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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

२३२ रसतरङ्गिणी दाडिमस्य दलञ्चैव तण्डुलीयकमेव च ॥ ६२ ॥ एरण्डमूलपत्राणि श्योनाको वस्त्ररञ्जनी । पालङ्कया भद्रमुस्ता च मीनाक्षी कोकिलाक्षकः ॥६३॥ पूर्वाचार्यैः कीर्तितोऽयमभ्रस्य मारको गणः । यथारोगं यथालाभं भेषजैः पुटयेद् घनम् ॥६४॥ अथाभ्रकमारकगणः—बिल्वमूलं बिल्वदलञ्चेत्युभयम् । वृषः वासकः, श्रीपर्णी गम्भारी, मातुलानी भङ्गा, तिक्तका कटुकी, घोट्टा बदरी, वस्त्ररञ्जनी मञ्जिष्ठा । स्पष्टमन्यत् ॥५६-६४॥ भा.टी.—आक का दूध, बड़ का दूध, थोहर का दूध, मकोय, मोथा, कुमारी, बड़ की कोंपल ( अंकुर ), गोमूत्र, बेल की जड़ और पत्तो, अडूसा, त्रिफला, बकरी का रक्त, छोटी कटैली, कदम्ब, अरणि, शालपर्णी, गंभारी, पाढल, गुड़, तिलपर्णी, पृश्निपर्णी, गोखरू, अपामार्ग, सफेद सरसों, लोध, बड़ी कटैली, हुलहुल, धतूरा, कसौंदी, भांग, गिलोय, मरचा, तुलसी, दूब, अस- गन्ध, कुटकी, ब्राह्मी, मैनफल, तगर, शंखपुष्पी, पान, बेर, सफेदपुनर्नवा, मूसा- कानी, सप्तपर्ण, कदलीकन्द, भांगरा, देवदारु, मूसली, चमेली, अगस्त का पत्र, तालीशपत्र, चित्रक, दाड़िमफलछाल, चौलाई, एरण्ड की जड़ तथा पत्तो, अरलु, मंजीठ, नागरमोथा, मछेछी, तालमखाना, इन औषधियों के समुदाय को पूर्वाचार्यों ने अभ्रकमारकगण नाम से कहा है । इनमें से जिस-जिस रोग को जो-जो औषधियाँ नष्ट करती हैं आवश्यकतानुसार उनसे अभ्रक को घोट कर पुट देनी चाहिये । यदि गणोक्त सब औषधियाँ न मिल सकें तो जितनी मिलें उन्हीं से पुट देने चाहिये ॥ ५६–६४ ॥ अभ्रकभस्मनो लोहितीकरणम् गाङ्गेरुकी भद्रमुस्ता वटक्षीरन्तथैव च । वटमूलजलं वापि हरिद्राया द्रवस्तथा ॥ ६५ ॥ समङ्गाकथितञ्चैव घनमेभिः सुपेषयेत् । पुटद्वयं त्रयं वापि वितरेद्भिषजां वरः ॥ ६६ ॥ निश्चन्द्रिकञ्च मृदुलं रक्तात्पलसमप्रभम् । गगनस्य भवेद्भस्म ततः कार्येषु योजयेत् ॥ ६७ ॥ गाङ्गेरुकी नागबला । समङ्गा मञ्जिष्ठा ॥ ६५–६७ ॥ भा.टी.—अभ्रक मारक औषधियों के साथ पुट देने पर यदि अभ्रक की

दशमस्तरङ्गः २३३ भस्म लाल न हो तो उसे गंगेरन, नागरमोथा, बड़दूध और बड़मूल स्वरस, हरिद्रास्वरस और मञ्जिष्ठा या लज्जालु के कषाय में मर्दनकर दो तीन पुट देने से वह निश्चंद्र कोमल, लालकमलवर्ण हो जाती है ॥ ६५-६७ ॥ अभ्रकभस्मनः अमृतीकरणम् मारितं त्वतियत्नेन दशभागिकमभ्रकम् । त्रिफलाक्वथितं चैव नवं षोडशभागिकम् ॥ ६८ ॥ नागभागिकमुस्राज्य दत्वा लोहस्य भाजने । पाचनाज्जायते रम्यममृतीकरणं वरम् ॥ ६६ ॥ उस्राज्यं गोघृतं नागभागिकमष्टभागिकं ग्राह्यम् ॥ ६८, ६६ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह बनी हुई अभ्रकभस्म दस भाग, त्रिफलाकषाय सोलह भाग और गोघृत आठ भाग तीनों को एक लोहे की कड़ाही में एकत्र मिला कर पकाने से अभ्रकभस्म का अमृतीकरण हो जाता है ॥ ६८, ६६ ॥ वक्तव्य — त्रिफलाकषाय और घृत के जलने तक अभ्रकभस्म को पकाना चाहिए। अन्य रसग्रंथों में भी इसी प्रकार लिखा है कि—"तुल्यं घृतं मृताभ्रेण लोहपात्रे विपाचयेत् । घृते जीर्णे ततश्चूर्णं सर्वकार्येषु योजयेत् ॥” अभ्रकभस्म के अमृतीकरण करने से उसके गुणों में वृद्धि होती है। द्वितीयः प्रकारः कन्याम्बुमेघगव्याज्यं कलादिक् तपनांशकम् ! पचेन्मन्दानलेनैतदमृतीकरणं वरम् ॥ ७० ॥ तृतीयः प्रकारः मृताभ्रसंमितं गव्यमाज्यं दत्वाभ्रकं पचेत् । अमृतीकृतमेवन्तु घनं कार्येषु योजयेत् ॥ ७१ ॥ कन्या घृतकुमारी, तस्या जलं षोडशभागिकम् । मेघः अभ्रकं दशभागिकम् । गोघृतं द्वादशभागिकम् । अथवा केवलं गोघृतेन पाकादमृतीकरणम् । तथा चाहुः प्राचीनाः—“तुल्यं घृतं मृताभ्रेण लोहपात्रे विपाचयेत् । घृते जीर्णे ततश्चूर्णं सर्वकार्येषु योजयेद् ॥” इति । तथा चैवं मृताभ्रकस्यामृतीकरणसंस्कार उक्तः । भस्मनस्तु पुनरमृतीकरणेन गुणवृद्धिर्भवति । इति ॥ ७०, ७१ ॥ भा.टी.—कुमारीस्वरस, चौलाई या मोथा, गोघृत को क्रमशः सोलह, दस और बारहवाँ भाग अभ्रक का लेकर एकत्र करके अग्नि से पका लेने पर उत्तम अमृतीकरण होता है । अभ्रकभस्म और गोघृत दोनों को समभाग में लेकर

