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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

३८६ राजतरंगिणी
नाट्यं सर्वजनप्रेक्ष्यं यश्चक्रे स महाकविः ।
द्वैपायनमुनेरंशस्तत्काले चन्दकोऽभवत् ॥१६॥
१६. उसी के समय जिसने सर्व जन प्रेक्ष्य नाट्य का निर्माण किया, वह द्वैपायन¹ मुनि
का अंशभूत महाकवि चन्दक² था।
के पास है। मुजफ्फराबाद जिला में मुजफ्फराबाद,
उरी की आधी तहसील, और तीन चौथाई करनाट
पाकिस्तान के पास है। गिलगित का दूसरा इलाका
पहले का रिड्सोक्षेत्र, लद्दाख सूबा में स्करदा की
तहसील, मारवा का थोड़ा भाग तथा करगिल की
एक चौथाई तहसील पाकिस्तान के पास है।
डोगरा राज्य काल के पश्चात् अक्टूबर सन् १६४७
से जनवरी सन् १६४६ तक पाकिस्तान से संघर्ष
था। जम्मू कश्मीर राज्य इस समय निम्नलिखित
विभागों में विभक्त है—जम्मू प्रदेश में जम्मू, कठुआ
उधमपुर, डोडा, नय शहर के जिले हैं। कश्मीर
प्रदेश में श्रीनगर, अनन्त नाग और बारह मूला है।
सरहदी इलाकाजात में लद्दाख का जिला है
उसमे करगिल सम्मिलित है। पहली जनवरी सन्
१६४९ को युद्ध विराम रेखा के आधार पर विभाग
किया गया है। यह युद्ध विराम रेखा मुनावर्
तहसील भीमवर से आरम्भ हो कर, देवह, और
बटाला के बीच होकर नौशेरा और राजौरी के करीब
से जाती है। पूंछ का शहर बायी ओर छोड़कर उड़ी
के दरम्यान से झेलम के उस पार से होती हुई काजी
नाग तक गयी है। काजी नाग से आगे बढ़कर
टिफवस के करीब से हो कर थरवयाँ गली के साथ
केरन में जाती है। यहाँ से पूरव तरफ गुरेज से हो
कर, करगिल कसबा के बीच से होकर, तहसील इस्क-
रदू को काटती तहसील लद्दाख तक चली जाती है।
सन् १६४१ के बाद कश्मीर में जनगणना नहीं
हुई। उस समय की जनगणना के अनुसार जम्मू
कश्मीर राज्य की आबादी ४०,३४,१८० थी।
कश्मीर प्रदेश की आबादी १७,२८,६००, जम्मू
प्रदेश की १५,६१, ५८०, सरहदी इलाके अर्थात्
लद्दाख करगिल में ३,११,१००, जागीर पूंछ में
५, २१, ७०० और चनेनी में ११,८०० लोग आबाद
थे। उसमे मुसलमान ३०, ७३, ५४०, सवर्ण हिन्दू,
५, ८६, ६२१, हरिजन १, १३, ४६४, सिख ६५,
९०३, बौद्ध ईसाई जैन आदि ८८,०८८ थे। पूरा
क्षेत्रफल लगभग ८४ हजार वर्ग मिल था। प्रति
मिल में औसतन ४७ व्यक्ति निवास करते थे।
सरहदी क्षेत्र में प्रति मिल ९ व्यक्ति निवास करते थे।
भारतीय क्षेत्र अधिक उपजाऊ तथा कम पहाड़ी है।
पाकिस्तानी भाग पहाड़ी और वन धन से भरा है।
युद्ध बन्दी के पश्चात् भारतीय कश्मीर की
आबादी में ६० प्रतिशत मुसलमान तथा ४० प्रति
शत हिन्दू है। पाकिस्तान में अनधिकृत कश्मीर में
१३ लाख मुसलमानों की आबादी थी। भारतीय
क्षेत्र में १८ लाख मुसलमान है। उसमें १६ लाख
केवल कश्मीर उपत्यका में है। केवल २ लाख सूबा
जम्मू में है। गैर मुस्लिम जम्मू में १० लाख और
कश्मीर सूबा में २ लाख है। इस प्रकार १८ लाख
मुसलमान तथा १२ लाख गैरमुस्लिम इस समय
आबाद है। पाकिस्तान में १२ लाख सबके सब
मुसलमान हैं। सन् १९६१ की जनगणना के अनुसार
जम्मू कश्मीर की भारतीय भाग की आबादी
३५,८३,००० और क्षेत्रफल २२२८०२ वर्ग
किलोमीटर है। सन् १६४१ की गणना अनुसार
इस क्षेत्र की आबादी ३०,००,००० थी।
कश्मीर राज्य का विभाजन तथा पुनर्गठन
अनेक बार हुआ है। प्राचीन भूगोल तथा विभाग
से आज का विभाजन सर्वथा भिन्न है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १६ में 'यश्चक्रे' का 'यच्चक्रे';
'कविः' का 'कवेः' 'पायन' का 'पायनं' तथा 'चन्दको'

द्वितीय तरंग : ३८७
का पाठभेद 'चन्द्रको' और 'चर्मको' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१६( १ ) द्वैपायन : व्यास पाराशर्य का नाम
द्वैपायन है । इनका जन्म यमुनाद्वीप में हुआ था ।
अतएव नाम 'द्वैपायन' पड़ा था । (म० आ० ५४:२)
इनकी माता का नाम काली था । अस्तु नाम 'कृष्ण
द्वैपायन' भी रखा गया था । भागवत पुराण में
उल्लेख आता है । वह स्वयं कृष्ण वर्ण थे । वर्ण के
कारण नाम कृष्ण द्वैपायन पड़ गया था । वैशाख
पूर्णिमा इनका जन्म दिन है । आषाढ पूर्णिमा को
व्यास पूर्णिमा मनायी जाती है ।
व्यास ने वेदों की पुनर्रचना की थी । इसलिए
उन्हें वेदव्यास कहा जाता है ।
'विव्यास वेदान् यस्मात्स तस्माद्व्यास इति स्मृतः।'
( म० आ० ५७ : ७३ । )
वायु पुराण में इन्हें 'पुराण प्रवक्ता' कहा गया
है ( वायु ६० : ११-२१; विष्णु धर्म : १७४ )
अत्यन्त कठोर तपस्या करने के कारण अनेकानेक
सिद्धियां प्राप्त किये थे । इन्होंने दूरश्रवण, दूर
दर्शन अनेक विद्याओं में प्रवीणता प्राप्त की थी ।
( म० आ० : ३७:१६ । )
कौरव पाण्डवो के पितामह थे । उनके महान्
हितचिन्तक रूप में उनका चरित्र चित्रण किया गया
है । जनमेजय के यज्ञ मण्डप में सर्प यज्ञ के समय
उपस्थित थे । वैशम्पायन ने अपने शिष्य को स्वरचित
महाभारत सुनाने का आदेश दिया था । ( म० आ०
५४ ) पाण्डवों के वनवास काल में युधिष्ठिर को
'प्रतिस्मृति विद्या' का उपदेश दिया था । ( म० व०
३७:२७-३० ) संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की
थी । संजय महाभारत युद्ध का आंखों देखा वर्णन
धृतराष्ट्र को सुनाते थे । ( म० भी० २:९ ) संजय
की दिव्य दृष्टि युद्ध के पश्चात् नष्ट हो गयी थी ।
(म० सौ० : ९:५८) घृताची अप्सरा से इनको शुक
नामक पुत्र प्राप्त हुआ था । ( म. आ. ५७:७४ )
किन्तु स्कन्द पुराण में शुक को जाबालि ऋषि की
कन्या वटिका से उत्पन्न कहा गया है । ( स्कन्द :
६८ : १४७-१४८ )
द्वैपायन चिरंजीवी हैं । वेदरक्षणार्थ उसका
विभाजन किये थे । पौराणिक साहित्य तथा
महाभारत का निर्माण किया था । (वायु०६०:१-१६)
वेद की चार स्वतंत्र संहिताओं को बनाया था ।
ततः स ऋच उद्धृत्य ऋग्वेदमकल्पयत् ।
( वायु० ६०:१९ ब्रह्माण्ड० ३:३४:१९)
व्यास की वैदिक शिष्य परम्परा है । ऋग्वेद की
शिष्य परम्परा में, पैल, बाष्कल ( इन्द्रप्रमति )
बोध्य, याज्ञवल्क्य, पराशर, माण्डूकेय, सत्यश्रवस्,
सत्यहित, सत्यश्री, शाकल्य, वाष्कलि, शाकपूर्ण,
पन्नगारि, शैशिरेय, वत्स, तथा दात बलाक हैं । ऋग्
वेद की २१ शाखाएँ हैं । उनमें केवल शाकल,
वाष्कल एवं सांख्यायन की संहिताएँ उपलब्ध है ।
शेष दो जिनका निर्देश प्राप्त है आश्वलायन एवं
मण्डूकायन है । आश्वलायन एवं सांख्यायन शाखाओं
के प्रवर्तक कौन आचार्य थे कहना कठिन है ।
व्यास को यजुर्वेद की वैदिक शिष्य परम्परा में,
वैशंपायन, याज्ञवल्क्य, प्रजापति, तित्तिरी, माध्यंदिन,
काण्व, श्यामाययाति, आसुरि एवं अलिम्प हैं ।
कृष्ण यजुर्वेद की ८६ शाखाओं में तैत्तिरीय,
मैत्रायणी, कठ एवं कापिष्ठल की सहिताएं प्राप्त है ।
शुक्ल यजुर्वेद की १५ शाखाएँ है । उनमें केवल काण्व
एवं माध्यंदिन उपलब्ध हैं ।
सामवेद की वैदिक शिष्य परम्परा में, जैमिनि,
सुमन्तु-जैमिनि, सुत्वन-जैमिनि, सुकर्मन्-जैमिनि,
पौष्पिण्ड्य, लोगाक्षि, कुथुमि, कुशीतिन्, लांगलि,
राणायनीय, सण्डिवुत्र, पराशर, भागवित्ति, सोम-
गायनी, पाराशर्य, प्राचीन योग, आमुरायण, तथा
पतंजलि हैं । सामवेद की १०० शाखाएँ हैं । उनमें
केवल कौथुम तथा राणायनीय संहिताएँ प्राप्त है ।
अथर्व वेद की शिष्य परम्परा में सुमन्त, कबन्ध,
पथ्य, देवादर्श, पिप्पलाद, जाजलि-शौनक, सैन्ध-

१८४ राजतरंगिणी
तयोः प्रभावमाहात्म्यजिज्ञासार्थमिवोद्यता ।
भयंकर अकाल १ प्रजासु दुस्सहा जातु व्यापद्वैवी व्यजृम्भत ॥१७॥
१७. कदाचित् उन दोनों का प्रभाव माहात्म्य जानने के लिये ही मानो प्रजाओं में
दुस्सह दैवी आपत्ति भयंकर रूप से प्रकट हुई ।

