न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
२२८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० येण सन्निधिः, क्वचिदसन्निधिः—इत्ययं तु व्यासङ्गोऽनुज्ञायते मनस इति ॥ ८ ॥ एकमन्तःकरणं नाना वृत्तय इति सत्यभेदे वृत्तेरिदमुच्यते— स्फटिकान्यत्वाभिमानवत् तदन्यत्वाभिमानः ॥ ९ ॥ तस्यां वृत्तौ नानात्वाभिमानो यथा द्रव्यान्तरोपहिते स्फटिकद्रव्ये अन्यत्वा- भिमानः—नीलो लोहित इति, एवं विषयान्तरोपधानादिति ? न; हेत्वभावात् । स्फटिकान्यत्वाभिमानवदयं ज्ञानेषु नानात्वाभिमानो गौणो न पुनर्गन्धाद्यन्यत्वाभिमानवदिति-हेतुर्नास्ति, हेत्वभावादनुपपन्न इति । समानो हेत्वभाव इति चेत् ? न; ज्ञानानां क्रमेणोपजनापायदर्शनात् । क्रमेण हीन्द्रियार्थेषु ज्ञानान्युपजायन्ते चापयन्ति चेति दृश्यते । तस्माद् गन्धाद्यन्यत्वाभिमानवदयं ज्ञानेषु नानात्वाभिमान इति ॥ ९ ॥ क्षणभङ्गपरीक्षाप्रकरणम् [ १०-१७ ] 'स्फटिकान्यत्वाभिमानवद्' इत्येतदमृष्यमाणः क्षणिकवाद्याह— है, अन्तःकरण को नहीं; परन्तु कहीं इन्द्रिय के साथ सन्निधि तथा कहीं असन्निधि— इस तरह का विषयान्तर-व्यासङ्ग तो मन में भी अनुज्ञात है ही ॥ ८ ॥ शंका—वस्तुतः अभेद होने पर भी 'अन्तःकरण एक है, वृत्तियाँ नाना हैं'—यह इसलिए कह दिया जाता है कि— स्फटिकान्यत्व के आरोप की तरह उस वृत्ति में अन्यत्व का आरोप है ? ॥ ९ ॥ उस वृत्ति में नानात्व का आरोप कर लिया जाता है। जैसे नील-रक्तादि पुष्पों के पास रखे हुए एक ही स्फटिक द्रव्य में नानात्व का आरोप ( भ्रम ) होता है कि यह नील स्फटिक है, यह रक्त स्फटिक है; उसी तरह विषयान्तर के उपधान ( अनुग्रह ) से वृत्ति में नानात्व का आरोप है ? उत्तर—उक्त दृष्टान्त में कोई हेतु न होने से ऐसा मानना उचित नहीं। 'स्फटि- कान्यत्वाभिमान की तरह यह ज्ञानों में नानात्वाभिमान गौण ( आहार्यारोप ) है, गन्धाद्यन्यत्वाभिमान की तरह वास्तविक नहीं'—इस अनुमान में हेतु नहीं है। अतः हेतु न दिखाया जाने से यह अनुमान बनेगा ही नहीं। हेत्वभाव तो आपके पक्ष में भी है ? नहीं; क्योंकि अस्मदभिमत में ज्ञानों का क्रमशः उत्पत्तिविनाश लोक में प्रत्यक्ष है। इन्द्रियार्थ के सन्निकर्ष में क्रमशः ज्ञान उत्पन्न तथा विनष्ट होते रहते हैं—यह लोक में वारंवार देखते हैं। अतः यह स्पष्ट है कि वृत्ति में नानात्वारोप गन्धाद्यन्यत्वाभिमान की तरह मुख्य ही है, आहार्यारोप नहीं ॥ ९ ॥ [ अब सूत्रकार बौद्धमत से सांख्यमत में दूषण दिखाते हुए बौद्धों के प्रसिद्ध क्षणिक- वाद के खण्डन का उपक्रम कर रहे हैं— ] सूत्रोक्त 'स्फटिकान्यत्वाभिमानवत्' इस हेतु को असह्य करते हुए क्षणिकविज्ञानवादी ( बौद्ध ) कहते हैं—
११. सू० ] क्षणभङ्गपरीक्षाप्रकरणम् २२९
११. सू० ] क्षणभङ्गपरीक्षाप्रकरणम् २२९ स्फटिकेऽप्यपरावरोत्पत्तेः क्षणिकत्वाच्चव्यक्तीनामहेतुः ॥ १० ॥ स्फटिकस्याभेदेनावस्थितस्योपधानभेदान्नानात्वाभिमान इत्ययमविद्यमान- हेतुकः पक्षः । कस्मात् ? स्फटिकेऽप्यपरावरोत्पत्तेः । स्फटिकेऽपि अन्या व्यक्तय उत्पद्यन्ते, अन्या निरुद्ध्यन्त इति । कथम् ? क्षणिकत्वाद् व्यक्तीनाम् । क्षणश्चा- ल्पीयान् कालः, क्षणस्थितिकाः = क्षणिकाः । कथं पुनर्गम्यते-क्षणिका व्यक्तय इति ? उपचयापचयप्रबन्धदर्शनाच्छरीरादिषु । पक्तिनिर्वृत्तस्याहाररसस्य शरीरे रुधिरादिभावेनोपचयोऽपचयश्च प्रबन्धेन प्रवर्त्तते । उपचयाद् व्यक्तीनामुत्पादः, अपचयाद् व्यक्तिनिरोधः । एवं च सत्यवयवपरिणामभेदेन वृद्धिः शरीरस्य काला- न्तरे गृह्यते इति । सोऽयं व्यक्तिविशेषधर्मो व्यक्तिमात्रे वेदितव्य इति ॥ १० ॥ नियमहेत्वभावाद्यथादर्शनमभ्यनुज्ञा ॥ ११ ॥ सर्वासु व्यक्तिषु उपचयापचयप्रबन्धः शरीरवदिति नायं नियमः । कस्मात् ? हेत्वभावात् । नात्र प्रत्यक्षमनुमानं वा प्रतिपादकमस्तीति । तस्माद् यथादर्शनम्- स्फटिक में दूसरे-दूसरे व्यक्तियों की उत्पत्ति होते रहने के कारण व्यक्तियों के क्षणिक होने से उक्त हेतु नहीं बनेगा ॥ १० ॥ 'अभेदेन उपस्थित स्फटिक में अनुग्रहभेद से नानात्व का आरोप हैं' यह पक्ष ( प्रतिज्ञात अर्थ ) अविद्यमानहेतुक है; क्योंकि स्फटिक में भी क्षण-क्षण में दूसरे-दूसरे की उत्पत्ति है । अर्थात् प्रतिक्षण स्फटिक व्यक्ति उत्पन्न होती है, तो पहली निरुद्ध होती रहती हैं । कारण, व्यक्ति तो क्षणिक है । अल्पतर काल को 'क्षण' तथा क्षणभर स्थितिवाले को 'क्षणिक' कहते हैं । यह कैसे ज्ञात होता है कि व्यक्ति क्षणिक हैं ? शरीरादि में वृद्धि तथा ह्रास का प्रवाह देखा जाने से । जठराग्नि पाक से निष्पन्न रस से शरीर में रुधिरादिभाव की वृद्धि तथा ह्रास के प्रवाह से वृद्धि ह्रास देखे जाते हैं । वहाँ उपचय से व्यक्ति का उत्पाद कहलाता है तथा अपचय से व्यक्ति का निरोध । इस रीति से अवयवों में परिणति होते रहने से कालपरिपाकवश शरीर के वृद्धि या ह्रास गृहीत होते हैं । यह व्यक्तिविशेष में दिखाया गया निदर्शन स्फटिकादि सभी व्यक्तियों में समझना चाहिये । कहने का तात्पर्य यह है कि हमारा (बौद्ध) मत स्वीकार कर लेने पर स्फटिकान्यत्व के आरोप की आवश्यकता न ही पड़ेगी, वहाँ तो क्षणिक सिद्धान्त से स्फटिकान्यत्व उपस्थित ही है ? ॥ १० ॥ आचार्य उत्तर देते हैं— क्षणिकवाद का कोई नियमहेतु न होने से जहाँ जैसा देखें वहाँ वैसा अभ्यनुज्ञान कर लेना चाहिये ॥ ११ ॥ 'सभी व्यक्तियों का उपचयापचयप्रबन्ध शरीर की तरह होता हैं'—ऐसा कोई नियम नहीं; क्योंकि इस नियम का साधक कोई हेतु नहीं है । इस नियम का प्रतिपादक न
२३० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० भ्यनुज्ञा। यत्र यत्रोपचयापचयप्रबन्धो दृश्यते, तत्र तत्र व्यक्तीनामपरापरो- त्पत्तिरुपचयापचयप्रबन्धदर्शनेनाभ्यनुज्ञायते, यथा—शरीरादिषु। यत्र यत्र न दृश्यते तत्र तत्र प्रत्याख्यायते, यथा—ग्रावप्रभृतिषु। स्फटिकेऽप्युपचयापचय- प्रबन्धो न दृश्यते। तस्मादयुक्तम्—स्फटिकेऽप्यपरापरोत्पत्तिरिति। यथा चार्कस्य कटुकिम्ना सर्वद्रव्याणां कटुकिमानमापादयेत्, तादृगेतदिति ॥ ११ ॥ यश्च—अशेषनिरोधेनापूर्वोत्पादं निरन्वयं द्रव्यसन्ताने क्षणिकतां मन्यते, तस्यैतत् न; उत्पत्तिविनाशकारणोपलब्धेः ॥ १२ ॥ उत्पत्तिकारणं तावदुपलभ्यते—अवयवोपचयो वल्मीकादीनाम्। विनाश- कारणं चोपलभ्यते—घटादीनामवयवविभागः। यस्य त्वनपचितावयवं निरुध्यते अनुपचितावयवं चोत्पद्यते, तस्याशेषनिरोधे निरन्वये वाऽपूर्वोत्पादे न कारण- मुभयत्राप्युपलभ्यते इति ॥ १२ ॥ क्षीरविनाशे कारणानुपलब्धिवद् दध्युत्पत्तिवच्च तदुत्पत्तिः ? ॥ १३ ॥ कोई प्रत्यक्ष है, न अनुमान; अतः जहाँ जैसे देखें वैसा स्वीकार लेना चाहिये। जहाँ- जहाँ उपचयापचयप्रबन्ध देखें वहाँ-वहाँ व्यक्तियों के उपचयापचय से उनके उत्पाद- विनाश की कल्पना से यथाकथमपि अपर अपर व्यक्ति के उत्पत्ति-विनाश माने जा सकते हैं, जैसे—शरीरादि में; परन्तु जहाँ-जहाँ उपचयापचय न दिखायी दे वहाँ उक्त कल्पना का प्रत्याख्यान भी किया जा सकता है, जैसे—शिला आदि में। स्फटिक में भी अपर-अपर व्यक्ति के उत्पाद-विनाश की कल्पना अयुक्त ही है; अन्यथा यह बात तो वैसी ही होगी जैसे कोई पुरुष अर्क के कटुत्व का अनुभव करके सभी द्रव्यों को कटु समझने लगे ॥ ११ ॥ और जो वादी (बौद्ध) सर्वावयवनाश हेतु से पूर्वांश से असम्बद्ध वैसे अपूर्व उत्पाद को द्रव्यसन्तान-धारा में क्षणिकता को स्वीकार करता है, उसकी यह बात उचित नहीं; उत्पत्ति तथा विनाश का कारण उपलब्ध होने से ॥ १२ ॥ (लोक में) वृद्धिरूप उत्पत्ति में कारण मिलता है, जैसे—वल्मीकादि का अवयवो- पचय। अपचयरूप विनाश में भी कारण उपलब्ध होता है, जैसे—घटादि का अवयवशः विभाग। जिसके मत में अनपचितावयव द्रव्य विनष्ट तथा उपचितावयव द्रव्य उत्पन्न हो जाता है, उसके इस (सर्वावयवनाश तथा अपूर्व उत्पाद) मत के दोनों ही पक्षों का साधक कोई हेतु लोक में नहीं मिलता ॥ १२ ॥ शंका— दूध के विनाश में कारणानुपलब्धि की तरह तथा दधि की उत्पत्ति की तरह (उपर्युक्त तथाविध) उत्पत्ति सिद्ध हो जायेगी ? ॥ १३ ॥
१५. सू० ] क्षणभङ्गपरीक्षाप्रकरणम् २३१
१५. सू० ] क्षणभङ्गपरीक्षाप्रकरणम् २३१ यथानुपलभ्यमानं क्षीरविनाशकारणं दध्युत्पत्तिकारणं चाभ्यनुज्ञायते, तथा स्फटिकेऽपरापरासु व्यक्तिषु विनाशकारणमुत्पादकारणं चाभ्यनुज्ञेयमिति ॥१३॥ लिङ्गतो ग्रहणान्नानुपलब्धिः ॥ १४ ॥ क्षीरविनाशलिङ्गं क्षीरविनाशकारणं दध्युत्पत्तिलिङ्गं दध्युत्पत्तिकारणं च गृह्यते, अतो नानुपलब्धिः, विपर्ययस्तु स्फटिकादिषु अपरापरोत्पत्तीनां न लिङ्गमस्तीत्यनुत्पत्तिरेवेति१ ॥ १४ ॥ अत्र कश्चित् परिहारमाह— न पयसः परिणाम-गुणान्तरप्रादुर्भावात् ॥ १५ ॥ पयसः परिणामो न विनाश इत्येक आह । परिणामश्च—अवस्थितस्य द्रव्य- स्य पूर्वधर्मनिवृत्तौ धर्मान्तरोत्पत्तिरिति । गुणान्तरप्रादुर्भाव इत्यपर आह । गुणान्तरप्रादुर्भावश्च—सतो द्रव्यस्य पूर्व- गुणनिवृत्तौ गुणान्तरमुत्पद्यत इति । स खल्वेकपक्षीभाव इव ॥ १५ ॥ जैसे लोक में अनुपलभ्यमान क्षीरविनाश तथा दध्युत्पत्ति का कारण अभ्यनुज्ञात होता है, उसी तरह स्फटिक को अपर-अपर व्यक्तियों में उत्पत्तिविनाशकारण मान लेना चाहिये ? ॥ १३ ॥ उक्त विनाश तथा उत्पत्ति का लिङ्ग द्वारा ग्रहण होने से वहाँ कारण की अनुपलब्धि नहीं है ॥ १४ ॥ क्षीरविनाश का लिङ्ग तथा कारण, दध्युत्पत्ति का लिङ्ग तथा कारण प्रमाणों से गृहीत हैं, अतः वहाँ आप अनुपलब्धि नहीं कह सहते । इसके विपरीत, स्फटिकादि द्रव्यों में अपर-अपर व्यक्तियों की उत्पत्ति में कोई लिङ्ग नहीं है, अतः उनका अनुपपादन ही समझिये ॥ १४ ॥ यहाँ कोई ( साङ्ख्यमतानुयायी ) अपने मत से समाधान देते हैं— दूध का यहाँ विनाश नहीं होता, अपितु परिणामाख्य गुणविशेष प्रादुर्भूत हो जाता है ॥ १५ ॥ दूध का परिणाम धर्मान्तरोत्पाद विनाश कैसे कहला सकता है—ऐसा एक साङ्ख्य- मतानुयायी कहता है। 'परिणाम' कहते हैं—अवस्थित द्रव्य के पूर्व-धर्म की निवृत्ति होने पर धर्मान्तर की उत्पत्ति हो जाना । दूसरा साङ्ख्यमतानुयायी कहता है—वहाँ गुणान्तर का प्रादुर्भाव हो जाता है। द्रव्य के विद्यमान रहते पूर्व-गुण की निवृत्ति हो कर गुणान्तर का उत्पादन होना— 'गुणान्तरप्रादुर्भाव' कहलाता है। इन दोनों ही पक्षों में धर्मी के अविनाशवाली बात समान है, अवशिष्ट में एक वादी परिणाम मानता है तथा एक गुणान्तर का विनाश- प्रादुर्भाव ॥ १५ ॥ १. अत्रत्यं वार्त्तिकं जिज्ञासुभिरवश्यं ध्येयम् । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
२३२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने • [ ३ अ० २. आ० अत्र तु प्रतिषेधः— व्यूहान्तराद् द्रव्यान्तरोत्पत्तिदर्शनं पूर्वद्रव्यनिवृत्तेरनुमानम् ॥ १६ ॥ सम्मूर्च्छनलक्षणादवयवव्यूहाद् द्रव्यान्तरे दध्युत्पन्ने गृह्यमाणे पूर्वं पयोद्रव्य- मवयवविभागेभ्यो निवृत्तमित्यनुमीयते, यथा—मृदवयवानां व्यूहान्तराद् द्रव्या- न्तरे स्थाल्यामुत्पन्नायां पूर्वं मृत्पिण्डद्रव्यं मृदवयवविभागेभ्यो निवर्तत इति । मृद्वच्चावयवान्वयः पयोदध्नोर्नशेषनिरोधे निरन्वयो द्रव्यान्तरोत्पादो घटत इति ॥ १६ ॥ अभ्यनुज्ञाय चं निष्कारणं क्षीरविनाशं दध्युत्पादं च प्रतिषेध उच्यत इति— क्वचिद्विनाशकारणानुपलब्धेः क्वचिच्चोपलब्धेरनेकान्तः ॥ १७ ॥ क्षीरदधिवन्निष्कारणौ विनाशोत्पादौ स्फटिकव्यक्तीनामिति नायमेकान्त इति । कस्मात् ? हेतुभावात् । नात्र हेतुरस्ति—अकारणौ विनाशोत्पादौ स्फटि- कादिव्यक्तीनां क्षीरदधिवत्; न पुनर्यथा विनाशकारणभावात् कुम्भस्य विनाशः, उक्त साङ्ख्यमत का खण्डन— व्यूहान्तर से द्रव्यान्तरोत्पत्ति का दिखायी देना पूर्व द्रव्य की निवृत्ति का अनुमान करा देता है ॥ १६ ॥ सम्मूर्च्छनलक्षणक अवयवव्यूह से दधिरूप द्रव्यान्तर के गृहीत होने पर, पहले का दुग्धद्रव्य अवयवों का विभाग ( विनाश ) होने से विनष्ट हो गया—ऐसा अनुमान होता है। जैसे मिट्टी के अवयवों के व्यूहान्तर से स्थालीरूप द्रव्यान्तर के उत्पन्न होने की दशा में पहले का मृत्पिण्ड द्रव्य, मृदवयवों के विभक्त होने से निवृत्त हुआ रहता है। मृत्तिका के अन्वय की तरह दूध-दही के अन्वय की स्थिति समझनी चाहिये। सम्पूर्णतया अन्वय ( अवयव ) के न रहने में द्रव्यान्तरोत्पाद होता है—ऐसा मानना उचित नहीं। अतः 'अवस्थित का द्रव्यान्तर परिणाम' वाला साङ्ख्यसिद्धान्त अयुक्त है॥ १६॥ अथ च—निष्कारण क्षीरविनाश तथा दध्युत्पाद मान कर भी आप उसका प्रतिषेध करते हैं, यह भी उचित नहीं; क्योंकि— विनाश-कारण की कहीं अनुपलब्धि तथा कहीं उपलब्धि होने से, यह नियम नहीं कहा जा सकता ॥ १७ ॥ स्फटिक व्यक्ति में, क्षीरदधि की तरह निष्कारण विनाश उत्पाद होते हैं—यह नियम ( व्याप्ति ) नहीं बन पाती, क्योंकि इसमें कोई हेतु नहीं है। यहाँ आप कोई हेतु नहीं बता सकते कि स्फटिक व्यक्ति में क्षीर, दधि की तरह अकारण ही विनाश-उत्पाद हो जाते हैं। और इस नियम को आप निराकृत भी नहीं कर सकते कि विनाशकारण
१८. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३३
