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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

६५६ रसतरङ्गिणी मृत्युकरं तस्मात् सम्यग्विचार्य प्रयत्नतो युञ्जीतेति समन्वयः। यत्नश्च वृद्धवाग्- भटोक्तोऽप्यनुसन्धेयः। तथाहि—"घृतोपस्कृतदेहस्य विशुद्धस्य हिताशिनः। सात्त्विकस्योदिते भानौ योज्यं शीतवसन्तयोः ॥ ग्रीष्मेऽप्यात्ययिके व्याधौ।" इति। तथा—"अभ्यस्तेऽपि विषे यत्नात् वर्जनीयान् विवर्जयेत्। कट्वम्ल- तैललवणदिवास्वप्नातपानलान् ॥ रूक्षमन्नं विशेषेण भयं वाजीर्णतः सदा। दृग्विभ्रमं कर्णरुजामन्यांश्चानिलजान् गदान् ॥ विषं रूक्षाशिनः कुर्यात् मृत्यु- मेव त्वजीर्णतः" इति। प्रवृद्धस्तापः त्वगुष्मेति यावत्, तस्य शमनम्। पूर्वा- चार्यैः सुश्रुतवाग्भटादिभिः। अत एवेति हेतुसमुच्चयः। यस्माद्विषं रक्तगति- नियामकं तस्मादित्यर्थः। शुद्धं हृदयस्य गतिं नैवावसादयति। अशुद्धमतिमात्रं वा शीलितन्तु हृदयावसादकरमस्त्येवेत्यर्थः। फुप्फुसच्छदशोथः “Pleurisy” इत्याङ्गलभाषायाम्, तस्य विनाशकः। फुप्फुसशोथस्तु “Pneumonia” इत्याख्यायते पाश्चात्यभिषक्तन्त्रेषु। हृदयावरणोत्थितः शोथः “Pericarditis” इति। अन्त्रावरणोद्भूतं ज्वरमिति तत्र शोथहेतुतया जातमिति यावत्। अयं हि “Peritonitis” इत्याख्यया प्रसिद्धः। प्रक्रम इति प्रारम्भकाले। तुण्डिकेरी गलरोगविशेषः "शोथः स्थूलस्तोददाहप्रपाकी श्लेष्मासृग्भ्यां तुण्डिकेरी मता तु” इत्युक्तलक्षणः। जत्रूर्ध्वगता पञ्चमी नाडिका “Fifth cranial Nerve” “Trigeminal Nerves” वा कथ्यते। अन्तर्दाहसमायुक्तमित्यादिना ज्व- रस्य सोपद्रवस्य आवस्थिकस्य विस्तरेण वर्णनम्। सत्स्वेषु लक्षणेषु विधिप्रयुक्तं विषं ज्वरं हन्ति। तरुणान् बलवतो नवीनानिति विशेषः। न संशय इति निश्चितानुभवप्रकाशनम् ॥ ३२-६० ॥ भा.टी.—यदि वत्सनाभ को विधिपूर्वक सेवन किया जाय तो यह अत्यन्त हृद्य और बल्य होता है और यदि अविधिपूर्वक (मात्रा, देश, काल, अवस्था आदि का बिना विचार किये ही) सेवन किया जाय तो वही प्राणघातक भी हो जाता है। अतः विषप्रयोगज्ञ वैद्य को चाहिए कि वह रोगी के लक्षणों का सूक्ष्म बुद्धि से विचार करके बड़ी सावधानी के साथ विष का अन्तःप्रयोग करें। वत्सनाभ विशेष रूप से वातिक वेदनाओं के शान्त करने में उत्तम औषधि है। इसके प्रयोग से मूत्र और पसीना अधिक मात्रा में आता है। इसके सेवन से वातिकशूल तथा आमवातशूल शान्त हो जाते हैं। ज्वरों में बढ़े हुए ताप को शान्त करने के लिए इसका सेवन कराया जाता है। यह हृदयविकृति के कारण उत्पन्न शोथ को शान्त करता है। अधिक परिश्रम आमवात, फिरंग, अति तीक्ष्ण उष्ण द्रव्य सेवन चिरकाल

४२ चतुर्विंशस्तरङ्गः ६५७

तक तीव्रज्वर आदि कारणों से बढ़ी हुई हृदय की गति (Pulpitation) को यह नियमित करता है । अन्य स्वेदजनक औषधियों की अपेक्षा (जो कि पसीना लाकर ज्वर को कम करती हैं) यह उत्तम ज्वरशामक है और अधिक मात्रा में पसीना भी नहीं लाता है। अति अधिक बढ़े हुए रक्तसञ्चार (Blood presure) को घटाने और नियमित करने में यह वत्सनाभ अचूक और सर्वोत्कृष्ट महौ- षधि है । रक्तभाराधिक्य को कम करने के लिये आजकल भारतवर्ष में अत्य- धिक रूप से रसचिकित्सा में विष का प्रयोग होने के कारण हीं रक्तनिर्हरण (फस्त खोलना) विरेचक रक्त के दबाव को कम करनेवाले उपचार प्रायः लुप्त-से हो गये हैं । अर्थात् एकमात्र वत्सनाभ प्रयोग से फस्त खोलने आदि उपचारों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है । क्योंकि शुद्ध वत्सनाभ मात्रापूर्वक सेवन करने पर कभी हृदय-गति को मन्द नहीं करता है और नहीं उसमें अनि- यमितता को उत्पन्न करता है। शुद्ध वत्सनाभ का प्रयोग मस्तिष्क में बढ़ी हुई रक्तसञ्चारण क्रिया तथा मस्तिष्क में होनेवाले रक्तसञ्चय को शीघ्र ही दूर कर देता है । शुद्ध वत्सनाभ अन्तःप्रयोग में फुप्फुसच्छदशोथ (Pleurisy) तथा फुप्फुसशोथ (Pneumonia) और शोथजन्य विविधप्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है वत्सनाभ प्रयोग से हृदयावरणजन्यशोथ (Pericarditis) तथा अन्त्रावरण शोथजन्य ज्वर (Perilenitis) नष्ट हो जाते हैं । कई चिकित्सकों का मत है कि प्लुरिसी, निमोनिया आदि रोगों के प्रारम्भ में वत्सनाभ का प्रयोग करने से इन रोगों की वृद्धि रुक जाती है । गले में होनेवाले गलशोथ, तुण्डिकेरी तथा गलशुण्डिका आदि अन्यान्य कंठरोगों में विष प्रयोग से शीघ्र आराम आता है । बाह्याभ्यन्तर शरीर के किसी स्थान से किसी अभि- घात आदि के कारण होनेवाले रक्तस्राव को रोकने में वत्सनाभ का प्रयोग किया जाता है । शुद्ध वत्सनाभ के प्रयोग से तीव्र शिरोवेदना, छींक, दाह तथा आँखों के दोनों भौंओं में दाह के साथ होनेवाले नूतन प्रतिश्याय में आराम आता है । कफयुक्त अधिक रक्त या अल्परक्त सहित अत्यधिक मल और वेग- युक्त प्रवाहिका के प्रारम्भ में वत्सनाभ का प्रयोग करने से रोग भयंकर रूप धारण नहीं कर सकता है और शान्त हो जाता है । जत्रु ऊर्ध्वगामी जो पञ्चमी नाड़ी (Fifth cranial Nerve or Trigeminal Nerves) है उसमें होनेवाले शूल को वत्सनाभ प्रयोग शीघ्र ही शांत कर देता है । तीव्रवेग या अल्पवेग अत्यधिक गाढ़े लाल रंग के ज्वर सहित ऊर्ध्वगत रक्तपित्त में वत्स- नाभ का प्रयोग शीघ्र लाभ पहुँचाता है। तापांश को कम करने के लिये वत्सनाभ

