भारतकोश
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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

३७ सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०९

३७ सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०९ इदमेव च परीक्ष्यते—किमेकप्रत्ययोऽणुसञ्चयविषयः, आहोस्वन्नेति ? अणुसञ्चय एव सेनावनाङ्गानि । न च परीक्ष्यमाणमुदाहरणमिति युक्तम्; साध्यत्वादिति । दृष्टमिति चेत् ? न; तद्विषयस्य परीक्षोपपत्तेः । यदपि मन्यते—दृष्टमिदं सेनावनाङ्गानां पृथक्त्वस्याग्रहणादभेदेनैकमिति ग्रहणम्, न च दृष्टं शक्यं प्रत्या- ख्यातुमिति ? तच्च नैवम्; तद्विषयस्य परीक्षोपपत्तेः । दर्शनविषय एवायं परी- क्ष्यते । योऽयमेकमिति प्रत्ययो दृश्यते, स परीक्ष्यते—किं द्रव्यान्तरविषयो वा, अथाणुसञ्चयविषय इति ? अत्र दर्शनमन्यतरस्य साधकं न भवति । नानाभावे चाणूनां पृथक्त्वस्याग्रहणादभेदेनैकमिति ग्रहणम् अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययः, यथा स्थाणौ पुरुष इति । ततः किम् ? अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययस्य प्रधानापेक्षित्वात् प्रधानसिद्धिः । स्थाणौ पुरुष इति प्रत्ययस्य किं प्रधानम्¹ ? योऽसौ पुरुषे पुरुषप्रत्ययस्त- इस प्रसङ्ग में यही परीक्ष्य है कि क्या अणुसमूह 'एक' इस बुद्धि का विषय बनता है ? या नहीं ? सेनाङ्ग या वनाङ्ग वाले उदाहरण भी अणुसमूह की तरह ही समझें । अणुसमूह के समान वे भी यहाँ, साध्य होने से परीक्षा के विषय हैं, उन्हें, उदाहरणरूप में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता । उनका वैसा ( अभेदेन ) प्रत्यक्ष होता है—यह नहीं कह सकते; क्योंकि वह प्रत्यक्ष परीक्षा ( संशय ) का विषय बन सकता है । यह जो मानते हो—"सेनाङ्ग या वनाङ्गों का पार्थक्य गृहीत न होने से 'अभेदेन एक हैं' ऐसा प्रत्यक्ष होता है, एक बार कृतप्रत्यक्ष का प्रत्याख्यान हो नहीं सकता" ? यह बात भी उचित नहीं है; क्योंकि उसी प्रश्न पर तो वहाँ विचार हो रहा है कि दर्शनविषय कौन बन सकता है । 'एक—इस बुद्धि का विषय कौन बने—क्या उस बुद्धि का विषय द्रव्यान्तर है या वही अणुसमूह ?' इस परीक्षा के अवसर पर किसी एक ( सेना इत्यादि ) का उदाहरण प्रत्यक्षसाधक रूप से प्रयुक्त नहीं किया जा सकता । अणुओं के नाना होने पर भी पृथक्त्व के गृहीत न होने से 'अभेदेन एक' यह ज्ञान तो वैसा ही है जैसा तदभाववान् में सत्ता का आरोपित ज्ञान, जैसे स्थाणु में पुरुषत्व का आरोप । इससे क्या नुकसान ( अनिष्ट ) होगा ? 'अतत् में तत् का सत्ताज्ञान' के प्रधानापेक्षी होने से प्रधान ( अणुसमूह में अभेदेन एकत्व ) की सिद्धि होने लगेगी । 'स्थाणु में पुरुष'—इस ज्ञान में प्रधान कौन है ? यह जो 'पुरुष' में पुरुषबुद्धि है उसके रहते पुरुषसामान्य का ग्रहण हो कर 'यह पुरुष है' यह ज्ञान स्थाणु में भी होता १. येन प्रत्ययेन विपरीतारोपः सम्पाद्यते सादृश्यवशात् तत्प्रधानम्, यथा—स्थाणौ पुरुषप्रत्ययस्य पुरुषे पुरुषप्रत्ययः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

११० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० स्मिन् सति पुरुषसामान्यग्रहणात् स्थाणौ पुरुषोऽयमिति । एवं नानाभूतेष्वेक- मिति सामान्यग्रहणात् प्रधाने सति भवितुमर्हति । प्रधानं च सर्वस्याग्रहणादिति नोपपद्यते । तस्मादभिन्न एवायमभेदप्रत्यय एकमिति । इन्द्रियान्तरविषयेष्वभेदप्रत्ययः प्रधानमिति चेद्, न; विशेषहेत्वभावात् दृष्टान्ताव्यवस्था । श्रोत्रादिविषयेषु शब्दादिष्वभिन्नेष्वेकप्रत्ययः प्रधानमने- कस्मिन्नेकप्रत्ययस्येति । एवं च सति दृष्टान्तोपादानं न व्यवतिष्ठते; विशेषहेत्व- भावात् । अणुषु सञ्चितेष्वेकप्रत्ययः किमतस्मिंस्तदिति प्रत्ययः स्थाणौ पुरुष- प्रत्ययवत् ? अथाथंस्य तथाभावात्तस्मिंस्तदिति प्रत्ययः, यथा—शब्दस्यैकत्वादेकः शब्द इति ? विशेषहेतुपरिग्रहणमन्तरेण दृष्टान्तौ संशयमापादयत इति । कुम्भ- वत् सञ्चयमात्रं गन्धादयोऽपीत्यनुदाहरणं गन्धादय इति । एवं परिमाणसंयोगस्पन्दजातिविशेषप्रत्ययानप्यनुयोक्तव्यः, तेषु चैवं प्रसङ्ग इति । १. एकत्वबुद्धिस्तस्मिंस्तदिति इति विशेषहेतुर्महदिति प्रत्ययेन सामाना- हें । इसी प्रकार 'अनेकों में एक'—इस.सामान्यग्रहण से कोई प्रधान हो तो अनेक में एकत्व गृहीत हो सकता है, पर अणुओं के नाना होने से सब का ग्रहण न हो पाने के कारण उनमें प्रधानत्व उपपन्न नहीं हो पा रहा है। अतः अभिन्न में अभेद का प्रत्यय ही, 'एक' ऐसी बुद्धि हैं ! यदि यह कहो कि श्रवणादि इन्द्रियान्तर के विषयों (शब्दादि) में अभेदज्ञान को ही यहाँ प्रधान मान लिया जाये ? तो यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि विशेष हेतु न होने से इस दृष्टान्त की अव्यवस्था बनेगी । तात्पर्य यह है कि श्रोत्रादि के प्रत्यक्षविषया'शब्दादि अभिन्न में एक प्रत्यय का यहाँ (चाक्षुषपरीक्षाप्रसङ्ग में) प्राधान्येन उपन्यास करना— युक्तियुक्त नहीं है; क्योंकि आपका यह दृष्टान्त विशेष हेतु न होने से स्वयं अव्यवस्थित है । इकट्ठे अणुओं में एकबुद्धि क्या 'अतत् में तत्ता' ज्ञान है, जैसे—स्थाणु में पुरुष का ज्ञान ? या अर्थ ही वैसा होने से स्वसत्ताज्ञान, जैसे एक शब्द होने से उसमें एकत्वबुद्धि ? यों दोनों ही तरह से, विशेष हेतु न मिलने के कारण आपके दृष्टान्त संशयग्रस्त हैं । जैसे—'घट की तरह गन्धादि भी अणुसञ्चय मात्र हैं' इसमें गन्धादि उदाहरण संशायापन्न है; क्योंकि उनकी सञ्चयता भी घटादि की तरह साध्य है । इस प्रसङ्ग में इस अणुसमूहवादी से—एकवृद्धि की तरह परिमाण, संयोग, चेष्टा, जाति-विशेष, आदि के ज्ञान को लेकर भी प्रश्न करना चाहिये । १. तत् में एकत्वप्रत्यय विशेष हेतु है तो इस साध्य में 'महत्' ज्ञान से सामानाधि- करण्य होने के कारण 'यह एक हैं' तथा 'महान् हैं'—ये दोनों ज्ञान एक ही विषय तथा

३७. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १११

३७. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १११ धिकरणयात् । एकमिदं महच्चेति एकविषयौ प्रत्ययौ समानाधिकरणौ भवतः, तेन विज्ञायते—यन्महत्तदेकमिति । अणुसमूहातिशयग्रहणं महत्प्रत्यय इति चेत् ? सोऽयममहत्सु अणुषु महत्प्रत्ययोऽतस्मिंस्तदिति प्रत्ययो भवतीति । किं चातः ? अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययस्य प्रधानापेक्षित्वात् प्रधानसिद्धिरिति भवितव्यं महत्येव महत्प्रत्ययेनेति । अणुः शब्दो महानिति च व्यवसायात् प्रधानसिद्धिरिति चेत् ? न; मन्द- तीव्रताग्रहणमियत्तानवधारणाद्, यथा द्रव्ये । अणुः शब्दोऽल्पो मन्द इत्येतस्य ग्रहणं महान् शब्दः पटुस्तीव्र इत्येतस्य ग्रहणम् । कस्मात् ? इयत्तानवधारणात् । न ह्ययम् 'महान् शब्दः' इति व्यवस्यन् 'इयानयम्' इत्यवधारयति, यथा बदरा- मलकबिल्वादिनी । २. संयुक्ते इमे इति च द्वित्वसमानाश्रयप्राप्तिग्रहणम् । द्वौ समुदायावाश्रयः संयोगस्येति चेत्—कोऽयं समुदायः ? प्राप्तिरनेकस्य, अनेका वा प्राप्तिरेकस्य समुदाय इति चेत् ? प्राप्तेरग्रहणं प्राप्त्याश्रितायाः । संयुक्ते इमे वस्तुनी इति नात्र द्वे प्राप्ती संयुक्ते गृह्येते । समान अधिकरण में हो रहे हैं। इससे ज्ञात होता है कि 'जो महान् है वही एक हैं' । यदि यह कहो कि अणुसमूह का अतिशय ( आधिक्य ) बोधन के लिए यहाँ मह- च्छब्द का प्रयोग है ? तो यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि तब यह अमहान् ( लघु ) अणुओं में महत्त्व बतलाना 'अतत् में तत्ता' बोधन (आरोप) होगा, वास्तविक नहीं। इससे अनिष्ट यह होगा कि 'अतत् में तत्ता' ज्ञान के प्रधानापेक्षी होने से प्रधान की सिद्धि हुआ करती है, अतः 'महत्' का प्रत्यय 'महत्' में ही होगा, द्रव्यान्तर ( अणु ) में नहीं। 'शब्द अणु भी है हैं महान् भो हैं'—ऐसा व्यवसाय होने से शब्द में प्रधान की सिद्धि हो जायेगी ? शब्द में अणुता, तीव्रता, पटुता आदि परिमाणविशेष का ज्ञान 'इयत्ता' का निश्चय न होने से नहीं होता, जैसा द्रव्य में हो जाता है। इयत्तानिश्चय न होने से 'शब्द अणु है, अल्प है, मन्द हैं'—यह ज्ञान तथा 'शब्द महान् है, तीव्र हैं'—यह ज्ञान नहीं होता । प्रयोक्ता पुरुष 'यह महान् शब्द हैं'—ऐसा निश्चय करता हुआ 'यह इतना बड़ा हैं'— ऐसा अवधारण नहीं कर पाता, जैसा बेर आमला-आदि फलों के विषय में कर लेता है । २. 'ये दोनों संयुक्त हैं'—यह संयोग-ज्ञान भी तभी बन सकता है जब द्वित्व के समान आश्रय में वह हो । पूर्वपक्षी यदि यह कहे—दो समुदाय इस संयोग के आश्रय हैं, तो उनसे हम पूछते हैं कि यह समुदाय कौन है ? क्या अनेक का एक संयोग या एक में अनेक संयोग ? तो संयोगाश्रित संयोग का ग्रहण नहीं हुआ करता । 'ये दोनों वस्तु संयुक्त होकर हैं'—इन ज्ञान में दो संयोग संयुक्त में गृहीत नहीं होते ।