१८. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३३ उत्पत्तिकारणभावाच्चोत्पत्तिः। एवं स्फटिकादिव्यक्तीनां विनाशोत्पत्तिकारण- भावाद्धिनाशोत्पत्तिभाव इति। निरधिष्ठानं च दृष्टान्तवचनम्। गृह्यमाणयोर्विनाशोत्पादयोः स्फटिकादिषु स्यादयमाश्रयवान् दृष्टान्तः—क्षीरविनाशकारणानुपलब्धिवद्, दध्युत्पत्तिवच्चेति, तौ तु न गृह्येते। तस्मान्निरधिष्ठानोऽयं दृष्टान्त इति। अभ्यनुज्ञाय च स्फटिकस्योत्पादविनाशौ, योऽत्र साधकस्तस्याभ्यनुज्ञानाद- प्रतिषेधः। कुम्भवन्न निष्कारणौ विनाशोत्पादौ स्फटिकादीनामित्यभ्यनुज्ञेयोऽयं दृष्टान्तः; प्रतिषेद्धुमशक्यत्वात्। क्षीरदधिवत्तु निष्कारणौ विनाशोत्पादाविति शक्योऽयं प्रतिषेद्धुम्ः कारणतो विनाशोत्पत्तिदर्शनात्। क्षीरदध्नोर्विनाशोत्पत्ती पश्यता तत्कारणमनुमेयम्। कार्यलिङ्गं हि कारणम् इत्युपपन्नम्—'अनित्या बुद्धिः' इति ॥ १७ ॥ बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् [ १८-४१ ] इदं तु चिन्त्यते—कस्येयं बुद्धिरात्मेन्द्रियमनोऽर्थानां गुण इति प्रसिद्धोऽपि उपस्थित होने पर घट का विनाश हो जाता है, उत्पत्तिकारण होने पर उसकी उत्पत्ति हो जाती है। इसी नियम से स्फटिक व्यक्ति में जब विनाश-उत्पाद के कारण उपस्थित होंगे तो उसके विनाश-उत्पाद हो जाते हैं। क्षीरदृष्टान्त निराश्रय ( निर्विषय ) भी है। स्फटिकादि में विनाश-उत्पाद यदि गृहीत होते तो क्षीरविनाशकारणानुपलब्धि तथा दध्युत्पत्ति वाला दृष्टान्त सविषयक होता। स्फटिक में वे गृहीत नहीं होते, अतः यह दृष्टान्त निराश्रय ही है। स्फटिक का उत्पाद-विनाश ( कार्य ) स्वीकार करके प्रकृति के साधक ( कारण ) की स्वीकृति की जा सकती है तो उसका अपरापर व्यक्ति की उत्पत्ति का अप्रतिषेध बनेगा ! घट की तरह उत्पाद-विनाश निष्कारण नहीं हैं, अतः यह ( घटवाला ) दृष्टान्त स्वीकार करने में भी बाधा नहीं होनी चाहिये; क्योंकि इसका आप प्रतिषेध नहीं कर सकते। क्षीर-दधि की तरह निष्कारण विनाश-उत्पाद होते हैं, यह दृष्टान्त, कारण से विनाश-उत्पाद देखा जाने से प्रतिषिद्ध किया जा सकता है। क्षीर-दधि का विनाश-उत्पाद देखने वाला भी उसके कारण का अनुमान अवश्य कर लेगा, क्योंकि कारण कार्य का अनुमापक है। इस सम्पूर्ण प्रसङ्ग से यह सिद्ध हो गया कि बुद्धि अनित्य है ॥ १७ ॥ अब इस पर विचार किया जा रहा है कि आत्मा, इन्द्रिय, मन तथा अर्थ—इनमें से बुद्धि किसका गुण है। यद्यपि इस विषय पर पहले ( ३.१.१ ) भी विचार किया जा
२३४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [३. अ० २. आ० खल्वयमर्थः, परीक्षाशेषं प्रवर्त्तयामोति प्रक्रियते। सोऽयं बुद्धौ सन्निकर्षोत्पत्तेः संशयः; विशेषास्याग्रहणादिति। तत्रायं विशेष :— नेन्द्रियार्थयोः, तद्विनाशेऽपि ज्ञानावस्थानात् ॥ १८ ॥ नेन्द्रियाणामर्थानां वा गुणो ज्ञानम्; तेषां विनाशे ज्ञानस्य भावात्। भवति खल्विदमिन्द्रियेऽर्थे च विनष्टे—ज्ञानमद्राक्षमिति। न च ज्ञातरि विनष्टे ज्ञानं भवितुमर्हति। अन्यत् खलु वै तदिन्द्रियार्थसन्निकर्षजं ज्ञानं यदिन्द्रियार्थविनाशे न भवति। इदमन्यदात्ममनःसन्निकर्षजं तस्य युक्तो भाव इति। स्मृतिः खल्विव- यम्—'अद्राक्षम्' इति पूर्वदृष्टविषया। न च विज्ञातार नष्टे पूर्वोपलब्धेः स्मरणं युक्तम्, न चान्यदृष्टमन्यः स्मरति। न च मनसि ज्ञातर्यभ्युपगम्यमाने शक्य- मिन्द्रियार्थयोर्ज्ञातृत्वं प्रतिपादयितुम् ॥ १८ ॥ अस्तु तर्हि मनोगुणो ज्ञानम् ? युगपज्ज्ञेयानुपलब्धेश्च न मनसः ॥ १९ ॥ 'युगपज्ज्ञेयानुपलब्धिरन्तःकरणस्य लिङ्गम्' ( १.१.१६ ), तत्र युगपज्ज्ञेया- चुका है; परन्तु इसके विशेष परिज्ञान के लिए पुनः विचार प्रारम्भ कर रहे हैं। बुद्धि में आत्मा, इन्द्रिय, तथा अर्थ के सन्निकर्ष की अपेक्षा होती है, अतः इन का यह गुण है— यह तो निश्चित हो गया; परन्तु इनमें से यह किस एक का गुण है—ऐसा विशेष ज्ञान नहीं होता—अतः संशय उपस्थित हो गया । यहाँ विशेष वक्तव्य यह है— इन्द्रिय तथा अर्थ का गुण बुद्धि नहीं है; क्योंकि उनके विनष्ट होने पर भी वह रहती है ॥ १८ ॥ बुद्धि इन्द्रियों या अर्थों का गुण नहीं है, क्योंकि उन इन्द्रियों तथा अर्थों के विनष्ट होने पर भी ज्ञान यथास्थित रहता है। इन्द्रिय तथा अर्थ के विनष्ट होने पर भी ऐसा होता है कि 'इसको मैंने देखा था', अन्यथा ज्ञाता के विनष्ट होने पर ज्ञान नहीं रहता ! वह इन्द्रियार्थसन्निकर्षज ज्ञान ( चाक्षुष-आदि ) दूसरा है, जो इन्द्रियार्थविनाश होने पर नहीं होता। परन्तु 'मैंने देखा था' यह आत्ममनःसन्निकर्षज ज्ञान दूसरा है, यह तो रह ही सकता है । 'मैंने इसे देखा था' यह पूर्वदृष्टविषयक स्मृति है। विज्ञाता के नष्ट होने पर पहले देखी हुई वस्तु का स्मरण युक्त नहीं; क्योंकि अन्य दृष्ट को अन्य कैसे स्मरण करेगा ? मन को ज्ञाता स्वीकार कर लिये जाने पर इन्द्रियार्थ को ज्ञाता बताना भी उचित नहीं ॥ १८ ॥ तो फिर मन को ही बुद्धि का गुण मान लें ? युगपज्ज्ञेयानुपलब्धि होने से बुद्धि मन का गुण नहीं है ॥ १९ ॥ युगपज्ज्ञेयानुपलब्धि अन्तःकरण ( मन ) का अनुमापक है। युगपज्ज्ञेयानुपलब्धिहेतु
सूत्रस्थ 'च' से एक अर्थ यह भी निकलता है कि यदि ज्ञान को मन का गुण मानोगे
२० सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३५ नुपलब्ध्या यदनुमीयते अन्तःकरणं न तस्य गुणो ज्ञानम्। कस्य तर्हि ? ज्ञस्य१, वशित्वात्। वशी ज्ञाता, वश्यं करणम्, ज्ञानगुणत्वे वा करणभावनिवृत्तिः । घ्राणादिसाधनस्य च ज्ञातुर्गन्धादिज्ञानभावादनुमीयते-अन्तःकरणसाधनस्य सुखादिज्ञानं स्मृतिश्चेति । तत्र यज्ज्ञानगुणं मनः स आत्मा, यत्तु सुखाद्युपलब्धि- साधनमन्तःकरणं मनस्तदिति संज्ञाभेदमात्रं नार्थभेद इति । युगपज्ज्ञेयानुपलब्धेश्च योगिन इति वा चार्थः । योगी खलु ऋद्धौ प्रादुर्भूतायां विकरणधर्मा निर्माय सेन्द्रियाणि शरोरान्तराणि तेषु युगपज्ज्ञेयान्युपलभते । तच्चैतद्विभौ ज्ञातर्युपपद्यते, नाणौ मनसीति । विभुत्वे वा मनसो ज्ञानस्य नात्मगुणत्वप्रतिषेधः । विभु च मनस्तदन्तःकरणभूतमिति तस्य सर्वेन्द्रियै- र्युगपत्संयोगाद् युगपज्ज्ञानान्युत्पद्येरन्निति ॥ १९ ॥ तदात्मगुणत्वेऽपि तुल्यम् ? ॥ २० ॥ से जिस मन का अस्तित्व सिद्ध करते हो; ज्ञान (बुद्धि) उसका गुण नहीं है तो किसका गुण है ? ज्ञाता का । ज्ञाता (आत्मा) स्वतन्त्र है, ज्ञानसाधन मन उस के अधीन है, यदि बुद्धि को मन का गुण माने तो मन का साधनत्व नष्ट हो जायेगा । जैसे घ्राणादि- साधन (इन्द्रिय) वाले पुरूप को गन्धादि का ज्ञान होता है उसी तरह अन्तःकरणसाधन वाले को सुखादि ज्ञान तथा स्मृति होती है-ऐसा अनुमान होता है । इस प्रकार मन के दो भेद हो गये ! उन में जो ज्ञानगुणवाला मन है, उसे आत्मा कह देते हैं, और जो सुखाद्युपलब्धि-साधन मन वह है अन्तःकरण है। यह नाम का ही भेद है, अर्थ का भेद नहीं। अर्थात् एक ज्ञाता ज्ञानगुणवान् है, तथा दूसरा ज्ञानसाधन है-यों, हम दोनों के पक्ष में समानता ही है। अन्तर इतना ही है कि जिस ज्ञाता को आप 'मन' कहते हैं, उसी को हम 'आत्मा' कहते हैं । सूत्रस्थ 'च' से एक अर्थ यह भी निकलता है कि यदि ज्ञान को मन का गुण मानोगे तो अणु मन द्वारा योगी को जो युगपज्ज्ञेयोपलब्धि होती है वह असम्भव हो जायेगी । योगी योगज समाधि के प्रादुर्भूत होने पर साधारण जनों से विशिष्ट इन्द्रियों का इन्द्रिय- सहित शरीरान्तर का निर्माण करके उन से एक साथ अनेक ज्ञेयों का जान लेता है । यह बात ज्ञाता के विभु मानने पर बन सकती है, मन के अणु मानने पर नहीं । मन के विभु होने पर भी ज्ञान के आत्मगुण का प्रतिषेध नहीं बनता । विभु मन उस ज्ञाता का अन्तःकरण है, उसका सब इन्द्रियों के साथ युगपत् संयोग होने से युगपद् ज्ञान उत्पन्न होंगे ॥ १९ ॥ ज्ञान को आत्मा का गुण मानने पर भी बात वही रहेगी ? ॥ २० ॥ १. जानतीति ज्ञः, 'इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः' ( ३.१.१३५) इति पाणिनिसूत्रेण सिद्धः, तस्य, ज्ञातुरित्यर्थः ।
