भारतकोश
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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

२०८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० निन्द्रियाधिष्ठानं न प्राप्तम्, न चासत्यां त्वचि किञ्चिद्विषयग्रहणं भवति, यया सर्वेन्द्रियस्थानानि व्याप्तानि, यस्यां च सत्यां विषयग्रहणं भवति, सा त्वगेक- मिन्द्रियमिति ? न; इन्द्रियान्तरार्थानुपलब्धेः। स्पर्शोपलब्धिलक्षणायां सत्यां त्वचि गृह्यमाणे त्वगिन्द्रियेण स्पर्शे इन्द्रियान्तरार्था रूपादयो न गृह्यन्ते अन्धादिभिः। न स्पर्श- ग्राहकादिन्द्रियादिन्द्रियान्तरमस्तीति स्पर्शवदन्धादिभिर्गृह्येरन् रूपादयः, न च गृह्यन्ते; तस्मान्नैकमिन्द्रियं त्वगिति। त्वगवयवविशेषेण धूमोपलब्धिवत्तदुपलब्धिः। यथा त्वचोऽवयवविशेषः कश्चि- च्चक्षुषि सन्निकृष्टो धूमस्पर्शं गृह्णाति नान्यः, एवं त्वचोऽवयवविशेषा रूपादि- ग्राहकाः, तेषामुपघातादन्धादिभिर्न गृह्यन्ते रूपादय इति ? व्याहतत्वादहेतुः। त्वग्व्यतिरेकादेकमिन्द्रियमित्युक्त्वा 'त्वगवयवविशेषेण धूमोपलब्धिवद्रूपाद्युपलब्धिः' इत्युच्यते। एवं च सति, नानाभूतानि विषयग्राह- काणि, विषयव्यवस्थानात्; तद्भावे विषयग्रहणस्य भावात्, तदुपघाते चाभावात्। तथा च पूर्वो वाद उत्तरेण वादेन व्याहन्यत इति। गृहीत हो सकता है ! अतः जिससे सभी इन्द्रियस्थान व्याप्त हैं, या जिसके रहने पर सब विषयों का ग्रहण हो पाता है, वह 'त्वग्' ही एक इन्द्रिय है ? उत्तर—नहीं, क्योंकि त्वगिन्द्रिय से दूसरी इन्द्रियों के विषय उपलब्ध नहीं हो पाते। स्पर्शोपलब्धिलक्षणवाली त्वगिन्द्रिय द्वारा गृह्यमाण स्पर्श से अन्ध पुरुष रूपादि का ग्रहण नहीं कर पाते ! यदि स्पर्शग्राहक इन्द्रिय से अतिरिक्त अन्य इन्द्रियाँ न होती तो स्पर्श की तरह रूपादि का ज्ञान भी अन्य पुरुषों को होना चाहिये। होता है नहीं, अतः निश्चित है कि एक 'त्वग्' ही इन्द्रिय नहीं है ( अपितु अन्य इन्द्रियाँ भी हैं )। 'त्वगवयव ही इन्द्रियाँ हैं' ऐसा मानकर त्वगवयवविशेष से धूमोपलब्धि की तरह तत्तदर्थ की उपलब्धि हो जायेगी। जैसे त्वग् का कोई अवयवविशेष चक्षु के समीप होता हुआ धूमस्पर्श का ग्रहण कर लेता है, अन्य अवयव नहीं; इसी तरह त्वग् के अवयवविशेष रूपादि के ज्ञाता हैं, उन अवयवविशेषों के उपघात से अन्ध पुरुषों को रूपादि गृहीत नहीं हो पाते ? वचनविरोध होने से यह हेतु नहीं बनता। पहले तो कहा था कि 'अभेद होने से केवल एक त्वगिन्द्रिय है'; अब कहते हो 'त्वगवयवविशेष से धूमाद्युपलब्धि की तरह रूपादि की उपलब्धि हो जाती है', ऐसा मानने पर विषयव्यवस्था से विषयग्राहक अनेक होंगे, जब वे होंगे तो विषयज्ञान हो जायगा, उनके उपघात होने पर विषयज्ञान न होगा। यों आपका वह पूर्वकथन इस उत्तरकथन से विरुद्ध पड़ रहा है।

५५. सू० ] इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् २०९

५५. सू० ] इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् २०९ सन्दिग्धश्चाव्यतिरेकः । पृथिव्यादिभिरपि भूतैरिन्द्रियाधिष्ठानानि व्याप्तानि, न च तेष्वसत्सु विषयग्रहणं भवतीति । तस्मान्न त्वगन्यद्वा सर्वविषयमेक- मिन्द्रियमिति ॥ ५३ ॥ न युगपदर्थानुपलब्धेः ॥ ५४ ॥ आत्मा मनसा सम्बध्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियं सर्वार्थैः सन्निकृष्टमिति— आत्मेन्द्रियमनोऽर्थसन्निकर्षेभ्यो युगपद् ग्रहणानि स्युः । न च युगपद्रूपादयो गृह्यन्ते, तस्मान्नैकमिन्द्रियं सर्वविषयकमस्तीति । असाहचर्याच्च विषयग्रहणानां नैकमिन्द्रियं सर्वविषयकम्, साहचर्यं हि विषयग्रहणानामन्याद्यनुपपत्तिरिति ॥५४॥ विप्रतिषेधाच्च न त्वगेका ॥ ५५ ॥ न खलु त्वगेकमिन्द्रियम्; व्याघातात् । त्वचा रूपाण्यप्राप्तानि गृह्यन्त इति, अप्राप्यकारित्वे स्पर्शादिष्वप्येवं प्रसङ्गः । स्पर्शादीनां च प्राप्तानां ग्रहणाद् रूपा- दीनां प्राप्तानां ग्रहणमिति प्राप्तम् । प्राप्याप्राप्यकारित्वमिति चेत् ? आवरणानुपपत्तेर्विषयमात्रस्य ग्रहणम् । अथापि मन्येत—प्राप्ताः स्पर्शादयस्त्वचा गृह्यन्ते, रूपाणि त्वप्राप्तानीति ? एवं अभेद हेतु भी सन्दिग्ध है । पृथिवी आदि अन्य भूतों द्वारा इन्द्रियाधिष्ठान व्याप्त हैं, उन भूतों के रहे बिना विषयज्ञान नहीं हो सकता । अतः त्वग्, या कोई अन्य इन्द्रिय एकाकी सर्वविषयग्राहक नहीं है ॥ ५३ ॥ अर्थों को एक साथ उपलब्धि न होने से एक ही इन्द्रिय नहीं है ॥ ५४ ॥ 'आत्मा मन से सम्बद्ध होता है, मन इन्द्रिय से, इन्द्रिय सब अर्थों से सन्निकृष्ट हैं'— इस सिद्धान्त से आत्मा, मन, इन्द्रिय, अर्थ के सन्निकर्षों से एक ही साथ अनेक ज्ञान होने चाहिये ! जब कि रस-रूपादिज्ञान एक साथ नहीं होते । अतः यह निश्चित है कि सर्व- विषयग्राहक एक इन्द्रिय नहीं है । यदि युगपदर्थज्ञान मानोगे तो अन्धादि को भी स्पर्श के साथ-साथ रूपादि का ज्ञान होने लगेगा ॥ ५४ ॥ विप्रतिषेध के कारण एक त्वग् ही इन्द्रिय नहीं है ॥ ५५ ॥ अर्थविरोध होने से त्वग् ही एक इन्द्रिय नहीं है; क्योंकि त्वग् से रूप अप्राप्त होते हुए गृहीत होते हैं। यों अप्राप्यकारित्व मानने पर स्पर्शादि में भी अप्राप्यकारित्वप्रसंग होने लगेगा । प्राप्त स्पर्शादि के ग्रहण से प्राप्त रूपादि का भी ग्रहणप्रसङ्ग प्राप्त होगा । यदि इन्द्रिय को प्राप्याप्राप्यकारित्व मानें तो आवरणानुपपत्ति होने से विषयमात्र का ग्रहण होने लगेगा। यदि यह मानें कि 'प्राप्य स्पर्शादि त्वग् से गृहीत हो जाते हैं, किन्तु रूपादि न्या० द० : १४

