निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त । १३३ ब्राह्मण प्रशंसा करे, वह अर्थ पहिले किसोका कहा हुआ होना चाहिये, किन्तु ऐसी आकांक्षाको सहजन्मा मन्त्रके अतिरिक्त और कौन पूरीकर सकता है। फल यह निकला कि—'मन्त्र अर्थवान् होकर भी ब्राह्मणसे विहित होता है, इससे वह अनर्थक नहीं होना चाहिये, प्रत्युत ब्राह्मणकी अर्थवत्ताके लिये उसे अर्थवान् होनेकी बड़ी आवश्यकता है। इस निर्णयके अनुसार कौत्सके मतमें, 'जो ब्राह्मणका अर्थवत्ता मन्त्रको अनर्थक बनाती थी,स्वयम् वही अब मन्त्रकीअर्थवत्ताके अनर्थक बनाती थी, स्वयम् वही अब मन्त्रकी अर्थवत्ताके बिना अपने ठहरनेका कोई आधार नहीं पाती। इस प्रकार ब्राह्मणकी अर्थवत्ताकी सहचरी बनकर मन्त्रकी अर्थवत्ता निर्विशङ्क विराजती है। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणकी अर्थवत्ता यो भी है कि—किसी किसी प्रकरणमें समानलिङ्ग अनेक मन्त्र होते है,जो सब समानरूपसे एकही कर्मको बोधन करते हैं, इससे या तो वे सभी कबूतरोंके समान एकदम उस कर्ममें आवें, या उनका विकल्प हो ? वैसे स्थलमें किसी अभिमत एक मन्त्रका नियम कर देता है कि—इस कर्ममें यही मन्त्र लिया जाय। इस प्रकार ब्राह्मणकी स्वतन्त्र आवश्यकता है, उसके कारण मन्त्र अनर्थक नहीं हो सकते। इससे सिद्ध हुआ कि—"मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही अर्थवान् हैं। ३—जोकि--यह कहा कि—"ओषधे त्रायस्वैनम्” “स्वधिते मै॒नं॒ हिं॑सीः” इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ उत्पन्न नहीं होता इस लिये मन्त्र अनर्थक है' ? ठीक नहीं है। क्योंकि—जहां केश या वृक्ष आदिके छेदनमें यह मन्त्र विनियुक्त है, वहां इस मन्त्रके द्वारा ओषधिके अधिदेवताको स्तुति की जाती है और उसीसे जजमान और वृक्ष आदिकोंके प्राणकी प्रार्थना है। जिससे कि—देवताकी
१३४ अ० १ पा० ५ सू० १ । कृपा से निर्विघ्न पीड़ारहित संस्कृत होकर वे यज्ञकर्ममें विनियुक्त हों। इसलिये मंत्रोंके अर्थोंमें कोई अनुपपत्ति नहीं है। ४-जोकि—यह कहा कि—हिंसा करता हुआ भी कहता है कि—“स्वधिते मैन ्र ति ्र सीः” इसपर कहना यह है कि-वेद- वाक्यसे यह अहिंसा प्रतीत होगी। प्रश्न होता है कि—प्रत्यक्षमें छेदन कर्म हिंसा है वह कैसे अहिंसा होसकती हैं ? सुनो;—‘यह अहिंसा है’ और यह हिंसा’ यह आगमसे प्रतीत होता है। और सम्पूर्ण आगमोंमें वेद ही प्रतिष्ठित आगम है, क्योंकि—सब अंग वेदसे ही निकले हैं। इसलिये वेदमें जिस छेदनादि क्रियाका विधान है, वह हिंसा नहीं कही जासकती। इन सबका यह अभिप्राय है कि—वेदवाक्य, जो धर्मका प्रथम बतानेवाला है, उसीसे हिंसा और अहिंसाका पता चलेगा, जिसको वह हिंसा कहे वह हिंसा है,और जिसको अहिंसा कहे,वह अहिंसा। जबकि—हिंसा-अहिंसाका निर्णता वेदही छेदनादि क्रियाका विधान करता है तो उसको हिंसा नहीं समझना चाहिये। जैसे कि कहा है,— “या वेदविहिता हिंसा न सा हिंसा प्रकीर्त्तिता” अर्थ—‘जो हिंसा वेदमें विहित है वह हिंसा नहीं है।’ क्योंकि— वैदिक आगम सारे ही जगत्के किसी एक उत्तम कल्याणके लिये उद्यत हुआ है, वह कैसे किसी प्राणीके अनिष्टके लिये विधान करता, इसलिये उसने जो कुछ किसी प्राणीके लिये छेदनादि कहा है, वह उसकी उत्तम गतिके लिये ही है। किञ्च ओषधि, वनस्पति, पशु, मृग, पक्षी, तथा सरीसृप सब, यज्ञमें भले प्रकार उपयुक्त होकर उत्कर्ष को प्राप्त होते हैं। वह उनकी हिंसा नहीं, लाभ है।
