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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

हे सर्वप्रिय अग्नि! तुम हमारे यज्ञ में गृहपति हो. तुम ही होता, पोता और विशिष्ट ज्ञान वाले हो. तुम उत्तम हव्य का यजन एवं भक्षण करो. (५) कृधि रत्नं यजमानाय सुक्रतो त्वं हि रत्नधा असि. आ न ऋते शिशीहि विश्वमृत्विजं सुशंसो यश्च दक्षते.. (६) हे शोभन कर्म वाले अग्नि! तुम यजमान को रत्न दो, क्योंकि तुम रत्न देने वाले हो. हमारे यज्ञ में सब ऋत्विजों को कुशल बनाओ एवं बढ़ने वाले होता को बढ़ाओ. (६) त्वे अग्ने स्वाहुत प्रियासः सन्तु सूरयः. यन्तारो ये मघवानो जनानामूर्वान्दयन्त गोनाम्.. (७) हे भली प्रकार बुलाए गए अग्नि! तुम्हारे स्तोता सबके प्रिय बनें. जो धनसंपन्नदाता मानवों एवं गायों का दान करते हैं, वे भी प्रिय बनें. (७) येषामिळा घृतहस्ता दुरोण आँ अपि प्राता निषीदति. ताँस्त्रायस्व सहस्य द्रुहो निदो यच्छा नः शर्म दीर्घश्रुत्.. (८) हे बलपुत्र अग्नि! उन घरों को द्रोह और निंदा करने वालों से बचाओ, जिन में हाथों में घी लिए हुए अन्नरूपिणी देवी पूर्णरूप से बैठती हैं. हमें बहुत समय तक सुनने योग्य सुख दो. (८) स मन्द्रया च जिह्वया वह्निरासा विदुष्टरः. अग्ने रयिं मघवद्भ्यो न आ वह हव्यदातिं च सूदय.. (९) हे हव्यवहन करने वाले एवं अतिशय विद्वान् अग्नि! अपनी प्रसन्न करने वाली एवं मुख में रहने वाली जीभ के द्वारा हम हव्यधारकों को धन दो एवं हव्य देने वाले को यज्ञकर्मों में लगाओ. (९) ये राधांसि ददत्यश्व्या मघा कामेन श्रवसो महः. ताँ अंहसः पिपृहि पर्तृभिष्ट्वं शतं पूर्भिर्यविष्ठ्य.. (१०) हे अतिशय युवा अग्नि! जो यजमान विशाल यश की कामना से सिद्ध करने वाले एवं अश्वरूप हव्य देते हैं, उन्हें पाप से बचाओ एवं रक्षासाधनरूपी सौ नगरियों द्वारा उनका पालन करो. (१०) देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम्. उद्वा सिञ्चध्वमुप वा पृणध्वमादिद्धो देव ओहते.. (११) हे यजमान! धन देने वाले अग्नि देव तुम्हारे हव्य से भरे हुए सुच की इच्छा करते हैं. तुम ebook converter DEMO Watermarks*

सोमरस से पात्र भरो और सोमरस का दान करो. इसके बाद अग्नि देव तुम्हें धारण करेंगे. (११) तं होतारमध्वरस्य प्रचेतसं वह्निं देवा अकृण्वत. दधाति रत्नं विधते सुवीर्यमग्निर्जनाय दाशुषे.. (१२) देवों ने उत्तम बुद्धि अग्नि को यज्ञ वहन करने वाला एवं बुलाने वाला बनाया है. अग्नि सेवा करने वाले एवं हव्य देने वाले व्यक्ति को शोभन वीर्य वाला धन दें. (१२) सूक्त—१७ देवता—अग्नि अग्ने भव सुषमिधा समिद्ध उत बर्हिरुर्विया वि स्तृणीताम्.. (१) हे अग्नि! तुम शोभन-समिधाओं द्वारा प्रज्वलित बनो. अध्वर्यु कुश फैलावें. (१) उत द्वार उशतीर्वि श्रयन्तामुत देवाँ उशत आ वहेह.. (२) हे अग्नि! देवों की कामना करने वाले यज्ञशालाद्वारों का आश्रय लो एवं यज्ञ की कामना करने वाले देवों को इस यज्ञ में लाओ. (२) अग्ने वीहि हविषा यक्षि देवान्त्स्वध्वरा कृणुहि जातवेदः.. (३) हे जातवेद अग्नि! तुम देवों के सामने जाओ, हवि द्वारा देवों का यज्ञ करो और उन्हें शोभनयज्ञ वाला बनाओ. (३) स्वध्वरा करति जातवेदा यक्षद्देवाँ अमृतान्यिप्रयच्च.. (४) हे जातवेद अग्नि! तुम मरणरहित देवों को शोभनयज्ञ वाला करो, हवि से उनका यज्ञ करो और उन्हें स्तोत्रों से प्रसन्न करो. (४) वंस्व विश्वा वार्याणि प्रचेतः सत्या भवन्त्वाशिषो नो अद्य.. (५) हे विशिष्ट बुद्धि वाले अग्नि! हमें सब संपत्तियां दो. हमारे आशीर्वाद आज सच्चे हों. (५) त्वामु ते दधिरे हव्यवाहं देवासो अग्न ऊर्जा आ नपातम्.. (६) हे बलपुत्र अग्नि! तुम्हें उन्हीं देवों ने हव्य वहन करने वाला बनाया है. (६) ते ते देवाय दाशतः स्याम महो नो रत्ना वि दध इयानः.. (७) हे दीप्तिशाली अग्नि! हम हव्यदाताओं को याचना करने पर महान् धन दो. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१८ देवता—इंद्र व सुदास

सूक्त—१८ देवता—इंद्र व सुदास त्वे ह यत्पितरश्चिन्न इन्द्र विश्वा वामा जरितारो असन्वन्. त्वे गावः सुदुघास्त्वे ह्यश्वास्त्वं वसु देवयते वनिष्ठः.. (१) हे इंद्र! हमारे पितरों ने तुम्हारा स्तुतिकर्त्ता बनकर समस्त उत्तम धनों को प्राप्त किया था. तुम्हारी गाएं सरलता से दुही जाने वाली हैं एवं तुम अश्वों के स्वामी हो. तुम देवों के अभिलाषियों को अधिक देते हो. (१) राजेव हि जनिभिः क्षेष्येवाव द्युभिरभि विदुष्कविः सन्. पिशा गिरो मघवन् गोभिरश्वैस्त्वायतः शिशीहि राये अस्मान्.. (२) हे इंद्र! तुम अपनी पत्नियों के साथ राजा के समान शोभा पाते हो. हे विद्वान् एवं कवि इंद्र! स्तोताओं को स्वर्ण आदि धन, गायों एवं अश्वों से सभी प्रकार संपन्न बनाओ. हम तुम्हारे अभिलाषी हैं. तुम धनप्राप्ति के लिए हमारा संस्कार करो. (२) इमा उ त्वा पस्पृधानासो अत्र मन्द्रा गिरो देवयन्तीरुप स्थुः. अर्वाची ते पथ्या राय एतु स्याम ते सुमताविन्द्र शर्मन्.. (३) हे इंद्र! इस यज्ञ में परस्पर स्पर्धा करती हुई एवं प्रसन्न करने वाली स्तुतियां तुम्हारे पास जाती हैं. तुम्हारे धन का मार्ग हमारी ओर हो. तुम्हारी कृपा से हम सुखी हों. (३) धेनुं न त्वा सूयवसे दुदुक्षन्नुप ब्रह्माणि ससृजे वसिष्ठः. त्वामिन्मे गोपतिं विश्व आहा न इन्द्रः सुमतिं गन्तवच्छ.. (४) हे इंद्र! जिस प्रकार उत्तम घास वाली गोशाला में गाय को दुहा जाता है, उसी प्रकार तुम्हें दुहने की इच्छा से वसिष्ठ ने स्तोत्ररूपी बछड़ा बनाया है. संसारभर तुम्हें ही गायों का स्वामी कहता है. तुम हमारी शोभनस्तुति के समीप आओ. (४) अर्णांसि चित्प्रथना सुदास इन्द्रो गाधान्यकृणोत्सुपारा. शर्धन्तं शिम्युमुचथस्य नव्यः शापं सिन्धूनामकृणोदशस्तीः.. (५) हे स्तुतियोग्य इंद्र! तुमने सुदास राजा के लिए परुष्णी नदी की भयानक धारा को भी उथला और सरलता से पार करने योग्य बनाया था. तुमने स्तोता के प्रति उस शाप को नष्ट किया था, जो नदियों में बाढ़ लाता है एवं उनका प्रवाह रोकता है. (५) पुरोळा इत्तुर्वशो यक्षुरासीद्राये मत्यासो निशिता अपीव. श्रुष्टिं चक्रुर्भृगवो द्रुह्यवश्च सखा सखायमतरद्विषूचोः.. (६) तुर्वश नाम के एक यज्ञकुशल एवं अग्रगामी राजा थे. जल में मछली के समान नियंत्रित ebook converter DEMO Watermarks*

