फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
चौथा अध्याय : ग्रह बल ७५ (७) यदि कोई ग्रह अपने द्वादशांश में हो तो उसे ३० षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है; अधिमित्र द्वादशांश में २२.५; मित्र द्वादशांश में १५; सम द्वादशांश में ७.५; शत्रु द्वादशांश में ३.७५ और अधिशत्रु द्वादशांश में १.८७५ षष्ट्यंश । (८) यदि कोई ग्रह अपने ही त्रिंशांश में हो तो उसे ३० षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है; अधिमित्र के त्रिंशांश में हो तो २२.५ और मित्र के त्रिंशांश में हो तो १५ । यदि समग्रह के त्रिंशांश में हो तो ७.५ षष्ट्यंश; शत्रु के त्रिंशांश में ३.७५ और अधिशत्रु के त्रिंशांश में होने से केवल १.८७५ षष्ट्यंश । (९) सूर्य, मंगल, बुध, बृहस्पति और शनि--इन पांचों में जो-जो ग्रह ओज राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, कुंभ) में हों उनको-- प्रत्येक को--१५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है । (ख) चन्द्र और शुक्र इन दोनों में जो-जो युग्म राशि (वृषभ कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर या मीन) में हो उसको--प्रत्येक को--१५ षष्ट्यंश बल मिलता है । (१०) (क) सूर्य, मंगल, बुध, वृहस्पति और शनि--इन पांचों में जो-जो ग्रह ओज (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु या कुंभ) नवांश में हो उनको--प्रत्येक को १५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है । (ख) चन्द्रमा और शुक्र इन दोनों में जो-जो युग्म (वृष, कर्क, टिप्पणी—मान लीजिये सूर्य बृहस्पति के द्रेष्काण में है और बृहस्पति सूर्य का अधिमित्र है तो सूर्य को २२.५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होगा । यह “श्रीपति पद्धति” का मत है । “केशवी जातक” की टीका करते हुए कुछ विद्वानों ने लिखा है कि सूर्य बृहस्पति के द्रेष्काण में हो और बृहस्पति अपने अधिमित्र वर्ग में हो तो सूर्य को २२.५ षष्ट्यंश बल मिलेगा । हम श्रीपति पद्धति के विचार से सहमत हैं । केशवी जातक के टीकाकारों का मत हमें मान्य नहीं ।
७६ फलदीपिका कन्या, वृश्चिक या मीन) नवांश में हो उसको—प्रत्येक को—१५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है। (११) जो ग्रह केन्द्र राशि में हो उसे १ रूप (=६० षष्ट्यंश) जो पणफर राशि में हो उसे ३० षष्ट्यंश और जो आपोक्लिम राशि में हो उसे केवल १५ षष्ट्यंश बल मिलता है। (१२) (क) सूर्य, मंगल या बृहस्पति यदि किसी राशि के प्रथम द्रेष्काण में हों तो उनकी (जो हो—प्रत्येक को) १५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है। अन्य द्रेष्काण में होने से कुछ नहीं मिलता। (ख) शनि या बुध—जो भी—किसी राशि के द्वितीय द्रेष्काण में हो उसे १५ षष्ट्यंश बल मिलता है। (ग) चन्द्रमा और शुक्र इनमें से जो भी ग्रह किसी राशि के अन्तिम द्रेष्करण में हो उसे १५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है। इन १२ प्रकार के बलों का योग स्थान बल कहलाता है। इनके संस्कृत नाम निम्नलिखित हैं :—(१) उच्च बल, (२)—(८) सप्तवर्गज बल, (९) ओज युग्म राशि बल, (१०) ओज युग्म नवांश बल, (११) केन्द्रादिबल, (१२) द्रेष्काण बल। दिक् बल दिक् बल कहिये, दिशा* बल कहिये एक ही बात है। (क) सूर्य और मंगल—इन दोनों में जो भी—दशम भाव मध्य पर हो उसे १ रूप बल प्राप्त होता है और यदि ये चतुर्थ भाव मध्य पर . हों तो ० बल प्राप्त होता है। मध्य में अनुपात से निकालिये। (ख) चन्द्रमा और शुक्र इन दोनों में जो भी चतुर्थ भाव मध्य पर हो या हों—उसे १ रूप बल प्राप्त होता है और दशम भाव मध्य पर ०। मध्य में अनुपात से निकालिये। *प्रथम भाव मध्य को पूर्व, सप्तम भाव मध्य को पश्चिम, चतुर्थ भाव मध्य को उत्तर और दशम भाव मध्य को दक्षिण कहते हैं।
