प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - प्रतिमा-दर्शन एवं सम्पूर्ण ७ अङ्क सान्वय सटीक)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa with Commentary
महाकवि भास द्वारा
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भरतः—किमिति किमिति । भटः—एकनाडिकावशेषः कृत्तिकाविषयः । तस्मात् प्रतिपन्नायामेव रोहिण्यामयोध्यां प्रवेक्ष्यति कुमारः । भरतः—वाढमेवनम् । न मया गुरुवचनमतिक्रान्तपूर्वम् । गच्छ त्वम् । भटः—यदाज्ञापयति कुमारः । (निष्क्रान्तः) शब्दार्थ—रथवेगं = रथ की गति को । निरूप्य = देख कर । क्षीण- विषयाः = अल्पीभूत पदार्थ वाले । उद्वृत्ताम्बुः = उछलते हुए जल वाली । नेमिविवरे = पहिए के घेरे के रन्ध्र में । अरव्यक्तिः = पहिए के नाभि मध्य के अवयव अरों की स्फुट प्रतीति । स्थितम् = गति रहित । जवात् = वेग के कारण । चक्रवलयम् = पहिए का मण्डल । रजः = धूलि । अश्वोद्धूतं = घोड़ों के खुरों से उडी हुई । पुरतः = आगे । नानुTurnपतति = पीछे नही गिरती है । घोपस्नेहतया = घने और शीतल होने के कारण । अभितः = आगे । त्वरता = शीघ्रता । स्निह्यता = प्रेम प्रदर्शित करते हुए । समुत्थापितः = उठाते हुए । उपगता = पहुँचा हुआ । क्लेदयन्ति = सींच रही हैं । सदृशः = पहले के समान ही । व्यायतः = नियन्त्रित या बलवान् । आत्मनः = स्वयं के । सौमित्रिणा = लक्ष्मण के द्वारा । अविज्ञाय = नहीं जान कर । उदर्के = उत्तर काल में । निष्फलाम् = फलरहित । आशानाम् = मनोरथ को । परिवहन् = धारण करते हुए । प्रवेक्ष्यति = प्रवेश करेगा । जानद्भिः = जानते हुए भी । निवेद्यते = कहा जा रहा है । प्राणपरित्यागं = मृत्यु को । ऐश्वर्यलुब्धताम् = धन लोलुपता को । प्रवास = देशान्तरगमन को । दोषान् = दुःखपूर्ण समाचारों को । अभिधास्यति = कहेगा । अभिगतः = आया है । उपाध्यायाः = वसिष्ठ, वामदेव आदि ने । भवन्तम् = आपको । आहुः = कहा है । नाडिका = २४ मिनट का काल या आधे मुहूर्त का समय । कृत्तिकाविषय = कृत्तिका नक्षत्र का समय । प्रतिपन्ना- याम् = बीत जाने पर । गेहिण्याम् = रोहिणी नक्षत्र में । वाढम् = हाँ, ठीक है । अतिक्रान्तपूर्वम् = पहले उल्लंघन करना । अन्वय—द्रुतरयगतिक्षीणविषयाः द्रुमाः धावन्ति इव । मही उद्- वृत्ताम्बुः नदी इव नेमिविवरे निपतति । अरव्यक्तिः नष्टा । चक्रवलयम् जवात् स्थितम् इव । अश्वोद्धूतं रजः च पुरतः पतति न अनुपतति । (२)
( ९१ ) अन्वय— पितुः पादयोः शिरः पतितम् इव। स्निह्यता राज्ञा समुत्था- पितः इव अस्मि। भ्रातरः त्वरितम् उपगता इव। मातरः अश्रुभिः माम् क्लेदयन्ति इव। सदृशः इति, महान् इति, व्यायतः च इति भृत्यैः सेवया अहम् स्तुतः इव। तत्र आत्मनः वेषं च भाषां च सौमित्रिणा परिहसितम् इव पश्यामि। (३) अन्वय—पितुः प्राणपरित्यागम्, मातुः ऐश्वर्यलुब्धताम्, ज्येष्ठभ्रातुः प्रवासम्, त्रीन् दोषान् कः अभिधास्यति। (४) हिन्दी अर्थ भरत—(रथ की गति को देख कर) अहा। रथ किस तीव्रता से भागा जा रहा है। ये वृक्ष रथ की तेज गति के कारण आँखों से ओझल होते हुए मानो दौड़ रहे हैं। भँवर से युक्त जल वाली नदी की भाँति पृथ्वी धुरी के छिद्र में मानो गिर रही है। बड़ी तेजी से घूमने के कारण चक्र के आरे दीख नहीं रहे हैं। रथ का पहिया वेग से मानो गति हीन हो रहा है और धूलि घोड़ों के खुरों से उड़ कर सामने ही गिरती है पीछे नहीं। (२) सूत—हे दीर्घायु, वृक्षों की सघनता तथा शीतलता से जान पड़ता है कि अयोध्या पास में ही है। भरत—अहा, आत्मीय जनों को देखने के लिए मेरा मन कितना उतावला हो रहा है। क्योंकि, इस समय—ऐसा लग रहा है कि पिताजी के चरणों में मेरा सिर झुका हुआ है और उन्होंने मुझे प्रेम से उठा सा लिया है। भाई शीघ्रता से आकर मुझे घेर से रहे हैं। जननियां आँसुओं से मुझे भिगो सी रही हैं। भरत पहले के समान ही है, पहले से बड़े हो गए हैं, इस प्रकार कहते हुए सेवक लोग मेरी सेवा करते हुए प्रशंसा कर रहे हैं और लक्ष्मण मेरी निम्न प्रकार की वेशभूषा तथा बोली पर परिहास कर रहा है। (३) सूत—(मन में) अरे, दुःख की बात है कि यह राजकुमार महाराज की मृत्यु को नहीं जान कर भावी मिथ्या आशा को लिए हुए अयोध्या में प्रवेश