सूत्र का भी समुच्चय कर लेना चाहिये । गुणनाश के हेतु दो हो सकते हैं—१. या तो
२३६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० विभुरात्मा सर्वेन्द्रियैः संयुक्त इति युगपज्ज्ञानोत्पत्तिप्रसङ्ग इति ? ॥ २० ॥ इन्द्रियैर्मनसः सन्निकर्षाभावात् तदनुत्पत्तिः ॥ २१ ॥ गन्धाद्युपलब्धेरिन्द्रियार्थसन्निकर्षवदिन्द्रियमनःसन्निकर्षोऽपि कारणम्, तस्य चायौगपद्यमणुत्वान्मनसः । अयौगपद्यादनुत्पत्तिर्युगपज्ज्ञानानामात्मगुणत्वे- ऽपीति ॥ २१ ॥ यदि पुनरात्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षमात्राद् गन्धादिज्ञानमुत्पद्यते ? न; उत्पत्तिकारणानपदेशात् ॥ २२ ॥ 'आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षमात्राद् गन्धादिज्ञानमुत्पद्यते'—नात्रोत्पत्तिकारणमप- दिश्यते, येनैतत् प्रतिद्येमहीति ॥ २२ ॥ विनाशकारणानुपलब्धेश्चावस्थाने तन्नित्यत्वप्रसङ्गः ? ॥ २३ ॥ 'तदात्मगुणत्वेऽपि तुल्यम्' इत्येतदनेन समुच्चीयते । द्विविधो हि गुणनाश- विभु आत्मा सब इन्द्रियों के साथ संयुक्त होगा तो युगपज्ज्ञानोत्पाद होने लगेगा ? ॥ २० ॥ उत्तर— इन्द्रियों का मन के साथ सन्निकर्ष न होने से युगपज्ज्ञानोत्पाद नहीं होता ॥ २१ ॥ गन्धाद्युपलब्धि का, इन्द्रियार्थसन्निकर्ष के कारण की तरह, इन्द्रियमनःसन्निकर्ष भी कारण है। वह इन्द्रियमनःसन्निकर्ष एक साथ अनेक जगह नहीं हो सकता; क्योंकि मन अणु है। अयौगपद्य होने से ही, ज्ञान की युगपद् उत्पत्ति आत्मगुण मानने पर भी नहीं होगी ॥ २१ ॥ यदि 'आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्ष से ही गन्धादि ज्ञान हो जाता है, तो मन की कोई आवश्यकता नहीं'—ऐसा मान लें ? उत्पत्तिकारण का प्रसङ्ग न होने से ऐसा नहीं मान सकते ॥ २२ ॥ 'आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षमात्र से ही गन्धादि ज्ञान उत्पन्न हो जाता है'—यह आप कह रहे हैं, परन्तु अभी ज्ञानोत्पत्ति के विचार का प्रसङ्ग नहीं, जिससे हम आपसे सह- मत हो सकें ॥ २२ ॥ शंका— ज्ञान के विनाशकारण की अनुपलब्धि से उस के सदा वर्तमान रहने पर उसमें नित्यता की प्रसक्ति होने लगेगी ? ॥ २३ ॥ यहाँ 'ज्ञान के आत्मगुण मानने पर भी यह बात तो बराबर है' ( ३.२.२०)—इस सूत्र का भी समुच्चय कर लेना चाहिये । गुणनाश के हेतु दो हो सकते हैं—१. या तो
२५. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३७
२५. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३७ हेतुः-गुणानामाश्रयाभावः, विरोधी च गुणः । नित्यत्वादात्मनोऽनुपपन्नः पूर्वः, विरोधी च बुद्धेर्गुणो न गृह्यते । तस्मादात्मगुणत्वे सति बुद्धेर्नित्यत्व- प्रसङ्गः ? ॥ २३ ॥ अनित्यत्वग्रहात् बुद्धेर्बुद्ध्यन्तराद्विनाशः शब्दवत् ॥ २४ ॥ अनित्या बुद्धिरिति सर्वशरीरिणां प्रत्यात्मवेदनीयमेतत् । गृह्यते च बुद्धि- सन्तानस्तत्र बुद्धेर्बुद्ध्यन्तरं विरोधी गुण इत्यनुमीयते, यथा-शब्दसन्ताने शब्दः शब्दान्तरविरोधीति ॥ २४ ॥ असंख्येयेषु ज्ञानकारितेषु संस्कारेषु स्मृतिहेतुष्वात्मसमवेतेष्वात्ममनसोश्च सन्निकर्षे समाने स्मृतिहेतौ सति न कारणस्यायौगपद्यमस्तीति युगपत्स्मृतयः प्रादुर्भवेयुः, यदि बुद्धिरात्मगुणः स्यादिति ? तत्र कश्चित् सन्निकर्षस्यायौगपद्यमुपपादयिष्यन्नाह- ज्ञानसमवेतात्मप्रदेशसन्निकर्षान्मनसः स्मृत्युत्पत्तेर्न युगपदुत्पत्तिः ? ॥ २५ ॥ उन के आश्रय का अभाव हो जाये, २. या फिर उसका विरोधी गुण पैदा हो जाये । नित्य होने से आत्मा में पहला विकल्प तो बनेगा नहीं; तथा बुद्धि का कोई विरोधी गुण गृहीत नहीं होता, अतः बुद्धि को आत्मगुण मानने पर उसमें नित्यत्वप्रसङ्ग होने लगेगा ? ॥ २३ ॥ उत्तर- बुद्धि के अनित्यत्वग्रहण से, बुद्ध्यन्तर से उसका विनाश हो जाता है, शब्द की तरह ॥ २४ ॥ 'ज्ञान अनित्य है'-यह बात सभी प्राणियों को अनुभवसिद्ध है, प्रत्येक ज्ञान के पश्चात् ज्ञानधारा होती है, जैसे-पहले घटज्ञान हुआ, फिर 'इस घट को मैं जानता हूँ'-यह ज्ञान अथवा घटज्ञान ही प्रतिक्षण में उत्पन्न होते हैं-यों क्रम से ज्ञान होते चलते हैं । यह क्रमिक ज्ञान ही बुद्धि के बुद्ध्यन्तर गुण का विरोधी है-ऐसा अनुमान किया जाता है । जैसे शब्द-सन्तान में शब्द का शब्दान्तरविरोधी होता है ॥ २४ ॥ शङ्का- स्मृतिहेतुक आत्मसमवेत असंख्य ज्ञानजनित संस्कारों एवं आत्ममनःसन्निकर्ष के समान रूप से स्मृतिहेतु होने पर कारण का अयौगपद्य नहीं है, अतः बुद्धि को आत्मगुण मानेंगे तो युगपत् स्मृतियाँ प्रादुर्भूत होने लगेगी ? वहाँ कोई एकदेशी सन्निकर्ष के अयौगपद्य का उपपादन करने के लिए कहता है- ज्ञानसमवेत आत्मप्रदेशसन्निकर्ष हेतु से मन द्वारा स्मृत्युत्पत्ति होने से युगपद् उत्पत्ति नहीं होगी ॥ २५ ॥
२३८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० ज्ञानसाधनः संस्कारो ज्ञानमित्युच्यते, ज्ञानसंस्कृतैरात्मप्रदेशैः पर्यायेण मनः सन्निकृष्यते । आत्ममनःसन्निकर्षात् स्मृतयोऽपि पर्यायेण भवन्तीति ? ॥ २५ ॥ न; अन्तःशरीरवृत्तित्वान्मनसः ॥ २६ ॥ सदेहस्यात्मनो मनसा संयोगो विपच्यमानकर्माशयसहितो जीवनमिष्यते । तत्रास्य प्राक् प्रायणादन्तःशरीरे वर्तमानस्य मनसः शरीराद् बहिर्ज्ञानसंस्कृतैरात्म- प्रदेशैः संयोगो नोपपद्यत इति ॥ २६ ॥ साध्यत्वादहेतुः ? ॥ २७ ॥ विपच्यमानकर्माशयमात्रं जीवनम्, एवं च सति साध्यमन्तःशरीरवृत्तित्वं मनस इति ॥ २७ ॥ स्मरतः शरीरधारणोपपत्तेरप्रतिषेधः ॥ २८ ॥ सुस्मूर्षया खल्वयं मनः प्रणिदधानः चिरादपि कञ्चिदर्थं स्मरति, स्मरतश्च शरीरधारणं दृश्यते । आत्ममनःसन्निकर्षजश्च प्रयत्नो द्विविधः—धारकः, प्रेरकश्च । निःसृते च शरीराद् बहिर्मनसि धारकस्य प्रयत्नस्याभावाद् गुरुत्वात् पतनं स्यात् शरीरस्य स्मरत इति ॥ २८ ॥ ज्ञानसाधन संस्कार 'ज्ञान' कहलाता है । ज्ञानसंस्कृत आत्मप्रदेशों से मन क्रमशः सन्निकृष्ट होता है ! इस पर्यायजनित आत्ममनःसन्निकर्ष से स्मृतियाँ भी पर्याय से ही होंगी ॥ २५ ॥ मन के अन्तःशरीरवृत्ति होने से ऐसा कहना युक्त नहीं ॥ २६ ॥ सदेह आत्मा से प्रारब्ध कर्मसहित मन का संयोग 'जीवन' कहलाता है । वहाँ, मृत्यु से पूर्व अन्तःशरीर में ही वर्तमान मन का शरीर से बाहर के आत्मप्रदेशों से संयोग उपपन्न नहीं होता ॥ २६ ॥ एकदेशी की शङ्का— उक्त जीवनलक्षण स्वयं साध्य होने से हेतु नहीं बन सकता ? ॥ २७ ॥ विपच्यमान कर्माशयमात्र ही 'जीवन' है—ऐसा मानने पर मन का अन्तःशरीर- वृत्तित्व प्रमाणों से साधनीय है, अतः वह सिद्ध नहीं है ? ॥ २७ ॥ स्मरण करनेवाले का शरीरधारणोपपादन होने से निषेध युक्त नहीं ॥ २८ ॥ स्मरण करने की इच्छा से यह मन प्रणिधान करता हुआ बहुत काल के बाद भी किसी विषय का स्मरण कर ही लेता है, और वैसे स्मरणकर्ता को शरीरधारण किये हुए भी देखते हैं । आत्ममनःसन्निकर्षज प्रयत्न दो प्रकार का होता है—१. शरीर का धारक तथा २. प्रेरक । यों, शरीर से बाहर मन के निकल जाने पर धारकप्रयत्नाभाव से स्मरण करते हुए शरीर का गुरुत्व के कारण पतन होने लगेगा ॥ २८ ॥
३१. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३९
३१. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३९ न; तदाशुगतित्वान्मनसः ? ॥ २९ ॥ आशुगति मनः, तस्य बहिः शरीरात्मप्रदेशेन ज्ञानसंस्कृतेन सन्निकर्षः, प्रत्यागतस्य च प्रयत्नोत्पादनमुभयं युज्यते इति । उत्पाद्य वा धारकं प्रयत्नं शरीरान्निःसरणं मनसः; अतस्तत्रोपपन्नं धारणमिति ? ॥ २९ ॥ न; स्मरणकालानियमात् ॥ ३० ॥ किञ्चित्क्षिप्रं स्मर्यते, किञ्चिच्चिरेण । यदा चिरेण, तदा सुस्मूर्षया मनसि धार्यमाणे चिन्ताप्रवन्धे सति कस्यचिदर्थस्य लिङ्गभूतस्य चिन्तनमाराधितं स्मृतिहेतुर्भवति । तत्रैतच्चिरनिश्चरिते मनसि नोपपद्यत इति । शरीरसंयोगान- पेक्षश्चात्ममनःसंयोगो न स्मृतिहेतुः; शरीरस्य भोगायतनत्वात् । उपभोगायतनं पुरुषस्य ज्ञातुः शरीरम्, न ततो निश्चरितस्य मनस आत्मसंयोगमात्रं ज्ञान- सुखादीनामुत्पत्तौ कल्पते, कॢप्तौ वा शरीरवैयर्थ्यमिति ॥ ३० ॥ आत्मप्रेरण-यदृच्छाज्ञ-ताभिश्च न संयोगविशेषः ? ॥ ३१ ॥ आत्मप्रेरणेन वा मनसो बहिः शरीरात् संयोगविशेषः स्याद् यदृच्छया मन के आशुगति होने से पतन नहीं होगा ? ॥ २९ ॥ मन शीघ्रगतिवाला है, उसका शरीर से बाहर ज्ञानसंस्कृत आत्मप्रदेश से सन्निकर्ष होता है, तथा वह वापस लौटकर शरीरधारक प्रयत्न उत्पन्न करता है—यों दोनों क्रियाएँ उसमें सम्पन्न होती हैं । या धारक प्रयत्न को उत्पन्न करके वह शरीर से बाहर निकलता है । इस रीति से, धारण उपपन्न होने से पतन नहीं बनेगा ? ॥ २९ ॥ स्मरणकाल का नियम न होने से ( पतनप्रतिषेध) नहीं (हो सकता ) ॥ ३० ॥ कोई बात जल्दी याद आ जाती है, कोई देर में । जब कोई बात देर में स्मरण आती है, उस स्मरण करने की इच्छा से धार्यमाण मन में चिन्तनप्रबन्ध के होने से हेतुभूत किसी अर्थ के विषय में किया गया चिन्तन स्मृतिहेतु होता है । इस स्थिति में यह दीर्घकालिक चिन्तन बाहर निकलनेवाले मन में नहीं बनेगा । ऐसा आत्ममनः- सन्निकर्ष जो शरीरसंयोग की अपेक्षा न रखता हो, स्मृतिहेतु नहीं बन सकता; क्योंकि शरीर ही भोगायतन है । ज्ञाता पुरुष का उपभोगायतन शरीरमात्र है, इस में से मन के बाहर निकल जाने पर, आत्मसंयोगमात्र ज्ञान सुखादि की उत्पत्ति में हेतु नहीं कल्पित किया जा सकता है । यदि कल्पना कर भी लें तो उस शरीर का वैयर्थ्य ही होगा ॥ ३० ॥ 'ज्ञानसमवेत' ( ३. २. २५ ) इत्यादि सूत्रोक्त एकदेशिमत को दूसरा एकदेशी खण्डित कर रहा है— शरीर से बाहर संयोग आत्मप्रेरणा, यदृच्छा या ज्ञातुता से नहीं हो पाता ? ॥ ३१ ॥ मन का शरीर से बाहर के प्रदेश में संयोग या तो आत्मप्रेरणा से हो, या फिर
२४० ' वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० वाऽऽकस्मिकतया, ज्ञातया व मनसः ? सर्वथा चानुपपत्तिः। कथम् ? स्मर्त्तव्यत्वादि- च्छात्तः स्मरणज्ञानासम्भवाच्च । यदि तावदात्मा-अमुष्यार्थस्य स्मृतिहेतुः संस्कारः अमुस्मिन्नात्मदेशे समवेतस्तेन मनः संयुज्यतामिति मनः प्रेरयति, तदा स्मृत एवा- सावर्थो भवति, न स्मर्त्तव्यः । न चात्मप्रत्यक्ष आत्मप्रदेशः संस्कारो वा, तत्रानुप- पन्नाऽऽत्मप्रत्यक्षेण संवित्तिरिति । सुस्मूर्षया चायं मनः प्रणिदधानश्चिरादपि कञ्चिदर्थं स्मरति, नाकस्मात् । ज्ञातृत्वं च मनसो नास्ति, ज्ञानप्रतिषेधादिति ॥३१॥ एतच्च— व्यासक्तमनसः पादव्यथनेन संयोगविशेषेण समानम् ॥ ३२ ॥ यदा खल्वयं व्यासक्तमनाः क्वचिद् देशे शर्करया कण्टकेन वा पादव्यथन- माप्नोति, तदाऽऽत्ममनःसंयोगविशेष एषितव्यः । दृष्टं हि दुःखं दुःखवेदनं चेति तत्रायं समानः प्रतिषेधः । यदृच्छया तु न विशेषः, नाकस्मिकी क्रिया, नाक- स्मिकः संयोग इति । कर्मादृष्टमुपभोगार्थं क्रियाहेतुरिति चेत् ? समानम् । कर्मादृष्टं पुरुषस्थं पुरुषोपभोगार्थं मनसि क्रियाहेतुः, एवं दुःखं दुःखसंवेदनं च यदृच्छा से ( अकस्मात् ) हो, या मन की ज्ञातृता से हो—तीनों ही विकल्पों में उपपा- दन नहीं बनेगा । कैसे ? स्मर्त्तव्य होने से, या इच्छा द्वारा स्मरणज्ञान सम्भव न होने से । यदि आत्मा 'अमुक अर्थ का स्मृतिहेतु संस्कार अमुक आत्मप्रदेश में समवेत हुआ है, अतः उससे साथ जाकर मन संयुक्त हो'—ऐसी प्रेरणा मन को करता है तो वह अर्थ आत्मा द्वारा स्मृत ही है, स्मर्त्तव्य उसमें क्या रह गया ! और उक्त प्रेरणा भी अनुपपन्न है, क्योंकि आत्मप्रदेश तथा संस्कार आत्मप्रत्यक्ष हैं नहीं, अतः वहाँ आत्मप्रत्यक्ष से संवित्ति अनुपपन्न है । स्मरण करने की इच्छा से मन प्रणिधान करता हुआ बहुत देर में भी किसी अर्थ को स्मरण करता है, अकस्मात् नहीं । अतः दूसरा पक्ष भी अनुपपन्न है; क्योंकि मन में ज्ञानप्रतिषेध पहले प्रतिपादित किया जा चुका, अतः उसमें ज्ञातृत्व अनुपपन्न है ॥३१॥ दूसरे एकदेशिमत का खण्डन— और यह कथन— व्यासक्तमना पुरुष के पादव्यथन द्वारा हुए संयोगविशेष के समान है ॥ ३२ ॥ जब यह अन्यासक्तचित्त पुरुष किसी जगह कंकड़ या काँटे से पैर में बिंध जाता हैं, तब एक विशिष्ट आत्ममनःसंयोग मानना ही पड़ेगा; क्योंकि लोक में वैसा दुःख तथा दुःखानुभूति भी देखी जाती है । इसमें भी प्रतिषेध पहले जैसा ही है; क्योंकि यदृच्छा से यह संयोगविशेष नहीं होता, न यहाँ आकस्मिकी क्रिया ही होती है, न तथाभूत संयोग ही । यदि वैसे संयोगविशेष में अदृष्ट कर्म ही उपभोग के लिये क्रिया का हेतु हो जायेगा ? तो यह बात स्मृतिहेतु मनःसंयोग में भी समान है । पुरुषस्थ अदृष्ट कर्म पुरुष के उप-
३३. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४१