हिन्दी निरुक्त। १३५ हम समझते हैं कि-ठीक यही अभिप्राय निम्न लिखित मार्क- ण्डेयपुराणके सप्तशती स्तोत्रमें भी दिखाया है । "एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम् । संग्राम मृत्यु मधि- गम्य दिवं प्रयान्तु मत्वेतिनून महिमान्विति- हंसि देवि !" (४,१८) । अर्थ:-"हे देवि ! संसारमें अशान्तिके उत्पन्न करनेवाले इन राक्षसोंको तुम समदर्शिनी होकर भी इसलिये मारती हो कि- 'इनके मरनेसे सब जगत् सुखी हो, तथा ये (दैत्य) नरकमें जानेके लिये बहुत कालतक पाप करें, इसकी अपेक्षा संग्राममें मृत्युको प्राप्त होकर, स्वर्गमें जावें, अच्छा होगा ।” अर्थात् भगवती उनके अनिष्टके लिये नहीं प्रत्युत उनके अभ्युदयके लक्ष्यसे उनका वध करती है इसी तात्पर्यके साथमें भगवान् वेद भी वृक्षादिकोंकी हिंसाका विधान करता है। इस रीतिसे मंत्रोंमें ऐसा कोई अर्थ नहीं जो अनुपपन्न हो, अतः मंत्र अर्थवान् हैं। (५) परस्पर विरुद्ध अर्थके उदाहरणसे भी मंत्रोंकी अन- र्थकता नहीं है, क्योंकि-यह बात दैवतकाण्ड (७, १, ४) में स्पष्ट कही जायगी कि-'देवता महाभाग्यके योगसे एक भी अनेक होजाती है और अनेक होती हुई एक । इस कारण एक रुद्र अनेक रूप होसकतो और अनेक एक, इसलिये मंत्रोंमें कोई ऐसा विरोध न होनेसे मंत्र अर्थवान् हैं । (६) इन्द्रके शत्रुरहित होने और उसके सैकड़ों शत्रुसेनाओंके जीतनेका प्रश्न भी युक्त नहीं, क्योंकि-लोकमें भी “असपत्नोऽयं ब्राह्मणः” 'यह ब्राह्मण शत्रु रहित है' “अनमित्रोऽयं राजा” 'यह
अ० १ पा० ५ ख० १ ।
राजा वैरीशून्य है' इत्यादि व्यवहार प्रसिद्ध हैं। किन्तु लोकमें कोई शत्रुरहित नहीं है। जैसाकि—कहा है— मुनेरपि वनस्थस्य स्वाति कर्माणि कुर्वतः । उत्पद्यन्ते त्रयः पक्षा मित्रोदासीन शत्रवः । अर्थ—मुनि जो वनमें रहकर केवल अपने कर्मोंको करता है, उसके भी मित्र उदासीन और शत्रु ये तीन पक्ष उत्पन्न होजाते हैं। तथापि किसीको कोई स्वल्पशत्रु देखकर ऐसा कह देता है कि- ‘वह अशत्रु है’ इसी प्रकार जब इन्द्रने किसी बड़े भारी मेघका हनन किया, उस समय अन्यमेघोंकी असारता जानकर कह दिया कि-- हे इन्द्र ! अब तू अशत्रु होगया, जैसा कि--किसीके भारी शत्रुके नष्ट होजानेपर क्षुद्र शत्रुओंके रहते हुए भी उसे अशत्रु कहा जावे, उसीके समान इंद्रकी अशत्रुता भी होसकती है। यद्यपि देवताओंके कोई शत्रु नहीं होते, बल्कि—वे विभुस्व- तंत्र तथा महिमावाले होते हैं तथापि सैकड़ों सेनाओंके जीतनेकी स्तुति कल्पनामात्र है। क्योंकि—आगे कहेंगे कि-“जल और ज्योतिः के योगसे वर्षण कर्म होता है” वहां उपमाके लिये युद्धका वर्णन होता है” (नै० का० २, ५, २) । इसलिये हे कौत्स ! तुम्हे यह ठीक नहीं दिखाई देता, निरुक्तके जाननेवालोंसे देवता तत्वको समझो, उसीसे तुम मन्त्रोंके अर्थोंको विरोध रहित जान सकोगे। इस प्रकार (जैसाकि—तुम करते हो) वाक्यके तत्वके न जाननेवालेसे मन्त्रार्थ अवगाहन नहीं किया जा सकता। क्योंकि—वेदके पदार्थ गम्भीर हैं। कैसे जानोंगे ? वेदार्थके विचारमें भ्रान्त वादियोंने ही अपनी बुद्धिके लाघवके प्रकट करने के लिये सर्व-वर्णा साधारण दर्शनोंको प्रतिपादन किया है, उन्हींके चक्रमें तुम भी कहीं पड़ गये हो। अतः तुमने जो कहा है
कि—“विप्रतिषिद्धार्थ होनेसे मन्त्र अनर्थक हैं” यह तुम्हारा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि 'ये मन्त्र विप्रतिषिद्धार्थ नहीं हैं, किन्तु मन्द शिक्षाके कारण तुम्हारी बुद्धिका ही यह दोष है, इसलिये “मन्त्र अर्थवान् हैं”। जानते हुएकी प्रेरणाका प्रश्न भी अयुक्त है, क्योंकि लौकिक अर्थवाले शब्दोंमें भी यही स्वभाव देखा गया है। जानते हुए गुरुको अभिवादन करते हुए शिष्य अपना गोत्र कहते हैं, तथा जानते हुए वर आदिको मधुपर्क देता हुआ तीनवार “मधुपर्को मधुपर्को मधुपर्कः” ऐसा कहता है। इस तरह जैसे अर्थवान् शब्दोंमें भी विहित अर्थके प्रकाश करनेके लिये शब्द प्रयोग होता है, वैसे ही वेदमें भी “अग्नये समिध्यमानायानुब्रूहि” इत्यादि मन्त्र जानते हुए भी होता आदिके लिये कहे जाते हैं। इसलिये मन्त्र अर्थ- वान् हैं। ६—जोकि—“अदितिः सर्वम्” इसमें यह आक्षेप किया कि— विभिन्न वस्तुओंको एक वस्तुमें देखना मन्त्रोंकी अनर्थकताको सिद्ध करता है। यह भी ठीक नहीं है। क्योकि—शब्दकी प्रवृत्ति दो प्रकारकी होती है, एक मुख्यार्थ और दूसरी गौणी। इससे यह स्वारस्य निकला कि—जहां मुख्य अर्थ असम्भव हो वहां गौण अर्थ स्वीकार करना। जैसे किसीने किसीके बहुत उपकार किये हैं और वह उस उपकारीसे कहे कि—'तू ही मेरी माता और तू ही पिता है' उसी प्रकार इसको भी देखना चाहिए। जिस प्रकार लौकिक अर्थवाले शब्दोंमें भी देखा गया है कि—“जिसे पानी मिल गया उसे सभी रस प्राप्त हो गये” उसी प्रकार यहां भी अदितिकी सर्वरूपता किसी तरह कही गई है। इससे जोकि—तुमसे यह कहा कि—'मन्त्रोंमें परस्पर विरुद्ध बहुत कुछ कहा हुआ है? यह १८
