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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

अत्र च हेतुरुपादीयते—

३०२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० 'बाधनालक्षणं दुःखम्' (१.१.२१) इत्युक्तम्, ऋषिभिर्दुःखसंज्ञाभावनमुपदिश्यते । अत्र च हेतुरुपादीयते— विविधबाधनायोगाद् दुःखमेव जन्मोत्पत्तिः ॥ ५५ ॥ जन्म = जायते इति, शरीरेन्द्रियबुद्धयः, शरीरादीनां च संस्थानविशिष्टानां प्रादुर्भाव उत्पत्तिः। विविधा च बाधना-हीना, मध्यमा, उत्कृष्टा चेति। उत्कृष्टा नारकिणाम्, तिरश्चां तु मध्यमा, मनुष्याणां तु हीना, देवानां हीनतरा वीत- रागाणां च। एवं सर्वमुत्पत्तिस्थानं विवधबाधनानुषक्तं पश्यतः सुखे तत्साधनेषु च शरीरेन्द्रियबुद्धिषु दुःखसंज्ञा व्यवतिष्ठते । दुःखसंज्ञाव्यवस्थानात् सर्वलोकेष्वन- भिरतिसंज्ञा भवति। अनभिरतिसंज्ञामुपासीनस्य सर्वलोकविषया तृष्णा विच्छि- द्यते, तृष्णाप्रहाणात् सर्वदुःखाद्विमुच्यते इति । यथा विषयोगात् पयो विषमिति बुध्यमानो नोपादत्ते, अनुपाददानो मरणदुःखं नाप्नोति ॥ ५५ ॥ दुःखोद्देशस्तु न सुखस्य प्रत्याख्यानम्, कस्मात् ? न; सुखस्याप्यन्तरालनिष्पत्तेः ॥ ५६ ॥ न खल्वयं दुःखोद्देशः सुखस्य प्रत्याख्यानम् । कस्मात् ? सुखस्याप्यन्तराल- सभी को पीड़ा देते हैं, अतः दुःख हैं'—यों यह ऋषियों द्वारा दुःखसंज्ञाभावना के रूप में उपदिष्ट किया है। यहाँ हेतु देते हैं— विविध बाधायुक्त होने से शरीरादि की उत्पत्ति दुःख है ॥ ५५ ॥ जन्म अर्थात् जो उत्पन्न हो, जैसे—शरीर, इन्द्रिय तथा बुद्धि । संस्थानविशिष्ट शरीरादि का प्रादुर्भाव 'उत्पत्ति' कहलाता है। हीन, मध्यम तथा उत्कृष्ट भेद से दुःख अनेक प्रकार का है। इनमें उत्कृष्ट दुःख नरकवासकाल में मिलता है, मध्यम दुःख पशु योनि में तथा हीन ( अल्प ) दुःख मनुष्य योनि में मिलता है। देवयोनि में तथा वीतराग ज्ञानियों में यह दुःखमात्रा अल्पतर होती है। इस प्रकार सभी उत्पत्तिस्थान ( योनियों ) को दुःखानुपक्त समझते हुए जिज्ञासु की सुख के साधन तथा जायमान शरीर, इन्द्रिय तथा बुद्धि में दुःखबुद्धि बन जाती है। इनमें दुःखबुद्धि बन जाने से समग्र चराचर जगत् को दुःख रूप समझ कर जिज्ञासु उससे विरक्त हो जाता है। इस विराग-भावना का अभ्यास करने से उसकी सार्वत्रिकी तृष्णा विच्छिन्न हो जाती है। तृष्णानाश से वह सभी दुःखों से छुटकारा पा जाता है। वह समझता है कि जैसे विषसम्पृक्त दुग्ध विषवत् कार्य करता है उसी तरह यह दुःखसम्पृक्त सुख भी दुःख ही है, अतः उसकी प्राप्ति के लिये प्रयास नहीं करता; उक्त प्रयास न करने से वह मरणदुःख नहीं पाता ॥ ५५ ॥ उद्देशसूत्र (१.१.९) में दुःख की गणना सुखप्रत्याख्यान के रूप में नहीं की गयी है— बीच-बीच में सुख की भी उत्पत्ति होने से यह सुख का प्रत्याख्यान नहीं है ॥५६॥ यह दुःखपरिगणन सुख का निषेध नहीं हैं; क्योंकि इस दुःखप्रवाह में बीच-बीच में

५७. सू० ] दुःखपरीक्षाप्रकरणम् ३०३

५७. सू० ] दुःखपरीक्षाप्रकरणम् ३०३ निष्पत्तेः । निष्पद्यते खलु बाधनान्तरालेषु सुखं प्रत्यात्मवेदनीयं शरीरिणाम्, तदशक्यं प्रत्याख्यातुमिति ॥ ५६ ॥ अथापि— बाधनानिवृत्तेर्वेदयनः पर्येषणदोषादप्रतिषेधः ॥ ५७ ॥ सुखस्य दुःखोद्देशेनेति प्रकरणात्, पर्येषणम् = प्रार्थना विषयार्जनतृष्णा, पर्येषणस्य दोषो यदयं वेदयमानः प्रार्थयते, तच्चास्य प्रार्थितं न सम्पद्यते, सम्पद्य वा विपद्यते, न्यूनं वा सम्पद्यते, बहुप्रत्यनीकं वा सम्पद्यते—इत्येतस्मात् पर्येषण- दोषान्नानाविधो मानसः सन्तापो भवति । एवं वेदयतः पर्येषणदोषाद् बाधनाया अनिवृत्तिः । बाधनानिवृत्तेर्दुःखसंज्ञाभावनमुपदिश्यते । अनेन कारणेन दुःखं जन्म, न तु सुखस्याभावादिति । अथाप्येतदनूक्तम्— 'कामं कामयमानस्य यदा कामः समृध्यते । अथैनमपरः कामः क्षिप्रमेव प्रबाधते' ॥ "अपि चेदुदनेमिं समन्ताद् भूमिमिमां लभते१ सगवाश्वां न स तेन धनेन सुख की उत्पत्ति होती रहती है। दुःखों के बीच में सुख भी प्रत्येक प्राणी को अनुभूत होता रहता है । इस प्रत्यक्षगम्य सुखानुभव का कोई कैसे प्रत्याख्यान कर सकता है ! एक बात और— सुखानुभव करते हुए को तृष्णानुवर्तन होने के कारण दुःखनिवृत्ति न होने से प्रतिषेध नहीं बनेगा ॥ ५७ ॥ दुःखों का कीर्तन प्रकरण रहने से यहाँ पर्येषण सुखसम्बन्धी समझना चाहिये । पर्येषण से तात्पर्य है प्रार्थना, अर्थात् विषय को पाने की तृष्णा । इस तृष्णा में दोष यह है कि जब पुरुष किसी सुख का अनुभव करके उसे ( पुनः ) चाहता है, चाहने पर कभी वह सुख उसे मिल जाता है, कभी नहीं मिलता, या कभी मिलकर पुनः नष्ट हो जाता है, या यथेच्छ नहीं मिलता, या उसे बहुत से विघ्न आगे-पीछे घेर लेते हैं। इस तृष्णादोष से उस पुरुष को नाना प्रकार का मानसिक क्लेश होता है। इस रीति से, सुखानुभव करते हुए भी वह सुख तृष्णा से लिपटा रहता है । यतः दुःख एकान्ततः निवृत्त नहीं होता, अतः बाधा के रहने से दुःख पृथक् पदार्थ माना गया है, सुखाभाव नहीं । जैसा कि वृद्धजनों ने कहा भी है— विषय को जब यह चाहने लगता है तो इसकी यह चाह ( तृष्णा ) धीरे-धीरे बढ़ती जाती है, अतः यह एक चाह के पूरा होते ही दूसरी चाह को लेकर परेशान हो उठता है । उदाहरण के रूप में इस बात को ले सकते हैं—'गौ, अश्व-आदि साधनों सहित १. 'भूमिमालभते'—इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३०४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० धनैषी तृप्यति किन्नु सुखं धनकामे" इति ! ॥ ५७ ॥ दुःखविकल्पे सुखाभिमानाच्च ॥ ५८ ॥ दुःखसंज्ञाभावनोपदेशः क्रियते । अयं खलु सुखसंवेदने व्यवस्थितः सुखं परम- पुरुषार्थं मन्यते—न सुखादन्यन्निःश्रेयसमस्ति, सुखे प्राप्ते चरितार्थः कृतकरणीयो भवति । मिथ्यासंकल्पात्सुखे तत्साधनेषु च विषयेषु संरज्यते, संरक्तः सुखाय घटते, घटमानस्यास्य जन्मजराव्याधिप्रयाणानिष्टसंयोगेष्टवियोगप्रार्थितानुपपत्तिनिमित्त- मनेकविधं यावद् दुःखमुत्पद्यते, तं दुःखविकल्पं सुखमित्यभिमन्यते । सुखाङ्गभूतं दुःखम्, न दुःखमनासाद्य शक्यं सुखमवाप्तुम् । तादर्थ्यात्सुखमेवेदमिति सुखसंज्ञोपह- तप्रज्ञो जायस्व म्रियस्व सन्धावेति संसारंनातिवर्तते । तदस्याः सुखसंज्ञायाः प्रतिपक्षो दुःखसंज्ञाभावनमुपदिश्यते—दुःखानुषङ्गाद् दुःखं जन्मेति, न सुखस्याभावात् । यद्येवम्, कस्माद् दुःखं जन्मेति नोच्यते सोऽयमेवं वाच्ये यदेवमाह-दुःखमेव जन्मेति, तेन सुखाभावं ज्ञापयतीति ? जन्मविनिग्रहार्थीयो१ वै खल्वयमेवशब्दः, समुद्रपर्यन्त समग्र पृथिवी को पा ले तो भी यह धनलोलुप सन्तुष्ट नहीं हो सकता; अतः ऐसी धनकामना में क्या सुख है !' ॥ ५७ ॥ दुःख के विविध कल्पों में सुखाभिमान होने से ॥ ५८ ॥ दुःखसंज्ञाभावना का उपदेश किया जाता है । साधारणतया पुरुष विषयों में वार- बार सुखानुभव करता हुआ सुख को परम पुरुषार्थ मानता है कि सुख के अतिरिक्त कोई कल्याण नहीं है । अतः सुख प्राप्त होने पर सन्तुष्ट होता हुआ कृतकृत्य हो जाता है । इस प्रकार मिथ्या सङ्कल्प से सुख तथा तत्साधनभूत विषयों में संरक्त हो जाता है, संरक्त हो सुखाप्ति के लिए चेष्टा करता है । चेष्टा करते हुए इसको जन्म, वार्द्धक्य, व्याधि, मृत्यु, इष्टवियोग, अनिष्टसंयोग तथा काम्यानुपलब्धि आदि के कारण अनेक प्रकार के दुःख उत्पन्न होते हैं, क्योंकि इन्हीं को वह सुख मान बैठता है । सुख का अङ्ग है दुःख, दुःख विना पाये सुख नहीं मिल सकता—इस तदर्थता से उस दुःख में 'यह सुख ही है'—ऐसी मिथ्या संज्ञाभावना करके अविवेक से 'जीऊँ, मरूँ, भटकता फिरूँ' इस वासना के कारण वह संसार (जन्म-मरणरूपी प्रवाह) को कभी अतिक्रान्त नहीं कर पाता । अतः आचार्यजन इस सुखसंज्ञा की प्रतिपक्षभूत दुःखसंज्ञा की भावना का उपदेश करते हैं । यों, दुःखानुषङ्ग होने से जन्म को दुःख माना गया है, न कि सुख के अभाव से । यदि ऐसी बात है, तो 'दुःख जन्म हैं'—इतना ही कह दें, आपके कहने का मतलब 'दुःख ही जन्म है'—ऐसा है तो आप सुख का सर्वथा प्रत्याख्यान करना चाह रहे हैं ? यह ठीक नहीं, क्योंकि इस 'एव' शब्द का जन्मनिवृत्ति बतलाना ही प्रयोजन है; कैसे ? १. 'विनिग्रहः = विनिवृत्तिः, स एव अर्थः प्रवर्त्तते इति जन्मविनिग्रहार्थीयः । यथा च-मत्वर्थीय इति । एतदुक्तं भवति-जन्म दुःखमेवेति भावयितव्यम्, नात्र मनागपि सुख- बुद्धिः कर्तव्या; अनेकानर्थपरम्परायामपवर्गप्रत्यूहप्रसङ्गात्—इति श्रीवाचस्पतिमिश्राः ।

