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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—७३ देवता—बृहस्पति

है. (४)
इन्द्रासोमा युवमङ्ग तरुत्रमपत्यसाचं श्रुत्यं रराथे.
युवं शुष्मं नर्यं चर्षणिभ्यः सं विव्यथुः पृतनाषाहमुग्रा.. (५)
हे इंद्र एवं सोम! तुम हमें उद्धार करने वाला, संतानयुक्त एवं प्रशंसनीय धन शीघ्र दो. हे
अति शूरो! तुम मानवों में कल्याणकारी एवं शत्रुसेनाओं को हराने वाला बल बढ़ाओ. (५)
सूक्त—७३ देवता—बृहस्पति
यो अद्रिभित्प्रथमजा ऋतावा बृहस्पतिराङ्गिरसो हविष्मान्.
द्विबर्हज्मा प्राघर्मसत्पिता न आ रोदसी वृषभो रोरवीति.. (१)
पर्वत का भेदन करने वाले, सबसे पहले उत्पन्न, सत्ययुक्त, अंगिरा के पुत्र, यज्ञ के भागी,
दोनों लोकों में गतिशील, अतिशय दीप्त स्थान में रहने वाले एवं हमारे पालनकर्त्ता बृहस्पति
कामपूरक बनकर धरती-आकाश में गर्जन करते हैं. (१)
जनाय चिद्य ईवत उ लोकं बृहस्पतिर्देवहूतौ चकार.
घ्नन्वॄत्राणि वि पुरो दर्दरीति जयञ्छत्रूँरमित्रान्पृत्सु साहन्.. (२)
जो बृहस्पति स्तुति करने वाले को यज्ञ में स्थान देते हैं, वे ही ढकने वाले अंधकार को
दूर करते हुए युद्धों में शत्रुओं को जीतते हैं एवं अमित्रों को हराते हैं. वे राक्षसों के नगरों को
बार-बार जलाते हैं. (२)
बृहस्पतिः समजयदद्वसूनि महो व्रजान् गोमतो देव एषः.
अपः सिषासन्तत्स्व१ रप्रतीतो बृहस्पतिर्हन्त्यमित्रमर्कैः.. (३)
इन बृहस्पति देव ने असुरों के धनों के साथ-साथ उनकी गायों से पूर्ण गोचर भूमि को
जीता था. बृहस्पति किसी के द्वारा न रोके जाते हुए यज्ञकर्म द्वारा स्वर्ग को भोगने की इच्छा
करते हैं एवं मंत्रों द्वारा शत्रु का नाश करते हैं. (३)
सूक्त—७४ देवता—सोम व रुद्र
सोमारुद्रा धारयेथामसुर्यं१ प्र वामिष्टयोऽरमश्रुवन्तु.
दमेदमे सप्त रत्ना दधाना शं नो भूतं द्विपदे शं चतुष्पदे.. (१)
हे सोम एवं रुद्र! तुम हमें असुरों के समान शक्ति दो. हमारे यज्ञ प्रत्येक घर में तुम्हें पूरी
तरह व्याप्त करें. हे सात रत्न धारण करने वालो! तुम हमारे अतिरिक्त दो पैर वाले मानवों एवं
चार पैर वाले पशुओं के लिए कल्याणकारी बनो. (१)
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सोमारुद्रा वि वृहतं विषूचीममीवा या नो गयमाविवेश.
आरे बाधेथां निर्ऋतिं पराचैरस्मे भद्रा सौश्रवसानि सन्तु.. (२)
हे सोम एवं रुद्र! हमारे घर में जो रोग समाया हुआ है, उसे दूर भगाओ एवं दरिद्रता को
बाधा पहुंचाकर हमसे दूर भगाओ. हमारे पास कल्याणकारी अन्न हो. (२)
सोमारुद्रा युवमेतान्यस्मे विश्वा तनूषु भेषजानि धत्तम्.
अव स्यतं मुञ्चतं यन्नो अस्ति तनूषु बद्धं कृतमेनो अस्मत्.. (३)
हे सोम एवं रुद्र! तुम हमारे शरीर को लाभ पहुंचाने वाली सभी ओषधियां धारण करो.
हमारे द्वारा किया हुआ जो पाप हमारे शरीर में बंधा है, उसे शिथिल करके दूर भगाओ. (३)
तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृळतं नः.
प्र नो मुञ्चतं वरुणस्य पाशाद् गोपायतं नः सुमनस्यमाना.. (४)
हे सोम एवं रुद्र! तुम दीप्त धनुष वाले, तेज बाणों वाले एवं शोभनसुख देने वाले हो.
शोभनस्तोत्रों की इच्छा करते हुए तुम दोनों इस संसार में हमें सुखी बनाओ, वरुण के पाशों से
छुड़ाओ एवं हमारी रक्षा करो. (४)
सूक्त—७५ देवता—वर्म आदि
जीमूतस्येव भवति प्रतीकं यद्वर्मी याति समदामुपस्थे.
अनाविद्धया तन्वा जय त्वं स त्वा वर्मणो महिमा पिपर्तु.. (१)
युद्धों के आरंभ होने पर यह राजा जब कवच पहन कर जाता है, तब इसका रूप बादल
के समान जान पड़ता है. हे राजा! तुम शत्रुओं द्वारा बिना बिंधे शरीर से जय प्राप्त करो.
कवच की यह महिमा तुम्हारी रक्षा करे. (१)
धन्वना गा धन्वनाजिं जयेम धन्वना तीव्राः समदो जयेम.
धनुः शत्रोरपकामं कृणोति धन्वना सर्वाः प्रदिशो जयेम.. (२)
हम धनुष के द्वारा गायों एवं युद्ध को जीतेंगे. हम धनुष की सहायता से शत्रुओं की
उद्धत एवं मदवाली सेनाओं को जीतेंगे. हमारा धनुष शत्रुओं की अभिलाषाएं नष्ट करे. हम
धनुष द्वारा सब दिशाओं को जीतें. (२)
वक्ष्यन्तीवेदा गनीगन्ति कर्णं प्रियं सखायं परिषस्वजाना.
योषेव शिङ्क्ते वितताधि धन्वञ्ज्या इयं समने पारयन्ती.. (३)
युद्धभूमि में पार लगाने वाली यह धनुष की डोरी धनुष पर विस्तृत होकर प्रिय वचन
बोलने की अभिलाषा सी करती हुई प्यारी बातें कहने के लिए धनुर्धारी के कान के समीप

आती है. पति का आलिंगन करके बात करने वाली नारी के समान यह डोरी बाण को छूकर
शब्द करती है. (३)
ते आचरन्ती समनेव योषा मातेव पुत्रं बिभृतामुपस्थे.
अप शत्रून् विध्यतां संविदाने आर्ती इमे विष्फुँरन्ती अमित्रान्.. (४)
धनुष की दोनों कोटियां परस्पर प्रिय आचरण करने वाली नारियों के समान कार्य करती
हुई युद्ध में राजा की इस प्रकार रक्षा करें, जिस प्रकार माता पुत्र की रक्षा करती है. ये परस्पर
विरोध छोड़कर जाती हुई इस राजा के अमित्रों को मारकर शत्रुओं को बेध दें. (४)
बह्वीनां पिता बहुरस्य पुत्रश्चिश्चा कृणोति समनावगत्य.
इषुधिः सङ्काः पृतनाश्च सर्वाः पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः.. (५)
यह तरकस बहुत से बाणों का पिता है. बहुत से बाण इसके पुत्र हैं. बाण निकालने पर
इससे त्रिश्चा शब्द होता है. तरकस योद्धा की पीठ पर बंधा हुआ है, युद्धों को जानकर बाणों
को जन्म देता है एवं सब सेनाओं को जीतता है. (५)
रथे तिष्ठन्नयति वाजिनः पुरो यत्रयत्र कामयते सुसारथिः.
