भारतकोश
संग्रह पर लौटें

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

५२६ राजतरंगिणी इत्थं स्थिते परं कंचित्त्वदीयोऽस्मीति शंसता । न नेया भवता राजन्वयमात्मा च लाघवम् ॥ २४५ ॥ २४५. 'ऐसी स्थिति में हे राजन् ! किसी अन्य से 'तुम्हारा हूँ' यह कहकर आप स्वयं तथा हम लोगों का गौरव लाघव न करें।' इति तैस्तथ्यमुक्तोऽपि संस्मरन्स्वामिसत्क्रियाम् । मातृगुप्तो महीपालः क्षणमासीत्कृतस्मितः ॥ २४६ ॥ २४६. इस प्रकार उनके यथार्थ कहने पर भी महीपाल मातृगुप्त स्वामी के समादर को स्मरण करते हुए क्षण भर सस्मित रहा। दानेन सुदिनं कुर्वन्नवराज्योचितेन सः । तत्रैव मङ्गलोदग्रं तदहो निरवर्तयत् ॥ २४७ ॥ २४७. उसने नव राज्योचित प्रचुर दान द्वारा मंगलमय उस दिन को सुदिन करते हुए (उसे) वहीं व्यतीत किया। पुरप्रवेशायान्त्येद्युरर्थ्यमानोऽथ मन्त्रिभिः । अद्भुतप्राभृतं दूतं राज्यदातुर्व्यसर्जयत् ॥ २४८ ॥ २४८. दूसरे दिन मन्त्रियों ने पुर प्रवेश हेतु प्रार्थना की। अद्भुत भेंट के साथ दूत को राज्यदाता (विक्रमादित्य) के पास भेजा। देशोन्नत्यानुसारेण स्पर्धामिव च तां विदन् । स्वामिनो मनसि हीतः सागसं स्वममन्यत ॥ २४९ ॥ २४९. देश की समृद्धि के अनुसार उसे स्वामी की स्पर्धा तुल्य जानते हुये, मन में लज्जित हुआ और अपने को अपराधी समझा। अथाहूयपरान्भृत्यान्वक्तु सेवास्मृतिं प्रभोः । अल्पार्घाण्यपि सात्म्यानि प्राहिणात्प्राभृतानि सः ॥ २५० ॥ २५०. उसने प्रभु की सेवा स्मृति को कहने के लिये दूसरे भृत्यों को बुलाकर स्वल्प मूल्यों के भी (नृप के) तदनुरूप भेंट भेजीं


श्लोक संख्या ४ 'अपरं', 'वे' संख्या २५० में ' - ण्य' का 'अल्पा- का 'कश्चित्' 'किंचि' भेद 'राज र्घिय' तथा ' का पाठभेद मिलता है। 'स्वात्म्यानि'

तृतीय तरंग ५२७ असामान्यान्गुणांस्तस्य स्मरन्पर्यश्रुलोचनः । स्वयं लिखित्वा श्लोकं च स्वकमेकं व्यसर्जयत् ॥ २५१ ॥ २५१. असामान्य उसके गुणों का स्मरण करते हुये उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गये। स्वयं लिखकर उसने अपना एक श्लोक भेजा। नाकारमुद्वहसि नैव विकत्थसे त्वं दित्सां न सूचयसि मुञ्चसि सत्फलानि । निःशब्दवर्षणमिवाम्बुधरस्य राज- न्संलक्ष्यते फलत एव तव प्रसादः ॥ २५२ ॥ २५२. "हे राजन् ! आप अपना आकार नहीं बदलते, आत्म श्लाघा नहीं करते, दान करने की इच्छा बिना प्रकट किये फल प्रदान करते हैं। जलद के निःशब्द वर्षण तुल्य फलित ही आपकी कृपा दिखायी पड़ती है।" ततः प्रविश्य नगरं सैन्यैः पिहितदिक्तटैः । क्रमागतामिव महीं यथावत्पर्यपालयत् ॥ २५३ ॥ २५३. तदनन्तर दिक्तट को आच्छादित करनेवाले सैनिकों के साथ नगर प्रवेश कर परम्परा प्राप्त तुल्य पृथिवी का यथावत् परिपालन किया। त्यागे वा पौरुषे वापि तस्यौचित्योन्नतात्मनः । क्ष्माभुजस्तर्कुक¹स्येव नाभूत्परमितेच्छता ॥ २५४ ॥ २५४. त्याग या पौरुष में भी औचित्य से उन्नतात्मा वह; याचक (तर्कुक १) के तुल्य परिमित (इच्छा) आकाङ्क्षी नहीं हुआ। यष्टुं यज्ञान्धृतोद्योगस्त्यागी विततदक्षिणान् । पशुबन्धमनुध्याय करुणाकूर्णितोऽभवत् ॥ २५५ ॥ २५५. (उस) त्यागी ने प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञ करने के लिये उद्योग किया किन्तु पशुवध का ध्यान कर करुणापूर्ण हो गया। पादटिप्पणियाँ : २५२ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ६८ वा श्लोक है। पाठभेद : श्लोक संख्या २५४ में 'चित्योन्नतात्मन :' का 'नत्योचित्वात्मनः' तथा 'तर्कुकस्येव' का पाठभेद 'याचकस्येव' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २५४ ( १ ) तर्कुक : कुछ अनुवादकों में तर्कुक का अर्थ तकुवा लगाया है। परन्तु यह अर्थ यहाँ नही बैठता है। इसका पाठभेद 'याचकस्येव' भी मिलता है। वह यहा पर संगत है। पाठभेद : श्लोक संख्या २५५ में 'कूर्णितो' का पाठभेद 'कुञ्चितो' तथा 'कूजितो' मिलता है।

५२६ राजतरंगिणी इत्थं स्थिते परं कंचिच्चदीयोऽस्मीति शंसता । न नेया भवता राजन्वयमात्मा च लाघवम् ॥ २४५ ॥ २४५. 'ऐसी स्थिति में हे राजन् ! किसी अन्य से 'तुम्हारा हूँ' यह कहकर आप स्वयं तथा हम लोगों का गौरव लाघव न करें।' इति तैस्तथ्यमुक्तोऽपि संस्मरन्स्वामिसत्क्रियाम् । मातृगुप्तो महीपालः क्षणमासीत्कृतस्मितः ॥ २४६ ॥ २४६. इस प्रकार उनके यथार्थ कहने पर भी महीपाल मातृगुप्त स्वामी के समादर को स्मरण करते हुए क्षण भर सस्मित रहा । दानेन सुदिनं कुर्वन्नवराज्योर्जितेन सः । तत्रैव मङ्गलोदग्रं तदहो निरवर्तयत् ॥ २४७ ॥ २४७. उसने नव राज्योचित प्रचुर दान द्वारा मंगलमय उस दिन को सुदिन करते हुए ( उसे ) वहीं व्यतीत किया । पुरप्रवेशायान्थेद्युरभ्यर्थ्यमानोऽथ मन्त्रिभिः । अद्भुतप्राभृतं दूतं राज्यदातुर्व्यसर्जयत् ॥ २४८ ॥ २४८. दूसरे दिन मन्त्रियों ने पुर प्रवेश हेतु प्रार्थना की। अद्भुत भेंट के साथ दूत को राज्यदाता (विक्रमादित्य) के पास भेजा । देशौन्नत्यानुसारेण स्पर्धामिव च तां विदन् । स्वामिनो मनसि हीतः सागसं स्वममन्यत ॥ २४९ ॥ २४९. देश की समृद्धि के अनुसार उसे स्वामी की स्पर्धा तुल्य जानते हुये, मन में लज्जित हुआ और अपने को अपराधी समझा । अथाहूयपरान्भृत्यान्वक्तुं सेवास्मृतिं प्रभोः । अल्पार्घाण्यपि सात्म्यानि प्राहिणोत्प्राभृतानि सः ॥ २५० ॥ २५०. उसने प्रभु की सेवा स्मृति को कहने के लिये दूसरे भृत्यों को बुलाकर स्वल्प मूल्यों के भी (नृप के) तदनुरूप भेंट भेजा । श्लोक संख्या २४५ में 'परं' का 'अपरं'; 'कंचि' श्लोक संख्या २५० में 'अल्पार्घाण्य' का 'अल्पा- का 'क्वचि' 'किंचि' तथा 'राजन्' का पाठभेद 'राजा' र्ध्याण्य, 'अनर्घ्याण्य' तथा 'सात्म्यानि' का पाठभेद मिलता है । 'साद्यानि' तथा 'स्वात्म्यानि' मिलता है।