एकत्वप्रतिषेधाच्च नानात्वसिद्धौ स्थापनाहेतुरप्युपादीयते—

२१० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० सति नास्यावरणम्, आवरणानुपपत्तेश्च रूपमात्रस्य ग्रहणं व्यवहितस्य चाव्य- वहितस्य चेति। दूरान्तिकानुविधानं च रूपोपलब्ध्यनुपलब्ध्योर्न स्यात्। अप्राप्तं त्वचा गृह्यते रूपमिति दूरे रूपस्याग्रहणम्, अन्तिके च ग्रहणम्—इत्येतन्न स्यादिति ॥ ५५ ॥ एकत्वप्रतिषेधाच्च नानात्वसिद्धौ स्थापनाहेतुरप्युपादीयते— इन्द्रियार्थपञ्चत्वात् ॥ ५६ ॥ अर्थः प्रयोजनम्, तत् पञ्चविधमिन्द्रियाणाम्, स्पर्शनेनेन्द्रियेण स्पर्शग्रहणे सति न तेनैव रूपं गृह्यत इति रूपग्रहणप्रयोजनं चक्षुरनुमीयते; स्पर्शरूपग्रहणे च ताभ्यामेव न गन्धो गृह्यत इति गन्धग्रहणप्रयोजनं घ्राणमनुमीयते; त्रयाणां ग्रहणे न तैरेव रसो गृह्यते इति रसग्रहणप्रयोजनं रसनमनुमीयते; चतुर्णां ग्रहणे न तैरेव शब्दः श्रूयते इति शब्दग्रहणप्रयोजनं श्रोत्रमनुमीयते। एवमिन्द्रिय- प्रयोजनस्यानितरेतरसाधनसाध्यत्वात् पञ्चैवेन्द्रियाणि ॥ ५६ ॥ न, तदर्थबहुत्वात् ? ॥ ५७ ॥ न खल्विन्द्रियार्थपञ्चत्वात् पञ्चेन्द्रियाणीति सिद्ध्यति। कस्मात् ? तेषा- प्राप्य होकर गृहीत नहीं होते हैं' तो आवरण की बात कहाँ आयेगी कि इसकी अनु- पपत्ति से व्यवहित या अव्यवहित रूपादि का ग्रहण होना चाहिये। सन्निकृष्ट, विप्रकृष्ट वाली बात रूपोपलब्धि या रूपानुपलब्धि में नहीं बनेगी। 'त्वग् द्वारा अप्राप्य रूप गृहीत होगा तो दूर होने से गृहीत नहीं होता, समीप का रूप गृहीत हो जाता है'—यह व्यवस्था नहीं बनेगी ॥ ५५ ॥ एकत्व के खण्डन से अनेकत्व सिद्ध हो जाने पर, उस अनेकत्व की स्थापना में हेतु भी देते हैं— इन्द्रियों के पांच अर्थ होने से ॥ ५६ ॥ अर्थ से सूत्रकार का तात्पर्य है—प्रयोजन। इन्द्रियों का वह प्रयोजन पांच प्रकार का है। त्वगिन्द्रिय से स्पर्शज्ञान होने पर उसी से रूपज्ञान नहीं हो पाता—अतः उस ज्ञान के लिए चक्षुरिन्द्रिय का अनुमान होता है ! स्पर्श तथा रूप का ज्ञान होने पर भी उन्हीं इन्द्रियों से गन्ध का ज्ञान नहीं होता; अतः गन्धज्ञानप्रयोजनवाली घ्राणेन्द्रिय का अनुमान किया जाता है। इन तीनों का ज्ञान होने पर भी उन्हीं तीनों इन्द्रियों से रस का ज्ञान नहीं हो पाता—अतः रसज्ञान के लिए रसनेन्द्रिय का अनुमान होता है। इन चारों का ज्ञान उन उन इन्द्रियों से होने पर भी उन्हीं से शब्द नहीं सुनायी पड़ता, अतः शब्द- ग्रहणप्रयोजनक श्रोत्रेन्द्रिय का अनुमान करना पड़ता है। इस तरह इन इन्द्रियप्रयोजनों के एक दूसरे के साधनों द्वारा साध्य न होने से पांच ही इन्द्रियाँ हैं ॥ ५६ ॥ शंका— उन इन्द्रियों का प्रयोजनबहुत्व होने से ऐसा नहीं ? ॥ ५७ ॥ इन्द्रियों के पाँच प्रयोजन होने से पाँच की सिद्धि करनी हो तो उतनी ही सिद्धि

५८. सू० ] इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् २११

५८. सू० ] इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् २११ मर्थानां बहुत्वात् । बहवः खल्विमे इन्द्रियार्थाः—स्पर्शास्तावच्छीतोष्णानुष्ण- शीता इति, रूपाणि शुक्लहरितादीनि, गन्धा इष्टानिष्टोपेक्षणीयाः, रसाः कटुकादयः, शब्दा वर्णात्मानो ध्वनिमात्राश्च भिन्नाः । तद्यस्येन्द्रियार्थपञ्च- त्वात् पञ्चेन्द्रियाणि, तस्येन्द्रियार्थबहुत्वाद् बहूनि इन्द्रियाणि प्रसज्यन्त इति ? ॥ ५७ ॥ गन्धत्वाद्यव्यतिरेकाद् गन्धादीनामप्रतिषेधः ॥ ५८ ॥ गन्धत्वादिभिः स्वसामान्यैः कृतव्यवस्थानां गन्धादीनां यानि गन्धादि- ग्रहणानि तान्यसमानसाधनसाध्यत्वात् ग्राहकान्तराणि प्रयोजयन्ति । अर्थ- समूहोऽनुमानमुक्तः, नार्थैकदेशः; नार्थैकदेशं चाश्रित्य विषयपञ्चत्वमात्रं भवान् प्रतिषेधति; तस्मादयुक्तोऽयं प्रतिषेध इति । कथं पुनर्गन्धत्वादिभिः स्वसामान्यैः कृतव्यवस्था गन्धादय इति ? स्पर्शः खल्वयं त्रिविधः—शीत उष्णोऽनुष्णाशीतश्च स्पर्शत्वेन स्वसामान्येन संगृहीतः । नहीं होतीं; क्योंकि उनके प्रयोजन बहुत से हैं। इन इन्द्रियप्रयोजनों की बहुलता है, जैसे— एक स्पर्श को ही लें—यह अकेला शीत, उष्ण, अनुष्ण भेदवाला है । इसी तरह शुक्ल, हरित आदि भेद से रूप अनेक प्रकार का है; गन्ध भी इष्ट, अनिष्ट, उपेक्षणीय भेद से; रस मधुर, कटु आदि भेद से; शब्द वर्ण तथा ध्वनि भेद से अनेक प्रकार के होते हैं । अतः जो वादी यह कहता है कि ‘इन्द्रियों के पाँच ही प्रयोजन होने से इन्द्रियाँ पांच हैं’, उसके सामने अनेक प्रयोजन सिद्ध होने से अनेक इन्द्रियों का प्रसंग आ पड़ा ? ॥ ५७ ॥ उत्तर— गन्धसमूह के गन्धत्वेन एक होने से गन्धादिक का प्रतिषेध नहीं होता ॥ ५८ ॥ गन्धत्वादि स्वसामान्य ( एकत्वजाति ) से व्यवस्थित ( अनुगत ) गन्धादि का ज्ञान विजातीय तत्तत् साधनों ( ग्राहकों ) से साध्य हैं, अतः वे इन्द्रियान्तर का अनुमान कराने लगते हैं । क्योंकि हम अर्थसमूह को ही अनुमापक हेतु कहते हैं, न कि प्रयोजनैक- देश को; जब कि प्रयोजनैकदेश के सहारे आप विषयपञ्चत्व का प्रतिषेध करने खड़े हो गये । अतः आपका यह प्रतिषेध उचित नहीं । गन्धत्वादि स्वसामान्य से गन्धादि कैसे व्यवस्थित हैं ? यह स्पर्श तीन प्रकार का है—शीत, उष्ण, अनुष्णाशीत भेद से । ये तीनों स्पर्शत्व स्वसामान्य से संगृहीत हो जाते हैं । शीतस्पर्श के गृहीत होते हुए उष्ण या अनुष्णशीत स्पर्श गृहीत होता है, उनका ग्रहण शीतस्पर्श ग्राहक से ही होता है । अतः एकसाधनसाध्य होने से

२१२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० गृह्यमाणे च शीतस्पर्शे, नोष्णस्यानुष्णाशीतस्य वा स्पर्शस्य ग्रहणं ग्राहकान्तरं प्रयोजयति; स्पर्शभेदानामेकसाधनसाध्यत्वाद्-येनैव शोतस्पर्शो गृह्यते तेनैवे- तरावपीति । एवं गन्धत्वेन गन्धानाम्, रूपत्वेन रूपाणाम्, रसत्वेन रसानाम्, शब्दत्वेन शब्दानामिति । गन्धादिग्रहणानि पुनरसमानसाधनसाध्यत्वाद् ग्राह- कान्तराणां प्रयोजकानि । तस्मादुपपन्नम्-‘इन्द्रियार्थपञ्चत्वात् पञ्चेन्द्रियाणि' इति ॥ ५८ ॥ यदि सामान्यं संग्राहकम्, प्राप्तमिन्द्रियाणाम् विषयत्वाव्यतिरेकादेकत्वम् ? ॥ ५९ ॥ विषयत्वेन हि सामान्येन गन्धादयः सङ्गृहीता इति ॥ ५९ ॥ न; बुद्धिलक्षणाधिष्ठानगत्याकृतिजातिपञ्चत्वेभ्यः ॥ ६० ॥ न खलु विषयत्वेन सामान्येन कृतव्यवस्था विषया ग्राहकान्तरनिरपेक्षा एक- साधनग्राह्या अनुमीयन्ते, अनुमीयन्ते च पञ्च गन्धादयो गन्धत्वादिभिः स्वसा- मान्यैः कृतव्यवस्था इन्द्रियान्तरग्राह्याः, तस्मादसम्बद्धमेतत् । अयमेव चार्थोऽनूच्यते-बुद्धिलक्षणपञ्चत्वादिति । बुद्धय एव लक्षणानि विषय- उष्ण आदि स्पर्शान्तर का ग्रहण ग्राहकान्तर ( इन्द्रियान्तर ) का अनुमापक नहीं है । इसी प्रकार गन्धत्वसामान्य से समग्र गन्धों का, रूपत्वसामान्य से सभी रूपों का, रस- त्वसामान्य से सम्पूर्ण रसों का, शब्दत्वसामान्य से सब शब्दों का ग्रहण सिद्ध हो सकता है। गन्धादि विजातीय गुणविशेष का ज्ञान असमान साधनों द्वारा साध्य होने से ग्राह- कान्तर का अनुमान करा सकते हैं । अतः प्रयोजन समूहभेद के पाँच प्रकार के होने से इन्द्रियाँ भी पाँच ही हैं ॥ ५८ ॥ यदि जाति ही संग्रहिका हैं तो इन्द्रियों का— विषयत्वाभेद से एकत्व उपपन्न होने लगेगा ? ॥ ५९ ॥ विषयत्वसामान्य से गन्धादि का संग्रह होने से एक ही इन्द्रिय में सबका संग्रह हो जायेगा ? ॥ ५९ ॥ नहीं; बुद्धि, लक्षण, अधिष्ठान, गति, आकृति—इन से ( वे गन्धादि संगृहीत होते ) ॥ ६० ॥ विषयत्वसामान्य से व्यवस्थित विषय ग्राहकान्तरनिरपेक्ष होते हुए एकेन्द्रियग्राह्यत्वेन अनुमित नहीं होते । गन्धादि पाँच गन्धत्वादि स्वसामान्य से व्यवस्थित होकर इन्द्रिया- न्तरग्राह्य हैं । अतः यह इन्द्रिय का एकत्व असम्बद्ध है । इसी बात को इस सूत्र में बुद्धिलक्षणपञ्चत्व से स्पष्ट कर रहे हैं । तत्तद्बुद्धियाँ ही इन्द्रियत्वसाधक विषयग्रहण के पाँच भेद होने से उनके पञ्चत्व के लक्षण हैं । यह बात CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६०. सू० ] इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् २१३

