न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
है। वात्स्यायन ने प्रश्नोत्तर के रूप में, वादी प्रतिवादी के संवाद-रूप में जैसे सूत्रकार का अभिप्राय समझाया है, ऐसा उदाहरण 'पातञ्जल महाभाष्य' के अतिरिक्त अन्य भाष्यों में अधिक नहीं मिलता। विषय पर पूर्ण अधिकार, भाषा सरल, नपे-तुले शब्द, स्थान-स्थान पर लौकिक उपमा तथा मुहावरों का स्वच्छन्द प्रयोग—ये सब मिल कर विषय की शुष्कता को अपसारित किये रहते हैं। इतने पर भी सूत्रकार के प्रति अगाध श्रद्धा कि समग्र भाष्य में किसी भी सूत्र के किसी भी शब्द के खण्डन के लिए एक वाक्य भी प्रयुक्त नहीं। यह विनय हम इस भाष्यकार में ही देखते हैं, या फिर महाभाष्यकार पतञ्जलि में। अस्तु। न्याय-सूत्रों की रचना वात्स्यायन ने अपने भाष्य में अत्यधिक स्थलों पर ऐसे लघु वाक्यों का प्रयोग किया है कि उन वाक्यों के सूत्र होने का सन्देह होता है। भाष्यकार की यह शैली है कि वे सूत्र का अक्षरार्थ कर पुनः विस्तृत व्याख्यान करने के लिए अपनी बात को पहले संक्षेप (एक वाक्य) में रखते हैं, फिर उसका अनेक वाक्यों में व्याख्यान करते कि ये संक्षिप्त वाक्य प्रारम्भ में जैसे रहे हों आगे चलकर न्यायदर्शन के सूत्रों का नियत रखने में बाधक बन बैठे। कारण कि, प्रतिपक्षी दार्शनिक जब नैयायिकों के तर्कों से पराभूत होने लगे तो उन्होंने भी इन न्यायसूत्रों में स्वमतपोषक सूत्र बना बनाकर प्रक्षिप्त करने आरम्भ कर दिये। अन्त में वाचस्पति मिश्र ने अपनी अनुपम प्रतिभा तथा प्रगाढ पाण्डित्य का प्रयोग कर इन सूत्रों का प्रामाणिक संग्रह 'न्यायसूची-निवन्ध' नाम से प्रकरणानुसार निबद्ध कर दिया। इस तरह विरोधियों के आक्रमण पर तो अर्गला लग गयी, परन्तु घर में ही ऐसा विवाद हो गया कि जो आजतक शान्त नहीं हो सका। विरोधियों की बात जाने भी दें तो भी हम नहीं समझ पाये कि नैयायिकपरम्परा के प्रामाणिक व्याख्याताओं के भी सूत्रसंग्रह क्यों नहीं मिल पाते। वार्त्तिककार उद्योतकर के व्याख्यात सूत्र उतने ही नहीं हैं जितने उसके व्याख्याकार वाचस्पति मिश्र ने माने हैं; यही दशा उदयन की है, 'तात्पर्यपरिशुद्धिकार' उदयन को प्रसङ्ग-प्रसङ्ग पर लिखना पड़ा है कि 'यह सूत्र नहीं भाष्य है' या 'यह भाष्य नहीं सूत्र है'। विश्वनाथ चक्रवर्ती भी उतने सूत्रों को नहीं लेते, जितनों के लिये वाचस्पति मिश्र प्रतिज्ञा करते हैं कि 'इतने सूत्र हैं'। यही मनोदशा भाष्यचन्द्रकार रघूत्तम की है। दूर क्यों जायें—हम अपनी ही कहें, हमने यह अनुवाद करते समय यह धारणा बनायी थी कि वाचस्पति मिश्र का 'सूत्रसंग्रह' प्रामाणिक है, हमें इसी के अनुसार सूत्र रखने हैं, तथापि पञ्चाधिक स्थलों पर हम भी उस पिच्छिल राजपथ से विचलित हो गये; क्योंकि वहाँ हम प्रकरणानुसार उन्हें सूत्र मानने के लिये विवश हैं, परन्तु वे सूत्र 'न्यायसूचीनिबन्ध' में परिगणित नहीं हैं। बहुत कुछ ऊहापोह के बाद हम इसी निष्कर्ष
[ १४ ]
पर पहुँचे हैं कि वाचस्पति मिश्र का मुख्य लक्ष्य इतना ही था कि विरोधियों द्वारा प्रक्षिप्त दर्शनविरोधी सूत्रों को निकाल कर प्रामाणिक सूत्रसंग्रह बनाया जाये। यदि कोई विद्वान् कहीं सूत्रानुकूल भाष्यवाक्य को सूत्र समझकर व्याख्यान कर ही दे तो उससे वस्तुतत्त्व में क्या अन्तर आयेगा ! भाषान्तर के विषय में दो बात हम कोई बहुत बड़े नैयायिक नहीं, न सर्वतन्त्रस्वतन्त्र विद्वान् हैं; फिर भी न्याय- दर्शन ऐसे महत्त्वशाली ग्रन्थ को स्पर्श कर हमने कोई बहुत अधिक मूर्खता नहीं की ! विचारशील मानव अपने प्रारम्भ के क्षणों (अध्ययनकाल) में अपने जीवन के कुछ लक्ष्य निर्धारित करता है, उन्हें पूर्ण करने के लिये वह तभी से प्रयास प्रारम्भ कर देता है। अपनी भी यही मनोदशा थी। विद्यालयों में बैठ कर जब अध्ययन होता था तो स्थल- स्थल पर यह भाव उठते थे कि विवादास्पद विषयों (शास्त्रार्थ) को छोड़ कर कोई इस ग्रन्थ का अध्ययन इतना भी करा देता कि ग्रन्थ का तत्त्वबोध भी हो जाता और व्यर्थ के भार से भी बच जाते । तभी हमने यह निश्चय किया था कि इन पुस्तकों का ऐसा हिन्दी रूपान्तर या संस्कृत की सरल टीका कर देनी है जो व्युत्पन्न विद्यार्थी को अत्यधिक स्वावलम्बी बना सके । इस अनुवाद को लिखते समय हमने अपनी विद्यार्थिकाल की मनोदशा को प्रतिक्षण ध्यान में रखा है। हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि हमारा यह प्रयास हमारे ही समानधर्मा विद्याव्यसनियों के लिये है। हो सकता है, एकाधिक स्थलों पर हम से कुछ प्रमाद हो गया हो; परन्तु यदि मित्रगण अध्ययन-अध्यापन के समय आयी असुविधाओं को हमें सूचित करते रहेंगे तो इसके आगामी संस्करण तथा अन्य दर्शनों के हिन्दी-रूपान्तर में उनका परिमार्जन अवश्य कर देंगे । अनुवाद को आद्योपान्त पढने पर अनुवाद की भाषा के विषय में हमारे विचार स्पष्टतः आप के सामने आ जायेंगे-ऐसी हमें आशा है। हम मिश्रित हिन्दी ( सरल हिन्दी ) में विश्वास नहीं रखते। दर्शन के कुछ गूढ तथा पारिभाषिक शब्द हैं, कुछ श्रद्धेय वाक्य हैं, कुछ प्रबल तर्क हैं जो चालू भाषा में प्रयुक्त किये जाने पर अपना महत्त्व विनष्ट कर बैठते हैं, उनकी गुरुता समाप्त हो जाती है। अतः हम विवश थे कि भाषा को निम्नस्तर तक न पहुँचने दें। फिर भी हमने भाषा को प्रवाहित रखने का प्रयास किया है। हमारा सौभाग्य यह था कि वात्स्यायन भाष्य, जिसका हमें अनुवाद करना था, बहुत प्राञ्जल भाषा में है; उससे भी अत्यधिक अवलम्ब मिला ।
$\left.\begin{aligned} कार्तिकी पूर्णिमा, २०२३ वि० वाराणसी \end{aligned}\right}$ $\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad$ विद्वद्वशंवद $\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad$ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
