मृतिः स्या- त्स्थानत्रयेऽङ्कयुजि सौख्यजयौ निरुक्तौ ॥ २४ ॥ अन्वयः—तिथ्यक्षर्वारयुतिः स्थानत्रये अत्र (स्थाप्या) (क्रमेण) अद्रिगजाग्नितष्टा प्रथमे [स्थाने] वियति शून्ये सति अतिदुःखी स्यात्, मध्ये वियति (सति) धनक्षतिः स्यात्, अथो चरमे वियति मृतिः स्यात्, स्थानत्रये अंकयुजि (सति) सौख्यजयौ निरुक्तौ ॥ २४ ॥ जिस दिन यात्रा करना हो उस दिन शुक्लपक्ष की परीवा से लेकर जो तिथि हो, अश्विनी से लेकर जो नक्षत्र हो और रविवार से लेकर जो दिन हो, उन सबकी संख्याओं के योग को तीन स्थानों में रखे । प्रथम स्थान में सात का, दूसरे स्थान में आठ का, तीसरे स्थान में तीन का भाग दे । उन तीनों स्थानों में या प्रथम स्थान में शून्य शेष रहे तो यात्रा करने- वाला अतिदुःखी होता है, दूसरे स्थान में शून्य शेष रहे तो धन की हानि और तीसरे स्थान में शून्य बचे तो मृत्यु होती है । तीनों स्थानों में यदि अंक शेष हों तो यात्रा करनेवाला सुखी तथा विजयी होता है । उदाहरण—जैसे कार्त्तिक शुक्ल द्वितीया को मंगल दिन, अनुराधा नक्षत्र में यात्रा करना है । यहाँ तिथि की संख्या २, दिन की संख्या ३, नक्षत्र की संख्या १७ हुई । इन सबका योग २२ हुआ । इसको तीन स्थानों में रखे । प्रथम स्थान में सात का भाग देने से एक, दूसरे स्थान में आठ का भाग देने
यात्राप्रकरण १७७ सात का भाग दे। यदि दो अथवा सात शेष रहें तो महाडल दोष होता है, और यदि तीन अथवा छः शेष रहें तो भ्रमण दोष होता है। ये दोनों दोष यात्रा में निषिद्ध हैं ॥ २५ ॥ हिम्बराख्य योग शशाङ्कभं सूर्यभतोऽत्र गण्यं पक्षादितिथ्या दिनवासरेण । युतं नवाप्तं नगशेषकं चेत्स्याद्धिम्बरं तद्गमनेऽतिशस्तम् ॥ २६ ॥ अन्वयः-सूर्यभतः शशाङ्कभं अत्र गण्यं [तत्] पक्षादितिथ्या दिनवासरेण युतं नवाप्तं चेत् नगशेषकं तदा हिम्बरं स्यात् तत् गमने अतिशस्तं स्यात् ॥ २६ ॥ सूर्य के नक्षत्र से चन्द्रमा के नक्षत्र पर्यन्त जितनी संख्या हो, उसमें शुक्ल या कृष्ण पक्ष की वर्त्तमान तिथि की संख्या जोड़कर नव का भाग देने से यदि सात शेष रहें तो हिम्बरयोग होता है यह यात्रा में अति शुभ होता है ॥ २६ ॥ घातचन्द्र योग भूपञ्चाङ्कद्वयङ्गदिग्वह्निसप्तवेदाष्टेशार्काश्च घा
१७८ मुहूर्त्तचिन्तामणि रूपद्वग्न्यग्निभूरामं द्वयब्ध्यग्न्यब्धियुगाग्नयः । घातचन्द्रे धिष्ण्यपादा मेषाद्वर्ज्या मनीषिभिः ॥ २९ ॥ अन्वयः—आग्नेयत्वाष्ट्रजलपपित्र्यवासवरौद्रभे मूलब्राह्म्याजपादक्षं पित्र्यमूलाजभे क्रमात् मेषादीनां (घातको ज्ञेयः) । मेषात्घातचन्द्रे (क्रमात्) रूपद्वग्न्यग्निभूराम- द्वयब्ध्यग्न्यब्धियुगाग्नयः धिष्ण्यपादाः मनीषिभिः वर्ज्याः ॥ २८-२९ ॥ मेष राशिवाले को कृत्तिका का पहिला चरण घातक है, वृष राशिवाले को चित्रा का दूसरा पाद घातक है, मिथुन राशिवाले को शतभिष का तीसरा पाद घातक है, कर्क राशिवाले को मघा का तीसरा पाद घातक है, सिंह राशिवाले को धनिष्ठा का पहिला पाद घातक है, कन्या राशिवाले को आर्द्रा का तीसरा पाद घातक है, तुला राशिवाले को मूल का दूसरा पाद घातक है, वृश्चिक राशिवाले को रोहिणी का चौथा पाद घातक है, धनु राशिवाले को पूर्वाभाद्रपद का तीसरा पाद घातक है, मकर राशिवाले को मघा का चौथा पाद घातक है, कुम्भ राशिवाले को मूल का दूसरा पाद घातक है और मीन राशिवाले को पूर्वाभाद्रपद का तीसरा पाद घातक होता है। ये कृत्तिका आदि के घातपाद यात्रा आदि में पण्डितों को वर्जित करना चाहिए ॥ २८-२९ ॥ घातक नक्षत्रपाद चक्र
| मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुं० | मी० | राशि |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृ० | चि० | श० | म० | ध० | आ० | मू० | रो० | पू० भा० | म० | मू० | पू० भा० | नक्षत्र |
| १ | २ | ३ | ३ | १ | ३ | २ | ४ | ३ | ४ | २ | ३ | पाद |
| घातक तिथियाँ | ||||||||||||
| गोस्त्रीझषे घाततिथिस्तु पूर्णा भद्रा नृयुक्कर्कटकेऽथ नन्दा । | ||||||||||||
| कौर्प्याजयोर्नक्रघटे च रिक्ता जया धनुः कुम्भहरौ न शस्ता ॥ ३० ॥ | ||||||||||||
| अन्वयः—गोस्त्रीझषे पूर्णा घाततिथिः (स्यात्) तु (तथा) नृयुक्कर्कटके भद्रा घात- | ||||||||||||
| तिथिः, अथ कौर्प्याजयोः नन्दा, नक्रघटे रिक्ता, धनुः कुम्भहरौ जया घाततिथिः (ताः) | ||||||||||||
| न शस्ताः (स्युः) ॥ ३० ॥ | ||||||||||||
| वृष, कन्या और मीन राशिवाले को पञ्चमी, दशमी, पूर्णमासी, | ||||||||||||
| अमावास्या ये तिथियाँ घातक हैं । मिथुन और कर्क राशिवाले को द्वितीया, | ||||||||||||
| सप्तमी और द्वादशी घातक हैं । वृश्चिक और मेष राशिवाले को परीवा, | ||||||||||||
| छठि और एकादशी । मकर और तुला राशिवाले को चौथि नवमी और |
यात्राप्रकरण १७९ चतुर्दशी। धनु, कुम्भ और सिंह राशिवाले को तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी ये तिथियाँ घातक हैं। इस कारण यात्रा आदि में वर्जित हैं ॥ ३० ॥ घाततिथि चक्र
| मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुं० | मी० | राशि |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ५ | २ | २ | ३ | ५ | ४ | १ | ३ | ४ | ३ | ५ | |
| ६ | १० | ७ | ७ | ८ | १० | ६ | ६ | ८ | ६ | ८ | १० | घात |
| ११ | १५ | १२ | १२ | १३ | १५ | १४ | ११ | १३ | १४ | १३ | १५ | तिथि |
घातक वार नक्रे भौमो गोहरिस्त्रीषु मन्दश्चन्द्रो द्वन्द्वेडर्कोजभे ज्ञश्च कर्के। शुक्रः कोदण्डालिमीनेषु कुम्भजूके जीवो घातवारा न शस्ताः ॥ ३१ ॥ अन्वयः—नक्रे भौमः, गोहरिस्त्रीषु मन्दः, द्वन्द्वे चन्द्रः, अजभे अर्कः, च (तथा) कर्के ज्ञः, कोदण्डालिमीनेषु शुक्रः, कुम्भजूके जीवः, (इमे) घातवाराः न शस्ताः स्युः ॥ ३१ ॥ मकर राशिवालों को मङ्गल; वृष, सिंह और कन्या राशिवालों को शनैश्चर; मिथुन राशिवालों को सोमवार; मेष राशिवालों को रविवार; कर्क राशिवालों को बुध; धनु, मीन और वृश्चिक राशिवालों को शुक्र; तुला और कुम्भ राशिवालों को बृहस्पतिवार घातक होता है। ये यात्रा आदि शुभ कार्य में निषिद्ध हैं ॥ ३१ ॥ घातवार चक्र
| मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुं० | मी० | राशि |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सू० | श० | चं० | बु० | श० | श० | बृ० | शु० | शु० | मं० | बृ० | शु० | घातवार |
