राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
५४२ राजतरंगिणी यान्यक्षराण्यन्तरेण वाच्यं वक्तुं न पार्यते । का गतिस्तदु दाने मर्यादोल्लङ्घनं विना ॥३०६॥ ३०९. 'जिन अक्षरों को कहे बिना अभिप्राय व्यक्त नहीं होता, उसे प्रकट करने में मर्यादा उल्लंघन के अतिरिक्त और कौन गति है ? अतः परुषमप्यद्य किंचिदेव मयोच्यते । अव्याजाजैवमप्येतदायैत्वमवधीर्यते ॥३१०॥ ३१०. 'अतएव आज मैं कुछ परुष (शब्द) कहता हूँ यद्यपि (इससे) निष्कारण सरलतामयी भद्रता' तिरस्कृत हो रही है। सर्वः स्मरति सर्वस्य प्रगवस्थासु लाघवम् । आत्मैव वेत्ति माहात्म्यं वर्तमाने क्षणे पुनः ॥३११॥ ३११. 'पूर्व स्थितियों में सब लोग सभी लोगों के लाघव का स्मरण करते हैं, किन्तु वर्तमान क्षण में माहात्म्य (गौरव) को आत्मा ही जानती है । पूर्वावस्था मदीया ते त्वदीया या च मे हृदि । ताभ्यां विमोहितावावां न विद्मोऽन्योन्यमाशयम् ॥३१२॥ ३१२. "मेरी पूर्वावस्था आपके एवं आपकी मेरे हृदय में है । उनसे विमोहित हम दोनों एक दूसरे का आशय नहीं जानते हैं। राजा भूत्वा कथ मादृक्प्रतिगृह्णातु संपदः । कथमेकपदे सर्वमौचित्य परिमार्जतु ॥३१३॥ ३१३. "राजा होकर मुझ सदृश जन सम्पत्तियों कैसे ग्रहण करें ? सब औचित्य एका- एक (सहसा) कैसे परिमार्जित (नष्ट) कर दें ?
पाठभेद : करना उचित समझा है । श्लोक संख्या ३०९ में 'यान्यक्षरा' का पाठभेद ३११ (१) राजतरंगिणी सूक्ति सग्रह का यह 'यान्यक्षारा' मिलता है । ८०वां श्लोक है । पादटिप्पणियाँ : ३१३ (१) राजा : राजा किसी का अनुग्रह द्वारा ३१० (१) भद्रता : कल्हण ने 'आर्यत्व' शब्द प्रदत्त दान सहसा नहीं ग्रहण करता । राजा दान का प्रयोग यहाँ किया है। उसका अनुवाद 'भद्रत्व' देता है। दान लेता नहीं है। यह पुरानी परम्परा उचित बैठता है। मैने आर्य का अर्थ यहाँ भद्र ही है। इस श्लोक में यही भाव निहित है।
५४३ तृतीय तरंग असाधारणमौदार्यमाहात्म्यं तस्य भूपतेः । भोगमात्रकृते मादृक्किं साधारणतां नयेत् ॥ ३१४ ॥ ३१४. 'उस नृपति के असाधारण औदार्य माहात्म्य को भोग मात्र के लिये, क्या साधारण कर दूँ ? अपि च स्पृहयालुः स्यां भोगेभ्यो यदि भूपते । ध्रियमाणेऽभिमाने मे केन ते विनिवारिताः ॥ ३१५ ॥ ३१५. 'भूपते ! यदि मैं भोगों' के लिए इच्छा करूँ, तो मेरे स्वाभिमान के रहते, उन्हें (भोगों को) कौन रोक सकता है ? यन्ममोपकृतं तेन तद्विना प्रत्युपक्रियाम् । जीर्णमेवाधुनाऽङ्गेषु प्रभवत्वेष निश्चयः ॥ ३१६ ॥ ३१६. 'उसने मेरा जो उपकार किया है, वह बिना प्रत्युपकार के यह निश्चय है कि अब (मेरे) अंगों में जीर्ण हो जायगा । या गतिर्भूर्भुजोऽमृष्य मया तामनुगच्छता । पात्रापात्रविवेकत्वख्यातिर्नैषा प्रकाश्यताम् ॥ ३१७ ॥ ३१७. “उस भूभुज का जो आचरण था उसका अनुसरण करने वाले मुझे पात्रापात्र विवेकशीलता की ख्याति प्रकाश में लानी चाहिये । एतावत्येव कर्तव्ये यातेऽस्मिन्कीर्तिशेषताम् । भोगमात्रपरित्यागाद्विदध्यां सत्यसंघताम् ॥ ३१८ ॥ ३१८. 'इतना ही कर्तव्य कर इसके दिवंगत हो जाने पर (कीर्ति शेष) अब भोग मात्र के परित्याग से अपनी सत्यसंधता सिद्ध करूँगा ।" इत्युक्त्वा विरते तस्मिञ्जगाद जगतीपतिः । त्वदीया न मया स्पृश्यास्त्वयि जीवति संपदः ॥ ३१९ ॥ ३१९. ऐसा कहकर उसके विरक्त हो जाने पर जगतीपति (प्रवरसेन) ने कहा- 'तुम्हारे जीवित रहते, मैं तुम्हारी सम्पत्तियों का स्पर्श नहीं करूंगा।' पाठभेद : करता, तो उनका भोग बिना स्वाभिमान त्याग किये श्लोक संख्या ३१५ में 'मे' का पाठभेद 'ते' कर सकता था। जैसा कि यह प्रवरसेन से पुनः मिलता है । राज्य प्राप्त कर सकता था। पादटिप्पणियाँ : पाठभेद : ३१५ (१) भोग : मातृगुप्त के मुख से कल्हण श्लोक संख्या ३१७ में 'श्यताम्' का पाठभेद ने कहलवाया है। यदि वह भोग की आकांक्षा 'शताम्' मिलता है ।
५४२ राजतरंगिणी यान्यक्षराण्यन्तरेण वाच्यं वक्तुं न पार्यते । का गतिस्तदुदाने मर्यादोल्लङ्घनं विना ॥३०६॥ ३०९. 'जिन अक्षरों को कहे बिना अभिप्राय व्यक्त नहीं होता, उसे प्रकट करने में मर्यादा उल्लंघन के अतिरिक्त और कौन गति है ? अतः परुषमप्यद्य किंचिदेव मयोच्यते । अव्याजाज्जैवमप्येतदार्यस्त्वमवधीर्यते ॥३१०॥ ३१०. 'अतएव आज मैं कुछ परुष (शब्द) कहता हूँ यद्यपि (इससे) निष्कारण सरलतामयी भद्रता' तिरस्कृत हो रही है। सर्वः स्मरति सर्वस्य प्रागवस्थासु लाघवम् । आत्मैव वेत्ति माहात्म्यं वर्तमाने क्षणे पुनः ॥३११॥ ३११. 'पूर्व स्थितियों में सब लोग सभी लोगों के लाघव का स्मरण करते हैं, किन्तु वर्तमान क्षण में माहात्म्य (गौरव) को आत्मा ही जानता है। पूर्वावस्था मदीया ते त्वदीया या च मे हृदि । ताभ्यां विमोहितावावां न विद्मोऽन्योन्यमाशयम् ॥३१२॥ ३१२. "मेरी पूर्वावस्था आपके एवं आपकी मेरे हृदय में है। उनसे विमोहित हम दोनों एक दूसरे का आशय नहीं जानते हैं। राजा भूत्वा कथ मादृक्प्रतिगृह्णातु संपदः । कथमेकपदे सर्वमौचित्य परिमार्जतु ॥३१३॥ ३१३. 'राजा' होकर मुझ सदृश जन सम्पत्तियाँ कैसे ग्रहण करें ? सब औचित्य एका- एक (सहसा) कैसे परिमार्जित (नष्ट) कर दें ? पाठभेद : करना उचित समझा है। द्रष्टव्य श्लोक ३०९ में 'यान्यक्षरा' का पाठभेद 'तान्यक्षरा' मिलता है। ३११ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह पादटिप्पणियाँ : ८०वां श्लोक है। ३१० (१) भद्रता : कल्हण ने 'आर्यत्व' शब्द ३१३ (१) राजा : राजा किसी का अनुग्रह द्वारा का प्रयोग यहाँ किया है। उसका अनुवाद 'भद्रत्व' प्रदत्त दान सहसा नहीं ग्रहण करता। राजा दान अधिक श्रेष्ठ है। मैंने आर्य का अर्थ यहाँ भद्र ही देता है। दान लेता नहीं है। यह पुरानी परम्परा है। इस श्लोक में यही भाव निहित है।