चौथा अध्याय : ग्रह बल ७७ (ग) बुध और बृहस्पति प्रथमभाव (लग्न) मध्य पर हों तो इन्हें १ रूप बल प्राप्त होता है—यदि सप्तम भाव मध्य पर हों तो शून्य बल। मध्य में अनुपात से। (घ) शनि यदि सप्तम भाव मध्य पर हो तो उसे १ रूप बल प्राप्त होता है—यदि प्रथम भाव मध्य पर हो तो शून्य बल। मध्य में कहीं हो तो अनुपात से निकालिये। काल बल : यह ९ प्रकार के बलों का सम्मिश्रण है। काल बल के अन्तर्गत जो ९ प्रकार के बल आते हैं—उन्हें नीचे बताते हैं— (१) (क) सूर्य, बृहस्पति और शुक्र को—प्रत्येक को ठीक मध्याह्न के समय १ रूप (=६० षष्ट्यंश) बल प्राप्त है। ठीक मध्य रात्रि के समय, कुछ प्राप्त नहीं होता। मध्य काल में अनुपात से निकालना चाहिये। (ख) चन्द्र, मंगल और शनि को—प्रत्येक को ठीक मध्य- रात्रि के समय १ रूप (=६० षष्ट्यंश) बल प्राप्त होता है। ठीक मध्याह्न के समय ० बल प्राप्त होता है। मध्य काल में अनुपात से निकालना चाहिये। (ग) दिन रात के चाहे किसी भी काल में जन्म हो बुध को सदैव १ रूप बल मिलता है। (२) (क) जब सूर्य और चन्द्रमा एक-दूसरे से ठीक १८०° अंश पर हों तब शुभ ग्रहों को ६० षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है—जब दोनों (सूर्य और चन्द्र) बिल्कुल एक ही राशि एक ही अंश पर हों तो शुभ ग्रहों को ० बल मिलता है। मध्य में (सूर्य और चन्द्रमा का अन्तर ०° से १८०° तक हो) तो अनुपात से निकालना चाहिये। चन्द्रमा, बुध, बृहस्पति और शुक्र शुभ ग्रह हैं। केशवी जातक का मत है कि पापयुत बुध को पाप ग्रह मानना। परन्तु कुछ अन्य आचार्य बुध को इस बल के लिये सदैव शुभ मानते हैं। हमारे विचार से बुध शुभ ग्रह ही है।
७८ फलदीपिका (ख) जब सूर्य और चन्द्रमा दोनों एक ही राशि, एक ही अंश पर हों तो क्रूर ग्रहों को ६० षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है। यदि सूर्य और चन्द्र दोनों १८० अंश के अन्तर पर हों तो क्रूर ग्रहों को ० बल प्राप्त होता है। मध्य में (सूर्य और चन्द्रमा का अंतर ०°—१८०°—इस बीच में हों) तो अनुपात से निकलना चाहिये। सूर्य, मंगल और शनि क्रूर ग्रह हैं। इस बल को पक्ष बल कहते हैं। यह काल बल के अन्तर्गत है। (ग) चन्द्रमा को जो 'पक्ष बल प्राप्त हो उसे दुगुना करना चाहिये।१ (३) (क) यदि दिन में जन्म है तो दिन मान (सूर्योदय से सूर्यास्त तक) के ३ भाग कीजिये। यदि प्रथम भाग में जन्म हुआ है तो बुध को एक रूप (६० षष्ट्यंश) बल मिलेगा। यदि दिनमान के द्वितीय भाग में जन्म हुआ है तो सूर्य को एक रूप बल प्राप्त होगा और दिनमान के अंतिम तृतीयांश में जन्म हुआ हो तो शनि को एक रूप बल मिलेगा। (ख) यदि रात्रि में जन्म है तो रात्रिमान के ३ भाग कीजिये यदि रात्रि के प्रथम हिस्से में जन्म है तो चन्द्रमा को १ रूप बल प्राप्त होगा—यदि द्वितीय हिस्से में जन्म है तो शुक्र को १ रूप बल मिलेगा और यदि रात्रि के अन्तिम तीसरे हिस्से में जन्म है तो मंगल को १ रूप बल मिलेगा। (ग) २४ घंटे में किसी भी समय जन्म हो बृहस्पति को सदैव १ रूप बल मिलता है। (४) जब से सृष्टि आरंभ हुई है तब से ३६० दिन का १ वर्ष और ३०—३० दिन का एक महीना—इस प्रकार जन्म दिन तक हिसाब कर निकालिये कि जब जन्म हुआ—उस वर्ष के प्रथम दिन कौन-सा वार था। १. चन्द्रमा को वक्र बल या चेष्टा बल प्राप्त नहीं होता क्योंकि चन्द्रमा सदैव मार्गी रहता है—इसलिये इसका पक्ष बल दुगुना किया जाता है।
