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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

१२८ प्रासादमण्डने तीन २ चौकी की तीन लाईन ऐसा नव चौकी वाला शान्त नाम का मंडप कहा जाता है ॥६॥ शान्तमंडप के आगे एक चौकी हो तो नंद ७, शान्तमंडप के आगे चौकी न हो, परन्तु दोनों बगल में एक २ चौकी हो तो सुदर्शन ८, शान्तमंडप के आगे और दोनों बगल में एक २ चौकी हो तो रम्यक ९, तीन २ चौकी वाली चार लाईन हो तो सुनाभ १०, सुनाभ मंडप के दोनो बगल में एक २ चौकी हो तो सिंह ११, और सिंह मंडप के आगे एक चौकी हो तो सूर्यात्मक नामका मंडप १२ कहा जाता है । इन मंडपों के ऊपर गूमट अथवा संवरणा किया जाता है । गूढस्याग्रे प्रकर्त्तव्या नानाचतुष्किकान्विताः । चतुरस्रादिभेदेन बितानैर्बहुभिर्युताः ॥२४॥ इति द्वादशत्रिकमंडपाः । पुष्पकादि मण्डपो. [१ सुभद्र, ३२ स्तंभ] [२ श्यामभद्र, ३४ स्तंभ] [३ सिंहक, ३६ स्तंभ] [४ पद्माधिक, ३८ स्तंभ] [५ कर्णिकार, २० स्तंभ] [६ हर्षण, २२ स्तंभ] [७ सुग्रीव, २४ स्तंभ] [८ विमानभद्र, २६ स्तंभ] [९ मानव, २८ स्तंभ] [१० नंदन, ३० स्तंभ] [११ कुल्य, ३२ स्तंभ] [१२ शत्रुमर्दल, ३४ स्तंभ] [१३ सुमेरु, ३६ स्तंभ] [१४ विशालाक्ष, ३८ स्तंभ]

सप्तमोऽध्यायः १२६ ऐसे ये बारह प्रकार के मंडप गूढ मंडप के आगे अनेक प्रकार के चौकी वाले किये जाते हैं। तथा ये मंडप समचोरस आदि आकृति वाले और अनेक प्रकार के वितान (चदोवा) वाले होते हैं ॥२४॥ नृत्यमण्डप— त्रिकाग्रे रङ्गभूमिर्या तत्रैव नृत्यमण्डपः । प्रासादाग्रेऽथ सर्वत्र प्रकुर्याच्च विधानतः ॥२५॥ चौकी मंडप के आगे जो रंगभूमि है, उसी भूमि के ऊपर ही नृत्यमंडप किया जाता है। ऐसा सब प्रासादो के आगे बनाने का विधान है ॥२५॥ [चित्र: विभिन्न मण्डप योजनाएँ] (१) १५ यशगेह (६४ स्तंमे) (२) १६ श्रीधर (६४ स्तंमे) (३) १७ वासुकीर्ति (६४ स्तंमे) (४) १८ विजय (६८ स्तंमे) (५) १९ श्रीवत्स (६८ स्तंमे) (६) २० गयोदय (५० स्तंमे) पुष्पकादि मण्डपो (७) २१ गजयश (५२ स्तंमे) (८) २२ सुविभीषक (५६ स्तंमे) (९) २३ कोशक्य (५६ स्तंमे) पुष्पकांक सोमकादि

१३० प्रासादमण्डने सप्तविंशति मण्डप— सप्तविंशतिरुक्ता ये मण्डपा विश्वकर्मणा । तलैस्तु विषमैस्तुल्यैः क्षणैः स्तम्भैः समैस्तथा ॥२६॥ प्रथमो द्वादशस्तम्भो द्विद्विस्तम्भविवर्द्धनात् । यावत् षष्टिश्चतुर्युक्ताः सप्तविंशतिमण्डपाः ॥२७॥ श्री विश्वकर्मा ने जो सत्ताईस प्रकार के मंडप कहे है उनके तल सम अथवा विषम कर सकते हैं, परन्तु क्षण (खड ?) और स्तंभ ये सम संख्या मे ही रखना चाहिये। पहला मंडप बारह स्तंभ का है। पीछे दो २ स्तंभ की वृद्धि चौसठ स्तंभ तक बढाने से सत्ताईस मंडप होते है ॥२६-२७॥ विशेष जानने के लिये देखें समरांगण सूत्रधार अध्याय ६७ और अपराजितपृच्छा सूत्र १८६ वा। इन दोनो मे प्रथम मंडप चौसठ स्तंभों का लिखा है, पीछे दो २ स्तंभ घटाने से सत्ताईसवा मंडप बारह स्तंभ का बनाने को कहा है। [चित्र: पुष्पकादि २७ मण्डपो — २४ सुभानन्दन (५८ स्तंभ), २५ सुग्रीव (६० स्तंभ), २६ पुष्पभद्र (६२ स्तंभ), २७ पुष्पक (६४ स्तंभ)] अष्टास्र और षोडशास्र-- क्षेत्रार्धं स्वषडंशोन-मेकास्रेऽष्टास्रमुच्यते । कलास्रः क्षेत्रषड्भागास्तत्षडंशेन संयुतः ॥२८॥