विषय-सूची अत्राक्षपादसूत्राणां विषयाः परिदर्शिताः । विषयादिश्च पृष्ठान्तः क्रमोऽयमवलोक्यताम् ॥ अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ३ कथालक्षणप्रकरणम् ५९ प्रमाणप्रकरणम् ५ वादलक्षणम् ५९ प्रत्यक्षलक्षणम् १७ जल्पलक्षणम् ६१ अनुमानलक्षणम् २१ वितण्डालक्षणम् ६२ उपमानलक्षणम् २३ हेत्वाभासप्रकरणम् ६३ शब्दलक्षणम् २४ सव्यभिचारलक्षणम् ६३ प्रमेयप्रकरणम् २५ विरुद्धलक्षणम् ६४ आत्मलक्षणम् २६ प्रकरणसमलक्षणम् ६५ शरीरलक्षणम् २८ साध्यसमलक्षणम् ६६ इन्द्रियलक्षणम् २९ कालातीतलक्षणम् ६७ भूतलक्षणम् ३० छलप्रकरणम् ६८ अर्थ(विषय)लक्षणम् ३० छललक्षणम् ६८ बुद्धिलक्षणम् ३० वाक्छललक्षणम् ६९ मनोलक्षणम् ३१ सामान्यच्छललक्षणम् ७० प्रवृत्तिलक्षणम् ३२ उपचारच्छललक्षणम् ७२ दोषलक्षणम् ३२ लिङ्गदोषसामान्यप्रकरणम् ७४ प्रेत्यभावलक्षणम् ३३ जातिलक्षणम् ७४ फललक्षणम् ३४ निग्रहस्थानलक्षणम् ७४ दुःखलक्षणम् ३४ संशयपरीक्षाप्रकरणम् ७६ अपवर्गलक्षणम् ३५ प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८३ न्यायपूर्वाङ्गलक्षणप्रकरणम् ४० प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ९६ संशयलक्षणम् ४० प्रत्यक्षलक्षणपरीक्षा ९६ प्रयोजनलक्षणम् ४२ प्रत्यक्षविषयपरीक्षा १०२ न्यायाश्रयसिद्धान्तलक्षणप्रकरणम् ४४ प्रसङ्गोपात्ता अवयविपरीक्षा० १०६ न्यायप्रकरणम् ४७ अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् ११४ प्रतिज्ञालक्षणम् ४८ वर्तमानकालपरीक्षाप्रकरणम् ११५ हेतुलक्षणम् ४८ उपमानपरीक्षाप्रकरणम् ११९ उदाहरणलक्षणम् ४९ शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् १२१ उपनयनलक्षणम् ५१ शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १२६ निगमनलक्षणम् ५२ प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् १३६ न्यायोत्तराङ्गप्रकरणम् ५४ अर्थापत्तिप्रामाण्यसिद्धिः १३८ तर्कलक्षणम् ५४ अभावप्रामाण्यसिद्धिः १४० निर्णयलक्षणम् ५६
[ १६ ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४२ संख्येकान्तवादप्रकरणम् २९४ शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १५८ फलपरीक्षाप्रकरणम् २९८ शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् १६८ दुःखपरीक्षाप्रकरणम् ३०१ व्यक्तिवादः १६९ अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०५ आकृतिवादः १७२ तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१६ जातिवादः १७२ प्रासङ्गिकम् अवयविप्रकरणम् ३२१ सिद्धान्तवादः १७३ निरवयवप्रकरणम् ३२८ इन्द्रियव्यतिरिक्तात्मपरीक्षा० १७५ बाह्यार्थभङ्गनिरकरणप्रकरणम् ३३० शरीरव्यतिरिक्तात्मपरीक्षा० १७८ तत्त्वज्ञानविवृद्धिप्रकरणम् ३३७ प्रासङ्गिकं चक्षुरद्वैतपरीक्षा० १८१ तत्त्वपरिपालनप्रकरणम् ३४२ आत्ममनोभेदपरीक्षाप्रकरणम् १८६ सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् ३४४ आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १८८ उत्कर्षसमादिजातिषट्कप्रकरणम् ३४७ शरीरपरीक्षाप्रकरणम् १९४ प्राप्याप्राप्तिसमजातिद्वय० ३४९ इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् १९६ प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमप्रकरणम् ३५० साङ्ख्यमतखण्डनम् १९७ अनुत्पत्तिसमप्रकरणम् ३५२ इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् २०७ संशयसमप्रकरणम् ३५२ अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २१३ प्रकरणसमप्रकरणम् ३५३ बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २२२ हेतुसमप्रकरणम् ३५५ क्षणभङ्गप्रकरणम् २२८ अर्थापत्तिसमप्रकरणम् ३५६ बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३३ अविशेषसमप्रकरणम् ३५७ बुद्धेरुत्पन्नापवर्गित्वपरीक्षा० २५२ उपपत्तिसमप्रकरणम् ३५८ बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षा० २५६ उपलब्धिसमप्रकरणम् ३५९ मनःपरीक्षाप्रकरणम् २६० अनुपलब्धिसमप्रकरणम् ३६० अदृष्टनिष्पाद्यत्वप्रकरणम् २६२ अनित्यसमप्रकरणम् ३६२ प्रवृत्तिदोषसामान्यपरीक्षा० २७४ नित्यसमप्रकरणम् ३६३ दोषत्रैराश्यपरीक्षाप्रकरणम् २७५ कार्यसमप्रकरणम् ३६५ प्रेत्यभावपरीक्षाप्रकरणम् २७८ षट्पक्षीकथाभासप्रकरणम् ३६६ शून्योपादाननिराकरण० २८० निग्रहस्थानपञ्चकप्रकरणम् ३७० ईश्वरोपादानताप्रकरणम् २८२ निग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७३ आकस्मिकत्वनिराकरणप्रकरणम् २८४ निग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् ३७५ सर्वानित्यत्वनिराकरणप्रकरणम् २८५ पुनरुक्तनिग्रहस्थानप्रकरणम् ३७६ सर्वनित्यत्वनिराकरणप्रकरणम् २८७ उत्तरविरोधि निग्रहस्थानचतुष्क० ३७७ सर्वपृथक्त्वनिराकरणप्रकरणम् २९० मतानुज्ञादिनिग्रहस्थानत्रिक० ३७८ सर्वशून्यतानिराकरणप्रकरणम् २९२ कथकान्योक्तिनिरूप्यनिग्रह० ३७८
वात्स्यायनभाष्यसंवलितम् न्यायदर्शनम् [ हिन्दीभाषान्तरसहितम् ]
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प्रथमोऽध्यायः
ब्रजवल्लभ द्विवेदी २४-८-७६ ॐ तस्मै श्रीगुरवे नमः ॐ वात्स्यायनभाष्यसंवलितम् न्यायदर्शनम् [ हिन्दीभाषान्तरसहितम् ] प्रथमोऽध्यायः [ प्रथममाह्निकम् ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् [ १-२ ] प्रमाणतोऽर्थप्रतिपत्तौ प्रवृत्तिसामर्थ्यादर्थवत्प्रमाणम् । प्रमाणमन्तरेण नार्थप्रतिपत्तिः, नार्थप्रतिपत्तिमन्तरेण प्रवृत्तिसामर्थ्यम् । प्रमाणेन खल्वयं ज्ञाताऽर्थमुपलभ्य तमर्थमभीप्सति, जिहासति वा । तस्येप्सा- जिहासाप्रयुक्तस्य समीहा प्रवृत्तिरित्युच्यते । सामर्थ्यं पुनरस्याः फलेनाऽभि- सम्बन्धः । समीहमानस्तमर्थमभीप्सन् जिहासन् वा तमर्थमाप्नोति जहाति वा । अर्थस्तु—सुखं सुखहेतुश्च, दुःखं दुःखहेतुश्च । सोऽयं प्रमाणार्थोऽपरिसंख्येयः, प्राणभृद्भेदस्यापरिसंख्येयत्वात् । प्रमाण से उपादेय, हेय स्वरूप द्विविध अर्थों ( इच्छाओं ) की प्रतीति होनेपर ही कायिक ( बाह्य, आभ्यन्तर ) प्रयत्नों का सामर्थ्य देखा जाने से प्रमाण सप्रयोजन कहा जाता है । प्रमाण के बिना अर्थ-प्रतीति नहीं होती, अर्थ-प्रतीति के बिना प्रयत्न-सामर्थ्य नहीं हो सकता । निश्चय ही विज्ञजन प्रमाण से उस अर्थ को यथार्थ जानकर या तो ईप्सित ( ग्राह्य ) को चाहते हैं या जिहासित ( त्याज्य ) को छोड़ देते हैं । इस ईप्सा और जिहासा को लेकर जो प्रयत्न किया जाता है, वही 'प्रवृत्ति' कहलाता है । इस प्रवृत्ति का फल से अभिसम्बन्ध ( फलसाधकत्व ) 'सामर्थ्य' कहलाता है । प्रयत्न करता हुआ पुरुष यदि उस अर्थ को चाहता है तो प्राप्त कर लेता है, और छोड़ना चाहता है तो छोड़ देता है । यह प्रवृत्तिविषय अर्थ चार प्रकार का होता है—१. सुख, २. सुखहेतु, ३. दुःख, ४. दुःखहेतु । इस प्रमाण से गम्य अर्थ का वस्तुतः हम संख्या से विभाजन नहीं कर सकते; क्योंकि प्राणियों की संख्या असीम है । [ प्रत्येक प्राणी अपनी स्थिति रखता है, CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० अर्थवति च प्रमाणे प्रमाता, प्रमेयम्, प्रमितिरित्यर्थवन्ति भवन्ति । कस्मात् ? अन्यतमापायेऽर्थस्यानुपपत्तेः । तत्र यस्येप्सानिहासाप्रयुक्तस्य प्रवृत्तिः स प्रमाता, स येनार्थं प्रमिणोति तत्प्रमाणम्, योऽर्थः प्रमीयते तत् प्रमेयम्, यदर्थविज्ञानं सा प्रमितिः । चतसृषु चैवंविधास्वर्थतत्त्वं परिसमाप्यते । किं पुनस्तत्त्वम् ? सतश्च सद्भावः, असतश्चासद्भावः । सत्सदिति गृह्य- माणं यथाभूतमविपरीतं तत्त्वं भवति । असच्चासदिति गृह्यमाणं यथाभूतम- विपरीतं तत्त्वं भवति । कथमुत्तरस्य प्रमाणेनोपलब्धिरिति ? सत्युपलभ्यमाने तदनुपलब्धेः प्रदीपवत् । यथा दर्शकेन दीपेन दृश्ये गृह्यमाणे तदिव यन्न गृह्यते, तन्नास्ति; 'यद्यभविष्य- . जो अर्थ एक के लिये सुख का साधन हो सकता है, वही दूसरे के लिये दुःख का साधन बन सकता है । जैसे—बकरी के लिये वृक्ष के कोमल पत्ते मृदु होने से सुख के साधन ( सुखोत्पादक ) हैं, परन्तु वे ही ऊँट के लिये दुःखोत्पादक हो जाते हैं । उसी तरह ऊँट के लिये काँटेदार-झाड़ियों के पत्ते सुखोत्पादक हैं, वही बकरी के लिये दुःखोत्पादक । इसी प्रकार एक साधारण गृहस्थ के लिये स्त्री-पुत्रादि सुखोत्पादक हैं, परन्तु वे ही एक संन्यासी के लिये दुःखरूप हैं । उसी तरह विवेक, वैराग्य आदि से युक्त एक गृहस्थ स्त्री-पुत्रादि को दुःख समझ लेता है और उद्बुद्धपापकर्मा संन्यासी मठ-मन्दिरादि के परिग्रह में पड़ जाता है । ] इस सप्रयोजन (अर्थवान्) प्रमाण में प्रमाता, प्रमेय और प्रमिति—ये तीनों मिलकर होते हैं; क्योंकि इनमें से किसी एक के न होनेपर, अर्थ की प्रतीति नहीं हो सकती । जिस पुरुष की ईप्सा या जिहासा को लेकर प्रवृत्ति होती है, वह 'प्रमाता' कहलाता है । वह पुरुष जिस ईप्सा या जिहासा को जिससे याथात्म्येन समझता है, वह 'प्रमाण' कह- लाता है । जो अर्थ (ईप्सित या जिहासित ) समझा जाता है, वह 'प्रमेय' कहलाता है । उस ईप्सित या जिहासित का यथार्थ ज्ञान ही 'प्रमिति' कहलाता है । इन चार प्रकारों में ही अर्थ का समग्र तत्त्व परिसमाप्त हो जाता है । (अर्थात् इन चारों द्वारा ईप्सित को ग्रहण किया जाता है, जिहासित को छोड़ दिया जाता है या उपेक्षित की उपेक्षा कर दी जाती है ।) यह अर्थ-तत्त्व क्या है ? सत् का सद्भाव और असत् का असद्भाव । अर्थात् सत् वह तत्त्व है, जो 'सत्' ऐसा जाना जाते हुए अविरुद्ध ( अनुकूल या उदासीन ) भी हो और यथार्थ भी हो । इसी तरह 'असत्' वह तत्त्व है, जो 'असत्' ऐसा जाना जाते हुए अनुकूल, उदासीन तथा यथार्थ हो । अन्तिम पक्ष (.असतश्चासद्भावः) के प्रमाण की उपलब्धि कैसे हो सकती है, क्योंकि जो है ही नहीं, वह हजार प्रमाणों से भी कैसे जाना जा सकेगा ? सत् के मिल जानेपर (उपलभ्यमानता सिद्ध रहते हुए) भी उसके न मिलने से वह जाना जा सकेगा,
[Header] १. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ५
दिदमिव व्यज्ञास्यत विज्ञानाभावान्नास्ति' इत्येवं प्रमाणेन सति गृह्यमाणे तदिव यन्न गृह्यते, तन्नास्ति; 'यद्यभविष्यदिदमिव व्यज्ञास्यत, विज्ञानाभावान्नास्ति' इति । तदेवं सतः प्रकाशकं प्रमाणमसदपि प्रकाशयतीति । सच्च खलु षोडशधा व्यूढमुपदेक्ष्यते । तासां खल्वासां सद्गिधानाम्— प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डा - हेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः ॥ १ ॥ निर्देशे यथावचनं विग्रहः । चार्थे द्वन्द्वसमासः । प्रमाणादीनां तत्त्वमिति शैषिकी षष्ठी । तत्त्वस्य ज्ञानम्, निःश्रेयसस्याधिगमः—इति कर्मणि षष्ठ्यौ । त एतावन्तो विद्यमानार्थाः, येषामविपरीतज्ञानार्थमिहोपदेशः । सोऽयम- नवयवेन तन्त्रार्थ उद्दिष्टो वेदितव्यः । जैसे—प्रदीप से । जैसे द्रष्टा पुरुष दीपक हाथ में लेकर दीखने योग्य ( सत् ) वस्तु को ग्रहण कर लेने की क्षमता रखते हुए भी उसी दृश्य वस्तु की तरह उस ( असत् ) को नहीं ग्रहण कर पाता है तो समझ लेता है कि वह नहीं है; क्योंकि वह ( असत् वस्तु ) होती तो अवश्य उसके द्वारा सत् की तरह जानी जाती; जानी नहीं गयी, इसलिये (योग्यानुपलब्धि प्रमाण से समझता है कि) वह नहीं है। इस तरह प्रमाण द्वारा सत् के जान लिये जानेपर उसकी तरह जो नहीं जाना जाता है तो समझ लिया जाता है कि वह नहीं है, यदि होता तो उसी तरह जाना जाता; जाना न जाने के कारण वह नहीं है। इस प्रकार 'सत्' का ज्ञान करानेवाला ( प्रकाशक ) प्रमाण 'असत्' का भी ज्ञान करा देता है । इस 'सत्' का संक्षेप में १६ प्रकार से उपदेश किया जायगा । सत् के इन प्रकारों में से १. प्रमाण, २. प्रमेय, ३. संशय, ४. प्रयोजन, ५: दृष्टान्त, ६. सिद्धान्त, ७. अवयव, ८. तर्क, ९. निर्णय, १०. वाद, ११. जल्प, १२. वितण्डा, १३. हेत्वाभास, १४. छल, १५. जाति, १६. निग्रहस्थान ( होते हैं इन ) के तत्त्वज्ञान से निःश्रेयस ( मोक्ष ) प्राप्त होता है ॥ १ ॥ इस सूत्र में ( प्रमाण से ले कर निग्रहस्थान तक ) पदों का विग्रह लक्षणसूत्रोक्त लिंग-वचन के अनुसार रखना चाहिये । यहाँ 'चार्थे द्वन्द्वः' ( २-२-२९ ) इस पाणिनि सूत्र से द्वन्द्वसमास होता है, जिसमें कि सभी पदार्थ प्रधान होते हैं । 'प्रमाण············· स्थानानां तत्त्व—' यहां शेषषष्ठी समझें ( 'शेषषष्ठी' उसे कहते हैं जहाँ किसी भी कारक की विवक्षा न हो ) । 'तत्त्वस्य ज्ञानम्' तथा 'निःश्रेयसस्य अधिगमः' यहाँ उभ- यत्र कर्म में षष्ठी समझना चाहिये । ये इतने विद्यमान ( सत् ) अर्थ हैं, जिनके अविपरीत ज्ञान के लिये इस सूत्र में उपदेश किया गया है । इस प्रकार यह शास्त्र में किये जाने वाले समग्र उपदेश का उद्देश ( नाम मात्र से संकेत ) कर दिया गया है—ऐसा समझना चाहिये ।