६०. सू० ] इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् २१३ ग्रहणलिङ्गतत्वाद्विन्द्रियाणाम्, तदेतत् 'इन्द्रियार्थपञ्चत्वात्' ( ३. १. ५६ ) इत्ये- तस्मिन् सूत्रे कृतभाष्यमिति । तस्माद् बुद्धिलक्षणपञ्चत्वात् पञ्चेन्द्रियाणि । अधिष्ठानान्यपि खलु पञ्चेन्द्रियाणाम् । सर्वशरीराधिष्ठानं स्पर्शनं स्पर्श- ग्रहणलिङ्गम्, कृष्णताराधिष्ठानं चक्षुर्बहिर्निःसृतं रूपग्रहणलिङ्गम्, नासाधिष्ठानं घ्राणम्, जिह्वाधिष्ठानं रसनम्, कर्णच्छिद्राधिष्ठानं श्रोत्रम्; गन्धरसरूपस्पर्श- शब्दग्रहणलिङ्गतत्वादिति । गतिभेदादपीन्द्रियभेदः । कृष्णसारोपनिवद्धं चक्षुर्बहिर्निःसृतं रूपाधिकर- णानि द्रव्याणि प्राप्नोति । स्पर्शनादीनि त्विन्द्रियाणि विषया एवाश्रयोपसर्प- णात् प्रत्यासीदन्ति । सन्तानवृत्त्या शब्दस्य श्रोत्रप्रत्यासत्तिरिति । आकृतिः खलु परिमाणम्, इयत्ता । सा पञ्चधा—स्वस्थानमात्राणि घ्राण- रसन-स्पर्शनानि विषयग्रहणेनानुमेयानि; चक्षुः कृष्णसाराश्रयं बहिर्निःसृतं विषय- व्यापि; श्रोत्रं नान्यदाकाशात्, तच्च विभु शब्दमात्रानुभवानुमेयं पुरुषसंस्कारो- पग्रहाच्चाधिष्ठाननियमेन शब्दस्य व्यञ्जकमिति । हमने ऊपर 'इन्द्रियार्थों के पांच होने से' ( ३.१.५६. ) सूत्र में स्पष्ट कर दी है । अतः बुद्धिलक्षण पाँच होने से इन्द्रियाँ भी पाँच हैं । पाँचों इन्द्रियों के अधिष्ठान भी पाँच ही हैं । सम्पूर्ण शरीर का आश्रय लेनेवाली स्पर्शनेन्द्रिय स्पर्शज्ञान का हेतु है । कनीनिका का आश्रय लिये हुए चक्षुरिन्द्रिय बहिर्निःसृत रूपज्ञान का हेतु है । घ्राणेन्द्रिय नासाधिष्ठानवाली है, रसनेन्द्रिय जिह्वाधिष्ठानवाली है, श्रोत्रेन्द्रिय कर्णच्छिद्राधिष्ठानवाली है । इस प्रकार ये सभी पाँच विजातीय क्रमशः गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द ज्ञान की हेतु हैं । गतिभेद से भी इन्द्रियभेद सिद्ध होता है । कनीनिका से संयुक्त चक्षु बाहर निकल, रूपाश्रय द्रव्य तक पहुँचती है । स्पर्शनादि इन्द्रियों के विषय ही उन इन्द्रियों के पास पहुँच जाते हैं । सन्तानवृत्ति से शब्द श्रोत्र के पास पहुँचता है । आकृति कहते हैं—परिमाण को, इयत्ता को । वह आकृति पाँच प्रकार की है । घ्राण, रसन, स्पर्शनेन्द्रियाँ स्वस्थानमात्र पर्याप्त हैं, तथा स्व स्व विषय के ग्रहण से अनुमित होती हैं । चक्षु कनीनिकाधिष्ठित हो, बाहर निकल कर विषय को व्याप्त करती है, श्रोत्रेन्द्रिय आकाश से भिन्न नहीं है, वह आकाश नित्य है, शब्दमात्र के अनु- भव से अनुमेय है, पुरुषों के दृष्टादृष्टाख्य संस्कारविशेष सम्बन्ध अथवा संस्कारबल से वह अधिष्ठान होकर शब्द का व्यञ्जक है । इस प्रकार आकृति से भी ये इन्द्रियाँ सिद्ध होती हैं ।

२१४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० जातिरिति योनिं प्रचक्षते । पञ्च खल्विन्द्रिययोनयः-पृथिव्यादीनि भूतानि, तस्मात् प्रकृतिपञ्चत्वादपि पञ्चेन्द्रियाणीति सिद्धम् ॥ ६० ॥ कथं पुनर्ज्ञायते-भूतप्रकृतीनीन्द्रियाणि, नाव्यक्तप्रकृतीनीति ? भूतगुणविशेषोपलब्धेस्तादात्म्यम् ॥ ६१ ॥ दृष्टो हि वाय्वादीनां भूतानां गुणविशेषाभिव्यक्तिनियमः । वायुः स्पर्श- व्यञ्जकः, आपो रसव्यञ्जिकाः, तेजो रूपव्यञ्जकम्, पार्थिवं किञ्चिद् द्रव्यं कस्यचिद् द्रव्यस्य गन्धव्यञ्जकम् । अस्ति चायमिन्द्रियाणां भूतगुणविशेषो- पलब्धिनियमः, तेन भूतगुणविशेषोपलब्धेर्मन्यामहे-भूतप्रकृतीनीन्द्रियाणि, नाव्यक्तप्रकृतीनीति ॥ ६१ ॥ अर्थपरीक्षाप्रकरणम् [ ६२-७४ ] 'गन्धादयः पृथिव्यादिगुणाः' ( १. १. १४ ) इत्युद्दिष्टम्; उद्देशश्च पृथिव्यादीनामेकगुणत्वे चानेकगुणत्वे समानम्, इत्यत आह- गन्धरसरूपस्पर्शशब्दानां स्पर्शपर्यन्ताः पृथिव्याः ॥ ६२ ॥ अप्तेजोवायूनां पूर्वं पूर्वमपोह्याकाशस्योत्तरः ॥ ६३ ॥ : स्पर्शपर्यन्तानामिति विभक्तिविपरिणामः । आकाशस्योत्तरः शब्दः स्पर्श- जाति कहते हैं योनि (प्रकृति, कारणविशेष) को । पृथ्वी आदि पाँच भूत पाँचों इन्द्रियों की योनि हैं। अतः पृथक् पृथक् पाँच प्रकृति होने से भी ये इन्द्रियाँ पाँच हैं ॥ ६० ॥ यह कैसे ज्ञात होता है कि इन्द्रियाँ भूतप्रकृतिक हैं, अव्यक्तप्रकृतिक नहीं ? प्रत्येक भूत की गुणविशेषोपलब्धि से उनके साथ तादात्म्य ज्ञात होता है ॥ ६१ ॥ वायु आदि भूतों का गुणविशेषाभिव्यक्तिनियम लोक में देखा गया है। वायु स्पर्श- व्यञ्जक है, जल रसव्यञ्जक है, तेज रूपव्यञ्जक है, कोई पार्थिवद्रव्य उसी द्रव्य की गन्ध का व्यञ्जक है । यह इन्द्रियों का भूतगुणविशेषोपलब्धिनियम है, इस भूतगुणविशेषो- पलब्धि से हम मान लेते हैं कि इन्द्रियां भूतप्रकृतिक हैं, अव्यक्तप्रकृतिक नहीं ॥ ६१ ॥ पीछे हम नामसंकीर्तनरूप से कह आये हैं कि 'पृथिव्यादि भूतों के गन्धादि विषय हैं' (१. १. १४), यह नामसंकीर्तन पृथ्व्यादि के एक गुण या अनेक गुण होने पर भी समान ही है—ऐसा संशय होने पर, कहते हैं— गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्दों में स्पर्शपर्यन्त पृथ्वी के विषय हैं ॥ ६२ ॥ इन में से पूर्व का एक एक छोड़ कर जल, तेज, वायु के विषय हैं, आकाश का केवल अन्तिम ( शब्द ) विषय है ॥ ६३ ॥ 'स्पर्शपर्यन्त' शब्द में विभक्तिविपरिणाम करके 'स्पर्शपर्यन्त गुणों से उत्तर'—ऐसा

