पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
भाषाटीकासमेतम् । (२५१)
हस्ती आरोहकं हत्वा प्रणश्यज्जनकोलाहलेन लोकमाकुल- यन् तमेव उद्देशं प्राप्तः । तं च दृष्ट्वा सर्वे वरानुयायिनो वरेण सह प्रणश्य दिशो जग्मुः । अथ अस्मिन्नवसरे भयतरललो- चनामेकाकिनीं कन्यामवलोक्य “मा भैषीरहं परित्राता” इति सुधीरं स्थिरीकृत्य दक्षिणपाणौ संगृह्य महासाहासिक- तया प्राप्तव्यमर्थः परुषवाक्यैः हस्तिनं निर्भर्त्सितवान् । ततः कथमपि दैवयोगादपयाते हस्तिनि ससुहृद्बान्धवेन अतिक्रान्तलग्नसमये वरकीर्त्तिना आगत्य तावत् तां कन्या- मन्यहस्तगतां दृष्ट्वा अभिहितम्-“भोः श्वशुर ! विरुद्धमिदं त्वया अनुष्ठितं यन्मह्यं प्रदाय कन्यामन्यस्मै प्रदत्ता” इति । सोऽब्रवीत्,-“भो ! अहमपि हस्तिभयपलायितो भवद्भिः सह आयातो न जाने किमिदं वृत्तम्” । इति अभिधाय दुहितरं प्रष्टुमारब्धः, “वत्से ! न त्वया सुन्दरं कृतम् । तत्कथ्यतां कोऽयं वृत्तान्तः ।” साऽब्रवीत्,-“यदहमनेन प्राणसंशयात् रक्षिता तदा एनं मुक्त्वा मम जीवन्त्या नान्यः पाणिं ग्रहीष्यति” इति । अनेन वार्त्ताव्यतिकरेण रजनी व्युष्टा । अथ प्रातस्तत्र सञ्जाते महाजनसमवाये वार्त्ताव्य- तिकरं श्रुत्वा राजदुहिता तमुद्देशमागता । कर्णपरम्परया श्रुत्वा दण्डपाशकसुतापि तत्रैव आगता । अथ तं महाजन- समवायं श्रुत्वा राजा अपि तत्रैव आजगाम। प्राप्तव्यमर्थं प्राह- “भो ! विश्रब्धं कथय, कीदृशोऽसौ वृत्तान्तः,” अथ सोऽब्र- वीत्,-“प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यः” इति । राजकन्या स्मृत्वा प्राह,-“देवोऽपि तं लंघयितुं न शक्तः” । ततो दण्डपाशक- सुता अब्रवीत्,-“तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे” इति । तमखिललोकवृत्तान्तिमाकर्ण्य वणिक्सुताऽब्रवीत्,-“यद- स्मदीयं न हि तत्परेषाम्” इति । अभयदानं दत्त्वा राज्ञा पृथक् पृथग् वृत्तान्तान् ज्ञात्वा अवगततत्त्वः तस्मै प्राप्तव्यम- र्थाय स्वदुहितरं सबहुमानं ग्रामसहस्रेण समं सर्वालं-
( २९२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
कारपरिवारयुतां दत्त्वा त्वं मे पुत्रोऽसीति नगरविदितं तं यौवराज्येऽभिषिक्तवान् । दण्डपाशकेनापि स्वदुहिता स्वशक्त्या वस्त्रदानादिना सम्भाव्य प्राप्तव्यमर्थाय प्रदत्ता । अथ प्राप्तव्यमर्थेनापि स्वीयपितृमातरौ समस्तकुटुम्बावृतौ तस्मिन्नगरे सम्मानपुरःसरं समानीतौ । अथ सोऽपि स्वगोत्रेण सह विविधभोगानुपभुञ्जानः सुखेन अवस्थितः। अतोऽहं ब्रवीमि-
यह विचारकर उसके पास न गया, उस समय वह (प्राप्तव्यमर्थवाला) घूमता हुआ श्वेत घरके निकट रात्रिमे लम्बायमान रस्सी (कमन्द) को देखकर कौतुकयुक्त हृदयसे उसको पकडकर गया। उस राजपुत्रीने यह वहीहै इस प्रकार जान सन्तुष्टचित्तसे स्नान भोजन पानाच्छादनादिसे सन्मान किया उसके संग शय्यामें सोती हुई उसके अंगस्पर्शसे प्राप्त हुए हर्षसे रोमांचित शरीर हो उसने कहा—“तुम्हारे दर्शनमात्रसे अनुरक्त हुई मैंने अपना आत्मा तुमको दिया, तुमको छोडकर और स्वामी स्वप्नमेंभी मेरे न होगा, सो मेरे साथ आलाप क्यों नहीं करते”। वह बोला,—“मनुष्य प्राप्त होनेयोग्य अर्थकोही प्राप्त होताहै”। ऐसा कहनेपर यह और है ऐसा उसने विचार अपने धवलगृहसे उतारकर छोड-दिया, वह किसी टूटे देवमंदिरमें जाकर सो गया। तब वहां किसा कुलटाका संकेत किया हुआ जबतक नगररक्षक प्राप्त हुआ, उससे पहलेही यह सोगयाथा उसने देखकर इस गुप्तभेद छिपानेके लिये पूछा,—“आप कौनहै”। वह बोला “मनुष्य प्राप्त होने योग्यही अर्थको प्राप्त होताहै”। यह सुनकर वह दण्डपाशक बोला—“यह देवगृह शून्यहै। सो मेरे स्थानमें जाकर सोरह”। “बहुत अच्छा” ऐसा कह बुद्धिकी विपरीततासे अन्य स्थानमें सोगया, उस रक्षककी कन्या नियमवती नामवाली रूपयौवनसे सम्पन्न किसी पुरुषमें अनुरक्त हुई संकेत देकर उस स्थानमें सोगईथी तब यह उसको आया देख यही मेरा प्रियहै ऐसा रात्रीके घने अंधकारसे मोहित हुई उठकर भोजनाच्छादि क्रियाको कराकर गान्धर्वरितिसें अपना विवाहकर उसके संग शयनमें स्थित हुई खिले मुखकमलसे उससे बोली “अबभी क्यों निडर होकर तुम मुझसे नहीं बोलते”। वह बोला—“मनुष्य प्राप्तव्य अर्थको प्राप्त होताहै”। यह सुन उसने विचार किया, “जो बिना विचारे
भाषाटीकासमेतम् । ( २९३ )
