फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
४४० फलदीपिका
२२. यदि दसवें घर का मालिक दसवें; नवें घर का मालिक नवें, हो तो भी वही फल जो ऊपर २० में दिया गया है । २३. यदि दसवें और पाँचवें घर के मालिक दोनों, एक-एक या एक साथ दसवें या पाँचवें घर में बैठे हों तो राज योग और यश होता है । २४. यदि नवें और दसवें घर के मालिक सातवें और पहले घर में बैठे हों तो राज योग और यश प्राप्त करता है । २५. यदि पाँचवें, सातवें और दसवें के मालिक केन्द्र और कोण में हों तो जातक को राज योग और यश प्राप्त होता है। महादशा-फल तरंग अब महादशा सम्बन्धी कुछ योग बताये जाते हैं । १. शुक्र की महादशा में शनि का अन्तर या शनि की महादशा में शुक्र का अन्तर हो तो जातक योगहीन हो जाता है अर्थात् यह अन्तर्दशा कष्टकारक होती है। २. जिन व्यक्तियों का धनु या मीन लग्न में जन्म हो उनकी शनि की दशा में शुक्र की अन्तर्दशा में शनि उत्तम फल करता है और शुक्र की महादशा में शनि अच्छा फल देता है । ३. यदि आठवें घर का मालिक छठे, आठवें या बारहवें घर में बैठा हो और उसकी महादशा हो तो छठे आठवें या बारहवें घर के मालिक की अन्तर्दशा में मारक फल होगा । ४. यदि तीसरे तथा दसवें घर के मालिकों का सम्बन्ध हो तो दसवें घर के मालिक की दशा में योग नहीं होता बल्कि अवयोग होता है । किन्तु तीसरे घर के मालिक की दशा में उत्तम योग होता है । ५. यदि (i) कोई ग्रह लग्न या सातवें घर में हो या (ii) नवें घर का मालिक सातवें घर में हो तो ऐसे ग्रह की दशा में जातक अपने पुरुषार्थ से धन कमाता है ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४१ ६. यदि राहु की महादशा हो तो उसमें राहु केतु-शनि या सूर्य की अन्तर्दशा में पिता की मृत्यु हो सकती है । ७. यदि केतु की दशा हो तो उसमें मंगल, शनि, सूर्य या राहु की अन्तर्दशा जातक के पिता की मृत्यु कर सकती है । ८. यदि मंगल की दशा हो तो उसमें राहु, केतु या शनि की अन्तर्दशा में जातक के पिता का मरण हो सकता है । ९. यदि शनि की महादशा हो तो उसमें राहु, केतु, सूर्य या मंगल की अन्तर्दशा में पिता का मरण हो सकता है । १०. मंगल की महादशा का अन्त हो और राहु प्रारम्भ होने वाला हो तो पिता की मृत्यु हो सकती है । ११. यदि क्रूर ग्रह की महादशा हो और उसमें राहु की अन्तर्दशा हो तो पिता की मृत्यु हो सकती है । १२. यदि बृहस्पति और शुक्र वृश्चिक में हों और शुक्र की दशा आवे तो शुक्र दशा राजयोग कारक होती हैं, इसमें संशय नहीं है । १३. यदि सूर्य और बुध एक साथ हों या कन्या का सूर्य, सिंह का बुध हो तो बुध की दशा प्रबल होती है; सूर्य की दशा मध्यम होती है । १४. यदि चन्द्रमा और मंगल का सम्बन्ध हो तो चन्द्र की दशा बहुत योग देने वाली होती है, मंगल की दशा मध्यम होती है । १५. यदि बृहस्पति और शनि का सम्बन्ध हो तो शनि की दशा विशेष योग प्रदान करने वाली होती है; बृहस्पति की महादशा मध्यम होती है । १६. यदि मंगल और बृहस्पति का सम्बन्ध हो तो मंगल की दशा उत्तम होती है, बृहस्पति की दशा मध्यम होती है । १७. यदि चन्द्रमा और बृहस्पति का सम्बन्ध हो तो चन्द्र दशा विशेष योग प्रदान करने वाली होती है, बृहस्पति की दशा मध्यम होती है ।
