प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
आबू जैन मंदिर के मडप के स्तभ और इलिका तोरण
सप्तमोऽध्यायः १२१ स्तंभ का विस्तारमान और भेद— प्रासादाद् दशरुद्रार्क-भागेन स्तम्भविस्तरः । वेदाष्टरविविंशत्यः कर्णा वृत्तस्तु पञ्चधा ॥१४॥ प्रासाद के दसवा, ग्यारहवा अथवा बारहवा भागके बराबर स्तंभ का विस्तार (मोटाई) रक्खे । तथा चार, आठ, बारह और बीस कोना वाला और गोल, ऐसे पाच प्रकार के स्तंभ हैं ॥१४॥ अपराजितपृच्छा सूत्र १८४ श्लोक ३५ मे तेरहवा और चौदहवा भाग के बराबर भी स्तंभ का विस्तार रखना लिखा है । आकृति से स्तंभसंज्ञा— "चतुरस्रश्च रुचका भद्रका भद्रसंयुताः । वर्द्धमानाः प्रतिरथैस्तथाष्टाश्रैश्चाष्टास्रकाः ॥ ग्रासनोर्ध्वं भवेद् भद्र-मष्टकर्णोस्तु स्वस्तिकाः । प्रकर्त्तव्या पञ्चविधा स्तम्भाः प्रासादरूपिणः ।।” अप० सू० १८४ चार कोना वाला चतुरस्र, भद्रवाला भद्रक, प्रतिरथवाला वर्द्धमान, आठ कोना वाला अष्टास्र और ग्रासन के ऊपर से भद्र और आठ कोना वाला स्वस्तिक नाम का स्तंभ कहा जाता है । ये पांच प्रकार के स्तंभ प्रासाद के अनुसार बनाना चाहिये । क्षीरार्णवग्रंथ के अनुसार स्तंभ का विस्तार मान— “एकहस्ते तु प्रासादे स्तम्भः स्याच्चतुरङ्गुलः । द्वौ हस्ते चाङ्गुलं सप्त त्रिहस्ते च नवाङ्गुलः ॥ तस्योर्ध्वं दशहस्तानां हस्ते हस्ते च द्वयङ्गुला । सपादाङ्गुला वृद्धिः स्यात् त्रिंशद्धस्ते यदा भवेत् ॥ अङ्गुलैका ततो वृद्धि-श्चत्वारिंशच्च हस्तके । तस्योर्ध्वं च शतार्द्धं च पादोनमङ्गुलं भवेत् ॥” एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद का स्तंभ चार अंगुल, दो हाथ के प्रासाद का स्तंभ सात अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद का स्तंभ नव अंगुल, चार से दश हाथ के प्रासाद का स्तंभ प्रत्येक हाथ दो दो अंगुल, ग्यारह से तीस हाथ के प्रासाद का स्तंभ प्रत्येक हाथ सवा सवा अंगुल, इकतीस से चालीस हाथ के प्रासाद का स्तंभ प्रत्येक हाथ एक एक अगुल और इकतालीस से प्रा० १६
१२२ प्रासादमण्डने पच्चास हाथ के विस्तार वाले प्रासाद का स्तंभ पौन पौन अंगुल बढाकर स्तंभ का विस्तार करना चाहिये । स्तंभका अन्य विस्तार मान— “एक हस्ते तु प्रासादे स्तम्भः स्याच्चतुरङ्गुलः । सप्ताङ्गुलश्च द्विहस्ते त्रिहस्ते तु नवाङ्गुलः ॥ द्वादशाङ्गुलविस्तारः प्रासादे चतुर्हस्तके । चतुर्हस्तादितः कृत्वा यावद् द्वादशहस्तकम् ॥ सार्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिः प्रतिहस्ते विवर्द्धयेत् । द्वादशहस्तस्योर्ध्वं तु यावत् त्रिशद्धस्तकम् ॥ अङ्गुलैका ततो वृद्धिर्हस्ते हस्ते प्रदापयेत् । अत ऊर्ध्वं ततः कुर्याद् यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥ अर्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिः कर्त्तव्या शिल्पिभिः सदा । उच्छ्रयं चतुर्गुणं प्रोक्तमेतत्स्तम्भस्य लक्षणम् ॥” इति ज्ञानप्रकाशदीपार्णवे । एक हाथ के प्रासाद मे स्तंभ का विस्तार चार अंगुल, दो हाथ के प्रासाद में सात अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद में नव अंगुल और चार हाथ के प्रासाद में बारह अंगुल रक्खे । पीछे पांच हाथ से बारह हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ डेढ़ डेढ़ अंगुल, तेरह हाथ से तीस हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ एक एक अंगुल और इकतीस से पचास हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा आधा अंगुल बढा करके स्तंभ का विस्तार रक्खे और विस्तार से चार गुणी स्तंभ की ऊंचाई रक्खे । प्राग्ग्रीव मंडप— द्वाराग्रे स्तम्भवेद्याद्या प्राग्ग्रीवो मण्डपो भवेत् । द्विद्विस्तम्भविवृद्धया च षोडशैव प्रकीर्त्तिताः ॥१५॥ प्रासाद के द्वारके आगे दो स्तंभवाली प्रथम वेदी है, वह प्राग्ग्रीव मंडप है । उनमें दो २ स्तंभ बढ़ाने से सोलह प्रकार का प्राग्ग्रीव मंडप होता है ॥१५॥ विशेष जानने के लिये देखो अपराजितपृच्छा सूत्र १८८ श्लोक १ से ११ आठ जाति के गूढ मंडप— भित्तिः प्रसादवद् गूढे मण्डपेऽष्टविधेषु च । चतुरस्रः सुभद्रश्च तथा प्रतिरथान्वितः ॥१६॥
सर्वाङ्ग पूर्ण सांगोपांग वाला प्राचीन देवालय आमेर - जयपुर (राजस्थान)
जगतशरणजी का प्राचीन मेरु मडोवर वाला देवालय श्रामेर-जयपुर (राजस्थान)
सप्तमोऽध्यायः १२३ तीनों आद्यस्तंभ मोढेरा सोमपुरा २ पालिताना (काठियावाड) स्तम्भो के नमूने
१२४ प्रासादमण्डने मुखभद्रयुतो वापि द्वित्रिप्रतिरथैर्युतः । कर्णोदकान्तरेणाथ भद्रोदकविभूषितः ॥१७॥ आठ प्रकार के गूढ मंडपों की भी दीवार प्रासाद के दीवार जैसी बनावें अर्थात् प्रासाद की दीवार जितने थरवाली हों उतने थरवाली और रूपों की आकृति वाली हो तो रूपों की आकृति वाली गूढ मंडप की दीवार बनानी चाहिये । वे समचोरस, सुभद्र और प्रतिरथ वाला, मुखभद्र और दो या तीन प्रतिरथ वाला, कर्ण जलान्तर वाला अथवा भद्र जलान्तर वाला, ऐसे आठ प्रकार के गूढ मंडप है ॥१६-१७॥
सप्तमोऽध्यायः - १२५ गूढमण्डप की फालना— कर्णतो द्विगुण भद्रं पादोनप्रतिकर्णकः । भद्रार्धं मुखभद्रं च शेषं षड्द्वसु भाजितम् ॥१८॥ कोने से दुगुणा भद्र और पौन भाग का प्रतिरथ रखे, भद्र से आधा मुखभद्र रखे । बाकी नंदी आदि छठ्ठ अथवा आठवे भाग की रखे ॥१८॥ दलेनाधेन पादेन दलस्य निर्गमो भवेत् । मूलप्रासादवद् बाह्ये पीठजङ्घादिमेखला ॥१६॥ फालनाओ का निर्गम अपना चौथा अथवा आधा भाग का रखे तथा पीठ जंघा आदि की मेखलाएं मुख्य प्रासाद के जैसी बाहर निकलती हुई बनावे ॥१६॥ गवाक्षेणान्वितं भद्र-मथ जालकसंयुतम् । गूढोऽथ कर्णगूढो वा भद्रे चन्द्रावलोकनम् ॥२०॥ गूढ मंडप के भद्र मे जाली अथवा गवाक्ष बनावे । कोने गुप्त (अंधकार मय) रखें अर्थात् दीवार बनावे अथवा भद्र मे चन्द्रावलोकन (खुला भाग) रखें ॥२०॥ त्रिद्वारे चैकवक्त्रेऽथ मुखे कार्या चतुष्किका । गूढे प्राकाशके वृत्त-मर्धोदयं करोटकम् ॥२१॥ इत्यष्टगूढमण्डपाः । गूढ मंडप मे तीन अथवा एक द्वार बनावे और द्वारके आगे चौकी मंडप बनावे । मंडप की गोलाई के विस्तार मान से आधे मान का करोटक (गूमट) का उदय रखे ॥२१॥ विशेष जानने के लिये देखे अप० सू० १८७ वर्द्धमानादि अष्टमंडप । गूमट' के उदयका तीन प्रकार— “अर्धोदयश्च यत्प्रोक्तो वामन उदयो भवेत् । कृते चैव भवेच्छान्तिः सर्वयज्ञफल लभेत् ॥ अर्धोदयश्च नवधा द्वौ भागौ परिवर्जयेत् । अनन्त उदयो नाम सर्वलोकसुखावह ॥ अर्धोदयश्च नवधा त्रयभागान् परित्यजेत् । वाराह उदयो नाम अनन्तफलदायकः ॥” ज्ञानरत्नकोशे ।
१२६ . प्रासादमण्डन. गूमट का उदय विस्तार से आधे मानका रक्खें, यह वामन नाम का उदय कहा जाता है यह सब यज्ञों के फल को देने वाला है और शान्तिदायक है। उदय का नव भाग कर, उन में से दो भाग कम करके सात भाग का उदय रक्खें, उसको अनन्त नाम का उदय कहते हैं, यह सब लोगों के लिये सुख कारक है। नव भाग मे से तीन भाग कम करके छह भाग का उदय रक्खें उसको वाराह नाम का उदय कहते हैं। यह अनन्त फल को देने वाला है। गूमट का न्यूनाधिक उदय फल-- "उदयाश्च समाख्याता अनन्त फलदायकाः । तत्र देशे भवेच्छान्ति-रारोग्यं च प्रजायते ॥ उदये हीनाश्च ये केचित् क्रियन्ते मण्डपा भुवि । तत्र मारी महाव्याधी राष्ट्रभङ्गभयं भवेत् ॥ दुर्भिक्षं चातिरीद्रं च राजा च म्रियते तथा । धनं निष्फलतां याति शिल्पिनो म्रियन्ते ध्रुवम् !!" इति ज्ञानरत्नकोशे । उदय का जो मान बतलाया है, उसी मान के अनुसार कार्य करने से वह अनन्त फल को देने वाला, देश में शान्ति करने वाला और आरोग्यता को बढ़ाने वाला है। यदि ये मंडप कहे हुए उदय के मान से हीन करें तो देश में महामारी, अनेक प्रकार की व्याधियां, देश भंग का भय, भयंकर दुर्भिक्ष, राजा को मृत्यु, धनकी निष्फलता और शिल्पियों की मृत्यु, इत्यादि उपद्रव होने का भय है। बारह चौको मंडप-- एकत्रिवेदपट्सप्ता-ङ्कचतुष्कयस्त्रिकत्रये । अग्रे भद्रं विना पार्श्वे पार्श्वयोरग्रतस्तथा ॥२२॥ अग्रतस्त्रिचतुष्कयश्च तथा पार्श्वद्वयेऽपि च । मुक्तकोणं चतुष्के चेदिति द्वादश मण्डपाः ॥२३॥ गूढमंडप के आगे एक, तीन, चार, छह, सात और नव चौकी वाले, ये छह प्रकार के मंडप हुए, उनमें छट्ठा नव चौकी वाले मंडप के आगे एक चौकी हो ७, अथवा आगे चौकी न हो परन्तु दोनों बगल मे एक एक चौकी हो ८, तथा दोनों बगल मे और आगे एक एक चौकी हो ९, अथवा आगे तीन चौकी हो, अर्थात तीन तीन चौकी वाली चार लाईन हो १०, इसके दोनों बगल में एक २ चौकी हो ११ अथवा दोनों बगल में और आगे एक ३ चौकी हो १२, ऐसे बारह प्रकार के चौकी मंडप हैं॥२२-२३॥