११२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० अनेकसमूहः समुदाय इति चेद्, न; द्वित्वेन समानाधिकरणस्य ग्रहणात् । द्वाविमौ संयुक्तावर्थाविति ग्रहणे सति नानेकसमूहाश्रयः संयोगो गृह्यते । न च द्वयोरण्वोर्ग्रहणमस्ति । तस्मान्महती द्वित्वाश्रयभूते द्रव्ये संयोगस्य स्थानमिति । ३. प्रत्यासत्तिः प्रतीघातावसाना संयोगो नार्थान्तरमिति चेत् ? न; अर्थान्तर- हेतुत्वात् संयोगस्य । शब्दरूपादिस्यन्दनां हेतुः संयोगः । नच द्रव्ययोर्गुणान्त- रोपजनन मन्तरेण शब्दे रूपादिषु स्पन्दे च कारणत्वं गृह्यते तस्माद् गुणान्तरम्, प्रत्ययविषयश्चार्थान्तरं तत्प्रतिषेधो वा-कुण्डली गुरुः, अकुण्डलश्छात्र इति । संयोगबुद्धेश्च यद्यर्थान्तरं न विषयः, अर्थान्तरप्रतिषेधस्तर्हि विषयः ? तत्र प्रति- षिध्यमानवचनम् । ‘संयुक्ते द्रव्ये' इति यदर्थान्तरमन्यत्र दृष्टमिह प्रतिषिध्यते, तद्वक्तव्यमिति । द्वयोर्महतोराश्रितस्य ग्रहणान्नाण्वाश्रय इति । अनेक संयोगसमूह को समुदाय मान लें ? नहीं मान सकते; क्योंकि युक्त द्वित्व से समानाधिकरणत्व का ही संयोग में ग्रहण कर पाता है, 'ये दो अर्थ ( घट पट ) संयुक्त हैं—इस ज्ञान में अनेकसमूह में संयोग गृहीत नहीं होता ! ओर फिर दो अणु का तो ( अतीन्द्रिय होने से ) ज्ञान भी नहीं हो पाता । अतः निष्कर्ष यह निकला कि द्वित्वा- श्रयभूत महान् द्रव्य में ही संयोग बन सकता है । ३. अवरोध ( रोक ) समाप्त होकर समीप आ जाना ही संयोग है, इसके अतिरिक्त यह कुछ नहीं ? —ऐसा कहना भी उचित नहीं; क्योंकि संयोग अर्थान्तर का हेतु हैं, न कि स्वयं अर्थान्तर । संयोग शब्द, रूप आदि तथा स्पन्द का हेतु हैं। दो द्रव्यों में गुण- विशेष की उत्पत्ति के बिना, शब्द, रूप तथा स्पन्द निरूपित कारणत्व ( जनकत्व ) नहीं गृहीत हो सकता, अतः यह गुणान्तर है । इस अर्थान्तर का या उसके प्रतिषेध का प्रत्यक्ष भी होता है, जैसे 'गुरु कुण्डल धारण किये हुए हैं' 'छात्र कुण्डल धारण किये हुए नहीं हैं' । (यदि यह अर्थान्तर न होता तो 'कुण्डलगुरु' या 'गुरुकुण्डल' ऐसा शब्द प्रयुक्त होता, न कि मत्वर्थक 'कुण्डली' । इसी प्रकार 'अकुण्डल छात्र' या 'छात्रांकुण्डल' शब्द-प्रयोग होता, न कि बहुव्रीहि समास' वाला । यह अर्थान्तर हैं तभी 'समर्थः पदविधिः' (२. १. १) इस पाणिनि के अनुशासन से मतुप्प्रत्यय तथा बहुव्रीहि .समास की प्रवृत्ति हुई; क्योंकि उक्त शास्त्र अर्थ-सम्बन्ध में ही प्रवृत्त होता है; अन्यथा लोकशास्त्रविरोध- प्रसङ्ग होने लगेगा । 'गुरु कुण्डल से संयुक्त हैं' इस बुद्धि का यदि अर्थान्तर विषय नहीं है, तो अर्थान्तरप्रतिषेध ही उसका विषय मानना पड़ेगा। तब वहाँ प्रतिषिध्यमान क्या है—यह स्पष्टतः बतावें । अर्थात् उस 'संयुक्त द्रव्य में' इस प्रतीति में जो अर्थान्तर अन्यत्र देखा गया है, परन्तु उसका यहाँ प्रतिषेध कर रहे हैं तो उसे शब्दतः बताइये कि वह क्या है ! दो 'महत्' में समवायेन वृत्तिमान् संयोग का ग्रहण होने से वह अण्वाश्रित नहीं हो सकता (;क्योंकि वैसा सम्भव नहीं है) ।

३७. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ११३

३७. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ११३ जातिविशेषस्य प्रत्ययानुवृत्तिलिङ्गस्याप्रत्याख्यानम्, प्रत्याख्याने वा प्रत्यय- व्यवस्थानुपपत्तिः । व्यधिकरणस्यानभिव्यक्तेरधिकरणवचनम् । अणुसमवस्थानं विषय इति चेत् ? प्राप्ताप्राप्तसामर्थ्यवचनम् । किमप्राप्ते अणुसमवस्थाने तदाश्रयो जातिविशेषो गृह्यते ? अथ प्राप्ते इति ? अप्राप्ते ग्रहणमिति चेत् ? व्यवहित- स्याणुसमवस्थानस्याप्युपलब्धिप्रसङ्गः, व्यवहितेऽणुसमवस्थाने तदाश्रयो जाति- विशेषो गृह्येत । प्राप्ते ग्रहणमिति चेत् ? मध्यपरभागयोरप्राप्तावनभिव्यक्तिः । यावत्प्राप्तं भवति तावत्यभिव्यक्तिरिति चेत् ? तावतोऽधिकरणत्वमणुसमवस्था- नस्य । यावति प्राप्ते जातिविशेषो गृह्यते तावदस्याधिकरणमिति प्राप्तं भवति । तत्रैकसमुदाये प्रतीयमानेऽर्थभेदः । एवं च सति योऽयमणुसमुदायो वृक्ष इति प्रतीयते, तत्र वृक्षबहुत्वं प्रतीयेत—यत्र यत्र ह्यणुसमुदायस्य भागे वृक्षत्वं गृह्यते स स वृक्ष इति । तस्मात् समुदिताणुसमवस्थानस्यार्थान्तरस्य जातिविशेषाभिव्यक्तिविषयत्वा- दवयव्यर्थान्तरभूत इति ॥ ३७ ॥ ४. एकाकारप्रतीतिक हेतु के जातिविशेष का अप्रत्याख्यान भी, समूह को अवयवी मानने पर, नहीं बनेगा । यदि किसी तरह बन भी जाये तो भी उक्त प्रतीतिव्यवस्था नहीं बन पायेगी; क्योंकि आश्रयप्रतीति के बिना जातिप्रतीति कैसे होगी ! यदि व्यधिकरण की अभिव्यक्ति न होने से परमाणु का अधिकरणत्व अप्रत्याख्यात होता है तो जाति मानेंगे तब वह व्यधिकरण कौन सा है ? बताइये । यदि कहें कि परमाणु ही किसी संयोगविशेष से रहते हुये उस जाति को व्यक्त करते हैं, तो यह बता- इये कि संयुक्त अणुसमूह में जातिविशेष को व्यक्त करता है, या असंयुक्त अणुसमूह में । यदि असंयुक्त में व्यक्त करता है ? तो व्यवहित अणुसंयुक्त को उपलब्धि होने लगेगी; अर्थात् व्यवहित अणुसंयुक्त में भी तदाश्रित जातिविशेष गृहीत होने लगेगा । यदि कहें कि संयुक्त में ग्रहण होता है ? तो उस अणुसमूह के मध्य तथा पृष्ठभाग से संयोग न होने के कारण उनमें ही अनभिव्यक्ति रहेगी । यदि कहें कि जितने के साथ संयोग हुआ, उतने में जाति की अभिव्यक्ति हो जायेगी ? तो अभिव्यक्त जातिविशेष का अधिकरण कौन है—यह बताइये । अर्थात् जितने अणुसमूह के संयुक्त होने पर जातिविशेष गृहीत होता है, उतना उसका अधिकरण हो जायेगा । एवं च—वहाँ एकसमुदाय की प्रतीति में विषय का बहुत अर्थभेद है । इस तरह जो 'अणुसमुदाय वृक्ष है'—ऐसी प्रतीति होती है, वहाँ वृक्षबहुत्व प्रतीत होने लगेगा । उस अणुसमुदाय के जिस जिस भाग में वृक्षत्व गृहीत होगा वह वह भाग वहाँ 'वृक्ष' कहलायेगा । इसलिए निष्कर्ष यह निकला कि वृक्षत्व का अधिकरण कह कर जो लिया जाता है वह अणुसमूह न होकर अर्थान्तर ही जातिविशेष का आश्रय बन सकता है । वह अर्थान्तर अवयवी हो सकता है, न कि अणुसमूह ॥३७॥ न्याय द० : ८

अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् [ ३८-४४ ]

११४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् [ ३८-४४ ] परीक्षितं प्रत्यक्षम् । अनुमानमिदानीं परीक्ष्यते— रोधोपघातसादृश्येभ्यो व्यभिचारादनुमानमप्रमाणम् ? ॥ ३८ ॥ अप्रमाणमिति—एकदाप्यर्थस्य न प्रतिपादकमिति । रोधादपि नदी पूर्णा गृह्यते, तदा च ‘उपरिष्टाद् वृष्टो देवः’ इति मिथ्यानुमानम् । नीडोपघातादपि पिपीलिकाण्डसञ्चारो भवति, तदा च ‘भविष्यति वृष्टिः’ इति मिथ्यानुमान- मिति । पुरुषोऽपि मयूरवाशितमनुकरोति, तदापि शब्दसादृश्यान्मिथ्यानुमानं भवति ? ॥ ३८ ॥ न; एकदेशत्राससादृश्येभ्योऽर्थान्तरभावात् ॥ ३९ ॥ नायमनुमानव्यभिचारः, अनुमाने तु खल्वयमनुमानाभिमानः । कथम् ? नाविशिष्टो लिङ्गं भवितुमर्हति । पूर्वोदकविशिष्टं खलु वर्षोदकं शीघ्रतरत्वं प्रत्यक्ष का परीक्षण किया जा चुका, अब अनुमान का परीक्षण किया जा रहा है— रोध, उपघात, तथा सादृश्य से अनुमान मिथ्या सिद्ध होने के कारण वह भी अप्रमाण है ॥ ३८ ॥ पीछे जो आप अनुमान के तीन भेद कर आये, उनमें एक भी अर्थ का यथार्थप्रतिपादक नहीं है । जैसे शेषवदनुमान का उदाहरण है—नदी भरी हुई दिखायी देने से अनुमान होता है—‘ऊपर कहीं वर्षा हुई हैं’; परन्तु कहीं आगे अवरोध ( रुकावट ) होने पर भी तो नदी भरी हुई दिखायी दे सकती है, अतः भरी हुई नदी देख कर वृष्टि का अनुमान मिथ्यानुमान है; क्योंकि यहाँ पूर्णत्वहेतु व्यभिचारी है । इसी तरह पूर्ववदनुमान का उदाहरण—‘चींटी अण्डा उठाये ले जा रहीं हैं, अतः वृष्टि होगी’—भी मिथ्यानुमान है, क्योंकि यहाँ ‘चींटियों का अण्डे उठाना’ हेतु उनके विल ( शरणस्थल ) के नष्टभ्रष्ट होने से भी हो सकता है, अतः वह व्यभिचारी है । इसी प्रकार सामान्यतोदृष्टानुमान का उदाहरण—‘मोर बोल रहे हैं, अतः वर्षा होगी’ भी मिथ्यानुमान ही हैं; क्योंकि पुरुष भी परिहास या आजीविका के लिये मोर की वोली बोल लेते हैं, अतः यह ‘मोर की वोली’ हेतु यहाँ व्यभिचारी है ॥ ३८ ॥ नहीं; क्योंकि एकदेश, त्रास, सादृश्य हेतुओं से उन उदाहरणों में अर्थान्तर आ जाता है ॥ ३९ ॥ आपके द्वारा अनुमान के खण्डन में जो हेतु दिये हैं, उनसे अनुमान में व्यभिचार नहीं आता । ये उक्त उदाहरण सही ‘अनुमान’ नहीं; बल्कि अनुमान में अनुमानाभिमान हैं । कैसे ? सामान्य नदीवृद्धि विशेषण से अविशिष्ट होकर अनुमान में हेतु नहीं बनती, अपितु पहले के जल से विशिष्ट वर्षा का जल, प्रवाह का वेग, बहुत से झाग, फल, सूखे CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

४०. सू० ] अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् ११५

४०. सू० ] अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् ११५ स्रोतसो बहुत्वरफेनफलपर्णकाष्ठादिवहनं चोपलभमानः पूर्णत्वेन नद्याः 'उपरि वृष्टो देवः' इत्यनुमिनोति, नोदकवृद्धिमात्रेण । पिपीलिकाप्रायस्याण्डसञ्चारे 'भविष्यति वृष्टिः' इत्यनुमीयते, न कासाञ्चिदिति । 'नेदं मयूरवाशितं तत्सदृशो- ऽयं शब्दः' इति विशेषापरिज्ञानान्मिथ्यानुमानमिति । यस्तु विशिष्टाच्छब्दाद् विशिष्टमयूरवाशितं गृह्णाति तस्य विशिष्टोऽर्थो गृह्यमाणो लिङ्गम्, यथा— सर्पादीनामिति । सोऽयमनुमातुरपराधो नानुमानस्य, योऽर्थविशेषेणानुमेयमर्थं विशिष्टार्थदर्शनेन बुभुत्सत इति ॥ ३९ ॥ वर्तमानकालपरीक्षा त्रिकालविषयमनुमानं त्रैकाल्यग्रहणादित्युक्तम्, अत्र च— वर्त्तमानाभावः, पततः पतितपतितव्यकालोपपत्तेः ? ॥ ४० ॥ वृन्तात्प्रच्युतस्य फलस्य भूमौ प्रत्यासीदतो यदूर्ध्वं स पतितोऽध्वा, तत्संयुक्तः कालः पतितकालः, योऽधस्तात् स पतितव्योऽध्वा, तत्संयुक्तः कालः पतितव्य- पत्ते, जंगल की लकड़ी-आदि उस जल में वेग से बहते हुए देखे और साथ में नदी को भी बढ़ा हुआ देखे तब वह अनुमान में हेतु बनती है कि 'ऊपर वर्षा हुई है, नदी बढ़ी होने से', अर्थात् केवल उदकवृद्धि से नहीं । इसी तरह बहुत-सी चींटियों के बराबर गमनागमन से 'वृष्टि होगी' यह अनुमान होता है, न कि कुछ चींटियों के गमनागमन से । 'यह मोर की बोली नहीं है, उसी तरह की पुरुष की बोली है'—ऐसा विशेष ज्ञान न होने से मिथ्यानुमान होता है । जो प्रमाता विशिष्ट शब्द से विशिष्ट मयूर ध्वनि ( बोली ) को जब ग्रहण करता है तब उस ध्वनि का विशिष्ट अर्थ गृहीत होता हुआ हेतु बनता है, जैसे सर्पादियों को मयूर की खास बोली सुनकर ही उनके अस्तित्व का अनुमान हो जाता है । इस प्रकार अनुमाता का ही यह अपराध माना जायेगा कि वह अर्थविशेष हेतु से अनुमेय अर्थ को सामान्य अर्थ से जानने की इच्छा करता है, अनुमान का इसमें क्या दोष ! ॥ ३९ ॥ पूर्वपक्ष—पीछे (१.१.५ में) आप 'त्रिकालयुक्त अर्थ अनुमान से गृहीत होते हैं, अतः अनुमान त्रिकालविषय है'—ऐसा कह आये हैं; और यहाँ— वर्तमानकाल नहीं है; क्योंकि गिरती हुई वस्तु के केवल पतितकाल तथा पतितव्य- काल ही उपपन्न हैं ? ॥ ४० ॥ डाल से टूटे फल के भूमि की ओर आते समय ऊपर (डाल और फल के बीच) का मार्ग पतित-मार्ग हुआ, उसमें लगने वाला काल 'पतितकाल' कहलाया । जो नीचे भूमि तक आने का मार्ग है वह पतितव्य-मार्ग हुआ, उसमें लगने वाला काल 'पतितव्य-