वायन, बभ्रु, और मंजुकेश हैं। अथर्ववेद की २
शाखाएं हैं। उनमें दोनों पिप्पलाद तथा शौनक
प्राप्त हैं।
समस्त पुराणों की श्लोक संख्या ४,२५,०००
है। उनमें १० पुराण अपूर्ण हैं। केवल ८ पूर्ण हैं।
नृसिंह, भागवत, वायु एवं शिव पुराण को महापुराण
नहीं माना जाता। इन पुराणों में अग्नि पुराण के
देवता अग्नि हैं। गुण तामस है। स्थल नैमिषारण्य है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के देवता सूर्य हैं। गुण राजस हैं।
स्थान नैमिषारण्य है। पद्मपुराण के देवता ब्रह्मान
हैं। गुण सात्त्विक है। स्थान नैमिषारण्य है। पाच
पुराणों के देवता विष्णु हैं। गुण सात्विक है। उनमे
गरुड़ एवं नारद का स्थान नैमिषारण्य, नृसिंह का
स्थान प्रयाग, भागवत का स्थान सहस्र वार्षिक सत्र,
और विष्णु का स्थान दृषद्वतीतीर दीर्घसत्र है। शेष
पुराणों के देवता शिव हैं। उनमें वराह और कूर्म
सात्त्विक है। मार्कण्डेय, लिंग, ब्रह्माण्ड, भविष्य,
तथा वामन राजसिक है। स्कन्द, मत्स्य, तथा शिव
तामसिक हैं। वायु पुराण का क्या प्रधान गुण है।
निश्चित नही किया जा सकता। कूर्म, लिंग, स्कन्द,
ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य का स्थान नैमिषारण्य है। भविष्य
का शतानीक नृप सभा, वराह का पृथ्वी और शिव का
स्थान प्रयाग है। मारकण्डेय, वायु का स्थान निश्चित
नहीं हैं।
व्यास का जीवन संदेश था। चतुर्विध पुरुषार्थों
में केवल धर्माचरण द्वारा ही अर्थ कामादि पुरुषार्थ
प्राप्य हो सकते हैं। केवल धर्म ही शाश्वत है।
चिरंतन है। नित्य है। शेष सुखोपभोग एवं पुरुषार्थ
अनित्य हैं। वे कितना मार्मिक वचन कहते हैं :—
ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति माम् ।
धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ॥
(म० स्व० २२४९)

'मैं हाथ उठाकर समस्त विश्व से कहता
आ रहा हूँ कि अर्थ एवं काम से भी अधिक धर्म
महत्व पूर्ण है। किन्तु कोई भी मनुष्य मेरे इस कथन
की ओर ध्यान नहीं देता है।'
द्रष्टव्य है पृष्ठ १८३ पादटिप्पणी-व्यास।
(२) चन्द्रक : सुभाषितावलो में चन्द्रक
चन्द्रगोपी नाम से सम्बोधित किया गया है। पाश्चात्य
लेखक साइलवियन लेवी का मत है कि चीनी पर्यटक
इत्सिंग द्वारा उल्लिखित चन्द्र ही चन्द्रक कवि हैं।
तिब्बती भाषा में एक नाटक मिला है। उसमें चन्द्र-
गोपिन का वर्णन है। महाकवि कल्हण ने उसकी
तुलना महाभारतकार से की है। सुभाषितावली
में उसके पद प्राप्त होते हैं।
प्रसीदे चेतस्य प्रकटय मुदं सन्त्यज रुषम्
प्रिये क्षुव्यन्त्यङ्गान्यमृतमिव ते सिञ्चतु वचः।
निधानं सौख्यानां क्षणमभिमुखं स्थापय मुखं
न मुग्धे प्रत्येतुं प्रभवति गतः कालहरिणः॥
॥ १६२९ ॥
एषा हि मे रणगतस्य दृढा प्रतिज्ञा
द्रक्ष्यन्ति यन्न रिपवो जघनं हयानाम्।
युद्धेषु भाग्यचपलेषु न मे प्रतिज्ञा
दैवं यदिच्छति जयं च पराजयं च ॥२२०५ ॥
पाठभेद :
श्लोक संख्या १७ में 'दैवी' का पाठभेद 'देवी'
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१७ (१) अकाल : कल्हण ने कश्मीर के अनेक
अकालों का वर्णन किया है। सम्राट् अकबर के
समय में भी भीषण अकाल पड़ा था। कल्हण ने
अपने काल के समीप पड़ने वाले अकालों का अर्थ भी
दिया है। अकबर के समय कश्मीर में पर्यटन करने

द्वितीय तरंग ३८९
पाकोन्मुखशरच्छालीच्छन्नकेदारमण्डले ।
मासि भाद्रपदेऽकस्मात्पपात तुहिनं महत् ॥१८॥
महा अकाल :
१८. भाद्रपद¹ मास में पकते हुए शरद् कालीन शालियुक्त क्षेत्र मण्डल में अकस्मात्
महान् तुहिन पात हुआ ।

वाले ईसाई पर्यटकों ने उसका वर्णन किया है। उनके
पढ़ने से रोंगटा खड़ा हो जाता है ।
श्री पिनोइस्ट डी गोइम् जो सम्राट् अकबर के
निवेदन पर कश्मीर गये थे, वर्णन करते हैं : कश्मीर
में इस अकाल के काल में हमने देखा कि बहुत सी
माताएँ बे घर बार की हो गयी थीं । अपने बच्चों
को कुछ खिलाने में असमर्थ हो कर उन्हें खुले ग्राम
बाजारों में बेचने लगी थीं । बहुत से बालकों को
पादरियों ने खरीद कर उनका बपतिस्मा कर उन्हें
ईसाई बना लिया । एक मुसलमान अपना एक बच्चा
बेचने के लिये लाया । पादरी ने बच्चे की माँ को
कुछ धन देकर बच्चा इसलिए वापस कर दिया कि
वह बड़े होने पर कश्मीर में ईसाई होकर नहीं रह
सकता था । दूसरे दिन लड़के की माँ पुनः पादरी
के यहाँ आई । उससे बोली कि बच्चा मरने ही
वाला है । उसके घर चलकर उसका बपतिस्मा कर
दिया जाय । पादरी कुछ पुर्तगालियों के साथ बच्चे के
घर गया । उसके पिता की अनुमति लेकर उसका
बपतिस्मा किया । मरने पर लड़के का पिता बच्चे
का खतना करना चाहता था परन्तु पादरी ने खतना
नहीं करने दिया और ईसाई धर्मानुसार उसे गाड़
दिया । इसी प्रकार कुछ द्रव्य लेकर एक दूसरी स्त्री
अपने बच्चे का बपतिस्मा कराने के लिए ले आई ।
बच्चे का बपतिस्मा ज्यों ही समाप्त हुआ बच्चा मर
गया । (अकबर एण्ड जिस्यूस्टा पृष्ठ ७८ )
आइने अकबरी—इस राजा के समय सूर्य जब
सिंह राशि में था उस समय इतना हिमपात हुआ
कि पूरी फसल नष्ट हो गई । उससे देश में भयंकर
अकाल फैल गया ।

पाठभेद :
श्लोक संख्या १८ मे 'च्छन्न' का 'छन्ने' तथा
'छत्रे' पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१८ (१) भाद्रपद अकाल : काश्मीर का
मुख्य अन्न शाली है । भारत में वर्षाकालीन
फसल है। धान कई प्रकार के होते हैं । कोई साठ
दिन में होता है और कोई भाद्र कार्तिक और अगहन
मास तक तैयार होता है। शरद कालीन धान को
भारत में अगहनिया धान कहते हैं । कश्मीर में भाद्रपद
में शाली पुष्ट होने लगती है। वह पकने लगती है।
कार्तिक शुक्ल पक्ष में शाली काटने को अच्छा माना
जाता है । सितम्बर अक्टूबर में वह काट ली
जाती है ।
काश्मीर के ग्रामीण क्षेत्रों में जाने का यह सबसे
अच्छा समय है । फल भी हो जाते हैं । सेव, बबूगोशा
अखरोट से वृक्ष लद जाते हैं । खेतों में सुवर्ण वर्ण
शाली अत्यन्त सुहावनी लगती है ।
काश्मीर उपत्यका की मुख्य उपज शाली है ।
उष्ण तापमान ९४ डिगरी से ऊपर नहीं जाता ।
वर्ष में लगभग २६ इंच वर्षा होती है। उत्तर पूर्व
का भाग उत्तर पश्चिम की अपेक्षा कम ऊँचा है ।
दस इंच से कम जहाँ वर्षा होती है, उसे इस समय
खुश्क, दस से २५ इंच तक वर्षा वाले को खुश्कवार
तथा २५ इंच से अधिक जहाँ वर्षा होती है उसे
मरतूब कहते हैं । कश्मीर उपत्यका की जल वायु
खुश्कवार प्रचलित कश्मीरी भाषा में कही जायगी ।
उसे मातदिल भी कह सकते हैं । सूर्य की रश्मि