( ९२ ) करेगा और मैं जानते हुए भी इसे नही बता पा रहा हूं । क्योकि, पिता दशरथ की मृत्यु, माता कैकेयी का राज्यलोभ और वडे भाई राम का वनवास इन तीनो दोषों को कौन कहेगा । (४) (प्रवेश करके) भट - राजकुमार की जय हो । भरत-भद्र, क्या शत्रुघ्न मेरे पास श्रा रहे हैं । भट- हां, राजकुमार तो श्रापके पास श्रा ही रहे हैं । किन्तु उपाध्यायों ने श्रापसे कहा है । भरत - क्या कहा है, क्या कहा है ? भट- कृत्तिका का एक दण्ड (६० पल या २४ मिनट का काल=नाडी या नाडिका) रह गया है । उसके बीत जाने पर रोहिणी मे कुमार श्रोयोध्या मे प्रवेश करे । भरत-बहुत अच्छा । मैंने गुरुजनो के वचन पहले कभी नही टाले । तुम चलो । भट - जैसा राजकुमार श्रादेश देते हैं। (निकल जाता है) (३) मूल भरतः- अथ कस्मिन् प्रदेशे विश्रमिष्ये । भवतु दृष्टम् । एतस्मिन् वृक्षान्तराविष्कृते देवकुले मुहूर्तम् विश्रमयिष्ये । तदुभयं भविष्यति-दैवतपूजा विश्रमश्च । अथ च उपोपविश्य प्रवेष्ट- व्यानि नगराणीति सत्समुदाचारः । तस्मात् स्थाप्यताम् रथः । सूतः-यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । (रथं स्थापयति) भरतः- (रथादवतीर्य) सूत ! एकान्ते विश्रामयाश्वान् । सूतः-यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । (निष्क्रान्तः) भरतः- (किञ्चिद गत्वावलोक्य) साधुमुक्तपुष्पलाजाविष्कृता वलयः, दत्तचन्दनपञ्चाङ्गला भित्तयः, अवसक्तमाल्यदामशोभीनि द्वाराणि, प्रकीर्णा वालुकाः । किं नु खलु पार्वणोऽयं विशेषः श्रथवा आह्निक मास्तित्वयम् ? कस्य नु खलु दैवतस्य स्थानं भविष्यति । नेह किञ्चित् प्रहरणं ध्वजो वा बहिश्चिह्नं दृश्यते । भवतु प्रविश्य ज्ञास्ये । (प्रविश्यावलोक्य) अहो
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धुर्यम् पाषाणानाम् । अहो भावगतिराकृतीनाम् । दैवतोद्- दिष्टानापि मानुषविश्वासतासां प्रतिमानाम् । किन्नु खलु चतुर्देवतोऽय स्तोमः । अथवा यानि तानि भवन्तु । अस्ति तावन्मे मनसि प्रहर्षः । काम दैवतमित्येव युक्त नमयितुं शिरः । विफलस्तु प्रणाम. स्याद मन्त्रार्चितदैवतः ॥ (५) (प्रविश्य) देवकुलिकः—भोः ! नैत्यकावसाने प्राणिधर्ममनुतिष्ठति मयि को नु खल्वयमासा प्रतिमानामल्पान्तराकृतिरिव प्रतिमागृहं प्रविष्टः ? भवतु, प्रविश्य ज्ञास्ये । (प्रविशति) भरतः—नमोऽस्तु । देवकुलिकः- न खलु न खलु प्रणामः कार्यः । भरतः—मा तावद् भो ! वक्तव्य किञ्चिदमासु विशिष्ट प्रतिपाल्यते । किं कृतः प्रतिषेधोऽय नियमप्रभविष्णुता ॥ (६) देवकुलिकः— य खल्वेतैः कारणैः प्रतिषेधयामि भवन्तम् । किन्तु दैवतशकया ब्राह्मणजनस्य प्रणामं परिहरामि । क्षत्रिया ह्यत्र- भवन्तः । भरतः—एवम् । क्षत्रिया ह्यत्रभवन्तः । अथ के नामात्रभवन्तः । देवकुलिकः- इक्ष्वाकवः । भरतः— (सहर्षम्) इक्ष्वाकव इति । एते ते ऽयोध्याभर्तारः । एते ते देवतानामसुरपुरवधे गच्छन्त्योऽभिसरीः— मेते ते शत्रुलोके सपुरजनपदा यान्ति स्वसुकृतैः । एते ते प्राप्नुवन्तः स्वभुजबुलजितां कृत्स्नां वसुमती मेने ते मृत्युना ये चिरमिवसिताश्छन्दं मृगयता ॥ (७) भोः ! यदृच्छया खलु मया महत् फलमासादितम् । अभिधीयता कस्तावदत्रभवान् ?
( ९४ ) शब्दार्थ—प्रदेशे=स्थान पर । विश्रमिष्ये=आराम करूंगा । वृक्षान्त राविष्कृते=पेडो के मध्य दीखने वाले । देवकुले=मन्दिर मे । मुहूर्तम्=थोडी देर तक । उभय=दोनो । उपोपविश्य = थोडी देर बैठकर । सत्समुदाचारः = शिष्टाचार । स्थाप्यताम् = रोको । विश्रामय=आराम कराओ । साधु- मुक्त पुष्पलाजाविष्कृताः=सज्जन व्यक्ति से विकीर्ण किए गए फूल व खीलों से प्रकट होने वाले । बलय. =प्रसाद या नैवेद्य । अवसक्त=लटकने वाली । पार्वणः =पूर्णिमा आदि विशेष तिथि पर होने वाला । आह्निकम्=प्रतिदिन किया जाने वाला । आस्तिक्यम् = ईश्वर भक्त का । दैवतस्य=देवता का । इह-यहाँ पर । प्रहरणम्=शक्ति आदि आयुध । बहिश्चिह्नं=बाहरी लक्षण । ज्ञास्ये= मालूम करूंगा । क्रियामाधुर्यम्= शिल्प चातुरी । भावगति = भावों की अभि- व्यक्ति । दैवतोद्दिष्टानां=देवताओ को प्रतिमा स सकल्पित । मानुषविश्वासातः =मनुष्यो की प्रतिमा की विश्वास योग्यता । चतुर्देवता=चार देवताओ का । स्तोम.