६५८ रसतरङ्गिणी को तब तक हर तीसरे घण्टे बाद प्रयोग करना चाहिये जब तक कि शारीरिक ताप १०० डिग्री तक न आ जाय । १०० सौ डिग्री से कम ताप हो जाने पर विष का प्रयोग नहीं करना चाहिये । विभिन्न कारणों से उत्पन्न होनेवाले शीतपूर्व और दाहान्त अर्थात् प्रायः मलेरिया (जिसमें भीतर अधिक गर्मी मालूम पड़ती हो, नाड़ी बहुत तेज चलती हो, अत्यधिक प्यास और हृदय की गति बहुत तेज हो, पेट में अफारा और अजीर्ण हो, पसीना न आता हो और शारी- रिक तापांश बहुत बढ़ा हुआ अर्थात् १०५-१०७ डिग्री हो, रोगी कास, हस्त- पादकम्प और शिरःशूल से बहुत बेचैन हो और रोगी को किसी तरह शान्ति, चैन न आता हो और उसे बहुत घबड़ाहट और मृत्यु का डर हो, सारे शरीर में वातिक वेदनायें होती हों, मुखमण्डल लाल हो रहा हो, शारीरिक त्वचा खुश्क और गर्म हो और गाढे लाल रंग का मूत्र आ रहा हो) में तो वत्सनाभ को विधिपूर्वक सेवन कराने से शीघ्र ही सब लक्षण और उपद्रव शान्त हो जाते हैं । शरीर के विविध स्थानों में विविध कारणों से उत्पन्न होनेवाले अनेक तरुण ( नूतन) शोथों में वत्सनाभ शीघ्र लाभ पहुँचाता है। विविध कारणों से उत्पन्न होनेवाली विभिन्न लक्षणोंवाली, स्पर्शासह, ( असहनीय ), रात्रि में होनेवाली शारीरिक वेदना को वत्सनाभ प्रयोग शीघ्र शान्त कर देता है। विष के गुणों के विषय में संक्षेप में यह समझना चाहिये कि शुद्ध वत्सनाभ को तत्तद् रोग- नाशक औषधियों के साथ मिला कर प्रयोग करने से यह योगवाहि धर्मके कारण सब प्रकार के भयंकर रोगों को नष्ट करता है। तत्तद् रोग नाशक प्रधान-प्रधान रसों के सेवन कराने से जो रोग नष्ट नहीं हो पाते हैं, वे रोग विधिपूर्वक विषके प्रयोग से शान्त हो जाते हैं ॥ ३२-६० ॥ वक्तव्य—वृद्धवाग्भट में विषसेवन के विषय में किन २ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिये, उनको इस प्रकार से लिखा है—"घृतोपस्कृतदेहस्य विशु- द्धस्य हिताशिनः। सात्त्विकस्योदिते भानौ योज्यं शीतवसन्तयोः॥ ग्रीष्मेप्यात्ययिके व्याधौ" तथा "अभ्यस्तेऽपि विषे यस्मात् वर्जनीयान् विवर्जयेत् । कट्वम्लतै- ललवणदिवास्वप्नातपानलान् ॥ रूक्षमन्नं विशेषेण भयं वाजीर्णतः सदा । दृग्विभ्रमं कर्णरुजामन्यांश्चानिलजान् गदान् । विषं रूक्षाशिनः कुर्यात् मृत्युमेव त्वजीर्णतः ॥" इत्यादि । बहिः प्रयोग में वत्सनाभ स्थानिक संज्ञावाहिनियों को आरम्भ में थोड़ा सा उत्तेजित कर फिर संज्ञा रहित कर देता है, जिससे उस स्थान में होनेवाली पीडा शान्त हो जाती है । यह पराश्रयी जीवाणुहर भी है। थोड़ी मात्रा में मुख द्वारा

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६५६ दिया जाय तो यह हृदय को बल देता है, जिससे निर्बल और तीव्र नाड़ी बल- वती और मन्द हो जाती है। परन्तु यदि अधिक मात्रा में दिया जावे तो वह हृदय को निर्बल कर देता है जिससे नाड़ी की प्रतिमिनट संख्या तथा शक्ति कम हो जाती है। साधारण मात्रा में यह श्वास-संस्थान को उत्तेजित करता है जिससे श्वास गहरा तीव्र हो जाता है। अधिक मात्रा में देने से श्वास मन्द हो जाता है। इसके अन्तःप्रयोग से भी स्वेद आता है। हृदय को मन्द करने तथा स्वेदक होने के कारण ज्वर की अवस्था में शरीर के बढ़े हुए तापमान को घटाता है। यह शरीर की संज्ञा-वाहिनियों के शिरों को थोड़े काल के लिये उत्तेजित कर फिर मन्द कर देता है जिससे शरीर के किसी भाग में शूल हो तो मिट जाती है। इसकी विषैली मात्रा खाये जाने के कुछ मिनट बाद मुख, गलप्रणाली और आमाशय में दाह वमन होती है और त्वचा पर अधिक स्वेद आता है, एवं त्वचा की संज्ञा पड़ जाती है। मंद नाड़ी निर्बल मन्द और विषम हो जाती है। पुतलियाँ फैल जातीं श्वास कठिन हो जाता और रोगी अत्यन्त निर्बल होकर मूर्च्छित हो जाता है और मूर्च्छा के बाद मृत्यु हो जाती है। किन्तु रोगी की चेतना मृत्यु तक भी बनी रहती है। उक्त विषैले लक्षणों के होने पर शीघ्र रोगी को वमन करा देना चाहिये और हृदय को सबल करने के लिये उत्तेजक औषधियाँ देनी चाहिए। हाथ और पैरों को गरम रखें और सारे शरीर को अच्छी तरह मलें। कस्तूरी वारुणी- सार, विषमुष्टि वारुणीसार, मिलाकर मकरध्वज देना चाहिए। विषप्रयोगस्य निषेधः न बालेष्वतिवृद्धेषु रोगिणीगर्भिणीषु च । न चातिक्षीणगात्रेषु यदमलद्दमयुते न च ॥६१॥ न क्रोधिते न च श्रान्ते हृद्दौर्बल्ये विशेषतः। वत्सनाभविषं वैद्यः प्रायशो न प्रयोजयेत् ॥६२॥ एतेष्वपि प्रयोक्तव्येऽवश्यं खलु विधानवित् । यत्नतोह्यल्पकालार्थं युञ्जीतात्यल्पमात्रया ॥६३॥ न बालेष्वतिवृद्धेष्विति विषप्रयोगनिषेधः तीक्ष्णवीर्यत्वात् हृदयावसादक- त्वाच्च वत्सनाभस्य। अत्र चापि प्रयोगावश्यकता चेद् अत्यल्पकालमात्रोऽस्य प्रयोगो निरापद इति ॥६१-६३॥