सप्तमोऽध्यायः १३१ क्षेत्र के विस्तार के आधे का छह भाग करे, उनमे से एक भाग कम करके बाकी पांच भाग के मान की अष्टास्र की एक भुजा का मान जाने । यदि पोडशास्र बनाना हो तो क्षेत्र के विस्तार का छह भाग करे। उनमे से एक भाग का छट्ठा भाग विस्तार के छठ्ठे भाग में जोड़ देने से जो मान हो, यही मानकी पोडशास्र की एक भुजा का मान होता है ॥२८॥ वितान (चंदोवा-गूमट)— अष्टास्रं षोडशास्रं च वृत्तं कुर्यात् तदूर्ध्वतः । उदयं विस्तारार्धेन षट् पञ्च सप्त वा भवेत् ॥२६॥ मंडप के चंदोवा का उदय बनाने की क्रिया इस प्रकार है। प्रथम पाट के ऊपर अष्टास्र बना कर उसके ऊपर पोडशास्र बनावे और षोडशास्र के ऊपर गोलाई बनावें। मंडप के विस्तार से आधा वितान का उदय रक्खे । उदय मे पाच छह अथवा सात थर बनावे ॥२९॥ वितान (गूमट) के थर— कर्णाद्दर्दरिका सप्त-भागेन निर्गमोन्नता¹ । रूपकण्ठस्तु पञ्चांशो द्विभागेनात्र² निर्गमः ॥३०॥ १. "निर्गमोच्छूयः ।' २. 'द्विभागोन्नत ।'

१३२ प्रासादमण्डने कर्णदर्दिरिका का थर सात भाग के उदय मे और सात भाग निर्गम में रक्खे । रूपकंठ का उदय पांच भाग और निर्गम दो भाग रखें ॥३०॥ विद्याधरैः समायुक्तं षोडशाष्टदिवाकरैः । जिनसंख्यामितैर्वापि दन्ततुल्यैर्विराजितम् ॥३१॥ आठ, बारह, सोलह, चौबीस अथवा बत्तीस विद्याधरों से युक्त सुन्दर वितान बनावे ॥३१॥ विद्याधरः पृथुत्वेन सप्तांशो निर्गमो¹ दश । तदूर्ध्वे चित्ररूपाश्च नर्त्तक्यः ²शालभञ्जिकाः ॥३२॥ विद्याधर का थर विस्तार मे सात भाग और निर्गम मे दस भाग रक्खे । उसके ऊपर अनेक प्रकार से नृत्य करती हुई, अनेक स्वरूप वाली देवांगना रक्खें ॥३२॥ गजतालुस्तु षट्सार्धा प्रथमा द्वितीया तु षट् । तृतीया सार्धपञ्चांशा कोलानि त्रीणि पंच वा ॥३३॥ प्रथम गजतालु साढे छह भाग, दूसरा गजतालु छह भाग और तीसरा गजतालु साढे पांच भाग का रक्खे । तीन अथवा पांच कोल का थर बनावें ॥३३॥ मध्ये वितानं कर्त्तव्यं चित्रवर्णविराजितम् । नाटकादिकथारूपैर्-र्नानाकारैर्विराजितम् ॥३४॥ मडप के मध्य मे वितान (चंदोवा) अनेक प्रकार के चित्रों से शोभायमान बनावे तथा संगीत और नृत्य करती हुई देवागनाओ से और पुराणादि के अनेक प्रकार के कथारूपों से सुशोभित बनावे ॥३४॥ वितान संख्या— एकादशशतान्येव वितानानां त्रयोदश । शुद्धसङ्घाटमिश्राणि क्षिप्तोत्क्षिप्तानि यानि च ॥३५॥ ग्यारहसो तेरह प्रकार के वितान है । वे शुद्ध संघात (समतल वाले), संघार्टमिश्र सम विषम तल वाला, क्षिप्त (नीचे भाग मे लटकते थरो वाला) और उत्क्षिप्त (ऊपर उठी हुई गोलाई वाला) ये चार प्रकार के वितान है ॥३५॥ १. 'निर्गमोदयः।' २. 'नृत्यशोभिताः ।'