-अयुक्त है, क्योंकि—मन्त्रोंमें सब उपपन्न होता है। तिससे 'मन्त्र अर्थवन् हैं' यह सिद्ध हुआ । ७—फिर यह कहा कि—मन्त्रोंमें बहुत ऐसे शब्द हैं जिनका कुछ अर्थ स्पष्ट नहीं होता, जैसे अम्यक् इत्यादि। यह भी ठीक नहीं। क्योंकि—"यह स्थाणु (खूँठ) का अपराध नहीं कि उसे अन्धा न देखे" "किन्तु वह पुरुषका अपराध है" अर्थात् पुरुषका ही वह अपराध है कि—वह नेत्ररहित है। इसी प्रकार यहां भी मन्त्रोंका कोई अपराध नहीं है, कि—आप अशिक्षित होनेसे अर्थोंको न जाने। किन्तु वह आपका अपराध है, हे सज्जन ! आप सब अपने अपराधोंको मन्त्रोंमें अथवा हमारेमें लगाना चाहते हो' वास्तवमें तुम्हें कुछ प्रज्ञा नहीं है। जिस प्रकार लौकिक शिल्पकलादिकोंमें कोई पुरुष शिक्षित होकर अन्य पुरुषोंकी अपेक्षा उन क्रियाओंमें वह विशेष हो जाता है, उसी प्रकार यहां पर भी मन्त्रार्थकी शिक्षासे कोई पुरुष अन्य पुरुषोंसे विशेष हो जाता है। ऐसी स्थितिमें कोई पुरुष स्पष्ट मन्त्रोंका भी निर्वचन नहीं कर सकते और कोई गूढ़ मन्त्रोंके भी अर्थोंको स्पष्ट करनेमें समर्थ होते हैं। यही बात "उतत्वः” (ऋ० सं० ८, २, २३, ४) इस ऋचामें कही गई है। इसी प्रकार वेद-शास्त्रके आद्यन्तके जाननेवाले ब्राह्मण जो कि— साक्षात्कृतधर्मा नहीं हैं, उनमें जो अधिक विद्वान् होता है, वही श्रेष्ठ होता है। जो ब्राह्मण मन्त्रोंके अर्थोंका विज्ञाता होता है, वही प्रशंसनीय होता है किन्तु अन्य जो मन्दबुद्धि एवम् अशिक्षित पुरुष नहीं। क्योंकि—बहुश्रुत पुरुष अनेक विषयोंवाले मन्त्रार्थमें कहीं भी रुकता नहीं, उसको कोई अर्थ भी गुप्त नहीं है। इस कारण हे कौत्स ! तुम विस्तारसे सुनो ! उससे तुम मन्त्रार्थोंको जानोगे। जैसाकि—तुमने पहिले कहा है कि—'मन्त्र अविस्पष्टार्थ हैं" वे अविस्पष्टार्थ नहीं हैं, और उनको स्पष्ट करके हम व्याख्यान
हिन्दी निरुक्त । १३३ भी करेंगे। यह संमोह तुम्हारी मतिको घुमाता है। इससे 'मन्त्र अर्थवान् हैं" यह सिद्ध हुआ । और इससे यह शास्त्र भी मन्त्रोंके अर्थ के जनानेके लिये सार्थक हो हैं, इससे शास्त्रका आरम्भ भी सिद्ध हुआ । इस कारण वहां तुमने यह कहा कि—‘यदि मन्त्रार्थ- के जाननेके लिये यह शास्त्र आरम्भ किया जाता है तो अनर्थक है' यह अयुक्त है । इस रीतिसे वादीके हेतुओंका निराकरण हो जाने पर अपने पक्षकी सिद्धिमें हेतु उठे और मन्त्रगणकी सार्थकता तथा उसके लिये इस शास्त्रको प्रयोजनवत्ता सिद्ध हुई । ॥ समाप्तः पञ्चमः पादः ॥ षष्ठः पाद । (खं० १ ) अथापि इमन्तरेण पदविभागो न विद्यते । “अवसाय पद्वते रुद्र मृल”-इति । पद्वत् अवसं गावः पथ्यदनम् । अते र्गत्यर्थस्य असौ नाम करणः । तस्मात् न अवगृह्णन्ति । “अवसायाश्वान्”- इति । स्यतिः उपसृष्टः विमोचने, तस्मात् अव- गृह्णान्ति । ‘दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम” इति । पञ्चम्यर्थ प्रेक्षा वा षष्ठ्यर्थप्रेक्षा वा, आः कारा- न्तम् । “परो निर्ऋत्या आचष्ट्व”-इति । चतुर्थ्यर्थ प्रेक्षा, ऐकारान्तम् । “परः संनिकर्षः संहिता” । पद प्रकृतिः संहिता । पद प्रकृतीनि सर्वचरणानां
१५० अ० १ पा० ६ ख० १ ।