६६० रसतरङ्गिणी भा.टी..—वैद्य को चाहिए कि वत्सनाभ विष को जहाँ तक हो सके प्रायः बालक, अत्यन्त वृद्ध, गर्भवती, रुग्णा, अतिक्षीण शरीर, राजयक्ष्मा के लक्षण युक्त अवस्था में, क्रोधित मनुष्य को और अतिभ्रान्त मनुष्य को हृदय की दुर्ब- लावस्था में ( विशेष रूप से ) वत्सनाभ का प्रयोग ( अन्तःप्रयोग ) न करें। यदि अल्पवयस्कों को बिना विषप्रयोग किये हुए कार्य नहीं चलता हो तो बड़ी सावधानी के साथ बहुत अल्प मात्रा में और बहुत थोड़े समय के लिये प्रयोग कर सकते हैं ॥६१-६३॥ विषस्य मात्रायां प्रयोगे फलवैशिष्ट्यम् विषं भवति पीयूषं मात्रया विनियोजितम् । तदेवामात्रया युक्तं द्रुतं मुष्णाति जीवितम् ॥६४॥ तस्मात्पूर्वन्तु रोगाणां रोगिणां च बलाबलम् । वीक्ष्य देशादिकञ्चापि विषमात्रां प्रकल्पयेत् ॥६५॥ वत्सनाभविषस्य मात्रा कलांशतो रक्तिकाया वस्वशप्रमितं विषम् । विमलं विनियुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥६६॥ विषं भवति पीयूषममृतं मात्रया विनियोजितम् । मात्रा च रोगिदेशकाल- बलापेक्ष्येति बोधयति तस्मात् पूर्वन्विति । रक्तिकायाः षोडशांशतः अष्टमांश- पर्यन्तमस्य मात्रानिर्धारणम् ॥६४-६६॥ भा.टी.—वत्सनाभ को यदि मात्रापूर्वक सब बातों का ध्यान रखते हुए प्रयोग किया जाय तो यह शरीर में अमृत का कार्य करता है अर्थात् जीवन- दान करनेवाला होता है। यदि इसे अधिक मात्रा में सेवन किया जाय तो हृदय क्रिया को बन्द करके यह जीवन ही नष्ट कर देता है। अतः विषप्रयोग करने के पूर्व रोग और रोगी का बलाबल और देश, काल, अवस्था, प्रकृति, सात्म्य आदि का पूर्ण विचार करके विष की मात्रा निर्धारित करनी चाहिये। रोग और रोगी का बलाबल देश काल आदि का निश्चय करके रत्ती के सोल- हवें भाग से लेकर रत्ती का आठवाँ भाग तक वत्सनाभ की मात्रा प्रयोग करनी चाहिये ॥६४-६६॥ अथ वत्सनाभविषस्य आमयिकः प्रयोगः । मृत्युञ्जयरसः अमृतं द्विगुणामलेज्जुलाढ्यं त्रिदिनं त्वार्द्रकवारिणा निपिष्टम् । बलिमागधिकामारचटङ्कैः समभागैः परिपेषयेन्मकासम् ॥६७॥

वाटिकाः कारयेद्यत्नात् ततो विषविधानवित् । गुञ्जार्धसम्मिता वापि गुञ्जापादांशसम्मिताः ॥ ६८ ॥ रसोऽयं तु समाख्यातो मृत्युञ्जयसमाह्वयः । अयं वातज्वरहरस्तथा फुप्फुसशोथहृत् ॥ ६६ ॥ प्रवाहिकाप्रशमनो विविधज्वरनाशनः । आध्मानाजीर्णसंयुक्तसंनिपातनिपातनः ॥ ७० ॥ अस्य च रोगयोग्यप्रयोगक्रमे प्रथमो मृत्युञ्जयरसः—यद्यपि तन्त्रान्तरेषु विष- हिंगुलयोराद्रर्कवारिणा पेषणां नोक्तं तथापि अनुभूतचरत्वादुपयुक्तमत्वाच्चात्र कथितमाचार्यैरिति । अस्य च आवस्थिकः प्रयोगः स्वानुभूतचरस्तन्त्रान्तरानु- क्तोऽप्याविष्कृतः ॥ ६७–७० ॥ भा.टी.—शुद्ध वत्सनाभ एक भाग में दो भाग शुद्ध हिंगुल मिलाकर खरल में तीन दिन तक अदरख के स्वरस से खूब अच्छी तरह मर्दन करें । अब इसमें वत्सनाभ के बराबर भाग, शुद्ध गन्धक, पिप्पलीचूर्ण, कालीमिर्चचूर्ण और सुहागा खील; प्रत्येक मिलाकर अच्छी तरह मर्दन करें । जब गोली बाँधने योग्य हो जाय तो इसकी चौथाई रत्ती से आधी रत्ती तक की गोलियाँ बना लें । इसको “मृत्युञ्जयरस” नाम से कहा जाता है । यह रस अन्तः प्रयोग में वातज्वर ( Dengoe ), फुप्फुस शोथ (निमोनिया), प्रारम्भिक प्रवाहिका तथा विविध प्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है। इसके अतिरिक्त यह रस आध्मान तथा अजीर्ण युक्त सन्निपात ज्वर आन्त्रज्वर आदि को भी नष्ट करता है ॥ ६७–७० ॥ मृत्युञ्जयरसस्य आमयिकः प्रयोगः आरक्तवक्त्रे प्रबलज्वरे च श्वासोच्छ्रये कष्टदकासवेगे । देयो दिनेऽयं प्रथमे द्वितीये मृत्युञ्जयः फुप्फुसशोथरोगे ॥७१॥ रसोऽयं शीलितस्तीव्रज्वरवेगसमन्वितम् । आध्मानाजीर्णसंयुक्तं कृमिरोगं विनाशयेत् ॥ ७२ ॥ विविद्योत्सेधजं वापि हृदावरणशोथजम् । ज्वरमारम्भवेलायां हन्ति मृत्युञ्जयो रसः ॥ ७३ ॥ नवज्वरायमाणं च त्वजीर्णाध्मानसंयुतम् । सन्निपातं निहन्त्याशु रसोऽयं निम्बुकाम्भसा ॥ ७४ ॥ गौरवारुचिसंसृष्टं सामं वापि निरामकम् ।

६६२ रसतरङ्गिणी रसोऽयं निम्बूकद्रावैर्निहन्ति विषमज्वरम् ॥ ७५ ॥ पिप्पलीमधुसंयुक्तो रसोऽयं परिशीलितः । नवज्वरायमानन्तु जीर्णज्वरमपोहति ॥ ७६ ॥ सोत्सेधारक्तशिश्राग्रं सदाहं वेदनान्वितम् । निहन्त्यारम्भवेलायामौपसर्गिकमेहकम् ॥ ७७ ॥ भा.टी.-फुप्फुस शोथ रोग ( निमोनिया ) में प्रारम्भ के पहिले और दूसरे दिन जब कि ज्वर बहुत तीव्र हो और रोगी का मुखमंडल लाल दिखाई देता हो और भयंकर कष्टदायक कास के साथ श्वास की अधिकता हो तो इस रस के प्रयोग करने से रोग का प्रभाव कम पड़ता जाता है। इस रस को तीव्र ज्वर- वेग युक्त और अजीर्ण तथा आध्मान सहित उदरकृमि-रोग में प्रयोग करने से शीघ्र लाभ होता है। हृदय में शोथ के कारण अथवा अन्य किसी शारीरिक भीतरी अंग के शोथ के कारण होनेवाले ज्वरों की प्रथमावस्था में इस रस का प्रयोग करने से शीघ्र ही इन रोगों के प्रभाव को शान्त कर देता है। अजीर्ण और आध्मान युक्त नूतन सन्निपातज्वर में इस रस को निम्बू के स्वरस के साथ अन्तः प्रयोग करने से शीघ्र ही सन्निपात ज्वर में लाभ होता है। अंग गौरव और अरुचि के साथ आम या निराम लक्षण युक्त विषमज्वर में इसको नीबू के रस के साथ सेवन कराने से आराम आता है। नवीन जीर्ण ज्वर में इस रस को पिप्पलीचूर्ण और शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से आराम आता है। औपसर्गिकमेह अर्थात् सुजाक की प्रथमावस्था में जब इन्द्रिय के अग्रभाग में बहुत शोथ और लालिमा के साथ तीव्र दाह और वेदना हो तो इसके प्रयोग से ये सब लक्षण शान्त हो जाते हैं ॥ ७१-७७ ॥ हिंगुलेश्वरो रसः अमृतं त्रिमलं युगतोलमितं दरदं च कणासममेव समम् । परिपेष्य भृशं खलु सार्द्धयवप्रमिता वटिका विदधीत बुधः ॥७८॥ रसोऽयं तु समाख्यातो विबुधैर्हिङ्गुलेश्वरः । आमवातप्रशमनस्तथा वातज्वरापहः ॥ ७६ ॥ हिंगुलेश्वरः— शुद्धविषं द्वितोलकम्, हिंगुलं द्वितोलकम्, पिप्पली द्वि- तोलकमिता । वारिणा पेषयित्वा सार्धयवप्रमिताः वटिकाः विधेयाः । सोऽयमाम- वातादिशमनः ॥ ७८, ७६ ॥ भा.टी.-शुद्धवत्सनाभ दो तोला और पिप्पलीचूर्ण दो तोला, इन सबको