४४२ फलदीपिका १८. यदि राहु केन्द्र या कोण में हो तो स्वतंत्र राजयोग है । जातक को बहुत यश प्राप्त होता है । १९. यदि बुध, बृहस्पति और शुक्र का सम्बन्ध हो तो यह विशेष धन योग है, जातक भाग्यवान् और यशस्वी होता है । २०. यदि शुक्र का बुध या बृहस्पति से सम्बन्ध हो, शुक्र की दशा में धन योग होता है । बृहस्पति की दशा में जातक धन हीन होता है और बुध की दशा मिला जुला फल देती है अर्थात् कभी धनागम कभी धन की हानि । २१. यदि सूर्य किसी ग्रह के साथ हो तो सूर्य की दशा में धनागम, अन्य ग्रह मध्यम फल देता है । २२. यदि राहु का अन्य ग्रहों से सम्बन्ध हो तो जो ग्रह सबसे प्रबल होगा राहु उसका फल देगा । २३. यदि राहु, सूर्य और शनि एक साथ तृतीय में हों तो राहु की दशा, अन्तर्दशा पराक्रम और भाग्योदय करती है । २४. यदि बुध तृतीय में हो तो राहु की दशा में जातक धैर्य हीन (कातर, या डरपोक) हो जाता है । ग्रह सामान्य योग तरंग १. यदि किसी भाव का स्वामी-उस भाव के कारक से संयुक्त हो तो उस भाव की प्रबलता होती है अर्थात् वह भाव पुष्ट होता है। किस भाव का कौन सा कारक होता है यह फलदीपिका के अध्याय १५ श्लोक १७ में बताया गया है। उदाहरण के लिये पंचम कारक बृहस्पति है और सप्तम कारक शुक्र है। यदि पंचमेश बृहस्पति के साथ हो या सप्तमेश शुक्र के साथ हो तो पंचम भाव या सप्तम भाव पुष्ट होगा ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४३ २. तृतीय, अष्टम या ग्यारहवें घर का स्वामी होना. दोषयुक्त होता है । पंचम या नवम का स्वामी होना शुभ होता है । ३. तीसरे, छठे या आठवें का मालिक होने से बृहस्पति दोष- युक्त हो जाता है लेकिन आठवें घर का मालिक होने पर भी यह योग देने वाला होता है । ४. यदि शुक्र छठे स्थान में हो तो योग देने वाला होता दे । १२वें घर में भी शुक्र का यही फल है । ५. राहु यदि चतुर्थ, पंचम, दशम या एकादश में हो तो योग देता है ऐसा उत्तम ज्योतिषियों ने कहा है । ६. यदि सौम्य ग्रह केन्द्र के स्वामी हों तो योग नहीं देते । केन्द्र में स्थित केन्द्रनाथ यदि क्रूर हों तो राजयोग देते हैं । ७. जिस भाव में शनि स्थित हो या जिस भाव को शनि देखता हो उस भाव की न्यूनता होती है । किन्तु शनि तृतीय या नवम को देखे तो उस भाव की (जिस को देखता हो) प्रबलता होती है । ८. यदि क्षीण चन्द्रमा लग्न में हो तो जातक मन्द बुद्धि होता है और अन्य लोगों से पोषित होता है । यदि पूर्ण चन्द्र लग्न में हो तो जातक गुणवान्, भाग्यवान् होता है। ९. यदि चन्द्रमा और मंगल लग्न में हों या चन्द्रमा और मंगल अष्टम में हों तो जातक भाग्यवान् होता है । १०. मंगल यदि चतुर्थेश के साथ हो तो निश्चय स्थावर सम्पत्ति (खेत, मकान) का मालिक होता है । ११. यदि चौथे घर के स्वामी के साथ वृहस्पति चौथे घर में हो तो वह गाय आदि चौपायों का मालिक होता है ।
४४४ फलदीपिका १२. जो भाव, भावेश या कारक पाप ग्रहों के मध्य में हो वह भाव, भावेश या कारक दुःखदायक होता है । १३. यदि ग्यारहवें और बारहवें भावों के स्वामियों का सम्बन्ध हो तो योग प्रद होता है । १४. ग्यारहवें घर का स्वामी यदि तीसरे घर या बारहवें घर में हो तो योग प्रद होता है । १५. कोई भी लग्न हो, यदि भाग्येश (नवें घर का मालिक) आठवें घर में हो तो योग प्राप्त नहीं होता, जातक सामान्य स्थिति में रहता है । १६. यदि चन्द्रमा छठे हो तो जातक की बुद्धि कुशल होती है । यदि द्वितीय में हो तो उसके नेत्र चंचल हों । ग्रह मालिका योग १. यदि नौ ग्रह लग्न से नवम भाव तक, प्रत्येक भाव में एक ग्रह हो तो मालिका योग होता है । २. यदि लग्न से छठे स्थान तक सब ग्रह हों तो “षष्टखेट