सप्तमोऽध्यायः १३३ अपराजितपृच्छा सूत्र. १८६ मे श्लोक ४ मे वितान के मुख्य तीन प्रकार लिखे है । देखो— "वितानानि विचित्राणि क्षिप्तान्युत्क्षिप्तकानि च । समतलानि ज्ञेयानि उदितानि त्रिधा क्रमात् ॥" क्षिप्त, उत्क्षिप्त और समतल ये तीन प्रकार के वितान कहे हैं । वर्ण और जाति के चार प्रकार के वितान--- "पद्मकं नाभिच्छन्दश्च सभामार्गस्तृतीयकः । मन्दारक इति प्रोक्तो वितानाश्च चतुर्विधाः ॥" अप० सू० १८६ श्लो० ६ पद्मक, नाभिछन्द, सभामार्ग और मन्दारक ये चार प्रकार के वितान हैं। "पद्मको विप्रजातिः स्यात् क्षत्रियो नाभिच्छन्दकः । सभामार्गो भवेद् वैश्यः शुद्रो मन्दारकस्तथा ॥" श्लो० ७ ब्रह्मण जाति का पद्मक, क्षत्रिय जातिका नाभिछन्द, वैश्यजातिका सभामार्ग और शूद्रजातिका मंदारक नामका वितान है । "पद्मकः श्वेतवर्णः स्यात् क्षत्रियो रक्तवर्णकः । सभामार्गो भवेत् पीतो मन्दारः सर्ववर्णकः ॥" श्लो० ८ सफेद वर्ण का पद्मक, लाल वर्ण का नाभिछंद, पीले वर्ण का सभामार्ग और अनेक वर्ण का मंदारक है । फिर अपराजित पृच्छा सूत्र १९० मे भी चार प्रकारके वितान कहे है— "वितानांश्च प्रवक्ष्यामि भेदंस्तच्च चतुर्विधम् । पद्मक नाभिच्छन्दं च सभा मन्दारकं तथा ॥ श्लो० १ शुद्धश्च छन्दसंघाटो भिन्न उद्भिग्न एव च । एतेषा सन्ति ये भेदाः कथये तान् समासतः ॥" श्लो० २ चार प्रकार के वितानो को कहता हू । पद्मक, नाभिच्छद, सभा और मन्दारक इन चार प्रकार के वितान के शुद्ध, संघात, भिन्न और उद्भिग्न ये चार भेद है । उसको संक्षेप से कहता हूँ । "एकत्वे च भवेच्छुद्धः संघातश्च द्विमिश्रणात् । त्रिमिश्राश्च तथा भिन्ना उद्भिग्नाश्चतुरन्विताः ॥" श्लो० ३ एकही प्रकारकी आकृति वाले शुद्ध, दो प्रकार की मिश्र आकृति वाले सघात, तीन प्रकार की आकृति वाले भिन्न और चार प्रकार की आकृति वाले उद्भिग्न नामके वितान है । "पद्मनाभ सभापद्मं सभामन्दारकं तथा । कमलोद्भवमाख्यातं मिश्रकाणां चतुष्टयम् ॥" श्लो० ४

१३४ प्रासादमण्डने पद्मनाभ, सभापद्म, सभामन्दारक और कमलोद्भव ये चार मिश्र जाति के वितान हैं । “किन्तु इसमे इसको आकृतियो का वर्णन नहीं लिखा है ।” वितानानि विचित्राणि वस्त्रचित्रादिभेदतः । शिल्पिलोके प्रवर्त्तन्ते तस्मादूह्यानि लोकतः ॥३६॥ जैसे अनेक प्रकार के चित्र आदि से विभिन्न प्रकार के वस्त्र है, वैसे ही शिल्पशास्त्र मे अनेक प्रकार के वितान है । वे अन्य शास्त्रों से विचार करके बनावे ॥३६॥ रंगभूमि-- मण्डपेषु च सर्वेषु पीठान्ते रङ्गभूमिका । कुर्यादुत्तानपट्टेन चित्रपाषाणजेन च ॥३७॥ इति मण्डपाः । समस्त मंडपो की पीठ के नीचे की जो भूमि है, वह रंग भूमि कही जाती है । वह बड़े लम्बे चौड़े पाषाणों से तथा अनेक प्रकार के चित्र विचित्र पाषाणों से बनाने चाहिए ॥३७॥ बलाणक का स्थान-- बलाणं देवगेहाग्रे राजद्वारे गृहे पुरे । जलाशयेऽथ कर्त्तव्यं सर्वेषां मुखमण्डपम् ॥३८॥ देवालय के द्वार के आगे तथा प्रवेश द्वारके ऊपर, राजमहल, गृह, नगर और जलाशय ( बावडी, तालाब आदि ) इन सब के द्वार के आगे मुखमंडप ( बलाणक ) किया जाता है ॥३८॥ बलाणक का मान-- जगतीपादविस्तीर्णं पादपादेन वर्जितम् । शालालिन्देन गर्भेण प्रासादेन समं भवेत् ॥३६॥ बलाणक का विस्तार जगती का चौथा भाग का अथवा चौथे का चौथा भाग न्यून, शाला और अलिंद के मान से, प्रासाद के गर्भमान के अथवा प्रासाद के मान के बराबर बनावे ॥३६॥ प्रासाद मे बलाणक का स्थान-- उत्तमे कन्यसं मध्ये मध्यं ज्येष्ठं तु कन्यसे । एकद्वित्रिचतुःपञ्च-रससप्तपदान्तरे ॥४०॥

