मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)
Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary
दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा
७८ मुहूर्त्तचिन्तामणि स्त्रीणां विधोर्बलमुशन्ति विवाहगर्भसंस्कारयोरितरकर्मसु भर्तुरेव ॥ ९ ॥ अन्वयः—सितकुजेज्यरवीन्दुसौरिचन्द्रात्मजाः तनुपचन्द्रदिवाकराः (क्रमेण) मासेश्वराः स्युः । विवाहगर्भसंस्कारयोः स्त्रीणां विधोः बलं उशन्ति । इतरकर्मसु भर्तुः एव विधोः बलम् (ग्राह्यम्) ॥ ६ ॥ पहिले मास का शुक्र, दूसरे मास का मंगल, तीसरे मास का बृहस्पति, चौथे मास का सूर्य, पाँचवें मास का चन्द्रमा, छठे मास का शनैश्चर, सातवें मास का बुध, आठवें मास का गर्भाधानलग्नेश, नवें मास का चन्द्रमा और दशवें मास का सूर्य स्वामी होता है । प्रयोजन यह है कि यदि मासेश्वर अस्त, निर्बल वा किसी अन्य ग्रह से पीड़ित हो तो गर्भपात हो जाता है । इसलिए पहिले ही उसका उपाय करे । अब स्त्रियों का चन्द्रबल कहते हैं । विवाह और गर्भसम्बन्धी संस्कारों में स्त्री की जन्मराशि से अन्य यात्रादि कार्यों में स्वामी की जन्मराशि से और यदि पति मर गया हो तो यात्रादि कार्यों में भी स्त्री की ही जन्मराशि से चन्द्रबल विचारना चाहिए ॥ ९ ॥ पुंसवनमुहूर्त्त पूर्वोदितैः पुंसवनं विधेयं मासे तृतीये त्वथ विष्णुपूजा । मासेऽष्टमे विष्णुविधातृजीवैर्लग्ने शुभे मृत्युगृहे च शुद्धे ॥ १० ॥ अन्वयः—पूर्वोदितैः (सीमन्तोक्तैः तिथ्यादिभिः) तृतीये मासे पुंसवन विधेयम्, अथ अष्टमे मासे विष्णुविधातृजीवैः (नक्षत्रै) शुभे लग्ने मृत्युगृहे शुद्धे [सति] विष्णु- पूजा (कार्या) ॥ १० ॥ सीमन्तोन्नयन मुहूर्त्त में कहे हुए तिथि, वार, नक्षत्र और लग्न में तथा गर्भाधान से तीसरे मास में पुंसवन कर्म करना चाहिए । अब गर्भ की रक्षा के लिए विष्णुपूजा का मुहूर्त्त कहते हैं । श्रवण, रोहिणी और पुष्य नक्षत्र में; शुभ ग्रहों के दिन में; गर्भाधान से आठवें मास में; शुभग्रह से दृष्ट, युत वा शुभग्रह-सम्बन्धी लग्न में और लग्न से आठवें स्थान में किसी ग्रह के न रहते, दोपहर के पूर्व विष्णु की पूजा करनी चाहिए ॥ १० ॥ जातकर्म और नामकर्म का मुहूर्त्त तज्जातकर्मादि शिशोर्विधेयं पर्वाह्वरिक्तोनतिथौ शुभेऽह्नि । एकादशे द्वादशकेऽपि घस्रे मृदुध्रुवक्षिप्रचरोडुषु स्यात् ॥ ११ ॥
संस्कारप्रकरण ७९ अन्वयः—पर्वाख्यरिक्तोनेतिथौ, शुभेह्नि, एकादशे अपि द्वादशके घस्रे, मृदुध्रुव- क्षिप्रचरेषु शिशोः तत् जातकर्मादि विधेयं स्यात् ॥ ११ ॥ पर्व अर्थात् कृष्णपक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पौर्णमासी, सूर्य- संक्रान्ति तथा चौथि, नवमी और चतुर्दशी को छोड़ अन्य तिथियों में, व्यतीपातादि दोषरहित शुभग्रहों के दिन में; जन्मकाल से गेरहवें वा बारहवें दिन में; मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, तीनों उत्तरा, रोहिणी, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित्, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिष नक्षत्र में जातकर्म करे यदि जन्मकाल में किसी कारणवश न किया गया हो । आदि पद से नामकर्म का भी ग्रहण है, अर्थात् इसी मुहूर्त्त में नामकर्म भी करना चाहिए ॥ ११ ॥ प्रसूता स्त्री के स्नान का मुहूर्त्त पौष्णध्रुवेन्दुकरवातहयेषु सूती- स्नानं समित्रभरवीज्यकुजेषु शस्तम् । नार्द्रात्रयश्रुतिमघान्तकमिश्रमूल- त्वाष्ट्रे ज्ञसौरिवसुषड्विरिक्ततिथ्याम् ॥ १२ ॥ अन्वयः—समित्रभरवीज्यकुजेषु, पौष्णध्रुवेन्दुकरवातहयेषु, सूतीस्नानं शस्तम्; आर्द्रात्रयश्रुतिमघान्तकमिश्रमूलत्वाष्ट्रे ज्ञसौरिवसुषड्विरिक्ततिथ्यां सूतीस्नान न शस्तम् ॥ १२ ॥ रेवती, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, स्वाती, अश्विनी और अनुराधा नक्षत्र में, रविवार, मङ्गल वा बृहस्पतिवार में प्रसूता स्त्री का स्नान करना शुभ है। आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, श्रवण, मघा, भरणी, विशाखा, कृत्तिका, मूल और चित्रा नक्षत्र में; बुध और शनिवार में; अष्टमी, षष्ठि, द्वादशी, चौथि, नवमी और चतुर्दशी तिथि में प्रसूता स्त्री स्नान न करे, इनमें स्नान करने से फिर सन्तान नहीं होती ॥ १२ ॥ प्रथम आदि महीनों में बालक के दाँत निकलने का फल मासे चेत्प्रथमे भवेत्सदर्शनो बालो विनश्येत्स्वयं हन्यात्सङ्क्रमतोऽनुजातभगिनीं मात्रग्रजान् द्व्यादिके । षष्ठादौ लभते हि भोगमतुलं तातात्सुखं पुष्टतां लक्ष्मीं सौख्यमथो जनौ सदशनो वोर्ध्वं स्वपित्राविहा ॥ १३ ॥
