प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Prashna Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
| २८ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न २ |
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| आवहप्रवहादिभेदः । किं चैष पृथिवी रयिर्देवः सर्वस्य जगतः सन्मूर्तमसदमूर्तं चामृतं च यद्देवानां स्थितिकारणं किं बहुना ॥५॥ | प्रवह आदि भेदोंवाला वायु है । अधिक क्या यह देव ही पृथिवी और रयि (चन्द्रमा) रूपसे सम्पूर्ण जगत्का धारक और पोषक है । सत्—स्थूल, असत्—सूक्ष्म और देवताओंकी स्थितिका कारणरूप अमृत भी यही है ॥ ५ ॥ |
प्राणका सर्वाश्रयत्व
अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥ ६ ॥
जैसे रथकी नाभिमें अरे लगे रहते हैं उसी तरह ऋक्, यजुः, साम, यज्ञ तथा क्षत्रिय और ब्राह्मण—ये सब प्राणमें ही स्थित हैं ॥ ६ ॥
| अरा इव रथनाभौ श्रद्धादिनामान्तं सर्वं स्थितिकाले प्राण एव प्रतिष्ठितम् । तथर्चो यजूंषि सामानीति त्रिविधा मन्त्राः तत्साध्यश्च यज्ञः क्षत्रं च सर्वस्य पालयितृ ब्रह्म च यज्ञादिकर्मकर्तृत्वेऽधिकृतं चैवैष प्राणः सर्वम् ॥ ६ ॥ | जिस प्रकार रथकी नाभिमें अरे लगे होते हैं उसी प्रकार जगत्के स्थितिकालमें [ प्रश्न० ६ । ४ में बतलाये जानेवाले ] श्रद्धासे लेकर नामपर्यन्त सम्पूर्ण पदार्थ प्राणमें ही स्थित हैं । तथा ऋक्, यजुः और साम—तीन प्रकारके मन्त्र, उनसे निष्पन्न होनेवाला यज्ञ, सबका पालन करनेवाले क्षत्रिय और यज्ञादिकर्मोंके अधिकारी ब्राह्मण—ये सब भी प्राण ही हैं ॥ ६ ॥ |
प्रश्न २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २९
किं च— | तथा—
प्राणकी स्तुति
प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे । तुभ्यं प्राण
प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥ ७ ॥
हे प्राण ! तू ही प्रजापति है, तू ही गर्भमें सञ्चार करता है, और तू ही [माता-पिताके समान आकृतिवाला होकर] जन्म ग्रहण करता है। यह [मनुष्यादि] सम्पूर्ण प्रजा तुझे ही बलि समर्पण करती है, क्योंकि तू समस्त इन्द्रियोंके साथ स्थित रहता है ॥ ७ ॥
| यः प्रजापतिरपि स त्वमेव गर्भे चरसि, पितुर्मातुश्च प्रतिरूपः सम्प्रतिजायसे; प्रजापतित्वादेव प्रागेव सिद्धं तव मातृपितृत्वम् । सर्वदेहदेह्याकृतिच्छद्मनैकः प्राणः सर्वात्मासीत्यर्थः । तुभ्यं त्वदर्थं या इमा मनुष्याद्याः प्रजास्तु हे प्राण चक्षुरादिद्वारैर्बलिं हरन्ति । यस्त्वं प्राणैश्चक्षुरादिभिः सह प्रतितिष्ठसि सर्वशरीरेष्वतस्तुभ्यं बलिं हरन्तीति युक्तम्; भोक्ता हि यतस्त्वं तवैवान्यत्सर्वं भोज्यम् ॥ ७ ॥ | जो प्रजापति है वह भी तू ही है; तू ही गर्भमें सञ्चार करता है और माता-पिताके अनुरूप होकर तू ही जन्म लेता है । प्रजापति होनेके कारण तेरा माता-पितारूप होना तो पहलेसे ही सिद्ध है । तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण देह और देहीके मिषसे एक तू प्राण ही सर्वात्मा है । ये जो मनुष्यादि प्रजाएँ हैं, हे प्राण ! वे चक्षु आदि इन्द्रियोंके द्वारा तुझे ही बलि समर्पण करती हैं, जो तू कि चक्षु आदि इन्द्रियोंके साथ समस्त शरीरोंमें स्थित है; अतः वे तुझे ही बलि समर्पण करती हैं; उनका ऐसा करना उचित ही है, क्योंकि भोक्ता तू ही है, और अन्य सब तेरा ही भोज्य है ॥ ७ ॥ |
३० प्रश्नोपनिषद् [प्रश्न २
| किं च— | तथा— |
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देवानामासि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ।
ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥
तू देवताओंके लिये वह्नितम है, पितृगणके लिये प्रथम स्वधा है और अथर्वाङ्गिरस ऋषियों [ यानी चक्षु आदि प्राणों ] के लिये सत्य आचरण है ॥ ८ ॥