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६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. आ० १ आ० आत्मादेः खलु प्रमेयस्य तत्त्वज्ञानान्निश्रेयसाधिगमः । तच्चैतदुत्तरसूत्रेणा- नूद्यत इति । हेयं तस्य निर्वर्तकम्, हानमात्यन्तिकम्, तस्योपायः, अधि- गन्तव्यः—इत्येतानि चत्वार्यर्थपदानि सम्यग्बुद्ध्वा निःश्रेयसमधिगच्छति । तत्र संशयादीनां पृथग्वचनमनर्थकम्, संशयादयो यथासम्भवं प्रमाणेषु प्रमेयेषु चान्तर्भवन्तो न व्यतिरिच्यन्त इति ? सत्यमेतत्; इमास्तु चतस्रो विद्याः पृथक्प्रस्थानाः प्राणभृतामनुग्रहायोपदिश्यन्ते । यासां चतुर्थीयमान्वीक्षिकी न्यायविद्या । तस्याः पृथक्प्रस्थानाः संशयादयः पदार्थाः । तेषां पृथग्वचनमन्त- रेणाध्यात्मविद्यामात्रमियं स्यात्, यथा—उपनिषदः । तस्मात् संशयादिभिः पदार्थैः पृथक् प्रस्थाप्यते । तत्र नानुपलब्धे न निर्णीतेऽर्थे न्यायः प्रवर्तते, किं तर्हि ? संशयितेऽर्थे । यथोक्तम्—'विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः' (१. १. ४१) इति । विमर्शः = संशयः, पक्षप्रतिपक्षौ = न्यायप्रवृत्तिः । अर्थाव- धारणम् = निर्णयः, तत्त्वज्ञानमिति । स चायं किंस्विदिति वस्तुविमर्शमात्रमनव- धारणं ज्ञानं संशयः प्रमेयेऽन्तर्भवन्नेवमर्थं पृथगुच्यते । आत्मा-आदि प्रमेयों के तत्त्व-ज्ञान से मोक्षप्राप्ति होती है। यह बात अनुपद (१.१.२ सूत्र) में स्पष्ट कर दी जायेगी १. हेय (दुःख और उसके उत्पादक अविद्या, तृष्णा आदि ), २. आत्यन्तिक हान (जिससे दुःख सदा के लिये क्षीण हो जाये अर्थात् तत्त्वज्ञान ), ३. उसके जानने का उपाय (शास्त्र), तथा ४. अधिगन्तव्य (मोक्ष)—इन चार अर्थपदों (पुरुषार्थ-स्थानों) को ठीक से जानकर अधिकारी पुरुष मोक्ष पा जाता है। शङ्का—सूत्र में संशयादि का अलग से पढ़ना निरर्थक है; क्योंकि संशयादि के प्रमाण या प्रमेयों में अन्तर्भूत होते हुये अलग से उनकी गणना नहीं होती ? बात तो ठीक है; परन्तु ये चारों विद्यायें (त्रयी, वार्ता, दण्डनीति, आन्वीक्षिकी) पृथक् विषयबोधक व्यापार वाली है, जिनमें यह चौथी आन्वीक्षिकी (न्यायविद्या) है। जिसके कि संशयादि पदार्थ पृथग्विषय माने गये हैं। इन संशयादिकों का यदि अलग से पाठ न करेंगे तो यह आन्वीक्षिकी भी अध्यात्मविद्यामात्र रह जायेगी; जैसे कि उपनिषद् । इस लिये यहाँ सूत्रकार द्वारा संशयादि पदार्थों से एक अलग ही बोध कराया गया है; क्योंकि इस तर्कशास्त्र का विषय न तो अनुपलब्ध अर्थ ही है, न निर्णीत अर्थ ही, अपितु संशयित अर्थ है। जैसा कि सूत्रकार ने कहा है—'विमर्श कर के पक्ष प्रतिपक्ष द्वारा अर्थ का अवधारण 'निर्णय' कहलाता है' (१.१.४१) । विमर्श = संशय । पक्ष प्रति- पक्ष = न्यायशास्त्र की प्रवृत्ति । अर्थावधारण = निर्णय, तत्त्वज्ञान । 'यह क्या होगा?'— ऐसा वस्तु में सन्देहमात्र अनिर्णीत ज्ञान ही 'संशय' कहलाता है। इस संशय का वस्तुतः प्रमेय में अन्तर्भाव हो सकता है, परन्तु न्यायशास्त्र की सुलभ प्रवृत्ति के लिये सूत्रकार ने पृथक् पाठ किया है। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ७ अथ प्रयोजनम् । येन प्रयुक्तः प्रवर्तते, तत् प्रयोजनम् । यमर्थमभीप्सन् जिहासन् वा कर्मारभते, तेनानेन सर्वे प्राणिनः सर्वाणि कर्माणि सर्वाश्च विद्या व्याप्ताः, तदाश्रयश्च न्यायः प्रवर्तते । कः पुनरयं न्यायः ? प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः । प्रत्यक्षागमाश्रितमनुमानं साऽन्वीक्षा । प्रत्यक्षागमाभ्यामीक्षितस्यान्वीक्षणमन्वीक्षा, तया प्रवर्तत इत्यान्वी- क्षिकी = न्यायविद्या, न्यायशास्त्रम् । यत् पुनरनुमानं प्रत्यक्षागमविरुद्धं न्याया- भासः स इति । तत्र वादजल्पौ सप्रयोजनौ । वितण्डा तु परीक्ष्यते—वितण्डया प्रवर्तमानो वैतण्डिकः । स प्रयोजनमनु- युक्तो यदि प्रतिपद्यते ? सोऽस्य पक्षः, सोऽस्य सिद्धान्तः इति वैतण्डिकत्वं जहाति । अथ न प्रतिपद्यते ? नायं लौकिको न परीक्षक इत्यापद्यते । अथापि परपक्षप्रति- षेधज्ञापनं प्रयोजनं ब्रवीति ? एतदपि तादृगेव; 'योज्ञापयति, यो जानाति, येन ज्ञाप्यते, यच्च ज्ञाप्यते'-एतच्च प्रतिपद्यते यदि ? तदा वैतण्डिकत्वं जहाति । अथ न प्रतिपद्यते ? 'परपक्षप्रतिषेधज्ञापनं प्रयोजनम्' इत्येतदस्य वाक्यमनर्थकं 'प्रयोजन—जिससे प्रेरित होकर पुरुष अर्थ में प्रवृत्त होता है, उसे 'प्रयोजन' कहते हैं । जिस अर्थ को चाहता हुआ या छोड़ने की इच्छा करता हुआ क्रिया प्रारम्भ करता है, उसी ( प्रयोजन ) से सब प्राणी, सब कर्म तथा सभी विद्यायें सम्बद्ध हैं । और उसी के अधीन न्याय भी प्रवृत्त होता है । यह न्याय क्या है ? अनुमानादि प्रमाणों से अर्थ का परीक्षण ( परिशोधन ) 'न्याय' ( निश्चय ) कहलाता है । प्रत्यक्ष तथा आगम से अविरुद्ध अनुमान को 'अन्वीक्षा' कहते हैं । प्रत्यक्ष तथा आगम के बाद का ईक्षण ( अनुमान ) 'अन्वीक्षा' कहलाता है । उसका आश्रय लेकर जो प्रवृत्त हो उसे ही 'आन्वीक्षिकी' 'न्यायविद्या', या 'न्यायशास्त्र' कहते हैं । और जो अनुमान प्रत्यक्ष तथा आगम के विरुद्ध हो वह 'न्यायाभास' कहलाता है । उस न्यायविद्या में वाद तथा जल्प 'प्रयोजन' के साथ रहते हैं । ( वाद का प्रयोजन है तत्त्वज्ञान और जल्प का प्रयोजन है विजय । ) वितण्डा पर भी विचार कर लें । शास्त्रार्थ में वितण्डा से प्रवर्तमान पुरुष को 'वैतण्डिक' कहते हैं । यदि वह प्रयोजन पूछे जाने पर 'यह उसका पक्ष है', या 'यह उसका सिद्धान्त है' ऐसा स्वीकार करता है तो अपने वैतण्डिकत्व को ही छोड़ बैठता है । यदि कुछ भी नहीं स्वीकार करता है तो साधारणजन उसे न तो लौकिक समझेंगे, न परीक्षक ही । यदि वह 'परपक्ष का खण्डन' ही अपना प्रयोजन बतावे ? तो इससे भी उसका वैतण्डिकत्व कहाँ रह पायेगा ! क्योंकि यदि वह 'जिसके द्वारा बोध कराया जाता है', 'जो जानता है', 'जो बोध कराया जाता है' या 'जिसको बोध कराया जाता है'— इन चार बातों को स्वीकार कर लेता है तो उसका वैतण्डिकत्व कैसा ? यदि नहीं स्वी- CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