तृतीय तरंग ५२७ असामान्यगुणस्तस्य स्मरन्पर्यश्रुलोचनः । स्वयं लिखित्वा श्लोकं च स्वकमेकं व्यसर्जयत् ॥ २५१ ॥ २५१. असामान्य उसके गुणों का स्मरण करते हुये उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गये। स्वयं लिखकर उसने अपना एक श्लोक भेजा। नाकारमुद्वहसि नैव विकत्थसे त्वं दित्सां न सूचयसि मुञ्चसि सत्फलानि । निःशब्दवर्षणमिवाम्बुधरस्य राज- न्संलक्ष्यते फलत एव तव प्रसादः ॥ २५२ ॥ २५२. "हे राजन् ! आप अपना आकार नहीं बदलते, आत्म श्लाघा नहीं करते, दान करने की इच्छा बिना प्रकट किये फल प्रदान करते हैं। जलद के निःशब्द वर्षण तुल्य फलित ही आपकी कृपा दिखायी पड़ती है।" ततः प्रविश्य नगरं सैन्यैः पिहितदिक्तटैः । क्रमागतमिव महीं यथावत्पर्यपालयत् ॥ २५३ ॥ २५३. तदनन्तर दिक्तट को आच्छादित करनेवाले सैनिकों के साथ नगर प्रवेश कर परम्परा प्राप्त तुल्य पृथिवी का यथावत् परिपालन किया। त्यागे वा पौरुषे वापि तस्यौचित्योन्नतात्मनः । क्ष्माभुजस्तर्ककस्येव नाभूत्परिमितैच्छना ॥ २५४ ॥ २५४. त्याग या पौरुष में भी औचित्य से उन्नतात्मा वहः याचक (तर्कक) के तुल्य परिमित (इच्छा) आकाङ्क्षी नहीं हुआ। यष्टुं यज्ञान्प्रभूतोद्योगस्त्यागी विनतदिग्गजः । पशुबन्धमनुध्याय करुणापूर्णतामगात् ॥ २५५ ॥ २५५. (उस) त्यागी ने प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञ करने के लिये उद्योगशील होकर भी पशुवध का ध्यान कर करुणापूर्ण हो गया। पादटिप्पणियाँ : २५२ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ६८ वां श्लोक है। .ठभेद पाठभेद : श्लोक संख्या २५४ में 'चित्योन्नतात्मनः' के स्थान पर लौकिक 'नत्योचितात्मनः' तथा 'तर्ककस्येव' का पाठभेद पर पानी 'माषकस्येव' मिलता है। फिरा जाना

५२८ राजतरंगिणी अमारमादिदेशाथ यावद्राज्यं स्वमण्डले । चूर्णीकृत्य सुवर्णादि प्रददौ च करम्भकम् ॥ २५६ ॥ २५६. अपने सम्पूर्ण ( मण्डल ) राज्य में अहिंसा का आदेश दिया और स्वर्ण चूर्ण आदि करम्भक¹ प्रदान किया । करम्भके कीर्यमाणे मातृगुप्तेन भूभुजा । वैतृष्ण्यमुन्मिषत्पोषो न को नाम न्यपेथत ॥ २५७ ॥ २५७. भूभुज मातृगुप्त के करम्भक प्रदान करने पर सन्तुष्ट हुआ कौन असन्तोष ( वितृष्णा ) को प्राप्त किया । गुणी च दृष्टकष्टश्च वदान्यश्च स पार्थिवः । विक्रमादित्योऽप्यासीदभिगम्यः शुगार्थिनाम् ॥ २५८ ॥ २५८. गुणी, कष्टदर्शी, वदान्य यह नृपति शुभाथियों के लिये विक्रमादित्य से भी अधिक अभिगम्य था । विवेचकतया तस्य श्लाघ्यया सुरभीकृताः । लक्ष्मीविलासाः क्ष्माभर्तुरशोभन्त मनीषिषु ॥ २५६ ॥ २५९. उस राजा की श्लाघ्य विवेकशीलता से सुरभित लक्ष्मी विलास मनीषियों से सुशोभित हुई । हयग्रीववधं मेण्ठस्तदग्रे दर्शयन्नवम् । आसमाप्ति ततो नापत्साध्वसाध्विति वा वचः ॥ २६० ॥ २६०. ( जब ) मेण्ठ उसके समक्ष नवीन हयग्रीववध¹ सुना ( प्रदर्शित कर ) रहा था समाप्ति पर्यन्त उससे "साधु या असाधु" वाणी नहीं सुनी ।


[बायाँ स्तम्भ : पादटिप्पणियाँ] पादटिप्पणियाँ : २५६ ( १ ) करम्भक : इसका अर्थ खिचड़ी होता है। कश्मीर में खिचड़ी ब्राह्मणों को देने का प्राचीन रिवाज था। काशी आदि स्थानों में खिचड़ी दरिद्र नारायण का भोजन माना जाता है। इसी प्रकार पुलाक जिसका अपभ्रंश वर्तमान पुलाव है प्राचीन भारत में प्रिय भोजन था। पुलाव सामिष तथा निरामिष दोनों बनता था। निरामिष में मेवा तथा सब्जी डालकर बनाया जाता था। सामिष पुलाव में भोजनीय मांस डाला जाता था। करम्भक का उल्लेख पुनः रा० त० ५.१६ में भी कल्हण ने किया है।

[दायाँ स्तम्भ : पाठभेद एवं पादटिप्पणियाँ] पाठभेद : श्लोक संख्या २५७ में 'वैतृष्ण्य' का पाठभेद 'वैतृष्य' मिलता है। श्लोक संख्या २५८ में 'वदान्य' का पाठभेद 'वदन्य' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २६० ( १ ) हयग्रीव वध : हयग्रीव का उल्लेख कुछ स्थानो पर महाकाव्य तथा अनेक स्थानों पर नाटक रूप में किया गया है। वह अत्यन्त सुन्दर काव्य है। अबतक यह काव्य पूर्ण रूप में नहीं प्राप्त हुआ है। इसको उल्लेख कवि राजशेखर न

तृतीय तरंग ५२१ अथ ग्रथयितुं तस्मिन्पुस्तकं प्रस्तुते न्यधात् । लावण्यनिर्याणभिया तदधः स्वर्णभाजनम् ॥ २६१ ॥ २६१. जब वह पुस्तक समेट रहा था—तो उसके नीचे स्वर्णपात्र, लावण्य¹ परिगलन भय से राजा ने रख दिया । अन्तरज्ञतया तस्य तादृश्या कृतसत्कृतिः । भर्तृमेण्ठः कविर्मेने पुनरुक्तं श्रियोऽर्पणम् ॥ २६२ ॥ २६२. नृप की उस प्रकार की अन्तरज्ञता से सत्कृत होकर कवि भर्तृमेण्ठ ने लक्ष्मी का प्रदान पुनरुक्त ( निःप्रयोजन ) माना ।

किया है। उसने अपने पूर्वजन्मों में वाल्मीकि भर्तृमेण्ठ तथा भवभूति होना लिखा है । बभूव वल्मीकभवः पुरा कवि- स्ततः प्रपेदे भुवि भर्तृमेण्ठताम् । स्थितः पुनर्यो भवभूतिरेखया स राजते सम्प्रति राजशेखरः । ( बालरामायण ) विनिर्गतं मानदमात्ममन्दिरा त्स सम्भ्रमेन्द्रद्रुतपातितार्गला । क्षेमेन्द्र ने सुवृत्ततिलक तथा मंख ने श्रीकंठ- चरित ( २:५३ ) में मेण्ठ का उल्लेख किया है। मंख ने उसे सुबन्धु, भारवि तथा बाण के समकक्ष रखा है। सुभाषितावली में मेण्ठ की कविताओं का उद्धरण दिया गया है। हेमचन्द्र ने अलंकार- चूडामणि में हयग्रीव वध को काव्य माना है । काव्यप्रकाश तथा साहित्यदर्पण में मेण्ठ तथा उसके काव्य का उल्लेख मिलता है । डाक्टर श्री भाऊदाजी ने राघव भट्ट के शकुन्तला भाष्य में मेण्ठ के पद्यों को पाया है। कश्मीरी कवियों में मेण्ड अन्यतम कवि हैं । यह प्रबन्ध कवि हैं । राज्यसभा के कवि थे । हयग्रीव वध के श्लोक सूक्ति ग्रन्थों में उद्धृत हैं। राजशेखर ने इन्हें वाल्मीकि का अवतार माना है। अश्वशिरस् तथा हयग्रीव दोनों शब्दों का उल्लेख पुराणों में मिलता है । महाभारत में उल्लेख ६७

