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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

हे सोम! तुम हमारी गायों को सुख दो. तुम हमारे लिए अधिक अन्न तथा प्रशंसनीय जल बढ़ाओ. (१५) पवमानो अजीजनद्दिवश्चित्रं न तन्युतम्. ज्योतिर्वैश्वानरं बृहत्.. (१६) शुद्ध होते हुए सोम ने वैश्वानर नामक ज्योति को वज्र के समान इसलिए उत्पन्न किया था कि स्वर्ग का विस्तार हो सके. (१६) पवमानस्य ते रसो मदो राजन्नदुच्छुनः. वि वारमव्यमर्षति.. (१७) हे दीप्तिशाली सोम! जब तुम शुद्ध होते हो तो तुम्हारा राक्षसनाशक एवं मदकारक रस भेड़ के बालों से बने हुए दशापवित्र पर जाता है. (१७) पवमान रसस्तव दक्षो वि राजति द्युमान्. ज्योतिर्विश्वं स्वर्द्दशे.. (१८) हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम्हारा बढ़ा हुआ एवं दीप्तिशाली रस विशेषरूप से सुशोभित होता है तथा अपने तेज से विश्व को व्याप्त करके देखने योग्य बनाता है. (१८) यस्ते मदो वरेण्यस्तेना पवस्वान्धसा. देवावीरघशंसहा.. (१९) हे सोम! तुम अपने देवाभिलाषी, राक्षसहंता, सबके वरण करने योग्य एवं नशीले रस को अन्न के साथ टपकाओ. (१९) जघ्निर्वृत्रममित्रियं सस्निर्वजं दिवेदिवे. गोषा उ अश्वसा असि.. (२०) हे सोम! तुमने शत्रु वृत्र को मारा, प्रतिदिन संग्राम में भाग लिया एवं तुम गाएं तथा घोड़े देते हो. (२०) सम्मिश्लो अरुषो भव सूपस्थाभिर्न धेनुभिः. सीदञ्छ्येनो न योनिमा.. (२१) हे शोभन स्वाद वाले गाय के दूध, दही आदि से मिले हुए सोम! तुम बाज पक्षी के समान शीघ्र अपने स्थान पर बैठते हुए सुशोभित बनो. (२१) स पवस्व य आविथेन्द्रं वृत्राय हन्तवे. वव्रिवांसं महीरपः.. (२२) हे सोम! तुमने विशाल जलों को रोकने वाले वृत्र के मारने के लिए इंद्र की रक्षा की थी. तुम इस समय नीचे गिरो. (२२) सुवीरासो वयं धना जयेम सोम मीढ्वः. पुनानो वर्ध नो गिरः.. (२३) हे सींचने वाले एवं शुद्ध होते हुए सोम! तुम हमारी स्तुतियों को बढ़ाओ. हम अंगिरागोत्रीय अमहीयु आदि ऋषि शत्रुओं के धन जीतें. (२३) ebook converter DEMO Watermarks*

त्वोतासस्तवावसा स्याम वन्वन्त आमुरः. सोम व्रतेषु जागृहि.. (२४) हे सोम! हम तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर अपने शत्रुओं को पाते ही मार डालें. तुम हमारे यज्ञकर्मों में जागृत बनो. (२४) अपघ्नन्पवते मृधोऽप सोमो अराव्णः. गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्.. (२५) सोम शत्रुओं को मारते हुए, धनदान न करने वालों को मारते हुए तथा इंद्र के स्थान को पाते हुए धारा के रूप में गिरे थे. (२५) महो नो राय आ भर पवमान जही मृधः. रास्वेन्दो वीरवद्यशः.. (२६) हे शुद्ध होते हुए सोम! हमारे लिए महान् धन लाओ, हमें मारने वाले शत्रुओं को मारो तथा हमें संतानयुक्त यश दो. (२६) न त्वा शतं चन हुतो राधो दित्सन्तमा मिनन्. यत्पुनानो मखस्यसे.. (२७) हे सोम! जब तुम