३९० राजतरंगिणी
शीतल वायु के कारण तपती नही। ग्रीष्म ऋतु आने
पर फारस की खाड़ी तथा भूमध्य सागर से आती वायु
के कारण साइक्लोन, अन्धड़ आता है। वर्षा होती
है। फरवरी मार्च तथा माधे अप्रैल तक पानी बरस
जाता है। पहाड़ियो पर वर्षा औसतन २६ इंच
होती है। शीत काल में कश्मीर उपत्यका मे १६
इंच वर्षा होती है। ग्रीष्म ऋतु मे ८ इंच पानी
बरसता है। अप्रैल से अक्टूबर तक तापमान ५५ से
९६ डिग्री तक रहता है। अतएव ग्रीष्म काल में
हवा मातदिल और खुशगवार होती है।
कश्मीर उपत्यका में केला, बरगद, पीपल,
आम, अमरूदादि के वृक्ष नहीं उगते। अखरोट,
चिनार, सफेदा, देवदार, वेद तथा चीड़ के वृक्ष खूब
दिखाई देते हैं। सेब, नाशपाती, खुबानी, चेरी,
सतालू, अखरोट, आलूवा, बादाम तथा शाक भाजी
होती है। अन्नों में शाली होती है।
शाली मुख्य उपज है। इसके लिये गरम और
मरतूब हवा पानी की आवश्यकता होती है। जमीन
समतल तथा पानी का उसमें रुकावट होना चाहिए।
पहाड़ो पर सीढ़ीनुमा धान की खेती होती है। उप-
त्यका के मैदान में खेतो में शाली बोयी जाती है।
काश्मीर उपत्यका मे ही शाली की फसल सबसे
अधिक होती है। उपत्यका की भूमि समतल तथा
उपजाऊ हैं।
उपत्यका के लोगों का शाली अर्थात् चावल सर्व-
प्रिय भोजन है। कश्मीर राज्य में अब भी चावल-
भोजी लोगो की आबादी अधिक है। दक्षिणी भाग में
में भूमि समतल है। सिंचाई का सुपास है। यहाँ पर
प्राचीन काल से अत्यधिक शाली पैदा होती है।
अनेकानेक नागो, सरोवरों, वितस्ता तथा कुओं से
सिचाई होती है।
कश्मीर उपत्यका में धान बोने का समय चैत्र
अर्थात् १३ अप्रैल से आरम्भ होता है। सितम्बर
१५ से धान काटने का समय आरम्भ हो जाता है।
हिन्दी मास से कार्तिक शुक्ल पक्ष में शाली काटने का
मूहूर्त माना जाता है।
कल्हण के वर्णन से प्रकट होता है कि उस समय
भी खेती का यही प्रकार था। मौसम में भी परिव-
र्तन नही हुआ है। शरद् ऋतु कुआर और कार्तिक
का महीना होता है। भाद्रपद भादों का महीना
होता है। धान कट कर शरद् अर्थात् कुआर कार्तिक
में तैयार हो जाता है। भारत में धान की बोआई
जुलाई अर्थात् आषाढ़ मास में होती है। विभिन्न
प्रकार के धान विभिन्न समयों पर काटे जाते हैं।
मुख्य फसल धान की होती है। जुलाई में बोकर
अगहन या कार्तिक के अन्त में काटते हैं। कश्मीर में
यह समय अप्रैल मई में बोआई तथा सितम्बर
अक्टूबर में कटाई का होता है। इस समय कश्मीर
राज्य में १९० हजार हेक्टर क्षेत्रफल में शाली बोयी
जाती है। इस समय शाली २१० मेट्रिक टन होती
है। गेहूँ केवल ६६ हजार, तथा चना ७ हजार
मेट्रिक टन होता है। अतएव शाली मुख्य खाद्य
पदार्थ है। शाली के बाद मक्का १७० हजार हेक्टर
टन १८० हजार मीटर क्षेत्र में बोया जाता है।
शरद् कालीन वायु उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूरब
बहती है। यह हवा झंझावात, साइक्लोन, उपल
वृष्टि तथा शीत के साथ प्रायः उम्र होने पर आती है।
कश्मीर तथा हिमाचल में तुषारपात एवं शीत-
लहरी आने पर उसका तुरन्त प्रभाव दिल्ली, पंजाब
तथा पश्चिम उत्तर प्रदेश पर पड़ता है।
दक्षिण पूरब से चलने वाली हवा नम तथा गर्म
होती है। वह मानसून होती है। उससे वर्षा होती
है। कश्मीर में भाद्रपद मास मे वायु उत्तर पश्चिम
से चलने लगती है। उत्तर से आने वाली वायु
हिमाच्छादित तथा शीत कटिबन्ध से आने के कारण
शीतल होती है। वह तापमान घटा देती है। अतएव
असमय ही कश्मीर में तुषारपात हो जाता है।
कल्हण ने सत्य ही इस भौगोलिक दशा,
प्राकृतिक जलवायु तथा उसके प्रभाव की ओर
संकेत किया है। भाद्रपद मे प्रायः शाली अधपकी
हो जाती है। तुषारपात से शाली लोट जाती

द्वितीय तरंग ३९१-
तस्मिन्विध्वंसयोद्धुक्तकालादृट्टहसितोपमे ।
न्यमज्जन् शालयः साकं प्रजानां जीविताशया ॥१९॥
१९. काल के अट्टहास सदृश, विश्व विनाश हेतु, उत्पन्न उसमें ( तुहिनपात में )
प्रजाओं की जीवित आशाओं के साथ, शालियाँ निमज्जित हो गयीं ।
अथाऽऽसीत्क्षुत्परिक्षामजनप्रेतकुलाकुलः ।
प्रकारो निरयस्येव घोरो दुर्भिक्षविप्लवः ॥२०॥
२०. क्षुधा से क्षीण जन-प्रेत-समूह-संकुल वह घोर दुर्भिक्ष विप्लव नरक¹ के प्रकार²
तुल्य लगता था ।
हैं । तुषार के आघात से बालें टूट जाती हैं। शीत
के कारण अधपकी शाली का पकना बंद हो जाता
है। वह नष्टप्राय हो जाती है। केवल पुवाल
तथा जीवनहीन शाली का दर्शन होता है।
कश्मीर में उन दिनों कृषी तथा ऊनी वस्त्र के
अतिरिक्त और कोई उद्योग-धन्धा नहीं था ।
शाली, मक्का, तथा फल एकमात्र जीवन यापन के
साधन थे । कश्मीर उपत्यका में बाहर से आने
वाला मार्ग पंजाब तथा बाहरी क्षेत्रों से दुर्गम है ।
अन्न यदि बाहर से उन दिनों घोड़ों, बैलों पर लाया
भी जाता था, तो बहुत महँगा पड़ता था । गरीबों
के साधन के बाहर उनका खरीदना हो जाता था ।
अन्न सरलतापूर्वक अधिक मूल्य देने पर भी नहीं
मिल पाता था ।
कल्हण इसी ओर इस श्लोक में संकेत करता
है । आजकल के विकसित सड़कों, हवाई
जहाजों, ट्रकों तथा रेलवे से उस समय की परि-
स्थिति पर विचार करना ठीक नहीं होगा । इन
साधनों से, वह समय साधनहीन एक प्रकार से
हिमालय की कुक्षि में था । जहाँ सभी कुछ कठिनता
से प्राप्त हो सकता था ।
कल्हण ने शाली नष्ट होने पर, जीवन के सहारा
न प्राप्त होने पर कश्मीर मण्डल की क्या अवस्था
हुई थी उसी पर अगले श्लोकों में अकाल का हृदय-
स्पर्शी अत्यन्त कष्टोत्पादक वर्णन किया है ।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या २० में 'कुलाकुलः' का 'समाकुलः'
तथा 'प्रकारो' का 'प्राकारो' एवं 'प्रकरो' पाठभेद
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
२०. ( १ ) नरक : निरय शब्द का प्रयोग
यहाँ कल्हण ने किया है । उसका अर्थ नरक होता
है । स्वर्ग एवं नरक की कल्पना प्रायः सभी धर्मों
में प्राप्त होती है । स्वर्ग का विलोमार्थक नाम
नरक है । प्राचीन मान्यता के अनुसार मरणोत्तर
अधोलोक स्थान में या अवस्था में देव इत्यादि
द्वारा पापियों को उनके पाप तथा अपराधों का दण्ड
दिया जाता है। शीत प्रधान देशों में नरक की कल्पना
प्रायः हिमाच्छादित तथा उष्ण देशों में अग्नितप्त
लोकों में की गयी है । भारतीय मान्यता के अनु-
सार नरक दक्षिण दिशा अर्थात् यम की दिशा में
पाताल के निम्नतम भाग में माना गया है । लगभग
२८ नरकों की कल्पना की गयी है । यमराज
पाप पुण्य का निर्णय कर पापियों को विभिन्न नरकों
में भेजते हैं ।
ऋग्वेद में नरक का उल्लेख नही मिलता ।
ब्राह्मण काल में नरक की कल्पना मिलती है ।
अथर्व वेद में ( २ : १४ : २; ५ : १९ : ३)
नरक स्वर्ग के विपरीत यम के क्षेत्र रूप में अभीष्ट
है । वहाँ राक्षसियों तथा व्यभिचारिणियों का

३९० राजतरंगिणी
शीतल वायु के कारण तपती नहीं। ग्रीष्म ऋतु आने
पर फारस की खाड़ी तथा भूमध्य सागर से आती वायु
के कारण साइक्लोन, अन्धड़ आता है। वर्षा होती
है। फरवरी मार्च तथा आधे अप्रैल तक पानी बरस
जाता है। पहाड़ियों पर वर्षा औसतन २६ इंच
होती है। शीत काल में कश्मीर उपत्यका में १६
इंच वर्षा होती है। ग्रीष्म ऋतु में ८ इंच पानी
बरसता है। अप्रैल से अक्टूबर तक तापमान ५४ से
९६ डिग्री तक रहता है। अतएव ग्रीष्म काल में
हवा मातदिल और खुश्कवार होती है।
कश्मीर उपत्यका में केला, बरगद, पीपल,
आम, अमरूदादि के वृक्ष नहीं उगते। अलरोट,
चिनार, सफेदा, देवदार, वेद तथा चीड़ के वृक्ष खूब
दिखाई देते हैं। सेब, नासपाती, खुबानी, चेरी,
समालू, अलरोट, आलूचा, बादाम तथा शाक भाजी
होती है। अन्नो में शाली होती है।
शाली मुख्य उपज है। इसके लिये गरम और
मरतूब हवा पानी की आवश्यकता होती है। जमीन
समतल तथा पानी का उसमें रुकावट होना चाहिए।
पहाड़ों पर सीढ़ीनुमा धान की खेती होती है। उप-
त्यका के मैदान में खेतों में शाली बोयी जाती है।
काश्मीर उपत्यका में ही शाली की फसल सबसे
अधिक होती है। उपत्यका की भूमि समतल तथा
उपजाऊ है।
उपत्यका के लोगों का शाली अर्थात् चावल सर्व-
प्रिय भोजन है। कश्मीर राज्य में अब भी चावल-
भोजी लोगो की आबादी अधिक है। दक्षिणी भाग में
में भूमि समतल है। सिंचाई का सुपास है। यहाँ पर
प्राचीन काल से अत्यधिक शाली पैदा होती है।
अनेकानेक नागों, सरोवरों, वितस्ता तथा कुओं से
सिंचाई होती है।
कश्मीर उपत्यका में धान बोने का समय चैत्र
अर्थात् १३ अप्रैल से आरम्भ होता है। सितम्बर
१३ से धान काटने का समय आरम्भ हो जाता है।
हिन्दो मास से कार्तिक शुक्ल पक्ष में शाली काटने का
मुहूर्त माना जाता है।
कल्हण के वर्णन से प्रकट होता है कि उस समय
भी खेती का यही प्रकार था। मौसम में भी परिव-
र्तन नहीं हुआ है। शरद् ऋतु कुआर और कार्तिक
का महीना होता है। भाद्रपद भादों का महीना
होता है। धान कट कर शरद् अर्थात् कुआर कातिक
में तैयार हो जाता है। भारत में धान की बोआई
जुलाई अर्थात् आषाढ़ मास में होती है। विभिन्न
प्रकार के धान विभिन्न समयों पर काटे जाते हैं।
मुख्य फसल धान की होती है। जुलाई में बोकर
अगहन या कार्तिक के अन्त में काटते हैं। कश्मीर में
यह समय अप्रैल मई में बोआई तथा सितम्बर
अक्टूबर में कटाई का होता है। इस समय कश्मीर
राज्य में १९० हजार हेक्टर क्षेत्रफल में शाली बोयी
जाती है। इस समय शाली २१० मेट्रिक टन होती
है। गेहूँ केवल ६६ हजार, तथा चना ७ हजार
मेट्रिक टन होता है। अतएव शाली मुख्य खाद्य
पदार्थ है। शाली के बाद मक्का १७० हजार हेक्टर
टन १८० हजार मीटर क्षेत्र में बोया जाता है।
शरद् कालीन वायु उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूरव
बहती है। यह हवा झंझावात, साइक्लोन, उपल
वृष्टि तथा शीत के साथ प्रायः उग्र होने पर आती है।
कश्मीर तथा हिमाचल में तुषारपात एवं शीत-
लहरी आनेपर उसका तुरन्त प्रभाव दिल्ली, पंजाब
तथा पश्चिम उत्तर प्रदेश पर पड़ता है।
दक्षिण पूरव से चलने वाली हवा नम तथा गर्म
होती है। वह मानसून होती है। उससे वर्षा होती
है। कश्मीर में भाद्रपद मास में वायु उत्तर पश्चिम
से चलने लगती है। उत्तर से आने वाली वायु
हिमाच्छादित तथा शीत कटिबन्ध से आने के कारण
शीतल होती है। यह तापमान घटा देती है। अतएव
असमय ही कश्मीर में तुषारपात हो जाता है।
कल्हण ने सत्य ही इस भौगोलिक दशा,
प्राकृतिक जलवायु तथा उसके प्रभाव की ओर
संकेत किया है। भाद्रपद में प्रायः शाली अधपकी
हो जाती है। तुषारपात से शाली लोट जाती