११६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १ . आ० कालः; नेदानीं तृतीयोऽध्वा विद्यते यत्र पततीति वर्त्तमानः कालो गृह्येत ! तस्माद् वर्त्तमानः कालो न विद्यत इति ? ॥ ४० ॥ तयोरप्यभावो वर्त्तमानाभावे; तदपेक्षत्वात् ॥ ४१ ॥ नाध्वव्यङ्ग्यः कालः; किं तर्हि ? क्रियाव्यङ्ग्यः—'पतति' इति । यदा पतन- क्रिया व्युपरता भवति स कालः पतितकालः, यदोत्पत्स्यते स पतितव्यकालः, यदा द्रव्ये वर्त्तमाना क्रिया गृह्यते स वर्त्तमानः कालः । यदि चायं द्रव्ये वर्त्तमानं पतनं न गृह्णाति कस्योपरममुत्पत्स्यमानतां वा प्रतिपद्यते ! पतितः काल इति भूता क्रिया, पतितव्यः काल इति चोत्पत्स्यमाना क्रिया । उभयोः कालयोः क्रियाहीनं द्रव्यम्, अधः पततीति क्रियासम्बद्धम् । सोऽयं क्रियाद्रव्ययोः सम्बन्धं गृह्णातीति वर्त्तमानः कालः, तदाश्रयौ चेतरौ कालौ तदभावे न स्याता- मिति ॥ ४१ ॥ अथापि— नातीतानागतयोरितरेतरापेक्षासिद्धिः ॥ ४२ ॥ काल' कहलायेगा; अब ऐसा तीसरा कौन मार्ग रह गया जिसे हम 'गिरता है'— ऐसा कहते हुये वर्तमान काल कह सकें ! अतः वर्तमान काल ही नहीं है—ऐसा हम मान लें ? ॥ ४० ॥ उत्तर देते हैं— वर्तमानकाल न मानोगे तो वर्तमानापेक्षित भूत, भविष्यत् काल की भी अनुपपत्ति होने लगेगी ॥ ४१ ॥ समय मार्ग से नहीं, अपितु 'पड़ता है'—इस क्रिया से व्यक्त होता है । 'पड़ता है' से आरंभ होकर जब पतन-क्रिया समाप्त हो जाती है वह काल 'पतितकाल', तथा जब पतन-क्रिया उत्पन्न होगी वह काल 'पतितव्य काल' कहलाता है, और जब फल आदि द्रव्य में वर्तमान पतन-क्रिया गृहीत होती है, वह 'वर्तमानकाल' कहलाता है । यदि यह पूर्वपक्षी वर्तमान पतनक्रिया को नहीं जानता है तो वह समाप्ति (भूतकाल) तथा प्रागभाव (भविष्यत्काल) किसके सम्बन्ध में प्रतिपादन करेगा ? पतितकाल भूत-क्रिया का तथा पतितव्यकाल भविष्यत्क्रिया का बोधक है । इन दोनों ही कालों में द्रव्य क्रियाहीन रहता है । 'नीचे गिरता है'—यह वर्तमानकाल अवश्य वर्तमान क्रिया से सम्बद्ध है । यह वर्तमानकाल द्रव्य-क्रिया का सम्बन्ध ग्रहण करता है, बाकी दोनों काल इसी पर आश्रित हैं, यदि यह न होगा तो वे कहाँ से होंगे ! ॥ ४१ ॥ भूत भविष्यत् को परस्परनिरूपणाधीन मान लें, उनके लिये एक पृथक् वर्तमानकाल मानने की क्या आवश्यकता है ? इसपर सूत्रकार कहते हैं— अतीत (भूत) अनागत (भविष्यत्) की इतरेतरापेक्षया सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ४२ ॥

४२. सू० ] अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् ११७ यद्यतीतानागता वितरेतरापेक्षौ सिद्ध्येताम्, प्रतिपद्येमहि वर्त्तमानविलोपम् । नातीतापेक्षाऽनागतसिद्धिः, नाप्यनागतापेक्षाऽतीतसिद्धिः । कया युक्त्या ? केन कल्पेनातीतः कथमतीतापेक्षाऽनागतसिद्धिः, केन च कल्पेनानागतः कथमनागता- पेक्षातीतसिद्धिरिति नैतच्छक्यं निर्वक्तुम्, अव्याकरणीयमेतद्वर्त्तमानलोप इति । यच्च मन्येत—'ह्रस्वदीर्घयोः, स्थलनिम्नयोः, छायाऽऽतपयोश्च यथेतरेतरा- पेक्षया सिद्धिरेवमतीतानागतयोः' इति ? तन्नोपपद्यते, विशेषहेत्वभावात् । दृष्टा- न्तवत् प्रतिदृष्टान्तोऽपि प्रसज्यते, यथा—रूपस्पर्शौ गन्धरसौ नेतरेतरापेक्षौ सिध्यतः; एवमतीतानागताविति, नेतरेतरापेक्षा कस्यचित्सिद्धिरिति । यस्मादे- काभावेऽन्यतराभावादुभयाभावः । यद्येकस्यान्यतरापेक्षा सिद्धिरन्यतरस्येदानीं किमपेक्षा ? यद्यन्यतरस्यैकापेक्षा सिद्धिरेकस्येदानीं किमपेक्षा ? एवमेकस्याभावे अन्यतरन्न सिध्यतीत्युभयाभावः प्रसज्यते ॥ ४२ ॥ अर्थसद्भावव्यङ्ग्यश्चायं वर्त्तमानः कालः—'विद्यते द्रव्यम्, विद्यते गुणः, विद्यते कर्म' इति । यस्य चायं नास्ति, तस्य—

यदि अतीत व अनागत काल एक दूसरे के आश्रय से सिद्ध हो सकें तो हम भी वर्तमानकाल को न मानें; परन्तु न भूत की अपेक्षा रखकर भविष्यत् की सिद्धि की जा सकती है, न भविष्यत् की अपेक्षा रखकर भूत की । किस तर्क से ? किस समर्थ प्रमाण से वह अतीत है तथा उसपर आश्रित अनागत की सिद्धि हो पायेगी ! अथ च, किस समर्थ प्रमाण से अनागत है तथा तदपेक्ष अतीत की सिद्धि हो पायेगी ! —इसका आप निर्वचन नहीं कर सकते, अतः वर्तमान का न मानना भी सभी को निर्वचन में बाधक होगा ! जो यह मानता है कि—'जैसे ह्रस्व-दीर्घ की, उच्च-नीच स्थल की, छाया-आतप की इतरेतरापेक्षया सिद्धि होती है, उसी तरह अतीत-अनागत की भी मान लें' ? यह नहीं मान सकते; क्योंकि ऐसा मानने में कोई विशेष हेतु नहीं है । दृष्टान्त की तरह प्रतिदृष्टान्त ( विपरीत दृष्टान्त ) भी प्रसक्त होता है; जैसे रूप तथा स्पर्श, गन्ध तथा रस इतरेतरापेक्षया सिद्ध नहीं किये जा सकते, इसी प्रकार अतीत अनागत में समझना चाहिये । और इतरेतरापेक्षया किसी की भी सिद्धि नहीं होती; क्योंकि एक का अभाव होने पर दूसरे का अभाव ( अन्यतराभाव ) होने से दोनों का ही अभाव (उभयाभाव) हो जायेगा । यदि एक की दूसरे की अपेक्षा से सिद्धि मानें तो बाकी बचे दूसरे की किसकी अपेक्षा से सिद्धि होगी ? यदि अन्यतर की एकापेक्षया सिद्धि मानें तो उस एक की अब किसकी अपेक्षा से सिद्धि होगी ? इस प्रकार एक का अभाव होने पर दूसरा भी सिद्ध नहीं हो पायेगा, अतः दोनों का ही असिद्धि-प्रसङ्ग आ पड़ेगा ॥ ४२ ॥ यह वर्त्तमानकाल न केवल पतनादि क्रिया से, अपितु अर्थ-सत्ता से भी व्यक्त होता है, जैसे—'यह द्रव्य वर्तमान है', 'यह गुण वर्तमान है', 'यह कर्म विद्यमान है'—आदि। जिस अर्थ की सत्ता नहीं होती, उसके—

११८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० वर्त्तमानाभावे सर्व्वाग्रहणं प्रत्यक्षानुपपत्तेः ॥ ४३ ॥ प्रत्यक्षमिन्द्रियार्थसन्निकर्षजम्, न चाविद्यमानमसदिन्द्रियेण सन्निकृष्यते । न चायं विद्यमानं सत्किञ्चिदनुजानाति । प्रत्यक्षनिमित्तं प्रत्यक्षविषयः प्रत्यक्षज्ञानं सर्वं नोपपद्यते, प्रत्यक्षानुपपत्तौ तत्पूर्वकत्वादनुमानागमयोरनुपपत्तिः । सर्वप्रमाण- विलोपे सर्वग्रहणं न भवतीति ॥ ४३ ॥ उभयथा च वर्त्तमानः कालो गृह्यते-क्वचिदर्थसद्भावव्यङ्ग्यः, यथा-अस्ति द्रव्यमिति; क्वचित् क्रियासन्तानव्यङ्ग्यः, यथा-पचति, छिनत्तीति । नानाविधा चैकार्था क्रिया क्रियासन्तानः क्रियाभ्यासश्च । नानाविधा चैकार्था क्रिया पचतीति स्थाल्यधिश्रयणमुदकासेचनं तण्डुलावपनमेधोऽपसर्पणमग्न्यभिज्वालनं दर्वीघट्टनं मण्डस्रावणमधोऽवतारणमिति । छिनत्तीति क्रियाभ्यासः, उद्यम्योद्यम्य परशुं दारुणि निपातयन् छिनत्तीत्युच्यते । यच्चेदं पच्यमानं छिद्यमानं च तत्क्रिय- माणम् । तस्मिन् क्रियमाणे—


वर्तमान के अभाव में प्रत्यक्ष न होने से सभी का ग्रहण नहीं होगा ॥ ४३ ॥ प्रत्यक्ष इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य होता है, और अविद्यमान असत् इन्द्रिय से सन्निकृष्ट नहीं हो सकता । यह पूर्वपक्षी विद्यमान सत् को कुछ स्वीकार नहीं करता, तो उसके मतमें प्रत्यक्ष का कारण, प्रत्यक्ष का विषय तथा प्रत्यक्ष ज्ञान—यह सब उपपन्न नहीं हो सकेगा । अनुमान तथा शब्द प्रमाण के प्रत्यक्षपूर्वक होने से, प्रत्यक्ष के अभाव में वे दोनों भी अनुपपन्न ही रहेंगे । यों, सब प्रमाणों के विलुप्त हो जाने से सभी का ग्रहण न हो सकेगा ॥ ४३ ॥ वर्तमानकाल दो प्रकार से गृहीत होता है—कहीं वह अर्थ-सत्ता से व्यक्त होता है, जैसे—'यह द्रव्य है'; कहीं क्रियासन्तान से व्यक्त होता है, जैसे—'पकाता है', 'काटता है' आदि । एक अर्थ के लिये होने वाली नाना प्रकार की क्रियायें 'क्रियासन्तान' तथा 'क्रियाभ्यास' कहलाती हैं । 'क्रियासन्तान' का उदाहरण है—'पचति' । यहाँ एक अर्थ के लिये—बटलोई (पात्र) का चूल्हे पर चढ़ाना, उसमें जल भरना, चावल डालना, चूल्हे में अग्नि जलाना, अग्नि तेज करने के लिये लकड़ी सरकाना, करछी से चावल को हिलाना, मांड़ पसारना, अन्त में बटलोई को नीचे उतारना—आदि अनेक प्रकार की क्रियायें होती हैं । 'छिनत्ति'—यह 'क्रियाभ्यास' का उदाहरण है, यहाँ 'कुठार को ऊपर उठा उठाकर काष्ठ पर पटकता हुआ काटता है'—ऐसा अर्थ निकलता है । इन दोनों क्रियाओं में पकाया जा रहा तथा काटा जा रहा 'क्रियमाण' (वर्तमान क्रिया-कर्म) कहलाता है । उस क्रियमाण में—