शुद्ध होते हुए हमें धन देना चाहते हो, उस समय हमें धन देने वाले तुमको बहुत से शत्रु भी नहीं रोक पाते. (२७) पवस्वेन्दो वृषा सुतः कृधी नो यशसो जने. विश्वा अप द्विषो जहि.. (२८) हे निचुड़े हुए एवं सींचने वाले सोम! तुम धारा के रूप में टपको, हमें जनपदों में यशस्वी बनाओ तथा सभी शत्रुओं को मारो. (२८) अस्य ते सख्ये वयं तवेन्दो द्युम्न उत्तमे. सासह्वाम पृतन्यतः.. (२९) हे इस यज्ञ में वर्तमान सोम! जब हम तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेंगे एवं तुम्हारे द्वारा दिए गए श्रेष्ठ अन्न से पुष्ट हो जाएंगे तो युद्ध के इच्छुक शत्रुओं को मारेंगे. (२९) या ते भीमान्यायुधा तिग्मानि सन्ति धूर्वणे. रक्षा समस्य नो निदः.. (३०) हे सोम! तुम्हारे जो भयंकर, तीखे और शत्रुवध करने वाले आयुध हैं, उनके द्वारा हमें सभी शत्रुओं की निंदा से बचाओ. (३०) सूक्त—६२ देवता—पवमान सोम एते असृग्रमिन्दवस्तिरः पवित्रमाशवः. विश्वान्यभि सौभगा.. (१) ऋत्विज् सभी धनों को पाने के उद्देश्य से शीघ्र गति वाले एवं शुद्ध होते हुए सोम को दशापवित्र के समीप ले जाते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

विघ्नन्तो दुरिता पुरु सुगा तोकाय वाजिनः. तना कृण्वन्तो अर्वते.. (२) बहुत से पापों को नष्ट करने वाले तथा हमारे पुत्रों और अश्वों को सुख देने वाले शक्तिशाली सोम दशापवित्र के समीप जाते हैं. (२) कृण्वन्तो वरिवो गवेऽभ्यर्षन्ति सुष्टुतिम्. इळामस्मभ्यं संयतम्.. (३) सोम हमारे लिए और हमारी गायों के लिए सुख देने वाला धन तथा अन्न देते हुए हमारी शोभन स्तुति के सामने जाते हैं. (३) असाव्यंशुर्मदायाप्सु दक्षो गिरिष्ठाः. श्येनो न योनिमासदत्.. (४) पर्वत पर उत्पन्न, नशे के लिए निचोड़े गए व जलों में बढ़े हुए सोम बाज पक्षी के समान अपने स्थान पर आकर बैठते हैं. (४) शुभ्रमन्धो देववातमप्सु धूतो नृभिः सुतः. स्वदन्ति गावः पयोभिः.. (५) गाएं अपने दूध के द्वारा देवों के प्रार्थित सोमरूप शोभन अन्न को स्वादिष्ट बनाती हैं. ऋत्विजों द्वारा निचोड़े गए सोम जल के द्वारा शुद्ध होते हैं. (५) आदीमश्वं न हेतारोऽशूशुभन्नमृताय. मध्वो रसं सधमादे.. (६) ऋत्विज् अमरता पाने के लिए इस नशीले सोम के रस को यज्ञ में इस प्रकार अलंकृत करते हैं, जैसे युद्ध में जाने वाला घोड़ा सजाया जाता है. (६) यास्ते धारा मधुश्चुतोऽसृग्रमिन्द ऊतये. ताभिः पवित्रमासदः.. (७) हे सोम! तुम्हारी जो मधुर रस टपकाने वाली धाराएं रक्षा के लिए बनाई जाती हैं, उनके साथ तुम दशापवित्र पर बैठो. (७) सो अर्षेन्द्राय पीतये तिरो रोमाण्याव्यया. सीदन्योना वनेष्वा.. (८) हे निचोड़े हुए सोम! तुम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करके इंद्र के लिए अपने पात्र में अपने स्थान पर टपको. (८) त्वमिन्दो परि स्रव स्वादिष्ठो अङ्गिरोभ्यः. वरिवोविद् घृतं पयः.. (९) हे स्वादिष्ट एवं हमें धन देने वाले सोम! तुम अंगिरागोत्रीय ऋत्विजों के लिए दूध और घी बरसाओ. (९) अयं विचर्षणिर्हितः पवमानः स चेतति. हिन्वान आप्यं बृहत्.. (१०) ये विशेष द्रष्टा, पात्रों में रखे हुए एवं पवित्र होते हुए सोम! जल में उत्पन्न महान् अन्न को ebook converter DEMO Watermarks*