=समूह । वार्षल = शूद्र सम्बन्धी । अमन्त्रार्चितदैवतः-देवता के मन्त्र और पूजा के बिना । देवकुलिक =पुजारी । नैत्यकावसाने=पूजा आदि नित्य कर्म की समाप्ति पर । प्राशणधमंम्=भोजन को । अनुतिष्ठति=कर लेने पर । अल्पान्तराकृति = बहुत कम भेद वाले आकार का । ज्ञास्ये=ज्ञात करूगा । नमोऽश्वरतु = नमस्कार होवे । मा तावद् भोः = ऐसा मत कहो । वक्तव्यम् = दूषण । विशिष्ट.= मुझ से अच्छे व्यक्ति की । प्रतिपाल्यते= प्रतीक्षा की जा रही है । नियमप्रभविष्णुता = स्वय के तपोनुष्ठान की प्रौढ़ता । दैवतशकया प्रतिमाओ के भ्रम मे । परिहरामि= मना कर रहा हूँ । असुरपरवधे - राक्षसों के नगर मे रहने वालो को समाप्त करने मे । अभिसरी=सहायता के लिए । शक्रलोके = इन्द्रलोक स्वर्ग मे । सुपरजनपदाः = नगर की प्रजाओं के साथ । यान्ति = जाते है । स्वसुकृतैः = अपने पुण्यो के द्वारा । स्वभुजवलजिता = अपने बाहुबल से जीती गई । कृत्स्नाम् सम्पूर्ण । वसुमतीम् = पृथ्वी को । अनवसिताः = नही समाप्त किये जाने वाले । छन्द = अभिप्राय को । मृगयता= ढूँढते हुए । यदृच्छया = अनायास ही । आसादितं = प्राप्त कर लिया है । अभिधीयताम् = कहो । अत्रभवान् = ये । अन्वय--दैवतम् इति इव शिरः नमयितुम् कामम् युक्तम् । प्रणामा तु अमन्त्रार्चितदैवत. वार्षलः स्यात् । (१५)
( 95 ) अन्वय—अस्मासु किञ्चित् वक्तवयम् ; विशिष्टः प्रतिपाल्यते । अयं प्रतिषेधः किं कृतः, नियमप्रभविष्णुता । (६) अन्वय—एते ते असुरपुरवधे दैवतानाम् अभिसरीम् गच्छन्ति । एते ते सपुरजनपदाः स्वसुकृतैः शक्रलोके गच्छन्ति । एते ते कृत्स्नाम् वसुमतीम् स्वभु- जबलजिताम् प्राप्नुवन्तः (सन्ति) । एते ते छन्द मृगयता मृत्युना चिरम् अनव- सिताः । (६) हिन्दी अर्थ भरत—तब तक किस जगह विश्राम करूँ । ठीक' है, देख लिया । वृक्षों के मध्य दिखने वाले इस मन्दिर में थोड़ी देर तक आराम करूँगा । इस प्रकार देवदर्शन और विश्राम दोनो काम हो जायेगे । और नगर के समीप थोडी देर बैठ कर फिर उसमे प्रवेश करना चाहिए, इस प्रकार शिष्टाचार का भी पालन हो जाएगा । अतः रथ को रोको । सूत—जैसी दीर्घायु की आज्ञा । (रथ ठहराता है) भरत—(रथ से उतरकर) सूत, घोडो को एक ओर ले जाकर आराम कराओ । सूत—जो आज्ञा । (निकल जाता है) भरत—(कुछ चलकर और देखकर) यहाँ तो विधिवत् खील और फूल के नैवेद्य दिए गए है । दीवारो की पुताई के ऊपर चन्दन से पाँचो अंगु- लियों की छापें लगाई गई है । दरवाजो पर फूलो की मालाएँ लटक रहीं है । बाहर रेत बिछी है । क्या कोई त्यौहार है, जिसकी यह विशेषता है अथवा प्रतिदिन का नियम पालन है । यह कौन से देवता का स्थान हो सकता है । यहाँ शस्त्र, ध्वजा आदि बाहरी चिह्न भी तो नही दीख पड़ते । ठीक है, अन्दर जाकर ज्ञात करूँगा । (प्रवेश करके और देखकर) अहा, पत्थर की कारीगरी कितनी अच्छी है । मूर्तियो मे भावव्यंजना सजीव प्रतीत होती है । ये प्रतिमाएँ देवताओ की होकर भी मनुष्यो के समान जान पडती है । क्या यह चार देवताओ की मूर्तियो का समूह है ? अथवा जो कुछ भी होवे । मुझे तो इन्हे देखकर अपार आनन्द हो रहा है ।
( 96 ) ये देवमूर्तियां हैं, ऐसा समझकर तो इन्हें प्रणाम करना उचित है। किन्तु विशेष परिचय न होने से बिना मन्त्र पढ़े ही प्रणाम करना होगा और यह परिपाटी शूद्रो की सी होगी । (५) (प्रवेश करके) देवकुलिक—अरे, नित्य नियत पूजा पाठ कर लेने के बाद मेरे भोजन आदि के अवसर पर इन मूर्तियो से मिलती जुलती आकृति वाला यह कौन व्यक्ति इस प्रतिमा गृह मे आया है । अच्छा, भीतर जाकर पता लगाता हूँ । (प्रवेश करता है) भरत—नमस्कार है । देवकुलिक—नही, नही, प्रणाम मत करो । भरत — क्यों ? ऐसा मत कहो । क्या हममे कोई दोष है, या हमसे किसी अच्छे आदमी की प्रतीक्षा कर रहे हो । यह प्रणाम करने के लिएमना क्यो रहे हो । क्या यह तुम्हारा अधिकार मद तो नही है ? (६) देवकुलिक—मैं आपको इन कारणो से नही रोक रहा हूँ । किन्तु कही तुम ब्राह्मण होकर देवताओ के भ्रम से इन मूर्तियो को प्रणाम न कर लो इसलिए मना कर रहा हूँ । ये मूर्तियाँ क्षत्रियो की हैं ? भरत—ऐमा । क्या ये क्षत्रिय महानुभाव है । अच्छा, तो फिर इन श्रीमानो के क्या नाम हैं। देवकुलिक—ये इक्ष्वाकु वंशीय है । भरत—(प्रसन्नतापूर्वक) क्या इक्ष्वाकुवंशी । क्या ये अयोध्या के राजा है ? ये वे ही लोग है, जो राक्षसों का विनाश करने में देवताओ की सहायता के लिए जाते रहे है । ये वे लोग है, जो अपने पुण्यों के प्रताप से अपने नगर व प्रजा जनों के साथ स्वर्ग जाते रहे हैं । ये वे है, जो अपने बाहुबल से सम्पूर्ण भूमण्डल को जीतकर अपने अधिकार में करते रहे हैं । और ये वे है, जो इच्छानुसार ढूंढने वाली मृत्यु के द्वारा भी बहुत समय तक समाप्त नही किए जाते हैं, अर्थात् जिनकी मृत्यु अपनी इच्छा पर निर्भर करती है । (७)