अभीशूनां महिमानं पनायत मनः पश्चादनु यच्छन्ति रश्मयः.. (६)
उत्तम सारथि रथ पर बैठकर अपने सामने वाले घोड़ों को जहां चाहता है, वहां ले जाता
है. हे मनुष्यो! उन लगामों की महिमा बखानो. घोड़े के मुंह से पीछे की ओर जाती हुई लगामें
सारथि के मन के अनुसार घोड़ों को वश में करती हैं. (६)
तीव्रान् घोषान् कृण्वते वृषपाणयोऽश्वा रथेभिः सह वाजयन्तः.
अवक्रामन्तः प्रपदैरमित्रान् क्षिणन्ति शत्रूँरनपव्ययन्तः.. (७)
धूल उड़ाते हुए एवं रथों के साथ तेज दौड़ते हुए घोड़े जोर से हिनहिनाते हैं. वे युद्ध से न
भागते हुए हिंसक शत्रुओं को अपनी टापों से कुचलते हैं. (७)
रथवाहनं हविरस्य नाम यत्रायुधं निहितमस्य वर्म.
तत्रा रथमुप शग्मं सदेम विश्वाहा वयं सुमनस्यमानाः.. (८)
हवि जिस प्रकार अग्नि को बढ़ाता है, उसी प्रकार रथ द्वारा ढोया गया शत्रुओं का धन
इस राजा को बढ़ाता है. रथ पर राजा के आयुध और कवच रखे रहते हैं. प्रसन्नचित्त हम
भरद्वाजवंशी सदा उस रथ के पास जावें. (८)
स्वादुषद्सदः पितरो वयोधाः कृच्छ्रेश्रितः शक्तिवन्तो गभीराः.
चित्रसेना इषुबला अमृध्राः सतोवीरा उरवो व्रातसाहाः.. (९)
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रथ की रक्षा करने वाले सैनिक शत्रु के स्वादिष्ट अन्न को नष्ट करके अपने योद्धाओं को
अन्न देने वाले एवं विपत्ति में आश्रय लेने योग्य हैं. ये सैनिक शक्तिशाली, गंभीर, विचित्रसेना
वाले, बाणरूपी शक्ति वाले, हिंसित न होने वाले, वीरतापूर्ण, विशाल एवं शत्रुसमूहों को हराने
वाले हैं. (९)
ब्राह्मणासः पितरः सोम्यासः शिवे नो द्यावापृथिवी अनेहसा.
पूषा नः पातु दुरिताद् ऋतावृधो रक्षा माकिर्नो अघशंस ईशत.. (१०)
हे ब्राह्मणो, पितरो और यज्ञ को बढ़ाने वाले सोम तैयार करने वालो! हमारी रक्षा करो.
पापरहित द्यावा-पृथिवी हमारा कल्याण करें. पूषा पाप से हमारी रक्षा करें. शत्रु हमारा स्वामी
न बने. (१०)
सुपर्णं वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभिः संनद्धा पतति प्रसूता.
यत्रा नरः सं च वि च द्रवन्ति तत्रास्मभ्यमिषवः शर्म यंसन्.. (११)
बाण शोभनपंख धारण करता है. हिरण का सींग इसका दांत है. गाय से बनी तांत द्वारा
बंधा हुआ बाण प्रेरणा के अनुसार लक्ष्य पर गिरता है. नेता जहां मिलकर या अलग-अलग
घूमते हैं, वहां ये बाण हमें शरण दें. (११)
ऋजीते परि वृङ्ग्धि नोऽश्मा भवतु नस्तनूः.
सोमो अधि ब्रवीतु नोऽदितिः शर्म यच्छतु.. (१२)
हे बाण! हमें सब प्रकार से बढ़ाओ. हमारा शरीर पत्थर के समान हो. सोम हमारा
पक्षपात करता हुआ बोले. अदिति हमें सुख दें. (१२)
आ जङ्घन्तिसान्वेषां जघनाँ उपजिघ्नते. अश्वाजनि प्रचेतसोऽश्वान्तसमत्सु चोदय..
(१३)
हे कोड़े! उत्तम ज्ञान वाले सारथि तुम्हारे द्वारा घोड़ों को पीठ और जांघों पर चोट करते
हैं. तुम युद्ध में घोड़ों को प्रेरणा दो. (१३)
अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतं परिबाधमानः.
हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान्पुमांसं परि पातु विश्वतः.. (१४)
धनुषधारी के हाथ में बंधा हुआ चमड़ा धनुष की डोरी की चोट से हाथ की रक्षा करता
हुआ सांप के समान लिपटा है एवं सब बातों को जानता हुआ पौरुष द्वारा धनुषधारी की रक्षा
करता है. (१४)
आलाक्ता या रुरुशीर्ष्ण्यथो यस्या अयो मुखम्.
इदं पर्जन्यरेतस इष्वै देव्यै बृहन्नमः.. (१५)
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जहर में बुझे हुए, हिंसक नोक वाले, लोहे के अग्रभाग वाले एवं पर्जन्य से उत्पन्न
विशाल बाण देव को नमस्कार है. (१५)
अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसंशिते.
गच्छामित्रान्प्र पद्यस्व मामीषां कं चनोच्छिषः.. (१६)
हे मंत्र द्वारा तेज किए हुए एवं हिंसाकुशल बाण! तुम छोड़े जाने पर जाओ और शत्रुओं
पर गिरो. उन में से किसी को भी मत छोड़ना. (१६)
यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव.
तत्रा नो ब्रह्मणस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु.. (१७)
जिस युद्ध में मुंडितशिर कुमारों के समान बाण गिरते हैं, वहां ब्रह्मणस्पति एवं अदिति
हमें सदा सुख दें. (१७)
मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानु वस्ताम्.
उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु.. (१८)
हे राजन्! मैं तुम्हारे मर्मस्थलों को कवच से ढकता हूं. राजा सोम तुम्हें अमृत से ढकें.
वरुण तुम्हें बड़े से बड़ा सुख दें. तुम्हारी विजय पाने के बाद देव प्रसन्न हों. (१८)
यो नः स्वो अरणो यश्च निष्ट्यो जिघांसति.
देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरम्.. (१९)
हमारे जो परिवारी जन हमसे प्रसन्न नहीं हैं एवं जो दूर रहकर हमें मारना चाहते हैं,
सभी देव उन्हें मारें. मंत्र ही हमारी रक्षा करने वाले कवच हैं. (१९)

सूक्त—१ देवता—अग्नि

सप्तम मंडल
सूक्त—१ देवता—अग्नि
अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युती जनयन्त प्रशस्तम्.
दूरेदृशं गृहपतिमथर्युम्.. (१)
यज्ञ के नेता ऋत्विज् प्रशंसायोग्य, दूर से दिखाई देने वाले, गृहपति एवं गतिशील अग्नि
को हाथों की गति एवं उंगलियों की सहायता से अरणि से उत्पन्न करते हैं. (१)
तमग्निमस्ते वसवो नृण्वन्त्सुप्रतिचक्षमवसे कुतश्चित्.
दक्षाय्यो यो दम आस नित्यः.. (२)
जो अग्नि घर में पूजनीय एवं नित्य थे, उन्हीं शोभनदर्शन वाले अग्नि को सभी भयों से
बचाने के लिए वसिष्ठ पुत्रों ने घर में रखा. (२)
प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरो नोऽजस्रया सूर्त्या यविष्ठ.