प्रेरित करते हुए सबके द्वारा जाने जाते हैं. (१०) एष वृषा वृषव्रतः पवमानो अशस्तिहा. करद्वसूनि दाशुषे.. (११) ये अभिलाषापूरक, बैल के समान कर्म करने वाले, राक्षसों को मारने वाले एवं शुद्ध होते हुए सोम हव्यदाता यजमान को धन देते हैं. (११) आ पवस्व सहस्रिणं रयिं गोमन्तमश्विनम्. पुरुश्चन्द्रं पुरुस्पृहम्.. (१२) हे सोम! तुम हजारों संख्याओं वाला, गायों से युक्त, अश्वसहित, बहुतों को प्रसन्न करने वाला एवं अनेक द्वारा चाहने योग्य धन दो. (१२) एष स्य परि षिच्यते मर्मृज्यमान आयुभिः. उरुगायः कविक्रतुः.. (१३) बहुतों द्वारा स्तुत एवं क्रांत कर्मों वाले ये सोम मनुष्यों द्वारा शुद्ध होते हुए बहते हैं. (१३) सहस्रोतिः शतामघो विमानो रजसः कविः. इन्द्राय पवते मदः.. (१४) असीमित रक्षाओं वाले, बहुत धन के स्वामी, लोक के निर्माता, क्रांत-कर्म वाले और नशीले सोम इंद्र के लिए टपकते हैं. (१४) गिरा जात इह स्तुत इन्दुरिन्द्राय धीयते. विर्योना वसताविव.. (१५) उत्पन्न एवं स्तुतियों द्वारा प्रशंसित सोम इंद्र के निमित्त इस यज्ञ में इस प्रकार जाते हैं, जैसे पक्षी अपने घोंसले में जाता है. (१५) पवमानः सुतो नृभिः सोमो वाजमिवासरत्. चमूषु शक्मनासदम्.. (१६) ऋत्विजों द्वारा निचोड़े गए सोम अपनी शक्ति से यज्ञस्थान में बैठने हेतु इस प्रकार जाते हैं, जैसे कोई युद्ध में जाता है. (१६) तं त्रिपृष्ठे त्रिवन्धुरे रथे युञ्जन्ति यातवे. ऋषीणां सप्त धीतिभिः.. (१७) ऋषियों का रथ यज्ञ है. उस में सोम निचोड़ने के तीन काल, तीन पीठ, तीनों वेद, तीन स्थान एवं सात छंद सात रस्सियां हैं. ऋत्विज् सोमरूपी रथ को देवों के पास जाने के लिए जोतते हैं. (१७) तं सोतारो धनस्पृतमाशुं वाजाय यातवे. हरिं हिनोत वाजिनम्.. (१८) हे सोमरस निचोड़ने वाले लोगो! धन की सृष्टि करने वाले, शक्तिशाली एवं शीघ्रगति वाले सोमरूपी घोड़े को यज्ञरूपी युद्ध में जाने के लिए प्रेरणा दो. (१८) आविशन्कलशं सुतो विश्वा अर्षन्नभि श्रियः. शूरो न गोषु तिष्ठति.. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*

निचोड़े हुए, द्रोणकलश की ओर जाते हुए तथा हमारे लिए सब संपत्तियां देते हुए सोम यज्ञभूमि में इस प्रकार भयरहित होकर ठहरते हैं, जैसे शत्रु से जीते हुए पशुओं में शूर ठहरता है. (१९) आ त इन्दो मदाय क पयो दुहन्त्यायवः. देवा देवेभ्यो मधु.. (२०) हे सोम! स्तोतागण तुम्हारा मधुर रस देवों के मद के निमित्त दुहते हैं. (२०) आ नः सोमं पवित्र आ सृजता मधुमत्तमम्. देवेभ्यो देवश्रुत्तमम्.. (२१) हे ऋत्विजो! देवों के अत्यंत प्रिय व अत्यधिक मधुर हमारे सोम