( 97 ) अहा, अकस्मात् स्वेच्छा से ही मुझे महान् फल मिल गया । आप कहिए, ये कौन महानुभाव है ? (४) मूल देवकुलिकः—अयं खलु तावत्त सन्निहितसर्वरत्नस्य विश्वजितो यज्ञस्य प्रवर्तयिता प्रज्वलितधर्मप्रदीपो दिलीपः । भरतः—नमोऽस्तु धर्मपरायणाय । अभिधीयतां कस्तावदत्रभवान् ? देवकुलिकः—अयं खलु तावत् संवेशनोत्थापनयोरनेकब्राह्मणजन- सहस्रप्रयुक्तपुण्याहशब्दरवो रघुः । भरतः—अहो बलवान् मृत्युरेतामपि रक्षामतिक्रान्तः । नमोऽस्तु ब्राह्मणजनावेदितराज्यफलाय । अभिधीयतां कस्ताव- दत्रभवान् ? देवकुलिकः—अथ खलु तावत् प्रियावियोगनिर्वेदपरित्यक्तराज्यभारो नित्यावभृथस्नानप्रशान्तरजा अजः । भरतः—नमोऽस्तु श्लाघनीयपश्चात्तापाय । (दशरथस्य प्रतिमामव- लोकयन् पर्याकुलो भूत्वा) भोः ? बहुमानव्याक्षिप्तेन मनसा सुव्यक्तं नावधारितम् । अभिधीयतां कस्तावदत्रभवान् ? देवकुलिकः—अयं दिलीपः । भरतः—पितृपितामहो महाराजस्य । ततस्ततः । देवकुलिक.—अत्रभवान् रघुः । भरतः—पितामहो महाराजस्य । ततस्ततः । देवकुलिकः—अत्रभवानजः । भरतः—पिता तातस्य । किमिति किमिति । देवकुलिक —अयं दिलीपः, अयं रघुः, अयमजः । भरतः—भवन्तं किञ्चित् पृच्छामि । धरमाणानामपि प्रतिमाः स्थाप्यन्ते ? देवकुलिकः—न खलु, अतिक्रान्तानामेव । भरतः—तेन ह्यापृच्छे भवन्तम् । देवकुलिकः—तिष्ठ ।
( 98 ) येन प्राणाश्च राज्य च स्त्रीशुल्कार्थे विसर्जिताः । इमा दशरथस्य त्व प्रतिमा कि न पृच्छसे ॥ ( ८ ) भरतः—हा तात ! (मूर्च्छितः पतति । पुनः प्रत्यागत्य) हृदय भव सकामं यत्कृते शकसे त्वं शृणु पितृनिधनं तद् गच्छ धैर्यम् च तावत् । स्पृशति तु यदि नीचो मामयं शुल्कशब्द स्त्र्यर्थं च भवति सत्यं तत्र देहो विशोध्यः ॥ ( ६ ) आर्य ! देवकुलिकः—आर्येति-इक्ष्वाकुकुलालापः खल्वियम् । कच्चित् कैकेयी- पुत्रो भरतो भवान् ननु ? भरतः—अथकिम् अथकिम् । दशरथपुत्रो भरतोऽस्मि, न कैकेय्याः । देवकुलिकः—तेन ह्यापृच्छे भवन्तम् । भरतः—तिष्ठ । शेषमभिधीयताम् । देवकुलिक.—का गतिः । श्रूयताम् । उपरतस्तत्रभवान् दशरथः । सीता- लक्ष्मणसहायस्य रामस्य वनगमन प्रयोजनं न जाने । भरतः—कथं कथमार्योऽपि वनं गतः । (द्विगुण मोहमुपगतः) शब्दार्थ--देवकुलिकः = पुजारी । सन्निहितसर्वरत्नस्य = सभी प्रकार की बहुमूल्य वस्तुओं को अपने पास रखने वाले । विश्वजितो यज्ञस्य=विश्वजित् नामक यज्ञ के । प्रवर्त्तयिता=करने वाले । प्रज्वलितधर्मप्रदीप-=धर्म रूपी दीपक को सतत जलाने वाले । धर्मपरायणाय=धर्मनिष्ठ को । अभिधीयता= कहो । सवेशनोत्थापनयोः=सोने के और उठने के समय में । सहस्र=हजार । पुण्याहशब्दरवो=पवित्र मन्त्र पाठो की वाचन ध्वनि वाला । एताम्=इस (रक्षा) को । अतिक्रान्त =पार गई । आवेदित=देना । प्रियावियोग = प्रिय रानी इन्दुमति का विरह । निर्वेद=विषयो से विमुखता । नित्य=सदा । अवभृतस्नान= यज्ञ की दीक्षा का अभिषेक । प्रशान्तरजा =रजोगुण को धोने वाले । अजः= राजा का नाम । श्लाघनीय=प्रशंसनीय । पश्चात्तापाय=प्रिया की अत्यधिक आसक्ति रूपि अनुताप वाले । पर्याकुलः=व्याकुल । बहुमानव्याक्षिप्तेन=अत्यन्त सम्मान या गौरव के कारण अन्यत्र लगे हुए । सुव्यक्तं=भली प्रकार से । नावधारितं=नही निश्चय कर सका । पितृपितामहः=परदादा । महाराजस्य