त्वां शश्वन्त उप यन्ति वाजाः.. (३)
हे अतिशय युवा अग्नि! तुम भली प्रकार प्रज्वलित होकर अपनी गतिशील ज्वाला के
साथ हमारे कल्याण के लिए यज्ञशाला में चमको. बहुत से अन्न तुम्हारे पास जाते हैं. (३)
प्र ते अग्नयोऽग्निभ्यो वरं निः सुवीरासः शोशुचन्त द्युमन्तः.
यत्रा नरः समासते सुजाताः.. (४)
शोभनजन्म वाले ऋत्विज् जहां बैठते हैं, वहां अग्नि लौकिक अग्नियों की अपेक्षा
कल्याणकारी, संतान देने वाले एवं अधिक दीप्तिशाली होकर चमकते हैं. (४)
दा नो अग्ने धिया रयिं सुवीरं स्वपत्यं सहस्य प्रशस्तम्.
न यं यावा तरति यातुमावान्.. (५)
हे शत्रुओं को हराने में कुशल अग्नि! हमारी स्तुतियां सुनकर हमें ऐसा कल्याणकर,
संतान वाला, शोभन पुत्र-पौत्र वाला एवं श्रेष्ठ धन दो, जिसे हिंसक शत्रु बाधित न कर सकें.
(५)
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उप यमेति युवतिः सुदक्षं दोषा वस्तोर्हविष्मती घृताची.
उप स्वैनमरमतिर्वस्यूः.. (६)
अग्नि से नित्ययुक्त एवं हव्यसहित जुहू रात-दिन शोभनबल वाले अग्नि के पास आती
है. स्तोताओं के धन की अभिलाषा करती हुई अग्नि की दीप्ति अग्नि के पास आती है. (६)
विश्वा अग्नेऽप दहारातीर्येभिस्तपोभिर्दहदो जरूथम्.
प्र निस्वरं चातयस्वामीवाम्.. (७)
हे अग्नि! तुमने जिन तेजों से भयानक शब्द करने वाले राक्षसों को जलाया था, उन्हीं
तेजों से समस्त शत्रुओं को जलाओ व ताप नष्ट करके रोग को मिटाओ. (७)
आ यस्ते अग्न इधते अनीकं वसिष्ठ शुक्र दीदिवः पावक.
उतो न एभिः स्तवथैरिह स्याः.. (८)
हे श्रेष्ठ, शुभ, तेजस्वी एवं शोधक अग्नि! जो तुम्हारा तेज बढ़ाते हैं, उन पर तुम जिस
प्रकार प्रसन्न होते हो, उसी प्रकार हमारे स्तोत्रों से प्रसन्न होकर इस यज्ञ में आओ. (८)
वि ये ते अग्ने भेजिरे अनीकं मर्ता नरः पित्र्यासः पुरुत्रा.
उतो न एभिः सुमना इह स्याः.. (९)
हे अग्नि! जो पितरों के हितकारक एवं यज्ञकर्म के नेता लोग तुम्हारे तेज को अनेक
स्थानों में बांटते हैं, तुम उन पर जिस प्रकार प्रसन्न होते हो, उसी प्रकार हमारे स्तोत्रों से प्रसन्न
होकर इस यज्ञ में स्थित बनो. (९)
इमे नरो वृत्रहत्येषु शूरा विश्वा अदेवीर्भि सन्तु मायाः.
ये मे धियं पनयन्त प्रशस्ताम्.. (१०)
जो लोग मेरे उत्तम यज्ञकर्म की स्तुति करते हैं, वे ही शूर नेता युद्धों में असुरों की माया
को पराजित करें. (१०)
मा शूने अग्ने नि षदाम नृणां माशेषसोऽवीरता परि त्वा.
प्रजावतीषु दुर्यासु दुर्य.. (११)
हे अग्नि! हम पुत्रादि से शून्य घर में न रहें, न हम दूसरों के घर में निवास करें. हे घर के
हितैषी अग्नि देव! पुत्रों एवं वीरों से युक्त हम तुम्हारी सेवा करते हुए प्रजायुक्त घरों में रहें.
(११)
यमश्री नित्यमुपयाति यज्ञं प्रजावन्तं स्वपत्यं क्षयं नः.
स्वजन्मना शेषसा वावृधानम्.. (१२)
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हे घोड़ों के स्वामी अग्नि! हमें सगे पुत्र से वृद्धि पाता हुआ ऐसा शोभन संतानयुक्त घर
दो, जिस यज्ञयुक्त घर में तुम नित्य आते हो. (१२)
पाहि नो अग्ने रक्षसो अजुष्टात् पाहि धूर्तेरररुषो अघायोः.
त्वा युजा पृतनायूँरभि ष्याम्.. (१३)
हे अग्नि! हमें द्वेषयुक्त राक्षस से बचाओ. हमें दान न करने वाले, पापी और हिंसक से
बचाओ. हम तुम्हारी सहायता से सेना के इच्छुक लोगों को पराजित करें. (१३)
सेदग्नीरग्नीरत्यस्त्वन्यान्यत्र वाजी तनयो वीळुपाणिः.
सहस्रपाथा अक्षरा समेति.. (१४)
हमारा बलवान्, दृढ़ हाथों वाला एवं हजारों अन्नों वाला पुत्र नाशरहित स्तोत्रों द्वारा जिस
अग्नि की सेवा करता है, वह अग्नि अन्य अग्नियों को पराजित करे. (१४)
सेदग्निर्यो वनुष्यतो निपाति समेद्धारमंहस उरुष्यात्.
सुजातासः परि चरन्ति वीराः.. (१५)
वे अग्नि ही हैं, जो अपने प्रज्वलित करने वाले को हिंसक एवं विशाल पाप से बचाते हैं
तथा शोभनजन्म वाले वीर जिनकी सेवा करते हैं. (१५)
अयं सो अग्निराहुतः पुरुत्रा यमीशानः समिदिन्धे हविष्मान्.
परि यमेत्यध्वरेषु होता.. (१६)
वे ही अग्नि अनेक यज्ञों में बुलाए जाते हैं, जिन्हें ऐश्वर्य चाहने वाला एवं हव्ययुक्त
यजमान भली प्रकार जलाता है एवं यज्ञों में होता जिनकी परिक्रमा करता है. (१६)
त्वे अग्न आहवनानि भूरीशानास आ जुहुयाम नित्या.
उभा कृण्वन्तो वहतू मियेधे.. (१७)
हे अग्नि! हम धनों के स्वामी बनकर अग्निहोत्रादि नित्यकर्मों को धारण करने वाले
स्तोत्र बोलते हुए यज्ञ में बहुत से हव्य देंगे. (१७)
इमो अग्ने वीततमानि हव्याजस्रो वक्षि देवतातिमच्छ.
प्रति न ईं सुरभीणि व्यन्तु.. (१८)
हे अग्नि! तुम इन अति सुंदर हव्यों को देवों के समीप लेकर जाओ. प्रत्येक देव हमारे
इस हव्य की कामना करें. (१८)
मा नो अग्नेऽवीरते परा दा दुर्वाससेऽमतये मा नो अस्यै.
मा नः क्षुधे मा रक्षस ऋतावो मा नो दमे मा वन आ जुहूर्थाः.. (१९)
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हे अग्नि! हमें संतानहीन मत बनाओ. हमें बुरे कपड़े और बुरी बुद्धि मत देना. हमें भूख
और राक्षस को मत सौंपना. हे सत्ययुक्त अग्नि! हमें न घर में मारना और न वन में. (१९)
नू मे ब्रह्माण्यग्न उच्छशाधि त्वं देव मघवद्भ्यः सुषदः.