पार्षदानि । अथापि यज्ञेदैवतेन बहवः प्रदेशा भवन्ति । तत् एतेन उपेक्षितव्यम् । ते चेद् ब्रूयु 'लिङ्गज्ञा अत्र स्मः' इति । "इन्द्रं न त्वा शवसा देवता वायुम्पृणन्ति" – इति । वायुलिङ्गञ्च इन्द्र- लिङ्गञ्च आग्नेये मन्त्रे । "अग्निरिव मन्यो त्विषितः सहस्वः"-इति । तथा अग्निर्मान्यवे मन्त्रे त्विषितः- ज्वलितः । 'त्विषिः'-इत्यपि-अस्य दीप्तिर्नाम भव- ति । अथापि ज्ञान प्रशंसा भवति, अज्ञान निन्दा च ॥ १ ॥ अनुवाद । और भी इस ( निरुक्त ) के बिना पद विभाग ( पाठ ) नहीं है, या हो सकता है । [ ज से– ] "अवसायं पद्धते रुद्र मृळः" [ ऋ० सं० ८, ८, २७, १ ] हे रुद्र ! पैरवाले अवस या अन्नके लिये सुखरूप हो । पद्धत् = पैरवाला, अवस = खाद्य, गोरूप, –जो पाथेय या पथिभोजन है । गत्यर्थक 'अव' धातुसे यह ( अवस ) नाम बनता है । इससे इसमें अवग्रह नहीं करते । "अवसायाश्वान्" [ १, ७, १८, १ ] हे इन्द्र! घोड़ोंको [ रथसे ] अलग करके । यहां 'षो' ( सा ) अन्तर्कमणि, धातु 'अव' उपसर्गके साथ विमोचन या छोड़ देने अर्थ में है । इससे यहां 'अव' और 'सा' का विभाग दिखानेके लिये अवग्रह या रुककर पाठ करते हैं । "दूतो निर्ऋत्या"... [ ऋ० सं० ८, ८, २३, १ ] हे देवगण ! निर्ऋतिका या निर्ऋति से ( कपोत ) दूत इस ( घरमें ) आया । यहां [ निर्ऋत्याः पदमें ] पञ्चमीके अर्थका ग्रहण अथवा षष्ठीके अर्थका ग्रहण होता है।
हिन्दी निरुक्त । १४१
'आः' कार अन्तम है। परा निर्ऋत्या आचक्ष्व" [ऋ० सं० ८, ८, २४, १] हे व्याधे ! तू अलग जा, निर्ऋति या मृत्युके लिये कह । यहां चतुर्थीके अर्थका ग्रहण है। [ निर्ऋत्यै ] ऐ कार अन्तमें है । वर्षोंका अत्यन्त सामीप्य संहिता होती है। पदोंकी प्रकृति या कारण संहिता है। अथवा पद रूप प्रकृतिसे संहिता (विकृति) है। सब शाखान्तरोंके प्रातिशाख्य या शिक्षा ग्रन्थ पदोंको ही संहितामें प्रकृति बताते हैं ।
और भी [प्रयोजन], यज्ञ कर्मके होते हुए देवताका लिङ्ग मन्त्रके बहुत स्थानोंमें प्रतीत होता है, जो कि इस निरुक्तसे ही निश्चय होने योग्य है। यदि वे [ याज्ञिक लोग ] कहें,-कि-हम लिङ्गके जाननेवाले हैं। [तो-] "इन्द्रं न त्वाः [ऋ० सं० ४, ५, ६, २] हे अग्ने ! तुझे देवता इन्द्रके समान और वायुके समान मानते हैं। इस अग्निके मन्त्रमें वायुका लिङ्ग और इन्द्रका लिङ्ग (बोधक) है। "अग्निरिव०" [ ऋ० सं० ८, ३, १६, २ ] हे मन्यो ! अग्निके समान दीप्तियुक्त होता हुआ सहन करनेवाला हो। वैसे ही यहां मन्युके मन्त्रमें अग्निका लिङ्ग है । 'त्विषित' नाम ज्वलितका है । 'त्विषि'- इसका भी दीप्ति नाम होता है।
और भी [निरुक्तका प्रयोजन।] वेदमैं भा ञ्ज्ञानको प्रशंसा होती है, और अञ्ज्ञानकी निन्दा ॥ १ ॥-
विशेष-मूलमें 'त्विषि रित्यप्यस्य दीप्तिर्नाम भवति' इसके स्थानमें 'त्विषि रित्यपि देप्तेर्नाम भवति' -ऐसा युक्त पाठ प्रतीत होता है। कारण 'त्विषि' यह भी दीप्तिका नाम है, यद्यपि दीप्ति नामोंमें पढा हुआ नहीं। ऐसे अथसे ही प्रकरणकी सिद्धि होती है।
अ० १ पा० ६ ख० १ । व्याख्या । शास्त्रके आरम्भके प्रयोजनका अधिकार या प्रकरण चला आता है, उसीमें दूसरा प्रयोजन यह कहा गया था कि—“इस निरुक्त शास्त्रके बिना मन्त्रोंमें अर्थका निश्चय नहीं हो सकता”। इसके विरुद्ध कौत्सने बहुत हेतुओंसे मन्त्रोंकी अनर्थकताका उपादन किया और आचार्यने उनके हेतुओंका खण्डन करके मन्त्रोंकी अर्थवत्ताका स्थापन किया। इस रीतिसे शास्त्रारम्भके प्रयोजन दिखानेका यह अभिप्राय है कि—शिष्यको बुद्धि किसो शब्दार्थके निर्णायक न्यायोंके परस्पर विरोधस्थलमें संकटमें न गिरकर सुखसे निर्णय कर ले। उसके अतिरिक्त इस शास्त्रके आरम्भका और प्रयोजन यह भी है कि—“इस शास्त्रके बिना मन्त्रोंमें पदविभागका परि ज्ञान भी नहीं हो सकता है” कि—‘इस प्रकारसे पद कहने चाहिये’ क्योंकि—अर्थके अधीन ही पद अवस्थित होते हैं। और अर्थका ज्ञान इस शास्त्रके बिना नहीं हो सकता। इससे सिद्ध हुआ कि—‘मन्त्रोंमें पदोंके विभागकी प्रसिद्धि भी इसी शास्त्रसे है’। “पदविभाग सब शाखाओंमें प्रसिद्ध है, इसलिये इसकी सत्ताको कोई किसी अवस्था में अस्वीकार नहीं कर सकता, और इसका (पदविभागका) मन्त्रोंकी अर्थवत्ताके बिना कोई प्रयोजन नहीं, तथा उस मन्त्रार्थका परिज्ञान निरुक्त शास्त्रके अधीन है, इसलिये पदविभागकी सार्थकताके लिये मन्त्र अर्थवान् हैं”—और उसके कारण निरुक्त शास्त्र अर्थवान् या सप्रयोजन है—ऐसा कोई आचार्य कहते हैं। ऐसी प्रतिज्ञा करके दिखाते हैं कि—जिन मन्त्रोंमें पदविभाग अनेक प्रकारसे हो सकता है वहां अर्थके परिज्ञान द्वारा ही पदोंके विभाग विशेषका निश्चय होता है। अर्थात् जैसा मन्त्रका उच्चारण है, वह कई प्रकारकी संधियोंसे संभव है। इसलिये वहां अर्थके