तृतीय तरंग ५४३ असाधारणमौदार्यमाहात्म्यं तस्य भूपतेः । भोगमात्रकृते मादृग्विधः साधारणतां नयेत् ॥ ३१४ ॥ ३१४. 'उस नृपति के असाधारण औदार्य माहात्म्य को भोग मात्र के लिये, क्या साधारण कर दूँ ? अपि च स्पृहयालुः स्यां भोगेभ्यो यदि भूपते । ध्रियमाणेऽभिमाने मे केन ते विनिवारिताः ॥ ३१५ ॥ ३१५. 'भूपते ! यदि मैं भोगों' के लिए इच्छा करूं, तो मेरे स्वाभिमान के रहते, उन्हें (भोगों को) कौन रोक सकता है ? यन्ममोपकृतं तेन तद्विना प्रत्युपक्रियाम् । जीर्णमेवाधुनाऽङ्गेषु प्रभवत्वेष निश्चयः ॥ ३१६ ॥ ३१६. 'उसने मेरा जो उपकार किया है, वह बिना प्रत्युपकार के यह निश्चय है कि अब (मेरे) अंगों में जीर्ण हो जायगा । या गतिर्भूर्भुजोऽमुष्य मया तामनुगच्छता । पात्रापात्रविवेकृत्वख्यातिर्नेया प्रकाशताम् ॥ ३१७ ॥ ३१७. "उस भूभुज का जो आचरण था उसका अनुसरण करने वाले मुझे पात्रापात्र विवेकशीलता की ख्याति प्रकाश में लानी चाहिये । एतावत्येव कर्तव्ये यातेऽस्मिन्कीर्तिशेषताम् । भोगमात्रपरित्यागाद्विदध्यां सत्यसंधताम् ॥ ३१८ ॥ ३१८. 'इतना ही कर्तव्य कर इसके दिवंगत हो जाने पर (कीर्ति शेष) अब भोग मात्र के परित्याग से अपनी सत्यसंधता सिद्ध करूँगा।" इत्युक्त्वा विरते तस्मिञ्जगाद जगतीपतिः । त्वदीया न मया स्पृश्यास्त्वयि जीवति संपदः ॥ ३१९ ॥ ३१९. ऐसा कहकर उसके विरक्त हो जाने पर जगतीपति (प्रवरसेन) ने कहा- 'तुम्हारे जीवित रहते, मैं तुम्हारी सम्पत्तियों का स्पर्श नहीं करूंगा।' पाठभेद : करता, तो उनका भोग बिना स्वाभिमान त्याग किये श्लोक संख्या ३१५ में 'मे' का पाठभेद 'ते' कर सकता था । जैसा कि वह प्रवरसेन से पुनः मिलता है । राज्य प्राप्त कर सकता था । पादटिप्पणियाँ : पाठभेद : ३१५ (१) भोग : मातृगुप्त के मुख से कल्हण श्लोक संख्या ३१७ में 'श्यताम्' का पाठभेद ने कहलवाया है। यदि यह भोग की आकांक्षा 'सताम्' मिलता है ।
५५४ राजतरंगिणी अथ वाराणसीं गत्वा कृतकाषायसंग्रहः । सर्वं संन्यस्य सुकृती मातृगुप्तोऽभवद्यतः ॥ ३२० ॥ ३२०. अनन्तर सुकृती मातृगुप्त वाराणसी जाकर, सर्व त्याग पूर्वक, काषाय वस्त्र संग्रह कर, यती हो गया । राजा प्रवरसेनोऽपि कश्मीरोत्पत्तिमञ्जसा । निखिलां मातृगुप्ताय प्राहिणोद् दृढनिश्चयः ॥ ३२१ ॥ ३२१. दृढनिश्चयी राजा प्रवरसेन ने भी सम्पूर्ण कश्मीरोत्पत्ति ( राजस्व-लाभ ) मातृगुप्त को भेजा। स हठात्पतितां लक्ष्मीं भिक्षाभुक् प्रतिपादयन् । सर्वार्थिभ्यः कृतो वर्षान्दश प्राणानधारयत् ॥ ३२२ ॥ ३२२. कृती वह भिक्षुभुक् हठपूर्वक आगत लक्ष्मी को सर्व प्रार्थियों को देते हुये, दश वर्ष प्राण धारण किया । अन्योन्यं साभिमानानामन्योन्यौचित्यशालिनाम् । त्रयाणामपि वृत्तान्त एष त्रिपथगापयः १ ॥ ३२३ ॥ परस्पर स्वाभिमानी एवं औचित्यशाली इन तीनों (विक्रमादित्य, मातृगुप्त, यह वृत्तान्त त्रिपथगा२ का जल है। अर्थ : (१) यतः : शाब्दिक अर्थ संन्यासी, त्यागी, होता है। यम शब्द से यतो बना है। आत्मनि- स्वनियन्त्रण, अपने पर नियन्त्रण रखने वाले व्यक्ति को यति किंवा यतो कहते हैं। जैनियों में जो लोग गृहस्थ जीवन त्याग देते हैं उन्हें यती कहा जाता है। पाठभेद : १. श्लोक संख्या ३२१ में 'काश्मीरो' का पाठभेद 'स्फीतो' मिलता है। २. श्लोक संख्या ३२२ में 'हठा' का पाठभेद 'हारा रे। पादटिप्पणियाँ : ३२३ (१) राजतरंगिणी सूक्ति सग्रह का यह ८१वां श्लोक है : ( २ ) त्रिपथगा : गंगा नदी है। कल्हण ने यहाँ पर अपने कवित्व का परिचय देते हुए सुन्दर उपमा दी है। त्रिपथगा (पवित्र गंगा ) की तीन पथ अर्थात् लोक हैं। स्वर्ग, मर्त्य एवं पाताल लोक । स्वर्ग से गंगा चलकर मर्त्य लोक में आयीं। पाताल लोक में पहुँच कर गंगा ने राजा सगर के पुत्रों को तार कर भगीरथ की तपस्या सफल की थी। त्रिपथगा की विमल, धवल धारा तुल्य ही तीनों राजा विक्रमादित्य, मातृगुप्त एवं प्रवरसेन थे। महाभारत एवं भागवत पुराण अध्याय ९ में गंगावतरण की कथा काव्यमय पदो मे दी गयी है।
तृतीय तरंग ५४५ राजा प्रवरसेनोऽथ नमयन्नवनीधरान् । अकृच्छ्रलङ्घ्याः ककुभो वृद्धस्य यशसो व्यधात् ॥ ३२४ ॥ राजा प्रवरसेन द्वितीय का अभियान : ३२४. राजा प्रवरसेन ने अवनीधरों ( भूपालों ) को झुकाते हुये, प्रवृद्ध यश द्वारा दिशाओं को बिना कष्ट के लंघनीय बना दिया । पीताब्धिलङ्घितोर्वीभृत्कुम्भयोनिरिवाऽनयत् । तस्य प्रतापः प्रभवन्भुवनानि प्रसन्नताम् ॥ ३२५ ॥ ३२५. जिस प्रकार समुद्र पान एवं पर्वत लंघन कर्ता ( कुम्भयोनि ) अगस्त्य१ जल निर्मल करते हैं उसी प्रकार उद्य होते उसके प्रताप ने भुवनों को प्रसन्न किया । पाठभेद : दिशा गमन कर रहे थे । उस समय विन्ध्य ने श्लोक संख्या ३२४ में 'व्यधात्' का पाठभेद नमस्कार किया । अगस्त्य ने उसे आशीर्वाद दिया 'न्यधात्' मिलता है । कि वह उसी प्रकार विनत उनके लौटने तक पड़ा पादटिप्पणियाँ : रहे । इसी समय से उत्तरापथ एवं दक्षिणापथ का ३२५ (१) अगस्त्य : ऋग्वेद के अनुसार आवागमन प्रारम्भ हुआ । इस आवागमन को प्रारम्भ अगस्त्य मित्रावरुणों के पुत्र हैं । ( ऋ० ७:३३:१३ ) करने के लिये अगस्त्य ने अपना निवास स्थान उर्वशी को देखकर मित्रावरुणों का रेत कमल पर काशी त्याग दिया । दक्षिण रामेश्वर में स्थित स्खलित हो गया । उससे वसिष्ठ एवं अगस्त्य हो गये । काशीपति शंकर स्वयं अपने दिये अभि- उत्पन्न हुए थे । ऋग्वेद में अगस्त्य के प्रचुर संख्या वचन के अनुसार दक्षिण रामेश्वर में निवास करने में सूक्त उपलब्ध हैं । उनका पैतृक नाम मान्य लगे । ( म० व० : १०२ ; दे० भा० २०:३.