रातौ स्यामोभयास आ ते यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (२०)
हे अग्नि! मेरे लिए अन्नों को विशेषरूप से शुद्ध करना. हे देव! हम हव्ययुक्तों को तुम
अन्न दो. हम यजमान और स्तोता दोनों तुम्हारे दान के पात्र बनें. तुम सदा कल्याणों द्वारा
हमारा पालन करो. (२०)
त्वमग्ने सुहवो रण्वसन्दृक् सुदीती सूनो सहसो दीदिहि.
मा त्वे सचा तनये नित्य आ धङ्मा वीरो अस्मन्नर्यो वि दासीत्.. (२१)
हे शक्ति के पुत्र, शोभन आह्वान वाले एवं रमणीयदर्शन अग्नि! तुम उत्तम प्रकाश के
साथ प्रदीप्त बनो! तुम मेरे पुत्र के सहायक बनो एवं उसे मत जलाओ. हमारा मानवहितकारी
पुत्र नष्ट न हो. (२१)
मा नो अग्ने दुर्भृतये सचैषु देवेद्धेष्वग्निषु प्र वोचः.
मा ते अस्मान्दुर्मतयो भृमाच्छिद्देवस्य सूनो सहसो नशन्त.. (२२)
हे सहायक अग्नि! ऋत्विजों द्वारा अग्नियों के प्रज्वलित होने पर उनसे हमें दुःखपूर्वक
मरण के लिए मत कहो. हे प्रज्वलित एवं बलपुत्र अग्नि! तुम्हारी दुर्बुद्धि भ्रम से भी हमें न
प्राप्त हो. (२२)
स मर्तो अग्ने स्वनीक रेवानमर्त्ये य आजुहोति हव्यम्.
स देवता वसुवनिं दधाति यं सूरिरर्थी पृच्छमान एति.. (२३)
हे शोभनतेज वाले एवं देवतारूप अग्नि! तुम्हें हव्य देने वाला मनुष्य धनवान् होता है. वे
अग्नि देव यजमान को धन देते हैं, जिनके पास धन चाहने वाला स्तोता पूछने के लिए जाता
है. (२३)
महो नो अग्ने सुवितस्य विद्वान् रयिं सूरिभ्य आ वहा बृहन्तम्.
येन वयं सहसावन्मदेमाविक्षितास आयुषा सुवीराः.. (२४)
हे अग्नि! तुम हमारे महान् कल्याणकारी कार्यों को जानते हो. हम स्तोताओं को तुम
महान् धन दो. हे बलपुत्र अग्नि! उस धन से हम क्षयरहित, पूर्ण आयु वाले व शोभन पुत्र-पौत्रों
वाले होकर प्रसन्न बनें. (२४)
नू मे ब्रह्माण्यग्न उच्छशाधि त्वं देव मघवद्भ्यः सुषदः.
रातौ स्यामोभयास आ ते यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (२५)
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सूक्त—२ देवता—आप्री

हे अग्नि! मेरे लिए तुम अन्नों को विशेषरूप से शुद्ध करना. हे देव! हम हव्ययुक्तों को
तुम अन्न दो. हम यजमान और स्तोता दोनों तुम्हारे दान के पात्र बनें. सदा कल्याणों द्वारा
हमारा पालन करो. (२५)
सूक्त—२ देवता—आप्री
जुषस्व नः समिधमग्ने अद्य शोचा बृहद्यजतं धूममृण्वन्.
उप स्पृश दिव्यं सानु स्तूपैः सं रश्मिभिस्ततनः सूर्यस्य.. (१)
हे अग्नि! आज हमारी समिधा को स्वीकार करो. यज्ञ के योग्य एवं प्रशंसनीय धुआं
उठाते हुए जलों एवं अपनी गर्म लपटों से ऊंचे आकाश को छुओ. तुम सूर्य से मिल जाओ.
(१)
नराशंसस्य महिमानमेषामुप स्तोषाम यजतस्य यज्ञैः.
ये सुक्रतवः शुचयो धियंधाः स्वदन्ति देवा उभयानि हव्या.. (२)
जो देव शोभनकर्म वाले, तेजस्वी, यज्ञकर्मों के धारक एवं दोनों प्रकार के हव्यों को
स्वीकार करने वाले हैं, हम उन देवों के बीच में यज्ञयोग्य एवं मनुष्यों द्वारा प्रशंसनीय अग्नि
की महिमा का वर्णन स्तुतियों द्वारा करते हैं. (२)
ईळेन्यं वो असुरं सुदक्षमन्तर्दूतं रोदसी सत्यवाचम्.
मनुष्वदग्निं मनुना समिद्धं समध्वराय सदमिन्महेम.. (३)
हे अध्वर्युगण! तुम स्तुति के योग्य, शक्तिशाली, शोभनबुद्धि वाले, धरती-आकाश के
बीच में देवों के दूतरूप में विचरण करने वाले, सत्यवचन, मनुष्य के समान और मन द्वारा
प्रज्वलित अग्नि को यज्ञ के लिए पूजते हो. (३)
सपर्यवो भरमाणा अभिज्ञु प्र वृञ्जते नमसा बर्हिरग्नौ.
आजुह्वाना घृतपृष्ठं पृषद्वदध्वर्यवो हविषा मर्चयध्वम्.. (४)
सेवा करने के अभिलाषी एवं घुटनों के सहारे बैठकर पात्रों में सोमरस भरते हुए अध्वर्यु
हव्य के साथ अग्नि को बर्हि देते हैं. हे अध्वर्युगण! घी से भीगे हुए एवं बड़ी-बड़ी बूंदों वाले
बर्हि को हव्य के साथ अग्नि में वहन करो. (४)
स्वाध्यो३ वि दुरो देवयन्तोऽशिश्रयू रथयुर्देवताता.
पूर्वी शिशुं न मातरा रिहाणे समग्रुवो न समनेष्वञ्जन्.. (५)
शोभनकर्म वाले, देवों की अभिलाषा करने वाले एवं रथ चाहने वाले लोगों ने यज्ञ में
द्वारों का सहारा लिया, अध्वर्युगण यज्ञ में प्राचीना जुहू एवं उपभृति को नदी के समान घी से
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सींचते हैं. वे अग्नि को इसी प्रकार चाटती हैं, जिस प्रकार गाय अपने बछड़े को चाटती है.
(५)
उत योषणे दिव्ये मही न उषासानक्ता सुदुघेव धेनुः.
बर्हिषदा पुरुहूते मघोनी आ यज्ञिये सुविताय श्रयेताम्.. (६)
युवा, दिव्य, महान्, कुशों पर बैठे हुए, बहुतों द्वारा स्तुत, संपत्ति के स्वामी एवं यज्ञ के
पात्र निशा-दिवस कामधेनु गाय के समान कल्याण के निमित्त हमारा आश्रय लें. (६)
विप्रा यज्ञेषु मानुषेषु कारू मन्ये वां जातवेदसा यजध्यै.
ऊर्ध्वं नो अध्वरं कृतं इवेषु ता देवेषु वनथो वार्याणि.. (७)
हे मेधावी, धनसंपन्न एवं मनुष्यों द्वारा किए जा रहे यज्ञों में काम करने वाले होताओ! मैं
यज्ञ करने के हेतु तुम्हारी स्तुति करता हूं. स्तुतियां पूर्ण हो जाने पर हमारे यज्ञ को देवों की
ओर प्रेरित करो एवं देवों के पास विद्यमान धन हमें दो. (७)
आ भारती भारतीभिः सजोषो इळा देवैर्मनुष्येभिरग्निः.
सरस्वती सारस्वतेभिरर्वाक् तिस्रो देवीर्बर्हिरिदं सदन्तु.. (८)
सूर्य की पत्नी भारती अर्थात् अग्नि सूर्यसंबंधियों तथा इस मनुष्यलोक के देवों के साथ
आवें. सरस्वती मध्यस्थित देवों के साथ पधारें. तीनों देवियां यज्ञ में कुशों पर बैठें. (८)
तन्नस्तुरीपमध पोषयित्नु देव त्वष्टर्वि रराणः स्यस्व.