हिन्दी निरुक्तः । १४३ अतिरिक्त कोई अवलम्ब नहीं है कि—जिससे पदविभाग एक प्रकारसे स्थिर किया जाय । मयो भूर्वातो अभिवातूखा ऊर्जस्वतीरोषधी रारि शन्ताम् । पीवस्वतीर्जीवधन्यः पिबन्त्व वसाय पद्धते रुद्रमृल ॥ ( ऋ० सं० ८, ८, २७, १ ) सुचरो नाम गौतमः समयोभूरित्यृचा त्रिष्टुभः पूर्वै स्त्रिभिः पादैः गवामाशिष माशास्योत्तमे न ता सामेवच रुद्रात्सुखमयाचत । गवामुपस्थाने विनियुक्ता । ( भ० दु० ) मयोभूरिति चतुर्ऋ चमष्टादशं सूक्तं कक्षीवद् गोत्रस्य शबरस्यार्षं त्रैष्टुभं गोदेवत्यम् ।” घासाय वनंप्रतिष्ठमानागाः आदितोद्वाभ्यामभिमन्त्रणीयाः । ( सा० भा० ) आरोग्यका उत्पन्न करनेवाला पश्चिम दिशाका वायु इन गौओंके सामने चले और ये गौवें उस सुखकारी एवम् अनुद्वेग या अभय प्रद वायुके स्पर्शसे घने रसवालो ओषधियोंको चरें तथा सुख- कारी ओषधियोंका स्वाद ले लेकर अपने वाञ्छित समयमें जीवोंको प्राण देनेवाले जलको पीवें, और ओषधि सहित पान किया हुआ वह जल इन गौओंके उदरकोष्ठमें रस-शोणित-मांस-मेदा-मज्जा तथा अस्थिके रूपसे पके, एवम् ये मोटी बलवती बहुत दूधवाली हो जायें, हे रुद्र ! तुम भी इस पाद् (पैर) वाले गोरूप अवस नाम अन्नके लिये सुखरूप हो, अर्थात् इनकी हिंसा न कर ।
१४४ अ० १ पा० ६ ख० १ । दूसरा उदाहरण— "अव॑सायाश्वा॒न्" (ऋ० सं० १, ७, १८, १) एतया॑ नि॒ष्टुभा कुत्स आङ्गिरस इन्द्रं॑ तुष्टाव । कुत्स आङ्गिरस इन्द्रकी स्तुति करता है कि—हे इन्द्र ! तुम्हारे बैठनेके लिये मैंने जो यह स्थान किया है, तू उस पर आकर निश्चय ही बैठ, अर्थात् जिस प्रकार रस्सियोंसे बंधा तथा शब्द करता हुआ घोड़ा अपने स्थानमें स्थित होता है, उसी प्रकार मेरी स्तुतियोंसे हर्ष शब्दोंको करते हुए मेरे बिछाये हुए कुशरूप आसन पर तू दिन और रात्रिमें चलनेवालोंसे अधिक चलनेवाले अपने घोड़ोंको रथसे अलग कर रस्सियोंसे मुक्त कर, तथा उन्हें चारा देकर, अनन्तर स्वस्थ वा निश्चिन्त होकर बैठ। किन्तु तुम्हारे इस यजनकालमें हमारे लिये विघ्न उपस्थित न कर । उक्त दोनों ही ऋचाओंमें “अवसाय" पद आता है, किन्तु पदकार पहिली ऋचामें इसको अन्नके पर्याय अदन्त अवस नामका चतुर्थ्यन्त पद समझ कर बिना अवग्रह किये पढ़ते हैं। तथा दूसरी ऋचामें 'अव' उपसर्ग 'षो' अन्तकर्मणि धातु और 'क्त्वा' प्रत्ययका समस्त पद समझकर 'अव ३ साय' ऐसा अवग्रह पूर्वक पढ़ते हैं। भाव यह है कि-वेदके संहिता पाठके समान मन्त्रोंका एक पद पाठ भी है, जिसमें ऋषियोंने मन्त्रोंके अर्थको सुखपूर्वक जानने एवम् उसके अन्यथा न होनेके लिये आनुपूर्वीसे मन्त्रगत सब पद १—"योनिष्ट इन्द्र निषदे अकारितमा निषीद् स्वानोनावौ । विमुच्यावयोऽवसायाश्वान् दोषा वस्तोर्वहीयसः प्रपित्वे ॥" (ऋ० सं० १, ७, १८, १)
हिन्दी निरुक्त । १७५
अलग अलग पढ़े हैं । मन्त्रके स्वरूपमें जैसा संहिता पाठ प्रामाणिक है, वैसा ही पद-ज्ञानके लिये पद पाठ भी मान्य हैं । ऋषियोंने उसमें अभ्रान्तिके लिये यहां तक विशेष कर दिया है कि—जहाँ दो या बहुत पदोंका समास या अविलम्बसे उच्चारण है, उनको आधी मात्राके कालसे विलम्बित कर जिसे अवग्रह कहते हैं पढ़ा है । अर्थात् यद्यपि व्याकरणमें जहाँ 'राजपुरुषः' इत्यादि पदोंमें समास हो जाता है, वहाँ उन समस्त पदोंके उच्चारणमें परस्पर एकपदके अक्षरोंका नियम माना जाता है, जिससे कि-वह अलग अलग प्रतीत न होकर अनेक होते हुए भी एक पद प्रतीत हों, तथापि वेदार्थमें ऐसा मानने पर अनेक स्थानोंमें भ्रान्तिका अधिक संभव है, इसलिये वहां उस धर्मके असाधारण या अद्वितीय आधार स्तम्भकी रक्षाके लिये उस नियमको भङ्गकर अवग्रह अर्थात् विच्छेदपाठ स्वीकार किया है, जितनेसे कि-उन पदोंकी पृथक्ता प्रतीत हो सके, प्रयोजन यह