८० मुहूर्तचिन्तामणि अन्वयः—चेत् [यदि] प्रथमे मासे बालः सदशनः भवेत् (तदा सः स्वयं नश्येत् । द्वयादिके मासे (चेत् सदशनः) तदा क्रमशः अनुजातभगिनीमातृग्रजान् हन्यात् । षष्ठादौ (क्रमेण) अतुलं भोगं, तातात् सुखं, पुष्टतां, लक्ष्मीं, सौख्य लभते । अथो जनौ (जन्मसमये) सदशनः (बालः) स्वपित्रादिहा (भवति) वा ऊर्ध्वं (ऊर्ध्वपंक्तौ) सदशनः बालः स्वपित्रादिहा (भवति) ॥ १३ ॥ पहिले मास में यदि बालक के दाँत निकलें तो वह बालक मर जाता है। यदि दूसरे मास में निकलें तो छोटे भाई को, तीसरे मास में निकलें तो बहिन को, चौथे मास में जामें तो माता को और पाँचवें मास में जामें तो जेठे भाई को मारता है। यदि छठे मास में दाँत जामें तो वह बालक उत्तम भोग, सातवें मास में जामें तो पिता से सुख, आठवें मास में जामें तो देह की पुष्टता, नवें मास में जामें तो लक्ष्मी, दशवें मास में जामें तो सौख्य, गेरहवें मास में जामें तो अतिसौख्य और बारहवें मास में धन-सम्पत्ति को प्राप्त होता है। यदि गर्भ ही में जामे हुए दांतों के सहित उत्पन्न हो, अथवा ऊपर की पंक्ति में पहिले दाँत जामें तो वह बालक अपने माता-पिता, भाई इत्यादिकों का विनाश करता है ॥ १३ ॥ दोलारोहणमुहूर्त्त दोलारोहेऽर्कभात्पञ्चशरपञ्चेषुसप्तभैः । नैरूज्यं मरणं कार्श्य व्याधिः सौख्यं क्रमाच्छिशोः ॥ १४ ॥ अन्वयः—अर्कभात् पञ्चशरपञ्चेषुसप्तभैः [नक्षत्रैः] दोलारोहे [सति] क्रमात् शिशोः नैरूज्यं, मरणं, कार्श्य, व्याधिः, सौख्यं स्यात् ॥ १४ ॥ सूर्य जिस नक्षत्र में स्थित हों उस नक्षत्र से पाँच नक्षत्र पर्यन्त बालक को झुलुआ पर चढ़ाकर झुलावे तो वह नीरोग हो, फिर पाँच नक्षत्रों में उस बालक का मरण हो, फिर पाँच नक्षत्रों में वह बालक दुबला हो, फिर पाँच नक्षत्रों में उस बालक के व्याधि हो और फिर सात नक्षत्रों में उस बालक को सौख्य हो ॥ १४ ॥ दन्तार्कभूपधृतिदिङ्मतवासरे स्या- द्वारे शुभे मृदुलघुध्रुवभैः शिशूनाम् । दोलाधिरूढिरथनिष्क्रमणं चतुर्थ- मासे गमोक्तसमयेऽर्कमितेऽह्नि वा स्यात् ॥ १५ ॥
संस्कारप्रकरण ८१ अन्वयः-दन्तार्कभूपधृतिदिङ्मितवासरे, शुभे वारे, मृदुलघुध्रुवभैः (भैःनक्षत्रैः) शिशोः दोलाधिरूढिः स्यात् । अथ चतुर्थमासे वा अर्कमिते अह्नि गमोक्तसमये शिशोः निष्क्रमणं (शुभं) स्यात् ॥ १५ ॥ जन्मदिन से बत्तीसवें, बारहवें, सोलहवें, अठारहवें वा दशवें दिन; चन्द्र, बुध, बृहस्पति वा शुक्रवार और मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित्, तीनों उत्तरा वा रोहिणी नक्षत्र में पहिले पहिल बालकों को झुलुआ पर चढ़ाना शुभ होता है । अब शिशुनिष्क्रमण- मुहूर्त्त कहते हैं । जन्म से चौथे मास में और यात्रा में कहे हुए तिथि, वार, नक्षत्र और लग्न में पहिले पहिल बालक को घर से बाहर निकालना शुभ होता है, अथवा जन्मदिन से बारहवें दिन यात्रोक्त समय में शुभ होता है ॥ १५ ॥ जलपूजामुहूर्त्त कवीज्यास्तचैत्राधिमासे न पौषे जलं पूजयेत्सूतिका मासपूर्तौ । बुधन्द्रीज्यवारे विरिक्ते तिथौ हि श्रुतीज्यादितीन्द्रर्कनैर्ऋत्यमैत्रैः ॥ १६ ॥ अन्वयः—कवीज्यास्तचैत्राधिमासे, पौषे मासे, मासपूर्तौ (अपि) सूतिका जलं न पूजयेत् । बुधेन्द्रीज्यवारे विरिक्ते तिथौ श्रुतीज्यादितीन्द्रर्कनैर्ऋत्यमैत्रैः जलं पूजयेत् ॥ १६ ॥ बृहस्पति वा शुक्र के अस्त में तथा चैत्र, पौष, वा मलमास में सूतिका जल की पूजा न करे और बुधवार, सोमवार, बृहस्पतिवार में; चौथि, नवमी, चतुर्दशी तिथि को छोड़ अन्य तिथियों में; श्रवण, पुष्य, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, मूल, अनुराधा नक्षत्र में और पहिले महीने की समाप्ति में सूतिका जल की पूजा करे ॥ १६ ॥ अन्नप्राशन मुहूर्त्त रिक्तानन्दाष्टदर्शं हरिदिवसमथो सौरिभौमार्कवाराँ- ल्लग्नं जन्मर्क्षलग्नाष्टमगृहलवगं मीनमेषालिकं च । हित्वा षष्ठात्समे मास्यथ हि मृगदृशां पञ्चमादोजमासे नक्षत्रैः स्यात्स्थिराख्यैः समृदुलघुचरैर्बालकान्नाशनं सत् ॥ १७ ॥ अन्वयः—रिक्तानन्दाष्टदर्शं, हरिदिवसं, सौरिभौमार्कवारान्, जन्मर्क्षलग्नाष्टमगृह- लवगं लग्नं, मीनमेषालिकं लग्नं (एतत् सर्वं) हित्वा, षष्ठात् समे मासि अथ हि मृगदृशां
८२ मुहूर्त्तचिन्तामणि (कन्यानां) पञ्चमात् ओजमासे समृदुलघुचरैः स्थिराख्यैः नक्षत्रैः बालकान्नाशनं सत् ॥ १७॥ चौथि, नवमी, चतुर्दशी, परीवा, षठि, एकादशी, अष्टमी, अमावास्या और द्वादशी तिथि को छोड़ अन्य तिथियों में; शनैश्चर, मंगल, रविवार को छोड़ अन्य दिनों में; जन्मराशि वा जन्मलग्न से आठवीं राशि, आठवाँ नवांश; मीन, मेष और वृश्चिक को छोड़ अन्य लग्न में; तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभि- जित्, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिष नक्षत्र में; छठे मास से लेकर सम मासों में अर्थात् छठे, आठवें, दशवें इत्यादि मासों में बालकों का और पाँचवें मास से लेकर विषम मासों में अर्थात् पाँचवें, सातवें, नवें, इत्यादि मासों में कन्याओं का अन्नप्राशन शुभ होता है सो भी शुक्लपक्ष में और दोपहर से पूर्व होना चाहिए ॥ १७॥ अन्नप्राशन के लिये लग्नशुद्धि केन्द्रत्रिकोणसहजेषु शुभैः खशुद्धे लग्ने त्रिलाभरिपुगैश्च वदन्ति पापैः । लग्नाष्टषष्ठरहितं शशिनं प्रशस्तं मैत्राम्बुपानिलजनुर्भमसच्च केचित् ॥ १८ ॥ अन्वयः—शुभैः केन्द्रत्रिकोणसहजेषु (स्थितैः) खशुद्धे लग्ने त्रिलाभरिपुगैः पापैः, लग्नाष्टषष्ठरहितं शशिनं (अन्नाशने) प्रशस्तं वदन्ति। केचित् मैत्राम्बुपानिलजनुर्भं असत् वदन्ति ॥ १८ ॥ लग्न से पहिले, चौथे, सातवें और तीसरे स्थान में शुभ ग्रह हों; दशवें स्थान में कोई ग्रह न हो; तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रह हों और लग्न, आठवें और छठे स्थान को छोड़ अन्य स्थानों में चन्द्रमा स्थित हो, ऐसे लग्न में अन्नप्राशन शुभ होता है। कोई आचार्य अनुराधा, शतभिष और जन्मनक्षत्र को अन्नप्राशन में अशुभ कहते हैं ॥ १८॥ अन्नप्राशन मुहूर्त्त में ग्रहों का फल क्षीणेन्दुपूर्णचन्द्रेज्यज्ञभौमार्काकिभार्गवैः । त्रिकोणव्ययकेन्द्राष्टस्थितैरुक्तं फलं ग्रहैः ॥ १९ ॥ भिक्षाशी यज्ञकृद्दीर्घजीवी ज्ञानी च पित्तहक । कुष्ठी चान्नक्लेशवातव्याधिमान्भोगभागिति ॥ २० ॥