| देवानामिन्द्रादीनामसि भवसि त्वं वह्नितमो हविषां प्रापयितृतमः । पितॄणां नान्दीमुखे श्राद्धे या पितृभ्यो दीयते स्वधान्नं सा देवप्रधानमपेक्ष्य प्रथमा भवति । तस्या अपि पितृभ्यः प्रापयिता त्वमेवेत्यर्थः । किं चर्षीणां चक्षुरादीनां प्राणानामङ्गिरसामङ्गिरसभूतानामथर्वणां तेषामेव "प्राणो वाथर्वा" इति श्रुतेः, चरितं चेष्टितं सत्यमवितथं देहधारणाद्युपकारलक्षणं त्वमेवासि ॥ ८ ॥ | तू इन्द्रादि देवताओंके लिये वह्नितम—हवियोंको पहुँचानेवालोंमें श्रेष्ठ है, पितृगणकी प्रथम स्वधा है—नान्दीमुख श्राद्धमें पितरोंको जो अन्नमयी स्वधा दी जाती है वह देवप्रधान कर्मकी अपेक्षासे प्रथम है, उस प्रथम स्वधाको भी पितरोंको प्राप्त करानेवाला तू ही है—ऐसा इसका भावार्थ है। तथा ऋषियों यानी चक्षु आदि प्राणोंका, जो कि "प्राणो वाथर्वा" इस श्रुतिके अनुसार अंगिरस्—अंगके रसस्वरूप* अथर्वा हैं, उनका सत्य—अवितथ अर्थात् देहधारणादिमें उपकारी चरित—आचरण भी तू ही है ॥ ८ ॥ |
* प्राणोंके अभावमें शरीरको सूखते देखा गया है; अतः उन्हें अङ्गका रस कहते हैं ।
प्रश्न २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता ।
त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ ९ ॥
हे प्राण ! तू इन्द्र है, अपने [ संहारक ] तेजके कारण रुद्र है, और [ सौम्यरूपसे ] सब ओरसे रक्षा करनेवाला है। तू ज्योतिर्गणका अधिपति सूर्य है और अन्तरिक्षमें सञ्चार करता है ॥ ९ ॥
| इन्द्रः परमेश्वरस्त्वं हे प्राण तेजसा वीर्येण रुद्रोऽसि संहरञ्जगत् । स्थितौ च परिसमन्ताद्रक्षिता पालयिता परिरक्षिता त्वमेव जगतः सौम्येन रूपेण । त्वमन्तरिक्षेऽजस्रं चरसि उदयास्तमयाभ्यां सूर्यस्त्वमेव च सर्वेषां ज्योतिषां पतिः ॥ ९ ॥ | हे प्राण ! तू इन्द्र—परमेश्वर है; तू अपने तेज—वीर्यसे जगत्का संहार करनेवाला रुद्र है तथा स्थितिके समय अपने सौम्यरूपसे तू ही सब ओरसे संसारकी रक्षा—पालन करनेवाला है। तू ही उदय और अस्तके क्रमसे निरन्तर आकाशमें गमन करता है और तू ही समस्त ज्योतिर्गणोंका अधिपति सूर्य है ॥ ९ ॥ |
यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः ।
आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥ १० ॥
हे प्राण ! जिस समय तू मेघरूप होकर बरसता है उस समय तेरी यह सम्पूर्ण प्रजा यह समझकर कि 'अब यथेच्छ अन्न होगा' आनन्दरूपसे स्थित होती है ॥ १० ॥
| यदा पर्जन्यो भूत्वाभिवर्षसि त्वमथ तदान्नं प्राप्येमाः प्रजाः प्राणते प्राणचेष्टां कुर्वन्तीत्यर्थः । | जिस समय तू मेघ होकर बरसता है उस समय यह सम्पूर्ण प्रजा अन्न पाकर प्राणन यानी प्राणक्रिया करती है—यह इसका |
| ३२ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न २: |
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| अथवा प्राण ते तवेमाः प्रजाः स्वात्मभूतास्त्वदन्नसंवर्धितास्त्वदभिवर्षणदर्शनमात्रेण चानन्दरूपाः सुखं प्राप्ता इव सत्यः तिष्ठन्ति कामायेच्छातोऽन्नं भविष्यतीत्येवमभिप्रायः ॥१०॥ | भावार्थ है। अथवा [ यों समझो कि ] हे प्राण ! 'ते'—तेरी स्वात्मभूत यह सम्पूर्ण प्रजा तेरे [ दिये हुए ] अन्नसे वृद्धिको प्राप्त होकर तेरी वृष्टिके दर्शनमात्रसे आनन्दरूपा-अर्थात् सुखको प्राप्त हुईके समान स्थित होती है । उसके आनन्दरूप होनेमें यह अभिप्राय है कि [ उस वृष्टिसे उसे ऐसी आशा हो जाती है कि ] 'अत्र यथेच्छ अन्न उत्पन्न होगा' ॥ १० ॥ |
| किं च— | इसके सिवां— |
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व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः । वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥११॥
हे प्राण ! तू व्रात्य (संस्कारहीन), एकर्षि नामक अग्नि, भोक्ता और विश्वका सत्पति है, हम तेरा भक्ष्य देनेवाले हैं । हे वायो ! तू हमारा पिता है ॥ ११ ॥