यतो वीरः कर्मण्यः सुदक्षो युक्तग्रावा जायते देवकामः.. (९)
हे त्वष्टा देव! तुम प्रसन्न होते हुए ऐसा शीघ्रताकारक एवं पोषक वीर्य हमें प्रदान करो,
जिसके द्वारा हम कार्यकुशल, शक्तिशाली, सोम निचोड़ने हेतु पत्थर उठाने वाले, देवाभिलाषी
एवं वीरपुत्र उत्पन्न करें. (९)
वनस्पतेऽव सृजोप देवानग्निर्हविः शमिता सूदयाति.
सेदु होता सत्यतरो यजाति यथा देवानां जनिमानि वेद.. (१०)
हे वनस्पति! देवों को हमारे पास लाओ. अग्निरूप वनस्पति संस्कारक होकर देवों के
प्रति हव्य को प्रेरित करें. वे ही देवों के बुलाने वाले बनकर यज्ञ करते हैं. वे देवों का जन्म
जानते हैं. (१०)
आ याह्यग्ने समिधानो अर्वाङ् इन्द्रेण देवैः सरथं तुरेभिः.
बर्हिर्न आस्तामदितिः सुपुत्रा स्वाहा देवा अमृता मादयन्ताम्.. (११)
हे प्रज्वलित अग्नि! तुम इंद्र एवं शीघ्रता करने वाले अन्य देवों के साथ एक रथ पर
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बैठकर हमारे सामने आओ. शोभनपुत्रों वाली अदिति हमारे कुशों पर बैठें. मरणरहित देवगण
स्वाहा के साथ एकाकार बनकर प्रसन्न हों. (११)
सूक्त—३ देवता—अग्नि
अग्निं वो देवमग्निभिः सजोषा यजिष्ठं दूतमध्वरे कृणुध्वम्.
यो मर्त्येषु निध्रुविॠतावा तपुर्मूर्धा घृतान्नः पावकः.. (१)
हे देवो! तुम अन्य अग्नियों के साथ प्रकाशित एवं अतिशय यज्ञपात्र उन अग्नि देव को
यज्ञों में देवों का दूत बनाओ, जो मनुष्यों में अधिक स्थिर, यज्ञयुक्त, तापसहित तेज वाले,
घृतयुक्त अन्न वाले व शुद्धिकर्त्ता हैं. (१)
प्रोथदश्वो न यवसेऽविष्यन्यदा महः संवरणाद्व्यस्थात्.
आदस्य वातो अनु वाति शोचिरध स्म ते व्रजनं कृष्णमस्ति.. (२)
जिस समय दारुरूप अग्नि घास खाते एवं हिनहिनाने वाले घोड़ों के समान पेड़ों में
स्थित रहते हैं, उस समय उनकी दीप्ति वायु के सहारे प्रकाशित होती है. हे अग्नि! इसके
पश्चात् तुम्हारा मार्ग काले रंग का हो जाता है. (२)
उद्यस्य ते नवजातस्य वृष्णोऽग्ने चरन्त्यजरा इधानाः.
अच्छा द्यामरुषो धूम एति सं दूतो अग्न ईयसे हि देवान्.. (३)
हे नवजात एवं कामपूरक अग्नि! तुम्हारी जो धूमरहित ज्वालाएं उठती हैं, उनको प्रकट
करता हुआ धुआं आकाश में जाता है. हे अग्नि! तुम दूत बनकर देवों के पास जाते हो. (३)
वि यस्य ते पृथिव्यां पाजो अश्रेत्तृषु यदन्ना समवृक्त जम्भैः.
सेनेव सृष्टा प्रसितिष्ट एति यवं न दस्म जुह्वा विवेक्षि.. (४)
हे अग्नि! जिस समय तुम ज्वलारूपी दांतों से काष्ठरूपी अन्न को खाते हो, उस समय
तुम्हारा तेज शीघ्रता से धरती पर फैलता है. तुम्हारी ज्वाला सेना के समान उन्मुक्त होकर
जाती है. हे दर्शनीय अग्नि! तुम अपनी ज्वालाओं से काष्ठों में जौ आदि के समान प्रवेश करते
हो. (४)
तमिद्दोषा तमुषसि यविष्ठमग्निमर्त्यं न मर्जयन्त नरः.
निशिशाना अतिथिमस्य योनौ दीदाय शोचिराहुतस्य वृष्णः.. (५)
अतिशय युवा अतिथि के समान पूज्य अग्नि को यज्ञशाला में रात-दिन प्रज्वलित करते
हुए लोग सततगामी अश्व के समान उनकी पूजा करते हैं. बुलाए हुए एवं अभिलाषापूरक
अग्नि की शिखा दीप्त होती है. (५)
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सुसन्दृक्ते स्वनीक प्रतीकं वि यद्द्युक्मो न रोचस उपाके.
दिवो न ते तन्यतुरेति शुष्मश्चित्रो न सूरः प्रति चक्षि भानुम्.. (६)
हे शोभनतेज वाले अग्नि! तुम जिस समय सूर्य के समान हमारे पास विशेषरूप से
चमकते हो. उस समय तुम्हारा रूप भली-भांति दर्शनीय होता है. तुम्हारा तेज स्वर्ग से वज्र के
समान निकलता है. तुम सुंदर सूर्य के समान अपना प्रकाश फैलाते हो. (६)
यथा वः स्वाहाग्नये दाशेम परीळाभिर्घृतवद्भिश्च हव्यैः.
तेभिर्नो अग्ने अमितैर्महोभिः शतं पूर्भिरायसीभिर्नि पाहि.. (७)
हे अग्नि! हम जिस प्रकार गव्य एवं घी आदि मिले हव्य द्वारा स्वाहा शब्द के साथ तुम्हें
आहुति देते हैं, उसी प्रकार तुम असीमित तेजों के साथ लौहनिर्मित सौ नगरियों द्वारा हमारी
रक्षा करो. (७)
या वा ते सन्ति दाशुषे अधृष्टा गिरो वा याभिर्नृवतीरुरुष्याः.
ताभिर्नः सूनो सहसो नि पाहि स्मत्सूरीञ्जरितॄञ्जातवेदः.. (८)
हे बलपुत्र जातवेद एवं दानशील अग्नि! तुम अपनी शिखाओं एवं संतानयुक्त प्रजाओं
की रक्षा करने वाले वचनों द्वारा हमारी रक्षा करो तथा प्रशंसनीय हव्य देने वाले स्तोताओं की
रक्षा करो. (८)
निर्यत्पूतेव स्वधितिः शुचिर्गात् स्वया कृपा तन्वा३ रोचमानः.
आ यो मात्रोरुशेन्त्यो जनिष्ट देवयज्याय सुक्रतुः पावकः.. (९)
विशुद्ध अग्नि जिस समय अपनी विशाल कृपा से दीप्त होकर काष्ठ से तेज फरसे के
समान निकलते हैं, उस समय कमनीय, शोभनकर्मों वाले, पावक एवं मातारूप दो अरणियों
से उत्पन्न अग्नि यज्ञ के योग्य बनते हैं. (९)
एता नो अग्ने सौभगा दिदीह्यपि क्रतुं सुचेतसं वतेम.
विश्वा स्तोतृभ्यो गृणते च सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०)
हे अग्नि! हमें ये ही धन प्रदान करो. हम यज्ञकर्म करने वाला तथा उत्तम ज्ञानयुक्त पुत्र
प्राप्त करें. सारा धन स्तोताओं एवं गान करने वालों को मिले. तुम कल्याणसाधनों द्वारा
हमारी सदा रक्षा करो. (१०)
सूक्त—४ देवता—अग्नि
प्र वः शुक्राय भानवे भरध्वं हव्यं मतिं चाग्नये सुपूतम्.