७ : एवं मान्दार्य भी वेदों में मिलता है । ( ऋ० १:- आ०रा० सार १० ; स्कन्द० ४:१:४ ) । १६५ ; १४—१५ ; १६६ ; १५ ; १८५ ; १० ) अगस्त्य को दक्षिण का स्वामी तथा विजेता कहा अगस्त्य की पत्नी का नाम लोपामुद्रा है । वह गया है । उनका उल्लेख सर्वदा दक्षिण तथा विदर्भराज निमिराज की कन्या थी । अगस्त्य श्रीलंका के सन्दर्भ में आया है । अगस्त्य ने लोपामुद्रा संवाद वैदिक साहित्य में प्रसिद्ध है । (१) वराह पुराण में पशुपालोपाख्यान में 'अगस्त्य ( ऋ० १:१७८:४ ; ) पुराणों के अनुसार मित्रा- गीता', (२) पंचरात्र की 'अगस्त्य संहिता' (३) स्कन्द वरुणों के वीर्य से इन्द्र के शाप के कारण कुंभ से पुराण की 'अगस्त्य संहिता' (४) 'शिव संहिता' तथा उत्पन्न हुए थे । अतएव इन्हें कुम्भयोनि कहा गया (५) भास्कर संहिता के 'द्वैध निर्णयतन्त्र' की रचना ( मत्स्य० ६१ : २०१ ; पद्म० सू० : २२ : २३ की है । ( ब्रह्म० वै० २:१६ ) अगस्त्य विदर्भ म० व० ९६ ; म० यो० १३२, १८४ ; म० निमिराज तथा काशिराज अलर्क के समकालीन भा० ३४४ ) । प्रतीत होते हैं । अग का अर्थ है पर्वत । पर्वत स्तम्भन करने अगस्त्य का उदय वर्षा ऋतु के अंत का प्रतीक के कारण अगस्त्य नाम पड़ा था । यही इस नाम है । इस समय जल निर्मल हो जाता है । भूमि की व्युत्पत्ति है । ( बा० रा० म० ११ ) अगस्त्य जल सोख कर हरीभरी हो जाती है । रा० व० ऋषि विन्ध्य पर्वत के गुरु थे । अगस्त्य दक्षिण २:१४० द्रष्टव्य है । ८०
५४४ राजतरंगिणी अथ वाराणसीं गत्वा कृतकाषायसंग्रहः । सर्वं संन्यस्य सुकृती मातृगुप्तोऽभवद्यतिः ॥ ३२० ॥ ३२०. अनन्तर सुकृती मातृगुप्त वाराणसी जाकर, सर्व त्याग पूर्वक, काषा संग्रह कर, यती हो गया । राजा प्रवरसेनोऽपि कश्मीरोत्पत्तिमञ्जसा । निखिलां मातृगुप्ताय प्राहिणोद् दृढनिश्चयः ॥ ३२१ ॥ ३२१. दृढनिश्चयी राजा प्रवरसेन ने भी सम्पूर्ण कश्मीरोत्पत्ति ( राजस्व-ला मातृगुप्त को भेजा। स हठात्पतितां लक्ष्मीं भिक्षाभुक् प्रतिपादयन् । सर्वार्थिभ्यः कृतो वर्षान्दश प्राणानधारयत् ॥ ३२२ ॥ ३२२. कृती व भिक्षुभुकू हठपूर्वक आगत लक्ष्मी का सर्व प्रार्थियों को देते हुये, दश वर्ष प्राण धारण कि अन्योन्यं साभिमानानामन्योन्यौचित्यशालिनाम् । त्रयाणामपि वृत्तान्त एष त्रिपथगापयः १ ॥ ३२३ ॥ परस्पर स्वाभिमानी एवं औचित्यशाली इन तीनों (विक्रमादित्य, मातृगुप्त, यह वृत्तान्त त्रिपथगा२ का जल है । : (१) यती- शाब्दिक अर्थ संन्यासी, त्यागी, है। यम शब्द से यतो बना है। आत्मनि- स्वनियन्त्रण, अपने पर नियन्त्रण रखने ले व्यक्ति को यति किंवा यतो कहते हैं। नियों में जो लोग गृहस्थ जीवन त्याग देते हैं उन्हें ती कहा जाता है। ठभेद : श्लोक संख्या ३२१ में 'काश्मीरो' का पाठभेद द्मीरो' मिलता है। श्लोक संख्या ३२२ में 'हठा' का पाठभेद 'हारा है। पादटिप्पणियाँ : ३२३ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ८१वां श्लोक है : (२) त्रिपथगा : गंगा नदी है । कल्हण ने यहाँ पर अपने कवित्व का परिचय देते हुए सुन्दर उपमा दी है। त्रिपथगा (पवित्र गंगा) की तीन पथ अर्थात् लोक हैं। स्वर्ग, मर्त्य एवं पाताल लोक । स्वर्ग से गंगा चलकर मर्त्य लोक में आयीं। पाताल लोक में पहुँच कर गंगा ने राजा सगर के पुत्रों को तार कर भगीरथ की तपस्या सफल की थी। त्रिपथगा की विमल, धवल धारा तुल्य ही तीनों राजा विक्रमादित्य, मातृगुप्त एवं प्रवरसेन थे। महाभारत एवं भागवत पुराण अध्याय ९ में गंगावतरण की कथा काव्यमय पदो मे दी गयी है ।
तृतीय तरंग ३१३ राजा प्रवरसेनोऽथ नमयन्नवनीश्वरान् । अकृच्छ्रोल्लङ्घ्याः ककुभो दृढस्य यशसो व्यधात् ॥ ३२४ ॥ राजा प्रवरसेन द्वितीय का अभियान : ३२४. राजा प्रवरसेन ने अवनीशों (भूपालों) को झुकाते हुए, प्रवृद्ध यश द्वारा दिशाओं को बिना कष्ट के लंघनीय बना दिया। पातालोल्लङ्घितोर्वीभृत्कुम्भोनिर्जिताऽनयत् । यस्य प्रतापः प्रसभन्भुवनानि प्रसन्नताम् ॥ ३२५ ॥ ३२५. जिस प्रकार समुद्र पान एवं पर्वत लंघन कर्त्ता (कुम्भोनि) अगस्त्य' बल निर्मद करते हैं उसी प्रकार उदय होते उसके प्रताप ने भुवनों को प्रसन्न किया ।
५४६ राजतरङ्गिणी शुष्यत्तमालपत्राणि श्रीगंत्तादोदलानि च तत्तरोनाऽर्णवतोराणि चक्रेऽस्तित्वोमुखानि च ॥ ३२६ ॥ ३२६. इसकी सेना ने समुद्र तट को सूमते तमाल पत्रों तथा शोर्ण ताड पत्रों से युक्त, और मुक्त तिलक अङ्गनाओं के मुखों को शुक तिलफ एवं गलित ताड़पत्रवाला बना दिया। स गङ्गाऽऽलिङ्गनारम्भ पूर्वार्यगिरिभेद्यभान् । सैन्यैममदनिष्यन्दैः कालिन्दीसंगमश्रियम् ॥ ३२७ ॥ ३२७. उसने गङ्गा आलिङ्गित पूर्व समुद्र को पुष्ट गजों के मद स्राव द्वारा कालिन्दी संगम शोभा प्रदान किया। राधस्यपगलोपैः कटकैः शृङ्गदिकटैः । चकारोत्पाटनं सौराष्ट्राणां गङ्गापपाटनम् ॥ ३२८ ॥ ३२८. इसने दिगन्तव्यापी सेनाओं द्वारा परागाधि ( समुद्र ) तटवर्ती सौराष्ट्र- वासियों का उत्पाटन कर राष्ट्र भ्रंश कर दिया। यशोऽर्थिनः पार्थिवेषु द्वेषरागबहिष्कृतः । ववृधे धर्मविजयस्तस्य क्षितिशतक्रतोः ॥ ३२६ ॥ ३२९. पृथ्वोन्द्र यशःकांक्षी एवं द्वेष राग रहित इस नृपेन्द्र का राजाओं पर धर्म- विजय' बढ़ा। नील मत पुराण अगस्त्य दर्शन पर्व का उल्लेख करता है। यह पूजा उस समय की जाती है जब सूर्य का योग कन्या राशि में होता है। इन में उपवास रात्रि में पूग, नैवेद्य आदि से पूजा का विधान है। (742-747) । ३२६ (१) तमाल : यहाँ श्लिष्ट है। कल्हण ने यहाँ बहुत उत्तम उपमा दी है। इस श्लोक में श्लेष तुल्ययोगिता आदि अलंकारों का समावेश किया गया है। अतएव इसे संसृष्टि या संकर कहेंगे (ताडो आज भी पंजाब में एक प्रकार के कर्णफूल अर्थात इयररिंग को कहते हैं।) तमाल का अर्थ तमाल वृक्ष के साथ ही छाप ललाट भी होता है। ताड़ोदल का भी अर्थ ताड़पत्र तथा कर्णफूल होता है। पाद्टिप्पणियाँ : ३२७. (१) गंगा : गंगा का जल उज्ज्वल तथा यमुना का जल श्यामल काला होता है। तार्ह ७।१४७७ में इस श्लोक की उपमा तुलनीय है। इतिहासकार विंसेंटस्मिथ प्रवरसेन को शशांक पर पहुँचा देता है। वह कहता है कि बंगाल में उसने 'शांक' अर्थात् 'शशांक' के नप्ता 'जयगुप्त' को तोड़ कर राज्य 'दामोदर गुप्त' को दे दिया। वह शीला- दित्य का पुत्र था। लेखक ने इसे किसी प्रमाण पर आधारित नहीं किया है। पद्मांक और शांक दोनों एक ही वृक्ष के नाम हैं। ३२८. (१) सुराष्ट्र : कल्हण यहाँ अपने भौगो- लिक ज्ञान का उदाहरण उपस्थित करता है। कल्हण ने निसन्देह भारत भ्रमण किया था। उसने जो भी भौगोलिक स्थिति दी है वह ठीक उतरी है। सुराष्ट्र अर्थात् वर्तमान सौराष्ट्र को वह समुद्र तट तथा पश्चिम दिशा में बतलाता है जो सर्वथा ठीक है। सौराष्ट्र को काठियावाड़ भी कहते हैं। ३२९. (१) धर्मविजय : कल्हण ने यहाँ
