रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
( ३४ ) विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ राजवर्त का नाम ६४१ | उत्तम वत्सनाभ ६५१ उत्तम राजवर्त ,, | वत्सनाभ शोधन का फल ,, राजवर्त शोधन ६४२ | वत्सनाभ का शोधन ,, द्वितीय शोधन ,, | द्वितीय शोधन ६५२ तृतीय शोधन ,, | तृतीय शोधन ,, राजवर्त मारण ,, | वत्सनाभ का गुण ६५३ राजवर्त भस्म का गुण ६४३ | वत्सनाभ का विशिष्ट गुण ६५४ राजवर्त भस्म का आमयिक | विष प्रयोग का निषेध ६५६ प्रयोग ६४३ | विष की मात्रा ६६० राजवर्त का सत्त्व पातन ६४४ | मृत्युञ्जय रस ,, पेरोज का नाम और मारण ,, | मृत्युञ्जय रस का आमयिक प्रयोग ६६१ पेरोज का शोधन मारण ,, | हिङ्गुलेश्वर रस ६६२ पेरोज भस्म का गुण ६४५ | हिङ्गुलेश्वर रस का आमयिक स्फटिकमणि का नाम ,, | प्रयोग ६६३ उत्तम स्फटिक ,, | पञ्चामृत रस ,, स्फटिक का शोधन मारण ६४६ | शिव ताण्डव रस ६६४ स्फटिक भस्म का गुण ,, | आनन्द भैरव रस ६६५ चतुर्विंशस्तरङ्गः | जया वटी ६६६ विष का निर्वचन ६४६ | कफकेतु रस ६६७ विष का नाम और भेद ६४७ | विष रसायन ६६८ स्थावर जङ्गम विष का स्वरूप ,, | अमृत रसायन ६६६ स्थावर विष का भेद ६४८ | विष का प्रयोग ६७१ स्थावर विष का अधिष्ठान ,, | विष का बाह्य प्रयोग ६७२ स्थावर विष का रूपान्तर से भेद ,, | विष प्रभा वर्तिका ६७४ विष के नव भेद ,, | उपविषों का नाम ६७५ वत्सनाभ का परिचय ६४८ | कुचिला का नाम ६७६ वत्सनाभ विष का परिचय ६५० | कुचिला का परिचय ६७६ वत्सनाभ के भेद ,, | कुचला का शोधन ६७८ वत्सनाभ का नाम ६५१ | द्वितीय शोधन ६७८
[ ३५ ] विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ तृतीय शोधन ६७६ | मङ्गलोदया वटी ७०२ कुचिला का गुण ,, | वेदनान्तक मलहर ,, कुचिला की मात्रा ६८४ | जयपाल का नाम ७०३ नवजीवन रस ,, | जयपाल का परिचय ,, अग्नि तुण्डी रस ६८५ | जयपाल शोधन ७०४ लक्ष्मी विलास रस ६८६ | द्वितीय शोधन ,, शूल निर्मूलन रस ६८७ | तृतीय शोधन ७०५ सुप्ति वातारि रस ,, | जयपाल का गुण ७०६ सारमेय विषापह योग ६८८ | जयपाल की मात्रा ,, विष तिन्दुक तेल ,, | इच्छा भेदी रस ,, अहिफेन का नाम ६८६ | जलोदरारि रस ७०७ अहिफेन का परिचय ,, | ज्वरारि रस ७०८ खस्तिलनिर्यास का निर्मलीकरण ६६१ | अञ्जन भैरव ७०६ खस्तिलनिर्यास निर्मलीकरण का | वृश्चिक विषहर लेप ,, फल ६६२ | जयपाल युक्त योगों का निषेध ,, अहिफेन शोधन ,, | धत्तूरा का नाम ७१० अहिफेन का गुण ,, | धत्तूरा का परिचय ,, अहिफेन का निषेध ६६५ | धत्तूरा बीजों का शोधन ७११ बाह्य प्रयोग में अहिफेन का गुण ६६६ | द्वितीय शोधन ,, अहिफेन की मात्रा ६६७ | शुद्ध धत्तूरा का गुण ,, अहिफेन का आमयिक प्रयोग ,, | धत्तूरा का विशेष गुण ७१२ वेदनान्तक रस ,, | धत्तूर की मात्रा ७१५ निद्रोदय रस ६६८ | धत्तूर का आमयिक प्रयोग ,, सिन्दूर भूषण रस ६६६ | प्रलापान्तक रस ७१७ इर्षोदया वटी ,, | उन्माद गजांकुश ,, अहिफेनासव ७०० | ग्रन्थिशोथ निवारिका वर्तिका ७१८ अहिफेनासव का गुण ७०१ | भांग का नाम ,, अहिफेनासव मात्रा ,, | भांग का परिचय ७१६ अहिफेनासव का आमयिक प्रयोग ,, | भांग का शोधन ७२०
[ ३६ ] विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ द्वितीय शोधन ७२० करवीर का नाम ७३८ भांग का विशेष गुण ,, करवीर का परिचय ,, भांग की मात्रा ७२३ करवीर का बाह्य प्रयोग ,, भांग का आमयिक प्रयोग ,, करवीराद्य तैल ७३६ मदनोदय मोदक ४२३ लाङ्गली का नाम ,, त्रैलोक्य विजया वटी ७२५ लाङ्गली का परिचय ७४० त्रैलोक्य संमोहन रस ७२६ लाङ्गलोका अन्तः प्रयोग में दोष ७४१ गुञ्जा का नाम ७२७ लाङ्गलो का गुण ,, गुञ्जा का परिचय ७२८ लाङ्गली का बाह्य प्रयोग ,, गुञ्जा शोधन फल ,, अर्क क्षीर का नाम ७४२ गुञ्जा शोधन ,, अर्क क्षीर का गुण ,, द्वितीय शोधन ७२६ अर्क क्षीर का बाह्य प्रयोग ,, शुद्ध गुञ्जा का गुण ,, स्नुही क्षीर का नाम ७४३ गुञ्जाबीज की मात्रा ७३० स्नुही क्षीर का शोधन ७४४ गुञ्जा का आमयिक प्रयोग ,, स्नुही क्षीर का गुण ,, गुञ्जाद्य तैल ७३१ स्नुही क्षीर का आमयिक प्रयोग ,, द्वितीय गुञ्जाद्य तैल ,, क्षार वर्तिका ,, गुञ्जाजीवन रस ७३२ क्षार सूत्र ७४५ गुञ्जा भद्र रस ७३३ कृष्णसर्प विष का नाम ७४६ भेलावे का नाम ,, कृष्णसर्प विष की आहार्य विधि ,, भेलावे का परिचय ७३४ कृष्णसर्प विष का शोधन ७४७ भेलावे का स्वरूप ,, कृष्णसर्प विष का गुण ,, भेलावे का शोधनफल ,, कृष्णसर्प विष का निषेध ७४६ भेलावे का शोधन ७३५ सूचिकाभरण रस ,, द्वितीय शोधन ,, सूचिकाभरण रस का गुण ७५० भेलावे का गुण ७३६ द्वितीय सूचिकाभरण रस ७५१ भेलावे की मात्रा ७३७ विसूचीध्वंसन रस ७५२ भेलावे का आमयिक प्रयोग ,, मृत संजीवन रस ,, भल्लातक रसायन ,, रक्त चित्रक शोधन ७५३