है कि—उस पाठमें स्वतन्त्र स्वतन्त्र पद . जिस विलम्बसे पढ़े जाते हैं, उनकी अपेक्षा उनमें अल्पविलंब ही किया जाता है, उससे समासका धर्म और पदोंकी पृथक्ता दोनों ही कार्य हो जाते हैं । उसी चालके अनुसार उक्त दोनों ऋचा- ओंमें अर्थभेदके जनानेके लिये पहिले मन्त्रमें अवग्रहका अभाव और दूसरेमें अवग्रह रखा गया है, किन्तु यह अवग्रह अर्थज्ञान पूर्वक किया जा सकता है, और वह अर्थज्ञान एकमात्र निरुक्त शास्त्रके अधीन है, इसलिये निरुक्त शास्त्रके बिना पदपाठ भी सिद्ध नहीं होता, अतः निरुक्त शास्त्रका यह तृतीय प्रयोजन है, जो कि इससे वेदका पदपाठ सिद्ध होता है । पहिले मन्त्रमें 'अवसाय' पदका 'अन्नके लिये'—यह अर्थ होता है, और दूसरेमें 'छुड़ा करके' या 'अलग करके' अर्थ होता है ।
१४६ अ० १ पा० ६ ख० १. यद्यपि उक्त उदाहरणमें अवग्रहको लेकर जो फल दिखाया है, वह निरुक्तका ही है, तथापि वह पदके अभ्यन्तरके सम्बन्धको लेकर ही है, पदविभागमें कोई विशेष नहीं आया, जिससे कि— प्रतिज्ञाके अनुसार निरुक्तका प्रयोजन पदविभाग समझा जाता, इसलिये अब ऐसा उदाहरण देते हैं जिनमें दो पदोंके मध्यमें सन्धिमात्रसे विशेष होता है और वह निरुक्त शास्त्रका व्युत्पत्तिसे ही प्रतीत होता है। जैसे कि = “दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम” (ऋ० सं० ८, ८, २३, १) “परो निर्ऋत्या आचक्ष्व” (ऋ० सं० ८, ८, २२, १) प्रथम उदाहरणमें ‘निर्ऋत्याः+इदम्’ तथा ‘निर्ऋत्यै+इदम्’ इस प्रकारसे दो तरह पदविभाग हो सकता है, क्योंकि—प्रथम स्थानमें रुत्व-यत्व और यलोप होनेसे, और दूसरे स्थानमें ‘आय् आदेश और यलोप होनेसे “निर्ऋत्या इदमाजगाम” ऐसा यथोक्त वाक्य बन जाता है किन्तु एक पक्षका स्थिर करना अर्थापेक्ष होनेसे निरुक्तके अधीन है, जिससे प्रतीत होगा कि यह पञ्चमी या षष्ठी विभक्ति है चतुर्थी नहीं। इस मन्त्रका कपोतशान्तिके लिये कपोत पद हरणमें विनियोग है। इसमें देवताओंसे प्रार्थना की गई है कि—हे देवगण ! निर्ऋति (मृत्यु) के निजका दूत यह कबूतर हमारे घरमें आकर बैठा है, जो कि-हमारे पूर्वजन्मके किये हुए पाप कर्मके विपाकको अपने घुंसले या दीवारों पर पदचिन्होंसे सूचित करता है, आप उसके दूर करनेमें समर्थ हैं, इसीसे हम तुम्हारी पूजा करते हैं। इसके अतिरिक्त इस अपशकुनकी शान्तिके लिये हम निष्कृति या शान्ति भी करेंगे। इसलिये हम कहते हैं कि - तुम्हारे प्रसाद और हमारे तपसे हमारे मनुष्यों और पशुओंम कल्याण रहे।
हिन्दी निरुक्त । १४७ इसी प्रकार दूसरे उदाहरणमें भी “निर्ऋत्यै+आवक्ष्व” तथा निर्ऋत्याः+आवक्ष्व” इन दोनों विभागोंसे ही सन्धिके नियमोंसे “निर्ऋत्या आवक्ष्व” यह यथोक्त वाक्य सिद्ध हो जाता है, किन्तु निरुक्त शास्त्रकी रीतिसे निर्णय हो जाता है कि—प्रथम पदविभाग ही ठीक है दूसरा नहीं। यह दूसरा मन्त्र दुःस्वप्नकी शान्तिके लिये पढ़ा जाता है। इसमें कहा गया है कि— हे मनसस्पते ! मृत्यो ! या व्याधे ! तू हमसे अलग हो जा । और अलग होकर भी, हमारे पास ही मत ठहर, किन्तु दूर जाकर रह । तथा दूर जाकर भी ऐसा दूर रह कि—फिर हमारी ओर तेरा आना न हो । और यह कि—यहांसे दूर होकर जिसका तू दूत है, उस निर्ऋतिसे बहुत प्रकारसे कह दे कि—“वह मुमूर्षु या मरनेवाला नहीं है ।” क्योंकि—मेरा मन जीते हुएके समान स्वच्छ है। मेरी सब इन्द्रियां सूर्यनारायणके प्रकाशमें यथार्थ ज्ञानको उत्पन्न करती हैं, जिस पुरुषका मृत्यु निकट आ जाता है, उसका अनुभव प्रकाशमें भी ठीक नहीं होता, जो कुछ देखता है, अन्यथा अन्यथा ही देखता है। संहिता और पद । स्वर तथा उनके सहारे पर लगे हुए व्यञ्जनोंका १ जो परस्पर अत्यन्त सामीप्य उसको संहिता १ कहते हैं। इस संहिता और नाम-आख्यात आदि रूप पदोंके सम्बन्धमें दो मत हैं, कोई कहते हैं कि—संहितासे पद होते हैं, और कोई कहते हैं कि—पदोंसे संहिता बनती है। पहिले मतमें संहिता प्रकृति (कारण) और पद विकृति (विकार या कार्य) हैं। एवम् दूसरे मतमें पद प्रकृति और संहिता विकृति है। १—परः संनिकर्षः संहिता। (पा० १. ४. १०९)