आता है कि और्व का क्रोध समुद्र में निक्षेप हुआ तो उसमें हयशिरस् की उत्पत्ति हुई । पुनः उल्लेख मिलता है कि हयग्रीव नरक का सेनापति था। भागवत पुराण के अनुसार विष्णु ने हयग्रीव का वध किया था । ( ११:४:१७ ) विष्णु तथा मारकण्डेय पुराण में उल्लेख है कि भगवान् विष्णु भद्राश्व में हयशिरस् रूप से उत्पन्न हुए थे । ( विष्णु० १:२:५० ; मारक० ५५ ) कालिका पुराण के अनुसार हयग्रीव ने ज्वरासुर को मारा था । ( कालिका० ८१:९६ ) देवी भागवत में विष्णु हयग्रीव ने असुर हयग्रीव का वध किया था ( देवीभागवत १:४ ) । असमी साहित्य में उल्लेख मिलता है कि ऋषि उर्व के कहने पर विष्णु ने हयासुर, जो मणिकूट पर निवास करता था, वध किया था । अन्तिम समय असुर ने प्रार्थना की कि भगवान् स्वयं हयसुर का रूप धारण कर मणिकूट पर निवास करें। नील मत में हयग्रीव अवतार का उल्लेख है । पाठभेद : श्लोक संख्या २६१ में ‘ग्रथयितुं’ का पाठभेद ‘ग्रन्थयितुं’ मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २६१ (१) लावण्य—लावण्य का लौकिक अर्थ पानी है। स्त्री पर पानी है। मोती पर पानी है। इसका अर्थ स्त्री पर लावण्य है किया जाता

५३० राजतरंगिणी स मातृगुप्तस्वाम्याख्यं निर्ममे मधुसूदनम् । कालेनादत्त यद्ग्रामान्मम्मः स्वगुरसद्मने ॥ २६३ ॥ २६३. उसने मातृगुप्त स्वामी' नामक मधुसूदन ( मन्दिर ) का निर्माण कराया, उनपर लगे ग्रामों को मम्म² ने कालान्तर में अपने देव मन्दिर हेतु ले लिया । इत्यासादितराज्यस्य शासतः क्ष्मां क्षमापतेः । त्रिमासोना ययुस्तस्य मैकाहाः पञ्च वत्सराः ॥ २६४ ॥ २६४. इस प्रकार राज्य प्राप्त कर पृथ्वी का शासन करते उस नृपति का तीन मास एक दिवस कम पाँच वर्ष व्यतीत हुआ । कृतार्थतां तीर्थतोयैराञ्जनेयो नयन्पितॄन् । जातं तादृशमश्रोपीत्स्वस्मिन्देशे पराक्रमम् ॥ २६५ ॥ २६५. आञ्जनेय ( प्रवरसेन ) ने जो कि, तीर्थों में जल से पित्रों¹ को कृत-कृत्य कर रहा था, इस प्रकार सुना—'स्वदेश पर आक्रमण² हुआ है।'

उचित है । लावण्य सौन्दर्य के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है । शब्दकल्पद्रुम में लावण्य की परिभाषा की गयी है : मुक्ताफलेषु छायायास्तरळत्वमिवान्तरा । प्रतिभाति यदङ्गेषु तल्लावण्यमिहोच्यते ॥ काव्य का यह रस नीचे चू न जाय इसलिए स्वर्णपात्र रख दिया । पाठभेद : श्लोकसंख्या २६३ में 'मम्म' का, 'तन्मः' 'मस्मः', तथा 'श्वसुर' का पाठभेद 'श्वशुर,' तथा 'स्वदेव- गुहाय' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २६३ (१) मातृगुप्त स्वामी—इस मन्दिर का उल्लेख पुनः कहीं नहीं मिलता । यह मन्दिर कहाँ था इसका पता भी नहीं चलता । (२) मम्म—मम्म ने मन्दिर कहाँ बनवाया था उल्लेख नहीं मिलता । मम्म का यह मन्दिर विष्णु मन्दिर था । यह श्लोक नं० ४:६९८ से प्रगट होता है । यह स्पष्ट निर्देश है कि मम्म ने मम्म स्वामी का मन्दिर निर्माण कराया था । स्वामी एवं ईश्वर शब्दों के साथ विष्णु तथा शिव मन्दिर समझना चाहिये । इसके लिये पृष्ठ १४७ की पाद टिप्पणी द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोकसंख्या २६५ में 'नयन्' का 'अनयत्' तथा 'पराक्रमम्' का पाठभेद 'पराभवम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २६५ (१) पित्रः यहाँ पित्र तर्पण के अर्थ जो लगाना चाहिये सन्ध्या करते समय तथा श्राद्ध के समय किया जाता है । (२) आक्रमण : कल्हण ने यहाँ पर पराक्रम शब्द का मूलतः प्रयोग किया है । अनुवादको ने उसका अर्थ हरण अर्थात् राज्य का बलात् ले लेना किया है । मैने यहाँ आक्रमण शब्द रखा है । धन, सम्पत्ति, राज्य सभी पर आक्रमण करने के भाव का समावेश हो जाता है ।

तृतीय तरंग ५३१ पितृशोकाद्व्रता तस्य क्रोधेनान्तरधीयत । तरोरिवाऽर्कतापेन नैशाम्बुलवसिक्तता ॥ २६६ ॥ २६६. उसकी पितृशोकार्द्रता क्रोध से वैसे ही अन्तर्हित हो गयी—जैसे रवि ताप से तरु की रात्रि कालीन जलसिक्तता । श्रीपर्वते पाशुपतव्रतिवेषस्तमागतम् । आचख्यावश्वपादाह्यः सिद्धः कन्दाशनं ददत् ॥ २६७ ॥ २६७. जब वह श्री' पर्वत पर आया तब उसे पाशुपत² व्रती वेश अश्वपाद नामक सिद्ध कन्द भोजन देते हुए कहा— २६७ (१) श्रीपर्वत—श्रोपर्वत किंवा श्री शैल के लिये विष्णुपुराण २:१४१ तथा ५:११८ द्रष्टव्य है । (२) पाशुपत : नाट्य शास्त्र के अनुसार इस पंथ का अनुयायी नृत्य एवं गान से अपना भक्ति भाव प्रकट करता है । कालान्तर मे तन्त्र शास्त्र के विकास के साथ शिव पुरुष रूप तथा पार्वती स्त्री शक्ति किंवा प्रकृति रूप में चित्रित गये हैं । श्री शंकराचार्य ने पाशुपत सम्प्रदाय के पाँच सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है—(१) कार्य, (२) कारण, (३) योग (४) विधि तथा (५) दुःखान्त । कार्य तीन प्रकार के हैं—(१) विद्या (१) अविद्या तथा (३) पशु । विद्या दो प्रकार की है—बोध स्वभावा तथा (२) अबोधस्वभावा । बोध स्वभावा विद्या दो प्रकार का है--(१) व्यक्त तथा (२) अव्यक्त । पशु दो प्रकार का होता है— (१) मलयुक्त तथा (२) निर्मल । (२) कारण—समस्त वस्तुओं की सृष्टि, संहार तथा अनुग्रह करने वाले तत्त्व को कारण कहते हैं । गुण एवं कार्य के भेदों के कारण इसके अनेक रूप हो जाते हैं । (३) योग—ईश्वर के साथ चित्त के सम्बन्ध को जोड़ने वाले साधन को योग कहते हैं । यह दो प्रकार का होता है—(१) क्रिया युक्त तथा (२) क्रियाहीन । (४) विधि—धर्म को सिद्धि करने वाले व्यापार किंवा क्रिया को विधि कहते हैं । विधि दो प्रकार की होती है । (१) प्रधान तथा (२) गौण । इसके भेद—(१) व्रत तथा (२) द्वार हैं ।' भस्म से स्नान, भस्म में शयन, उपहार, जप एवं प्रदक्षिणा व्रत हैं। द्वारचर्या छह प्रकार की होती है (१) क्रायन (२) स्पन्दन (३) मन्दन (४) शृंगारण (५) अवितकरण तथा (६) अविमद् भाषण । चर्या को सहायक विधि गौण विधि कही जाती है । (५) दुःखान्त—दो प्रकार का होता है— (१) अनात्मक तथा (२) सात्मक । अनात्मक दुःखों का पूर्ण क्षय है । सात्मक—जिसमे ज्ञान और कर्म की शक्ति से युक्त ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है । ज्ञान शक्ति पाँच प्रकार की होती है—(१) दर्शन (२) श्रवण (३) मनन (४) विज्ञान तथा (५) सर्वज्ञत्व । क्रिया शक्ति एक होने पर भी त्रिविध है—(१) मनोजवित्व (२) कामरूपित्व (३) विकरणधर्मित्व । शैव सम्प्रदाय के अन्तर्गत चार सम्प्रदाय (१) शैव (२) पाशुपत (३) कारुक सिद्धान्ती तथा (५) कापालिक नामधारी सिद्धान्त आते हैं । पाशुपत सिद्धान्त के प्रतिपादक स्वयं भगवान् पशुपति माने जाते थे । शिवपुराण की वायवीय संहिता (२,२४,१९९ ) द्रष्टव्य है । अन्य ग्रन्थ पंचाध्यायी है। उसका उल्लेख काश्मीर विद्वान् केशव भो करते हैं ।