२३४ रसतरङ्गिणी लोहपात्र में घृत जल जाने तक पकाने से अभ्रक का अमृतीकरण हो जाता है ॥ ७०, ७१ ॥ मृताभ्रकस्य गुणाः अभ्रं स्निग्धं परमशिशिरं स्वादु चायुष्यमग्र्यं केश्यं वर्ण्यं रुचिकरमलं दीपनं चातिबल्यम् । नेत्र्यं मेधां जनयतितरां स्तन्यसंवर्द्धनञ्च क्षेत्त्रे स्थैर्य्यं वितरति परं दीपनं पुष्पकेतोः ॥ ७२ ॥ क्षिप्रं घोरां दलयति महारोगसंघातभीतिं स्वान्ते प्रीतिं जनयति परं नर्महासे च यूनः । देहे शक्तिं वितरतितरां बह्वपत्यप्रदात्री कार्याल्स्यं हरति सुतरामभ्रकं सेव्यमानम् ॥ ७३ ॥ मृताभ्रकगुणाः—परमशिशिरं अतिशीतवीर्य्यम् । अग्र्यं प्रधानम्, तथा च विशेषत आयुष्यं हितकरमित्यर्थः । पुष्पकेतोः कामस्य दीपनमित्यन्वयः । महारो- गाणां ज्वरराजयक्ष्मरक्तपित्तादीनां संघातः समूहस्तज्जां भीतिं परिहरति ॥७२, ७३ भा.टी.—अच्छी प्रकार से बनायी हुई अभ्रकभस्म स्निग्ध ( धातुओं में स्निग्धता उत्पन्न करनेवाली ), अत्यन्त शीतवीर्य, स्वादुरस, आयुवृद्धि के लिए उत्तम है । यह बालों का पोषक होने से केश्य, त्वचा का पोषक होने से वर्ण्य, रुचिकर, पाचक रस अधिक उत्पन्न करने से दीपन, सर्व धातुओं का पोषक होने से बलवर्धक, नेत्रज्योतिवर्धक, बुद्धिवर्धक, दुग्ध-वाहिनियों का पोषक होने से स्तनों में दूध को बढ़ाती है । शरीर में स्थिरता उत्पन्न करती है और काम- शक्ति का उत्पादक है । शरीर में होनेवाले महारोग ज्वर, यक्ष्मा रक्तपित्त आदि के भय को नष्ट करती है, मन में प्रसन्नता लाती है और सन्तानोत्पादन की शक्ति उत्पन्न करती है । आलस्य को दूर करके कार्यतत्परता को बढ़ाती है ॥ ७२–७३ ॥ वक्तव्य—इसके अतिरिक्त नवीन खोज यह बताती है कि अभ्रक वनस्प- तियों द्वारा हमारे शरीर में विशेषतः वातिकसूत्रों में प्रवेश करता है और शरीर के अवयवों में निम्नलिखित मात्रा में पाया जाता है । मांसपेशियों में ४१ प्रति- शत, यकृत् में २७ प्र. श., प्लीहा में भी २७ प्र. श., लसीका में ५ प्रतिशत पाया जाता है । सबसे अधिक मात्रा में यह फुफ्फुसों में पाया जाता है । अतः फुफ्फुस के रोग, राजयक्ष्मा, कास, श्वास रोगों में अभ्रक बहुत ही उत्तम औषधि है । इस तरह हृदय तथा वातिक सूत्रों के लिये भी यह परमोपयोगी औषधि है ।

दशमस्तरङ्गः २३५ अथ अभ्रकस्य आमयिकः प्रयोगः रससिन्दूरसंयुक्तं मृताभ्रं नाशयेज्ज्वरान् । सचौद्रं सकणञ्चापि जीर्णज्वरविनाशनम् ॥ ७४ ॥ सचौद्रं सवरं व्योम दृष्टिशक्तिकरं परम् । सव्योषं सघृतञ्चैतद् ग्रहणीं नाशयेत् क्षणात् ॥ ७५ ॥ हरीतकीगुडोपेतं शर्करैलासमन्वितम् । मृताभ्रं सेव्यमानन्तु रक्तपित्तहरं परम् ॥ ७६ ॥ सव्योषं सवरञ्चैव चातुर्जातकसंयुतम् । सचौद्रं क्षपयेदंशः पाण्डुक्षयहलीमकान् ॥ ७७ ॥ मृताभ्रं रजनायुक्तं कणया मधुनापि च । मासमेकं लिहेत्प्राज्ञो मेहरोगाद्विमुच्यते ॥ ७८ ॥ मृतकाञ्चनसंयुक्तं मृताभ्रं माससेवितम् । धातुवृद्धिकरं पुंसां विशेषात्क्षयनाशनम् ॥ ७९ ॥ गुडूचीसत्त्वसंयुक्तं मेहवर्गप्रणाशनम् । तारस्वर्णयुतं त्वभ्रं शुक्रसन्तानकारकम् ॥ ८० ॥ भूधात्रिकागोक्षुरचन्द्रवालारुतान्वितं गव्यघृतेन लीढम् । संसेव्यमानं गगनं तु तूर्णं विनाशयेद् दारुणमूत्रकृच्छ्रम् ॥ ८१ ॥ क्षाराष्टकयुतं त्वभ्रं मूत्राघातं विनाशयेत् । अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रञ्च विशेषादग्निदीपनम् ॥ ८२ ॥ मूर्वाक्वाथसमायुक्तं मृताभ्रं व्रणनाशनम् । पयस्यागव्यदुग्धाभ्यां परमं बलवर्द्धनम् ॥ ८३ ॥ भल्लातकान्वितं व्योम त्वर्शांस क्षपयेद् ध्रुवम् । लवङ्गक्षौद्रसंयुक्तं धातुवृद्धिकरं परम् ॥ ८४ ॥ विजयास्वरसोपेतं जात फलसमन्वितम् । मृताभ्रं जुषतां पुंसां शुक्रस्तम्भः प्रजायते ॥ ८५ ॥ विश्वभेषजपौष्करान्वितं विप्रयष्टितुरगासमन्वितम् । सेवितं समधु मारिताभ्रकं नाशयेज्झटिति मारुतामयम् ॥ ८६ ॥ अभ्रं कज्जलिकोपेतमर्जुनक्वाथभावितम् । कृमजं श्लैष्मिकं वापि विनिहन्ति हृदामयम् ॥ ८७ ॥ ससितं सचतुर्जातं त्वभ्रं पित्तामयापहम् ।

२३६ रसतरङ्गिणी अथवा ससितं गव्यदुग्धेन परिशीलितम् ॥ ८८ ॥ पिप्पलीकट्फलक्षौद्रैर्मृष्टाभ्रं माससेवितम् । अतिमात्रं निहन्त्याशु सर्वानेव कफामयान् ॥ ८६ ॥ अथास्य रोगयोग्यः प्रयोगः—सवरं त्रिफलायुक्तम् । चन्द्रबाला स्थूलैला । क्षाराष्टकं “सुधापलाशशिखरीचिञ्चार्कतिलनालजाः । स्वर्जिकायावशूकश्च क्षाराष्टकमुदाहृतम् ॥” इत्युक्तम् । पयस्या क्षीरकाकोली क्षीरविदारी वा । विप्र- यष्टी भारंगी, तुरगी अश्वगन्धा । कज्जलिका समपारदगन्धा अतिमात्रं अत्यर्थं कफामयान् हन्ति ॥ ७४–८६ ॥ भा.टी.—साधारणतः ज्वरों में अभ्रकभस्म को रससिन्दूर के साथ प्रयोग करना चाहिये । जीर्णज्वर के लिये इसे पिप्पलीचूर्ण में मिला शहद के साथ चाटना चाहिये । नेत्रों की ज्योति बढ़ाने के लिये अभ्रक को त्रिफलाचूर्ण में मिला शहद के साथ चाटना चाहिये । पुरातन और वातप्रकोपाधिक ग्रहणी रोग में इसे त्रिकटुचूर्ण और घृत मिलाकर सेवन करना चाहिये । रक्तपित्त रोग के लिये इसको हरीतकी, गुड़, खांड और इलायचीबीजचूर्ण के साथ अथवा वासास्वरस के साथ सेवन कराना चाहिये । अर्श, पाण्डु, क्षय तथा हलीमक रोगों में इसको त्रिकटुचूर्ण, त्रिफला चूर्ण और चातुर्जातकचूर्ण में मिला शहद से सेवन कराना चाहिये । अभ्रकभस्म, हरिद्राचूर्ण और पिप्पलीचूर्ण को शहद के साथ एक मास तक सेवन करने से प्रमेहरोग नष्ट हो जाता है । स्वर्णभस्म और अभ्रकभस्म को मिला उचित सहपान-अनुपान के साथ एक मास तक सेवन करने से धातुओं की वृद्धि होती है और क्षयरोग नष्ट हो जाता है । गडूची- सत्त्व के साथ प्रयोग करनेपर सब प्रकार के प्रमेह नष्ट हो जाते हैं । रजत और स्वर्णभस्म के साथ अभ्रक का सेवन करने से शुक्रवृद्धि होकर सन्तानोत्पादन- शक्ति उत्पन्न होती है । भयंकर मूत्रकृच्छ्र रोग में अभ्रकभस्म को, भुंई-आंवला, गोखरू, बड़ी इलायचीबीज और खांड के साथ घृत में मिलाकर चटाना चाहिये । आठों क्षारों के साथ मिलाकर अभ्रकभस्म का सेवन करने से मूत्रा- घात (पेशाब रुकना) नष्ट होता है । और अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र रोग भी नष्ट होते हैं तथा पाचकअग्नि की वृद्धि होती है। व्रणदोषों को दूर करने के लिये इसे मूर्वाकषाय के साथ प्रयोग करना चाहिये । शरीर में बलवृद्धि के लिये इसको क्षीरकाकोलीचूर्ण के साथ गोदुग्धानुपान सेवन करना चाहिये । शुद्धभल्लातक- चूर्ण या भल्लातक योगों के साथ अभ्रकभस्म प्रयोग करने से बवासीर में लाभ २