| प्रथमजत्वादन्यस्य संस्कर्तुरभावादसंस्कृतो व्रात्यस्त्वं स्वभावत एव शुद्ध इत्यभिप्रायः । हे प्राणैकर्षिस्त्वमाथर्वणानां प्रसिद्ध एकर्षिनामाग्निः सन्नत्ता सर्वहविषाम् । त्वमेव विश्वस्य सर्वस्य | हे प्राण ! सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला होनेसे किसी अन्य संस्कारकर्ताका अभाव होनेके कारण तू व्रात्य (संस्कारहीन) है, तात्पर्य यह है कि तू स्वभावसे ही शुद्ध है। तू आथर्वणोंका एकर्षि यानी एकर्षिनामक प्रसिद्ध अग्नि होकर सम्पूर्ण हवियोंका भोक्ता है । तथा |
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प्रश्न २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३
| सतो विद्यमानस्य पतिः सत्पतिः। | तू ही समस्त विद्यमान जगत्का पति है इसलिये, अथवा [ सत्का ] साधु पति होनेके कारण तू सत्पति है । |
| साधुर्वा पतिः सत्पतिः । | |
| वयं पुनराद्यस्य तवादनीयस्य हविषो दातारः । त्वं पिता मातरिश्व हे मातरिश्वन्नोऽस्माकम् । अथ वा मातरिश्वनो वायोस्त्वम् । अतश्च सर्वस्यैव जगतः पितृत्वं सिद्धम् ॥ ११ ॥ | हम तो तेरे आद्य—भक्ष्य हविके देनेवाले हैं । हे मातरिश्वन् ! तू हमारा पिता है । अथवा [ यों समझो कि ] तू 'मातरिश्वनः'—वायुका पिता है । अतः तुझमें सम्पूर्ण जगत्का पितृत्व सिद्ध होता है ॥ ११ ॥ |
किं बहुना— । अधिक क्या—
या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि ।
या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२ ॥
तेरा जो स्वरूप वाणीमें स्थित है तथा जो श्रोत्र, नेत्र और मनमें व्याप्त है उसे तू शान्त कर । तू उत्क्रमण न कर ॥ १२ ॥
| या ते त्वदीया तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता वक्तृत्वेन वदनचेष्टां कुर्वती, या श्रोत्रे या च चक्षुषि या च मनसि संकल्पादिव्यापारेण सन्तता समनुगता तनूस्तां शिवां शान्तां कुरु मोत्क्रमीरुत्क्रमणेन अशिवां मा कार्षीरित्यर्थः ॥१२॥ | तेरा जो स्वरूप वक्तारूपसे बोलनेकी चेष्टा करता हुआ वाणीमें स्थित है तथा जो श्रोत्र, नेत्र और सङ्कल्पादि व्यापारसे मनमें व्याप्त है उसे शिव—शान्त कर । उत्क्रमण न कर, अर्थात् उत्क्रमण करके उसे अशिव—अमङ्गलमय न कर ॥ १२ ॥ |
किं बहुना । बहुत क्या—
३
३४ : प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न २
प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् ।
मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३ ॥
यह सब तथा स्वर्गलोकमें जो कुछ स्थित है वह प्राणके ही अधीन है। जिस प्रकार माता पुत्रकी रक्षा करती है उसी प्रकार तू हमारी रक्षा कर तथा हमें श्री और बुद्धि प्रदान कर ॥ १३ ॥
| अस्मिँल्लोके प्राणस्यैव वशे सर्वमिदं यत्किञ्चिदुपभोगजातं त्रिदिवे तृतीयायां दिवि च यत्प्रतिष्ठितं देवाद्युपभोगलक्षणं तस्यापि प्राण एवेशिता रक्षिता। अतो मातेव पुत्रानस्मान् रक्षस्व पालयस्व । त्वन्निमित्ता हि ब्राह्मयः क्षात्रियाश्च श्रियस्तास्त्वं श्रीश्च श्रियश्च प्रज्ञां च त्वत्स्थिति-निमित्तां विधेहि नो विधत्स्व इत्यर्थः । | इस लोकमें यह जो कुछ उपभोगकी सामग्री है वह सब प्राणके ही अधीन है तथा त्रिदिव अर्थात् तीसरे द्युलोक (स्वर्ग) में भी देवता आदिका उपभोगरूप जो कुछ वैभव है उसका भी ईश्वर—रक्षक प्राण ही है। अतः माता जिस प्रकार पुत्रोंकी रक्षा करती है उसी प्रकार तू हमारा पालन कर । ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी श्री—विभूतियाँ भी तेरे ही निमित्त-से हैं। वह श्री तथा अपनी स्थिति-के निमित्तसे ही होनेवाली प्रज्ञा तू हमें प्रदान कर—ऐसा इसका भावार्थ है । |
| इत्येवं सर्वात्मतया वागादिभिः प्राणैः स्तुत्या गमितमहिमा प्राणः प्रजापतिरत्तेत्यवधृतम् ॥१३॥ | इस प्रकार वागादि प्राणोंके स्तुति करनेसे जिसकी महिमा सर्वात्मरूपसे बतलायी गयी है वह प्राण ही प्रजापति और भोक्ता है—यह निश्चय हुआ ॥ १३ ॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये द्वितीयः प्रश्नः ॥ २ ॥
तृतीय प्रश्न (प्राणोत्पत्ति, स्थिति, लय व पञ्चप्राण)
तृतीय प्रश्न
कौसल्यका प्रश्न—प्राणके उत्पत्ति, स्थिति और लय आदि किस प्रकार होते हैं ?