चौथा अध्याय : ग्रह बल ७९ उस वार का स्वामी ग्रह वर्षेश हुआ। वर्षेश जो भी ग्रह हो उसे १५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है। * (५) इसी प्रकार सृष्टि के प्रारंभ से ३०-३० दिन के प्रत्येक मास के हिसाब से—जन्म दिन किस मास में पड़ा—उस मास के प्रारंभिक दिन जो वार था, उस वार के स्वामी ग्रह को ३० षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है। १ (६) जिस वार को जन्म हो—उस वार के स्वामी ग्रह को ४५ षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है। (७) जिस ग्रह के होरा में जन्म हो उस ग्रह के ६० षष्ट्यंश बल मिलता है। किसी भी दिन—किसी भी समय किस ग्रह की होरा है—यह निकालने के लिये देखिये हमारी लि खत—अंक विद्या, पृष्ठ ९८-१०१। अयन बल : (८) आकाशीय मध्य रेखा से कोई ग्रह उत्तर की ओर होता है तो उसकी उत्तर क्रांति होती है—जब दक्षिण की ओर होता है तो उसकी दक्षिण क्रांति होती है। जब ठीक मध्य रेखा पर होता है उसकी शून्य क्रांति होती है। (क) सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शुक्र को २४° उत्तर क्रांति पर १ रूप बल प्राप्त होता है। और २४° दक्षिण क्रांति पर शून्य बल। मध्य में अनुपात से निकालना चाहिये । (ख) चन्द्रमा और शनि को २४° दक्षिण क्रांति पर १ रूप बल १. सृष्टि के आरंभ से जन्म दिन तक कितने वर्ष (३६० दिन के) कितने मास (३० दिन के) व्यतीत हुए, यह निकालने के लिये देखिये सूर्य सिद्धान्त—प्रथम अध्याय श्लोक ४५-५१। एक अन्य मत यह है कि इतना गणित करने की आवश्यकता नहीं है। जिस विक्रम संवत्सर में जन्म हुआ उस विक्रम संवत्सर के आरंभ के दिन जो वार हो—उस वार का स्वामी वर्षेश हुआ। इसी प्रकार जन्म मास के प्रारंभ के दिन जो वार हो उसका स्वामी मासेश हुआ।
८० फलदीपिका प्राप्त होता है और २४° उत्तर क्रान्ति पर शून्य बल। मध्य में अनुपात से निकालिये। (ग) बुध के विषय में विशेषता है इसकी क्रांति यदि ० हो तो इसे ३० षष्ट्यंश बल प्राप्त होगा और यदि यह ०° से २४° उत्तर क्रांति की ओर जावे तो क्रमशः बल बढ़ता जावेगा—२४° उत्तर क्रांति पर ६० षष्ट्यंश बल प्राप्त होगा। यदि बुध उत्तर की बजाय--०° क्रांति से दक्षिण की ओर जावे तो भी २४° दक्षिण क्रांति पर पहुंचने पर इसे १ रूप बल प्राप्त होता है। ०° से २४° इन क्रांतियों के बीच अनुपात से निकालना चाहिये। (घ) सूर्य का जो अयन बल आवे उसे दुगुना करना चाहिये।१ युद्धबल : (९) यह काल बल के अन्तर्गत नवां बल है सूर्य और चन्द्रमा के अतिरिक्त पांचों ग्रहों में— (मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि में) यदि कोई से दो ग्रह एक ही राशि, एक ही अंश, एक ही कला में हो तो उन दोनों में युद्ध समझा जाता है। युद्ध बल निकालने का प्रकार श्रीपति पद्धति, केशवी जातक या पराशर होराशास्त्र में देखिये। यहां विस्तार भय से नहीं दिया जाता है। थोड़ा निर्देश पृष्ठ ७१ की टिप्पणी में कर दिया गया है। ऊपर जो १ से ९ तक—नौ प्रकार के बल दिये हैं उन्हें काल बल के अन्तर्गत समझना चाहिये। इनके संस्कृत नाम निम्नलिखित हैं :— १. सूर्य सदैव मार्गी रहता है वक्री नहीं होता इस कारण इसे चेष्टा- बल या वक्र बल नहीं मिलता। इसलिये इसका अयन बल दुगुना कर दिया जाता है। २ बहुत कम ऐसा होता है कि मंगल, बुध, बृहस्पति शुक्र, शनि इन पांचों में दो ग्रह एक ही राशि, एक ही अंश, एक ही कला में हों। तभी युद्ध बल निकालने की आवश्यकता होगी।
चौथा अध्याय : ग्रह बल ८१ (१) नतोन्नत बल या दिवारात्रि बल, (२) पक्ष बल, (३) त्रिभाग बल, (४) अब्द बल, (५) मास बल, (६) वार बल, (७) होरा बल, (८) अयन बल, (९) युद्ध बल। बहुत-से लोग प्रथम सात बलों को ही काल बल कहते हैं। अयन बल और युद्ध बल को पृथक् मानते हैं। चेष्टा बल : अब चेष्टा बल किसे कहते हैं यह समझाते हैं । सूर्य और चन्द्र कभी वक्री नहीं होते बाकी मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि कभी मार्गी होते हैं, कभी वक्री। इनकी 'गति' या चेष्टा के कारण इन्हें जो बल मिलता है उसे चेष्टा बल कहते हैं । यह बल निकालने के लिये मन्दोच्च, चेष्टा केन्द्र आदि निकालना पड़ता है—जिसके लिये बहुत गणित की आव- श्यकता है यहाँ स्थानाभाव के कारण वह नहीं समझाया जा सकता। यहाँ कुछ स्थूल गणना बताई जाती है (क) यदि ग्रह वक्री हो तो ६० षष्ट्यंश, (ख) अनुवक्र१ हो तो ३० षष्ट्यंश, (ग) विकल हो तो १५ षष्ट्यंश, (घ) समागम हो तो ३० षष्ट्यंश, (ङ) मन्द (गति बढ़ रही हो किन्तु मध्यम गति से कम हो) मार्गी गति हो तो १५ षष्ट्यंश (च) मन्दतर (गति कम हो रही हो किन्तु मध्यम गति से अधिक हो—मार्गी हो) हो तो ७॥ षष्ट्यंश (छ) शीघ्र हो (मार्गी गति कम हो रही हो किन्तु मध्यम गति से अधिक हो) तो ४५ षष्ट्यंश (ज) शीघ्रतर हो (मार्गी गति बढ़ रही हो और मध्यम गति से अधिक हो) तो ३० षष्ट्यंश बल प्राप्त होता है। यह स्थूल विचार है। सूक्ष्म बल गणित साध्य है। नैसर्गिक बल स्वभावतः कौन-सा ग्रह कितना बली है इसे नैसर्गिक बल कहते हैं। यह कभी नहीं बदलता। सूर्य ६०.०० षष्ट्यंश चन्द्र ५१.४३ ,, १. अनुवक्र गति को ऋजुगति भी कहते हैं।
८२ फलदीपिका शुक्र ४२.८५ ,, बृहस्पति ३४.२८ ,, बुध २५.७० ,, मंगल १७.१४ ,, शनि ८.५७ ,, दृक् बल दृक् बल कहते हैं दृष्टि को। जिस ग्रह पर शुभ ग्रहों की दृष्टि होती है उसे शुभ दृष्ट कहते हैं। दृक् बल निकालने में जिस ग्रह की अन्य ग्रह पर दृष्टि होती है, उन दोनों का अन्तर (कितने अंश का फासला है) निकाल- कर गणितानुसार दृष्टि निकाली जाती है।* *टिप्पणी—सूर्य,, चन्द्र, बुध, शुक्र की अपने से ३० अंश पर शून्य, ६० अंश पर चौथाई दृष्टि होती है : ९० अंश पर त्रिपाद, १२० अंश पर आधी, १५०° पर शून्य, १८० अंश पर पूर्ण २१०° पर त्रिपाद, २४० अंश पर आधी और २७० अंश पर चौथाई, ३०० अंश पर शून्य। मध्य में अनुपात से निकालना चाहिये। मंगल, बृहस्पति तथा शनि की कितने अंश पर कितनी दृष्टि होती है यह नीचे बताया जाता है। मंगल बृहस्पति शनि ३० अंश पर शून्य शून्य शून्य ६० ,, चौथाई चौथाई पूर्ण ९० ,, पूर्ण त्रिपाद त्रिपाद १२० ,, आधी पूर्ण आधी १५० ,, शून्य शून्य शून्य १८० ,, पूर्ण पूर्ण पूर्ण २१० ,, पूर्ण त्रिपाद त्रिपाद २४० ,, आधी पूर्ण आधी २७० ,, चौथाई चौथाई पूर्ण ३०० ,, शून्य शून्य शून्य बीच के किसी अंश पर कितनी दृष्टि है यह त्रैराशिक से निकालना चाहिये।
चौथा अध्याय : ग्रह बल ८३ यदि किसी ग्रह पर पापों ग्रहों की दृष्टि हो तो उसे पाप-दृष्ट कहते हैं। पाप दृष्टि भी उपर्युक्त प्रकार से गणित कर निकाली जाती है। जातक- पद्धति आदि में दृष्टि की सारणियां दी हुई रहती हैं। यदि शुभ दृष्टि अधिक हो तो पाप दृष्टि को उसमें से घटाकर जो शेष बचे उसे पूर्व के स्थान बल, काल बल आदि के सम्मिलित योग में जोड़ देना चाहिये। किन्तु यदि पाप दृष्टि अधिक हो तो इसमें से शुभ दृष्टि को घटाकर जो शेष बचे वह स्थान बल, काल बल आदि के सम्मिलित योग में से घटा देनी चाहिये। जो शेष बचे षड्बलपिंड या छः प्रकार के बलों का योग कहलाता है। ग्रहों का बल कैसे निकाला जाता है इसका कुछ परिचय करा देने के बाद भाव बल निकालना बताते हैं। भाव बल भाव बल ३ बलों का सम्मिश्रण कर निकाला जाता है— (१) भावेश बल, (२) भाव दिग्बल तथा (३) शुभ दृष्टि बल। भाव के स्वामी के बल को भावेश बल कहते हैं। भावदिग् बल (क) मिथुन, कन्या, तुला कुंभ तथा धन का पूर्वार्द्ध द्विपद राशियां हैं। यह यदि लग्न में हो तो एक रूप बल प्राप्त होता है। सप्तम में हो तो शून्य मध्य, में किसी भाव में हो तो अनुपात से । (ख) मेष, वृषभ, सिंह तथा धनु का उत्तरार्द्ध और मकर का पूर्वार्द्ध चतुष्पाद राशियां हैं। यदि यह दशम में हों तो एक रूप बल प्राप्त होता
८४ फलदीपिका है। यदि चतुर्थ में हों तो शून्य। बीच के किसी भाव में हो तो त्रैराशिक से निकालिये। (ग) कर्क और वृश्चिक कीट राशियाँ हैं। यदि यह सप्तम में हों तो एक रूप बल प्राप्त होता है। लग्न में हों तो शून्य। मध्य के किसी भाव में हो तो त्रैराशिक से निकालिये। (घ) मीन और मकर का पश्चिमार्द्धं जलराशियाँ हैं। यह चतुर्थ में हों तो तो इन्हें १ रूप बल प्राप्त होता है। दशम में शून्य। मध्य में अनुपात से। शुभाशुभ दृष्टिबल भाव पर शुभ दृष्टि अधिक हो तो उसमें से अशुभ दृष्टि कम करके, जो शेष बचे उसे भावेश बल तथा भाव दिक्बल में जोड़ने से भावेश बल होता है। यदि भाव पर अशुभ दृष्टि