५३२ राजतरंगिणी जन्मान्तरे लब्धसिद्धिस्त्वामस्म्युपरिगाधकम् । वाञ्छामपृच्छं राज्यार्थमभिलाषस्तु तेऽभवन् ॥ २६८ ॥ २६८. 'जन्मान्तर में तुम मेरे उपरि साधक' (अनुचर) थे। उस समय सिद्धि प्राप्त होने पर मैंने तुम्हारी अभिलाषा पूछी । राज्य की अभिलाषा तुम्हें हुई । सफलं तव कर्तुं तन्मनोरथमनन्यथा । अथ मामित्थमादित्यपारमणशेखरः ॥ २६९ ॥ २६९. 'तुम्हारे मनोरथ की सिद्धि हेतु जब मैं प्रयत्नशील था उस समय क्षपा रमण शेखर (शिव) ने ऐसी दीक्षा दी— गणोऽयं मामकः सिद्धो यस्तवोपरिसाधकः । जन्मान्तरेऽस्य राज्येच्छां कुर्यामहमनान्यथा ॥ २७० ॥ २७०. 'तुम्हारा उपरिसाधक मेरा सिद्ध गण है। जन्मान्तर में इसकी राज्य प्राप्त की इच्छा थी। मैं इसे पूर्ण करूंगा। भावं भवस्तद्भवतो भगवान्दत्तदर्शनः । साफल्यं नेष्यतीत्येवमभिधाय तिरोदधे ॥ २७१ ॥ २७१. 'भगवान् शिव दर्शन देकर तुम्हारा मनोरथ सफल करेंगे'—यह कहकर वह तिरोहित हो गया । साम्राज्येच्छोः समामेकां तत्र तस्य तपस्यतः । लब्धस्मृतिः सिद्धगिरा प्रददौ दर्शनं शिवः ॥ २७२ ॥ २७२. वहाँ एक वर्ष तपस्या करने पर साम्राज्याकांक्षी उसे (शिव ने) सिद्ध वाणी द्वारा स्मरण प्राप्त कर, दर्शन दिया । व्रतिवेषं तमादिष्टवाञ्छितार्थसमर्पणम् । स जगन्निर्जयोन्निद्रं नरेन्द्रत्वमयाचत ॥ २७३ ॥ २७३. वांछित अर्थ समर्पण के लिये कहने वाले उस व्रती वेशधारी (शिव) से जगत् जयसे जागरूक नरेन्द्रता को (प्रवरसेन ने) याचना की। पाठभेद : अलौकिक शक्ति प्राप्ति के लिये जो साधन करता श्लोक संख्या २६८ मे 'साधकम्' का पाठभेद है उसे साधक कहते हैं । 'साधक.' मिलता है । पाठभेद : पादटिप्पणियाँ : श्लोक संख्या २७१ में 'भावं' का पाठभेद २६९ (१) साधक : तन्त्र तथा माहात्म्य से 'भावे' मिलता है ।

तृतीय तरंग ५३३ उपेक्ष्य मोक्षं किं क्ष्माभृद्भोगानिच्छसि भङ्गुरान् । इति जिज्ञासुना भावं शंभुना सोऽभ्यधीयत ॥ २७४ ॥ २७४. 'राजन् ! मोक्ष को उपेक्षित कर क्षण भंगुर भोगों की क्यों इच्छा करते हो ? इस प्रकार भाव जानने के जिज्ञासु शम्भु' ने उससे कहा— स तं बभाषे शंभुं त्वां बुद्ध्वा व्याजतपोधनम् । अभ्यधामिदमद्धा त्वं न स देवो जगद्गुरुः ॥ २७५ ॥ २७५. उसने उनसे कहा—'तुम्हें तपस्वी वेशधारी शम्भु जानकर, यह याचना की थी किन्तु निश्चय ही, वह जगद्गुरु देव तुम नहीं हो। महान्तो ह्यर्थिताः स्वल्पं फलन्त्यल्पेतरत्स्वयम् । उदन्यया वदान्योऽदाद्दुग्धाब्धि स पयोऽर्थिने ॥ २७६ ॥ २७६. स्वल्प पार्थित, महान् जन स्वयं अधिक फल प्रदान करते हैं। उस वदान्य ने पयःप्रार्थी को क्षीरसागर दिया। पादटिप्पणियाँ : २७४ (१) शम्भु : कल्याण सम्पादित करने वाले देव का अर्थ शम्भु होता है। उपक्रमा रुद्र है। शिव कल्याण स्वरूप है। शम्भु रुद्र एवं शिव यद्यपि एक ही शंकर के नाम है, रूप है परन्तु उनका अर्थ भिन्न है। नीलमत पुराण में शम्भु को कालयज्ञोपवीती कहा है। (नी० १०९४, ९००, ९१३, ८८८) पाठभेद : श्लोक संख्या २७६ में 'वदान्ये.' का पाठभेद 'वदन्यो' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७६ (१) पयःप्रार्थी : कल्हण ने यहाँ महा- भारत वर्णित उपमन्यु की कथा की ओर संकेत किया है। उपमन्यु की कथा वायुपुराण अध्याय ५६ में दी गयी है—वीतमन्यु नामक एक वेद वेदांग पारग गृहस्थ एवं महाभाग्य शाली श्रेष्ठ ब्राह्मण था। उसकी धर्मशीला नामक पत्नी थी। उस पत्नी से उसे उपमन्यु नामक पुत्र प्राप्त हुआ। दूध के अभाव में माता चावल पीस कर उसे पिलाया करती थी। उसका रंग दूध की तरह उज्ज्वल होता था। एक दिन अपने पिता के साथ किसी द्विज के यहाँ उसने सुस्वादु खीर खाया। माता ने दूसरे दिन दूध के व्याज से उसे पिसा चावल का पानी दिया तो उपमन्यु ने पीने से अस्वीकार कर दिया। बालक असली दूध के लिये रोने लगा। माता ने भी रोते हुए कहा बिना शिव की कृपा से दूध कैसे मिल सकता है ? शिव की कृपा कैसे प्राप्त होगी इसका उत्तर माता ने दिया—'विरूपाक्ष त्रिशूलधारी महादेव की आराधना करो।' उपमन्यु के पूछने पर कि विरूपाक्ष कैसे हैं माता ने उत्तर दिया—प्राचीन काल में धौदाम नाम प्रसिद्ध एक महान् असुरपति था। उसने लक्ष्मी को समस्त जगत् अतिक्रान्त कर वशवर्तिनी बना लिया था। उस असुर ने तत्पश्चात् वासुदेव से श्रीवत्स प्राप्त करने का प्रयास किया। भगवान् विष्णु असुर वध की कामना से शिव के पास गये। शिव उस समय हिमालय शिखर के चिकने भूतल पर बैठे थे। तदनन्तर विष्णु जी जगन्नाथ के समीप गये। और अपने द्वारा स्वयं अपनी आराधना की। वे एक सहस्र वर्ष पैर के अँगूठे पर खड़े रह कर तपस्या करने लगे। महादेव ने प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु को सुदर्शन चक्र