सप्तमोऽध्यायः १३५ ज्येष्ठमान के प्रासाद में कनिष्ठ मान का, मध्यममान के प्रासाद मे मध्यम मान का और कनिष्ठमान के प्रासाद मे ज्येष्ठमान का वलाणक किया जाता है। यह प्रासाद से एक, दो तीन, चार, पाच, छह अथवा सात पद के अन्तर से (दूर) बनाया जाता है *॥४०॥ मूलप्रासादवद् द्वारं मण्डपे च वलाणके । न्यूनाधिकं न कर्त्तव्यं दैर्घ्ये हस्ताङ्गुलाधिकम् ॥४१॥ मंडप का द्वार और वलाणक का द्वार मुख्य प्रासाद के द्वार के बराबर रखना चाहिये । यदि वढाने की आवश्यकता हो तो द्वार की ऊंचाई मे हस्तागुल (जितने हाथ का हो उतने अंगुल) बढ़ा सकते है। 'यह नीचे के भाग मे वढाना चाहिये, क्यों कि उत्तरंग तो सब समसूत्र मे रखा जाता है ऐसा शास्त्रीय कथन है ॥४१॥ उत्तरंग का पेटा भाग— पेटकं चोत्तरङ्गानां सर्वेषां समसूत्रतः । अङ्गणेन समं पेटं जगत्याश्चोत्तरङ्गजम् ॥४२॥ सब उत्तरंग का पेटा भाग (उत्तरंग के नीचे का भाग) समसूत्र मे रखना चाहिये और जगती के द्वार के उत्तरंग का पेटा भाग प्रासाद के आगन जगती के मथला बराबर रखना चाहिये ॥४२॥ पांच प्रकार के वालाणक— जगत्यग्रे चतुष्किका' वामन तद् वलाणकम् । वामे च दक्षिणे द्वारे वेदिकामत्तवारणम् ॥४३॥ जगती के आगे की चौकी के ऊपर जो वलाणक किया जाता है, वह वामन नामका वलाणक कहा जाता है। उसके बायी और दाहिनी ओर के द्वार पर वेदिका और मत्तवारण किया जाता है ॥४३॥ ऊर्ध्वा भूमिः प्रकर्त्तव्या नृत्यमण्डपसूत्रतः । मत्तवारणं वेदी च वितानं तोरणैर्युता ॥४४॥

  • अपराजित पृच्छा सूत्र १२२ श्लोक १० मे एक से आठ पद के अंतरे भी बनाना लीखा है। १ 'चतुष्की या' ।

१३६ प्रासादमण्डने बलाणक को ऊर्ध्वभूमि नृत्यमंडप के समसूत्र में रखनी चाहिये । तथा मत्तवारण, वेदी, वितान और तोरणों से शोभायमान बनानी चाहिए ॥४४॥ राजद्वारे बलाणे च पञ्च वा सप्तभूमिकाः । तद्विमानं बुधैः प्रोक्तं पुष्करं वारिमध्यतः ॥४५॥ राजद्वार के ऊपर जो पांच अथवा सात भूमिवाला बलाणक किया जाता है, उसको विद्वान् शिल्पी विमान अथवा उत्तुं ग नामका बलाणक कहते है । तथा जलाशय के बलाणक को पुष्कर नामका बलाणक कहते है ॥४५॥ हर्म्यशालो गृहे वापि कर्त्तव्यो गोपुराकृतिः । एकभूम्यास्त्रिभूम्यन्तं गृहाग्रद्वारमस्तके ॥४६॥ इति पंचबलाणकम् । गृहद्वार के आगे एक, दो अथवा तीन भूमिवाला जो बलाणक किया जाय, उसका नाम हर्म्यशाल है । वह गोपुराकृति वाला बनाया जाता है । (किले के द्वार के ऊपर जो बलाणक किया जाता है, उसको गोपुर नाम का बलाणक कहते है ) । कौन २ देव के आगे बलाणक करना— “शिवसूर्यो ब्रह्मविष्णू चण्डिका जिन एव च । एतेषा च सुराणा च कुर्यादग्रे बलाणकम् ॥” अप० सू० १२३ शिव, सूर्य, ब्रह्म, विष्णु, चंडिका और जिन, इन देवो के आगे बलाणक बनाना चाहिए । संवरणा— संवरणा प्रकर्त्तव्या प्रथमा पञ्चघण्टिका । चतुर्घण्टाभिवृद्धया च यावदेकोत्तरं शतम् ॥४७॥ मंडप आदि के ऊपर गुमटी के स्थान पर संवरणा की जाती है । प्रथम संवरणा पांच घंटी की है । आगे प्रत्येक संवरण की चार चार घंटी की वृद्धि से एक सौ घंटी तक बढाया जाता है ॥४७। पञ्चविंशति रित्युक्ताः प्रथमा वसुभागिका । वेदोत्तरं शतं यावद् वेदांशा वृद्धिरिष्यते ॥४८॥