कार्य किया जाताहै उसका ऐसाही फल होताहै” । यह विचार दुःखी हो उसने इसे निकाल दिया, सो वह जबतक मार्गमे जाता है तबतक वरकीर्तिनाम वर और देशका रहनेवाला बडे बाजे गाजेसे आया । प्राप्तव्यमर्थभी उनके साथ जाने लगा, सो जबतक लग्नसमय प्राप्त हो कि, राजमार्गमे स्थित श्रेष्ठीके गृहद्वारमे कि, जहा रत्नमण्डपकी वेदीमें विवाहके निमित्त मगलका वेश किया वणिक्पुत्री स्थित थी, तबतक मदमत्त हाथी आरोहकको मारकर नष्ट होते जनोके कोलाहल-के साथ लोकको व्याकुल करता हुआ उसी स्थानमे प्राप्त हुआ । उसको देखकर सब वराती वरके सग प्रनष्ट होते दिशाओमें गये । उसीसमय भयसे चंचल नेत्र-वाली इकली कन्याको देखकर “मतडरो मैं रक्षकहू” इस प्रकार धीरतापूर्वक निश्चय करके दक्षिण हाथ पकडकर महा साहसपनसे प्राप्तव्यमर्थ कठोर वाक्योंसे हाथीको घुडकता हुआ, तब किसी प्रकारसे दैवयोगसे हाथीके हट जानेसे सुहृद्बान्धवोंके साथ लग्नसमय बीत जानेसे वरकीर्तिने आकर तत्रतक उस कन्याको अन्यके हाथमें प्राप्त हुई देखकर कहा,-“भो श्वशुर ! यह आपने विरुद्ध किया जो मुझको देकरके कन्या औरको दी” वह बोला,-“भो ! मैंभी हाथीके डरसे भागा हुआ, आपके सग आयाहू न जाने यह क्या हुआ” । ऐसा कह बेटीसे पूछने लगा, “वत्से ! यह तैने अच्छा न किया, सो कह यह क्या वृत्तान्त है?” वह बोली-“इसने मेरी प्राणसकटसे रक्षा की है सो इसको छोडकर मुझ जीती हुईका हाथ कोई न ग्रहण करेगा” । इस बातमे रात बीतगई । तब प्रातःकाल होनेपर महाजनोंके समूहमें इस वार्ताका व्यतिकर सुनकर राजदुहिता उस स्थानमें आई । कर्णपरपरासे सुनकर दण्डपाशकी कन्याभी उस स्थानमें आई। तब उस महाजनके समूहको सुनकर राजाभी उस स्थानमें आगया । तब प्राप्तव्यमर्थसे बोला,-“भो ! निडर कहो यह कैसा वृत्तान्त हे” । तब वह बोला,-“मनुष्य प्राप्तव्य अर्थको प्राप्त होताहै” राजकन्या बोली,-“देवभी उसको लघन करनेको समर्थ नहीं है” । तब दण्डपाशकसुता बोली,-“इस कारण न मैं कुछ सोचती हू न कुछ मुझे विस्मय है” इस अखिल लोकके वृत्तान्तको सुनकर वणिक्सुता बोली,-“जो हमारा है सो दूसरेका नही” । अभयदान देकर राजाने पृथक् २ वृत्तान्त पूछा उस वृत्तान्तको जान प्राप्तव्यमर्थके वास्ते अपनी कन्याको बहुत मानके सहित सम्पूर्ण अलकारसे परिवारसे युक्त देकर “तृ
(२५४) पञ्चतन्त्रम् ।
मेरा पुत्र है" ऐसा नगरमें विदित कर उसको युवराज्यमें अभिषिक्त कर दिया । दंडपाशकनेभी अपनी कन्या निजशक्तिके अनुसार वस्त्रपात्रादिसे सत्कृत कर प्राप्तव्यमर्थको दी प्राप्तव्यमर्थने भी अपने पिता माताको समस्त कुटुम्बके सहित उस नगरमें सम्मानपूर्वक बुलाया, वहभी अपने गोत्रोंके सहित अनेक भोगोंको भोगता हुआ सुखसे रहा। इससे मैं कहता हूं-
"प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो देवोऽपिते लंघयितुं न शक्तः । तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम् ॥ ११८ ॥"
मनुष्य प्राप्तव्य अर्थको प्राप्त होता है, उसे देवभी उल्लंघन करनेको समर्थ नहीं, इस कारण न मैं शोच करता हूं, न मुझको विस्मय है, क्यों कि, जो हमारा है वह दूसरोंका नहीं ॥ ११८ ॥”
तदे तत्सकलं सुखदुःखमनुभूय परं विषादमुपागतोऽने- न मित्रेण त्वत्सकाशमानीतः। तदेतत् मे वैराग्यकारणम्" । मन्थरक आह,—" भद्र ! भवति सुहृदयसन्दिग्धं यत् क्षुत्क्षामोऽपि शत्रुभूतं त्वां भक्ष्यस्थाने स्थितमेवं पृष्ठमारोप्य आनयति न मार्गेऽपि भक्षयति। उक्तञ्च यतः—
सो यह सम्पूर्ण दुःख सुख अनुभव करके परम विषादको प्राप्त हुए मित्रने मुझे तुम्हारे पास प्राप्त किया है। यह मेरे वैराग्यका कारण है" । मन्थरक बोला,—"भद्र ! यह काग असंशय मित्रहीहै, जो भूखसे व्याकुल भी शत्रुभूत तुमको भक्ष्यस्थानमें स्थितही पीठपर आरोपणकर लाया मार्गमेंभी भक्षण न किया । कारण कहा है-
विकारं याति नो चित्तं वित्ते यस्य कदाचन । मित्रं स्यात्सर्वकाले च कारयेन्मित्रमुत्तमम् ॥ ११९ ॥
जिसका चित्त कभी धनसे विकारको प्राप्त नहीं होता है वही मित्र है सदैव ऐसे मित्रको करै ॥ ११९ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (२५५)
विद्वद्भिः सुहृदामत्र चिह्नैरैतैरसंशयम् । परीक्षाकरणं प्रोक्तं होमाग्नेरिव पण्डितैः ॥ १२० ॥
विद्वान् पंडितोंको इन चिह्नोंसे अवश्यही होमाग्निकी समान सुहृदोंकी परीक्षा करनी कही है ॥ १२० ॥
तथाच- तैसेही-
आपत्काले तु संप्राप्ते यन्मित्रं मित्रमेव तत् । वृद्धिकाले तु संप्राप्ते दुर्जनोऽपि सुहृद्भवेत् ॥ १२१ ॥
आपत्तिका समय प्राप्त होनेपर जो मित्र है वही मित्र है वृद्धिका समय प्राप्त होनेपर तो दुर्जन भी सुहृद् होजाता है ॥ १२१ ॥
तन्ममापि अद्य अस्य विषये विश्वासः समुत्पन्नो यतो नीतिविरुद्धा इयं मैत्री मांसाशिभिर्वायसैः सह जलचराणाम् । अथवा साधु इदमुच्यते-
सो आज मेराभी इस विषयमें विश्वास हुआ है कि, नीतिविरुद्ध यह मित्रता मास खानेवाले कौओंके साथ जलचरोंकी है। अथवा अच्छा कहा है-
मित्रं कोऽपि न कस्यापि नितान्तं न च वैरकृत् । दृश्यते मित्रविध्वस्तात्कार्य्याद्वैरी परीक्षितः ॥ १२२ ॥
कोई किसीका न मित्रहै न अत्यन्त वैरी है मित्रके विपरीत कार्य्यकी परीक्षासे वैरी दीखता है ॥ १२२ ॥
तत् स्वागतं भवतः । स्वगृहवदास्यतामत्र सरस्तीरे । यच्च वित्तनाशो विदेशवासश्च ते सञ्जातस्तत्र विषये सन्तापो न कर्त्तव्यः । उक्तञ्च-