सप्तमोऽध्यायः १२७ अपराजितपृच्छा सूत्र १८७ मे विशेषरूप से कहा है कि— गूढमंडप के आगे एक चौकी वाला सुभद्र १, तीन चौकी वाला किरीटीर, तीन चौकी के आगे एक चौकी, ऐसा चार चौकी वाला दुंदुभी ३, तीन २ चौकी की दो लाईन, ऐसा छह चौकी वाला प्रान्त ४, छह चौकी के आगे एक चौकी ऐसा सात चौकी वाला मनोहर कामद ५, [रेखाचित्र विवरण:] १. सुभद्र १ २. किरीट २ — ३ पद, ८ स्तंभ ३. दुन्दुभि ३ — ५ पद, १० स्तंभ (३२ स्वीर्क मण्डप) ४. प्रान्त ४ — ६ पद, १२ स्तंभ ५. मनोहर ५ — ७ पद, १४ स्तंभ ६. शांत ६ — ९ पद, १६ स्तंभ ७. नंद ७ — १० पद, १८ स्तंभ (कुंभोद्भव मण्डप) [१२ चौकी मण्डप:] ८. सुदर्शन ८ — २४ पद, २० स्तंभ ९. रूपक ९ — २२ पद, २२ स्तंभ १०. सुनाभ १० — २४ पद, २४ स्तंभ ११. सिंह ११ — २५ पद, २६ स्तंभ १२. सूर्योत्थक १२ — २८ पद, २८ स्तंभ
१२८ प्रासादमण्डने तीन २ चौकी की तीन लाईन ऐसा नव चौकी वाला शान्त नाम का मंडप कहा जाता है ॥६॥ शान्तमंडप के आगे एक चौकी हो तो नंद ७, शान्तमंडप के आगे चौकी न हो, परन्तु दोनों बगल में एक २ चौकी हो तो सुदर्शन ८, शान्तमंडप के आगे और दोनों बगल में एक २ चौकी हो तो रम्यक ९, तीन २ चौकी वाली चार लाईन हो तो सुनाभ १०, सुनाभ मंडप के दोनो बगल में एक २ चौकी हो तो सिंह ११, और सिंह मंडप के आगे एक चौकी हो तो सूर्यात्मक नामका मंडप १२ कहा जाता है । इन मंडपों के ऊपर गूमट अथवा संवरणा किया जाता है । गूढस्याग्रे प्रकर्त्तव्या नानाचतुष्किकान्विताः । चतुरस्रादिभेदेन बितानैर्बहुभिर्युताः ॥२४॥ इति द्वादशत्रिकमंडपाः । पुष्पकादि मण्डपो. [१ सुभद्र, ३२ स्तंभ] [२ श्यामभद्र, ३४ स्तंभ] [३ सिंहक, ३६ स्तंभ] [४ पद्माधिक, ३८ स्तंभ] [५ कर्णिकार, २० स्तंभ] [६ हर्षण, २२ स्तंभ] [७ सुग्रीव, २४ स्तंभ] [८ विमानभद्र, २६ स्तंभ] [९ मानव, २८ स्तंभ] [१० नंदन, ३० स्तंभ] [११ कुल्य, ३२ स्तंभ] [१२ शत्रुमर्दल, ३४ स्तंभ] [१३ सुमेरु, ३६ स्तंभ] [१४ विशालाक्ष, ३८ स्तंभ]
सप्तमोऽध्यायः १२६ ऐसे ये बारह प्रकार के मंडप गूढ मंडप के आगे अनेक प्रकार के चौकी वाले किये जाते हैं। तथा ये मंडप समचोरस आदि आकृति वाले और अनेक प्रकार के वितान (चदोवा) वाले होते हैं ॥२४॥ नृत्यमण्डप— त्रिकाग्रे रङ्गभूमिर्या तत्रैव नृत्यमण्डपः । प्रासादाग्रेऽथ सर्वत्र प्रकुर्याच्च विधानतः ॥२५॥ चौकी मंडप के आगे जो रंगभूमि है, उसी भूमि के ऊपर ही नृत्यमंडप किया जाता है। ऐसा सब प्रासादो के आगे बनाने का विधान है ॥२५॥ [चित्र: विभिन्न मण्डप योजनाएँ] (१) १५ यशगेह (६४ स्तंमे) (२) १६ श्रीधर (६४ स्तंमे) (३) १७ वासुकीर्ति (६४ स्तंमे) (४) १८ विजय (६८ स्तंमे) (५) १९ श्रीवत्स (६८ स्तंमे) (६) २० गयोदय (५० स्तंमे) पुष्पकादि मण्डपो (७) २१ गजयश (५२ स्तंमे) (८) २२ सुविभीषक (५६ स्तंमे) (९) २३ कोशक्य (५६ स्तंमे) पुष्पकांक सोमकादि
