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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६

२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६ यैरिदं वासरं नक्तं वर्तते क्रमशः सदा। उन्हींके द्वारा सर्वदा क्रमशः दिन और रात होते रहते भगोंऽशुस्त्वर्यमा चैव मित्रोऽथ वरुणस्तथा॥ १० हैं। भग, अंशु, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बारहवें विष्णु हैं। ये सविता चैव धाता च विवस्वांश्च महामते। बारह आदित्य तपते और वर्षा करते हैं॥ ९-११ १/२॥ त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो विष्णुर्द्वादशमः स्मृतः॥ ११ अदितिके मध्यम पुत्र वरुण 'लोकपाल' कहे गये एते च द्वादशादित्यास्तपन्ते वर्षयन्ति च। हैं; इनकी स्थिति वरुण-दिशा (पश्चिम)-में बतलायी तस्याश्च मध्यमः पुत्रो वरुणो नाम नामतः॥ १२ जाती है। ये पश्चिम दिशामें पश्चिम समुद्रके तटपर लोकपाल इति ख्यातो वारुण्यां दिशि शब्द्यते। सुशोभित होते हैं। वहाँ एक सुन्दर सुवर्णमय पर्वत है। पश्चिमस्य समुद्रस्य प्रतीच्यां दिशि राजते॥ १३ उसके शिखर सब रत्नमय हैं। उनपर नाना प्रकारकी जातरूपमयः श्रीमानास्ते नाम शिलोच्चयः। धातुएँ और झरने हैं। इनसे युक्त और नाना प्रकारके सर्वरत्नमयैः शृङ्गैर्धातुप्रस्रवणान्वितैः॥ १४ रत्नोंसे परिपूर्ण वह सुन्दर पर्वत बड़ी शोभा पाता है। उसमें बड़े-बड़े दर्रे और गुहाएँ हैं, जहाँ बाघ और सिंह संयुक्तो भाति शैलेशो नानारत्नमयः शुभः। दहाड़ते रहते हैं। वहाँके अनेकानेक एकान्त स्थलोंपर महादरीगुहाभिश्च सिंहशार्दूलनादितः॥ १५ सिद्ध और गन्धर्व वास करते हैं। जब सूर्य वहाँ पहुँचते नानाविविक्तभूमीषु सिद्धगन्धर्वसेवितः। हैं, तब समस्त संसार अन्धकारसे पूर्ण हो जाता है। उसी यस्मिन् गते दिनकरे तमसाऽऽपूर्यते जगत्॥ १६ पर्वतके शिखरपर विश्वकर्माकी बनायी हुई एक 'विश्वावती' नामकी शोभनपुरी है, जो बड़ी, दिव्य तथा सुवर्णसे बनी तस्य शृङ्गे महादिव्या जाम्बूनदमयी शुभा। रम्या मणिमयैः स्तम्भैर्विहिता विश्वकर्मणा॥ १७ हुई है और उसमें मणियोंके खंभे लगे हैं। इस प्रकार वह पुरी रमणीय एवं सम्पूर्ण भोग-साधनोंसे सम्पन्न है। उसीमें पुरी विश्वावती नाम समृद्धा भोगसाधनैः। अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए 'वरुण' नामक आदित्य तस्यां वरुण आदित्यो दीप्यमानः स्वतेजसा॥ १८ ब्रह्माजीकी प्रेरणासे इन सम्पूर्ण लोकोंका पालन करते हैं। पाति सर्वानिमाँल्लोकान् नियुक्तो ब्रह्मणा स्वयम्। वहाँ उनकी सेवामें गन्धर्व और अप्सराएँ रहा करती उपास्यमानो गन्धर्वैस्तथैवाप्सरसां गणैः॥ १९ हैं॥ १२-१९॥ दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गो दिव्याभरणभूषितः। एक दिन वरुण अपने अङ्गोंमें दिव्य चन्दनका अनुलेप कदाचिद्वरुणो यातो मित्रेण सहितो वनम्॥ २० लगाये, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो 'मित्र' के साथ वनको गये। ब्रह्मर्षिगण सदा जिसका सेवन करते हैं, जो नाना कुरुक्षेत्रे शुभे रम्ये सदा ब्रह्मर्षिसेविते। प्रकारके फल और फूलोंसे युक्त तथा अनेक तीर्थोंसे व्याप्त नानापुष्पफलोपेते नानातीर्थसमाकुले॥ २१ है; जहाँ ऊर्ध्वरेता मुनियोंके आश्रम दृष्टिगोचर होते हैं तथा आश्रमा यत्र दृश्यन्ते मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्। जो प्रचुर फल-फूल और जलसे पूर्ण है, उस सुन्दर सुरम्य तस्मिंस्तीर्थे समाश्रित्य बहुपुष्पफलोदके॥ २२ कुरुक्षेत्र तीर्थमें पहुँचकर वे दोनों देवता चीर और कृष्णमृगचर्म चीरकृष्णाजिनधरौ चरन्तौ तप उत्तमम्। धारण करके तपस्या करने लगे। वहाँपर वनके एक तत्रैकस्मिन् वनोद्देशे विमलोदो ह्रदः शुभः॥ २३ भागमें निर्मल जलसे भरा हुआ एक सुन्दर सरोवर है, In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ६ ] अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग २५ बहुगुल्मलताकीर्णो नानापक्षिनिषेवितः । जो बहुत-सी झाड़ियों और बेलोंसे आवृत है; अनेकानेक नानातरुवनच्छन्नो नलिन्या चोपशोभितः ॥ २४ पक्षी उसका सेवन करते हैं। वह भाँति-भाँतिके वृक्षसमूहोंसे आच्छन्न और कमलोंसे सुशोभित है। उस सरोवरकी पौण्डरीक इति ख्यातो मीनकच्छपसेवितः । 'पौण्डरीक' नामसे प्रसिद्धि है। उसमें बहुत-सी मछलियाँ ततस्तु मित्रावरुणौ भ्रातरौ वनचारिणौ । और कछुए निवास करते हैं। तप आरम्भ करनेके तं तु देशं गतौ देवौ विचरन्तौ यदृच्छया ॥ २५ पश्चात् वे दोनों भाई—मित्र और वरुणदेवता एक दिन वनमें विचरण करते और स्वेच्छानुसार घूमते हुए उस सरोवरकी ओर गये ॥ २०-२५ ॥ ताभ्यां तत्र तदा दृष्टा उर्वशी तु वराप्सराः । वहाँ उन दोनोंने उस समय श्रेष्ठ एवं सुन्दरी अप्सरा स्नायन्ती सहितान्याभिः सखीभिः सा वरानना । उर्वशीको देखा, जो अपनी अन्य सहेलियोंके साथ स्नान गायन्ती च हसन्ती च विश्वस्ता निर्जने वने ॥ २६ कर रही थी। वह सुमुखी अप्सरा उस निर्जन वनमें विश्वस्त होकर हँसती और गाती थी। उसका वर्ण गोरा था। कमलके गौरी कमलगर्भाभा स्निग्धकृष्णाशिरोरुहा । भीतरी भागके समान उसकी कान्ति थी। उसकी अलकें पद्मपत्रविशालाक्षी रक्तोष्ठी मृदुभाषिणी ॥ २७ काली-काली और चिकनी थीं, आँखें कमल-दलके समान बड़ी-बड़ी थीं, होठ लाल थे, उसका भाषण शङ्खकुन्देन्दुधवलैर्दन्तैरविरलैः समैः । बहुत ही मधुर था। उसके दाँत शङ्ख, कुन्द और चन्द्रमाके सुभ्रूः सुनासा सुमुखी सुललाटा मनस्विनी ॥ २८ समान श्वेत, परस्पर मिले हुए और बराबर थे। उस मनस्विनीकी भौंहें, नासिका, मुख और ललाट—सभी सिंहवत् सूक्ष्ममध्याङ्गी पीनोरुजघनस्तनी । सुन्दर थे। कटिभाग सिंहके कटिप्रदेशकी भाँति पतला मधुरालापचतुरा सुमध्‍या चारुहासिनी ॥ २९ था। उरोज, ऊरु और जघन—ये मोटे और घने थे। वह मधुर भाषण करनेमें चतुर थी। उसका मध्यभाग रक्तोत्पलकरा तन्वी सुपदी विनयान्विता । सुन्दर और मुस्कान मनोहर थी। दोनों हाथ लाल कमलके पूर्णचन्द्रनिभा बाला मत्तद्विरदगामिनी ॥ ३० समान सुन्दर एवं कोमल थे। शरीर पतला और पैर सुन्दर थे। वह बाला बड़ी ही विनीता थी। उसका मुख दृष्ट्वा तस्यास्तु तद्रूपं तौ देवौ विस्मयं गतौ । पूर्णचन्द्रके समान आह्लादजनक और गति मत्त गजराजके तस्या हास्येन लास्येन स्मितेन ललितेन च ॥ ३१ समान मन्द थी। उर्वशीके उस दिव्य रूपको देखकर वे दोनों देवता विस्मयमें पड़ गये। उसके लास्य (नृत्य), मृदुना वायुना चैव शीतानिलसुगन्धिना । हास्य, ललितभाव-मिश्रित मन्द मुस्कान और मधुर सुरीले मत्तभ्रमरगीतेन पुंस्कोकिलरुतेन च ॥ ३२ गानसे तथा शीतल-मन्द-सुगन्धित मलयानलके स्पर्शसे एवं मतवाले भौंरोंके संगीत और कोकिलोंके कलरवसे सुस्वरेण हि गीतेन उर्वश्या मधुरेण च । उन दोनोंका मन और भी मुग्ध हो गया। साथ ही ईक्षितो च कटाक्षेण स्कन्दतुस्तावूभावपि । उर्वशीकी तिरछी चितवनके शिकार होकर वे दोनों निमेः शापादथोत्क्रम्य स्वदेहान्मुनिसत्तम ॥ ३३ ही वहाँ स्खलित हो गये (उनके वीर्यका पतन हो गया)। मुनिसत्तम ! इसके बाद निमिके शापवश* वसिष्ठजीका वसिष्ठ मित्रावरुणात्मजोऽसी- जीवात्मा अपने शरीरसे पृथक् होकर (मित्रावरुणके त्यथोचुरागत्य हि विश्वदेवाः । वीर्यमें आविष्ट हुआ) ॥ २६-३३ ॥ रेतस्त्रिभागं कमलेऽचरत्तद् 'वसिष्ठ ! तुम मित्रावरुणके पुत्र होओगे'—इस प्रकार वसिष्ठ एवं तु पितामहोक्तेः ॥ ३४ विश्वेदेवोंने (निमिके शुक्रमें) आकर कहा था तथा ब्रह्माजीका भी यही कथन था; अतएव मित्रावरुणके तीन स्थानोंपर