दशमस्तरङ्गः २३७ होता है। लौंग के चूर्ण में अभ्रकभस्म मिला शहद के साथ चटाने से धातुवृद्धि करती है। अभ्रकभस्म को जायफलचूर्ण के साथ मिला भांग के स्वरस से लेने पर शुक्रस्तम्भन शक्ति बढ़ती है। सुण्ठी, पुष्करमूल, भारंगी तथा वंशलोचन- चूर्ण में अभ्रकभस्म मिला शहद के साथ सेवन करने से शीघ्र ही वातरोग शान्त हो जाते हैं। अभ्रकभस्म और पारदगन्धक की कज्जली को समभाग में लेकर अर्जुन के क्वाथ में सात भावना देकर प्रयोग किया जाय तो कफप्रकोपजन्य अथवा कृमिजन्य हृदय रोग दूर होता है। पित्तरोगों की शान्ति के लिये अभ्रकभस्म को चतुर्जातकचूर्ण और खांड मिलकर सेवन करना चाहिए। अथवा केवल खांड में मिला गोदुग्ध अनुपान से सेवन करना चाहिये। सब प्रकार के कफरोगों के लिये अभ्रकभस्म को पिप्पली तथा कायफलचूर्ण में मिला शहद के साथ एक मास तक सेवन करना चाहिये ॥ ७४-८६ ॥ सत्त्वानां वैशिष्ट्यम् योगेषूपरसादीनां योगे सत्त्वयोजनम्। गुणोत्तरं भवेद्यस्मात्तस्मात्सत्त्वं विशिष्यते ॥ ९० ॥ भा.टी.—उपरस आदि के योगों के प्रयोग करने में उनका सत्त्व प्रयोग करना अधिक गुणशाली होता है। अतः अभ्रक आदि की भस्म की अपेक्षा उनका सत्त्व प्रयोग किया जाय तो विशेष गुणकारक होता है ॥ ९० ॥ अभ्रकसत्त्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः पादांशसौभाग्यरज.समेतं पिष्टं मुसल्याः स्वरसेन सार्द्धम् । कोष्ठ्यां निधायाभ्रकमत्र गाढं त्ध्मामापितं मुञ्चति सत्त्वमच्छम्॥६१. सौभाग्यरजः टङ्कणचूर्णम् । स्पष्टमन्यत् ॥ ६१ ॥ भा.टी.—अभ्रक में चतुर्थांश सुहागा मिला इसको सफेद मूसली के स्वरस के साथ पीसकर मूषा में रखकर तपाने से अभ्रक का साफ सत्त्व निकल आता है ॥ ६१ ॥ वक्तव्य—अभ्रक से प्राप्त होनेवाला सत्त्व एलुमिनियम (Aluminium) कहा जाता है। परन्तु आयुर्वेदीय रसशास्त्र की विधि से प्राप्त अभ्रक सत्त्व एलुमिनियम से ठीक नहीं मिलता है। क्योंकि आजकल मिलने वाला सत्त्व (एलुमिनियम) श्वेत हल्की धातु है। और इस विधि से निकाला हुआ कांस्य के सदृश होता है। द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः सम्पेषयेद् घनरजः खलु काञ्जिकस्थं पश्चात्तथैव खलु सूरणकन्दतोयैः ।

१३८ रसतरङ्गिणी रम्भाद्र्कन्दजरसैरपि भावयित्वा तुर्यांशटङ्कणकणालपकर्मानयुक्तम् ॥६२॥ संमेल्य सैरिभमलञ्च विधाय पिण्डान कोष्ठ्यां निधाय च ततः प्रथमेद् दृढाग्नौ । अभ्रं विमुञ्चति ततो निजसत्त्वमाशु प्रायः प्रयोगनिवहेषु नियोजयेद्वै ॥ ६३ ॥ अथान्यः प्रकारः-अभ्रचूर्णं काञ्जिकेन सूरणतोयेन कदलीकन्दलेन च पिष्ट्वा टङ्कणं पिप्पलीं क्षुद्रमत्स्यांश्चैकीकृत्य तच्चतुर्थांशं मेलयेत् । सैरिभमलं महिषी- मलम् ॥ ६२, ६३ ॥ भा.टी.-अभ्रकचूर्ण को काञ्जी, जिमीकन्दस्वरस, कदलीकन्दस्वरस से पृथक् मर्दन करके अन्त में इसमें चतुर्थांश सुहागा, पिप्पलीचूर्ण और छोटी- छोटी सुखाई हुई मछलियों का चूर्ण, और भैंस का गोबर मिलाकर गोले से बनाकर सुखा लें ।

दशमस्तरङ्गः २३६ अथ चतुर्थः सत्त्वपातनप्रकारः सौभाग्यं देवधूपश्च गुडः सर्जरसस्तथा । ऊर्णा लाक्षा च पिण्याकं क्षुद्रमीनन्तथैव च ॥९८॥ छागीदुग्धेन सम्पेष्य विदध्याद् गोलकान् भिषक् । स्थापयेद् वज्रमूषायां गगनं कृतगोलकम् ॥ ९६ ॥ कोष्ठिकायां निधायाथ तीव्राग्नौ प्रधमेद् घनम् । अनेन विधिना सत्त्वं द्रुतमेव प्रजायते ॥ १०० ॥ देवधूपः गुग्गुलुः, पिण्याकं तिलकल्कः ॥ ९८-१०० ॥ भा.टी.—सुहागा, गुग्गुल, गुड़, राल, ऊन, लाख, तिल की खली और छोटी मछली को छागदुग्ध के साथ अभ्रक को पीसकर छोटे-छोटे गोले बना लें, अब इसको भट्ठी में रखकर तीव्र अग्नि से तपायें तो शीघ्र ही सत्त्व निकल आता है ॥ ९८-१०० ॥ अभ्रकसत्त्वस्य पिण्डीकरणम् मित्रपञ्चकसंयुक्तं खसत्त्वं चूर्णसन्निभम् । मूषायां विनिधायाथ प्रधमेत्कोकलानले ॥ १०१ ॥ इत्थं तीक्ष्णतरं ध्मातमेकतां याति कांस्यवत् । पिण्डीभूतं ततः सत्त्वं शोधनार्थं प्रयोजयेत् ॥ १०२ ॥ मित्रपञ्चकं आज्यं गुंजा सौभाग्यं क्षौद्रं गुग्गुलुश्चेति । आहुश्च—“कणशो यद् भवेत् सत्त्वं मूषायां प्रणिधाय तत् । मित्रपञ्चकयुग्ध्मातमेकी भवति घोषवत् ॥” इति ॥ १०१-१०२ ॥ भा.टी.—उक्त विधि से प्राप्त अभ्रक सत्त्व पूर्वोक्त मित्रपञ्चक के साथ मिला कर मूषा में रख कोयलों की अग्नि में तेज रूप से तपायें तो कांसा धातु की तरह यह सत्त्व एकत्रित हो जाता है, अब इसे शुद्धकर लेना चाहिये ॥१०१-१०२॥ अभ्रकसत्त्वस्य सामान्यशोधनम् त्रिफलासलिले वापि वटमूलकषायतः । अम्लेन काञ्जिकैर्वापि खसत्त्वं शोधयेद्भिषक् ॥ १०३ ॥ त्रिफलासलिलादिषु निर्वापणात् सामान्या शुद्धिरस्य ॥ १०३ ॥ भा.टो.—अभ्रक को गरम करके त्रिफलाकषाय अथवा बड़मूलकषाय में अथवा अम्ल नीबूरस आदि या काञ्जी में सात बार बुझा लेने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ १०३ ॥