तृतीय तरंग ५४७ वैरिनिर्वासितं पित्र्ये विक्रमादित्यजं न्यधात् । राज्ये प्रतापशीलं स शीलादित्यापराभिधम् ॥ ३३० ॥ ३३०. इसने शत्रुनिर्वासित विक्रमादित्यात्मज प्रतापशील अपर नाम शीलादित्य¹ को उसके पैतृक राज्य पर बैठाया । सिंहासनं स्ववंश्यानां तेनाहितहृतं ततः । विक्रमादित्यवसतेरानीतं स्वपुरं पुनः ॥ ३३१ ॥ ३३१. स्व वंशियों का सिंहासन¹ जो अपहृत था उसे विक्रमादित्य के नगर से यह पुनः अपने पुर में लाया ।
[बायाँ स्तम्भ] धर्मविजय की चर्चा की है। अशोक ने 'भेरी घोष' के स्थान पर 'धर्मघोष' किया था। प्रवरसेन ने सैनिक विजय के स्थान पर धर्मविजय की बात उठायी। 'भेरी घोष सैन्य शक्ति का परिचायक है। सैन्य शक्ति पाशविक शक्ति का परिचायक है। रक्तपात का का जनक है। प्रवरसेन ने उसके स्थान पर धर्म विजय का नारा बुलन्द किया। धर्मविजय क्षत्रियों का धर्म कहा है। धर्म की रक्षा के लिए जो संघर्ष किंवा युद्ध होता है यह रक्तपात नहीं अपितु धर्म की स्थापना निमित्त होता है। महाभारत युद्ध को धर्मयुद्ध कहा गया है। क्षत्रियों के लिए भी न्याय के, धर्म के आचारादि के स्थान पर शस्त्र का आश्रय लेना अनुचित कहा गया है। यही प्राचीन भारतीय युद्ध परम्परा थी। पाठभेद : श्लोक संख्या ३३० में 'न्यधात्' का पाठभेद 'व्यधात्' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३३०. (१) शीलादित्य : प्रतापशील उपनाम शीलादित्य मालवा के राजा शीलादित्य थे। हुआ- नत्सांग कहता है कि उसके भारत आगमन के ६० वर्ष पूर्व वह हुआ था। परोक्षरूप से उसे विक्रमादित्य का उत्तराधिकारी बताता है। प्रोफेसर श्री एम. मुल्लर शीलादित्य का अनुमानित समय सन् ५५० से ६०० ई० लगाते हैं ।
[दायाँ स्तम्भ] ३३१ (१) सिंहासन : विक्रमादित्य के सिंहासन के सन्दर्भ में यह श्लोक कहा गया है। यह मत सर्व श्री ड्रोयर तथा लास्सेन पाश्चात्य इतिहास- विदों का है। वह विक्रमादित्य का वही सिंहासन है जिसके सम्बन्ध में अनेक गाथायें प्रचलित हैं। 'सिंहासन बत्तीसी' भी इसी सिंहासन से सम्बन्धित की गई है। बत्तीस पुतलियो अर्थात् अप्सराओ पर निर्मित सिंहासन के सम्बन्ध में अनेक गाथायें हैं। यह प्रतीत होता है कि विक्रमादित्य के पश्चात् यह सिंहासन उज्जैन में नहीं था। किन्तु यह कहा जाता है कि राजा भोज ने उसे पुनः प्राप्त किया था । किन्तु इसका ऐतिहासिक सप्रमाण पता नही लगता । कल्हण ने यहाँ एक विचित्र प्रश्न उपस्थित कर दिया है। उसके अनुसार कश्मीर निर्मित राज- सिंहासन विक्रमादित्य के नगर उज्जैन चला गया था। वह किस प्रकार श्रीनगर से अवन्ती पहुँचा इस पर कल्हण ने कही नही प्रकाश डाला है। विक्रमादित्य अथवा उज्जैन के किसी राजा ने कश्मीर विजय नही किया था। किसी राजा के सन्दर्भ में यह भी नही कहा गया है कि उसने विक्रमादित्य की अधी- नता स्वीकार कर ली थी। भेंट में सिंहासन विक्रमा- दित्य अथवा उसके पूर्वजों को दिया था। मातृगुप्त ने भेंट अवश्य विक्रमादित्य को भेजा था परन्तु
५४६ राजतरंगिणी शुष्कत्तमालपत्राणि शीर्णताडीदलानि च तत्सेनाऽर्णवतीराणि चक्रेऽरिस्त्रीमुखानि च ॥ ३२६ ॥ ३२६. इसकी सेना ने समुद्र तट को सूखते तमाल पत्रों तथा शीर्ण ताड पत्रों से युक्त, और शुष्क तिलक अरिपत्नियों के मुखों को शुष्क तिलक एवं गलित ताड़कवाला¹ बना दिया। स गङ्गाऽऽलिङ्गिताङ्गस्य पूर्ववारिनिधेर्व्यधात् । सैन्येभमदनिष्यन्दैः कालिन्दीसंगमश्रियम् ॥ ३२७ ॥ ३२७. उसने गंगा आलिंगित पूर्व समुद्र को युद्ध गजों के मद स्राव द्वारा कालिन्दी संगम शोभा प्रदान किया । राध्यस्यपरपाथोघेः कटकैः स्पृष्टदिक्तटैः । चकारोत्पाट्य सौराष्ट्रानसौ राष्ट्रविपाटनम् ॥ ३२८ ॥ ३२८. इसने दिगन्तव्यापी सेनाओं द्वारा परपाथोधि (समुद्र) तटवर्ती सौराष्ट्र- वासियो का उत्पाटित कर राष्ट्र ध्वंस कर दिया । यशोऽर्थिनः पार्थिवेषु द्वेषरागबहिष्कृतः । ववृधे धर्मविजयस्तस्य क्षितिशतक्रतोः ॥ ३२६ ॥ ३२९. पृथ्वीन्द्र यशःकांक्षी एवं द्वेष राग रहित इस पृथ्वीन्द्र का राजाओं पर धर्म- विजय¹ बढ़ा ।
नील मत पुराण अगस्त्य दर्शन पर्व का उल्लेख करता है। यह पूजा उस समय की जाती है जब सूर्य का योग कन्या राशि से होता है । दन मे उपवास रात्रि मे पुष्प, नैवेद्य आदि से पूजा का विधान है। (742-747)। ३२६ (१) तमाल : यहाँ क्लिष्ट है। कल्हण ने यहाँ बहुत उत्तम उपमा दी है। इस श्लोक में श्लेष तुल्ययोगिता आदि अलंकारों का समावेश किया गया है। अतएव इसे समष्टि या संकर कहेंगे (ताडो आज भी पंजाब मे एक प्रकार के कर्णफूल अर्थात् इयररिंग को कहते है।) तमाल का अर्थ तमाल वृक्ष के साथ ही साथ मशाट भी होता है। ताडीदल का भी अर्थ ताड़पत्र तथा कर्णफूल होता है। पारिपत्नियाँ : ३२७. (१) गंगा : गंगा का जल उज्ज्वल तथा यमुना का कुछ हलका काला होता है। तरंग ७ १४७७ से इस श्लोक की उपमा तुलनीय है। इतिहासकार विडेन्टन प्रवरसेन को बंगाल तक पहुँचा देता है। वह कहता है कि बंगाल मे उसने 'ढाक' अर्थात् 'ढावका' के राजा 'बेहरसिंह' को जीत कर राज्य 'पलास सिंह' को दे दिया। यह शोला- दित्य का पुत्र था। लेखक ने इसे किसी प्रमाण पर आधारित नहीं किया है। पलास और ढाक दोनो एक ही वृक्ष के नाम हैं। ३२८. (१) सुराष्ट्र : कल्हण यहाँ अपने भौगो- लिक ज्ञान का उदाहरण उपस्थित करता है। कल्हण ने निस्सन्देह भारत भ्रमण किया था। उसने जो भौ गोलिक स्थिति दी है वह ठीक उतरी है। सुराष्ट्र अर्थात् वर्तमान सौराष्ट्र को वह समुद्र तट तथा पश्चिम दिशा में बतलाता है जो सर्वथा ठीक है। सौराष्ट्र को काठियावाड़ भी कहते हैं। ३२९. (१) धर्मविजय : कल्हण ने यहाँ