संस्कारप्रकरण ८३ अन्वयः—क्षीणेन्दुपूर्णचन्द्रेज्यज्ञभौमार्कार्किकिभार्गवैः ग्रहैः त्रिकोणव्ययकेन्द्राष्टस्थितैः (क्रमेण) भिक्षाशी, यज्ञकृत्, दीर्घजीवी, ज्ञानी, पित्तरुक्, कुष्ठी च अन्नक्लेशवातव्या- धिमान्, भोगभाग्, इति उक्तं फलं ज्ञेयम् ॥ १६-२० ॥ जिस लग्न में अन्नप्राशन इष्ट हो उससे नवें, पाँचवें, बारहवें, पहिले, चौथे, सातवें वा आठवें स्थान में यदि क्षीण चन्द्रमा स्थित हो तो वह बालक भीख माँग कर जीविका करता है; पूर्णचन्द्रमा स्थित हो तो यज्ञ करता है; बृहस्पति स्थित हो तो दीर्घायु होता है; बुध स्थित हो तो ज्ञानी; मंगल स्थित हो तो पित्तरोगी; सूर्य स्थित हो तो कुष्ठरोगी; शनैश्चर, राहु वा केतु स्थित हों तो अन्न का क्लेश और वातरोगी; और शुक्र स्थित हो तो वह बालक भोगी होता है ॥ १९-२० ॥ बालकों को भूमि में बैठाने का मुहूर्त पृथ्वीं वराहमभिपूज्य कुजे विशुद्धे ऽरिक्ते तिथौ व्रजति पञ्चममासि बालम् । बद्ध्वा शुभेऽह्नि कटिसूत्रमथ ध्रुवेन्दु- ज्येष्ठर्क्षमित्रलघुभैरुपवेशयेत्कौ ॥ २१ ॥ अन्वयः—पृथ्वी वराहं अभिपूज्य, कुजे विशुद्धे, अरिक्ते तिथौ, पञ्चममासि व्रजति, शुभेऽह्नि, ज्येष्ठर्क्षमित्रलघुभैः, कटिसूत्रं बद्ध्वा वालं कौ [पृथिव्यां] उपवेशयेत् ॥ २१ ॥ मङ्गल के बली रहते; जन्म से पाँचवें महीने में और चौथि, नवमी, चतुर्दशी को छोड़ अन्य तिथियों में; तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, ज्येष्ठा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी वा पुष्य नक्षत्र में; पृथ्वी और वराह की पूजा करके कटिसूत्र बाँधकर बालक को भूमि में बैठावे ॥ २१ ॥ बालक की जीविका-परीक्षा तस्मिन्काले स्थापयेत्तत्पुरस्ताद्वस्त्रं शस्त्रं पुस्तकं लेखनीं च । स्वर्णं रौप्यं यच्च गृह्णाति बालस्तैराजीवैस्तस्य वृत्तिः प्रदिष्टा ॥ २२ ॥ अन्वयः—तस्मिन् काले तत्पुरस्तात् वस्त्रं शस्त्रं पुस्तकं लेखनीं स्वर्णं रौप्यं च स्थापयेत् । बालः यत् गृह्णाति तैः आजीवैः तस्य वृत्तिः प्रदिष्टा ॥ २२ ॥ बालक को भूमि में बैठाकर उसके आगे वस्त्र, शस्त्र, पुस्तक, लेखनी, सुवर्ण और चाँदी धरे । वह बालक पहिले जिस वस्तु को उठावे उसी वस्तु के द्वारा उसकी जीविका पण्डितों ने कही है ॥ २२ ॥
८४ मुहूर्तचिन्तामणि ताम्बूल-भक्षण-मुहूर्त्त वारे भौमार्किहीने ध्रुवमृदुलघुभैर्विष्णुमूलादितीन्द्र- स्वातीवस्वभ्युपेतैर्मिथुनमृगसुताकुम्भगोमीनलग्ने । सौम्यैः केन्द्रत्रिकोणैरशुभगगनगैः शत्रुलाभत्रिसंस्थै- स्ताम्बूलं सार्द्धमासद्वयमितसमये प्रोक्तमन्नाशने वा ॥ २३ ॥ अन्वयः—भौमार्किहीने वारे ध्रुवमृदुलघुभैः विष्णुमूलादितीन्द्रस्वातीवस्वभ्युपेतैः, मिथुनमृगसुताकुम्भगोमीनलग्ने, सौम्यैः केन्द्रत्रिकोणैः, अशुभगगनगैः शत्रुलाभत्रिसंस्थैः, सार्द्धमासद्वयमितसमये वा अन्नाशने ताम्बूलं प्रोक्तम् ॥ २३ ॥ मंगल और शनैश्चर को छोड़ अन्य दिनों में; तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, श्रवण, मूल, पुनर्वसु, ज्येष्ठा, स्वाती वा धनिष्ठा नक्षत्र में; मिथुन, मकर, कन्या, कुम्भ, वृष, मीन लग्न में; चौथे, सातवें, दशवें, पाँचवें, नवें स्थान में और लग्न में शुभ ग्रहों के रहते; छठे, गेरहवें और तीसरे स्थान में पापग्रहों के रहते; जन्म से अढ़ाई महीने पर अथवा अन्नप्राशनमुहूर्त्त में बालक का ताम्बूलभक्षण शुभ होता है ॥ २३ ॥ कर्णवेध-मुहूर्त्त हित्वैतांश्चैत्रपौषावमहरिशयनं जन्ममासं च रिक्तां युग्माब्दं जन्मतारामृतुमुनिवसुभिः संमिते मास्यथो वा । जन्माहात्सूर्यभूपैः परिमितदिवसे ज्ञेज्यशुक्रेन्दुवारे ऽथोजाब्दे विष्णुयुग्मादितिमृदुलघुभैः कर्णवेधः प्रशस्तः ॥ २४ ॥ अन्वयः—चैत्रपौषावमहरिशयनं, जन्ममासं, रिक्तां च युग्माब्दं, जन्मतारां, एतान् हित्वा, ऋतुमुनिवसुभिः सम्मिते मासि अथो वा जन्माहात् सूर्यभूपैः परिमितदिवसे, ज्ञेज्यशुक्रेन्दुवारे, अथ ओजाब्दे, विष्णुयुग्मादितिमृदुलघुभैः, कर्णवेधः प्रशस्तः ॥ २४ ॥ चैत्र, पौष, तिथिक्षय, हरिशयन अर्थात् आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्त्तिक शुक्ल एकादशी तक; जन्ममास अर्थात् जन्मदिन से तीस दिन पर्यन्त, रिक्ता तिथि, सम वर्ष और जन्मतारा को छोड़कर जन्म से छठे, सातवें, आठवें महीने में, अथवा बारहवें या सोलहवें दिन, बुधवार, बृहस्पति, शुक्र, सोमवार में; और विषम वर्ष में; और श्रवण, धनिष्ठा, पुनर्वसु, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी और पुष्य नक्षत्र में बालक का कर्ण- वेध शुभ होता है ॥ २४ ॥