६५ सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २१५

६५ सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २१५ पर्यन्तेभ्य इति । कथं तर्हि तरब्निर्देशः ? स्वतन्त्रविनियोगसामर्थ्यात् । तेनोत्तर- शब्दस्य परार्थाभिधानं विज्ञायते । उद्देशसूत्रे हि स्पर्शपर्यन्तेभ्यः परः शब्द इति । तन्त्रं वा, स्पर्शस्य विवक्षितत्वात् । स्पर्शपर्यन्तेषु नियुक्तेषु योज्यस्तदुत्तरः शब्द इति ॥ ६२-६३ ॥ न; सर्वगुणानुपलब्धेः ॥ ६४ ॥ नायं गुणनियोगः साधुः । कस्मात् ? यस्य भूतस्य ये गुणा न ते तदात्म- केनेन्द्रियेण सर्वे उपलभ्यन्ते । पार्थिवेन हि घ्राणेन स्पर्शपर्यन्ता न गृह्यन्ते, गन्ध एव एको गृह्यते । एवं शेषेष्वपीति ॥ ६४ ॥ कथं तर्हीमे गुणा विनियोक्तव्या इति ? एकैकश्येनोत्तरगुणसद्भावादुत्तरोत्तराणां तदनुपलब्धिः ? ॥ ६५ ॥ गन्धादीनामेकैको यथाक्रमं पृथिव्यादीनामेकैकस्य गुणः, अतस्तदनुपलब्धिः । तेषां तयोः तस्य चानुपलब्धिः—घ्राणेन रसरूपस्पर्शानाम्, रसनेन रूपस्पर्शयोः, चक्षुषा स्पर्शस्येति ? अर्थ समझना चाहिए । 'उत्तर' यह तरप्प्रत्यय से निर्देश क्यों किया ? क्योंकि सूत्रकार में शब्दों के स्व-तन्त्रानुसार विनियोग (प्रयोग) की सामर्थ्य रहती है । इस तरब्निर्देश से उत्तर शब्द पर अर्थ को बतलाता है—ऐसा विज्ञात होता है । उद्देशसूत्र में कथित स्पर्श- पर्यन्तों से पर शब्द ऐसी व्यवस्था है । या उत्तर शब्द में, स्पर्श विवक्षित होने से, तन्त्र समझना चाहिए—'स्पर्शपर्यन्तों के बारे में निर्धारण कर देने के बाद बाकी बचा उस स्पर्श से आगे का शब्द'—ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥ ६२-६३ ॥ शंका— एक भूत में अनेक गुण नहीं हैं; क्योंकि सब गुणों की उपलब्धि नहीं हो पाती ? ॥ ६४॥ आप का यह गुणयोग उचित नहीं है, क्योंकि जिस भूत के ये गुण नहीं हैं, वे सब तदात्मक इन्द्रिय से उपलब्ध नहीं हो पाते । पार्थिव घ्राणेन्द्रिय से स्पर्शपर्यन्त सभी विषय गृहीत नहीं हो पाते; अपितु एक गन्ध विषय ही गृहीत हो पाता है । घ्राणपृथ्वी में सभी गुणों के रहने से सब का उससे ग्रहण होना चाहिये । इसी तरह अवशिष्ट के बारे में भी समझ लें ? ॥ ६४ ॥ अतः इन गुणों का विनियोग कैसे समझा जाय ? एकैकक्रम से उत्तरोत्तर ( रसादि के ) गुण होने से उत्तरोत्तर ( अबादि ) के गुणों ( रसादि ) की उपलब्धि नहीं होती ? ॥ ६५ ॥ गन्धादि गुणों में से एक-एक क्रमशः पृथ्वी आदि में पूर्व-पूर्व में उत्तरोत्तर का सम्बन्ध रहने पर भी गुण यथाक्रम पृथिव्यादि एक एक महाभूत का हैं, अतः उन अति- रिक्त—तीन, दो, या एक की उपलब्धि नहीं हो पाती । जैसे घ्राण से रस-रूप-स्पर्श की, रसन से रूप-स्पर्श की, चक्षु से स्पर्श की उपलब्धि नहीं हो पाती ?

२१६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० कथं तह्य॑नेकगुणानि भूतानि गृह्यन्त इति ? संसर्गाच्चानेकगुणग्रहणम् । अबादिंससर्गाच्च पृथिव्यां रसादयो गृह्यन्ते । एवं शेषेष्वपीति ? ॥ ६५ ॥ नियमस्तर्हि न प्राप्नोति, संसर्गस्यानियमाच्चतुर्गुणा पृथिवी, त्रिगुणा आपः, द्विगुणं तेजः, एकगुणो वायुरिति ? नियमश्चोपपद्यते, कथम् ? विष्टं ह्यपरं परेण ? ॥ ६६ ॥ पृथिव्यादीनां पूर्वपूर्वमुत्तरेणोत्तरेण विष्टम्, अतः संसर्गनियम इति । तच्चैतद् भूतसृष्टौ वेदितव्यम्, नैतर्हीति ? ॥ ६६ ॥ न, पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् ॥ ६७ ॥ नेति त्रिसूत्रीं प्रत्याचष्टे । कस्मात् ? पार्थिवस्य द्रव्यस्याप्यस्य च प्रत्यक्षत्वात् । 'महत्त्वानेकद्रव्यत्वाद्रूपाच्चोपलब्धिः' (वै. सू. ४.१.६) इति तैजसमेव द्रव्यं प्रत्यक्षं स्यात्, न पार्थिवमाप्यं वा; रूपाभावात् । तैजसवत्तु पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् न सिद्धान्ती—अनेक गुणवाले भूतों का ग्रहण कैसे होता है ? पूर्वपक्षी—सम्बन्ध से अनेक गुणों का ग्रहण हो जायेगा। जलादि के सम्बन्ध से पृथ्वी में रसादि गृहीत हो जाते हैं। इसी तरह अवशिष्ट के बारे में भी समझ लेना चाहिये ॥ ६५ ॥ सिद्धान्ती—तब-तो एक-एक वाला नियम बन नहीं पायगा जलादि संसर्ग का नियम न होने से यह कैसे बनेगा कि पृथ्वी में चार गुण ( विषय ) होते हैं, जल में तीन गुण होते हैं, तेज में दो गुण होते हैं, वायु में एक गुण होता है ? पूर्वपक्षी—नियम भी उपपन्न हो सकता है। कैसे ? पृथिव्यादि अबादि से सम्बद्ध है ? ॥ ६६ ॥ पृथिवी-आदि में पहला पहला भूत, अपने उत्तर उत्तर भूत से सम्बद्ध है। अतः सम्बन्ध से नियम बन सकता है। यह नियम विषयभूतसृष्ट्यादि के प्रतिपादक पुराणादि ग्रन्थों में स्पष्ट प्रतिपादित है, भले ही आज हम लोगों के ध्यान में न आवें ? ॥ ६६ ॥ इस मत का नैयायिक प्रत्याख्यान करते हैं— पार्थिव और आप्य द्रव्य के प्रत्यक्ष होने से ( एकगुणवान् नहीं हैं ) ॥ ६७ ॥ 'न' इस पद से सूत्रकार पूर्वोक्त त्रिसूत्री से प्रतिपादित विषय का प्रत्याख्यान करते हैं। कैसे ? पार्थिव और आप्य द्रव्य के प्रत्यक्ष होने से । तब तो महत्त्व से, अनेक द्रव्या- श्रित होने से, और रूपवान् होने से उसी की उपलब्धि होती है, यों तैजस द्रव्य का तो प्रत्यक्ष हो जायेगा, परन्तु रूपवान् न होने से पार्थिव और आप्य द्रव्य का प्रत्यक्ष न हो CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६७. सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २१७

६७. सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २१७ संसर्गादिनेकगुणग्रहणं भूतानामिति । भूतान्तररूपकृतं च पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वं ब्रुवतः प्रत्यक्षो वायुः प्रसज्यते, नियमे वा कारणमुच्यतामिति । रसयोर्वा पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् । पार्थिवो रसः षड्विधः, आप्यो मधुर एव, न चैतत्संसर्गाद्भवितुमर्हति । रूपयोर्वा पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् तैजसरूपानुगृहीतयोः । संसर्गे हि व्यञ्जकमेव रूपं न व्यङ्ग्यमस्तीति । एकानेकविधत्वे च पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्ष- त्वाद् रूपयोः । पार्थिवं हरितलोहितपीताद्यनेकविधं रूपम्, आप्यं तु शुक्लमप्रका- शकम् । न चैतदेकगुणानां संसर्गे सत्युपलभ्यते इति । उदाहरणमात्रं चैतत् । अतः परं प्रपञ्चः । स्पर्शयोर्वा पार्थिवतैजसयोः प्रत्यक्षत्वात् । पार्थिवोऽनुष्णाशीतः स्पर्श उष्ण- स्तैजसः प्रत्यक्षः, न चैतदेकगुणानामनुष्णाशीतस्पर्शेन वायुना संसर्गेणोपपद्यत इति । अथ वा—पार्थिवाप्ययोर्द्रव्ययोर्व्यवस्थितगुणयोः प्रत्यक्षत्वात् । चतुर्गुणं सकेगा । तेज के सदृश ही पृथिवी जल का प्रत्यक्ष होने से इतर संसर्गप्रयुक्त उनका प्रत्यक्ष मानना उचित नहीं है। तब आप का यह सिद्धान्त कहाँ रह जायेगा कि सम्बन्ध से भूतों में अनेक विषयों का ग्रहण हो जाता है ! यदि उक्त पार्थिव या आप्य द्रव्य के प्रत्यक्ष को भूतान्तररूपजन्य मानोगे तो इस नय से वायु का भी प्रत्यक्ष होने लगेगा । यदि कोई इसके लिये प्रतिबन्धकनियम बनाते हो तो उसमें कोई हेतु बताना चाहिये । अथवा—'पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात्' का व्याख्यान 'रस' तथा 'रूप' आदि का अध्या- हार करके यों करना चाहिये—पार्थिव तथा आप्य रस के प्रत्यक्ष होने से । पार्थिव रस छह प्रकार का है, जब कि आप्य रस मधुर ही होता है, यह सम्बन्ध से नहीं बन सकता । अथवा—तैजस रूप से अनुगृहीत पार्थिव तथा आप्य रूप का प्रत्यक्ष होने से । तैजस सम्बन्ध मानने पर रूप व्यञ्जक ही होगा, व्यङ्ग्य नहीं । पार्थिव तथा आप्य रूपों का अनेक तथा एक प्रकार भेद से प्रत्यक्ष होने से भी उसका प्रत्यक्ष संसर्गप्रयुक्त नहीं है । पार्थिव रूप हरा, लाल, पीला आदि अनेक प्रकार का है, जब कि आप्य रूप एक अप्र- काशक शुक्ल ही होता है । यह बात गुणान्तर का सम्बन्ध मानने पर कैसे बनती ! यह उदाहरणमात्र दिखा दिया है । आगे इसी बात को विस्तार से समझा रहे हैं । अथवा—पार्थिव तथा तैजस स्पर्श के प्रत्यक्ष होने से । पार्थिव स्पर्श अनुष्णाशीत है, जब कि तैजस स्पर्श उष्ण प्रत्यक्ष होता है । यह बात एक गुणवाले अन्य द्रव्यों का अनुष्णाशीतस्पर्श वाली वायु के साथ सम्बन्ध मानने पर कैसे बनेगी ! अथवा—व्यवस्थित गुणवाले पार्थिव तथा आप्य द्रव्यों के प्रत्यक्ष होने से । पार्थिव