रहने पर भी भृगुवंशी एवं द्रुह्युवंशी योद्धाओं ने सुदास एवं तुर्वश को आमने-सामने कर दिया. इंद्र ने इन दोनों में से अपने मित्र सुदास का उद्धार कर दिया एवं तुर्वश को मार डाला. (६) आ पक्थासो भलानसो भनन्तालिनासो विषाणिनः शिवासः. आ योऽनयत्सधमा आर्यस्य गव्या तृत्सुभ्यो अजगन्धुधा नॄन्.. (७) हव्यों को पकाने वाले, भद्रमुख, तपस्या के कारण दुर्बल, हाथ में सींग लिए हुए एवं सारे संसार के कल्याणकारी लोग इंद्र की स्तुति करते हैं. इंद्र सोमपान से प्रमत्त होकर आर्यों की गाएं हिंसकों से छुड़ा लाए थे. इंद्र ने गाएं प्राप्त की थीं एवं युद्ध में शत्रुओं को मारा था. (७) दुराध्यो३ अदितिं सेवयन्तोऽचेतसो वि जगृभ्रे परुष्णीम्. मह्नाविष्यक् पृथिवीं पत्यमानः पशूष्कविरशयच्चायमानः. (८) बुरे विचारों वाले एवं मंदबुद्धि शत्रुओं ने विशाल परुष्णी नदी को खोदकर उसके तट गिरा दिए थे. इंद्र की कृपा से सुदास धरती पर विस्तृत हो गए और उन्होंने चायमान के पुत्र कवि को पालतू पशु के समान मारकर धरती पर सुला दिया था. (८) ईयुर्थं न न्यर्थं परुष्णीमाशुश्चनेदभिपित्वं जगाम. सुदास इन्द्रः सुतुकाँ अमित्रानरनध्यन्मनुषे वध्रिवाचः.. (९) इंद्र द्वारा किनारे ठीक करने पर परुष्णी नदी का जल उचित दिशा में बहने लगा, उसका इधर-उधर जाना रुक गया. सुदास का अश्व भी अपने मार्ग पर चला. इंद्र ने सुदास के कल्याण के लिए व्यर्थ बातें करने वाले शत्रुओं को संतानसहित वश में किया था. (९) ईयुर्गावो न यवसादगोपा यथाकृतमभि मित्रं चितासः. पृश्निगावः पृश्निनिप्रेषितासः श्रुष्टिं चक्रुर्नियुतो रन्तयश्च.. (१०) जिस प्रकार बिना ग्वाले की गाएं जौ के खेत की ओर जाती हैं, उसी प्रकार पृश्नि माता द्वारा भेजे गए एवं परस्पर सम्मिलित मरुद्गण पूर्व निश्चय के अनुसार अपने मित्र इंद्र की ओर गए थे. मरुतों के घोड़े भी प्रसन्न होकर इंद्र की ओर गए. (१०) एकं च यो विंशतिं च श्रवस्या वैकर्णयोर्जनान्राजा न्यस्तः. दस्मो न सद्मन्नि शिशाति बर्हिः शूरः सर्गमकृणोदिन्द्र एषाम्.. (११) राजा सुदास ने कीर्ति लाभ करने के लिए परुष्णी नदी के दोनों तटों पर बसे हुए इक्कीस मनुष्यों को मार डाला. युवा अध्वर्यु जिस प्रकार यज्ञशाला में कुशों को काटता है, उसी प्रकार सुदास ने शत्रुओं को काटा. इंद्र ने सुदास की सहायता के लिए मरुतों को उत्पन्न किया है. (११) अध श्रुतं कवषं वृद्धमप्स्वनु द्रुह्युं नि वृणग्वज्रबाहुः. ebook converter DEMO Watermarks*

वृणाना अत्र सख्याय सख्यं त्वायन्तो ये अमदन्ननु त्वा.. (१२) वज्रबाहु इंद्र ने श्रुत, कवष, वृद्ध व द्रुह्यु नाम के लोगों को पानी में डुबा दिया था. इस अवसर पर जिन्होंने तुम्हारी स्तुति की, उन्होंने मित्र बनकर तुम्हारी मित्रता प्राप्त की. (१२) वि सद्यो विश्वा दृंहितान्येषामिन्द्रः पुरः सहसा सप्त दर्दः. व्यानवस्य तृत्सवे गयं भाग्जेष्म पूरुं विदथे मृध्रवाचम्.. (१३) इंद्र ने श्रुत आदि की समस्त दृढ़ नगरियों एवं सात प्रकार के रक्षासाधनों को बल द्वारा नष्ट कर दिया था तथा अनु के पुत्र का धन तृत्सु को दे दिया था. हे इंद्र! हम युद्ध में कठोरवचन वाले शत्रु को जीत सकें. (१३) नि गव्यवोऽनवो द्रुह्यवश्च षष्टिः शता सुषुपुः षट् सहस्रा. षष्ठिर्वीरासो अधि षड् दुवोयु विश्वेदिन्द्रस्य वीर्या कृतानि.. (१४) गायों की अभिलाषा करने वाले अनु और द्रुह्यु के छियासठ हजार छियासठ वीर सैनिक इंद्र की सेवा के इच्छुक सुदास के कारण मारे गए थे. ये सब कार्य इंद्र की वीरता के हैं. (१४) इन्द्रेणैते तृत्सवो वेविषाणा आपो न सृष्टा अधवन्त नीचीः. दुर्मित्रासः प्रकलविन् मिमाना जहुर्विश्वानि भोजना सुदासे.. (१५) ये तृत्सु लोग इंद्र के बुरे मित्र एवं ज्ञानहीन हैं. ये इंद्र के साथ युद्ध करने लगे और युद्ध छोड़ने की इच्छा से इस प्रकार भागे, जैसे नीचे की ओर बहने वाला पानी दौड़ता है. सुदास के द्वारा रोकने पर उन्होंने प्रयोग की सब चीजें सुदास को दे दीं. (१५) अर्धं वीरस्य शृतपामनिन्द्रं परा शर्धन्तं नुनुदे अभि क्षाम्. इन्द्रो मन्युं मन्युम्यो मिमाय भेजे पथो वर्तनिं पत्यमानः.. (१६) इंद्र ने ऐसे लोगों को मारकर धरती पर गिरा दिया था जो शक्तिशाली सुदास के हिंसक थे, इंद्र को नहीं मानते थे, हव्य के पालक और उत्साही थे. इंद्र ने क्रोधियों का क्रोध समाप्त कर दिया. सुदास का शत्रु पलायन के मार्ग पर चला गया. (१६) आध्रेण चित्तद्वेकं चकार सिंह्यं चित्पेत्वेना जघान. अव सक्तीर्वेश्यावृश्चदिन्द्रः प्रायच्छद्विश्वा भोजना सुदासे.. (१७) इंद्र ने दरिद्र सुदास से उस समय एक काम कराया था. सिंह जैसे शत्रु को बकरे तुल्य सुदास से मरवाया, यूप, तुला शत्रुओं को सुई के समान सुदास से विद्ध कराया. इंद्र ने सब धन सुदास को दे दिया. (१७) शश्वन्तो हि शत्रवो रारधुष्टे भेदस्य चिच्छर्धतो विन्द रन्धिम्. ebook converter DEMO Watermarks*