मालिका” योग होता है । ३. यदि लग्न से सातवें घर तक—सातों भावों में सब ग्रह प्रत्येक भाव में कोई ग्रह होना चाहिये—तो मालिका योग होता है । ४. यदि सब ग्रह लग्न से अष्टम भाव तक (प्रत्येक भाव में ग्रह होना चाहिये) हों तो हो “अष्ट खेचर माला योग” होता है । ५. बहुत से जपोतिषियों की राय है कि सूय राशि से प्रारंभ- मालिका योग उत्तम योग है ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४५ कर मालिका योग होता है; अन्य ज्योतिषियों के विचार से लग्न से ही प्रारंभ करने से मालिका योग होता है। ६. यदि लग्न से ६, ७, ८ ओर ९ में सब ग्रह हों तो भाग्यप्रद योग होता है। ७. यदि लग्न से ५वें घर तक सब भावों में ग्रह हों और सब ग्रह इन पाँचों भावों में आ जावें तो भी भाग्य योग होता है। दो स्थानों के अधिपतियों के फल में क्रम १. जो ग्रह समराशि में होते हैं--वे पहले अपनी मूल त्रिकोण राशि का फल देते हैं--फिर अपनी दूसरी राशि का। उदाहरण के लिये शनि यदि समराशि, वृषभ, कर्क कन्या, वृश्चिक या मीन में हो तो अपनी दशा, अन्तर्दशा के पूर्वार्द्ध में अपनी मूल त्रिकोण राशि अर्थात् कुंभ का फल देगा और अपना उत्तरार्द्ध (दशा, अन्तर्दशा के काल को यदि दो हिस्सों में बाँटा जावे--तो बाद के आधे काल में) अपनी दूसरी राशि का-अर्थात् मकर का फल देगा। उदाहरण के लिये किसी जातक का मिथुन लग्न है-शनि आठवें तथा नवें का मालिक हुआ। आठवें घर में मकर राशि है। नवें घर में कुंभ राशि है तो मान लीजिये शनि कन्या राशि में है। अगले पृष्ठ पर देखिये सेठ रामकृष्ण जी डालमिया की जन्म कुण्डली। जन्म ता० ७ अप्रैल सन् १८९३। कन्या राशि का शनि सम राशि में है। इसलिये शनि अपनी मूल त्रिकोण राशि कुंभ के स्वामित्व का फल पहिले आधे काल में करेगा और मकर के स्वामित्व का फल बाद के आधे काल में ।
४४६ फलदीपिका यदि ग्रह ओज (ऊनी राशि में हो। तो मूल त्रिकोण राशि [कुंडली: लग्न ३; द्वितीय ४; तृतीय ५; चतुर्थ ६ श; पंचम ७ कें; षष्ठ ८; सप्तम ९ चं ०; अष्टम १०; नवम ११; दशम १२ बु. सू. शु.; एकादश १ बृ.; द्वादश २ मं ०] के स्वामित्व का फल उत्तरार्द्ध में करेगा और अपनी अन्य राशि के स्वामित्व का फल पूर्वार्द्ध में। उदा हरण के लिये बृहस्पति मेष में है। मेष ओज (या ऊनी राशि है) इस कारण अपनी मूल त्रिकोण राशि धनुष के स्वामित्व का प्रभाव उत्तरार्द्ध में दिखलावेगा और अपनी स्वराशि मीन का प्रभाव पूर्वार्द्ध में। वैसे तो मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि-इन पाँचों की दो-दो राशि स्वराशि होती है किन्तु समझाने के लिये--एक को मूल त्रिकोण राशि दूसरी को स्व राशि इन शब्दों में समझाया। मारक तरंग १. व्ययेश की दशा में धनेश मारक होता है। द्वितीयेश की दशा में व्ययेश मारक हो सकता है। २. व्ययेश की दशाकाल के द्वितीयेश के साथ रहने वाले अथवा द्वितीयेश से दृष्ट ग्रह मारक हो सकते हैं। ३. द्वितीयेश की दशा में, व्यय में बैठे हुए और व्ययेश से दृष्ट ग्रह मारक हो सकते हैं। ४. व्ययेश की दशा में, व्यय में बैठे हुए पाप ग्रह अपनी अन्तर्दशा में मारक हो सकते हैं। ५. द्वितीय स्थान में पापग्रह हों और व्ययेश के साथ हों तो व्ययेश की दशा में, यह पाप ग्रह मारक हो सकते हैं। ६. व्यय में पापी ग्रह हो तो उसकी दशा में द्वितीयेश से सम्बन्धित पाप ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४७ ७. अष्टमेश की दशा में स्वयं उसकी अन्तर्दशा