को इंद्रादि देवों के लिए दशापवित्र पर शुद्ध करो. (२१) एते सोमा असृक्षत गृणानाः श्रवसे महे. मदिन्तमस्य धारया.. (२२) सुत किए जाते हुए ये सोम ऋत्विजों द्वारा महान् अन्न पाने के लिए अत्यंत नशीली धारा को बनाते हैं. (२२) अभि गव्यानि वीतये नृम्णा पुनानो अर्षसि. सनद्वाजः परि स्रव.. (२३) हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम भक्षण योग्य बनने के लिए गायों के दूध आदि से मिलते हो. तुम हमें अन्न देते हुए टपको. (२३) उत नो गोमतीरिषो विश्वा अर्ष परिष्टुभः. गृणानो जमदग्निना.. (२४) हे सोम! तुम मुझ जमदग्नि की स्तुति सुनकर मुझे गायों से युक्त एवं सभी जगह प्रशंसित अन्न दो. (२४) पवस्व वाचो अग्रियः सोम चित्राभिरूतिभिः. अभि विश्वानि काव्या.. (२५) हे प्रमुख सोम! तुम हमारी स्तुतियां सुनकर पूज्य रक्षासाधनों के साथ बरसो एवं हमारे स्तुतिवाक्यों के अनुसार फल दो. (२५) त्वं समुद्रिया अपोऽग्रियो वाच ईरयन्. पवस्व विश्वमेजय.. (२६) हे विश्व को कंपाने वाले एवं प्रमुख सोम! तुम हमारे स्तुतिवचनों को प्रेरित करते हुए अंतरिक्ष से जलवर्षा करो. (२६) तुभ्येमा भुवना कवे महिम्ने सोम तस्थिरे. तुभ्यमर्षन्ति सिन्धवः.. (२७) हे क्रांत कर्म वाले सोम! तुम्हारी महिमा से ही ये लोक स्थित हैं एवं नदियां तुम्हारी ही आज्ञा का पालन करती हैं. (२७) ebook converter DEMO Watermarks*

प्र ते दिवो न वृष्टयो धारा यन्त्यसश्चतः. अभि शुक्रामुपस्तिरम्.. (२८) हे सोम! तुम्हारी अलग-अलग धाराएं आकाश से गिरने वाली वर्षा के समान सफेद रंग के भेड़ के बालों से बने दशापवित्र की ओर जाती हैं. (२८) इन्द्रायेन्दुं पुनीतनोग्रं दक्षाय साधनम्. ईशानं वीतिराधसम्.. (२९) हे ऋत्विजो! उग्र, बल के साधक, धनों के स्वामी एवं धन देने वाले सोम को इंद्र के लिए शुद्ध करो. (२९) पवमान ऋतः कविः सोमः पवित्रमासदत्. दधत्स्तोत्रे सुवीर्यम्.. (३०) सच्चे, क्रांतकर्म वाले एवं शुद्ध होते हुए सोम हमारी स्तुति सुनकर उत्तम शक्ति धारण करते हुए दशापवित्र पर बैठते हैं. (३०) सूक्त—६३ देवता—पवमान सोम आ पवस्व सहस्रिणं रयिं सोम सुवीर्यम्. अस्मे श्रवांसि धारय.. (१) हे सोम! हमारे लिए अधिक संख्या वाला एवं शोभन शक्ति से युक्त धन बरसाओ तथा हमें अन्न दो. (१) इषमूर्जं च पिन्वस इन्द्राय मत्सरिन्तमः. चमूष्वा नि षीदसि.. (२) हे अतिशय मादक सोम! तुम इंद्र के लिए अन्न एवं रस टपकाते हो तथा चमस नामक पात्रों में बैठे हो. (२) सुत इन्द्राय विष्णवे सोमः कलशे अक्षरत्. मधुमाँ अस्तु वायवे.. (३) इंद्र, विष्णु एवं वायु के लिए निचोड़े गए सोम द्रोणकलश में गिरते हैं एवं मधुर रस वाले हैं. (३) एते असृग्रमाशवोऽति ह्वरांसि बभ्रवः. सोमा ऋतस्य धारया.. (४) पीले रंग वाले व शीघ्र गतियुक्त ये सोम जल की धारा से निर्मित होते हैं एवं राक्षसों पर धावा बोलते हैं. (४) इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम्. अपघ्नन्तो अराव्णः.. (५) सोम इंद्र को बढ़ाते हुए, उदक को प्रेरित करने वाले, हमारे काम के लिए सभी रसों को भला बनाते हुए एवं दान न देने वालों का नाश करते हुए जाते हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