४५. सू०] उपमानपरीक्षाप्रकरणम् ११९

४५. सू०] उपमानपरीक्षाप्रकरणम् ११९ कृतताकर्त्तव्यतोपपत्तेस्तूभयथा ग्रहणम् ॥ ४४ ॥ क्रियासन्तानोऽनारब्धश्चिकीर्षितोऽनागतः कालः—पक्ष्यतीति । प्रयोजना- वसानः क्रियासन्तानोपरमः अतीत: काल:—अपाक्षीदिति । आरब्धक्रियासन्तानो वर्त्तमानः कालः—पचतीति । तत्र या उपरता सा 'कृतता', या चिकीर्षिता सा 'कर्त्तव्यता', या विद्यमाना सा 'क्रियमाणता' । तदेवं क्रियासन्तानस्थस्त्रैकाल्य- समाहारः—'पचति', 'पच्यते' इति वर्त्तमानग्रहणेन गृह्यते । क्रियासन्तानस्य ह्यत्रा- विच्छेदो विधीयते; नारम्भः, नोपरम इति । सोऽयमुभयथा वर्त्तमानो गृह्यते— अपवृक्तः, व्यपवृक्तश्च अतीतानागताभ्याम् । स्थितिव्यङ्ग्यः—विद्यते द्रव्यमिति । क्रियासन्तानाविच्छेदाभिधायी च त्रैकाल्यान्वितः—पचति, छिनत्तीति । अन्यश्च प्रत्यासत्तिप्रभृतेरर्थस्य विवक्षायां तदभिधायी बहुप्रकारो लोकेषु उत्प्रेक्षितव्यः । तस्मादस्ति वर्त्तमानः काल इति ॥ ४४ ॥ उपमानपरीक्षाप्रकरणम् [ ४५-४९ ] अत्यन्तप्रायैकदेशसाधर्म्यादुपमानासिद्धिः ? ॥ ४५ ॥ कृतता (भूत व्यापार) तथा कर्त्तव्यता (भविष्यत्)—दोनों की उपपत्ति होने से दोनों ही तरह से शाब्दबोध बन जाता है ॥ ४४ ॥ जब क्रियासन्तान आरम्भ नहीं किया परन्तु आरम्भ करने की इच्छा है, वह अनागत काल है—'पकायेगा' ऐसा । जहाँ पाकप्रयोजन निवृत्त हो जाये, क्रियासन्तान का उपरम हो जाये वह काल अतीत काल है—'पका चुका' ऐसा । जब क्रियासन्तान आरम्भ किया जा चुका हो, वह वर्तमान काल है—'पकाता है' ऐसा । इसमें जो क्रिया समाप्त हो चुकी उसे 'कृतता' कहते हैं, जो अभी प्रारम्भ नहीं हुई परन्तु करने की इच्छा है, वह कहलायी 'कर्त्तव्यता', और जो क्रिया विद्यमान है उसे कहेंगे 'क्रियमाणता' । इस प्रकार क्रियासन्तानस्थ यह त्रैकाल्यव्यवहार 'पकाता है' या 'पकाया जाता है'—यों वर्तमान के ग्रहण से गृहीत होता है । इस वर्तमान काल में क्रियासन्तान का केवल नैरन्तर्यविधान है, न कि आरम्भ या उपरम । यों यह वर्तमान, अतीत एवं अनागत उभय रीति में उभयथा गृहीत होता है— अतीत में अन्वपवृक्त (पश्चात्) तथा अनागत में व्यपवृक्त (पूर्व) । वर्तमान में सत्ता- क्रिया का उदाहरण है—'द्रव्य है' । क्रियासन्तान के नैरन्तर्य का बोधक तथा त्रैकाल्यान्वित (त्रिकाल में होनेवाला क्रियासमूह) का उदाहरण है—'पकाता है' या 'काटता है' । सामीप्य आदि की अर्थविवक्षा में तद्बोधक अन्य उदाहरणों की लोकव्यवहार को देखकर कल्पना कर लेना चाहिये । अस्तु ! निष्कर्ष यह निकाला कि वर्तमान काल भी है, अतः अनुमान प्रमाण में त्रैकाल्यविषयों का ग्रहण हो सकता है ॥ ४४ ॥ अत्यन्तसादृश्य, प्रायसादृश्य तथा एकदेशसादृश्य के कारण उपमान की सिद्धि नहीं हो सकती ? ॥ ४५ ॥

१२० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० अत्यन्तसाधर्म्यादुपमानं न सिध्यति, न चैवं भवति—'यथा गौरेवं गौः' इति ? प्रायसाधर्म्यादुपमानं न सिध्यति, न हि भवति—'यथाऽनड्वानेवं महिषः' इति ? एकदेशसाधर्म्यादुपमानं न सिध्यति, न हि सर्वेण सर्वमुपमीयत इति ? ॥ ४५ ॥ प्रसिद्धसाधर्म्यादुपमानसिद्धेर्यथोक्तदोषानुपपत्तिः ॥ ४६ ॥ न साधर्म्यस्य कृत्स्नप्रायल्पभावमाश्रित्योपमानं प्रवर्त्तते, किं तर्हि ? प्रसिद्ध- साधर्म्यात् साध्यसाधनभावमाश्रित्योपमानं प्रवर्त्तते, यत्र चैतदस्ति, न तत्रोपमानं प्रतिषेद्धुं शक्यम् । तस्माद्यथोक्तदोषो नोपपद्यत इति ॥ ४६ ॥ अस्तु तर्ह्युपमानमनुमानम्— प्रत्यक्षेणाप्रत्यक्षसिद्धेः ? ॥ ४७ ॥ यथा धूमेन प्रत्यक्षेणाप्रत्यक्षस्य वह्नेर्ग्रहणमनुमानम्, एवं गवा प्रत्यक्षेणाऽप्रत्य- क्षस्य गवयस्य ग्रहणमिति नेदमनुमानाद्विशिष्यते ? ॥ ४७ ॥ विशिष्यत इत्याह । कया युक्त्या ? नाप्रत्यक्षे गवये प्रमाणार्थमुपमानस्य पश्यामः ॥ ४८ ॥ अत्यन्तसादृश्य से उपमान सिद्ध नहीं होता, क्योंकि ऐसा कभी नहीं होता कि जैसी गौ हो ठीक वैसा ही बैल हो (कुछ न कुछ तो अन्तर होगा ही) । बाहुल्येन सादृश्य से उपमान की सिद्धि नहीं होती; क्योंकि लोक में यह कब होता है कि जैसा बैल है वैसा ही भैंसा हो ! यद्यपि दोनों में प्रायसादृश्य है । एकदेशसाधर्म्य से भी उपमान सिद्ध नहीं होता; क्योंकि तब कुछ न कुछ सादृश्य से सब का सबके साथ उपमान बनने लगेगा ? ॥ ४५ ॥ प्रसिद्ध-साधर्म्य से उपमानसिद्धि होने के कारण उक्त दोष नहीं बनेंगे ॥ ४६ ॥ सादृश्य की समग्रता, प्रायता या अल्पता से नहीं; अपितु प्रसिद्धसादृश्य से साध्य- साधनभाव को लेकर उपमान प्रवृत्त होता है । ऐसा जहाँ है, वहाँ उपमान प्रतिषिद्ध नहीं हो सकता । अतः उक्त दोष नहीं बन पायेंगे ॥ ४६ ॥ तो उपमान को अनुमान ही मान लें— क्योंकि उपमान में भी प्रत्यक्ष के हेतु से अप्रत्यक्ष की सिद्धि होती है ? ॥ ४७ ॥ जैसे धूम के प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष वह्नि का ग्रहण अनुमान कहलाता है, इसी प्रकार उपमान में गौ के प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष-गवय या ग्रहण होता है । यह प्रमाण अनुमान से भिन्न नहीं हुआ, अतः क्यों न इसे अनुमान ही मान लें ? ॥ ४७ ॥ नहीं, यह अनुमान से भिन्न होता है; क्योंकि— गवय का प्रत्यक्ष न होने पर उपमान की उपपत्ति नहीं लगती ॥ ४८ ॥ जब उपमानवाक्यश्रोता गौ का प्रत्यक्ष कर चुका हो, तब वन में गोसदृश अन-