मारक हो सकती है। ८. अष्टमेश की दशा में—षष्ठ स्थान स्थित पापी की दशा मारक हो सकती है। ९. षष्ठेश की महादशा में, अष्टम में स्थित ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। १०. अष्टमेश की दशा में, अष्टमेश से दृष्ट ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। ११. अष्टमेश की दशा में षष्ठेश के साथ बैठे हुए ग्रह की दशा मारक हो सकती है। १२. अष्टम स्थान में पाप ग्रह हो तो उसकी दशा में षष्ठेश की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। १३. षष्ठेश की महादशा में अष्टमेश की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। १४. षष्ठ स्थान में पाप ग्रह हो तो उसकी दशा में अष्टम स्थान स्थित ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। १५. षष्ठेश की दशा में—अष्टमेश की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। १६. अष्टम में पाप ग्रह हो तो उसकी दशा में—षष्ठ स्थान स्थित पाप ग्रह की अन्तर्दशा मारक हो सकती है। यह जो षष्ठेश, अष्टमेश या व्ययेश या षष्ठ, अष्टम द्वादश स्थित ग्रहों के मारकेश होने के नियम बतलाये हैं उन्हें निम्नलिखित रूप से अच्छी तरह समझा जा सकता है। उपर्युक्त योगों का निष्कर्ष यह निकला कि मारक ग्रह की दशा, अन्तर्दशा, निश्चित करने के लिये नियमों का सार यह है :— (i) अष्टमेश की महादशा में :— (क) अष्टमेश की अन्तर्दशा (ख) षष्ठ स्थान स्थित
४४८ फलदीपिका पापी ग्रहों की अत्तर्दशा (ग) षष्ठेश से युक्त ग्रह की अन्तर्दशा (घ) अष्टमेश से वीक्षित ग्रह की अन्तर्दशा । (ii) अष्टम स्थान स्थित यदि पापी ग्रह हो तो उसकी महा- दशा में :— (क) षष्ठेश की अन्तर्दशा (ख) षष्ठ स्थान स्थित पापी की अन्तर्दशा । (iii) षष्ठेश की महादशा में :— (क) अष्टमेश की अन्तर्दशा (ख) अष्टम स्थान स्थित ग्रह की अन्तर्दशा । (iv) षष्ठ स्थान स्थित पाप ग्रह की दशा में :-- (क) अष्टमेश की अन्तर्दशा । अष्टमेश अष्टम में हो तो भी उसकी अन्तर्दशा । (v) व्ययेश की महादशा में :— (क) धनेश की अन्तर्दशा (ख) द्वितीयेश के साथ बैठे हुए ग्रह की अन्तर्दशा (ग) द्वितीयेश से दृष्ट ग्रह की अन्तर्दशा (घ) व्यय में बैठे हुए पाप ग्रह की अन्तर्दशा (ङ) व्ययेश के साथ द्वितीय में बैठे हुए पाप ग्रह की अन्तर्दशा । (vi) व्यय में पापी ग्रह हो तो उसकी महादशा :-- (क) द्वितीयेश से सम्बन्धित पाप ग्रह की अन्तर्दशा । (vii) द्वितीयेश की महादशा में :-- (क) व्ययेश की अन्तर्दशा (ख) व्यय में बैठे हुए और व्ययेश से दृष्ट ग्रह की अन्तर्दशा । मारक निर्णय करने के लिये मारक तरंग में अन्य योग निम्न- लिखित हैं :— १७. यदि बुध और शुक्र दोनों एक साथ पंचम में हों तो एक
बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४९ दूसरे की महादशा, अन्तर्दशा में मारक हो सकते हैं। बुध में शुक्र, शुक्र में बुध। आधिपत्य का विचार भी कर लेना चाहिये। १८. यदि मंगल मारक स्थान या अनिष्ट का स्वामी हो (मूल श्लोक में लिखा है कि यदि मंगल को क्रूराधिपत्य हो) तो मंगल की दशा मारक होती है। १९. चाहे शनि अच्छे घरों का मालिक हो यदि मारक ग्रह के साथ हो तो प्रबल मारक होता है। २०. यदि अष्टमेश लग्न में हो तो अपनी महादशा में मारक होता है। २१. यदि किसी व्यक्ति के दो या तीन पुत्रों को राहु की महा- दशा जा रही हो तो जातक का निधन होता है। उपर्युक्त महादशा तथा अन्तर्दशा के साथ-साथ दीर्घायु, मध्यायु, अल्पायु