सप्तमोऽध्यायः १३७ उपरोक्त घंटिका की संख्यानुसार संवरणा पच्चीस प्रकार की हैं। उन में प्रथम संवरणा की भूमि का आठ आठ भाग करें। पीछे प्रत्येक संवरणा में चार चार भाग एक सौ चार भाग तक बढाने चाहिये ॥४८॥ भद्रार्धे रथिकार्धे च तवङ्गं वामदक्षिणे । अर्धोदयेन रथिका घण्टा कूटं तवङ्गकम् ॥४९॥ भद्राध की रथिकार्ध के मान का दोनो तरफ तवग बनावे । रथिका, घंटा, कूट और तवंग, ये विस्तार से आधा उदय मे रक्खें ॥४९॥ मूलघण्टा रथिका कूट १ पुष्पिका-नाम संवर्णा (१) घंटिका ५ कूट १६. सिंह ८. भाग प्रभातशङ्कर. ओ. सोमपुरा पुष्पिका नाम की प्रथम संवरणा प्रा० १६

१३८ प्रासादमण्डने

प्रथम संवरणा— कलाकूटान्विता पूर्वा पञ्चभिः कलशैर्युता । भागतुल्यैस्तथा सिंहै-रेवमन्याश्च लक्षिताः ॥५०॥ इति मण्डपोर्ध्वसंवरणाः । इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते प्रासादमण्डने मण्डपवलाणक- संवरणाधिकारे सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ नंदिनी नाम संवरणा (२) भाग ३२, घण्टिका ९. कूट ६८, सिंह ३२. प्रभाशंकर.ओ.स्थपति. नंदिनी नाम की दूसरी संवरणा

सप्तमोऽध्यायः १३६ प्रथम सवरणा सोलह कूट और पांच घंटाकलश वाली है। तथा कर्ण और उद्रुम के के ऊपर तल भाग के तुल्य ( आठ ) सिंह रक्खे । इस प्रकार अन्य संवरणा बनायी जाती है ॥५०॥ पच्चीस संवरणा के नाम— “पुष्पिका नन्दिनी चैव दशाक्षा देवसुन्दरी । कुलतिलका रम्या च उद्भिन्ना च नारायणी ॥ नलिका चम्पका चैव पद्माख्या च समुद्भवा । त्रिदशा देवगान्धारी रत्नगर्भा चूडामणिः ॥ हेमकूटा चित्रकूटा हिमाख्या गन्धमादिनी । मन्दरा मालिनी ख्याता कैलासा रत्नसम्भवा ॥ मेरु कूटोद्भवा ख्याताः संख्यया पञ्चविंशतिः ।” अप० सूत्र १६३ श्लोक २ से ५ पुष्पिका, नन्दिनी, दशाक्षा, देवसुन्दरी, कुलतिलका, रम्या, उद्भिन्ना, नारायणी, नलिका, चम्पका, पद्मा, समुद्भवा, त्रिदशा, देवगान्धारी, रत्नगर्भा, चूडामणि, हेमकूटा, चित्रकूटा, हिमाख्या, गन्धमादिनी, मन्दरा, मालिनी, कैलासा, रत्नसंभवा और मेरकूटा, ये ये पच्चीस संवरणा के नाम है । ज्ञानरत्नकोश नाम के ग्रन्थ मे बत्तीस संवरणा लिखा है। उनके नाम भी अन्य प्रकार के है। घंटिका की संख्या प्रासाद के मानानुसार लिखी है। जैसे—एक या दो हाथ के प्रासाद के ऊपर पांच घंटिका वाली संवरणा, तीन हाथ के प्रासाद के ऊपर नव, चार हाथ के प्रासाद के ऊपर तेरह, इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद के ऊपर एकसौ उनतीस घंटिका चढाना लोखा है। तथा घंटिकाओं की संख्यानुसार बत्तीस संवरणा के नाम लिखे है। जैसे—पाच घंटावाली पद्मिनी, नव घंटावाली मेदिनी, तेरह घंटावाली कलशा, इस प्रकार एकसौ उनतीस घंटावाली राजवर्द्धनी है। प्रथमा पुष्पिका संवरणा— “चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे अष्टधा प्रतिभाजिते । उच्छ्रयः स्याच्चतुर्भागेः सर्वांसामर्थोदयः ॥ मूलकूटोद्भवा. कर्णा द्विभागे. पृथग् विस्तरा । भागोदया विधातव्या. कूटा वै सर्वकामदाः ॥”