सो आपका मङ्गलहो । अपने घरकी समान इस सरोवरके किनारे स्थित रहो और जो आपका धननाश और विदेशवास हुआ है इस विषयमे सन्ताप करना न चाहिये । कहा है-
अभ्रच्छाया खलप्रीतिः सिद्धमन्नञ्च योषितः । किंचित्कालोपभोग्यानि यौवनानि धनानि च ॥ १२३ ॥
वादलोंकी छाया, दुष्टोंकी प्रीति, पकान्न, स्त्रिये, यौवन और धन यह किंचित्काल पर्यन्त भोग्य होते हैं ॥ १२३ ॥
( २५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
अतएव विवेकिनो जितात्मानो धनस्पृहां न कुर्वन्ति । उक्तञ्च- इसी कारण ज्ञानी और आत्माके जीतनेवाले पुरुष धनमें स्पृहा नहीं करते हैं। कहा है-
सुसञ्चितैर्जीवनवत्सुरक्षितै र्निजेऽपि देहे न वियोजितैः क्वचित् । पुंसो यमान्तं व्रजतोऽपि निष्ठुरै- रेतैर्धनैः पञ्चपदी न दीयते ॥ १२४ ॥
अति कष्टसे संचित किये प्राणकी समान रक्षित अपनी देहसे किसी प्रकारभी न नियुक्त किये निष्ठुरधन यमलोकको जाते मनुष्यके पीछे पांच पदभी गमन नहीं करते हैं ॥ १२४ ॥
अन्यञ्च- औरभी-
यथामिषं जले मत्स्यैर्भक्ष्यते श्वापदैर्भुवि । आकाशे पक्षिभिश्चैव तथा सर्वत्र वित्तवान् ॥ १२५ ॥
जैसे मांस जलमें मच्छोंसे, पृथ्वीमें हिंसक जीवोंसे, आकाशमें पक्षियोंसे खाया जाता है। इसी प्रकार सर्वत्र धनवान् खाया जाता है ॥ १२५ ॥
निर्दोषमपि वित्ताढ्यं दोषैर्योजयते नृपः । निर्धनः प्राप्तदोषोऽपि सर्वत्र निरुपद्रवः ॥ १२६ ॥
निर्दोषी धनीकोभी राजा दोषसे दूषित करता है, और निर्धनी दोषको प्राप्त होकरभी सदा उपद्रवसे हीन रहता है ॥ १२६ ॥
अर्थानामर्जने दुःखमर्जितानां च रक्षणे । नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थान्कष्टसंश्रयान् ॥ १२७ ॥
धनके इकट्ठा करनेमे दुःख, इकट्ठा कियेके रक्षा करनेमें दुःख, नाशमें दुःख, खर्चमें दुःख, कष्टके आश्रयवाले धनको धिक्कार है ॥ १२७ ॥
अर्थार्थी यानि कष्टानि मूढोऽयं सहते जनः । शतांशेनापि मोक्षार्थी तानि चेन्मोक्षमाप्नुयात् ॥ १२८ ॥
यह मूढमनुष्य धनके निमित्त जितना कष्ट सहता है मोक्षकी इच्छावाला उसके सौ वें अंश परिश्रम करे तो मुक्त होजाय ॥ १२८ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( २५७ )
अपरं च-
औरभी-
विदेशवासजमपि वैराग्यं त्वया न कार्य्यम् । यतः-
विदेशके निवास करनेसे उत्पन्न हुआ वैराग्यभी तुमको करना न चाहिये । क्यो कि-
को धीरस्य मनस्विनः स्वविषयः को वा विदेशः स्मृतो
यं देशं श्रयते तमेव कुरुते बाहुप्रतापार्जितम् ।
यदंष्ट्रानखलांगुलप्रहरणैः सिंहो वनं गाहते
तस्मिन्नेव हतद्विपेन्द्ररुधिरैस्तृष्णां छिनत्यात्मनः ॥ १२९॥
धीर बुद्धिमान्को अपना देश क्या है ? विदेश क्या है ? वह जिस देशमें निवास करता हे उसीको भुजाओके प्रतापसे जीत लेता है जो कि, डाढ नख पूंछके प्रहारसे सिंह वनमें फिरता है, उसी वनमें मारे हुए हाथीके रुधिरसे अपनी तृष्णाको दूर करता है ॥ १२९ ॥
अर्थहीनः परे देशे गतोऽपि यः प्रज्ञावान् भवति स कथ-
ञ्चिदपि न सीदति । उक्तञ्च-
धनहीन परदेशमे गया हुआभी यदि बुद्धिमान् हो तो किसी प्रकार दुःखी नहीं होता है । कहा है-
कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ॥ १३० ॥
शक्तिमानोंको अतिभार क्या है ? व्योपारियोंको दूर क्या है ? विद्यावानोंको विदेश क्या है ? प्रियवादियोंको पर क्या है ? ॥ १३० ॥
तत् प्रज्ञानिधिर्भवान् न प्राकृतपुरुषतुल्यः, अथवा-
सो आप तो बुद्धिके सागर है साधारण मनुष्यके तुल्य नहीं हैं । अथवा-
उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं
क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम् ।
शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदञ्च
लक्ष्मीः स्वयं मार्गति वासहेतोः ॥ १३१ ॥
१७
( २५८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
उत्साहसे युक्त, आलस्यरहित, क्रियाविधिका ज्ञाता, व्यसनमें न लगनेवाले, शूर, कृत्यको जाननेवाले, दृढ सौहार्दवाले पुरुषको लक्ष्मी निवासके लिये स्वयं ढूंढती है ॥ १३१ ॥
अपरं प्राप्तोऽपि अर्थः कर्मप्राप्त्या नश्यति । तद् एतावन्ति दिनानि त्वदीयमासीत् । मुहूर्त्तमपि अनात्मीयं भोक्तुं न लभ्यते । स्वयमागतमपि विधिनापह्रियते ।
औरभी यह कि, प्राप्त हुआ धन कर्मवशसे नष्ट होजाता है सो इतने दिन-तक तुम्हारे निकट धन रहना था, पराया धन कोई एक मुहूर्त नहीं भोग सक्ता । स्वयं आया हुआ भी प्रारब्धसे हरण होजाता है ।
अर्थस्योपार्ज्जनं कृत्वा नैव भोगं समश्नुते । अरण्यं महदासाद्य मूढः सोमिलको यथा ॥ १३२ ॥"
कोई धन उपार्जन करकेभी उसको नहीं भोग सक्ता जैसे महाधनको प्राप्त होकर मूढ सोमिलक ॥ १३२ ॥"
हिरण्यक आह,—"कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत्-
हिरण्यकने कहा,—"यह कैसी कथा ?" वह बोला-
कथा ५.