योगों के आधार पर मृत्यु की संभावना का भी विचार कर लेना चाहिये। अन्यथा षष्ठ, अष्टम, व्यय स्थित किंवा इन भावों के स्वामियों की दशा, अन्तर्दशा आती जाती ही रहती है। मृत्यु नहीं होती। धन आदि की कमी कर देती है। या शत्रु रोग आदि से पीड़ा होती है। ग्रंथकार श्री रामानुज का कहने का अभिप्राय यह है कि छठा, आठवां, बारहवां दुःस्थान है। इनके स्वामी और इन भावों में बैठे पापी ग्रह कष्ट कारक होते हैं। जातक चन्द्रिका के मत से निम्नलिखित ग्रह मारक होते हैं :— (i) दूसरे घर का मालिक। (ii) दूसरे घर में बैठे हुए पाप ग्रह। (iii) सातवें घर का मालिक। (iv) सातवें घर में बैठे हुए पाप ग्रह। (v) दूसरे घर के मालिक से युत पाप ग्रह। (vi) सातवें घर के मालिक से युत पाप ग्रह।
४५० फलदीपिका (vii) अष्टमेश । (viii) तृतीय या अष्टम का मालिक यदि द्वितीय या सप्तम के मालिक के साथ हो । (ix) मारक ग्रह के साथ बैठा हुआ शनि । (x) षष्ठेश । (xi) जो ग्रह जन्म कुंडली में सबसे निर्मल हो । द्वितीय मुख का स्थान है । सप्तम गुप्तेन्द्रिय का स्थान है । प्रसिद्ध है कि आहार (मुख) और विहार (स्त्री संग) जितना नियमित होगा, उतनी आयु अच्छी होगी। जितना मनुष्य अपने द्वितीय और सप्तम स्थान को बिगाड़ेगा, उतना ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार कर अपनी आयु को नष्ट करेगा। पृष्ठ ४२३ से पृष्ठ ४५० तक भावार्था रत्नाकर में दिये गये फलित ज्योतिष सम्बन्धी २२५ नियम बतलाये गये हैं । जिससे पाठकों को लाभ हो ।
इक्कीसवां अध्याय प्रत्यन्तर्दशाफल अपहारविभागलक्षणं तत्पंक्ति क्रमशः स्फुटं प्रवच्मि । यदुदीरितमत्र तत्समस्तं कथयेत्स्वदशान्तरान्तरादौ ॥१॥ पाकेशाब्दहता दशेश्वरसमा नेत्राङ्कभक्ताः समाः शिष्टा रूपहता नराङ्कविहृता मासा नगैर्वासराः । छिद्रादिष्वपि चैवमेव कलयेत्पाकक्रमाच्चेद्वशा- नाथाद्या पुनरन्तरान्तरदशास्तत्पाकनाथक्रमाः ॥२॥ अब इस अध्याय में अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर्दशा लगाना बताते हैं। एक महादशा में नवों ग्रहों की अन्तर्दशा होती है। जैसे सूर्य की महादशा छः वर्ष की है तो इस छः वर्ष में सूर्यादि नौ ग्रहों की अन्तर्दशा आवेंगी। जिस ग्रह की महादशा होती है सबसे पहले उसी की अन्तर्दशा भी होती है। उदाहरण के लिये बृहस्पति की महादशा में अन्तर्दशा का क्रम निम्नलिखित होगा : बृ०, श० बु० के० शु०, आ० चं० भौ० रा० । शुक्र की महादशा में अन्तर्दशा का क्रम होगा— शु० आ० चं० भौ० रा० बृ० श० बु० के० । जिस प्रकार एक महादशा में नौ अन्तर्दशा होती हैं उसी प्रकार किसी एक अन्तर्दशा में नौ प्रत्यन्तर्दशा होती हैं। जिस ग्रह की अन्त- दशा होती है उसी की प्रत्यन्तर्दशा सबसे पहले आती है। ग्रहों का जो फल पिछले अध्यायों में बता चुके हैं वह उनकी महादशा, उनकी अन्तर्दशा और उनकी प्रत्यन्तर्दशा में लागू करने चाहिये ॥१॥
४५२ फलदीपिका महादशा में अन्तर्दशाकाल त्रैराशिक से निकालना चाहिये। उदाहरण के लिये आपको यह निकालना है कि शुक्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा कितने समय की होगी तो निम्नलिखित तरीके से निकालिये। यदि १२० वर्ष में सूर्य का भाग ६ वर्ष तो १ ,, ,, ,, ६ × १/१२० वर्ष तो २० ,, ,, ,, ६/१२० × २० = १ वर्ष सूर्य की महादशा ६ वर्ष की होती है और शुक्र की महादशा २० वर्ष की इसलिये २० और ६ की संख्या ऊपर ली गयी है। जिस प्रकार त्रैराशिक से महादशा