मर्ताँ एनः स्तुवतो यः कृणोति तिग्मं तस्मिन्नि जहि वज्रमिन्द्र.. (१८) हे इंद्र! तुम्हारे बहुत से शत्रु तुम्हारे वश में हो गए हैं. उत्साही नास्तिक को वश में करो. नास्तिक तुम्हारी स्तुति करने वालों का अहित करता है. इसके विरुद्ध शक्तिशाली वीर को भेजो एवं उसे अपने वज्र से मारो. (१८) आवदिन्द्रं यमुना तृत्सवश्च प्रात्र भेदं सर्वताता मुषायत्. अजासश्च शिग्रवो यक्षवश्च बलिं शीर्षाणि जभ्रुरश्व्यानि.. (१९) इस युद्ध में इंद्र ने नास्तिक भेद को मारा था एवं यमुना ने तृत्सुओं व इंद्र को प्रसन्न किया था. अज, शिग्रु एवं यक्षु जनपद ने घोड़ों के सिर इंद्र को भेट में दिए थे. (१९) न त इन्द्र सुमतयो न रायः सञ्चक्षे पूर्वा उषसो न नूत्नाः. देवकं चिन्मान्यमानं जघन्थाव त्मना बृहतः शम्बरं भेत्.. (२०) हे इंद्र! तुम्हारी नवीन तथा प्राचीन कृपाएं एवं संपत्तियां उषा के द्वारा वर्णन नहीं की जा सकतीं. तुमने मान्यमान के पुत्र देवक का वध किया एवं बड़ा पहाड़ उठाकर शंबर का भेद किया. (२०) प्र ये गृहादममदुस्त्वाया पराशरः शतयातुर्वसिष्ठः. न ते भोजस्य सख्यं मृषन्ताधा सूरिभ्यः सुदिना व्युच्छान्.. (२१) हे इंद्र! अनेक राक्षसों को नष्ट करने वाले पराशर एवं वसिष्ठ ऋषि तुम्हारी कामना करके अपने घर को गए एवं उन्होंने तुम्हारी स्तुति की. वे अपने पालनकर्त्ता की अर्थात् तुम्हारी मित्रता नहीं भूले थे. उनके दिन सदा शोभन होते हैं. (२१) द्वे नप्तुर्देववतः शते गोर्द्वा रथा वधूमन्ता सुदासः. अर्हन्नग्ने पैजवनस्य दानं होतेव सद्म पर्येमि रेभन्.. (२२) हे अग्नि! मैंने इंद्र की स्तुति करके राजा देववान के नाती एवं पिजवन के पुत्र सुदास से रथ पाया था. मैं होता के समान यज्ञशाला में जाता हूं. (२२) चत्वारो मा पैजवनस्य दानाः स्मद्दिष्टयः कृशनिनो निरेके. ऋज्रासो मा पृथिविष्ठाः सुदासस्तोकं तोकाय श्रवसे वहन्ति.. (२३) पिजवन के पुत्र राजा सुदास को श्रद्धा एवं दान के प्रतिरूप, सोने के अलंकारों से सुशोभित, ऊंचे-नीचे स्थान में भी सीधे चलने वाले एवं पृथ्वी पर स्थित चार घोड़े पुत्र के समान पालनीय वसिष्ठ को पुत्र के यश के लिए ढोते हैं. (२३) यस्य श्रवो रोदसी अन्तरुर्वी शीर्णोशीर्णे विबभाजा विभक्ता. ebook converter DEMO Watermarks*

सप्तेदिन्द्रं न स्रवतो गृणन्ति नि युध्यामधिमशिशादभीके.. (२४) जिन सुदास का यश विस्तृत द्यावा-पृथिवी में फैला है, जिन्होंने दाता बनकर प्रत्येक श्रेष्ठ व्यक्ति को धन दिया है, उन सुदास की स्तुति सातों लोक इंद्र के समान करते हैं. नदियों ने युद्ध में युध्यामधि नामक शत्रु को मार डाला था. (२४) इमं नरो मरुतः सश्चतानु दिवोदासं न पितरं सुदासः. अविष्टना पैजवनस्य केतं दूणाशं क्षत्रमजरं दुवोयु.. (२५) हे नेता मरुतो! पिता दिवोदास के ही समान राजा सुदास की भी सेवा करो एवं पिजवन के पुत्र सुदास के घर की रक्षा करो. सुदास की सेना जरारहित एवं अविनाशी हो. (२५) सूक्त—१९ देवता—इंद्र यस्तिग्मशृङ्गो वृषभो न भीम एकः कृष्टीश्च्यावयति प्र विश्वाः. यः शश्वतो अदाशुषो गयस्य प्रयन्तासि सुष्वितराय वेदः.. (१) जो तीखे सींगों वाले एवं भयानक बैल के समान अकेले ही सारे शत्रुओं को भगा देते हैं एवं जो यज्ञ न करने वाले बहुत से लोगों के घर छीन लेते हैं, वे ही अतिशय सोमरस निचोड़ने वाले को धन देते हैं. (१) त्वं ह त्यदिन्द्र कुत्समावः शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्ये. दासं यच्छुष्णं कुयवं न्यस्मा अरन्धय आर्जुनेयाय शिक्षन्.. (२) हे इंद्र! तुमने उस समय शरीर से शुश्रूषा पाकर युद्ध में कुत्स की रक्षा की थी, जिस समय तुमने अर्जुनी के पुत्र कुत्स को धन देते हुए दास, शुष्ण और कुयव को वश में किया था. (२) त्वं धृष्णो धृषता वीतहव्यं प्रावो विश्वाभिरूतिभिः सुदासम्. प्र पौरुकुत्सिं त्रसदस्युमावः क्षेत्रसाता वृत्रहत्येषु पूरुम्.. (३) हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम अपने धर्षक वज्र द्वारा रक्षा के सभी साधन प्रयोग में लाकर हव्य देने वाले सुदास को बचाओ. भूमि के कारण होने वाले युद्ध में पुरुकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु एवं पुरु की रक्षा करो. (३) त्वं नृभिर्नृमणो देववीतौ भूरीणि वृत्रा हर्यश्व हंसि. त्वं नि दस्युं चुमुरिं धुनिं चास्वापयो दभीतये सुहन्तु.. (४) हे यज्ञ के नेताओं द्वारा स्तुतियोग्य इंद्र! तुमने संग्राम में मरुतों के साथ मिलकर बहुत से शत्रुओं को मारा था. हे हरि नामक अश्वों के स्वामी इंद्र! तुमने दभीति के कल्याण के लिए ebook converter DEMO Watermarks*