३३. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४१ सिध्यतीत्येवं चेन्मन्यसे ? समानम् । स्मृतिहेतावपि संयोगविशेषो भवितुमर्हति । तत्र यदुक्तम्- 'आत्मप्रेरणयहच्छाज्ञातृभिश्च न संयोगविशेषः' (३.२.३१) इति, अयमप्रतिषेध इति । पूर्वस्तु प्रतिषेधः 'नान्तःशरीरवृत्तित्वान्मनसः' (३.२.२६) इति ? ॥ ३२ ॥ कः खल्विदानीं कारणयौगपद्यसद्भावे युगपदस्मरणस्य हेतुरिति ? प्रणिधानलिङ्गादिज्ञानानामयुगपद्भावादयुगपत्स्मरणम् ॥ ३३ ॥ यथा खल्वात्ममनसोः सन्निकर्षः संस्कारश्च स्मृतिहेतुः, एवं प्रणिधानं लिङ्गा- दिज्ञानानि, तानि च न युगपद्भवन्ति, तत्कृता स्मृतानां युगपदनुत्पत्तिरिति । प्रातिभवत्तु प्रणिधानाद्यनपेक्षे स्मार्ते यौगपद्यप्रसङ्गः१ । यत्खल्विदं प्रातिभमिव ज्ञानं प्रणिधानाद्यनपेक्षं स्मार्तमुत्पद्यते, कदाचित्तस्य युगपदुत्पत्तिप्रसङ्गः; हेत्वभावात् । सतः स्मृतिहेतोरसंवेदनात् प्रातिभेन समाना- भिमानः । बह्वर्थविषये वै चिन्ताप्रबन्धे कश्चिदेवार्थः कस्यचित्स्मृतिहेतुः, तस्या- नुचिन्तनात् तस्य स्मृतिर्भवति, न चायं स्मर्ता सर्वं स्मृतिहेतुं संवेदयते-'एवं मे भोग के लिये मन में क्रियाहेतु बन जायेगा एवं सुखाद्युपभोग भी उसको प्राप्त होगा- ऐसा मानोगे ? तो हमारे मत में भी यही उत्तर है । अर्थात् स्मृतिहेतु में भी संयोगविशेष उस प्रकार हो सकता है । अतः वहाँ जो आपने प्रतिषेध दिया था कि- 'आत्मप्रेरणा, यदृच्छा तथा ज्ञातृता से संयोगविशेष नहीं होता' ( ३.२.३१ ) - यह नहीं बनेगा । अपितु मन के 'अन्तःशरीरवृत्ति होने से शरीर के बाह्य प्रदेशों में उसका संयोग नहीं होता' ( ३.२.२६ ) - यह पहला प्रतिषेध ही बनेगा ॥ ३२ ॥ शंका-स्मृतियौगपद्य के रहते अब कौन युगपद् स्मरण न होने में हेतु है ? प्रणिधान, लिङ्गादि ज्ञान के अयुगपद्भाव से युगपत् स्मरण नहीं होता ॥ ३३ ॥ जैसे आत्ममनःसन्निकर्ष तथा संस्कार स्मृतिहेतु हैं, उसी तरह प्रणिधान तथा लिङ्गादिज्ञान भी स्मृतिहेतु हैं । वे युगपद् उद्भूत नहीं होते; अतः तत्कृत स्मृतियाँ भी युगपत् उत्पन्न नहीं होतीं । प्रातिभ ज्ञान स्मृत्यनुरूप ही है, वह प्रणिधानादि के बिना ही संस्कारसहित आत्म- मनःसंयोगमात्र से जो स्मृतियाँ उत्पन्न होती हैं वैसी अन्य स्मृतियाँ भी युगपत् सम्भव होने लगेंगी ? अर्थात् जो प्रणिधानाद्यनपेक्ष स्मार्त ज्ञान प्रातिभ ज्ञान के सदृश उत्पन्न होता है, उनके हेतु (प्रणिधानादि) की अपेक्षा न होने से कदाचित् वैसी स्मृतियों की युगपदुत्पत्ति होने लगेगी ? स्मृतिहेतु के असंवेदन ( समझमें न आने ) से स्मार्त ज्ञान में प्रातिभज्ञान के साथ तुल्यारोप है । पर अनेकार्थविषयक चिन्ता ( अनुभवधारा ) में कोई ही अर्थ किसी चिन्तन का स्मृतिहेतु बनता है, उसके अनुचिन्तन से उसकी स्मृति होती है, और स्मर्ता इस प्रकार सभी स्मृतिहेतुओं का तो संवेदन नहीं कर पाता कि १. इदं भाष्यमेव न सूत्रम्; प्रमाणाभावात् । न्या० : द० १६
२४२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० स्मृतिरुत्पन्ना' इति, असंवेदनात् प्रातिभमिव ज्ञानमिदं स्मार्तमित्यभिमन्यते । न त्वस्ति प्रणिधानाद्यनपेक्षं स्मार्तमिति । प्रातिभे कथमिति चेत् ? पुरुषकर्मविशेषादुपभोगवन्नियमः । प्रातिभमिदानीं ज्ञानं युगपत् कस्मान्नोत्पद्यते ? यथोपभोगार्थं कर्म युगपदु- पभोगं न करोति, एवं पुरुषकर्मविशेषः प्रतिभाहेतुर्न युगपदनेकं प्रातिभं ज्ञान- मुत्पादयति । हेत्वभावादयुक्तमिति चेद् ? न; करणस्य प्रत्ययपर्याये सामर्थ्यात् । 'उपभोगवन्नियमः' इत्यस्ति दृष्टान्तो हेतुर्नास्तीति चेन्मन्यसे ? न; करणस्य प्रत्ययपर्याये सामर्थ्याद् । नैकस्मिन् ज्ञेये युगपदनेकं ज्ञानमुत्पद्यते, न चानेकस्मिन् । तदिदं दृष्टेन प्रत्ययपर्यायेणानुमेयं करणसामर्थ्यमित्थम्भूतमिति न ज्ञातुर्विकरण- धर्मणो देहनानात्वे प्रत्यययोगपद्यादिति । अयं च द्वितीयः प्रतिषेधः-अवस्थितशरीरस्य चानेकज्ञानसमवायादेकप्रदेशे युगपदनेकार्थस्मरणं स्यात् । क्वचिद् देशेऽवस्थितशरीरस्य ज्ञातुरिन्द्रियार्थप्रबन्धेन ज्ञानमनेकमेकस्मिन्नात्मप्रदेशे समवैति । तेन यदा मनः संयुज्यते तदा ज्ञातपूर्व- 'मुझे ऐसी स्मृति उत्पन्न हुई है' । अतः असंवेदन से स्मार्तज्ञान भी प्रातिभज्ञान की तरह होता है—ऐसा वह अभिमान ( भ्रम ) करता है। वस्तुतः स्मार्त में भी सम्पूर्ण प्रणिधानादि की अपेक्षा रहती ही है । प्रातिभ में क्या व्यवस्था रहती है ? पुरुषकर्मविशेष से उपभोग की तरह उसमें नियम है। अब प्रातिभज्ञान युगपत् उत्पन्न क्यों नहीं होता ? जैसे उपभोगार्थक कर्म एक साथ उपभोग नहीं कराता, उसी तरह प्रतिभाहेतु पुरुषकर्मविशेष एक साथ अनेक प्रातिभज्ञानों को उत्पन्न नहीं कराता । 'हेतु के न होने से' यह आपकी उक्ति अयुक्त है ? नहीं; क्योंकि करण में अनेक प्रत्यय एक साथ उत्पन्न करने की सामर्थ्य नहीं होती । और उपर्युक्त 'उपभोग- वन्नियमः' यह दृष्टान्त है, हेतु नहीं है—ऐसा आप नहीं कह सकते; क्योंकि हम अभी उत्तर दे चुके हैं कि करण ( साधन ) का क्रमिक ज्ञान में सामर्थ्य होता है । अनेक ज्ञान न तो एक ज्ञेय में युगपद् उत्पन्न हो सकते हैं, न अनेक में । इस लोकसिद्ध क्रमिकज्ञान से ऐसा ही करणसामर्थ्य अनुमित होता है । विकरणधर्मा ( योगी ) के अनेकदेह होने पर ज्ञानयोगपद्य दिखायी देता है । ज्ञाता होने की दशा में तो योगी को भी वैसा ज्ञान- योगपद्य नहीं होगा । दूसरा प्रतिषेध यह है—अवस्थित शरीर ज्ञाता के अनेक ज्ञानसमवाय से एक प्रदेश में युगपद् अनेकार्थ का स्मरण हो सकता है । किसी देश में अवस्थित शरीरज्ञाता से इन्द्रियार्थसम्बन्ध से अनेक ज्ञान एक ही आत्मप्रदेश में समवेत हो जाते हैं । उससे जब CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
३४. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४३
३४. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४३ स्यानेकस्य युगपत् स्मरणं प्रसज्यते; प्रदेशसंयोगपर्यायाभावादिति । आत्मप्रदे- शानामद्रव्यान्तरत्वादेकार्थसमवायस्याविशेषे स्मृतियौगपद्यप्रतिषेधानुपपत्तिः । शब्दसन्ताने तु श्रोत्राधिष्ठानप्रत्यासत्त्या शब्दश्रवणवत् संस्कारप्रत्यासत्त्या मनसः स्मृत्युत्पत्तेर्न युगपदुत्पत्तिप्रसङ्गः । पूर्वं एव तु प्रतिषेधो नानेकज्ञानसम- वायादेकप्रदेशे युगपत् स्मृतिप्रसङ्ग इति ॥ ३३ ॥ यत् 'पुरुषधर्मो ज्ञानमन्तःकरणस्येच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखानि धर्माः' इति कस्यचिद्दर्शनम्, तत् प्रतिषिध्यते— ज्ञस्येच्छाद्वेषनिमित्तत्वादारम्भनिवृत्त्योः ॥ ३४ ॥ अयं खलु जानाति तावद्—इदं मे सुखसाधनमिदं मे दुःखसाधनमिति, ज्ञात्वा स्वस्य सुखसाधनमाप्तुमिच्छति, दुःखसाधनं हातुमिच्छति। प्राप्तीच्छाप्रयुक्तंस्या- स्य सुखसाधनावाप्तये समीहाविशेष आरम्भः, जिहासाप्रयुक्तस्य दुःखसाधन- परिवर्जनं निवृत्तिः, एवं ज्ञानेच्छाप्रयत्नद्वेषसुखदुःखानामेकेनाभिसम्बन्धः । एक- कर्तृत्वं ज्ञानेच्छाप्रवृत्तीनां समानाश्रयत्वं च । तस्माद् ज्ञस्येच्छाद्वेषप्रयत्न- मन संयुक्त होता है तब ज्ञातपूर्व अनेक अर्थ का युगपत् स्मरण प्रसक्त हो सकता है; प्रदेशसंयोग में अनेकोत्पत्ति का सामर्थ्य होने से । आत्मप्रदेश द्रव्यानंतर तो हैं नहीं, अतः एकार्थक समवाय का सम्बन्धसमानतया स्मृतियौगपद्यप्रतिषेध अनुपपन्न ही है । शब्दसन्तान में तो शब्द श्रोत्रेन्द्रिय से साक्षात् सम्बद्ध है, वही सुनायी देता है, न कि शब्दसन्तानगत समग्र शब्द; इसी तरह सहकारिकारणसंस्कारप्रत्यासत्ति से मन में स्मृति उत्पन्न होती है, अतः उसमें यौगपद्यप्रसङ्ग न होगा । एकदेशिमत का भी वही प्रतिषेध समझना चाहिये, जो हम पीछे ( ३. २. २६ में) कह आये हैं कि अनेकज्ञान- समवाय होने से एक प्रदेश में युगपत्स्मृतिप्रसङ्ग न होगा ॥ ३३ ॥ 'ज्ञान पुरुषधर्म है; इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख अन्तःकरण के धर्म हैं'—ऐसा कुछ ( साङ्ख्यमतानुयायी ) विद्वान् मानते हैं, सूत्रकार इस का खण्डन करते हैं— इच्छा, द्वेषादि भी ज्ञाता के ही गुण हैं; क्योंकि अर्थ में प्रवृत्ति-निवृत्ति उस ज्ञाता के ही इच्छाद्वेष के कारण होती हैं ॥ ३४ ॥ यह ज्ञाता जानता है , कि 'यह मेरे लिये सुखसाधन है, यह दुःखसाधन हैं', ऐसा जानकर वह सुखसाधन को पाना चाहता है, तथा दुःखसाधन को छोड़ देना चाहता हैं। पाने की इच्छा से युक्त इस सुखसाधन की प्राप्ति के लिये समीहाविशेष को 'आरम्भ' कहते हैं । और जिहासाप्रयुक्त दुःखसाधन का परिवर्जन 'निवृत्ति' कहलाता है । इस प्रकार ज्ञान, इच्छा, प्रयत्न, द्वेष एवं सुख-दुःखों का एक ( ज्ञाता ) से ही अभिसम्बन्ध बनता है । ज्ञानेच्छादिकों का एककर्तृत्व तथा सामानाधिकरण्य है, अतः ज्ञाता CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
२४४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० सुखदुःखानि धर्माः, नाचेतनस्येति । आरम्भनिवृत्त्योश्च प्रत्यगात्मनि दृष्टत्वात् परत्रानुमानं वेदितव्यमिति ॥ ३४ ॥ अत्र भूतचैतनिकः १ आह— तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः ? ॥ ३५ ॥ आरम्भनिवृत्तिलिङ्गाविच्छाद्वेषाविति यस्यारम्भनिवृत्ती तस्येच्छाद्वेषौ तस्य ज्ञानमिति प्राप्तम्—पार्थिवाप्यतैजसवायवीयानां शरीराणारम्भनिवृत्तिदर्शना- दिच्छाद्वेषज्ञानैर्योग इति चैतन्यम् ? ॥ ३५ ॥ परश्वादिष्वारम्भनिवृत्तिदर्शनात् ॥ ३६ ॥ शरीरे चैतन्यनिवृत्तिः। आरम्भनिवृत्तिदर्शनादिच्छाद्वेषज्ञानैर्योग इति प्राप्तं परश्वादेः करणस्यारम्भनिवृत्तिदर्शनाच्चैतन्यमिति । अथ शरीरस्येच्छादिभि- र्योगः, परश्वादेस्तु करणस्यारम्भनिवृत्ती व्यभिचरतः ? न तर्ह्ययं हेतुः 'पार्थिवा- प्यतैजसवायवीयानां शरीराणामारम्भनिवृत्तिदर्शनादिच्छाद्वेषज्ञानैर्योगः' इति । के ही इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःखादि धर्म हैं, अचेतन के नहीं । यों यह प्रवृत्ति- निवृत्ति जीवात्मा में प्रमाण से जान लेने के बाद परमात्मा में भी अनुमान प्रमाण से समझ लेनी चाहिये ॥ ३४ ॥ यहाँ भूतचैतनिक चार्वाक कहता है— इच्छा द्वेष के शरीरनिमित्तिक होने से पार्थिवादि देहों में चैतन्यप्रतिषेध नहीं बनता ? ॥ ३५ ॥ 'इच्छा, द्वेष आरम्भ-निवृत्ति के हेतु हैं'—इस सिद्धान्त से जिसके आरम्भ-निवृत्ति होंगे, उस के इच्छा-द्वेष हैं तथा उसी का ज्ञान होना चाहिये; तब पार्थिव, आप्य, तैजस, वायवीय शरीरों के भी आरम्भ-निवृत्ति देखे जाने से इच्छा द्वेषादि का योग भी उन्हीं के साथ होगा, तब ज्ञान भी उन्हीं को होना चाहिये, तो क्यों न उन शरीरों में ही चैतन्य मान लें ? ॥ ३५ ॥ परशु-आदि में भी आरम्भनिवृत्ति देखे जाने से ॥ ३६ ॥ शरीरों में चैतन्य नहीं मानना चाहिये । यदि चर्वाक यह सिद्धान्त बनायेगा कि 'जिसमें आरम्भ-निवृत्ति देखे जाय उसी का इच्छा द्वेष तथा ज्ञान से सम्बन्ध होगा' तो परशु ( कुठार ) आदि साधनों की भी आरम्भ-निवृत्ति देखे जाने से उसे भी चैतन्य मानना पड़ेगा । यदि कहें कि शरीर का इच्छा-द्वेषादि से ही सम्बन्ध होता है, परश्वादि साधनों की आरम्भ-निवृत्ति तो कहीं-कहीं व्यभिचरित भी देखी जाती है ? तो यह कोई हेतु नहीं बना, तथा इसी परश्वादि दृष्टान्त से आपका यह सिद्धान्त भी व्यभिचरित हो जायेगा कि पार्थिव, आप्य, तैजस, वायवीय शरीरों की आरम्भ-निवृत्ति देखे जाने से उनका इच्छा द्वेष तथा ज्ञान से सम्बन्ध है । १. 'ज्ञानेच्छादीनां पार्थिवमिदं शरीरमेवाधिकरणम्' इति भूतचेतनवादी चार्वाक इत्यर्थः ।
३७. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४५
३७. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४५ अयं तर्ह्यन्योऽर्थः—तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः। पृथ्वि- व्यादीनां भूतानामारम्भस्तावत्तदसत्स्थावरशरीरेषु तदवयव्यूहलिङ्गः प्रवृत्ति- विशेषः. लोष्टादिषु च लिङ्गाभावात् प्रवृत्तिविशेषाभावो निवृत्तिः, आरम्भ- निवृत्तिलिङ्गाविच्छाद्वेषाविति । पार्थिवाद्येष्वणुषु तद्दर्शनादिच्छाद्वेषयोगः, त- द्योगाज् ज्ञानयोग इति सिद्धं भूतचैतन्यमिति ? कुम्भादिष्वनुपलब्धेरहेतुः¹। कुम्भादिमृदवयवानां व्यूहलिङ्गः प्रवृत्तिविशेष आरम्भः, सिकतादिषु प्रवृत्तिविशेषाभावो निवृत्तिः । न च मृत्सिक्तानामारम्भ- निवृत्तिदर्शनादिच्छाद्वेषप्रयत्नज्ञानैर्योगः, तस्मात् 'तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः' इत्यहेतुरिति ॥ ३६ ॥ नियमानियमौ तु तद्विशेषकौ ॥ ३७ ॥ तयोरिच्छाद्वेषयोर्नियमानियमौ विशेषकौ = भेदकौ। ज्ञस्येच्छाद्वेषनिमित्ते प्रवृत्तिनिवृत्ती, न स्वाश्रये। किं तर्हि ? प्रयोज्याश्रये। तत्र प्रयुज्यमानेषु भूतेषु प्रवृत्तिनिवृत्ती स्तः, न सर्वेष्वित्यनियमोपपत्तिः। यस्य तु ज्ञत्वाद् भूतानामिच्छाद्वेषनिमित्ते आरम्भनिवृत्ती स्वाश्रये तस्य शंका—हमारे सिद्धान्तवाक्य का आपने अर्थ ठीक नहीं समझा । उसका अर्थ यह है—पृथिव्यादि भूतों में उनके अस्थिर स्थावर शरीरों में तदवयव्यूहहेतु से प्रवृत्तिविशेष ज्ञात होता है। तथा लोष्टादिक में वह हेतु न होने से प्रवृत्तिविशेषाभावरूप निवृत्ति ज्ञात होती है। इच्छाद्वेषादिक आरम्भ निवृत्ति हेतु से निर्णीत है। पार्थिवादि अणुओं में वह हेतु देखा जाने से उनसे इच्छाद्वेष का सम्बन्ध तथा उससे ज्ञान का सम्बन्ध है। अतः भूतचैतन्य सिद्ध हो जाता है ? कुम्भादि में उक्त साध्य की अनुपलब्धि होने से वह अहेतु है । कुम्भादि के मृत्तिकावयवों में उनके आकृतिहेतु प्रवृत्तिविशेष 'आरम्भ', तथा सिकता ( बालुका ) में उस प्रवृत्तिविशेष का अभाव ही 'निवृत्ति' कहलाती है। उन मृत्सिक्तादिकों में प्रवृत्ति-निवृत्ति देखी जाने पर भी, इच्छाद्वेषादि या ज्ञान से उनका सम्बन्ध नहीं देखा जाता। अतः 'इच्छा द्वेष आरम्भप्रवृत्तिमित्तक हैं'—यह आपका कहना अहेतुक है ॥ ३६ ॥ नियम तथा अनियम तो उनके भेदक हैं ॥ ३७ ॥ इच्छाद्वेषों के नियम, अनियम तो ज्ञ तथा अज्ञ के भेदक हैं। प्रवृत्ति-निवृत्ति ज्ञाता के इच्छाद्वेषनिमित्तक है। आप उन्हे स्वाश्रय ( ज्ञ के आश्रित ) नहीं कह सकते; वे तो प्रयोज्याश्रय हैं। जो भूत प्रयुज्यमान होंगे, उनमें ही प्रवृत्ति-निवृत्ति होगी, सब में नहीं; अतः नियम नहीं बन सकता। जिस (चार्वाक) के मत में ज्ञाता होने से भूतों की इच्छाद्वेषपत्तिमित्तक प्रवृत्ति-निवृत्ति १. न्यायसूचीनिबन्धे नैतत् सूत्रत्वेन परिगणितम्, नापि वृत्तिकृता व्याख्यातम्, अतो नेदं सूत्रम् ।