  • एक बार राजा निमिने यज्ञ करनेकी इच्छासे अपने पुरोहित वसिष्ठजीसे परामर्श किया। वसिष्ठजीने कहा—'मैं देवलोकमें एक यज्ञ आरम्भ करा चुका हूँ। उसके समाप्त होनेतक आप अपना यज्ञ रोके रहें। वहाँसे आकर हम आपका यज्ञ आरम्भ करायेंगे।' निमिने उनकी प्रतीक्षा नहीं की। वसिष्ठजीने लौटनेपर यज्ञ होता देख राजाको शाप दिया कि 'तुम विदेह हो जाओ।' तब राजाने भी शाप दिया कि 'आपका भी यह शरीर न रहे।'

२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६

२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६ त्रिधा समभवद्रेतः कमलेऽथ स्थले जले। अरविन्दे वसिष्ठस्तु जातः स मुनिसत्तमः। स्थले त्वगस्त्यः सम्भूतो जले मत्स्यो महाद्युतिः ॥ ३५ स तत्र जातो मतिमान् वसिष्ठः कुम्भे त्वगस्त्यः सलिलेऽथ मत्स्यः। स्थानत्रये तत्पतितं समानं मित्रस्य यस्माद्वरुणस्य रेतः ॥ ३६ एतस्मिन्नेव काले तु गता सा उर्वशी दिवम्। उपेत्य तानृषीन् देवौ गतौ भूयः स्वमाश्रमम्। यमावपि तु तप्येते पुनरुग्रं परं तपः ॥ ३७ गिरे हुए वीर्यमेंसे जो भाग कमलपर गिरा था, उसीसे वसिष्ठजी हुए। उन दोनों देवताओंका वीर्य तीन भागोंमें विभक्त होकर कमल, जल और स्थलपर (घड़ेमें) गिरा। कमलपर गिरे हुए वीर्यसे मुनिवर वसिष्ठ उत्पन्न हुए, स्थलपर गिरे हुए रेतस्‌से अगस्त्य और जलमें गिरे हुए शुक्रसे अत्यन्त कान्तिमान् मत्स्यकी उत्पत्ति हुई। इस तरह उस कमलपर बुद्धिमान् वसिष्ठ, कुम्भमें अगस्त्य और जलमें मत्स्यका आविर्भाव हुआ; क्योंकि मित्रावरुणका वीर्य तीनों स्थानोंपर बराबर गिरा था। इसी समय उर्वशी स्वर्गलोकमें चली गयी। वसिष्ठ और अगस्त्य—इन दोनों ऋषियोंको साथ लेकर वे दोनों देवता पुनः अपने आश्रममें लौट आये और पुनः उन दोनोंने अत्यन्त उग्र तप आरम्भ किया ॥ ३४–३७ ॥ तपसा प्राप्तुकामौ तौ परं ज्योतिः सनातनम्। तपस्यन्तौ सुरश्रेष्ठौ ब्रह्माऽऽगत्येदमब्रवीत् ॥ ३८ मित्रावरुणकौ देवौ पुत्रवन्तौ महाद्युती। सिद्धिर्भविष्यति यथा युवयोर्वैष्णवी पुनः ॥ ३९ स्वाधिकारेण स्थीयेतामधुना लोकसाक्षिकौ। इत्युक्त्वान्तर्दधे ब्रह्मा तौ स्थितौ स्वाधिकारकौ ॥ ४० तपस्याके द्वारा सनातन परम ज्योति (ब्रह्मधाम)–को प्राप्त करनेकी इच्छावाले उन दोनों तपस्वी देवेश्वरोंसे ब्रह्माजीने आकर यह कहा—'महान् कान्तिमान् और पुत्रवान् मित्र तथा वरुण देवताओ! तुम दोनोंको पुनः वैष्णवी सिद्धि प्राप्त होगी। इस समय संसारके साक्षीरूपसे तुम लोग अपने अधिकारपर स्थित हो जाओ।' यों कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये और वे दोनों देवता अपने अधिकृत पदपर स्थित हुए ॥ ३८–४० ॥ एवं ते कथितं विप्र वसिष्ठस्य महात्मनः। मित्रावरुणपुत्रत्वमगस्त्यस्य च धीमतः ॥ ४१ इदं पुंसीयमाख्यानं वारुणं पापनाशनम्। पुत्रकामास्तु ये केचिच्छृण्वन्तीदं शुचिव्रताः। अचिरादेव पुत्रांस्ते लभन्ते नात्र संशयः ॥ ४२ यश्चैतत्पठते नित्यं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः। देवाश्च पितरस्तस्य तृप्ता यान्ति परं सुखम् ॥ ४३ यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः। नन्दते स सुखं भूमौ विष्णुलोकं स गच्छति ॥ ४४ इत्येतदाख्यानमिदं मयेरितं पुरातनं वेदविद्वैरुदीरितम्। पठिष्यते यस्तु शृणोति सर्वदा स याति शुद्धो हरिलोकमञ्जसा ॥ ४५ ब्राह्मण! इस प्रकार महात्मा वसिष्ठजी और बुद्धिमान् अगस्त्यजी जिस तरह मित्रावरुणके पुत्र हुए थे, वह सब प्रसङ्ग मैंने आपसे कह दिया। यह वरुणदेवता-सम्बन्धी पुंसवनाख्यान पाप नष्ट करनेवाला है। जो लोग पुत्रकी कामनासे शुद्ध व्रतका आचरण करते हुए इसका श्रवण करते हैं, वे शीघ्र ही अनेक पुत्र प्राप्त करते हैं—इसमें संदेह नहीं है। जो उत्तम ब्राह्मण हव्य (देवयाग) और कव्य (पितृयाग)-में इसका पाठ करता है, उसके देवता तथा पितर तृप्त होकर अत्यन्त सुख प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य नित्य प्रातःकाल उठकर इसका श्रवण करता है, वह पृथ्वीपर सुखपूर्वक प्रसन्नताके साथ रहता है और फिर विष्णुलोकको प्राप्त करता है। वेदवेत्ताओंके द्वारा प्रतिपादित इस पुरातन उपाख्यानको, जिसे मैंने कहा है, जो लोग सादर पढ़ेंगे और सुनेंगे, वे शुद्ध होकर अनायास ही विष्णुलोकको प्राप्त कर लेंगे ॥ ४१–४५ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे पुंसवनाख्यानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'पुंसवन' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥ In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