अथ हैनँ कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ । भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्छरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥
तदनन्तर, उन (पिप्पलाद मुनि) से अश्वलके पुत्र कौसल्यने पूछा—'भगवन् ! यह प्राण कहाँसे उत्पन्न होता है ? किस प्रकार इस शरीरमें आता है ? तथा अपना विभाग करके किस प्रकार स्थित होता है ? फिर किस कारण शरीरसे उत्क्रमण करता है और किस तरह बाह्य एवं आभ्यन्तर शरीरको धारण करता है ?' ॥ १ ॥
| अथ हैनँ कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ । प्राणो ह्येवं प्राणैर्निर्धारिततत्त्वैरुपलब्धमहिमापि संहतत्वात्स्यादस्य कार्यत्वमतः पृच्छामि भगवन्कुतः कस्मात्कारणादेष यथावधृतः प्राणो जायते । जातश्च कथं केन वृत्तिविशेषेण | तदनन्तर, उन (पिप्पलाद मुनि) से अश्वलके पुत्र कौसल्यने पूछा—'पूर्वोक्त प्रकारसे चक्षु आदि प्राणों (इन्द्रियों) के द्वारा जिसका तत्त्व निश्चय हो गया है तथा जिसकी महिमाका भी अनुभव हो गया है वह प्राण संहत (सावयव) होनेके कारण कार्यरूप होना चाहिये । इसलिये हे भगवन् ! मैं पूछता हूँ कि जिस प्रकारका पहले निश्चय किया गया है वैसा यह प्राण किससे—किस कारणविशेषसे |
३६ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न ३
| आयात्यस्मिञ्शरीरे। किंनिमित्तकमस्य शरीरग्रहणमित्यर्थः । प्रविश्य शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य प्रविभागं कृत्वा कथं केन प्रकारेण प्रातिष्ठते प्रतितिष्ठति । केन वा वृत्तिविशेषेणास्माच्छरीरादुत्क्रमत उत्क्रामति । कथं बाह्यमधिभूतमधिदैवतं चाभिधत्ते धारयति कथमध्यात्मम् इति, धारयतीति शेषः ॥ १ ॥ | उत्पन्न होता है ? तथा उत्पन्न होनेपर किस वृत्तिविशेषसे इस शरीरमें आता है ? अर्थात् इसका शरीरग्रहण किस कारणसे होता है ? और शरीरमें प्रविष्ट होकर अपनेको विभक्त कर—अपने अनेकों विभाग कर किस प्रकार उसमें स्थित होता है ? फिर किस वृत्तिविशेषसे इस शरीरसे उत्क्रमण करता है ? और किस प्रकार बाह्य यानी अधिभूत और अधिदैव विषयोंको धारण करता है ? तथा किस प्रकार अध्यात्म (देहेन्द्रियादि) को [धारण करता है ?] 'धारण करता है' यह वाक्य शेष है ॥१॥ |
|---|---|
| एवं पृष्टः— | [कौसल्यद्वारा ] इस प्रकार पूछे जानेपर— |
पिप्पलाद मुनिका उत्तर
तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥ २ ॥
उससे पिप्पलाद आचार्यने कहा—'तू बड़े कठिन प्रश्न पूछता है। परन्तु तू [बड़ा] ब्रह्मवेत्ता है; अतः मैं तेरे प्रश्नोंका उत्तर देता हूँ' ॥२॥
प्रश्न ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ३७
| तस्मै स होवाचाचार्यः, प्राण एव तावद्दुर्विज्ञेयत्वाद्द्विषमप्रश्नाहँस्तस्यापि जन्मादि त्वं पृच्छस्यतोऽतिप्रश्नान्पृच्छसि । ब्रह्मिष्ठोऽसीत्यतिशयेन त्वं ब्रह्मविदतस्तुष्टोऽहं तस्मात्ते तुभ्यं ब्रवीमि यत्पृष्टं शृणु ॥ २ ॥ | उससे उस आचार्यने कहा— 'प्रथम तो प्राण ही दुर्विज्ञेय होनेके कारण विषम प्रश्नका विषय है; तिसपर भी तू तो उसके भी जन्मादि पूछता है । अतः तू बड़े ही कड़े प्रश्न पूछ रहा है । परन्तु तू ब्रह्मिष्ठ—अत्यन्त ब्रह्मवेत्ता है, अतः मैं तुझसे प्रसन्न हूँ; सो तूने जो कुछ पूछा है वह तुझसे कहता हूँ, सुन ॥ २ ॥ |
प्राणकी उत्पत्ति
आत्मन एष प्राणो जायते। यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ॥ ३ ॥
यह प्राण आत्मासे उत्पन्न होता है । जिस प्रकार मनुष्य-शरीरसे यह छाया उत्पन्न होती है उसी प्रकार इस आत्मामें प्राण व्याप्त है तथा यह मनोकृत सङ्कल्पादिसे इस शरीरमें आ जाता है ॥ ३ ॥
| आत्मनः परस्मात्पुरुषादक्षरात्सत्यादेष उक्तः प्राणो जायते। कथमित्यत्र दृष्टान्तः । यथा लोक एषा पुरुषे शिरःपाण्यादिलक्षणे निमित्ते छाया नैमित्तिकी जायते तद्वदेतस्मिन्ब्रह्मण्येतत् प्राणाख्यं छायास्थानीयमनृतरूपं तत्त्वं सत्ये पुरुष आततं समर्पितम् | यह उपर्युक्त प्राण आत्मा— परम पुरुष—अक्षर यानी सत्यसे उत्पन्न होता है । किस प्रकार उत्पन्न होता है ? इसमें यह दृष्टान्त देते हैं—जिस प्रकार लोकमें शिर तथा हाथ-पाँववाले पुरुषरूप निमित्तके रहते हुए ही उससे होनेवाली छाया उत्पन्न होती है उसी प्रकार इस ब्रह्म यानी सत्य पुरुषमें यह छायास्थानीय मिथ्या तत्त्व |
