पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
३५६ पृथ्वीराजरासो। [ सातवां समय २८ दूहा ॥ उत मंडोवर वीर कौं, इत संभरि वै राव ॥ दुअ लग्गा अस रार जुध, सुकवि चंद करि कावं ॥ छं० ॥ १३८ ॥ रू० ॥ ८१ ॥ छंद भुजंगी ॥ सलुथ्यं सलुथ्यं अलुथ्यं तिलुथ्यं । इयानं उषानं समानं पलत्थं ॥ हयगं रथंगं धरं धार तुहैं । धरं धार धीरं मघा वीर लुहै ॥ छं० ॥ १३६ ॥ छबकै रुधिंगा प्रवाहं सिरज्जं । धरं घाम चापं रनं केन रज्जं । भनकंतं भेरी चिक्कारैं सुछथ्यी । नचैं रंग भैरूं ततय्ये ततय्यी ॥ छं० ॥ १४० ॥ प्रचारं सुदंती सुअंती अलुभकं । अलुझैं सुदंती उड़ैं किंक झुलकं ॥ मनं झारते जान हेभं हयनं । परज्वाल तुहैं तनंजा विननं ॥ छं ॥ १४१ ॥ रू० ॥ ८२ ॥ लोहाना आजानु बाहु के युद्ध का वर्णन ॥ कवित्त ॥ लोहानौ आजानं । बांह लंबी पसारै ॥ लंबी बांच पसारि । तेग खंबी उब्भारै ॥ उब्भारै विब्भार । बीर बाधै बद्धाली ॥ अद्धाली अर बद्धि । कंध सोहैं सुद्धाली ॥ सुद्धाल कंध विव षंड धुअ । विधि ओपम कवि चंद कहि ॥ आउत्त घत्त आजान भुअ । मनु कजल कोटक विज लहि ॥ छं० ॥ १४२ ॥ रू० ॥ ८३ ॥ ८१ पाठान्तर-कौं । दोउन के असराल युद्ध । सो चंद करीय सु काब ॥ ८२ पाठान्तर--अलुथं सलुथं । सलुथं सलोथं । अलुथं तिलुथं । उयानं । पलथं । हयं गंरथं । तुहैं । लुहैं ॥ १३६ ॥ पलकैं । रुधिजा । प्रबाहं । कंन । भनकंत । चिकारे । सुहथी । नचै । भैरौं । ततथे । ततथी ॥ १४० ॥ अलुभं । अरुझैं सुदंती । अलुझंत । उड्डे । झुकं । हयनं । गयनं । परै । तुटें ॥ १४ ॥ ८३ पाठान्तर-आजान । वाह । पसारे । उभारै । उभारै । विभार । बढाली । वढाली । अरिकट्टि । सोहैहैं । सुढाली । सुढालि । पंघ किक्कि षंड हुअ । उपम । आवत । छत आजानु । मनौं । मनौ ॥
कवित्त ॥ लोहांनै अरि फौज । चक्क चिहुँकोद फिरांइय ॥ ज्यौं तूल मध्य वातुल । पवन जिम पत्त भ्रमाप्य ॥ मारुत वलि आरिष्ट । बापू चिहुँ कोद भुलावय ॥ कै वाय पुरातन धज्ज । बिबिधि विध तुंग दखायय ॥ कै कुद्धान्त चित चक्कित भौ । चक्र चिहूं दिसि फेरइय ॥ मृगराज मृगनि ज्यौं क्रोध बल । दल सम्मृह अरि घेरइय ॥ छं० ॥ १४३ ॥ रु० ॥ ८४ ॥ कवित्त ॥ तहां बिख्फि पिथ कुँअर । लोह भारै गज मध्यं ॥ भय भसुंड विपंड । अंम सोभंत सुतथ्थं ॥ कै * जलधि तह छवि सोम । धोम धारा घृत सिंचिय ॥ कै * तडित तेज नव घंन प्रमान * । भान चलि बहल संचिय ॥ कज्जल प्रमान प्रब्बत ढल्यौ । रत्त धार बुट्ठंत जलु ॥ कंचन प्रनार दै सुर अवकि । इह ओपम दीसंत षलु ॥ छं० ॥ १४४ ॥ रु० ॥ ८५ ॥ दूहा ॥ जावक ओन प्रनार जल । इंगुर फटिक वछात ॥ जीवत रद कढि रुचिर तिन । दंतू सर दररात ॥ छं० ॥ १४५ ॥ रु० ॥ ८६ ॥ कवित्त ॥ लोहांनी आजान बाहु* । जित आरनि जस लिन्नौ ॥ ज्यौ इक लेई कन्द । दंग दावा नल पिन्नौ ॥ ज्या इकले हनुवंत । बंक लंका गढ ढाथ्यौ ॥ ज्यौं इकलेई भीम । सित्त कौरव तन गायौ ॥ ८४ पाठान्तर-लोहांनौ । चिहु । काँद । ज्यौं । तुल । मधि । भ्रमाइय । बलि । चिहु । ध्वज । विधितुंग । भयौ । चिहुं । फेरर्दय । ज्यौँ । घेरिईय ॥ ८५ पाठान्तर-पिन्नि । कुंआर । मथं । भईय । तथं । कें । तरह । चिंचिय ! चिंचीय । * यह सब अधिक पाठ हैं । भांम । बहूलह । फजल । प्रमांन । प्रबत । ८६ पाठान्तर-प्रनाल ॥
३५८ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३० ज्यौं पुनि अगस्ति अप डुक्कलि । खोषि सब्ब सायर खयौ ॥ दांनव क्ति चंपि अंगद वलिय । नंपि उदधि परसैं गयौ ॥ छंदं० ॥ १४६ ॥ रु० ॥ ८७ ॥ कवित्त ॥ वल बंध्यौ नाहर नारिंद * । इंद्र जनु वज्र छह्य ऋषि ॥ सुकति सुफल बड्डीय । बोर ब्रह्मांड तार पुत्ति ॥ नर नाहर ज्यौं लस्यौ । लज्ज पंकल्ल आनुभयौ ॥ सार धार निह्तार । पार सुक्कियग जग सुस्रथौ ॥ कुलछंत केल्लि परिचाररिन । चिसल तेज लग्गिय चिसुक ॥ भग्गौ न भूमि रजपूत हैं। करौं नाम जिम अटल धुव ॥ छंदं० ॥ १४७ ॥ रु० ॥ ८८ ॥ कवित्त ॥ सुनिय मंच सेवकक प्रमांन * । रघट घही फेरहि एम ॥ पेट भरन * चह्यंत । पुठ्ठि दै भार चलचि कम ॥ ते नह गनियै सूर । अंत किचिन कौ नांची ॥ स्वांमि संकरैं छंडि । लो अन्नप्पन घर जांची ॥ गनियै न सूर अरि जूझ बल । अप्प सेन इषि घट्ठियै ॥ जै अजै भाग भूपति कमह । अप्पु दोस अप मिट्टियै ॥ छंदं० ॥ १४८ ॥ रु० ॥ ८६ ॥ कवित्त ॥ वाय रूप प्रथिराज । गज्जि गयो असि झुक्कं ॥ सार धार उक्तार । गुरज भंज्यौ सिरभूक्कं ॥ रच्यौ आन रथ पंहि । पवन रच्यौ गति कुंडि थिर ॥ रहे देव टग चाहि । नथै वैताल बीर भर ॥ ८७ पाठान्तर-* अधिक पाठ है । जिति । लौनौ । ज्यौं । दुकलेइ । इक्कलेंद । ज्यौं । इक्कलेंद । हनवंत । हनुमंत । ज्यौं । इकले । सत्त इकले । सब । दांनव । परसों ॥ ८८ पाठान्तर-नाहर । * अधिक पाठ है। हथि । हथ । सुगति । ब्रह्मंड । ज्यौं । जल पंकल्ल । निभार । मुक्किग है। । करौ। नांम ॥ ८६ पाठान्तर-सेवक । * अधिक पाठ हैं। घटी। घटिका पुठि । चलि । कौं। स्वामी । जांहीं । रखि । भुञ्चाति ॥
सातवां समय २१ ] पृथ्वीराजरासो । ३५६ लंपे जु राज कित्ती प्रवछ । लोह मरन हुल्लंत दिन ॥ पछ पंद राज पच्छै चढी । नाहरराउ नरिंद रन ॥ छं० ॥ १४८ ॥ दृ० ॥ ८० ॥ कवित्त ॥ नाहर राउ नरिंद । चित्त चिंता उत्तारिय ॥ मन वध्यौ घन घय्यौ । मरम केवल विचारिय ॥ सुनहूं तौ * कहूं कवित्त । सुथिर जीवन जग नांची ॥ एह संसार असार । सार कित्ती कलु मांची ॥ ज्यौं उरगए सुप उंदर परै । यौं सुदेस नाहर कधै ॥ सपनव्य बात भिक्षै नहीं । नाम एक जुग जुग रचै ॥ छं० ॥ १५० ॥ ६० ॥ ८१ ॥ दूहा ॥ दूप कपि रचि रन मंड रूपि । ज्यौं कपि रक्खस सेन ॥ कोपि कान्ह धायौ बली । ज्यौं अगि विकुठिय गेन ॥ छं० ॥ १५१ ॥ ६० ८२ ॥ कान्ह चौहान के युद्ध का वर्णन ॥ विराज ॥ धप्प्यौ कान्ह घही। फुटी अंधिपही ॥ खरी सेन फही। मनौं दूध षही ॥ छं० ॥ १५२ षगंगे उछही । मनौं कठ कही । परे भूमि लही । मनौं मद जही ॥ छं० ॥ १५३ ॥ बद्दै पग्ग घही । मनौं चक्क मही । तरफैं कि नही । मनौं लागि नही ॥ छं० ॥ १५४ खरै यों सुभही । मनौं लौन नही । सुरैं मारि रूही । मनौं लत्त तही ॥ छं० ॥ १५५ ॥ पसू पंष ठही । पषं ओन चही । कषीचंद भही । मुषं कित्ति रही ॥ छं० ॥ १५६ ॥ रु० ॥ ८३ ॥ ८० पाठान्तर-प्रथीराज । गजि । उद्भार । भांन। गषन । मंडै । यु । रासि । कित्ति । सोई । पक्कै । नाहरराव ॥ ८१ पाठान्तर-नाहरराय । चिंत चिंता । उतारीय । केवलह । विचारीय । सुनहु । सुन हूं । * अधिक पाठ है । नांहीं । ज्यां । उरगह सुमुप । यों । सुमिट्टै । ८२ पाठान्तर-हनं । ज्यां । रंपस । कन्ह । ज्यो । विकुट्ठिय ॥ ८३ पाठान्तर-* सं० १६४७ की प्रति में शुद्ध नाम विराज है और इतर में छंद रसावला है ॥ १५२ ॥ मनं । कठ । परैं । मनौं । मनौ । मद ॥ १५३ ॥ बहै । मनं । तरफै । लाग ॥ १५४ ॥ लरैं । यों । मनं । लांन । मनं । लत ॥ १५५ ॥ पसूं । घट्टी । कवि ॥ १५६ ॥ १४
३६० पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३२ कवित्त ॥ नाहर नाहर राव । कन्हर नाहर सुकन्ह कर ॥ दिठ्ठ दिठ्ठ अंकुरिय । अरिय विस जांनु बिखद्दर ॥ उमसि कन्ह असिरीस । सीस चुकि परिय बांम भुज ॥ पुनि उक्कुटि परिच्छार । सार सिर कन्ह टोप धुज ॥ लग्गे सुटोप उड्डिय किरच । बढ़त धार उन संग बचि ॥ जैजया सद् जुग्गिन करचि । दुअन जुद्ध अदभूत सचि ॥ छं० ॥ १५७ ॥ छ० ॥ ८४ ॥ डारि कंन्द तरवारि । कट्ठि जम दढ़ मिल्यै चिय ॥ सचि जुद्ध दूत बीच । धप्प भतीज दिषि निय ॥ गचि सुसिष्ष पुठि आइ । घाइ जम दढ़ कियै तिय ॥ छंडि प्रान परिच्छार । परे पाल्हन ऊपर जिय ॥ गचि रोस नंपि नर भूमि पर । अनि अनियारिय उभय कसि ॥ तिन अनत घाय घुंमत झुमत । गयौ निठ्ठि नाहर निकास ॥ छं० ॥ १५८ ॥ रु० ॥ ८५ ॥ बर नाहर जिम लखै । गयौ नाहर जिम नाहर ॥ घाव घट घन घुंसि । झुंसि निक्कसिय बल नाहर ॥ कन्ह कंक किय नन्द । बंक भर भूमि पछारिय ॥ जनु कि लँगूरह लंक । तोरि बारा धर डारिय ॥ सादान बज्जि रन रज्जि सच । तत्त सु सस्थरकत करिय ॥ सोमेस सूर चहुआन सुअ । कित्ति चंद कंदच धरिय ॥ छं० ॥ १५९ ॥ रु० ॥ ८६ ॥ ८४ पाठान्तर-कंन्द। दिठ दिठ। जांनि । परीय। बांम । फुनि । उक्कंटि । उकुटि । कन्द । उडिय । सबद । जुगिन ॥ ८५ पाठान्तर- कन्ह । जमदठ । मचि । जुध । वीचि । धपि । भतीज । दिषिनीय । सिषि । पुष्ठि । जमदठ । प्रांन । पल्हन । उपर । अनिथारीय । निठि ॥ ८६ पाठान्तर-घट । धूमि । भूमि । नन्ह । भूमि । लंगूरह । डारीय । सादांन । ब्रजि । रजि । सथ । करीय । चहुवांन । चहुवांन । सुय । कंदहि ॥