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६३ एकत्र खरल में जल के साथ मर्दन करके गोली बनाने योग्य हो जाने पर डेढ़ जौ के बराबर अर्थात् आधी रत्ती की गोली बना लें। इसको हिंगुलेश्वर रस कहते हैं। यह रस आमवात शामक और वातज्वरहर है ॥ ७८, ७६ ॥ हिंगुलेश्वरस्य आमयिकः प्रयोगः तीव्रज्वरं साङ्गमर्दं सन्धिशूलसमन्वितम् । आमवातं निहन्त्याशु शीलितो हिङ्गुलेश्वरः ॥ ८० ॥ शीतकम्पाङ्गमर्दाढ्यं शिरोवेदनयान्वितम् । रसोऽयं शीलितो हन्ति वातिकज्वरमुल्बणम् ॥ ८१ ॥ नवज्वरायमाणान्तु जीर्णज्वरमथापि वा । सविरामज्वरं हन्ति रसोऽयं परिशीलितः ॥ ८२ ॥ सविरामज्वरमिति विरम्य पुनर्वेगोदये जनिशीलम् ॥ ८०-८२ ॥ भा.टी.—तीव्र ज्वर, अंगमर्द तथा सन्धिशूल युक्त आमवात में इस रस का सेवन करने से शीघ्र ही आराम आता है। सब शरीर में शीत कम्प अंगमर्द और तीव्र शिरोवेदना के साथ होनेवाला वातिक ज्वर इसके प्रयोग से शान्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त नवज्वर अथवा जीर्णज्वर और सविरामज्वर (एक या दो दिन रुककर आनेवाला) में भी यह लाभ करता है ॥८०-८२ ॥ पञ्चामृतरसः अमृतं तोलकमितं रसं गन्धञ्च तन्मितम् । मरिचं टङ्कणञ्चैव तोलकत्रितयोन्मितम् ॥ ८३ ॥ समादाय ततो वारा वटिका रक्तिकोन्मिताः । निर्यापयेद्भिषग्वर्यो रसः पञ्चामृताभिधः ॥ ८४ ॥ विविधोत्थानसंस्थानं विविधस्थानसंस्थितम् । ज्वरातःसार युक्तञ्च शोथं हन्त्यविशालम्बितम् ॥८५॥ जलोदरं शिरःशूलं पीनसञ्च गलग्रहम् । नासारोगं कण्ठरोगं हन्ति च श्लैष्मिकामयम् ॥ ८६ ॥ भा.टी.—शुद्ध वत्सनाभ एक तोला, शुद्ध पारा एक तोला, शुद्ध गन्धक एक तोला, कालीमिरच तथा शुद्ध टंकण; प्रत्येक तीन-तीन तोला लेकर एकत्र खरल में जल से पीस लें, जब गोली बनने योग्य हो जाय तो इसकी एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको पञ्चामृत रस कहते हैं। विविध कारणजन्य

६६४ रसतरङ्गिणी और विविध लक्षण युक्त शरीर के विविध भागों में होनेवाले ज्वरातिसार सहित शोथ को यह रस नष्ट करता है। इसी प्रकार जलोदर (जलंधर पेट में पानी भरना) शिरःशूल, पीनस, गलग्रह, नासिकारोग, कण्ठरोग तथा कफप्रयोग जन्य रोगों को भी यह रस नष्ट करता है ॥ ८३-८६ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः पुनर्नवाकषायेण रसोऽतं वार्द्रकद्रवैः । विविधोत्थानसंस्थानं शोथं हन्त्याशु सर्वगम् ॥ ८७ ॥ आर्द्रकद्रवयोगेन रसोऽयं परिशीलितः । शिरःशूलं निहन्त्याशु वृत्तं शक्राशनिर्यथा ॥ ८८ ॥ भा.टी.-सर्वशरीरग, विविध कारणजन्य तथा विविध लक्षण युक्त शोथ को शान्त करने के लिये इस पञ्चाननरस को पुनर्नवा कषाय अथवा अदरक स्वरस के साथ देने से शीघ्र आराम आता है। अदरक स्वरस के साथ इस रस का सेवन करने से शिरःशूल शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥ ८७, ८८ ॥ शिवताण्डवरसः विषं तु तोलकमितं रससिन्दूरकं तथा। तालकं विमलं सूतं बलिं च समभागिकम् ॥ ८६ ॥ चूर्णीकृतं च मरिचं चतुस्तोलकसंमितम् । समादाय भिषग्वर्यः पेषयेदार्द्रकद्रवैः ॥ ६० ॥ निर्यापयेद्विधानज्ञो वटिका रक्तिकोन्मिताः । रसोऽयं तु समाख्यातः शिवताण्डवसंज्ञकः ॥ ६१ ॥ दृढदन्तं लिप्तदेहं भ्रान्ततारकलोचनम् । विषयाशक्तकरणं सन्निपातं निपातयेत् ॥ ६२ ॥ शिवताण्डवरसः—विषादिगन्धकान्तानां प्रत्येकमेकतोलकम्, मरिचस्य च चतुस्तोलकं गृहीत्वा आर्द्रकरसैः पेषयेत् । व्याख्यासमानमन्यत् ॥ ८६-६२ ॥ भा.टी.-शुद्ध वत्सनाभ एक तोला, रससिन्दूर एक तोला, शुद्ध हरताल एक तोला, शुद्ध पारा एक तोला, शुद्ध गन्धक एक तोला और कालीमिर्च चूर्ण चार तोला लेकर इसको एकत्र खरल में अदरक स्वरस से अच्छी तरह मर्दन करें। गोली बनाने योग्य होने पर इसकी एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इस रस को वैद्य लोग शिवताण्डव रस कहते हैं। यह रस सन्निपात की उस अवस्था में लाभ करता है

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६५ जब कि रोगी के दाँत बैठ गये हों, सारे शरीर में स्वेद आ रहा हो और रोगी की पुतलियाँ तथा नेत्र टेढ़े पड़ गये हों और इन्द्रियों की विषय ग्रहण शक्ति नष्ट हो गयी हो ॥८६-६२॥ आनन्दभैरवरसः अमृतं गव्यमूत्रेण यत्नतो विमलीकृतम् । मागधी मरिचं चैव सौभाग्यं दरदं तथा । ६३ । समं समं समादाय वारिणा परिपेषयेत् ! रक्तिकार्द्धमिताश्चैव वटिकाः कारयेत्ततः ॥६४॥ प्रवाहिकाप्रशमनः पूयमेहप्रणुत्परम् । ज्वरातिसारजिन्नाम्ना रसो ह्यानन्दभैरवः ॥६५॥ आनन्दभैरवः—यत्नतो विमलीकरणं प्रागुक्तम् । दरदं हिंगुलम् । सर्वे समानमानम् । पूयमेहः “Gonorrhea” इत्याङ्गलभाषायाम् ॥६३-६५॥ भा.टी.—गोमूत्र से अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ वत्सनाभ चूर्ण, पिप्पली- चूर्ण, मरिचचूर्ण, शुद्ध सुहागाचूर्ण और शुद्ध हिंगुल; प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र खरल में डालकर जल से मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी आधी-आधी रत्ती की गोलियाँ बना सुखाकर रखलें। यह रस आनन्द- भैरव नाम से कहा जाता है। इसके सेवन से प्रवाहिका ( पेचिश ) की शान्ति होती है और सुजाक में तथा ज्वरातिसार में आराम आता है ॥६३-६५॥ आनन्दभैरवस्य आमयिकः प्रयोगः सशोथारक्तशिश्नाग्रं दाहकण्डूयनान्वितम् । पूयमेहं निहन्त्याशु रसो ह्यानन्दभैरवः ॥६६॥ अतिसारं ज्वरोद्भूतं ज्वर वाप्यतिसारजम् । बहुतापं वातिवेगं हन्त्ययं तु रसोत्तमः ॥६७॥ अजीर्णशूलप्रबलज्वरायां प्रवाहिकायां कफवातजायाम् । ज्वरौशान्त्यै विनियोजनीयः फलेन्द्रपत्रस्वरसादियोगात् ॥६८॥ सशोथारक्तशिश्नाग्रमिति प्रयोगयोग्यरोगावस्थानिर्देशः । फलेन्द्रपत्रं राज- जम्बूवृक्षपत्रम् ॥६६-६८॥ भा.टी.—पूयमेह (सुजाक) में जब मूत्रेन्द्रिय के मुख पर शोथ और रक्त- सञ्चय के साथ दाह (जलन) और कण्डू (खुजली) होती हो तो आनन्दभैरवरस