( 99 ) :। रथ के । पितामहः=दादा । तातस्य=पिता दशरथ के । धरमाणानाम् = ८) र्म धारण करने वालो के । अतिक्रान्तानाम् मृत्यु को प्राप्त करने वालों के । पृच्छे=जाने की अनुमति लेता हूँ । स्त्रीशुल्कार्थे=विवाह के समय स्त्री को र जाने वाले द्रव्य के लिए । विसर्जिताः=छोड दिए । पृच्छसे=पूछ रहे हो । भागत्य=होश में आकर । सकामं=पूर्ण मनोरथ वाले । यत्कृते=जिस विषय । शकसे=आशका कर रहे थे । स्पृशति=सम्बन्ध युक्त होता है । नीचः= न्दनीय । विशोध्य=(अग्नि द्वारा) शुद्ध करना चाहिए । आलाप. = बोला िने का शब्द । शेषम्=अवशिष्ट या बचा हुआ । गति. = उपाय । उपरत= र गए । अन्वय- येन स्त्रीशुल्कार्थे प्राणाः राज्यं च विसर्जिताः, दशरथस्य इमां प्रतिमा त्वं किम् न पृच्छसे । (८) अन्वय-हृदय, सकामं भव, त्वं यत्कृते शंकसे, तत् पितृनिधन शृणु, तावत् धैर्यम् च गच्छ । तु नीचः अयम् शुल्कशब्दः मां स्पृशति, अथ च सत्यम् भवति, तत्र देहः विशोध्य । (६) हिन्दी अर्थ देवकुलिक-ये महाराज दिलीप हैं, जिन्होने सभी रत्नो को इकट्ठा कर, विश्वजित् नामक यज्ञ को सम्पन्न किया था और धर्म के दीपक को प्रकाशित किया था । भरत - इन धर्म प्राण को नमस्कार । आगे बताइए, ये कौन है ? देवकुलिक-ये महाराज रघु हैं, जिनके कान सोते-जागते समय पुण्याह वाचन की मन्त्र ध्वनि से पूर्ण रहा करते थे । भरत - ओह, प्रबल मृत्यु ने इस घेरे को भी पार कर लिया । ब्राह्मणो की सेवा में अपनी पूरी सम्पत्ति समर्पित करने वाले महाराज रघु को प्रणाम हो । अब कहो, ये श्रीमान् कौन है ? देवकुलिक-ये महाराज अज हैं, जिन्होंने अपनी प्रिय रानी के विरह में विरक्त होकर राजपाट को छोड़ दिया था और जो नित्य प्रति किए जाने वाले यज्ञों के अवसान में अभिषेकों से सम्पूर्ण कल्मषभार को धो देने वाले थे ।
( 100 ) भरत—प्रशंसनीय पश्चात्ताप करने वाले को नमस्कार है । (दशरथ की प्र को देखते हुए श्रौर घबरा कर) श्ररे, मेरा हृदय इन महापुरु गौरवचिन्ता मे लग गया था, इसलिए ठीक से नही समझ सका । श्राप फिर से बताइये कि ये कौन हैं ? देवकुलिक—ये दिलीप हैं । भरत—महाराज के प्रपितामह । इसके वाद । देवकुलिक—ये हैं रघु । भरत—महाराज के पितामह । इसके आगे । देवकुलिक—ये श्रीमान् अज हैं । भरत—महाराज के पिता । क्या कहा, क्या कहा ? देवकुलिक—यह दिलीप, यह रघु, यह अज हैं । भरत—मैं श्रापसे कुछ पूछना चाहता हूँ । क्या जीवितों की भी प्रति स्थापित की जाती हैं ? देवकुलिक—नही, केवल मृतको की । भरत—अच्छा, श्रव श्राप मुझे जाने की श्राज्ञा दें । देवकुलिक—ठहरो, जिन्होने स्त्री शुल्क के लिए अपने राज्य श्रौर प्राण सव कुछ दिए, उन महाराज दशरथ की प्रतिमा के विषय मे श्राप क्यों नही जानना चाहते । (८) भरत—हा पिताजी । (वेहोश होकर गिरता है । फिर होश मे श्राकर) हे हृदय, श्रव तुम्हारी इच्छा पूरी हुई, जिसकी तुम्हे श्राशंका थी, पिता की मृत्यु के समाचार को सुनो श्रौर धीरज बाँधो । किन्तु हा यदि स्त्री शुल्क मे याचित राज्य का उद्देश्य मैं बनाया गया होऊँ तब तो देह की शुद्धि करनी पडेगी श्रर्थात् कड़ी परीक्षा देकर श्रप निर्दोष होना सिद्ध करना पडेगा । (६) श्रार्य ! देवकुलिक—'श्रार्य, कह कर वात करना तो इक्ष्वाकु वंशी लोगों का क्रम है क्या श्राप कैकयी के पुत्र भरत तो नही है ?
( 101 ) [भरत]—और क्या, और क्या । मै दशरथ का पुत्र भरत हूँ, कैकेयी का नही । [देव]कुलिक—तो अब आप जा सकते है । [भरत]—ठहरो, बची हुई बात भी कह दो । [देव]कुलिके—क्या किया जाए । सुनिए । महाराज दशरथ की मृत्यु हो गई । सीता और लक्ष्मण के साथ राम वन को क्यो चले गए, इसका मुझे कारण ज्ञात नही है । [भर]त—क्या कहा, क्या पूज्य राम भी वन को गए ? (फिर मूच्छित हो जाता है) (१) मूल देवकुलिकः—कुमार ! समाश्वसिहि समाश्वसिहि । [भ]रतः—(समाश्वस्य) अयोध्यामटवीभूतां पित्रा भ्रात्रा च वर्जिताम् । पिपासार्तोऽनुधावामि क्षीणतोयां नदीमिव ॥ (१०) आर्य ! विस्तरश्रवणं मे मनसः स्थैर्यमुत्पादयति । तत् सर्वमन- वशेषमभिधीयताम् । देवकुलिकः—श्रूयताम्, तत्रभवता राज्ञाभिषिच्यमाने तत्रभवति रामे भवतो जनन्याऽभिहितं किल । भरतः—तिष्ठ, तं स्मृत्वा शुल्कदोषं भवतु मम सुतो राजेत्यभिहितं तद्धैर्येणाश्वसत्या व्रज सुत वनमित्यार्याऽप्यभिहितः । तं दृष्ट्वा बद्धचीरं निधनमसहत राजा ननु गतः पात्यन्ते धिक्प्रलापा ननु मयि सदृशाः शेषाः प्रकृतिभिः ॥ (११) (मोहमुपगतः) (नेपथ्ये) उत्सरतार्याः ! उत्सरत । देवकुलिकः—(विलोक्य) अये ! काले खल्वागता देव्यः पुत्रे मोहमुपागते । हस्तस्पर्शो हि मातृणामजलस्य जलाञ्जलिः ॥ (१२)