सातवाँ अध्याय

अध्याय ७ ] मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र'का पाठ २७ सातवाँ अध्याय मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र' का पाठ और मृत्युपर विजय प्राप्त करना श्रीभरद्वाज उवाच │ श्रीभरद्वाजजी बोले—सूतजी! मार्कण्डेय मुनिने मार्कण्डेयेन मुनिना कथं मृत्युः पराजितः। │ मृत्युको कैसे पराजित किया? यह मुझे बताइये। आपने एतदाख्याहि मे सूत त्वयैतत् सूचितं पुरा॥ १ │ पहले यह सूचित किया था कि वे मृत्युपर विजयी │ हुए थे*॥ १॥ सूत उवाच │ सूतजी बोले—भरद्वाजजी! इस महान् पुरातन इदं तु महदाख्यानं भरद्वाज शृणुष्व मे। │ इतिहासको आप और ये सभी ऋषि सुनें; मैं कह रहा शृण्वन्तु ऋषयश्चेमे पुरावृत्तं ब्रवीम्यहम्॥ २ │ हूँ। अत्यन्त पवित्र कुरुक्षेत्रमें, व्यासपीठपर, एक सुन्दर कुरुक्षेत्रे महापुण्ये व्यासपीठे वराश्रमे। │ आश्रममें स्नान तथा जप आदि समाप्त करके व्यासासनपर तत्रासीनं मुनिवरं कृष्णद्वैपायनं मुनिम्॥ ३ │ बैठे हुए और शिष्यभूत मुनियोंसे घिरे हुए मुनिवर कृतस्नानं कृतजपं मुनिशिष्यैः समावृतम्। │ महर्षि कृष्णद्वैपायनसे, जो वेद और वेदार्थोंके तत्त्ववेत्ता वेदवेदार्थतत्त्वज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम्॥ ४ │ तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ थे, परम धर्मात्मा शुकदेवजीने प्रणिपत्य यथान्यायं शुकः परमधार्मिकः। │ हाथ जोड़ उन्हें यथोचितरूपसे प्रणाम कर इसी विषयको इममेवार्थमुद्दिश्य तं पप्रच्छ कृताञ्जलिः॥ ५ │ जाननेके लिये प्रश्न किया था, जिसके लिये कि इन यमुद्दिश्य वयं पृष्टास्त्वयात्र मुनिसंनिधौ। │ मुनियोंके निकट आप पुण्यतीर्थनिवासी नृसिंहभक्तने नरसिंहस्य भक्तेन कृततीर्थनिवासिना॥ ६ │ मुझसे पूछा है॥ २–६॥ श्रीशुक उवाच │ श्रीशुकदेवजी बोले—पिताजी! मार्कण्डेय मुनिने मार्कण्डेयेन मुनिना कथं मृत्युः पराजितः। │ मृत्युपर कैसे विजय पायी? यह कथा कहिये। इस एतदाख्याहि मे तात श्रोतुमिच्छामि तेऽधुना॥ ७ │ समय मैं आपसे यही सुनना चाहता हूँ॥ ७॥ व्यास उवाच │ व्यासजी बोले—महामते पुत्र! मार्कण्डेय मुनिने मार्कण्डेयेन मुनिना यथा मृत्युः पराजितः। │ जिस प्रकार मृत्युपर विजय पायी, वह तुमसे कहता तथा ते कथयिष्यामि शृणु वत्स महामते॥ ८ │ हूँ, सुनो। मुझसे कहे जानेवाले इस महान् एवं उत्तम शृण्वन्तु मुनयश्चेमे कथ्यमानं मयाधुना। │ उपाख्यानको ये सभी मुनि और मेरे शिष्यगण भी सुनें। मच्छिष्याश्चैव शृण्वन्तु महदाख्यानमुत्तमम्॥ ९ │

  • यद्यपि नरसिंहपुराणके गत अध्यायोंमें मार्कण्डेयजीका नाम कहीं नहीं आया है। अतः 'आपने पहले यह सूचित किया था— (त्वयैतत् सूचितं पुरा)' इत्यादि कथनकी कोई संगति नहीं प्रतीत होती, तथापि प्रथम अध्यायके पंद्रहवें श्लोकसे इस बातकी सूचना मिलती है कि भरद्वाजजीने सूतजीके मुखसे पहले 'वाराहीसंहिता' सुनी थी, उसके बाद उन्होंने 'नरसिंहसंहिता' सुननेकी इच्छा प्रकट की। तब सूतजीने 'नरसिंहसंहिता' सुनाना आरम्भ किया था। अतः यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वाराहीसंहिता-श्रवणके प्रसंगमें भरद्वाजजीको सूतजीके मुखसे मार्कण्डेयजीके मृत्युपर विजय पानेके इतिहासकी कोई सूचना प्राप्त हुई हो, जिसका स्मरण उन्होंने यहाँ दिलाया है।