द्वितीय तरंग ३९१
तस्मिन्विध्वंसयोद्युक्तकालाट्टहसितोपमे ।
न्यमज्जन् शालयः साकं प्रजानां जीविताशया ॥१९॥
१९. काल के अट्टहास सदृश, विश्व विनाश हेतु, उत्पन्न उसमें ( तुहिनपात में )
प्रजाओं की जीवित आशाओं के साथ, शालियाँ निमज्जित हो गयीं ।
अथाऽऽसीत्क्षुत्परिक्षामजनप्रेतकुलाकुलः ।
प्रकारो निरयस्येव घोरो दुर्भिक्षविप्लवः ॥२०॥
२०. क्षुधा से क्षीण जन-प्रेत-समूह-संकुल वह घोर दुर्भिक्ष विप्लव नरक¹ के प्रकार²
तुल्य लगता था ।

हैं । तुषार के आघात से बालें टूट जाती हैं । शीत
के कारण अधपकी शाली का पकना बंद हो जाता
है । वह नष्टप्राय हो जाती है । केवल पुवाल
तथा जीवनहीन शाली का दर्शन होता है ।
कश्मीर में उन दिनों कृषि तथा ऊनी वस्त्र के
अतिरिक्त और कोई उद्योग-धन्धा नहीं था ।
शाली, मक्का, तथा फल एकमात्र जीवन यापन के
साधन थे । कश्मीर उपत्यका में बाहर से आने
वाला मार्ग पंजाब तथा बाहरी क्षेत्रों से दुर्गम है ।
अन्न यदि बाहर से उन दिनों घोड़ों, बैलों पर लाया
भी जाता था, तो बहुत महँगा पड़ता था । गरीबों
के साधन के बाहर उनका खरीदना हो जाता था ।
अन्न सरलतापूर्वक अधिक मूल्य देने पर भी नहीं
मिल पाता था ।
कल्हण इसी ओर इस श्लोक में संकेत करता
है । आजकल के विकसित सड़कों, हवाई
जहाजों, ट्रकों तथा रेलवे से उस समय की परि-
स्थिति पर विचार करना ठीक नहीं होगा । इन
साधनों से, यह समय साधनहीन एक प्रकार से
हिमालय की कुक्षि में था । जहाँ सभी कुछ कठिनता
से प्राप्त हो सकता था ।
कल्हण ने शाली नष्ट होने पर, जीवन के सहारा
न प्राप्त होने पर कश्मीर मण्डल की क्या अवस्था
हुई थी उसी पर अगले श्लोकों में अकाल का हृदय-
स्पर्शी अत्यन्त कष्टगोलादक वर्णन किया है ।

पाठभेद :
श्लोकसंख्या २० में 'कुलाकुलः' का 'समाकुलः'
तथा 'प्रकारो' का 'प्राकारो' एवं 'प्रकरो' पाठभेद
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
२०. ( १ ) नरक : निरय शब्द का प्रयोग
यहाँ कल्हण ने किया है । उसका अर्थ नरक होता
है । स्वर्ग एवं नरक की कल्पना प्रायः सभी धर्मों
में प्राप्त होती है । स्वर्ग का विलोमार्थक नाम
नरक है । प्राचीन मान्यता के अनुसार मरणोत्तर
अधोलोक स्थान में या अवस्था में देव इत्यादि
द्वारा पापियों को उनके पाप तथा अपराधों का दण्ड
दिया जाता है। शीत प्रधान देशों में नरक की कल्पना
प्रायः हिमाच्छादित तथा उष्ण देशों में अग्नितप्त
लोकों में की गयी है । भारतीय मान्यता के अनु-
सार नरक दक्षिण दिशा अर्थात् यम की दिशा में
पाताल के निम्नतम भाग में माना गया है । लगभग
२८ नरकों की कल्पना की गयी है । यमराज
पाप पुण्य का निर्णय कर पापियों को विभिन्न नरकों
में भेजते हैं ।
ऋग्वेद में नरक का उल्लेख नहीं मिलता ।
ब्राह्मण काल में नरक की कल्पना मिलती है ।
अथर्व वेद में ( २ : १४ : २; ५ : १९ : ३ )
नरक स्वर्ग के विपरीत दम के क्षेत्र रूप में अभीष्ट
है । वहाँ राक्षसियों तथा व्यभिचारियों का

३९२ राजतरंगिणी

[बायाँ स्तम्भ]
आवास रहता है। जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण में
(४:२६:१) नरक का उल्लेख मिलता है
'मनो नरको वाङ्नरकः प्राणो नरकश्चक्षुर्नरका
श्रोत्रं नरकस्त्वङ्नरको हस्तौ नरको गुदं नरकः
शिश्नः नरकः पादौ नरकः' पुनः इसी ग्रन्थ में उल्लेख
मिलता है (४:२५:६) 'दश पुरुये स्वर्गनरकाणि
तान्येनं स्वर्गं गतानि स्वर्गं गमयन्ति नरकं गतानि,
नरकं गमयन्ति' ।
विष्णु तथा भागवत पुराण में नरकों का विशद
वर्णन मिलता है। भागवत पुराण (५:२६:५)
नरक त्रिलोक में है। दक्षिण दिशा तथा पृथ्वी के
नीचे किन्तु जल के ऊपर स्थित है। विष्णु पुराण
नरकों की स्थिति जल एवं स्थल दोनों के नीचे
मानता है। (२:६:१) नरकों की संख्या
निश्चित नहीं है। विष्णु पुराण ७ नरको की कल्पना
करता है। किन्तु भागवत में यह संख्या २८ तक
पहुँच गयी है।
प्रायश्चित स्वरूप यातनाओ के भोगने के स्थान
नरक के २८ नाम है (१) तामिस्र (२) अंध तामिस
(३) रौरव (४) महारौरव (५) कुंभीपाक (६) काल-
सूत्र (७) असिपत्रवन (८) सूकरमुख (९) अंध कूप
(१०) कृमि भोजन (११) संदंश (१२) तप्त सूरिम
(१३) वज्रकंटक शाल्मली (१४) वैतरणी (१५)
पूयोद (१६) प्राणरोध (१७) विशसन (१८) लाला-
भक्ष (१९) सारमेयादन (२०) अवीचि (२१) अयः-
पान (२२) क्षारकदम (२३) रक्षोगणभोजन (२४)
शूलप्रोत (२५) दंदशूक (२६) अवनिरोधन (२७)
पर्यावर्तन तथा (२८) सूचीमुख ।
सूर्यपुत्र यमराज नरक का शासन सूत्र चलाते
हैं। मरणासन्न प्राणी को यम के दूत संयमनी पुरी
में ले जाते हैं। चित्रगुप्त उनके पाप पुण्य का लेखा
जोखा उपस्थित करते हैं। पुण्यात्माओं को उनके
पुण्य फल भोगने के लिये स्वर्ग तथा पापियों को नरक
में भेजते हैं ।

[दायाँ स्तम्भ]
अपने कर्मों के अनुसार जिन्हें मुक्ति नहीं मिलती
ये पुण्य का फल स्वर्ग तथा पाप का फल नरक में
भोगकर पुनः पुण्य-पाप रूप कर्मों के साथ इस लोक
में जन्म लेते हैं।
यहूदी लोगों के नरक की कल्पना पुरातन बाइ-
बिल में है। उसे 'शिउल' कहते हैं। वह मृतात्माओं
का आवास है। ईसाई मान्यता के अनुसार मनुष्यों
की रचना से पूर्व भगवान् ने स्वर्गदूतों की सृष्टि
की थी। उन स्वर्गदूतों के एक वर्ग ने ईश्वर के
विरुद्ध विद्रोह कर दिया। वे विद्रोही नरकगामी
हुए। उनका नेता शैतान बन गया। इस नरक
अर्थात् हेल में पापी मनुष्य भी पहुँच जाते हैं।
मुसलमान लोग नरक को दोजख कहते हैं। यह शब्द
जहन्नुम अरबी शब्द का पर्याय है। यह वह स्थान
है जहाँ अग्नि धधकती रहती है। अल्लाह पर
विश्वास न लाने वाले तथा उसके आदेश को न
मानने वाले, दूसरे देवता की पूजा करने वाले दोजख
में जाते हैं। दोजख में दण्ड भोगने के पश्चात् वे
एराफ में भेज दिये जाते हैं। पारसी धर्म के नरक
की कल्पना के अनुसार यह उत्तर दिशा में अत्यन्त
शीतल स्थान है। उसे 'द्रजो देमन' ( द्रुजोश्मन )
कहते हैं। यह अत्यन्त दुर्गंध पूर्ण अन्धकारमय
असह्य शीतल क्रन्दनपूर्ण है।
(२) प्रकार: यहाँ कल्हण ने 'प्रकार' किंवा
'प्रकारो' शब्द का प्रयोग नरक के विशेषणरूप में
किया है। 'प्रकार' का पाठभेद 'प्राकारो' भी मिलता
है। श्रो स्टीन ने इसका अनुवाद नरक के एक
प्रकार किंवा भेद के अर्थ में किया है। श्रो पण्डित
ने प्रकार शब्द का अनुवाद 'स्ट्रोंग होल्ड अर्थात् दुर्ग'
किया है। प्राकार का अर्थ नगर की रक्षा के लिये
निर्मित परकोटा, चहार दिवारी अथवा शहर पनाह
होता है। अनेक अनुवादकों ने इस का विभिन्न अर्थ
किया है। मैंने मूल शब्द प्रकार ही रख दिया है।
प्रकार शब्द हिन्दी में प्रचलित और बोधगम्य है।