१३० प्रासादमण्डने सप्तविंशति मण्डप— सप्तविंशतिरुक्ता ये मण्डपा विश्वकर्मणा । तलैस्तु विषमैस्तुल्यैः क्षणैः स्तम्भैः समैस्तथा ॥२६॥ प्रथमो द्वादशस्तम्भो द्विद्विस्तम्भविवर्द्धनात् । यावत् षष्टिश्चतुर्युक्ताः सप्तविंशतिमण्डपाः ॥२७॥ श्री विश्वकर्मा ने जो सत्ताईस प्रकार के मंडप कहे है उनके तल सम अथवा विषम कर सकते हैं, परन्तु क्षण (खड ?) और स्तंभ ये सम संख्या मे ही रखना चाहिये। पहला मंडप बारह स्तंभ का है। पीछे दो २ स्तंभ की वृद्धि चौसठ स्तंभ तक बढाने से सत्ताईस मंडप होते है ॥२६-२७॥ विशेष जानने के लिये देखें समरांगण सूत्रधार अध्याय ६७ और अपराजितपृच्छा सूत्र १८६ वा। इन दोनो मे प्रथम मंडप चौसठ स्तंभों का लिखा है, पीछे दो २ स्तंभ घटाने से सत्ताईसवा मंडप बारह स्तंभ का बनाने को कहा है। [चित्र: पुष्पकादि २७ मण्डपो — २४ सुभानन्दन (५८ स्तंभ), २५ सुग्रीव (६० स्तंभ), २६ पुष्पभद्र (६२ स्तंभ), २७ पुष्पक (६४ स्तंभ)] अष्टास्र और षोडशास्र-- क्षेत्रार्धं स्वषडंशोन-मेकास्रेऽष्टास्रमुच्यते । कलास्रः क्षेत्रषड्भागास्तत्षडंशेन संयुतः ॥२८॥
सप्तमोऽध्यायः १३१ क्षेत्र के विस्तार के आधे का छह भाग करे, उनमे से एक भाग कम करके बाकी पांच भाग के मान की अष्टास्र की एक भुजा का मान जाने । यदि पोडशास्र बनाना हो तो क्षेत्र के विस्तार का छह भाग करे। उनमे से एक भाग का छट्ठा भाग विस्तार के छठ्ठे भाग में जोड़ देने से जो मान हो, यही मानकी पोडशास्र की एक भुजा का मान होता है ॥२८॥ वितान (चंदोवा-गूमट)— अष्टास्रं षोडशास्रं च वृत्तं कुर्यात् तदूर्ध्वतः । उदयं विस्तारार्धेन षट् पञ्च सप्त वा भवेत् ॥२६॥ मंडप के चंदोवा का उदय बनाने की क्रिया इस प्रकार है। प्रथम पाट के ऊपर अष्टास्र बना कर उसके ऊपर पोडशास्र बनावे और षोडशास्र के ऊपर गोलाई बनावें। मंडप के विस्तार से आधा वितान का उदय रक्खे । उदय मे पाच छह अथवा सात थर बनावे ॥२९॥ वितान (गूमट) के थर— कर्णाद्दर्दरिका सप्त-भागेन निर्गमोन्नता¹ । रूपकण्ठस्तु पञ्चांशो द्विभागेनात्र² निर्गमः ॥३०॥ १. "निर्गमोच्छूयः ।' २. 'द्विभागोन्नत ।'
१३२ प्रासादमण्डने कर्णदर्दिरिका का थर सात भाग के उदय मे और सात भाग निर्गम में रक्खे । रूपकंठ का उदय पांच भाग और निर्गम दो भाग रखें ॥३०॥ विद्याधरैः समायुक्तं षोडशाष्टदिवाकरैः । जिनसंख्यामितैर्वापि दन्ततुल्यैर्विराजितम् ॥३१॥ आठ, बारह, सोलह, चौबीस अथवा बत्तीस विद्याधरों से युक्त सुन्दर वितान बनावे ॥३१॥ विद्याधरः पृथुत्वेन सप्तांशो निर्गमो¹ दश । तदूर्ध्वे चित्ररूपाश्च नर्त्तक्यः ²शालभञ्जिकाः ॥३२॥ विद्याधर का थर विस्तार मे सात भाग और निर्गम मे दस भाग रक्खे । उसके ऊपर अनेक प्रकार से नृत्य करती हुई, अनेक स्वरूप वाली देवांगना रक्खें ॥