२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७

२८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७ भृगोः ख्यातयां समुत्पन्नो मृकण्डुर्नाम वै सुतः । भृगुजीके उनकी पत्नी ख्यातिके गर्भसे 'मृकण्डु' नामक सुमित्रा नाम वै पत्नी मृकण्डोस्तु महात्मनः ॥ १० एक पुत्र हुआ। महात्मा मृकण्डुकी पत्नी सुमित्रा हुई। धर्मज्ञा धर्मनिरता पतिशुश्रूषणे रता । वह धर्मको जाननेवाली, धर्मपरायणा और पतिकी तस्यां तस्य सुतो जातो मार्कण्डेयो महामतिः ॥ ११ सेवामें लगी रहनेवाली थी। इसीके गर्भसे मृकण्डुके भृगुपौत्रो महाभागो बालत्वेऽपि महामतिः । पुत्र मेधावी मार्कण्डेयजी हुए। ये भृगुके पौत्र महाभाग ववृधे वल्लभो बालः पित्रा तत्र कृतक्रियः ॥ १२ मार्कण्डेय बचपनमें भी बड़े बुद्धिमान् थे। पिताके द्वारा तस्मिन् वै जातमात्रे तु आगमी कश्चिदब्रवीत् । जातकर्म आदि संस्कार कर देनेपर माँ-बापके लाड़ले वर्षे द्वादशमे पूर्णे मृत्युरस्य भविष्यति ॥ १३ बालक मार्कण्डेयजी क्रमशः बढ़ने लगे॥८-१२॥ श्रुत्वा तन्मातृपितरौ दुःखितौ तौ बभूवतुः । उनके जन्म लेते ही किसी भविष्यवेत्ता ज्योतिषीने विदूयमानहृदयौ तं निरीक्ष्य महामते ॥ १४ यह कहा था कि 'बारहवाँ वर्ष पूर्ण होते ही इस तथापि तत्पिता तस्य यत्नात् काले क्रियां ततः । बालककी मृत्यु हो जायगी।' यह सुनकर उनके माता- चकार सर्वा मेधावी उपनीतो गुरोर्गृहे ॥ १५ पिता बहुत ही दुःखी हुए। महामते! उन्हें देख-देखकर वेदानेवाभ्यसन्नास्ते गुरुशुश्रूषणोद्यतः । उन दोनोंका हृदय व्यथित होता रहता था, तथापि उनके स्वीकृत्य वेदशास्त्राणि स पुनर्गृहमागतः ॥ १६ पिताने उनके नामकरण आदि सभी संस्कार किये। मातापितॄन्नमस्कृत्य पादयोर्विनयान्वितः । तत्पश्चात् मेधावी बालक मार्कण्डेय गुरुके घर ले जाये तस्थौ तत्र गृहे धीमान् मार्कण्डेयो महामुनिः ॥ १७ गये। वहाँ उनका उपनयन-संस्कार हुआ। वहाँ वे गुरुकी तं निरीक्ष्य महात्मानं सत्प्रज्ञं च विचक्षणम् । सेवामें तत्पर रहकर वेदाभ्यास करते हुए ही रहने लगे। दुःखितौ तौ भृशं तत्र तन्मातापितरौ शुचा ॥ १८ वेद-शास्त्रोंका यथावत् अध्ययन करके वे पुनः अपने तौ दृष्ट्वा दुःखमापन्नौ मार्कण्डेयो महामतिः । घर लौट आये। घर आनेपर बुद्धिमान् महामुनि मार्कण्डेयने उवाच वचनं तत्र किमर्थं दुःखमीदृशम् ॥ १९ विनयपूर्वक माता-पिताके चरणोंमें शीश झुकाया और सदैतत् कुरुषे मातस्तातेन सह धीमता । तबसे वे घरपर ही रहने लगे ॥ १३-१७॥ वक्तुमर्हसि दुःखस्य कारणं मम पृच्छतः ॥ २० शुकदेव ! उस समय उन परम बुद्धिमान् महात्मा इत्युक्ता तेन पुत्रेण माता तस्य महात्मनः । एवं विद्वान् पुत्रको देखकर माता-पिता शोकसे बहुत ही कथयामास तत्सर्वमागमी यदुवाच ह ॥ २१ दुःखी हुए। उन्हें दुःखी देखकर महामति मार्कण्डेयजीने तच्छ्रुत्वासौ मुनिः प्राह मातरं पितरं पुनः । कहा-'माँ! तुम बुद्धिमान् पिताजीके साथ क्यों इस पित्रा सार्धं त्वया मातर्न कार्यं दुःखमण्वपि ॥ २२ प्रकार निरन्तर दुःखी रहा करती हो? मैं पूछता हूँ, अपनेष्यामि भो मृत्युं तपसा नात्र संशयः । मुझसे अपने दुःखका कारण बतलाओ।' अपने पुत्र यथा चाहं चिरायुः स्यां तथा कुर्यामहं तपः ॥ २३ मार्कण्डेयजीके इस प्रकार पूछनेपर उन महात्माकी इत्युक्त्वा तौ समाश्वास्य पितरौ वनमभ्यगात् । माताने, ज्योतिषी जो कुछ कह गया था, वह सब कह वल्लीवटं नाम वनं नानातृषिनिषेवितम् ॥ २४ सुनाया। यह सुनकर मार्कण्डेयमुनिने माता-पितासे तत्रासौ मुनिभिः सार्धमासीनं स्वपितामहम् । कहा-'माँ! तुम और पिताजी तनिक भी दुःख न भृगुं ददर्श धर्मज्ञं मार्कण्डेयो महामतिः ॥ २५ मानो। मैं तपस्याके द्वारा अपनी मृत्युको दूर हटा दूँगा, इसमें संशय नहीं है। मैं ऐसा तप करूँगा, जिससे चिरजीवी हो सकूँ' ॥ १८-२३॥ इस प्रकार कहकर, माता-पिताको आश्वासन देकर, वे अनेक ऋषियोंसे सुसेवित 'वल्लीवट' नामक वनमें गये। वहाँ पहुँचकर महामति मार्कण्डेयजीने मुनियोंके In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ७ ] मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र'का पाठ २९ अभिवाद्य यथान्यायं मुनींश्चैव स धार्मिकः। कृताञ्जलिपुटो भूत्वा तस्थौ तत्पुरतो दमी॥ २६ गतायुषं ततो दृष्ट्वा पौत्रं बालं महामतिः। भृगुराह महाभागं मार्कण्डेयं तदा शिशुम्॥ २७ किमागतोऽसि पुत्रात्र पितुस्ते कुशलं पुनः। मातुश्च बान्धवानां च किमागमनकारणम्॥ २८ इत्येवमुक्तो भृगुणा मार्कण्डेयो महामतिः। उवाच सकलं तस्मै आदेशिवचनं तदा॥ २९ पौत्रस्य वचनं श्रुत्वा भृगुस्तु पुनरब्रवीत्। एवं सति महाबुद्धे किं त्वं कर्म चिकीर्षसि ॥ ३० मार्कण्डेय उवाच भूतापहारिणं मृत्युं जेतुमिच्छामि साम्प्रतम्। शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि तत्रोपायं वदस्व नः ॥ ३१ भृगुरुवाच नारायणमनाराध्य तपसा महता सुत। को जेतुं शक्नुयान्मृत्युं तस्मात्तं तपसार्चय ॥ ३२ तमनन्तमजं विष्णुमच्युतं पुरुषोत्तमम्। भक्तप्रियं सुरश्रेष्ठं भक्त्या त्वं शरणं व्रज ॥ ३३ तमेव शरणं पूर्वं गतवान्नारदो मुनिः। तपसा महता वत्स नारायणमनामयम् ॥ ३४ तत्प्रसादान्महाभाग नारदो ब्रह्मणः सुतः। जरां मृत्युं विजित्याशु दीर्घायुर्वर्धते सुखम्॥ ३५ तमृते पुण्डरीकाक्षं नारसिंहं जनार्दनम्। कः कुर्यान्मानवो वत्स मृत्युसत्तानिवारणम्॥ ३६ तमनन्तमजं विष्णुं कृष्णं जिष्णुं श्रियः पतिम्। गोविन्दं गोपतिं देवं सततं शरणं व्रज ॥ ३७ नरसिंहं महादेवं यदि पूजयसे सदा। वत्स जेतासि मृत्युं त्वं सततं नात्र संशयः ॥ ३८ व्यास उवाच उक्तः पितामहेनैवं भृगुणा पुनरब्रवीत्। मार्कण्डेयो महातेजा विनयात् स्वपितामहम् ॥ ३९ साथ विराजमान अपने पितामह धर्मात्मा भृगुजीका दर्शन किया। उनके साथ ही अन्य ऋषियोंका भी यथोचित अभिवादन करके धर्मपरायण मार्कण्डेयजी मनोनिग्रहपूर्वक दोनों हाथ जोड़कर भृगुजीके समक्ष खड़े हो गये। महामति भृगुजीने अपने बालक पौत्र महाभाग मार्कण्डेयको, जिसकी आयु प्रायः बीत चुकी थी, देखकर कहा— 'वत्स! तुम यहाँ कैसे आये? अपने माता-पिता और बान्धवजनोंका कुशल कहो तथा यह भी बतलाओ कि यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है?' भृगुजीके इस प्रकार पूछनेपर महाप्राज्ञ मार्कण्डेयजीने उनसे उस समय ज्योतिषीकी कही हुई सारी बात कह सुनायी। पौत्रकी बात सुनकर भृगुजीने पुनः कहा—'महाबुद्धे! ऐसी स्थितिमें तुम कौन-सा कर्म करना चाहते हो?'॥ २४-३०॥ मार्कण्डेयजी बोले- भगवन्! मैं इस समय प्राणियोंका अपहरण करनेवाले मृत्युको जीतना चाहता हूँ, इसलिये आपकी शरणमें आया हूँ। इस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये आप मुझे कोई उपाय बतायें ॥ ३१ ॥ भृगुजी बोले- पुत्र ! बहुत बड़ी तपस्याके द्वारा भगवान् नारायणकी आराधना किये बिना कौन मृत्युको जीत सकता है? इसलिये तुम तपस्याद्वारा उन्हींका अर्चन करो। भक्तोंके प्रियतम और देवताओंमें सर्वश्रेष्ठ उन अनन्त, अजन्मा, अच्युत पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुकी शरणमें जाओ। वत्स ! पूर्वकालमें नारदमुनि भी महान् तपके द्वारा उन्हीं अनामय भगवान् नारायणकी शरणमें गये थे। महाभाग! ब्रह्मपुत्र नारदजी उन्हींकी कृपासे जरा और मृत्युको शीघ्र ही जीतकर दीर्घायु हो सुखपूर्वक रहते हैं। पुत्र! उन कमललोचन नृसिंहस्वरूप भगवान् जनार्दनके बिना कौन मनुष्य यहाँ मृत्युकी सत्ताका निवारण कर सकता है? तुम निरन्तर उन्हीं अनन्त, अजन्मा, विजयी, कृष्णवर्ण, लक्ष्मीपति, गोविन्द, गोपति भगवान् विष्णुकी शरणमें जाओ! वत्स ! यदि तुम सदा उन महान् देवता भगवान् नरसिंहकी पूजा करते रहोगे तो सदाके लिये मृत्युपर विजय प्राप्त कर लोगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ३२-३८॥ व्यासजी बोले- पितामह भृगुके इस प्रकार कहनेपर महान् तेजस्वी मार्कण्डेयजीने उनसे विनयपूर्वक कहा ॥ ३९ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७