| ३८ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ३ |
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| इत्येतत् । छायेव देहे मनोकृतेन मनःसंकल्पेच्छादिनिष्पन्नकर्मनिमित्तेनेत्येतत्—वक्ष्यति हि “पुण्येन पुण्यम्” (प्र० उ० ३।७) इत्यादि; तदेव “सक्तः सह कर्मणा” (बृ० उ० ४।४।६) इति च श्रुत्यन्तरात्—आयाति आगच्छत्यस्मिञ्शरीरे ॥ ३ ॥ | व्याप्त—समर्पित है । देहमें छायाके समान यह मनके कार्यसे यानी मनके सङ्कल्प और इच्छादिसे होनेवाले कर्मसे इस शरीरमें आता है । जैसा कि आगे “पुण्यसे पुण्यलोकको ले जाता है” आदिश्रुतिसे कहेंगे । “कर्मफलमें आसक्त हुआ पुरुष अपने कर्मके सहित [उसीको प्राप्त होता है ]” इस अन्य श्रुतिसे भी यही बात कही गयी है ॥ ३ ॥ |
प्राणका इन्द्रियाधिष्ठातृत्व
यथा सम्राडेवाधिकृतान्विनियुङ्क्ते । एतान्ग्रामान्ने-
तान्ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान्प्राणान्पृथक्पृथ-
गेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥
जिस प्रकार सम्राट् ही 'तुम इन-इन ग्रामोंमें रहो' इस प्रकार अधिकारियोंको नियुक्त करता है उसी प्रकार यह मुख्य प्राण ही अन्य प्राणों (इन्द्रियों) को अलग-अलग नियुक्त करता है ॥ ४ ॥
| यथा येन प्रकारेण लोके राजा सम्राडेव ग्रामादिष्वधिकृतान्विनियुङ्क्ते । कथम् ? एतान्ग्रामानेतान्ग्रामानधितिष्ठस्व इति । एवमेव यथा दृष्टान्तः एष मुख्यः प्राण इतरान्प्राणान् | जिस प्रकार लोकमें राजा ही ग्रामादिमें अधिकारियोंको नियुक्त करता है; किस प्रकार [नियुक्त करता है ? कि] तुम इन-इन ग्रामोंमें अधिष्ठान (निवास) करो । इस प्रकार, जैसा यह दृष्टान्त है वैसे ही, यह मुख्य प्राण भी अपने भेदस्वरूप |
प्रश्न ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९
| चक्षुरादीनात्मभेदांश्च पृथक् पृथगेव यथास्थानं संनिधत्ते विनियुङ्क्ते ॥ ४ ॥ | चक्षु आदि अन्य प्राणोंको अलग-अलग उनके स्थानोंके अनुसार स्थापित करता यानी नियुक्त करता है ॥ ४ ॥ |
तत्र विभागः— | उनका विभाग इस प्रकार है—
पञ्च प्राणोंकी स्थिति
पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः । एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्ताचि॑षो भवन्ति ॥ ५ ॥
वह [प्राण] पायु और उपस्थमें अपानको [नियुक्त करता है] और मुख तथा नासिकासे निकलता हुआ नेत्र एवं श्रोत्रमें स्वयं स्थित होता है तथा मध्यमें समान रहता है । यह [समानवायु] ही खाये हुए अन्नको समभावसे [शरीरमें सर्वत्र] ले जाता है । उस [प्राणाग्नि] से ही [दो नेत्र, दो कर्ण, दो नासारन्ध्र और एक रसना] ये सात ज्वालाएँ उत्पन्न होती हैं ॥ ५ ॥
| पायूपस्थे पायुश्चोपस्थश्च पायूपस्थं तस्मिन्, अपानमात्मभेदं मूत्रपुरीषाद्यपनयनं कुर्वंस्तिष्ठति संनिधत्ते । तथा चक्षुःश्रोत्रे चक्षुश्च श्रोत्रं च चक्षुःश्रोत्रं तस्मिंश्चक्षुःश्रोत्रे, मुखनासिकाभ्यां च मुखं च नासिका च ताभ्यां मुखनासिकाभ्यां च निर्गच्छन्प्राणः स्वयं सम्राट्स्थानीयः प्रातिष्ठते प्रतितिष्ठति । | यह प्राण अपने भेद अपानको पायूपस्थमें—पायु (गुदा) और उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय) में मूत्र और पुरीष (मल) आदिको निकालते हुए स्थित करता यानी नियुक्त करता है । तथा मुख और नासिका इन दोनोंसे निकलता हुआ सम्राट्स्थानीय प्राण चक्षुःश्रोत्रे—चक्षु और श्रोत्रमें स्थित रहता है । तथा |
| ४० | प्रश्नोपनिषद् | [प्रश्न ३ |
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| मध्ये तु प्राणापानयोः स्थानयोर्नाभ्यां समानोऽशितं पीतं च समं नयतीति समानः। | प्राण और अपानके स्थानोंके मध्य नाभिदेशमें समान रहता है, जो खाये और पिये हुए पदार्थको सम करनेके कारण समान कहलाता है। | | एष हि यस्माद्यदेतद्द्भुतं भुक्तं पीतं चात्माग्नौ प्रक्षिप्तमन्नं समं नयति तस्मादशितपीतेन्धनाद् अग्नेरौदर्याद्धृदयदेशं प्राप्तादेताः सप्तसंख्याका अर्चिषो दीप्तयो निर्गच्छन्त्यो भवन्ति शीर्षण्याः। घ्राणद्वारा दर्शनश्रवणादिलक्षणरूपादिविषयप्रकाशा इत्यभिप्रायः ॥ ५॥ | क्योंकि यह समानवायु ही खायी-पीयी वस्तुको अर्थात् देहान्तर्वर्ती जठरानलमें डाले हुए अन्नको समभावसे [समस्त शरीरमें] पहुँचाता है इसलिये खान-पानरूप ईंधनसे हृदयदेशमें प्राप्त हुए इस जठराग्निसे ये शिरोदेशवर्तिनी सात अर्चियाँ-दीप्तियाँ निकली हैं। तात्पर्य यह है कि रूपादि विषयोंके दर्शन-श्रवण आदिरूप प्रकाश प्राणसे ही निष्पन्न हुए हैं ॥ ५ ॥ |