कस्मिंश्चिदधिष्ठाने सोमिलको नाम कौलिको वसति स्म । स च अनेकविधपट्टरचनारञ्जितानि पार्थिवोचितानि सदा एव वस्त्राणि उत्पादयति । परं तस्य च अनेकविधपट्ट-रचनानिपुणस्यापि न भोजनाच्छादनाभ्यधिकं कथमपि अर्थमात्रं सम्पद्यते । अथ अन्ये तत्र सामान्यकौलिकाः स्थूलवस्त्रसम्पादनविज्ञानिनो महर्द्धिसम्पन्नाः तानवलोक्य स स्वभार्यामाह,—"प्रिये ! पश्य एतान् स्थूलपट्टकार-कान् धनकनकसमृद्धान् । तद्धारणकं मम एतत्स्थानं तद्-न्यत्र उपार्जनाय गच्छामि" । सा आह—"भोः प्रियतम ! मिथ्याप्रलपितमेतद्यदन्यत्र गतानां धनं भवति, स्वस्थाने न भवति । उक्तञ्च-
भाषाटीकासमेतम्। (२५९)
किसी स्थानमें सोमिकक नाम कौलिक रहता था, वह अनेक प्रकार पटरचनासे रजित राजाओंके योग्य वस्त्र सदा बनाता था और उसके अनेकविध पटरचनामें निपुण होकरभी भोजनाच्छादनसे अधिकधन न प्राप्त होता और दूसरे साधारण जुलाहे मोटे वस्त्र बुनना जानने वाले बडे धनवाले थे । उनको देखकर यह अपनी भार्यासे बोला,–"प्रिये ! इन मोटे कपडे बनाने वालोंको देखो जो धन सुवर्णसे सम्पन्न हैं । सो यह स्थान हमको लेना फागना नहीं है । सो और स्थानमें धन उपार्जनके निमित्त जाताहू " । वह बोली,--“ भो प्रियतम ! यह सब मिथ्या प्रलाप है जो और स्थानमे जाकर धन होता है अपने स्थानमे नहीं होता । कहा है–
उत्पतन्ति यदाकाशे निपतन्ति महीतले ।
पक्षिणां तदपि प्राप्या नादत्तमुपतिष्ठति ॥ १३३ ॥
जो आकाशमें उडते पृथ्वीमे गिरते हैं उन पक्षियोंकोभी बिनादिया अन्न प्राप्त नही होता है ॥ १३३ ॥
तथाच–
तैसेही–
न हि भवति यन्न भाव्यं भवति च भाव्यं विनापि यत्नेन ।
करतलगतमपि नश्यति यस्य तु भवितव्यता नास्ति ॥ १३४ ॥
जो होनहार नहीं है वह नहीं होता है जो होनहार है वह यत्नके बिनाही होजाता है जिसकी प्राप्ति नहीं है वह हाथमे प्राप्त हुआ भी नष्ट होजाता है ॥ १३४ ॥
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् ।
तथा पुरा कृतं कर्म कर्त्तारमनुगच्छति ॥ १३५ ॥
जैसे सहस्र धेनुओंमें बछडा माताको पहचानता है इसी प्रकार पूर्व किया कर्म कर्ताको पहुचता है ॥ १३५ ॥
शेते सह शयानेन गच्छन्तमत्तुगच्छति ।
नराणां प्राक्तनं कर्म तिष्ठेत्त्वथ सहात्मना ॥ १३६ ॥
सोतेके साथ सोता है, चलतेके साथ चलता है, बहुत क्या मनुष्योका किया कर्म आत्माके साथ रहता है ॥ १३६ ॥
यथा छायातमौ नित्यं सुसम्बद्धौ परस्परम् ।
एवं कर्म च कर्ता च संश्लिष्टावितरेतरम् ॥ १३७ ॥
( २६० ) पञ्चतन्त्रम् ।
जैसे छाया और धूप परस्पर सम्बद्ध हैं इसी प्रकार कर्म और उसका कर्त्ता परस्पर संघटित हैं ॥ १३७ ॥
तस्मादत्र एव व्यवसायपरो भव "। कौलिक आह- "प्रिये ! न सम्यगभिहितं भवत्या, व्यवसायं विना कर्म न फलति । उक्तञ्च-
इस कारणसे यहीं रोजगार करो" कौलिक बोला,-"प्रिये ! तुमने अच्छा नहीं कहा । रोजगारके बिना कर्मसिद्धि नहीं होती । कहा है-
यथैकेन न हस्तेन तालिका सम्प्रपद्यते ।
तथोद्यमपरित्यक्तं न फलं कर्मणः स्मृतम् ॥ १३८ ॥
जैसे एक हाथसे ताली नहीं बजती इसी प्रकार उद्यम त्यागनेसे कर्मफल नहीं होता है ॥ १३८ ॥
पश्य कर्मवशात्प्राप्तं भोज्यकालेऽपि भोजनम् ।
हस्तोद्यमं विना वक्त्रे प्रविशेन्न कथञ्चन ॥ १३९ ॥
देखो भोजनके समय प्राप्त हुआभी अन्न हाथके उद्यमके बिना मुखमें किसी प्रकार प्रवेश नहीं करसक्ता ॥ १३९ ॥
तथाच-
तैसेही-
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी-
दैवं हि दैवमिति कापुरुषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
यत्ने कृते यदि न सिद्ध्यति कोऽत्र दोषः ॥ १४० ॥
उद्योगी पुरुषसिंहको लक्ष्मी प्राप्त होती है दैव देता है यह कायर कहते हैं दैवको पृथक् कर आत्मशक्तिसे पुरुषार्थकर यत्न करनेसेभी यदि सिद्धि न हो तो किसका क्या दोष है ॥ १४० ॥
तथाच-
औरभी-
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सिंहस्य सुप्तस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥ १४१ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (२६१)
काम उद्यमसेही सिद्ध होते हैं मनोरथोंसे नहीं। सोते हुए सिंहके मुखमें मृग प्रवेश नहीं करते हैं ॥ १४१ ॥
उद्यमेन विना राजन्न सिद्ध्यंति मनोरथाः।
कातरा इति जल्पन्ति यद्भाव्यं तद्भविष्यति ॥ १४२ ॥
हे राजन् ! उद्यमसेही मनोरथ सिद्ध होते हैं जो होनहार है सो होगा यह कायर कहा करते हैं ॥ १४२ ॥
स्वशक्त्या कुर्वतः कर्म न चेत्सिद्धिं प्रयच्छति ।
नोपालम्भ्यः पुमांस्तत्र दैवान्तरितपौरुषः ॥ १४३ ॥
जो कर्म अपनी शक्तिसे करनेपरभी सिद्ध नहो उसमे पुरुषका तिरस्कार नहीं होता कारण कि, वह पुरुषार्थ तो दैवसे हत होगया है ॥ १४३ ॥