संस्कारप्रकरण ८५ कर्णवेध में लग्नशुद्धि संशुद्धे मृतिभवने त्रिकोणकेन्द्र- त्र्यायस्थैः शुभखचरैः कवीज्यलग्ने । पापाख्यैररिसहजायगेहसंस्थै- र्लग्नस्थे त्रिदशगुरौ शुभावहः स्यात् ॥ २५ ॥ अन्वयः—मृतिभवने संशुद्धे, शुभखचरैः त्रिकोणकेन्द्रत्र्यायस्थैः, कवीज्यलग्ने, पापाख्यैः अरिसहजायगेहसंस्थैः, त्रिदशगुरौ लग्नस्थे, (कर्णवेधः) शुभावहः स्यात् ॥ २५ ॥ लग्न से आठवें स्थान में कोई ग्रह न हो, नवें, पाँचवें, पहिले, चौथे, सातवें, दशवें, तीसरे, और गेरहवें स्थान में शुभग्रह हों; तीसरे, छठे, गेरहवें स्थान में पापग्रह और लग्न में बृहस्पति हों; वृष, तुला, धनु वा मीन लग्न हो तो बालक का कर्णवेध शुभ होता है ॥ २५ ॥ मुंडन आदि में निषिद्ध काल गीर्वाणाम्बुप्रतिष्ठापरिणयदहनाधानगेहप्रवेशा- श्चौलं राजाभिषेको व्रतमपि शुभदं नैव याम्यायने स्यात् । नो वा बाल्यास्तवार्ध्ये सुरगुरुसितयोर्नैव केतूदये स्या- त्पक्षं वार्द्धं च केचिज्जहति तमपरे यावदीक्षां तदुग्रे ॥ २६ ॥ अन्वयः—याम्यायने गीर्वाणाम्बुप्रतिष्ठापरिणयदहनाधानगेहप्रवेशाः चौलं, राजा- भिषेकः व्रतं अपि नैव शुभदं स्यात् । वा सुरगुरुसितयोः बाल्यास्तवार्ध्ये अपि नैव शुभदं, वा केतूदये (अपि) नैव शुभद स्यात् । त [केतूदयं] केचित् पक्षं वा अर्धं [पक्षार्धं] जहति, अपरे तदुग्रे [ब्रह्मपुत्राख्ये केतौ] ईक्षां [दर्शनं] यावत् जहति ॥ २६ ॥ देवप्रतिष्ठा, जलाशयप्रतिष्ठा, विवाह, अग्न्याधान, चूडाकर्म, यज्ञोपवीत, राजाभिषेक, गृहप्रवेश और भी जिनका कोई नियत काल नहीं है वे सब शुभ कर्म याम्यायन अर्थात् कर्क संक्रान्ति से मकर संक्रान्ति तक शुभ नहीं होते । बृहस्पति और शुक्र की बाल्यावस्था, अस्त और वृद्धावस्था में और केतु के उदय में भी उक्त कर्म शुभ नहीं होते । कोई आचार्य केतु के उदय में पक्ष भर और कोई आधा पक्ष उक्त कर्म करने में त्याग करते हैं । कोई कहते हैं कि जब तक केतु दीख पड़े तब तक ये उक्त कर्म नहीं करना चाहिए, यह उनका कहना उग्र अर्थात् ब्रह्मपुत्र नामक अति दुष्ट फल देनेवाले केतु के उदय में समझना चाहिए । ब्रह्मपुत्र नामक केतु का लक्षण
८६ मुहूर्त्तचिन्तामणि वशिष्ठजी से कहा है कि तीन शिखा और तीन वर्णों से संयुक्त, ब्रह्मदण्ड के सदृश. किसी भी दिशा में उदय होनेवाला ब्रह्मपुत्र नामक केतु होता है। यह उदय होकर ब्रह्मा का भी नाश करता है, फिर दूसरों के लिए क्या कहना है। वराहजी ने भी इसका ऐसा ही लक्षण कहा है। अन्य केतुओं के लक्षण गर्गजी ने कहे हैं। तीन शिखा, लाल वर्ण, लाल किरण, सदा उत्तर ही दिशा में उदय, लोहितांगात्मज और कौंकुम नाम के साठ प्रकार के केतु होते हैं। उनके उदय होने से राजाओं में परस्पर संग्राम होता है। कृष्णवर्ण मिली हुई काली किरणोंवाले कीलक नाम के तेंतीस प्रकार के केतु होते हैं, वे उदय होने पर अतिदारुण होते हैं ॥ २६ ॥ शुक्र और बृहस्पति की बाल्य और वृद्ध अवस्था पुरः पश्चाद्भृगोर्बाल्यं त्रिदशाहं च वार्धकम् । पक्षं पंचदिनं ते द्वे गुरोः पक्षमुदाहृते ॥ २७ ॥ अन्वयः—भृगोः पुरः पश्चात् (क्रमेण) त्रिदशाहं बाल्यं, पक्षं पञ्चदिनं च वार्धक (प्रोक्तम्) । गुरोः ते द्वे [बाल्यवार्धके] पक्षं उदाहृते ॥ २७ ॥ यदि शुक्र का उदय पूर्व दिशा में हो तो तीन दिन बाल और पन्द्रह दिन वृद्ध तथा पश्चिम में हो तो दश दिन बाल और पाँच दिन वृद्ध रहता है। बृहस्पति दोनों दिशाओं में उदय से पन्द्रह दिन तक बाल और अस्त से पूर्व पन्द्रह दिन वृद्ध रहता है ॥ २७ ॥ मतान्तर से बाल्य और वृद्ध अवस्था ते दशाहं द्वयोः प्रोक्ते कैश्चित्सप्तदिनं परैः । त्र्यहं त्वात्ययिकेऽप्यन्य र्धाहं च त्र्यहं विधोः ॥ २८ ॥ अन्वयः—कैश्चित् द्वयोः (गुरुशुक्रयोः) ते [बाल्यवार्धके] दशाहं प्रोक्ते, परैः सप्तदिनं प्रोक्ते । अन्यैः आत्ययिके [आवश्यके] त्र्यहं प्रोक्त । विधोः च अर्धाहं बाल्यं, त्र्यहं वार्धकं (प्रोक्तम्) ॥ २८ ॥ कोई आचार्य शुक्र और बृहस्पति दोनों की बाल्य और वृद्धावस्था दश दिन की कहते हैं, कोई सात दिन की कहते हैं और कोई कहते हैं कि यदि किसी कार्य की अति आवश्यकता हो तो तीन ही दिन की मानना चाहिए । चन्द्रमा की बाल्यावस्था आधा दिन और वृद्धावस्था तीन दिन की होती है ॥ २८ ॥
संस्कारप्रकरण ८७ चूडाकर्म का मुहूर्त्त चूडावर्षात्तृतीयात्प्रभवति विषमेऽष्टाद्यरिक्तार्कषष्ठी- पर्वोनाहे विचैत्रोदगयनसमये ज्ञेन्दुशुक्रेज्यकानाम् । वारे लग्नांशयोश्च स्वभनिधनतनौ नैधने शुद्धियुक्ते शाक्रोपेते॑विमैत्रैर्मृदुचरलघुभैरायषट्त्रिस्थपापैः ॥ २९॥ क्षीणचन्द्रकुजसौरिभास्करैर्मुत्युशस्त्रमृतिपङ्गुताज्वराः । स्युः क्रमेण बुधजीवभार्गवैः केन्द्रगैश्च शुभमिष्टतारया ॥ ३०॥ अन्वयः—तृतीयात् वर्षात् विषमे वर्षे, अष्टाद्यरिक्तार्कषष्ठीपर्वोनाहे, विचैत्रोदगयन- समये, ज्ञेन्दुशुक्रेज्यकानां वारे लग्नांशयोश्च, स्वभनिधनतनौ, नैधने शुद्धियुक्ते (सति) शाक्रोपेतेः विमैत्रैः मृदुचरलघुभः, आयषट्त्रिस्थपापैः चूडा शुभा प्रभवति ॥