२४० रस्तरङ्गिणी विशेषशोधनम् सत्त्वस्य गोलकं ध्मात्वा भृशं संतापयेद् बुधः । काञ्जिके चाथ निर्वाप्य लोहदण्डेन कुट्टयेत् ॥ १०४ ॥ पुनः पुनः सम्प्रताप्य यावद्यायाति चूर्णताम् । गोघृतेन त्रिधा वापि धात्रीनीरेण भर्जयेत् ॥ १०५ ॥ भर्जने भर्जने कार्यं खल्वे सत्त्वविमर्दनम् । ततः पुनर्नवानीरैः सिंहास्यस्वरसेन च ॥ १०६ ॥ काञ्जिकेनापि सम्मेल्य भृशं सम्पे नयेद्भिषक् । इत्थं विशोधितं व्योमसत्त्वं मारणसम्मतम् ॥ १०७ ॥ सिंहास्यः वासा, मारणाय सम्मतमिति विग्रहः ॥ १०४-१०७ ॥ भा.टी.—अभ्रकसत्त्व के गोले को कोयलों की अग्नि में रखकर खूब तपायें, तपने पर इसे निकाल उसी क्षण काञ्जी में बुझाकर इमामदस्ते में लोहे की मूसली से खूब कूटें और फिर भट्टी पर रखकर तपायें और काञ्जी में बुझाकर खूब कूटें जब तक कि उसका चूर्ण हो जाय । अब चूर्णरूप अभ्रक सत्व को गोघृत और आँवलों के स्वरस में डालकर तीन-तीन बार भून लें और खरल में डालकर मर्दन करते रहें, अन्त में पुनर्नवास्वरस, वासास्वरस और काञ्जी में पीसकर रख लें और भस्म करने के लिये इसको उपयुक्त समझें ॥१०४-१०७॥ अभ्रकसत्त्वस्य मारणम् विशोधितं व्योमसत्त्वं तदर्धं सूतगन्धकम् । निक्षिप्य मर्दयेत्खल्वे काचकूपीगतं ततः ॥ १०८ ॥ पचेत्तु बालुकायन्त्रे विधानज्ञो भिषग्वरः । इत्थं नातिचिरादेव खसत्त्वं याति पञ्चताम् ॥ १०६ ॥ अभ्रकसत्त्वमारणप्रकारः व्याख्यातः ॥ १०८, १०६ ॥ भा.टी.—उक्तविधि से शुद्ध अभ्रकसत्त्व एक भाग, और पारे गन्धक की समभाग कज्जली आधा भाग लेकर दोनों को एकत्र मर्दन करके कपड़मिट्टी की हुई काँच की शीशी में भरकर बालुकायन्त्र में पकावें तो इसकी शीघ्र ही भस्म हो जाती है ॥ १०८, १०६ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः द्वौ भागौ घनसत्त्वस्य भागश्च रसगन्धयोः । श्लक्ष्णपिष्टं ततः कृत्वा सप्तवारं प्रयत्नतः ॥ ११० ॥

गोमयाग्नौ पचेत्प्राज्ञः खसत्त्वस्य मृतिर्भवेत् । एवं मृतं व्योमसत्त्वं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥१११॥ भा.टी.—अभ्रकसत्व दो भाग, एक भाग कज्जली, दोनों को एकत्र अच्छी तरह पीसकर सम्पुट में बन्द करके उपलों की पुट में पकायें । इस प्रकार सात पुट देने से सत्त्व की भस्म हो जाती है । इसे बिना संकोच प्रयोग में ला सकते हैं ॥ ११०-१११ ॥ अभ्रसत्त्वस्य गुणाः अभ्रसत्त्वं सुशिशिरं मधुरं रुचिरं परम् । सुस्निग्धं केश्यमायुष्यं त्रिदोषघ्नं रसायनम् ॥११२॥ प्रौढाङ्गनामदविचूर्णनचारुदन्तः सिंहोपमप्रचुरपुत्रवृतः सुवृत्तः । लावण्यपरिपूरितवक्त्रचन्द्रो जीवेच्छतञ्च शरदां घनसत्त्वसेवी॥११३ मृताभ्रसत्त्वादपरं भेषज्यं नास्ति पुष्टिदम् । विशेषात् पुंस्त्वजननं वयसः स्थापनन्तथा ॥ ११४ ॥ नास्त्यनेन समं लोके निर्विकारं गुणोत्तमम् । त्रिदोषघ्नञ्च भेषज्यं त्वन्यद् भेषज्यमण्डले ॥ ११५ ॥ अथास्य गुणाः—अभ्रकसत्त्वं सुशिशिरं शीतवीर्यम्, सुवृत्तः सदाचारी,तथा चाहुः स्म पूर्वे—सत्त्वमभ्रस्य शिशिरं त्रिदोषघ्नं रसायनम् । विशेषात् पुंस्त्वजननं वयसः स्तम्भनमपरम् ॥ नानेन सदृशं किञ्चिद् भेषज्यं पुंस्त्वकृत्यरम् । सत्त्वसेवी वयः- स्तम्भं लभते नात्र संशयः ॥” इति । अपि च “यवोपसभागोऽस्ति योगे तत्सत्त्व- योजनम् । कर्तव्यं षड्गुणाधिक्याद्रसज्ञत्वमभीप्सता ॥” इति च ॥११२-११५॥ भा.टी.—अभ्रकसत्वभस्म अतिशीतवीर्य, मधुररस और रुचिकारक, स्निग्ध, बालों के लिए लाभदायक, आयुवर्धक, त्रिदोषनाशक रसायन है। इसके सेवन से पुरुष नवयुवती के मद को चूर्ण कर सकता है और अनेक सन्तति उत्पन्न करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है । इसके सेवन से मनुष्य का मुख-मण्डल बहुत ही सुन्दर भरा हुआ शोभायुक्त हो जाता है । यदि इसको विधिपूर्वक कुछ दिन सेवन किया जाय तो सौ वर्ष की आयु हो जाती है। अभ्रकसत्त्वभस्म के समान शरीरपोषक विशेष रूप से नपुंसकताहर और आयुःस्थापक कोई औषधि नहीं है। इसके गुणों को देखने से ज्ञात होता है कि संसार में सत्त्वभस्म के समान निर्विकार अत्यधिक गुण और त्रिदोषप्रकोपनाशक कोई औषधि नहीं है ॥११२-११५॥