सातवां समय ३३ ] पृथ्वीराजरासो । ३६१ दल घट्क्यौ सब सथ्य । जुद्ध धायौ तत्तंरिय ॥ चाहुआन कौ साथ । तेग तुंगह विडारिय ॥ उंच गात अरु हत्थ । वीर कही पट भारिय ॥ एइ ओपम कविचंद । चिंति मन मझ्झ विचारिय ॥ पल्लव सुवीर केतुक नवन । षरबंसंत वायद्द चल्लै ॥ तम तेज रुधिर भींज्यौ बहुल । कज्जह कित्ति जावक घुलै ॥ कूं० ॥ १६० ॥ छं० ॥ ९७ ॥ दूहा ॥ नाहर नाहर जिम निकसि । भिरि नाहर के भेष ॥ कहर कन्ह धपि कुप्पि पुठि । वली मीर चष लेष ॥ कूं० ॥ १६१ ॥ दू० ॥ ९८ ॥ कुंडलिया ॥ फिरि जुझार किय स्वामि कौं । मुक्तियं काम धमारि ॥ बली मीर गढ्ढौ लयौ । मरन सरन विचारि ॥ मरन सरन विचारि । मिलन अंतहपुर किन्नौ ॥ बँधि चिय सांइ सुभित्त । करि सांई सौं दिन्नौ ॥ सार धार तन षंड । षंडि मायौ रिपु जुर जुरि ॥ तिल तिल तन तुट्ट्यौ । रंभ ढुंढ्ढौ चित फिरि फिरि ॥ कूं० ॥ १६२ ॥ कुं० ॥ ९९ ॥ दूहा ॥ सिर तुट्टै परि भूमि पर । यौं राजै कविचंद ॥ कमल जानि नचंत सर । सरद चंद पर कंध ॥ कूं० ॥ १६३ ॥ दू० ॥ १०० ॥ कुंडलिया ॥ कमल जानि नच्यौ जु सर । दिसि सोभै संग्राम ॥ मानहु जलद कमोद तजि । थल आए ए ताम ॥ ९७ पाठान्तर-सथ । तत्तारीय । चाहुवान । विडारीय । हाथ । कट्टी । भारीय । उपम । मन सों । विचारीय । विच्यारिय । बायह । भंज्यौ ॥ ९८ पाठान्तर-नाहर कै । लेषि ॥ ९९ पाठान्तर-स्वामि कों । मुक्तिय । काम । गल्लौ । शरन । विचारि । अन्तरपुर । बंधि । चीय । सांई । सुभित । सुभृत । तिल तिल्ल । ढंढ्यौ ॥ १०० पाठान्तर-तुट्टै । यों । राजि । राजै । जानि । नाचंत । शरद कंच ॥
३६२ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३४ थल जए ए ताम । चंद ओपम तहां पाई ॥ मांनहु वीर समुद्र । दयौ फत्त ध्य्य बधाई ॥ धार धार चढि सूर । सूर कीर्त्ति विमलं ॥ धंनि धंनि उच्चार । सीस नच्चौ सुकमलं ॥ छं० ॥ १६४ ॥ रू० ॥ १०१ ॥ नाहरराय का भागना और पृथ्वीराज का पीछा करना ॥ कवित्त ॥ भग्गा नाहर राई । पाई मुक्कै नाहर जिम ॥ जिम जिम भर कह्रई । रोस लग्गा वर तिम तिम ॥ बेत सोधि चहुआनं । पर्यो तूंवर पाछारी ॥ बर* परस्यौ तहां गोइंद । पर्यौ भट्टी अधिकारी ॥ षांची प्रसंग बंधव उसै । मोह सुबंधा बंध वर ॥ तिम तिम सु तेग तारून षसै । तिस तिम बुट्ठे सार नर ॥ छं० ॥ १६५ ॥ रू० ॥ १०२ ॥ चिविध सहस्र नाहर * बसंत । पच कायर तन झारिय ॥ वीर रूप तप भान । नीर सूखै षत्त भारिय ॥ तत्तरि तुंअर नरिंद । भयौ तरु गहर पत्त कूँछ ॥ छांच स्वांमि संमूह । जूझ टारिय सुअंग तच्छँ ॥ फल फूल कित्ति पंषी वरन । विमुख न भौ संमुह लख्यौ ॥ गंधर्व वीर चालुक वरन । मरन वीर अच्छरि बरयौ ॥ छं० ॥ १६६ ॥ रू० १०३ ॥ १०१ पाठान्तर-जांनि । जानैं । नच्चैौ । सुर । मानहु । थल ए उए तांम । उपम । पाइय । मानहु । हथ । बधाइय । किए ति । किए सु । धनि २ । उच्चार । नंच्यौ ॥ १०२ पाठान्तर-नाहरराय । पाय । मुक्या । कह्रई । रोस । चहुवान । चाहुआनं । तूंवर । तूंअर । पहारी । परहारी । * अधिक पाठ है । तथा उलट पुलट पाठ ऐसा है-बर गोइंद तहां पस्यौ । बध्या बंधवर । तेज ॥ १०३ पाठान्तर-सस्त्र । * अधिक पाठ है । झारीय । भांन । सुक्कै । झारीय । तत्तारी । तूंअर । तोअर । पंत्त सह । पत्त कूंह । छाह । स्वांमि । टारीय । तहां । भौं। गंधर्व्व वीर चारन वरन । अक्करि ॥