अधिक है तो अशुभ दृष्टि में से शुभ दृष्टि घटाकर जो शेष बचे उसे भावेश बल* तथा भाव दिक् बल के योग में से घटाने से भावबल निकलता है। भाव पर शुभाशुभ दृष्टि कैसे निकाली जाती है यह विस्तृत विषय है। जातक पद्धति आदि से समझना चाहिये। √ ऊपर जो ग्रह बल और भाव बल के विषय में कुछ रूप रेखा मात्र दिखाई गई है वह केवल परिचय मात्र है। फल दीपिका के चतुर्थ अध्याय में मंत्रेश्वर ने यही विषय बतलाया है। अब नीचे फलदीपिका के श्लोकों का भावार्थ बताया जाता है :— *जो ग्रह भाव का स्वामी हो। √ग्रहों का षड्बल तथा भाव बल का विस्तृत परिचय प्राप्त करने के लिये देखिये (१) केशवी जातक, (२) श्रीपति पद्धति तथा वटश्रेणि भूदेव प्रणीत जातक-पद्धति।
चौथा अध्याय : ग्रह बल ८५ वीर्यं षड्विधमाह कालजबलं चेष्टाबलं स्वोच्चजं दिग्वीर्यं त्वयनोद्भवं दिविषदां स्थानोद्भवं च क्रमात् । निश्यारेन्दुसिताः परे दिवि सदा ज्ञः शुक्लपक्षे शुभाः; कृष्णेऽन्ये च निजाब्दमासदिनहोरास्वङ्घ्रिवृद्ध्या क्रमात् ॥१॥ ग्रह का बल छः प्र कार का होता है काल बल, चेष्टाबल, उच्च बल, दिक् बल, अयन बल और स्थान बल। मंगल चन्द्रमा और शुक्र रात्रि में बलवान् होते हैं—अन्य ग्रह दिन में। बुध रात्रि हो या दिन सदैव बलवान् समझा जाता है। शुक्ल पक्ष में शुभ ग्रह बलवान् होते हैं— अन्य ग्रह कृष्ण पक्ष में। अब्द पति को चौथाई रूप बल प्राप्त होता है। मास पति (जो ग्रह मास का स्वामी हो) को आधा रूप बल मिलता है। दिन पति (जन्म के दिन जिस ग्रह का वार हो ) को ३/४ रूप तथा जन्म के समय जिस ग्रह की होरा हो उसे १ रूप बल मिलता है ॥ १ ॥ राकाचन्द्रस्य चेष्टाबलमुदगयने भास्वतो वक्रगानां युद्धे चोदक्स्थितानां स्फुटबहुलरुचां स्वोच्चवीर्यं स्वतुङ्गे । दिग्वीर्यं खेडर्कभौमौ सुहृदि शशिसितौ विद्गुरू लग्नगौ चे- न्मन्देऽस्ते याम्यमार्गे बुधशनिशशिनोऽन्येऽयनाख्ये परस्मिन् ॥२॥ चन्द्रमा को पूर्णिमा के दिन पूर्ण चेष्टाबल प्राप्त होता है। सूर्य को उत्तर अयन में चेष्टाबल मिलता है। अन्य ग्रह जब वक्री होते हैं तब उन्हें चेष्टा बल प्राप्त होता है। ग्रहों के युद्ध में जो अस्त न हो और जो उत्तर की ओर हो उसे विजयी समझना चाहिये। जब ग्रह अपने परमोच्च स्थान (अंश) पर हो तब उसे पूर्ण उच्च बली समझना चाहिये। अब दिक् बल बताते हैं। दशम में सूर्य और मंगल बली होते हैं। चन्द्रमा और शुक्र चतुर्थ में बली होते हैं। बुध और बृहस्पति लग्न में बली होते हैं। शनि सप्तम में।
८६ फलदीपिका अब अयन बल बताते हैं। शनि बुध और चन्द्र दक्षिण अयन में बलवान् होते हैं। अन्य ग्रह उत्तर अयन में ॥ २ ॥ स्वोच्चस्वर्क्षसुहृद्गृहेषु बलिनः षट्सु स्ववर्गेषु वा प्रोक्तं स्थानबलं चतुष्टयमुखात्पूर्णार्द्धपादाः क्रमात् । मध्याद्यन्तकषण्डमर्त्यवनिताः खेटा बलिष्ठाः क्रमात् मन्दारज्ञगुरूशनोब्जरवयो नैजे बले वर्द्धनाः ॥३॥ ग्रह को अपनी उच्च, स्व (अपनी) या मित्र राशि या छः वर्गों में स्थित होने के कारण जो बल प्राप्त होता है उसे स्थान बल कहते हैं। ग्रह यदि केन्द्र में हो तो एक रूप बल मिलता है, पणफर में हो तो आधा रूप और यदि आपोक्लिम में हो तो चौथाई रूप बल मिलता है। नपुंसक ग्रह राशि के मध्यम में (११° से २०°) पुरुष ग्रह राशि के प्रथम भाग (१° से १०° तक) में, तथा स्त्रीग्रह अंतिम भाग (२१° से ३०° तक) बली होते हैं। नैसर्गिक बल में शनि, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्र तथा सूर्य क्रमशः अधिकाधिक बली होते हैं। अर्थात् शनि से बली मंगल, मंगल से बली बुध इत्यादि ॥ ३ ॥ वक्रं गतो रुचिररश्मिसमहपूर्णो नीचारिभांशसहितोऽपि भवेत्स खेटः । वीर्यान्वितस्तुहिनरश्मिरिवोच्चमित्र- स्वक्षेत्रगोऽपि विबलो हतदीधितिश्चेत् ॥ ४ ॥