३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७ मार्कण्डेय उवाच आराध्यः कथितस्तात विष्णुर्विश्वेश्वरः प्रभुः। कथं कुत्र मया कार्यमच्युताराधनं गुरो। येनासौ मम तुष्टस्तु मृत्युं सद्योऽपनेष्यति॥ ४० भृगुरुवाच तुङ्गभद्रेति विख्याता या नदी सह्यपर्वते। तत्र भद्रवटे वत्स त्वं प्रतिष्ठाप्य केशवम्॥ ४१ आराध्य जगन्नाथं गन्धपुष्पादिभिः क्रमात्। हृदि कृत्वेन्द्रियग्रामं मनः संयम्य तत्त्वतः॥ ४२ हृत्पुण्डरीके देवेशं शङ्खचक्रगदाधरम्। ध्यायन्नेकमना वत्स द्वादशाक्षरमभ्यसन्॥ ४३ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। इमं मन्त्रं हि जपतो देवदेवस्य शार्ङ्गिणः॥ प्रीतो भवति विश्वात्मा मृत्युं येनापनेष्यति॥ ४४ व्यास उवाच इत्युक्तस्तं प्रणम्याथ स जगाम तपोवनम्॥ ४५ सह्यपादोद्भवोवायास्तु भद्रायास्तटमुत्तमम्। नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम्॥ ४६ गुल्मवेणुलताकीर्णं नानामुनिजनाकुलम्। तत्र विष्णुं प्रतिष्ठाप्य गन्धधूपादिभिः क्रमात्॥ ४७ पूजयामास देवेशं मार्कण्डेयो महामुनिः। पूजयित्वा हरिं तत्र तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ ४८ निराहारो मुनिस्तत्र वर्षमेकममन्द्रितः। मात्रोक्तकाले त्वासन्ने दिने तत्र महामतिः॥ ४९ स्नात्वा यथोक्तविधिना कृत्वा विष्णोस्तथार्चनम्। हृदि कृत्वेन्द्रियग्रामं विशुद्धेनान्तरात्मना॥ ५० आसनं स्वस्तिकं बद्ध्वा कृत्वासौ प्राणसंयमम्। ॐकारोच्चारणाद्धीमान् हृत्पद्मं स विकासयन्॥ ५१ तन्मध्ये रविसोमाग्निमण्डलानि यथाक्रमम्। कल्पयित्वा हरेः पीठं तस्मिन् देशे सनातनम्॥ ५२ हिन्दी अनुवाद: मार्कण्डेयजी बोले—तात! गुरो! आपने विश्वपति भगवान् विष्णुको आराध्य तो बतलाया, परंतु मैं उन अच्युतकी आराधना कहाँ और किस प्रकार करूँ? जिससे वे शीघ्र प्रसन्न होकर मेरी मृत्युको दूर कर दें॥ ४०॥ भृगुजी बोले—सह्यपर्वतपर जो 'तुङ्गभद्रा' नामसे विख्यात नदी है, वहाँ 'भद्रवट' नामक वृक्षके नीचे जगन्नाथ भगवान् केशवकी स्थापना कर क्रमशः गन्ध और पुष्प आदिसे उनकी पूजा करो। इन्द्रियोंको मनमें नियन्त्रित कर, मनको भी पूर्णतः संयममें रखते हुए एकाग्रचित्त हो, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—इस द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करो और अपने हृदयकमलमें शङ्ख, चक्र, गदा (एवं पद्म) धारण किये देवेश्वर भगवान् विष्णुका ध्यान किया करो। जो देवाधिदेव शार्ङ्गधन्वा विष्णुके इस द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करता है, उसके ऊपर वे विश्वात्मा प्रसन्न होते हैं। तुम भी इसका जप करो, जिससे प्रसन्न होकर वे तुम्हारी मृत्यु दूर कर देंगे॥ ४१–४४॥ व्यासजी कहते हैं—वत्स! भृगुजीके इस प्रकार कहनेपर उन्हें प्रणाम करके मार्कण्डेयजी सह्यपर्वतकी शाखासे निकली हुई तुङ्गभद्राके उत्तम तटपर विविध प्रकारके वृक्ष और लताओंसे भरे हुए नाना भाँतिके पुष्पोंसे सुशोभित, गुल्म, लता और वेणुओंसे व्याप्त तथा अनेकानेक मुनिजनोंसे पूर्ण तपोवनमें गये। वहाँ वे महामुनिने देवेश्वर भगवान् विष्णुकी स्थापना करके क्रमशः गन्ध-धूप आदिसे उनकी पूजा करने लगे। भगवान्‌की पूजा करते हुए वहाँ उन्होंने निरालस्यभावसे निराहार रहकर सालभर अत्यन्त दुष्कर तप किया। माताका बतलाया हुआ समय निकट आनेपर उस दिन महामति मार्कण्डेयजीने वहाँ स्नान करके पूर्वोक्त विधिसे विष्णुकी पूजा की और स्वस्तिकासन बाँध इन्द्रियसम्मूहको मनमें संयत कर विशुद्ध अन्तःकरणसे युक्त हो प्राणायाम किया। फिर ॐकारके उच्चारणसे हृदयकमलको विकसित करते हुए उसके मध्यभागमें क्रमशः सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निमण्डलकी कल्पना करके भगवान् विष्णुका पीठ निश्चित किया और उस स्थानपर In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ७ ] मार्कण्डेयजीके द्वारा तपस्यापूर्वक श्रीहरिकी आराधना; 'मृत्युञ्जय-स्तोत्र'का पाठ ३१ पीताम्बरधरं कृष्णं शङ्खचक्रगदाधरम्। भावपुष्पैः समभ्यर्च्य मनस्तस्मिन्निवेश्य च ॥ ५३ ब्रह्मरूपं हरिं ध्यायंस्ततो मन्त्रमुदीरयत्। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ ५४ व्यास उवाच इत्येवं ध्यायत्तस्तस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः। मनस्तत्रैव संलग्नं देवदेवे जगत्पतौ ॥ ५५ ततो यमाज्ञया तत्र आगता यमकिंकराः। पाशहस्तास्तु तं नेतुं विष्णुदूतैस्तु ते हताः ॥ ५६ शूलैः प्रहन्यमानास्तु द्विजं मुक्त्वा ययुस्तदा। वयं निवृत्य गच्छामो मृत्युरेवागमिष्यति ॥ ५७ विष्णुदूता ऊचुः यत्र नः स्वामिनो नाम लोकनाथस्य शार्ङ्गिणः। को यमस्तत्र मृत्युर्वा कालः कलयतां वरः ॥ ५८ व्यास उवाच आगत्य स्वयमेवाह मृत्युः पार्श्वं महात्मनः। मार्कण्डेयस्य बभ्राम विष्णुकिंकरशङ्कया ॥ ५९ तेऽप्युद्यम्य्याशु मुशलानायसान् विष्णुकिंकराः। विष्ण्वाज्ञया हनिष्यामो मृत्युमद्येति संस्थिताः ॥ ६० ततो विष्ण्वर्पितमना मार्कण्डेयो महामतिः। तुष्टाव प्रणतो भूत्वा देवदेवं जनार्दनम् ॥ ६१ विष्णुनैवोदितं यत्तत्स्तोत्रं कर्णे महात्मनः। सुभाषितेन मनसा तेन तुष्टाव माधवम् ॥ ६२ मार्कण्डेय उवाच नारायणं सहस्राक्षं पद्मनाभं पुरातनम्। प्रणतोऽस्मि हृषीकेशं किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६३ गोविन्दं पुण्डरीकाक्षमनन्तमजमव्ययम्। केशवं च प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६४ वासुदेवं जगद्योनिं भानुवर्णमतीन्द्रियम्। दामोदरं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६५ पीताम्बर तथा शङ्ख, चक्र, गदा धारण करनेवाले सनातन भगवान् श्रीकृष्णकी भावमय पुष्पोंसे पूजा करके उनमें अपने चित्तको लगा दिया। फिर उन ब्रह्म-स्वरूप श्रीहरिका ध्यान करते हुए वे 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'-इस मन्त्रका जप करने लगे ॥ ५३-५४॥ व्यासजी कहते हैं—शुकदेव ! इस प्रकार ध्यान करते हुए बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीका मन उन देवाधिदेव जगदीश्वरमें लीन हो गया। तदनन्तर यमराजकी आज्ञासे उन्हें ले जानेके लिये हाथोंमें पाश लिये हुए यमदूत वहाँ आये; परंतु भगवान् विष्णुके दूतोंने उन्हें मार भगाया। शूलोंसे मारे जानेपर वे उस समय विप्रवर मार्कण्डेयको छोड़कर भाग चले और यह कहते गये कि 'हमलोग तो लौटकर चले जा रहे हैं, परंतु अब साक्षात् मृत्युदेव ही यहाँ आयेंगे' ॥ ५५-५७॥ विष्णुदूत बोले—जहाँ हमारे स्वामी जगदीश्वर शार्ङ्गधन्वा भगवान् विष्णुका नाम जपा जाता हो, वहाँ उनकी क्या बिसात है? ग्रसनेवालोंमें श्रेष्ठ काल, मृत्यु अथवा यमराज कौन होते हैं? ॥ ५८॥ व्यासजी कहते हैं—यमदूतोंके लौटनेके बाद साक्षात् मृत्युने ही वहाँ आकर उन्हें यमलोक चलनेको कहा, परंतु श्रीविष्णुदूतोंके डरसे वे महात्मा मार्कण्डेयके आसपास ही घूमते रह गये; उन्हें स्पर्श करनेका साहस न कर सके। इधर विष्णुदूत भी शीघ्र ही लोहेके मूसल उठाकर खड़े हो गये। उन्होंने अपने मनमें यह निश्चय कर लिया था कि 'आज हमलोग विष्णुकी आज्ञासे मृत्युका वध कर डालेंगे।' तत्पश्चात् महामति मार्कण्डेयजी भगवान् विष्णुमें चित्त लगाये उन देवाधिदेव जनार्दनको प्रणाम करते हुए स्तुति करने लगे। भगवान् विष्णुने ही वह स्तोत्र उन महात्माके कानमें कह दिया। उसी सुभाषित स्तोत्रद्वारा उन्होंने मनोयोगपूर्वक भगवान् लक्ष्मीपतिकी स्तुति की ॥ ५९-६२॥ मार्कण्डेयजी बोले—जो सहस्रों नेत्रोंसे युक्त, इन्द्रियोंके स्वामी, पुरातन पुरुष तथा पद्मनाभ (अपनी नाभिसे ब्रह्माण्डमय कमलको प्रकट करनेवाले) हैं, उन श्रीनारायणदेवको मैं प्रणाम करता हूँ। मृत्यु मेरा क्या कर लेगा? मैं अनन्त, अजन्मा, अविकारी, गोविन्द, कमलनयन भगवान् केशवकी शरणमें आ गया हूँ; अब मृत्यु मेरा क्या करेगा? मैं संसारकी उत्पत्तिके स्थान, सूर्यके समान प्रकाशमान्, इन्द्रियातीत वासुदेव (सर्वव्यापी देवता) भगवान् दामोदरकी शरणमें आ गया In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७