६६६ रसतरङ्गिणी के सेवन से उक्त सब कष्ट मिट जाते हैं । तीव्र ज्वर में होनेवाले अतीसार में अथवा अतीसार में होनेवाले तीव्र वेग और अत्यन्त तापांशवाले ज्वर में यह आनन्दभैरवरस उत्तम कार्य करता है । इसी तरह इस आनन्दभैरवरस को अजीर्णशूल और प्रबलज्वरयुक्त कफवातप्रकोपजन्य प्रवाहिका में, ज्वर और प्रवाहिका में बड़ी जामुन के पत्तों के स्वरस के साथ सेवन करने से शीघ्र आराम आता है ॥६६-६८॥ जयावटी विषं निशा कटुत्रिकं कृमिघ्ननिम्बुमुस्तकम् । समं समं समोन्मितं जयन्तिकाशफारजः ॥६६॥ समाहरेद्भिषग्वरो वटीं द्विगुञ्जासंमिताम् । प्रमापयेत्तु नामतो बुधैर्मता जयावटी ॥१००॥ जयावटी विशेषतः प्रमेहकासपाण्डुजित् । नवज्वरापहा परं तथैव रक्तपित्तनुत् ॥१०१॥ जयावटी—निशा हरिद्रा, कृमिघ्नं विडङ्गम् । रोगप्रयोगस्तु यद्यप्यनुपान- भेदेन तन्त्रान्तरेषु विस्तरेणोक्तः, तथापि विषप्रयोगमधिकृत्य विशेषतो येषु येषु रोगेषु प्रयुज्यते तेषामेव परिसंख्यानम् ॥६६-१०१॥ भा.टी.—शुद्धवत्सनाभ, हरिद्राचूर्ण, सोंठचूर्ण, मरिचचूर्ण, पिप्पलीचूर्ण, वायविडंग चूर्ण, निम्बपत्रचूर्ण, मुस्ता (मोथा) चूर्ण, जयन्तीमूलचूर्ण; प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र खरल में जल के साथ मर्दन करें। गोली बनाने के योग्य हो जाने पर इसको दो-दो रत्ती की गोलियाँ बनालें । इसको विद्वान् वैद्य लोग जयावटी के नाम से व्यवहार करते हैं । यह जयावटी विशेष रूप से प्रमेह कास तथा पाण्डुरोग नाशक है । नवज्वर में प्रयोग करने से ज्वर शान्त हो जाता है और रक्तपित्त रोग में भी यह उत्तम लाभ पहुँचाती है ॥६६-१०१॥ जयावटिकाया आमयिकः प्रयोगः चन्दनस्य कषायेण शीलिता तु जयावटी । रक्तपित्तं निहन्त्याशु सज्वरं त्वविलम्बितम् ॥१०२॥ बलामूलकषायेण शालिता तु जयावटी । जत्रूर्ध्वपञ्चमीनाडीगतं शूलं व्यपोहति ॥१०३॥ मुस्तेन्द्रयवविश्वानां क्वाथेन तु जयावटी । शीलिता ग्रहणीं हन्ति सज्वरामतिदारुणाम् ॥१०४॥ पर्पटस्य कषायेण जया तु परिशीलिता ।

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६७ विनाशयति पित्तोत्थं ज्वरं खल्वतिदारुणम् ॥ १०५ ॥ भा.टी.—ज्वरयुक्त रक्तपित्त में जयावटी को रक्तचन्दन के कषाय के साथ सेवन कराने से शीघ्र ही रक्तपित्त में आराम आता है। यदि जयावटी को खरेंटी- मूलकषाय के साथ सेवन कराया जाय तो जत्रु के ऊर्ध्वभागगामी पञ्चमी नाडी (Fifth Nerves) के शूलमें (सूर्यावर्त, अर्धावभेदक आदि) शीघ्र आराम आ जाता है। अति भयंकर ज्वरयुक्त संग्रहणी रोग में इस जयावटी को मोथा, इन्द्रजौ और सोंठ के कषाय के साथ प्रयोग कराने से शीघ्र आराम आता है। अति भयंकर पित्तप्रकोपजन्य ज्वर में जयावटी को पित्तपापड़े के कषाय के साथ सेवन कराने से शीघ्र ज्वर कम हो जाता है ॥ १०२-१०५ ॥ कफकेतुरसः अमृतं तोलकंमितं गोमूत्रपरिशोधितम् । पिप्पली शंखभसितं टङ्कणं चैव तन्मितम् ॥ १०६ ॥ शृङ्गवेररसेनैव पेषयेत्त दिनत्रयम् । गुञ्जाधेमात्रा वटिकाः कर्त्तव्याः खलु यत्नतः ॥ १०७ ॥ रसोऽयं भाषितो नाम्ना कफकेतुसमाह्वयः । प्रतिश्यायं तथा कासं कण्ठरोधं विनाशयेत् ॥ १०८ ॥ गलग्रहं कर्णरोगं श्वासं प्रतमकाभिधम् । विनिहन्ति विशेषेण रसोऽयमविलम्बितम् ॥ १०६ ॥ कफकेतुरसः—शृङ्गवेररसेन आर्द्रकरसेन । अनुपानानि आवस्थिकः प्रयोग- कालश्चानुभूतचरो विशदीकृतः ॥ १०६-१०६ ॥ भा.टी.—गोमूत्र से शुद्ध किया हुआ अमृत (वत्सनाभविष) एक तोला पिप्पलीचूर्ण, शंखभस्म और शुद्ध टंकण (सुहागा); प्रत्येक विष के समभाग लेकर सब को एकत्र खरल में अदरख के स्वरस के साथ तीन दिन तक मर्दन करें। गोली बनाने पर इसकी आधी-आधी रत्ती की गोलियाँ बना- कर सुखा लें। इसको कफकेतुरस कहते हैं। यह कफकेतुरस प्रतिश्याय, कास तथा कण्ठ के रोगों को नष्ट करता है। गले में कफ प्रकोप से रुकावट होने पर और कर्णरोगों तथा विशेषरूप से प्रतमक श्वास (दमा) रोग में यह बहुत शीघ्र ही लाभ पहुँचाता है ॥ १०६-१०६ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः क्षौद्रार्द्रकरसोपेतो रसोऽयं परिशीलितः ।