दस्यु, चुमुरि और धुनि को अपने वज्र द्वारा सुला दिया था. (४) तव च्यौत्नानि वज्रहस्त तानि नव यत्पुरो नवतिं च सद्यः. निवेशने शततमाविवेषीरहञ्च वृत्रं नमुचिमुताहन्.. (५) हे वज्रहस्त इंद्र! तुम्हारे बल ऐसे हैं कि तुमने शंबर की निन्यानवे नगरियों को तुरंत ही नष्ट कर डाला था. अपने निवास के लिए सौवीं नगरी में प्रवेश किया था तथा वृत्र और नमुचि को मारा था. (५) सना ता त इन्द्र भोजनानि रातहव्याय दाशुषे सुदासे. वृष्णे ते हरी वृषणा युनज्मि व्यन्तु ब्रह्माणि पुरुशाक वाजम्.. (६) हे इंद्र! हव्य देने वाले यजमान सुदास के लिए तुम्हारे द्वारा दिए हुए धन सनातन हुए थे. हे बहुकर्म वाले एवं अभिलाषापूरक इंद्र! तुम्हें लाने के लिए दो मनचाहे घोड़े मैं रथ में जोड़ता हूं. स्तुतियां तुम बलशाली के पास जावें. (६) मा ते अस्यां सहसावन्परिष्टावघाय भूम हरिवः परादै. त्रायस्व नोऽवृकेभिर्वरूथैस्तव प्रियासः सूरिषु स्याम.. (७) हे शक्तिशाली एवं अश्वस्वामी इंद्र! इस यज्ञ में हम आदान और पाप के भागी न बनें. हमें अपने बाधारहित रक्षासाधनों द्वारा बचाओ. हम तुम्हारे स्तोताओं में प्रिय हों. (७) प्रियास इत्ते मघवन्नभिष्टौ नरो मदेम शरणे सखायः. नि तुर्वशं नि याद्वं शिशीह्यतिथिग्वाय शंस्यं करिष्यन्.. (८) हे धनस्वामी इंद्र! तुम्हारे यज्ञों में हम स्तोताओं के नेता, तुम्हारे मित्र एवं प्रिय बनकर अपने घर में प्रसन्न हों. अतिथियों की पूजा करने वाले सुदास को सुख देते हुए तुर्वश एवं याद्व नामक राजाओं को वश में करो. (८) सद्यश्चिन्नु ते मघवन्नभिष्टौ नरः शंसन्त्युकथशास उक्था. ये ते हवेभिर्वि पर्णींरदाशन्नस्मान्वृणीष्व युज्याय तस्मै.. (९) हे धनस्वामी इंद्र! हम तुम्हारे यज्ञ में नेता और उक्थ बोलने वाले हैं. हम तुम्हें हव्य देने के साथ-साथ तुम्हें दान न देने वाले पणियों को भी दानशील बनाते हैं. तुम हमें मित्रता के लिए स्वीकार करो. (९) एते स्तोमा नरां नृतम तुभ्यमस्मद्रयञ्चो ददतो मघानि. तेषामिन्द्र वृत्रहत्ये शिवो भूः सखा च शूरोऽविता च नृणाम्.. (१०) हे नेताओं में श्रेष्ठ इंद्र! यज्ञ के नेताओं के इस समूह ने यज्ञों में हव्य देकर तुम्हें हमारी ebook converter DEMO Watermarks*

ओर उन्मुख बना दिया है. युद्ध में तुम उन्हीं नेताओं के कल्याणकारी, मित्र एवं रक्षक बनो. (१०) नू इन्द्र शूर स्तवमान ऊती ब्रह्मजूतस्तन्वा वावृधस्व. उप नो वाजान्मिमीह्युप स्तीन्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (११) हे शूर इंद्र! तुम स्तुतियां सुनकर और मंत्रों के भागी बनकर अपने शरीर से बढ़ो तथा हमें अन्न व घर दो. तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (११) सूक्त—२० देवता—इंद्र उग्रो जज्ञे वीर्याय स्वधावाञ्चक्रिरपो नर्यो यत्करिष्यन्. जग्मिर्युवा नृषदनमवोभिस्त्राता न इन्द्र एनसो महश्चित्.. (१) शक्तिशाली एवं ओजस्वी इंद्र अपना वीर्य प्रकाशित करने के लिए उत्पन्न हुए हैं. मानवहितकारी इंद्र जो कर्म करना चाहते हैं, वह अवश्य करते हैं. रक्षासाधनों के साथ यज्ञभवन में जाने वाले इंद्र हमें महान् पाप से बचावें. (१) हन्ता वृत्रमिन्द्रः शूशुवानः प्रावीन्नु वीरो जरितारमूती. कर्ता सुदासे अह वा उ लोकं दाता वसु मुहुरा दाशुषे भूत्.. (२) वर्धमान होकर वृत्र का वध करने वाले वीर इंद्र स्तोता को अपने रक्षा साधनों से सुरक्षित करते हैं. वे सुदास के लिए जनपद का निर्माण करने वाले एवं यजमान को धन देने वाले हैं. (२) युध्मो अनर्वा खजकृत्समद्वा शूरः सत्राषाड्जनुषेमषाळ्हः. व्यास इन्द्रः पृतनाः स्वोजा अधा विश्वं शत्रूयन्तं जघान.. (३) योद्धा, शत्रुरहित, युद्ध करने वाले, झगड़ालू, शूर, अनेक जनों को पराजित करने वाले, स्वभाव से ही अपराजित एवं उत्तम शक्ति वाले इंद्र शत्रुसेना के मार्ग में बाधा डालते हैं एवं शत्रुता करने वाले का वध करते हैं. (३) उभे चिदिन्द्र रोदसी महित्वा पप्राथ तविषीभिस्तुविष्मः. नि वज्रमिन्द्रो हरिवान्मिमिक्षन्त्समान्धसा मदेषु वा उवोच.. (४) हे अधिक संपत्तिशाली इंद्र! तुमने अपने महत्त्व और शक्ति से द्यावा-पृथिवी दोनों को पूर्ण किया. हरि नामक अश्वों के स्वामी इंद्र शत्रुओं पर वज्र फेंकते हुए यज्ञों में सोमरस द्वारा सेवित होते हैं. (४) वृषा जजान वृषणं रणाय तमु चिन्नारी नर्यं ससूव. ebook converter DEMO Watermarks*

प्र यः सेनानीरध नृभ्यो अस्तीनः सत्वा गवेषणः स धृष्णुः.. (५) पिता कश्यप ने अभिलाषापूर्वक इंद्र को युद्ध के निमित्त उत्पन्न किया है. नारी ने भी मानवहितैषी इंद्र को जन्म दिया है. इंद्र मानवों के सेनापति, स्वामी सारे संसार के ईश्वर, शत्रुहंता, गायों की खोज करने वाले एवं शत्रुओं को हराने वाले हैं. (५) नू चित्स भ्रेषते जनो न रेष्न्मनो यो अस्य घोरमाविवासात्. यज्ञैर्य इन्द्रे दधते दुवांसि क्षयत्स राय ऋतपा ऋतेजाः.. (६) जो व्यक्ति यज्ञों द्वारा इंद्र के शत्रुबाधक मन की सेवा करता है, वह न कभी स्थान से भ्रष्ट होता है और न नष्ट होता है. जो व्यक्ति इंद्र के प्रति यज्ञों के द्वारा स्तुतियां पहुंचाता है, उसे यज्ञ के पालक एवं यज्ञ में उत्पन्न इंद्र धन दें. (६) यदिन्द्र पूर्वो अपराय शिक्षन्नयज्जयायान् कनीयसो देष्णम्. अमृत इत्पर्यासीत दूरमा चित्र चित्र्यं भरा रयिं नः.. (७) हे आकर्षक इंद्र! पहली पीढ़ी जो धन बाद वाली पीढ़ी को देती है, जो धन बड़ा छोटे से पाता है और जो धन पिता से प्राप्त करके पुत्र मरणरहित के समान घर से परदेश जाता है, ये तीनों प्रकार के आकर्षक धन हमें दो. (७) यस्त इन्द्र प्रियो जनो ददाशदसन्निरेके अद्रिवः सखा ते. वयं ते अस्यां सुमतौ चनिष्ठाः स्याम वरूथे अघ्नतो नृपीतौ.. (८) हे वज्रधारी इंद्र! जो प्रिय सखा तुम्हें हव्य देता है, वह तुम्हारे दान का पात्र रहे. हम हिंसारहित होकर तुम्हारी कृपादृष्टि के कारण अधिक अन्न वाले बनें एवं मानवरक्षक घर में निवास करें. (८) एष स्तोमो अचिक्रदद्वृषा त उत स्तामुर्मघवन्नक्रपिष्ट. रायस्कामो जरितारं त आगन्त्वमङ्ग शक्र वस्व आ शको नः.. (९) हे धनशाली इंद्र! यह टपकता हुआ सोमरस तुम्हारे लिए क्रंदन कर रहा है. स्तोता तुम्हारी स्तुतियां कर रहे हैं. हे शक्र! तुम्हारे स्तोताओं को धन की अभिलाषा हुई है. तुम उन्हें शीघ्र धन दो. (९) स न इन्द्र त्वयताया इषे धास्तमना च ये मघवानो जुनन्ति. वस्वी षु ते जरित्रे अस्तु शक्तिर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०) हे इंद्र! अपने दिए हुए अन्न का उपभोग करने के लिए हमारी रक्षा करो. जो अपने आप तुम्हें हव्य देते हैं, उनकी भी रक्षा करो. तुम्हारे स्तोताओं में तुम्हारी प्रशंसनीय स्तुतियां करने की शक्ति हो. तुम कल्याणसाधनों से सदा हमारी रक्षा करो. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—२१            देवता—इंद्र