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८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० भवति । वाक्यसमूहश्च स्थापनाहीनो वितण्डा, तस्य यद्यभिधेयं प्रतिपद्यते ? सोऽस्य पक्षः स्थापनीयो भवति । अथ न प्रतिपद्यते ? प्रलापमात्रमनर्थकं भवति, वितण्डात्वं निवर्त्तत इति । अथ दृष्टान्तः प्रत्यक्षविषयोऽर्थः—यत्र लौकिकपरीक्षकाणां दर्शनं न व्याह- न्यते, स च प्रमेयम् । तस्य पृथग्वचनं च—तदाश्रयावनुमानागमौ । तस्मिन् सति स्यातामनुमानागमौ, असति च न स्याताम् । तदाश्रया च न्यायप्रवृत्तिः । दृष्टान्तविरोधेन च परपक्षप्रतिषेधो वचनीयो भवति, दृष्टान्तसमाधिना च स्वपक्षः साधनीयो भवति । नास्तिकश्च दृष्टान्तमभ्युपगच्छन्नास्तिकत्वं जहाति, अनभ्युपगच्छन् किंसाधनः परमुपालभेतेति ! निरुक्तेन च दृष्टान्तेन शक्यमभि- धातुम्—'साध्यसाधर्म्यात् तद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम्' (१. १. ३६), तद्वि- पर्ययाद्वा विपरीतम्' (१. १. ३७) इति । 'अस्त्ययम्' इत्यनुज्ञायमानोऽर्थः सिद्धान्तः, स च प्रमेयम् । तस्य पृथग्वचनम्—सत्सु सिद्धान्तभेदेषु वादजल्पवितण्डाः प्रवर्त्तन्ते, नातोऽन्येथेति । कार करता है तो उसका 'परपक्षखण्डन मेरा प्रयोजन है'—यह वाक्य निष्प्रयोजन हो जायेगा । (स्वपक्ष) स्थापनाहीन वाक्यसमूह 'वितण्डा' कहलाता है । यदि वैतण्डिक वाक्य का अभिधेय स्वीकार कर लेता है तो वही उसका पक्ष-स्थापन कहलायेगा, यदि नहीं स्वीकार करता है तो शास्त्रार्थ में उसका सब कुछ कहा-सुना प्रलापमात्र तथा निरर्थक होगा, वितण्डात्व कहाँ रहेगा ! अब दृष्टान्त का निरूपण करते हैं—प्रत्यक्ष (प्रमाणमात्र) से जहाँ साध्य अर्थ को लौकिक स्वीकार करते हैं वह 'दृष्टान्त' कहलाता है, अर्थात् जहाँ लौकिक परीक्षकों की बात न कट पाये । वह भी प्रमेय के ही अन्तर्भूत है । उसको सूत्र में अलग इसलिये पढ दिया गया कि अनुमान और आगम प्रमाण उसके अधीन हैं—उसके होने पर वे होंगे, उसके न होने पर नहीं होंगे । न्यायशास्त्र की प्रवृत्ति भी तदाश्रित ही है । विरुद्ध दृष्टान्त से परपक्ष का खण्डन किया जाता है, तथा अनुकूल दृष्टान्त से स्वपक्ष-समर्थन । नास्तिक पुरुष यदि शास्त्रार्थ में दृष्टान्त का सहारा लेगा तो वह अपना 'नास्तिकत्व' ही खो बैठेगा, यदि सहारा न लेगा तो वह किस साधन से परपक्ष का खण्डन कर पायेगा ! दृष्टान्त का निर्वचन करने के लिये हम कह सकते हैं—'साध्य की समानधर्मता से युक्त तद्धर्मभावी दृष्टान्त कहलाता है' ( १. १. ३६ ), तथा 'उसके विपर्यय से विपरीत' ( १. १. ३७ ) । प्रमाणजन्य प्रतीति के बाद 'यह प्रमाण का विषय है' या 'ऐसा ही है'—इस तरह स्वीक्रियमाण अर्थ सिद्धान्त कहलाता है । यह भी प्रमेय है । सिद्धान्तों के भिन्न होने पर ही वाद, जल्प, वितण्डा ( इन प्रमेयों ) की प्रवृत्ति होती है, अन्यथा नहीं । इसलिये सिद्धान्त को एक पृथक् प्रमेय माना है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ९ साधनीयार्थस्य यावति शब्दसमूहे सिद्धिः परिसमाप्यते, तस्य पञ्चावयवाः प्रतिज्ञादयः समूहमपेक्ष्यावयवा उच्यन्ते । तेषु प्रमाणसमवायः आगमः प्रतिज्ञा, हेतुरनुमानम्, उदाहरणं प्रत्यक्षम्, उपनयनमुपमानम्, सर्वेषामेकार्थसमवाये सामर्थ्यप्रदर्शनं निगमनमिति । सोऽयं परमो न्याय इति । एतेन वादजल्पवितण्डाः प्रवर्तन्ते, नातोऽन्यथेति । तदाश्रया च तत्त्वव्यवस्था । ते चैतेऽवयवाः शब्द- विशेषाः सन्तः प्रमेयेऽन्तर्भूताः, एवमर्थं पृथगुच्यन्त इति । तर्को न प्रमाणसंगृहीतः, न प्रमाणान्तरम्, प्रमाणानामनुग्राहकस्तत्त्वज्ञानाय कल्पते । तस्योदाहरणम्—किमिदं जन्म कृतकेन हेतुना निर्वर्त्यते ? आहोस्विद- कृतकेन ? अथाकस्मिकमिति ? एवमविज्ञातेऽर्थे कारणोपपत्त्या ऊहः प्रवर्तते— 'यदि कृतकेन हेतुना निर्वर्त्यते ? हेतूच्छेदादुपपन्नोऽयं जन्मोच्छेदः । अथाकृत- केन हेतुना ? ततो हेतूच्छेदाशक्यत्वादद्यनुपपन्नो जन्मोच्छेदः । अथाकस्मि- कम् ? अतोऽकस्मान्निर्वर्त्यमानं न पुनर्निर्वर्त्स्यतीति निवृत्तिकारणं नोपपद्यते, तेन जन्मानुच्छेदः' इति । एतस्मिंस्तर्कविषये कर्मनिमित्तं जन्मेति प्रमाणानि प्रवर्तमानानि तर्केणाऽनुगृह्यन्ते । तत्त्वज्ञानविषयस्य विभागात् तत्त्वज्ञानाय कल्पते पाँचों अवयवों द्वारा ज्ञापनीय अर्थ का जितने शब्दसमूह से विशेष प्रत्यय हो जाये, उस शब्दसमूह के प्रतिज्ञादि पाँचों अवयव समूह की अपेक्षा से अवयव कहलाते हैं । इन अवयवों में ही सब प्रमाण एकत्र हो जाते हैं । जैसे—'प्रतिज्ञा' शब्दप्रमाण है, 'हेतु' अनु- मान प्रमाण है, 'उदाहरण' प्रत्यक्ष प्रमाण है, 'उपनयन' उपमान प्रमाण है, सभी प्रमाणों का एकार्थ-प्रतिपादन में सामर्थ्य-प्रदर्शन 'निगमन' कहलाता है । इन्ही पाँचों अवयवों के सहारे—वाद, जल्प, वितण्डा की प्रवृत्ति होती है । तत्त्वज्ञान-व्यवस्था भी तदधीन है । इन पाँचों अवयवों के वस्तुतः शब्दविशेष ही होने के कारण प्रमेय के अन्तर्भूत होते हुए भी, इसीलिए इनका अलग से निर्वचन किया गया है । तर्क न प्रमाणों में अन्तर्भूत हो सकता है, न यह उन से कोई अलग प्रमाण है, अपितु उन प्रमाणों का सहकारिमात्र है, जैसे दीपक चक्षु का सहकारी होता है । उदाहरण— 'यह जन्म क्या विनाशी कारण से निष्पन्न होता है, या अविनाशी कारण से अथवा आकस्मिक कारण से ?'—इस प्रकार के संशयित अर्थ में सम्भावित कारण और कार्यों के विचार में तर्क उठता है—'यदि विनाशी कारण से जन्म निष्पन्न होता तो कारण के विनाश से जन्म का उच्छेद भी हो ही जायेगा, यदि अविनाशी कारण से निष्पन्न होगा तो कारण का नाश कभी न हो पाने के कारण जन्मोच्छेद ही असम्भव हो जायेगा, यदि आकस्मिक कारण माना जाये तो अकस्मात् जन्मोच्छेद हो पुनः जन्म निष्पन्न न होगा— इस तरह निवृत्तिकारण न बनने से जन्म का उच्छेद होगा ही नहीं । इस प्रकार की तर्कणा के अवसर पर 'जन्म कर्मनिमित्तक है'—ऐसा प्रमाणों से सिद्ध होता है । इस CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० तर्क इति । सोऽयमित्थम्भूतस्तर्कः प्रमाणसहितो वादे साधनाय, उपालम्भाय चार्थस्य भवतीत्येवमर्थं पृथगुच्यते प्रमेयान्तर्भूतोऽपीति । निर्णयस्तत्त्वज्ञानं प्रमाणानां फलम् । तदवसानो वादः । तस्य पालनार्थं जल्प- वितण्डे । तावेतौ तर्कनिर्णयौ लोकयात्रां वहत इति । सोऽयं