२४२ रसतरङ्गिणी अभ्रकसत्त्वसेविनां वर्जनीयानि वस्तूनि करीरं कारवेल्लञ्च कर्कटीं कोलम्मलकम् । तैलं क्षारञ्च वृन्ताकं नाश्नीयादभ्रसेवकः ॥ ११६ ॥ करीरमित्यादिना वर्ज्यवस्तूनि गगनसेविनाम् । उक्तञ्च रसमाधवे-“क्षाराम्लं बिदलं कोलं कर्कटीं कारवेल्लकम् । वृन्ताकञ्च करीरञ्च तैलञ्चाभ्रे विवर्जयेत् ॥” इति ॥ ११६ ॥ भा.टी.—अभ्रक सेवनकाल में करीरी (टेंटी), करेला, ककड़ी, खट्टा बेर, तैल, क्षार, बैगन, इन चीजों का सेवन नहीं करना चाहिये ॥ ११६ ॥ अभ्रकस्य प्रथमः कल्पः मृताभ्रं व्योषसंयुक्तं विडङ्गामलकान्वितम् । केशराजरसेनेह सलिलेनैव वा भिषग् ॥ ११७ ॥ खल्वे सम्पेषयेत्प्राज्ञः गुटिकाः कारयेत्ततः । छायायां शोषयित्वा च काचकुम्भे निधापयेत् ॥ ११८ ॥ एकैकां गुटिकां प्राज्ञः समश्रीयान्निरन्तरम् । मासषट्कं त्रिमासं वा वैद्यवाचि कृतादरः ॥ ११९ ॥ दिव्यदृष्टिर्दीर्घकायो दिनेशद्युतिदीप्तिमान् । दृढदन्तो भवेद्रूपे द्वितीय इव दर्पकः ॥१२०॥ आन्त्रशोषं त्वस्थिशोषं शोषं यक्ष्माणमुल्बणम् । चिरोत्थितान् पञ्चकासान् सभेदं श्वासमुद्धतम् ॥१२१॥ अर्शांसि ग्रहणीं पाण्डुं कामलां कुम्भकामलाम् । कुष्ठान्यष्टादशात्यर्थं निहन्यादामवातकम् ॥ १२२ ॥ वातपित्तकफोद्भूतान् मृत्युकल्पानिहामयान् । सर्वानैव निहन्त्याशु वज्रकल्पोऽयमादिमः ॥१२३॥ शोषं मांसादीनाम्, उल्बणं यक्ष्माणं पूर्णलक्षणमिति यावत् । सभेदं तमका- दिभेदयुक्तम् । आदिमः प्रथमः वज्रकल्पः अभ्रकरसायनप्रयोगः ॥११७-१२३॥ भा.टी.—अभ्रकभस्म, त्रिकटुचूर्ण, विडंगचूर्ण आंवलाचूर्ण; प्रत्येक सम- भाग लेकर एकत्र खरल में भांगरास्वरस अथवा जल से मर्दन करके गोली बना कर छाया में सुखा लें और कांच की शीशी में रख लें। अब इनमें से एक गोली प्रतिदिन प्रातःकाल छः मासे अथवा तीन मासे तक निरन्तर सेवन करें। इसके सेवन से मनुष्य दिव्यदृष्टि, दीर्घकाय, सूर्य के समान प्रभावाला हो जाता है। उस मनुष्य के दांत बहुत दृढ़ हो जाते हैं। मनुष्य देखने में दूसरा कामदेव

जैसा हो जाता है। इससे आन्त्रशोथ, अस्थिक्षय, भयंकर राजयक्ष्मा, पुरानी सब प्रकार की खांसी और श्वास, अर्शरोग, ग्रहणी, पाण्डु, कामला, कुम्भका- मला, अठारह प्रकार के कुष्ठरोग, आमवात और भी वात-पित्त और कफ से होने वाले मृत्युकारक सब रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ११७-१२३ ॥ अभ्रकस्य द्वितीयः कल्पः अभ्रायःसूतबलयः दिगङ्गयुगद्वङ्मिताः । भावयेत्तु वरानीरैः सप्तवारं विधानतः ॥ १२४ ॥ भृङ्गद्रावैः पृथक् तद्वत् शिग्रुतिक्ताग्निजैर्द्रवैः । गुटिकाः कारयित्वा च स्थापयेत्काचभाजने ॥ १२५ ॥ कणया त्वथ जीर्णेन गुडेनापि समन्विताम् । एकैकां गुटिकां खादेदशेषानामयान् हरेत् ॥ १२६ ॥ षण्मासाज्जायते मर्त्यो भीमसेन इवापरः । प्रज्ञया गुरुसोदर्यश्चक्षुषा गरुडोपमः ॥ १२७ ॥ अभ्रं दशभागिकम्, लौहस्य षड्भागाः, सूतस्य चत्वारः, गन्धकस्य द्वौ भागौ, तिक्ता कटुकी, अग्निश्चित्रकः ॥ १२४-१२७ ॥ इति अभ्रकविज्ञानीयो नाम दशमस्तरङ्गः भा.टी.—अभ्रकभस्म दस भाग, लोहभस्म छः भाग, शुद्धपारद चार भाग, शुद्धगन्धक दो भाग लेकर पहिले पारदगन्धक की कज्जली बना उसमें अभ्रक आदि औषधियाँ मिला इसको त्रिफलाकषाय की सात, भृंगराजरस की सात, सहंजने के स्वरस की सात, कुटकीकषाय की सात और चित्रकमूल कषाय की सात भावना देकर गोली बना छाया में सुखाकर कांच की शीशी में रख लें । अब इनमें से एक गोली लेकर उसमें पिप्पलीचूर्ण और गुड़ मिला प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करें तो इससे सब प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं । छ महीने तक निरन्तर सेवन करने से मनुष्य के शरीर में भीम के समान बल आ जाता है। उसकी बुद्धि वृहस्पति के समान और दृष्टि गरुड़ के समान हो जाती है ॥१२४-१२७॥ वक्तव्य—उक्त दोनों कल्पों में गोलियों की मात्रा नहीं बतायी गयी है। अतः रोग-दोष-देश-काल आदि देखकर २ रत्ती से ४ रत्ती तक मात्रा का प्रयोग कर सकते हैं। यह अभ्रकविज्ञानीय नाम दशम तरङ्ग समाप्त हुआ ।

२४४ रसतरङ्गिणी अथ तालकादिविज्ञानीयो नाम एकादशस्तरङ्गः अथ तालकस्य नामानि हरितालं मतं तालं तालकं नटभूषणम् । नटमण्डनकञ्चापि मतं शैलूषभूषणम् ॥ १ ॥ विडालकं चित्रगन्धं पिञ्जरं वंशपत्रकम् । आलं पीतनकञ्चापि कथितं मल्लगन्धजम् ॥२॥ तालकं जायते यस्मान्मल्लगन्धकमिश्रणात् । तस्माद्भिषग्वरैरेतन्मल्लगन्धजमुच्यते ॥ ३ ॥ तालकनामानि तन्त्रे व्यवहार्थ्याणि । मल्लगन्धजमिति नवीननामकल्पने हेतु- गर्भनिर्वचनमाह तालकं जायते यस्मादित्यादि । सोऽयं कृत्रिमो निर्माणप्रकारः प्राचीनानुक्तोऽपि शिष्यबोधायोद्भावितः ॥ १-३ ॥ भा.टी.—हरिताल, ताल, तालक, नटभूषण, नटमण्डनक, शैलूषभूषण, विडालक, चित्रगन्धक, पिञ्जर, वंशपत्रक, आल, पीतनक तथा मल्लगन्धज, ये हरताल के नाम हैं । क्योंकि हरताल में संखिया और गन्धक का मिश्रण होता है या इनके योग से बनाया जाता है । अतः हरताल को मल्ल ( संखिया ) गन्धज कहा जाता है ॥ १-३ ॥ तालकस्य द्वौ भेदौ तालकं द्विविधं ख्यातं रससिद्धैः पुरातनैः । प्रथमं पत्रतालं स्याद् द्वितीयं पिण्डतालकम् ॥ ४ ॥ पुराने रसाचार्यों ने हरताल को दो प्रकार का माना है—१ प्रथम पत्रताल या वर्की हरताल, २ दूसरा पिण्डहरताल ॥ ४ ॥ पत्रतालकस्य स्वरूपम् सुवर्णवर्णं विमलं गुरु चापि महोज्ज्वलम् । तनुपत्राचितं स्निग्धं मतं तत्पत्रतालकम् ॥ ५ ॥ सुवर्णवर्णमिति पत्रतालकमुत्कृष्टं लक्षणतः ॥ ५ ॥ भा.टी.—वर्की हरताल स्वर्ण के समान, पीतरक्त मिश्रितवर्ण और साफ, चमकीला भारी और चिकनां होता है। इसमें अनेक बारीक पत्र जुड़े हुए होते हैं ॥ ५ ॥ पिण्डतालस्य स्वरूपम् निष्प्रभं स्वल्पसत्त्वञ्च पत्रहीनं तथा लघु । विशेषतः पिण्डरूपं स्मृतं तत्पिण्डतालकम् ॥६॥