सूक्त—२१            देवता—इंद्र असावि देवं गोऋजीकमन्धो न्यस्मिन्निन्द्रो जनुषेमुवोच. बोधामसि त्वा हर्यश्व यज्ञैर्बोधा नः स्तोममन्धसो मदेषु.. (१) दिव्य एवं गव्यमिश्रित सोमरस निचोड़ा गया है. ये इंद्र इस सोमरूपी अन्न में स्वभाव से सम्मिलित रहते हैं. हे हरि नामक घोड़ों वाले इंद्र! हम यज्ञों के द्वारा तुम्हें हमारी बात बताते हैं। तुम सोम के नशे में हमारी बात समझो. (१) प्र यन्ति यज्ञं विपयन्ति बर्हिः सोममादो विदथे दुध्रवाचः. न्यु भ्रियन्ते यशसो गृभादा दूरउपब्दो वृषणो नृषाचः.. (२) यजमान यज्ञ में जाते हैं और कुश बिछाते हैं. यज्ञ में सोमलता कूटने के पत्थर भयानक शब्द करते हैं. यशस्वी, दूर तक शब्द करने वाले, ऋत्विजों को मिलाने वाले एवं अभिलाषापूरक पत्थर पत्थरों से बने घर से लिए जाते हैं. (२) त्वमिन्द्र स्रवितवा अपस्कः परिष्ठिता अहिना शूर पूर्वीः. त्वद्वावक्रे रथ्यो३ न धेना रेजन्ते विश्वा कृत्रिमाणि भीषा.. (३) हे शूर इंद्र! तुमने वृत्र द्वारा रोके हुए जलों को प्रवाहित किया था. तुम्हारे कारण ही नदियां रथस्वामियों के समान निकलती हैं. सारा संसार तुम्हारे भय से कांपता है. (३) भीमो विवेषायुधेभिरेषामपांसि विश्वा नर्याणि विद्वान्. इन्द्रः पुरो जर्हषाणो वि दूधोद्वि वज्रहस्तो महिना जघान.. (४) इंद्र ने मानवहितकारी एवं सब कामों को जानने वाले आयुधों द्वारा भयंकर बनकर असुरों को घेरा था एवं उनके नगरों को कंपित बनाया था. महान् एवं हाथ में वज्र धारण करने वाले इंद्र ने असुरों को मारा था. (४) न यातव इन्द्र जूजुवुर्नो न वन्दना शविष्ठ वेद्याभिः. स शर्धदर्यो विषुणस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवा अपि गुर्ऋतं नः.. (५) हे इंद्र! राक्षस हमारी हिंसा न करें. हे अतिशय बली इंद्र! वे राक्षस हमें प्रजाहीन न बनावें. स्वामी इंद्र कुटिल व्यक्ति के मारने में उत्साह दिखाते हैं. ब्रह्मचर्यहीन लोग हमारे यज्ञ में बाधा न बनें. (५) अभि क्रत्वेन्द्र भूरध ज्मन्न ते विव्यङ्न्महिमानं रजांसि. स्वेना हि वृत्रं शवसा जघन्थ न शत्रुरन्तं विविदद्युधा ते.. (६) हे इंद्र! तुम कर्म द्वारा धरती पर वर्तमान प्राणियों को पराजित करते हो. सब लोक

मिलकर भी तुम्हारी महिमा से नहीं बढ़ सकते. तुमने अपनी शक्ति से वृत्र को मारा था. युद्ध के द्वारा शत्रु तुम्हारा अंत नहीं पाते. (६) देवाश्चित्ते असुर्याय पूर्वेऽनु क्षत्राय ममिरे सहांसि. इन्द्रो मघानि दयते विषह्येन्द्रं वाजस्य जोहुवन्त सातौ.. (७) हे इंद्र! प्राचीन देवों और राक्षसों ने शक्तिप्रयोग एवं हिंसा करने में स्वयं को तुमसे हीन माना था. इंद्र शत्रुओं को हराकर उनका धन अपने भक्तों को देते हैं. स्तोता अन्न पाने के लिए इंद्र की स्तुति करते हैं. (७) कीरिश्चिद्धि त्वामवसे जुहावेशानमिन्द्र सौभगस्य भूरे:. अवो बभूथ शतमूते अस्मे अभिक्षत्तूस्तवावतो वरूता.. (८) हे स्वामी इंद्र! स्तोता तुम्हें अपनी रक्षा के लिए बुलाता है. हे बहुतों की रक्षा करने वाले इंद्र! तुम हमारे विपुल धन के रक्षक बने थे. तुम्हारे समान शक्तिशाली यदि कोई हमारा हिंसक हो तो उसे रोको. (८) सखायस्त इन्द्र विश्वह स्याम नमोवृधासो महिना तरुत्र. वन्वन्तु स्मा तेऽवसा समीकेऽभीतिमर्यो वणुषां शवांसि.. (९) हे इंद्र! हम स्तुति द्वारा तुम्हें बढ़ाते हुए सदा तुम्हारे मित्र रहें. हे महत्त्व द्वारा सबकी रक्षा करने वाले इंद्र! तुम्हारी रक्षा के सहारे श्रेष्ठ होता युद्ध में अभय होकर हिंसकों की शक्ति नष्ट करें. (९) स न इन्द्र त्वयताया इषे धास्तमना च ये मघवानो जुनन्ति. वस्वी षु ते जरित्रे अस्तु शक्तिर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०) हे इंद्र! अपने दिए हुए अन्न का उपभोग करने के लिए हमारी रक्षा करो. जो लोग अपने आप तुम्हें हव्य देते हैं, उनकी भी रक्षा करो. तुम्हारे स्तोता मुझ में तुम्हारी प्रशंसनीय स्तुतियां करने की शक्ति हो. तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (१०) सूक्त—२२ देवता—इंद्र पिबा सोममिन्द्र मन्दतु त्वा यं ते सुषाव हर्यश्वाद्रिः. सोतुर्बाहुभ्यां सुयतो नार्वा.. (१) हे इंद्र! तुम सोमरस पिओ. सोम तुम्हें प्रसन्न करे. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी! जैसे लगाम द्वारा घोड़ा वश में किया जाता है, उसी प्रकार सोमरस निचोड़ने वाले के दोनों हाथों द्वारा पकड़े गए पत्थरों ने तुम्हारे लिए सोम तैयार किया है. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