२४६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० नियमः स्यात्, यथा-भूतानां गुणान्तरनिमित्ता प्रवृत्तिर्गुणप्रतिबन्धाच्चानिवृ- त्तिर्भूतमात्रे भवति नियमेन; एवं भूतमात्रे ज्ञानेच्छाद्वेषनिमित्ते प्रवृत्तिनिवृत्तौ स्वाश्रये स्याताम् ! न तु भवतः । तस्मात् प्रयोजकाश्रिता ज्ञानेच्छाद्वेषप्रयत्नाः, प्रयोज्याश्रये तु प्रवृत्तिनिवृत्ती इति सिद्धम् । एकशरीरे तु ज्ञातृबहुत्वं निरनुमानम् । भूतचैतनिकस्यैकशरीरे बहूनि भूतानि ज्ञानेच्छाद्वेषप्रयत्नगुणानीति ज्ञातृबहुत्वं प्राप्तम् । ओमिति ब्रुवतः प्रमाणं नास्ति । यथा नानाशरीरेषु नानाज्ञातारो बुद्ध्यादिगुणव्यवस्थानात्, एवमेक- शरीरेऽपि बुद्ध्यादिव्यवस्थानुमानं स्याज्ज्ञातृबहुत्वस्येति । दृष्टश्चान्यगुणनिमित्तः प्रवृत्तिविशेषो भूतानाम्, सोऽनुमानमन्यत्रापि । दृष्टः करणलक्षणेषु भूतेषु परश्वादिषु उपादानलक्षणेषु च मृत्प्रभृतिष्वन्यगुणनिमित्तः प्रवृत्तिविशेषः । सोऽनुमानमन्यत्रापि-त्रसत्स्थावरशरीरेषु तदवयव्यूहलिङ्गः प्रवृत्तिविशेषो भूतानामन्यगुणनिमित्त इति । स च गुणः प्रयत्नसमानाश्रयः संस्कारो धर्माधर्मसमाख्यातः सर्वार्थः, पुरुषार्थाराधनाय प्रयोजको भूतानां
- प्रयत्नवदिति । है, उसके यहाँ नियम बन सकता है। जैसे भूतसामान्य में गुरुत्वादि गुणान्तरनिमित्तक प्रवृत्ति तथा इसी गुणप्रतिबन्ध से नियमतः भूतमात्र में निवृत्ति देखी जाती है। इसी तरह भूतमात्र में ज्ञानेच्छाद्वेषनिमित्तक प्रवृत्ति-निवृत्ति स्वाश्रय होने से होने लगेगी, जब कि होती नहीं है । अतः यही मानना चाहिये कि ज्ञान, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न प्रयोजक ( ज्ञाता ) के आश्रित हैं, तथा प्रवृत्ति-निवृत्ति प्रयोज्य ( भूतादि ) के आश्रित हैं । एक शरीर में अनेक ज्ञाता किसी भी अनुमान से सिद्ध नहीं किये जा सकते । भूत- चैतन्यवादी के मत में बहुत से भूत ज्ञान, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न गुणवाले हैं, अतः अनेक ज्ञाता होने लगेंगे । यदि वह उनका अनेकत्व स्वीकार करता है तो उसकी इस स्वीकृति में कोई प्रमाण नहीं है । जैसे अनेक शरीरों में बुद्ध्यादिगुणव्यवस्था से अनेक ज्ञाता होते हैं; वैसे ही एक में भी बुद्ध्यादिव्यवस्था से अनेक ज्ञाताओं का अनुमान होने लगेगा । भूतों का अन्यगुणनिमित्तक प्रवृत्तिविशेष देखा गया है, वह अन्यत्र भी अनुमान करा देगा । करणलक्षण परशु-आदि तथा उपादानलक्षण मृदादि भूतों में अन्यगुणनिमित्तक प्रवृत्तिविशेष देखा जाता है, तन्मूलक ही यह अनुमान होता है कि प्राणियों के अस्थिर शरीरों में भूतों का तदवयवव्यूहलिङ्गक प्रवृत्तिविशेष अन्यगुणनिमित्तक ही है । वह गुण प्रयत्नसमानाधिकरण धर्माधर्माख्य संस्कारविशेष ही है । वह पुरुषसम्बद्ध सकलार्थ- प्रयोजक पुरुषार्थ-सम्पादन के लिये भूतों का प्रयोजक है । जैसे पुरुष का प्रयत्न तत्तदर्थ सम्पादन के लिये भूतों को प्रेरणा देता है, उसी तरह तद्गत धर्माधर्मरूप संस्कार भी प्रेरणा देता है ।
·३८. सू० ]· बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् :२४७
·३८. सू० ]· बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् :२४७ आत्मास्तित्वहेतुभिरात्मनित्यत्वहेतुभिश्च भूतचैतन्यप्रतिषेधः कृतो वेदि- तव्यः । 'नेन्द्रियार्थयोस्तद्विनाशेऽपि ज्ञानावस्थानात्' ( ३.२.१८ ) इति च समानः प्रतिषेध इति । क्रियामात्रं क्रियोपरममात्रं चारम्भनिवृत्ती इत्यभिप्रेत्यो- क्तम्-‘तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः' ( ३.२.३५ ) । अन्यथा त्विमे आरम्भनिवृत्ती आख्याते, न च तथाविधे पृथिव्यादिषु दृश्येते, तस्मादयु- क्तम्-‘तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः' इति ॥ ३७ ॥ भूतेन्द्रियमनसां समानः प्रतिषेधः, मनस्तूदाहरणमात्रम् । यथोक्तहेतुत्वात् पारतन्त्र्यादकृताभ्यागमाच्च न मनसः ॥ ३८ ॥ ‘इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्' (१.१.१०) इत्यतः प्रभृति यथोक्तं संगृह्यते, तेन भूतेन्द्रियमनसां चैतन्यप्रतिषेधः । पारतन्त्र्यात् । परतन्त्राणि भूतेन्द्रियमनांसि धारणप्रेरणव्यूहनक्रियासु प्रय- त्नवशात् प्रवर्तन्ते, चैतन्ये पुनः स्वतन्त्राणि स्युरिति । इसी प्रकार, आत्मास्तित्वसाधक तथा आत्मनित्यत्वसाधक हेतुओं से भी भूतचैतन्य का प्रतिषेध समझना चाहिये । 'इन्द्रिय-अर्थ को बुद्धि नहीं कह सकते; क्योंकि उनके विनाश पर भी ज्ञानस्थिति देखी जाती है' ( ३.२.१८ ) — यह प्रतिषेध भी भूतचैतन्या- भाव का ही समर्थन करता है। क्रिया तथा क्रियोपरममात्र को आरम्भ-निवृत्ति समझ कर पूर्वपक्षी ने कह दिया था कि 'तल्लिङ्ग होने से इच्छाद्वेष का पार्थिवादि में प्रतिषेध नहीं बनता' ( ३.२.३५ ) । अन्यथा हमारे मत में हितप्राप्ति तथा अहितपरिहार के लिये चेष्टा ( प्रयत्न ) विशेष आरम्भ-निवृत्ति कहलाते हैं। इस लक्षणवाले आरम्भ तथा निवृत्ति भूतों में दिखायी नहीं देते । अतः यह कहना असमीचीन ही है कि 'तल्लिङ्ग होने से पार्थिवादि में प्रतिषेध नहीं बनता' ॥ ३७ ॥ बुद्धि के आश्रितत्व के वारे में भूत, इन्द्रिय तथा मन का प्रतिषेध समान ही है; मन तो एक उदाहरणमात्र है । यथोक्त हेतुओं से, पारतन्त्र्य से, तथा अकृताभ्यागम दोष से बुद्धि मन का ( गुण नहीं हो सकती ) ॥ ३८ ॥ 'यथोक्त' का तात्पर्य 'इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख, ज्ञान को ही आत्मा का हेतु समझें' ( १. १. १० ) इत्यादि सूत्र से है। उक्त हेतुओं से भूत, इन्द्रिय, तथा मन का चैतन्य प्रतिषिद्ध समझना चाहिए । पारतन्त्र्य हेतु से भी इनमें चैतन्य का प्रतिषेध समझें । भूत, इन्द्रिय तथा मन परतन्त्र हैं, वे किसी अन्य के प्रयत्न से धारण, प्रेरण तथा व्यूहन ( संग्रह ) क्रियाओं में प्रवृत्त होते हैं। इनको चैतन्य मानने पर ये स्वतन्त्र होने लगेंगे ।