३२॥ गजतालुस्तु षट्सार्धा प्रथमा द्वितीया तु षट् । तृतीया सार्धपञ्चांशा कोलानि त्रीणि पंच वा ॥३३॥ प्रथम गजतालु साढे छह भाग, दूसरा गजतालु छह भाग और तीसरा गजतालु साढे पांच भाग का रक्खे । तीन अथवा पांच कोल का थर बनावें ॥३३॥ मध्ये वितानं कर्त्तव्यं चित्रवर्णविराजितम् । नाटकादिकथारूपैर्-र्नानाकारैर्विराजितम् ॥३४॥ मडप के मध्य मे वितान (चंदोवा) अनेक प्रकार के चित्रों से शोभायमान बनावे तथा संगीत और नृत्य करती हुई देवागनाओ से और पुराणादि के अनेक प्रकार के कथारूपों से सुशोभित बनावे ॥३४॥ वितान संख्या— एकादशशतान्येव वितानानां त्रयोदश । शुद्धसङ्घाटमिश्राणि क्षिप्तोत्क्षिप्तानि यानि च ॥३५॥ ग्यारहसो तेरह प्रकार के वितान है । वे शुद्ध संघात (समतल वाले), संघार्टमिश्र सम विषम तल वाला, क्षिप्त (नीचे भाग मे लटकते थरो वाला) और उत्क्षिप्त (ऊपर उठी हुई गोलाई वाला) ये चार प्रकार के वितान है ॥३५॥ १. 'निर्गमोदयः।' २. 'नृत्यशोभिताः ।'
सप्तमोऽध्यायः १३३ अपराजितपृच्छा सूत्र. १८६ मे श्लोक ४ मे वितान के मुख्य तीन प्रकार लिखे है । देखो— "वितानानि विचित्राणि क्षिप्तान्युत्क्षिप्तकानि च । समतलानि ज्ञेयानि उदितानि त्रिधा क्रमात् ॥" क्षिप्त, उत्क्षिप्त और समतल ये तीन प्रकार के वितान कहे हैं । वर्ण और जाति के चार प्रकार के वितान--- "पद्मकं नाभिच्छन्दश्च सभामार्गस्तृतीयकः । मन्दारक इति प्रोक्तो वितानाश्च चतुर्विधाः ॥" अप० सू० १८६ श्लो० ६ पद्मक, नाभिछन्द, सभामार्ग और मन्दारक ये चार प्रकार के वितान हैं। "पद्मको विप्रजातिः स्यात् क्षत्रियो नाभिच्छन्दकः । सभामार्गो भवेद् वैश्यः शुद्रो मन्दारकस्तथा ॥" श्लो० ७ ब्रह्मण जाति का पद्मक, क्षत्रिय जातिका नाभिछन्द, वैश्यजातिका सभामार्ग और शूद्रजातिका मंदारक नामका वितान है । "पद्मकः श्वेतवर्णः स्यात् क्षत्रियो रक्तवर्णकः । सभामार्गो भवेत् पीतो मन्दारः सर्ववर्णकः ॥" श्लो० ८ सफेद वर्ण का पद्मक, लाल वर्ण का नाभिछंद, पीले वर्ण का सभामार्ग और अनेक वर्ण का मंदारक है । फिर अपराजित पृच्छा सूत्र १९० मे भी चार प्रकारके वितान कहे है— "वितानांश्च प्रवक्ष्यामि भेदंस्तच्च चतुर्विधम् । पद्मक नाभिच्छन्दं च सभा मन्दारकं तथा ॥ श्लो० १ शुद्धश्च छन्दसंघाटो भिन्न उद्भिग्न एव च । एतेषा सन्ति ये भेदाः कथये तान् समासतः ॥" श्लो० २ चार प्रकार के वितानो को कहता हू । पद्मक, नाभिच्छद, सभा और मन्दारक इन चार प्रकार के वितान के शुद्ध, संघात, भिन्न और उद्भिग्न ये चार भेद है । उसको संक्षेप से कहता हूँ । "एकत्वे च भवेच्छुद्धः संघातश्च द्विमिश्रणात् । त्रिमिश्राश्च तथा भिन्ना उद्भिग्नाश्चतुरन्विताः ॥" श्लो० ३ एकही प्रकारकी आकृति वाले शुद्ध, दो प्रकार की मिश्र आकृति वाले सघात, तीन प्रकार की आकृति वाले भिन्न और चार प्रकार की आकृति वाले उद्भिग्न नामके वितान है । "पद्मनाभ सभापद्मं सभामन्दारकं तथा । कमलोद्भवमाख्यातं मिश्रकाणां चतुष्टयम् ॥" श्लो० ४