लिङ्गदेहकी स्थिति
हृदि ह्येष आत्मा । अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्चरति ॥ ६ ॥
यह आत्मा हृदयमें है। इस हृदयदेशमें एक सौ एक नाडियाँ हैं। उनमेंसे एक-एककी सौ शाखाएँ हैं और उनमेंसे प्रत्येककी बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखा नाडियाँ हैं। इन सबमें व्यान सञ्चार करता है ॥६॥
| प्रश्न ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४१ |
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| हृदि ह्येष पुण्डरीकाकारमांस-<br>पिण्डपरिच्छिन्ने हृदयाकाश एष<br>आत्मात्मना संयुक्तो लिङ्गात्मा ।<br>अत्रास्मिन्हृदय एतदेकशतम्<br>एकोत्तरशतं संख्यया प्रधान-<br>नाडीनां भवतीति । तासां शतं<br>शतमेकैकस्याः प्रधाननाड्या<br>भेदाः । पुनरपि द्वासप्ततिर्द्वा-<br>सप्ततिद्वे सहस्रे अधिके<br>सप्ततिश्च सहस्राणि सहस्राणां<br>द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडी-<br>सहस्राणि । प्रतिप्रतिनाडीशतं<br>संख्यया प्रधाननाडीनां सह-<br>स्राणि भवन्ति । | यह आत्मा—आत्मासहित लिङ्ग-<br>देह अर्थात् जीवात्मा हृदयमें यानी<br>कमलके-से आकारवाले मांसपिण्डसे<br>परिच्छिन्न हृदयाकाशमें रहता है ।<br>इस हृदयदेशमें ये एक शत यानी<br>एक ऊपर सौ (एक सौ एक)<br>प्रधान नाड़ियाँ हैं । उनमेंसे प्रत्येक<br>प्रधान नाडीके सौ-सौ भेद हैं और<br>प्रधान नाडीके उन सौ-सौ भेदोंमेंसे<br>प्रत्येकमें बहत्तर-बहत्तर सहस्र अर्थात्<br>दो ऊपर सत्तर सहस्र' प्रतिशाखा<br>नाड़ियाँ हैं । |
| आसु नाडीषु व्यानो वायुः<br>चरति व्यानो व्यापनात् ।<br>आदित्यादिव रश्मयो हृदयात्<br>सर्वतोगामिनीभिर्नाडीभिः सर्व-<br>देहं संव्याप्य व्यानो वर्तते ।<br>सन्धिस्कन्धमर्मदेशेषु विशेषेण<br>प्राणापानवृत्त्योश्च मध्य उद्भूत-<br>वृत्तिर्वीर्यवत्कर्मकर्ता भवति ॥६॥ | इन सब नाडियोंमें व्यानवायु<br>सञ्चार करता है । व्यापक होनेके<br>कारण उसे 'व्यान' कहते हैं ।<br>जिस प्रकार सूर्यसे किरणें निकलती<br>हैं उसी प्रकार हृदयसे निकलकर<br>सब ओर फैली हुई नाडियोंद्वारा<br>व्यान सम्पूर्ण देहको व्याप्त करके<br>स्थित है । सन्धिस्थान, स्कन्धदेश<br>और मर्मस्थलोंमें तथा विशेषतया<br>प्राण और अपानवायुकी वृत्तियोंके<br>मध्यमें इस (व्यानवायु)की अभिव्यक्ति<br>होती है और यही पराक्रमयुक्त<br>कर्मोंका करनेवाला है ॥ ६ ॥ |
| ४२ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ३ |
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प्राणोत्क्रमणका प्रकार
अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन
पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७ ॥
तथा [ इन सब नाडियोंमेंसे सुषुम्ना नामकी ] एक नाड़ीद्वारा ऊपरकी ओर गमन करनेवाला उदानवायु [ जीवको ] पुण्य-कर्मके द्वारा पुण्यलोकको और पापकर्मके द्वारा पापमय लोकको ले जाता है तथा पुण्य-पाप दोनों प्रकारके ( मिश्रित ) कर्मोंद्वारा उसे मनुष्यलोकको प्राप्त कराता है ॥ ७ ॥
| अथ या तु तत्रैकशतानां नाडीनां मध्य ऊर्ध्वगा सुषुम्नाख्या नाडी तयैकयोर्ध्वः सन्नुदानो वायुरापादतलमस्तकवृत्तिः सञ्चरन्पुण्येन कर्मणा शास्त्रविहितेन पुण्यं लोकं देवादिस्थानलक्षणं नयति प्रापयति पापेन तद्विपरीतेन पापं नरकं तिर्यग्योन्यादिलक्षणम्। उभाभ्यां समप्रधानाभ्यां पुण्यपापाभ्यामेव मनुष्यलोकं नयतीत्यनुवर्तते ॥७॥ | तथा उन एक सौ एक नाड़ियोंमेंसे जो सुषुम्नानाम्नी एक ऊर्ध्वगामिनी नाड़ी है उस एकके द्वारा ही ऊपरकी ओर जानेवाला तथा चरणसे मस्तकपर्यन्त सञ्चार करनेवाला उदानवायु [जीवात्माको] पुण्य कर्म यानी शास्त्रोक्त कर्मसे देवादि-स्थानरूप पुण्यलोकको प्राप्त करा देता है तथा उससे विपरीत पापकर्मद्वारा पापलोक यानी तिर्यग्योनि आदि नरकों में ले जाता है और समानरूपसे प्रधान हुए पुण्य-पापरूप दोनों प्रकारके कर्मोंद्वारा वह उसे मनुष्यलोकको प्राप्त कराता है। यहाँ 'नयति' इस क्रियाकी सर्वत्र अनुवृत्ति होती है ॥ ७ ॥ |