१४० प्रासादमण्डने प्रथम संवरणा की समचोरस भूमिका आठ भाग करें, उसमें चार भाग संवरणा का उदय रखें। सब संवरणा विस्तार से आधी उदय में रखें। कर्ण के ऊपर मूल घंटा दो भाग विस्तार वाली और एक भाग का उदयवाली बनावें एवं कूटा भी विस्तार से आधा उदय मे रखें । [.....................................................। द्याद्योद्भास्तदर्थे च कर्णो कर्णो च घण्टिका ॥ १८ वीं शताब्दि से वर्तमान आवृति सवरणी शैली चित्र सं० ३८२ और गुजराती. १८ वी शताब्दि से आधुनिक समय की सवरणा शैली ।

जेसलमेर जैन मंदिर के मडप की सवरणा

कीर्त्ति स्तंभ - चितौड़गढ

सप्तमोऽध्यायः १४१ तद्रूपा भद्रकूटाश्च श्रृङ्गकूटास्तदर्धतः । सिंहस्थाना कर्णघण्टी बृहद्घण्टी तदूर्ध्वतः ॥ संवरणागर्भमूले रथिका द्वयं‍शविस्तरा । भागैका चोदये कार्या भागा पक्षतवङ्गिका ॥ तदूर्ध्वे उद्गमो भाग-स्तवङ्गोर्ध्वे च कूटकः । सिंह वै उद्गमोर्ध्वे तु उरोघण्टा भागोपरि ॥ तदुपरि सिंहस्थानं भागेकं च विनिर्गतम् । तस्योपरि मूलघण्टा द्विभागा च भागोच्छ्रया ॥ अष्टसिंहेः पञ्चघण्टैः कूटैरेवं द्विरष्टभिः । चतुर्भिर्मूलकूटश्च पुष्पिका नाम नामतः ॥” ..... 'छज्जा के उद्गम के अर्धमान का कोने कोने के ऊपर घंटिका रक्खे । उसके जैसा भद्र का कूट बनावे व इससे आधे भाग का शृंगकूट रक्खे । कर्णघंटी पर सिंह रक्खें । उसके ऊपर बीच में बड़ी घंटो रक्खें । संवरणा के गर्भ के मूल मे दो भाग के विस्तार वालो रथिका बनावें और यह उदय मे एक भाग की रक्खे । इसके दोनो तरफ तवंगा एक एक भाग की रक्खें और रथिका के ऊपर एक भाग उदय वाला उद्गम बनावे । तवंगा के ऊपर कूट रक्खें । उद्गम और बडी कर्णघंटी के ऊपर सिह रक्खे, उसका निर्गम एक भाग रक्खे । उसके ऊपर दो भाग के विस्तारवाली और एक भाग का उदय वाली मूलघंटा रक्खे । आठसिंह (चार कर्ण और चार भद्र के उद्गम ऊपर) पाच बडी घंटी, सोलह कूट और चार मूलकूट वाली प्रथम पुष्पिका नाम की संवरणा होती है । दूसरो नन्दिनी नाम की सवरणा— "तवङ्गकूटयोर्मध्ये तिलकं द्वयं‍शविस्तरम् ॥ भागोदयं विधातव्यं रूपसंघाटभूषितम् ॥ तवङ्गरथिकाश्चैव द्विभागोदयिन. स्मृताः । अष्टचत्वारिंशत्कूटा मूले स्युः पूर्ववत्तथा ॥ नवघण्टा समायुक्ता स्याद्वै द्वादशसिंहतः । नन्दिनी नामविख्याता कर्तव्या शान्तिमिच्छता ॥ कार्या तिलकवृद्धिश्च यावत्क्षेत्रं वेदास्रकम् । मण्डपवलनिष्कासे-र्भक्तिभागेस्तु कल्पना ॥