५०. सू० ] शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् १२१

५०. सू० ] शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् १२१ यदा ह्ययमुपयुक्तोपमानो गोदर्शी गवा समानमर्थं पश्यति, तदाऽयम् 'गवय' इत्यस्य संज्ञाशब्दस्य व्यवस्थां प्रतिपद्यते, न चेदमनुमानमिति । परार्थं चोपमानम्, यस्य ह्युपमेयमप्रसिद्धं तदर्थं प्रसिद्धोभयेन क्रियते इति । परार्थमुपमानमिति चेद् ? न; स्वयमध्यवसायात् । भवति च भोः ! स्वयम- ध्यवसायः-'यथा गौरेवं गवयः' इति ? नाध्यवसायः प्रतिषिध्यते, उपमानं तु तन्न भवति-'प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्' (१. १. ६)। न च यस्योभयं प्रसिद्धं तं प्रति साध्यसाधनभावो विद्यत इति ॥ ४८ ॥ तथेत्युपसंहारादुपमानसिद्धेर्नाविशेषः ॥ ४९ ॥ तथेति समानधर्मोपसंहारादुपमानं सिध्यति, नानुमानम्। अयं चानयोर्विशेष इति ॥ ४९ ॥ (क) शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् [ ५०-५७ ] [ पूर्वपक्षः ] शब्दोऽनुमानमर्थस्यानुपलब्धेरनुमेयत्वात् ? ॥ ५० ॥ वधारितसंज्ञक विषय को आँखों से देखता है तब (उद्बुद्धसंस्कार) 'यह गवय है' ऐसी उस संज्ञाशब्द की नियत शक्ति को प्रतिपन्न होता है—यह प्रक्रिया अनुमान कैसे हुई ! क्योंकि गवय के प्रत्यक्ष की तरह अनुमान में वह्नि का प्रत्यक्ष आवश्यक नहीं ! दूसरी बात यह है कि (अनुमान से स्वयं को ज्ञान होता है, जबकि) उपमान से दूसरे को संज्ञाशब्द की व्युत्पत्ति करायी जाती है । जिसको उपमेय (गवय) का ज्ञान न हों उसको उपमान द्वारा उपमेय की प्रसिद्धि दिखला कर ज्ञान कराया जाता है । तो परार्थोपमान ही क्यों न मान लिया जाय ? नहीं; इसमें स्वयम् को भी अध्यव- साय होने से इसे परार्थोपमान नहीं मान सकते । 'जैसी गौ वैसा यह गवय है' यह स्वयम् को अध्यवसाय होता है ? अध्यवसाय नहीं होता—यह हम नहीं कह रहे, हम तो कहते हैं—वैसा परार्थोपमान नहीं होता ! उपमान का लक्षण है—'प्रसिद्ध-सादृश्य से साध्य की सिद्धि' (१.१.६) । जिसको दोनों (उपमा, उपमेय) ही ज्ञात है उसके लिये साध्य- साधनभाव क्या बनेगा ? ॥ ४८ ॥ 'तथा'—इस उपसंहार से उपमान-सिद्धि होने से अनुमान तथा उपमान दोनों एक नहीं हो सकते ॥ ४९ ॥ उपमान में समानधर्म का 'वैसा यह'—इस प्रकार उपसंहार होने से उपमान प्रमाण सिद्ध होता है, ऐसा उपसंहार अनुमान में नहीं होता । अर्थात् अनुमान में—'जैसा धूम वैसी अग्नि'—यह उपसंहार नहीं हो पाता, परन्तु उपमान में 'जैसी गौ वैसा यह गवय'—यों उपसंहार होता है । यही अनुमान तथा उपमान में भेद है। अतः दोनों को पृथक् प्रमाण माना गया ॥ ४९ ॥ प्रत्यक्ष से अर्थोपलब्धि न होने पर अनुमेय होने से शब्दप्रमाण अनुमान है ? ॥ ५० ॥

१२२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० १. शब्दोऽनुमानम्, न प्रमाणान्तरम्; कस्मात् ? शब्दार्थस्यानुमेयत्वात् । कथमनुमेयत्वम् ? प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धेः। यथाऽनुपलभ्यमानो लिङ्गी मितेन लिङ्गेन पश्चान्मीयत इति अनुमानम्, एवं मितेन शब्देन पश्चान्मीयतेऽर्थोऽनुपलभ्यमान इत्यनुमानं शब्दः ? ॥ ५० ॥ २. इतश्चानुमानं शब्दः— उपलब्धेर्द्विप्रवृत्तित्वात् ? ॥ ५१ ॥ प्रमाणान्तरभावे द्विप्रवृत्तिरुपलब्धिः । अन्यथा ह्युपलब्धिरनुमाने, अन्य- थोपमाने; तद्व्याख्यातम्। शब्दानुमानयोस्तूपलब्धिर्द्विप्रवृत्तिः, यथानुमाने प्रवर्त्तते तथा शब्देऽपि विशेषाभावादनुमानं शब्द इति ? ॥ ५१ ॥ सम्बन्धाच्च ? ॥ ५२ ॥ ३. शब्दोऽनुमानमिति वर्त्तते। सम्बद्धयोश्च शब्दार्थयोः सम्बन्धप्रसिद्धौ शब्दोपलब्धेरर्थग्रहणम्, यथा सम्बद्धयोर्लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धप्रतीतौ लिङ्गो- पलब्धौ लिङ्गिग्रहणमिति ? ॥ ५२ ॥ [ सिद्धान्तपक्षः ] १. यत्तावदर्थस्यानुमेयत्वादिति, तन्न— १. शब्द अनुमान ही है, पृथक् प्रमाणान्तर नहीं; क्योंकि उसका अर्थ अनुमेय है । कैसे अनुमेय है ? प्रत्यक्ष से अनुपलब्ध होने के कारण । जैसे—अनुपलभ्यमान वह्नि प्रत्यक्ष से ज्ञात धूम अनुमित होता है, एवमेव शब्दप्रत्यक्षानन्तर उससे अनुपलभ्यमान अर्थ की अनुमिति होता है, अतः हम शब्द को अनुमान ही मान लें ? ॥ ५० ॥ २. इस वक्ष्यमाण कारण से भी शब्द अनुमान ही है— शब्द ज्ञान के अनुमान से भिन्न प्रकार का न होने से ॥ ५१ ॥ शब्द यदि प्रमाणान्तर होता तो अनुमान से भिन्न प्रकार की उपलब्धि होनी चाहिये । आप पीछे उपमानप्रकरण में कह आये हैं—'उपमान में भिन्न उपलब्धि होती है, अनुमान में भिन्न, अतः उपमान एक स्वतन्त्र प्रमाण है न कि अनुमानान्तर्भूत', परन्तु शब्द तथा अनुमान के वारे में यह बात नहीं कही जा सकती; इन दोनों की तो समान उपलब्धि है, जैसे अनुमान से ज्ञान उत्पन्न होता है, ठीक उसी विधि से शब्द से भी । कोई विशेषता न होने से हम तो यही समझते हैं कि शब्द अनुमान ही है ॥ ५१ ॥ और सम्बन्ध से भी (शब्द अनुमान ही सिद्ध होता है) ॥ ५२ ॥ ३. सम्बद्ध शब्दार्थ में ही सम्बन्ध-प्रसिद्धि होने पर शब्दोपलब्धि से अर्थग्रहण होता है, जैसे—सम्बद्ध लिङ्ग-लिङ्गी की सम्बन्ध-प्रसिद्धि होने पर लिङ्ग की उपलब्धि से लिङ्गी का ज्ञान होता है ? तात्पर्य यह निकला कि शब्द ज्ञान भी व्याप्तिज्ञानजन्य है, अतः वह वस्तुतः अनुमान ही है, उसे पृथक् प्रमाण मानने से क्या लाभ ? ॥ ५२ ॥ १. पूर्वपक्षी ने जो यह कहा कि—'अर्थ के अनुमेय होने से शब्द प्रमाण अनुमान हैं, वह उचित नहीं—

५३. सू० ] शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् १२३

५३. सू० ] शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् १२३ आप्तोपदेशसामर्थ्याच्छब्दार्थसम्प्रत्ययः ॥ ५३ ॥ स्वर्गः, अप्सरसः, उत्तरा कुरवः, सप्तद्वीपसमुद्रो १ लोकसन्निवेश इत्येव- मादेरप्रत्यक्षस्यार्थस्य न शब्दमात्रात् प्रत्ययः, किं तर्हि ? ‘आप्तैरयमुक्तः शब्दः’ इत्यतः सम्प्रत्ययः; विपर्यये सम्प्रत्ययाभावाद् । न त्वेवमनुमानमिति । २. यत्पुनरुपलब्धेरद्विप्रवृत्तत्वादिति ? अयमेव शब्दानुमानयोरुपलब्धेः प्रवृत्तिभेदः—तत्र विशेषे सत्यहेतुविशेषाभावादिति । ३. यत्पुनरिदं सम्बन्धाच्चेति ? अस्ति च शब्दार्थयोः सम्बन्धोऽनुज्ञातः, अस्ति च प्रतिषिद्धः । ‘अस्येदम्’ इति षष्ठीविशिष्टस्य वाक्यस्यार्थविशेषोऽनु- ज्ञातः, प्राप्तिलक्षणस्तु शब्दार्थयोः सम्बन्धः प्रतिषिद्धः । कस्मात् ? प्रमाणतोऽनुप- लब्धेः २ । प्रत्यक्षतस्तावच्छब्दार्थप्राप्तेर्नोपलब्धिः, अतीन्द्रियत्वात् । येनेन्द्रियेण गृह्यते शब्दः, तस्य विषयभावमतिवृत्तोऽर्थो न गृह्यते । अस्ति चातीन्द्रियविषय- आप्तोपदेश-सामर्थ्य से शब्द द्वारा ही अर्थज्ञान हो जाता है ॥ ५३ ॥ स्वर्ग, अप्सराएँ, उत्तर कुरुदेश, सात समुद्रवाला भूमण्डल इत्यादि अप्रत्यक्ष अर्थ का केवल शब्द से ज्ञान नहीं होता, 'आप्तपुरुषों ने यह शब्द इस अर्थ में कहा है' इस लिये उस शब्द से ज्ञान नहीं होता, अपितु 'आप्त पुरुषों ने यह शब्द इस अर्थ में कहा है' इसलिये उस शब्द से उस अर्थ का ज्ञान हो पाता है । यदि किसी शब्द के लिये वैसा आप्तोपदेष्टृत्व नहीं मिलता तो उस शब्द से शब्दरहित ज्ञान भी नहीं होता । इस तरह शब्दज्ञान का अनुमान प्रमाण में अन्तर्भाव नहीं होता । २. पूर्वपक्षी ने जो यह कहा—'उपलब्धि भिन्न प्रकार की नहीं है' ? यह भी उचित नहीं; क्योंकि शब्द की उक्त प्रवृत्ति अनुमान से भिन्न सिद्ध हो गयी । अतः अनुमान से शब्द में विशेषता आ गयी—तब 'विशेषाभाव' हेतु देना अयुक्त है । ३. पूर्वपक्षी ने जो यह कहा था कि 'शब्द एवं अर्थ का सम्बन्ध ज्ञात होना आवश्यक है, अतः सम्बन्ध होने से शब्द पृथक् प्रमाण नहीं है' ? यह भी उचित नहीं; क्योंकि शब्द-अर्थ का सम्बन्ध स्वीकृत भी है, प्रतिषिद्ध भी है । जैसे—'इसका यह है' इस षष्ठी- विशिष्ट वाक्य को षष्ठी का अर्थविशेष सम्बन्ध स्वीकृत है, संयोग-समवायान्यतरस्वरूप शब्दार्थ का सम्बन्ध प्रतिषिद्ध है; ऐसा क्यों ? क्योंकि प्रमाण से उस अर्थविशेष की उपलब्धि नहीं होती । यतः प्रत्यक्ष प्रमाण से शब्दार्थ-सम्बन्ध की उपलब्धि नहीं हो सकती; क्यों कि वह अतीन्द्रिय है । जिस इन्द्रिय से शब्द गृहीत होता है उस इन्द्रिय के विषयत्व को अर्थ अतिक्रान्त कर जाता है । अर्थ अतीन्द्रिय विषय है, कि शब्द उसका विषय नहीं बन १. 'सप्त द्वीपाः, समुद्रो'—इति पाठ० । २. क्वचित् सूत्रत्वेन परिगणितमेतद् भाष्यम् । न्यायसूचीनिबन्धे तु नास्ति, वृत्ति- कृतापि च न व्याख्यातम्, नातः सूत्रम् ।