सातवां समय ३५ ] पृथ्वीराजरासौ । ३६३ गुज्जर वै परधान । जैन धुम्मी मत लड्ढी ॥ एकादस चहुआन । धर धारह आलुड्डी ॥ सहस एक असवर । धार वै गै घर मंड्यौ ॥ नाहर राइ नरिंद । कोट पहन वै चढ़क्यौ ॥ ढुंढयौ षेत चहुआन बर । अरु भारथ आहुह्यौ ॥ चामर सु कवच धरि षेत में । सुधा विविध विधि लुह्यौ ॥ छं० ॥ १६७ ॥ रु० ॥ १०४ ॥ डोला पंच पचीस । स्वामी संजुत्त चढाइय ॥ घाइ कन्ह घट घुम्मि । घाइ एकादस राइय ॥ चंपि बीर चालुक्क । राज मेलान तुच्छ करि ॥ गल गज्जै सामंत । बरै बरनी नाहर बरि ॥ रविवार बीर पंचमि दिवस । एकादस रविभुअन ग्रह ॥ अष्टम सु चक्र जोगिनि ग्रहण । बर बज्जेति नरिंद तह ॥ छं० ॥ १६८ ॥ रु० ॥ १०५ ॥ पट्टन में पृथ्वीराज का राज्याभिषेक होना ॥ देव दसमि कै दीह । नयर पहन चहुआनं ॥ गुर पंचम रवि नवम । सुवर ग्यारह ससि धानं ॥ तीय थान बर भौम । सुक्र सप्तम बल किन्ना ॥ केंद्री बर बुद्ध । राह सब कौंद अहिन्ना ॥ आनंद चंदं बरदाइ घन । राजभिषेकन पहि करि ॥ साजंत भूमि जीते सुपत्ति । तेज तुंग दुज्जन सुहरि ॥ छं० ॥ १६९ ॥ रु० ॥ १०६ ॥ १०४ पाठान्तर—गुज्जर । परघांन । धुंम्मो । धुमी । चहुवांन । आलुही । नाहरराय । चढ्यौ । चहुवांन । आहुट्यौ । लुट्यौ ॥ १०५ पाठान्तर—डोंला । स्वांमी । स्वांमि । घाय । घूंमि । घुंम्मि । धाय । ईकादस । मेलांन । तुछ । बरैं । बरौ । बजेति ॥ १०६ पाठान्तर—चहुवांनं । चहुआनं । यांन । कीनो । केंद्री । सबकोद अहिना । बरदय धनं । पट । दुजन ॥
३६४ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३६ दूहा ॥ तिरिय वक्र अधचक्र नन । ऊरध वक्र प्रमान ॥ पून नखिच चहुआन वै । पट अभिषेक समान ॥ छंद ॥ १७० ॥ छ० ॥ १०७ ॥ कवित्त ॥ पून नखिच कविचंद । कौन वान् उपावै ॥ पटभिषेक राजान । बहुत आगम प्रभावै ॥ ग्रच प्रसाद * तोरन उतंग । कूच जंचह सक ठावै ॥ ध्वजा बंधि पत्ताक । संष चामर मंडावै ॥ उद्यत्त परब पनि अर्चन । बहु विवेक घंमच सुधरि ॥ नन कूप तडागन वापियन । धन सुकियन सुकियन बरि ॥ छंद० ॥ १७१ ॥ छ० ॥ १०८ ॥ नाहरराय का हारकर अपनी कन्या के विवाह का लग्न लिखवाकर भेजना ॥ छंद पहरि ॥ सब सथ्थ तथ्य हुअ एक ठांम । मुक्कांम कीन गिरिनार गांम ॥ सब लोक महाजन मिले आइ । चिंत्यौ सुचित्त नाहर सुभाइ ॥छं॥१७२॥ जिणि मेल होइ सो करि उपाइ । दिप्पियै दीप ल्हो नहीं खाइ ॥ पहुमी सुकाज अर तजत प्रान। पहुमीस काज धन देत दान ॥ छंद॥ १७३ ॥ पहुमीय काज जग बाजि देत । उपाइ नेक पहुमी सुलेत ॥ पुत्री सुएक तिन तन कुआरि । दीसंत देह जनु मदनधारि ॥ छंद ॥ १७४ ॥ बुल्लाइ विप्र लिखि लगन तथ्य । पठाइ दीन नृप पिथ्थ जय्थ ॥ आनंद राज सब सेन अंग । फुल्ले कि कमल जनु दिषि पतंग ॥ छंद० ॥ १७५ ॥ छ० ॥ १०९ ॥ १०७ पाठान्तर=तिरीय । प्रमाणं । चहुआन कौं । पटभिषेक । समांन ॥ १०८ पाठान्तर-कौन । उपावै । पाट विभेक रजांन । पाटभिषेक राजांन । आरांम ।
- अधिक पाठ है ॥ उतंग । पताक । उदयं । उद्यंत । पांनिं । पांनि । घुंम्मह । तटांकने । धन मुकियन मुकियन वरि । मुकियन चुकियन वर ॥ १०९ पाठान्तर-सब्ब । सर्थ । तथ । हूष । ठांम । मुकाम । गिरनारि । गांम । सब्ब । मिलियं । आय । चिंत्यौ । सुभाय ॥ १७२ ॥ जिंहिं । होय । उपाय । दिषियै । नही । लाय । पुहमी । प्रांन । दांन ॥ १७३ ॥ उपाय । कुवार । धार ॥ १७४ ॥ बुलाय । तच्छ । पठाइ । पिथ । जय । फूले ॥ १७५ ॥
सतवां समय ३७ ] पृथ्वीराजरासो । ३६५ पृथ्वीराज का ब्याहने को जाना ॥ कवित्त ॥ नट्ठा नाहरराइ । सेन ढूंक्यौ चहुआनं ॥ राज जीति गज लब्धि । सीस लग्गा असमानं ॥ सुम मल्लह परिछार । मत्त कीनौ अमिस जुध ॥ बरन बीर संमुहौ । राज लग्गे सुमंत सुध ॥ पंचमी बार रवि रात दिन । मंज नाम बर जोग गुर ॥ गिरि नाम करन राजन बर । चह्यौ बीर बारंस डर ॥ छं० ॥ १७६ ॥ ११० ॥ पृथ्वीराज का तोरन की बंदना करना ॥ कवित्त ॥ बंदिं राज तोरन्न सुचंग * । मुति नख्यै अच्छित अलि ॥ मनां * चंद किरनि छूटंत । भान नखै मयूष छबि ॥ ठाम ठाम घिय गान । जानि अच्छरि कैलासच्च ॥ सुभ सिंगार सोभंत । भूमि रचि अलि रस बासच्च ॥ तोरन सुचरु आचार करि । कै जनवासत मंडपहि ॥ दिष्षंत नयन भुल्लहि चरित । काः कवि ब्रन्दहि आव कहि ॥ छं० ॥ १७७ ॥ रु० ॥ १११ ॥ पृथ्वीराज का नाहरराय की कन्या से विवाह होना ॥ दूहा ॥ करि आचार सब पंडित । पानि ग्रहन फुनि व्याह ॥ सोम बास ससुनाइकै । धनि नाहर कत्याह ॥ छं० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ११२ ॥ ११० पाठान्तर-नठा । नाहरराय । ढूंक्यौ । चहुआनं । लभि । मल्लह । मत्तह । मत । अमित । जुधु । लगा । राति । नाम । गिर । नांम । बरन । चढौ । बीरंसु ॥ १११ पाठान्तर-तोरन । * अधिक पाठ रै । मुति । नयें । छुट्ठत । नंपै । ठांम ठांम । जीय । गांन । गांम ॥ ११२ पाठान्तर-पंडितन । पांनि । फुनि । सोबास्रब सुनायकैं । सोबास ससुनाइकै । धंनि । कत्याह ॥
३६६ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३८ नाहरराय का कहना कि आपके काम में सीस देने के सिवाय और कुछ देने के योग्य हम नहीं हैं ॥ दूहा ॥ नाहर बोलू नरिंद कहि । का तुम जोग जगीस । और देन हम है कहा । काम सीस हम ईस ॥ छंद० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ११३ ॥ नाहरराय की कन्या का गुण और रूप वर्णन ॥ साटक ॥ तन्जे स्याम सुरंग वाम तनयं, मन्मध्य वल्ली कळा । सुषं धामय तेज दीपक कळा, तारुन्य लच्छी ग्रहा ॥ रूपं रंजित मंजु माल कळया, वासंत पंचावली । श्रवं लक्कन काम धीरज गुणै, धन्यौ दुती दंपती ॥ छंद० ॥ १८० ॥ रु० ११४ ॥ पृथ्वीराज का जीतकर स्त्री के साथ लौटना ॥ कवित्त ॥ संभारि बैरन जीत । पीर चालुक्क काम बच ॥ उभै जोध खो जितै । जोरू कर बत्त कालि कल । बीर निसानति सग्ग । बगिग आनन्द निसानं ॥ प्रान चेत बर बीर । चक्र्यौ संभरि दिसि थानं ॥ अर विब्भर खग्ग मग गय गएय । रचिय तिम्मगत जुद्ध इक्छ ॥ काकंक कोटि भंजै विषछ । सुबर बीर बीरछ जु पुछ ॥ छंद० ॥ १८१ ॥ रु० ॥ ११५ ॥ अरिल्ल ॥ लै तरुनी डोला चढि राजं । डोला लंगरिरारु बिराजं ॥ धन रंगा तोर त्तिय धन्यं । जिन रख्यौ जीवत नृप मन्यं ॥ छंद० ॥ १८२ ॥ रु० ॥ ११६ ॥ ११३ पाठान्तर—नाहरराव । नाहरराय । कहा । देन । और । दैन । है । कांम ॥ ११४ पाठान्तर-तन्मं । स्यामं । वांम । मनमथ । वाली । सुषं । लछी । गृहा । पचावली । श्रवं । लक्षन । कांम । गुनै ॥ ११५ पाठान्तर-रिन । जोत । करवत । कालिकल । निसानं । बगिग । निसानं । थानं । विप्भर । अगमगह गइय । तिम । भंजे । एच्छ ॥ ११६ पाठान्तर-लंगरीराय । धनि लंगा तोर तीय धन्यं । जीवित । मंन्यं ॥
सातवां समय ३६ ] पृथ्वीराजरासो । ३६७ संग वरनि डोला चढ़ि गजं । सनौं रत्ति दुति काम समाजं ॥ को अलि डोलनि सथ्य सुसाजं । चढ़ि सब सथ्य बजावत बाजं ॥ छं० ॥ १८३ ॥ रु० ॥ ११७ ॥ पृथ्वीराज का ग्यारह डोलों सहित होना ॥ गाहा ॥ करी जर्जन सरीरं । भीरं भंजि स्वामि का खेवं ॥ ग्यारह डोल सुसथ्यं । कथं पत्तेव संभरि गेहं ॥ छं० ॥ १८४ ॥ रु० ॥ ११८ ॥ पृथ्वीराज का विवाह कर घर पहुँचना ॥ दूहा । ग्रह पत्तै जित्तौ सथन । परनि सुचंगी बाज ॥ जंभा वीनं न्निम्मयौ । कुँअरप्पन सुचि लाज ॥ छं० ॥ १८५ ॥ रु० ॥ ११९ ॥ पृथ्वीराज की प्रशंसा ॥ कवित्त ॥ वंस अनन्त चहुआन । भयौ न पिथ समकोई ॥ जिन षंडे छत्र षग्ग । दीन वंदै सब खोई ॥ जिन नाहर राइ नरिंद । पंडव सच पञ्जारिय ॥ जिन वंभनवा सो सिंघ । वान ढल्यो गंजाड्य ॥ अरि घरन घरनि घर चैन नहि । सयन निसंकन संचरहि ॥ वन गहन बहन विह्वल फिरहि । बंदर ज्यौं कंदर वसहि ॥ छं० ॥ १८६ ॥ रु० ॥ १२० ॥ इति श्री कविचंद विरचिते पृथिराजरासके नाहरराइ कथा वर्णनं नाम सप्तमो प्रस्तावः ॥ ७ ॥ ॥ इति ॥ ११७ पाठान्तर- बरनि । मनो । रति । डोलन । सथ ॥ ११८ पाठान्तर-करि । भंजि । सुसथं । संभरी ॥ ११९ पाठान्तर-गृह । विमयो ॥ १२० पाठान्तर-चहुवांन । भय । पियह । नाहरराय । नाहरराव । पंजायीय । सैं । बांन । ठट्ठौ । ठढौ । चैन नह । ज्यो ॥