यो दैव्यानि मानुषा जनूंष्यन्तर्विश्वानि विद्मना जिगाति.. (१)
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हे हव्यवहन करने वाले लोगो! तुम शुभ एवं दीप्ति के लिए शुद्ध हव्य एवं स्तुति समर्पित
करो. अग्नि देवों तथा मानवों से उत्पन्न सभी पदार्थों के मध्य अपनी बुद्धि द्वारा चलते हैं. (१)
स गृत्सो अग्निस्तरुणश्चिदस्तु यतो यविष्ठो अजनिष्ट मातुः.
सं यो वना युवते शुचिदन् भूरि चिदन्ना समिदत्ति सद्यः.. (२)
जो अतिशय युवा अग्नि मातारूप अरणियों से उत्पन्न हुए हैं, वे ही मेधावी अग्नि तरुण
बनें. दीप्ति ज्वालारूपी दांतों वाले अग्नि वनों को आत्मसात् करते हैं एवं शीघ्र ही बहुत से
अन्नों को खाते हैं. (२)
अस्य देवस्य संसद्यनीके यं मर्तासः श्येतं जगृभ्रे.
नि यो गृभं पौरुषेयीमुवोच दुरोकमग्निरयवे शुशोच.. (३)
मनुष्य शुभ्र अग्नि को प्रमुख स्थान में गृहीत करते हैं. अग्नि मनुष्यों द्वारा की गई सेवा
स्वीकार करते हैं. वे मानवों के कल्याण के लिए इस प्रकार दीप्त होते हैं कि शत्रु उन्हें सहन
नहीं कर पाते. (३)
अयं कविरकविषु प्रचेता मर्तेष्वग्निरमृतो नि धायि.
स मा नो अत्र जुहुरः सहस्वः सदा त्वे सुमनसः स्याम.. (४)
कवि, प्रकाशक एवं मरणरहित अग्नि अकवि एवं मरणधर्मा लोगों में विराजमान हैं. हे
शक्तिशाली अग्नि! हम लोक में तुम्हारे प्रति शोभनमन वाले हों. तुम हमारी हिंसा मत करना.
(४)
आ यो योनिं देवकृतं ससाद क्रत्वा ह्य१ग्निरमृताँ अतारीत्.
तमोषधीश्च वनिनश्च गर्भं भूमिश्च विश्वधायसं बिभर्ति.. (५)
अग्नि ने बुद्धि द्वारा देवों को तारा है. वे देवों द्वारा बनाए हुए स्थान पर बैठते हैं.
ओषधियां, वृक्ष एवं भूमि सबके धारणकर्त्ता एवं गर्भरूप को अपने में रखते हैं. (५)
ईशे ह्य१ग्निरमृतस्य भूरेरीशे रायः सुवीर्यस्य दातोः.
मा त्वा वयं सहसावन्नवीरा माप्सवः परि षदाम मादुवः.. (६)
अग्नि अधिक मात्रा में अमृत देने में समर्थ हैं. वे उत्तम वीर्य वाला धन दे सकते हैं. हे
बलवान् अग्नि! हम संतानहीन, रूपरहित एवं बिना सेवा के न बैठें. (६)
परिषद्यं ह्यररणस्य रेक्णो नित्यस्य रायः पतयः स्याम.
न शेषो अग्ने अन्यजातमस्त्यचेतानस्य मा पथो वि दुक्षः.. (७)
ऋणरहित व्यक्ति का धन पर्याप्त होता है. हम नित्य धन के स्वामी हों. हे अग्नि! हमारी
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संतान दूसरों से उत्पन्न नहीं है. तुम हमारा मार्ग अज्ञानियों का मत समझो. (७)
नहि ग्रभायारणः सुशेवोऽन्योदर्यो मनसा मन्तवा उ.
अधा चिदोकः पुनरित्स एत्या नो वाज्यभीषाळेतु नव्यः.. (८)
अन्य से उत्पन्न पुत्र प्रसन्नता एवं सुख देने वाला होने पर भी मन से पुत्ररूप में ग्रहण
नहीं होता. वह अपने ही स्थान पर पहुंच जाता है. अन्न का स्वामी, शत्रुओं को हराने वाला एवं
नव उत्पन्न पुत्र हमारे समीप आवे. (८)
त्वमग्ने वनुष्यतो नि पाहि त्वमु नः सहसावन्नवद्यात्.
सं त्वा ध्वस्मन्वदभ्येतु पाथः सं रयिः स्पृहयाय्यः सहसी.. (९)
हे अग्नि! तुम हिंसक से हमारी रक्षा करो. हे शक्तिशाली अग्नि! तुम हमें पाप से
बचाओ. दोषरहित अन्न हवि के रूप में तुम्हें प्राप्त हो. हमें हजारों प्रकार का अभिलषणीय
धन मिले. (९)
एता नो अग्ने सौभगा दिदीह्यपि क्रतुं सुचेतसं वतेम.
विश्वा स्तोतृभ्यो गृणते च सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०)
हे अग्नि! हमें ये ही धन प्रदान करो. हम यज्ञकर्म करने वाला तथा उत्तम ज्ञानयुक्त पुत्र
प्राप्त करें. सारा धन स्तोताओं और गान करने वालों को मिले. तुम कल्याणसाधनों द्वारा
हमारी सदा रक्षा करो. (१०)
सूक्त—५ देवता—वैश्वानर अग्नि
प्राग्नये तवसे भरध्वं गिरं दिवो अरतये पृथिव्याः.
यो विश्वेषाममृतानामुपस्थे वैश्वानरो वावृधे जागृवद्भिः.. (१)
हे स्तोताओ! प्रवृद्ध एवं अंतरिक्ष व धरती पर चलने वाले अग्नि की स्तुति करो. वे
वैश्वानर अग्नि यज्ञ में जागने वाले मरणरहित देवों के साथ बढ़ते हैं. (१)
पृष्टो दिवि धाय्यग्निः पृथिव्यां नेता सिन्धूनां वृषभः स्तियानाम्.
स मानुषीरभि विशो वि भाति वैश्वानरो वावृधानो वरेण.. (२)
सरिताओं के नेता, जलों को बरसाने वाले एवं तेजयुक्त जो अग्नि धरती और आकाश में
गतिशील होते हैं, वे ही वैश्वानर अग्नि उत्तम हव्य के द्वारा बढ़ते हुए मानव प्रजाओं के सामने
शोभा पाते हैं. (२)
त्वद्विया विश आयन्नसिक्नीरसमना जहतीर्भोजनानि.
वैश्वानर पूरवे शोशुचानः पुरो यदग्ने दरयन्नदीदेः.. (३)
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हे वैश्वानर अग्नि! उस समय तुम्हारे भय से काले रंग की प्रजाएं आपस में बिखरकर
भोजन त्यागती हुई भाग गई थीं, जिस समय तुमने दीप्त होकर राजा पुरु के कल्याण के लिए
उसके शत्रु के नगरों को जलाया था। (३)
तव त्रिधातु पृथिवी उत द्यौर्वैश्वानर व्रतमग्ने सचन्त.
त्वं भासा रोदसी आ ततन्थाजस्रेण शोचिषा शोशुचान:.. (४)
हे वैश्वानर अग्नि! धरती, आकाश और स्वर्ग-तीनों तुम्हें प्यारा लगने वाला काम करते
हैं. तुम नित्य तेज से दीप्तिमान होकर धरती-आकाश को विस्तृत करते हो. (४)
त्वामग्ने हरितो वावशाना गिर: सचन्ते धुनयो घृताची:.