प्रश्न ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४३
बाह्य प्राणादिका निरूपण
आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ ८ ॥
निश्चय आदित्य ही बाह्य प्राण है। यह इस चाक्षुष (नेत्रेन्द्रिय-स्थित) प्राणपर अनुग्रह करता हुआ उदित होता है। पृथिवीमें जो देवता है वह पुरुषके अपानवायुको आकर्षण किये हुए है। इन दोनोंके मध्यमें जो आकाश है वह समान है और वायु ही व्यान है ॥ ८ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| आदित्यो ह वै प्रसिद्धो ह्यधिदैवतं बाह्यः प्राणः स एष उद्यत्युद्गच्छति । एष ह्येनम् आध्यात्मिकं चक्षुषि भवं चाक्षुषं प्राणं प्रकाशेनानुगृह्णानो रूपोपलब्धौ चक्षुष आलोकं कुर्वन्नित्यर्थः। तथा पृथिव्यामभिमानिनी या देवता प्रसिद्धा सैषा पुरुषस्य अपानमपानवृत्तिमवष्टभ्याकृष्य वशीकृत्याध एवापकर्षणेनानुग्रहं कुर्वती वर्तत इत्यर्थः । अन्यथा हि शरीरं गुरुत्वात्पतेत्सावकाशे वोद्गच्छेत् । | यह प्रसिद्ध आदित्य ही अधिदैवत बाह्य प्राण है, वही यह उदित होता है—ऊपरकी ओर जाता है और यही इस आध्यात्मिक चाक्षुष (नेत्रस्थित) प्राणको—चक्षुमें जो हो उसे चाक्षुष कहते हैं—प्रकाशसे अनुगृहीत करता हुआ अर्थात् रूपकी उपलब्धिमें नेत्रको प्रकाश देता हुआ [उदित होता है]। तथा पृथिवीमें जो उसका प्रसिद्ध अभिमानी देवता है वह पुरुषके अपान अर्थात् अपानवृत्तिका अवष्टम्भ—आकर्षण करके यानी उसे अपने अधीन कर [स्थित रहता है]। तात्पर्य यह है कि नीचेकी ओर आकर्षणद्वारा उसपर अनुग्रह करता हुआ स्थित रहता है। नहीं तो, शरीर अपने भारीपनके कारण गिर जाता अथवा अवकाश मिलनेके कारण उड़ जाता। |
| ४४ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ३ |
|---|
| यदेतदन्तरा मध्ये द्यावा-पृथिव्योर्य आकाशस्तत्स्थो वायुः आकाश उच्यते; मञ्चस्थवत् । स समानः समानमनुगृह्णानो वर्तत इत्यर्थः । समानस्यान्तराकाशस्थत्वसामान्यात् । सामान्येन च यो बाह्यो वायुः स व्याप्तिसामान्याद्व्यानो व्यानम् अनुगृह्णानो वर्तत इत्यभिप्रायः ॥८॥ | इन द्युलोक और पृथिवीके अन्तरा—मध्यमें जो आकाश है उसमें रहनेवाला वायु भी [लक्षणा-वृत्तिसे 'मञ्च' कहे जानेवाले] मञ्चस्थ व्यक्तियोंके समान आकाश कहलाता है। वही 'समान' है, अर्थात् समानवायुको अनुगृहीत करता हुआ स्थित है, क्योंकि मध्य-आकाशमें स्थित होना—यह समानवायुके लिये भी [बाह्य वायुकी तरह] साधारण है* । तथा साधारणतया जो बाह्य वायु है वह व्यापकत्वमें [शरीरके भीतर व्याप्त हुए व्यान-वायुसे] समानता होनेके कारण व्यान है अर्थात् व्यानपर अनुग्रह करता हुआ वर्तमान है ॥ ८ ॥ |
तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥ ९ ॥
लोकप्रसिद्ध [ आदित्यरूप ] तेज ही उदान है। अतः जिसका तेज (शारीरिक ऊष्मा) शान्त हो जाता है वह मनमें लीन हुई इन्द्रियोंके सहित पुनर्जन्मको [अथवा पुनर्जन्मके हेतुभूत मृत्युको] प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
* समानवायु शरीरान्तर्वर्ती आकाशके मध्यमें रहता है और बाह्य वायु द्युलोक एवं पृथिवीके मध्यवर्ती आकाशके बीच रहता है; इस प्रकार मध्य आकाशमें स्थित होना—यह दोनोंके लिये एक-सी बात है।
प्रश्न ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४५
| यद्वाह्यं ह वै प्रसिद्धं सामान्यं तेजस्तच्छरीर उदान उदानं वायुमनुगृह्णाति स्वेन प्रकाशेनेत्यभिप्रायः । यस्मात्तेजःस्वभावो वाह्यतेजोऽनुगृहीत उत्क्रान्तिकर्ता तस्माद्यदा लौकिकः पुरुष उपशान्ततेजा भवति; उपशान्तं स्वाभाविकं तेजो यस्य सः, तदा तं क्षीणायुषं मुमूर्षु विद्यात् । स पुनर्भवं शरीरान्तरं प्रतिपद्यते । कथम् ? सहेन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः प्रविशद्भिर्वागादिभिः ॥ ९ ॥ | जो [ आदित्यसंज्ञक ] प्रसिद्ध बाह्य सामान्य तेज है वही शरीरमें उदान है; तात्पर्य यह है कि वहीं अपने प्रकाशसे उदान वायुको अनुगृहीत करता है । क्योंकि उत्क्रमण करनेवाला [ उदान-वायु ] तेजःस्वरूप है—बाह्य तेजसे अनुगृहीत होनेवाला है इसलिये जिस समय लौकिक पुरुष उपशान्ततेजा होता है अर्थात् जिसका स्वाभाविक तेज शान्त हो गया है ऐसा होता है उस समय उसे क्षीणायु—मरणासन्न समझना चाहिये । वह पुनर्भव यानी देहान्तरको प्राप्त होता है । किस प्रकार प्राप्त होता है ? [ इसपर कहते हैं— ] मनमें लीन—प्रविष्ट होती हुई वागादि इन्द्रियोंके सहित [ वह देहान्तरको प्राप्त होता है ] ॥ ९ ॥ |