२१८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० पार्थिवं द्रव्यमु, त्रिगुणमाप्यं प्रत्यक्षम्, तेन तत्कारणमनुमीयते तथाभूतमिति । तस्य कार्यं लिङ्गं कारणाभावाद्धि कार्याभाव इति । एवं तैजसवायव्ययोर्द्रव्ययोः प्रत्यक्षत्वाद् गुणव्यवस्थायाः तत्कारणे द्रव्ये व्यवस्थानुमानमिति । दृष्टश्च विवेकः—पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् । पार्थिवं द्रव्यमबादिभिर्वियुक्तं प्रत्यक्षतो गृह्यते, आप्यं च पराभ्याम्, तैजसं च वायुना, न चैकैकगुणं गृह्यत इति । निरनुमानं तु 'विष्टं ह्यपरं परेण' ( ३.१.६६ ) इत्येतदिति, नात्र लिङ्गम- नुमापकं गृह्यत इति येनैतदेवं प्रतिपद्येमहि । यच्चोक्तम्—'विष्टं ह्यपरं परेणेति भूतसृष्टौ वेदितव्यं न साम्प्रतम्' इति ? नियमकारणाभावादयुक्तम्¹ । दृष्टं च साम्प्रतमपरं परेण विष्टमिति वायुना च विष्टं तेज इति । विष्टत्वं संयोगः, स च द्वयोः समानः वायुना च विष्टत्वात् स्पर्शवत्तेजः, न तु तेजसा विष्टत्वाद् रूपवान् वायुरिति नियमकारणं नास्तीति । द्रव्य चतुर्गुण प्रसिद्ध है, जब कि आप्य द्रव्य त्रिगुण ही, इस व्यवस्थित गुणकार्य से व्यवस्थितगुण वाले कारण का अनुमान करते है । इस अनुमान का हेतु वह कार्य ही है, क्योंकि कारण न होने से ही कार्य नहीं होता है । इसी प्रकार, तैजस तथा वायव्य द्रव्यों के प्रत्यक्ष होने के कारण गुणव्यवस्था से कार्यव्यवस्था का अनुमान होता है। पार्थिव और आप्य पृथक्-पृथक् देखा गया है । पार्थिव द्रव्य का प्रत्यक्ष जलादि से रहित होने पर भी होता है, इसी तरह जलीय द्रव्य तेज तथा वायु से रहित भी प्रत्यक्ष से गृहीत होता है, और तैजस द्रव्य वायु से रहित स्वतन्त्रतया प्रत्यक्ष से गृहीत होता है । उस समय ये एक एक गुण वाले गृहीत नहीं होते हैं। आप का यह कहना तो निरनुमान ही है कि 'पृथिव्यादि अवादि से व्याप्त हैं' ( ३.१.६६ ) । क्योंकि यहाँ हमें ऐसा कोई अनुमापक हेतु नहीं मिलता, जिससे आप की बात से हम सहमत हो सकें । तथा आप का यह कहना भी अयुक्त ही है कि 'पृथिव्यादि अवादि से व्याप्त हैं, यह बात भूतसृष्टिप्रतिपादक पुराणों में प्रतिपादित है, भले ही आज कल हम लोगों के ध्यान में न आवें'; क्योंकि यहाँ भी आपने कोई नियमहेतु नहीं दिखाया । आज भी हम अपर (तेज) को दूसरे ( वायु ) से विष्ट ( संयुक्त ) देखते हैं, जैसे—तेज वायु से संयुक्त है । विष्टत्व का अर्थ है 'संयोग' । वह तो दोनों का समान ही है । तथा वायु से संयुक्त होने से तेज स्पर्शवान् है, परन्तु तेज से संयुक्त होने पर भी वायु रूपवान् नहीं बनती—इसमें नियमहेतु नहीं है। यह भी हम देखते हैं कि तैजस उष्ण स्पर्श से १. नियमः 'गन्ध एव पृथिव्याम्' इत्येवमादिः, तस्य कारणं प्रमाणं नास्ति; तद्बाधकस्यैव प्रमाणस्योक्तत्वात् । तस्माद् भूतसृष्टिः कथञ्चिदुपचारतो व्याख्येयेति तात्पर्यटीकायां मिश्राः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६८. सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २१९

६८. सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २१९ दृष्टं च तैजसेन स्पर्शेन वायव्यस्य स्पर्शस्याभिभवादग्रहणमिति, न च तेनैव तस्याभिभव इति ॥ ६७ ॥ तदेवं न्यायविरुद्धं प्रवादं प्रतिषिध्य ‘न सर्वगुणानुपलब्धेः’ (३.१.६४) इति चोदितं समाधीयते— पूर्वपूर्वगुणोत्कर्षात् तत्तत्प्रधानम् ॥ ६८ ॥ तस्मान्न सर्वगुणोपलब्धिः । घ्राणादीनां पूर्वं पूर्वं गन्धादेर्गुणस्योत्कर्षात्तत्तत् प्रधानम् । का प्रधानता ? विषयग्राहकत्वम् । को गुणोत्कर्षः ? अभिव्यक्तौ समर्थत्वम् । यथा बाह्यानां पार्थिवाप्यतैजसानां द्रव्याणां चतुर्गुणत्रिगुणद्विगु- णानां न सर्वगुणव्यञ्जकत्वम्, गन्धरसरूपोत्कर्षात्तु यथाक्रमं गन्धरसरूपव्यञ्ज- कत्वम् । एवं घ्राणरसनचक्षुषां चतुर्गुणत्रिगुणद्विगुणानां न सर्वगुणग्राहकत्वम्, गन्धरसरूपोत्कर्षात्तु यथाक्रमं गन्धरसरूपग्राहकत्वम् । तस्माद् घ्राणादिभिर्न सर्वेषां गुणानामुपलब्धिरिति । यस्तु प्रतिजानीते—‘गन्धगुणत्वाद् घ्राणं गन्धस्य ग्राहकमेवं रसनादिष्वपि’ इति ? तस्य यथागुणयोगं घ्राणादिभिर्गुणग्रहणं प्रसज्यत इति ॥ ६८ ॥ वायव्य ( अनुष्णाशीत ) स्पर्श अभिभूत हो जाता है, परन्तु वायव्य स्पर्श से ही वायव्य स्पर्श का अभिभव हमें नहीं मिला ॥ ६७ ॥ इस रीति से, न्यायविरुद्ध संवाद का खण्डन कर, पूर्वपक्षी ‘सब गुणों की उपलब्धि न होने से नहीं’ ( ३. १. ६४ ) उक्ति का समाधान कर रहे हैं— पूर्वं पूर्व ( गुण ) के उत्कर्ष से वह वह प्रधान होता है ॥ ६८ ॥ इस लिये सब गुणों की उपलब्धि नहीं हो पाती । घ्राणादि इन्द्रियों में पूर्व पूर्व गन्धादि गुण का उत्कर्ष होने से उस उस गुण से वह इन्द्रिय प्रधान है । यह प्रधानता है—‘विषयग्राहकत्व’ । तथा गुणोत्कर्ष है—‘अभिव्यक्ति में सामर्थ्य’ । जैसे क्रमशः चार गुणवाले, तीन गुणवाले, तथा दो गुणवाले बाह्य पार्थिव, आप्य, तैजस का सर्वगुण- व्यञ्जकत्व नहीं होता; अपितु क्रमशः गन्ध, रस, रूप के उत्कर्ष से गन्ध, रस और रूप व्यञ्जक होता है। उसी प्रकार चार गुण, तीन गुण तथा दो गुण वाली घ्राण, रसन, तथा चक्षु इन्द्रियाँ भी सब विषयों की ग्राहक नहीं हैं, अपितु गन्ध, रस तथा रूप के उत्कर्ष से क्रमशः गन्ध, रस, तथा रूप की ही ग्राहक हैं । अतः घ्राणादि एक एक इन्द्रिय से सब विषयों की उपलब्धि नहीं होती । जो यह प्रतिज्ञा करता है कि—‘गन्ध गुण होने से घ्राणेन्द्रिय गन्ध को ग्रहण करती है’, इसी तरह रसनेन्द्रिय के विषय में प्रतिज्ञा करता है, उसको यथागुणसम्बन्ध से तत्तद्विषय का ग्रहण प्रसक्त होता है; हमारे मत में नहीं ॥ ६८ ॥