तृतीय तरंग ५४७ वैरिनिर्वासितं पित्र्ये विक्रमादित्यजं न्यधात् । राज्ये प्रतापशीलं स शीलादित्यापराभिधम् ॥ ३३० ॥ ३३०. इसने शत्रुनिर्वासित विक्रमादित्यात्मज प्रतापशील अपर नाम शीलादित्य¹ को उसके पैतृक राज्य पर बैठाया । सिंहासनं स्ववंश्यानां तेनाहृतहृत ततः । विक्रमादित्यवसतेरानांतं स्वपुरं पुनः ॥ ३३१ ॥ ३३१. स्व वंशियों का सिंहासन¹ जो अपहृत था उसे विक्रमादित्य के नगर से वह पुनः अपने पुर में लाया ।
धर्मविजय की चर्चा की है। अशोक ने 'भेरी घोष' के स्थान पर 'धर्मघोष' किया था । प्रवरसेन ने सैनिक विजय के स्थान पर धर्मविजय की बात उठायी। भेरी घोष सैन्य शक्ति का परिचायक है। सैन्य शक्ति पाशविक शक्ति का परिचायक है। रक्तपात का का जनक है। प्रवरसेन ने उसके स्थान पर धर्म विजय का नारा बुलन्द किया । धर्मविजय क्षत्रियों का धर्म कहा है। धर्म की रक्षा के लिए जो संघर्ष किंवा युद्ध होता है वह रक्तपात नही अपितु धर्म की स्थापना निमित्त होता है। महाभारत युद्ध को धर्मयुद्ध कहा गया है। क्षत्रियों के लिए भी न्याय के, धर्म के आचारादि के स्थान पर शस्त्र का आश्रय लेना अनुचित कहा गया है। यही प्राचीन भारतीय युद्ध परम्परा थी । पाठभेद : श्लोक संख्या ३३० में 'न्यधात्' का पाठभेद 'अ्यधात्' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३३०. (१) शीलादित्य : प्रतापशील उपनाम शीलादित्य मालवा के राजा शीलादित्य थे । हुआ- न्त्संग कहता है कि उसके भारत आगमन के ६० वर्ष पूर्व वह हुआ था । परोक्षरूप से उसे विक्रमादित्य का उत्तराधिकारी बताता है। प्रोफेसर थी एम. मुल्लर शीलादित्य का अनुमानित समय सन् ५५० से ६०० ई० लगाते है ।
३३१ (१) सिंहासन : विक्रमादित्य के सिंहासन के सन्दर्भ में यह श्लोक कहा गया है। यह मत सर्व श्री टोयर तथा लास्सेन पाश्चात्य इतिहास- विदों का है। वह विक्रमादित्य का वही सिंहासन है जिसके सम्बन्ध में अनेक गाथायें प्रचलित है। 'सिंहासन बत्तीसी' भी इसी सिंहासन से सम्बन्धित की गई है । बत्तीस पुतलियो अर्थात् अप्सराओ पर निर्मित सिंहासन के सम्बन्ध में अनेक गाथायें है। यह प्रतीत होता है कि विक्रमादित्य के पश्चात् यह सिंहासन उज्जैन मे नही था । किन्तु यह कहा जाता है कि राजा भोज ने उसे पुनः प्राप्त किया था । किन्तु इसका ऐतिहासिक सप्रमाण पता नही लगता । कल्हण ने यहाँ एक विचित्र प्रश्न उपस्थित कर दिया है। उसके अनुसार कश्मीर निर्मित राज- सिंहासन विक्रमादित्य के नगर उज्जैन चला गया था । वह किस प्रकार श्रीनगर से अवन्ती पहुँचा इस पर कल्हण ने कहीं नहीं प्रकाश डाला है। विक्रमादित्य अथवा उज्जैन के किसी राजा ने कश्मीर विजय नही किया था । किसी राजा के सन्दर्भ में यह भी नहीं कहा गया है कि उसने विक्रमादित्य की अधी- नता स्वीकार कर ली थी। भेंट में सिंहासन विक्रमा- दित्य अथवा उसके पूर्वजों को दिया था। मातृगुप्त ने भेंट अवश्य विक्रमादित्य को भेजा था परन्तु
५४८ राजतरंगिणी हेतुंस्तुदीर्य विविधानमन्वानं पराजयम् । सप्त वारान्स तत्याज जित्वा मुम्मुनिभृभुजम् ॥ ३३२ ॥ ३३२. विविध हेतुओं को कहकर पराजय न मानने वाले राजा मुम्मुनि' को सात बार विजित कर उसने छोड़ दिया । उसमें सिंहासन जैसे महत्त्वपूर्ण वस्तुका उल्लेख नहीं मिलता । नादिरशाह भारत का तख्तेताऊस उठा ले गया था । वह ऐतिहासिक घटना हैं। वह ईरान में आज भी मौजूद हैं । एक यह सम्भावना हो सकती है। कश्मीर लकड़ी की नक्कासी के काम के लिये प्रसिद्ध हैं। भारत में आज भी यहाँ से टेबुल, कुर्सी, मेज, दीपदान, तस्तरी, आदि लकड़ी के सामान भारत के बड़े शहरों में बिकते हैं । कश्मीर में भी विक्रमादित्य अथवा उसके पूर्वजों के लिये सिंहासन बनाया गया होगा । वह उज्जैन भेजा गया होगा । किसी देश का सिंहासन विदेश अथवा पर राजा के यहाँ भेजना उसकी पराजय स्वीकार करने के समान हैं । प्रवरसेन ने सम्भवतः यह बात सुनी होगी । उसे बुरा लगा होगा अतएव वह सिंहासन उठा लिया होगा। कश्मीर लकड़ी की कला में प्रवीण समझा जाता था । आज भी उसकी वही ख्याति है । अप्सरा की मूर्ति पत्थरों पर, दीवारों तथा छज्जो के नीचे पत्थरों को सहारा देने के लिये लगायी जाती है। कुर्सियों तथा मेजों के पाया के स्थान पर मछली, सिंह, हरिण, स्त्री की मूर्ति काष्ठ अथवा पत्थर में बना दी जाती है। सिंहासन को देवी महत्त्व देने के लिये अप्सराओं की काष्ठ मूर्तियाँ सिंहासन के पाया के स्थान पर चारो ओर लगा कर सिंहासन को अत्यन्त सुन्दर बना दिया गया होगा । ३३२ (१) मुम्मुनि : यह अभारतीय शब्द हैं। किसी वंश, जाति, किंवा कुल का नाम प्रतीत होता है । ललितादित्य की विजय यात्रा के सन्दर्भ में उनका स्थान तुषार और भोट्ट क्षेत्रों के मध्य कहा गया हैं। तरंग ४ : १६७ तथा ५१६ में मुम्मुनि का उल्लेख कल्हण ने पुनः किया है । श्लोक ४:१६७ से प्रकट होता है । ललितादित्य ने मुम्मुनि को तीन बार परास्त किया था । जयापीड़ के सन्दर्भ में मुम्मुनि का पुनः उल्लेख (त०४.५१६) में कल्हण ने किया हैं। रात्रि में वे चाण्डालों के साथ पहरा देते देखे जाते हैं । तुषार किंवा तुखार प्रदेश वर्तमान बदख्शां हैं। भोट्ट स्थान निस्सन्देह लद्दाख हैं । राजतरंगिणी में भोट्ट शब्द सर्वदा लद्दाख तथा लेह के निवासियों के लिये प्रयुक्त किया गया हैं। मुम्मुनि को दरद जातीय समझना भ्रामक होगा । उनका उल्लेख कल्हण ने सर्वदा अलग एक जाति तथा भू अंचल के रूप में किया है । दरदो तथा मुम्मुनों में भेद किया गया है। उन दिनो हूणों के त्रास के कारण जो कतिपय मूल तुर्क वंशीय लोग थे थे कश्मीर राज्य के उत्तरी सिन्धु उपत्यका में आ गये होगे । इस प्रकार वे कश्मीर के प्रभाव व क्षेत्र में आ गये थे । कल्हण ने तरंग ८:१०९० तथा ८:२१७९ में मुम्मुनि शब्द का उल्लेख किया है। यहाँ मुम्मुनि संगत का भ्राता कहा गया हैं। वह पहले विदेशियों की तालिका में राजपुत्र रूप से रखा गया हैं। वह पर्वतीय राजा था । राजा सुस्सल को सहायता किया था । यह मुम्मुनि हिन्दू थे । सम्भव है काबुल के शाही वंश के समान मुम्मुनि भो कश्मीर में आकर बस गये थे । समाज में वे दालो के समान मिल गये-