चौथा अध्याय : ग्रह बल ८७ चाहे ग्रह अपनी नीच राशि या नीच अंश (नवांश) में भी हो यदि वह वक्री है और सुन्दर किरण समूहों से पूर्ण है (अर्थात् अस्त नहीं है) तो बली समझा जाता है। चन्द्रमा की तरह—ग्रह चाहे वह उच्च राशि स्वराशि और मित्रराशि में भी क्यों न हो—यदि उसकी किरणें मर गई हों (सूर्य के समीप होने के कारण) तो वह निर्बल होता है। भावार्थ यह है कि चाहे वृष या कर्क का ही चन्द्रमा क्यों न हो यदि वह अमावास्या का चन्द्र हो तो निर्बल है और चाहे वृश्चिक का ही चन्द्रमा क्यों न हो यदि पूर्णिमा तिथि है तो वह बली है। यह सिद्धान्त अन्य ग्रहों पर भी लागू करना चाहिये ।। ४ ।। तुङ्गस्था बलिनोऽखिलाश्च शशिनः इलाघ्यं हि पक्षोद्भवं भानोर्दिग्बलमाह वक्रगमने ताराग्रहाणां बलम् । कर्क्युक्षाजघटालिगोहिरबलान्त्योक्षाशिवपाश्चात्यगः केतुस्तत्परिवेषधन्वसु बली चेन्द्रर्कयोगो निशि ।। ५ ।। सब ग्रह तुंगी (उच्च) होने से बली होते हैं। चन्द्रमा के पक्ष-बल को विशेष महत्त्व देना चाहिये। सूर्य के दिग्बल को मुख्यता है और अन्य ग्रहों के वक्र बल की। राहु, कर्क, वृषभ, मेष, कुंभ और वृश्चिक में तथा केतु, मीन कन्या वृषभ और धनु के उत्तरार्द्ध में और परिवेष तथा इन्द्रचाप में बलवान् होते हैं यदि रात्रि का समय हो और सूर्य तथा चन्द्र का योग हो (अर्थात् सूर्य चन्द्र एक राशि में हों) । रूपं मानुषभेदलिभेडङ्घ्रिपरेष्वद्धं बलं स्यात्तनोः तुल्यं स्वामिबलेन चोपचयगे नाथेऽतिवीर्योत्कटम् । स्वामीडचज्ञयुतेक्षिते कवियुते चान्यैरयुक्तेक्षिते शर्वर्या 'निशि राशयोऽहनि परे वीर्यान्विताः कीर्तिताः ।।६।।
८८ फलदीपिका यदि प्रथम भाव (लग्न) में मनुष्य राशि हो तो एक रूप बल मिलता है। यदि लग्न में वृश्चिक हो तो १/४ रूप बल मिलता है। और कोई राशि लग्न में हो तो १/२ रूप बल प्राप्त होता है । लग्न को वही बल प्राप्त होता है जो उसके स्वामी लग्नेश का बल है। यदि लग्नेश उपचय में हों तो लग्न को बहुत बली समझना चाहिये। यदि लग्न शुक्र से युत हो अपने स्वामी बुध या बृहस्पति से युत हो या अपने स्वामी बुध या बृहस्पति से दृष्ट हो और अन्य ग्रहों से युत वीक्षित न हो—तो भी लग्न को बलवान् समझना चाहिये। भावार्थ यह है कि शुक्र से युत होने को महत्त्व है—शुक्र की दृष्टि का उतना महत्त्व नहीं किन्तु लग्नेश बुध, बृहस्पति—इनकी युति हो या दृष्टि हो—दोनों बली बनाती हैं। दिवा बली राशियाँ दिन में बली होती हैं। रात्रि बली राशियाँ रात्रि में बली होती हैं ॥ ६ ॥ (१) सूर्य स्पष्ट (राशि, कला, विकला में ४ रा. १३ अं. २० कला जोड़िये। जो योग आवे वह 'धूम हुआ'। (२) १२ राशि अर्थात् १२ रा. ० अं. ० क. ० वि. ० में से 'धूम घटाइये जो बचे वह 'व्यतीपात हुआ'। (३) व्यतीपात की राशि, अंश कला विकला में ६ राशि अर्थात् ६-०-० जोड़िये यह परिवेष हुआ । (४) १२ राशि अर्थात् १२ रा. ० अं. ० क. ० वि. में से परिवेष घटाइये यह इन्द्र चाप हुआ । उदाहरण के लिये किसी के जन्म समय का स्पष्ट सूर्य ७-२६-११-३८ है। (१) स्पष्ट सूर्य ७-२६-११-३८
- ४-१३-२० ०- ९-३१-३८ धूम (२) १२- ०- ०- ० — ० - ९-३१-३८ ११-२०-२८-२२ व्यतीपात
चौथा अध्याय : ग्रह बल ८९ स्वोच्चे पूर्णं स्वत्रिकोणे त्रिपादं स्वक्षेत्रऽर्द्धं मित्रभे पादमव । द्विट्क्षेत्रेऽल्पं नीचगेऽस्तं गतेऽपि क्षेत्रं वीर्यं निष्फलं स्याद् ग्रहाणाम् ॥ यदि ग्रह अपनी उच्च राशि में हो तो उसे १ रूप बल प्राप्त होता है, यदि मूल त्रिकोण राशि में हो तो ३।४ रूप स्वराशि में १।२ रूप, मित्र राशि में १।४ । शत्रु राशि में बहुत कम बल मिलता है । यदि ग्रह नीच राशि में हो या अस्त हो तो उसे कुछ बल नहीं मिलता ॥ ७ ॥ केन्द्रे ग्रहाणामुदितं बलं यत्सुखे नभस्यस्तगृहे विलग्ने । उपर्युपर्युक्तपदक्रमेण बलाभिवृद्धि हि विकल्पयन्ति ॥८॥ चारों केन्द्रों में किसका कितना महत्त्व है यह बतलाते हैं । लग्न में पूर्ण बली, सप्तम में ३।४, दशम में १।२ और चतुर्थ में १।४ ॥ ८ ॥ अब किस दृष्टि को क्या महत्त्व देना यह समझाते हैं :— श्रेष्ठेति सा सप्तमदृष्टिरेव सर्वत्र वाच्या न तथाऽन्यदृष्टिः । योगादिषु न्यूनफलप्रदेति विशेषदृष्टिर्न तु कैश्चिदुक्ता ॥ ९ ॥ सर्वत्र सप्तम दृष्टि को ही श्रेष्ठ समझना चाहिये । अन्य दृष्टि (नवम, पंचम आदि) का वह प्रभाव नहीं है । किन्तु कुछ अन्य आचार्यों का मत (३) ११-२०-२८-२२ — ६- ०- ०- ० ५-२०-२८-२२ परिवेश (४) १२- ०- ०- ० — ५-२०-२८-२२ ६- ९-३१-३८ इन्द्रचाप