निर्णयः प्रमेयान्त- र्भूत एवमर्थं पृथगुद्दिष्ट इति । वादः खलु नानाप्रवक्तृकः प्रत्यधिकरणसाधनोऽन्यतराधिकरणनिर्णयावसानो वाक्यसमूहः पृथगुद्दिष्ट उपलक्षणार्थम्; उपलक्षितेन व्यवहारस्तत्त्वज्ञानाय भवतीति । तद्विशेषौ जल्पवितण्डे तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थमित्युक्तम् ( ४. २. ५० ) । निग्रहस्थानेभ्यः पृथगुद्दिष्टा हेत्वाभासा वादे चोदनीया भविष्यन्तीति । जल्पवितण्डयोस्तु निग्रहस्थानानीति । सिद्धि में तर्क प्रमाणों का सहकारी बनकर तत्त्वज्ञान में सहायक होता है। इसीलिये इस तर्क को वाद में अर्थ की स्थापना तथा प्रतिषेध के लिए आचार्य ने पृथक् निर्दिष्ट किया है। वास्तव में इसका प्रमेय में ही अन्तर्भाव हो जायेगा । प्रमाणों के फल (प्रयोजन) तत्त्वज्ञान को निर्णय कहते हैं। किसी भी विषय का निष्कर्ष (निर्णय) निकले—इसी को लेकर 'वाद' किया जाता है। उस (निर्णय) की रक्षा (बाधकहेतुनिवारण तथा साधकहेतुधारण) के लिये ही जल्प तथा वितण्डा का प्रयोग किया जाता है। ये दोनों (तर्क और निर्णय) लोकव्यवहार को सफल बनाते हैं। इसलिये आचार्य ने निर्णय का पृथक् उल्लेख किया है। वस्तुतः यह प्रमेय के ही अन्त- र्भूत है। जो अनेक वक्ताओं (कम से कम दो) के रहने पर हो, प्रत्येक अधिकृत अर्थ उसका विषय हो, जिसके अन्त में किसी एक विषय के निर्णय पर पहुँचा जाये, ऐसे तर्क तथा पञ्चावयवसहित वाक्यसमूह को वाद कहते हैं। आचार्य ने इसे उपलक्षण (ज्ञान) के लिये अलग उद्दिष्ट किया है; क्योंकि ज्ञात वस्तु से ही व्यवहार तत्त्वज्ञान के लिये होता है। अपने आप में कुछ विशेषता रखनेवाले १ जल्प और वितण्डा तत्त्वनिश्चय-पालन के लिये हैं—ऐसा आगे कहेंगे (४. २. ५०) । निग्रहस्थानों से पृथक् करके उद्दिष्ट हेत्वाभासों का वाद में उपयोग होता है—ऐसा आगे (पंचम अध्याय में) कहेंगे। जल्प और वितण्डा निग्रहस्थान हैं। तात्पर्य यह है कि हेत्वाभासोद्भावन और वाद का तत्त्वनिर्णय में ही प्रयोजन है, वादविजय में नहीं; १. जल्प में छल, जाति, निग्रहस्थान के प्रयोग से अङ्गाधिक्य है, वितण्डा में स्वपक्षस्था- पन ही नहीं है—इस तरह ये दोनों क्रमशः अंगाधिक्य और अंगहानि वाले हैं। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ११ छलजातिनिग्रहस्थानानां पृथगुपदेश उपलक्षणार्थमिति । उपलक्षितानां स्ववाक्ये परिवर्जनम्, छलजातिनिग्रहस्थानानां परवाक्ये पर्यनुयोगः । जातेश्च परेण प्रयुज्यमानायाः सुलभः समाधिः, स्वयं च सुकरः प्रयोग इति । सेयमान्वीक्षिकी प्रमाणादिभिः पदार्थैर्विभज्यमाना— प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्त्तिता ॥ तदिदं तत्त्वज्ञानं निःश्रेयसाधिगमार्थं १ यथाविद्यं वेदितव्यम् । इह त्वध्यात्म- विद्यायामात्मादितत्त्वज्ञानं तत्त्वज्ञानम्, निःश्रेयसाधिगमोऽपवर्गप्राप्तिरिति ॥१॥ तत् खलु निःश्रेयसं किं तत्त्वज्ञानानन्तरमेव भवति ? नेत्युच्यते; किं तर्हि ? तत्त्वज्ञानात्— क्योंकि एक वाद में सभी निग्रहस्थानों का उद्भावन सम्भव नहीं है, परन्तु हेत्वाभास ऐसे निग्रहस्थान हैं जिनका वाद से सर्वथा उद्भावन हो सकता है । इसलिए इनका पृथक् उपदेश किया है । छल, जाति, निग्रहस्थान—इनका उपदेश उपलक्षण के लिये है । उपलक्षित छल, जाति, निग्रहस्थानों का अपने वाक्य में त्याग और दूसरों के वाक्य में प्रयोग किया जा सकता है । दूसरे द्वारा प्रयुक्त जाति का समाधान विद्वानों के लिये सुलभ है, अपने वाक्य में उसका प्रयोग करना भी उनके लिये सरल है । इस प्रकार ये संशयादि पदार्थ प्रमाण या प्रमेय में अन्तर्भूत होते हुए भी न्यायविद्या का प्रस्थान-भेद बताने के लिये पृथक् पढ़े गये हैं । यह आन्वीक्षिकी विद्या प्रमाणादि पदार्थों से विभक्त होती हुई, सभी अन्य विद्याओं के लिये दीपोपम है, सभी लौकिक-वैदिक कार्यों की उपकारिका (भृत्यादिवत् सहायिका) है, सभी धर्मों की आश्रय है । इस विद्या का यह संक्षिप्त रूप अर्थशास्त्र के विद्योद्देश में बताया गया है । यह 'तत्त्वज्ञान' और 'निःश्रेयसप्राप्ति' उस-उस विद्या के अनुसार ही समझना चाहिये । इस आन्वीक्षिकी विद्या (न्यायशास्त्र) में, जो कि अध्यात्म विद्या भी कहलाती है, आत्मा-आदि प्रमेयों का तत्त्वज्ञान ही 'तत्त्वज्ञान' कहलाता है और निःश्रेयसप्राप्ति 'मोक्षप्राप्ति' कहलाती है ॥ १ ॥ तो क्या यह निःश्रेयस (मोक्ष) तत्त्वज्ञान के बाद ही हो जाता है ? नहीं ! अपितु तत्त्वज्ञानसे— १. 'निःश्रेयसाधिगमश्च'—इति पाठ० ।
१२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायाद- पवर्गः ॥ २ ॥ तत्रात्माद्यपवर्गपर्यन्तं प्रमेये मिथ्याज्ञानमनेकप्रकारकं वर्त्तते । आत्मनि तावत्-नास्तीति । अनात्मनि-आत्मेति । दुःखे-सुखमिति । अनित्ये-नित्यमिति । अत्राणे-त्राणमिति । सभये-निर्भयमिति । जुगुप्सिते-अभिमतमिति । हातव्ये- अप्रतिहातव्यमिति । प्रवृत्तौ-'नास्ति कर्म, नास्ति कर्मफलम्' इति । दोषेषु- 'नायं दोषनिमित्तः संसारः' इति । प्रेत्यभावे-'नास्ति जन्तुर्जीवो वा, सत्त्व आत्मा वा यः प्रेयात्, प्रेत्य च भवेदिति, अनिमित्तं जन्म, अनिमित्तो जन्मोपरम इत्यादि- मान् प्रेत्यभावः, अनन्तश्चेति, नैमित्तिकः सन्नकर्मनिमित्तः प्रेत्यभाव इति, देहे- न्द्रियबुद्धिवेदनासन्तानोच्छेदप्रतिसन्धानाभ्यां निरात्मकः प्रेत्यभावः' इति । अपवर्गे-'भीष्मः खल्वयं सर्वकार्योपरमः, सर्वविप्रयोगेऽपवर्गे बहु भद्रकं लुप्यत इति कथं बुद्धिमान् सर्वसुखोच्छेदमचैतन्यममुपवर्गं रोचयेत्' इति । मिथ्या ज्ञान नष्ट होता है, मिथ्याज्ञान-नाश से दोष नष्ट होते हैं, दोषापाय से प्रवृत्ति नहीं होती, प्रवृत्ति न होने से जन्म नहीं होता, जन्म न होने से दुःख नहीं होता तथा दुःख के न होने से अपवर्ग (स्वतः सिद्ध) हो जाता है ॥ २ ॥ यहाँ आत्मा से अपवर्ग पर्यन्त प्रमेयों में अनेक तरह का मिथ्याज्ञान रहता है, जैसे— आत्मा 'नहीं हैं', ऐसा मिथ्याज्ञान; अनात्म-पदार्थों में 'आत्मा हैं' ऐसा; दुःख में 'सुख' ऐसा; अनित्य ( देहादि ) में 'नित्य' ऐसा; अत्राण ( कलत्र पुत्र गेहादि ) में 'त्राण' ऐसा; सभय ( धन-पुत्र आदि ) में 'निर्भय' ऐसा; जुगुप्सित ( अस्थि, मांस, शोणित, मल, मूत्रादि से युक्त स्वशरीर-परशरीर ) में 'प्रशस्त' ऐसा; हातव्य (जन्म आदि संसार ) में 'अप्रहातव्य' ऐसा; प्रवृत्ति (पुण्य-पापादि अदृष्ट कर्म) में 'कर्म नहीं हैं', 'कर्म स्वर्ग-नर- कादि-फलप्रद नहीं हैं' ऐसा; दोष ( राग, द्वेष, मोह ) में 'यह संसार दोष के कारण नहीं हैं' ऐसा; प्रेत्यभाव (मरकर पुनः जन्म लेना) में 'ऐसा कोई जन्तु (पैदा करनेवाला) या जीव ( पैदा होनेवाला ) नहीं है, तो आत्मा नहीं है जो मरे या मरकर पुनः जन्म ले' ऐसा; 'जन्म में कोई निमित्त ( धर्माधर्मादि ) नहीं है, मोक्ष भी अनिमित्त (तत्त्वज्ञान के बिना ही ) होता है', इसलिये 'यह मरना-जीना आदिमान् और अनन्त हैं', 'यह मरना-जीना स्वभावादिनिमित्तक तो है, पर कर्मनिमित्तक नहीं हैं', यह मरना-जीना, देह, इन्द्रिय, बुद्धि, वेदना ( हर्ष-शोकविषाद ) के उच्छेद, प्रतिसन्धान से रहित ( क्षणिक- विज्ञान-स्वरूप या शून्यरूप ) हैं' ऐसा; मोक्ष के विषय में 'समस्त कार्यों से उपरति निश्चय ही भयानक होगी, सबसे अलग इस अपवर्ग में सभी मनोरञ्जक तथा सुखकर बातें लुप्त हो जायेंगी तो कौन बुद्धिमान् सर्वसुखोच्छेद रूप मोक्ष को चाहेगा'—ऐसा ( मिथ्या ज्ञान होता है ) । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
२. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् १३ एतस्मान्मिथ्याज्ञानादनुकूलेषु रागः, प्रतिकूलेषु द्वेषः । रागद्वेषाधिकाराच्चाऽसूयेर्ष्यामायालोभादयो दोषा भवन्ति । दोषैः प्रयुक्तः शरीरेण प्रवर्त्तमानो हिंसास्तेयप्रतिषिद्धमैथुनान्य्याचरति, वाचाऽनृतपरुषसूचनाऽ- सम्बद्धानि, मनसा परद्रोहं परद्रव्याभीप्सां नास्तिक्यं चेति । सेयं पापात्मिका प्रवृत्तिरधर्माय । अथ शुभा—शरीरेण दानं परित्राणं परिचरणं च, वाचा सत्यं हितं प्रियं स्वाध्यायं चेति, मनसा दयामस्पृहां श्रद्धां चेति । सेयं धर्माय । अत्र प्रवृत्तिसाधनौ धर्माधर्मौ प्रवृत्तिशब्देनोक्तौ । यथा—अन्नसाधनाः प्राणाः ‘अन्नं वै प्राणिनः प्राणाः’ इति । सेयं प्रवृत्तिः कुत्सितस्याभिपूजितस्य च जन्मनः कारणम् । जन्म पुनः— इस मिथ्याज्ञान से अनुकूल विषय में राग तथा प्रतिकूल विषय में द्वेष होता है । राग द्वेष का विषय बन जाने से असूया ( गुणों में दोषाविष्करण ), ईर्ष्या ( शत्रु की प्रिय वस्तु की हानि की इच्छा ), माया ( दम्भ ), लोभ ( अन्याय से परद्रव्य पाने की इच्छा ) आदि दोष उत्पन्न होते हैं । दोषों के वशीभूत होकर शरीर से चेष्टा करता हुआ हिंसा, स्तेय, प्रतिषिद्ध मैथुन ( परदारागमन ) आदि का आचरण करता है । वाणी से चेष्टा करता हुआ अनृत ( मिथ्या वचन ) परुष ( कठोर = दुःखद वचन ) सूचना ( चुगली करना ) असम्बद्ध ( ऊटपटांग प्रलाप ) आदि का; तथा मनसे चेष्टा करता हुआ परद्रोह ( जिघांसा या अपकार ), परद्रव्य की इच्छा करना, नास्तिक्य ( परलोक नहीं हैं—ऐसी बुद्धि ) का आचरण करता है । यह पापात्मिका प्रवृत्ति अधर्म ( अशुभ ) के लिये होती है । अब शुभ प्रवृत्ति का वर्णन करते हैं—शरीर से चेष्टा करता हुआ वह मन्त्रादिपूर्वक या सामान्यतः दान करता है, परित्राण ( निरीह प्राणियों की रक्षा ), परिचरण ( तीर्था- टन या गुरुसेवा ) करता है । वाणी से चेष्टा करता हुआ सत्य ( यथार्थ ), हित ( उप- कारक ), प्रिय ( प्रीतिकर ) वचन बोलता है । मन से चेष्टा करता हुआ दया ( निःस्वार्थ दुःखप्रहाणेच्छा ), स्वाध्याय ( वेद या पुराण आदि का अध्ययन ) करता है । अस्पृहा ( लोभत्याग ), श्रद्धा ( शास्त्र में दृढ विश्वास ) रखता है । यह शुभ प्रवृत्ति धर्म ( शुभा- दृष्ट ) के लिये होती है । इस सूत्र में प्रवृत्ति के साधन धर्म और अधर्म को ‘प्रवृत्ति’ पद से कह दिया गया है । जैसे—‘अन्नं वै प्राणाः’ इस श्रुति में प्राणों के साधन अन्न को ‘प्राण’ कह दिया गया । यह प्रवृत्ति कुत्सित या प्रशस्त जन्म का कारण होती है। शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि—तीनों के निकाय ( सजातीय कुलों ) से विशिष्ट प्रादुर्भाव को ‘जन्म’ कहते हैं । जन्म होने पर CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० शरीरेन्द्रियबुद्धीनां निकायविशिष्टः प्रादुर्भावः । तस्मिन् सति दुःखम् । तत्पुनः प्रतिकूलवेदनीयम्-बाधना, पीडा, ताप इति । त इमे मिथ्याज्ञानादयो दुःखान्ता धर्मा अविच्छेदेनैव प्रवर्तमानाः-संसार इति । यदा तु तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञानमपैति, तदा मिथ्याज्ञानापाये दोषा अपयन्ति, दोषापाये प्रवृत्तिरपैति, प्रवृत्त्यपाये जन्मापैति, जन्मापाये दुःखमपैति, दुःखापाये च आत्यन्तिकोऽपवर्गो निःश्रेयसमिति । तत्त्वज्ञानं तु खलु मिथ्याज्ञानविपर्ययेण व्याख्यातम्। आत्मनि तावत्- अस्तीति, अनात्मनि-अनात्मेति । एवं दुःखे, अनित्ये, अत्राणे, सभये, जुगुप्सिते, हातव्ये च यथाविषयं वेदितव्यम् । प्रवृत्तौ-'अस्ति कर्म अस्ति कर्मफलम्' इति । दोषेषु-'दोषनिमित्तोऽयं संसारः' इति । प्रेत्यभावे खलु-'अस्ति जन्तुर्जीवः, सत्त्वः आत्मा वा यः प्रेत्य भवेदिति, निमित्तवज्जन्म, निमित्तवान् जन्मोपरम इत्यानादिः प्रेत्यभावोऽपवर्गान्त इति, नैमित्तिकः सन् प्रेत्यभावः प्रवृत्तिनिमित्त इति, सात्मकः सन् देहेन्द्रियबुद्धिवेदनासन्तानोच्छेदप्रतिसन्धानाभ्यां प्रवर्त्तते' इति । अपवर्गे-'शान्तः खल्वयं सर्वविप्रयोगः; सर्वोपरमोऽपवर्गः, बहु च कृच्छ्रं घोरं दुःख होता है । वह दुःख प्रतिकूलवेदनीय ( अहित रूप से अनुभवनीय ) होता है । उसे बाधना ( व्यथा ) पीड़ा, ताप भी कहते हैं । ये मिथ्याज्ञान से लेकर दुःखपर्यन्त धर्म अवि- च्छिन्न रूपसे जब प्रवृत्त होते हैं तो इसे ही 'संसार' कहते हैं । और जब तत्त्वज्ञान से मिथ्याज्ञान नष्ट हो जाता है, तब मिथ्याज्ञान के न रहने से दोष नष्ट हो जायेंगे दोषनाश से प्रवृत्ति नहीं होगी, प्रवृत्ति न होने से जन्म नहीं होगा, जन्म न होने से दुःख नहीं होगा तथा दुःख के न होनेपर आत्यन्तिक ( ऐकान्तिक ) अपवर्ग 'निःश्रेयस' ( मोक्ष ) हो जाता है । तत्त्वज्ञान का व्याख्यान मिथ्याज्ञान के व्याख्यान से उलटा किया गया है । जैसे- आत्मा के विषय में 'है' ऐसा, अनात्म पदार्थों में 'अनात्मा' ऐसा । इसी तरह दुःख, अनित्य, .