सुता अनु स्वमा रजाऽभ्यर्षन्ति बभ्रवः. इन्द्रं गच्छन्त इन्दवः.. (६) पीले रंग के एवं निचोड़े हुए सोम इंद्र की ओर जाते हुए अपने स्थान को प्राप्त करते हैं. (६) अया पवस्व धारया यया सूर्यमरोचयः. हिन्वानो मानुषीरपः.. (७) हे सोम! तुम उस धारा से नीचे टपको, जिस धारा के द्वारा तुमने मनुष्यों के हितकारक जलों को प्रेरित करते हुए सूर्य को प्रकाशित किया है. (७) अयुक्त सूर एतशं पवमानो मनावधि. अन्तरिक्षेण यातवे.. (८) पवित्र होते हुए सोम मानवों के हित एवं अंतरिक्ष में गति के लिए सूर्य के रथ में घोड़े जोड़ते हैं. (८) उत त्या हरितो दश सूरो अयुक्त यातवे. इन्दुरिन्द्र इति ब्रुवन्.. (९) इंद्र शब्द का उच्चारण करते हुए सोम दशों दिशाओं में जाने के लिए सूर्य के रथ में एतश नामक घोड़े जोड़ते हैं. (९) परीतो वायवे सुतं गिर इन्द्राय मत्सरम्. अव्यो वारेषु सिञ्चत.. (१०) हे स्तोताओ! तुम इंद्र एवं वायु के लिए निचोड़े गए नशीले सोम को इस स्थान से उठाकर भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर सींचो. (१०) पवमान विदा रयिमस्मभ्यं सोम दुष्टरम्. यो दूणाशो वनुष्यता.. (११) हे पवित्र होते हुए सोम! तुम हमें ऐसा धन दो जो हिंसक शत्रु द्वारा नष्ट न हो सके और शत्रु जिसका पार न पा सके. (११) अभ्यर्ष सहस्रिणं रयिं गोमन्तमश्विनम्. अभि वाजमुत श्रवः.. (१२) हे सोम! तुम हमें बहुत संख्या वाला, गायों से युक्त एवं अश्वसहित धन दो तथा हमें बल और अन्न प्राप्त कराओ. (१२) सोमो देवो न सूर्योऽद्रिभिः पवते सुतः. दधानः कलशे रसम्.. (१३) सूर्य के समान तेजस्वी एवं पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए सोम अपना रस द्रोणकलश में धारण करते हुए टपकते हैं. (१३) एते धामान्यार्या शुक्रा ऋतस्य धारया. वाजं गोमन्तमक्षरन्.. (१४) ये निचुड़ते हुए एवं उज्ज्वल सोम यजमानों के घरों की ओर गायों से युक्त अन्न देते हुए ebook converter DEMO Watermarks*

जल की धारा के रूप में नीचे गिरते हैं. (१४) सुता इन्द्राय वज्रिणे सोमासो दध्याशिरः. पवित्रमत्यक्षरन्.. (१५) वज्रधारी इंद्र के लिए निचोड़े गए एवं गाय के दूध से मिश्रित सोम दशापवित्र को पार करके टपकते हैं. (१५) प्र सोम मधुमत्तमो राये अर्ष पवित्र आ. मदो यो देववीतमः.. (१६) हे सोम! तुम अपने अतिशय मादक एवं देवाभिलाषी रस को हमें धन देने के लिए दशापवित्र पर गिराओ. (१६) तमी मृजन्त्यायवो हरिं नदीषु वाजिनम्. इन्दुमिन्द्राय मत्सरम्.. (१७) ऋत्विज् लोग हरे रंग के, शक्तिशाली, नशीले एवं पवित्र हुए उस सोम को इंद्र के लिए जलों में मसलते हैं. (१७) आ पवस्व हिरण्यवदश्वावत् सोम वीरवत्. वाजं