३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ७ शङ्खचक्रधरं देवं छन्नरूपिणमव्ययम्। हूँ; मृत्यु मेरा क्या कर सकेगा? जिनका स्वरूप अव्यक्त अधोक्षजं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६६ है, जो विकारोंसे रहित हैं, उन शङ्ख-चक्रधारी भगवान् अधोक्षजकी मैं शरणमें आ गया; मृत्यु मेरा क्या कर वाराहं वामनं विष्णुं नरसिंहं जनार्दनम्। लेगा? मैं वाराह, वामन, विष्णु, नरसिंह, जनार्दन एवं माधवं च प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६७ माधवकी शरणमें हूँ; मृत्यु मेरा क्या कर सकेगा? मैं पवित्र, पुष्कररूप अथवा पुष्कल (पूर्ण) रूप, कल्याणबीज, पुरुषं पुष्करं पुण्यं क्षेमबीजं जगत्पतिम्। जगत्-प्रतिपालक एवं लोकनाथ भगवान् पुरुषोत्तमकी लोकनाथं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६८ शरणमें आ गया हूँ; अब मृत्यु मेरा क्या करेगा? जो समस्त भूतोंके आत्मा, महात्मा (परमात्मा) एवं जगत्की भूतात्मानं महात्मानं जगद्योनिमयोनिजम्। योनि (उत्पत्तिके स्थान) होते हुए भी स्वयं अयोनिज हैं, विश्वरूपं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ६९ उन भगवान् विश्वरूपकी मैं शरणमें आया हूँ; मृत्यु मेरा क्या कर सकेगा? जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो व्यक्ताव्यक्त सहस्रशिरसं देवं व्यक्ताव्यक्तं सनातनम्। स्वरूप हैं, उन महायोगी सनातन देवकी मैं शरणमें आया महायोगं प्रपन्नोऽस्मि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ ७० हूँ; अब मृत्यु मेरा क्या कर सकेगा? ॥ ६३–७० ॥ इत्युदीरितमाकर्ण्य स्तोत्रं तस्य महात्मनः। महात्मा मार्कण्डेयके द्वारा उच्चारित हुए उस स्तोत्रको अपयातस्ततो मृत्युर्विष्णुदूतैश्च पीडितः ॥ ७१ सुनकर विष्णुदूतोंद्वारा पीड़ित हुए मृत्युदेव वहाँसे भाग चले। इस प्रकार बुद्धिमान् मार्कण्डेयने मृत्युपर इति तेन जितो मृत्युर्मार्कण्डेयेन धीमता। विजय पायी। सच है, कमललोचन भगवान् नृसिंहके प्रसन्ने पुण्डरीकाक्षे नृसिंहे नास्ति दुर्लभम् ॥ ७२ प्रसन्न होनेपर कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता। स्वयं भगवान् विष्णुने ही मार्कण्डेयजीके हितके लिये मृत्युको मृत्युञ्जयमिदं पुण्यं मृत्युप्रशमनं शुभम्। शान्त करनेवाले इस परम पावन मङ्गलमय मृत्युञ्जय- मार्कण्डेयहितार्थाय स्वयं विष्णुरुवाच ह ॥ ७३ स्तोत्रका उपदेश दिया था। जो नित्य नियमपूर्वक पवित्रभावसे भक्तियुक्त होकर सायं, प्रातः और मध्याह्न— य इदं पठते भक्त्या त्रिकालं नियतः शुचिः। तीनों समय इस स्तोत्रका पाठ करता है, भगवान् नाकाले तस्य मृत्युः स्यान्नरस्याच्युतचेतसः ॥ ७४ अच्युतमें चित्त लगानेवाले उस पुरुषका अकालमरण नहीं होता। योगी मार्कण्डेयने अपने हृदय-कमलमें हृत्पद्ममध्ये पुरुषं पुराणं सूर्यसे भी अधिक प्रकाशमान सनातन पुराण-पुरुष नारायणं शाश्वतमादिदेवम्। आदिदेव नारायणका चिन्तन करके तत्काल मृत्युपर संचिन्त्य सूर्यादपि राजमानं मृत्युं स योगी जितवांस्तदैव ॥ ७५ विजय प्राप्त कर ली ॥ ७१–७५ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे मार्कण्डेयमृत्युञ्जयो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मार्कण्डेयकी मृत्युपर विजय' नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

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श्रीसूतजीद्वारा कथारम्भ

गीताप्रेस, गोरखपुर श्रीसूतजीद्वारा कथारम्भ

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आठवाँ अध्याय

अध्याय ८ ] मृत्यु और दूतोंको समझाते हुए यमका उन्हें वैष्णवोंके पास जानेसे रोकना ३३ आठवाँ अध्याय मृत्यु और दूतोंको समझाते हुए यमका उन्हें वैष्णवोंके पास जानेसे रोकना; उनके मुँहसे श्रीहरिके नामकी महिमा सुनकर नरकस्थ जीवोंका भगवान्‌को नमस्कार करके श्रीविष्णुके धाममें जाना