तृतीय तरंग ५४९ धार्ष्ट्यादथाष्टमे वारे हेतुमाख्यातुमुद्यतम् । धिक्पशून्बध्यतां सोऽमित्यूचे नृपतिः क्रुधा ॥ ३३३ ॥ ३३३. आठवीं बार धृष्टता पूर्वक जब कोई कारण कहने को उद्यत हुआ तब राजा ने क्रोध पूर्वक कहा—'पशु को धिक्कार है इसे बाँधो।' अवध्योऽहं पशुत्वेन वीरेत्युक्त्वा भयोत्सुकः । मध्येसभं ननर्तास्य सोऽनुकुर्वन्कलापिनम् ॥ ३३४ ॥ ३३४. भयभीत वह 'ओ वीर ! पशु होने के कारण अवध्य हूँ।' यह कहकर सभा मध्य मयूर सदृश नृत्य करने लगा । नृत्तं केकां च शिखिनो दृष्ट्वाऽस्मै द्रविणं नृपः । अभयेन समं प्रादात्तालार्थचरणोचितम् ॥ ३३५ ॥ ३३५. नृप ने मयूर¹ की केका वाणी (सुन) एवं नृत्य देखकर इसे अभय के साथ नर्त्तकोचित द्रव्य प्रदान किया । वसतोऽस्य दिशो जित्वा नप्तुः पैतामहे पुरे । कर्तुं पुरं स्वनामाङ्क प्रथते स्म मनोरथः ॥ ३३६ ॥ ३३६. दिशाओं को विजय कर, पितामह² के नगर में निवास करते, इस नृप को स्वनामांकित पुर निर्माण करने की अभिलाषा हुई । मुम्मुनि के लिये कुछ विद्वानो ने कहा है कि वे श्लोकसंख्या ३३५ में 'तालाघव' का पाठभेद मोमिन थे । मोमिन मुसलमान थे वह शब्द खलीफा 'तालावध' मिलता है । के समान अमीरुल मोमनीन था । वह तर्क असंगत पादटिप्पणियाँ : है । परन्तु राजतरंगिणी में तीन राजाओ के ३३५ (१) मयूर नृत्य : मुम्मुनि ने मयूर सन्दर्भ में मुम्मियन का नाम आया है । ये प्रवरसेन नृत्य किया । यह कुछ विचित्र मालूम होता है । (३१८६ लौ० सं०) ललितादित्य (लो०३७७६सं.) सम्भव है मुम्मुनि वंश किया गोत्र अथवा जाति मे तथा जयापोड (लौ०३८२८सं०) थे । उनके काल मयूर नृत्य प्रचलित हो या उसके यश की विशेषता में शताब्दियो का अन्तर है । अतएव मुम्मुनि कोई रही हो । दक्षिण के लोगो में भरत नाट्यम् एक व्यक्ति नहीं था । अत्यधिक प्रचलित है जबकि उत्तर भारत में कथक एक मत है कि यह शाही तथा खाकान के समान नृत्य । उल्लास काल में मानव अपने मौलिक कोई रहे हो । ललितादित्य ने उन्हें उत्तर में अकृत्रिम रूप में आ जाता है । संस्कार जन्य कार्य सोपार तथा भोट्ट के मध्य जोता था । करना, गान एवं नृत्य अनायास वह करने लगता है । यही भाव इस श्लोक का है । पाठभेद : पाठभेद : श्लोकसंख्या ३३३ में 'पशून्च' का पाठभेद श्लोक संख्या ३३६ में 'प्रयते स्म' का पाठभेद 'पशुचं' मिलता है । 'पप्रथे स' मिलता है । २
५५० राजतरंगिणी रात्रौ क्षेत्रं च लग्नं च दिव्यं ज्ञातुमथैकदा । स वीरो वीरचर्यायां दिर्ययौ पार्थिवार्यमा ॥ ३३७ ॥ ३३७. पार्थिव सूर्य, वह वीर एक बार क्षेत्र एवं दिव्य लग्न ज्ञात करने के लिये रात्रि में वीर चर्या को निकला। गच्छतः क्ष्मापतेस्तस्य मौलिरत्नाग्रबिम्बितः । बभार ताराप्रकरो रक्षार्सर्पपविभ्रमम् ॥ ३३८ ॥ ३३८. गमन करते उस नृपति के मुकुर रत्नों के अग्र भाग में प्रतिबिम्बित तारा निकर रक्षा सर्षप १ तुल्य शोभित हुआ। अथानन्तचितालोकस्पष्टभीमतटद्रुमम् । श्मशानप्रान्ततटिनीं पर्यटन्नाससाद सः ॥ ३३६ ॥ ३३९. पर्यटन करते हुए वह ऐसी सरिता तट पर पहुंचा जहाँ प्रान्त भाग में श्मशान १ था और अनन्त चिताओं के प्रकाश से तटवर्ती द्रुम स्पष्ट (भयंकर) वीभत्स लग रहे थे। पादटिप्पणियाँ : ३३९ (१) श्मशान—कल्हण ने इस स्थान ३३६ (१) पितामह-नगर—यहाँ पितामह का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है कि श्मशान कहाँ के नगर से अर्थ पुराधिष्ठान है। पुराधिष्ठान के पर है। श्मशान का स्थान श्रीनगर में बदलता लिये पादटिप्पणी श्रीनगर पृ० १३९-१४६ तथा रहा था। किन्तु इतना निश्चय प्रकट होता है कि रा० त० १:१०४; १२९, ३०६; ३:९९; वह स्थान सरितातट पर था। सरिता के उस पार ५:२६७ द्रष्टव्य है। भूत था। जिसे सरिता के इस पार से राजा पाठभेदः श्मशान की चिता-ज्वाला-प्रकाश में देख सकता था। श्लोकसंख्या ३३८ में 'रत्नाग्र' का पाठभेद कल्हण ने तरंग ७ श्लोक ३३९ में राजा 'रत्नाङ्क' मिलता है। उच्चल के दाह स्थान का उल्लेख करता है। यह पादटिप्पणियाँ : स्थान वितस्ता तथा महासरित के संगम पर एक ३३८ (१) सर्षप : पीली सरसो भूत, द्वीप पर था। श्रीवर ने जैन राजतरंगिणी प्रेतादि बाधा तथा सर्पों को दूर भगाने के लिये मन्त्र तरंग १: सर्ग ५ श्लोक ५४ तथा ५६ में मारी पढ़कर गृह में अथवा सर्पों के स्थान पर फेंका जाता नदी तथा मार्गे वितस्ता संगम का उल्लेख किया है। ताकि बाध्य दूर हो जाय। और सर्पादि भाग है। मारी वितस्ता का जहाँ संगम था वही जायें। जहाँ पीली सरसो नहीं मिलती वहाँ यह श्मशान वर्तमान प्रथम पुल के कुछ नीचे था। साधारण सरसो का ही प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार प्राचीन श्मशान के स्थान का निश्चित कश्मीर में रिवाज है कि सरसो बालको को पता श्रीवर के उल्लेख से मिल जाता है। महासरित टोंपी के कपड़ो के नीचे रखकर सी दिया जाता है। वितस्ता संगम, प्रतीत होता है, कालान्तरमें मारी बच्चों को नज़र के साथ ही साथ प्रेत बाधा आदि संगम के रूप में व्यवहृत होने लगा था। कुछ नहीं लगती। वह पुरानी मान्यता है। विद्वानो का विचार है कि मारी, मर, महासरित,