गोमन्तमा भर.. (१८) हे सोम! तुम हमारे लिए स्वर्ण, घोड़ों और संतान से युक्त धन बरसाओ एवं हमारे लिए गायों से युक्त धन दो. (१८) परि वाजे न वाजयमव्यो वारेषु सिञ्चत. इन्द्राय मधुमत्तमम्.. (१९) हे ऋत्विजो! तुम युद्धाभिलाषी व अतिशय मधुर सोम को इंद्र के लिए भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर युद्ध के समान सींचो. (१९) कविं मृजन्ति मर्ज्यं धीभिर्विप्रा अवस्यवः. वृषा कनिक्रदर्षति.. (२०) रक्षा की अभिलाषा करते हुए बुद्धिमान् ऋत्विज् उंगलियों की सहायता से मसलने योग्य एवं क्रांतकर्म वाले सोम को मसलते हैं. अभिलाषापूरक एवं शब्द करते हुए सोम धारा के रूप में गिरते हैं. (२०) वृषणं धीभिरप्तुरं सोममृतस्य धारया. मती विप्राः समस्वरन्.. (२१) बुद्धि वाले ऋत्विज् अभिलाषापूरक एवं जल बरसाने वाले सोम को उंगलियों एवं स्तुतियों के साथ जल की धारा के रूप में प्रेरित करते हैं. (२१) पवस्व देवायुषगिन्द्रं गच्छतु ते मदः. वायुमा रोह धर्मणा.. (२२) हे दीप्तिशाली सोम! धारा के रूप में गिरो. तुम्हारा नशीला रस आसक्त इंद्र के पास जावे. तुम अपने धारक रस द्वारा वायु को प्राप्त करो. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*

पवमान नि तोशसे रयिं सोम श्रवाय्यम्. प्रियः समुद्रमा विश.. (२३) हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम शत्रुओं के प्रशंसा योग्य धन को सभी प्रकार नष्ट करते हो. हे प्रिय सोम! तुम द्रोणकलश में जाओ. (२३) अपघ्नन् पवसे मृधः क्रतुवित्सोम मत्सरः. नुदस्वादेवयुं जनम्.. (२४) हे नशीले एवं शत्रुओं को नष्ट करने वाले सोम! तुम हमें बुद्धि देते हुए छनते हो. तुम देवों की अभिलाषा न करने वाले राक्षसों को समाप्त करो. (२४) पवमाना असृक्षत सीमाः शुक्रास् इन्दवः. अभि विश्वानि काव्या.. (२५) स्तुति वाक्यों को सुनने वाले, उज्ज्वल, दीप्तिशाली एवं शुद्ध होते हुए सोम ऋत्विजों द्वारा निर्मित होते हैं. (२५) पवमानास आशवः शुभ्रा असृग्रमिन्दवः. घ्नन्तो विश्वा अप द्विषः.. (२६) ऋत्विजों द्वारा शीघ्र गति वाले, शोभन, दीप्तिशाली एवं शुद्ध होते हुए सोम, शत्रुओं का हनन करने के लिए निर्मित होते हैं. (२६) पवमाना दिवस्पर्यन्तरिक्षादसृक्षत. पृथिव्या अधि सानवि.. (२७) शुद्ध होते हुए सोम स्वर्ग एवं धरती के उन्नत स्थानों एवं देवयज्ञ में निर्मित होते हैं. (२७) पुनानः सोम धारयेन्दो विश्वा अप स्रिधः. जहि रक्षांसि सुक्रतो.. (२८) हे दीप्तिशाली एवं शोभनकर्म वाले सोम! तुम धारा के रूप में छनते हुए सभी शत्रुओं और राक्षसों को मारो. (२८) अपघ्नन्त्सोम रक्षसोऽभ्यर्ष कनिक्रदत्. द्युमन्तं शुष्ममुत्तमम्.. (२९) हे सोम! तुम राक्षसों का हनन करते हुए एवं शब्द करते हुए हमें दीप्तिशाली एवं श्रेष्ठ बल दो. (२९) अस्मे वसूनि धारय सोम दिव्यानि पार्थिवा. इन्दो विश्वानि वार्या.. (३०) हे दीप्तिशाली सोम! तुम द्युलोक एवं धरती से संबंधित सभी वरण करने योग्य धनों को हमें दो. (३०) सूक्त—६४ देवता—पवमान सोम वृषा सोम द्युमाँ असि वृषा देव वृषव्रतः. वृषा धर्माणि दधिषे.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