[ ३७ ] विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ वृद्धदारक बीज शोधन | ७५३ | विड लवणादि नस्य | ७६२ निम्बू बीज का शोधन | ७५४ | चतुर्मुख रस | ,, हींग का शोधन | ,, | बाल चन्द्र रस | ७६३ गुग्गुल का शोधन | ,, | सूत शेखर रस | ,, ग्रन्थ समाप्ति काल | ७५५ | कुमुदेश्वर रस | ७६४ परिशिष्ट | | आरोग्य वर्द्धिनी गुटिका | ,, वृश्चिक हारी गुटिका | ७५६ | सूर्याञ्जन | ७६५ पञ्चामृत रस | ,, | स्वप्नमेहान्तक वटी | ,, स्मृति सागर रस | ,, | वृहदङ्केश्वर रस | ७६६ शिलाञ्जन | ७५७ | पुष्पधन्वारस | ,, द्वितीय शिलाञ्जन | ,, | गुल्म कुठार रस | ७६७ वृश्चिक विषनाशक गुटिका | ७५८ | शूल वज्रिणी वटी | ,, तन्द्राहरी गुटिका | ,, | पुनर्नवा मण्डूर | ७६८ वातेभकेशरी रस | ,, | कासीसाञ्जन | ,, नयनामृत द्रव | ७५९ | सौवीराञ्जन चूर्ण | ७६९ टङ्कणादि वटी | ,, | प्रमेह गज केशरी रस | ,, शूलाद्रि भञ्जन चूर्ण | ,, | गैरिकादि प्रलेप | ७७० वह्नि प्रदीपन चूर्ण | ,, | नख दन्त विषहर प्रयोग | ,, कफ निःसारक वटी | ७६० | लघु सूत शेखर रस | ,, नवसादर चूर्ण | ,, | प्रवाल पञ्चामृत रस | ,, सुधांशु द्रव | ,, | नवजीवन मलहर | ७७१ कर्ण पाकज वेदनाहर योग | ७६१ | कर्ण मूल हर लेप | ,, सैन्धवादि नस्य | ,, | अहिफेन तैल | ७७२ खर्जूर विषहर योग | ,, | भल्लातकादि कषाय | ,, सर्प विषहर योग | ,, | भल्लातकादि गुटिका | ,, आखू विषहर योग | ७६२ | भल्लातकादि लेप | ,, बरटै विषहर योग | ,, | भल्लातक रसायन | ,,
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ॐ रसतरङ्गिणी श्रीकंसमर्द्दिन्यै नमः अथ रसशालाविज्ञानीयः प्रथमस्तरंगः गणेशमुखचुम्बिनी सुरकदम्बकादम्बिनी दयारसतरङ्गिणी दनुजसङ्घसंहारिणी । अघव्रजविडम्बिनी हरकुटुम्बिनी सन्ततं भवत्वमरवन्दिता मम हृदन्तरालम्बिनी ॥ १ ॥ प्रसादिनी ध्रुवोऽखिलनमस्कृतः स्थिरतनुश्च यत्साधकः समस्तगुणमण्डितो जगति यन्नियुक्तो बलिः ॥ यवोऽतनुरपि स्मरस्तनुयुतोऽनिरुद्धस्थितिः स नोऽवतु समंततो मुरहरः सदा पारदः ॥ १ ॥ अथ खलु रसतन्त्रविविदिषामुह्यन्मनुजमानसमलमोषिणीं रसतरङ्गिणी- माविष्करिष्यन्नाचार्यः सम्भावितप्रत्यूहन्यूहापोहाय शिष्टाचारानुमितस्मृत्यनुमित- श्रुतिबोधितकर्तव्यताकम्मङ्गलमाचरन् स्वेष्टदेवतामुपश्लोकयति—गणेशमुखचुम्बि- नीत्यादिना पृथ्वीवृत्तेन । गणेशो विघ्नहरः, तस्य मुखं चुम्बतीति, सुतवत्सल- तया, गणेशः पार्वतीसुतः इति पौराणिकस्मरणात् । अत्र चादौ गणेशनाम- कीर्तनमपि माङ्गलिकमित्यपि रहस्यम् । सुरकदम्बः = देवसमूहः तत्र काद- म्बिनी = सामूहिका प्रधानभूतेति यावत्, दया = करुणा एव रसस्तस्य तरङ्गि- णीव अत्यन्तदयायुक्तेति यावत्, दनुजसङ्घां = दैत्यसमूहस्तस्य संहारिणी = विनाशिका, अघव्रजः=पापसमूहः तस्य विडम्बिना=अपहरणशीला, अमर- वंदिता=देवैः स्तुता, नमस्कृता च, हरकुटुम्बिनी=शिवस्यार्धाङ्गिनो, संततं = निर- न्तरं मम हृदंतरालम्बिनी = मानसमध्यस्थायिनी भवतु इत्याशीः प्रार्थनम् ॥१॥ भा.टी.—गणेशजी के मुख को प्यार करनेवाली, देवसमूह में प्रथम पूजनीया, अत्यन्त दयावाली, दैत्य समूह को विनाश करनेवाली, पाप समूह
को नष्ट करनेवाली, शिव के आधे भाग में विराजमान और देवसमूह से पूजनीया श्रीपार्वती देवी मेरे हृदय में वास करें ॥ १ ॥ ज्योतिःशास्त्रमहाम्भोधिकर्णधारं नमाम्यहम् । जीवानन्दं तु पितरं मातरञ्च सरस्वतीम् ॥२॥ ज्योतिःशास्त्रेत्यादिना पित्रोर्नमस्कारः ॥२॥ भा.टी.—ज्योतिष शास्त्ररूपी समुद्र में नाविक स्वरूप पिता श्री पं० जीवानन्दजी, एवं माता सरस्वतीदेवी को नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ क्वाहं विमूढधिषणाः क्व च सूततन्त्र- माकुण्ठितामलधियामपि यत्र बुद्धिः । सत्यं तदेतदपि तत्र तथापि यत्नः साफल्यमेष्यति गुरोरनुकम्पयाऽयम् ॥ ३ ॥ गुर्वानुकम्पासामर्थ्यं प्रकटयन् स्वाभिमानमपाकरोति क्वाह्मिति—विमूढधि- षणाः मुग्धबुद्धिः अहं क्व ? अमलधियां निर्मलमतीनामपि यत्र सूततन्त्रे बुद्धिः आकुण्ठिता स्यादिति शेषः, तादृशं सूततंत्रं पारदसाधनशास्त्रं च क्व ? अहो वैषम्यम् । अपि यद्यप्यर्थे, यद्यपि तदेतत् वैषम्यं सत्यं, तथापि तत्रायं यत्नः रस- तरङ्गिणीनिर्माणरूपः गुरोरनुकम्पया साफल्यमेष्यति ॥३॥ भा.टी.—स्वच्छ एवं पवित्र बुद्धिमान् वैद्यों की बुद्धि भी जिस रसशास्त्र में कुंठित हो जाती है उसमें मेरे जैसे अल्पज्ञ की बुद्धि कुंठित हो तो यह स्वाभाविक है फिर भी गुरु की कृपा से यह परिश्रम मेरा सफल होगा ऐसा विश्वास है॥३॥ य इह गुरुसमीपे यत्नतोऽब्दान्त्रयेण रसनिगमनिगूढग्रन्थितत्त्वावबोधः । अपि च गुरुरहस्यः कर्ममार्गोऽप्यकारि सरलमधुरपद्यैर्ग्रन्थ्यते वै स एव ॥ ४ ॥ ननु क्रियमाणोऽयं भवद्यत्नो रसयोगसंग्रहफल एवेति कृतं प्रयत्नेन, तादृश- संग्रहाणां बाहुल्यात् इति चेत्तत्राह, य इहेति—यत्नतः शिष्यधर्मपालनपरतया रसनिगमे रसशास्त्रे निगूढा यत्नलभ्याः ये ग्रंथयः आवरणसामान्याद् गुप्तरह- स्यस्थलानि, तेषां यः तत्त्वावबोधो मर्मज्ञानं गुरुसमीपे मया अकारि, अपि च गुरुणा बोधितं रहस्यं यस्य तादृशः, कर्ममार्गः, रचनात्मकः क्रमोऽपि अकारि स एव सरलमधुरपद्यैः सुखेनैवार्थज्ञापकैः मधुरैश्च श्लोकैः ग्रध्यते, नतु संग्रह- मात्रमिति भावः ॥४॥
प्रथमस्तरङ्गः ३ आ.टी.--तीन वर्षों तक गुरु की सेवा कर रसशास्त्र के गूढ़ तत्त्वों का और गुरूपदेश से कर्म मार्ग का जो हमने ज्ञान प्राप्त किया है-उन्हीं ज्ञानों को सरल एवं मधुर पद्यों द्वारा इस ग्रंथ में ग्रथित कर रहा हूँ ॥ ३ ॥ प्राचीनेषु दुरूहेषु रसतन्त्रेषु मुह्यताम् । सन्दिग्धास्वतिकष्टासु रसपाकक्रियासु च ॥५॥ पदे पदे विशेषेण नित्यं व्यामोहितात्मनाम् । ग्रन्थसम्पद्विहीनानां स्वल्पाध्ययनसम्पदाम् ॥६॥ इदानींतनबालानां स्वल्पेन समयेन तु । सुखतः प्रतिपत्त्यर्थं प्रयत्नोऽयं कृतो मया ॥७॥ घिल्डियालोपसंज्ञेन सदानन्देन शर्मणा । निबध्यते महायतनादियं रसतरङ्गिणी ॥८॥ अथ ग्रन्थानूबन्धचतुष्टयं दर्शयति विशेषकेण — प्राचीनेष्विति । दुरूहेषु कष्टलभ्यतत्त्वेषु = रसहृदयतन्त्रादिषु, मुह्यतामाकुलानाम् , सन्दिग्धासु स्फुटनि- श्चायकवर्णनरहितासु अत एव अतिकष्टासु बहुसमारम्भाल्पफलासु रसपाकक्रि- यासु = पारदादिजारणमारणव्यापारेषु,पदे पदे इति बाहुल्याभिप्रायेण स्वल्पेन समयेन तु इति तुर्विशेषार्थे, यदयमेव प्राक्तनतन्त्रेभ्यो रसतरङ्गिण्यां विशेषो यावता परिमितकालमप्येतदध्ययनं जिज्ञासुमनःसु रसरहस्यमाधातुमलमलमिति । तदेतदाह-सुखतः प्रतिपत्त्यर्थमिति प्रतिपत्तिः ज्ञानम् , महायत्नात् गुर्वनुकम्पास- हायविशिष्टाद् यत्नात् इत्यर्थः ॥५-८॥ एतेन स्वगुरूणां श्रीनरेन्द्रनाथ-मित्रम- होदयानां रसतरङ्गिणीनिर्माणे साहाय्यं ध्वनितम् । भा.टी.—अत्यन्त दुरूह रसशास्त्र में और संदिग्ध एवं अतिकष्टकारी रस- पाकक्रिया में व्यामोह प्राप्त वैद्यों के लिए, ग्रन्थ की कमी के कारण, स्वल्प अध्ययन करनेवाले, आजकल के अल्पज्ञ वैद्यों को स्वल्प समय में सुखपूर्वक ज्ञान कराने के लिए घिल्डियालोपाधियुक्त सदानन्द शर्मा ने रसतरंगिणी नामक ग्रंथ रचने का प्रयास किया है ॥ ५-८ ॥ रसतरंगिण्याः परिचयः सशिलापि निराघाता सनागापि भ्योज्झिता । सुखावगाहा बोभूयादियं रसतरङ्गिणी ॥९॥ ससत्त्वापि निराबाधा सघोषापि स्थिरक्रिया । सुखावगाह। जयति भृशं रसतरङ्गिणी ॥१०॥
४ रसततरङ्गिणी अथ रसतरङ्गिण्या अलौकिकत्वं ध्वनयति युग्मकेन सशिलापीति । लोको- पलब्धा हि तरंगिणी नदी शिलापाषाणयुता चेदाघातविशिष्टा, ससर्पा च भय- प्रदा जलजन्तुसमन्विता चेत् प्रविष्टपुरुषप्राणहरा च, सजलशब्दा चञ्चला च, इयन्तु सह शिलया=मनःशिलया उपलक्षितापि निराघाता=सङ्घट्टनवर्जिता, सनागा=सीसकयुतापि भयोझिता=निर्भयसाधना, ससत्त्वा=अभ्रकादिसत्त्वयु- तापि निराबाधा=प्राणबाधारहिता, घोषः=कांस्यं तद्युतापि स्थिरक्रिया=निश्चि- त्तगुणसाधना च, सेयमध्यापकाध्येतृणां सुखावगाहा सरसवर्णानायुक्तत्वेन सुख- प्रवेशा भृशं = अत्यर्थं बोभूयात्=आस्तामित्याशिषः । जयतीत्यस्याः सर्वोत्कर्षो बोधितः ॥६, १०॥ भा.टी.-अपने ग्रंथ की उत्तमता बताते हुए रसों का तरंग है जिसमें ऐसी, रसतरंगिणी की, गंगा इत्यादि पवित्र नदियों से तुलना करते हैं- जहाँ नदियों में पत्थर का चट्टान इत्यादि रहता है वहाँ आघात अवश्य रहता है और जहाँ सर्प रहता है वहाँ भय अवश्य रहता है पर इस रसशास्त्र रूपी नदी में शिला ( मैनशिल ) और नाग ( सीसा ) के रहते हुए सुख- पूर्वक प्रवेश करने योग्य है ॥