२२० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [३. अ० १. आ० किंकृतं पुनर्व्यवस्थानम्-किञ्चित् पार्थिवमिन्द्रियं न सर्वाणि, कानिचिदाप्य- तैजसवायव्यानि इन्द्रियाणि न सर्वाणीति ? तद्व्यवस्थानं तु भूयस्त्वात् ॥ ६९ ॥ अर्थनिर्वृत्तिसमर्थस्य प्रविभक्तस्य द्रव्यस्य संसर्गः पुरुषसंस्कारकारितः 'भूयस्त्वम्' । दृष्टो हि प्रकर्षे भूयस्त्वशब्दः, प्रकृष्टो यथा विषयो भूयानित्युच्यते । यथा पृथगर्थक्रियासमर्थानि पुरुषसंस्कारवशाद्विषौषधिमणिप्रभृतीनि द्रव्याणि निर्वर्त्यन्ते, न सर्वं सर्वार्थम्; एवं पृथग्विषयग्रहणसमर्थानि घ्राणादीनि निर्वर्त्यन्ते, न सर्वविषयग्रहणसमर्थानीति ॥ ६९ ॥ स्वगुणान्नोपलभन्ते इन्द्रियाणि । कस्मादिति चेत् ? सगुणानामिन्द्रियभावात् ॥ ७० ॥ स्वान् गन्धादीन्नोपलभन्ते घ्राणादीनि । केन कारणेनेति चेत् ? स्वगुणैः सह घ्राणादीनामिन्द्रियभावात् । घ्राणं स्वेन गन्धेन समानार्थकारिणा सह बाह्यं गन्धं गृह्णाति, तस्य स्वगन्धग्रहणं सहकारिवैकल्यान्न भवति । एवं शेषाणामपि ॥ ७० ॥ यह व्यवस्था कैसे बन गयी कि कोई इन्द्रिय ही पार्थिव है सब इन्द्रियाँ नहीं, या कोई इन्द्रिय ही आप्य है, कोई इन्द्रिय ही तैजस है, कोई इन्द्रिय ही वायव्य है, सब नहीं ? उस द्रव्य का भूयस्त्व ( प्रकृष्टत्व ) होने से ऐसी व्यवस्था बन जाती है ॥ ६९ ॥ पुरुष के कर्मविशेष से किया गया, कार्योत्पत्ति में समर्थ, प्रविभक्त द्रव्य के संसर्ग को 'भूयस्त्व' कहते हैं । प्रकर्ष अर्थ में 'भूयस्त्व' का प्रयोग देखा जाता है, जैसे- प्रकृष्ट विषय को 'भूयान्' कह देते हैं । यथा-पुरुषसंस्कारवश से विषौषधि, मणि-आदि द्रव्य पृथक्-पृथक् क्रिया करने में समर्थ उत्पन्न होते हैं । अतएव सब द्रव्य सभी क्रिया नहीं कर सकते । इसी प्रकार, अलग-अलग विषय को ग्रहण करने में समर्थ इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, न कि सब विषयों को ग्रहण करने में समर्थ ॥ ६९ ॥ शङ्का-इन्द्रियाँ स्वगुणों को उपलब्ध नहीं करतीं; क्योंकि उनका इन्द्रियत्व स्वविषयसहित होता है ॥ ७० ॥ घ्राणादि इन्द्रियाँ स्वविषय गन्धादि को ग्रहण नहीं करतीं; क्योंकि स्वविषयों के साथ मिलकर घ्राणादिकों में 'इन्द्रियत्व' आता है । घ्राण अपने समानार्थकारी गन्ध के साथ होकर बाह्य गन्ध को ग्रहण करता है । उसका स्वगन्धग्रहण सहकारिकारण के असम्बन्ध से नहीं बनता । इसी तरह अन्य इन्द्रियों के विषय में भी समझना चाहिए ॥७०॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

७३. सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २२१

७३. सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २२१ यदि पुनर्गन्धः सहकारो च स्याद्, घ्राणस्य ग्राह्यश्च ? इत्यत आह— तैनैव तस्याग्रहणाच्च ॥ ७१ ॥ न गुणोपलब्धिरिन्द्रियाणाम् । यो ब्रूते-यथा वाह्यं द्रव्यं चक्षुषा गृह्यते तथा तेनैव चक्षुषा तदेव चक्षुर्गृह्यतामिति, तादृगिदम्; तुल्यो ह्युभयत्र प्रति- पत्तिहेत्वभाव इति ॥ ७१ ॥ न, शब्दगुणोपलब्धेः ? ॥ ७२ ॥ स्वगुणान्नोपलभन्त इन्द्रियाणीति एतन्न भवति । उपलभ्यते हि स्वगुणः शब्दः श्रोत्रेणेति ? ॥ ७२ ॥ तदुपलब्धिरितरेतरद्रव्यगुणवैधर्म्यात् ॥ ७३ ॥ न शब्देन गुणेन सगुणमाकाशमिन्द्रियं भवति, न शब्दः शब्दस्य व्यञ्जकः । न च घ्राणादीनां स्वगुणग्रहणं प्रत्यक्षम्, नाप्यनुमीयते । अनुमीयते तु श्रोत्रेणा- काशेन शब्दस्य ग्रहणम्, शब्दगुणत्वं च आकाशस्येति । परिशेषश्चानुमानं वेदितव्यम् । आत्मा तावत् श्रोता न करणम्, मनसः श्रोत्रत्वे बधिरत्वाभावः, इस पर पूर्वपक्षी कहता है कि यदि गन्ध को सहकारी भी मान लें और घ्राणेन्द्रिय का ग्राह्य भी मान लें ? उसी से उसका ग्रहण न होने से ॥ ७१ ॥ इन्द्रियों से स्वगुणोपलब्धि नहीं होती, क्योंकि जैसे कोई कहे—'यथा बाह्य द्रव्य चक्षु से गृहीत होता है उसी तरह उसी चक्षु से वह चक्षु गृहीत हो जायेगी', ऐसी ही बात यह हुई । मतलब कहने का यह है कि दोनों ही जगह ज्ञान के हेतु का अभाव समान है ॥ ७१ ॥ ऐसा नहीं; क्योंकि शब्द गुण श्रोत्र से उपलब्ध होता है ? ॥ ७२ ॥ 'इन्द्रियां अपने गुणों को उपलब्ध नहीं करतीं'—ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा स्वगुण शब्द गृहीत होता देखा जाता है ? ॥ ७२ ॥ इतरेतर द्रव्य के गुणवैधर्म्य से उसकी उपलब्धि होती है ॥ ७३ ॥ शब्द गुण से सगुण होकर आकाश इन्द्रिय ( शब्दाभिन्न गुण सहित ) नहीं हैं; क्योंकि शब्द शब्द का व्यञ्जक नहीं होता । घ्राणादि का भी स्वगुण प्रत्यक्ष नहीं होता, और न उनका अनुमान होता है । श्रोत्ररूप आकाश से शब्दग्रहण का अनुमान अवश्य होता है, और तब यह भी अनुमान होता है कि शब्द आकाश का गुण है । यहाँ कौन- सा अनुमान है ? परिशेष अनुमान समझना चाहिये । अनुमानप्रकार दिखाते हैं—'आत्मा श्रोता है, श्रोत्र नहीं; मन को श्रोत्र मानने पर दुनियाँ में कहीं बहरापन रह ही न जायेगा;

बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् [ १-९ ]

२२२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० पृथिव्यादीनां घ्राणादिभावे सामर्थ्यं श्रोत्रभावे चासामर्थ्यम् । अस्ति चेदं श्रोत्रम्, आकाशं च शिष्यते । परिशेषादाकाशं श्रोत्रमिति १ ॥ ७३ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये तृतीयाध्यायस्याद्यमाह्निकम् । [ अथ द्वितीयमाह्निकम् ] बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् [ १-९ ] परीक्षितानीन्द्रियाणि अर्थांश्च । बुद्धेरिदानीं परीक्षाक्रमः—सा किमनित्या ? नित्या वेति ? कुतः संशयः ? कर्माकाशसाधर्म्यात् संशयः ॥ १ ॥ अस्पर्शवत्त्वं ताभ्यां समानो धर्म उपलभ्यते बुद्धौ, विशेषश्चोपजनापायधर्म- वत्त्वं विपर्ययश्च यथास्वमनित्यनित्ययोस्तस्यां बुद्धौ नोपलभ्यते, तेन संशय इति ॥ १ ॥ अनुपपन्नः खल्वयं संशयः । सर्वशरीरिणां हि प्रत्यात्मवेदनीया अनित्या बुद्धिः सुखादिवत् । भवति च संवित्तिः—ज्ञास्यामि, जानामि, अज्ञासिषमिति; न पृथिव्यादि में घ्राणादि इन्द्रियों को उत्पन्न करने की सामर्थ्य हैं, श्रोत्रेन्द्रिय को उत्पन्न करने की सामर्थ्य नहीं । यह श्रोत्र फिर है अवश्य; अतः अवशिष्ट रहने से भाव मानने पर परिशेषात् अनुमान होता है कि आकाश ही श्रोत्र हैं ॥ ७३ ॥ वात्स्यायनकृत न्यायभाष्य (सहित न्यायदर्शन) के तृतीय अध्याय का प्रथम आह्निक समाप्त । इन्द्रिय तथा उनके विषयों की परीक्षा की जा चुकी । अब बुद्धि की परीक्षा आरम्भ करते हैं—वह बुद्धि नित्य है, या अनित्य ? यह संशय क्यों हुआ ? कर्म तथा आकाश के सादृश्य से यहाँ संशय हुआ ॥ १ ॥ कर्म तथा आकाश का अस्पर्शवत्त्व बुद्धि में भी समान रूप से मिलता है। इस बुद्धि में अनित्य के उत्पत्तिविनाशधर्मवत्त्व तथा नित्य के उत्पत्तिविनाशधर्माभाववत्त्व—दोनों ही नहीं मिलते, अतः संशय होता है ॥ १ ॥ शंका—यह संशय युक्त नहीं है; क्योंकि सभी प्राणियों को बुद्धि का अनित्यत्व प्रत्यात्मवेदनीय होने से सुखादि की तरह अनित्य ही है । जैसे—'जानूँगा' 'जानता हूँ' 'जानता था' यह त्रैकाल्ययुक्त संवेदन भी उत्पत्ति विनाश के बिना कैसे होगा ! अतः सिद्ध होता है कि बुद्धि द्वारा त्रैकाल्याभिव्यक्ति होने से बुद्धि अनित्य है। यह प्रमाणसिद्ध १. अत्रत्यं वार्त्तिकं मननीयं जिज्ञासुभिः ।