घातक नक्षत्र मघाकरस्वातिमैत्रमूलश्रुत्यम्बुपान्त्यभम् । याम्यब्राह्मयेशसार्पञ्च मेषादेर्घातभं न सत् ॥ ३२ ॥ अन्वयः—मघाकरस्वातिमैत्रमूलश्रुत्यम्बुपान्त्यभं च (तथा) याम्यब्राह्मयेशसार्पं मेषादेः (क्रमात्) घातभं न सत् ॥ ३२ ॥ मेष राशिवालों को मघा, वृष राशिवालों को हस्त, मिथुन राशिवालों को स्वाती, कर्क राशिवालों को अनुराधा, सिंह राशिवालों को मूल, कन्या राशिवालों को श्रवण, तुला राशिवालों को शतभिष, वृश्चिक राशिवालों को रेवती, धनु राशिवालों को भरणी, मकर राशिवालों को रोहिणी, कुम्भ
१८० मुहूर्तचिन्तामणि राशिवालों को आर्द्रा और मीन राशिवालों को आश्लेषा नक्षत्र घातक होता है। ये यात्रा आदि में निषिद्ध हैं ॥ ३२ ॥ घातनक्षत्र चक्र
| मे० | वृ० | मि० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुं० | मी० | राशि |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म० | ह० | स्वा० | अनु० | मू० | श्र० | श० | रे० | भ० | रो० | आ० | श्ले० | घातनक्षत्र |
| तिथियोगिनी | ||||||||||||
| नव ९ भूम्यः १ शिव ११ वह्नयो ३ ऽक्ष ५ विश्वे १३ | ||||||||||||
| ऽर्क १२ कृताः ४ शक्र १४ रसा ६ स्तुरङ्ग ७ तिथ्यः १५ । | ||||||||||||
| द्वि २ दिशो १० ऽमा ३० वसवश्च ८ पूर्वतः स्यु- | ||||||||||||
| स्तिथयः सम्मुखवामगा न शस्ताः ॥ ३३ ॥ | ||||||||||||
| अन्वयः—नवभूम्यः, शिववह्नयः, अक्षविश्वे, अर्ककृताः, शक्ररसाः, तुरंगतिथ्यः, | ||||||||||||
| द्विदिशः च (तथा) अमावसवः इमाः तिथयः पूर्वतः (पूर्वदिशमारभ्य क्रमेण) स्युः, एताः | ||||||||||||
| सम्मुखवामगाः न शस्ताः (भवन्ति) ॥ ३३ ॥ | ||||||||||||
| नवमी, परीवा पूर्व में; एकादशी, तृतीया आग्नेय में; पञ्चमी, त्रयोदशी | ||||||||||||
| दक्षिण में; द्वादशी, चौथि नैर्ऋत्य में; चतुर्दशी, छठि पश्चिम में; सप्तमी, | ||||||||||||
| पूर्णमासी वायव्य में; द्वितीया, दशमी उत्तर में, अमावास्या, अष्टमी ईशान | ||||||||||||
| दिशा में योगिनी-संज्ञक तिथियाँ हैं। यात्रा आदि में ये सम्मुख और वामभाग | ||||||||||||
| में शुभ नहीं हैं ॥ ३३ ॥ | ||||||||||||
| तिथियोगिनी चक्र | ||||||||||||
| ई० ८ । ३० | पू० ९ । १ | आ० ३ । ११ | ||||||||||
| :---: | :---: | :---: | ||||||||||
| उ० २ । १० | तिथियोगिनी | द० ५ । १३ | ||||||||||
| वा० ७ । १५ | प० ६ । १४ | नै० ४ । १२ | ||||||||||
| घातलग्न | ||||||||||||
| भूमि १ द्वय २ ब्ध्य ४ द्रि ७ दिक् १० सूर्या १२ | ||||||||||||
| ङ्ग ६ ष्टा ८ ङ्के ९ शा ११ ग्नि ३ सायकाः ५ । | ||||||||||||
| मेषादिघातलग्नानि यात्रायां वर्जयेत्सुधीः ॥ ३४ ॥ |
यात्राप्रकरण १८१ अन्वयः-भूमिद्वयब्ध्यद्रिदिक्सूर्याङ्गाष्टांकेशाग्निशायकाः (क्रमात्) मेषादिघात- लग्नानि सुधीः यात्रायां वर्जयेत् ॥ ३४ ॥ मेष राशिवालों को मेष, वृषराशिवालों को वृष, मिथुन राशिवालों को कर्क, कर्क राशिवालों को तुला, सिंह राशिवालों को मकर, कन्या राशिवालों को मीन, तुला राशिवालों को कन्या, वृश्चिक राशिवालों को वृश्चिक, धनु राशिवालों को धनु, मकर राशिवालों को कुम्भ, कुम्भ-राशिवालों को मिथुन, मीन राशिवालों को सिंह लग्न घातक है। पण्डित को चाहिए कि यात्रा में इन लग्नों का त्याग करे ॥ ३४ ॥ घातलग्न चक्र