हिन्दी निरुक्त । १४६ प्रधानताका निर्णय करके,उसी उसी देवताके कर्ममें उस उस मन्त्रके विनियोगका निर्धार करना । यद्यपि पूर्वमीमांसा दर्शनके ३ य अध्यायके द्वितीय पादमें मन्त्रोंके विनियोगोंका निर्णय किया है, जैसे कि—७वें अधि- करणमे' "इन्द्राग्नी रोचन" इत्यादि याज्या-अनुवाक्या नामक मन्त्र काम्य ऐन्द्राग्न इष्टिमें ही विनियुक्त होते हैं, किन्तु—नित्यमे नहीं । तथा ८ वें अधिकरणमें "आग्नेय्याऽग्नीध्रमुपतिष्ठते" "ऐन्द्र्या सदः" "वैष्णव्या हविर्धानम्" इन विधियोंमें बताया है, कि--'ज्योतिष्टोम यज्ञमे आग्नेयी ( अग्नि देवताकी ) ऋचासे आग्नीध्र नामक मण्डपका उपस्थान करना। एवम् ऐन्द्री ( इन्द्र देवताकी ) ऋचासे सदस् नाम मण्डपका तथा वैष्णवी (विष्णु, देवताको ) ऋचासे हविर्धान नाम मण्डपका उपस्थान करना।' यहां ज्योतिष्टोमके मन्त्रकाण्डोय तथा कर्मकाण्डोय प्रकरणमें जो जो अग्न्यादि देवताओंकी ऋचा पढ़ी हुई हैं, वे ही ऋचा उस उस मण्डपके उपस्थानमे' विनियुक्त होती हैं, किन्तु समस्त ऋग्वेदमें जितनी इन देवताओंकी ऋचा हैं, वे नहीं। इत्यादि रूपसे मन्त्रोंके अर्थाभिधान सामर्थ्य रूप लिङ्ग, समाख्या तथा प्रकरण आदि प्रमाणों के द्वारा मन्त्रोंके विनियोगोंका निर्णय किया है, तथापि "इन्द्रं नत्वा शवसा देवता वायु' पृणन्ति" (ऋ० सं० ४, ५, ६, २,) इस आग्नेय ( अग्नि देवताके ) मन्त्रमें मीमांसक निर्णय नहीं कर सकते कि—'अग्नि देवताका है, तो इन्द्र और वायुका क्यों नहीं ? क्योंकि—इन्द्र और वायु देवताके भी नाम इस मन्त्रमें हैं। उनके दर्शनमे बहु देवताओंके संकरस्थलमें निर्णयका उपाय नहीं है और निरुक्त शास्त्रमे' यह निर्णय किया है कि—'यहां कौनसा देवताका नाम प्रधान है और कौनसा गौण ।' यदि याज्ञिक या मीमांसक लोग निरुक्त शास्त्रकी उपेक्षा करके
१५० अ० १ पा० ६ ख० १ । बलपूर्वक लिङ्गके सहारे पर मंत्रों का विनियोग करें, तो एक मन्त्रमे' आनेवाले अनेक देवताओं के नामो'के गुण-प्रधान भावको न जाननेसे, वे अन्य देवताके 'मन्त्रको अन्य देवताके कर्ममें लगा दे'गे, जिससे कि विधि विरुद्ध करनेसे कर्मकी समृद्धि न होगी, इतना ही नहीं बल्कि—दुष्ट यज्ञसे यजमानकी हानि भी होगी। इसलिये निरुक्त शास्त्र सर्वथा जानने योग्य है। इस प्रकार देवताके परिज्ञान द्वारा पुरुषके प्रति निरुक्त शास्त्र विशिष्ट उपकारका करनेवाला है, इसीसे यह आरम्भ करने योग्य है। “त्वां हि मन्द्रतम मर्कशोकैर्ववृमहे महिनः श्रोष्यग्ने । इन्द्रं नत्वा शवसा देवता वायुं पृक्षन्ति राधसानृतमाः ॥” ऋ० सं० ४, ५, ६. २) भारद्वाजस्यार्षम् । आग्नेयी। प्रातरनुवाकाश्वि- नयोर्विनियोगः । हे अग्ने ! सब देवताओंमें अधिक कोमल हृदयवाले तुम्हीं हो, इस कारण हम ब्रह्मचर्य व्रतपूर्वक अध्ययन किए हुए वीर्ययुक्त मंत्रों के द्वारा तुम्हारा ही सेवन करते हैं। तुम हमारे मन्त्रों से किये हुए स्तोत्रको सुनो। तुम केवल हमारे ही पूज्य नहीं हो, अपितु देवता और लोकमें जो धन-बलसे सम्पन्न प्रतिष्ठित मनुष्य हैं, वे सभी इन्द्र तथा वायुके समान तुम्हारी ही पूजा करते हैं। इस प्रकार यह मन्त्र आग्नेय है, लिङ्गमात्रके दर्शनसे प्रधान देवताके जाने बिना इन्द्र या वायु देवताके कर्ममें विनियुक्त होकर यह मन्त्र कर्त्ताके वांछितको पूर्ण करनेके लिये समर्थ न होगा और कर्मके विगुण होनेके कारण प्रत्युत कर्त्ताका अपध्वंस करेगा। इसलिये मन्त्र देवताके निश्चय ज्ञानके लिये निरुक्त ज्ञातव्य है।