द्वितीय तरंग ३९३
पत्नीप्रीतिं सुतस्नेहं पितृदाक्षिण्यमातुरः ।
कुक्षिम्भरिः क्षुदुत्तप्तो विसस्माराखिलो जनः ॥२१॥
२१. कुक्षिम्भरि' एवं क्षुधातप्त निखिल आतुर जनों ने पत्नी-प्रेम, सुत-स्नेह तथा
पितृ समादर को विस्मृत कर दिया था।
क्षुत्तापाद् व्यस्मरल्लज्जामभिमानं कुलोन्नतिम् ।
अशनाहंक्रियाघ्रातो लोकोऽलक्ष्मोकटाञ्चितः ॥२२॥
२२. दारिद्र्य दृष्टि ग्रस्त एवं अशन हेतु ही क्रिया प्रवृत्त लोक, क्षुधा ताप से लज्जा,
स्वाभिमान, एवं कुल गौरव को विस्मृत कर दिया था।
क्षामं कण्ठगतप्राणं याचमानं सुतं पिता ।
पुत्रो वा पितरं त्यक्त्वा चकार स्वस्य पोषणम् ॥२३॥
२३. क्षाम' तथा कण्ठगत प्राण वाले याचना करते पुत्र को पिता ने, क्षामादियुक्त
पिता को पुत्र ने त्याग कर, अपना ही पोषण किया।
स्नाय्वस्थिशेषे वीभत्से स्वदेहेऽहंक्रियावताम् ।
अभूद्भोज्यार्थिनां युद्धं प्रेतानामिव देहिनाम् ॥२४॥
२४. स्नायु एवं अस्थि मात्रावशिष्ट वीभत्स स्वदेह निमित्त क्रिया करने वाले भोज्यार्थी
प्राणियों का प्रेतों तुल्य युद्ध होता था।
रूक्षाभिभाषी क्षुत्क्षामो घोरो दिक्ष्वक्षिणी क्षिपन् ।
एक एको जगज्जीवैरियेष स्वात्मपोषणम् ॥२५॥
२५. कटुभाषी, क्षुधा-क्षाम एवं भयंकर दिशाओं में दृष्टिपात करने वाला एक-एक
व्यक्ति जगत् जीवों से आत्म पोषण की इच्छा करता था।
तस्मिन्महाभये घोरे प्राणिनामतिदुस्सहे ।
ददृशे लोकनाथस्य तस्यैव करुणार्द्रता ॥२६॥
२६. प्राणियों के उस अति दुस्सह एवं घोर महाभय में केवल उसी लोकनाथ
(राजा) की करुणार्द्रता देखी गयी।
पादटिप्पणियाँ : मिलता है ।
२१ (१) कुक्षिम्भरि : उदर पूति की चिन्ता पादटिप्पणियाँ :
मात्र जिनको रहती है, उनको कुक्षिम्भरि अर्थात् २३ (१) साम : अत्यन्त दुर्बल, भूख से कृश
कुक्षि भरने वाला कहा जाता है । हुए, कंकाल मात्र प्राणियों के लिये क्षाम शब्द का
पाठभेद : प्रयोग किया गया है ।
श्लोक संख्या २२ में 'स्मरत्' का 'व्यस्मरन् तथा पाठभेद :
'लोकोऽलद्मी' का पाठभेद 'लोको लदमो' मिलता है। श्लोक संख्या २६ में 'मतिदुःसहे' का पाठभेद
: , श्लोक संख्या २३ में 'पुत्रो' का पाठभेद 'गुतो' 'मितिदुःसहे' मिलता है।
५०

३९४ राजतरंगिणी
निवारितप्रतीहारः स रत्नौषधिशोभिना ।
दर्शनेनैव दीनानामलक्ष्मीक्रममच्छिनत् ॥२७॥
२७. प्रतिहार¹ रहित उस राजा ने रत्नौषधि² के सदृश शोभायमान दर्शन मात्र से ही
दीनों के दारिद्र्य कष्ट को दूर किया ।
सपत्नीको निजैः कोशैः संचयैर्मन्त्रिणामपि ।
क्रीतान्नः स दिवारात्रं प्राणिनः समजीवयत् ॥२८॥
२८. अपने तथा मन्त्रियों के भी संचित कोषों द्वारा अन्न खरीदने वाले सपत्नीक उस
राजा ने रात-दिन प्राणियों को जीवित किया।
अटवीषु श्मशानेषु रथ्यास्वावसथेषु च ।
क्षुत्क्षामः क्ष्माभुजा तेन नहि कश्चिदुपेक्ष्यत ॥२९॥
२९. अटवी में, श्मशान में, रथ्या में, गृह में, किसी भी क्षुत्क्षाम¹ की उस राजा ने
उपेक्षा नहीं की ।
श्लोक संख्या २७ में 'शोभिना' का पाठभेद और औषधि, रत्न की ओषधि आदि अनुवाद किया
'शोभिनः' मिलता है। गया है। यह भ्रामक है।
पादटिप्पणियाँ : रत्नौषधि आयुर्वेद के अनुसार पार्थिव औषधि
२७ (१) प्रतिहार : इस शब्द का अर्थ द्वार- है। रत्न स्वतः औषधि होता है। ज्योतिष में ग्रहों
पाल, दरबान तथा साथ चलने वाला भृत्य होता है। की दशा ठीक करने के लिये विभिन्न प्रकार के रत्नों
यहाँ पर राजा की सज्जनता, सरलता, सहृदयता और को धारण करने की व्यवस्था की गयी है। इसी
वह प्रजा पीड़ा से कितना दुःखी हो गया था, इसका प्रकार आयुर्वेद के अनुसार विभिन्न बीमारियों से
उल्लेख कल्हण ने किया है। राजा बिना किसी के नीरोग होने के लिये रत्न पहनने का विधान किया
साथ लिये, अकेला अपनी प्रजा के पास जाता था । गया है। मेरे एक मित्र को पथरी की बीमारी थी ।
उनके दुःख में दुःखी होता था। दारिद्र्य पीड़ित प्रजा, उन्हें दहाने फिरंग पहनने को कहा गया। उससे
उसके दर्शन मात्र से सन्तोष प्राप्त करती थी । उन्हें अभूतपूर्व लाभ हुआ ।
यह स्मरण कराता है, महात्मा गान्धी की रत्नौषधि का कर्मकाण्ड में भी विधान है।
नोआखाली तथा पूर्वीय बंगाल सन् १९४७ ई० की मकान की नींव तथा कूप के तल में, घट में रत्नों
यात्रा का । महात्मा गान्धी एकाकी नाव पर, पैदल, को रखते हैं, उस पर मकान तथा कूप रचना करते
विपद ग्रस्त ताड़ित जनता में विचरण करते थे । हैं। इस रत्न की संज्ञा ही रत्नौषधि दी गयी है ।
उस महान् विभूति को देखकर अनायास विपन्न पूर्व पाठभेद :
बंगाल के हिन्दुओं में आत्मविश्वास तथा सन्तोष श्लोक संख्या २९ में 'दुपेक्ष्यत' का पाठभेद
उत्पन्न हो जाता था। 'ह्रपेक्ष्यते', 'दुपेक्ष्यत' तथा 'दुपेक्ष्यते' मिलता है।
(२) रत्नौषधि : अनुवादकों को रत्नौषधि के पादटिप्पणियाँ :
सम्बन्ध में भ्रम हुआ है। रत्नरुपी ओषधि, रत्न २९ (१) क्षुत्क्षाम : क्षुधा से दुर्बल, क्षुधा से
हतकाय अर्थ में इस शब्द का प्रयोग किया गया है।

द्वितीय तरंग ३९५
ततो निःशेषितधनः क्षीणानां वीक्ष्य मेदिनीम्।
क्षपायामेकदा देवीमेवमृचे स दुःखितः॥३०॥
३०. तदनन्तर धनहीन दुःखी उस राजा ने अन्न विहीन पृथ्वी को देखकर एक समय
रात्रि में देवी¹ (पत्नी) से इस प्रकार कहा-
देव्यस्मदपचारेण ध्रुवं केनाऽपि दुस्तरा।
जाता निरपराधानां जनानां व्यापदीदृशी ॥३१॥
३१. देवि ! निश्चय ही हमारे किसी दुस्तर दुष्कर्म के कारण निरपराध लोगों पर
ऐसी विपत्ति आयी है।
धिङ्मामधन्यं यस्याग्रे लोकोऽयं शोकपीडितः ।
पश्यन्नशरणामुर्वीमनुग्राह्यो विपद्यते ॥३२॥
३२. मुझ अधन्य को धिक्कार है कि जिसके सम्मुख, शरण रहित, पृथ्वी को देखते हुए,
अनुग्राह्य एवं शोक पीड़ित यह लोक विपत्ति ग्रस्त हो रहा है।
प्रजा निश्शरणा एता अन्योन्यं बान्धवोज्झिताः ।
अरक्षतो भयेऽमुष्मिन् किं कार्यं जीवितेन मे ॥३३॥
३३. परस्पर में बान्धवों को त्यागने वाली यह प्रजा शरण रहित हो रही है। इस महा-
भय में रक्षा न करने वाले मेरे इस जीवन से क्या प्रयोजन ?
यथाकथञ्चिल्लोकोऽयं दिनान्येतानि यत्नतः ।
मयाऽतिवाहितः सर्वो न च कोऽपि व्यपद्यत ॥३४॥
३४. यथा कथञ्चित् इतने दिनों तक यत्न पूर्वक मैंने इस सर्वलोक की रक्षा की
और कोई भी मृत नहीं हुआ ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ३० में 'ततो' का 'अतो' तथा
'दुःखितः' का पाठभेद 'सुदुःखितः' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
३० (१) देवी : राजा ने रानी को आदर
सूचक देवी शब्द का प्रयोग किया है। प्रकट होता
है। उसकी रानी उत्तम चरित्र वाली विदुषी,
तथा पति के कार्यों की सहायक थी। उचित सलाह
देती थी। आपत्तिकाल में धैर्य दिलाती थी। आदर्श
धर्मांगिनी थी। देवी का शब्दार्थ देवपत्नी, दुर्गा,
सरस्वती, अग्रमहिषी, पटरानी, पूज्य एवं प्रतिष्ठित
महिला होता है।
पाठभेदः
श्लोक संख्या ३१ में 'देव्यस्म' का पाठभेद
'देव्यस्स' मिलता है।
श्लोक संख्या ३२ में 'लोकोऽयं' का पाठभेद
'लोकेयं' मिलता है।
श्लोक संख्या ३३ में 'अरक्षतो' का पाठभेद
'अरक्षितो' तथा 'अरक्षिता' मिलता है।
श्लोक संख्या ३४ में 'वाहितः सर्वो' का पाठभेद
'वाहिताः सर्वे' तथा 'वारिताः सर्वे' मिलता है।