९० फलदीपिका है कि जहाँ 'योग का विचार करना हो वहां गुरु की नवम पञ्चम (विशेष दृष्टि) मंगल की चतुर्थ, अष्टम (विशेष दृष्टि) तथा शनि की तृतीय, दशम (विशेष दृष्टि) भी सप्तम की भाँति ही पूर्ण फल देने वाली होती है ॥ ९ ॥ ग्रहों की मित्रता या शत्रुता दो प्रकार की होती हैं—नैसर्गिक तथा तात्कालिक—इनमें किसको क्या महत्त्व देना यह बतलाते हैं :— नैसर्गिकं शत्रुसुहृत्त्वमेव भवेत्प्रमाणं फलकारि सम्यक् । तात्कालिकं कार्यवशेन वाच्यं तच्छत्रुमित्रत्वमनित्यमेव ॥१०॥ ग्रहों की नैसर्गिक या स्वाभाविक मित्रता, शत्रुता आदि ही विशेष फल देने वाली होती है—तात्कालिक शत्रुता, मित्रता कार्यवश¹ कहनी चाहिये—वह स्थायी नहीं होती । (जो ग्रह नैसर्गिक शत्रु हैं—वह एक की महादशा एक की अन्तर्दशा होने पर अच्छा फल नहीं दिखाते । लग्न का शत्रु, या जिस भाव का विचार करना है उस भावेश का शत्रु भी अपनी दशा अन्तर्दशा में अपने शत्रु के भाव को बिगाड़ता है—यह सब विचार करना चाहिये ।) निःशेषदोषहरणे शुभवर्द्धने च वीर्यं गुरोरधिकमस्त्यखिलग्रहेभ्यः । तद्वीर्यपाददलशक्तिभृतौ ज्ञशुक्रौ चान्द्रं बलं तु निखिलग्रहवीर्यबीजम् ॥ ११॥ १. मूल संस्कृत श्लोक में 'कार्यवश शब्द आया है । यद्यपि फल- दीपिका जातक का ग्रंथ है—प्रश्न का नहीं, तथापि प्रश्न कुंडली में 'कार्य' होगा या नहीं—इसमें तात्कालिक संबंध देखना ।
चौथा अध्याय ग्रह बल ९१ सब दोषों को दूर करने में और शुभ फल को बढ़ाने में बृहस्पति सबसे अधिक शक्तिशाली है । जितनी शुभता की सामर्थ्य बृहस्पति की है उसकी आधी शुक्र की समझनी चाहिये और शुक्र से आधी सामर्थ्य बुध की। लेकिन चन्द्रमा का बल सब ग्रहों की सामर्थ्य का बीज (मूल) है । चन्द्रक्रियादि अब चन्द्रक्रिया, चन्द्र अवस्था तथा चन्द्रवेला कैसे निकालना और उनका क्या फल है यह बताते हैं। जन्मकुंडली विचार, प्रश्न कुंडली विचार तथा मुहूर्त विचार तीनों में चन्द्र क्रिया, चन्द्र अवस्था तथा चन्द्रवेला का विचार करें। चन्द्र क्रिया कुल ६० होती हैं। चन्द्र अवस्था १२ तथा चन्द्र वेला ३६ । जन्मर्क्षविघटी नीतैर्ज्ञानाङ्गैर्ननयैर्भजेत् । लब्धाश्चन्द्रक्रियावस्थावेलाख्यास्तत्फलं क्रमात् ॥१२॥ यह देखिये कि किस नक्षत्र में जन्म है या प्रश्न या मुहूर्त के समय कौन- सा नक्षत्र है । जितने घड़ी और पल व्यतीत हो चुके हों—उनके पल बना लीजिये :— (१) चन्द्रक्रिया—इन पलों में ६० का भाग दीजिये—जो भजनफल आवे उसका फल नीचे १३-१५ श्लोकों में बताया है । (२) जन्म मुहूर्त या प्रश्न के समय जितना नक्षत्र बीत चुका है— उसकी पल बना लीजिये । ३०० का भाग दीजिये । जो लब्धि या भजनफल आया वह चन्द्र-अवस्था हुई । प्रत्येक का फल नीचे १६वें श्लोक में बताया गया है । (३) जन्म, प्रश्न या मुहूर्त के समय जितने घड़ी, पल बीत चुके हैं— उनके पल बनाकर १०० का भाग दीजिये । जो लब्धि या भजनफल आवे वह चन्द्रवेला हुई । प्रत्येक चन्द्र वेला का फल आगे श्लोक १७-१९ में बताया है ।
९२ फलदीपिका चन्द्रक्रिया फल स्थानाद्भ्रष्टस्तपस्वी परयुवतिरतो द्यूतकृद्धस्तिमुख्या- रूढः सिंहासनस्थो नरपतिररिहा दण्डनेता गुणी च । निष्प्राणश्छिन्नमूर्द्धा क्षतकरचरणो बन्धनस्थो विनष्टो राजा वेदानधीते स्वपिति सुचरितः संस्मृतो धर्मकर्ता ॥१३॥ सद्द्वंश्यो निधिसंगतः श्रुतकुलो व्याख्यापरः शत्रुहा रोगी शत्रुजितः स्वदेशचलितो भृत्यो विनष्टार्थकः । अस्थानो च सुमन्त्रकः परमहीभर्ता सभार्यो गज- त्रस्तः संयुगभीतिमानतिभयो लीनोन्नदाताग्निगः ॥१४॥ क्षुद्बाधासहितोऽन्मत्ति विचरन्मांसाननोऽस्त्रक्षतः सोद्वाहो धृतकन्दुको विहरति द्यूतैर्नृपो दुःखितः । शय्यास्थो रिपुसेवितश्च ससुहृद्योगी च भार्यान्वितो मिष्टाशी च पयः पिबन् सुकृतकृत् स्वस्थस्तथास्ते सुखम् ॥१५॥ (१) स्थान भ्रष्ट, (२) तपस्वी, (३) दूसरे की युवती में रत, (४) जुआ खेलने वाला, (५) मुख्य हाथी पर चढ़ा हुआ, (६) सिंहासन पर बैठा हुआ, (७) राजा, (८) शत्रुओं का नाश करने वाला, (९) सेना- पति या फौजदार, (१०) गुणी । (११) निष्प्राण (निःशक्त या मरा हुआ), (१२) जिसका सिर कटा हुआ है, (१३) जिसके हाथ और पैर में चोट लगी हुई है, (१४) गिरफ्तार (बन्धन में), (१५) विनष्ट, (१६) राजा, (१७) वेदों को पढ़ता है, (१८) सोता है, (१९) सच्चरित्र, (२०) धर्माचरण करने वाला। (२१) अच्छे वंश (कुल) का (२२) खज़ाना प्राप्त करने वाला,
चौथा अध्याय ग्रह बल ९३ (२३) प्रसिद्ध या विद्वान् कुल का, (२४) व्याख्या करने वाला, (२५) शत्रुओं का नाश करने वाला, (२६) रोगी (२७) शत्रुओं से हराया हुआ, (२८) जिसने अपना देश छोड़ दिया है, (२९) नौकर, (३०) जिसका धन नष्ट हो गया है । (३१) राजसभा में रहने वाला, (३२) अच्छा मंत्री या विचार देने वाला, (३३) दूसरे की पृथ्वी का स्वामी, (३४) पत्नी सहित, (३५) हाथी से डरा हुआ, (३६) डरपोक, (३७) बहुत डरा हुआ, (३८) छिप- कर रहने वाला, (३९) जो दूसरों को अन्न देता हो, (४०) अग्नि में पड़ा हुआ । (४१) भूखा, (४२) अन्न खाता हुआ, (४३) भ्रमण करने वाला, (४४) मांस खाने वाला, (४५) अस्त्र से जिसको घाव लगा है, (४६) विवाहित, (४७) जिसके हाथ में गेंद है, (४८) जुआ खेलने वाला, (४९) राजा, (५०) दुःखित । (५१) शय्या में लेटा हुआ, (५२) जिसकी सेवा शत्रु करें, (५३) मित्र सहित, (५४) योगी, (५५) भार्या सहित, (५६) मिठाई खाने वाला, (५७) दूध पीने वाला, (५८) अच्छे कर्म करने वाला, (५९) स्वस्थ, (६०) सुखी ॥ १३-१५ ॥ चन्द्र-अवस्था फल आत्मस्थानात्प्रवासो महितनृपहितो दासता प्राणहानि- र्भूपालत्वं स्ववंशोचितगुणनिरतो रोग आस्थानवत्त्वम् । भीतिः क्षुद्बाधितत्वं युवतिपरिणयो रम्यशय्यानुषक्ति र्मृष्टाशित्वं च गीता इति नियमवशात्सद्भिरिन्दोरवस्था ॥१६॥ (१) अपने घर से बाहर गया हुआ, (२) किसी बड़े राजा का कृपा पात्र, (३) दासता से प्राण हानि, (४) भूपालत्व (राजत्व), (५) अपने कुलोचित गुणों से युक्त, (६) रोग, (७) राज दरबार में होना, (८) भय, (९) भूख से व्याकुल (१०) युवती से विवाह, (११) सुन्दर शय्या में आराम की इच्छा, (१२) उत्तम भोजन करने वाला ॥ १६ ॥
९४ फलदीपिका चन्द्रवेला-फल मूर्द्धामयो मुदितता यजनं सुखस्थो नेत्रामयः सुखितता वनिताविहारः । उग्रज्वरः कनकभूषणमश्रुमोक्षः क्ष्वेला नं निधुवनं जठरस्य रोगः ॥ १७ ॥ क्रीडा जले हसनचित्रविलेखने च क्रोधश्च नृत्तकरणं घृतभुक्तिनिद्रे । दानक्रिया दशनरुक् कलहः प्रयाण- मुन्मत्तता च सलिलाप्लवनं विरोधः ॥ १८ ॥ स्वेच्छास्नानं क्षुद्भयं शास्त्रलाभं स्वैरं गोष्ठी योधनं पुण्यकर्म । पापा चारः क्रूरक र्मा प्रहर्षं प्राज्ञैरेवं चन्द्रवेला प्रदिष्टा ॥ १९ ॥ ३६ चन्द्र वेलाओं का फल निम्नलिखित है :- (१) सिरदर्द, (२) प्रसन्नता, (३) यज्ञ करना, (४) सुखी या सुखपूर्वक बैठा हुआ, (५) नेत्र रोग, (६) सुखी होना, (७) स्त्रियों से विहार, (८) तीव्र ज्वर, (९) सोने के आभूषण, (१०) नेत्रों से आंसू बहाते हुए, (११) जहर खाना, (१२) संभोग करना । (१३) पेट का रोग, (१४) जल में क्रीड़ा करना, हंसना, चित्रकला करना, (१५) क्रोध, (१६) नृत्य करना, (१७) घी खाना, (१८) सोना (निद्रा), (१९) दान देना, (२०) दांत का रोग, (२१) कलह (झगड़ा), (२२) यात्रा करना, (२३) उन्मत्तता, (नशा या पागलपन), (२४) पानी में तैरना । (२५) विरोध, (२६) अपनी इच्छा से स्नान करना, (२७) भूख, (२८) भय, (२९) शास्त्राध्ययन, (३०) अपनी मनमानी करने वाला, (३१) गोष्ठी (दोस्तों के साथ गपशप), (३२)युद्ध करना, (३३) पुण्य कर्म, (३४) पापाचार, (३४) क्रूर कर्म करने वाला, (३६) हर्ष ॥१९॥