(ततः प्रविशन्ति देव्यः सुमन्त्रश्च) सुमन्त्रः— इत इतो भवत्यः । इदं गृहं तत् प्रतिमानृपस्य नः समुच्छ्रयो यस्य स हर्म्यदुर्लभः । असन्निवृत्तैरप्रतिहारिकागतै- र्विना प्रणामं पथिकैरुपास्यते ॥ (१३) (प्रविश्यावलोक्य) भवत्यः ! न खलु न खलु प्रवेष्टव्यम् । अयं हि पतितः कोऽपि वयःस्थ इव पार्थिवः । देवकुलिकः— परशङ्कामलं कर्तुं गृह्यतां भरतो ह्ययम् ॥ (१४) (निष्क्रान्तः) देव्यः—(सहसोपगम्य) हा जात ! भरत ! भरतः—(किञ्चित् समाश्वस्य) आर्य ! सुमन्त्रः—जयतु महा— (इत्यर्धोक्ते सविषादम्) आहो स्वरसादृश्य- मन्ये प्रतिमास्थो महाराजो व्याहरतीति । भरतः—अथ मातृणामिदानीं काऽवस्था । देव्यः—जात ! एषा नोऽवस्था । (अवगुण्ठनमपनयन्ति) सुमन्त्रः—भवत्यः ! निगृह्यतामुत्कण्ठा । भरतः—(सुमन्त्रं विलोक्य) सर्वसमुदाचारसन्निकर्षस्तु मा सूचयति कच्चित् तात ! सुमन्त्रो भवान् ननु । सुमन्त्रः—कुमार ! अथ किम् । सुमन्त्रोऽस्मि । अन्वास्यमानश्चिरजीवदोषैः कृतघ्नभावेन विडम्ब्यमानः । अहं हि तस्मिन् नृपतौ विपन्ने जीवामि शून्यस्य रथस्य सूतः ॥ (१५) शब्दार्थ—समाश्वस्य=आश्वासन पाकर । अटवीभूतां=अरण्य के तुल्य वर्जिताम्=रहित । पिपासार्तः=पानी की इच्छा से पीडित । अनुधावामि=पीछे दौडता हूं । क्षीणतोयां=सूखे जल वाली । विस्तरश्रवणं=विस्तार से समाचार
( 103 )
सुनता। स्थैर्यम्=स्थिरता को। अनवशेषम्=सम्पूर्ण रूप से। अभिधीयताम्= कहा जाए। अभिषिच्यमाने=राज्य की धुरी पर नियोजित करते हुए। शुल्क- दोष=विवाह के मूल्य रूपी अनर्थ को। स्मृत्वा=याद करके। भवतु=होवे। मम सुतः=मेरा पुत्र भरत। अभिहितं=कहा। धैर्येण=धैर्यपूर्वक। आश्वसत्या= साहस प्राप्त होने पर। व्रज = जाओ। सुत=हे पुत्र राम। बद्धचीर=वल्कल वस्त्र पहने हुए को। निधनम्=मृत्यु को। असदृशं=आरोग्य अर्थात् बिना अवसर के। पात्यन्ते = गिराए जा रहे हैं। धिक्प्रलापाः=धिक्कार के वाक्य। ननु= सचमुच मे। मयि=मुझ पर। सदृशाः= समुचित। शेषाः= जननी कैकेयी की भर्त्सना से बचे हुए। प्रकृतिभिः=प्रजाजनों के द्वारा। मोहम् उपगतः=संज्ञाहीन हो जाता है। उत्सरत=हटो। आर्याः=सज्जनो। काले=उचित समय पर। देव्यः= कौशल्या आदि रानियां। उपागते=प्राप्त होने पर। अजलस्य=जलरहित प्यासे व्यक्ति के लिए। जलाञ्जलिः=जल की अंजलि। इतः इतः=इधर से आइए इधर से। भवत्यः=आप देवियां। प्रतिमानृपस्य=प्रतिमा रूप से बने राजाओं का नः=हमारे। समुच्छ्रयः= उन्नत। हर्म्यदुर्लभः=राज सदन से भी बढ़कर। अयन्त्रितैः=बिना रोके जाने वाले। अप्रतिहारिकागतैः=द्वारपाल की अनुमति के बिना आने वाले। विना प्रणामं=प्रणाम रहित। पथिकैः=मुसाफिरों द्वारा। उपास्यते=उपयोग में लिया जाता है। वयःस्थः=युवा। इव=समान। पार्थिवः= राजा = दशरथ। परशङ्काम्=किसी पराए की आशंका को। अलं कर्तुम्= मत करो। गृह्यताम्=ग्रहण करो। अन्वास्यमानः=पीछा किए जाते हुए। चिरजीवदोषैः=दीर्घजीवी पुरुष मे आसानी से प्राप्त होने वाले दूषणों के द्वारा। कृतघ्नभावेन=किए हुए के उपकार को न मानने की भावना के द्वारा। विडम्ब्यमानः=हँसी उड़ाया गया। विपन्ने=मर जाने पर। जीवामि=जी रहा हूँ। सूतः=सारथि। अन्वय-पित्रा भ्रात्रा च वर्जिताम् अटवीभूताम् अयोध्याम् क्षीणतोयाम् नदीम् इव पिपासार्तः अनुधावामि। (१०) अन्वय—तं शुल्कदोषं स्मृत्वा मम सुतः राजा भवतु इति तया अभि- हितम्। तत् धैर्येण आश्वसन्त्या सुतं वनं व्रज इति आर्यः अपि अभिहितः। तं बद्धचीरं दृष्ट्वा राजा असदृशं निधनं गतः ननु, प्रकृतिभिः शेषाः सदृशाः धिक् प्रलापाः ननु मयि पात्यन्ते। (११)
( १०४ ) अन्वय—पुत्रे मोहम् उपागते देव्यःकाले आगताः खलु, मातृणां हस्त- स्पर्शः हि अजलस्य जलाञ्जलिः । (१२) अन्वय- - यस्य स हर्म्यदुर्लभः समुच्छ्रयः तत् इदं नः प्रतिमानृपस्य गृहम्, अनन्वितैः अप्रतिहारिकागतैः पथिकैः प्रणामं विना उपास्यते । (१३) अन्वय—हि अय कः अपि वयःस्थः पार्थिवः इव पतितः । पर्यङ्ककामं कर्तुम् अलम्, हि अयम् भरतः, गृह्यताम् । (१४) अन्वय--चिरजीवदोषैः अन्वास्यमानः, कृतघ्नभावेन विडम्ब्यमानः अहं. हि तस्मिन् नृपतौ विपन्ने शून्यस्य रथस्य सूतः जीवामि । (१५) हिन्दी अर्थ देवकुलिक—कुमार, धैर्य रखो, धैर्य रखो । भरत—(होश में आकर) पिताजी और बड़े भाई राम से शून्य वन के समान इस अयोध्या में मैं जा रहा हूं । जैसे कोई प्यासा आदमी सूखी नदी की ओर दौड़ता जा रहा हो । (१०) आर्य, विस्तारपूर्वक सुनने से मेरे मन को कुछ सहारा मिल रहा है, अतः समूचे