| मे० | वृ० | म० | क० | सिं० | कं० | तु० | वृ० | ध० | म० | कुं० | मी० | राशि |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मे० | वृ० | क० | तु० | म० | मी० | कं० | वृ० | ध० | कुं० | मि० | सिं० | घातलग्न |
कालपाश योग कौबेरीतो वैपरीत्येन कालो वारेऽर्काद्य सम्मुखे तस्य पाशः । रात्रावेतौ वैपरीत्येन गण्यौ यात्रायुद्धे सम्मुखे वर्जनीयौ ॥ ३५ ॥ अन्वयः-कौबेरीतः (उत्तरदिशमारभ्य क्रमेण) अर्काद्ये वारे कालः (स्यात्) तस्य सम्मुखे पाशः (स्यात्) एतौ [कालपाशौ] रात्रौ वैपरीत्येन गण्यौ (तौ) यात्रायुद्धे सम्मुखे वर्जनीयौ ॥ ३५ ॥ रविवार आदि में उत्तर दिशा से लेकर विपरीतक्रम से काल रहता है, अर्थात् रविवार के दिन उत्तर में, सोमवार के दिन वायव्य में, मंगल के दिन पश्चिम में, बुध के दिन नैर्ऋत्य में, बृहस्पति के दिन दक्षिण में, शुक्र के दिन आग्नेय में, शनैश्चर के दिन पूर्व दिशा में काल रहता है, और काल के सम्मुख पाश रहता है, अर्थात् रविवार के दिन दक्षिण में, सोमवार के दिन आग्नेय में, मंगल के दिन पूर्व में, बुध के दिन ईशान में, बृहस्पति के दिन उत्तर में, शुक्र के दिन वायव्य में, शनैश्चर के दिन पश्चिम दिशा में पाश रहता है। ये दोनों रात्रि में इससे विपरीत रहते हैं। जैसे रविवार की रात्रि में काल दक्षिण में और पाश उत्तर में रहता है। ऐसे ही सोमवार आदि में भी जानना चाहिए। ये दोनों यात्रा तथा युद्ध में सम्मुख वर्जनीय हैं ॥ ३५ ॥
१८२ मुहूर्तचिन्तामणि कालपाशचक्र
| र० | चं० | मं० | बु० | बृ० | शु० | श० | वार |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ० | वा० | प० | नै० | द० | आ० | पू० | दिशा दिन में काल |
| द० | आ० | पू० | ई० | उ० | वा० | प० | दिशा दिन में पाश |
| द० | आ० | पू० | ई० | उ० | वा० | प० | दिशा रात्रि में काल |
| उ० | वा० | प० | नै० | द० | आ० | पू० | दिशा रात्रि में पाश |
| परिघदण्ड दोष | |||||||
| पूर्वादिषु चतुर्दिक्षु सप्तसप्तानलर्क्षतः । | |||||||
| वायव्याग्नेयदिकसंस्थं पारिघं नैव लङ्घयेत् ॥ ३६ ॥ | |||||||
| अन्वयः-अनलर्क्षतः सप्त सप्त [नक्षत्राणि] पूर्वादिषु चतुर्दिक्षु (ज्ञेयानि) (तत्र) | |||||||
| वायव्याग्नेयदिकसंस्थं पारिघं नैव लंघयेत् ॥ ३६ ॥ | |||||||
| चतुष्कोण चक्र बनाकर उसमें कृत्तिका से लेकर सात सात नक्षत्र चारों | |||||||
| दिशाओं में लिखे, अर्थात् कृत्तिका से श्लेषा तक पूर्व में, मघा से विशाखा | |||||||
| तक दक्षिण में, अनुराधा से श्रवण तक पश्चिम में और धनिष्ठा से भरणी | |||||||
| तक उत्तर में। उसी चक्र में वायव्य कोण से आग्नेय कोण में गई हुई रेखा | |||||||
| का परिघदण्ड नाम है यात्रा में उसका उल्लंघन न करे, अर्थात् उत्तर | |||||||
| और पूर्व दिशा के नक्षत्रों में दक्षिण और पश्चिम की यात्रा तथा दक्षिण | |||||||
| और पश्चिम दिशा के नक्षत्रों में उत्तर और पूर्व दिशा की यात्रा न | |||||||
| करे ॥ ३६ ॥ | |||||||
| परिघदण्ड चक्र | |||||||
| पूर्व | |||||||
| कृ. रो. मृ. आ. पु. पु. श्ले. | |||||||
| उत्तर म. पू. उ. ह. चि. स्वा. वि. दक्षिण | |||||||
| ध. श. पू. उ. रे. अ. भ. परिघदण्ड | |||||||
| अ. अ. मू. पू. उ. श्र. | |||||||
| पश्चिम |