• १५२ प्रासादमण्डने बृहद्हलैर्भिन्नोद्भिन्ना मण्डपक्रमभागतः । आसां युक्तिर्विधातव्या मेरूकूटान्तकल्पना ॥ तवंग और कूटके मध्य में दो भाग के विस्तारवाला और एक भाग के उदय वाला तलके भूषणरूप तिलक बनावें । तवंगा और रथिका ये दोनों दो भाग के उदयवाले बनावें । अड़तालीस कूटा, नवघण्टा और बारह सिंह वाली नन्दिनी नाम की संवरणा शांति की इच्छा रखने वाले बनावें। समचोरस क्षेत्र के भागों में तिलककी वृद्धि करनी चाहिये । मंडप को विस्तार से आधा उदय में रखें। भूमि के बारह भाग की कल्पना करे। संवरणायें भिन्न और उद्भिन्न [चित्र-शीर्षक: १३ वामी सैन्यधी की पुरानी संवारणी वल्लभी-शैली] [पुरातत्त्व प्रो. सांकलि.] होती हैं। मण्डप के अनुक्रम भाग से पचीसवीं मेरुकूटा नाम की संवरणा तक इस प्रकार युक्ति से अन्य संवरणायें बनावें । इति श्री मंडनसूत्र धार विरचित प्रासादमंडन के मंडप बलाणक संव- रणा लक्षणवाला सातवां अध्याय की पंडित भगवानदास जैन ने सुबोधिनी नाम की भाषा टीका रची ॥७॥ ★

अथ प्रासादमण्डनेऽष्टमः साधारणोऽध्यायः अथ साधारणोऽध्यायः सर्वलक्षणसंयुतः । विश्वकर्मप्रसादेन विशेषेण प्रकथ्यते ॥१॥ श्री विश्वकर्मा के प्रसाद से सर्व लक्षणों वाला साधारण नाम का यह आठवां अध्याय कुछ विशेषरूप से कहा जाता है ॥१॥ शिवलिंग का न्यूनाधिक मान— 'मानं न्यूनाधिकं वापि स्वयंभूबाणरत्नजे । घटितेषु विधातव्य-मर्चालिङ्गेषु शास्त्रतः ॥२॥ स्वयंभूलिंग, बाणलिंग और रत्नका लिंग, ये मान मे न्यूनाधिक हो तो दोष नही है । परन्तु घड़ा हुआ शिवलिंग और मूर्ति तो शास्त्र मे कहे हुए मानानुसार ही होना चाहिये ॥२॥ वास्तुदोष— बहुलेपमल्पलेपं समसन्धिः शिरोगुरुः । सशव्यं पादहीनं तु तच्च वास्तु विनश्यति ॥३॥ अधिक लेपवाला, कम लेपवाला, सांध के ऊपर सांध वाला, उपरका हिस्सा मोटा और नीचे पतला, शल्यवाला और कम नीव वाला, ऐसे वास्तु का शीघ्र ही नाश हो जाता है ॥३॥ निषेधवास्तुद्रव्य— अन्यवास्तुच्युतं द्रव्य-मन्यवास्तुनि योजयेत् । प्रासादे न भवेत् पूजा गृहे तु न वसेद् गृही ॥४॥ किसी मकान आदि का गिरा हुआ ईंट, चूना, पाषाण और लकडी आदि वास्तु द्रव्य, यदि मंदिर मे लगावें तो देव अपूजित रहें और घरमे लगावे तो मालिक का निवास न रहे, अर्थात् मंदिर और गृह शून्य रहे ॥४॥ १ 'मान' के स्थान पर 'वृष' होना चाहिये । क्योकि अपराजित पृच्छा सूत्र० १०६ श्लो० ११ मे लिखा है कि—'वृष न्यूनाधिकं वाणे रत्नजे च स्वयम्भुवि' अर्थात् बाण, रत्न और स्वयम्भूलिंग के मंदिर में नंदी का मान न्यूनाधिक भी हो सकता है ।