९॥ जहाँ सत्त्व, मारक जीव ( नक्रादि ) रहते हैं वहाँ बाधा अवश्य होती है और जहाँ नदी में = भ्रमर (चकोह) रहता है वहाँ कोई कार्य स्थिर नहीं होता है । पर सत्त्व ( अभ्रक धात्वादि सत्त्व, एवं घोष (कांसा) इत्यादि के रहते हुए भी इस रसशास्त्र में सुखपूर्वक प्रवेश कर सकते हैं । अतः इस रसतरं- गिणी की जय हो ॥ १० ॥ रसवैद्यस्य प्रशंसा तत्तत्संस्काररीत्या सपदि रसवरः शोधितः स्यान्न यावद् यावद्वा मारितः स्यात्सकृदपि न रसो नो कृता स्याद्बुभुक्षा । यद्वा नैवाभ्रसत्त्वं खलु कृतमथवा जारितं वा सुवर्णं प्राणाचार्यः क्व तावद्भवति हि भिषजां मण्डले मण्डनीयः॥११॥ अथ चिकित्साप्रधानपादं रसवैद्यं स्तौति स्रग्धरया, तत्तदिति--मारणं भस्मत्वापादनं, बुभुक्षा पारदस्य धात्वादिश्राससामर्थ्यम्, एतावता च पारद- संस्कारादि जारणान्तं कर्म भिषग्वपुणावश्यं ज्ञातव्यमिति ध्वनितम् ॥११॥ भा.टी.-जो वैद्य भिन्न-भिन्न संस्कारों द्वारा पारद का अच्छी तरह से शोधन कर लेता है और जो पारद का मारण (भस्म) तथा पारद को बुभुक्षित (धातुओं
प्रथमस्तरङ्गः ५ को खा जानेवाला ) नहीं कर लेता है और जो पारद में अभ्रक सत्त्व तथा स्वर्ण का जारण नहीं कर सकता है वह किस तरह वैद्यसमुदाय में माननीय हो सकता है अर्थात् उपर्युक्त गुण होने पर ही श्रेष्ठ रसवैद्य हो सकता है ॥११॥ कृतिरियमिह दोषैराचिता स्यान्मदीया यदि तदपि न धीरैः काप्युपेक्षा विधेया । कृमिशतपरिपूर्णा कण्टकाकीर्णकाया स्वनसि नहि नरेन्द्रैरर्प्यते केतकी किम् ॥१३॥ अथ दोषैकदृष्ट्या नेयमुपेक्षणीयेति दृष्टान्तयति कृतिरियमिति—दोषभरिता- पीयं मत्कृतिः धीरैर्नोपेक्षणीया, इति नात्राधीराः प्रार्थ्यन्ते तेषामुपेक्षण-स्वभाव- त्वात्, यतः कृमिशतैः पूर्णा अथ च कण्टकव्यासशरीराऽपि केतकी नरेन्द्रैः किं स्वनसि = स्वकीयनासिकायां नार्प्यते ? अति त्वपर्यत एव । तथा च विधूय पुरोभागितां गुणैकग्रहिभिर्भव्यैर्भाव्यमिति भावः ॥ १२ ॥ भा.टी.—यद्यपि इस मेरी कृति में अनेकों दोष होंगे फिर भी धीर वैद्यों को इसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्या सैकड़ों कृमियों से परिपूर्ण और काँटों से युक्त केतकी ( केवड़ा ) के पुष्प को राजवर्ग नासिका पर नहीं रखते हैं अर्थात् सुगन्ध नहीं ग्रहण करते हैं, किन्तु ग्रहण करते ही हैं ॥ १२ ॥ रसशाला विमलोपवनप्रदेशगां रमणीयां जलयन्त्रशोभिताम् । कमनीयगवाक्षसंयुतां जनबाधारहितामसंकुलाम् ॥१३॥ निखिलौषधवर्गमण्डितां रससिद्धेश्वरचित्रभूषिताम् । विपुलाखिलसाधनान्वितां रसशालां विदधीत शोभनाम् ॥१४॥ अथ साधनप्राथम्यादुपक्रमो रसशालायाः—विमलेत्यादि, वियोगिनीवृत्त- युगलेन—विमले उपवनप्रदेशे स्थापितां, उपवनस्य औषधिसुलभताजनकत्वात् रजोधूमादिबाधारहितत्वात् रम्यत्वाच्च । औषधव्याघातभयात् जनबाधारहिताम्, असङ्कुलां = असङ्कीर्णाम् , निखिलौषधवगैंण रसक्रियोपयोगिभेषजसमूहेन, रस- सिद्धेश्वराः श्रीशङ्करादयः, तेषां चित्रैः भूषितां श्रद्धाप्रोत्साहनहेतोः । स्पष्टमन्यत् ॥ १३-१४ ॥ भा.टी.—औषधि निर्माण करने के लिए एक स्वच्छ उपवन (बगीचा) में जहाँ पर रहट या पानी का नल लगा हो और मनुष्यों के आने जाने से
६ रसतरङ्गिणी जहाँ पर औषधि-निर्माण में कोई विघ्न न हो सके, ऐसी एक रसशाला (Pharmacy) बनानी चाहिये यह शाला विस्तृत और वायु के आने जाने के लिये सुंदर खिड़की तथा रोशनदानों से युक्त होनी चाहिए । इसमें सब औषधियाँ वर्ग-क्रम से रखी हुई और दीवारों पर रस-आचार्यों के चित्र टँगे होने चाहिये । इसमें औषधिसिद्धि के लिये काम में आनेवाले सब साधन पर्याप्त रूप में होने चाहिये ॥१३-१४॥ रसशालायां कर्मविभागः शङ्करं पूर्वदिग्भागे स्थापयेद्भिषजाग्रणीः । आग्नेये वह्निकार्याणि याम्ये प्रस्तरकृत्यकम् ॥१५॥ शस्त्रकृत्यन्तु नैर्ऋत्ये क्षालनादीनि वारुणे । वायव्ये शोषणं शस्तमुत्तरे यन्त्ररक्षणम् ॥१६॥ निदध्यादीशकोणे तु रससाधनमूलकम् । मुख्योपकरणं तत्तन्नित्यकृत्यं समागतम् ॥१७॥ अत्र च कर्मसौकर्यार्थं दिग्भेदेन रसशालायां कर्मविभागमाह-शङ्करं पूर्व दिग्भाग इति-शङ्करो रससाधकेष्टतमः, शङ्करप्रिय इत्याचार्यगुणेषूक्ते । वह्निका- र्याणि भ्राष्ट्रीप्रभृतीनि, प्रस्तरकृत्यं खल्वपेषणादिकम् । याम्ये=दक्षिणस्याम् , वारुणे=पश्चिमायाम् ॥ अन्यत् सुगमम् ॥ १५-१७ । भा.टी.-पुरानी प्रथा के अनुसार पूर्वोक्त रसशाला में पूर्व दिशा में शंकर की स्थापना करनी चाहिये और आग्नेय कोण में आग की भट्टी चूल्हा आदि बनाने चाहिये । दक्षिण दिशा में सिल खरल में पीसने रगड़ने का कार्य करने चाहिये । नैर्ऋत्य कोण में शस्त्र आदि से काटने आदि के कार्य करने चाहिये । पश्चिम दिशा में जल से धोने के कार्य करने चाहिये । वायव्यकोण में औषधि आदि को सुखाने के कार्य करने चाहिये । उत्तर दिशा में भिन्न- भिन्न प्रकार के यन्त्रों को बनाकर रखना चाहिये और ईशान कोण में पारद के शोधन-मारण में प्रतिदिन काम आनेवाले मुख्य-मुख्य उपकरणों को रखना चाहिये । जिससे काम करनेवालों को सुविधा हो और समय नष्ट न हो ॥ १५-१७ ॥ रसशालायां उपकरणद्रव्याणि द्रोणीरूपा वर्तुलाश्च खल्वाः पाषाणनिर्मिताः । आयसाश्चापि संग्राह्यास्तद्योग्याश्चैव मर्दकाः ॥१८॥
प्रथमस्तरङ्गः ७ काचमृत्काष्ठलोहादिनिर्मितानि बहूनि च । पात्राणि कारयेद्धीमान् यत्नतः पात्रमानवित् ॥१६॥ सन्दंशिका कर्तरी च तथा शूर्पमुदूखलम् । चालनी वह्निमित्रा च स्थापनीया प्रयत्नतः ॥२०॥ दोलायन्त्रादिकानाञ्च सामग्रीं निखिलामपि । सुरक्षिते प्रदेशे तु स्थापयेद्भिषजाग्रणीः ॥२१॥ सुदृढा विविधाकाराः कूपिकाः काचनिर्मिताः । सपिधानाः सिद्धरसस्थापनाय समाहरेत् ॥२२॥ विविधानि सुरूपाणि पित्तलादि कृतानि च । मानयुक्तानि वै वैद्यस्तुलायन्त्राणि रचयेत् ॥२३॥ मसृणान्यतिनूतनानि कागदानि सितानि तु । रसौषधप्रदानार्थं प्रशस्यन्ते भिषग्वरैः ॥२४॥ वन्योत्पलानि काष्ठानि तुषादीनि तृणानि च । शिखित्रान् कोकिलांश्चापि रक्षयेद्भिषजां वरः ॥२५॥ यच्चान्यदुपयोगि स्याद् देशकालाद्यपेक्षया । तत्तत्संस्थापयेत्तत्र रसकर्मविशारदः ॥२६॥ प्रत्यहं कारयेद्धीमान् शालायां मार्जनादिकम् । भृत्यैः कर्मसु निष्णातैः सदाऽऽतङ्कनिवृत्तये ॥२७॥ प्रसङ्गादुपकरणद्रव्याणि -- द्रोणीरूपाः = नौकाकाराः, वर्तुलाः = गोलाः, तद् योग्याः खल्वसमानोपादानाः । सन्दंशिका वस्तुदृढग्रहणसाधनम् , चालनी औषधादिशोधनी "तितउ" इति ख्याता, वह्निमित्रा = मूषा, सुरक्षिते रजः- कृम्यादिवर्जिते, सपिधानाः यथायोगं कोमलकाष्ठकाचादिनिर्मितमुखावरणा- न्विताः, विविधानि लघूनि बृहन्ति च, मसृणानि = सुचिकणानि अतिनूतनानि, पुरातनानि विदीर्य्यन्ते, कागदानि सितानि मस्यादिसम्पर्करहितानि तथा च मुद्रितपत्रेष्वौषधं न्यस्तं विगुणीभवतीति । वन्योत्पलानि वने स्वयं शुष्काणि, शिखित्रः जलनिर्वापितं दग्धकाष्ठं, कोकिलः सबाष्परोधं निर्वापितमिति भेदः । "शिखित्राः पावकोच्छिष्टा अङ्गाराः कथिताः पुनः । कोकिलाश्चेतिताङ्गारा निर्वाणाः पयसा विना।।" इति रसरत्नसमुच्चयात् । अन्यदपि योग्यतानुसारमावश्यकं सुरा- प्रदीपादि । आतङ्कनिवृत्तये रोगपरिहारार्थम् । स्पष्टमन्यत् ॥ १८-२७ ॥ भा.टी.—रसशाला में निम्नलिखित उपकरण और समय समय पर यन्त्र
मूषा आदि बनाने की सामग्री भी रखनी चाहिये, पत्थर और लोहे के गोल और किश्तीनुमा खरल और उनकी मूसली और अनेक प्रकार के काँच, मिट्टी, लकड़ी, लोहादि धातुओं के बने हुए सँड़सी, कैंची, सूप, ऊखल, चलनी, मूषा और दोलायन्त्र आदि यन्त्रों को बनाने की सामग्री और बने हुए रस भस्म आदि को रखने के लिए मजबूत और डाटवाली काँच की शीशी। इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के धातुओं के बने हुए छोटे बड़े तराजू या काँटे, रसौषधि-वितरण करने के लिए पतले सफेद और बारीक चिकने कागज, जंगली उपलें, लकड़ी, भूसी, फूस, बुझे और अनबुझे कोयले। इसके अति- रिक्त देश काल आदि के अनुसार और भी जो जो उपयोगी चीजें हों उनका भी रसशाला में संग्रह करना चाहिये। इस प्रकार सब सामग्री से परिपूर्ण हुई रसशाला को प्रतिदिन सेवकों द्वारा झाड़ना-बुहारना चाहिए, जिसमें उससे अशुद्ध वायु धूल आदि द्वारा औषधियों में खराबी न आ जाय ॥१८-२७॥ वक्तव्य—उक्त रसशाला में प्रधान रूप से निम्न उपकरण भी होने चाहिये। पारद, उपरस, शंख, शुक्ति आदि जान्तवपदार्थ, विशिष्ट क्षार, सब प्रकार के नमक, जौ, अपामार्ग, पलाश, थोहर, इमली, तिल आदि से प्राप्त होनेवाले क्षार स्वर्ण आदि धातु-उपधातु, मिश्रलोह, महारत्न, क्षुद्ररत्न, विष, उपविष और भिन्न-भिन्न धातु आदि के शोधन-मारण में काम आनेवाली औषधियाँ तथा सुराप्रदीप कांच के प्याले, दृढ़ काँच की नलियाँ, सीसे के पात्र, सारक पत्र, वर्णपत्र, इसके अतिरिक्त गंधकद्राव को रखने के लिए मज- बूत काँच के डाटवाली नीलवर्ण काँच की शीशियाँ और कस्तूरी आदि सुगन्धित औषधियों के रखने के लिए काँच के डाटवाली सुन्दर शीशियाँ और छपे हुए या हाथ से लिखे हुए भिन्न-भिन्न औषधि नाम के लेबल होने चाहिये। गन्धकद्राव तथा विषैली औषधियों के लेबल विशेषरूप से लाल वर्ण के होने चाहिए जिससे इनको सावधानी से प्रयोग किया जाय, भिन्न-भिन्न रसौ- षधियों को शीशियों में भरकर उनके ऊपर अच्छी तरह लेबल लगा देना चाहिए। इसके अतिरिक्त रोगियों के घर जाकर देखनेवाले वैद्यों के लिए सुन्दर और रसौषधियों से भरी हुई शीशियों से युक्त एक करभेषजपेटिका होनी चाहिये। परिचारकलक्षणम् सोद्यमाः सत्यवक्तारो निर्लोभाः शुचयः परम्। शूराः पथ्याशिनो ग्राह्याः भिषग्भिः परिचारकाः ॥२८॥
प्रथमस्तरङ्गः ६ प्रसङ्गाद् योग्यपरिचारकलक्षणम्—पथ्याशिनः, अन्यथा रोगादिभिः कर्म- कालातिपातः ॥ २८ ॥ भा.टी.—रसशाला में काम करने के लिए रखे जानेवाले सेवक लोग, परिश्रमी, सत्यभाषी, निर्लोभ, साफ-सुथरे रहनेवाले, बलवान् और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह समझनेवाले होने चाहिए ॥ २८ ॥ रससिद्धानां नामपरिगणनम् श्रीशङ्करो भैरवश्च नन्दी स्वच्छन्दभैरवः । मन्थानभैरवः शम्भुर्ब्रह्मा विष्णुश्च भास्करः ॥२९॥ कापालिकश्च लङ्केशो ह्यगस्त्यो नरवाहनः । नागार्जुनो नरेन्द्रश्च काकचण्डीश्वराभिधः ॥३०॥ मत्तो माण्डव्यगोविन्दौ नागबोधिर्विशारदः । यशोधनो रत्नकोशो व्याडिर्गोरक्षनाथकः ॥३१॥ सुगृहीताभिधेयास्तु रससिद्धा इमे मताः । नामान्येतानि हि पठेत् प्रत्यहं रससिद्धये ॥३२॥ अथ रससिद्धानां नामपरिगणनं मङ्गलार्थं सम्प्रदायप्रवृत्तये च । सुगृहीता- भिधेयाः पुण्यश्लोकाः । सिद्धिश्च तादृशाऽदृष्टसंपत्त्या ॥ २९-३२ ॥ भा.टी.—पुरानी प्रथा के अनुसार निम्नलिखित नामवाले रसाचार्यों के नाम का जप उक्त रसशाला में होना चाहिए क्योंकि इन पवित्रात्माओं के नाम- कीर्तन से रस की सिद्धि होती है । रसाचार्यों के नाम ये हैं—श्री शंकर, भैरव, नन्दी, स्वच्छन्दभैरव, मन्थानभैरव, शम्भु, ब्रह्मा, विष्णु, भास्कर, कापा- लिक, लङ्केश, अगस्त्य, नरवाहन, नागार्जुन, नरेन्द्र, काकचंडीश्वर, मत्त, माण्डव्य, गोविन्द, नागबोधि, विशारद, यशोधन, रत्नकोश, व्याडि, गोरक्ष- नाथ आदि ॥ २९-३२ ॥ रसशास्त्राचार्यस्य स्वरूपम् सदाचारः सुचरितः समदर्शी सदाशयः । सत्यवादी सिद्धमन्त्रः सर्वदा शङ्करप्रियः ॥३३॥ धीरो वीरः स्थिरप्रज्ञो रसकर्मविचक्षणः । रसतन्त्रस्वतन्त्रो यः स आचार्यः प्रशस्यते ॥३४॥ “ततोऽनन्तरमाचार्यम्परीक्षेत” इति विमानस्थाने चरकस्मरणात् आचार्य-
१० रसतस्रङ्गिणी परीक्षोपयोगि रसशास्त्राचार्य्यस्वरूपमाह सदाचार इत्यादिना--सदाचारादयो गुणाः प्रभावत्त्वार्थं व्यवहारशुद्ध्यर्थञ्च, सिद्धमन्त्रः == आप्तमन्त्रसिद्धिः । रसत- न्त्रस्वतन्त्रः स्वतन्त्रप्रज्ञः नवनवरसतन्त्रनिर्माणकुशलः ॥३३, ३४॥ आ.टी.---रसशास्त्र को पढ़ानेवाला तथा क्रियात्मक ज्ञान करानेवाला आचार्य (गुरु) सदाचारी, सच्चरित्र, पक्षपातरहित,सद्भावयुक्त,सत्यवक्ता, मन्त्र- सिद्ध किया हुआ, शिव का परमभक्त, धैर्यवान् , बलवान् , स्थिरविचारवाला, पारद की जारणा-मारणादि क्रिया में अत्यन्त चतुर, विज्ञान विचार और अनुभव द्वारा नूतनरसशास्त्र रचने में भी प्रवीण श्रेष्ठ आचार्य कहा जाता है॥३३,३४॥ शिष्यस्य स्वरूपम् सदाशयः सदाचारः स्वकुलाचारदीक्षितः । गुरुपूजारतो वीरः सत्यवादी दृढव्रतः ॥३५॥ आज्ञापरो निरालस्यो कुलीनोऽतिविचक्षणः । आयुर्वेदकृताभ्यासः शिष्यः खलु प्रशस्यते ॥३६॥ सदाशयादयः शिष्यगुणाः शिष्यादृढताव्यवहाररक्षार्थाः। दृढव्रतः प्रतिज्ञा- पालकोऽतिविचक्षण ऊहापोहकुशलः ॥ ३५, ३६ ॥ आ.टी.---रसशास्त्र पढ़नेवाला शिष्य शुद्ध भाववाला, सदाचारी, अपने कुलाचार को जाननेवाला, गुरुपूजक, बलवान् , सत्यवक्ता, प्रतिज्ञा को पूरा करनेवाला, आज्ञापालक, निरालसी, कुलीन, अत्यन्त समझदार और रस- शास्त्र के अतिरिक्त आयुर्वेद का विद्वान् होना चाहिए ॥ ३५, ३६ ॥ शिष्योपनयने वर्जनीयाः दुराचारा दुश्चरिता अकुलीना महोद्धताः । चौर्यच्छलादिना नित्यं विद्याग्रहणलोलुपाः ॥३७॥ अज्ञातकुलशीला ये नास्तिका गुरुनिन्दकाः । शिष्योपनयने हेया नरा रसविशारदैः ॥३८॥ इति रसशालाविज्ञानीयो नाम प्रथमस्तरङ्गः । दुराचारादयः शिष्यदोषास्त्यागार्थाः, नास्तिकाः---“नास्तिको वर्ज्याना- मिति” चरकस्मरणात् , शिष्योपनयने शिष्यतास्वीकारकम्मैणि हेयाः वर्जनीयाः ॥ ३७, ३८ ॥ आ.टी.-रसशास्त्र के अध्यापक को दुराचारी, दुश्चरित्र, नीचकुलोत्पन्न, नम्रतारहित, चोरी और छल से विद्या ग्रहण करनेवाला, जिसके स्वभाव और