५९. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०५

५९. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०५ कथम् ? न दुःखं जन्म स्वरूपतः, किन्तु दुःखोपचाराद् । एवं सुखमपीति एतद- नेनैव निर्वर्त्त्यते, न तु दुःखमेव जन्मेति ॥ ५८ ॥ अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् [ ५९-६८ ] दुःखोपदेशानन्तरमपवर्गः, स प्रत्याख्यायते— ऋणक्लेशप्रवृत्त्यनुबन्धादपवर्गाभावः ? ॥ ५९ ॥ ऋणानुबन्धान्नास्त्यपवर्गः । “जायमानो ह वै ब्राह्मणस्त्रिभिर्ऋणैर्ऋणवान् जायते ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः, प्रजया पितृभ्यः” इति ऋणानि, तेषामनुबन्धः१ स्वकर्मभिः सम्बन्धः । कर्मसम्बन्धवचनात् “जरामयं वा एतत्सत्रं यदग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ चेति; जरया ह एष तस्मात् सत्राद्विमुच्यते, मृत्युना ह ”वा इति । ऋणानुबन्धादपवर्गानुष्ठानकालो नास्तीत्यपवर्गाभावः ? क्लेशानुबन्धान्नास्त्यपवर्गः । क्लेशानुबन्ध एवायं म्रियते, क्लेशानुबद्धश्च जायते । नास्य क्लेशानुबन्धविच्छेदो गृह्यते ? स्वयं जन्म दुःख नहीं, किन्तु उसमें दुःख की भावना (आरोप) की जाती है अर्थात् दुःख का जन्म में उपचार है। इसी तरह सुख के विषय में भी समझ लें। जन्म से सुख होता है न कि दुःख ही जन्म है। यहाँ जन्मनिवृत्ति ही इस उपदेश से समझायी जा रही है, सुख का अभाव नहीं सिद्ध किया जा रहा है ॥ ५८ ॥ उद्देशसूत्रानुसार अब क्रमप्राप्त 'अपवर्ग' पर विचार किया जाये । अपवर्ग, जिसका कि हम पीछे (१. १. २०) लक्षण कर आये हैं, का कुछ लोग प्रत्याख्यान करते हैं। (वे कहते हैं—) ऋणानुबन्ध, क्लेशानुबन्ध तथा प्रवृत्त्यनुबन्ध हेतुओं से अपवर्ग नहीं है ? ॥ ५९ ॥ ऋणानुबन्ध से 'अपवर्ग नहीं है'—ऐसा मानना चाहिए। जैसा कि शतपथब्राह्मण में कहा है—'उत्पन्न होता हुआ यह ब्राह्मण तीन ऋणों से ऋणवान् रहता है, उसमें वह ऋषियों के ऋण (वेदाध्ययनाध्यापन) से ब्रह्मचर्य द्वारा छूटता है, देव-ऋण से यज्ञ द्वारा तथा पितृ-ऋण से सन्तानोत्पत्ति द्वारा छूट पाता है।' यों ऋण बता दिये गये। इन ऋणों का अनुबन्ध अर्थात् स्वकर्तव्यों से सम्बन्ध। इस प्रकार हमारा सम्बन्ध इनसे सदा बना है। निष्कर्ष यह है कि इन ऋणों का अपाकरण कर्त्तव्य कोटि में आता है। इस कर्म- सम्बन्धवचन से—'यह अग्निहोत्र तथा दर्श, पूर्णमास आदि यज्ञ वार्धक्य तक करने आव- श्यक हैं, इन यज्ञों से बुढ़ापा या मृत्यु आने पर ही छुटकारा मिल सकता है' यह श्रुति- वाक्य से प्रमाणित होता है। उक्त ऋणापाकरण में ही समग्र जीवन व्यतीत हो जायेगा तो उसे अपवर्गानुष्ठान का समय ही न मिलेगा, अतः मान लें कि अपवर्ग नहीं है ? क्लेशानुबन्ध से भी अपवर्ग नहीं है। यह प्राणी क्लेशानुबद्ध ही पैदा होता है, क्लेशों से संघर्ष करता-करता मर जाता है। उसका यह क्लेशानुबन्ध कभी विच्छिन्न होता नहीं दिखायी देता ? १. 'अनुबन्धः = सर्वदाकरणीयता' इति वार्त्तिककृतः । न्या० द० : २०

३०६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० प्रवृत्त्यनुबन्धान्नास्त्यपवर्गः। जन्मप्रभृत्ययं यावत्प्रायणं वाग्बुद्धिशरीरा- रम्भेणाविमुक्तो गृह्यते, तत्र यदुक्तम्-‘दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरो- त्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः’ इति (१.१.२) तदनुपपन्नमिति ? ॥ ५९ ॥ अत्राभिधीयते— १. यत्तावदृणानुबन्धादिति, ऋणैरिव ऋणैरिति— प्रधानशब्दानुपपत्तेर्गुणशब्देनानुवादो निन्दाप्रशंसोपपत्तेः ॥ ६० ॥ ‘ऋणैः’ इति नायं प्रधानशब्दः। यत्र खल्वेकः प्रत्यादेयं ददाति द्वितीयश्च प्रतिदेयं गृह्णाति तत्रास्य दृष्टत्वात् प्रधानमृणशब्दः! न चैतदिहोपपद्यते; प्रधानशब्दानुपपत्तेः। गुणशब्देनायमनुवादः—ऋणैरिव ऋणैरिति। प्रयुक्तोपमं चैतद्, यथाऽग्निर्मांणवक इति। अन्यत्र दृष्टश्चायमृणशब्द इह प्रयुज्यते, यथाग्नि- शब्दो मागवके। कथं गुणशब्देनानुवादः ? निन्दाप्रशंसोपपत्तेः। कर्मलोपे ऋणीव ऋणादानान्निन्द्यते, कर्मानुष्ठाने च ऋणीव ऋणदानात्प्रशस्यते; स एवोपमार्थ इति।

प्रवृत्त्यनुबन्ध से भी अपवर्ग नहीं है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त यह प्राणी वाचिक, बौद्धिक तथा शारीरिक क्रियाओं में लगा रहता है, उनसे इसे कभी छुटकारा नहीं मिल पाता। अतः आपका यह पूर्व कथन (१. १. २) कि—'दुःख जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्या- ज्ञानों के उत्तरोत्तर के अपाय द्वारा उसके बाद वाले के नाश से अपवर्ग हो जाता है' ? सर्वथा अयुक्त है ॥ ५९ ॥ यहाँ सिद्धान्ती (नैयायिक) कहता है—इस ‘ऋणानुवन्ध’ शब्द में ‘ऋणों की तरह ऋणों से’ ऐसा औपचारिक अर्थ करना चाहिए। क्योंकि जहाँ शब्द का मुख्यार्थ अनुपपन्न हो वहाँ गुण शब्द से, निन्दा-प्रशंसोपपादन होने से अनुवाद कर लिया जाता है ॥ ६० ॥ ‘ऋणों से’ यह प्रधान (मुख्यार्थबोधक) शब्द नहीं है। जहाँ एक उधार ली हुई चीज को देता है तथा दूसरा लेता है—वहीं ‘ऋण’ शब्द का मुख्यार्थ रूप में प्रयोग होता है। यहाँ ऐसी बात है नहीं, अतः इस शब्द का प्रधान अर्थ गृहीत नहीं होता। इसलिये ऋणशब्द लाक्षणिक अर्थ में प्रयुक्त किया है कि ‘ऋणों की तरह के ऋणों से’। जैसे तेजस्वी आदमी को लोक में कह देते हैं—‘यह माणवक तो अग्निरूप है’। इसी तरह अन्यत्र देखा गया ऋण शब्द यहाँ प्रयुक्त हुआ है, जैसे अग्नि शब्द माणवक में। गुण- शब्द से अनुवाद कैसे है ? उसके निन्दा-प्रशंसात्मक होने से। जैसे ऋणी ऋण न चुका पाने के कारण निन्दापात्र होता है उसी तरह यह पुरुष भी उक्त तीनों में से कोई एक या सब कर्मों के विलोप से निन्दापात्र बनता है। और जैसे ऋणी ऋण चुका देने से प्रशंसित होता है उसी तरह यह पुरुष कर्मानुष्ठान से प्रशंसा प्राप्त करता है।

६०. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०७

६०. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०७ जायमान इति गुणशब्दः; विपर्ययेऽनधिकारात् । 'जायमानो ह वै ब्राह्मणः' इति च शब्दः-गृहस्थः सम्पद्यमानो जायमान इति । यदायं गृहस्थो जायते तदा कर्मभिरधिक्रियते; मातृतो जायमानस्यानधिकारात् । यदा तु मातृतो जायते कुमारः, न तदा कर्मभिरधिक्रियते; अर्थिनः शक्तस्य चाधिकारात् । अर्थिनः कर्मभिरधिकारः; कर्मविधौ कामसंयोगस्मृतेः 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्ग- कामः' इत्येवमादि । शक्तस्य च प्रवृत्तिसम्भवात्-शक्तस्य कर्मभिरधिकारः; प्रवृत्तिसम्भवात् । शक्तः खलु विहिते कर्मणि प्रवर्त्तते, नेतर इति । उभया- भावस्तु प्रधानशब्दार्थे । मातृतो जायमाने कुमारे उभयम्-अर्थिता, शक्तिश्च न भवतीति । न भिद्यते च लौकिकाद् वाक्याद्वैदिकं वाक्यं प्रेक्षापूर्वककारिपुरुषप्रणीतत्वेन । तत्र लौकिकस्तावदपरीक्षकोऽपि न जातमात्रं कुमारकमेवं ब्रूयात्-अधीष्व, यजस्व, ब्रह्मचर्यं चरेति, कुत एष ऋषिरुपपन्नानवद्यवादी उपदेशार्थेन प्रयुक्त उप- दिशति ! न खलु वै नर्त्तकोऽन्धेषु प्रवर्त्तते, न गायको बधिरेष्विति । उपदिष्टार्था- इसी तरह 'जायमानो ह वै ब्राह्मणः' इस श्रुति में 'जायमान' भी गुणशब्द है; क्योंकि इस शब्द के प्रधान अर्थ 'जातमात्र' को यागाद्यनुष्ठान का अधिकार ही प्राप्त नहीं है । मन्त्र में 'जायमान' शब्द का अर्थ है गृहस्थ होता हुआ, गृहस्थ बनता हुआ । अर्थात् जब यह ब्राह्मण गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होता है तब उसको यज्ञादि कर्मों में अधिकार प्राप्त होता है । माता से उत्पन्न होते ही ब्राह्मण-शिशु को उन कर्मों में अधिकार प्राप्त नहीं है । जब यह शिशु माता से उत्पन्न होता है तभी से इसका अधिकार इसलिए नहीं होता कि उस यज्ञ कर्म में .अर्थी तथा तत्कर्मानुष्ठानसमर्थ ही अधिकारी होता है । अर्थी को अधिकारी मानने का कारण यह है कि यज्ञों द्वारा अपने लिए कुछ चाहने वाला ही यज्ञ करे-ऐसा विधिरूप श्रुतिवाक्य में कामसंयुक्त वचन है, जैसे-'स्वर्गकाम अग्निहोत्र हवन करे'। सामर्थ्यवान् पुरुष ही उन कर्मों का अधिकारी है, क्योंकि समर्थ ही पूर्ण यज्ञों को कर पाता है । समर्थ ही विहित कर्म में प्रवृत्त हो सकता है, असमर्थ नहीं । 'जातमात्र' इस प्रधान शब्द के अर्थ में 'अर्थित्व' तथा 'शक्तत्व' दोनों का ही अभाव है । अर्थात् माता से उत्पन्न होते हुए शिशु में न अर्थित्व ( किसी पुत्रादि वस्तु की चाह) रहती है, न शक्ति (यज्ञ करने की सामर्थ्य) ही । बुद्धिमान् पुरुष द्वारा प्रणीत लौकिक वाक्य से वैदिक वाक्य भी भिन्न (निरर्थक) नहीं है । जैसे लोक में उत्पन्न होते हुए बालक को कोई बुद्धिमान् यह उपदेश नहीं दे सकता कि, 'पढ़ो, यज्ञ करो, ब्रह्मचर्य पालन करो', तो ये हित-मित-सत्यवादी ऋषि उपदेशानर्ह शिशु को ऐसा उपदेश कैसे कर सकते हैं ! क्या नर्तक अन्धों की अपना नाच दिखायेगा, या कोई गायक बहरों को अपना गाना सुनायेगा ! उपदेश उसी को किया जाता

३०८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० विज्ञाता नोपदेशविषयः । यश्चोपदिष्टमर्थं विजानाति तं प्रत्युपदेशः क्रियते, न चैतदस्ति जायमानकुमारक इति । गार्हस्थ्यलिङ्गं च मन्त्रब्राह्मणं कर्माभिवदति । यच्च मन्त्रब्राह्मणं कर्माभिवदति तत्पत्नीसम्बन्धादिना गार्हस्थ्यलिङ्गेनोपपन्नम् । तस्माद् गृहस्थोऽयं जायमानोऽभिधीयते इति । अर्थित्वस्य चाविपरिणामे जरामर्यवादोपपत्तिः । यावच्चास्य फलेनार्थित्वं न विपरिणमते न निवर्तते, तावदनेन कर्मानुष्ठेयमित्युपपद्यते जरामर्यवादस्तं प्रतीति । 'जरया ह वा' इत्यायुषस्तुरीयस्य चतुर्थस्य प्रव्रज्यायुक्तस्य वचनम्—'जरया ह वा एष एतस्माद्विमुच्यते' इति । आयुषस्तुरीयं चतुर्थं प्रव्रज्यायुक्तं 'जरा' इत्युच्यते । तत्र हि प्रव्रज्या विधीयते, अत्यन्तजरासंयोगे 'जरया ह वा' इत्यनर्थकम् । 'अशक्तो विमुच्यते' इत्येतदपि नोपपद्यते; स्वयमशक्तस्य बाह्यां शक्तिमाह- 'अन्तेवासी वा जुहुयाद् ब्रह्मणा स परिक्रीतः, क्षीरहोता वा जुहुयाद्धनेन स परिक्रीतः' इति । अथापि विहितं वानूद्येत ? कामाद्वार्थः परिकल्प्येत ? विहितानूवचनं न्याय्य- मिति । ऋणवानिवास्वतन्त्रो गृहस्थः कर्मसु प्रवर्तते इत्युपपन्नं वाक्यस्य साम- र्थ्यम् । फलस्य हि साधनानि प्रयत्नविषयः, न फलम् । तानि सम्पन्नानि फलाय हैं जो उपदेश के अर्थ को समझे । उत्पन्न होता हुआ शिशु उस अज्ञातोपदेश-को क्या समझेगा ! अपि च—यह कर्म का प्रकाशक मन्त्रब्राह्मण गृहस्थचिह्नयुक्त जिस कर्म का अभिवदन कर रहा है, वह मन्त्रब्राह्मणोक्त कर्म गृहस्थ के चिह्न पत्नीसम्बन्ध आदि से युक्त हैं, अतः यही मानना पड़ेगा कि उक्त मन्त्रब्राह्मण में 'जायमान' का अर्थ 'गृहस्थ' ही अभिप्रेत हैं । अर्थित्व की अनिवृत्ति होने पर जरामर्यवाद (वार्धक्य सीमा) भी उपपन्न हो जायगा । 'जब तक इस की फल से संयुक्त होने की कामना निवृत्त नहीं होती तब तक यह कर्म करना चाहिये' इस में जरामर्यवाद की मर्यादा रखी गयी है । यह उचित ही है । 'जरा' से तात्पर्य है आयु का प्रव्रज्यायुक्त चतुर्थ भाग। अर्थात् आयु के प्रव्रज्यायुक्त चतुर्थ भाग में वह इस कर्म से छुटकारा पा जाता है। क्योंकि आयु के चतुर्थ भाग को ही 'जरा' कहना उचित है; अन्यथा मरणासन्न अत्यन्त वार्धक्य आने पर प्रव्रज्या लेना निरर्थक ही है। अशक्त पुरुष हवनकर्म से मुक्त है—यह बात उचित नहीं बैठती; क्यों ? वही मन्त्र- ब्राह्मण अशक्त की वाह्यशक्ति को लेकर उपदेश करता है । जैसे—या तो इस (अशक्त) का शिष्य उसके बदले में हवन करे; क्योंकि वह विद्या देकर खरीदा जा चुका है, फलतः अन्तेवासी के किये कर्म का फल गुरु को ही मिलेगा । या ( अशक्त ) का क्षीरहोता हवन करे; क्योंकि यह क्षीरहोता धन से परिक्रीत है । प्रश्न है—गृहस्थादि अर्थ विहित का अनुवाद है, या किसी कामना से यह अर्थपरि- कल्पन है ? विहित का अनुवाद मानना ही उचित है । ऋणी की तरह इच्छाधीन गृहस्थ ही अस्वतन्त्र है, अतः यहाँ उसी को अधिकारी माना गया है । इसलिये गृहस्थ कर्मों में प्रवृत्त होता है—यह वाक्य, सामर्थ्य क्लृप्त होने से उपपन्न हो गया । प्रयत्न के विषय

६०. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०९

६०. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०९ कल्पन्ते । विहितं च जायमानम्, विधीयते च जायमानम् । तेन यः सम्बद्ध्यते सोऽयं जायमान इति । प्रत्यक्षविधानाभावादिति चेद् ? न; प्रतिषेधस्यापि प्रत्यक्षविधानाभावादिति । प्रत्यक्षतो विधीयते गार्हस्थ्यं ब्राह्मणेन, यदि चाश्रमान्तरमभविष्यत् तदपि व्यधास्यत् प्रत्यक्षतः, प्रत्यक्षविधानाभावान्नास्त्याश्रमान्तरमिति ? न; प्रतिषेध- स्यापि प्रत्यक्षतो विधानाभावात् । न प्रतिषेधोऽपि वै ब्राह्मणेन प्रत्यक्षतो विधीयते, 'न सन्त्याश्रमान्तराणि एक एव गृहस्थाश्रमः' इति प्रतिषेधस्य प्रत्यक्ष- तोऽश्रवणादयुक्तमेतदिति । अधिकाराच्च विधानं विद्यान्तरवत् । यथा शास्त्रान्तराणि स्वे स्वेऽधिकारे प्रत्यक्षतो विधायकानि, नार्थान्तराभावात्; एवमिदं ब्राह्मणं गृहस्थशास्त्रं स्वेऽधिकारे प्रत्यक्षतो विधायकम्, नाश्रमन्तराणामभावादिति । ऋग्ब्राह्मणं चापवर्गाभिधाय्यभिधीयते । ऋचश्च ब्राह्मणानि चापवर्गा- भिवादीनि भवन्ति । ऋचश्च तावत्— 'कर्मभिर्मृत्युमृषयो निषेदुः प्रजावन्तो द्रविण॒च्छमानाः । अथापरे ऋषयो मनीषिणः परं कर्मभ्योऽमृतत्वमानशुः ॥ फलसाधन हैं न कि फल; वे सम्पन्न होते हुए फल को कल्पित करते हैं। यहाँ 'जायमान' विहित है; इससे जो यहाँ सम्बद्ध होता है वही (गृहस्थ) जायमान है । इस ब्राह्मण में जरा का संकेत है, प्रव्रज्या का प्रत्यक्षविधान तो है नहीं ? ऐसा न कहें; क्योंकि उस प्रव्रज्यानिषेध का भी तो प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है । पूर्वपक्षी शंका करता है कि उक्त ब्राह्मण में गार्हस्थ्यविधान तो प्रत्यक्ष है, यदि आश्रमान्तर उसके लिये विहित होता तो उसका भी प्रत्यक्ष विधान होता, अतः ज्ञात होता है गार्हस्थ्यातिरिक्त आश्र- मान्तर नहीं है ? सिद्धान्ती उत्तर देता है—उक्त ब्राह्मण में प्रव्रज्याप्रतिषेध का भी तो प्रत्यक्षविधान नहीं है, अतः यह हम कैसे मान लें कि आश्रमान्तर होता ही नहीं ! एक बात और, इस ब्राह्मणवाक्य की बात छोड़ भी दें, तो भी अन्यत्र हमें यह नहीं मिलता कि एक गृहस्थाश्रम ही है, अन्य आश्रम नहीं हैं । अतः आपका कहना अयुक्त ही है । बल्कि यह समझिये कि यह ब्राह्मणवाक्य अपने अधिकार का विधान करता है । जैसे विद्यान्तर का विधान अन्य शास्त्र में नहीं प्राप्त होता । क्योंकि वे शास्त्र अपने-अपने अधिकार में प्रत्यक्ष विधायक हैं, अर्थान्तर न होने से; उसी तरह यह ब्राह्मण भी गृहस्थ- शास्त्र का प्रत्यक्ष विधायक है आश्रमान्तर का यहाँ विधान न होने से । उधर ऋग्वेद का ब्राह्मण भी अपवर्ग का बोधक है । कुछ ऋचाएँ तथा उनके ब्राह्मण अपवर्ग के बोधक हैं । पहले ऋचाओं को लें । जैसे वाजसनेयिसंहिता (३१.१८) में कहा है—कुछ ऋषि पुत्रपौत्रादि युक्त धन को चाहते हुए कर्मों से बन्ध कर मृत्यु को

३१० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः । परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद् यतयो विशन्ति' ॥ 'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' ॥ अथ ब्राह्मणानि— 'त्रयो धर्मस्कन्धाः—यज्ञोऽध्ययनं दानमिति, प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचा- र्याचार्यकुलवासीति तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् । सर्वे एवैते पुण्यलोका भवन्ति । ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' । 'एतमेव प्रव्राजिनो लोकमभीप्सन्तः प्रव्रजन्ति' इति । 'अथो खल्वाहुः—काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तथाक्रतु- र्भवति, यथाक्रतुर्भवति तथा तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते' । इति कर्मभिः संसरणमुक्त्वा प्रकृतमन्यदुपदिगन्ति— 'इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आत्मकाम आप्त- प्राप्त हुए; तथा दूसरे बुद्धिमान् धर्मज्ञ ऋषि उन कर्मों से दूर रहकर अमृतत्व ( अपवर्ग ) पा गये । उन्हें न कर्म से, न पुत्रपौत्रादिक से, न धन से यह अमृतत्व मिल पाया अपितु केवल त्याग से मिल पाया । यह अमृतत्व अविद्या से दूर गुह्यतम होते हुये भी देदी- प्यमान तेजःपुंज है, जिसे जितेन्द्रिय पुरुष ही पा सकते हैं । तैत्तिरीयारण्यक (३. १२. ७) में लिखा है—'मैं इस आदित्यवर्ण ( तेजोमय ) तम (अविद्या) से दूर महान् पुरुष (आत्मा) को जानता हूँ । इसी को जानकर मनुष्य मृत्यु (जन्म-मरण) को पार कर सकता है । मोक्ष का अन्य कोई मार्ग नहीं है।' अब ब्राह्मण के कुछ उदाहरण सुनिये— छान्दोग्योपनिषद् (२. २३. १) का ब्राह्मणवाक्य है—'ये तीन धर्मस्कन्ध हैं । यज्ञ, अध्ययन तथा दान यह प्रथमस्कन्ध (गृहस्थ), तथा तप द्वितीयस्कन्ध (वानप्रस्थ) है । तीसरा है—आचार्य कुल में रहकर ब्रह्मचर्यव्रतपूर्वक आचार्य की आज्ञा में अपना समय बिताना (ब्रह्मचर्य) । ये सभी पुण्यफलप्रद हैं । परन्तु ब्रह्मज्ञानी (संन्यासी) अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है, अतः वह श्रेष्ठ हैं'। बृहदारण्यक के ब्राह्मण (४. ४. २२) में लिखा है—'इसी संन्यासियों के लोक को चाहते हुए बुद्धिमान् लोग प्रव्रज्या लेते हैं।' दूसरे स्थान (४. ४. ५) पर यही कहता है—'ज्ञानी लोग कहते हैं यह प्राणी वासनामय है, जैसी वासना करेगा वैसे इसके संकल्प होंगे, संकल्पों के अनुसार यह कर्म करेगा; जैसा कर्म करेगा वैसा फल मिलेगा।' इस तरह संसार को कर्ममय बताकर प्रसङ्गोपात्त दूसरी बात का भी उपदेश देते हैं—'यह तो हुई वासना की बात; परन्तु जिसको वासना नहीं है वह अकाम पुरुष CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६१. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३११

६१. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३११ कामो भवति न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, इहैव समवलीयन्ते । ब्रह्मौव सन् ब्रह्माप्येति' इति । तत्र यदुक्तम्—'ऋणानुबन्धादपवर्गाभावः' इत्येतदयुक्तमिति । 'ये चत्वारः पथयो देवयानाः' इति च चातुराश्रम्यश्रुतेरेकाश्रम्यानुपपत्तिः ॥ ६० ॥ फलार्थिनश्चेदं ब्राह्मणम्—'जरामर्य्यं वा एतत्सत्रं यदग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ च' इति । कथम् ? समारोपणादात्मन्यप्रतिषेधः ॥ ६१ ॥ 'प्राजापत्यामिष्टिं निरूप्य तस्यां सार्ववेदसं हुत्वा आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेत्' इति श्रूयते, तेन विजानीमः—प्रजावित्तलोकैषणाभ्यो व्युत्थि- तस्य निवृत्ते फलार्थित्वे समारोपणं विधीयते इति । एवं च ब्राह्मणानि—"सोऽन्यद् व्रतमुपाकरिष्यमाणो याज्ञवल्क्यो मैत्रेयीमिति होवाच—प्रव्रजिष्यन् वा अरे अहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्या सहान्तं करवाणीति । अथाप्युक्तानुशासनासि मैत्रेयि एतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यः प्रवव्राजेति" ॥ ६१ ॥ वासनारहित हो आत्मज्ञान चाहता हुआ पूर्णसङ्कल्प हो जाता है, उसके प्राण फिर इधर- उधर नहीं भटकते । वह शाश्वत हो जाता है, ब्रह्मरूप हो ब्रह्म में लीन हो जाता है ।' इतनी ऋचाओं तथा ब्राह्मणों का प्रमाण मिलने के बाद भी आपका 'ऋणानुबन्ध से अपवर्ग नहीं होता'— यह कहना अयुक्तियुक्त ही है । अपि च—तैत्तिरीयसंहिता (५. ७. २. ३) में तो 'ये चार आश्रम देवलोक में जाने के मार्ग हैं'—यह कह कर स्पष्ट ही चार आश्रम स्वीकार कर लिए गये हैं ॥ ६० ॥ उक्त 'वार्धक्यपर्यन्त यह अग्निहोत्र तथा दर्श, पूर्णमास यज्ञ हैं'—यह शतपथब्राह्मण- वाक्य फलार्थी को लेकर कहा गया है, न कि यह प्रव्रज्या की मर्यादा का बोधक है । कैसे ? (आगे चल कर) अग्नियों का आत्मा में समारोपण बताने से प्रव्रज्या का प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ६१ ॥ 'प्राजापत्य इष्टि का निरूपण करके उसमें अपना सर्वस्व दानकर उन अग्नियों को आत्मा में रखकर ब्राह्मण प्रव्रज्या ग्रहण कर लें'—ऐसा श्रुतिवाक्य हैं। इससे हम अनु- मान करते हैं कि यह वाक्य पुत्रैषणा, धनैषणा, तथा लोकैषणाओं को त्यागकर गार्हस्थ्य से व्युत्थितचित्त पुरुष की फल-कामनायें निवृत्त हो जाने पर उनमें अग्नि का समारोपण विहित करता है । गार्हस्थ्य से व्युत्थितचित्त की प्रव्रज्या विहित है, तभी यह (बृहदारण्यक का) ब्राह्मणवाक्य भी उपपन्न हो पाता है—"वे याज्ञवल्क्य दूसरा व्रत करना चाहते हुए मैत्रेयी से बोले—'या प्रव्रज्या लेकर मैं इस स्थान (जन्ममरणरूपी संसार) से कात्यायनी के साथ अपना छुटकारा कर लूंगा । मैत्रेयि ! तुम यह अच्छी तरह समझ चुकी हो कि वही पद (अपवर्ग) अमृतत्वयुक्त है'—ऐसा कहकर याज्ञवल्क्य प्रव्रजित हो गये" ॥६१॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३१२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. अ० पात्रचयान्तानुपपत्तेश्च फलाभावः ॥ ६२ ॥ जरामर्यं च कर्मण्यविशेषेण कल्प्यमाने सर्वस्य पात्रचयान्तानि कर्माणीति प्रसज्यते, तत्रैषणाव्युत्थानं न श्रूयेत—'एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे ब्राह्मणा अनूचाना विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोक इति ! ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्तीति' । एषणाभ्यश्च व्युत्थितस्य पात्रचयान्तानि कर्माणि नोपपद्यन्ते इति । नाविशेषेण कर्तुः प्रयोजकं फलं भवतीति । चातुराश्रम्यविधानाच्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्रेष्वैकाश्रम्यानुपपत्तिः । तद- प्रमाणमिति चेद् ? न; प्रमाणेन प्रामाण्याभ्यनुज्ञानात् । प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेति- हासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते—'ते वा खल्वेते अथर्वाङ्गिरस एतदिति- हासपुराणमभ्यवदन्नितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेद इति' । तस्मादयुक्तमेत- दप्रामाण्यमिति । अप्रामाण्ये च धर्मशास्त्रस्य प्राणभृतां व्यवहारलोपाल्लोको- 'उक्त वाक्य फलार्थी के लिए ही विहित है तथा चतुर्थ आश्रम भी है'—इसमें एक और युक्ति देते हैं— पात्रचयान्तानुपपत्ति से भी फलाभाव सिद्ध होता है ॥ ६२ ॥ यदि पुरुष प्रव्रज्या न लेकर गृहस्थाचरण करता हुआ ही मर जाता है तो उसके अग्निहोत्र के पात्र भी उसी के साथ जला दिये जाते हैं—यह विधि यदि साधारणतः सब पुरुषों में कल्पित की जायेगी तो सभी में उक्त पात्रचयदाह कल्पित करना पड़ेगा । तब पीछे कही एषणात्रय से व्युत्थानवाली बात कैसे बनेगी ! जैसे कि बृहदारण्यक में कहा है—"पहले के विद्वान् बुद्धिमान् ब्राह्मण पुत्र की कामना नहीं करते थे, उनका कहना था कि इन पुत्रपौत्रादिकों का हम क्या करेंगे जिनसे न यह लोक सुधरता है न परलोक ! वे ब्राह्मण तीनों ही एषणाओं से अपने चित्त को हटाकर प्रव्रज्या ले भिक्षाचरण करते थे ।" यों इन प्रमाणों से जब ऐषणाओं से व्युत्थान होने पर परिव्राट् को पात्रचयनान्त कर्म उपपन्न ही नहीं होते तो उनका परिव्राट् के साथ दाह कैसे बनेगा ! कर्त्ता को सामान्यतया लेने के लिए प्रयोजक फल नहीं हो सकता । इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र में भी चार आश्रमों का ही विधान होने से एकाश्रम की बात कहीं उपपन्न नहीं होती । वे तो सब अप्रमाण हैं ? यह नहीं कह सकते; क्योंकि प्रमाण ( श्रुति ) से उन ( इतिहासादि ) का प्रामाण्य सिद्ध होता है । ब्राह्मण-प्रमाण से इतिहास-प्रामाण्य यों सिद्ध होता है—'उन अथर्वा, आङ्गिरस आदि ऋषियों ने इस इति- हास-पुराण का आख्यान किया है अतः यों मानना चाहिए कि इतिहास पुराण भी वेदों में एक ( पञ्चम ) वेद है ।' अतः इतिहास पुराणादि को अप्रामाणिक कहना अयुक्त है । धर्मशास्त्र को अप्रामाणिक मानने पर प्राणियों के व्यवहार का कोई आधार न होने से समग्र लोकों का उच्छेद-प्रसंग उपस्थित हो जायेगा । दूसरे, जो ऋषि उन श्रुतियों के CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६४. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३१३

६४. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३१३ च्छेदप्रसङ्गः । द्रष्टृप्रवक्तृसामान्याच्चाप्रामाण्यानुपपत्तिः । य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति । विषयव्यवस्थानाच्च यथाविषयं प्रामाण्यम् । अन्यो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः, अन्यच्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्राणामिति । यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य, लोकवृत्तमितिहास- पुराणस्य, लोकव्यवहारव्यवस्थानं धर्मशास्त्रस्य विषयः । तत्रैकेन न सर्वं व्यव- स्थाप्यत इति यथाविषयमेतानि प्रमाणानीन्द्रियादिवदिति ॥ ६२ ॥ २. यत्पुनरेतत् 'क्लेशानूबन्धस्याविच्छेदात्' इति ? सुषुप्तस्य स्वप्नादर्शने क्लेशाभावादपवर्गः ॥ ६३ ॥ यथा सुषुप्तस्य खलु स्वप्नादर्शने रागानुबन्धः सुखदुःखानुबन्धश्च विच्छिद्यते, तथापवर्गेऽपीति । एतच्च ब्रह्मविदो मुक्तस्यात्मनो रूपमुदाहरन्तीति ॥ ६३ ॥ ३. यदपि 'प्रवृत्त्यनुबन्धात्' इति ? न प्रवृत्तिः प्रतिसन्धानाय हीनक्लेशस्य ॥ ६४ ॥ प्रक्षीणेषु रागद्वेषमोहेषु प्रवृत्तिर्न प्रतिसन्धानाय । प्रतिसन्धिरस्तु पूर्वजन्म- द्रष्टा या प्रवक्ता हैं वे ही इन इतिहास-पुराणों के भी द्रष्टा प्रवक्ता हैं, अतः इस समा- नता से भी इतिहास-पुराणादि में प्रामाण्य ही मानना चाहिए । वास्तविकता भी यही है कि जो ऋषि मन्त्र ब्राह्मणों के द्रष्टा या प्रवक्ता हैं वे ही लोग इतिहास, पुराण तथा धर्म शास्त्रों के द्रष्टा, प्रवक्ता हैं। एक बात और, दोनों का पृथक्-पृथक् विषय होने से भी दोनों में प्रामाण्य है । मन्त्र ब्राह्मणों का दूसरा विषय है, इतिहास-पुराण-धर्मशास्त्रों का दूसरा विषय है। जैसे यज्ञ मन्त्रब्राह्मण का विषय है, इतिहास पुराण का लोकवृत्त तथा धर्मशास्त्र का लोकव्यवहार व्यवस्थित रखना विषय है ! इनमें से एक ही ने सब यज्ञेतिवृत्तादि की व्यवस्थाएं नहीं की हैं, अतः इनके पृथग्विषयं होने से इन्द्रियों की तरह इनकी प्रामाणिकता भी स्वीकार करना चाहिये ॥ ६२ ॥ २. यह जो कहा था कि क्लेशानूबन्ध के अविच्छेद से अपवर्गाभाव है ? · सुषुप्त को स्वप्नावस्था न रहने पर क्लेशाभाव दिखायी देने से अपवर्ग में क्लेशानू- बन्ध-विच्छेद सम्भव है ॥ ६३ ॥ जैसे सोते हुए पुरुष को घोर निद्रावस्था में राग तथा सुख-दुःखानुबन्ध विच्छिन्न होता है, उसी तरह अपवर्ग में भी यह अनुबन्धविच्छेद सम्भव है। यह मुक्त ब्रह्मज्ञानी अवस्था है ॥ ६३ ॥ ३. यह जो कहा था कि प्रवृत्त्यनुबन्ध से अपवर्गाभाव है ? क्षीणक्लेश ज्ञानी की प्रवृत्ति पुनर्जन्म के लिये प्रतिसन्धान नहीं कर पाती ॥ ६४ ॥ राग-द्वेष-मोह के क्षीण हो जाने पर प्राणी के दैनिक कर्म प्रतिसन्धान करने योग्य नहीं होते । एक जन्म निवृत्त होने पर पुनर्जन्म होना 'प्रतिसन्धि' कहलाता है। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३१४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० निवृत्तौ पुनर्जन्म, तच्च तृष्णाकारितम्१, तस्यां प्रहीणायां पूर्वजन्मभावे जन्मान्त- राभावोऽप्रतिसन्धानमपवर्गः । कर्मवैफल्यप्रसङ्ग इति चेद् ? न; कर्मविपाकप्रति- संवेदनस्याप्रत्याख्यानात् । पूर्वजन्मनिवृत्तौ पुनर्जन्म न भवतीत्युच्यते, न तु कर्म- विपाकप्रतिसंवेदनं प्रत्याख्यायते । सर्वाणि पूर्वकर्माणि ह्यन्ते जन्मनि विपच्यन्त इति ॥ ६४ ॥ न; क्लेशसन्ततेः स्वाभाविकत्वात् ? ॥ ६५ ॥ नोपपद्यते क्लेशानुबन्धविच्छेदः, कस्मात् ? क्लेशसन्ततेः स्वाभाविकत्वात् । अनादिरियं क्लेशसन्ततिः, न चानादिः शक्य उच्छेत्तुमिति ? ॥ ६५ ॥ अत्र कश्चित् परिहारमाह— प्रागुत्पत्तेरभावानित्यत्ववत् स्वाभाविकेऽप्यनित्यत्वम् ॥ ६६ ॥ यथाऽनादिः प्रागुत्पत्तेरभाव उत्पन्नेन भावेन निवर्त्यते, एवं स्वाभाविकी क्लेशसन्ततिरनित्येति ॥ ६६ ॥ अपर आह— अणुश्यामतानित्यत्ववद् वा ॥ ६७ ॥ यह पुनर्जन्म विषयजन्य तृष्णा के कारण होता है । तृष्णा के क्षीण होने पर पूर्व-जन्म के नाश के बाद दूसरा जन्म नहीं होगा, यह अप्रतिसन्धान ही ‘अपवर्ग’ है । तब तो कर्मवैफल्य होने लगेगा ? हम कर्मविपाकप्रतिसंवेदन का खण्डन नहीं कर रहे हैं, किन्तु हम इतना ही कहते हैं कि पूर्व जन्म निवृत्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता । सभी पूर्व कर्म अन्तिम जन्म में विपाक को प्राप्त हो जाते हैं ॥ ६४ ॥ क्लेशप्रवाह के स्वाभाविक होने से क्लेशानूबन्ध विच्छिन्न नहीं होता ? ॥ ६५ ॥ क्लेशानूबन्धविच्छेद उपपन्न नहीं होता; क्योंकि यह सांसारिक क्लेशप्रवाह स्वाभा- विक है ! यह क्लेशप्रवाह अनादि है, इसका उच्छेद सम्भव नहीं ? ! ६५ ॥ यहां कोई एकदेशी समाधान करता है— उत्पत्ति से पूर्व अभावानित्यत्व की तरह स्वाभाविक में भी अनित्यत्व बन सकता है ॥ ६६ ॥ जैसे क्षीरादि में उत्पत्ति से पूर्व का दध्यभाव ( प्रागभाव ) उत्पन्न दधिभाव से निवृत्त हो जाता है, इसी तरह स्वाभाविक क्लेशप्रवाह की अनित्यता सिद्ध होने से क्लेश- विच्छेद सम्भव है ॥ ६६ ॥ दूसरा एकदेशी कहता है— अणुश्यामता के अनित्यत्व की तरह क्लेशसन्तति का अनित्यत्व बन सकता है ॥ ६७ ॥ १. अदृष्ट०-पाठ० ।

६८. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३१५

६८. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३१५ यथानादिरणुश्यामता अथ चाग्निसंयोगादनित्या, तथा क्लेशसन्ततिरपीति । सतः खलु धर्मो नित्यत्वमनित्यत्वं च । तत्त्वं भावेऽभावे भाक्तमिति । 'अनादि- रणुश्यामता' इति हेत्वभावादयुक्तम् । अनुत्पत्तिधर्मकमनित्यमिति नात्र हेतु- रस्तीति ॥ ६७ ॥ अयं तु समाधिः— न; सङ्कल्पनिमित्तत्वाच्च रागादीनाम् ॥ ६८ ॥ कर्मनिमित्तत्वादितरेतरनिमित्तत्वाच्चेति समुच्चयः । मिथ्यासङ्कल्पेभ्यो रञ्जनीयकोपनीयमोहनीयेभ्यो रागद्वेषमोहा उत्पद्यन्ते, कर्म च सत्त्वनिकायनिर्व- र्तकं नैयमिकान् रागद्वेषमोहान्निर्वर्त्तयति; नियमदर्शनात् । दृश्यते हि कश्चित् सत्त्वनिकायो रागबहुलः, कश्चिद् द्वेषबहुलः, कश्चिन्मोहबहुल इति । इतरेतर- निमित्ता च रागादीनामुत्पत्तिः । मूढो रज्यति, मूढः कुप्यति, रक्तो मुह्यति, कुपितो मुह्यति । सर्वमिथ्यासङ्कल्पानां तत्त्वज्ञानादनुत्पत्तिः । कारणानुत्पत्तौ च कार्यानुत्पत्तेरिति—रागादीनामत्यन्तमनुत्पत्तिरिति । जैसे यद्यपि अणु का श्यामरूप अनादि है, परन्तु वही अग्निसंयोग होने पर निवृत्त हो जाता है, उसी तरह क्लेशसन्तति अनादि होते हुए भी निवृत्त हो सकती है । अब सिद्धान्ती पहले दोनों एकदेशिमंतों का खण्डन करता है— १. नित्यत्वानित्यत्वादि धर्म भावरूप पदार्थ में ही सम्भव हो सकते हैं, अभाव में नहीं । यदि कहीं ये अभाव में उपलब्ध होते हों तो वे उपचारात् ही समझने चाहिये । अतः अभाव का दृष्टान्त देना उचित नहीं । २. 'अणुश्यामता अनादि है' इसमें हेतु न होने से यह अयुक्त है । और उसको अनित्य कहना भी नहीं बनेगा; क्योंकि जो कुछ भी अनुत्पत्तिधर्मा हो वह अनित्य हो हो—यह किसी हेतु से सिद्ध नहीं किया जा सकता ! ॥ ६७ ॥ सिद्धान्ती का समाधान यह है— रागादि के सङ्कल्पनिमित्त होने से ( क्लेशसन्तति स्वाभाविक ) नहीं ॥ ६८ ॥ कर्मनिमित्त होने से तथा इतरेतरनिमित्त होने से भी वह स्वाभाविक नहीं । १. रञ्जनीय, कोपनीय तथा मोहनीय मिथ्या सङ्कल्पों से राग द्वेष तथा मोह उत्पन्न होते हैं । तथा पुरुष में वैसी व्यवस्था देखी जाने से सत्त्वनिकाय ( प्राणिशरीर ) को उत्पन्न करने वाला कर्म भी नियमतः राग द्वेष मोह को उत्पन्न करता है—यह नियम ज्ञात होता है । उदाहरणार्थ, इस संसार में कोई प्राणी रागातिशयी, कोई द्वेषातिशयी तथा कोई मोहातिशयी होता है । २. रागादि की उत्पत्ति परस्परनिमित्तक भी है, जैसे—मोहसम्पन्न को राग होता है, वही कुपित भी होता है; रागातिशयी मुग्ध भी होता है, और कुपित भी । सभी मिथ्यासङ्कल्प तत्त्वज्ञान होने पर उत्पन्न नहीं हो पाते । यों कारणानुत्पत्ति से कार्यानुत्पत्ति हो जाने पर रागादि की अत्यन्तानुपपत्ति सम्भव है ।

३१६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० 'अनादिश्च क्लेशसन्ततिः' इत्यप्युक्तम्, सर्वे इमे खल्वाध्यात्मिका भावा अनादिना प्रबन्धेन प्रवर्त्तन्ते शरीरादयः । न जात्वत्र कश्चिदनुत्पन्नपूर्वः प्रथमत उत्पद्यतेऽन्यत्र तत्त्वज्ञानात् । न चैवं सत्यनुत्पत्तिधर्मकं किञ्चिद्व्ययधर्मकं प्रतिज्ञा- यते इति । कर्म च सत्त्वनिकायनिर्वर्तकं तत्त्वज्ञानकृतान्मिथ्यासङ्कल्पविधातान्न रागाद्युत्पत्तिनिमित्तं भवति, सुखदुःखसंवित्तिफलं तु भवतीति ॥ ६८ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये चतुर्थाध्यायस्याद्यमाह्निकम् । • [ द्वितीयमाह्निकम् ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् [ १-३ ] किं नु खलु भोः ! यावन्तो विषयास्तावत्सु प्रत्येकं तत्त्वज्ञानमुत्पद्यते ? अथ क्वचिदुत्पद्यत इति ? कश्चात्र विशेषः ? न तावदेकैकत्र यावद्विषयमुत्पद्यते; ज्ञेया- नामानन्त्यात् । नापि क्वचिदुत्पद्यते, यत्र नोत्पद्यते तत्रानिवृत्तो मोह इति मोह- शेषप्रसङ्गः । न चान्यविषयेण तत्त्वज्ञानेनान्यविषयो मोहः शक्यः प्रतिषेद्धुमिति ? मिथ्याज्ञानं वै खलु मोहो न तत्त्वज्ञानस्यानुत्पत्तिमात्रम् । तच्च मिथ्याज्ञानं 'क्लेशसन्तति अनादि हैं'—यह भी आपने कहा । इतना ही नहीं, सभी आध्यात्मिक शरीरादि भाव अनादिप्रवाह से प्रवर्त्तमान हैं। ऐसा इनमें आज कोई पहली बार उत्पन्न नहीं हुआ जो पहले कभी उत्पन्न न हुआ हो, केवल तत्त्वज्ञान को छोड़ कर । इसका यह अर्थ नहीं कि अनुत्पत्तिधर्मक भाव भी निवृत्त होता है । अपि तु प्राणिशरी- रोत्पादक कर्म तत्त्वज्ञानकृत मिथ्यासङ्कल्पनाश से रागादि की उत्पत्ति में कारण नहीं बनता । हाँ, तत्त्वज्ञान होने पर भी सुखदुःखसंवेदन फल तो होता ही रहता है ॥ ६८ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन) में चतुर्थाध्याय का प्रथमाह्निक समाप्त • क्यों जी, हम पूछते हैं कि जितने विषय हैं उनमें से व्यक्तिशः प्रत्येक का तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है या किसी एक व्यक्ति का तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है ? इसमें अन्तर क्या आयेगा ? विषय के अनुसार एक-एक का ज्ञान सम्भव नहीं; क्योंकि ज्ञेय अनन्त हैं, कहाँ तक पार पाइयेगा । किसी एक व्यक्ति के तत्त्वज्ञानोत्पाद से कोई लाभ नहीं; क्योंकि जहाँ वह उत्पन्न नहीं हुआ वहां मोह रह ही जायेगा तो मोह फिर भी शेष रह गया । यह कैसे हो सकता है कि अन्यविषयक तत्त्वज्ञान से अन्यविषयक मोह निवृत्त हो जाये ! मिथ्याज्ञान को मोह कहते हैं, न कि तत्त्वज्ञान की अनुत्पत्तिमात्र को । मिथ्याज्ञान जिस

१. सू० ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१७

१. सू० ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१७ यत्र विषये प्रवर्त्तमानं संसारबीजं भवति स विषयस्तत्त्वतो ज्ञेय इति। किं पुनस्तन्मिथ्याज्ञानम् ? अनात्मन्यात्मग्रहः, ‘अहमस्मि’ इति मोहोऽहङ्कार इति। अनात्मानं खलु ‘अहमस्मि’ इति पश्यतो दृष्टिरहङ्कार इति। किं पुनस्तदर्थजातं यद्विषयोऽहङ्कारः ? शरीरेन्द्रियमनोवेदनाबुद्धयः। कथं तद्विषयोऽहङ्कारः संसारबीजं भवति ? अयं खलु शरीराद्यर्थजातमहमस्मीति व्यवसितः तदुच्छेदेनात्मोच्छेदं मन्यमानोऽनुच्छेदतृष्णापरिल्लुतः पुनः पुनस्त- दुपादत्ते, तदुपाददानो जन्ममरणाय यतते, तेनावियोगान्नात्यन्तं दुःखद्विमुच्यते, इति। यस्तु दुःखं दुखायतनं दुखानुषक्तं सुखं च सर्वमिदं दुःखमिति पश्यति स दुःखं परिजानाति, परिज्ञातं च दुःखं प्रहीण भवत्यनुपादानात्, सविषान्नवत्। एवं दोषान् कर्म च दुःखहेतुरिति पश्यति। न चाप्रहीणेषु दोषेषु दुःखप्रबन्धोच्छेदेन शक्यं भवितुमिति दोषान् जहाति। प्रहीणेषु च दोषेषु न प्रवृत्तः प्रतिसन्धाना- येत्युक्तम्। प्रेत्यभावफलदुःखानि च ज्ञेयानि व्यवस्थापयति, कर्म च दोषांश्च प्रहेयान्। अपवर्गोऽधिगन्तव्यः, स्तस्याधिगमोपायस्तत्त्वज्ञानम्। एवं चतसृभिर्विधाभिः प्रमेय॑ विषय में प्रवृत्त होता हुआ संसारोत्पत्ति का कारण बनता है तत्त्व से वही विषय जानना चाहिये। वह मिथ्याज्ञान क्या है ? अनात्मपदार्थों में आत्माभिमान अर्थात् शरीर की दृष्टि से 'मैं हूँ' यह अहङ्कार मोह है। अनात्मपदार्थों को 'मैं हूँ'—ऐसा समझने वाले की मिथ्यादृष्टि ही अहङ्कार है। वह विषयसमूह कौन-सा है जिसको लेकर अहङ्कार होता है ? शरीर, इन्द्रिय, मन, वेदना, बुद्धि। तद्विषयक अहङ्कार संसारोत्पत्ति का कारण कैसे हो जाता है ? यह मिथ्याभिनिवेशी अरीरादिसमूह में 'मैं हूँ' यह अभिनिवेश करके उनके नाश में अपना नाश मानता हुआ उन को टिकाये रखने की चाह से भरा हुआ पुनः पुनः उनको ग्रहण करता है, उनको ग्रहण करता हुआ जन्म-मरण के लिए प्रयत्न करता है, यों उनसे सम्बन्ध विच्छिन्न न होने से आत्यन्तिक दुःख से छुटकारा नहीं पाता। परन्तु तत्त्वजिज्ञासु दुःख, दुःखाधिष्ठान दुःख से लिपटे सुख को भी 'यह सब दुःख है' ऐसा मानता हुआ दुःख को ठीक से समझ लेता है, पहचान लेता है, पहचाने दुःख को विष-सम्पृक्त अन्न की तरह ग्रहण न करने से उसका दुःख क्षीण हो जाता है। इसतरह वह कर्म तथा दोषों को दुःखहेतु समझता है। दोषों को छोड़े बिना दुःखप्रवाह का उच्छेद हो नहीं सकता, अतः उन दोषों को वह छोड़ देता है। दोषों के प्रहीण होने पर उस तत्त्वज्ञ की प्रवृत्ति प्रतिसन्धानयोग्य नहीं रह जाती—यह हम पहले कह चुके। १. प्रेत्यभाव, फल तथा दुःख ज्ञेय हैं। २. कर्म तथा दोष प्रहेय हैं। ३. अपवर्ग अधिगन्तव्य (प्राप्तव्य) हैं। ४. उसके पाने का एकमात्र उपाय है तत्वज्ञान। इस तरह चार प्रकारों में विभक्त इन सम्पूर्ण प्रमेयों पर विचार करने वाले को

३१८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० विभक्तमासेवमानस्याभ्यस्यतो भावयतः सम्यग्दर्शनं यथाभूतावबोधस्तत्त्वज्ञान- मुत्पद्यते । एवं च— दोषनिमित्तानां तत्त्वज्ञानादहङ्कारनिवृत्तिः ॥ १ ॥ शरीरादि दुःखान्तं प्रमेयं दोषनिमित्तम्; तद्विषयत्वान्मिथ्याज्ञानस्य । तदिदं तत्त्वज्ञानं तद्विषयमुत्पन्नमहङ्कारं निवर्त्तयति; समानविषये तयोर्विरोधात् । एवं तत्त्वज्ञानाद् 'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायाद- पवर्गः' (१.१.२) इति । स चायं शास्त्रार्थसङ्ग्रहोऽनूद्यते, नापूर्वो विधीयते इति ॥१॥ प्रसंख्यानानुपूर्वी तु खलु— दोषनिमित्तं रूपादयो विषयाः १सङ्कल्पकृताः ॥ २ ॥ कामविषया इन्द्रियार्था इति रूपादय उच्यन्ते, ते मिथ्यासङ्कल्प्यमाना रागद्वेषमोहान् प्रवर्त्तयन्ति, तान् पूर्वं प्रसञ्चक्षीत । तांश्च प्रसञ्चक्षाणस्य रूपादि- विषयो मिथ्यासङ्कल्पो निवर्त्तते । तन्निवृत्तावध्यात्मं शरीरादि प्रसञ्चक्षीत । तत्प्रसंख्यानादध्यात्मविषयोऽहङ्कारो निवर्त्तते । सोऽयमध्यात्मं वहिश्च विविक्त- चित्तो विहरन्मुक्त इत्युच्यते ॥ २ ॥ बार-बार मनन भावना करने वाले को सम्यग्दर्शन, याथातथ्य ज्ञान अर्थात् तत्त्वज्ञान हो जाता है । और इस तरह— दोषनिमित्त शरीरादि के तत्त्वज्ञान से अहङ्कार निवृत्त हो जाता है ॥ १ ॥ शरीर से लेकर दुःख तक प्रमेय दोष का हेतु है, क्योंकि मिथ्याज्ञान तद्विषयक होता है । तद्विषयक तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता हुआ अहङ्कार को निवृत्त करता है; क्योंकि समान- विषय में उन दोनों तत्त्व एवं मिथ्या ज्ञानों का विरोध है। इस प्रकार तत्त्वज्ञान से 'दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्या ज्ञानों के उत्तरोत्तर अपाय से उससे पूर्व-पूर्व के न होने से अप- वर्ग हो जाता हैं' (१. १. २) । यहाँ यह शास्त्रार्थसंग्रह तत्रोक्त तत्त्वज्ञान का उत्पत्ति प्रकार दिखाने के लिए उक्त सूत्र का अनुवाद ही है कोई अपूर्व विषय नहीं उठाया गया है ॥ १ ॥ ( इस समाधिज ) तत्त्वज्ञान् का क्रम यह है— सङ्कल्पकृत रूपादि विषय दोषों के कारण होते हैं ॥ २ ॥ इन्द्रियों के अर्थ रूपादि कामविषय हैं । वे मिथ्या संकल्पित किये जाते हुए राग द्वेष मोह को प्रवृत्तित करते हैं । जिज्ञासु पहले उनका तत्त्वज्ञान करें । उनका तत्त्वज्ञान होने पर तत्त्ववेत्ता का रूपादिविषयक मिथ्यासंकल्प निवृत्त हो जाता है । उनके निवृत्त होने पर वह अध्यात्म शरीरेन्द्रियादि का तत्त्व जानने का प्रयास करे । उसके तत्त्वज्ञान से अध्यात्मविषयक अहङ्कार निवृत्त हो जाता है । इस प्रकार रूपादि विषय तथा शरीरादि को तत्त्वतः जानकर यह ज्ञानी रागद्वेषादि से विमुक्तचित्त होकर लोकयात्रा करता हुआ भी 'मुक्त' कहलाता है ॥ २ ॥ १. 'सङ्कल्पः = समीचीनोऽयमिति मानसं' इति वार्त्तिककृतः ।

३. सू० ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१९

३. सू० ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१९ अतः परं काचित्संज्ञा हेया, काचिद्भावयितव्येत्युपदिश्यते, नार्थनिराकरणम्, अर्थोपादानं वा । कथमिति ? तन्निमित्तं त्ववयव्यभिमानः ॥ ३ ॥ तेषां दोषाणां निमित्तं त्ववयव्यभिमानः । सा च खलु स्त्रीसंज्ञा सपरिष्कारा पुरुषस्य, पुरुषसंज्ञा च स्त्रियाः । परिष्कारश्च निमित्तसंज्ञा, अनुव्यञ्जनसंज्ञा च । निमित्तसंज्ञा—रसनाश्रोत्रम्, दन्तोष्ठम्, चक्षुर्नासिकम् । अनुव्यञ्जनसंज्ञा-इत्थं दन्तौ इत्थमोष्ठाविति । सेयं संज्ञा कामं वर्धयति, तदनुषक्तांश्च दोषान् विवर्ज- नीयान् । वर्जनं त्वस्या भेदेनावयवसंज्ञा केशलोममांसशोणितास्थिस्नायुशिरा- कफपित्तोच्चारादिसंज्ञा, तामशुभसंज्ञेत्याचक्षते । तामस्य भावयतः कामरागः प्रहीयते । सत्येव च द्विविधे विषये काचित्संज्ञा भावनीया, काचित्परिवर्जनीयेत्यु- पदिश्यते, यथा विषसम्पृक्तेऽन्नेऽन्नसंज्ञोपादानाय, विषसंज्ञा प्रहाणायेति ॥ ३ ॥ अब इससे आगे 'कौन सी बात छोड़नी चाहिए, किस का ग्रहण करना चाहिए'— इसी का उपदेश किया जा रहा है। न कि उसका सर्वांशतः ग्रहण या त्याग अपेक्षित है। कैसे ?— अवयवी (कामिनी-शरीरादि) का अभिमान ही दोषों का कारण है ॥ ३ ॥ उन दोषों का कारण है अवयव्यभिमान । जैसे पुरुष को स्त्रीविषय में 'सुन्दर स्त्री' यह भावना राग का कारण होती है, तथा स्त्री की पुरुष के विषय में 'सुन्दर पुरुष' यह भावना राग का कारण होती है । संज्ञा के दो भेद होते हैं— १. निमित्त, २. अनुव्यञ्जन । जैसे—उसके कान, दांत, आँख नाक को लेकर सम्मुग्ध की तरह भावना निमित्त है; तथा 'इसके ऐसे सुन्दर दांत है, ऐसे सुन्दर ओठ हैं'—इत्यादि भावना अनुव्यञ्जन है। यह कामुक- भावना वासना को बढ़ाती है तथा तदनुषक्त विवर्जनीय दोषों को भी बढ़ावा देती है। इस भावना का परिहार अवयवभावना से होता है। अर्थात् स्त्री-विषयक आसक्ति को हटाने के लिए उस स्त्री के अवयवों के वारे में जिज्ञासु तत्त्वतः सोचे कि यह समग्र शरीर तो केश, रोम, मांस, रक्त, अस्थि, स्नायु, शिरा, कफ-पित्त, मल-मूत्र से भरा पड़ा है, इसमें कौन सी अच्छी चीज है, जिसके लिए मेरी इतनी अधिक आसक्ति हो ! इन अवयवों पर इस रूप से विचार को 'अशुभसंज्ञा' भी कह देते हैं। इस प्रकार उक्त साधक का कामज राग क्षीण हो जाता है । इस तरह विषय के शुभ-अशुभ रूप से दो भेद दिखाते हुए उक्त कामिनी- शरीरादि में कोई संज्ञा (निमित्त संज्ञा, तथा अनुव्यञ्जन संज्ञा) छोड़ने के लिए तथा किसी संज्ञा (अवयव संज्ञा या अशुभ संज्ञा) का ग्रहण (भावना) करने के लिए उपदेश देते हैं । जैसे विषसम्पृक्त अन्न में 'अन्न' संज्ञा ग्रहण के लिए होती है, तथा 'विष' संज्ञा त्याग के लिए होती है ॥ ३ ॥

प्रासङ्गिकम् अवयविप्रकरणम् [ ४-१७ ]

३२० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० प्रासङ्गिकम् अवयविप्रकरणम् [ ४-१७ ] अथेदानीमर्थं निराकरिष्यताऽवयव्युपपाद्यते— विद्याऽविद्याद्वैविध्यात् संशयः ? ॥ ४ ॥ सदसतोरुपलम्भाद्विद्या द्विविधा, सदसतोरनुपलम्भादविद्यापि द्विविधा । उप- लभ्यमानेऽवयविनि विद्याद्वैविध्यात् संशयः, अनुपलभ्यमाने चाविद्याद्वैविध्यात् संशयः । सोऽयमवयवी यद्युपलभ्यते, अथापि नोपलभ्यते—न कथञ्चन संशयान्मु- च्यते इति ? ॥ ४ ॥ तदसंशयः; पूर्वहेतुप्रसिद्धत्वात् ॥ ५ ॥ तस्मिन्ननुपपन्नः संशयः । कस्मात् ? पूर्वोक्तहेतूनामप्रतिषेधादस्ति द्रव्या- न्तरारंभ इति ॥ ५ ॥ वृत्त्यनुपपत्तेरपि तर्हि न संशयः ? ॥ ६ ॥ संशयानुपपत्तिर्नास्त्यवयवीति ? ॥ ६ ॥ तद्विभजते— पूर्वोक्त निमित्त-अनुव्यञ्जन संज्ञाओं का अवयवी ही विषय है, उन संज्ञाओं में से कतिपय के परिवर्जन के लिये 'अशुभ संज्ञा' का उपदेश किया गया । अब विज्ञानवादी बौद्ध के मत में जब अर्थमात्र नहीं है तो अवयवी तथा तदाश्रित उक्त संज्ञाएँ कहाँ होंगी ! अतः वह अर्थ का खण्डन करना चाहता हुआ पहले अवयवी का निराकरण कर रहा है— विद्या, अविद्या के द्वैविध्य से संशय होता है ? ॥ ४ ॥ सत्, असत् की उपलब्धि से विद्या दो प्रकार की है। सत्, असत् की अनुपलब्धि से अविद्या भी दो प्रकार की है। अवयवी के उपलब्ध होने पर विद्याद्वैविध्य से संशय होता है ! तथा उसके अनुपलब्ध रहने पर अविद्याद्वैविध्य से भी संशय होगा । इस तरह यह अवयवी भले ही उपलब्ध होता हो या न उपलब्ध होता हो—किसी भी तरह संशय से मुक्त नहीं होता ॥ ४ ॥ पूर्व हेतु की सिद्धि से संशय उपपन्न नहीं है ॥ ५ ॥ उस अवयवी में संशय नहीं है; क्योंकि पूर्वोक्त हेतुओं से अवयवी के बारे में सिद्धि की जा चुकी है कि अवयवी द्रव्यान्तर से आरब्ध होता है। ऐसा सिद्ध हो जाने के बाद उसमें संशय क्यों होगा ! ॥ ५ ॥ (हमारा भी यही कहना है कि) सत्तानुपपत्ति से भी उसमें संशय नहीं है ? ॥ ६ ॥ विज्ञानवादी ( बौद्ध ) प्रतिबन्दी उत्तर देता है—हमारा भी यही कहना है कि वहाँ संशय नहीं होता; क्योंकि अवयवी की सत्ता ही सिद्ध नहीं होती ? ॥ ६ ॥ इसी का वह (विज्ञानवादी) उपपादन करता है—

९. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२१

९. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२१ कृत्स्नैकदेशावृत्तित्वादवयवानामनवयव्यभावः ? ॥ ७ ॥ एकैकोऽवयवो न तावत् कृत्स्नेऽवयविनि वर्त्तते; तयोः परिमाणभेदात्, अवय- वान्तरसम्बन्धाभावप्रसङ्गाच्च । नाप्यवयव्येकदेशेन, न ह्यस्यान्ये अवयवा एक- देशभूताः सन्तोति ? ॥ ७ ॥ अथावयवेष्वेवावयवी वर्त्तते ? तेषु चावृत्तेरवयव्यभावः ? ॥ ८ ॥ न तावत् प्रत्यवयवं वर्त्तते, तयोः परिमाणभेदाद्, द्रव्यस्य चैकद्रव्यत्वप्रसङ्गात् । नाप्येकदेशेन, सर्वेषु अन्यावयवाभावात् । तदेवं न युक्तः संशयः—नास्त्यव- यवोति ? ॥ ८ ॥ पृथक् चावयवेभ्योऽवृत्तेः ॥ ९ ॥ अवयव्यभाव इति वर्त्तते । न चायं पृथगवयवेभ्यो वर्त्तते; अग्रहणात्, नित्यत्व- प्रसंगाच्च । तस्मान्नास्त्यवयवीति ? ॥ ९ ॥ अवयवों के सम्पूर्ण या एकदेश में अवयवों के न रहने से उसकी सिद्धि नहीं होती ? ॥ ७ ॥ एक एक अवयव समग्र अवयवी में नहीं रहता; क्योंकि उन दोनों में परिमाणभेद हैं (अवयव अणुपरिमाण तथा अवयवी महापरिमाण हैं), तथा वैसी स्थिति में अवयवा- न्तर का उससे सम्बन्ध भी न बन पायेगा । और न अवयव उसके एकदेश में ही रहता है; क्योंकि अवयवों को छोड़ कर इसका कोई अन्य एकदेश नहीं है। यदि सब अवयव ही अवयवी हैं इस स्थिति में जितने अवयव हैं उतने ही अवयवी होने लगेंगे; जबकि आप अवयवी को एक मानते हैं ? ॥ ७ ॥ तो अवयवों में अवयवी रहता है—ऐसा मान लें ? उन अवयवों में अवयवी के वर्त्तमानत्व की अनुपपत्ति से अवयवी का अभाव ही है ? ॥ ८ ॥ पूर्वोक्त परिमाणभेद होने से अवयवी प्रत्येक अवयव में नहीं रह सकता; तथा एकावयववृत्ति होने से एक द्रव्य में एकसमवेत द्रव्यत्वप्रसक्ति होने लगेगी। अवयवी अपने एकदेश से प्रत्येक अवयव में नहीं रह सकता; क्योंकि सभी अवयवों में अन्य अवयव का अभाव ही है। अतः इसमें आप सन्देह क्यों कर रहे हैं कि अवयवी नहीं है ? ॥ ८ ॥ अवयव से पृथक् उसकी सत्ता न होने के कारण भी ? ॥ ९ ॥ अवयवी का अभाव ही है। अवयवी अवयवों से पृथक् नहीं हैं, क्योंकि वैसा गृहीत नहीं होता। अथ च, उसे पृथक् मानने पर उसके निराधार होने से उसमें नित्यत्व प्राप्त होगा। अतः अवयवी नहीं है—यही मान लें ? ॥ ९ ॥ न्या० दर्श० २१