में अन्तर्दशा निकालते हैं, उसी प्रकार अन्तर्दशा में त्रैराशिक से प्रत्यन्तर्दशा निकाली जाती है। ऊपर हम बता चुके हैं कि शुक्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा १ वर्ष की आयी। अब सूर्य की एक वर्ष की अन्तर्दशा में सूर्य की प्रत्यन्तर्दशा कितने दिन का होगा ? १२० वर्ष में ६ वर्ष १ वर्ष में ६/१२० वर्ष = १/२० वर्ष = १/२० × ३६० दिन = १८ दिन इस प्रकार शुक्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा में सूर्य की प्रत्यन्तर्दशा का समय आया १८ दिन। ग्रहों की महादशा, अन्तर्दशा तथा प्रत्यन्तर्दशा की सारिणी पंचांगों में दी रहती है इसलिये यहां नहीं दी जा रही है। महीश्वरादुपलभतेऽधिकं यशो वनाचलस्थलवसतिं धनागमम् । ज्वरोष्णरुग्जनकवियोगजं भयं निजां दशां प्रविशति तीक्ष्णदीधितौ ॥३॥
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४५३ रिपुक्षयोऽ व्यसनशमो धनागमः कृषिक्रिया गृहकरणं सुहृद्युतिः । क्षयानलप्रतिहतिरर्कदायकं शशी यदा हरति जलोद्भवा रुजः ॥४॥ रुजागमः पदविरहोऽरिपीडनं व्रणोद्भवः स्वकुलजनैर्विरोधिता । महीभृतो भवति भयं धनच्युति- र्यदा कुजो हरति तदार्कवत्सरम् ॥५॥ रिपूदयो धनहतिरापदुद्गमो विषाद्भयं विषयविमूढता पुनः शिरोदृशोरधिकरुगेव देहिनाम् अहौ भवेदहिमकरायुरन्तरे ॥६॥ रिपुक्षयो विविधधनाप्तिरन्वहं सुरार्चनं द्विजगुरुबन्धुपूजनम् । श्रवःश्रमो भवति च यक्ष्मरोगिता सुरार्चिते विशति गोपतेर्दशाम् ॥७॥ धनाहतिः सुतविरहः स्त्रिया रुजो गुरुव्ययः सपदि परिच्छदच्युतिः । मलिष्ठता भवति कफप्रपीडनं शनैश्चरे सवितृदशान्तरं गते ॥८॥ विचर्चिका पिटकसकुष्ठकामिला विशर्धनं जठरकटिप्रपीडनम् । महीक्षयः त्रिगदभयं भवेत्तदा विधोः सुते चरति रवेरथाब्दकम् ॥९॥
४५४ फलदीपिका सुहृद्व्ययः स्वजनकुटुम्बविग्रहो रिपोर्भयं धनहरणं पदच्युतिः । गुरोर्गदश्चरणशिरोरुगुच्चकैः शिखी यदा विशति दशां विवस्वतः ॥१०॥ शिरोरुजा जठरगुदार्तिपीडनं कृषिक्रिया गृहधनधान्यविच्युतिः । सुतस्त्रियोरसुखमतीव देहिनां भृगोः सुते चरति रवेरथाब्दकम् ॥११॥ सूर्य (i) सूर्य की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा में राजा से अधिक यश मिले, धनागम हो, पर्वतों और वनों में रहे, ज्वर और उष्णता के रोग हों, पिता के वियोग का भय हो । सूर्य अच्छा हो तो अच्छा फल लीजिये । सूर्य दुर्बल या दुःस्थान में हो तो अनिष्ट फल लीजिये । (ii) जब सूर्य की महादशा में चन्द्रमा का अन्तर हो तो जातक अपने शत्रुओं का नाश करे, उसके कष्टों की शान्ति हो जावे, धन का आगम हो, खेती बाड़ी का काम हो, मकान बने, मित्रों से समागम हो । यदि चन्द्रमा दुःस्थान में पड़ा हो या अशुभ फलदायक हो तो क्षय, तथा जल से उत्पन्न होने वाले रोग हों, अग्नि से भी हानि की सम्भावना है ॥४॥ (iii) जब सूर्य की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा हो तो जातक बीमार पड़े, पद्च्युत हो और शत्रुओं से पीड़ा हो । अपने कुल के आदमियों से विरोध हो । जातक को राजा से भय हो और धन का नाश हो । जातक को यह भी भय रहता है कि उसको चोट *ऊपर जो महादशा में अन्तर्दशा का फल दिया गया है उसी अनुसार इस अध्याय में सर्वत्र अन्तर्दशा में प्रत्यन्तर्दशा का फल समझना चाहिये ।