श्रीव्यास उवाच मृत्युश्च किंकराश्चैव विष्णुदूतैः प्रपीडिताः। स्वराज्ञस्तेऽनु निर्वेशं गत्वा ते चुक्रुशुर्भृशम् ॥ १

श्रीव्यासजी बोले—विष्णुदूतोंके द्वारा अत्यन्त पीड़ित हुए मृत्युदेव और यमदूत अपने राजा यमके भवनमें जाकर बहुत रोने-कलपने लगे॥ १॥

मृत्युकिंकरा ऊचुः शृणु राजन् वचोऽस्माकं तवाग्रे यद् ब्रवीमहे । त्वदादेशाद्वयं गत्वा मृत्युं संस्थाप्य दूरतः ॥ २ ब्राह्मणस्य समीपं च भृगोः पौत्रस्य सत्तम। तं ध्यायमानं कमपि देवमेकाग्रमानसम् ॥ ३ गन्तुं न शक्तास्तत्पार्श्वं वयं सर्वे महामते। यावत्तावन्महाकायैः पुरुषैर्मुशलैर्हताः ॥ ४ वयं निवृत्तास्तद्वीक्ष्य मृत्युस्तत्र गतः पुनः। अस्मान्निर्भर्त्स्य तत्रायं तैनैरैर्मुशलैर्हतः ॥ ५ एवमत्र तमानेतुं ब्राह्मणं तपसि स्थितम्। अशक्ता वयमेवात्र मृत्युना सह वै प्रभो ॥ ६ तद्ब्रवीहि महाभाग यद्ब्रह्म ब्राह्मणस्य तु। देवं कं ध्यायते विप्रः के वा ते यैर्हता वयम् ॥ ७

मृत्यु और यमदूत बोले—राजन् ! आपके आगे हम जो कुछ कह रहे हैं, हमारी इन बातोंको आप सुनें। हमलोगोंने आपकी आज्ञाके अनुसार यहाँसे जाकर मृत्युको तो दूर ठहरा दिया और स्वयं भृगुके पौत्र ब्राह्मण मार्कण्डेयके समीप गये। परंतु सत्पुरुषशिरोमणे ! वह उस समय एकाग्रचित्त होकर किसी देवताका ध्यान कर रहा था। महामते! हम सभी लोग उसके पासतक पहुँचने भी नहीं पाये थे कि बहुत-से महाकाय पुरुष मूसलसे हमें मारने लगे। तब हमलोग तो लौट पड़े, परंतु यह देखकर मृत्युदेव वहाँ फिर पधारे। तब हमें डाँट-फटकारकर उन लोगोंने इन्हें भी मूसलोंसे मारा। प्रभो! इस प्रकार तपस्यामें स्थित हुए उस ब्राह्मणको यहाँतक लानेमें मृत्युसहित हम सब लोग समर्थ न हो सके। महाभाग ! उस ब्राह्मणका जो तप है, उसे आप बतलाइये, वह किस देवताका ध्यान कर रहा था और जिन लोगोंने हमें मारा, वे कौन थे ? ॥ २-७ ॥

व्यास उवाच इत्युक्तः किंकरैः सर्वैर्मृत्युना च महामते। ध्यात्वा क्षणं महाबुद्धिः प्राह वैवस्वतो यमः ॥ ८

व्यासजी कहते हैं—महामते ! मृत्यु तथा समस्त दूतोंके इस प्रकार कहनेपर महाबुद्धि सूर्यकुमार यमने क्षणभर ध्यान करके कहा ॥ ८ ॥

यम उवाच शृण्वन्तु किंकराः सर्वे मृत्युश्चान्ये च मे वचः। सत्यमेतत्प्रवक्ष्यामि ज्ञानं यद्योगमार्गतः ॥ ९ भृगोः पौत्रो महाभागो मार्कण्डेयो महामतिः । स ज्ञात्वाद्यात्मनः कालं गतो मृत्युजिगीषया ॥ १० भृगुणोक्तेन मार्गेण स तेपे परमं तपः। हरिमाराध्य मेधावी जपन् वै द्वादशाक्षरम् ॥ ११

यम बोले—मृत्यु तथा मेरे अन्य सभी किंकर आज मेरी बात सुनें—योगमार्ग (समाधि)-के द्वारा मैंने इस समय जो कुछ जाना है, वही सच-सच बतला रहा हूँ। भृगुके पौत्र महाबुद्धिमान् महाभाग मार्कण्डेयजी आजके दिन अपनी मृत्यु जानकर मृत्युको जीतनेकी इच्छासे तपोवनमें गये थे। वहाँ उन बुद्धिमान्‌ने भृगुजीके बतलाये हुए मार्गके अनुसार भगवान् विष्णुकी आराधना एवं द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करते हुए उत्कृष्ट तपस्या की

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३४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ८


[बायाँ स्तम्भ - मूल संस्कृत श्लोक]

एकाग्रेणैव मनसा ध्यायते हृदि केशवम्। सततं योगयुक्तस्तु स मुनिस्तत्र किंकराः ॥ १२ हरिध्यानमहादीक्षाबलं तस्य महामुनेः। नान्यद्वै प्राप्तकालस्य बलं पश्यामि किंकराः ॥ १३ हृदिस्थे पुण्डरीकाक्षे सततं भक्तवत्सले। पश्यन्तं विष्णुभूतं नु को हि स्यात् केशवाश्रयम् ॥ १४ तेऽपि वै पुरुषा विष्णोर्यैर्युयं ताडिता भृशम्। अत ऊर्ध्वं न गन्तव्यं यत्र वै वैष्णवाः स्थिताः ॥ १५ न चित्रं ताडनं तत्र अहं मन्ये महात्मभिः । भवतां जीवनं चित्रं यक्षैर्दत्तं कृपालुभिः ॥ १६ नारायणपरं विप्रं कस्तं वीक्षितुमुत्सहेत्। युष्माभिश्च महापापैर्मार्कण्डेयं हरिप्रियम्। समानेतुं कृतो यत्नः समीचीनं न तत्कृतम् ॥ १७ नरसिंहं महादेवं ये नराः पर्युपासते। तेषां पार्श्वे न गन्तव्यं युष्माभिर्मम शासनात् ॥ १८

श्रीव्यास उवाच स एवं किंकरानुक्त्वा मृत्युं च पुरतः स्थितम्। यमो निरीक्ष्य च जनं नरकस्थं प्रपीडितम् ॥ १९ कृपया परया युक्तो विष्णुभक्त्या विशेषतः । जनस्यानुग्रहार्थाय तेनोक्ताश्च गिरः शृणु ॥ २० नरके पच्यमानस्य यमेन परिभाषितम्। किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः ॥ २१ उदकेनाप्यलाभे तु द्रव्याणां पूजितः प्रभुः । यो ददाति स्वकं लोकं स त्वया किं न पूजितः ॥ २२ नरसिंहो हृषीकेशः पुण्डरीकनिभेक्षणः । स्मरणान्मुक्तिदो नृणां स त्वया किं न पूजितः ॥ २३ इत्युक्त्वा नारकान् सर्वान् पुनराह स किंकरान्। वैवस्वतो यमः साक्षाद्विष्णुभक्तिसमन्वितः ॥ २४ नारदाय स विश्वात्मा प्राहैवं विष्णुरव्ययः । अन्येभ्यो वैष्णवेभ्यश्च सिद्धेभ्यः सततं श्रुतम् ॥ २५ तद्वः प्रीत्या प्रवक्ष्यामि हरिवाक्यमनुत्तमम्। शिक्षार्थं किंकराः सर्वे शृणुत प्रणता हरेः ॥ २६


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]

है। दूतो ! वे मुनि निरन्तर योगयुक्त होकर वहाँ एकाग्रचित्तसे अपने हृदयमें केशवका ध्यान कर रहे हैं। किंकरो ! उस महामुनिको भगवान् विष्णुके ध्यानकी महादीक्षाका ही बल प्राप्त है; क्योंकि जिसका मरणकाल प्राप्त हो गया है, उसके लिये मैं दूसरा कोई बल नहीं देखता। भक्तवत्सल, कमललोचन भगवान् विष्णुके निरन्तर हृदयस्थ हो जानेपर उस विष्णुस्वरूप भगवच्छरणागत पुरुषकी ओर कौन देख सकता है ? ॥ ९-१४ ॥