तन्मया अवश्यं देशान्तरं गन्तव्यम्” । इति निश्चित्य वर्द्धमानपुरं गतः । तत्र च वर्षत्रयं स्थित्वा सुवर्णशतत्रयो-पार्जनं कृत्वा भूयः स्वगृहं प्रस्थितः । अथ अर्द्धपथे गच्छतः तस्य कदाचिदटव्यां पर्यटतो भगवान् रविरस्तमुपागतः । तदा असौ व्यालभयाद् स्थूलतरवटस्कन्धमारुह्य यावत् प्रसुप्तः तावन्निशीथे स्वप्ने द्वौ पुरुषौ रौद्राकारौ परस्परं प्रजल्पन्तौ अशृणोत् । तत्रैक आह,-“भोः कर्त्तः ! त्वं किं सम्यक् न वेत्सि ? यदस्य सोमिलकस्य भोजनाच्छादनाभ्य-धिका समृद्धिर्नास्ति । तत् किं त्वया अस्य सुवर्णशतत्रयं प्रदत्तम्” । स आह-“भोः कर्मन् ! मया अवश्यं दातव्यं व्य-वसायिनां तत्र च तस्य परिणतिः त्वदायत्ता इति ।”
सो अवश्यही मैं देशान्तरको जाऊंगा”। यह विचार वर्द्धमानपुरको गया । यहा तीन वर्ष रहकर तीनसौ अशरफी उत्पन्न कर फिर अपने घर आया, आधे मार्गमें आते हुए उसके एक समय वनमें चलते २ भगवान् भास्कर अस्त होगये । तब यह सर्पके भयसे स्थूलवटवृक्षके स्कन्धपर चढकर जबतक सोता है कि, तबतक अर्धरात्रिके समय स्वप्नमें दो पुरुष रौद्र आकारवाले परस्पर बात करते सुने गये । उनमें एक बोला,-“भो प्रभो ! क्या तू भली प्रकारसे नहीं
नता कि, इस जुलाहेके भाग्यमे भोजनाच्छादनसे अधिक धन नहीं है सो
( २६२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तैने कैसे इसको तीनसौ मुद्रा दीं।” वह बोला—“भो कर्मन् ! रोजगारियोंको मैं अवश्य देता हूं उसकी स्थिति तुम्हारे अधीन है”।
अथ यावदसौ कौलिकः प्रबुद्धः सुवर्णग्रन्थमवलोकयति, तावत् रिक्तं पश्यति । ततः साक्षेपं चिन्तयामास,—“अहो ! किमेतत् ! महता कष्टेन उपार्जितं वित्तं हेलया क्वापि गतम् । तद्व्यर्थश्रमोऽकिंचनः कथं स्वपत्न्या मित्राणां च मुखं दर्शयिष्यामि” । इति निश्चित्य तदेव पत्तनं गतः । तत्र च वर्षमात्रेणापि सुवर्णशतपंचकमुपार्ज्य भूयोऽपि स्वस्थानं प्रति प्रस्थितः । यावत् अर्द्धपथे भूयोऽटवीगतस्य भगवान् भानुरस्तं जगाम । अथ सुवर्णनाशभयात् सुश्रान्तोऽपि न विश्राम्यति केवलं कृतगृहोत्कण्ठः सत्वरं व्रजति । अत्रान्तरे द्वौ पुरुषौ तादृशौ दृष्टिदेशे समागच्छन्तौ जल्मन्तौ च शृणोति । तत्रैकः प्राह,—“भो कर्त्तः ! किं त्वया एतस्य सुवर्णशतपञ्चकं प्रदत्तम् । तत् किं न वेत्सि ? यद्भोजनाच्छादनाभ्यधिकमस्य किञ्चित् नास्ति” । स आह—“भोः कर्मन् ! मया अवश्यं देयं व्यवसाायिनाम् । तस्य परिणामः त्वदायत्तः । तत् किं मामुपालम्भयसि ?” तत श्रुत्वा सोभिलको यावद्ग्रन्थमवलोकयति तावत् सुवर्णं नास्ति । ततः परं दुःखमापन्नो व्यचिन्तयत् । “अहो ! किं मम धनरहितस्य जीवितेन । तदत्र वटवृक्षे आत्मानमुद्बध्य प्राणान् त्यजामि” । एवं निश्चित्य दर्भमयीं रज्जुं विधाय स्वकण्ठे पाशं नियोज्य शाखायामात्मानं निबध्य यावत् प्रक्षिपति तावदेकः पुमान् आकाशस्थ एव इदमाह,—“भो भोः सोमिलक ! मा एवं साहसं कुरु । अहं ते वित्तापहारको, न ते भोजनाच्छादनाभ्यधिकां वराटिकामपि सहामि । तद्गच्छ स्वगृहं प्रति । अन्यच्च भवदीयसाहसेन अहं तुष्टः । तथा मे न स्यात् व्यर्थ दर्शनम् । तत् प्रार्थ्यतामभीष्टो वरः कश्चित्” । सोमिलक आह—“यदि एवं तद्देहि मे प्रभूतं धनम्” । स आह—“भोः ! किं करिष्यसि
भाषाटीकासमेतम् । ( २६३ )
भोगरहितेन धनेन ? यतः तव भोजनाच्छादनाभ्यधिका प्राप्तिरपि नास्ति । उक्तञ्च-
सो जबतक यह कौलिक जागकर उस मोहरोंकी गांठको देखता है तबतक रीती देखकर खेदसे विचारने लगा । "अहो यह क्या है ? बड़े कष्टसे उपार्जन किया धन लीलासेही कहां गया । सो व्यर्थ श्रमवाला निर्धनी मैं किस प्रकारसे अपनी स्त्री और मित्रोको मुख दिखलाऊंगा" । ऐसा निश्चय कर उसी स्थानको गया । वहा तीन वर्षमें पाचसौ अशरफी उत्पन्न कर फिरभी आपने स्थानको चला । जब कि, जाते हुए अर्धमार्गमें सूर्य अस्त हुए तब सुवर्णके नाश होनेके भयसे थककर भी वह न सोया और केवल घरमे मन लगाये शीघ्रतासे चला । तब दो पुरुष सामनेसे आते वार्ता करते उसने सुने । उनमेंसे एक बोला—“भो प्रभो ! तुमने क्यो इसको पाचसौ सुवर्ण दिये । सो क्या तू नहीं जानता है कि, भोजनाच्छादनसे अधिक इसके भाग्यमे कुछ नहीं है ” । वह बोला—“भो कर्मन् ! उद्योगियोंको मैं अवश्य देताहू । उसका परिणाम तुम्हारे अधीनहै । सो क्यों मेरा तिरस्कार करते हो” । यह सुनकर सोमिलक जबतक गांठको देखता है तबतक सुवर्ण नहीं पाया, तब तो परम दुःखको प्राप्त होकर विचारने लगा, “अहो धनहीन मेरे जीवनसे क्या है ? सो इस वटवृक्षमें अपनेको बाधकर प्राणत्यागन करूं” । ऐसा विचार कुशकी रस्सी बनाय अपने कठमे पाश डाल शाखामे अपनेको बाध जबतक अपनेको छोड़ता है तबतक एक पुरुष आकाशमें स्थित हुआ यह बोला,-“भो भो सोमिलक ! इस प्रकारका साहस मत कर मैं तेरे धनका हरण करनेवाला । भोजनाच्छादनस अधिक एक कौडी भी तेरेपास नहीं रहने देता । सो अपने घरको जा,तुम्हारे साहससे मैं संतुष्ट हुआहूं । मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं होता सो कोई अभीष्ट वर माग,” सोमिलक बोला—“जो ऐसा है तो मुझको बहुत धन दो” । वह बोला,-“भोगरहित धनको लेकर क्या करेगा क्यों कि तुझको भोजनाच्छादनसे अधिक प्राप्ति नहीं है । कहा है-
किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला ।
या च वेश्येव सामान्या पथिकैरुपभुज्यते ॥ १४४ ॥
उस सम्पत्तिसे क्या है जो पुत्रवधूकी समान केवल अभोग्य है जो साधारण वेश्याकी समान पथिकोंसे भोगी जाती है वही अच्छी है ॥ १४४ ॥ ”
( २६४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
सोमिलक आह- “यद्यपि भोगो नास्ति तथापि तद्भवतु । उक्तञ्च-
सोमिलक बोला-“यद्यपि भोग नहीं है तथापि धन हो । कहा है-
कृपणोऽप्यकुलीनोऽपि सज्जनैर्वर्जितः सदा ।
सेव्यते स नरो लोके यस्य स्याद्वित्तसञ्चयः ॥ १४५ ॥
कृपण, अकुलीन, सज्जनोंसे सदा वर्जितभी धनी मनुष्यको लोकमें सब कोई सेवन करते हैं ॥ १४५ ॥
तथाच-
और देखो-
शिथिलौ च सुबद्धौ च पततः पततो न वा ।
निरीक्षितौ मया भद्रे ! दश वर्षाणि पञ्च च ॥ १४६ ॥
हे भद्रे ! मैंने पन्द्रहवर्षतक शिथिल दृढ पतित होते अपतित वृषण देखे हैं ॥ १४६ ॥
पुरुष आह-“किमेतत् ?” सोऽब्रवीत्-
पुरुष बोला,-“यह कैसी कथा ?” वह बोला-
कथा ६.
कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने तीक्ष्णविषाणो नाम महावृषभः प्रतिवसति स्म, स च मदातिरेकात् परित्यक्तनिजयूथः शृङ्गाभ्यां नदीतटानि विदारयन् स्वेच्छया मरकतसदृशानि शष्पाणि भक्षयन् अरण्यचरो बभूव । अथ तत्र एव वने प्रलोभको नाम शृगालः प्रतिवसति स्म । स कदाचित् स्वभार्य्यया सह नदीतीरे सुखोपविष्टः तिष्ठति । अत्रान्तरे स तीक्ष्णविषाणो जलार्थं तदेव पुलिनमवतीर्णः । ततश्च तस्य लम्बमानौ वृषणौ अवलोक्य शृगाल्या शृगालोऽभिहितः- “स्वामिन् ! पश्य अस्य वृषभस्य मांसपिण्डौ लम्बमानौ यथा स्थितौ । तदेतौ क्षणेन प्रहरेण वा पतिष्यतः । एवं ज्ञात्वा भवता पृष्ठमनुयायिना भाव्यम्” । शृगाल आह- “प्रिये ! न ज्ञायते कदा एतयोः पतनं भविष्यति वा न वा ।
भाषाटीकासमेतम् । ( २६५ )
तत् किं वृथा श्रमाय मां नियोजयसि । अत्रस्थः तावज्जला- र्थमागतान् मूषकान् भक्षयिष्यामि समं त्वया मार्गोऽयं यतः तेषाम् । अपरं यदि त्वां मुक्त्वा अस्य तीक्ष्णविषाणस्य वृष- भस्य पृष्ठे गमिष्यामि तदा आगत्य अन्यः कश्चिदेतत् स्थानं समाश्रयिष्यति । न एतत् युज्यते कर्तुम् । उक्तञ्च-
किसी एक स्थानमें तीक्ष्ण शृंगनामवाला बैल रहता था वह मदकी अधि- कतासे अपने यूथको त्यागने किये शृंगोंसे नदीतटको विदीर्ण करता हुआ अपनी इच्छासे मरकतमणीकी समान घास खाता वनचारी भया । उसी वनमें प्रलोभक नाम शृगाल रहता था । वह कभी अपनी भार्याके सहित नदीके किनारे सुखसे बैठाथा, इसी समय तीक्ष्णशृंग जलपानके निमित्त नदीके तटपर आया । तब उसके लम्बायमान अण्डकोष देखकर शृगालीने शृगालसे कहा,- "स्वामिन् ! इस वृषभके मासपिण्ड लम्बायमान होते हुए देखो । सो यह एकही क्षणसे अथवा प्रहारसे गिर जायगे । ऐसा विचार कर तुम इसके पीछे फिरो" । शृगाल बोला- "प्रिये ! नहीं जाना जाता कि, कब इन दोनोंका पतन होगा वा नहीं । सो क्यों वृथा श्रममें मुझको नियुक्त करती है । यहीं पर स्थित हुआ जलपानके निमित्त आये हुए मूपकोंको तेरे साथ भक्षण करूंगा कारण कि, यह उनका मार्ग है । और यदि तुझको छोड़कर इस तीक्ष्णशृंगवाले वृषके पीछे जाऊंगा तो, आनकर और कोई इस स्थानको ग्रहण कर लेगा, सो यह करना उचित नहीं । कहा है-
यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव च ॥ १४७ ॥”
जो विद्यमानको छोड़कर अविद्यमानका सेवन करता है उसके ध्रुव कार्य नष्ट होते हैं और अध्रुव नष्ट हैं हीं ॥ १४७ ॥”
शृगाली आह-“भोः कापुरुषस्त्वं यत्किञ्चित् प्राप्तं तेनापि सन्तोषं करोषि । उक्तञ्च-
शृगाली बोली,-“भो ! कापुरुष (डरपोक) तू जो कुछ प्राप्त हुआ है उसीसे सन्तोष करता है । कहा है-
( २६६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
सुपूरा स्यात्कुनदिका सुपूरो मूषिकाञ्जलिः । सुसन्तुष्टः कापुरुषः स्वल्पकेनापि तुष्यति ॥ १४८ ॥