वृत्तान्त को पूरी तरह से कहो । देवकुलिक—सुनिए, जब महाराज दशरथ राजकुमार राम का अभिषेक कर रहे थे उस समय आपकी माता कैकेयी ने कहा । भरत—ठहरो, उस अनर्थकारी विवाह शुल्क को याद कर उसने कहा होगा कि मेरा पुत्र राजा बने । इस प्रार्थना के सफल हो जाने से उसका बल बढ़ा होगा और फिर उसने कहा होगा कि राम वन को जाएँ । राम को वल्कल वस्त्र पहने देख कर महाराज को असामयिक मृत्यु प्राप्त हो गई होगी । इन सब बातों से दुःखी प्रजावर्ग इन सबका मूल मुझे मानकर धिक्कारती होगी और उसका धिक्कारना उचित भी है । (११) (मूर्च्छित हो जाता है) (नेपथ्य में) हट जाइए, हट जाइए ।
( 105 ) देवकुलिक—(देख कर) अरे, पुत्र के संज्ञाहीन होने पर माताएं आ गईं, यह बडा अच्छा हुआ। क्योकि पुत्र के लिए माता का हस्तस्पर्श प्यासे के लिए जलधारा के समान हुआ करता है। (१२) (इसके बाद रानियो व सुमन्त्र का प्रवेश) सुमन्त्र—देविया, आप इधर से आयें। जो ऊँचाई में राजमहलो से भी बड़ा है, ऐसा यह हमारा प्रतिमा रूप से अवस्थित महाराज का सदन है। यहां यात्री लोग स्वतन्त्रतापूर्वक, पहरेदारों की बिना रोक-टोक के आते-जाते है तथा बिना प्रणाम के उपासना करते है (१३) (प्रवेश करके और देखकर) हे देवियों, आप अन्दर मत आइए, मत आइए। यहा कोई कुमार गिर पडा है, ऐसा लगता है मानो राजा दशरथ का युवावस्था का शरीर हो। देवकुलिक—आप किसी दूसरे की आशंका मत कीजिए। ये भरत है। आप इन्हे सम्भालिए। (१४) (निकल जाता है) रानियां—(शीघ्रता से पास जाकर) हा पुत्र, भरत। भरत—(कुछ होश मे आकर) आर्य। सुमन्त्र—जय हो महा—(इस प्रकार आधा कहकर, दुःख पूर्वक) अहा, बोली में कितनी समानता है। लगता है जैसे दशरथ की प्रतिमा ही बोल रही हो। भरत—तो फिर माताओं की अब क्या दशा है? रानियां—हे पुत्र, हमारी दशा यह है। (घूंघट हटाती हैं) सुमन्त्र—देवियो, अपने आवेग को रोके। भरत—(सुमन्त्र को देख कर) सभी प्रकार के व्यवहार में आपकी उपस्थिति से मुझे जान पड़ता है कि आप सुमन्त्र हैं।
( १०६ ) सुमन्त्र—कुमार, और क्या ? मैं सुमन्त्र ही हूं । दीर्घकाल-जीविता ने मुझ मे अनेक बुराइयाँ ला दी। कृतघ्नता ने मेरा उपहास किया, और अब मै राजा दशरथ के मर जाने पर उनके सूने रथ का सारथि होकर जी रहा हूं । (१५) (६) मूल भरतः—हा तात ! (उत्थाय) तात ! अभिवादनक्रममुपदेष्टुमिच्छामि मातृणाम् । सुमन्त्रः—बाढम् । इयं तत्रभवतो रामस्य जननी देवी कौसल्या । भरतः—अम्ब ! अनपराधोऽहमभिवादये । कौसल्या—जात ! निःसन्तापो भव । भरतः—(आत्मगतम्) आकृष्ट इवास्म्यनेन । (प्रकाशम्) अनु- गृहीतोऽस्मि । ततस्तत । सुमन्त्रः—इयं तत्रभवतो लक्ष्मणस्य जननी देवी सुमित्रा । भरतः—अम्ब ! लक्ष्मणेनातिसन्धितोऽहमभिवादये । सुमित्रा—जात ! यशोभागी भव । भरतः—अम्ब ! इद प्रयतिष्ये । अनुगृहीतोऽस्मि । ततस्ततः । सुमन्त्रः—इयं ते जननी । भरतः—(सरोषमुत्थाय) आः पापे ! मम मातुश्च मातुश्च मध्यस्था त्वं न शोभसे । गङ्गायमुनयोर्मध्ये कुनदीव प्रवेशिता ॥ (१६) कैकेयी—जात ! किं मया कृतम् ? भरतः—किं कृतमिति वदसि ? वयमयशसा चीरेणार्यो नृपो गृहमृत्युना , प्रततरुदितैः कृत्स्नायोध्या मृगैः सह लक्ष्मणः । दयिततनयाः शोकेनाम्बाः स्नुषाध्वपरिश्रमे धिगिति वचसा चोग्रेणात्मा त्वया ननु योजिताः ॥ (१७) कौसल्या—जात ! सर्वसमुदाचारमध्यस्थः किं न वन्दसे मातरम् ? भरतः—मातरमिति । अम्ब ! त्वमेव मे माता । अम्ब ! अभिवादये ।
( 107 ) कौसल्या-न हि, न हि । इयं ते जननी । भरतः-आसीत् पुरा । न त्विदानीम् । पश्यतु भवती- त्यक्ता स्नेहं शीलसङ्क्रान्तदोषैः पुत्रास्तावन्नन्वपुत्राः क्रियन्ते । लोकेऽपूर्वम् स्थापयाम्येष धर्मम् भर्तृद्रोहादस्तु माताप्यमाता ॥ (१८) शब्दार्थ-उपदेष्टुम् इच्छामि = जानना चाहता हूं । बाढम् = हां । तत्रभवतः = उन श्रीमान् की । अनपराधः = अपराध नही करने वाला । निःसन्तापः = हृदय की वेदना से रहित । भव = बनो । आकृष्टः = तिरस्कृत । अस्मि = हूं । अतिसन्धित = ठगा गया । यशोभागी = यशस्वी । प्रयतिष्ये= प्रयत्न करूँगा । उत्थाय = उठ कर । पापे ! = पाप करने वाली दुष्टे । मध्यस्था = बीच मे स्थित । शोभसे = सुन्दर लगती हो । कुनदी = बुरी नदी । अयशा = निन्दा के द्वारा । चीरेण = वल्कल वस्त्र के द्वारा । गृहमृत्युना = यमराज के घर के द्वारा । प्रततरुदितैः = लगातार आंसू बहाने के द्वारा । कृत्स्ना = सारी । दयिततनयाः = पुत्रों से प्रेम करने वाली अर्थात् कौसल्या व सुमित्रा (दयिताः प्रियाः तनयाः पुत्राः यासां ताः अम्बाः) स्नुषा = पुत्रवधू सीता । अध्वपरिश्रमैः = मार्ग में चलने के परिश्रम से । धिक् इति वचसा = कैकेयी को धिक्कार है-इस प्रकार के निन्दा पूर्ण वाक्यो से । उग्रेण = प्रचण्ड या मर्म- भेदी । आत्मा = स्वयं । त्वया = तुम कैकेयी के द्वारा । ननु = सचमुच में । योजिताः = संलग्न किया । जात = हे पुत्र । सर्वसमुदाचारमध्यस्थः = सकल सदाचार के पालन में प्रवण । भवती = श्रीमती । शीलसंक्रान्तदोषैः = आचरण में दोष आ जाने के कारण । स्नेहं = ममता को । अपुत्राः क्रियन्ते = अपुत्र के समान आचरण किया जा रहा है । लोके = संसार में । अपूर्वम् = अनोखे । स्थापयामि = प्रवर्तित करता हूं । एषः = यह मैं । धर्मम् = मान्यता को । भर्तृद्रोहात् = पति से विरुद्ध आचरण करने के कारण । अस्तु = होवे । अमाता = बुरी जननी । अन्वय-मम मातुः मातुः च मध्यस्था त्वम् गंगायमुनयोः मध्ये प्रवेशिता कुनदी इव न शोभसे । (१६)
( 108 ) अन्वय—ननु त्वया वयम् अयशसा योजिताः, आर्यः चीरेण (योजितः) नृपः गृहमृत्युना, कृत्स्ना अयोध्या प्रततरुदितैः, लक्ष्मणः मृगैः सह (योजितः), दयिततनयाः अम्बाः शोकेन, स्नुषा अध्वपरिश्रमैः, आत्मा च उग्रेण धिक् इति वचसा (यजिता) । (१७) अन्वय—ननु शीलसंक्रान्तदोषैः तावत् पुत्राः स्नेह त्यक्त्वा अपुत्राः क्रियन्ते । एषः अहम् लोके अपूर्वम् धर्मम् स्थापयामि, भर्तृद्रोहात् माता अपि अमाता अस्तु । (१८) हिन्दी अर्थ भरत—हा तात, (उठकर) तात, अब मैं माताओं को प्रणाम करने का क्रम जानना चाहता हूँ । सुमन्त्र—अच्छा, यह श्री राम की माता देवी कौसल्या हैं। भरत—माँ, यह निरपराध भरत आपको प्रणाम करता है। कौसल्या—पुत्र, तुम्हारा दुःख दूर होवे । भरत—(मन मे) इस कथन से तो मानो मेरी भर्त्सना की जा रही है। (प्रकट- रूप से) बड़ी कृपा है । अच्छा, फिर । सुमन्त्र—यह लक्ष्मण की मां सुमित्रा देवी हैं। भरत—माँ, मैं प्रणाम करता हूँ, जिसे राम की सेवा का अवसर न देकर लक्ष्मण ने ठग लिया है। सुमित्रा—पुत्र, कीर्ति प्राप्त करने वाले बनो । भरत—माँ, इसका प्रयास करूँगा । कृतकृत्य हूँ । इसके बाद । सुमन्त्र—यह तुम्हारी माता है । त—(क्रोध सहित उठकर) अरी पापिनी, मेरी जननी कौसल्या और जननी सुमित्रा के बीच बैठी हुई तुम उसी तरह बुरी लगती हो, जैसे गंगा और यमुना के बीच में प्रविष्ट कोई कुनदी । (१६) कैकयी—पुत्र, मैंने क्या किया ? भरत—'क्या किया' यह कहती हो । तुमने हमे (मुझे) अपयश से कलंकित किया, पूज्य राम को वल्कल
धारण करने वाला बना दिया । महाराज को गृहकलह से मरने को विवश किया। सारी अयोध्या को निरन्तर रुला दिया । लक्ष्मण को हरिणों का सहवासी बना दिया । पुत्रों से स्नेह करने वाली माताओं को शोक सागर में डुबो दिया । पुत्रवधू सीता को वन मे भटकने को बाध्य किया और अपने को भी कठोर धिक्कार का पात्र बनाया । (१७) कौसला—पुत्र, सब प्रकार के शिष्टाचार को जानते हुए भी तुम अपनी जननी को प्रणाम क्यों नही करते हो ? भरत—क्या अपनी जननी को ? माँ, आप ही मेरी जननी है । माँ, मै प्रणाम करता हूँ । कौसल्या—नही, नही, यह कैकयी तुम्हारी जननी है । भरत—पहले थी । किन्तु अब नही है । आप देवी देखिए, इसने दुष्ट परिजनो के सहवास मे सत्य स्नेह को छोड़ कर बेटों से नाता तोड लिया है । आज मै संसार मे एक नये धर्म की स्थापना करने जा रहा हूँ कि जो स्त्री अपने स्वामी से विद्रोह करे, वह माँ कहलाने की अधिकारिणी नहीं है । (१८) (७) मूल कैकेयी—जात ! महाराजस्य सत्यवचनं रक्षन्त्या मया तथोक्तम् । भरतः—किमिति किमिति । कैकेयी—पुत्रको मे राजा भवत्विति । भरतः—अथ स इदानीमार्योऽपि भवत्याः कः ? पितुर्मे नौरसः पुत्रो न क्रमेणाभिषिच्यते । दयिता भ्रातरो न स्युः प्रकृतीनां न रोचते ॥ (१९) कैकेयी—जात ! शुल्कलुब्धा ननु प्रष्टव्या । भरतः—वल्कलैर्हृतराजश्रीः पदातिः सह भार्यया । वनवासं त्वयाऽऽज्ञप्तः शुल्केऽप्येतदुदाहृतम् ॥ (२०) कैकेयी—जात ! देशकाले निवेदयामि । भरतः—अयशसि यदि लोभः कीर्तयित्वा किमस्मान्