तृतीय तरंग ५५१ ततस्तस्य सरित्पारे मुक्तसंरावमग्रतः । ऊर्ध्वबाहु महद् भूतं प्रादुरासीन्महीजसः ॥ ३४० ॥ ३४०. तदनन्तर उस महौजस के सम्मुख नदी के पार ऊर्ध्व बाहु चीत्कार करता हुआ महान् भूत प्रादुर्भूत हुआ। नृपतिस्तस्य दृक्पातैर्ज्वलद्भिः कपिशीकृतः । उल्काज्योतिःकृताश्लेषः कुलाद्रिरिव दिद्युते ॥ ३४१ ॥ ३४१. उसके प्रज्वलित दृष्टिपातों से कपिशीकृत नृपति उल्का ज्योतियों से अलंकृत कुलाद्रि तुल्य प्रदीप्त हुआ। तमथ प्रतिशब्देन घोरेणापूरयन्दिशः । अत्रासं विहसन्नुच्चैरुवाच क्षणदाचरः ॥ ३४२ ॥ ३४२. भयंकर प्रतिध्वनि से दिशाओं को व्याप्त करते हुए क्षणदाचर १ ने उच्चाहास कर निर्भय नृपति से कहा— संत्यज्य विक्रमादित्यं सत्त्वोद्रिक्तं च शूद्रकम् । स्वां च भूपाल पर्याप्तं धैर्यमन्यत्र दुर्लभम् ॥ ३४३ ॥ ३४३. 'भूपाल ! विक्रमादित्य, सत्त्वशाली शूद्रक' एवं आपके अतिरिक्त अन्यत्र पर्याप्त धैर्य दुर्लभ है। वसुधाधिपते वाञ्छासिद्धिस्तय विधीयते । सेतुमेतं समुत्तीर्य पार्श्वमागम्यतां मम ॥ ३४४ ॥ ३४४. 'वसुधापते ! इस सेतु को पार कर मेरे पास आओ तुम्हारी वाञ्छा सिद्ध करता हूँ। माहुरी एक ही नदी हैं। परन्तु श्रीस्तीन का मत | निशा में चलने वाला होगा। क्षणदाचर का प्रचलित है कि माहुरी नदी मच्छीपुर परगना की मबुर नदी | अर्थ निशाचर है। राक्षस, निशाचर, क्षणदाचरादि है। माहुरी का उल्लेख नीलमत (१३२०) में | तम शक्ति के प्रतीक हैं। किया गया है। ३४३. (१) शूद्रक : विक्रमादित्य के समान ३४२. (१) क्षणदाचर : क्षणदा का अर्थ रात्रि | शूद्रक भी लोक साहित्यिक नायक है। कथा सरित्सा- किंवा निशा होता है। क्षणदाचर का अर्थ रात्रि किंवा | गर (७८:५) द्रष्टव्य है।
५५० राजतरंगिणी रात्रौ क्षेत्रं च लग्नं च दिव्यं ज्ञातुमथैकदा। स वोरो वीरचर्यायां निर्ययौ पार्थिवार्यमा ॥ ३३७ ॥ ३३७. पार्थिव सूर्य, वह वीर एक बार क्षेत्र एवं दिव्य लग्न ज्ञात करने के लिये रात्रि में वीर चर्या को निकला। गच्छतः क्ष्मापतेस्तस्य मौलिरत्नाग्रबिम्बितः । बभार ताराप्रकरो रक्षासर्षपविभ्रमम् ॥ ३३८ ॥ ३३८. गमन करते उस नृपति के मुकुर रत्नों के अग्र भाग में प्रतिबिम्बित तारा निकर रक्षा सर्षप१ तुल्य शोभित हुआ। अथानन्तचितालोकस्पष्टभीमतटद्रुमाम् । श्मशानप्रान्ततटिनीं पर्यटन्नाससाद सः ॥ ३३६ ॥ ३३९. पर्यटन करते हुए वह ऐसी सरिता तट पर पहुंचा जहाँ प्रान्त भाग में श्मशान१ था और अनन्त चिताओं के प्रकाश से तटवर्ती द्रुम स्पष्ट (भयंकर) वीभत्स लग रहे थे। पादटिप्पणियाँ. ३३९ (१) श्मशान-कल्हण ने इस स्थान ३३६ (१) पितामह-नगर- यहां पितामह का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है कि श्मशान कहाँ के नगर से अर्थ पुराधिष्ठान है। पुराधिष्ठान के पर है। श्मशान का स्थान श्रीनगर में बदलता लिये पादटिप्पणी श्रीनवर पृ० १३९-१४६ तथा रहा था। किन्तु इतना निश्चय प्रकट होता है कि रा० त० १:१०४; १२९, ३०६; ३:९९; वह स्थान सरिता तट पर था। सरिता के उस पार ५:२६७ द्रष्टव्य है। भूत था। जिसे सरिता के इस पार से राजा पाठभेदः श्मशान की चिता-ज्वाला-प्रकाश में देख सकता था। श्लोकसंख्या ३३८ में 'रत्नाग्र' का पाठभेद कल्हण ने तरंग ७ श्लोक ३३९ में राजा 'रत्नाङ्क' मिलता है। उच्चल के दाह स्थान का उल्लेख करता है। यह पादटिप्पणियाँ : स्थान वितस्ता तथा महासरित के संगम पर एक ३३८ (१) सर्षप : पीली सरसो भूत, द्वीप पर था। श्रीवर ने जैन राजतरंगिणी प्रेतादि बाधा तथा सर्पों को दूर भगाने के लिये मन्त्र तरंग १: सर्ग ५ श्लोक ५४ तथा ५६ में मारी पढ़कर गृह में अथवा मपों के स्थान पर फेंका जाता नदी तथा मारी वितस्ता संगम का उल्लेख किया है। ताकि वाध्य दूर हो जाय। और सर्पादि भाग है। मारी वितस्ता का जहाँ संगम था वही जायें। जहाँ पीली सरसो नहीं मिलती वहाँ यह श्मशान वर्तमान प्रथम पुल के कुछ नीचे था। साधारण सरमों का हो प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार प्राचीन श्मशान के स्थान का निश्चित पता श्रीवर के उल्लेख मे मिल जाता है। महासरित वितस्ता संगम, प्रतीत होता है, कालान्तरमें मारी संगम के रूप में व्यवहृत होने लगा था। कुछ विद्वानों का विचार है कि मारी, मर, महासरित,
तृतीय तरंग ५५१ ततस्तस्य सरित्पारे मुक्तसंरावमग्रतः । ऊर्ध्वबाहु महत् भूतं प्रादुरासीन्महौजसः ॥ ३४० ॥ ३४०. तदनन्तर उस महौजस के सम्मुख नदी के पार ऊर्ध्व बाहु चीत्कार करता हुआ महान् भूत प्रादुर्भूत हुआ । नृपतिस्तस्य दृक्पातैर्ज्वलद्भिः कपिशीकृतः । उल्काज्योतिःकृताश्लेषः कुलाद्रिरिव दिद्युते ॥ ३४१ ॥ ३४१. उसके प्रज्वलित दृष्टिपातों से कपिशीकृत नृपति उल्का ज्योतियों से अलंकृत कुलाद्रि तुल्य प्रदीप्त हुआ । तमथ प्रतिशब्देन घोरेणापूरयन्दिशः । अत्रासं विहसन्नुच्चैरुवाच क्षणदाचरः ॥ ३४२ ॥ ३४२. भयंकर प्रतिध्वनि से दिशाओं को व्याप्त करते हुए क्षणदाचर १ ने उच्चाहास कर निर्भय नृपति से कहा— संत्यज्य विक्रमादित्यं सत्त्वोद्रिक्तं च शूद्रकम् । त्वां च भूपाल पर्याप्तं धैर्येमन्यत्र दुर्लभम् ॥ ३४३ ॥ ३४३. 'भूपाल ! विक्रमादित्य, सत्त्वशाली शूद्रक' एवं आपके अतिरिक्त अन्यत्र पर्याप्त धैर्य दुर्लभ है। वसुधाधिपते वाञ्छासिद्धिस्तद्य विधीयते । सेतुमेतं समुत्तीर्य पार्श्वमागम्यतां मम ॥ ३४४ ॥ ३४४. 'वसुधापते ! इस सेतु को पार कर मेरे पास आओ तुम्हारी वाञ्छा सिद्ध करता हूँ । माहुरी एक ही नदी है। परन्तु श्रीस्टीन का मत निशा में चलने वाला होगा। क्षणदाचर का प्रचलित है कि माहुरी नदी मच्छीपुर परगना की मबुर नदी अर्थ निशाचर है। राक्षस, निशाचर, क्षणदाचरादि है। माहुरी का उल्लेख नीलमत (१३२०) में तम शक्ति के प्रतीक हैं। किया गया है। ३४३. (१) शूद्रक : विक्रमादित्य के समान ३४२. (१) क्षणदाचर : क्षणदा का अर्थ रात्रि शूद्रक भी लोक साहित्यिक नायक है। कथा सरित्सा- किंवा निशा होता है। क्षणदाचर का अर्थ रात्रि किंवा गर (७८:५) द्रष्टव्य है।