प्रकरण प्रारम्भ किया गया है। साङ्ख्यमतानुयायी ऐसा मानते हैं—‘पुरुष की मनोरूप

३. सू० ] बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २२३ चोपजनापायावन्तरेण त्रैकाल्यव्यक्तिः, ततश्च त्रैकाल्यव्यक्तेरनित्या बुद्धिरित्ये- तत्सिद्धम्। प्रमाणसिद्धं चेदं शास्त्रेऽप्युक्तम्-‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नम्’, ‘युगपज्- ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्’ इत्येवमादि, तस्मात्संशयप्रक्रियानुपपत्तिरिति ? दृष्टिप्रवादोपालम्भार्थं तु प्रकरणम्। एवं हि पश्यन्तः प्रवदन्ति सांख्याः-पुरुषस्यान्तःकरणभूता नित्या बुद्धिरिति। साधनं च प्रचक्षते— विषयप्रत्यभिज्ञानात् ॥ २ ॥ किं पुनरिदं प्रत्यभिज्ञानम् ? ‘यं पूर्वमज्ञासिषमर्थं तमिमं जानामि’ इति ज्ञानयोः समानेऽर्थे प्रतिसन्धिज्ञानं प्रत्यभिज्ञानम्। एतच्चावस्थिताया बुद्धेरुप- पन्नम्। नानात्वे तु बुद्धिभेदेषूत्पन्नापवर्गिषु प्रत्यभिज्ञानानुपपत्तिः, नान्यज्ञात- मन्यः प्रत्यभिजानातीति ॥ २ ॥ साध्यसमत्वादहेतुः ॥ ३ ॥ यथा खलु नित्यत्वं बुद्धेः साध्यम् एवं प्रत्यभिज्ञानमपीति । किं कारणम् ? चेतनधर्मस्य करणेऽनुपपत्तिः। पुरुषधर्मः खल्वयम्—ज्ञानं दर्शनमुपलब्धिर्बोधः अनित्यता शास्त्र में पीछे कह आये हैं—‘इन्द्रिय-अर्थ के सम्बन्ध से उत्पन्न ज्ञान (बुद्धि’) ( १.१.४ ) तथा ‘युगपज्ज्ञानानुत्पाद ही मन का हेतु हैं’ ( १.१.१६ ) । इन प्रमाणों से ज्ञान की अनित्यता स्पष्ट सिद्ध है। अतः संशय नहीं बनेगा ? समाधान—सांख्यमत के प्रौढिवाद का उपालम्भ ( तिरस्कार ) करने के लिये यह प्रकरण प्रारम्भ किया गया है। साङ्ख्यमतानुयायी ऐसा मानते हैं—‘पुरुष की मनोरूप बुद्धि अविनाशिनी हैं’। इसमें कारण बतलाते हैं— विषय का प्रत्यभिज्ञान होने से ॥ २ ॥ यह प्रत्यभिज्ञान क्या है ? ‘जिस अर्थ को मैं पहले जानता था, उसी अर्थ को अब जान रहा हूँ’—इस तरह दो ज्ञानों का समान अर्थ में प्रतिसन्धिज्ञान ‘प्रत्यभिज्ञान’ कहलाता है। यह अवस्थित ( नित्य ) बुद्धि में ही उपपन्न हो सकता है। उत्पन्नविनाशी नाना बुद्धिभेद मानने पर यह प्रत्यभिज्ञान नहीं बनेगा; क्योंकि अन्य द्वारा ज्ञात को अन्य कैसे स्मरण करेगा ! ॥ २ ॥ सांख्यमत-निराकरण— साध्यसम होने से यह ( प्रत्यभिज्ञान ) हेतु हेत्वाभास है ॥ ३ ॥ जैसे बुद्धि का नित्यत्व साध्य हैं, इसी तरह प्रत्यभिज्ञान भी साध्य है। कारण, चेतन धर्म का अन्तःकरण में सम्भव नहीं है। यह सब—ज्ञान, दर्शन, उपलब्धि,

२२४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० प्रत्ययोऽध्यवसाय इति । चेतनो हि पूर्वज्ञातमर्थं प्रत्यभिजानाति, तस्यैतस्माद् हेतोर्नित्यत्वं युक्तमिति । करणचैतन्याभ्युपगमे तु चेतनस्वरूपं वचनीयं नानि- र्दिष्टस्वरूपमात्मान्तरं शक्यमस्तीति प्रतिपत्तुम् । ज्ञानं चेद् बुद्धेरन्तःकरणस्या- भ्युपगम्यते, चेतनस्येदानीं किं स्वरूपम्, को धर्मः, किं तत्त्वम् ? ज्ञानेन च बुद्धौ वर्तमानेनायं चेतनः किं करोतीति ? चेतयते इति चेत् ? न ज्ञानादर्थान्तरवचनम् । पुरुषश्चेतयते बुद्धिर्जानातीति नेदं ज्ञानादर्थान्तरमुच्यते । चेतयते, जानीते, बुध्यते, पश्यति, उपलभते-इत्येको- ऽयमर्थ इति । बुद्धिर्ज्ञापयतीति चेत् ? अद्धा जानीते पुरुषो बुद्धिर्ज्ञापयतीति सत्यमेतत् । एवं चाभ्युपगमे ज्ञानं पुरुषस्येति सिद्धं भवति, न बुद्धेरन्त- करणस्येति । प्रतिपुरुषं च शब्दान्तरव्यवस्थाप्रतिज्ञाने प्रतिषेधहेतुवचनम् । यश्च प्रति- जानीते—'कश्चित् पुरुषश्चेतयते, कश्चिद् बुध्यते, कश्चिदुपलभते, कश्चित् पश्यति' इति ? पुरुषान्तराणि खल्विमानि—चेतनो बोद्धोपलब्धा द्रष्टेति, नैकस्यैते धर्मा इति, अत्र कः प्रतिषेधहेतुरिति ? बोध, अध्यवसाय, प्रत्यय—पुरुष-धर्म हैं ! चेतन ही पूर्व ज्ञात अर्थ का प्रत्यभिज्ञान करता है, अतः उस चेतन का नित्यत्व तो युक्त है; पर अन्तःकरण-धर्म को चैतन्य मानोगे तो उसका चेतनस्वरूप बतलाना पड़ेगा । अस्मदभिमत आत्मा से भिन्न अदर्शित- लक्षणक अन्य चेतन का प्रतिपादन करना असम्भव है । बुद्धि या मन को ही यदि ज्ञान हो जाता है तो अब चेतन का क्या स्वरूप, धर्म या तत्त्व रह जायेगा ? तथा ज्ञान का बुद्धि में ही सम्भव होने पर यह चेतन क्या करेगा ? यदि 'चेतना को करता है'—यह कहो तो ज्ञान तथा चेतना तो पर्यायमात्र है । 'पुरुष चेतना देता है, बुद्धि ज्ञान करती है' यह ज्ञान से अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा रहा । 'चेतना देता है, जानता है, बोध करता है, देखता है, अवगत करता है'—ये सब पर्याय एक ही बात को बतलाते हैं । यदि यह कहो कि 'बुद्धि चेतन को जानती है' तो ठीक है, पुरुष जानता है, बुद्धि प्रेरणा देती है तो आखिर यह ज्ञान किसमें सिद्ध हुआ ? पुरुष में, न कि आप के कथनानुसार मन या बुद्धि में ! प्रत्येक पुरुष में भिन्न-भिन्न शब्दों की व्यवस्था प्रतिज्ञात करोगे तो एक का दूसरे में प्रतिषेध-हेतु बतलाना पड़ेगा । जो यह प्रतिज्ञा करता है कि कोई पुरुष चेतना करता है, कोई बोध करता है, कोई प्राप्त करता है, कोई देखता है तो उसके मत में ये सब भिन्न भिन्न पुरुष हैं—चेतन, बोद्धा, उपलब्धा, द्रष्टा आदि; एक ही पुरुष के ये सब धर्म नहीं हैं, यहाँ प्रतिषेधहेतु दिखाने की आवश्यकता है ?