कुनदी जल्दी पूरी होजाती है, मूषिककी अंजली शीघ्र भर जाती है, कापुरुष शीघ्र थोड़ेहीसे सन्तुष्ट हो जाते हैं ॥ १४८ ॥
तस्मात् पुरुषेण सदा एव उत्साहवता भाव्यम् । उक्तञ्च- इस कारण पुरुषको सदा उत्साहसे रहना चाहिये । कहा है-
यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता । नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम् ॥ १४९ ॥
जहां उत्साहसे आरम्भ होता है, जहां आलस्य हीनता होती है, जहां नीति और विक्रमका संयोग है वहां अचल लक्ष्मी रहती है ॥ १४९ ॥
तद्दैवमिति सञ्चिन्त्य त्यजेन्नोद्योगमात्मनः । अनुद्योगं विना तैलं तिलानां नोपजायते ॥ १५० ॥
योंही होगा ऐसा विचार कर अपना उद्योग त्यागना नहीं चाहिये अनुद्योगके विना तिलोंमेंसे तेलभी नहीं निकलता है ॥ १५० ॥
अन्यच्च- औरभी-
यःस्तोकेनापि सन्तोषं कुरुते मन्दधीर्जनः । तस्य भाग्यविहीनस्य दत्ता श्रीरपि मार्ज्यते ॥ १५१ ॥
जो मन्दबुद्धि पुरुष थोड़ेमेंही सन्तोष करता है उस भाग्यहीनकी दूसरोंकी दी हुई लक्ष्मीभी नष्ट हो जाती है ॥ १५१ ॥
यच्च त्वं वदसि, एतौ पतिष्यतो न वेति, तदपि अयुक्तम् । उक्तञ्च- और जो तुम कहते हो कि, यह गिरेंगे या नहीं सोभी अयुक्त है । कहाहै-
कृतनिश्चयिनो वन्द्यास्तुङ्गिमा न प्रशस्यते । चातकः को वराकोऽयं यस्येन्द्रो वारिवाहकः ॥ १५२ ॥
कारण, कि कार्यसिद्धिमें उत्साहवाले पूजनीय हैं हमारी उच्चाभिलाषा प्रशंसाको प्राप्त होती है यह चातक दीन क्या वस्तु है जिसके उत्साहसे देवराज जल देता है (उस क्षुद्रके निश्चयको जानकर देवराजभी उसके मनोरथको पूर्ण करता है) ॥ १५२ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (२६७)
अपरं मूषकमांसस्य निर्विण्णा अहम्, एतौ च मांसपिण्डौ पतनप्रायौ दृश्येते, तत्सर्वथा नान्यथा कर्त्तव्यम्" इति। अथ असौ तदाकर्ण्य मूषकप्राप्तिस्थानं परित्यज्य तीक्ष्णविषाणस्य पृष्ठमन्वगच्छत् । अथवा साधु इदमुच्यते-
औरभी मूषकमांस खाते २ मेरा जी उकता गया है और यह मांसपिण्ड-प्रायः गिरजायेंगे ऐसा विदित होता है । सो सब प्रकारसे अन्यथा करना उचित नहीं" । तब यह ऐसे वचन श्रवण कर मूषकप्राप्ति स्थानको त्यागन कर तीक्ष्णविषाणके पीछे पीछे गया । अथवा यह अच्छा कहा है-
तावत्स्यात्सर्वकृत्येषु पुरुषोऽत्र स्वयं प्रभुः ।
स्त्रीवाक्याङ्कुशविक्षुण्णो यावन्नोद्ध्रियते बलात् ॥ १५३ ॥
तभीतक यह पुरुष सम्पूर्ण कार्योंमें स्वाधीन होता है जबतक बलपूर्वक स्त्रीके वाक्यरूपी अंकुशसे ताड़ित नहीं होता ॥ १५३ ॥
अकृत्यं मन्यते कृत्यमगम्यं मन्यते सुगम् ।
अभक्ष्यं मन्यते भक्ष्यं स्त्रीवाक्यप्रेरितो नरः ॥ १५४ ॥"
स्त्रीके वाक्यसे प्रेरित हुआ मनुष्य अकार्य्यको कार्य, अगम्य (दुर्गम) को सुगम और अभक्ष्यको भक्ष्य मानता है ॥ १५४ ॥"
एवं स तस्य पृष्ठतः सभार्य्यः परिभ्रमन् चिरकालमनयत् । न च तयोः पतनमभूत् । ततश्च निर्वेदात् पञ्चदशे वर्षे शृगालः स्वभार्यामाह,-
इस प्रकार वह उसके पीछे स्त्रीसहित परिभ्रमण करता २ बहुत समय बिताता हुआ परन्तु अण्डकोशोंका पतन न हुआ तब वैराग्यसे पन्द्रहवें वर्ष अपनी भार्यासे बोला,-
"शिथिलौ च सुबद्धौ च पततः पततो न वा ।
निरीक्षितौ मया भद्रे दश वर्षाणि पञ्च च ॥ १५५ ॥
"शिथिल हैं सुदृढ हैं गिरेंगे वा नहीं भद्रे १५ वर्षतक मैं बराबर देखता रहा ॥ १५५ ॥
त्तयोः तत्पश्चादपि पातो न भविष्यति । तद् तदेव स्वस्थानं गच्छावः । अतोऽहं ब्रवीमि-
( २६८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
इन दोनोंका इसके पीछे भी पात न होगा । सो आओ अपने स्थानकौं चलें । इससे मैं कहता हूं-
शिथिलौ च सुबद्धौ च पततः पततो न वा ।
निरीक्षितौ मया भद्रे दश वर्षाणि पञ्च च ॥ १५६ ॥”
शिथिल और सुदृढ हैं गिरेंगे वा नहीं हे भद्रे ! यह मैंने बराबर पन्द्रह वर्ष-तक देखे ॥ १५६ ॥”
पुरुष आह-“यदि एवं तद्गच्छ भूयोऽपि वर्द्धमानपुरम् । तत्र द्वौ वणिक्पुत्रौ वसतः, एको गुप्तधनः, द्वितीय उपभुक्तधनः । ततः तयोः स्वरूपं बुद्ध्वा एकस्य वरः प्रार्थनीयः । यदि ते धनेन प्रयोजनम् अभक्षितेन ततः त्वामपि गुप्तधनं करोमि । अथवा दत्तभोग्येन धनेन ते प्रयोजनं तदुपभुक्तधनं करोमि” इति । एवमुक्त्वा अदर्शनं गतः । सोमिलकोऽपि विस्मितमना भूयोऽपि वर्द्धमानपुरं गतः । अथ सन्ध्यासमये श्रान्तः कथमपि तत्पुरं प्राप्तो गुप्तधनगृहं पृच्छन्कृच्छ्रात् लब्ध्वा अस्तमितसूर्ये प्रविष्टः । अथ असौ भार्य्यापुत्रसमेतेन गुप्तधनेन निर्भर्त्स्यमानो हठाद्गृहं प्रविश्य उपविष्टः । ततश्च भोजनवेलायां तस्यापि भक्तिवर्जितं किञ्चिदशनं दत्तम् । ततश्च भुक्त्वा तत्र एव यावत् सुप्तो निशीथे पश्यति तावत् तौ अपि द्वौ पुरुषौ परस्परं मन्त्रयतः । तत्र एक आह-“भोः कर्त्तः ! किं त्वया अस्य गुप्तधनस्य अन्योऽधिको व्ययो निर्मित्तो यत् सोमिलकस्य अनेन भोजनं दत्तम् । तदयुक्तं त्वया कृतम्” । स आह-“भोः कर्म्मन् ! न मम अत्र दोषः मया पुरुषस्य लाभप्राप्तिर्दातव्या । तत्परिणतिः पुनः त्वदायत्ता” इति । अथ असौ यावदुत्तिष्ठति तावत् गुप्तधनो विसूचिकया खिद्यमानो रुजाभिभूतः क्षणं तिष्ठति । ततो द्वितीयेऽह्नि तद्दोषेण कृतोपवासः सञ्जातः । सोमिलकोऽपि प्रभाते तद्गृहात् निष्क्रम्य उपभुक्तधनगृहं गतः । तेनापि च अभ्युत्थानादिना