१३४ प्रासादमण्डने पद्मनाभ, सभापद्म, सभामन्दारक और कमलोद्भव ये चार मिश्र जाति के वितान हैं । “किन्तु इसमे इसको आकृतियो का वर्णन नहीं लिखा है ।” वितानानि विचित्राणि वस्त्रचित्रादिभेदतः । शिल्पिलोके प्रवर्त्तन्ते तस्मादूह्यानि लोकतः ॥३६॥ जैसे अनेक प्रकार के चित्र आदि से विभिन्न प्रकार के वस्त्र है, वैसे ही शिल्पशास्त्र मे अनेक प्रकार के वितान है । वे अन्य शास्त्रों से विचार करके बनावे ॥३६॥ रंगभूमि-- मण्डपेषु च सर्वेषु पीठान्ते रङ्गभूमिका । कुर्यादुत्तानपट्टेन चित्रपाषाणजेन च ॥३७॥ इति मण्डपाः । समस्त मंडपो की पीठ के नीचे की जो भूमि है, वह रंग भूमि कही जाती है । वह बड़े लम्बे चौड़े पाषाणों से तथा अनेक प्रकार के चित्र विचित्र पाषाणों से बनाने चाहिए ॥३७॥ बलाणक का स्थान-- बलाणं देवगेहाग्रे राजद्वारे गृहे पुरे । जलाशयेऽथ कर्त्तव्यं सर्वेषां मुखमण्डपम् ॥३८॥ देवालय के द्वार के आगे तथा प्रवेश द्वारके ऊपर, राजमहल, गृह, नगर और जलाशय ( बावडी, तालाब आदि ) इन सब के द्वार के आगे मुखमंडप ( बलाणक ) किया जाता है ॥३८॥ बलाणक का मान-- जगतीपादविस्तीर्णं पादपादेन वर्जितम् । शालालिन्देन गर्भेण प्रासादेन समं भवेत् ॥३६॥ बलाणक का विस्तार जगती का चौथा भाग का अथवा चौथे का चौथा भाग न्यून, शाला और अलिंद के मान से, प्रासाद के गर्भमान के अथवा प्रासाद के मान के बराबर बनावे ॥३६॥ प्रासाद मे बलाणक का स्थान-- उत्तमे कन्यसं मध्ये मध्यं ज्येष्ठं तु कन्यसे । एकद्वित्रिचतुःपञ्च-रससप्तपदान्तरे ॥४०॥
सप्तमोऽध्यायः १३५ ज्येष्ठमान के प्रासाद में कनिष्ठ मान का, मध्यममान के प्रासाद मे मध्यम मान का और कनिष्ठमान के प्रासाद मे ज्येष्ठमान का वलाणक किया जाता है। यह प्रासाद से एक, दो तीन, चार, पाच, छह अथवा सात पद के अन्तर से (दूर) बनाया जाता है *॥४०॥ मूलप्रासादवद् द्वारं मण्डपे च वलाणके । न्यूनाधिकं न कर्त्तव्यं दैर्घ्ये हस्ताङ्गुलाधिकम् ॥४१॥ मंडप का द्वार और वलाणक का द्वार मुख्य प्रासाद के द्वार के बराबर रखना चाहिये । यदि वढाने की आवश्यकता हो तो द्वार की ऊंचाई मे हस्तागुल (जितने हाथ का हो उतने अंगुल) बढ़ा सकते है। 'यह नीचे के भाग मे वढाना चाहिये, क्यों कि उत्तरंग तो सब समसूत्र मे रखा जाता है ऐसा शास्त्रीय कथन है ॥४१॥ उत्तरंग का पेटा भाग— पेटकं चोत्तरङ्गानां सर्वेषां समसूत्रतः । अङ्गणेन समं पेटं जगत्याश्चोत्तरङ्गजम् ॥४२॥ सब उत्तरंग का पेटा भाग (उत्तरंग के नीचे का भाग) समसूत्र मे रखना चाहिये और जगती के द्वार के उत्तरंग का पेटा भाग प्रासाद के आगन जगती के मथला बराबर रखना चाहिये ॥