८८ मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—पञ्चमासाधिके मातुः गर्भे शिशोः चौलं न सत् । पञ्चवर्षाधिकस्य शिशोः मातरि गर्भिण्यां अपि चौल इष्टं स्यात् ।। ३१ ।। यदि माता के पाँच महीने से अधिक दिनों का गर्भ हो तो बालक का मुण्डन शुभ नहीं होता और यदि पाँच वर्ष से अधिक दिनों का बालक हो गया हो तो माता के गर्भवती रहते भी मुण्डन शुभ होता है ।। ३१ ।। तारादोष का अपवाद तारादौष्ट्येऽब्जे त्रिकोणोच्चगे वा क्षौरं सत्स्यात्सौम्यमित्रस्ववर्गे । सौम्ये भेऽब्जे शोभने दुष्टतारा शस्ता ज्ञेया क्षौरयात्रादिकृत्ये ।। ३२ ।। अन्वयः—तारादौष्ट्ये (अपि) अब्जे (चन्द्रे) त्रिकोणोच्चगे वा सौम्यमित्रस्ववर्गे (स्थिते) क्षौरं सत् स्यात् । शोभने अब्जे सौम्ये भे (सति) क्षौरयात्रादिकृत्ये दुष्टतारापि शस्ता ज्ञेया ।। ३२ ।। यदि तारा दुष्ट भी हो, अर्थात् पहिली, तीसरी, पाँचवीं, सातवीं भी हो और चन्द्रमा नवें या पाँचवें या अपने उच्चस्थान में, अथवा बुध, बृहस्पति, शुक्र के षड्वर्ग में, अथवा अपने ही षड्वर्ग में स्थित हो तो मुण्डन शुभ होता है । विहित शुभ नक्षत्र हों, चन्द्रमा गोचर से शुभ हो, अर्थात् जन्मराशि से चौथे, छठे, आठवें, बारहवें स्थान को छोड़ अन्य स्थान में स्थित हो तो दुष्ट भी तारा मुण्डन और यात्रा आदि में शुभ हो जाती है ।। ३२ ।। मुण्डनादि कार्यों में निषिद्ध काल ऋतुमत्याः सूतिकायाः सूनोश्चौलादि नाचरेत् । ज्येष्ठापत्यस्य न ज्येष्ठे कैश्चिन्मार्गेऽपि नेष्यते ।। ३३ ।। अन्वयः—ऋतुमत्याः सूतिकायाः सूनोः चौलादि न आचरेत् । ज्येष्ठापत्यस्य ज्येष्ठे चौलं न आचरेत् । कैश्चित् मार्गेऽपि न इष्यते ।। ३३ ।। जब माता रजस्वला हो, अथवा माता के लड़की हुए महीने से कम अथवा लड़का हुए बीस दिन से कम दिन बीते हों तो लड़के का मुण्डनादि संस्कार न करे । जेठे लड़के और जेठी लड़की का ज्येष्ठ महीने में विवाहादि शुभ कार्य न करे । कोई आचार्य अगहन में भी जेठे लड़के और लड़की के विवाहादि संस्कार को निषिद्ध कहते हैं ।। ३३ ।।
संस्कारप्रकरण ८९ साधारण क्षौरादि का मुहूर्त और निषेध दन्तक्षौरनखक्रियात्र विहिता चौलोदिते वारभे पातंग्याररवीन् विहाय नवमं घस्रं च सन्ध्यां तथा । रिक्तां पर्वनिशां निरासनरणग्रामप्रयाणोद्यतः स्नाताभ्यक्तकृताशनैर्नहि पुनः कार्या हितप्रेप्सुभिः ॥ ३४ ॥ अन्वयः-पातंग्याररवीन् विहाय च नवमं घस्रं, सन्ध्यां, रिक्तां पर्वनिशां विहाय, चौलोदिते वारभे, दन्तक्षौरनखक्रिया विहिता। अत्र निरासनरणग्रामप्रयाणोद्यतः स्नाताभ्यक्तकृताशनैः हितप्रेप्सुभिः (जनैः) दन्तक्षौरनखक्रिया नहि कार्या ॥ ३४ ॥ शनैश्चर, मंगल, रविवार, क्षौर दिन से नवें दिन, संध्याकाल, चौथि, नवमी, चतुर्दशी, अष्टमी, पूर्णमासी, अमावास्या, सूर्यसंक्रान्ति और रात्रि को छोड़ मुण्डन में कहे हुए तिथि, वार, नक्षत्र और लग्न में दाँतों को साफ कराना, बाल बनवाना और नख कटाना शुभ कहा है। जिनको अपने हित की इच्छा हो वे बिना आसन के, रणभूमि में, किसी अन्य गाँव में, यात्रा की तैयारी कर चुकने पर, स्नान करके, उबटन या तेल लगाकर और भोजन करके उक्त तीनों काम न करें ॥ ३४ ॥ निमित्तवश क्षौरकर्म ऋतुपाणिपीडमृतिबन्धमोक्षणे क्षुरकर्म च द्विजनृपाज्ञयाचरेत् । शववाहतीर्थगमसिन्धुमज्जनक्षुरमाचरेन्न खलु गर्भिणीपतिः ॥ ३५ ॥ अन्वयः-ऋतुपाणिपीडमृतिबन्धमोक्षणे द्विजनृपाज्ञया क्षुरकर्म आचरेत् । खलु गर्भिणीपतिः, शववाहतीर्थगमसिन्धुमज्जनक्षुरं न आचरेत् ॥ ३५ ॥ यज्ञ में, विवाह में, माता-पिता के मरण में, बन्धन से छूटने पर अथवा ब्राह्मण वा राजा की आज्ञा से सदा बाल बनवावे; चाहे निषिद्ध भी वारादि हो तो भी कुछ दोष नहीं। अब गर्भिणीपति के त्याज्य कर्म कहते हैं। शव का ले जाना, तीर्थयात्रा, समुद्र में स्नान और क्षौरकर्म जिसकी स्त्री गर्भवती हो वह पुरुष इतने कर्म न करे ॥ ३५ ॥ क्षौरकर्म में राजाओं के लिए विशेष नृपाणां हितं क्षौरभे श्मश्रुकर्म दिने पञ्चमे पञ्चमेऽस्योदये वा । षडग्निस्रिमैत्रोऽष्टकःपञ्चपित्र्योऽब्दतोऽब्ध्यर्यमा क्षौरकृन्मृत्युमेति ॥ ३६ ॥
९० मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—क्षौरभे तथा पञ्चमे पञ्चमे दिने वा अस्य (नक्षत्रस्य) उदये (मुहूर्त्ते) नृपाणां श्मश्रुकर्म हितम् । तथा षडग्निः त्रिर्मैत्रः, अष्टकः, पञ्चपित्र्यः, अब्ध्यर्यमा, क्षौरकृत् अब्दतः मृत्युं एति ॥ ३६ ॥ साधारण क्षौरकर्म के लिए कहे हुए नक्षत्रों में पाँचवें दिन दाढ़ी के बाल बनवाना राजाओं का हितकारक होता है । अब सर्वथा क्षौर में त्याज्य नक्षत्र कहते हैं । कृत्तिका नक्षत्र में छः बार, अनुराधा में तीन बार, रोहिणी में आठ बार, मघा में पाँच बार, उत्तराफाल्गुनी में चार बार बाल बनवाने- वाला पुरुष एक वर्ष के अनन्तर मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ ३६ ॥ अक्षरारम्भ का मुहूर्त्त गणेशविष्णुवाग्रमाः प्रपूज्य पञ्चमाब्दके तिथौ शिवार्कदिक्द्विषट्शरत्रिके रवावुदक् । लघुश्रवोनिलान्त्यभादितीशतक्षमित्रभे चरोनसत्तनौ शिशोर्लिपिग्रहः सतां दिने ॥ ३७ ॥ अन्वयः—पञ्चमाब्दके, शिवार्कदिग्द्विषट्शरत्रिके तिथौ रवौ उदक् लघुश्रवोऽनिला- न्त्यभादितीशतक्षमित्रभे, चरोनसत्तनौ, सतां दिने, गणेशविष्णुवाग्रमाः प्रपूज्य, शिशोः लिपिग्रहः शुभः स्यात् ॥ ३७ ॥ जन्म से पाँचवें वर्ष में, एकादशी, द्वादशी, दशमी, दुइज, छठि, पञ्चमी वा तीज तिथि में; उत्तरायण में सूर्य के रहते; हस्त, अश्विनी, पुष्य, श्रवण, स्वाती, रेवती, पुनर्वसु, आर्द्रा, चित्रा या अनुराधा नक्षत्र में; चर अर्थात्, मेष, कर्क, तुला और मकर को छोड़ शुभग्रहों के लग्न में; शुभ ग्रहों के दिन में; गणेश, विष्णु, सरस्वती और लक्ष्मी की पूजा करके बालक का अक्षरारम्भ शुभ होता है ॥ ३७ ॥ विद्यारम्भ का मुहूर्त्त मृगात्कराच्छूतेस्त्रयेऽशिवमूलपूर्विकात्रये गुरुद्वयेऽर्कजीववित्सितेऽह्नि षट्शरत्रिके । शिवार्कदिग्द्विके तिथौ ध्रुवान्त्यमित्रभे परैः शुभैरधीतिरुत्तमा त्रिकोणकेन्द्रगैः स्मृता ॥ ३८ ॥ अन्वयः—मृगात् करात् श्रुतेः त्रये गुरुद्वये, अर्कजीववित्सिते अह्नि, षट्शरत्रिके शिवार्कदिग्द्विके तिथौ, परैः ध्रुवान्त्यमित्रभे, शुभैः त्रिकोणकेन्द्रगैः अधीतिः उत्तमा स्मृता ॥ ३८ ॥
संस्कारप्रकरण ९१ मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, अश्विनी, मूल, तीनों पूर्वा, पुष्य वा आश्लेषा नक्षत्र में; रविवार, बृहस्पति वा शुक्रवार में; छठि, पञ्चमी तीज, एकादशी, द्वादशी, दशमी वा दुइज तिथि में; लग्न से नवें, पाँचवें, पहिले, चौथे, सातवें और दशवें शुभ ग्रहों के रहते विद्यारम्भ शुभ होता है। कोई आचार्य तीनों उत्तरा, रेवती और अनुराधा में भी विद्यारम्भ शुभ कहते हैं ॥ ३८ ॥ वर्णक्रम से यज्ञोपवीत का समय विप्राणां व्रतबन्धनं निगदितं गर्भाज्जनेर्वाऽष्टमे वर्षे वाप्यथ पञ्चमे क्षितिभुजां षष्ठे तथैकादशे । वैश्यानां पुनरष्टमेऽप्यथ पुनः स्याद्द्वादशे वत्सरे कालेऽथ द्विगुणे गते निगदितं गौणं तदाहुर्बुधाः ॥ ३९ ॥ अन्वयः—गर्भात् वा जनेः [जन्मसमयात्] अष्टमे, अपि वा पञ्चमे वर्षे विप्राणां, (एवं) षष्ठे तथा एकादशे वर्षे क्षितिभुजाम्, पुनः अष्टमे वा द्वादशे वत्सरे वैश्यानाम् व्रतबन्धनं (शुभ) निगदितम् । अथ निगदिते काले द्विगुणे गते सति तत् व्रतम् बुधाः गौणं आहुः ॥ ३९ ॥ गर्भाधान से अथवा जन्मकाल से आठवें वा पाँचवें वर्ष में ब्राह्मणों का, छठे अथवा गेरहवें वर्ष में क्षत्रियों का, आठवें अथवा बारहवें वर्ष में वैश्यों का यज्ञोपवीत श्रेष्ठ कहा गया है। उक्तकाल के द्विगुणकाल में अर्थात् सोलहवें वर्ष ब्राह्मण का, बाइसवें वर्ष क्षत्रिय का और चौबीसवें वर्ष वैश्य का यज्ञोपवीत मध्यम कहा गया है ॥ ३९ ॥ यज्ञोपवीत के नक्षत्रादि क्षिप्रध्रुवाह्विचरमूलमृदुत्रिपूर्वा- रौद्रेऽर्कविद्गुरुसितेन्दुदिने व्रतं सत् । द्वित्रीषुरुद्ररविदिक्प्रमिते तिथौ च कृष्णादिमत्रिलवकेऽपि न चापराह्ले ॥ ४० ॥ अन्वयः—क्षिप्रध्रुवाह्विचरमूलमृदुत्रिपूर्वारौद्रे, अर्कविद्गुरुसितेन्दुदिने, द्वित्रीषुरुद्रर- विदिक्प्रमिते तिथौ, व्रतं सत् स्यात्, च (पुनः) कृष्णादिमत्रिलवके अपि सत्, च (तथा) अपराह्णे व्रतं न सत् ॥ ४० ॥ हस्त, अश्विनी, पुष्य, तीनों उत्तरा, रोहिणी, आश्लेषा, स्वाती, पुनर्वसु,
९२ मुहूर्तचिन्तामणि श्रवण, धनिष्ठा, शतभिष, मूल, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, तीनों पूर्वा और आर्द्रा नक्षत्र में; सूर्य, बुध, बृहस्पति, शुक्र वा चन्द्रमा के दिन में; दुइज, तीज, पञ्चमी, एकादशी, द्वादशी वा दशमी तिथि में; शुक्लपक्ष में, पञ्चमी तिथि पर्यन्त कृष्णपक्ष में भी दोपहर से पूर्व ही यज्ञोपवीत शुभ होता है । यद्यपि ग्रन्थकार ने महीने यहाँ नहीं कहे तथापि ग्रन्थान्तर से उन्हें जानना चाहिए । वसन्त ऋतु में ब्राह्मण का, ग्रीष्म ऋतु में क्षत्रिय का और शरद् ऋतु में वैश्य का यज्ञोपवीत श्रेष्ठ होता है । यद्यपि सब वर्णों के लिये हस्त, अश्विनी आदि नक्षत्र कहे हैं किंतु ब्राह्मण का यज्ञोपवीत पुनर्वसु नक्षत्र में न करना चाहिए ॥ ४० ॥ यज्ञोपवीत में लग्नदोष कवीज्यचन्द्रलग्नपा रिपौ मृतौ व्रतेऽधमाः । व्ययेऽब्जभार्गवौ तथा तनौ मृतौ सुते खलाः ॥ ४१ ॥ अन्वयः—कवीज्यचन्द्रलग्नपाः रिपौ मृतौ स्थिता व्रते अधमाः भवन्ति, तथा अब्ज- भार्गवौ व्यये, तथा खलाः तनौ मृतौ सुते स्थिताः अशुभाः भवन्ति ॥ ४१ ॥ यज्ञोपवीत में लग्न से छठे वा आठवें स्थान में स्थित शुक्र, बृहस्पति, चन्द्रमा वा लग्नेश तथा बारहवें स्थान में स्थित चन्द्रमा वा शुक्र तथा लग्न में अथवा आठवें वा पाँचवें स्थान में स्थित पापग्रह अधम अर्थात् बालक के मरणकारक होते हैं ॥ ४१ ॥ यज्ञोपवीत में लग्न के गुण व्रतबन्धेऽष्टषड्रिफवर्जिताः शोभनाः शुभाः । त्रिषडाये खलाः पूर्णो गोकर्कस्थो विधुस्तनौ ॥ ४२ ॥ अन्वयः—शुभाः [शुभग्रहाः] अष्टषड्रिफवर्जिताः व्रतबन्धे शोभनाः भवन्ति । तथा खलाः त्रिषडाये, शोभनाः भवन्ति । पूर्णः विधुः गोकर्कस्थः तनौ मृतौ शोभनो भवति ॥ ४२ ॥ यज्ञोपवीत में लग्न से आठवें, छठे वा बारहवें स्थान को छोड़ अन्य स्थानों में शुभग्रह स्थित हों और तीसरे छठे वा गेरहवें स्थान में पापग्रह स्थित हों तो शुभ होते हैं । वृष वा कर्क राशि में स्थित पूर्ण चन्द्रमा यदि लग्न में हो तो शुभ होता है ॥ ४२ ॥