हिन्दी निरुक्त । १५१ दूसरा उदाहरण— “अग्निरिव मन्यो त्विषितः सहस्व” इति । ( ऋ० सं० ८, ३, १६, २ ) जिस प्रकार पूर्वोक्त आग्नेय मन्त्रमें वायु और इन्द्र देवताका लिङ्ग है, वैसे ही इस मन्य देवताके मंत्रमें भी अग्निका भी नैघण्टुक वा गौण लिङ्ग है । ऐसे ऐसे अनेक देवताओंके लिङ्ग संकटस्थलोंमें निरुक्त न पढ़नेवालोंको जिनको कि-मंत्रोंके व्याख्यानके नियम विदित नहीं हैं, देवता तत्वका निर्धारण करना कठिन है । इससे मीमांसकोंका ऐसा कहना कि—“हम लिङ्गके ज्ञाता हैं, हमें निरुक्तसे कुछ प्रयोजन नहीं है” यह अयुक्त है । त्विषि नाम दीप्तिका है । यद्यपि यह दीप्तिके नामोंमें पठित नहीं है, किन्तु यह नियम नहीं है कि—“जो वहां जिस अर्थमें पड़े हैं, वे ही उस अर्थ के वाचक हैं” अपितु और और शब्द भी उन उन अर्थोंमें आसकते हैं । ५वां प्रयोजन । शास्त्रमें ज्ञानकी प्रशंसा और अज्ञानकी निन्दा है । ऐसी अवस्थामें “हम अनिन्द्य और प्रशंसनीय हों” इसलिये निरुक्त शास्त्र ज्ञातव्य है । क्योंकि—निरुक्तशास्त्रसे मन्त्रोंके अध्यात्म, अधिदैवत, तथा अधियज्ञ सब अर्थ जाने जाते हैं, और वे अर्थ, परिज्ञात होकर मनुष्यके उत्तम कल्याणके लिये होते हैं । इस रीतिसे यह शास्त्र अखिल पुरुषार्थोंके उपकारमें समर्थ है, इस प्रयोजनसे इसका आरम्भ न्यायसे संगत है । ( प्रमाण )—कहां ज्ञानकी प्रशंसा तथा अज्ञानकी निन्दा है— ( खं० २ ) स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम् । योऽर्थज्ञ॒इत्सकलं भद्रमश्नुते
१५२ अ० १ पा० ६ ख० २ । नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा । यद्गृहीतमवि- ज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते । अनग्नाविवशुष्कैधो न तज्ज्वलतिकर्हिचित् । (शिष्टाचारस्मृतिः) लोक और वेदमें। लोकमें जो कोई विद्वान् होता है, वह पुण्यफलार्थी जनोंसे पूजित होता है। यह तो प्रत्यक्षमें देखा ही जाता है। किन्तु शास्त्रमें भी ऊपरिलिखित वाक्य है। जैसे—वृक्ष अपने पत्र-पुष्प-फलोंके धारण करनेका ही भागी है, किंतु उनके, गन्ध-रस-रूप तथा स्पर्शके उपभोग सुखोंसे संयुक्त नहीं होता। ऐसे ही वह पुरुष है, जिसने वेद पढ़कर उसका अर्थ नहीं जाना। जो पुरुष अर्थ को भी जानता है, किन्तु केवल पाठ- मात्रका पढ़नेवाला नहीं है, वह पुरुष ही सकल (अखण्डित) कल्याणको भोगता है। और क्या ? इस लोकमें शिष्ट पुरुषोंका पूज्य होकर अन्तमें स्वर्गमें जाता है, जहां दुःखका नाममात्र भी नहीं है। वह पुरुष ऐसे स्थानमें क्यों जाता है ? स्वर्गमें जानेके विरोधी जितने पाप हैं वे सब उसके ज्ञानसे नष्ट हो जाते हैं। इससे वह स्वर्गमें जाता है। जैसा कि कहा है-- “नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।” अर्थ--'ज्ञानके समान इस संसारमें और कुछ भी पवित्र नहीं है। अथवा स्थाणु नाम गधेका है, वह जिस प्रकार चन्दनभारको ढोता है, किन्तु उसके गन्धका उपभोग नहीं करता ऐसे ही वह पुरुष है जो अर्थ को नहीं जानता। अज्ञानकी निन्दा-- जो गुरुमुखसे अर्थ के बिना शब्दमात्रसे पढ़ता है, तथा नित्य काल ही उच्चारणमात्र करता रहता है, किन्तु कभी उसके अर्थ का
हिन्दी निरुक्त । १५३ विचार नहीं करता, जिस प्रकार सूखा काष्ठ अग्निसे अन्यत्र कभी नहीं जलता, ऐसे ही वह पुरुष वेदाध्ययनके भारमात्रसे सम्बन्ध रखता है किन्तु उसके फलसे नहीं । इससे फलित यह हुआ कि--परिज्ञान, पुरुषको श्रेय तथा अभ्युदयसे संयुक्त करता है, इसलिये निरुक्त शास्त्र आरम्भ करने योग्य है । “स्थाणु” और “अर्थ” शब्दका निर्वचन । ( नि० ) स्थाणुः तिष्ठतेः । अर्थः ऋत्तेः । अरणा- स्थोवा ॥ २ ॥ स्थाणुः-क्योंकि यह सदा ही स्थित या खड़ा रहता है, किन्तु कभी बैठता नहीं। इसलिये यह 'स्थाणु' है। ष्ठा (स्था ) गति निवृत्तौ धातुसे बनता है । अर्थः-( १ ) क्योंकि-अर्थी लोग इसे सदा ही प्राप्त करते रहते हैं, इससे यह अर्थ कहाता है। ऋ गतौ धातुसे बनता है। - ( २ ) जब इस (अर्थ) का स्वामी इस लोकसे परलोकको जाता है, तब यह उसके साथ न जाकर इसी लोकमें रह जाता है, इससे यह रुपये अशरफी अर्थ कहाते हैं। इसके सादृश्यसे शब्दका अर्थ भी अर्थ कहलाता है। ( सं० ३ ) “उतत्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुतत्वः शृण्वन्न शृणो- त्येनाम् । उतोत्वस्मै तन्वं विसस्रे जायेव पत्यउ- शती सुवासाः । अप्येकः पश्य न्, न पश्यति वाचम्, अपिच शृ- ण्वन् न शृणोति एनाम् ।—इति अविद्वांसमाह २०