अत्राण, सभय, जुगुप्सित तथा हातव्य के बारे में भी विषय के अनुसार समझना चाहिये । प्रवृत्ति के विषय में-'कर्म हैं', 'कर्मों का फल हैं' ऐसा; दोषों के बारे में 'यह संसार दोषों से उत्पन्न हैं' ऐसा; पुनर्जन्म के बारे में-'है ऐसा जीव या जन्तु सत्त्व या आत्मा, जो मरकर पुनः जन्म ग्रहण करे' ऐसा, 'जन्म की उपरति भी निमित्त कारण- वाली है, अतः यह मरना-जीना प्रवाहरूप से अनादि होते हुए मोक्षपर्यन्त है' ऐसा, 'यह मरना-जीना नैमित्तिक होता हुआ प्रवृत्तिनिमित्तक है' ऐसा; 'सात्मक होता हुआ देह, इन्द्रिय, बुद्धि वेदना की सन्तति ( निरन्तर प्रवाह ) से उच्छेद और प्रतिसन्धान द्वारा प्रवृत्त होता है' ऐसा; अपवर्ग के विषय में-'यह सभी से नाता टूटना बहुत ही शान्त है, सब तरह से छुटकारा पा जाना अपवर्ग है, इससे बहुत ही कठिन और भयानक पाप CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
पापकं लुप्यत इति कथं बुद्धिमान् सर्वदुःखोच्छेदं सर्वदुःखसंविदमपवर्गं न रोचयेदिति । तद्यथा-मधुविषसम्पृक्तान्नमनादेयमिति, एवं सुखं दुःखानुषक्त- मनादेयम्' इति ॥ २ ॥ २. प्रमाणप्रकरणम् [ ३-८ ] त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिः—उद्देशः, लक्षणम्, परीक्षा चेति । तत्र नामधेयेन पदार्थमात्रस्याभिधानमुद्देशः । तत्रोद्दिष्टस्य तत्त्वव्यवच्छेदको धर्मो लक्षणम् । लक्षितस्य 'यथालक्षणमुपपद्यते न वा' इति प्रमाणैरवधारणं परीक्षा । तत्रोद्दिष्टस्य प्रविभक्तस्य लक्षणमुच्यते, यथा-प्रमाणानां प्रमेयस्य च । उद्दिष्टस्य लक्षितस्य च विभागवचनम्, यथा छलस्य-'वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या च्छलम्, तत्त्रिविधम्'-( १. २. ५१-५२ ) इति । अथोद्दिष्टस्य विभागवचनम्— प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि ॥ ३ ॥ अक्षस्याऽक्षस्य प्रतिविषयं वृत्तिः = प्रत्यक्षम् । वृत्तिस्तु-सन्निकर्षः, ज्ञानं वा। यदा सन्निकर्षस्तदा ज्ञानं प्रमितिः, यदा ज्ञानं तदा हानोपादानोपेक्षाबुद्धयः फलम् । विनष्ट हो गये, कौन बुद्धिमान् ऐसे सब दुःखों तथा उनकी अनुभूति से छुटकारा दिलाने- वाले अपवर्ग को न चाहेगा ! जैसे जहर मिला हुआ मीठा भोजन नहीं खाया जाता, वैसे ही दुखानुपक्त सुख भी नहीं चाहा जाता' ॥ २ ॥ उद्देश, लक्षण, परीक्षा—यों तीन प्रकार से इस शास्त्र की प्रवृत्ति होती है। उनमें केवल नाम लेकर पदार्थ का गिनाना 'उद्देश' कहलाता है। उद्दिष्ट ( नाममात्र से गिनाये गये ) का स्वरूपभेदक धर्म 'लक्षण' कहलाता है। लक्षित (स्वरूपभेदक धर्मवान्) का 'यह लक्षणानुसारी है या नहीं'—इसका प्रमाणों से निश्चय करना 'परीक्षा' कहलाती है। यह विभाग पुनः दो प्रकार का है—१. जो उद्दिष्ट तथा प्रविभक्त हैं उनका लक्षण कहा जाता है, जैसे—प्रमाण और प्रमेयों का । २. तथा जो उद्दिष्ट तथा लक्षित हैं उनका विभाग कहा जाता है, जैसे—छल का विभागवचन ( १. २. ५१-५२ )। अब यह उद्दिष्ट का विभागवचन है— प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द-ये चार प्रमाण ( हैं ) ॥ ३ ॥ इन्द्रिय की प्रत्येक विषय को लेकर वृत्ति ही 'प्रत्यक्ष' कहलाती है। संनिकर्ष या प्रमिति ही यहाँ 'वृत्ति' पद का वाच्य है। जब संनिकर्ष होगा तभी ज्ञान होगा, वही प्रमिति है, और तब हान (त्याग), उपादान (ग्रहण) या उपेक्षा बुद्धि रूप फल निष्पन्न होगा ।
१६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० अनुमानम्-मितेन लिङ्गेन लिङ्गिनोऽर्थस्य पश्चान्मानमनुमानम् । उपमानम्-सारूप्यज्ञानम्१, 'यथा गौरेवं गवयः' इति । सारूप्यं२ तु सामान्ययोगः । शब्दः-शब्द्यतेऽनेनार्थ इत्यभिधीयते = ज्ञायते । 'उपलब्धिसाधनानि प्रमाणानि' इति समाख्यानिर्वचनसामर्थ्याद् बोद्धव्यम् । 'प्रमीयतेऽनेन' इति करणार्थाभिधानो हि प्रमाणशब्दः । तद्विशेषसमाख्याया अपि तथैव व्याख्यानम् । किं पुनः प्रमाणानि प्रमेयमभिसम्पप्लवन्ते ? अथ प्रमेयं व्यवतिष्ठन्त इति ? उभयथा दर्शनम्-'अस्त्यात्मा' इत्याप्तोपदेशात् प्रतीयते, तत्रानुमानम्-'इच्छा- द्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्' ( १ १. १० ) इति, प्रत्यक्षम्-युञ्जा- नस्य योगसमाधिजमात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मा प्रत्यक्ष इति । अग्निरप्तो- पदेशात् प्रतीयते-'अत्राऽग्निः' इति, प्रत्यासीदता धूमदर्शनेनानुमीयते, प्रत्यासन्नेन अनुमान-व्याप्ति या पक्षधर्मता से प्रमित लिङ्ग ( हेतु ) द्वारा लिङ्गी ( ज्ञाप्य ) अर्थ के पश्चात् ( प्रत्यक्षानन्तर हुए ) मान को 'अनुमान' कहते हैं। उपमान-सादृश्यज्ञान को 'उपमान' कहते हैं। 'जैसी यह गौ है ऐसा ही गवय होता हैं' । सारूप्य से तात्पर्य है सामान्य सादृश्य सम्बन्ध । शब्द-जिस विभक्त्यन्तसमूह से वाक्यार्थबोध होता हो वह 'शब्द' प्रमाण है। प्रमाण उपलब्धि के साधन हैं-यह 'प्रमाण' इस समाख्या ( नाम ) के निर्वचन ( 'प्रमीयतेऽनेन' इस तृतीया समास ) से समझना चाहिए । 'प्रमीयतेऽनेन' (जिसके द्वारा प्रमिति की जाये)-इस व्युत्पत्ति से 'प्रमाण' शब्द करण अर्थ को बतलाता है। तत्तद्विशेष ( प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द ) की समाख्या का भी इसी तरह करणव्युत्पत्ति से व्याख्यान समझना चाहिए । क्या एक एक प्रमेय में कई प्रमाणों का व्यापार होता है ? या एक एक का ही ? १. कई प्रमाण भी देखे जाते हैं। जैसे 'आत्मा हैं' इसमें आप्तोपदेश (शाब्द) प्रमाण है, 'इच्छा द्वेष, सुख दुःख, प्रयत्न, ज्ञान-ये आत्मा के लिंग हैं' (१. १. १०) यह अनुमान प्रमाण भी है, तथा आत्मा में मनोयोगविशेष करनेवाले को योगसमाधिज प्रत्यक्ष भी होता है अतः हम यह मान सकते हैं कि आत्म-मन के सम्बन्धविशेष से आत्मा का प्रत्यक्ष भी होता है। इसी तरह अग्नि के बारे में आप्तादेश (वृद्धोपदेश) से 'यह अग्नि हैं' ऐसा ज्ञान होता है। पर्वत के समीप जानेवाले को धूमदर्शन से अनुमान द्वारा वह्नि- ज्ञान होता है। समीप गये हुए को प्रत्यक्ष भी होता है। २. एक प्रमाण भी देखा जाता १. 'सामीप्यज्ञानम्'-इति पाठ० । २. 'सामीप्यम्'-इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri