भारतकोश
संग्रह पर लौटें

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२७

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२७ है। क्यों कि तब तक तो द्वैत की उत्पत्ति ही नहीं हुई थी। इस कारण प्रथम पक्ष ही शेष रह जाता है अर्थात् द्वैत की उत्पत्ति से प्रथम अद्वैत ही था। अद्वैतसिद्धिर्युक्त्यैव नानुभूत्येति चेद्वद। निर्दृष्टान्ता सदृष्टान्ता वा कोट्यन्तर मत्र नो ॥२७॥ यदि कहो कि अद्वैत की सिद्धि युक्ति से तो हो जाती है, परन्तु अनुभव से तो अद्वैत का अनुमोदन नहीं होता। तो बताओ कि जो युक्ति अद्वैत को सिद्ध करती है वह किसी दृष्टान्त को न देकर सिद्ध करती है, या दृष्टान्त को देकर सिद्ध करती है ? इन दोनों अवस्थाओं के अतिरिक्त तीसरी बात तो हो ही नहीं सकती। नानुभूति र्न दृष्टान्त इति युक्तिस्तु शोभते। सदृष्टान्तत्वपक्षे तु दृष्टान्तं वद मे मतम् ॥२८॥ [जो (इसी प्रकरण के २७श्लोक में) कहता है कि अद्वैत की सिद्धि युक्ति से ही होती है, अनुभव से अद्वैत की सिद्धि नहीं होती वह अनुभूति का तो निषेध ही कर रहा है, और दृष्टान्त के बिना युक्ति कुछ सिद्ध नहीं कर सकती। फिर यह कहना कि] बिना ही दृष्टान्त के अद्वैत सिद्धि हो जाती है आपके ही मुंह को शोभा देने वाली बात है [विवेचक लोग तो ऐसी बात को मान ही नहीं सकते कि बिना दृष्टान्त के भी कोई बात युक्ति से सिद्ध हो जाती हो] अब केवल सदृष्टान्तत्व पक्ष शेष रह जाता है [कि दृष्टान्त देकर ही युक्ति किसी अर्थ को सिद्ध किया करती है] उसमें आपको ऐसा दृष्टान्त देना चाहिये जो हम दोनों वादियों को सम्मत हो।

४२८ पञ्चदशी अद्वैतः प्रलयो द्वैतानुपलम्भेन सुप्तिवत् । इति चेत् सुप्तिरद्वैतेत्यत्र दृष्टान्तमीरय ॥२९॥ [पूर्ववादी कहता है कि अच्छा लो दृष्टान्त भी सुन लो] प्रलय तो एक प्रकार का अद्वैत [अर्थात् द्वैत रहित अवस्था] है। क्योंकि उस समय द्वैत की उपलब्धि नहीं होती। जिस जिस में द्वैत की उपलब्धि नहीं होती वह वह सभी अद्वैत होता है जैसे कि सुप्ति। इस पर हमारा कहना है कि सुप्ति अद्वैत होती है इस बात को सिद्ध करने के लिये भी तुम्हें अन्य दृष्टान्त देना पड़ेगा। [यदि तुम अपनी सुप्ति का दृष्टान्त दोगे तो उसे कोई जानता नहीं। वह तो दूसरे के प्रति असिद्ध है। इस कारण उसकी सिद्धि के लिये कोई और दृष्टान्त तुम्हें टटोलना ही पड़ेगा।] दृष्टान्तः परसुप्तिश्चेदहो ते कौशलं महत् । यः स्वसुप्तिं न वेत्स्यस्य परसुप्तौ तु का कथा ॥३०॥ यदि तुम दूसरे की सुप्ति का दृष्टान्त दो 'सुप्तिरद्वैता पर- सुप्तिवत्' तब तो यह तुम्हारी बड़ी [भद्दी] चतुराई है [क्योंकि अप्रसिद्ध होने के कारण परसुप्ति का तो तुम्हें दृष्टान्त ही नहीं देना चाहिये] भला जो तुम अपनी सुप्ति को भी नहीं जानते हो वह तुम दूसरे की सुप्ति की बातें क्यों करते हो [जिसे अपनी सुप्ति का ज्ञान नहीं है उसे परसुप्ति का ज्ञान भी नहीं हो सकता।] निश्चेष्टत्वात् परः सुप्तो यथाहमिति चेत् तदा । उदाहर्तुः सुषुप्तेस्ते स्वप्रभत्वं भवेद् बलात् ॥३१॥ यदि अनुमान से परसुप्ति को सिद्ध करना चाहो कि- परः सुप्तः निश्चेष्टत्वात् अहमिव दूसरा सोया पड़ा है क्योंकि

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२९

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२९ [इसके प्राण चल रहे हैं और] निश्चेष्ट पड़ा है जैसे कि मैं सोया करता हूँ । इस पर हम कहेंगे कि बस तब तो मेरे प्रति सुषुप्ति का दृष्टान्त देने वाले तेरी सुषुप्ति ही, तेरे न चाहने पर भी [तेरी इच्छा के विरुद्ध भी] स्वयं प्रकाश सिद्ध हो जाती है । [तभी तो तुम उसका उदाहरण दे रहे हो । नहीं तो बताओ कि अपनी सुप्ति को तुम कैसे जानते हो ?] नेन्द्रियाणि न दृष्टान्तस्तथाप्यङ्गीकरोषि ताम् । इदमेव स्वप्रभत्वं यद् भानं साधनैर्विना ॥३२॥ [तुम्हारे न चाहने पर भी, सुप्ति स्वयंप्रकाश कैसे सिद्ध हो जाती है सो भी देख लो]—सुप्ति को ग्रहण करने वाली इन्द्रियें नहीं होतीं [क्योंकि वे उस समय अपने कारण में विलीन हो जाती हैं] तुम्हारे पास कोई दृष्टान्त भी नहीं है फिर भी तुम उस सुप्ति को मान रहे हो। इसे देखकर यही कहना पड़ता है कि ज्ञान के साधनों के बिना भी प्रकाशित होते रहना यही [सुषुप्ति की] 'स्वयंप्रकाशता' है। स्तामद्वैतस्वप्रभत्वे, वद सुप्तौ सुखं कथम् । शृणु, दुःखं तदा नास्ति ततस्ते शिष्यते सुखम् ॥३३॥ [प्रश्न यह है कि] सुषुप्ति अद्वैत और स्वयंप्रकाश भले ही हो, परन्तु सुषुप्ति में सुख है, यह कैसे मान लें ? इस का उत्तर है कि—उस समय [सुख का विरोध करने वाला] दुःख नहीं रहता, इस कारण सुख ही शेष रह जाता है। [क्योंकि प्रकाश और अन्धकार के समान सुख दुःख भी विरोधी वस्तुएँ हैं। जब दुःख नहीं रहता तब सुख शेष रह ही जाता है। जैसे कि अन्धकार के न रहने पर प्रकाश शेष रह जाता है।]

४३० पञ्चदशी अन्धः सन्नप्यनन्धः स्याद्विद्धोऽविद्धोऽथ रोग्यपि। अरोगीति श्रुतिः प्राह, तच्च सर्वे जना विदुः ॥३४॥ तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वान्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो भवति उपतापी सन्ननुपतापी भवति (छ. ८-४-२) तद्यद्यपीदं भगवः शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति (छ. ८-१०-३) इस श्रुति में कहा गया है कि—सुषुप्ति के आ जाने पर अन्धा अन्धा नहीं रहता, ज़खमी ज़खमी नहीं रहता, रोगी अरोगी हो जाता है। [अर्थात् देहाभिमान के कारण उत्पन्न हुए दोष सुषुप्ति में भाग जाते हैं] इस बात को सब लोग ही जानते हैं [कि—रोग से पीडित भी पुरुष को जब सुषुप्ति आ जाती है तब उसे उस के दुःख का अनुभव नहीं होता।] न दुःखाभावमात्रेण सुखं लोष्टशिलादिषु । द्वयाभावस्य दृष्टत्वादितिचेद् विषमं वचः ॥३५॥ केवल दुःख के न होने से ही सुख की कल्पना करना ठीक नहीं है। देखा जाता है कि—ढेले और पत्थर आदि में दोनों का ही अभाव होता है [उन में जहां दुःख नहीं है, वहां उनमें सुख भी तो नहीं है] इस का उत्तर यह है कि तुम्हारा दृष्टान्त दाष्टन्तिक के अनुसार नहीं है] मुखदैन्यविकासाभ्यां परदुःखसुखोहनम् । दैन्याद्यभावतो लोष्टे दुःखाद्यूहो न संभवेत् ॥३६॥ [दाष्टन्तिक के अनुसार न होने की बात भी देख लो कि] दूसरे के दुःख और दूसरे के सुख की ऊहना उस के मुख की दीनता और उसके मुख के विकास को देख कर ही तो की जाती है

होने से यह तो दुःखी है और प्रसन्न मुख वाला होने से यह सुखी है । प्रकृत तात्पर्य तो यही हुआ कि ] लोष्ठ आदि में दीनता या विकास आदि लिंग नहीं पाये जाते इस कारण उनमें दुःख सुख की कल्पना ही नहीं हो सकती [ यही कारण है कि लोष्ठ आदि में यह भी निश्चय नहीं किया जा सकता कि उनमें दुःखाभाव है । ] स्वकीये सुखदुःखे तु नोहनीये ततस्तयोः । भावो वेद्योऽनुभूत्यैव, तदभावोऽपि नान्यतः ॥३७॥ [ अनुभवसिद्ध होने के कारण अपने सुख दुःख तो ऊहना [ कल्पना ] के योग्य ही नहीं होते, किंवा अनुमेय नहीं होते । इस कारण उन सुख दुःख़ों का सद्भाव जैसे अनुभूति ( प्रत्यक्ष ) से मालूम हो जाता है, उसी तरह उन सुख दुःख का अभाव भी अनुमान आदि से ही नहीं जाना जाता । किन्तु उन सुख दुःख का अभाव भी प्रत्यक्ष से ही जाना जाता है [ अपने और पराये सुख दुःख में यही बड़ी विषमता है ] तथा सति स्वसुप्तौ च दुःखाभावोऽनुभूतिभिः । विरोधिदुःखराहित्यात् सुखं निर्विघ्नमिष्यताम् ॥३८॥ जब कि अपने सुखादि अनुभवगम्य सिद्ध हो चुके तब अपनी सुषुप्ति में का दुःखाभाव भी अनुभव से ही सिद्ध हो गया । जागरण के समय जैसे सुख का विरोधी दुःख बना रहता है सुख का विरोधी वैसा दुःख सुषुप्ति में नहीं रहता । इस कारण सुषुप्ति के समय निर्विघ्न (बाध रहित) सुख मान ही लेना चाहिये । महत्तरप्रयासेन मृदुशय्यादिसाधनम् । कुतः संपाद्यते सुप्तौ सुखं चेत् तत्र नो भवेत् ॥३६॥

४३२ पंचदशी उस सुषुप्ति में यदि सुख ही नहीं है तो बड़े भारी प्रयासों से कोमल शय्या आदि साधनों का उपार्जन क्यों किया जाता है ? दुःखनाशार्थमेवैतदिति चेद् रोगिणस्तथा। भवत्वरोगिण स्त्वेतत् सुखायैवेति निश्चिनु ॥४०॥ यदि कहो कि यह सब साधन संग्रह तो दुःखनाश के लिये किया जाता है तो हम कहेंगे कि [दुःख नाश को इसका फल कहना ठीक नहीं है। क्योंकि] यह फल तो केवल रोगी को ही हो सकता है [जो अरोगी है उसके लिये क्या कहोगे ?] जब कोई रोग ही नहीं है तब तो इन साधनों का सम्पादन सुख के लिये ही है ऐसा निश्चय कर लो। तर्हि साधनजन्यत्वात् सुखं वैषयिकं भवेत् । भवत्वेवात्र निद्रायाः पूर्वं शय्यासनादिजम् ॥४१॥ अच्छा सौषुप्त सुख को साधनजन्य मानोगे तो तुम्हें उस को वैषयिक सुख मानना होगा। [फिर तुम उसे आत्मस्वरूप कैसे कह सकोगे ?] इसका उत्तर यह है कि—निद्रा आने से पहले पहले जो शय्या और आसनादि से सुख होता है उसे तो हम भी वैषयिक सुख मानते हैं। निद्रायां तु सुखं यत्तज्जन्यते केन हेतुना। सुखाभिमुखधीरादौ पश्चान्मज्जेत् परे सुखे ॥४२॥ परन्तु निद्रा आजाने पर जो सुख होता है वह तो किसी भी साधन से नहीं होता [क्योंकि उस समय उन शय्या आदि साधनों का विचार ही किसी को नहीं रहता] निद्रा आने से पहले पहले तो इस जीव की बुद्धि शय्या आदि से मिलने वाले सुखों की तर्फ को रहती है। परन्तु निद्रा आजाने पर तो वही बुद्धि

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३३

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३३ [विषय सुख में से निकल कर] परम सुख में डूब जाती है [उस समय जीव की बुद्धि स्वरूप सुख में विलीन हो जाती है। यों निद्रा से पहला सुख विषय सुख है। निद्रा आ जाने पर मिलने वाला सुख स्वरूप सुख है।] जागद्व्यावृत्तिभिः श्रान्तो विश्रम्याथ विरोधिनि । अपनीते स्वस्थचित्तो ऽनुभवेद् विषये सुखम् ॥४३॥ [ऊपर की बात को तीन श्लोकों में विस्तारपूर्वक यों समझो कि] जागते समय जो अनेक व्यापार यह जीव करता है, उनसे थक कर जब मृदुशय्या आदि पर विश्राम लेता है, तब उसके अनन्तर [दुःखदायी व्यापारों से मिलने वाले] विरोधी दुःखों के हटा दिए जाने पर, जब वह स्वस्थचित्त हो जाता है, [जब इसका मन व्याकुल नहीं रह जाता] उसी समय शय्या आदि विषयों से मिलने वाले सुख का साक्षात्कार यह किया करता है। आत्माभिमुखधीवृत्तौ स्वानन्दः प्रतिबिम्बति । अनुभूयैनमत्रापि त्रिपुट्या श्रान्तिमाप्नुयात् ॥४४॥ [विषयों को उपार्जन करता करता तंग हो कर जब उस दुःख को हटाने के लिए कोमल शय्या पर लेट जाता है, तब इस की बुद्धि अन्तर्मुख हो जाती है,] अन्तर्मुख हुई उस बुद्धिवृत्ति में [सामने रखे हुए दर्पण की तरह] स्वरूपभूत जो आनन्द है वह प्रतिबिम्बित हो जाता है। [बस इसी को 'विषयानन्द' कहते हैं] परन्तु इस समय इस विषयानन्द को अनुभव करते हुए भी त्रिपुटी के रहने के कारण जीव को श्रम होता ही है। २९

४३४ पञ्चदशी तच्छ्रमस्यापनुत्त्यर्थं जीवो धावेत् परात्मनि । तेनैक्यं प्राप्य तत्रत्यो ब्रह्मानन्दः स्वयं भवेत् ॥४५॥ [उसके बाद यह होता है कि] उस उपर्युक्त श्रम को हटाने के लिए वह जीव परमात्मा में को दौड़कर चला जाता है। वहां जाकर उस ब्रह्म के साथ एकता किंवा तादात्म्य को पाकर वह जीव स्वयं भी सुषुप्ति के समय प्रकट होने वाला ब्रह्मानन्द हो जाता है। [तभी तो कहा है कि सता सोम्य तदा सपन्नो भवति (छा० ६-८-१) हे सोम्य उस समय सत् से सम्पन्न हो जाता है] दृष्टान्ताः शकुनिः श्येनः कुमारश्च महानृपः । महाब्राह्मण इत्येते सुप्त्यानन्दे श्रुतीरिताः ॥४६॥ शकुनि, श्येन, कुमार, महाराजा और महाब्राह्मण ये पांच दृष्टान्त सुप्त्यानन्द को सिद्ध करने के लिए श्रुति ने दिये हैं। शकुनिः सूत्रबद्धः सन् दिक्षु व्यापृत्य विश्रमम् । अलब्ध्वा बन्धनस्थानं हस्तस्तम्भाद्युपाश्रयेत् ॥४७॥ जीवोपाधिमनस्तद्वद् धर्माधर्मफलाप्तये । स्वप्ने जाग्रति च भ्रान्त्वा क्षीणे कर्मणि लीयते ॥४८॥ [स यथा शकुनिः सूत्रेण बद्धो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतन मलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयते एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः (छा० ६-८-२) बालक लोग खेल के लिए सूत्र में बुलबुल आदि पक्षियों को बाँध कर हाथ आदि पर बैठा लेते हैं उसको ध्यान में रख कर इस श्रुति में कहा गया है कि]—सूत्र से बंधा हुआ पक्षी, इधर उधर कुछ उड़ कर वहां ठहरने का

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ५३५

[Header] ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ५३५

आधार न पाकर, फिर अपने बन्धन स्थान हाथ आदि पर ही लौट आता है ॥४७॥ इसी प्रकार जीव की उपाधि यह मन भी धर्माधर्म के सुख दुःख रूपी फलों को अनुभव करने के लिए, स्वप्न और जाग्रत् में, जहां तहां भ्रमण करके, जब भोगदायी कर्म क्षीण हो जाते हैं तब [अपने उपादान अज्ञान में] विलीन हो जाता है । [उस समय उस मन से उपहित जो 'जीव' है वह 'परमात्मा' ही हो जाता है ] श्येनो वेगेन नीडैकलम्पटः शयितुं व्रजेत् । जीवः सुप्त्यै तथा धावेद् ब्रह्मानन्दैकलम्पटः ॥४९॥ तद्यथास्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्तः संहृत्य पक्षौ स्वालयायैव म्रियते एवमेवायं पुरुष एतस्मा आनन्दाय धावति यत्र सुप्तो न कंचन कामं कामयते न कंचन स्वप्नं पश्यति' (बृ० ४-३-२२) इस श्रुति में कहा गया है कि जैसे आकाश में सब ओर घूमता हुआ श्येन पक्षी गगन में घूमने की थकावट को हटाने के उद्देश्य से, सोने के लिए केवल मात्र घोंसले की ओर जल्दी जल्दी जाता है, ठीक इसी प्रकार यह जीव भी केवल मात्र ब्रह्मानन्द का लम्पट होकर सुषुप्ति के लिए जल्दी ही हृदयाकाश में पहुँच जाता है । अतिबालः स्तनं पीत्वा मृदुशय्यागतो हसन् । रागद्वेषाद्यनुत्पत्ते रानन्दैकस्वभावभाक् ॥५०॥ महाराजः सार्वभौमः संतृप्तः सर्वभोगतः । मानुषानन्दसीमानं प्राप्यानन्दैकमूर्तिभाक् ॥५१॥ महाविप्रो ब्रह्मवेदी कृतकृत्यत्वलक्षणाम् । विद्यानन्दस्य परमां काष्ठां प्राप्यावतिष्ठते ॥५२॥

५३६ पञ्चदशी 'स यथा कुमारो वा महाराजो वा महाब्राह्मणो वातिघ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीतैवमेवैष एतच्छेते' (बृ. २-१-१९) इस श्रुति में कहा गया है कि—जैसे स्तनपायी बालक पेट भर कर स्तन पीकर कोमल शय्या पर पड़ा पड़ा हंसता रहता है और अपना पराया न पहचानने के कारण रागद्वेष से रहित होकर सुख की मूरत बना रहता है, या जैसे सार्वभौम महाराज [ अशुद्ध बुद्धि होने पर भी ] सब मानुषानन्दों से युक्त होने के कारण, जब कि उसे किसी वस्तु की चाह नहीं रहती तब मानुषानन्द की सीमा पर पहुंच कर आनन्द की मूर्ति दीखा करता है, या जैसे कोई महा ब्राह्मण जिसे ब्रह्म का साक्षात्कार हो चुका हो जब 'मैं कृत कृत्य हो चुका' ऐसी विद्यानन्द की सीमा को पा जाता है किंवा जीवन्मुक्ति को पा लेता है, तब परमानन्द स्वरूप ही हो जाता है । ठीक इसी प्रकार सोया हुआ पुरुप भी आनन्द रूप हो गया होता है । मुग्धबुद्धातिबुद्धानां लोके सिद्धा सुखात्मता । उदाहृतानामन्ये तु दुःखिनो न सुखात्मकाः ॥५३॥ मुग्ध, बुद्ध और अतिबुद्ध ये ही तीन लोक में सुखी माने जाते हैं [ जिनको विवेक नहीं है, उनमें बालक सब से सुखी माना जाता है । जिन्हें कुछ विवेक है, उनमें सार्वभौम राजा सर्वाधिक सुखी गिना जाता है । जो अतिविवेकी हैं उनमें आत्मदर्शी को सर्वाधिक सुखी मानते हैं ] इन तीनों के अति- रिक्त और तो सब सदा रागद्वेषादिसंकुल रहने के कारण दुःखी ही बने रहते हैं । वे सुखी कभी नहीं होते [ इसी कारण उन किसी का दृष्टान्त नहीं दिया है ]

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३७

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३७ कुमारादिवदेवायँ ब्रह्मानन्दैकतत्परः । स्त्रीपरिष्वक्तवद् वेद न बाह्यं नापि चान्तरम् ॥५४॥ प्रकृत में तो हमें यही कहना है कि स्तनपायी कुमार या महाराजा आदि जैसे आनन्द में मग्न रहते हैं ऐसे ही यह सुषुप्त प्राणी केवल ब्रह्मानन्द को भोगा करता है। तद्यथा प्रियया स्त्रिया संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम् (बृ. ४-३-२१) इस वाक्य में कहा गया है कि जैसे कोई कामी स्त्री का आलिंगन कर लेने पर अन्दर बाहर के विषयज्ञान से शून्य होकर सुख की मूर्ति हो जाता है इसी प्रकार सुषुप्ति के समय प्राज्ञ परमात्मा के साथ एकता को प्राप्त हुआ यह जीव भी बाह्य और आन्तर कुछ भी नहीं जानता और आनन्दरूप हो गया होता है । बाह्यं रथ्यादिकं वृत्तं, गृहकृत्यं यथान्तरम् । तथा जागरणं बाह्यं, नाडीस्थः स्वप्न आन्तरः ॥५५॥ [ऊपर के वाक्य में जो बाह्य और आन्तर दो शब्द आये हैं उनके अर्थ यों जानने चाहियें] जैसे लोक में गली कूर्चा आदि बाह्य तथा घर के काम आन्तर कहाते हैं, इसी प्रकार जागरण को ‘बाह्य’ कहा जाता है तथा नाड़ी में प्रतीत होने वाला स्वप्नप्रपंच ‘आन्तर’ कहाता है । पितापि सुप्तावपितेत्यादौ जीवत्ववारणात् । सुप्तौ ब्रह्मैव नो जीवः संसारित्वासमीक्षणात् ॥५६॥ अत्र पिताऽपिता भवति (बृ. ४-३-२२) इत्यादि श्रुति में कहा गया है कि—सुप्तिकाल जब आता है तब पिता पिता नहीं रहता । यों जीवत्व का वारण कर दिया है कि सुप्ति के

५३८ पञ्चदशी समय ब्रह्म ही रह जाता है जीव नहीं रहता । क्योंकि उस समय संसारिभाव का कहीं पता ही नहीं चलता [भाव यह है कि- सुप्ति में जीव के जो आध्यासिक पितृत्व आदि धर्म हैं वे नहीं रहते । जीवभाव की प्रतीति के बन्द हो जाने पर अर्थात् ही ब्रह्मभाव शेष रह जाता है । ] पितृत्वाद्यभिमानो यः सुखदुःखाकरः स हि । तस्मिन्नपगते तीर्णः सर्वाञ्छोकान् भवत्ययम् ॥५७॥ तीर्णो हि तदा सर्वाञ्शोकान् हृदयस्य भवति (बृ. ४-३-२२) इस वाक्य में बताया गया है कि-पितापने आदि का जो अभिमान है वही तो सुख दुःख का आकर है । जब वह अभि- मान नहीं रह जाता तब यह जीव सब शोकों के पार पहुँच जाता है [यह संसार देहाभिमानमूलक है । जब देहाभिमान नहीं रहता तब संसार भी नहीं रहता । देहाभिमान के भूलते ही सब प्रकार के शोक समाप्त हो जाते हैं । ] सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमसावृतः । सुखरूपमुपैतीति ब्रूते ह्याथर्वणी श्रुतिः॥५८॥ आथर्वणी श्रुति कहती है कि-यह सकल [जाग्रदादि] प्रपंच जब [अपनी उपदान, तमःप्रधान प्रकृति में] विलीन हो जाता है तब उसी तमोमयी प्रकृति से ढका हुआ यह जीव सुख रूप [ब्रह्म] को प्राप्त हो जाता है । सुखमस्वाप्समत्राहं न वै किंचिदवेदिषम् । इति सुप्ते सुखाज्ञाने परामृशति चोत्थितः ॥५६॥ [सबका अनुभव भी इसी बात को कह रहा है कि-] 'इस समय मैं सुख पूर्वक सोया । इतने समय मैंने कुछ भी नहीं

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३९

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३९ जाना' यों निद्रा के समय के सुख और अज्ञान दोनों का स्मरण, सोकर उठा हुआ पुरुष किया करता है [ इस कारण कहना पड़ता है कि सुप्ति में सुख है ] परामर्शोऽनुभूतेऽस्तीत्यासीदनुभवस्तदा । चिदात्मत्वात् स्वतो भाति सुखमज्ञानधीस्ततः ॥६०॥ जो भी परामर्श होता है वह अनुभूत विषय का ही होता है [ अनुभव न किये हुए विषय का तो स्मरण हो ही नहीं सकता ] इस कारण उस समय सुप्ति में सुख का अनुभव माना जाता है। सुख का अनुभव करने के साधनों के बिना ही वह सुख स्वतः प्रतीत हो जाता है क्योंकि वह सुख चिदात्मा है [ अर्थात् वह सुख स्वयंप्रकाशचिद्रूप है ] । उसी स्वयंप्रकाश सुख के सहारे से ही [ उस सुख को ढकने वाले ] अज्ञान की भी प्रतीति हो जाती है । ब्रह्म विज्ञान मानन्दमिति वाजसनेयिनः । पठन्त्यतः स्वप्रकाशं सुखं ब्रह्मैव नेतरत् ॥६१॥ वाजसनेयी शाखा वाले कहते हैं कि- 'ब्रह्म' 'विज्ञान' तथा 'आनन्द' दो रूप का है । इस कारण जो भी स्वयं प्रकाश सुख है वह सब ब्रह्म तत्व ही है । वह और कुछ नहीं है [फिर सुषुप्ति के स्वयं प्रकाश सुख को भी ब्रह्मरूप ही मानना चाहिए] यदज्ञानं तत्र लीनौ तौ विज्ञानमनोमयौ । तयोर्हि विलयावस्था निद्राऽज्ञानं च सैव हि ॥६२॥ ['मैंने उस समय कुछ नहीं जाना' इस स्मरण की अन्य- थानुपपत्ति से जिस अज्ञान को हम पहचानते हैं] उसी अज्ञान में प्रमाता और प्रमाण कहाने वाले विज्ञानमय और मनोमय

१४० पञ्चदशी दोनों ही विलीन हो जाते हैं। [वे अपने विज्ञानमयत्व आदि आकार को छोड़कर कारण रूप में पहुँच जाते हैं। अर्थात् उस समय 'विज्ञानमय' और 'मनोमय' दोनों ही नहीं रहते] उन 'विज्ञानमय' और 'ननोमय' की विलयावस्था 'निद्रा' कहाती है। उसी निद्रा को विद्वान् लोग 'अज्ञान' भी कहते हैं [सोच कर देखलो नींद भी तो अज्ञान ही है] विलीनघृतवत् पश्चात् स्याद् विज्ञानमयो घनः । विलीनावस्थ आनन्दमयशब्देन कथ्यते ॥६३॥ [अग्निसंयोग आदि से] पिघला हुआ घृत, पीछे शीतल- वायु के संयोग से जैसे गाढ़ा हो जाता है, इसी प्रकार [जाग्र- दादि के भोगदायी कर्मों के क्षय हो जाने के कारण] निद्रारूप से विलीन हुआ अन्तःकरण [फिर जब भोगदायी कर्मों के वश से, जागरण अवस्था आती है] विज्ञानरूप से घनका [गाढ़ा] हो जाता है। वह घन विज्ञान ही आत्मा की उपाधि होती है इस कारण आत्मा भी विज्ञानमय हो जाता है। वही जब पहले विलीन अवस्था में था— [जब वह अवस्था उसकी उपाधि बन रही थी] तब उसी को 'आनन्दमय' कहा जाता था। सुप्तिपूर्वक्षणे बुद्धिवृत्तिर्या सुखविम्विता । सैव तद्विम्वसहिता लीनानन्दमयस्ततः ॥६४॥ [ऊपर के श्लोक की बात को अधिक स्पष्ट रीति से यों सम- झना चाहिए कि] सुप्ति से पहले क्षण में जो अन्तर्मुख बुद्धि- वृत्ति होती है उसमें जब सुख का प्रतिबिम्ब पड़ता है उसके बाद उस प्रतिबिम्ब को लिये ही लिये, वही वृत्ति जब निद्रारूप से विलीन हो जाती है तब वही 'आनन्दमय' कहाने लगती है।

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४१

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४१ अन्तर्मुखो य आनन्दमयो ब्रह्मसुखं तदा । भुङ्क्ते चिद्विम्बयुक्ताभि रज्ञानोत्पन्नवृत्तिभिः ॥६५॥ वह जो अन्तर्मुख 'आनन्दमय' है वह चिदाभास से युक्त, तथा अज्ञान से उत्पन्न हुई वृत्तियों के द्वारा ब्रह्मसुख [किंवा स्वरूपभूत सुख] को भोगता अर्थात् अनुभव किया करता है। अज्ञानवृत्तयः सूक्ष्मा विस्पष्टा बुद्धिवृत्तयः । इति वेदान्तसिद्धान्तपारगाः प्रवदन्ति हि ॥६६॥ [ उस समय जागरण की तरह् सुख के अनुभव का जो अभिमान नहीं होता उस का कारण तो यह है कि]—वे अज्ञान- वृत्तियां बहुत ही सूक्ष्म होती हैं [वे बुद्धिवृत्तियों की तरह स्पष्ट नहीं होतीं।] बुद्धिवृत्तियां तो बहुत ही स्पष्ट होती हैं। यह बात वेदान्तसिद्धान्त के पारङ्गत लोग बताते हैं। अज्ञान वृत्तियों का पता नहीं चलता कि वे कैसी कैसी हैं और कितनी हैं? जब तो उन अज्ञान वृत्तियों से बुद्धिवृत्तियें बन जाती हैं, तब हम को मालूम पड़ता है कि हमारे अन्दर इतना कूड़ा कचरा भरा पड़ा है। जब तक हमारा अज्ञान बुद्धिवृत्तियों के रूप में प्रकट नहीं हो जाता तब तक हम अपने आप को बड़ा महात्मा समझ बैठते हैं। एकान्त में जाकर साधन करने से यह एक बड़ी कमी रह जाती है कि अज्ञान वृत्तियों को बुद्धिवृत्ति बनने का अवसर ही नहीं मिलता और यों हमें अपने विषय में मिथ्याज्ञान या मिथ्याभिमान हो जाता है। समाज में रह कर साधन करने से हमारे अन्दर के अज्ञान की बार- बार बुद्धिवृत्ति बनती रहती है और हमें अपने अज्ञान का पता चलता रहता है। यों हम दुरभिमान से भी बचते हैं और उस

४४२ पञ्चदशी अज्ञान को हटाने में भी तत्पर रहते हैं अर्थात् हमारे साधन की परीक्षा नित्य ही होती रहती है। इस दृष्टि से व्यवहार के साथ साथ साधन करना अधिक लाभदायक प्रतीत होता है। व्यवहार से हट कर आत्मसाधन करने वाले लोग प्रायः करके व्यवहार के झंझट में स्थिर बुद्धि नहीं रह सकते हैं। यों साधन का यह मार्ग बहुत से साधकों को अधूरा रख देता है ऐसा मालूम पड़ता है। माण्डूक्यतापनीयादिश्रुतिष्वेतदतिस्फुटम् । आनन्दमयभोक्तृत्वं ब्रह्मानन्दे च भोग्यता ॥६७॥ माण्डूक्य और तापनीय आदि श्रुतियों में यह बात अत्यन्त ही स्पष्ट है कि 'आनन्दमय' तो भोक्ता है तथा 'ब्रह्मानन्द' भोग्य है । एकीभूतः सुषुप्तस्थः प्रज्ञानघनतां गतः । आनन्दमय आनन्दभुक् चेतोमयवृत्तिभिः ॥६८॥ [सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतो- मुखः (माण्डूक्य ५) इस माण्डूक्य श्रुति में कहा गया है कि] सुषुप्ति का जो अभिमानी है, वह जब एकीभाव को प्राप्त हो जाता है, उसमें जब प्रज्ञानघनता आजाती है, तब वह आनन्द- मय किंवा आनन्द प्रचुर हो जाता है। वही आनन्दमय, [जिन में चैतन्य की अधिकता रहती है—जो चैतन्य के प्रतिबिम्ब से से युक्त होती हैं] उन अपनी चेतोमय वृत्तियों से आनन्द को भोगा करता है । विज्ञानमयमुख्यैर्यो रूपैर्युक्तः पुराधुना । स लयेनैकतां प्राप्तो बहुतन्दुलपिष्टवत् ॥६९॥ जो आत्मा पहले जागरणकाल में विज्ञानमय आदि

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४५३ मय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुमय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, आपो- मय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतजोमय, काममय अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय आदि] आकारविशेषों से युक्त था, वही अब लय के कारण [विज्ञान आदि उपाधियों के विलीन हो जाने के कारण] एकरूप हो जाता है। मानो बहुत से चावलों को पीस कर उन की एक पिष्ठी बना ली गयी हो । [इसी को उसका एकीभाव कहते हैं ] प्रज्ञानानि पुरा बुद्धिवृत्तयोऽथ घनोऽभवत् । घनत्वं हिमबिन्दूना मुदग्देशे यथा तथा ॥७०॥ [उस श्रुति के प्रज्ञानघन शब्द का अर्थ यह है कि]—पुरा अर्थात् पहले जाग्रदादि के समय घटादि को विषय करने वाली प्रज्ञान नाम की जो बहुत सी बुद्धिवृत्तियां थीं, अब [सुषुप्ति- काल के आजाने पर जब कि कोई भी घटादि विषय नहीं रहते तब] उन सब वृत्तियों का एक घन हो जाता है [अब उनका केवल एक चिद्रूप ही हो जाता है] जैसे कि उत्तर दिशा में बरफ़ की बहुत सी बूंदों का घनाकार पिण्ड हो गया हो । तद्घनत्वं साक्षिभावं दुःखाभावं प्रचक्षते । लौकिकास्तार्किका यावद्दुःखवृत्तिविलोपनाव् ॥७१॥ यह जो वेदान्तों में साक्षी कहाने वाली प्रज्ञानघनता है उसी को तो लौकिक लोग [जिन्हें शास्त्र का संस्कार ही नहीं है] तथा तार्किक आदि लोग, दुःखाभाव कहते हैं या समझते हैं। क्योंकि उस समय जितनी भी दुःखवृत्तियां होती हैं उन सभी का विलय हो जाता है [वे लोग इसी बात को न समझ कर उस प्रज्ञान- घनता को ही दुःखाभाव समझ बैठते हैं]

४४४ पञ्चदशी अज्ञानविम्बिता चित् स्यान्मुखमानन्दभोजने । भुक्तं ब्रह्मसुखं त्यक्त्वा बहिर्यात्यथ कर्मणा ॥७२॥ [उस श्रुति के चेतो मुख का अर्थ यह है कि]—सुषुप्ति- काल के ब्रह्मानन्द को भोगने का मुख [साधन] अज्ञानवृत्ति में प्रतिबिम्बित चैतन्य ही तो है [उस ब्रह्मानन्द को भोगता हुआ भी वह उसे छोड़कर जो कि दुःखों के घर [इस जागरण] में आता है उसका कारण यह है कि—यह जीव पुण्य पाप नामक कर्मपाश में बंधा हुआ है, इस कारण उस] कर्म से प्रेरित हुआ यह जीव, साक्षात् देखे हुए भी ब्रह्मानन्द को छोड़ कर, बाहर निकल आता है अर्थात् जाग पड़ता है । कर्म जन्मान्तरेऽभूद् यत् तद्योगाद् बुध्यते पुनः । इति कैवल्यशाखायां कर्मजो बोध ईरितः ॥७३॥ पुनश्च जन्मान्तरकर्मयोगात् स एव जीवः स्वपिति प्रबुद्धः इस कैवल्यशाखा में कहा गया है कि—जन्मान्तर में किये हुए कर्मों से यह प्राणी फिर जागरण में आ जाता है । अर्थात् जागरण अवस्था यों ही बिना कारण के नहीं आजाती किन्तु यह कर्मज है । कंचित्कालं प्रबुद्धस्य ब्रह्मानन्दस्य वासना । अनुगच्छेद् यतस्तूष्णीमास्ते निर्विषयः सुखी ॥७४॥ [सुप्ति में ब्रह्मानन्द भोगना मिलजाता है इसका चिह्न भी सुनलो]—जब आदमी जाग जाता है तब भी थोड़ी देर तक सुषुप्ति में जिस ब्रह्मानन्द का अनुभव उसने किया था उसी के संस्कार चालू रहते हैं। जभी तो जागने के प्रारम्भ में बिना ही विषय के सुखी होकर यह प्राणी चुपचाप बैठा रहता है

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४५

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४४५ [ इसी से जानते हैं कि उस ने ब्रह्मानंद को भोगा था और अब भी उसके संस्कारों से वह सुखी हो रहा है ] कर्मभिः प्रेरितः पश्चान्नानादुःखानि भावयन् । शनै र्विस्मरति ब्रह्मानन्दमेषोऽखिलो जनः ॥७५॥ [फिर सदा मौन होकर ही क्यों नहीं बैठा रहता इसका कारण भी सुन लो] पूर्वोक्त कर्मों से प्रेरित हुए सभी प्राणी पीछे से जब संसार के नाना दुःखों की भावना करने लगते हैं तब फिर ये सभी प्राणी धीरे धीरे [हाय ! हाय ! उस जगज्जीवन] ब्रह्मानन्द को भूल जाते हैं । प्रागूर्ध्वमपि निद्रायाः पक्षपातो दिने दिने । ब्रह्मानन्दे नृणां, तेन प्राज्ञोऽस्मिन् विवदेत कः ॥७६॥ [ब्रह्मानन्द में संशय न करने का एक यह भी कारण है कि] सभी मनुष्यों को नींद से पहले और नींद के पीछे ब्रह्मा- नन्द में स्नेह बना रहता है [जभी तो निद्रा के आदि में कोमल शय्या आदि का संपादन करते हैं। निद्रा समाप्त हो जाने पर उस ब्रह्मानन्द को न छोड़ने के कारण चुप चाप बैठे रहते हैं] ऐसी अवस्था में कौन समझदार होगा जो इस आनन्द में विवाद करेगा ? ननु तूष्णीं स्थितौ ब्रह्मानन्दश्चेद् भाति, लौकिकाः। अलसाश्चरितार्थाः स्युः, शास्त्रेण गुरुणात्र किम् ॥७७॥ जो ब्रह्मानन्दानुभव गुरुशुश्रूषा आदि प्रयासों से मिला करता है वह अगर चुप रहने मात्र से किसी को मिल सकता हो तब तो लौकिक पामर लोग तथा आलस में पड़े रहने वाले

४४६ पञ्चदशी अहदी लोग सभी कृतार्थ हो जाने चाहिये । फिर श्रवणादि परिश्रम की क्या आवश्यकता रह जायगी ? बाढं, ब्रह्मेति विद्युश्चेत् कृतार्था स्तावतैव ते । गुरुशास्त्रे विनात्यन्तं गम्भीरं ब्रह्म वेत्ति कः ॥७८॥ ‘यह ब्रह्मानन्द है’ ऐसा यदि कोई उनमें से पहचान जाय तो वह अवश्य ही कृतार्थ हो कर रहे । परन्तु गुरु और शास्त्र के बिना [मन वाणी से अगम्य सर्वज्ञ सर्वान्तर सर्वात्मरूप] उस गम्भीर ब्रह्म को और किस उपाय से कौन जान सकता है ? [अर्थात् गुरु और शास्त्र के बिना इस तत्व का पता नहीं चलता] जानाम्यहं त्वदुक्त्याद्य कुतो मे न कृतार्थता । शृण्वत्र त्वादृशो वृत्तं प्राज्ञंमन्यस्य कस्यचित् ॥७९॥ यदि यह पूछा जाय कि—तुम्हारे कहने से मैं ब्रह्मानन्द को जान तो गया हूँ परन्तु मैं कृतार्थ क्यों नहीं हो पाया हूँ ? इसके उत्तर में अपने जैसे किसी प्राज्ञाभिमानी का वृत्तान्त सुन लीजिये । चतुर्वेदविदे देयमिति शृण्वन्नवोचत । वेदाश्चत्वार इत्येवं वेद्मि मे दीयतां धनम् ॥८०॥ किसी तुम्हारे जैसे ने यह सुना था कि—चतुर्वेदज्ञ को यह बहुत सा धन दे दो । बस इस बात को सुन कर वह कह उठा कि वेद चार हैं यह तो मैं जानता ही हूँ और यों मैं चतु- र्वेदज्ञ हो गया हूँ, इस कारण यह धन मुझे ही दे दो [ इसी तरह तुम भी कहते हो कि मैं ब्रह्मज्ञ हो गया हूँ मैं कृतार्थ क्यों नहीं हुआ ?]