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अथ सेवाती मुंगल कथा लिख्यते ॥ ❖ ( आठवां खण्ड । ) —:-o-:-— सोमेश्वर के मंडोवर जीतने और लूट को सरदारों में बांट कर प्रबल प्रताप के साथ राज्य करने का वर्णन ॥ कवित्त ॥ सुभसि देस सोमेस । पेस मैवास महीपन ॥ सुभट यह संघट्ट । दिठ्ठि कुँवरं किय जीपन ॥ मंडोवर परिहार । मारि उज्जारि जेर किय ॥ सामतंन सस रंग । लच्छि लब्भी सुवंटि दिय ॥ दिन दसा देस दरबार दुति । दान जग्ग रत्ता रचै ॥ पहु प्रबल पारि पच्छारि करि । अदट दह जगवनि गरै ॥ छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥ सोमेश्वर के गुणों और उसकी गुणग्राहकता का वर्णन ॥ कवित्त ॥ अरिद्द दंड बल संड । गर्भ गर्भन डर कंडहि ॥ सगपन एक पग चास । पञ्चक सेवा सिर मंडहि ॥ दुजनि देव गुरु गाहू । पाइ पुज्जियहि निरंतर ॥ पंडित गुनी गुनग्य । द्रव्य चै वञ्चहि दिसंतर ॥ दरबार भीर सुभटन घटन । कला कवित्त नाटिक्क नटहि ॥ छत्तीस राग रागनि रसनि । तंत ताल कंठन ठटहि ॥ छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥ ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ १ पाठान्तर-सुभट्ट । दिट्ठ । कुअ्रं । कुंवरं । जिप्पन । उजारि । लछि । लभि । लभी । लीय । दांन । पछारी । हन ॥ २ पाठान्तर-कंडह । दुजन । गाई । गाय । पाय । पुजहि । पुजियहि । रागन । रसन । तंत ताठ ॥
३७० | पृथ्वीराजरासो । | [ आठवां समय २ सोमेस्वर का मेवात के राजा मुग्गल (मुङ्गलराय) के पास कर लेने के लिये दूत भेजना ॥ कवित्त ॥ एक सुदिन सोमेस । दूत हज्जूर बुलाइय ॥ मैवाति सुगल नरिंद । पत्त पठ्ठइ लिपिदिय ॥ भूमि आस जौ करहि । भरहि तौ दंड सेव करि ॥ नतर समर डर डरपि । समुद उत्तरहि पारं तरि ॥ फिर धारि हुकुम चर चलिय तहँ । जहां मुग्गल संडल मची ॥ सोमेस सूर प्रथिराज कल । तिम संमुच चर वर कछी ॥ छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥ राजा मुङ्गल का यह पत्र पाकर क्रोध प्रगट करके दूत को लौटा देना और सोमेस्वर का पत्रोत्तर पाकर क्रोध करना और उस पर चढ़ाई करने की आज्ञा देना ॥ छंद पद्धरी ॥ पढ़ि पत्त पिच्छ मुग्गल नरिंद । प्रज्जरिंग रोस मैवात इंद ॥ बहु दिवस सोमंनृप हुअ सुषंग । किम उज्झवत्त कट्टी मुषंग ॥ छं० ॥ ४ ॥ किम सलिल उंट मुष चढै नीर । किम पवन गवन गति धरै धीर ॥ किम सूर सीत गुन गह्रै अंग । किम धर्मराज धरै दया अंग ॥ छं० ॥ ५ ॥ किम तजै ब्याल बल विषम मुष । किम तजै जटी गल्ल गरल दुष ॥ किम तजै उदधि उर अगनि दाह । किम तजै चंद रवि राह ग्राह. छं ॥६॥ धरि नाम कचि कौं दंड देहू । इह बत्त मुष कौं राज लेहू ॥ अरु करन सेव कचि चहुआन । मन मंझझ हँसि मति राज कान ॥ छं ॥ सेवामु साँचि श्रीनाथ पाइ । तिहि चरन चित्त लग्यौ सदाइ ॥ भंडार दंड कौ सस्त्र पान । जब तब सुलेखु पाजुर निदान ॥ छं० ॥ ८ ॥ सिर पाव मंगि बुद्धिक प्रवीन । पछिराइ चरन बर बिदा दीन ॥ फिरि दूत पच्छ अजमेर आइ । दिय पत्त लग्गि सोमेस पाइ ॥ छं ॥ ९ ॥ बंचिय सुलेख कायथ प्रमान * । सुनि सोम राज चहुआन भान ॥ ३ पाठान्तर-हजूर । मेवाती । नरिंद । पठाय । लिपि । भूमियांास । उतराहि । हुकम । तहां । तह ॥
- प्रमान = प्रमानराय नामक कायथ सोमेसराज की पेशी का मुंशी था ॥
करतार छय्य पग दान दोइ । धन सह गर्व जिन करौ कोइ ॥ कं० ॥ १० ॥ अनसंक कंक सम बंक धीर । तिहि दान दंड सो जुद्ध श्रीर ॥ प्रज्जरिग सोम सुनि श्रवन दूत। जिहि गेह पिथ्थ अवतार भूत ॥ कं० ॥ ११ ॥ बुल्लाइ सूर सामंत राज । दुय घटी सुहूरत सधौ आज ॥ मेवात मही ऊजारि जारि । पुर ग्राम नैर दीजै प्रजारि ॥ कं० ॥ १२ ॥ पन खोदि बंक गढ ढाचि होहिं । इम करिय भूमि मैवात लेहिं ॥ कित्तीक सहिप मुंगल नरेस । वन बंधि संधि बिन करि अभेस ॥ कं० ॥ १३॥ पज्जन बोलि कूरंभ राव । पुंडीर चंद जनु अग्नि वाव ॥ दाहिम नरिंद कैमास संग । चामंड गव अरि दन्त अभंग ॥ कूं० ॥ १४ ॥ गुज्जर कनं क बड़ राम देव । गहिलेोत राव गोइंद खेव ॥ इतने सुभट सजि जूझ धार । वजि पंच सबद वाजे करार ॥ कं० । १५ ॥ रु०॥ ४॥ ज्योतिषियों से मुहूर्त दिखोवार पुष्य नक्षत्र से चढ़ाई के लिये निकलना ॥ दूहा ॥ बोलिय जोतिग गनिक दुज । परी मुहूरत सद्द ॥ तेरसि पुष्य रु भ्रगु दसा । चढि चल्ले निसि अद्ध ॥ कं० ॥ १६ ॥ रु० ॥ ५ ॥ घर की रक्षा के लिये पृथ्वीराज को घर पर छोड़ा ॥ दूहा ॥ रत्तजु इह विधि गेह भय । सुनि सोमेस सुभाल ॥ सिसु रख्खि रु संगृह्ही वछौ । मुंभत दिसा विसाल ॥कं० ॥ १७ ॥ रु० ॥ ६॥ ४ पाठान्तर-पिथ । मुंगल । नरिंद । पजरिग । प्रज्जरिंग । रोम । मेद्वात । सुपग । उछ्रवत्त । कठी ॥ ४ ॥ सूलित उलटी । शीत ॥ ५ ॥ व्यांल । मुख । मुंष । दुःद । दुष ॥ ६ ॥ नांम । छित्री । मुःप । चाहुश्रांत । चाहुश्रांत । मक्त । होत । होस । आंन ॥ ७ ॥ पाय । तिहिं । दंड मेा भंडार वर सस्त्र पांति । निदान ॥ ८ ॥ बुलिक प्रवीन । पहिराय । पछ । आप । हीय । लगि । पाय ॥ ९ ॥ कायध प्रमांन । चहुवान । भांनं । हय । दांत । दोय । मदहिं । कोय ॥ १० ॥ तिहिं दांन । प्रजरिग । जि.हिं । गेह । पिथ ॥ ११ ॥ बोलाय । दुग्र । महूरत । उजारि । यांम । नयर १२ ॥ पनि । करिय । करितु । मेवात । कित्तक । सुभूंम ॥ १३ ॥ पजूं । जनुं । चामंडराव । ॥ जर । रामदेव । गोयंद । भट ॥ १५ ॥ ५ पाठान्तर-बोलिय । धरी । पुरूष । भृगु दशा । चले । निशि ॥ ६ पाठान्तर-रति यु विधि इह येह भय । रषे संगृह । दिशा विशाल ॥
३०२ पृथ्वीराजरासो। आठवां समय ४] यात्रा के समय अच्छे शगुन मिलने ॥ दूहा ॥ प्रथम प्रयानच सुंदरी । मिली अंक लिय बाल ॥ पीतांबर अंबर धरै । दीप जोति रचि थाल ॥ छंद० ॥ १८ ॥ रु० ॥ ७ ॥ दूहा ॥ कलस कामिनी इक्क सिर। प्रात होत नृप पिख्ख ॥ मच्छ कंध काछार करि । खुर धुनि बाहम इक्ख ॥ छंद० ॥ १९ ॥ रु० ॥ ८ ॥ दूहा ॥ अन्य सगुन सुभ पिख्खि सब । गुंज गचर नीसान ॥ तमचर कर उज्जल्ल अवनि । प्रगटे पुब्ब दिसान ॥ छंद० ॥ २० ॥ रु० ॥ ९ ॥ पृथ्वीराज को राज्य में छोड़कर सोमेश्वर का मेवात पर चढ़ाई करना और उसकी सूचना पत्र द्वारा मुङ्गदलराय को दे कहना कि लड़े वा दंड दे आधीन हो ॥ छंद भुजंगी ॥ चल्यौ चंपि सोमेस मेवात थानं । रच्यौ राज प्रिथराज गेहं निधानं ॥ फटी फौज बैरीन की झाल दिक्खी । तबै कग्गदं प्रेषराजं विसख्खी ॥ छंद० ॥ २१ ॥ वरं बीर धीरं मछा बैर पुत्त्रं । मगै राज सोमेस सौं जुद्ध अब्बं ॥ मछा तेज जाजुल्य भारी सुषग्गं । करै बैर सारथ्थ पारथ्थ जग्गं ॥ छंद० ॥ २२ ॥ इसौ सूर सोमेस दीपौ म्लानं । दियं कग्गदं मुंगलं राजथानं ॥ करो छेय छेयं किधौ अप्पि दंडं । तजौ आज पच्छै षगं षंडि कुंडं ॥ छंद० ॥ २३ ॥ रु० ॥ १० ॥ ७ पाठान्तर-पयानह । प्रयांनह । लियें । पीतंबर ॥ ८ पाठान्तर-एक शिर । पिषि । मल्ल । वामस ॥ ९ पाठान्तर-सुभुन सब । निसांन । उजल । प्रगटी । दिसांन ॥ १० पाठान्तर-मेवात । प्रिथिराज । प्रिथिराज । गेहं । निधानं । दीषी । तबैं । विसषी ॥ २१ ॥ मगैं । युद्ध । अंब्बं । भारी सुजाजुल्य षग्गं । सारथ पारथ ॥ २२ ॥ इसो । मेला नं । दीयौ । पक्के । कुंडि ॥ २३ ॥
आठवां समय ४] पृथ्वीराजरासो । ३०३ मुद्दलराय का पत्तोत्तर देकर सोमेस्वर और पृथ्वीराज दोनो से लड़ाई मांगना ॥ साटक ॥ स्वस्ति श्री सउमेस राजन बरं । प्रिथ्राज राजं बरं ॥ तो पत्तं सुनि अन्न कग्गद बरं । पल्यंज आकृतयं ॥ जाजा भंजन सेन साहस रने । प्रातं प्रतं जुद्धयं ॥ नां किज्जै तिन टाम पचिय घरं । छिभ्या किमा कामनं ॥ छं० ॥ २४ ॥ रु० ॥ ११ ॥ सोमेस्वर का अपने लड़के के बध के विषय में संशय करना ॥ दूहा ॥ सिसु संसौ सम्ही फिख्यौ । उभय काम बध बीर ॥ जौ मुक्कै चिय अधम छत । तौ दल सद्धि सरीर ॥ ॥छं० २५ ॥ रु० ॥ १२ ॥ और पृथिराज के पास मुद्दलराय के पत्र का संदेसा भेजना और उसका रोस में आकर पिता के पास रण में आ मिलना ॥ कवित्त ॥ छह भग्गा तिय पुच्छ । तात मुक्यौ संदेसं ॥ अरिन सयन संमुद्धौ । जुद्ध मंगन अंदेसं ॥ बाल कठिन कर ग्रह्यौ । भ्रम रखन पित कागर ॥ जु कछु अग्ग संभवै । सोइ किज्जै सुमंत नर ॥ चढि बाल वियोगन कंत अप । सो निस रख्यै राज सिसु ॥ सामंत दोह भय प्रात बर । चढि चल्ल्यौ संग्राम किसु ॥ छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ १३ ॥ कवित्त ॥ सुन्यौ राज प्रथिराज । तात मुक्यौ संदेसं ॥ भयौ रोस जाजुल्य । तुल्य पावक सुमिसं ॥ ११ पाठान्तर-स्वस्तश्रो । सोमेस । प्रथीराज । प्रथिराज । तो । श्रवन । पलपंच । पल्यंन । प्रात । प्रातं । नां । किजै । ठाम । पिञ्जिय । छिमया ॥ १२ पाठान्तर-दोहरा । संह्री । पर्यौ । उभै । मुकै ॥ १३ पाठान्तर-भगा । पुछ । पुद्धि । मुक्यो । संदेस । अरिय । सैनं । अंदेस । रखन । यु । आप । निशि । रख्यो । राजें । सामंत । राज बर । चढे । चल्पो । संगाम ॥
३७४ | पृथ्वीराजरासो । | [ सातवां समय ६ कवन षत्त कूह तत्त । मत्त बंधौ अरि गेहं मक्खिम जुद्ध चिन मुझ्झ । करे नह सेष रनेहं ॥ बुल्लाइ अप्प भर अप्प सँग । चढि चल्यौ निसि चय्य सह ॥ पत्तौ सुजाइ तिन ठाम तब । सुष्ष सयन सोमेस सह ॥ छंदं ॥ २७ ॥ छ० ॥ १४ ॥ पृथ्वीराज का पिता के पास पहुंच कर सब सेना को सोते हुए पाना और सोमेस का उससे न बोलना ॥ गाथा ॥ पत्तौ पहु ढिग तातं । दिष्यौ सोतय्य सब्ब सेनायं ॥ न बुल्यौ सोमेसं । पृथिराजं मिष्टयं बैनं ॥ छं० ॥ २८ ॥ रू० ॥ १५ ॥ उसका पिता को निद्रा में और शत्रु की सेना को देख भाल कर उत्तापित होना ॥ अरिल्ल ॥ मच्चा तेज तन जग्गिय बीरं । तात दिषि निद्रा घन श्रीरं ॥ पहिलोइ अरि सेन सँपत्तिय । ज्यौं अरियं घन बीज पिवत्तिये ॥ छं० ॥ २९ ॥ रू० ॥ १६ ॥ और उस का शत्रु की सेना पर झपटना ॥ दूहा ॥ सयन कुंडि पति सयन सैं। झपल्लौ इन उन मान ॥ खीनर तीतर देखि कै । झपत्यौ जानि सिचांन ॥ छं० ॥ ३० ॥ ६० ॥ १७ ॥ पृथ्वीराज और मुद्दलराय का युद्ध ॥ कवित्त ॥ जनु कि सिंघ बण गज्जि । झपटि करि करनि जुथ्य पर ॥ जनु कि अंजनिस जात । पात दनु दिषि बुध्यबर ॥ जनु कि भीम भीमंडा । दंत हंतीय उखारन ॥ १४ पाठान्तर-सुन्या । पावक । करे । बुलाय । अप । आप संग । चल्यौ । निशि । ब्यमह । पत्तौ । ठांम सुप्र । सेंन । सोमेस जहां ॥ १५ पाठान्तर-सो सब्ज सच्छ सेनायं । तथ । सब । नहं । बुल्यौ । पृथीराजं ॥ १६ पाठान्तर-बीर । दिषि । निंद्रा घट श्रीर । पहिलौ । अरि । संपतिय संपत्तिय । पिवंत्तिय ॥ १७ पाठान्तर-सेंन कुंडि पति सेंन सो । उनमांन । लीनेर । जांनि ।
आठवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो । ३०५ जनु कि गरुड़ मन्त्र गज्जि । वज्जि पंनग बहु पारन ॥ तिम सूर झपटि सोमेस सुन्न । जनु अकास तारक तूटिय ॥ सम जोर रोर अरि उड्डवन । सार सार सचुन जुटिय ॥ छं० ॥ ३१ ॥ रू० ॥ १८ ॥ कवित्त ॥ उन मुंगल गहि इंद । इंद देवन जनु पारस ॥ हर दल कर वन्न कोर । गोड मंडिय भर भारस ॥ गहिर गुंज नीसांन । आंनु वहल गुर गज्जिय ॥ वरन वरन वैरप्प । इंद धनुषह सम रज्जिय द्वय नारि धारि आतस अनँत । सेार रोर चंमर उड़िय ॥ जाने कि विरचि वारधि लहरि । सत्ति म्रजाद बूडन कुटिय ॥ छं० ॥ ३२ ॥ रु० ॥ १६ ॥ ऐसे पृथ्वीराज के अन्य सूर मुङ्गल के योद्धाओं से लड़े ॥ गाथा ॥ इम रंजे रन रंगं ॥ सूरं नूरं अंगं अमितायं ॥ जनु * विरचे महिष महिंद्रं ॥ वज्जं पात घाव अंगायं ॥ छं० ॥ ३३ ॥ रु० ॥ २० ॥ कन्ह का मेवातियों से युद्ध ॥ कवित्त ॥ उसन्नंग दर धौर । ठौर रप्पन सेवातिय ॥ सीस नाइ मुंगल नरिंद * । कछर कृष्यौ घन घातिय ॥ हूंत सु कन्ह नरनाह । दाह दावावल जह्निय ॥ धक्क वक्क धरि धक्क । जानि मचना रँभ झल्लिय ॥ पय हुंत मंत उरझे जनुकि । मेछ बूंद सर कर कुटिय ॥ सरजाल चाल अनहद अवनि । तिमिर पसर रविकर मिटिय ॥ छं० ॥ ३४ ॥ रु० ॥ २१ ॥ १८ पाठान्तर-कर । करिन । जुथ । अंजनी । दिषि । हथ धर । गनि । बजि । तिम सु सूर सोमेस सुन्न । जुटिय । उड्डयन ॥ १६ पाठान्तर-मही । गहर । नीसांन । जांनु । रञ्जिय । जांनै । म्याद ॥ २० पाठान्तर-सूर । नूर । अंग । * अधिक पाठ है । महिंद्रं ॥ २१ पाठान्तर-ठौर। ठौर । मेवातीय । नांह । मुंगल । * अधिक पाठ है । घातीय । जलिय । जानि । रंभ । झलिय ॥