सूत्रोक्त 'च' का अर्थ कण्ठादि स्थान तथा प्रयत्नादि न होना है। यह अनुमान से भी

१२४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० भूतोऽप्यर्थः, समानेन चेन्द्रियेण गृह्यमाणयोः प्राप्तिर्गृह्यत इति ॥ ५३ ॥ प्राप्तिलक्षणे च गृह्यमाणे सम्बन्धे शब्दार्थयोः शब्दान्तिके वार्थः स्यात्, अर्थान्तिके वा शब्दः स्याद्, उभयं वोभयत्र। अथ खल्वयम्— पूरणप्रदाहपाटनानुपलब्धेश्च सम्बन्धाभावः ॥ ५४ ॥ स्थानकरणाभावादिति चार्थः। न चायमनुमानतोऽप्युपलभ्यते-शब्दान्ति- केऽर्थ इति। एतस्मिन् पक्षेऽप्यास्यस्थानकरणोच्चारणीयः शब्दस्तदन्तिकेऽर्थ इति—अन्नाग्न्यसिशब्दोच्चारणे पूरणप्रदाहपाटनानि गृह्येरन्, न च गृह्यन्ते। अग्रहणाच्चानुमेयः प्राप्तिलक्षणः सम्बन्धः। अर्थान्तिके शब्द इति स्थानकरणा- सम्भवाद् अनुच्चारणम्। स्थानम् = कण्ठादयः; करणम् = प्रयत्नविशेषः, तस्यार्थान्तिकेऽनुपपत्तिरिति। उभयप्रतिषेधाच्च नोभयम्। तस्मान्न शब्देनार्थः प्राप्त इति ॥ ५४ ॥ शब्दार्थव्यवस्थानादप्रतिषेधः ? ॥ ५५ ॥ सकता। व्यवहार यह देखा जाता है कि दोनों के समान इन्द्रिय से गृहीत होने पर ही उनका सम्बन्ध गृहीत होता है ॥ ५३ ॥ शब्दार्थ के संयोग-समवायान्तरस्वरूप सम्बन्ध को गृहीत करते समय या तो अर्थ शब्दाधिकरण हो, या फिर शब्द अर्थाधिकरण हो या दोनों के अधिकरण हो। तब यह— सम्बन्ध नहीं बनता; पूरण, प्रवाह, पाटन की उपलब्धि न होने से ॥ ५४ ॥ सूत्रोक्त 'च' का अर्थ कण्ठादि स्थान तथा प्रयत्नादि न होना है। यह अनुमान से भी सिद्ध नहीं होता कि अर्थ शब्दाधिकरण है। इस पक्ष में कण्ठादि स्थान तथा वायुक्रियादि प्रयत्नविशेष से उच्चारणीय शब्द को अर्थ का अधिकरण माना जाये तो 'अन्न', 'अग्नि' तथा 'असि' शब्दों के उच्चारण करने परं क्रमशः उनके अर्थ 'पूरण' (पेट भरना), 'दाह' (जलना) या 'पाटन' (फाड़ना)—इनका मुख में ग्रहण होना चाहिये; परन्तु ग्रहण नहीं होता, अतः सिद्ध होता है कि शब्द-अर्थ का वैसा सम्बन्ध नहीं बनता। 'शब्द अर्थाधिकरण हैं'—ऐसा मानें तो अर्थ के स्थान तथा करण न होने से उच्चा- रण ही असम्भव है। 'स्थान' का अर्थ है कण्ठादि तथा 'करण' का वाय्वादि क्रियारूप प्रयत्नविशेष। इन दोनों की अर्थाधिकरणपक्ष में उपपत्ति नहीं बनती। इस प्रकार अर्था- धिकरणता तथा शब्दाधिकरणता—दोनों का ही प्रतिषेध हो जाने पर दोनों नहीं बनते, अतः दोनों में ही संयोगसम्बन्ध सिद्ध नहीं हुआ ॥ ५४ ॥ लोक में शब्द तथा अर्थ की व्यवस्था देखने से प्रतिषेध नहीं बनेगा ? ॥ ५५ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

५६. सू० ] शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् १२५

५६. सू० ] शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् १२५ शब्दादर्थप्रत्ययस्य व्यवस्थादर्शनादनुमीयते—अस्ति शब्दार्थसम्बन्धो व्यवस्थाकारणम् । असम्बन्धे हि शब्दमात्रार्थमात्रे प्रत्ययप्रसङ्गः । तस्माद- प्रतिषेधः सम्बन्धस्येति ? ।। ५५ ।। अत्र समाधिः— न; सामयिकत्वाच्छब्दार्थसम्प्रत्ययस्य ।। ५६ ।। न सम्बन्धकारितं शब्दार्थव्यवस्थानम्, किं तर्हि ? समयकारितं यत्तद- वोचाम । 'अस्येदम्' इति षष्ठीविशिष्टस्य वाक्यस्यार्थविशेषोऽनुज्ञातः शब्दार्थयोः सम्बन्ध इति, समयं तमवोचाम इति । कः पुनरयं समयः ? 'अस्य शब्दस्ये- दमर्थजातमभिधेयम्'—इति अभिधानाभिधेयनियमनियोगः । तस्मिन्नुपयुक्ते शब्दा- दर्थसम्प्रत्ययो भवति । विपर्यये हि शब्दश्रवणेऽपि प्रत्ययाभावः । सम्बन्धवादि- नापि चायमवर्जनीय इति । प्रयुज्यमानग्रहणाच्च समयोपयोगो 'लौकिकानाम् । समयपालनार्थं चेदं पदलक्षणाया वाचोऽन्वाख्यानं व्याकरणम् । वाक्यलक्षणाया वाचोऽर्थो लक्षणम् । पदसमूहो वाक्यमर्थपरिसमाप्ताविति । तदेवं प्राप्तिलक्षणस्य शब्दार्थसम्बन्ध- स्यार्थतुषोऽपि अनुमानहेतुर्न भवतीति ।। ५६ ।। शब्द से अर्थज्ञान होता है—ऐसा लोक में देखने से अनुमान होता है कि शब्दार्थ- सम्बन्ध व्यवस्था का कारण है । दोनों का सम्बन्ध न मानने पर शब्दमात्र से अर्थमात्र का ज्ञान होने लगेगा । इसलिये सम्बन्ध का प्रतिषेध नहीं है—ऐसा मान लें ? ।। ५५ ।। इसका उत्तर है— नहीं; क्योंकि शब्दार्थसम्प्रत्यय सामयिक (साङ्केतिक) नहीं है ।। ५६ ।। लोक में शब्दार्थ की व्यवस्था सम्बन्धापेक्ष नहीं; अपितु संकेतापेक्ष है । ऐसा हम दोनों कहते हैं—' "इसका यह' इस षष्ठीविशिष्ट वाक्य की किसी अर्थविशेष में स्वीकृति ही शब्दार्थ का सम्बन्ध है", तो यह हम संकेत के लिये ही कहते हैं । यह संकेत क्या है ? 'इस शब्द का यह अर्थ अभिधेय है'—ऐसा विधिपरक अभिधानाभिधेय-नियम । इस नियम का उपयोग करने पर शब्द से अर्थ का ज्ञान होता है । इस संकेत का ज्ञान न हो तो विदेशी भाषा का शब्द सुनने पर भी हमें अर्थज्ञान नहीं हो पाता । शब्दार्थ- सम्बन्धवादी (मीमांसक) को भी यह संकेतनियम मानना ही पड़ेगा । लौकिकों को प्रयुज्यमान अर्थ के ग्रहण से ही संकेत-ग्रहण होता है । इस संकेत की रक्षा के लिये 'पदलक्षण अर्थात् वाचक शब्द का अन्वाख्यान' रूप व्याकरणशास्त्र बना हैं । वाक्य रूप वाणी के शब्दों का अर्थलक्षण = भेदक है । जहाँ अर्थ परिसमाप्त हो जाता हो—वह पदसमूह 'वाक्य' कहलाता है । यों, शब्दार्थ का संयोगरूप सम्बन्ध अनुमानहेतु नहीं बन सकता—यह सिद्ध हो गया ।। ५६ ।। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१२६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० जातिविशेषे चानियमात् ॥ ५७ ॥ सामयिकः शब्दार्थसम्प्रत्ययः, न स्वाभाविकः। ऋष्यार्यम्लेच्छानां यथा- कामं शब्दविनियोगोऽर्थप्रत्यायनाय प्रवर्त्तते। स्वाभाविके हि शब्दस्यार्थप्रत्याय- कत्वे यथाकामं न स्याद्, यथा-तैजसस्य प्रकाशस्य रूपप्रत्ययहेतुत्वं न जातिविशेषे व्यभिचरतीति ॥ ५७ ॥ (ख) शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् [ ५८-६९ ] पुत्रकामेष्टिहवनाभ्यासेषु— तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः ? ॥ ५८ ॥ १. तस्येति शब्दविशेषमेवाधिकुरुते भगवान् ऋषिः। शब्दस्य प्रमाणत्वं न सम्भवति। कस्मात्? अनृतदोषात् पुत्रकामेष्टौ। 'पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत' इति नेष्टौ संस्थितायां पुत्रजन्म दृश्यते। दृष्टार्थस्य वाक्यस्यानृतत्वात् अदृष्टार्थ- मपि वाक्यम्—'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' इत्याद्यनृतमिति ज्ञायते। २. विहितव्याघातदोषाच्च—हवने 'उदिते होतव्यम्, अनुदिते होतव्यम्, समयाध्युषिते होतव्यम्' इति विधाय, विहितं व्याहन्ति—'श्यावोऽस्याहुति- मभ्यवहरति य उदिते जुहोति, शबलोऽस्याहुतिमभ्यवहरति योऽनुदिते जुहोति, जातिविशेष में नियम न होने से भी शब्दार्थ-सम्बन्ध सामयिक नहीं बनता ॥ ५७ ॥ शब्द से अर्थ का ज्ञान सांकेतिक है, न कि स्वाभाविक। ऋषि, आर्य तथा म्लेच्छ जन अर्थ-ज्ञान के लिये शब्दों का यथेच्छ आदान प्रदान करते हैं। यदि यह शब्दार्थ- सम्बन्ध स्वाभाविक होता तो उनका यथेच्छ प्रयोग न हो पाता। जैसे कि सूर्य आदि का प्रकाश रूपज्ञान का स्वाभाविक हेतु है, वह कहीं अन्यजातीय में व्यभिचरित नहीं होता ॥ ५७ ॥ पूर्वपक्ष—पुत्रकामयाग, हवन तथा अभ्यास में— मिथ्यात्व, विरोध तथा पुनरुक्ति दोष होने से शब्द में प्रामाण्य नहीं ॥ ५८ ॥ १. सूत्र में महर्षि ने 'तस्य' पद से शब्दविशेष का ग्रहण किया है। शब्द का प्रामाण्य सम्भव नहीं हैं; अनृत (= मिथ्या) दोष होने से, जैसे पुत्रकामेष्टि में। 'पुत्र की इच्छा रखने वाला पुरुष पुत्रकामयज्ञ करें'—यह वाक्य है, यहाँ यज्ञ के होते पुत्र जन्म नहीं दिखायी देता। यों जब उस वेद में दृष्टार्थक वाक्य ही मिथ्या है तो वहाँ के अदृष्टार्थक वाक्य—'स्वर्ग की इच्छा वाला अग्निहोत्र करें' में भी मिथ्यात्वकल्पना अनुमान से हो सकती है। २. विहित के विरोध से भी शब्द प्रमाण नहीं हैं। जैसे हवन-प्रसङ्ग में 'उदित (सूर्य के रेखामात्र उदय होने पर) में हवन करे, अनुदित (रात्रि का सोलहवां भाग, जिसमें तारागण अस्त न हुए हों) में हवन करे, समयाध्युषित (प्रभात का वह समय जिसमें तारागण अस्त हो चुका हो, परन्तु सूर्योदय न हुआ हो) में हवन करें'—यह विघानकर CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