१४४ प्रासादमण्डने शिवालय उत्थापनदोष— स्वस्थाने संस्थितं यस्य विप्रवास्तुशिवालयम् । अचाल्यं सर्वदेशेषु चालिते राष्ट्रविभ्रमः ॥५॥ अपने स्थान मे यथास्थित रहा हुआ और ब्राह्मणों से वास्तु पूजन किया हुआ, ऐसे शिवालय को चलायमान नही किया जाता । क्योंकि अचल ( चलायमान न हो ), को यदि चलायमान किया जाय तो राष्ट्रों मे परिवर्त्तन होता है ॥५॥ जीर्णोद्धार का पुण्य— वापीकूपतडागानि प्रासादभवनानि च । जीर्णान्युद्धरते यस्तु पुण्यमष्टगुणं लभेत् ॥६॥ वावडी, कुआं, तालाब, प्रासाद ( मंदिर ) और भवन, ये जीर्ण हो गये हों तो उनका उद्धार करना चाहिये । जीर्णोद्धार करने से आठ गुना फल होता है ॥६॥ जीर्णोद्धार का वास्तु स्वरूप— तद्रूपं तत्प्रमाणं स्यात् पूर्वसूत्रं न चालयेत् । हीने तु जायते हानि-रधिके स्वजनक्षयः' ॥७॥ जीर्णोद्धार करते समय पहले का वास्तु जिस आकार और जिस मानका हो, उसी आकार और उसी मानका रखना चाहिये । अर्थात् पहले के मानसूत्र मे परिवर्त्तन नही करना चाहिये । प्रथम के मान से कम करे तो हानि होवे और अधिक करे तो स्वजन की हानि होवे ॥७॥ वास्तु द्रव्याधिकं कुर्यान्मृत्काष्ठे शैलजं हि वा । शैलजे धातुजं वापि धातुजे रत्नजं तथा ॥८॥ जीर्णोद्धार करते समय प्रथम का वास्तु अल्पद्रव्य का हो तो वह अधिक द्रव्यका बनाना चाहिये । जैसे—प्रथमका वास्तु मिट्टी का हो तो काष्ठ का, काष्ठ का हो तो पाषाण का, पाषाण का हो तो धातु का और धातु का हो तो रत्न का बनाना श्रेयस्कर है ॥८॥ दिङ्‌मूढ दोष— पूर्वोत्तरदिशामूढं मूढं पश्चिमदक्षिणे । तत्र मूढममूढं वा यत्र तीर्थं समाहितम् ॥६॥ १. 'तु धनक्षयः ।'

पूर्वोत्तर दिशा ( ईशान कोन ) अथवा पश्चिम दक्षिण दिशा ( नैर्ऋत्य कोन ) मे प्रासाद टेढा हो तो दिङ्मूढ दोष नही माना जाता। जैसे तीर्थ स्थान में प्रासाद के मूढ और अमूढ का दोष नहीं माना जाता ॥९॥ "पूर्वपश्चिमदिङ्मूढं वास्तु स्त्रीनाशकं स्मृतम् । दक्षिणोत्तरदिङ्मूढं सर्वनाशकरं भवेत् ॥" अप० सू० ५२ पूर्व पश्चिम दिशा का वास्तु अग्नि और वायु कोनमे दिङ्मूढ हो तो स्त्री का विनाश कारक है। दक्षिणोत्तर दिशा का वास्तु भी अग्नि और वायुकोन मे दिङ्मूढ हो तो सर्व विनाश कारक है। दिङ्मूढ का परिहार— सिद्धायतनतीर्थेषु नदीनां सङ्गमेषु च । स्वयम्भूबाणलिङ्गेषु तत्र दोषो न विद्यते ॥१०॥ सिद्धायतन अर्थात् सिद्ध पुरुषों का निर्वाण, अग्नि संस्कार, जल संस्कार अथवा भूमि- संस्कार हुआ हो ऐसे पवित्र स्थानो मे, तथा च्यवन, जन्म, दीक्षा ज्ञान और मोक्ष संस्कार हुआ हो, ऐसे तीर्थस्थानो मे, नदी के संगम स्थान मे, बनाया हुआ प्रासाद तथा स्वयंभू और बाण लिंगो के प्रासाद, ये दिङ्मूढ हो तो दोष नही है ॥१०॥ अव्यक्त प्रासाद का चालन— अव्यक्तं¹ मृण्मयं चाल्यं त्रिहस्तान्तं तु शैलजम् । दारुजं पुरुषार्द्धं हि अत ऊर्ध्वं न चालयेत् ॥११॥ यदि अव्यक्त जीर्ण प्रासाद मिट्टी का हो तो गिरा करके फिर बनावे, पाषाण का हो तो तीन हाथ तक और लकडी का हो तो आधे पुरुष के मान तक ऊंचा रहा हो तो चलायमान करे। इससे अधिक ऊंचाई मे रहा हो तो चलायमान न करे ॥११॥ महापुरुष स्थापित देव— विषमस्थानमाश्रित्य भग्नं यत्स्थापितं पुरा । तत्र स्थाने स्थिता देवा भग्नाः पूजाफलप्रदाः ॥१२॥ प्राचीन महापुरुषोंने जो देव स्थापित किये हैं, वे विषमासन वाले हो, अथवा खंडित हों तो भी पूजनीय है। क्यो कि उस स्थान पर देवो का निवास है, इसलिये वे देवमूर्तिया पूजन का फल देनेवाली है ॥१२॥ १. 'व्यक्तं तु' ऐसा अपराजितपृच्छा सूत्र ११० मे पाठ है। प्रा० १६