५३४ राजतरंगिणी अस्य वैक्लव्यकैवल्यलाभनिश्चलचेतसः । नो चेत्स्यभिजनस्याभिभृतिं मर्मव्यथायहाम् ॥ २७७ ॥ २७७. 'कैवल्य प्राप्ति से भी अशान्त चित्त वाले इसके कुल के मर्म व्यथाकारी तिर- स्कार को क्या आप नहीं जानते ?' जगत्परिवृढः प्रौढप्रीतिस्तं सफलार्थनम् । कृत्व। प्रादुष्कृतवपुस्ततो भूयोऽभ्यभाषत ॥ २७८ ॥ २७८. उसे सफल मनोरथ करके अत्यन्त प्रसन्न जगन्नाथ शरीर धारणकर पुनः बोले- मज्जतो राज्यसौख्येषु सायुज्यावाप्तिदूतिकाप् । मदाज्ञयाऽश्वपादस्ते संज्ञां काले करिष्यति ॥ २७९ ॥ २७९. 'अश्वपाद मेरी आज्ञा से समय पर राज सुखों में निमग्न तुम्हें सायुज्य' प्राप्ति का सन्देश वाहिका-संज्ञा प्रदान करेगा । इत्युक्तवाऽन्तर्हिते देवे स कृतव्रतपारणः । अगच्छदश्वपाद तमापृच्छ्याऽभिमतां भुवम् ॥ २८० ॥ २८०. यह कह कर देव के अन्तर्हित हो जाने पर उसने व्रत का पारण किया और अश्वपाद से आज्ञा लेकर अभिमत भूमि की ओर गया । प्रदान किया। सुदर्शन चक्र द्वादश अरो, छह नाभियों, एवं दो युगों से युक्त था। चक्र को अमोघ शक्ति जानने की जिज्ञासा पर शंकर ने विष्णु से अपने ही ऊपर चलाने के लिये कहा । शंकर पर विष्णु ने चक्र चलाया। शंकर के शरीर के तीन भाग हो गये। प्रथम भाग का नाम हिरण्याक्ष, दूसरे का सुवर्णाक्ष तथा तृतीय का विरूपाक्ष नाम पड़ा। विष्णु ने उस चक्र द्वारा दामा का वध किया । उस असुर के वध के पश्चात् विष्णु ने विरूपाक्ष शंकर की उपासना की। तत्पश्चात् क्षीर सागर चले गये। यदि तुम दूध चाहते हो तो विरूपाक्ष शंकर की उपासना करो। उपमन्यु ने शिव विरूपाक्ष की उपासना कर दुग्ध प्राप्त किया । पाठभेद : श्लोक संख्या २७७ में 'वैक्लव्य' का 'वैक्लप' तथा “कैवल्य” का पाठभेद "कैवल्या" मिलता । श्लोक संख्या २७८ में 'म्यभाषत' का पाठभेद 'व्यभाषत' मिलता है। श्लोक सख्या २७९ मे 'मज्जतो' का 'सजमो' तथा 'सायुज्या' का पाठभेद 'सायुग्या' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७९ (१) सायुज्य : पाँच प्रकार की मुक्ति होती है। सायुज्य में आत्मा परमात्मा मे लीन होकर एकाकार हो जाता है। पाठभेद : श्लोक सख्या २८० 'अगच्छ' का पाठभेद 'आगच्छ' मिलता है।

तृतीय तरंग ५३५ ततो विदितवृत्तान्तो मातृगुप्ताभिषेणनात् । निषिध्य सविधायातानामात्यानब्रवीद्वचः ॥ २८१ ॥ २८१. तदुपरान्त (सब) वृत्तान्त जानकर पूजाहेतु उद्यत हो, आये हुये, अमात्यों को निवारित कर बोला- विक्रमादित्यमुत्सिक्तमुच्छेत्तुं यतते मनः । मातृगुप्तं प्रति न नो रोषेणारूषितं मनः ॥ २८२ ॥ २८२. 'मेरा मन गर्वीले विक्रमादित्य को उच्छेद के लिये प्रयत्नशील है, मातृगुप्त के प्रति क्रोध से मेरा मन रूक्ष नहीं है। अप्रियैरपि निष्पिष्टैः किं स्यात्क्लेशासहिष्णुभिः । ये तदुन्मूलने शक्ता जिगीषा तेषु शोभते ॥ २८३ ॥ २८३. क्लेश न सह सकने वाले एवं निष्पिष्ट शत्रुओं में क्या रखा है ? जो अपने उन्मूलन में समर्थ हैं, उन्हीं में विजयेच्छा शोभित होती है । यान्यब्जान्यदयं द्विषन्ति शशिनः कोऽन्यस्ततोऽसंमत- स्तन्निर्माथिकरीन्द्रदन्तदलनं यन्नाम कोऽयं नयः । सामर्थ्यप्रथनाय चित्रमसमैः स्पर्धां विधूयोन्नता ये तेषु प्रभवन्ति तत्रजहति व्यक्तं प्ररूढा रुषः ॥ २८४ ॥ २८४. 'जो कमल' चन्द्रोदय द्वेषी हैं, उनसे बढ़कर असम्यत (शत्रु) दूसरा कौन है ? उनका निर्मन्थन कर्त्ता करीन्द्र (हाथी) के दन्त का दलन जो चन्द्र करता है, यह कौन आश्चर्य है। उन्नत जन सामर्थ्य प्रख्यात करने के लिये, असम जनों के साथ स्पर्धा त्यागकर, जो उनमें समर्थ हैं, वहाँ उग्र क्रोध का प्रदर्शन करते हैं। श्लोक संख्या २८३ में 'क्लेशास' का पाठभेद होने और सूर्योदय के साथ ही उसकी पंखुड़ी बन्द हो 'क्लेशस' मिलता है। जाती है। इस प्रकार शशी कमल का प्रवृत्तितः श्लोक संख्या २८४ में 'विधूय' का पाठभेद शत्रु है । कल्हण यहाँ शशि की उज्ज्वलता को गज- 'विधाय' मिलता है । दन्त अर्थात् हाथी दांत से तुलना करता दांत की पादटिप्पणियाँ : उज्ज्वलता को श्रेष्ठ बताता है। इस प्रकार शशी २८४ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह को गज विरोधी चित्रित किया गया है। हाथी दाँत ७०वा श्लोक है । शशि रश्मि से चिनक जाता है। गज कमल का (२) कमलः कमल सूर्योदय के साथ शत्रु माना गया है। वह सरोवर में प्रवेश करता मुकुलित होता है और सूर्यास्त के साथ उसके पटल है और कमल दल को नष्ट कर देता है । तरंग बन्द हो जाते हैं। कुमुदिनी रात्रि में चन्द्रोदय के ७:१०९९ तथा ८:२८५६, २८६५ तथा २१४२ साथ मुकुलित होती है। चन्द्र किरणों के तिरोहित द्रष्टव्य हैं।

५३६ राजतरंगिणी त्रिगर्तानां भुवं जित्वा स व्रजन्नथ भूपतिः । विक्रमादित्यमशृणोत्कालधर्ममुपागतम् ॥ २८५ ॥ २८५. त्रिगर्त भूमि विजित कर जाते हुए उसने विक्रमादित्य को दिवंगत हुआ सुना। तस्मिन्नहनि भूभर्त्रा शोकान्निश्वसताऽनिशम् । नास्नायि नाशि नास्वापि स्थितेनावनताननम् ॥ २८६ ॥ २८६. उस दिन अवनतानन (अधोवदन) स्थित राजा ने शोक से निःश्वास लेते हुये; स्नान, भोजन एवं शयन भी नहीं किया। स्थिर रहा। अन्येद्युर्धमुत्सृज्य काश्मीरेभ्यो विनिर्गतम् । शुश्राव मातृगुप्तं स नातिदूरे कृतस्थितिम् ॥ २८७ ॥ २८७. दूसरे दिन उसने सुना—मातृगुप्त भूमि त्याग, कश्मीर से बहिर्गत हो कर, बहुत दूर पर स्थित नहीं (समीप) ही है। कैश्चिन्निर्वासितो मा स्विन्मदीयैरिति शङ्कितः । ययौ प्रवरसेनोऽस्य पार्श्वं मितपरिच्छदः ॥ २८८ ॥ २८८. मेरे किसी पक्षपाती द्वारा निर्वासित कर दिया गया हो, इस शंका से प्रवर- सेन परिमित जनों के साथ उसके पास गया। मैं अपने अनुभव से बता सकता हूँ कि कमल, हाथी दाँत, शशि की उपमा कल्हण ने सत्यता के आधार पर दी है। मेरे पास हाथी था। उसका दाँत बड़ा था। हम प्रायः बालपन में हाथी के पास जाते थे। उसे ईख खाने को दिया जाता था। ईख में ही रोटी मिला दी जाती थी। उन दिनों मेरी हाथी दस सेर आटा की रोटी प्रतिदिन खाता था। रामलीला के पश्चात् अगहन मास में वह जमीन्दारो पर भेज दिया जाता था। मैं भी एक बार गया था। संयोग से मेरे एक बड़े सरोवर में खूब कमल खिला था। हाथी उस ओर जाने के लिये उत्सुक हो गया। मैं उसपर बैठा था। महावत के मना करने पर हमारी जिदपर वह सरोवर में लाया गया। सरोवर में पैठते ही वह कमलों को उखाड़कर फेंकने लगा। बाहर निकला तो सूँड में कमल को उछालता लाया। रात्रि में मैंने एक बार देखा कि महावत चाँदनी रात में दाँत पर कपड़ा लपेट देता था। पूछने पर कोई जवाब नही दे सका। केवल यही कहा कि बाप दादों के समय से यह होता आया है। वह भी करता है। कल्हण का वह श्लोक पढ़ने पर मुझे स्मरण आया कि दाँत चिनक न जाय इसलिये उसपर चाँदनी में कपड़ा लपेट दिया जाता था। परन्तु मैंने देखा है कि हाथी दाँत चिनक जाते हैं। उनको लम्बी चिनक पंक्ति बन जाती है। इससे हाथी दाँत का मूल्य कम हो जाता है। पाठभेद : श्लोक संख्या २८६ में 'निश्र्वस' का 'निश्वस' तथा 'नास्नायि' का पाठभेद 'नाम्नापि' और 'माम्नापि' मिलता है।