६६८ रसतरङ्गिणी तीव्रशोफव्यथोपेतं स्तब्धांगं काससंयुतम् ॥ ११० ॥ सज्वरं वातजं वापि खलु वातबलासजम् । प्रतिश्यायं निहन्त्याशु दिवसत्रयमात्रतः ॥ १११ ॥ सन्निपातसमुद्भूतं तथैव तु गलग्रहम् । कर्णक्षतादिजनितं ज्वरं हन्ति च दारुणम् ॥ ११२ ॥ नवज्वरायमाणञ्च प्रतिश्यायसमन्वितम् । श्वासं प्रतमकाभिख्यं नाशयत्यविलम्बितम् ॥ ११३ ॥ दिवसत्रयमात्रत इति अनुभवविषयीभूतकाल निवेदनं प्रायिकम् । ११०-११३। भा.टी.—इस कफकेतुरस को वातप्रकोपजन्य अथवा कफवातप्रकोपजन्य प्रतिश्याय में, जब ज्वर, अधिक पीड़ा, शरीर में स्तब्धता तथा कास भी साथ हो तो अदरक और शहद के साथ सेवन करने से शीघ्र ही तीन दिन में आराम आ जाता है । इसी तरह गले में सन्निपातप्रकोपजन्य अवरोध और कर्ण, गल, कण्ठ आदि क्षत के कारण होनेवाले भयंकर ज्वरों में यह शीघ्र लाभ करता है । नूतन ज्वर और प्रतिश्याय युक्त प्रतमक श्वास रोग में भी यह शीघ्र ही उक्तानुपान से लाभ पहुँचाता है ११०-११३ ॥ विषरसायनम् अमृतं तोलकंमितं गोमूत्रविमलीकृतम् । तत्समं रससिन्दूरं हिंगुलं विमलं तथा ॥ ११४ ॥ तथैव तारं ताम्रं च रसगन्धकजारितम् । व्योषं पलार्द्धप्रमितं चतुर्जातं च चित्रकम् ॥ ११५ ॥ समादाय भिषग्वर्यो वारिणा परिपेषयेत् । वटिकाः कारयेद्युक्त्या रक्तिद्वितयसंमिताः ॥ ११६ ॥ प्राणाचार्यैः समाख्यातं नाम्ना विषरसायनम् । बल्यं वयं परं वृष्यं नानारोगनिषूदनम् ॥ ११७॥ मासद्वयप्रयोगेण रसस्यास्य निरन्तरम् । दिव्यदृष्टिर्दीर्घकायो भवत्येवाविलम्बितम् ॥ ११८ ॥ अग्निसंदीपनमिदं यकृत्प्लीहनिषूदनम् । अजीर्णानाहशमनं परं शूलनिबर्हणम् ॥ ११९ ॥ कर्तुं जीवनसाफल्यं विहर्तुं ललनाकुले । यौवनानन्दमाहर्तुमिदं सेव्यं रसायनम् ॥ १२० ॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६६ विषरसायनम्—गोमूत्रविमलीकृतमिति विशेषः। तारं रजतम्। रसगन्धक- जारितमिति ताम्रविशेषणं प्रकारान्तरमृतिनिषेधाय। युक्त्यासावधानतया जीवन- साफल्यमिति वृष्यत्वादस्य योगस्य ॥ ११४-१२० ॥ भा.टी.—गोमूत्र में शुद्ध किया हुआ अमृत (विष) एक तोला, रस- सिन्दूर एक तोला, शुद्ध हिंगुल एक तोला, रजतभस्म, पारद-गन्धक योग से बनी हुई ताम्रभस्म; प्रत्येक एक तोला, शुण्ठीचूर्ण, मिरचचूर्ण, पिप्पलीचूर्ण, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, नागकेशर तथा चित्रकमूलचूर्ण; प्रत्येक आधा पल लेकर एकत्र खरल में जल के साथ पीसकर अच्छी तरह दो-दो रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखा लें। इस योग को वैद्य लोग "विषरसायन" नाम से कहते हैं। यह रसायन सेवन करने पर बल्य, वृष्य, वर्ण्य तथा अनेक विध रोगों को नष्ट करनेवाला है। इस रसायन का निरन्तर दो मास तक सेवन करने से मनुष्य शीघ्र ही दिव्यदृष्टि तथा दीर्घकाय हो जाता है। इसके सेवन से अग्नि की वृद्धि होती है और यकृत् तथा प्लीहा रोग नष्ट हो जाते हैं। पेट में शूल, अफारा और अजीर्ण होने पर सब रोग शान्त हो जाते हैं। युवावस्था का आनन्द लेनेवाले और अधिक स्त्रियों से रमण की इच्छावाले मनुष्य को इसका सेवन अवश्य करना चाहिये ॥ ११४-१२० ॥ अमृतरसायनम् विषं द्वितोलकमितं सुरभीमूत्रभावितम् । धात्रीहृतं कान्तलोहं गगनं स्वर्णमाक्षिकम् ॥ १२१ ॥ स्वर्णसिन्दूरकञ्चैव तारं वङ्गञ्च तन्मितम् । खादिरं नागरं चैव त्रितोलकमितं पृथक् ॥ १२२ ॥ समादाय भिषग्वर्यः कन्यानीरेण मर्दयेत् । निर्मापयेत्तु वटिका रक्तिद्वितयसंमिताः ॥ १२३ ॥ समाख्यातं भिषग्वर्यैर्नाम्नाऽमृतरसायनम् । नानातङ्कप्रशमनं रसायनमनुत्तमम् ॥ १२४ ॥ रसायनमिदं रम्यं दीपनं बृंहणं परम् । बलसञ्जननञ्चैव रतिशक्तिविवर्द्धनम् ॥ १२५ ॥ कासश्वासप्रशमनं क्षयक्षयकरं परम् । क्लैब्यापहं विशेषेण शुक्रतारल्यनाशनम् ॥ १२६ ॥ अतीसारग्रहणिकावह्निमान्द्यनिषूदनम् ।

६७० रसतरङ्गिणी परं त्वग्दोषशमनं तथा कुष्ठविनाशनम् ॥ १२७ ॥ अपत्यकरमत्यन्तं परमोजोविवर्द्धनम् । धृतिस्मृतिप्रदञ्चैव नानामेहनिषूदनम् ॥ १२८ ॥ यौवनोपवने नित्यं रतिपुष्पचिचीषया । विहरद्भिः कामिभिस्तु सेव्यमेतद्रसायनम् ॥ १२६ ॥ एतद्दिव्यरसायनं घृतसिताक्षौद्रेण संयोजितं । वर्षैकं परिशीलितं ह्यविरतं कामं द्विगुञ्जोन्मितम् । वार्द्धक्यं विनिहन्त्यलं शमयति श्लेष्माणमत्युल्बणं कामं कामकलाविलासचतुरप्रौढाङ्गणारञ्जनम् ॥ १३० ॥ अथामृतरसायनम्—सुरभीमूत्रं गोमूत्रम् , धात्री आमलकी, आमलकीसत्त्व- स्वरसेन शतधा पुटितं कान्तं म्रियत इति पूर्वमुक्तम् । गगनं अभ्रकम् । खादिरः खदिरसारः रतिरेव पुष्पं तस्य चिचीषा चयनेच्छा । कामम् अत्यर्थम् । १२१-१३०। भा.टी.—गोमूत्र से शुद्ध वत्सनाभ, आवंलों के स्वरस से पुट दिया हुआ कान्तलोह, अभ्रकभस्म, स्वर्णमाक्षिकभस्म, स्वर्णसिन्दूर, रजतभस्म और वंगभस्म, प्रत्येक दो-दो तोला, खदिरसार (कत्था) और शुण्ठीचूर्ण पृथक् तीन-तीन तोला लेकर सबको एकत्र खरल में घीकुआर के स्वरस से अच्छी तरह मर्दन करें। गोली बनाने योग्य होने पर इसकी दो रत्ती की गोलियाँ बना लें । इस योग को वैद्य लोग अमृतरसायन कहते हैं। यह अमृतरसायन अनेक विध रोग नाशक और उत्तम रसायन गुणकारक दीपक बृंहण है । इसके सेवन करने से शरीर में बल की वृद्धि होती है, स्त्री सम्भोग-शक्ति बढ़ती है। यह कास तथा श्वास रोग को शान्त करता और क्षयरोग का क्षय (नाश) करता है । इसको कुछ काल सेवन करने से नपुंसकता नष्ट हो जाती है और शुक्र-धातु का पतलापन हट जाता है। यह रसायन पुरातन अतीसार, ग्रहणीरोग तथा अग्निमान्द्य रोगों को नष्ट करता है । रक्तविकृतिजन्य त्वक् रोगों को मिटाता और कुष्ठरोग को नष्ट करता है। इसके सेवन से वीर्य की दुर्बलता और दोष दूर होकर वह सन्तानोत्पादन करने के योग्य हो जाता है और शरीर में ओजः शक्ति बढ़ जाती है । स्वस्थ शरीर से इसका सेवन करने से धारणा तथा स्मरण शक्ति बढ़ जाती है और अनेक- विध प्रमेहरोग नष्ट हो जाते हैं । इस दिव्य रसायन को गोघृत, मिश्री और शहद के साथ मिलाकर दो रत्ती मात्रा में निरन्तर एक वर्ष तक सेवन करने से बुढ़ापा तथा अतिवृद्ध कफप्रकोप शान्त हो जाता है ॥ १२१-१३० ॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६७१ अथ विषस्य प्रयोगः व्योषताम्रसमायुक्तं विषं तु परिशीलितम् । वातशूलं तथा गुल्मं विनिहन्ति सुदारुणम् ॥१३१॥ मधुयष्टीपद्मकन्दलाक्षोशीरयुतं विषम् । शीलितं तण्डुलाम्भोभी रक्तपित्तहरं परम् ॥१३२॥ वचाचन्दनलोध्राढ्यं विषं क्षौद्रेण शीलितम् ! समाख्यातं विशेषेण जीर्णज्वरविनाशनम् ॥१३३॥ वरीविदारिकाद्राक्षाकपिकच्छूममन्वितम् । विषं तु मधुना लीढं शुक्रसञ्जननं परम् ।.१३४॥ रजनीगोक्षुरद्राक्षायुतं युक्तं विषं द्रुतम् । गोक्षुरस्य कषायेण मूत्रकृच्छ्रप्रणाशनम् ॥१३५॥ त्रायन्तीवायसीमूलगायत्रीराजपादपैः । शृतैर्विषं शीलितं तु ख्यातं कुष्ठनिषूदनम् ॥१३६॥ पाषाणभेदाश्मजतुयवक्षारसमन्वितम् । अमृतं शीलितं हन्ति त्वश्मरीमतिदारुणाम् ॥१३७॥ सर्जिकाक्षारसंयुक्तं सव्योषं परिशोलितम् । विषं खलु समाख्यातं परं गुल्मप्रणाशनम् ॥१३८॥ जन्तुघ्नदाडिमशिफाशतपुष्पायुतं विषम् । शोलितं नाशयात्याशु कृमिरोगं सुदारुणम् ॥१३६॥ त्रिक्षारशरपुङ्खाढ्यं कणामूलयुतं विषम् । शोलितं मात्रया नित्यं मतं प्लीहनिषूदनम् ॥१४०॥ अथ विषस्य प्रयोगाः—व्योष त्रिकटु । पद्मकन्दः शालूकं विषं वा । त्रायन्ती त्रायमाणा । वायसीमूलम्—"काकाह्वा चैव वायसी" इति निघण्टुः । गायत्री खदिरः, राजपादपंः आरग्वधः, अश्मजतु शिलाजतु, दडिमशिफा दाडिमीमूलम् ॥१३१–१४०॥ भा.टी.—शुद्ध विष को सोंठ, मिर्च तथा पिप्पलीचूर्ण और ताम्रभस्म के साथ मिलाकर सेवन करने से भयंकर बातिक शूल और गुल्म रोग शान्त हो जाता है । रक्तपित्त को शान्त करने के लिए शुद्ध विषचूर्ण में मुलैठी, कमल- कन्द, लाख तथा खश का चूर्ण मिला चावलों के धोवन के साथ सेवन करना