पतिं कृष्टीनां रथ्यं रयीणां वैश्वानरमुषसां केतुमह्नाम्.. (५)
हे वैश्वानर अग्नि! तुम प्रजाओं के स्वामी, धनों के नेता तथा उषाओं व दिवसों के केतु
हो. तुम्हारी कामना करते हुए अश्व एवं मानवों की पापरहित तथा हव्ययुक्त स्तुतियां तुम्हारी
सेवा करती हैं. (५)
त्वे असुर्यं१ वसवो न्यृण्वन्क्रतुं हि ते मित्रमहो जुषन्त.
त्वं दस्यूँरोकसो अग्न आज उरु ज्योतिर्जनयन्नार्याय.. (६)
हे मित्रों की पूजा करने वाले अग्नि! वसुओं ने तुम में बल धारण किया है एवं तुम्हारे
यज्ञ को स्वीकार किया है. तुम यज्ञकर्त्ता के लिए अधिक तेज उत्पन्न करते हुए दस्युओं को
उनके स्थान से निकालो. (६)
स जायमान: परमे व्योमन्वायोर्न पाथ: परि पासि सद्य:.
त्वं भुवना जनयन्नभि क्रन्नपत्याय जातवेदो दशस्यन्.. (७)
हे वैश्वानर! परम व्योम में तुम सूर्यरूप से उत्पन्न होकर वायु के समान सबसे पहले
सोमरस पीते हो. हे जातवेद अग्नि! तुम जलों को उत्पन्न करते हुए एवं पुत्रवत् पालनीय
यजमान की अभिलाषाएं पूरी करते हुए बिजली के रूप में गरजते हो. (७)
तामग्ने अस्मे इषमेरयस्व वैश्वानर द्युमतीं जातवेद:.
यया राध: पिन्वसि विश्ववार पृथु श्रवो दाशुषे मर्त्याय.. (८)
हे जातवेद, सबके द्वारा वरणीय एवं वैश्वानर अग्नि! तुम हमें वही दीप्तिमान अन्न दो,
जिसके द्वारा तुम धन की रक्षा करते हो एवं हव्यदाता मनुष्य को विस्तृत कीर्ति देते हो. (८)
तं नो अग्ने मघवद्भ्य: पुरुक्षुं रयिं नि वाजं श्रुत्यं युवस्व.
वैश्वानर महि न: शर्म यच्छ रुद्रेभिरग्ने वसुभि: सजोषा:.. (९)
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सूक्त—६ देवता—वैश्वानर अग्नि

हे अग्नि! हम धनस्वामियों को बहुत सा अन्न, धन एवं प्रसिद्ध बल दो. हे वैश्वानर अग्नि!
तुम रुद्रों एवं वसुओं के साथ समान प्रीति-वाले होकर हमें महान् सुख दो. (९)
सूक्त—६ देवता—वैश्वानर अग्नि
प्र सम्राजो असुरस्य प्रशस्तिं पुंसः कृष्टीनामनुमाद्यस्य.
इन्द्रस्येव प्र तवसस्कृतानि वन्दे दारुं वन्दमानो विवक्मि.. (१)
मैं शत्रुनगरियों को नष्ट करने वाले की वंदना करता हूं. मैं वंदना करता हुआ सारे लोक
के स्वामी, बलवान्, वीर एवं प्रजाओं के स्तुतियोग्य और बलवान् इंद्र के समान वैश्वानर अग्नि
के कर्मों एवं स्तुतियों को कहता हूं. (१)
कविं केतुं धासिं भानुमद्रेर्हिन्वन्ति शं राज्यं रोदस्योः.
पुरन्दरस्य गीर्भिराववासेऽग्नेर्व्रतानि पूर्व्या महानि.. (२)
देव प्राज्ञ, केतुरूप, पर्वत धारण करने वाले, दीप्तियुक्त करने वाले, सुखकर एवं धरती-
आकाश के राजा अग्नि को प्रसन्न करते हैं. मैं स्तुति द्वारा शत्रुनगरियों को नष्ट करने वाले
अग्नि के प्राचीन एवं महान् कार्यों को स्तुतिवचनों द्वारा गाता हूं. (२)
न्यक्रतून् ग्रथिनो मृध्रवाचः पर्णीरश्रद्धाँ अवृधाँ अयज्ञान्.
प्रप्र तान्दस्यूँरग्निर्विवाय पूर्वश्चकारापरां अयज्यून्.. (३)
अग्नि यज्ञ न करने वाले, केवल बातें करने वाले, वचनों द्वारा हिंसा करने वाले,
श्रद्धारहित व स्तुतियों द्वारा वृद्धि न करने वाले प्राणियों को दूर भगावें एवं प्रमुख बनकर
अन्य यज्ञशून्यों को नीचा बनावें. (३)
यो अपाचीने तमसि मदन्तीः प्राचीश्चकार नृतमः शचीभिः.
तमीशानं वस्वो अग्निं गृणीषेऽनानतं दमयन्तं पृतन्यून्.. (४)
जिन अतिशय नेता अग्नि ने प्रकाशरहित अंधकार में पड़ी प्रजाओं को प्रसन्न करके
अपनी बुद्धि से सरलपथगामिनी बनाया, मैं उन्हीं धनस्वामी तथा नम्रतारहित एवं
युद्धाभिलाषियों का दमन करने वाले अग्नि की स्तुति करता हूं. (४)
यो देह्यो३ अनमयद्वधस्नैर्यो अर्यपत्नीरुषसश्चकार.
स निरुध्या नहुषो यह्वो अग्निर्विशश्चक्रे बलिहृतः सहोभिः.. (५)
जिन अग्नि ने आसुरी विद्याओं को आयुधों द्वारा हीन बनाया है एवं सूर्यपत्नी उषा को
उत्पन्न किया है, उन्हीं महान् अग्नि ने बल द्वारा प्रजाओं को रोककर राजा नहुष को कर देने
वाला बनाया था. (५)
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यस्य शर्मन्नुप विश्वे जनास एवैस्तस्थुः सुमतिं भिक्षमाणाः.
वैश्वानरो वरमा रोदस्योरग्निः ससाद पित्रोरुपस्थम्.. (६)
सभी मनुष्य सुखप्राप्ति के निमित्त जिस वैश्वानर अग्नि की कृपा की प्रार्थना करते हुए
हव्यों एवं कर्मों के साथ उपस्थित होते हैं, वे ही अपने माता-पिता के समान स्वर्ग और धरती
के बीच में उपस्थित अंतरिक्ष में आए थे. (६)
आ देवो ददे बुध्या३ वसूनि वैश्वानर उदिता सूर्यस्य.
आ समुद्रादवरादा परस्मादग्निर्देदे दिव आ पृथिव्याः.. (७)
सूर्य निकल आने पर वैश्वानर अग्नि अंतरिक्ष के अंधकार को ले लेते हैं. वे अंतरिक्ष,
धरती एवं स्वर्ग से भी अंधकार ले लेते हैं. (७)
सूक्त—७ देवता—अग्नि
प्र वो देवं चित् सहसानमग्निमश्वं न वाजिनं हिषे नमोभिः.
भवा नो दूतो अध्वरस्य विद्वान्त्मना देवेषु विविदे मितद्रुः.. (१)
हे राक्षसों को हराने वाले तथा अश्व के समान वेगशाली अग्नि देव! हम हव्य द्वारा तुम्हें
यज्ञ का दूत बनाते हैं. हे विद्वान् अग्नि! तुम देवों में वृक्ष जलाने वाले के नाम से प्रसिद्ध हो.
(१)
आ याह्यग्ने पथ्या३अनु स्वा मन्द्रो देवानां सख्यं जुषाणः.