तृतीय तरंग ५३७ कृतार्हणं सुखासीनं ततः पप्रच्छ तं शनैः । विनयावनतो राजा राज्यत्यागस्य कारणम् ॥२८६॥ मातृगुप्त का राज त्याग २८९. इसके पश्चात् विनयावनत राजा ने नमस्कार कर, सुखपूर्वक बैठे, उससे धीरे से राज त्याग का कारण पूछा । बभाषे तं क्षणं स्थित्वा स निश्वस्य विहस्य च । गतः स सुकृतो राजन् येन भूमिभुजो वयम् ॥२९०॥ २९०. वह कुछ क्षण स्थिर हो, निःश्वास लेकर, विहँसकर, बोला—'हे राजन् ! जिसके द्वारा मैं राजा था वह सुकृती गत हो गया । यावन्मूर्ध्नि रवेः पादास्तावद् द्योतयते दिशः । द्योतयेन्नान्यथा किं न ग्रावैव तपनोपलः ॥२६१॥ २९१. 'जब तक मूर्धा पर सूर्य की किरणें रहती हैं, तब तक सूर्यकान्त मणि दिशाओं का ज्योतिर्मय करती है, अन्यथा नहीं, तो क्या वह पत्थर मात्र नहीं है । अथ राजाऽभ्यधात्केन राजन्नपकृतं तव । यत्प्रत्यपचिकीर्षार्थं तमीशमनुशोचसि ॥२९२॥ २९२. राजा ने कहा—'हे राजन् ! आपका किसने अपकार किया है ? जिसके प्रतिकार करने की इच्छा से उस स्वामी के लिये आप शोक करते हैं ? मातृगुप्तस्ततोऽवादीत्कोपस्मितसिताधरः । अस्मानुत्सहते कश्चिन्नापकर्तुं बलाधिकः ॥२६३॥ २९३. तदनन्तर क्रोध पूर्ण स्मिति से सिताधर मातृगुप्त बोला—'कोई बलाधिक हमारा अपकार करने में समर्थ नहीं है । नयता गण्यतामस्मानन्तरङ्गेन तेन हि । न भस्मनि हुतं सर्पिनोंप्तं वा सस्यमूपरे ॥२६४॥ २९४. 'अन्तरङ्ग उस राजा२ ( विक्रमादित्य ) ने मुझे अधिपति बनाकर निश्चय ही भस्म में घृत का हवन तथा ऊसर में बीज वपन नहीं किया है । पादटिप्पणियाँ : 'यत्प्रत्यय' और 'तत्प्रत्यय' मिलता ह । २९१ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह पादटिप्पणियाँ : ७१वां श्लोक हैं। २९४ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह पाठभेद : ७२वां श्लोक हैं । श्लोकसंख्या २९२ में 'यत्प्रत्यप' का पाठभेद ( २ ) राजा : श्लोक का भावार्थ यह ६८

५३८ राजतरंगिणी उपकारं स्मरन्तस्तु कृतज्ञत्ववशंवदाः। पदवीमुपकर्तॄणां यान्ति निश्चेतना अपि ॥२९५॥ २९५. 'कृतज्ञता से वशंवद उपकार स्मरण करने वाले निश्चेतन भी उपकारियों का अनुसरण करते हैं। निर्वाणमनु निर्वाति तपनं तपनोपलः । इन्दुमिन्दुमणिः किंच शुष्यन्तमनु शुष्यति ॥२९६॥ २९६. 'सूर्यकान्त मणि सूर्य के निर्वाण (अस्त) के पश्चात् शान्त हो जाता है। और इन्दुमणि इन्दु के क्षीण होने पर शुष्क हो जाता है। पुण्यां वाराणसीं गत्वा तस्माच्छमसुखोन्मुखः । इच्छामि सर्वसंन्यासं कर्तुं द्विजजनोचितम् ॥२९७॥ २९७. 'अतएव शान्ति सुख का इच्छुक मैं पुण्य वाराणसी जाकर द्विज जनोचित सर्व त्याग करना चाहता हूँ। मणिदीपमिवेशं तमन्तरेणान्धकारिताम् । विभेमि द्रष्टुमप्युर्वी भोगयोगे कथैव का ॥२९८॥ २९८. 'मणि दीप' निभ उस स्वामी के बिना, अन्धकार पूर्ण पृथ्वी को देखने में भी भयभीत होता हूँ। भोग योग का कहना ही क्या ? इत्यौचित्यनिधेस्तस्य वाणीमाकर्ण्य विस्मितः । धीरः प्रवरसेनोऽपि व्याञ्जहारोचितं वचः ॥२९६॥ २९९. इस प्रकार औचित्य विधान की वाणी सुनकर विस्मित धीर प्रवरसेन भी उचित वचन बोला— प्रतीत होता है कि मातृगुप्त को विक्रमादित्य ने जिस (२) सूर्यकान्त मणि : कविपरम्परा के महत्वपूर्ण स्थान पर पहुँचा दिया था वह उसके अनुसार चिन्तामणि सूर्य की रश्मियों से ज्योतिर्मय महानता तथा दूरदर्शिता का परिणाम था । होती है। इन्दुमणि शर्वरी में पिघल जाती है। पाठभेद : पाठभेद : श्लोकसंख्या २९५ में 'वशंवदाः' का पाठभेद श्लोक सख्या २९८ में 'कथैव का' का पाठभेद 'वशीकृता.' मिलता है। 'तु का कथा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : पादटिप्पणियाँ : २९५ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह २९८ (१.) मणिदीप : कल्हण ने पुनः ७१वां श्लोक है। उल्लेख तरंग ४:१५ में 'मणिदीपिकान्' किया है। मणि दीप का यहाँ अर्थ रात्रिकालीन प्रकाश है। २९६ (१) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह २९९ (१) आइने अकबरी में अबुल फजल ७२वां श्लोक है। ने नाम पीवीरसेन दिया है। आइने अकबरी के