३९६ राजतरंगिणी
अतिक्रान्तप्रभावेयं कालदौरात्म्यपीडिता ।
निष्किञ्चनाऽद्य संजाता पृथिवी गतगौरवा ॥३५॥
३५. काल दौरात्म्य से पीड़ित तथा विगत प्रभाव वाली गौरव रहित यह पृथ्वी आज
निष्किञ्चन हो गयी है ।
तदिमाः सर्वतो मग्ना दारुणे व्यसनार्णवे ।
उपायः कतमस्तावत्समुद्धर्तुं क्षमः प्रजाः ॥३६॥
३६. अतएव चारों ओर से दारुण दुःख सागर में मग्न इस प्रजा का उद्धार करने
में कौन सा यत्न समर्थ है ?
निरालोको हि लोकोऽयं दुर्दिनग्रस्तभास्करः ।
कालरात्रिकुलैर्विष्वक्परीत इव वर्तते ॥३७॥
३७. सूर्य के दुर्दिन ग्रस्त होने के कारण प्रकाश रहित यह लोक, कालरात्रि कुलों
से सर्वतः मानो घिरा हुआ है ।
हिमसंघातदुर्लङ्घ्यक्षितिभृद्बद्धनिर्गमाः ।
बद्धद्वारकुलायस्थखगवद्विवशा जनाः ॥३८॥
३८. हिम संघात के कारण दुर्लङ्घ्य पर्वत से रुद्ध मार्ग वाले लोग अवरुद्ध द्वार युक्त
नीड में स्थित पक्षियों के सदृश विवश हो गये हैं।
शूराश्च मतिमन्तश्च विद्यावन्तश्च जन्तवः ।
कालदौरात्म्यतः पश्य जाता निहतयोग्यताः ॥३९॥
३९. 'देखो ! शूर, मतिमान् एवं विद्यायुक्त प्राणी काल कौटिल्य के कारण लुप्त योग्यता
वाले हो गये हैं ।
आशाः काश्चनपुष्पकुड्मलकुलच्छन्ना न काः क्ष्मातले
सौजन्यामृतवर्षिभिस्तिलकितं सेव्यैर्न किं मण्डलम् ।
पन्थानः सुचिरोपचाररुचिरैर्व्याप्ता न कैः संस्तुतै-
स्तेषामत्र न सन्ति निह्नुतगुणाः कालेन ये मोहिताः ॥४०॥
४०. इस पृथ्वी तलपर ऐसी कौन सी दिशाएं हैं जो स्वर्ण पुष्प कुड्मल समूह संकुल
नहीं हैं ? सौजन्यरूपी अमृत की वृष्टि करने वाले स्वामियों से कौन सा मण्डल शोभित नहीं
है ? चिर काल तक सेवा से शोभायमान एवं प्रशंसित किन लोगों से मार्ग पूर्ण नहीं हैं ? जो
छिपे हुए गुण वाले एवं काल से मोहित हैं; उन लोगों का ही गुण अब यहां नहीं है ?
श्लोक संख्या ३५ में 'संजाता' का पाठभेद श्लोक संख्या ३८ में 'हिमसंघातदुर्लङ्घ्य' का
'सम्पन्ना' मिलता है । 'हिमसंघातदुर्लभ' तथा 'जनाः' का पाठभेद 'जनः'
श्लोक संख्या ३७ में 'विष्वक्' का पाठभेद मिलता है ।
'विश्वक्' तथा 'विव्यक्ता' मिलता है । श्लोक संख्या ४० में 'काः' का 'कः'; 'सुचिरो-

द्वितीय तरंग ३९७
तदेष गलितोपायो जुहोमि ज्वलने तनुम् ।
न तु द्रष्टुं समर्थोऽस्मि प्रजानां नाशमीदृशम् ॥४१॥
४१. अतएव साधन रहित मैं, शरीर की आहुति देता हूं । क्यों कि प्रजा का इस
प्रकार नाश देखने में समर्थ नहीं हूं ।
धन्यास्ते पृथिवीपालाः सुखं ये निशि शेरते ।
पौरान्पुत्रानिव पुरः सर्वतो वीक्ष्य निर्वृतान् ॥४२॥
४२. वे पृथिवीपाल धन्य हैं जो सर्व प्रकार से सुखी पुरजनों को पुत्रवत् सम्मुख
देखकर सुख की नींद लेते हैं । सुख पूर्वक शयन करते हैं ।
इत्युक्त्वा करुणाविष्टो मुखमाच्छाद्य वाससा ।
निपत्य तल्पे निश्शब्दं रुरोद पृथिवीपतिः ॥४३॥
४३. ऐसा कहकर, करुणाविष्ट, पृथिवीपति वस्त्र से मुख ढककर, तल्पपर गिर,
निश्शब्द रोने लगा ।
निवातस्तिमितैर्दीपैरुद्ग्रीवैः कौतुकादिव ।
वीक्ष्यमाणाऽथ तं देवी जगाद जगतीभुजम् ॥४४॥
४४. उत्थित ग्रीवा वाले निश्चल दीपों से मानों कौतुक वश देखी जाती हुई
देवी, (रानी) तब उस पृथिवीपति से बोली—
पचार' का 'प्रचुरोपचार'; 'स्तेषामत्र' का 'रेषा- अपना निवास स्थान छोड़कर उत्तरो भारत में आ
मत्र' 'सन्ति' का 'वसन्ति' और 'ये' का पाठभेद 'ते' जाते थे । वहीं वे अपनी शक्ति, पौरुष एवं बुद्धि का
मिलता है । परिचय देते थे । निवास करते थे । इस प्रकार का
पादटिप्पणियाँ : उल्लेख पुनः कल्हण ने तरंग ८:२२२७ में किया है।
४० (१) अनुवादको ने अन्य प्रतियोको आधार पाठभेद :
मानकर अनुवाद किया है अतएव अन्तिमपद का
अनुवाद पाठभेद के कारण इस प्रकार होगा- श्लोक संख्या ४१ में 'गलितोपायो' का पाठभेद
'गलिताशयो' मिलता है ।
'जिनका गुण छिपा है तथा जो काल से मोहित
है, वही यहाँ निवास करते हैं ।' श्लोक संख्या ४३ में 'निश्शब्दं' का पाठभेद
कल्हण ने इस श्लोक में शिक्षित, विद्वानों 'निश्शंकु' मिलता है ।
सुसंस्कृत एवं कलाविद् कश्मीरियो पर अकाल का श्लोक संख्या ४४में 'निवात' का 'निर्वातः' तथा
क्या प्रभाव पड़ा था, वर्णन करता है । त्रस्त काश्मीरी 'भुजम्' का 'पतिम्' पाठभेद मिलता है ।

३९८ राजतरंगिणी
राजन्प्रजानां कुकृतैः कोऽयं मतिविपर्ययः ।
येनेतर इव स्वैरमधीरोचितमीहसे ॥४५॥
४५. 'हे राजन् ! प्रजाओं की कुकृतियों से यह कौन सा मतिविपर्यय हो गया है ?
जिससे इतर जन की तरह अधीरोचित स्वेच्छा-वृत्ति की कामना कर रहे हैं ?
यद्यसाध्यानि दुःखानि छेतुं न प्रहविष्णुता ।
तन्महीपाल महतां महत्त्वस्य किमङ्कनम् ॥४६॥
४६. हे महीपाल ! असाध्य दुःखों को दूर करने के लिये, यदि असमर्थता है, तो
बड़े लोगों के महत्त्व का चिह्न ही क्या ?
कः शक्रः कतमः स्रष्टा वराकः कतमो यमः ।
सत्यव्रतानां भूपानां कर्तुं शासनलङ्घनम् ॥४७॥
४७. 'इन्द्र' कौन है ? स्रष्टा$^२$ कौन-? बेचारा यम$^३$ कौन-? जो कि सत्यव्रती
नृपों के शासन का उल्लंघन कर सके ?
श्लोक संख्या ४५ में 'कुकृतैः' का पाठभेद
'सुकृत्यैः' मिलता है ।
श्लोक संख्या ४७ में 'भूपानां' का 'भूतानां'
तथा 'शासनलङ्घनम्' का पाठभेद 'शासनलङ्घनाम्'
तथा 'न प्रमविष्णुता' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
४७ (१) इन्द्र : इन्द्र का सर्वाधिक दर्शन वेद
में मिलता है । वैदिक आर्यों के ओजपूर्ण देवता इन्द्र
हैं । इन्द्र ने मेघों को विदीर्ण किया था । इनके लिये
त्वष्टा ने वज्र बनाया था । इन्द्र ने स्रष्टा, सूर्य,
द्यु तथा उषस को उत्पन्न किया है । वृत्रासुर का वध
किया है । जल एवं नदियां प्रवाहित किया है ।
गायों तथा सोम को जीता है । दस्यु का संलक्षण
किया है । ऋग्वेद (१:३३ : १४-१५) ।
साम गानसे इन्द्र को स्फूर्ति प्राप्त होती है ।
आंगिरस तथा इन्द्र एक साथ रहते हैं ।
(सा० १ : ११) वृहि को मार कर सात
सिन्धु को मुक्त किया था । (ऋ०: २: १२)
इन्द्र की उपासना न करने वालों को अनिन्द्र कहा
जाता है । उनकी निन्दा की गयी है । (ऋ०७:१२:
१६) ।
प्रत्येक मन्वन्तरों में इन्द्र की कल्पना की गयी
है। इन्द्र भूः, भुवः एवं स्वः तीनों लोकों का
अधिपति है । एक सौ यज्ञ करने पर इन्द्रत्व की प्राप्ति
होती है। यद्यपि इनके मन्त्रणा दायक हैं । इन्द्र की
पौराणिक कल्पनायें परस्पर भिन्न है । इनका उल्लेख
गरुड़, वृत्त वध, त्रिपुर, सुकर्माख्यान, यज्ञविर्भाग
महताख्यान, सागर मंथन, वृत्रोत्पत्ति, ब्रह्म-
हत्या, मुच्वित्त, पुरंजय वाहन, जयापजय, यज्ञ,
हवनादि, के सन्दर्भ में आता है । इन्द्र के सम्बन्ध में
भारतीय साहित्य में इतनी गाथायें हैं कि उनका
संकलन स्वतः एक विशाल ग्रन्थ का रूप ले लेगा ।
(२) स्रष्टा:—सृष्टि के रचयिता, सर्जन एवं
निर्माण करने के अर्थ में स्रष्टा शब्द का प्रयोग किया
जाता है । यह शब्द ब्रह्मा के लिये प्रयुक्त किया
गया है । परन्तु अनेक स्थलों पर ब्रह्मा विष्णु तथा
शिव के लिये एक साथ प्रयुक्त किया गया है।
महाभारत के अनुसार ब्रह्मा के शरीर से देवता,
ऋषि, नाग एवं असुरों का निर्माण हुआ था । उन चारों

द्वितीय तरंग १९९

प्राणियों को ब्रह्मा ने 'ॐ' का उपदेश दिया था ।
( म० धारव० २६:८ ) पद्म पुराण के अनुसार ब्रह्मा
के हृदय से बकरी, उदर से गाय, भैसादि ग्राम्य पशु
समूह, तथा पद से अश्व, गधा, ऊँट आदि वन्य पशु
उत्पन्न हुए थे । मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा के
दक्षिण अंगूठा से दक्ष, हृदय से मदन, अधर से लोभ,
अहंभाव से मद, नेत्र से मृत्यु, स्तनाग्र से धर्म, भ्रूमध्य
से क्रोध, बुद्धि से मोह, कंठ से प्रमोद, हथेली
से भरत, एवं शरीर से सतरूपा नामक पत्नी उत्पन्न
हुई थी । मत्स्य पुराण एवं महाभारत के अनुसार
ब्रह्मा के शरीर से मृत्यु नामक नारी उत्पन्न
हुई थी । ( म० द्रो०:१:म:१५० )

पुराणों के अनुसार ब्रह्मा के चार मुखों से वेदों
तथा समस्त वैदिक साहित्य एवं ग्रन्थों का निर्माण
हुआ था । ब्रह्मा के, पुराणों के अनुसार, चतुर्मुख हैं ।
(१) पूर्व मुख से गायत्री छंद, ऋग्वेद, त्रिवृत रथन्तर
एवं अग्निष्टोम, (२) दक्षिण मुख से-यजुर्वेद,
पंचदश ऋक् समूह, बृहत्साम, एवं उक्थ यज्ञ, (३)
पश्चिम मुख से-सामवेद, सप्तदश ऋक्समूह, वैरूप
साम, एवं अतिरात्र यज्ञ, एवं (४) उत्तर मुख से-
अथर्ववेद, एकविंश ऋक् समूह, आप्तोयम अनुष्टुप्
छन्द एवं वैराज साम उत्पन्न हुए थे ।