एकादशस्तरङ्गः २४५ पिण्डहरताल, चमकरहित, पत्रहीन और पिंड (डली) के रूप में होता है। इसमें से सत्त्व की मात्रा बहुत कम निकलती है ॥ ६ ॥ पत्रपिण्डतालयोर्वैशिष्ट्यम् पत्रतालं त्रिदोषघ्नं कुष्ठरोगहरं परम् । वातरक्तप्रशमनं परमेतद्रसायनम् ॥ ७ ॥ पिण्डतालं समाख्यातं भृशं स्त्रीपुष्पहारकम् । पत्रतालात्स्वल्पगुणं विशेषाद्धेयमेव तत् ॥ ८ ॥ परं अतिशयेनेति यावत् । पत्रपिण्डतालयोर्भेदः सत्त्वतारतम्यात् सहेतुकः । तत्र निःसत्त्वं पिण्डतालन्तु हेयमेवेति ॥ ७–८ ॥ भा.टी.–पत्रहरताल त्रिदोषप्रकोपनाशक, कुष्ठरोग तथा वातरक्त रोगनाशक और उत्तम रसायन है किन्तु पिंडहरताल प्रयोग करने पर स्त्री के मासिक स्राव को नष्ट करता है और पत्रहरताल की अपेक्षा इसमें बहुत ही स्वल्प-गुण होने से यह औषधिप्रयोग में नहीं लिया जाता है ॥ ७–८ ॥ कृत्रिमतालस्य निर्माणप्रकारः विशोधितं शङ्खविषं मरुत्सङ्ख्यकभागिकम् । तत्त्वभागिकमत्यच्छं गन्धकं विमलीकृतम् ॥ ९ ॥ खल्वे निक्षिप्य यत्नेन मेलयेत्तु शनैः शनैः । मिलितं तु ततो ज्ञात्वा विधानज्ञो भिषग्वरः ॥ १० ॥ पचेन्मन्दानलेनैतद् यन्त्रे डमरुकाभिधे । स्वांगशीते ततश्चोर्ध्वसंलग्नं तालकं हरेत् ॥ ११ ॥ विशुद्धमल्लगन्धाभ्यां तालकं यदि निर्मितम् । भिषग्वरस्तदा तालं नैवेह खलु शोधयेत् ॥ १२ ॥ शंखविषं श्वेतमल्लं ४९ भागिकम्, गन्धकं २४ भागिकम्। स्पष्टमन्यत् ।९-१२। भा.टी.–शुद्ध संखिया उनचास ४९ भाग, शुद्ध गन्धक चौबीस २४ भाग खरल में डालकर अच्छी तरह मर्दन करें और डमरूयन्त्र में डालकर बन्द करके पकावें । जब स्वांगशीत हो जाय तो सावधानी से यन्त्र को नीचे उतारकर ऊपर की हाँडी के भीतर जमे हुए हरताल को निकाल लें । यह कृत्रिम हरताल बनाने की विधि है । यदि शुद्ध संखिया और शुद्ध गन्धक से हरताल बनाया हुआ हो तो उसे शुद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती है ॥ ९–१२ ॥

२४६ रसतरङ्गिणी अशोधिततालकस्य दोषाः [ गीतिका ] अविशोधितं तु तालं परिशीलितं प्रकामम् । जनयत्यनलपदाहक्षोभप्रकम्पतोदान् ॥ १३ ॥ मलिनीकरोति गात्रं प्रकरोति कुष्ठभीतिम् । कमनीयतां प्रकामं विनिहन्ति कायजाताम् ॥ १४ ॥ अशुद्धं तालकं कुर्याद् रोगान् वातकफोद्भवान् । मृत्युशङ्काकरान् यस्माद् भिषक् तस्माद्विशोधयेत् ॥ १५ ॥ अशुद्धतालकदोषाः दाहक्षोभादयः । उक्तञ्च—"हरति च हरितालं चारुतां देहजातां सृजति च बहुतापानङ्गसङ्कोचपीडाः । वितरति कफवातौ कुष्ठरोगं विदध्यादिदमशितमशुद्धं मारितं वाप्यसम्यक् ॥" इति । अशुद्धं हि यानुद्भावयति व्याधीन् शुद्धं सत् तानेव शमयतीति विशेषः ॥ १३-१५ ॥ भा. टी.—अशुद्ध हरताल को सेवन करने से अत्यन्त दाह, क्षोभ, शरीर- कम्प, तोद (सर्व शरीर में सुई-सी चुभना) पीड़ा होने लगती है । सम्पूर्ण शरीर में रक्तदुष्टि से विकृति आ जाती है और कुष्ठ होने का डर रहता है । शरीर की सुन्दरता नष्ट हो जाती है। क्योंकि अशुद्ध हरताल शरीर में मृत्युकारक वातकफप्रकोपात्मक रोगों को उत्पन्न करता है । अतः इसको शुद्ध करके ही अन्तःप्रयोग करना चाहिये ॥ १३-१५ ॥ वक्तव्य—हरिताल में यह विशेषता पायी जाती है कि अशुद्धावस्था में यह जिन रोगों को उत्पन्न करता है शुद्ध होने पर उन्हीं रोगों की परम औषधि है । तालकशोधनस्य प्रथमः प्रकारः [ गीतिका ] सुविचूर्णितं तु तालं खलु पोट्टलीगृहस्थम् । नवनिम्बूकोत्थवारा त्विह दोलिकाख्ययन्त्रे ॥ १६ ॥ विपचेद्विधानविज्ञः सततं तु याममेकम् । गृहवारिणा च यामं विमलत्वमेति नूनम् ॥ १७ ॥ विधिना ह्यनेन यत्नाद्विमलीकृतं तु तालम् । विनियोजयेद्रसादौ नियतं तु वीतशङ्कः ॥ १८ ॥ तालकशोधनस्य प्रथमः प्रकारः—पोट्टलीगृहस्थं पोट्टलीमध्यम् । वीतशङ्कः विगतसन्देहः ॥ १६-१८ ॥ भा.टी.—वर्की हरताल का मोटा-मोटा चूर्ण बना एक पोटली में बाँध लें।

एकादशस्तरङ्गः २४७ अब इस पोटली को दोलायंत्र में नींबू का रस डालकर उसमें निरन्तर एक पहर तक पकावें । इसी तरह घरके धुएँ के जल में भी एक पहर तक दोलायन्त्र में पकावें । इसी विधि से शुद्ध किया हुआ हरताल निःशंक होकर रसयोगों में प्रयोग किया जा सकता है ॥ १६-१८ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः तालकं चूर्णयित्वा तु पोट्टल्यां विनिधाय च । दोलायन्त्रे पचेद्यामं कूष्माण्डसलिले भिषक् ॥ १९ ॥ यामैकं चूर्णतोयेन त्रैफलेन जलेन वा । इत्थं यामद्वयेनैव शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ २० ॥ यामद्वयं कूष्माण्डसलिलादिषु स्वेदनाद् द्वितीयः प्रकारः । केचित्तु टङ्कण- कणान् तालके मेलयित्वा दोलायन्त्रे शांभयन्ति कूष्माण्डसलिलादिभिः ॥ १६-२०॥ भा.टीं.—हरताल का मोटा चूर्ण करके पोटली में बाँधकर इसे दोलायन्त्र में पेठे का स्वरस डाल उसमें एक पहर तक पकावें । इसके अनन्तर चूने के जल में अथवा त्रिफलाक्वाथ में भी दो पहर पकाकर शुद्ध कर लें ॥ १६-२० ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः तालचूर्णंन्तु पोट्टल्यां न्यस्य दोलागतं पचेत् । तिलक्षारजलेनैव याममात्रं भिषग्वरः ॥ २१ ॥ यामैकं स्वेदनादेवं तालं शुद्धिमवाप्नुयात् । इत्थं विशोधितं तालं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ २२ ॥ तालचूर्णं तिलक्षारजलेन स्वेदितं याममात्राच्छुध्यतीति तृतीयः सरलः प्रकारः भा.टी.—हरतालचूर्ण को पोटली में बाँधकर तिलक्षारजल में दोलायन्त्र। विधान द्वारा पकावें । इस प्रकार तिलक्षारजल में एक पहर स्वेदन करने से हरताल शुद्ध हो जाता है, इसे निःशंक होकर प्रयोग कर सकते हैं ॥ २१-२२॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः पोट्टल्यां निहितं तालचूर्णं दोलागतं पचेत् । शाल्मलीमूलतोयेन याममेकं भिषग्वरः ॥ २३ ॥ यामैकं स्वेदनादेव तालकं शुद्धिमाप्नुयात् । अथवा तद्द्रवेणैव दिनसप्तकभावनात् ॥ २४ ॥ शाल्मलीमूलक्वाथेनैवमेव चतुर्थः ॥ २३-२४ ॥ भा.टी.--हरतालचूर्णं को पोटली में बाँधकर सेमल की जड़ के स्वरस में

२४८ रसतरङ्गिणी दोलायंत्र द्वारा पकावें । इस प्रकार शाल्मलीमूलस्वरस में एक पहर तक स्वेदन करने से हरताल शुद्ध हो जाता है । अथवा शाल्मलीमूलस्वरस की सांत भावना देने से भी हरताल शुद्ध हो जाता है ॥ २३-२४ ॥ पञ्चमः शोधनप्रकारः चूर्णीकृतं पत्रतालं चूर्णानीरेण भावयेत् । सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ २५ ॥ चूर्णोदकेन प्रागुक्तपरिमाणेन सप्तधा भावनात् पञ्चमः ॥ २५ ॥ भा.टी.—वर्कीहरताल को चूने के जल की सात भावना देने से भी वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ २५ ॥ तालकमारणस्य प्रथमः प्रकारः विमलं तालमादाय भिषक् पौनर्नवे रसे । दिनैकं खल्वयन्त्रे च पेषयित्वाऽथ शोषयेत् ॥ २६ ॥ घनीभूतं ततो ज्ञात्वा चक्रिकाः कारयेद्भिषक । सम्यक् ताः शोषयित्वा च भस्मयन्त्रेण वै पचेत् ॥ २७ ॥ क्षारैः पौनर्नवैश्चात्र स्थाल्यर्द्धं परिपूरयेत् । निधाय चक्रिकाश्चाथ क्षारैस्तैरेव पूरयेत् ॥ २८ ॥ वह्निं प्रदापयेत् यत्नाद्विधानज्ञो निरन्तरम् । मल्लगन्धजमेवन्तु म्रियते नात्र संशयः ॥ २९ ॥ अथ मारणप्रकारः प्रथमः—पुनर्नवारसैर्घृष्टं तत्क्षारान्तर्निवेशितं क्रमवृद्धाग्निना पश्चात् पचेच्च दिवसत्रयम् । भावप्रकाशमते सततं पञ्चदिनानि पाकः कार्यः । उक्तं तत्र—"दिनान्यन्तरशून्यानि पञ्च वह्निं प्रदापयेदिति ।” ॥ २६-२९ ॥ भा.टी.—शुद्ध हरताल को खरल में डालकर उसमें पुनर्नवा स्वरस मिला खूब मर्दन करके जब गाढ़ा-सा कल्क हो जाय तो इसकी टिकिया बना लें और अच्छी तरह सुखाकर भस्मयंत्र में आधा भाग पुनर्नवाक्षार भर के टिकियाओं को रखकर पुनः ऊपर से पुनर्नवाक्षार को दबा-दबाकर मुख तक भर दें । अब चूल्हे पर रखकर विधिपूर्वक अग्नि देवें तो निःसन्देह हरताल की भस्म हो जाती है ॥ २६-२९ ॥ वक्तव्य—यहाँ पर पुनः यह बात स्मरण करनी चाहिये कि पुनर्नवा की यदि भस्म ली जाय तो वह अच्छी तरह कपड़छान की हुई होनी चाहिये । अन्यथा हरताल उड़ जायगी । अग्नि के विषय से दो मत देखने में आते हैं—भाव- प्रकाश में पाँच दिन तक निरन्तर मध्यम अग्नि देने को लिखा है; और कोई

एकादशस्तरङ्गः २४६ कहते हैं कि भस्म के उपर रखे सूखे तिनके यदि भस्म हो जाँय तो अग्नि देना बन्द कर देना चाहिये । ऐसी अवस्था में गुरु उपदेश ही परम सहायक होता है । द्वितीयो मारणप्रकारः विमलं हरितालन्तु पञ्चतोलकसंमितम् । पिप्पलत्वक्कषायेण वस्त्रपूतेन भावयेत् ॥ ३० ॥ एकविंशतिवाराणि कुर्यादेवं प्रयत्नतः । चक्रिकां कारयित्वा च भस्मयन्त्रेण पाचयेत् ॥ ३१ ॥ पिप्पलत्वग्भवेनात्र वस्त्रपूतेन भस्मना । स्थाल्यर्द्धं पूरयित्वा च चक्रिकां स्थापयेद्भिषक् ॥ ३२ ॥ तेनैव भस्मना चाथ शेषं भागं प्रपूरयेत् । स्थालीं चुल्ल्यां निधायाथ पचेद्यामचतुष्टयम् ॥ ३३ ॥ मल्लगन्धजमेवन्तु मृतिमाप्नोति निश्चितम् । एवं मृतं तालकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ ३४ ॥ वस्त्रपूतेन भस्मना इति अत्र वक्तव्यं यद्यपि तथापि सौकर्य्यार्थं स्मारयामः । भस्म चेद्वस्त्रपूतं न क्रियेत असृणं स्थूलं तत् धमनिरोधायालं न स्यात्, तस्मात् श्लक्ष्णमसृणं वस्त्रपूतं विधेयमिति ॥ ३०-३४ ॥ भा.टी.—शुद्ध हरताल पाँच तोला लेकर उसे कपड़े में अच्छी तरह छुने हुए पीपलवृक्षत्वक्कषाय में क्रमशः इक्कीस भावना दें । अन्त में इसकी टिकिया बनाकर अच्छी तरह सुखा लें । अब भस्मयंत्र में पीपलवृक्ष-त्वक् की शुद्ध तथा कपड़छन भस्म को आधे भाग में दबा-दबाकर भरें और इसके ऊपर उक्त टिकि- याओं को रख अच्छी तरह जमा दें और फिर अन्त के अवशिष्ट भाग को उसी भस्म से दबा-दबाकर मुख तक भर दें । यन्त्र को चूल्हे पर रखकर चार पहर की अग्नि देवें । इस विधि से अवश्य ही हरताल की भस्म हो जाती है ॥३०-३४॥ तृतीयो मारणप्रकारः विमलं हरितालन्तु पञ्चतोलकसंमितम् । अर्कक्षीरे दशगुणे पेषयेद्भिषजां वरः ॥ ३५ ॥ चक्रिकां कारयित्वा च शोषयेदातपे पुनः । भस्मयन्त्रेण मतिमान् पचेद्युक्तिपुरःसरम् ॥ ३६ ॥ पलाशभस्मना चात्र वस्त्रपूतेन पूरयेत् । स्थाल्यर्द्धञ्च ततो मध्ये चक्रिकां स्थापयेद्भिषक् ॥ ३७ ॥