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४५५ लगे या शरीर में फोड़े हों। हमारे विचार से सूर्य, मंगल दोनों अच्छे पड़े हों—परस्पर इष्ट राशि में तो मंगल का अच्छा फल ही होगा ॥५॥ (iv) सूर्य की महादशा में राहु का अन्तर बताते हैं। शत्रुओं का उदय हो, वैर बढ़े, धन का नाश हो या चोरी हो। आपत्तियाँ आवें। जातक को विष से भय हो। जातक के शिर में पीड़ा हो। नेत्र में रोग हो किन्तु उसका मन सांसारिक विषयों के भोग की ओर अधिक आकृष्ट हो ॥६॥ (v) जब सूर्य की महादशा में बृहस्पति का अन्तर हो तो शत्रुओं का नाश हो, नाना प्रकार से धन की आमदनी हो। नित्य देवताओं की अर्चना हो, ब्राह्मण, गुरु और बन्धुओं का सत्कार हो। किन्तु कान में पीड़ा हो और यक्ष्मा सम्बन्धी रोग हो। हमारे विचार से बृहस्पति की अन्तर्दशा में अनिष्ट फल तब ही होगा जब बृहस्पति प्रबल मारक हो या दुःस्थान में पड़ा हो ॥७॥ (vi) सूर्य की महादशा में जब शनि की अन्तर्दशा होती है तो धन का नाश हो, पुत्र से वियोग हो, स्त्री को रोग हो, किसी गुरु जन (गुरु, पिता, चाचा आदि) की मृत्यु हो। बहुत अधिक व्यय हो। वस्त्र तथा घर की अन्य वस्तुओं का नाश हो। गन्दगी रहे (जातक का मकान, कपड़े, शरीर आदि स्वच्छ न रहें) और जातक को कफ- रोगों से पीड़ा हो। यद्यपि उपर्युक्त श्लोक में कफ पीड़ा कही गयी है किन्तु हमारे विचार से सूर्य पित्त का स्वामी है और शनि वात का इस कारण शनि की अन्तर्दशा में वात पीड़ा होनी चाहिये ॥८॥ (vii) सूर्य की महादशा में जब बुध की अन्तर्दशा हो तो फोड़े, फुंसी, चर्म रोग, कुष्ठ, पीलिया आदि हो। कमर में, पेट में दर्द हो और वात, पित्त, कफ इन तीनों के विकार से शरीर में रोग हो। बुध वात, पित्त, कफ तीनों का स्वामी है। इस कारण तीनों दोषों से रोग होना कहा है। ॥९॥
४५६ फलदीपिका (viii) सूर्य में जब केतु की अन्तर्दशा होती है तो किसी मित्र की मृत्यु हो या मित्र मित्रता छोड़ दे । अपने आदमियों से और कुटुम्ब के लोगों से विग्रह (झगड़ा) हो । शत्रु से भय हो । धन का नाश हो (चोरी से या किसी अन्य प्रकार से), किसी गुरुजन को बीमारी हो । जातक के पैर में तथा सिर में बहुत दर्द हो । सूर्य और केतु परस्पर शत्रु हैं इस कारण सूर्य में केतु का बहुत दुष्ट फल कहा गया है ॥१०॥ (ix) सूर्य की महादशा में शुक्र का अन्तर जब आवे तो सिर में पीड़ा, पेट में रोग हो, गुदा में पीड़ा हो, खेती बाड़ी के काम, मकान, धन और अन्न में कमी हो, बच्चे बीमार पड़ें । स्त्री बीमार हो ॥११॥ चन्द्रमा की महादशा में एविध अन्तर्दशाओ का फल स्त्रीप्रजाप्तिरमलांशुकागमो भूसुरोत्तमसमागमो भवेत् । मातुरिष्टफलमङ्गनासुखं स्वां दशां विशति शीतदीधितौ ॥१२॥ पित्तवह्निरुधिरोद्भवा रुजः क्लेशदुःखरिपुचोरपीडनम् । वित्तमानविहतिर्भवेत्कुजे शीतदीधितिदशान्तरं गते ॥१३॥ तीव्रदोषरिपुवृद्धिबन्धुरुङ् मारुताशनिभयार्तिरुद्भवेत् । अन्नपानजनितज्वरोदयाश्चन्द्रवत्सरविहारके ह्यहौ ॥१४॥ दानधर्मनिरतिः सुखोदयो वस्त्रभूषणसुहृत्समागमः । राजसत्कृतिरतीव जायते कैरवप्रियवयोहरे गुरौ ॥१५॥
इक्कीसवां अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४५७ नैकरोगविहतिः सुहृत्सुत- स्त्रीरुजा व्यसनसंभवो महान् । प्राणहानिरथवा भवेच्छनौ मारबन्धुवयसो गतेऽन्तरम् ॥१६॥ सर्वदा धनगजाश्वगोकुल- प्राप्तिराभरणसौख्यसम्पदः । चित्तबोध इति जायते विधो- रायुषि प्रविशति प्रबोधने ॥१७॥ चित्तहानिरपि सम्पदश्च्युति- र्बन्धुहानिरपि तोयजं भयम् । दासभृत्यहतिरस्ति देहिनां केतुके हरति चान्द्रमब्दकम् ॥१८॥ तोययानवसुभूषणाङ्गनाविक्रयक्रयकृषिक्रियादयः । पुत्रमित्रपशुधान्यसंयुतिश्चन्द्रदायहरगोन्मुखे भृगौ ॥१९॥ राजमाननमतीव शूरता रोगशान्तिररिपक्षविच्युतिः । पित्तवातरुगिने गते तदा स्याच्छशाङ्कपरिवत्सरान्तरम् ॥२०॥ (i) जब चन्द्रमा की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा हो तो कन्या-सन्तति की प्राप्ति हो, उज्ज्वल वस्त्र मिलें, उत्तम ब्राह्मणों