मरणकालीन संकल्पका फल
| मरणकाले— | मरणकालमें— |
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यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः
सहात्मना यथासङ्कल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥
इसका जैसा चित्त (संकल्प) होता है उसके सहित यह प्राणको प्राप्त होता है । तथा प्राण तेजसे ( उदानवृत्तिसे ) संयुक्त हो [ उस भोक्ताको ] आत्माके सहित संकल्प किये हुए लोकको ले जाता है ॥ १० ॥
| ४६ | प्रश्नोपनिषद् | [ प्रश्न ३ |
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| यच्चित्तो भवति तेनैव चित्तेन संकल्पेनेन्द्रियैः सह प्राणं मुख्यप्राणवृत्तियायाति । मरणकाले क्षीणेन्द्रियवृत्तिः सन्मुख्यया प्राणवृत्त्यैवावतिष्ठत इत्यर्थः । तदाभिवदन्ति ज्ञातय उच्छ्वसिति जीवतीति ।<br><br>स च प्राणस्तेजसोदानवृत्त्या युक्तः सन्सहात्मना स्वामिना भोक्त्रा स एवमुदानवृत्त्यैव युक्तः प्राणस्तं भोक्तारं पुण्यपापकर्मवशाद्यथासंकल्पितं यथाभिप्रेतं लोकं नयति प्रापयति ॥ १० ॥ | इसका जैसा चित्त होता है उस चित्त—संकल्पके सहित ही यह जीव इन्द्रियोंके सहित प्राण अर्थात् मुख्य प्राणवृत्तिको प्राप्त होता है। तात्पर्य यह कि मरणकालमें यह प्रक्षीण इन्द्रियवृत्तिवाला होकर मुख्य प्राणवृत्तिसे ही स्थित होता है। उसी समय जातिवाले कहा करते हैं कि 'अभी श्वास लेता है—अभी जीवित है' इत्यादि ।<br><br>वह प्राण ही तेज अर्थात् उदान वृत्तिसे सम्पन्न हो आत्मा—भोक्ता स्वामीके साथ [सम्मिलित होता है]। तथा उदानवृत्तिसे संयुक्त हुआ वह प्राण ही उस भोक्ता जीवको उसके पाप-पुण्यमय कर्मोंके अनुसार यथासङ्कल्पित अर्थात् उसके अभिप्रायानुसारी लोकोंको ले जाता—प्राप्त करा देता है ॥ १० ॥ |
य एवं विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥
जो विद्वान् प्राणको इस प्रकार जानता है उसकी प्रजा नष्ट नहीं होती। वह अमर हो जाता है। इस विषयमें यह श्लोक है ॥ ११ ॥
| यः कश्चिदेवं विद्वान्यथोक्तविशेषणैर्विशिष्टमुत्पत्त्यादिभिः | जो कोई विद्वान् पुरुष इस प्रकार उपर्युक्त विशेषणोंसे विशिष्ट |
प्रश्न ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
| प्राणं वेद जानाति तस्येदं फलम् ऐहिकमामुष्मिकं चोच्यते । न हास्य नैवास्य विदुषः प्रजा पुत्रपौत्रादिलक्षणा हीयते छिद्यते । पतिते च शरीरे प्राणसायुज्यतयामृतोऽमरणधर्मा भवति तदेतस्मिन्नर्थे संक्षेपाभिधायक एष श्लोको मन्त्रो भवति ॥ ११ ॥ | प्राणको उसके उत्पत्ति आदिके सहित जानता है उसके लिये यह लौकिक और पारलौकिक फल बतलाया जाता है—'इस विद्वान्की पुत्र-पौत्रादिरूप प्रजा हीन—उच्छिन्न अर्थात् नष्ट नहीं होती तथा शरीरके पतित होनेपर प्राणसायुज्यको प्राप्त हो जानेके कारण वह अमृत—अमरणधर्मा हो जाता है। इस विषयमें संक्षेपसे बतलानेवाला यह श्लोक यानी मन्त्र है—॥ ११ ॥ |
उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा ।
अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते
विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥ १२॥
प्राणकी उत्पत्ति, आगमन, स्थान, व्यापकता एवं बाह्य और आध्यात्मिक भेदसे पाँच प्रकार स्थिति जानकर मनुष्य अमरत्व प्राप्त कर लेता है—अमरत्व प्राप्त कर लेता है ॥ १२ ॥
| उत्पत्तिं परमात्मनः प्राणस्यायतिमागमनं मनोकृतेनास्मिन् शरीरे स्थानं स्थितिं च पायूपस्थादिस्थानेषु विभुत्वं च स्वाम्यमेव सम्राडिव प्राणवृत्तिभेदानां पञ्चधा स्थापनं बाह्यमादित्यादिरूपेण | प्राणकी परमात्मासे उत्पत्ति, आयति—मनके सङ्कल्पसे इस शरीरमें आगमन, स्थान—पायु-उपस्थादिमें स्थित होना, विभुत्व—सम्राट्के समान प्रभुत्व यानी प्राणके वृत्तिभेदको पाँच प्रकारसे स्थापित करना, तथा आदित्यादि- |