तृतीय तरंग ५३१

अनुसार प्रवरसेन हिन्दुस्तान का एक सामान्य व्यक्ति था। एक धार्मिक व्यक्ति ने भविष्यद् वाणी की थी। वह राजा होगा। इस पर वह नगरकोट गया। वहाँ का अधिकारी बन गया। मातृगुप्त ने प्रवरसेन के लिये राज्य त्याग दिया। वह बनारस चला गया और साधारण जीवन व्यतीत करने लगा। प्रवरसेन एक श्रेष्ठ राजा था। उसने काश्मीर की श्रीनगरो बसायी थी। कहा जाता है कि उसमे ३० लाख ६० हजार मकान थे। उसने बहुत दान किया था। प्रवरसेन कश्मीर की ग्यारह वर्षों की मालगुजारी बराबर मातृगुप्त के पास काशी भेजता रहा। मातृगुप्त धन गरीबों में बाँटता था। श्री विल्सन ने प्रवरसेन का राज्यारोहण मूल संवत् के अनुसार सन् १२२-२३ ईस्वी देता है। श्री एस. पी. पण्डित ने प्रवरसेन का राज्या- रोहण काल सन् १२३ ई० तथा राज्यकाल १० वर्ष दिया है। श्री स्टीन ने राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् ३१८६ मास ११ तथा दिन प्रथम तथा राज्य- काल ६० वर्ष दिया है। श्री वाली ने यह समय सप्तर्षि संवत् ४०५४ तथा सन् २४४ ई० दिया है। कलिगताब्द ३२७८ वर्ष ३ मास ड्रायर के अनु- सार सन् १२३ वर्ष ८ मास तथा कनिघम के अनुसार सन् ४३२ ई० ६ मास आता है। हसन लिखता है- ६) प्रवरसेन। राजा प्रवरसेन सन् १३५ विक्रमी में मातृगुप्त के रुखसत करने के बाद कश्मीर में आकर हकूमत के जब्त रख्त और फौज और रंय्यत की आसाइश में मशगूल हुआ। अदल व इन्साफ और बख्शिश और मिहरबानी में मसरूफ रहकर अपने हमअस्रों से बढ़ गया। दो तीन साल कमाल आजादी के साथ इस जगह का इन्तजाम दरजा कमाल तक पहुँचाकर कश्मीर फौज के साथ हिन्दुस्तान का इरादा किया। इतराफ हिन्दुस्तान के बहुत से मुल्क दरयाए शोर के किनारे तक अपने .कब्जा में ले आया। विक्रमाजीत का बेटा शीलादित्य जो कि मुखालिफों के हाथ से डरकर परेशानी के जंगल में हैरान था। प्रवरसेन ने उसके सारे मुखा- लिफों को जंग के जरिया मग्लूब और शिकस्त देकर शीलादित्य को अपने बाप के मौरूशी मुल्क पर तस- ल्लत बख्श दिया। और सिंहासन का तख्त जो कि विक्रमाजीत के कब्जा में पड़ा था शीलादित्य से लेकर कश्मीर की तरफ लौटा। कुछ अरसा के बाद शीला- दित ने राजा की पैरवी से सरकशी करके बगावत का झण्डा बुलन्द कर दिया। राजा प्रवरसेन अपने लश्कर के साथ हमलावर हुआ । और उसे कैदी बनाया। बुलन्द हिम्मती से उसको खता अता से बख्श कर अपने मौरूशो मुल्क पर बदस्तूर कायम किया। कुछ अरसा के बाद स्याह बख्ती के बायस उसने फिर सरकशी की। राजा ने उसपर दूसरी दफा कहर करके फिर मुआफ कर दिया। कहते हैं कि शिलादित्य ने छह मर्तबा बगावत अख्तयार की। प्रवरसेन ने हर दफा इसकी सरकोबी करके फिर उन्हे अता की कशरत से बख्श दिया। सातवीं मर्तबा राजा ने कमाल कहर से उसकी हकूमत को जब्त करके उस बागी को महबूस कर दिया। कुछ अरसा के बाद कमाल हिम्मत और दरया दिलो से उसके गुनाहों से दरगुजर कर बदस्तूर अपने मुल्क की हकूमत पर मुख्तार कर दिया। कहते हैं कि अपनी हिम्मत की बिना पर हर शहर बिना जंग व जदल से फतह करता वहाँ की हकूमत पर वारि- सान मुल्क को बदस्तूर रखता था और अपनी मोरूशी मुमलकत से किसी को भी माखिज न करता था। (पृ.२) बिलाद व इमसार के रब्त व जब्त के बाद चाहा कि खित्तः कश्मीर में एक दिल पजीर शहर (पृष्ठ ६६) आबाद करके अपना नाम जमाना की वफा पर यादगार छोड़े। इस बिना पर रूहानियों में से एक की रहनुमाई से श्रीनगर का शहर जो इस वक्त आबाद और मशहूर है कोह मारों के इर्द गिर्द शाफो इमारतों के साथ जिनकी तादाद मुवलों ने छतीस

५३८ राजतरंगिणी उपकारं स्मरन्तस्तु कृतज्ञत्ववशंवदाः । पदवीमुपकर्तॄणां यान्ति निश्चेतना अपि ॥२९५॥ २९५. 'कृतज्ञता से वशंवद उपकार स्मरण करने वाले निश्चेतन भी उपकारियों का अनुसरण करते हैं। निर्वाणमनु निर्वाति तपनं तपनोपलः । इन्दुमिन्दुमणिः किंच शुष्यन्तमनु शुष्यति ॥२९६॥ २९६. 'सूर्यकान्त मणि सूर्य के निर्वाण (अस्त) के पश्चात् शान्त हो जाता है। और इन्दुमणि इन्दु के क्षीण होने पर शुष्क हो जाता है। पुण्यां वाराणसीं गत्वा तस्माच्छमसुखोन्मुखः । इच्छामि सर्वसंन्यासं कर्तुं द्विजजनोचितम् ॥२९७॥ २९७. 'अतएव शान्ति सुख का इच्छुक मैं पुण्य वाराणसी जाकर द्विज जनोचित सर्व त्याग करना चाहता हूँ। मणिदीपमिवेशं तमन्तरेणान्धकारिताम् । विभेमि द्रष्टुमप्युर्वी भोगयोगे कथैव का ॥२९८॥ २९८. 'मणि दीप' निभ उस स्वामी के बिना, अन्धकार पूर्ण पृथ्वी को देखने में भी भयभीत होता हूँ। भोग योग का कहना ही क्या ? इत्यौचित्यनिधेस्तस्य वाणीमाकर्ण्य विस्मितः । धीरः प्रवरसेनोऽप व्याजहारोचितं वचः ॥२९६॥ २९९. इस प्रकार औचित्य विधान की वाणी सुनकर विस्मित धीर प्रवरसेन भी उचित वचन बोला— दर्शन होता है कि मातृगुप्त को विक्रमादित्य ने जिस (२) सूर्यकान्त मणि : कविपरम्परा के महत्त्वपूर्ण स्थान पर पहुँचा दिया था वह उसके अनुसार चिन्तामणि सूर्य की रश्मियों से ज्योतिर्मय महानता तथा दूरदर्शिता का परिणाम था। होती है। इन्दुमणि शर्वरी में पिघल जाती है। पाठभेद : पाठभेद : श्लोकसंख्या २९५ में 'वशंवदाः' का पाठभेद श्लोक संख्या २९८ में 'कथैव का' का पाठभेद 'वशंवृता' मिलता है। 'तु का कथा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : पादटिप्पणियाँ : २९५ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह २९८ (१.) मणिदीप : कल्हण ने पुनः ७१वां श्लोक है। उल्लेख तरंग ४:१५ में 'मणिदीपिकान्' किया है। मणि दीप का यहाँ अर्थ रात्रिकालीन प्रदीप है। २९६ (१) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह २९९. (१) आइने अकबरी में अबुल फजल ७२वां श्लोक है। ने नाम पीथोरसेन दिया है। आइने अकबरी के