चाहिए। शुद्ध विषचूर्ण में श्वेतवच, चन्दन तथा लोध का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ चटाने से कुछ ही दिनों में जीर्ण (पुराना) ज्वर नष्ट हो जाता है। शुक्र धातु की उत्पत्ति तथा वृद्धि के लिए वत्सनाभ चूर्ण को शतावरी, विदारीकन्द, द्राक्षा तथा कौंच के बीजों के चूर्ण में मिलाकर शहद के साथ चटाया जाता है। शुद्ध विष चूर्ण में हरिद्रा, गोखरू और द्राक्षा मिलाकर गोखरू कषाय के साथ सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र नष्ट हो जाता है। कुष्ठ रोग में शुद्ध विष को त्रायमाणा, मकोयमूल, खैर तथा अमलतास की फली के कषाय के साथ सेवन करने से आराम आता है। अति भयंकर पथरी को नष्ट करने के लिए वत्सनाभविषचूर्ण में पाषाणभेदचूर्ण, शुद्ध शिलाजीत तथा यवक्षार चूर्ण मिलाकर कुछ काल निरन्तर सेवन कराना चाहिए। शुद्ध वत्सनाभचूर्ण में सोंठ मिर्च तथा पिप्पली- चूर्ण और सज्जीखार चूर्ण मिलाकर सेवन करने से गुल्म रोग नष्ट होता है। भयंकर उदरकृमि रोग में शुद्ध विषचूर्ण को वायविडंगचूर्ण में मिलाकर सेवन कराना चाहिए। शुद्ध वत्सनाभचूर्ण में त्रिक्षार (यवक्षार-सज्जीक्षार और टंकणक्षार) तथा सरसों का चूर्ण और पिप्पलीमूलचूर्ण मिलाकर कुछ दिन निरन्तर सेवन करने से प्लीहा (तिल्ली) रोग नष्ट हो जाता है ॥१३१-१४०॥ अथास्य बाह्यप्रयोगः बीजपूरद्रवैः पिष्टं विषं समसितायुतम्। अञ्जनान्नाशयत्याशु काचं नातिचिरोत्थितम् ॥१४१॥ निशाद्वयकणायुक्तं विषं कृष्णाञ्जनान्वितम्। अञ्जितं नाशयत्येव काचं नातिचिरोत्थितम् ॥१४२॥ त्रिसप्तवारं त्वमृतं भावितं धात्रिकारसैः। अञ्जितं शुद्धशङ्खाढ्यं तिमिरं हन्ति दारुणम् ॥१४३॥ सुरभीमूत्रयोगेन सप्तधा भावितं विषम्। सकणं त्वञ्जितं यत्नान्मतं काचजिदञ्जनम् ॥१४४॥ सुश्लक्ष्णपिष्टहीराढ्यं विषं गोमूत्रभावितम्। नारीस्तन्येन संघृष्टं मतं काचजिदञ्जनम् ॥१४५॥ करवीरकरञ्जार्कनिम्बपत्रनिशायुतम्। रक्तचन्दनमञ्जिष्ठासप्तपर्णेवचान्वितम् ॥१४६॥ मालतीपत्रसंयुक्तं विषं तालशिलायुतम्।

४३ चतुर्विंशस्तरङ्गः ६७३ प्रलेपेन निहन्तीह व्रणान् कुष्ठसमुद्भवान् ॥ १४७ ॥ घृष्टमार्द्रकतोयेन विषमत्यल्पमात्रया । सद्यःपूरणयोगेन कर्णशूलहरं मतम् ॥ १४८ ॥ कदलीकन्दतोयेन विषं भृङ्गाम्बुभावितम् । पूरणाद्विनिहन्तीह पुष्पं नातिचिरोत्थितम् ॥ १४६ ॥ भृङ्गराजरसेनैव पूरणाच्च निशान्धताम् । विषाञ्जिते च नयने सिञ्चेद्धारा मुहुर्मुहुः ॥ १५० ॥ समं विषतुल्यं यत् सिताखण्डं तद्युतम् । काचः नेत्ररोगविशेषः। तिमिरमेव विकृतं सत् काचतां याति । सकणं पिप्पलीसहितम् । करवीरो हयमारः, निशा हरिद्रा, तालं हरितालम्, शिला मनःशिला । विषाञ्जिते चेत्युपक्रमः विषतीक्ष्ण- तापप्रतिषेधाय सर्वत्र ज्ञेयः ॥ १४१-१५० ॥ भा.टो.—नूतन मोतियाबिन्द में अर्थात् मोतियाबिन्द उतरने के प्रारम्भ में शुद्ध वत्सनाभ को बिजौरा नीम्बू के स्वरस में घोटकर उसमें समभाग (विष के बराबर ) खांड मिलाकर आँखों में अञ्जन करने से मोतियाबिन्द बढ़ने नहीं पाता है । इसी तरह शुद्ध वत्सनाभ, हल्दी, दारुहल्दी, पिप्पलीचूर्ण और शुद्ध काला सुरमा एकत्र बारीक पीसकर अञ्जन बना लें । इस अञ्जन को नेत्रों में लगाने से नया मोतियाबिन्द नष्ट हो जाता है । भयंकर तिमिर (नेत्ररोग) में विष को इक्कीस बार आंवलों के स्वरस में भावना देकर उसमें विष के बराबर भाग शंखचूर्ण मिलाकर आँखों में आंजन किया जाता है । गोमूत्र में सात भावना दिये हुए वत्सनाभचूर्ण में समभाग पिप्पली चूर्ण मिलाकर अञ्जन करने से भी काचरोग नष्ट होता है । गोमूत्र में सात बार भावना दिये हुए वत्सनाभ चूर्ण में समभाग हीरे का चूर्ण मिलाकर स्त्री-दुग्ध में पीसकर नेत्रों में लगाने से भी काच रोग नष्ट हो जाता है। कुष्ठ के व्रणों को नष्ट करने के लिए वत्सनाभ चूर्ण में लालचन्दन, मजीठ, सप्तपर्ण, वच, कनेरपत्र, कञ्चनपत्र, आक के पत्ते, निम्बपत्र, हरिद्राचूर्ण, चमेली के पत्र, हरताल और मैनसिल मिलाकर लेप करने से व्रण शीघ्र अच्छे हो जाते हैं । कर्णशूल को दूर करने के लिए वत्सनाभ को अदरक के स्वरस में घिस कर तत्काल कान में डालने से कान का दर्द बन्द हो जाता है । वत्सनाभ को भृंगराज के स्वरस की भावना देकर कदली कन्द के स्वरस में घिसकर नेत्र में डालने से नया फूला नष्ट हो जाता है । निशान्धता (रतौंधी) रोग में विष को भांगरा स्वरस में घिस कर डालने से वह नष्ट हो जाती है ।