२५० रसतरङ्गिणी भस्मना चाथ तेनैव भागं शेषं प्रपूरयेत् । चतुर्यामं पचेद्धीमान् श्वेतं भस्म समाहरेत् ॥ ३८ ॥ अर्कदुग्धेन पिष्टं श्लक्ष्णीभूतं साधु भस्मीभवतीति व्याचष्टे । अर्कक्षीरे दशगुणे इति । सर्वमन्यत् पारिभाषिकं पूर्ववदेव ॥ ३५–३८ ॥ भा.टी.—पाँच तोला शुद्ध हरताल लेकर उसे दसगुने आक के दूध के साथ खरल में डालकर अच्छी तरह मर्दन करें और टिकिया बना उसको अच्छी तरह धूप में सुखा लें। अब भस्मयन्त्र के आधे भाग में कपड़छन ढाक की छाल की भस्म भरें। और उस पर उक्त टिकियाओं को रखकर पुनः अवशिष्ट यंत्रभाग को उसी भस्म से अच्छी तरह भर दें और यंत्र को चूल्हे पर रखकर चार पहर की अग्नि दें तो हरताल की श्वेतवर्ण भस्म हो जाती है ॥ ३५–३८ ॥ चतुर्थो मारणप्रकारः विमलं पत्रतालन्तु तत्तुल्या मृतशुक्तिका । खल्वे सम्पेषयेद्यामं कुमारीस्वरसेन वै ॥ ३९ ॥ निर्माय चक्रिकां तस्य शोषयेदातपे भिषक् । शरावसम्पुटे न्यस्य ततो लघुपुटे पचेत् ॥ ४० ॥ स्वाङ्गशीतं ततो ज्ञात्वा भस्म निश्चन्द्रिकं हरेत् । इत्थं मृतं तालकन्तु कुष्ठरोगहरं परम् ॥ ४१ ॥ चतुर्थो मारणप्रकारो मृतशुक्तिकया, अस्मिन् गुणविशेषः कुष्ठनाशन इति । भा. टी.—शुद्ध वर्कीहरताल के बराबर भाग शुक्ति (सीप) भस्म ले कर दोनों को खरल में कुमारी स्वरस से एक पहर तक अच्छी तरह मर्दन करें। टिकिया बनाने योग्य होने पर टिकिया बना उसको धूप में अच्छी तरह सुखा लें। अब इसको एक शरावसम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके लघुपुट में फूँक दें। सम्पुट के स्वांगशीत होने पर उसे खोल निश्चन्द्र भस्म निकाल लें। इस प्रकार बनायी हुई हरताल की भस्म विशेषरूप से कुष्ठनाशक होती है ॥३९-४१॥ पञ्चमो मारणप्रकारः विमलं पत्रतालन्तु त्रिवारं भावयेद्भिषक् । पलाशमूलजैः क्वाथैर्घनीभूतैर्विधानतः ॥ ४२ ॥ माहिषेण च मूत्रेण भावयेच्च ततः परम् । कपोताख्यपुटेनैव पचेत्तालं भिषग्वरः ॥ ४३ ॥ एवं पुटैर्द्वादशभिस्तालकं मृतिमाप्नुयात् । इत्थं मृतं तालकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ ४४ ॥

एकादशस्तरङ्गः २५१ पञ्चमः द्वादशपुटैः शनैः शनैः भस्मीकरणोपयोगी। घनीभूतैरिति मधुनिभैः॥ भा.टी.—शुद्ध वर्कीहरताल को पलाशमूल के गाढ़े क्वाथ की तीन भावना देकर फिर इसको भैंस के मूत्र की तीन भावना दें। धूप में सुखाकर सम्पुट में बन्द करके कपोतपुट में फूँक लें। इस प्रकार बारह पुट देने से हरताल की भस्म हो जाती है। इसको भी निःशंक होकर प्रयोग में लायें ॥ ४२–४४ ॥ षष्ठो मारणप्रकारः विमलं पत्रतालन्तु कन्यकाद्भिर्विमर्दयेत् । चक्रिकां कारयित्वा च शोषयेदातपे भिषक् ॥ ४५ ॥ विधाय गोमये गर्तं तस्मिन् डिण्डीरचूर्णकम् । तालोन्मितं तु विन्यस्य चक्रिकां स्थापयेत्ततः ॥४६ ॥ पुनस्तेनैव चूर्णेन सम्यगाच्छाद्य चक्रिकाम् । पुटेन्महापुटेनैव भूमौ गर्तेऽथवा भिषक् ॥ ४७ ॥ स्वाङ्गशीतं ततो ज्ञात्वा गोमयान्यपसारयेत् । शरदिन्दुनिभं पश्चान्मृतं तालं समाहरेत् ॥४८॥ तालं सञ्चूर्ण्य खल्वे च काचकुप्यां तु विन्यसेत् । इत्थं मृतं तालकन्तु नाशयेद्विषमज्वरम् ॥ ४९ ॥ तण्डुलैकमितं दद्यादेकवारं तु वासरे। श्रीमन्नरेन्द्रनाथाख्यैः गुरुवर्यमहोदयैः ॥ ५० ॥ आविष्कृतोऽनुभूतश्च सुगमोऽयं विधिवरः । प्रकाशितः खलु मया लोकानुग्रहकाम्यया ॥ ५१॥ अथानुभूतचरः षष्ठो मारणप्रकारः—डिण्डीरैः समुद्रफेनैः, भूमौ इति गर्ता- भावेऽपि इत्यर्थः । अत्र विशेषः समुद्रफेनचूर्णकमपि वह्नियोगात् पिण्डितमत्र मिलतीति तत्संयुक्तमेव तालभस्म सम्पद्यते न वियुक्तम् । निर्धूमन्तु भवत्येव । सुगमोऽयं प्रकारः ॥ ४५–५१ ॥ भा.टी.—शुद्ध हरताल को कुमारीस्वरस से अच्छी तरह मर्दन कर उसकी टिकिया बनाकर धूप में सुखा लें। अब एक मोटे और सूखे हुए उपले में गाढ़ा बनाकर हरताल के बराबर भाग समुद्रफेन का चूर्ण भर दें और इसके ऊपर हरताल की टिकिया रखकर फिर इसके अविशिष्ट भाग को समुद्रफेनचूर्ण से भर दें। अब इस चक्रिकायुक्त उपले को जमीन में या गड्ढे में महापुट की अग्नि से फूंक दें। पुट के स्वांगशीत होने पर धीरे-धीरे उपलों की राख को अलग करते हुए निश्चित स्थान में बनी हुई शरच्चन्द्रमा के समान सफ़ेद वर्ण