४. सू० ] बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २२५

४. सू० ] बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २२५ अर्थस्याभेद¹ इति चेत् ? समानम् । भिन्नार्था एते शब्दा इति तत्र व्यवस्थानुपपत्तिरित्येवं चेन्मन्यसे ? समानं भवति । पुरुषश्चेतयते, बुद्धिर्जानीते इत्यत्राप्यर्थो न भिद्यते; तत्रोभयोश्चेतनत्वादन्यतरलोप इति । यदि पुनर्बुध्यते- ऽनेनेति बोधनं बुद्धिर्मन एवोच्यते, तच्च नित्यम् ? अस्त्येतदेवम्, न तु मनसो विषयप्रत्यभिज्ञानान्नित्यत्वम् । दृष्टं हि करणभेदे ज्ञातुरेकत्वात् प्रत्यभिज्ञानम्— 'सव्यदृष्टस्येतरेण प्रत्यभिज्ञानात्' इति चक्षुर्वत् प्रदीपवच्च—प्रदीपान्तरदृष्टस्य प्रदीपान्तरेण प्रत्यभिज्ञानमिति । तस्माद् ज्ञातुरयं नित्यत्वे हेतुरिति ॥ ३ ॥ यच्च मन्यते—बुद्धेरवस्थिताया यथाविषयं वृत्तयो ज्ञानानि निश्चरन्ति, वृत्तिश्च वृत्तिमत्तो नान्येति, तच्च न; युगपद्ग्रहणात् ॥ ४ ॥ वृत्तिवृत्तिमत्तोरनन्यत्वे वृत्तिमतोऽवस्थानाद् वृत्तीनामवस्थानमिति यानी- यदि यह कहो कि—'चेतयते' 'बुद्ध्यते' इत्यादि का अर्थभेद होने के कारण, एक ही ज्ञाता के कर्ता होने पर उक्त प्रयोग की व्यवस्था उपपन्न नहीं होगी, अतः उस एक का ही सब के साथ सम्बन्ध उचित नहीं ? तो यह बात आप के पक्ष में भी समान ही है, क्योंकि आप भी जब यह कहते हैं कि 'बुद्धि जानती है' तो बुद्धि तथा ज्ञान एक ही चीज हैं, तब उस का सम्बन्ध उसी में कैसे होगा ? एक बात और ! जब आप कहते हैं कि 'पुरुष चेतना देता है, बुद्धि जानती है' तो ये पुरुष और बुद्धि—दोनों ही चेतन हैं । अतः एक चेतन का आप के मत में विनाश मानना पड़ेगा । यदि यह व्युत्पत्ति करोगे कि 'जिससे जाना जाये वह बुद्धि है' तो यह मन हो गया, और मन नित्य है ? ठीक है, परन्तु विषयप्रत्यभिज्ञानसमवायिता के कारण वह नित्य नहीं है । क्योंकि लोक में करण ( इन्द्रिय ) का भेद होने पर भी एक ज्ञाता के देखे जाने से उसी को प्रत्यभिज्ञान होता है, जैसे—बायीं आँख से देखे गये का ही दाहिनी आँख से देखा जाने पर प्रत्यभिज्ञान होता है । अथवा—एक दीप से देखा जाने के बाद दूसरे दीप से वही चीज देखी जाने पर प्रत्यभिज्ञान होता है । अतः यह प्रत्यभिज्ञान ज्ञाता के नित्यत्व का साधक है, मेन के नित्यत्व का नहीं ॥ ३ ॥ जो यह मानता है कि—बुद्धि के स्थिर ( नित्य ) रहते हुए ही विषयानुसार वृत्तियाँ ( ज्ञान ) उसमें से निकलती रहती हैं; यह वृत्ति वृत्तिमान् से भिन्न नहीं है ? युगपद् ग्रहण न होने से ऐसा नहीं कह सकते ॥ ४ ॥ यदि वृत्ति और वृत्तिमान्—दोनों का अभेद मानोगे तो वृत्तिमान् के स्थिर रहते वृत्तियाँ १. अर्थस्य भेदः—इति पाठ० । न्या० द० : १५

२२६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० मानि विषयग्रहणानि तान्यवतिष्ठन्त इति युगपद् विषयाणां ग्रहणं प्रसज्यत इति ॥ ४ ॥ अप्रत्यभिज्ञाने च विनाशप्रसङ्गः ॥ ५ ॥ . अतीते च प्रत्यभिज्ञाने वृत्तिमानप्यतीत इत्यन्तःकरणस्य विनाशः प्रसज्यते, विपर्यये च नानात्वमिति ॥ ५ ॥ अविभु चैकं मनः पर्यायेणेन्द्रियैः सम्प्रयुज्यत इति— क्रमवृत्तित्वादयुगपद् ग्रहणम् ॥ ६ ॥ इन्द्रियार्थानाम् । वृत्तिवृत्तिमतोर्नानात्वमिति । एकत्वे च प्रादुर्भावतिरो- भावयोरभाव इति ॥ ६ ॥ अप्रत्यभिज्ञानं च विषयान्तरव्यासङ्गात् ॥ ७ ॥ अप्रत्यभिज्ञानम् = अनुपलब्धिः । अनुपलब्धिश्च कस्यचिदर्थस्य विषयान्तर- व्यासक्ते मनस्युपपद्यते; वृत्तिवृत्तिमतोर्नानात्वात् । एकत्वे हि अनर्थको व्यासङ्ग इति ॥ ७ ॥ विभुत्वे चान्तःकरणस्य पर्यायेणेन्द्रियैः संयोगः— भी स्थिर रहेंगी, तब जितने भी विषयज्ञान होंगे वे सब स्थिर हो जायेंगे, फिर एक साथ सभी विषयों का ज्ञान प्रसक्त होने लगेगा ॥ ४ ॥ [ वृत्ति तथा वृत्तिमान् के अभेद में एक और दूषण दिखा रहे हैं—] अप्रत्यभिज्ञान में विनाश-प्रसक्ति होने लगेगी ॥ ५ ॥ प्रत्यभिज्ञान के अतीत ( समाप्त ) होने पर वृत्तिमान् भी अतीत हो जायेगा, तब अन्तःकरण का विनाश प्रसक्त होगा । वृत्ति का नाश होने पर भी प्रत्यभिज्ञान ( अन्तः- करण ) का अनाश—यों विपर्यय मानने पर मन का नानात्व प्रसङ्ग होने लगेगा ॥ ५ ॥ एक ही विनाशी मन कालभेद से इन्द्रियों के साथ संप्रयुक्त होता है, अतएव क्रमवृत्ति होने से युगपज्ज्ञान नहीं हो पाता ॥ ६ ॥ इन्द्रियों के विषयों का । ज्ञान को अनेकता का कारण वृत्तिमान् का नानात्व मानना ही पड़ेगा; अन्यथा ज्ञान का प्रादुर्भाव तथा तिरोभाव कैसे होगा ! ॥ ६ ॥ [ स्वमत में प्रत्यभिज्ञान का उपपादन करते हैं—] मन के विषयान्तर में व्यासक्त होने से अप्रत्यभिज्ञान हो जाता है ॥ ७ ॥ अप्रत्यभिज्ञान से तात्पर्य है—अनुपलब्धि । यह अनुपलब्धि मन के विषयान्तर में व्यासक्त होने पर होती है; क्योंकि हम वृत्ति तथा वृत्तिमान् को नाना मानते हैं । एक मानने वाले के मत में भले ही उसका विषय में व्यासङ्ग होना निरर्थक रहे ! ॥ ७ ॥ मन को विभु मानने पर कालभेद से इन्द्रियों के साथ संयोग—

८. सू० ] बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २२७

८. सू० ] बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २२७ न; गत्यभावात् ॥ ८ ॥ प्राप्तानोन्द्रियाण्यन्तःकरणेनेति प्राप्त्यर्थस्य गमनस्याभावः तत्र क्रमवृत्ति- त्वाभावादयुगपद् ग्रहणानुपपत्तिरिति । गत्यभावाच्च प्रतिषिद्धं विभुनोऽन्तः- करणस्यायुगपद्ग्रहणं न लिङ्गान्तरेणानुमीयते इति । यथा चक्षुषो गतिः प्रति- षिद्धा सन्निकृष्टविप्रकृष्टयोस्तुल्यकालग्रहणात् पाणिचन्द्रमसोर्व्यवधानेन प्रतीघाते सानुमीयत इति । सोऽयं नान्तःकरणे विवादः, न तस्य नित्यत्वे । सिद्धं हि मनोऽन्तःकरणं नित्यं चेति । क्व तर्हि विवादः ? तस्य विभुत्वे । तच्च प्रमाणतोऽनुपलब्धेः प्रति- षिद्धमिति । एकं चान्तःकरणम्, नाना चैता ज्ञानात्मिका वृत्तयः—चक्षुर्विज्ञानं घ्राण- विज्ञानं रूपविज्ञानं गन्धविज्ञानम् । एतच्च वृत्तिवृत्तिमतोरेकत्वेऽनुपपन्नमिति । पुरुषो जानीते नान्तःकरणमिति-एतेन विषयान्तरव्यासङ्गः प्रत्युक्तः १। विषया- न्तरग्रहणलक्षणो विषयान्तरव्यासङ्गः पुरुषस्य, नान्तःकरणस्येति । क्वचिदिन्द्रि- गति न होने से नहीं (बनेगा) ॥ ८ ॥ ‘इन्द्रिय अन्तःकरण से सम्बद्ध होती हैं’—यह सम्बन्धानुकूलव्यापारार्थक गमन मन को विभु मानने पर उसमें नहीं बनेगा । तथा उसे विभु मानने पर, उसके क्रमवृत्ति न होने से युगपज्ज्ञान होने लगेगा । यों, गत्यभाव से प्रतिसिद्ध मनःसाधक युगपज्ज्ञानानुत्पाद हेतु का लिङ्गान्तर से अनुमान नहीं हो सकता । एक ही समय में दूर एवं समीप में वर्तमान वस्तु का चाक्षुष प्रत्यक्ष होता है, पर मध्य में हाथ का व्यवधान होने पर प्रती- घात हो जाने से चन्द्रपर्यन्त से चक्षु की गति अवरुद्ध होने का अनुमान होता है । यह विवाद अन्तःकरण की सत्ता पर, या उसके नित्यत्व पर नहीं है, मन का अन्तः करणत्व तथा नित्यत्व तो सिद्ध ही है । फिर विवाद किस बात पर है ? उसके विभुत्व मानने पर । उस (विभुत्व) के बारे में कोई प्रमाण न मिलने से वह निरस्त होता है । साङ्ख्यसम्मत वृत्ति-वृत्तिमान् का एकत्वसिद्धान्त यों भी अनुपपन्न है—अन्तःकरण एक है और चक्षुर्विज्ञान, घ्राणविज्ञान, रूपविज्ञान तथा गन्धविज्ञान आदि वृत्तियाँ अनेक हैं; तब यह भेद वृत्ति तथा वृत्तिमान् के अभेद में कैसे होगा ! यह तो ठीक है कि पुरुष ज्ञाता है न कि अन्तःकरण, अतः विषयान्तर-व्यासङ्ग वाला हमारा उत्तर खण्डित हो सकता है; क्योंकि ‘विषयान्तरव्यासङ्ग’ से तात्पर्य है—विषयान्तरज्ञान, वह पुरुष को ही बन सकता १. पुरुषो जानीते नान्तःकरणमिति हेतुना । अन्तःकरणस्येति शेषः । व्यासक्तो ऽ स भवति यो जानीते, नान्तःकरणं जानीतेऽतो न व्यासक्तम् ।