भाषाटीकासमेतम्। (२६९)
सत्कृतो विहितभोजनाच्छादनसंमानः तस्य एव गृहे भव्यशय्यामारुह्य सुष्वप। ततश्च निशीथे यावत्पश्यति तावत् तौ एव द्वौ पुरुषौ मिथो मन्त्रयतः। अथ तयोः एक आह— “भोः कर्त्तः ! अनेन सोमिलकस्य उपकारं कुर्वता प्रभूतो व्ययः कृतः, तत् कथय कथमस्य उद्धारकविधिः भविष्यति। अनेन सर्वमेतद्व्यवहारकगृहात् समानीतम्”। स आह— “भोः कर्म्मन् मम कृत्यमेतत्। परिणतिः त्वदायत्ता” इति। अथ प्रभातसमये राजपुरुषो राजप्रसादजं वित्तम् आदाय समायात उपभुक्तधनाय समर्पयामास। तद् दृष्ट्वा सोमिलकः चिन्तयामास। “सञ्चयरहितोऽपिवरमेष उपभुक्तधनो न असौ गुप्तधनः। उक्तञ्च—
पुरुष बोला—"जो ऐसा है तो फिर वर्द्धमान पुरको जा वहा दो वणिक्पुत्र रहते हैं एक गुप्तधन दूसरा उपभुक्तधन (धनका भोगनेवाला) है उन दोनोंका आशय देखकर पीछे वर मांगना, और जो केवल तेरा भी गुप्तधन (धनरक्षा) से प्रयोजन होगा तो तुझे भी गुप्तधन करदूगा। अथवा दत्तभोग्य धनसे तेरा प्रयोजन होगा तो वैसा करदूगा”। यह कहकर वह अन्तर्हित हुआ। सोमिलक आश्चर्ययुक्त होकर फिर वर्द्धमानपुरको गया, सन्ध्या समय थका हुआ किसी प्रकार उस पुरमें प्राप्त हो गुप्तधनके घरको पूछता हुआ कठिनतासे प्राप्त होकर सूर्यास्तमें प्रविष्ट हुआ तब यह भार्या पुत्रके सहित हुए गुप्तधनसे घुडकाया हुआ भी हठसे उसके घरमें प्रवेश कर बैठगया, तब भोजनके समय उसको भी भक्तिसे हीन कुछ भोजन दिया, तब यह भोजन कर जबतक सो कर आधी रातमे देखता है कि, वही दोनों पुरुष परस्पर मन्त्रणा करते हैं। तब एक बोला— “भो प्रभो क्यों तुमने इस गुप्तधनका अधिक व्यय किया, जो सोमिलकको इसने भोजन दिया, सो यह तुमने अयुक्त किया”। वह बोला— “भो कर्मन् इसमें मेरा दोष नहीं मुझे तो पुरुषको लाभ प्राप्ति देनी है। उसका परिणाम तुम्हारे आधीन है”। सो यह जबतक उठता है तबतक गुप्तधन विषूचिका (उवान्त) रोगसे खेदको प्राप्त हुआ रुग्णहो क्षणमात्रको स्थित हुआ। सो दूसरे दिन उस दोषसे उसने लघन किया। सोमिलक भी प्रभात
( २७० ) पञ्चतन्त्रम् ।
समय उसके घरसे निकल उपभुक्तधनके घरको गया । उसने अभ्युत्थानादिसे सत्कार कर भोजनाच्छादनका सम्मान करा और उसीके घरमें मनोहर सेजपर सोगया । सो रात्रिमें जबतक देखता है तबतक दोनों पुरुष सम्मति करते हैं उन दोनोंमें एक बोला,-"भो ! स्वामिन् ! उसने सोमिलकका उपकार करके बहुत व्यय किया । सो कहो कैसे इसका उद्धार होगा इसने यह सब व्योपारीके घरसे प्राप्त किया है"। वह बोला-"भो ! कर्म्मन् ! यह सब मेरा कृत्य है । परिणाम आपके आधीनहै"। तब प्रभात समय राजपुरुष राजाकी प्रसन्नता ( इनाम ) के धनको लेकर उपभुक्तधनको समर्पण करते भये । यह देखकर वह सोमिलक विचारने लगा-“संचयसे रहित यह उपभुक्तधन अच्छा है न कि यह गुप्तधन । कहा है-
अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवित्तफलं श्रुतम् ।
रतिपुत्रफला दारा दत्तभुक्तफलं धनम् ॥ १५७ ॥
वेद यज्ञानुष्ठानके फलवाले हैं, शास्त्रपढना देखनेका फल शील धन सुना है, स्त्रियें रति पुत्रफलके निमित्त हैं, धनका दान और भोगही फल है ॥ १५७ ॥
तद्विधाता मां दत्तभुक्तधनं करोतु, न कार्य्यं मे गुप्तधनेन" । ततः सोमिलको दत्तभुक्तधनः सञ्जातः । अतोऽहं ब्रवीमि- ।
सो विधाता 'मुझको दत्तभुक्त धन करे । गुप्तधनसे मेरा कुछ कार्य नहीं है" । तब सोमिलक दत्तभुक्तधन होगया । इससे मै कहता हूं-
“अर्थस्योपार्जनं कृत्वा नैव भोगं समश्नुते ।
अरण्यं महदासाद्य मूढः सोमिलको यथा ॥ १५८ ॥”
“अर्थ उत्पन्न करके भी उसको भोग नहीं सकता जैसे बडे बनमे प्राप्त होकर मूढ सोमलिक न भोगसका ॥ १५८ ॥”
तद्भद्र हिरण्यक ! एवं ज्ञात्वा धनविषये सन्तापो न कार्य्यः । अथ विद्यमानमपि धनं भोज्यबन्ध्यतया तत् अविद्यमानं मन्तव्यम् । उक्तञ्च-
सो हे भद्र ! हिरण्यक ! ऐसा जानकर धनके विषयमें सन्ताप मतकरो । सो विद्यमान भी धन भोगनेकी अशक्यतासे उसको नहीं की बराबर मानना चाहिये । कहा है-