४२॥ पांच प्रकार के वालाणक— जगत्यग्रे चतुष्किका' वामन तद् वलाणकम् । वामे च दक्षिणे द्वारे वेदिकामत्तवारणम् ॥४३॥ जगती के आगे की चौकी के ऊपर जो वलाणक किया जाता है, वह वामन नामका वलाणक कहा जाता है। उसके बायी और दाहिनी ओर के द्वार पर वेदिका और मत्तवारण किया जाता है ॥४३॥ ऊर्ध्वा भूमिः प्रकर्त्तव्या नृत्यमण्डपसूत्रतः । मत्तवारणं वेदी च वितानं तोरणैर्युता ॥४४॥
- अपराजित पृच्छा सूत्र १२२ श्लोक १० मे एक से आठ पद के अंतरे भी बनाना लीखा है। १ 'चतुष्की या' ।
१३६ प्रासादमण्डने बलाणक को ऊर्ध्वभूमि नृत्यमंडप के समसूत्र में रखनी चाहिये । तथा मत्तवारण, वेदी, वितान और तोरणों से शोभायमान बनानी चाहिए ॥४४॥ राजद्वारे बलाणे च पञ्च वा सप्तभूमिकाः । तद्विमानं बुधैः प्रोक्तं पुष्करं वारिमध्यतः ॥४५॥ राजद्वार के ऊपर जो पांच अथवा सात भूमिवाला बलाणक किया जाता है, उसको विद्वान् शिल्पी विमान अथवा उत्तुं ग नामका बलाणक कहते है । तथा जलाशय के बलाणक को पुष्कर नामका बलाणक कहते है ॥४५॥ हर्म्यशालो गृहे वापि कर्त्तव्यो गोपुराकृतिः । एकभूम्यास्त्रिभूम्यन्तं गृहाग्रद्वारमस्तके ॥४६॥ इति पंचबलाणकम् । गृहद्वार के आगे एक, दो अथवा तीन भूमिवाला जो बलाणक किया जाय, उसका नाम हर्म्यशाल है । वह गोपुराकृति वाला बनाया जाता है । (किले के द्वार के ऊपर जो बलाणक किया जाता है, उसको गोपुर नाम का बलाणक कहते है ) । कौन २ देव के आगे बलाणक करना— “शिवसूर्यो ब्रह्मविष्णू चण्डिका जिन एव च । एतेषा च सुराणा च कुर्यादग्रे बलाणकम् ॥” अप० सू० १२३ शिव, सूर्य, ब्रह्म, विष्णु, चंडिका और जिन, इन देवो के आगे बलाणक बनाना चाहिए । संवरणा— संवरणा प्रकर्त्तव्या प्रथमा पञ्चघण्टिका । चतुर्घण्टाभिवृद्धया च यावदेकोत्तरं शतम् ॥४७॥ मंडप आदि के ऊपर गुमटी के स्थान पर संवरणा की जाती है । प्रथम संवरणा पांच घंटी की है । आगे प्रत्येक संवरण की चार चार घंटी की वृद्धि से एक सौ घंटी तक बढाया जाता है ॥४७। पञ्चविंशति रित्युक्ताः प्रथमा वसुभागिका । वेदोत्तरं शतं यावद् वेदांशा वृद्धिरिष्यते ॥४८॥
सप्तमोऽध्यायः १३७ उपरोक्त घंटिका की संख्यानुसार संवरणा पच्चीस प्रकार की हैं। उन में प्रथम संवरणा की भूमि का आठ आठ भाग करें। पीछे प्रत्येक संवरणा में चार चार भाग एक सौ चार भाग तक बढाने चाहिये ॥४८॥ भद्रार्धे रथिकार्धे च तवङ्गं वामदक्षिणे । अर्धोदयेन रथिका घण्टा कूटं तवङ्गकम् ॥४९॥ भद्राध की रथिकार्ध के मान का दोनो तरफ तवग बनावे । रथिका, घंटा, कूट और तवंग, ये विस्तार से आधा उदय मे रक्खें ॥४९॥ मूलघण्टा रथिका कूट १ पुष्पिका-नाम संवर्णा (१) घंटिका ५ कूट १६. सिंह ८. भाग प्रभातशङ्कर. ओ. सोमपुरा पुष्पिका नाम की प्रथम संवरणा प्रा० १६