६७४ रसतरङ्गिणी विषयुक्त अञ्जनों को नेत्रों में लगाने के बाद नेत्रों को बार-बार शुद्ध जल से कई बार धोना चाहिए ॥ १४१-१५० ॥ विषप्रभा वर्तिका विषं तु तोलकमितं निशास्वरसपेषितम् । विशोधिता रोगशिला भृङ्गराजद्रवेणं तु ॥१५१॥ श्लक्ष्णचूर्णीकृतं शङ्खं त्वब्धिफेनं च सैन्धवम् । कणाभया लोध्रनिशे बीजमक्षक़रञ्जयोः ॥१५२॥ वृक्षाम्लं मरिचं चैव मञ्जिष्ठा रक्तचन्दनम् । समं समं समादाय त्वजाक्षीरेण पेषयेत् ॥१५३॥ निर्मापयेद्भिषग्वर्यो वर्तिकाः खलु शोभनाः । नामतस्तु समाख्याता भिषग्भिस्तु विषप्रभा ॥१५४॥ सङ्घृष्टा वर्तिका वारि नेत्रयोर्विनियोजिता । शुक्लार्ममांसपिल्लादीन् रोगान् नाशयति द्रुतम् ॥१५५॥ शिरीषदलपुष्पाढ्यं विषं तु परिशीलितम् । समाख्यातं विशेषेण भृशमाखुविषापहम् ॥१५६॥ कदलीकन्दतोयेन विषं साज्यं प्रयोजितम् । अशनाल्लेपनाच्चैव हन्ति सर्पविषं भृशम् ॥१५७॥ गोतक्रेण समायुक्तं विषमल्पमात्रया । निपीतं शमयत्येव विषमाखुकुलोद्भव २ ॥१५८॥ विषं तु तिलतैलेन घृष्टं लेपप्रयोगतः । विनिहन्त्यचिरादेव वृश्चिकार्तिं सुदारुणाम् ॥१५६॥ अर्कक्षीरेण लिप्तं तु विषमल्पमात्रया । सर्वासामेव लूतानां विषं जयति दारुणम् ॥१६०॥ विषगर्भाभिधं तैलं नित्यमभ्यङ्गयोजितम् । मन्यास्तम्भं हनुस्तम्भं पक्षाघातं परिग्रहम् ॥१६१॥ सर्वाङ्गग्रहणं पृष्ठत्रिककम्पादिकं तथा । निहन्ति हि विशेषेण निखिला निलवेदनाः ॥१६२॥ विषप्रभा वर्तिका- अक्षस्य विभीतकस्य बीजम् । बीजस्य मज्जा ग्राह्या तथा करञ्जस्य च बीजमज्जा शिरीषस्य पत्रपुष्पाभ्यां संयुक्तं विषं विशेषतो मूषिकां वषापहम्।

साज्यं संघृतम् लेपनात् दंशदेशे । नतं तगरम् । विषगर्भाभिधं तैलं विषगर्भतैलम्, तद्यथा- “धत्तूरस्य रसस्य पञ्चकुडवं तैलं तथा काञ्जिकं प्रस्थानाञ्च चतुष्टयं गद- वचा त्रिंशत्परं शाणकाः । हृद्धार्वीमरिचात्पृथङ् नव विषात् षट् स्वर्णबीजात्पटोः स्युः सप्ताधिकविंशतिः परिमितं तीव्रानिलध्वंसनम्” ॥१५१-१६२॥ भा.टी.-हरिद्रा स्वरस में पिसा हुआ शुद्ध वत्सनाभ, भांगरे के स्वरससे शुद्ध की हुई मैनसिल, अत्यन्त सूक्ष्म चूर्ण किया हुआ शंख, समुद्रफेन, सैन्धानमक, पिप्पलीचूर्ण, हरीतकीचूर्ण, बहेड़े की मज्जा, करञ्जबीजमज्जा; वृक्षाम्ल (आलु बोखारा) कालीमिर्च चूर्ण, मञ्जिष्ठाचूर्ण, लालचन्दन, सब द्रव्य समभाग में लेकर एकत्र खरल में बकरीके दूध के साथ खूब मर्दन करें। जब बत्तियाँ बनाने के योग्य हो जाय तो उसकी लम्बी-लम्बी बत्तियाँ बनाकर सुखा लें। इन बत्तियों को 'विषप्रभा' नाम से कहा जाता है। इस वर्त्ती को जल में पीस कर आंखों में लगाने से नेत्रशुक्ल (फूला), अर्म, मांस पिल्ल आदि नेत्रोंके रोग नष्ट होते हैं। शुद्ध वत्सनाभ को सिरसके पत्र तथा फूलों के साथ पीसकर उचित मात्रा में सेवन करने से विशेष रूप से चूहे का विष नष्ट होता है। सर्पविष को नष्ट करने के लिए वत्सनाभ को कदली कन्द स्वरस में पीसकर उसमें गोघृत मिलाकर खिलाना और दंशस्थान में लेप करना चाहिये। सब प्रकार के मूषक (चूहा) विष को नष्ट करने के लिए वत्सनाभ को गोतक्र के साथ थोड़ी मात्रा में सेवन कराने से निश्चय ही चूहोंका विष शान्त हो जाता है। वत्सनाभ को शुद्ध तिल तैल में घिस कर लेप करने से शीघ्र ही बिच्छू के काटने की पीड़ा शान्त हो जाती है। सब प्रकार के लूता (मकड़ी) विष को नष्ट करने के लिये थोड़े से वत्सनाभ को आक के दूध में घिस कर लेप करना चाहिये। कूट, इलायची- बीज, बाकुची, जटामांसी, देवदारु तथा तगर के साथ विष मिलाकर जल में पिलाने और दंशस्थान पर लेप कराने से सब प्रकार के विष नष्ट हो जाते हैं। अन्य शास्त्रोक्त “विषगर्भ” नामक तैल की प्रतिदिन शरीरमें अभ्यंग करने से, मन्यास्तम्भ (गरदन की अकड़ाहट), हनुस्तम्भ, पक्षाघात (लकवा), परिग्रह (सब शरीर का टूटना) तथा सर्व शरीर की अकड़ाहट, पृष्ठ, त्रिकस्तब्धता, कग्र तथा और भी सब प्रकार की वातिक वेदना इस तैल की मालिश से शान्त हो जाती है ॥१५१-१६२॥ अथ उपविषाणां नामानि विषतिन्दुकबीजं च त्वाह्विफेनञ्च रेचकम्