५९. सू० ] शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १२७

५९. सू० ] शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १२७ श्यावशवलावास्याहुतिमभ्यवहरतो यः समयाध्युषिते जुहोति’ । व्याघाता- च्चान्यतरन्मिथ्येति । ३. पुनरुक्तदोषाच्च-अभ्यासे देद्यमाने ‘त्रिः प्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम्’ इति पुनरुक्तदोषो भवति । पुनरुक्तं च प्रमत्तवाक्यमिति । तस्मादप्रमाणं शब्दोऽनृत- व्याघातपुनरुक्तदोषेभ्य इति ॥ ५८ ॥ न; कर्मकर्तृसाधनवैगुण्यात् ॥ ५९ ॥ नानृतदोषः पुत्रकामेष्टौ, कस्मात् ? कर्मकर्तृसाधनवैगुण्यात् । इष्ट्वा पितरौ संयुज्यमानौ पुत्रं जनयत इति । इष्टिः करणं साधनम्, पितरौ कर्तारौ, संयोगः कर्म, त्रयाणां गुणयोगात् पुत्रजन्म । वैगुण्याद्विपर्ययः । इष्ट्याश्रयं तावत्कर्म अन्यत्र उसका विरोध किया जाता है-‘जो उदित में हवन करता है, उसकी आहुति को श्याव ( श्वान ) खा जाता है ( वह आहुति लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाती ), जो अनु- दित में हवन करता है, उसकी आहुति को शवल ( श्वान ) खा जाता है; जो समया- ध्युषित में हवन करता है, उस आहुति को वे दोनों ( श्वान ) मिलकर खा जाते हैं’ ( उसे लक्ष्यतक नहीं पहुंचने देते ) । ये दोनों उक्त वाक्य परस्परविरुद्ध हैं, अतः इनमें से कोई एक मिथ्या है । ३. शब्द प्रमाण मानने पर पुनरुक्त दोष भी आता है । जैसे—एकादश सामिधेनी के पञ्चदशत्वबोधक अभ्यास ( आवृत्तिगणना ) के प्रसङ्ग में-‘पहली को तीन बार तथा अन्तिम को तीन बार आवृत्त करता है’ । यह अभ्यास पुनरुक्तदोषसम्पन्न है । पुनरुक्त दोष प्रमत्तों के वाक्य में मिलता है, ऋषि-वाक्य में कैसे आया ! यदि है तो वे भी प्रमत्त हैं, उनका वाक्य प्रमाण कैसे होगा ? अतः यह सिद्ध हुआ कि अनृत, व्याघात तथा पुन- रुक्त दोषों के कारण शब्द प्रमाण नहीं है ॥ ५८ ॥ इस पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं— अनृत दोष नहीं; क्योंकि कर्मकर्तृसाधनविपर्यय से ( वहाँ फलादर्शन है ) ॥ ५९ ॥ पुत्रकामेष्टिप्रतिपादक श्रुति में फलदर्शन न होने से अनृत दोष दिया था, वह नहीं हैं; क्योंकि वहाँ कर्म, कर्ता, तथा करण का विपर्यय हो सकता है । यज्ञ से माता-पिता संयुक्त हो कर पुत्र पैदा करते हैं—अतः यज्ञ, साधन ( करण ) हुआ, माता-पिता कर्ता हुए, उनका संयोग कर्म हुआ, तीनों के उचित सम्बन्ध से पुत्र-जन्म होता है, उनके विपर्यय में नहीं होता । यज्ञाश्रित कर्मविपर्यय जैसे—यज्ञ का साङ्गोपाङ्ग अनुष्ठान न अत्र—‘द्वौ श्वानौ श्यावशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ । ताभ्याम्पिण्डं प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ ॥’ इति बलिमन्त्रोऽनुसन्धेयः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१२८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० वैगुण्यं समीहाभ्रेषः१, कर्तृवैगुण्यम्-अविद्वान् प्रयोक्ता कपूयाचरणश्च। साधनवै- गुण्यम्-हविरसंस्कृतमुपहतमिति, मन्त्रा न्यूनाधिकाः स्वरवर्णहीना इति, दक्षिणा दुरागता हीना निन्दिता चेति। अथोपजनाश्रयं कर्मवैगुण्यम्—मिथ्यासम्प्रयोगः। कर्तृवैगुण्यम्—योनिव्यापादो बीजोपघातश्चेति। साधनवैगुण्यम् इष्टावभिहितम्। लोके च 'अग्निकामो दारूणी मथ्नीयात्' इति विधिवाक्यम्, तत्र कर्मवैगुण्यम्- मिथ्यामन्थनम्, कर्तृवैगुण्यम्-प्रज्ञाप्रयत्नगतः प्रमादः, साधनवैगुण्यम्-आर्द्रं सुषिरं दार्विति। तत्र फलं न निष्पद्यत इति नानृतदोषः, गुणयोगेन फलनिष्पत्ति- दर्शनात्। न चेदं लौकिकाद्भिद्यते-'पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत' इति ॥ ५९ ॥ अभ्युपेत्य कालभेदे दोषवचनात् ॥ ६० ॥ न व्याघातो हवनः-इत्यनुवर्त्तते। योऽभ्युपगतं हवनकालं भिनत्ति ततोऽन्यत्र करना। कर्तृविपर्यय जैसे—माता-पिता अविद्वान् ( वैदिक विधि के ज्ञाता न ) हों, निन्दित आचरण वाले हों। साधनविपर्यय जैसे—हवि असंस्कृत हो, या कुत्ता बिल्ली आदि से अपवित्र कर दी गयी हो; मन्त्र स्वरवर्णहीन तथा न्यूनाधिक पढ़े जायें। यज्ञ के बाद दी जाने वाली दक्षिणा का धन जूआ, चोरी या रिश्वतखोरी से कमाया हुआ हो; कम हो, या सुवर्ण के अतिरिक्त निषिद्ध धातु के रूप में दिया जाये। पुत्रोत्पादनाश्रित कर्मविपर्यय जैसे—मिथ्यासम्प्रयोग ( अनुचित सम्बन्ध )। कर्तृ- विपर्यय जैसे—मातृयोनि में या पिता के शुक्र में खराबी। साधनविपर्यय तो इष्टिप्रसङ्ग में कह ही दिया गया। लोक में भी यह विपर्यय देखते हैं—'अग्नि की इच्छा रखने वाला अरणिमन्थन करें' ( दो लकड़ियों को रगड़े ) यह विधिवाक्य है। यहाँ कर्मविपर्यय जैसे—गलत ढंग से उनको रगड़ना। कर्तृविपर्यय जैसे—रगड़ने वाले का प्रज्ञा या प्रयत्न में प्रमाद करना। साधन-विपर्यय जैसे—लकड़ियां गीली या पोली ( दीमक लगी हुई ) हों। यहाँ भी ऐसी स्थितियों में अग्नि नहीं बन पाती; क्योंकि यथोचित सम्बन्ध से ही फलनिष्पत्ति देखी जाती है। पूर्वपक्षी का दिया हुआ 'पुत्रेच्छु पुत्रेष्टि से यज्ञ करे' उदाहरण में दृष्ट उदाहरण से भिन्न नहीं, अतः उसमें अनृत दोष देकर शब्द को अप्रमाण नहीं कह सकते ॥ ५९ ॥ स्वीकार करके पुनः भिन्न काल में हवन करनेवाले को उक्त दोष कहने से ( व्याघातदोष नहीं है ) ॥ ६० ॥ वचनव्याघात दोष भी नहीं है; क्योंकि जो अभ्युपेत हवनकाल को छोड़ कर अन्य काल में हवन करता है, ऐसे अभ्युपगत कालभेद में यह दोष कहा गया है—'श्याव श्वा १. समीहा = तदङ्गसमिदादिकर्मानुष्ठानम्, तस्या भ्रेषः = भ्रंशः, अननुष्ठानमिति यावत्।