वे पुरुष भी, जिन्होंने तुम्हें बहुत मारा है, भगवान् विष्णुके ही दूत हैं। आजसे जहाँ वैष्णव हों, वहाँ तुमलोग न जाना। उन महात्माओंके द्वारा तुम्हारा मारा जाना आश्चर्यकी बात नहीं है। आश्चर्य तो यह है कि उन दयालु महापुरुषोंने तुम्हें जीवित रहने दिया है। भला, नारायणके ध्यानमें तत्पर हुए उस ब्राह्मणको देखनेका भी साहस कौन कर सकता है? तुम महापापियोंने भगवान्के प्रिय भक्त मार्कण्डेयजीको जो यहाँ लानेका प्रयत्न किया है, यह अच्छा नहीं किया। आजसे तुमलोग मेरी आज्ञा मानकर उन महात्माओंके पास न जाना, जो महादेव भगवान् नृसिंहकी उपासना करते हों ॥ १५-१८ ॥

**श्रीव्यासजी कहते हैं—**शुकदेव ! यमने अपने सामने खड़े हुए मृत्युदेव और दूतोंसे इस प्रकार कहकर नरकमें पड़े हुए पीड़ित मनुष्योंकी ओर देखा तथा अत्यन्त कृपा एवं विशेषतः विष्णुभक्तिसे युक्त होकर नारकीय जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये जो बातें कहीं, उन्हें तुम सुनो। नरकमें यातना सहते हुए जीवोंसे यमने कहा—‘पापसे कष्ट पानेवाले जीव ! तुमने क्लेशनाशक भगवान् केशवकी पूजा क्यों नहीं की ? पूजन-सम्बन्धी द्रव्योंके न मिलनेपर केवल जलमात्रसे भी पूजित होनेपर जो भगवान् पूजकको अपना लोकतक दे डालते हैं, उनकी पूजा तुमने क्यों नहीं की? कमलके समान लोचनोंवाले, नरसिंहरूपधारी जो भगवान् हृषीकेश स्मरणमात्रसे ही मनुष्योंको मुक्ति देनेवाले हैं, उनकी पूजा तुमने क्यों नहीं की?' ॥ १९-२३ ॥

नरकमें पड़े हुए जीवोंके प्रति यों कहकर विष्णुभक्तिसे युक्त सूर्यनन्दन यमने अपने किंकरोंसे पुनः कहा—'किंकरो ! अविनाशी विश्वात्मा भगवान् विष्णुने नारदजीसे जैसा कहा था और अन्य वैष्णवों तथा सिद्धोंसे जैसा सदा ही सुना गया है, वह अत्यन्त उत्तम भगवद्वाक्य मैं प्रसन्न होकर तुम लोगोंसे शिक्षाके लिये कह रहा हूँ। तुम सभी भगवान्के शरणागत होकर सुनो ॥ २४-२६॥

अध्याय ८ ] मृत्य और दूतोंको समझाते हुए यमका उन्हें वैष्णवोंके पास जानेसे रोकना ३५

हे कृष्ण कृष्ण कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यशः। | भगवान् कहते हैं—'हे कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !'— जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम् ॥ २७ | इस प्रकार जो मेरा नित्य स्मरण करता है, उसको मैं | उसी प्रकार नरकसे निकाल लेता हूँ, जैसे जलको पुण्डरीकाक्ष देवेश नरसिंह त्रिविक्रम। | भेदकर कमल बाहर निकल आता है। 'पुण्डरीकाक्ष ! त्वामहं शरणं प्राप्त इति यस्तं समुद्धरे ॥ २८ | देवेश्वर नरसिंह ! त्रिविक्रम ! मैं आपकी शरणमें पड़ा | हूँ'—यों जो कहता है, उसका मैं उद्धार कर देता हूँ। त्वां प्रपन्नोऽस्मि शरणं देवदेव जनार्दन। | 'देवाधिदेव ! जनार्दन ! मैं आपकी शरणमें आ गया इति यः शरणं प्राप्तस्तं क्लेशादुद्धराम्यहम् ॥ २९ | हूँ'—इस प्रकार जो मेरा शरणागत होता है, उसे मैं | क्लेशसे मुक्त कर देता हूँ॥ २७-२९॥ व्यास उवाच | व्यासजी कहते हैं—वत्स ! यमराजके कहे हुए इत्युदीरितमाकर्ण्य हरिवाक्यं यमेन च। | इस भगद्वाक्यको सुनकर नरकमें पड़े हुए जीव 'कृष्ण ! नारकाः कृष्णकृष्णेति नारसिंहेति चुक्रुशुः ॥ ३० | कृष्ण ! नरसिंह !' इत्यादि भगवन्नामोंका जोरसे उच्चारण | करने लगे। नारकीय जीव वहाँ ज्यों-ज्यों भगवन्नामका यथा यथा हरेर्नाम कीर्तयन्त्यत्र नारकाः। | कीर्तन करते थे, त्यों-ही-त्यों भगवद्भक्तिसे युक्त होते तथा तथा हरेर्भक्तिमुद्वहन्तोऽब्रुवन्निदम् ॥ ३१ | जाते थे। इस तरह भक्तिभावसे पूर्ण हो वे इस प्रकार | कहने लगे ॥ ३०-३१॥ नारका ऊचुः | नरकस्थ जीव बोले—'ॐ' जिनका नाम कीर्तन ॐ नमो भगवते तस्मै केशवाय महात्मने। | करनेसे नरककी ज्वाला तत्काल शान्त हो जाती है, उन यन्नामकीर्तनात् सद्यो नरकाग्निः प्रशाम्यति ॥ ३२ | महात्मा भगवान् केशवको नमस्कार है। जो यज्ञोंके | ईश्वर, आदिमूर्ति, शान्तस्वरूप और संसारके स्वामी हैं, भक्तप्रियाय देवाय रक्षाय हरये नमः। | उन भक्तप्रिय, विश्वपालक भगवान् विष्णुको नमस्कार लोकनाथाय शान्ताय यज्ञेशायादिमूर्तये ॥ ३३ | है। अनन्त, अप्रमेय नरसिंहस्वरूप, शङ्ख-चक्र-गदा धारण अनन्तायाप्रमेयाय नरसिंहाय ते नमः। | करनेवाले, लोकगुरु आप श्रीनारायणको नमस्कार है। नारायणाय गुरवे शङ्खचक्रगदाभृते ॥ ३४ | वेदोंके प्रिय, महान् एवं विशिष्ट गतिवाले भगवान्‌को | नमस्कार है। तर्कके अविषय, वेदस्वरूप, पृथ्वीको वेदप्रियाय महते विक्रमाय नमो नमः। | धारण करनेवाले भगवान् वाराहको प्रणाम है। ब्राह्मणकुलमें वाराहायाप्रतर्क्याय वेदाङ्गाय महीभृते ॥ ३५ | अवतीर्ण, वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञाता और अनेक विषयोंका नमो द्युतिमते नित्यं ब्राह्मणाय नमो नमः। | ज्ञान रखनेवाले कान्तिमान् भगवान् वामनको नमस्कार वामनाय बहुज्ञाय वेदवेदाङ्गधारिणे ॥ ३६ | है। बलिको बाँधनेवाले, वेदके पालक, देवताओंके | स्वामी, व्यापक, परमात्मा आप वामनरूपधारी बलिबन्धनदक्षाय वेदपालाय ते नमः। | विष्णुभगवान्‌को प्रणाम है। शुद्ध द्रव्यमय, शुद्धस्वरूप विष्णवे सुरनाथाय व्यापिने परमात्मने ॥ ३७ | भगवान् चतुर्भुजको नमस्कार है। दुष्ट क्षत्रियोंका अन्त | करनेवाले जमदग्निनन्दन भगवान् परशुरामको प्रणाम है। चतुर्भुजाय शुद्धाय शुद्धद्रव्याय ते नमः। | रावणका वध करनेवाले आप महात्मा श्रीरामको नमस्कार जामदग्न्याय रामाय दुष्टक्षत्रान्तकारिणे ॥ ३८ | है। गोविन्द ! आपको बारंबार प्रणाम है। आप इस रामाय रावणान्ताय नमस्तुभ्यं महात्मने। | दुर्गन्धपूर्ण नरकसे हमारा उद्धार करें ॥ ३२-३९॥ अस्मानुद्धर गोविन्द पूतिगन्धान्नमोऽस्तु ते ॥ ३९ |

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