आ सानु शुष्मैर्नदयन्पृथिव्या जम्भेभिर्विश्वमुशधग्वनानि.. (२)
हे प्रसन्न करने वाले अग्नि! तुम देवों के साथ मित्रता का आचरण करते हुए अपने तेजों
द्वारा धरती पर ऊंचे लताकुंजों को शब्दपूर्ण करो तथा अपने ज्वालारूपी दांतों से वनों को
जलाते हुए अपने मार्ग से आओ. (२)
प्राचीनो यज्ञः सुधितं हि बर्हिः प्रीणीते अग्निरीळितो न होता.
आ मातरा विश्ववारे हुवानो यतो यविष्ठ जज्ञिषे सुशेवः.. (३)
हे अतिशय युवा अग्नि! जब तुम शोभन सुखपूर्वक जन्म लेते हो, तब यज्ञ का भली
प्रकार अनुष्ठान किया जाता है एवं कुश बिछाए जाते हैं. स्तुति सुनकर अग्नि और होता तृप्त
होते हैं. सबके प्रिय धरती आकाश भी बुलाए जाते हैं. (३)
सद्यो अध्वरे रथिरं जनन्त मानुषासो विचेतसो य एषाम्.
विशामधायि विशपतिर्दुरोणे३ग्निर्मन्द्रो मधुवचा ऋतावा.. (४)
विशेष विद्वान् लोग यज्ञ में नेता अग्नि को तुरंत उत्पन्न करते हैं. यज्ञकर्त्ताओं का हव्य
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वहन करने वाले, विश्वपति, प्रसन्नकर्त्ता, मधुर वचन वाले एवं यज्ञयुक्त अग्नि मनुष्यों के घर में
स्थापित होते हैं. (४)
असादि वृतो वह्निराजगन्वानग्निर्ब्रह्मा नृषदने विधर्ता.
द्यौश्च यं पृथिवी वावृधाते आ यं होता यजति विश्ववारम्.. (५)
होतारूप से हव्य ढोने वाले, ब्रह्मा, सबको धारण करने वाले एवं स्वर्गलोक से आए हुए
वे अग्नि मानवों के घरों में बैठे हैं, जिन्हें स्वर्ग व धरती बढ़ाते हैं और होता जिन सर्वप्रिय
अग्नि का यज्ञ करता है. (५)
एते द्युम्नेभिर्विश्वमातिरन्त मन्त्रं ये वारं नर्या अतक्षन्.
प्र ये विशस्तिरन्त श्रोषमाणा आ ये मे अस्य दीधयन्नृतस्य.. (६)
वे लोग अन्नों द्वारा विश्व को पालते हैं, जिन्होंने स्तुतियोग्य मंत्रों का पर्याप्त संस्कार
किया है, जिन लोगों ने सुनने की इच्छा से अग्नि को बढ़ाया है एवं सत्यभूत अग्नि को
जलाया है. (६)
नू त्वामग्न ईमहे वसिष्ठा ईशानं सूनो सहसो वसूनाम्.
इषं स्तोतृभ्यो मघवद्भ्य आनड्युयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
हे बलपुत्र एवं वसुओं के स्वामी अग्नि! वसिष्ठगोत्रीय ऋषियों को जो तुम्हारे स्तोता एवं
हवियुक्त हैं. तुम अन्न द्वारा शीघ्र प्राप्त करो एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (७)
सूक्त—८ देवता—अग्नि
इन्धे राजा समर्यो नमोभिर्यस्य प्रतीकमाहुतं घृतेन.
नरो हव्येभिरीळते सबाध अग्निरग्र उषासामशोचि.. (१)
दीप्त एवं हवि के स्वामी अग्नि स्तुतियों के साथ प्रज्वलित होते हैं. उनका रूप घृत द्वारा
बुलाया जाता है एवं नेता जन एकत्र हव्य के साथ उनकी स्तुति करते हैं. अग्नि उषा के आगे
भली प्रकार जलते हैं. (१)
अयमु ष्य सुमहाँ अवेदि होता मन्द्रो मनुषो यह्वो अग्निः.
वि भा अकः ससृजानः पृथिव्यां कृष्णपविरोषधीभिर्ववक्षे.. (२)
देवों को खुलाने वाले, प्रसन्नताकारक एवं महान् अग्नि मानवों द्वारा विशाल जाने जाते
हैं एवं प्रकाश फैलाते हैं. काले मार्ग वाले अग्नि धरती पर उत्पन्न होकर ओषधियों की
सहायता से बढ़ते हैं. (२)
कया नो अग्ने वि वसः सुवृक्तिं कामु स्वधामृणवः शस्यमानः.
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कदा भवेम पतयः सुदत्र रायो वन्तारो दुष्टरस्य साधोः.. (३)
हे अग्नि! तुम हवि के कारण हमारी स्तुति को स्वीकार करोगे. हमारी स्तुति सुनकर तुम
किस स्वधा को पाओगे? हे शोभनदान वाले अग्नि! हम ऐसे धन के स्वामी एवं विभाग करने
वाले कब बनेंगे जो शत्रुओं द्वारा हिंसित न हो सके और पर्याप्त हो? (३)
प्रप्रायमग्निर्भरतस्य शृण्वे वि यत्सूर्यो न रोचते बृहद्भाः.
अभि यः पूरुं पृतनासु तस्थौ द्युतानो दैव्यो अतिथिः शुशोच.. (४)
प्रसिद्ध अग्नि यजमान द्वारा उस समय प्रसिद्ध होते हैं, जिस समय वे सूर्य के समान
अधिक तेजस्वी होकर चमकते हैं. जिन अग्नि ने युद्धों में पुरु को हराया था वे दीप्तिशाली एवं
देवों के अतिथि अग्नि प्रज्वलित हुए. (४)
असन्नित्त्वे आहवनानि भूरि भुवो विश्वेभिः सुमना अनीकैः.
स्तुतश्चिदग्ने शृण्विषे गृणानः स्वयं वर्धस्व तन्वं सुजात.. (५)
हे अग्नि! तुम में बहुत सी आहुतियां होती हैं. तुम समस्त तेजों के साथ प्रसन्नमन बनो
एवं स्तोता की स्तुतियां सुनो. हे शोभनजन्म वाले अग्नि! तुम स्तुत होकर स्वयं अपना शरीर
बढ़ाओ. (५)
इदं वचः शतसाः संसहस्रमुदग्नये जनिषीष्ट द्विबर्हाः.
शं यत्स्तोतृभ्य आपये भवाति द्युमदमीवचातनं रक्षोहा.. (६)
सौ गायों का विभाग करने वाले, हजार गायों से युक्त एवं विद्या व कर्म के द्वारा महान्
वसिष्ठ ने यशस्कर, रोगनिवारक, राक्षसों का नाश करने वाला, स्तोताओं व पुत्रादि को सुख
देने वाला यह स्तोत्र अग्नि के प्रति रचा है. (६)
नू त्वामग्न ईमहे वसिष्ठा ईशानं सूनो सहसो वसूनाम्.
इषं स्तोतृभ्यो मघवद्भ्य आनड्युयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
हे बलपुत्र एवं वसुओं के स्वामी अग्नि! वसिष्ठगोत्रीय ऋषियों को जो हवियुक्त एवं
तुम्हारे स्तोता हैं, तुम अन्न द्वारा शीघ्र प्राप्त करो एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो.
(७)
सूक्त—९ देवता—अग्नि
अबोधि जार उषसामुपस्थाद्धोता मन्द्रः कवितमः पावकः.
दधाति केतुमुभयस्य जन्तोर्हव्या देवेषु द्रविणं सुकृत्सु.. (१)
सब प्राणियों को पुराना बनाने वाले, देवों को बुलाने वाले, प्रसन्नताकारक, अतिशय
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