ब्रह्मा के मानस पुत्र, मरीचि, अग्नि, अंगिरस,
पुलस्त्य, पुलह, ऋतु, दक्ष, भृगु एवं वसिष्ठ थे ।
( ब्रह्म० ब्रह्माण्ड:२:९ )

महाभारत में सृष्टि निर्माण का क्रम दिया गया
हैं । शंकर ने यज्ञ किया । ब्रह्मा ने अपने वीर्य की
आहुति दी । उस यज्ञ से प्रजापतियों का जन्म
हुआ । ( म० अनु० ८५:९९-१२० ) पद्म पुराण
और प्रकार उपस्थित करता है । सर्वप्रथम तमोगुणी
प्रजा उत्पन्न हुई । वह पांच प्रकार यथा-तम,मोह,
महामोह, तामिस्र एवं अन्धतामिस्र थी । तत्पश्चात्
आठ सृष्टियो का निर्माण किया उनमें उत्पन्न
प्राणी-तिर्यक् स्रोतस् (पशु), ऊर्ध्वस्रोतस् (देव) अर्वाक्,
स्रोतस् (मानव) अनुग्रह, भूत, प्राकृत, वैकृत, एवं
कौमार थे । देव राक्षस किन्नर मनुष्य यक्ष एवं पिशाच
गणों की उत्पत्ति ब्रह्मा ने मनःसामर्थ्य से की थी ।
ब्रह्मा का प्रथम शरीर तमोगुणी था । उसके जघन
से असुरों का निर्माण हुआ । तमोगुण का त्याग कर
ब्रह्मा ने सतोगुणी शरीर धारण किया । परित्याग
किये तमोगुणी शरीर से रात्रि का निर्माण हुआ ।
सतोगुणी शरीर से देवों का निर्माण हुआ । इस
शरीर का भी ब्रह्मा ने त्याग किया । इससे दिन की
उत्पत्ति हुई । इसके तृतीय शरीर से पितर उत्पन्न
हुए । उसके त्यक्त भाग से सन्ध्या काल का जन्म
हुआ । ब्रह्मा के चतुर्थ शरीर से मानवों की उत्पत्ति
हुई । उसके त्यक्त भाग से उषा काल का निर्माण
हुआ । इसके पाँचवें शरीर से यक्ष एवं राक्षस
उत्पन्न हुए ।

(३) यमः- यम के पिता वैवस्वत तथा माता
सरण्यू थी यम यमी दोनों युगल सन्तान थे (ऋ० १०
१४:१७:१०:१४.१) उन्हें यमो मिथुनौ, कहा जाता
है । जुड़वा के अर्थ में प्रयुक्त होता है । यम यमी एक
साथ जुड़वा पैदा हुए थे । [ऋ० १:६६:४:१:२६४
:१५:२:३९:२] यम वैदिक काल से मृत्यु के देवता
माने गये हैं [ १:१६५:४ ] वे पहले प्राणी हैं।
जिनकी मृत्यु हुई थी [ अ० १८:३:१३ ] ऋग्वेद में
यम यमी का संवाद प्रसिद्ध हैं । उसमें भाई एव बहन
के विवाह का निषेध किया गया है। मृतकों को
विश्राम स्थान प्रदान करता है । ( ऋ० १०:१४
:१८ तथा १०:१६) वह प्रथम मनुष्य था (अ०
८:३:१३ ) यमको दक्षिण दिशा का राजा कहा गया
है ( श. ब्रा० २:२:४:२ ) यम के दूत दो श्वान हैं।
उनके चार नेत्र हैं । उनकी नासिका चौड़ी है ।
उनका नाम उलूक तथा कपोत है । [ऋ० १०:१६५
:४ ) उन्हें शबल एवं उदुंबल भी कहा गया है ।
(ऋ० १०:१३:४ )

वेदों के पश्चात् यम का रूप बदलता गया है ।
उसे विवस्वत् तथा संध्यापुत्र कहा गया है
(ह-वं १:९:४ मार ७४:७मा० ६:३:४०) यमके बरवों

४०२ राजतरंगिणी
वर्षैः षट्त्रिंशता शान्ते पत्यौ विरहजो ज्वरः ।
तत्यजे ज्वलनज्वालानलिनप्रच्छदे तया ॥ ५६ ॥
छत्तीस वर्षों के साथ पति के गत हो जाने पर, उसने विरह ज्वर को अग्नि की ज्वाला
रूपी नलिन२ प्रच्छद पर त्याग दिया।

नाम कँमूह है। यह आदविन परगना में एक बड़ा
गाँव है। विशोका नदी के वाम पश्चिम तट पर
स्थित है। ग्राम की सबसे बड़ी मुस्लिम जियारत
के समीप सितम्बर सन् १८९५ ई० में थीस्टीन को
मन्दिर के भग्नावशेष के बड़े पत्थर दिखाई पड़े थे।
विजयेश्वर से दक्षिण दिशा में लगभग ७ मील
दूर स्थित है। इसके पूर्व विशाका नदी, पश्चिम में
तरीगाम, वचरू, उत्तर में ब्रजल्रू और दक्षिण में
छोटा नाला है।
(२) रामुष : वर्तमान ग्राम सुपियान और
श्रीनगर की मुख्य सड़क पर मध्य मार्ग में रामुह
नाम से स्थित है। कुछ समय पहले दर ब्राह्मणों
को यह जागीर थी। यह श्रीनगर का प्रसिद्ध ब्राह्मण
वंश था। अक्तूबर सन् १८९१ ई० में थीस्टीन को
ग्राम के नाग के समीप बहुत सी प्राचीन मूर्तियाँ
मिली थी। कल्हण ने राजतरंगिणी में इस ग्राम का
पुनः वर्णन तरंग ८ श्लोक २८१३ में किया है।
यह स्थान छोटी नदी रामषू के पश्चिम अर्थात्
वाम तट पर है। यह नदी उत्पलपुर के समीप
वितस्ता में मिल जाती है। दक्षिण में मीरगुन्ड
उत्तर में पोरगपुर, पश्चिम में चरार पड़ता है।
पूर्व में नदी पर मितरगम, तथा जेगम अर्थात्
जेगार है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ५६ में 'ज्वलन' का पाठ भेद
'दलन' मिलता है।
५६ (१) अग्नि ज्वाला : रानी का राजा के
साथ अथवा पत्नी का पति के साथ सती होने का
यह सर्व प्रथम उदाहरण राजतरंगिणी में प्राप्त होता
है। कश्मीर के इतिहास में जहाँ तक अध्ययन कर

सका हूँ यह सप्रमाणिक प्रथम उदाहरण है। इसके
पूर्व राजाओं के साथ रानियों तथा किसी और दूसरी
महिला के सती होने का उल्लेख नहीं मिलता।
कश्मीर में सती प्रथा का आरम्भ एक प्रकार से यही
से होता है। यह समस्त हिन्दू, मुसलिम तथा लार्ड
विलियम वैंटिंग के शासन के समय तक भारत में
चलता रहा।
सम्राट् अकबर ने सती प्रथा को गैर कानूनी
ठहराया था। राजाज्ञा से बन्द कर दिया था।
राजा जलोक ने स्वेच्छया सपत्नीक स्वर्गारोहण
किया था। अतएव उसे सती प्रथा का कश्मीर में
आरम्भ काल कहना उचित नहीं है।
वैदिक काल में सती प्रथा का स्पष्ट उल्लेख नहीं
मिलता। यह विषय अत्यन्त विवादास्पद है। वेद
सती प्रथा को मान्यता देता है या नहीं। मैने
अपनी पुस्तक 'वेद क्या' लिखते समय ऋग्वेद का
पूरा अध्ययन किया परन्तु मुझे कही सती प्रथा का
स्पष्ट उदाहरण नही मिला।
एक प्रथा निसन्देह वैदिक काल में प्रचलित थी।
दिवंगत पति के साथ विधवा चिता के समीप जाती
थी। कहीं-कहीं उदाहरण मिलता है। शव के
साथ भी जाती थी। तत्पश्चात् मृत व्यक्ति का भाई
अथवा अन्य सम्बन्धी उसे उठाता था। साथ लोटा
लाता था। विवाह कर लेता था। आज भी पंजाब
के जाटों में यह प्रथा प्रचलित है। छोटा भाई बड़े
भाई की विधवा स्त्री को स्त्रीवत् रख लेता है।
अनेक जातियों में यह प्रथा अभी तक प्रचलित है।
देवी पार्वती सती रूप से दक्ष यज्ञ में प्राण दे
दी थी। सती होने के पश्चात् वह उमा हो गयी।
इससे सती नाम तथा सती होने की महत्ता बढ़ गयी।

द्वितीय तरंग ४०३

सती उस समय से पवित्र समझी जाने लगी।
यह प्रथा आदिम जातियों से आरम्भ हुई है। मृत
के साथ स्त्री भी स्वर्ग जाए ताकि उनका वहां
मिलन होता रहे अथवा वह पति की स्वर्ग में इस
लोक की तरह सेवा करती रहे, उनका साथ न छूटे,
इसलिये मुख्यतः राजा के कब्र में उनकी रानियां,
राजा के पार्षद, अस्त्र-शस्त्र, अश्व, भोज्य तथा अन्य
दैनिक जीवनोपयोगी सामग्रियां गाड़ दी जाती थी।
इसलिये उन्हें गाड़ दिया जाता था कि परलोक में
दिवंगत के साथ रहकर उसे सुख पहुँचाती रहे।
चीन में यह प्रथा बहुत समय तक प्रचलित थी। यहाँ
की समाधियो में दिवंगत के शव के साथ इस प्रकार
की गढ़ी स्त्रियाँ आदि मिली है।
यूरोप मे भी यह प्रथा प्रचलित थी। दियोदोरम
सिकुलस, स्ट्राबों तथा सन्त जेरामो ईसा पूर्व चौथी
शताब्दी में इस प्रथा के प्रचलित रहने का उल्लेख
करते हैं।
कालान्तर में सती की पूजा होने लगी। मेवाड़
में गाँव गाँव में सतियों का चौरा दिखायी पड़ेगा।
काशी में श्मशान तथा अन्य स्थानों पर सती का चौरा
बना दिखायी पड़ता है। सती के चौरा की पूजा होती
रहेगी इस मानवीय गर्व मिश्रित दुर्बलता के कारण
स्त्रियाँ स्वतः सती हो जाती थी। यह पुण्य कार्य माना
जाने लगा। पति भक्ति की यह चरम सीमा आँकी
गयी। मान्यता मिलती थी कि सती होने वाली स्वर्ग
जाती है। स्वर्ग प्राप्ति की कामना इस प्रथा को मजबूत
बनाने में सहायक हुई थी। यह यहाँ तक बढ़ गयी
थी कि यदि पति कही दूर मर जाता था तो पत्नी
अकेली स्वतः सती हो जाती थी।
बौद्धो ने सती प्रथा को प्रोत्साहित नही किया
था। जैन धर्म मे सती होने की प्रथा नही है।
राजपूतों में यह प्रथा विशेष रूप से प्रचलित थी।
राजपूत वीर शत्रु सेना की प्रबल शक्ति देख-
कर जौहर करते थे। घर में स्त्रियां अपने बच्चों
को गोद में लिये सती हो जाती थी। चित्तौर में