तृतीय तरंग १३३ अनुसार प्रवरसेन हिन्दुस्तान का एक सामान्य व्यक्ति था । एक क्षत्रिय व्यष्टि के पश्चात् राज्य की थी। वह राजा हुआ। इस पर वह नगरकोट गया । वहाँ का अधिकारी बन गया । मातृगुप्त ने प्रवरसेन के लिये राज्य त्याग दिया। वह बनारस चला गया और साधारण जीवन व्यतीत करने लगा । प्रवरसेन एक श्रेष्ठ राजा था । उसने काश्मीर की नींव पूरी बदलदी थी। कहा जाता है कि उसमें ३० लाख ६० हजार मकान थे। उसने बहुत दान किया था। प्रवरसेन कश्मीर की ग्यारह वर्षों की मालगुजारी बराबर मातृगुप्त के पास काशी भेजता रहा। मातृगुप्त धन गरीबों में बाँटता था। श्री विल्सन ने प्रवरसेन का राज्यारोहण कूक संवत् के अनुसार सन् १२६-२३ ईस्वी देता है । श्री एस. पी. पण्डित ने प्रवरसेन का राज्या- रोहण काल सन् १२३ ई० तथा राज्यकाल ६० वर्ष दिया है। श्री स्टीन ने राज्याभिषेक का समय लौकिक संवत् ३१८४ मास ११ तथा दिन प्रथम तथा राज्य- काल ६० वर्ष दिया है। श्री दायी ने यह समय सप्तर्षि संवत् ४०५४ तथा सन् १८४ ई० दिया है। कनिङ्गहाम ३२७८ वर्ष ३ मास ट्रायर के अनु- सार सन् १२३ वर्ष ८ मास तथा कनिघम के अनुसार सन् ४३२ ई० ६ मास आता है। हसन लिखता है- ६) परवरसेन । राजा परवरसेन सन् १३५ विक्रमी में मातृगुप्त के रुखसत करने के बाद कश्मीर में आकर हुकूमत के रस्म रखो दौर धौउ और रैय्यत की आसाइश में मश्गूल हुआ । अदल व इन्साफ और बख्शिश और मिहरवानी में मसरूफ रहकर अपने हमअस्रों से बढ गया। दो तीन साल कमाल आवादी के साथ इस जगह का इन्तजाम दरजा कमाल तक पहुँचाकर कश्मीर फौज के नाथ हिन्दुस्तान का इरादा किया। इतराफ हिन्दुस्तान के बहुत से मुल्क दरयाए शीर के किनारे तक अपने कब्ज़ा में ले आया। विक्रमाजीत का बेटा शीलादित्य जो कि मुखालिफों के हाथ से हारकर दरबारी के ईरूह में हैरान था। प्रवरसेन ने सहारे सारे मुझा- लिफों को जंग के जरिया महदूद और शिकस्त देकर शीलादित्य को इतने बाप के मौसूशी मुल्क पर इस- नद बख्श दिया। और सिंहासन का तख्त जो कि विक्रमाजीत के क़ब्ज़ा में पड़ा था मिन.दित्य से लेकर कश्मीर की तरफ भेजा । झूठ अरसा के बाद शीला- दित्य ने राजा की पैरवी से सरकशी करके बगावत का झण्डा बुलन्द कर दिया । राजा प्रवरसेन अपने लश्कर के साथ हमलावर हुआ । और उसे कैदी बनाया। बुलन्द हिम्मती ने उसको सुशा अदा से बड़ा कर उसके मौसूशी मुल्क पर बदस्तूर क़ायम किया। कुछ अरसा के बाद स्वार्थ बख्शी के बायस उसने फिर सरकशी की। राजा ने इसवार दूसरी दफ़ा कैद करके फिर मुआफ कर दिया। कहते हैं कि शीलादित्य ने छह मर्तबा बगावत बदस्तूर की । प्रवरसेन ने हर दफ़ा इसकी सरकशी करके फिर उसी वफ़ा की बशारत से बख्श दिया। सातवीं मर्तबा राजा ने कमाल कहर से उसकी हुकूमत को जब्त करके उस दागी को महबूस कर दिया। कुछ अरसा के बाद कमाल हिम्मत और दरया दिली से उसके गुनाहों से दरगुजर कर बदस्तूर अपने मुल्क की हुकूमत पर मुख्तार कर दिया। कहते हैं कि अपनी हिम्मत की बिना पर हर शहर बिना जंग व जदल से फतह करता वहाँ की हुकूमत पर वारि- सान मुल्क को बदस्तूर रखता था और अपनी मौसूशी मुमलकत से किसी को भी मायदिन न करता था। (१.३) बिलाद व इमारत के रख्त व ज़ब्त के बाद चाहा कि खित्तः कश्मीर में एक दिन बजौर शहर (पृष्ठ ६६) आबाद करके अपना नाम ज़माना की क्या पर यादगार छोड़े। इस बिना पर कहानियों मे से एक की रहनुमाई में श्रीनगर का शहर जो इस वक़्त आबाद और मशहूर है कोह मारों के इर्द गिर्द शाही इमारतों के साथ जिसकी तादाद मुवर्रों ने छतील

५४० राजतरंगिणा सत्यं विश्वम्भरा देवी भूपते रत्नसूरियम् । उत्पत्त्या द्योतते धर्म्यैः कृतज्ञैर्या भवादृशैः ॥३००॥ ३००. हे भूपते ! सत्य ही यह विश्वम्भरा देवी रत्न प्रसूता है, जो कि आपके तुल्य कृतज्ञ एवं धार्मिकों की उत्पत्ति से समुज्ज्वल है । अन्तरङ्गतया श्लाघ्यः कोऽन्यस्तस्मान्महीभ्रुजः । इत्थं जडे जगत्येकस्त्वां यथावद्विचेद यः ॥३०१॥ ३०१. 'उस महीभुज से (अधिक) अन्य कौन अन्तरङ्गत के कारण श्लाघ्य है ? जिसने जड़ संसार में उस प्रकार आपको जाना । चिरं खलु खिलीभूताः कृतज्ञत्वस्य वीथयः । धीर त्वयैव न त्वाशु संचारो यदि दर्शयते ॥३०२॥ ३०२. 'हे धीर ! कृतज्ञता की वीथियां पूर्व में ही निःसार (नष्ट) हो जाती, यदि आप शीघ्र ही संचार न करते । पाकश्चेन्न शुभस्य मेऽद्य तदसौ प्रागेव नादात्किमु स्वार्थश्चेन्न मयाऽस्य किं न भजते दीनान्स्वबन्धून्अयम् । मत्तो रन्ध्रदृशोऽस्य भीर्यदि न तल्लुब्धः किमेष त्यजे- दित्यन्तः पुरुषाधमः कलयति प्रायः कृतोपक्रियः'॥३०३॥ ३०३. (अन्य से) उपकृत अधम पुरुष प्रायः अन्तःकरण में इस प्रकार सोचता है— 'आज मेरे शुभ का परिपाक (भाग्योदय) हुआ है, अन्यथा पूर्व में ही इसने क्यों नहीं प्रदान किया, यदि मुझसे इसका स्वार्थ नहीं है, तो क्यों न यह अपने दीन बन्धुओं को उपकृत करता है। छिद्रद्रष्टा मेरे द्वारा यदि इसे भय न होता, तो क्या यह लोभी त्याग करना, प्रदान करता ? साल लिखी है। आबाद किया । उसकी हकीकत ३०१ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह पहले हिस्सा में गुजर गयी । साठ बरस की मुद्दत ७६वां श्लोक है । हकूमत करके जिन्दगी का बिस्तर लपेट लिया । ३०२ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ७७वां श्लोक है । पाठभेद : पाठभेदः श्लोक संख्या ३०० में 'धर्म्यैः का पाठभेद श्लोक संख्या ३०३ में 'पक्रियः' का पाठभेद 'धम्र्यैः' मिलता है । 'पक्तियः' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : पादटिप्पणियाँ : ३०० (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ३०३ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ७५वां श्लोक है । ७८वां श्लोक है ।

तृतीय तरंग ५४१ अत्युदात्तगुणेष्वेषा कृतपुण्यैः प्ररोपिता। शतशाखीभवत्येव यावन्मात्राऽपि सत्क्रिया ॥३०४॥ ३०४. 'पुण्यशालियों द्वारा अत्युदात्त गुणवानों पर (प्ररोपित) की गयी, यावन्मात्र भी सत्क्रिया शत शाखाओं वाली हो ही जाती है। तच्च गुणवतामग्र्यस्तत्त्वज्ञैश्चाभिनन्दितः । परीक्षितो मणिरिव व्यक्तं बहुमतः सताम् ॥३०५॥ ३०५. 'वास्तव में तत्त्वज्ञों द्वारा अभिनन्दित गुणवानों में अग्रणी एवं स्पष्ट ही सज्जनों द्वारा बहु मान्य (बहुमत) (आप) परीक्षित मणि तुल्य हैं। तस्मादनुगृहाणास्मान्मा स्म त्याक्षीर्नरेंद्रताम् । ममापि ख्यातिमायातु गुणवत्पक्षपातिता ॥३०६॥ ३०६. 'अतएव हमें अनुगृहीत करें। नरेन्द्रता का त्याग न करें ताकि मेरी भी गुणवत्पक्षपातिता प्रख्यात हो। पूर्वं तेनाथ चग्मं मयाऽपि प्रतिपादितम् । भवान् पाणिप्रणयिनीं विदधातु पुनर्भूवम् ॥३०७॥ ३०७. 'पूर्व में उनसे एवं अन्त में मेरे द्वारा भी प्रतिपादित भूमि को पुनः आप हस्तगत करें।' अभ्याजौदार्यचर्यस्य श्रुत्वेति नृपतेर्वचः । कृतस्मितो मातृगुप्तः शनैर्वचनमब्रवीत् ॥३०८॥ ३०८. उदारचर्या निष्कारण उदारता पूर्ण आचरण वाले इस नृपति की बात सुनकर मुस्कुराकर मातृगुप्त शनैः शनैः बोला- ३०४ (१) राजतरंगिणी सूक्ति संग्रह का यह ७९वा श्लोक है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३०५ में 'भिनन्दिता' का पाठभेद 'पि नन्दिताः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३०६ (१) गुणवत्पक्षपातिता : यह शब्द सुन्दर है। भावपूर्ण है। अतएव मूलरूप में यहाँ रखा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि मैं भी गुणवानों के प्रति पक्षपात करता हूं यह ख्याति हो । पाठभेद : श्लोक संख्या ३०७ में 'पाणि' का पाठभेद 'प्रति' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३०७ (१) पुनर्भूवम् : पुनर्भूवम् यहाँ श्लिष्ट है। इसका अर्थ यहाँ दो विभिन्न भुवन अर्थात् लोक अथवा 'पुनर्भू' पुनर्विवाहित विधवा हो सकती है। ३