यस्ते मदो युज्यश्चारुरस्ति येन वृत्राणि हर्यश्व हंसि. स त्वामिन्द्र प्रभूवसो ममत्तु.. (२) हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी एवं अधिक धन वाले इंद्र! जो सोम तुम्हारे अनुकूल भली प्रकार निचोड़ा गया एवं नशीला है एवं जिसे पीकर तुम राक्षसों को मारते हो, वह सोमरस तुम्हें प्रसन्न बनावे. (२) बोधा सु मे मघवन्वाचमेमां यां ते वसिष्ठो अर्चति प्रशस्तिम्. इमा ब्रह्म सधमादे जुषस्व.. (३) हे धनस्वामी इंद्र! मैं वसिष्ठ तुम्हारी प्रशंसा के रूप में जो बातें कहता हूं, उन्हें भली प्रकार समझो एवं यज्ञ में उन्हें स्वीकार करो. (३) श्रुधी हवं विपिपानस्याद्रेर्बोधा विप्रस्यार्चतो मनीषाम्. कृष्वा दुवांस्यन्तमा सचेमा.. (४) हे इंद्र! मुझ सोमपानकर्त्ता के पत्थर की पुकार सुनो एवं स्तुति करने वाले विद्वान् की स्तुति समझो. तुम मेरे सहायक बनकर मेरी इन सेवाओं को समझो. (४) न ते गिरो अपि मृष्ये तुरस्य न सुष्टुतिमसुर्यस्य विद्वान्. सदा ते नाम स्वयशो विवक्मि.. (५) हे शत्रुहिंसक इंद्र! तुम्हारी शक्ति को जानने वाला मैं तुम्हारी स्तुतियों को नहीं त्याग सकता. मैं तुम्हारा असाधारण यशवाला नाम सदा बोलूंगा. (५) भूरि हि ते सवना मानुषेषु भूरि मनीषी हवते त्वामित्. मारे अस्मन्मघवञ्ज्योक्कः.. (६) हे इंद्र! मनुष्यों में तुम्हारे बहुत से सवन हैं. स्तोता तुम्हें ही अधिक बुलाता है. चिरकाल तक अपने को हमसे अलग मत रखना. (६) तुभ्येदिमा सवना शूर विश्वा तुभ्यं ब्रह्माणि वर्धना कृणोमि. त्वं नृभिर्हव्यो विश्वधासि.. (७) हे शूर इंद्र! ये सब सवन तुम्हारे हेतु ही हैं. ये उन्नतिकारक स्तोत्र मैं तुम्हारे निमित्त ही बोलता हूं. तुम अनेक प्रकार से मानवों द्वारा बुलाने योग्य हो. (७) नू चिन्नु ते मन्यमानस्य दस्मोदश्रुवन्ति महिमानमुग्र. न वीर्यमिन्द्र ते न राधः.. (८) हे दर्शनीय इंद्र! तुम्हारी स्तुतियां सुनकर तुम्हारी महिमा कौन नहीं जानेगा? हे उग्र इंद्र! ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—२३ देवता—इंद्र

तुम्हारी शक्ति और धन को कौन नहीं समझेगा. (८) ये च पूर्व ऋषयो ये च नूतना इन्द्र ब्रह्माणि जनयन्त विप्राः. अस्मे ते सन्तु सख्या शिवानि यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (९) हे इंद्र! सभी प्राचीन एवं नवीन ऋषि तुम्हारे लिए स्तोत्र बनाते हैं. तुम्हारी मित्रता हमारे लिए मंगलकारी हो. तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (९) सूक्त—२३ देवता—इंद्र उदु ब्रह्माण्याैरत श्रवस्येन्द्रं समर्ये महया वसिष्ठ. आ यो विश्वानि शवसा ततानोपश्रोता म ईवतो वचांसि.. (१) ऋषियों ने सब स्तुतियां अन्न पाने की अभिलाषा से कही हैं. हे वसिष्ठ! तुम भी स्तोत्र व हव्य द्वारा इंद्र की पूजा करो. जिस इंद्र ने अपनी शक्ति से समस्त लोकों को विस्तृत किया है, वे मुझ समीपगामी की स्तुतियां सुनें. (१) अयामि घोष इन्द्र देवजामिरिरज्यन्त यच्छुरुधो विवाचि. नहि स्वमायुश्चिकिते जनेषु तानीदंहांस्यति पर्ष्यस्मान्.. (२) हे इंद्र! जब ओषधियां बढ़ती हैं, तब देवों को प्रिय लगने वाले शब्द बोले जाते हैं. मानवों में कोई भी अपनी आयु नहीं जानता. तुम हमारे पापों को दूर करो. (२) युजे रथं गवेषणं हरिभ्यामुप ब्रह्माणि जुजुषाणमस्थुः. वि बाधिष्टस्य रोदसी महित्वेन्द्रो वृत्राण्यप्रती जघन्वान्.. (३) मैं इंद्र के गायों को खोजने वाले रथ को हरि नामक अश्वों से युक्त करता हूं. सब लोग स्तुतियां स्वीकार करने वाले इंद्र की सेवा करते हैं. इंद्र ने अपनी शक्ति से द्यावा-पृथिवी को बाधा पहुंचाई है तथा शत्रुसमूह का नाश किया है. (३) आपश्चित्पिप्युः स्तर्यो३ न गावो नक्षन्नृतं जरितारस्त इन्द्र. याहि वायुर्न नियुतो नो अच्छा त्वं हि धीभिर्दायसे वि वाजान्.. (४) हे इंद्र! जिस प्रकार बिना ब्याई गाय मोटी होती है, उसी प्रकार तुम्हारी कृपा से जल बढ़े एवं तुम्हारे स्तोता जल को प्राप्त करें. वायु जिस प्रकार घोड़ों के पास जाती है, उसी प्रकार तुम हमारे पास आओ. तुम यज्ञकर्मों द्वारा अन्न देते हो. (४) ते त्वा मदा इन्द्र मादयन्तु शुष्मिणं तुविराधसं जरित्रे. एको देवत्रा दयसे हि मर्तानस्मिञ्छुछ्र सवने मादयस्व.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! नशीला सोम तुम्हें प्रसन्न करे. तुम स्तोता को शक्तिशाली एवं धनवान् पुत्र देते हो. हे शूर इंद्र! देवों में एकमात्र तुम्हीं मानवों के प्रति दया करते हो. तुम इस यज्ञ में प्रसन्न बनो. (५) एवेदिन्द्रं वृषणं वज्रबाहुं वसिष्ठासो अभ्यर्चन्त्यर्कैः. स नः स्तुतो वीरवद्धातु गोमद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६) वसिष्ठगोत्रीय ऋषि इसी प्रकार स्तुतियों द्वारा अभिलाषापूरक एवं वज्रबाहु इंद्र की पूजा करते हैं. वे स्तुति सुनकर हमें वीरों एवं गायों से युक्त धन दें. हे इंद्र! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (६) सूक्त—२४ देवता—इंद्र योनिष्ट इन्द्र सदने अकारि तमा नृभिः पुरुहूत प्रयाहि. असो यथा नोऽविता वृधे च ददो वसूनि ममदश्च सोमैः.. (१) हे इंद्र! तुम्हारे सदन के लिए स्थान बनाया गया है. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! मरुतों के साथ