सहस्त्रों की संख्या में सामूहिक रूप से महिलायें
मुस्लिम आक्रामकों से अपनी पवित्रता की रक्षा करने
के लिये अनेक बार सती हो गयी है। जगत् में सबसे
अधिक महिलाएँ मेवाड़ में सती हुई हैं। यहाँ सती के
स्मारक बिखरे पड़े हैं। मुख्यतः प्रवेश द्वारों पर जहां उनके
पति शत्रुओं से लड़ते वीर गति को प्राप्त हुए थे।
चित्तौर दुर्ग में रानी पद्मिनी सहस्रो महिलाओ के साथ
अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय जिस भूश्याक
पर सती हुई थी वहीं मैंने अपनी आँखों से देखा है कि
पत्थर अग्नि ज्वाला में फट गये हैं तथा धूयें के काले
चिन्ह वर्तमान हैं।
ब्रिटिशराज भारत में स्थापित होने के पश्चात्
लार्ड विलियम बैण्टिक ने चार दिसम्बर सन् १८२० ई०
को सती तथा सती होने के सहायक होने वालों को
दण्डनीय घोषित कर सती प्रथा को अवैधानिक कार्य
करार दिया था। उस समय से यह प्रथा बंद हो
गयी है। तथापि कभी न कभी किसी महिला के सती
होने का समाचार प्राप्त होता रहता है।
तथापि सन् १८३९ ई० में पंजाब के सिख
राजा रणजीत सिंह के साथ उनकी ३६ विधवाएँ
सती हो गयी थी। केवल रानी जिन्दा अपने छोटे
बच्चे के लालन पालन करने के व्याज से सती न
हो सकी थी।
सन् १८२१ ई० में जिस वर्ष सती सम्बन्धी
कानून बना ५७५ विधवायेँ बंगाल और केवल
कलकत्ता की सीमा में ३१०, स्त्रियां सती हो गयी
थी। उनमें १०१ साठ वर्ष; २२६ चालीस से साठ वर्ष;
२०८ बीस से चालीस वर्ष तथा ३२ महिलायें बीस
वर्ष उम्र तक की थी।
सन् १७७७ ई० में राणा जंगबहादुर की पिता
के साथ नेपाल में उनकी अनेक रानियां सती हो
गयी थी। नेपाल में यह प्रथा बीसवी शताब्दी के
प्रारम्भ तक दिखायी पड़ती है।
निस्सन्देह विश्व की अनेक जातियों के इतिहास
इस प्रथा के साक्षी हैं। महान् व्यक्तियों की चिता

४०४ राजतरंगिणी
सा यत्र शुचिचारित्रा विपन्नं पतिमन्वगात् ।
स्थानं जनैस्तद् वाक्पुष्टाटवीत्यद्यापि गद्यते ॥ ५७ ॥
५७. पवित्रचरित्रा उसने जहां दिवंगत पति का अनुगमन किया था, उस स्थान को
लोग आज भी वाक्पुष्टाटवी' नाम से कहते है।
के साथ, पत्नियों, दास, पशु, स्नेही, अस्त्र-शस्त्र,
अश्वादि जला दिये जाते थे अथवा मारकर अथवा
जीते जी कब्र के साथ गाड़ दिये जाते थे।
ब्रह्मपुराण, व्यास स्मृति तथा अथर्ववेद का सम-
र्थन सती प्रथा के पक्ष में लिया जाता है। किन्तु
वह अत्यन्त क्षीण समर्थन स्रोत प्रमाणित हुआ है।
भगवान् मनु ने सती होने के लिए कहीं नहीं
लिखा है।
आधुनिक युग में सती शुद्ध रूप से नही परन्तु
प्रेमिकायें जो प्रेमी को पति स्वरूप मानती थी उनके
साथ प्राण त्याग दी है। जर्मनी के अधिनायक
हिटलर की आत्महत्या के समय उसकी प्रेमिका इवा
ब्रौ ने भी एक साथ एक मुहूर्त में आत्म हत्या
की थी। दोनों का शव एक साथ एक ही स्थान
पर फूंका गया था।
इसी प्रकार इटली के अधिनायक बेनितो
मुसोलिनी की प्रेमिका जो उनके साथ थी। उनके
साथ ही गोली से मार दी गयी थी। उसने मुसोलिनी
के साथ ही मरना पसन्द किया था। भावना सती
प्रथा तथा अन्य दोनों उदाहरणों से एक ही प्रकार
की है।
५६ (३) नलिन: कल्हण ने चिता की
ज्वाला को उपमा नलिन से दी है। कश्मीर में
नलिन अर्थात् कुमुदिनी का रेशा शीतलता लाने के
लिए प्रयोग किया जाता है। अधिकतरया उसका लेप
करते हैं। कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तल में इस
प्रकार के प्रयोग का वर्णन किया है।
कल्हण ने अग्नि ज्वाला को नलिन जैसा शीतल-
प्रद बताया है। रानी के विरह ज्वर की उष्णता
नलिन प्रच्छद पर जाने से शीतल हो गयी थी।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या ५७ में 'शुचिचारित्रा' का पाठभेद
'शुचिचारित्र्या' तथा 'शुचिदारिद्रा' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
५७ (१) वाक्पुष्टाटवीः वाक्पुष्टा अटवी
कहां हैं। इसका पता नहीं चलता। जोनराज ने
वाक्पुष्टा अटवी का उल्लेख अलाउद्दीन (अल्लेश्वर)
के सम्बन्ध में किया है। इसके समीप एक गिरिगुह्वर
में एक डायन के होने का वर्णन किया है। जिससे
अलाउद्दीन का सामना हुआ था। अतएव यह स्थान
किसी पर्वत के समीप रहा होगा। जोनराज ने
वाक्पुष्टाटवी का उल्लेख किया है। (जोन राज श्लोक
३४३) उससे प्रकट होता है कि उसके समय तक उस
स्थान का महत्त्व था तथा लोगों में धुंधली स्मृति उस
घटना की शेष रह गयी थी।
राजपुत्रः स वाक्पुष्टाटवीं लोलारमाददन् ।
योगिनीचक्रमद्राक्षीत् कदाचिद्गिरिगह्वरे ॥३४६॥
पं० गोविन्द कोल के अनुसार यह स्थान सुहृ-
नर वाव परगना में वुट्टर ग्राम होना चाहिए। इस
स्थान पर गुलाव गढ़ दर्रा के पर्वत बाहमूल से होकर
पहुंचते हैं। श्री स्टीन ने इस स्थान की यात्रा सित-
म्बर सन् १८९१ में की थी। किन्तु वहाँ पर
उन्हें स्थानीय लोगों में उक्त कथा के विषय में कुछ
जानकारी नहीं मिल सकी।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या ५८ में 'नानापवागता' का पाठभेद
'नानागतरथागता' मिलता है।

द्वितीय तरंग ४०५
चारुचारित्रिया तत्र तया सत्रेऽवतारिते ।
नानापथागतानाथासार्थैरद्यापि भुज्यते ॥ ५८ ॥
५८. सच्चरित्रा उस देवी द्वारा वहाँ स्थापित सत्र¹ में नाना पथों से आये अनाथ
आज भी भोजन करते हैं ।
आभ्यामभ्यधिकं कर्तुं शक्तिः कस्येति निश्चितम् ।
विचिन्त्यारोचकी धाता नापत्यं निर्ममे तयोः ॥ ५६ ॥
५९. इन दोनों से अधिक करने की निश्चय ही किस की शक्ति है ? यह सोचकर
अरोचकी विधाता ने उन दोनों के लिये सन्तति का विधान नहीं किया ।
वेधाः परां धुरमुपैति परीक्षकाणा-
मिच्छोः फलप्रजनने न कृतश्रमो यः ।
विस्मारितोद्धुरसुधारसयोग्यतात् तत्
तस्मादुदेत्य किमियाभ्यधिकं विदध्यात् ॥ ६० ॥
६०. विधाता परीक्षकों की पराकाष्ठा को प्राप्त होता है, जिस ने इक्षु¹ के फल देने
में परिश्रम नहीं किया । सुस्वादु सुधा रस को भी विस्मरित कर देने की योग्यता वाले,
उससे बढ़कर और वह क्या कर सकता था ।
पादटिप्पणियाँ :
५८(१) : सोम यज्ञ का समय जो १३
से १०० दिनों के अन्दर पूर्ण होता है उसके लिये
प्राचीन समय में यह शब्द प्रयुक्त किया जाता था ।
इसका अर्थ आश्रय स्थान, शरण स्थान तथा वह
स्थान है, जहाँ गरीबों को भोजन दिया जाता है ।
अतिथणी तथा सत्र में सूक्ष्म भेद है । सत्र प्रायः
उसी दान के लिए प्रयुक्त होता है जहाँ गरीबों को
बना भोजन दिया जाता है जैसे लंगर अथवा
क्षेत्र । काशी में क्षेत्र विद्यार्थी तथा संन्यासियों का
मुफ्त भोजन स्थान है । सत्र और क्षेत्र समानार्थक
हैं । कहावत है—क्षेत्रे भोजं मठे निद्रा ।
पादटिप्पणियाँ
राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ४२वाँ श्लोक है।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या ६० में 'सुवारस' वा 'मुदारम्',
'मुदारस', 'मुधारम्'; 'योग्यत्वात्' का 'योग्यतात्',
'योग्यता तु', 'योग्यता तत्', 'योग्यतः तत्' 'योग्य-
तात्तान' तथा 'दुदेत्य' का पाठभेद 'उत्पादयित्वा'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ
राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह ४३ वाँ श्लोक है ।
६०. (१) इक्षु : इसे ईंख और पूर्वी उत्तर-
प्रदेश तथा बिहार में ऊख कहते हैं । दोनों ही शब्द
इक्षु के अपभ्रंश हैं । इक्षु शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख
अथर्ववेद (१ : ३४ : ७) में प्राप्त होता है । तत्प-
श्चात् संहिताओं में भी उल्लेख मिलता है । (मै
सं. : ३ . ७ : ९; ४ : २ : ९; वा. स. २५ : १ :
मै. सं : ३ : १६ : १; तथा कठक अश्वमेध ३ :
८ ) वैदिक साहित्य से यह पता नही चलता कि इसको
खेती होती थी अथवा यह वन में उत्पन्न होता था ।
कश्मीर की उपत्यका किंवा वादी में ईख
प्रायः नहीं होती है । इसकी पैदावार इस समय
जम्मू काश्मीर राज्य के जम्मू प्रदेश में तहसील रन-
बीर सिंह पूरा में खूब होती है । इस समय यहाँ
६ हजार एकड़ में ईख की खेती होती है । जम्मू के