संस्कारप्रकरण ९३ वर्णेश वा शाखेश विप्राधीशौ भार्गवेज्यौ कुजार्कौ राजन्यानामोषधीशो विशां च । शूद्राणां ज्ञश्चान्त्यजानां शनिः स्याच्छाखेशाः स्युर्जीवशुक्रारसौम्याः ॥ ४३ ॥ अन्वयः—भार्गवेज्यौ विप्राधीशौ, कुजार्कौ राजन्यानां (अधीशौ), ओषधीशः विशां (अधीशः), ज्ञः शूद्राणां (अधीशः), शनिः अन्त्यजाना (अधीशः), जीवशुक्रारसौम्याः शाखेशाः स्युः ॥ ४३ ॥ शुक्र और बृहस्पति ब्राह्मण वर्ण के ईश, मङ्गल और सूर्य क्षत्रिय वर्ण के ईश, चन्द्रमा वैश्य वर्ण का ईश, बुध शूद्र वर्ण का ईश और शनैश्चर अन्त्यज अर्थात् चाण्डालादि वर्णसङ्कर का ईश है । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वणवेद के क्रम से बृहस्पति, शुक्र, मंगल और बुध शाखेश हैं । यथा ऋग्वेद का ईश बृहस्पति, यजुर्वेद का ईश शुक्र, सामवेद का ईश मङ्गल और अथर्वणवेद का ईश बुध है ॥ ४३ ॥ शाखेश और वर्णेश का प्रयोजन शाखेशवारतनुवीर्यमतीव शस्तं शाखेशसूर्यशशिजीवबले व्रतं सत् । जीवे भृगौ रिपुगृहे विजिते च नीचे स्याद्वेदशास्त्रविधिना रहितो व्रतेन ॥ ४४ ॥ अन्वयः—(व्रते) शाखेशवारतनुवीर्यं अतीव शस्तं स्यात् । शाखेशसूर्यशशिजीवबले व्रतं सत् स्यात्, जीवे भृगौ च रिपुगृहे, विजिते, नीचे (सति) व्रतेन वेदशास्त्रविधिना रहितः स्यात् ॥ ४४ ॥ यदि शाखेश का दिन हो; शाखेश ही की लग्न हो और शाखेश बली भी हो तो यज्ञोपवीत अति शुभ होता है । अथवा शाखेश, वर्णेश, सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति बली हों तो भी यज्ञोपवीत शुभ होता है । यदि बृहस्पति वा शुक्र अपने शत्रु के स्थान में हों, अथवा युद्ध में किसी ग्रह से हार गये हैं अथवा अपने नीच स्थान में हों तो यज्ञोपवीत करने से वह बालक वेद और शास्त्र से तथा वेद-शास्त्र में कही हुई क्रिया से रहित होता है ॥ ४४ ॥ जन्म-मास आदि का यज्ञोपवीत में अपवाद जन्मर्क्षमासलग्नादौ व्रते विद्याधिको व्रती । आद्यगर्भेऽपि विप्राणां क्षत्रादीनामनादिमे ॥ ४५ ॥
९४ मुहूर्त्तचिन्तामणि अन्वयः—विप्राणां आद्यगर्भे, क्षत्रादीनां अनादिमेगर्भे अपि जन्मर्क्षमासंलग्नादौ व्रते (सति) व्रती विद्याधिकः स्यात् ॥ ४५ ॥ जन्मनक्षत्र, जन्ममास, जन्मलग्न और जन्मतिथि में ब्राह्मण के पहले लड़के का और क्षत्रियों तथा वैश्यों के पहले को छोड़ अन्य लड़के का यज्ञोपवीत हो तो वह अधिक विद्यावाला होता है ॥ ४५ ॥ बृहस्पति का बल वटुकन्याजन्मराशेस्त्रिकोणायद्विसप्तगः । श्रेष्ठो गुरुः खषट्त्र्याद्ये पूजयान्यत्र निन्दितः ॥ ४६ ॥ अन्वयः—वटुकन्याजन्मराशेः त्रिकोणायद्विसप्तगः गुरुः श्रेष्ठः स्यात्, खषट्त्र्याद्येषु पूजया (शुभः) अन्यत्र निन्दितः स्यात् ॥ ४६ ॥ लड़के वा लड़की की जन्मराशि से नवीं, पाँचवीं, गेरहवीं, दूसरी वा सातवीं राशि में बृहस्पति शुभ; दसवीं, छठी, तीसरी वा पहली राशि में पूजा करने से शुभ और चौथी, आठवीं वा बारहवीं राशि में अशुभ होता है ॥ ४६ ॥ गुरुदोषापवाद स्वोच्चे स्वभे स्वमैत्रे वा स्वांशे वर्गोत्तमे गुरुः । रिष्फाष्टतुर्यगोऽपीष्टो नीचारिस्थः शुभोऽप्यसत् ॥ ४७ ॥ अन्वयः—गुरुः स्वोच्चे स्वभे स्वमैत्रे वा स्वांशे रिष्फाष्टतुर्यगोऽपि इष्टः स्यात् । तथा नीचारिस्थः शुभोऽपि असत् स्यात् ॥ ४७ ॥ बारहवें, आठवें वा चौथे स्थान में भी स्थित बृहस्पति यदि स्वोच्च, स्वराशि, स्वमित्रराशि, स्वनवांश वा वर्गोत्तम में हो तो शुभ हो जाता है और शुभ भी बृहस्पति यदि अपने नीच स्थान में या अपने शत्रु के स्थान में स्थित हो तो वह अशुभ हो जाता है ॥ ४७ ॥ यज्ञोपवीत में निषिद्ध समय कृष्णे प्रदोषेऽनध्याये शनौ निश्यपराह्नके । प्राक्संध्यागर्जिते नेष्टो व्रतबन्धो गलग्रहे ॥ ४८ ॥ अन्वयः—कृष्णे, प्रदोषे, अनध्याये, शनौ, निशि, अपराह्नके, प्राक्संध्यागर्जिते तथा गलग्रहे व्रतबन्धः नेष्टः स्यात् ॥ ४८ ॥
संस्कारप्रकरण ९५ पञ्चमी तक को छोड़ कृष्णपक्ष, प्रदोष*, अनध्याय†, शनैश्चर का दिन, रात्रि और दोपहर के बाद का समय, जिस दिन प्रातःकाल मेघ गर्जे वह दिन और गलग्रह‡, इनमें यज्ञोपवीत शुभ नहीं होता ॥ ४८ ॥ सूर्यादि ग्रहों के नवांश में यज्ञोपवीत होने का फल क्रूरो जडो भवेत्पापः पटुः षट्कर्मकृद्वटुः । यज्ञार्थभाक् तथा मूर्खो रव्याद्यंशे तनौ क्रमात् ॥ ४९ ॥ अन्वयः—रव्याद्यंशे तनौ सति वटुः क्रमात्, क्रूरः, जडः, पापः, पटुः, षटकर्मकृत्, यज्ञार्थभाक्, तथा मूर्खः स्यात् ॥ ४९ ॥ सूर्य के नवांश+ में यज्ञोपवीत करने से वह बालक क्रूर अर्थात् निर्दय, चन्द्रमा के नवांश में करने से जड़ अर्थात् विचाररहित, मङ्गल के नवांश में पापी, बुध के नवांश में पटु अर्थात् चतुर, बृहस्पति के नवांश में यज्ञ करना- कराना, दान लेना-देना, पढ़ना-पढ़ाना, ये छः कर्म करनेवाला, शुक्र के नवांश में यज्ञ करनेवाला और धनी तथा शनैश्चर के नवांश में यज्ञोपवीत करने से मूर्ख होता है । इसलिए लग्न में शुभग्रह का नवांश हो तब यज्ञोपवीत उत्तम होता है ॥ ४९ ॥ यज्ञोपवीत में चन्द्रनवांश का फल विद्यानिरतः शुभराशिलवे पापांशगते हि दरिद्रतरः । चन्द्रे स्वलवे बहुदुःखयुतः कर्णादितिभे धनवान्स्वलवे ॥ ५० ॥ अन्वयः—शुभराशिलवे चन्द्रे व्रती विद्यानिरतः स्यात् । पापांशगते दरिद्रतरः स्यात् । स्वलवे चन्द्रे बहुदुःखयुतः स्यात् । स्वलवे चन्द्रे कर्णादितिभे धनवान् भवति ॥ ५० ॥ यज्ञोपवीत में यदि चन्द्रमा शुभराशि के नवांश में स्थित हो तो व्रती अर्थात् जिसका यज्ञोपवीत करना है वह बालक सदा विद्या में रुचि रखनेवाला और पापराशि के नवांश में स्थित हो तो अतिशय दरिद्र तथा अपनी राशि के नवांश में अर्थात् कर्कराशि के नवांश में स्थित हो तो बहुत
- इसी प्रकरण के ५५ श्लोक में कहेंगे । † इसी प्रकरण के ५४ श्लोक में कहेंगे । ‡ चौथि, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पौर्णमासी, परीबा और कृष्णपक्ष में अमावास्या ये गलग्रहसंज्ञक तिथियाँ हैं ।
- नवांशों का विचार विवाहप्रकरण में कहेंगे ।
९६ मुहूर्तचिन्तामणि दुःखों से संयुक्त होता है। यदि यज्ञोपवीतकाल में चन्द्रमा कर्कराशि के नवांश में हो और श्रवण नक्षत्र या पुनर्वसु नक्षत्र हो तो वह बालक धनवान् होता है ॥ ५० ॥ केन्द्रस्थित सूर्यादि ग्रहों का फल राजसेवी वैश्यवृत्तिः शस्त्रवृत्तिश्च पाठकः । प्राज्ञोऽर्थवान्म्लेच्छसेवी केन्द्रे सूर्यादिखेचरैः ॥ ५१ ॥ अन्वयः—केन्द्रे सूर्यादिखेचरैः व्रती क्रमेण राजसेवी, वैश्यवृत्तिः, शस्त्रवृत्तिः, पाठकः, प्राज्ञः, अर्थवान्, च म्लेच्छसेवी भवति ॥ ५१ ॥ लग्न, चौथे, सातवें और दशवें स्थान की केन्द्र संज्ञा है। सूर्य केन्द्र में स्थित हो तो जिसका यज्ञोपवीत किया जाय वह राजा का सेवक, चन्द्रमा केन्द्र में हो तो वैश्यवृत्ति करनेवाला, मङ्गल केन्द्र में हो तो शस्त्रजीवी, बुध केन्द्र में हो तो अध्यापक, बृहस्पति केन्द्र में हो तो पण्डित, शुक्र केन्द्र में हो तो धनवान् और शनैश्चर केन्द्र में हो तो म्लेच्छों का सेवक होता है ॥ ५१ ॥ यज्ञोपवीतकाल में संयुक्त ग्रहों का फल शुक्रे जीवे तथा चन्द्रे सूर्यभौमार्किसंयुते । निर्गुणः क्रूरचेष्टः स्यान्निर्घृणः सद्युते पटुः ॥ ५२ ॥ अन्वयः—शुक्रे, जीवे तथा चन्द्रे सूर्यभौमार्किसंयुते व्रती क्रमेण निर्गुणः, क्रूरचेष्टः तथा निर्घृणः स्यात् । सद्युते पटुः स्यात् ॥ ५२ ॥ यदि यज्ञोपवीतकाल में शुक्र, बृहस्पति व चन्द्रमा, इनमें से किसी ग्रह के साथ सूर्य हो तो बालक निर्गुण, मङ्गल हो तो निर्दय और शनैश्चर हो तो निर्लज्ज होता है। शुभ ग्रहों का संयोग होने से सब विद्याओं में निपुण होता है ॥ ५२ ॥ यज्ञोपवीत में चन्द्रवश से शुभाशुभ योग विधौ सितांशगे सिते त्रिकोणगे तनौ गुरौ । समस्तवेदविद् व्रती यमांशगेऽतिनिर्घृणः ॥ ५३ ॥ अन्वयः—विधौ सितांशगे, सिते त्रिकोणगे, गुरौ तनौ, व्रती समस्तवेदविद् भवति । यमांशगे अतिनिर्घृणः स्यात् ॥ ५३ ॥
संस्कारप्रकरण ९७ यदि शुक्र के नवांश में चन्द्रमा, लग्न से पाँचवें वा नवें स्थान में शुक्र और लग्न में बृहस्पति हो तो बालक चारों वेदों का जाननेवाला होता है। यदि शनैश्चर के नवांश में चन्द्रमा, लग्न में बृहस्पति और लग्न से पाँचवें वा नवें स्थान में शुक्र हो तो बालक निर्दय अथवा निर्लज्ज होता है ॥ ५३ ॥ अनध्यायसंज्ञक तिथियाँ शुचिशुक्रपौषतपसां दिगशिवरुद्रार्कसंख्यसिततिथयः । भूतादितत्रितयाष्टमी संक्रमणं च व्रतेष्वनध्यायाः ॥ ५४ ॥ अन्वयः—शुचिशुक्रपौषतपसां मासानां दिगशिवरुद्रार्कसंख्यसिततिथयः, तथा भूतादि- त्रितयाष्टमी संक्रमणं च व्रतेषु अनध्यायाः (भवन्ति) ॥ ५४ ॥ आषाढ़ शुक्ल दशमी, ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया, पौष शुक्ल एकादशी, माघ शुक्ल द्वादशी तथा चतुर्दशी, पौर्णमासी, अमावास्या, परीवा, अष्टमी और सूर्य संक्रान्ति ये सब यज्ञोपवीत में अनध्यायसंज्ञक हैं। इनमें यज्ञोपवीत न करना चाहिए ॥ ५४ ॥ प्रदोष-लक्षण अर्कतर्कत्रितिथिषु प्रदोषः स्यात्तदग्रिमैः । रात्र्यर्थसार्धप्रहरयाममध्ये स्थितैः क्रमात् ॥ ५५ ॥ अन्वयः—अर्कतर्कत्रितिथिषु रात्र्यर्थसार्धप्रहरयाममध्ये स्थितैः तदग्रिमैः प्रदोष स्यात् ॥ ५५ ॥ द्वादशी में आधी रात से पूर्व ही यदि त्रयोदशी का योग हो तो वह प्रदोष, छठि में डेढ़ पहर रात बीतने के पूर्व ही यदि सप्तमी का योग हो तो वह प्रदोष और तीज में पहर भर रात बीतने के पूर्व ही यदि चौथ का योग हो तो वह प्रदोष कहा जाता है ॥ ५५ ॥ ब्रह्मौदन के पहिले उत्पात होने पर शांति का विधान प्राग् ब्रह्मौदनपाकाद् व्रतबन्धानन्तरं यदि चेत् । उत्पातानध्ययनोत्पत्तावपि शान्तिपूर्वकं तत्स्यात् ॥ ५६ ॥ अन्वयः—व्रतबन्धानन्तरं, ब्रह्मौदनपाकात् प्राग् यदि चेत् उत्पातानध्ययनोत्पत्तौ अपि शान्तिपूर्वकं तत् (ब्रह्मौदनं) स्यात् ॥ ५६ ॥ विधिपूर्वक यज्ञोपवीत होने के पश्चात् और सायंकाल में होनेवाले