एष स्तोमो मह उग्राय वाहे धुर्यो३ वात्यो न वाजयन्नधायि. इन्द्र त्वायमर्क इट्टे वसूनां दिवीव द्यामधि नः श्रोमतं धाः.. (५) रथ के घोड़े के समान शक्तिशाली यह मंत्रसमूह महान्, उग्र एवं विश्वभारवहन समर्थ इंद्र को लक्ष्य करके बनाया गया है. हे इंद्र! यह स्तोता तुमसे धन मांगता है. तुम हमें स्वर्ग के समान तेजस्वी पुत्र दो. (५) एवा न इन्द्र वार्यस्य पूर्धि प्र ते महीं सुमतिं वेविदाम. इषं पिन्व मघवद्भ्यः सुवीरां यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६) हे इंद्र! इस प्रकार तुम हमें उत्तम धन से पूर्ण करो. हम तुम्हारी महती दया प्राप्त करें. हम हव्य वालों को वीर पुत्रों से युक्त अन्न दो एवं सभी कल्याणसाधनों से हमारी रक्षा करो. (६) सूक्त—२५ देवता—इंद्र आ ते मह इन्द्रोत्युग्र समन्यवो यत्समरन्त सेनाः. पताति दिद्युन्नर्यस्य बाह्वोर्मा ते मनो विष्वद्र्य१ग्वि चारीत्.. (१) हे उग्र, महान् एवं मानवहितैषी इंद्र! तुम्हारी क्रोधभरी सेनाएं जब युद्ध करती हैं, तब तुम्हारे हाथ में स्थित वज्र हमारी रक्षा के लिए गिरे. तुम्हारा सब ओर जाने वाला मन विचलित न हो. (१) नि दुर्ग इन्द्र श्लथिह्यमित्रानभि ये नो मर्तासो अमन्ति. आरे तं शंसं कृणुहि निनित्सोरा नो भर सम्भरणं वसूनाम्.. (२) हे इंद्र! युद्ध में जो लोग हमारे सामने आकर हमें पराजित करते हैं, उन शत्रुओं का नाश करो. हमारी निंदा के इच्छुक व्यक्ति का नाम मिटा दो. हमें धन का समूह दो. (२) शतं ते शिप्रिन्नूतयः सुदासे सहस्रं शंसा उत रातिरस्तु. जहि वधर्वंनुषो मर्त्यस्यास्मे द्युम्नमधि रत्नं च धेहि.. (३) हे साफा वाले इंद्र! तुम्हारे सैकड़ों रक्षासाधन एवं हजारों कामनाएं एवं धन मुझ सुदास के हों. हिंसक मनुष्य के आयुध का तुम नाश करो एवं हमारे लिए दीप्तिशाली यश एवं रत्न दो. (३) त्वावतो हीन्द्र क्रत्वे अस्मि त्वावतोऽवितुः शूर रातौ. विश्वेदहानि तविषीव उग्रँ ओकः कृणुष्व हरिवो न मर्धीः.. (४) हे इंद्र! मैं तुम्हारे समान महान् व्यक्ति के यज्ञकर्म में लगा हूं. मैं तुम्हारे समान रक्षक के ebook converter DEMO Watermarks*

दान में नियुक्त हूं. हे बली एवं उग्र इंद्र! सब दिन हमारे लिए घर बनाओ. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हमारी हिंसा मत करो. (४) कुत्सा एते हर्यश्वाय शूषमिन्द्रे सहो देवजूतमियानाः. सत्रा कृधि सुहना शूर वृत्रा वयं तरुत्राः सनुयाम वाजम्.. (५) हम हरि नामक घोड़ों वाले इंद्र के लिए ये सुखकर स्तुतियां बनाते हैं एवं इंद्र से देवप्रेरित बल की याचना करते हैं. हम सभी दुःखों को पार करके बल प्राप्त करेंगे. हे शूर इंद्र! हमें सदा शत्रुहनन में समर्थ बनाओ. हम अतिशय सुरक्षित होकर अन्न प्राप्त करें. (५) एवा न इन्द्र वार्यस्य पूर्धि प्र ते महीं सुमतिं वेविदाम. इषं पिन्व मघवद्भ्यः सुवीरां यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६) हे इंद्र! इस प्रकार तुम हमें उत्तम धन से पूर्ण करो. हम हव्य वालों को वीर पुत्रों से युक्त अन्न दो एवं सभी कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (६) सूक्त—२६ देवता—इंद्र न सोम इन्द्रमसुतो ममाद नाब्रह्माणो मघवानं सुतासः. तस्मा उक्थं जनये यज्जुजोषन्नृवन्नवीयः शृणवद्यथा नः.. (१) धनस्वामी इंद्र के उद्देश्य से न निचोड़ा हुआ एवं स्तुतिहीन सोमरस उन्हें प्रसन्न नहीं करता. इंद्र की सेवा करने वाला मैं राजा के द्वारा भी आदरपूर्वक सुनने योग्य एवं नवीन मंत्रसमूह इंद्र के निमित्त पढ़ता हूं. (१) उक्थउक्थे सोम इन्द्रं ममाद नीथेनीथे मघवानं सुतासः. यदीं सबाधः पितरं न पुत्राः समानदक्षा अवसे हवन्ते.. (२) प्रत्येक मंत्रसमूह के पाठ के समय सोम धनस्वामी इंद्र को प्रसन्न करता है. प्रत्येक स्तोत्र के समय निचोड़े गए सोमरस इंद्र को तृप्त करते हैं. परस्पर मिलित एवं समान उत्साह वाले ऋत्विज् इंद्र को अपनी रक्षा के लिए उसी प्रकार बुलाते हैं, जिस प्रकार पुत्र पिता को बुलाते हैं. (२) चकार ता कृणवन्नूनमन्या यानि ब्रुवन्ति वेधसः सुतेषु. जनीरिव पतिरेकः समानो नि मामृजे पुर इन्द्रः सु सर्वाः.. (३) सोमरस निचुड़ जाने पर स्तोतागण जिन कर्मों का वर्णन करते हैं, इंद्र ने प्राचीन काल में वे सब कर्म किए हैं एवं इस समय अन्य कर्म भी करते हैं. पति जिस प्रकार पत्नी का मर्दन करता है, उसी प्रकार इंद्र ने अकेले ही शत्रुनगरियों को तहस-नहस कर डाला. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

एवा तमाहुरूत शृण्व इन्द्र एको विभक्ता तरणिर्मघानाम्. मिथस्तुर ऊतयो यस्य पूर्वीरस्मे भद्राणि सश्चत प्रियाणि.. (४) इंद्र के विषय में ऋत्विज् कहते हैं कि वे अकेले ही धन बांटने एवं विपत्तियों से पार करने वाले हैं. यह भी सुना गया है कि इंद्र के पास परस्पर मिले अनेक रक्षासाधन हैं. इंद्र की कृपा से हमें प्रिय कल्याणप्रद वस्तुएं मिलें. (४) एवा वसिष्ठ इन्द्रमूतये नृन्कृष्टीनां वृषभं सुते गृणाति. सहस्रिण उप नो माहि वाजान् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) वसिष्ठ ऋषि सोमरस निचुड़ जाने पर मनुष्यों की रक्षा के लिए प्रजाओं के अभिलाषापूरक इंद्र की स्तुति इस प्रकार करते हैं. हे इंद्र! हमारे हजारों प्रकार के अन्न एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (५) सूक्त—२७ देवता—इंद्र इन्द्रं नरो नेमधिता हवन्ते यत्पार्या युनजते धियस्ताः. शूरो नृषाता शवसश्चकान आ गोमति व्रजे भजा त्वं नः.. (१) जब युद्ध की तैयारी होने लगती है तो नेता युद्ध में इंद्र को बुलाते हैं. हे शूर, मनुष्यों के पोषक एवं शक्ति की कामना करने वाले इंद्र! हमें गायों वाली गोशाला में पहुंचाओ. (१) य इन्द्र शुष्मो मघवन्ते अस्ति शिक्षा सखिभ्यः पुरुहूत नृभ्यः. त्वं हि दृळ्हा मघवन्विचेता अपा वृधि परिवृतं न राधः.. (२) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम्हारा जो बल है, उसे अपने सखा स्तोताओं को दो. तुमने दृढ़ शत्रुनगरियों को छिन्नभिन्न किया है. तुम बुद्धि का प्रकाश करके छिपा हुआ धन हमारे लिए प्रकट करो. (२) इन्द्रो राजा जगतश्चर्षणीनामधि क्षमि विषुरूपं यदस्ति. ततो ददाति दाशुषे वसूनि चोदद्राध उपस्तुतश्चिदवार्क.. (३) इंद्र पशु आदि गतिशील प्राणियों एवं मनुष्यों के स्वामी हैं. धरती में नानारूप धन है, उसके राजा भी इंद्र हैं. हव्यदाता को धन देने वाले इंद्र हमारी स्तुति सुनकर धन हमारे सामने भेजें. (३) नू चिन्न इन्द्रो मघवा सहूती दानो वाजं नि यमते न ऊती. अनूना यस्य दक्षिणा पीपाय वामं नृभ्यो अभिवीता सखिभ्यः.. (४) हमने धनस्वामी एवं दानशील इंद्र को मरुतों के साथ बुलाया है. वे हमारी रक्षा के लिए ebook converter DEMO Watermarks*