५५२ राजतरंगिणी इत्युदीर्य निजं जानुं रक्षः पारात्प्रसारयत् । तन्महासरितो वारि सेतुसीमन्तितं व्यधात् ॥ ३४५ ॥ ३४५. ऐसा कहकर राक्षस ने (उस) पार से जानु प्रसारित कर उस महासरित का जल सेतु-विभक्त कर दिया । अङ्गेन रक्षःकायस्य ज्ञात्वा सेतुं प्रकल्पितम् । वीरः प्रवरसेनोऽथ विकाशां क्षुरिकां दधे ॥ ३४६ ॥ ३४६. सेतु को राक्षस शरीर से निर्मित जानकर, धीर प्रवरसेन ने नग्न क्षुरिका१ धारण कर लिया। स तयोत्कृत्य तन्मांसं कृतसोपानपद्धतिः । अतरद्यत्र तत्स्थानं क्षुरिकाबल उच्यते ॥ ३४७ ॥ ३४७. वह उसका मांस उससे काटकर सोपान माग निर्मित कर, जहाँ पार किया, वह स्थान क्षुरिका१ बल कहा जाता है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३४५ में 'यत्' का पाठभेद 'यन्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३४६ (१) क्षुरिका : इसका अर्थ छोटी तलवार तथा छुरी भी होता है । कल्हण ने क्षुरिका शब्द का बहुत प्रयोग किया है । भारत के क्षत्रिय गण अन्य मध्य कालीन देशों के सैनिक वर्ग के समान दो कृपाण रखते थे । उनमें एक बड़ी तथा दूसरी छोटी होती थी । जापान के वीरकालीन पुरुष भी भारत के क्षत्रियों के समान ही सैनिक संहिता का अनुसरण करते थे । निस्सन्देह जापान में तेरहवीं शताब्दी तक यह प्रथा प्रचलित थी। बड़ी और छोटी तलवार वीरगण धारण करते थे। मुस्लिम काल में छोटी तलवार ने खंजर का स्थान ले लिया था। बड़ी तलवार कमर से बाईं तरफ लटकाते थे और खंजर नाभि के पास पेटी अथवा कमरबन्द में खोंस लेते थे। यह प्रथा अब और परिवर्तित हो गयी है। उत्सवों तथा भोजन के समय सैनिक अधिकारी केवल एक छोटी तलवार अर्थात् क्षुरिका कमर में अपने वर्दी के ऊपर वामभाग में लटका लेते हैं । मुख्यतः नाविक अधिकारियों में यह प्रथा सम्पूर्ण विश्व में प्रचलित है । वे अपनी पुरानी परम्परा के अनुसार तलवार साथ रखते हैं । पाठभेद : श्लोक सख्या ३४७ में 'बल' का पाठभेद 'बाल' 'भाल' तथा 'वार' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३४७ (१) क्षुरिका बल : वर्तमान खुदबल स्थान है । महासरित के उत्तरी तट पर है । बल स्थान को कहते हैं । कश्मीर के नामों के अन्त में बल स्थान वाचक नामों के अन्त में लगा दिया जाता है जैसे पारबल, मारवल, पोखरवल । मैं समझता हूँ कि हजरत बल का अन्तिम नाम बल स्थानवाचक था परन्तु वहाँ बाल रखा था अतएव कालान्तर में उसका नाम हजरत का बाल रखने के स्थान रूप में हजरत बल एवं बाल रख दिया गया । साधारण लोग कश्मीर में हजरत बल ही कहते हैं न कि हजरत बाल ।
तृतीय तरंग ५५३ पार्श्वस्थं तं लग्नमुक्त्वा प्रातर्मेत्सूत्रपातनम् । दृष्ट्वा पुरं विधेहीति वदद् भूतं तिरोदधे ॥ ३४८ ॥ ३४८. पार्श्वस्थ लग्न कहकर—'प्रातः मेरा सूत्रपात¹ देख कर नगर² निर्माण करो।' यह कहते हुए भूत तिरोहित हो गया । देव्या शारिकयाऽङ्केन यक्षेणाधिष्ठिते च सः । ग्रामे शारीटकेऽपश्यत्सूत्रं वेतालपातितम् ॥ ३४९ ॥ ३४९. उस (राजा) ने शारीटक ग्राम में वैताल पातित सूत्र¹ देखा जो देवी शारिका² एवं यक्ष अट्टा³ से अधिष्ठित था ।
पादटिप्पणियाँ : ३४८. (१) सूत्रपातन : इसे सूत लगाना, सूत बाँधना कहते हैं। इसका प्रयोग विश्व में सर्वत्र इमारतों तथा सड़कों की रचना में चिह्न लगाने के लिये होता है। कल्हण ने इसका पुनः उल्लेख तरंग ५:५६ में किया है। (२) नगर : यह नगर प्रवरपुर अथवा प्रवरसेनपुर था। प्राचीन श्रीनगर को पुनः मालूम पड़ता है राजा ने और विस्तृत किया। पुराने श्रीनगर से मिला ही उसने अपने नाम पर नगर बनवाया। प्रायः सभी मुस्लिम इतिहासकार इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रवरसेन वर्तमान श्रीनगर का संस्थापक था यद्यपि वे यह भी कहते हैं कि श्रीनगर की रचना में अनेक राजाओ द्वारा अनेक बार परि-वर्त्तन किये गये हैं। मुस्लिम शासन काल में श्रीनगर या प्रवरपुर कश्मीर कहा जाता था। कश्मीर जाने का अर्थ श्रीनगर जाना समझा जाता था। बैरनी के अनुसार नगर चार फर्लांग में विस्तृत था। सन् १८१६ ई० में सिखों ने कश्मीर जीता तो पुराना नाम श्रीनगर रख दिया गया। मूल श्रीनगर की स्थापना अशोक न की थी। वर्तमान श्रीनगर का स्थान राजा प्रवरसेन ने चुना था। नाम प्रवरसेनपुर रखा गया था। कश्मीर उपत्यका के मध्य में स्थित है। वितस्ता नदी का पाट ८० गज है। वितस्ता के दक्षिण तटपर पुराना नगर अधिक आबाद था। समुद्र की सतह से ५२५० फिट ऊँचा है। यहाँ का तापमान जनवरी में ३५ डिग्री तथा जुलाई में ८० डिग्री होता है। वर्षा प्रति वर्ष यहाँ २७ इंच होती है। नगर के बाहर प्रायः कब्रिस्तान है।
पाठभेद : श्लोक संख्या ३४९ में 'शारीटके' का पाठभेद 'हारटठ' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : ३४९ (१) सूत्र : जिस स्थान पर सूत्र-लगा था वहीं पर प्रवरपुर की स्थापना राजा प्रवरसेन ने की। वही वर्तमान श्रीनगर है। श्रीनगर टिप्पणी पृष्ठ १३८ पर द्रष्टव्य है। (२) शारिका देवी के कारण हरिपर्वत का नाम शारिका पर्वत पड़ गया है। यह श्रीनगर में ही एक प्रकार से नगर बढ़ने के कारण आ गया है। शारिका पर्वत पर सम्राट् अकबर ने दुर्ग निर्माण कराया था। यह किला भी अच्छी अवस्था में स्थित है। पर्वत की ढाल पर शारिका देवी का तीर्थ स्थान है। मैं जिस समय पहली बार यहाँ पहुंचा उस समय शारिका देवी तक पहुँचने के लिए राज्य सरकार की तरफ से पत्थर की सीढ़ियाँ बनवायी जा रही थीं।
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