द्वितीयस्तरङ्गः ११ कुल का पता न हो ऐसा और नास्तिक तथा गुरु की निन्दा करनेवाला शिष्य विद्या पढ़ाने में स्वीकार नहीं करना चाहिये ॥ ३७, ३८ ॥ रसशालाविज्ञानीय नामक प्रथम तरङ्ग समाप्त हुआ । —:०:— अथ परिभाषाविज्ञानीयो द्वितीयस्तरङ्गः परिभाषाविज्ञानफलम् परिभाषाध्यायमादौ योऽधीते रससाधकः । रसतन्त्रार्थविज्ञाने न स मुह्यति कुत्रचित् ॥१॥ स्पष्टम् ॥ १ ॥ भा.टी.--जो रससाधक वैद्य रसनिर्माण करने के पूर्व रसशास्त्र की परि- भाषा को अपने अध्यापकों से अच्छी तरह पढ़ लेता है उसे रसशास्त्र के अर्थज्ञान में कहीं भी कठिनाई नहीं आती है। अतः परिभाषाज्ञान अत्यावश्यक है ॥१॥ परिभाषालक्षणम् निगूढानुक्तलेशोक्तसन्दिग्धार्थप्रदीपिका । सुनिश्चितार्था विबुधैः परिभाषा निगद्यते ॥२॥ स्पष्टम् ॥ २ ॥ भा.टी.—जिस संक्षिप्त और सांकेतिक शब्द द्वारा शास्त्र के गुप्त अप्रकट अथवा किञ्चित् प्रकट तथा सन्दिग्ध भाव या अर्थ का स्पष्ट और निश्चित अर्थ ( मतलब ) प्राप्त हो उसे परिभाषा कहते हैं ॥ २ ॥ लवणपञ्चकम् सैन्धवञ्चाथ सामुद्रं बिडं सौवर्चलं तथा । रोमकञ्चेति विज्ञेयं बुधैर्लवणपञ्चकम् ।.३॥ बिडसौवर्चले कृत्रिमे ॥ ३ ॥ भा.टी.—सैन्धानमक, समुद्रनमक, विडनमक, सौंचलनमक, रोमक (रेह) नमक, इन पाँच नमकों को लवणपंचक नाम से कहा जाता है ॥ ३ ॥ लवणत्रिकम् सिन्धुजं रुचकं पाक्यमेतत् त्रिज्रवणं स्मृतम् । प्रकीर्तितञ्च लवणत्रिकं वा लवणत्रयम् ॥४॥ रुचकं सौवर्चलम् , पाक्यं विडम् ॥ ४ ॥
१२ रसतरङ्गिणी आ.टी.—सैन्धा, सौंचल और विडनमक को त्रिलवण, लवणत्रिक या लवणत्रय नाम से कहा जाता है ॥ ४ ॥ सैन्धवस्य मुख्यत्वम् तत्रापि सैन्धवं मुख्यं विद्वद्भिः परिकीर्तितम् । उक्ते लवणसामान्ये सैन्धवं विनियोजयेत् ॥५॥ मुख्यं नेत्र्यत्वाद् बहुगुणवत्त्वाच्च ॥५॥ भा.टी.--यद्यपि औषधि-प्रयोग में पाँचों नमक काम में आते हैं परन्तु इनमें सैन्धानमक मुख्य माना जाता है । अतः जहाँ पर केवल लवण शब्द लिखा हो वहाँ सैन्धानमक ही लेना चाहिये ॥ ५ ॥ क्षारद्वयं क्षारत्रिकञ्च स्वर्ज्जिक्षारो यवक्षारः क्षारद्वयमुदाहृतम् । सौभाग्येन समायुक्तं क्षारत्रिकमुदाहृतम् ॥६॥ क्षारपञ्चकम् मुष्कक्षारो यवक्षारः किंशुकक्षार एव च । स्वर्ज्जिक्षारस्तिलक्षारः क्षारपञ्चकमुच्यते ॥७॥ किंशुकक्षारः = पलाशक्षारः ॥ ६, ७ ॥ भा.टी.-सजीखार और जवाखार को क्षारद्वय शब्द से कहा जाता है । इन दोनों के साथ सुहागा भी हो तो इसको क्षारत्रिक शब्द से कहा जाता है ॥६॥ पाढल क्षार, जवाखार, ढाकक्षार, सजीखार और तिलक्षार को क्षार- पंचक शब्द से कहा जाता है ॥ ७ ॥ क्षाराष्टकम् सुधापलाशशिखरचिञ्चार्कतिलनालजाः । स्वर्जिका यावशूकश्च क्षाराष्टकमुदाहृतम् ॥८॥ सुधा स्नुही, शिखरी अपामार्गः ॥ ८ ॥ भा.टी.--थोहर, ढाक, अपामार्ग, इमली, आक, तिल के डंठल के क्षार, सजीखार और जवाखार को क्षाराष्टक शब्द से कहा जाता है ॥ ८ ॥ मूत्राष्टकम् सैरिभाजाविकरभगोखरद्विपवाजिनाम् । मूत्राणीति भिषग्वर्यैर्मूत्राष्टकमुदाहृतम् ॥६॥ खरेभोष्ट्रतुरङ्गाणां पुंसां मूत्रं प्रशस्यते ।
द्वितीयस्तरङ्गः १३ गोजाविमहिषीणाञ्च मूत्रं स्त्रीणां हितं मतम् ॥१०॥ निखिलेष्वपि मूत्रेषु गोमूत्रं गुणवत्तमम् । अतो विशेषानुक्तौ तु गोमूत्रं विनियोजयेत् ॥११॥ सैरिभी महिषी, करभः = उष्ट्रः, द्विपः = हस्ती ॥ ६-११ ॥ भा.टी.—भैंस, बकरी, भेड़, ऊँट, गाय, गधा, हाथी और घोड़े के मूत्रों को मूत्राष्टक शब्द से कहा जाता है। इनमें से गधा, हाथी, ऊँट और घोड़े का पुरुष जाति का मूत्र और गाय, बकरी, भेड़ और भैंस का मूत्र लेना हो तो स्त्री जाति का मूत्र लेना चाहिये । सब मूत्रों में गोमूत्र विशेष गुणवाला होता है अतः जहाँ किसी विशेष मूत्र का वर्णन न हो किन्तु केवल मूत्र शब्द ही लिखा हो तो वहाँ पर गोमूत्र का ही प्रयोग करना चाहिये । कहीं-कहीं मनुष्य- मूत्र का भी प्रयोग होता है ॥ ६-११ ॥ गोर्वरम् गोखुरैस्ताडितं गोष्ठे शुष्कं चूर्णोपमञ्च यत् । गोमयं तत्समाख्यातं बुधैर्गोर्वरसंज्ञकम् ॥१२॥ गोष्ठे = गोनिवासस्थले ॥ १२ ॥ भा.टी.--गोशाला या गाय बाँधने की जगह में गाय के खुरों से पिच- कर टूट-टूट करके सूखने के बाद मोटे चूर्ण के समान हुए गोबर को गोमय या गोर्वर शब्द से कहा जाता है ॥ १२ ॥ अम्लवर्गः जम्बीरं निम्बुकञ्चैव त्वम्लवेतसमम्लिका । नारङ्गं दाडिमञ्चैव वृक्षाम्लं बीजपूरकम् ॥१३॥ चाङ्गेरी चणकाम्लञ्च कर्कन्धुः करमर्दकः । चुक्रिका चेति सामान्यादम्लवर्गः प्रकीर्तितः ॥१४॥ वृक्षाम्लं = तिन्तिडीकम् , कर्कन्धुः = बदरीफलम् , चुक्रिका "चूका" इति ख्याता ॥ १३, १४ ॥ भा.टी.—जम्बीरी नींबू, कागजी नींबू, अमलवेत, इमली, नारंगी, दाड़िम, विषांविल, बिजौरा नींबू, चने का क्षार, खट्टा बेर, करौंदा और चूका; इन सब को सामान्यरूप से "अम्लवर्ग" के नाम से लिया जाता है । अर्थात् जहाँ कहीं अम्लवर्ग से मर्दन भावना आदि लिखा हो इन द्रव्यों के रस को लेना चाहिये ॥ १३, १४ ॥
१४ रसतरङ्गिणी अम्लपञ्चकम् अम्लवेतसजम्बीरलुङ्गनारङ्गनिम्बुकैः । फलपञ्चाम्लकं ख्यातं कीर्तितञ्चाम्लपञ्चकम् ॥१५॥ अपरमम्लपञ्चकम् कोलदाडिमवृक्षाम्लचाङ्गेरीचिञ्चिकारसैः । पञ्चाम्लकं समाख्यातं त्वम्लपञ्चकमेव च ॥१६॥ सर्वेषामम्लजातीनां निम्बूकं गुणवत्तरम् । अम्लवेतसकं वापि त्वम्लिका वा गुणाधिका ॥१७॥ लुङ्गं = मातुलुङ्गम् ॥ १५-१७ ॥ आ.टी.-अमलवेत, जम्भौरी नींबू, बिजौरा नींबू, नारंगी और कागजी नींबू को पञ्चाम्लक या अम्लपञ्चक शब्द से कहा जाता है ॥ १५ ॥ बेर (खट्टा), दाड़िम, वृक्षाम्ल, चांगेरी, इमली, इनके रसों को भी पञ्चाम्लक या अम्लपञ्चक शब्द से कहा जाता है । सब प्रकार के अम्लद्रव्यों में कागजी नींबू विशेष गुणयुक्त होता है । अथवा अमलवेत या इमली भी अन्यों की अपेक्षा अधिक गुणवाली होती हैं ॥ १६, १७ ॥ पञ्चतिक्तकम् गूडूची निम्बमूलत्वक् भिषङ्माता निदिग्धिका । पटोलपत्रमित्येतत् पञ्चतिक्तं प्रकीर्तितम् ॥ १८ ॥ भिषङ्माता = वासकः, निदिग्धिका क्षुद्रभण्टाकी ॥ १८ ॥ आ.टी.--गिलोय, नीम की जड़ की छाल, अडूसा, छोटी कटैली और पटोलपत्र, इन पाँच द्रव्यों को पञ्चतिक्त शब्द से ग्रहण किया जाता है ॥१८॥ पञ्चमृत्तिकाः इष्टिकाचूर्णांकं भस्म तथा वल्मीकमृत्तिका । गैरिकं लवणञ्चेति कीर्तिताः पञ्चमृत्तिकाः ॥१९॥ इष्टिकाचूर्णं = पक्वेष्टिकाच्छोदः ॥ १९ ॥ भा.टी.-ईंट का चूर्ण, साधारण घर की राख, बाँबी की मिट्टी, गेरी और नमक इन पाँच द्रव्यों को पञ्चमृत्तिका (मिट्टी) शब्द से लिया जाता है ॥१९॥ मधुरत्रिकम् आज्यं गुडो माक्षिकञ्च विज्ञेयं मधुरत्रिकम् । मतं त्रिमधुरुञ्चापि तथैव मधुरत्रयम् ॥ २० ॥
द्वितीयस्तरङ्गः १५ आज्यं = घृतम् ॥ २० ॥ आ.टी.--घी, गुड़ और शहद इन तीन द्रव्यों को मधुरत्रिक, त्रिमधुर या मधुरत्रय शब्द से ग्रहण किया जाता है ॥ २० ॥ पञ्चामृतम् गव्यं क्षीरं दधि घृतं माक्षिकञ्चाथ शर्करा । पञ्चामृतं समाख्यातं रसकर्मप्रसाधकम् ॥२१॥ पञ्चगव्यम् गव्यं क्षीरं दधि घृतं गोमूत्रं गोमयं तथा । एकत्र योजितं तुल्यं पञ्चगव्यमिहोच्यते ॥२२॥ दधिघृतेऽपि गव्ये ग्राह्ये ॥ २१-२२ ॥ आ.टी.--गाय का दूध, घृत और दही, शहद और शर्करा (खाँड़) को पञ्चामृत शब्द से लिया जाता है । इसके द्वारा रसों के अनेक प्रकार के कार्य सिद्ध होते हैं ॥ २१ ॥ गाय के दूध, दही, घृत, गोमूत्र और गोबर के रस को एकत्र मिलाने पर इसे पञ्चगव्य शब्द से लिया जाता है ॥ २२ ॥ क्षीरत्रयम् रविशीरं वटक्षीरं स्नुहीक्षीरन्तथैव च । क्षीरत्रयमिति ख्यातं मारणादौ प्रशस्यते ॥२३॥ रविशीरं अर्कदुग्धम् ॥ २३ ॥ आ.टी.--आक का दूध, बड़ का दूध, थोंहर का दूध, इन तीनों को एकत्र मिलाकर ग्रहण करने को क्षीरत्रय कहा जाता है । यह क्षीरत्रय धातु आदि के शोधन-मारण में विशेषरूप से काम आता है ॥२३॥ दुग्धवर्गः करिणी घोटिका धेनुस्त्वविका छागिकोष्ट्रिका । महिषी गर्दभी नारी काकोदुम्बरिका सुधा ॥२४॥ दुग्धिकोदुम्बरश्चार्को न्यग्रोधोऽश्वत्थतिल्वकौ । एषां दुग्धैःसमाख्यातो दुग्धवर्गः समासतः ॥२५॥ करिणीतो नारीपर्यन्तं जङ्गमवर्गः, काकोदुम्बरिकातस्तिल्वकपर्यन्तं स्थावर- वर्गः उभयग्रहणं तन्त्रानुरोधात् । तिल्वको लोध्रः ॥ २४-२५ ॥ भा.टी.--हथिनी, घोड़ी, गाय, भेड़, बकरी, ऊँटनी, भैंस, गधी, स्त्री,