शीघ्र ही अन्न दें. जो इंद्र स्तोताओं को संपूर्ण धन देते थे, वे ही मनुष्यों को उत्तम धन दें. (४) नू इन्द्र राये वरिवस्कृधी न आ ते मनो ववृत्याम मघाय. गोमदश्वावद्रथवद्वयन्तो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) हे इंद्र! धनप्राप्ति के लिए शीघ्र धन दो. हम पूज्य स्तुतियों द्वारा तुम्हारा मन अपनी ओर खींच लेंगे. तुम हमें गायों, अश्वों एवं रथों का स्वामी बनाओ एवं कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (५) सूक्त—२८ देवता—इंद्र ब्रह्मा ण इन्द्रोप याहि विद्वानर्वाञ्चस्ते हरयः सन्तु युक्ताः. विश्वे चिद्धि त्वा विहवन्त मर्ता अस्माकमिच्छृणुहि विश्वमिन्व.. (१) हे इंद्र! तुम जानते हुए हमारी स्तुतियों के समीप आओ. तुम्हारे घोड़े हमारे सामने ही रथ में जुड़े हैं. हे सबको प्रसन्न करने वाले इंद्र! यद्यपि तुम्हें सभी लोग बुलाते हैं, फिर भी तुम हमारी पुकार सुनो. (१) हवं त इन्द्र महिमा व्यानड् ब्रह्म यत्पासि शवसिन्नृषीणाम्. आ यद्वज्रं दधिषे हस्त उग्र घोरः सन्क्रत्वा जनिष्ठा अषाळ्हः.. (२) हे शक्तिशाली इंद्र! जिस समय तुम ऋषियों के स्तोत्रों की रक्षा करते हो, उस समय तुम्हारी महिमा स्तुतिकर्त्ता को व्याप्त करे. हे उग्र इंद्र! जिस समय तुम अपने हाथ में वज्र पकड़ते हो, उस समय कर्म द्वारा भयंकर बनकर शत्रुओं को असहनीय हो जाते हो. (२) तव प्रणीतीन्द्र जोहुवानान्संत्यन्नृन्न रोदसी निनेथ. महे क्षत्राय शवसे हि जज्ञेऽतूतुर्जिं चित्तूतूजिरशिश्रत्.. (३) हे इंद्र! जो लोग तुम्हारे कहने के अनुसार तुम्हारी बार-बार स्तुति करते हैं, उन्हें तुम लोक एवं धरती पर स्थापित करते हो. तुमने महान् शक्ति एवं धन लेने के लिए जन्म लिया है. तुम्हारा यजमान यज्ञरहितों की हिंसा करता है. (३) एभिर्न इन्द्राहभिर्दशस्य दुर्मित्रासो हि क्षितयः पवन्ते. प्रति यच्चष्टे अनृतमनेना अव द्विता वरुणो मायी नः सात्.. (४) हे इंद्र! तुम्हारी मित्रता का ढोंग करने वाले दुष्ट लोग आ रहे हैं. इनसे धन छीनकर हमें दो. पाप नष्ट करने वाले एवं बुद्धिमान् वरुण हमारा जो पाप देखें. उससे हमें हर प्रकार से छुड़ाएं. (४) वोचेमेदिन्द्रं मघवानमेनं महो रायो राधसो यद्ददन्नः. ebook converter DEMO Watermarks*

यो अर्चतो ब्रह्मकृतिमविष्ठो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) हम उसी धनस्वामी इंद्र की स्तुति करते हैं, जिसने हमें आराधना के योग्य महान् धन दिया एवं स्तोता के स्तुतिकर्म की रक्षा की. हे इंद्र! तुम कल्याणसाधनों से हमारी सदा रक्षा करो. (५) सूक्त—२९ देवता—इंद्र अयं सोम इन्द्र तुभ्यं सुन्व आ तु प्र याहि हरिवस्तदोकाः. पिबा त्व१स्य सुषुतस्य चारोर्ददो मघानि मघवन्न्नियानः.. (१) हे इंद्र! यह सोम तुम्हारे लिए निचोड़ा गया है. हे हरि नामक अश्वों वाले इंद्र! उसे सेवन करने हेतु शीघ्र आओ. भली प्रकार निचोड़े गए इस सुंदर सोमरस को पिओ. हे धनस्वामी इंद्र! हमारी याचना सुनकर हमें धन दो. (१) ब्रह्मन्वीर ब्रह्मकृतिं जुषाणोऽर्वाचीनो हरिभिर्याहि तूम्य्. अस्मिन्न् षु सवने मादयस्वोप ब्रह्माणि शृणव इमा नः.. (२) हे महान् एवं शक्तिशाली इंद्र! तुम स्तुतियों को सुनते हुए अपने घोड़ों की सहायता से शीघ्र हमारी ओर आओ. तुम इस यज्ञ में भली प्रकार प्रमुदित बनो एवं हमारी इन स्तुतियों को सुनो. (२) का ते अस्त्यरङ्कृतिः सूक्तैः कदा नूनं ते मघवन् दाशेम. विश्वा मतीरा ततने त्वायाधा म इन्द्र शृणवो हवेमा.. (३) हे इंद्र! हमारे द्वारा की हुई स्तुतियों द्वारा तुम्हारी शोभा कैसे होती है? हे धनस्वामी इंद्र! हम कब तुम्हें प्रसन्न करें? मैं तुम्हारी कामना करता हुआ ही सब स्तुतियां बोलता हूं, इसलिए मेरी इन स्तुतियों को सुनो. (३) उतो घा ते पुरुष्या३ इदासन्त्येषां पूर्वेषामशृणोऋषीणाम्. अधाहं त्वा मघवञ्जोहवीमि त्वं न इन्द्रासि प्रमतिः पितेव.. (४) हे इंद्र! वे सब प्राचीन ऋषि मानवहितकारी थे, जिनकी स्तुतियां तुमने सुनीं. हे धनस्वामी इंद्र! इसलिए मैं तुम्हें बार-बार बुलाता हूं. तुम पिता के समान मेरे बंधु हो. (४) वोचेमेदिन्द्रं मघवानमेनं महो रायो राधसो यद्ददन्नः. यो अर्चतो ब्रह्मकृतिमविष्ठो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) हम उसी धनस्वामी इंद्र की स्तुतियां करते हैं. जिसने हमें आराधना के योग्य महान् धन दिया एवं स्तोता के स्तुतिकार्य की रक्षा की. हे इंद्र! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा ebook converter DEMO Watermarks*