४५८ फलदीपिका का समागम हो, माता की प्रसन्नता की बात हो और जातक को अपनी स्त्री का सुख हो ॥१२॥ (ii) जब चन्द्रमा की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा हो तो पित्त-प्रकोप, अग्नि-प्रकोप तथा रुधिर की ख़राबी के कारण रोग हो। शत्रुओं और चोरों से पीड़ा हो। क्लेश और दुःख हो। धन और मान का नाश हो ॥१३॥ (iii) चन्द्रमा की महादशा में, राहु की अन्तर्दशा में तीव्र दोष हो अर्थात् जातक के मन को कष्ट पहुंचाने वाली कोई तीव्र घटना हो या कोई शारीरिक बीमारी हो। शत्रुओं की वृद्धि हो, वन्धु बीमार पड़े, तूफ़ान और वज्र से भय और कष्ट हो। और खाने-पीने की गड़बड़ी के कारण शरीर में ज्वर हो ॥१४॥ (iv) चन्द्रमा की महादशा में जब बृहस्पति की अन्तर्दशा हो तो जातक की प्रवृत्ति दान और धर्म में होती है। राजा से सम्मान प्राप्त हो, मित्रों से समागम हो, नवीन वस्त्र और आभूषण प्राप्त हों और सब प्रकार के सुख का उदय हो ॥१५॥ (v) चन्द्रमा की महादशा में जब शनि का अन्तर हो तो अनेक प्रकार के रोगों से कष्ट हो। जातक के मित्र, पुत्र और स्त्री को बीमारी हो, कोई महान् विपत्ति की सम्भावना हो अथवा प्राण की हानि हो। कहने का तात्पर्य यह है कि चन्द्रमा में शनि की अन्तर्दशा बहुत पीड़ा कारक होती है ॥१६॥ (vi) जब चन्द्रमा की महादशा में बुध की अन्तर्दशा हो तो सर्वदा हाथी, घोड़े, गौ और सब प्रकार के धन की प्राप्ति हो। *श्लोक ५ से ११ तक जो अनिष्ट फल बताये गये हैं वे तभी घटित होंगे जब महादशानाथ और अन्तर्दशानाथ या अन्तर्दशानाथ और प्रत्यन्तर्दशानाथ दोनों अनिष्ट हों।
आभूषण और सम्पत्ति मिले। जातक सुखी रहे और उसका मन ज्ञान और बुद्धि में लगा रहे ॥१७॥ (vii) जब चन्द्रमा में केतु की अन्तर्दशा होती है तो तबीयत को परेशान करने वाली घटनायें होती हैं; जल से भय हो। धन हानि हो और बन्धुओं की भी हानि हो अर्थात् किसी बन्धु को कष्ट हो या जातक की उससे अन-बन हो जाये। जातक को दास और भृत्यों से भी हानि हो। संक्षेप में यह है कि चन्द्रमा में केतु कष्ट कारक होता है ॥१८॥ (viii) चन्द्रमा में शुक्र का शुभ फल है। जल, यान (सवारी), धन, भूषण, स्त्री सम्बन्धी कार्य में सुख हो। जातक की खेती के काम में भी वृद्धि हो। यदि जातक व्यापारी है तो माल खरीदने-बेचने में भी लाभ होगा। इस अन्तर्दशा में पुत्र, मित्र, पशु तथा अन्न की प्राप्ति हो और उनसे हर्ष हो ॥१९॥ (ix) जब चन्द्रमा की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा आती है तो राजा से सम्मान प्राप्त होता है। जातक शूरता के कार्य करता है। यदि किसी रोग से पीड़ा पा रहा हो तो उस रोग की शान्ति हो जाती है अर्थात् स्वास्थ्य उत्तम रहता है किन्तु पित्त और वात से नवीन रोग होने की सम्भावना रहती है। इस अन्तर्दशा में जातक विजयी होता है और उसके शत्रु पक्ष को नीचा देखना पड़ता है। ॥२०॥ मंगल की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल पित्तोष्णरुग्व्रणभयं सहजैर्वियोगः क्षेत्रप्रवादजनितार्थविभूतिसिद्धिः । ज्ञात्यग्निशत्रु नृपचोरजनैर्विरोधो धात्रीसुतो हरति चेच्छरवं स्वकीयम् ॥२१॥