हे सोम! तुम अभिलाषापूरक एवं दीप्तिशाली हो. हे दीप्तिशाली एवं अभिलाषापूरक सोम! तुम देवों और मानवों के उपयोगी कर्मों को धारण करते हो. (१) वृष्णस्ते वृष्ण्यं शवो वृषा वनं वृषा मदः. सत्यं वृषन् वृषेदरसि.. (२) हे अभिलाषापूरक सोम! तुम्हारा बल, तुम्हारी सेवा एवं तुम्हारा मद अभिलाषापूरक है. तुम वास्तव में अभिलाषापूरक हो. (२) अश्वो न चक्रदो वृषा सं गा इन्दो समर्वतः. वि नो राये दुरो वृधि.. (३) हे अभिलाषापूरक सोम! तुम घोड़े के समान हिनहिनाते हो. तुम हमें गाएं एवं घोड़े दो और हमारे लिए धन के द्वार खोलो. (३) असृक्षत प्र वाजिनो गव्या सोमासो अश्व्या. शुक्रासो वीरयाशवः.. (४) ऋत्विजों ने शक्तिशाली, उज्ज्वल एवं वेगशाली सोम का निर्माण गायों, घोड़ों और संतान को पाने की अभिलाषा से किया है. (४) शुम्भमाना ऋतायुभिर्मृज्यमाना गभस्त्योः. पवन्ते वारे अव्यये.. (५) यज्ञाभिलाषी यजमानों द्वारा अलंकृत एवं दोनों हाथों से मसले जाते हुए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर छनते हैं. (५) ते विश्वा दाशुषे वसु सोमा दिव्यानि पार्थिवा. पवन्तामान्तरिक्ष्या.. (६) वे सोम हव्य देने वाले यजमान के लिए द्युलोक, धरती एवं अंतरिक्ष में उत्पन्न सभी धन बरसावें. (६) पवमानस्य विश्ववित्प्र ते सर्गा असृक्षत. सूर्यस्येव न रश्मयः.. (७) हे सबको देखने वाले एवं छनते हुए सोम! तुम्हारी बनती हुई धारें इस समय सूर्य किरणों के समान चमकती हुई निर्मित होती हैं. (७) केतुं कृण्वन्दिवस्परि विश्वा रूपाभ्यर्षसि. समुद्रः सोम पिन्वसे.. (८) हे रस भरे हुए सोम! तुम हमारी पहचान करते हुए हमारे लिए सभी रूप अंतरिक्ष से बरसाओ एवं हमें भांति-भांति का धन दो. (८) हिन्वानो वाचमिष्यसि पवमान विधर्मणि. अक्रान्देवो न सूर्यः.. (९) हे छनते हुए सोम! जब तुम सूर्य देव के समान दशापवित्र पर पहुंचते हो, तब तुम प्रेरणा पाकर शब्द करते हो. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

इन्दुः पविष्ट चेतनः प्रियः कवीनां मती. सृजदश्वं रथीरिव.. (१०) ज्ञान कराने वाले व देवों के प्रिय सोम क्रांतकर्म वाले स्तोताओं की स्तुतियां सुनकर पवित्र होते हैं. जैसे रथी घोड़े को चलाता है, उसी प्रकार सोम अपनी लहरें आगे बढ़ाते हैं. (१०) ऊर्मिर्यस्ते पवित्र आ देवावीः पर्यक्षरत्. सीदन्नृतस्य योनिमा.. (११) हे सोम! तुम्हारी देवाभिलाषिणी लहरें यज्ञ के स्थान में दशापवित्र पर बैठती हैं. (११) स नो अर्ष पवित्र आ मदो यो देववीतमः. इन्द्विन्द्राय पीतये.. (१२) हे दीप्तिशाली, नशीले एवं अतिशय देवाभिलाषी सोम! तुम इंद्र के पीने के लिए हमारे दशापवित्र पर गिरो. (१२) इषे पवस्व धारया मृज्यमानो मनीषिभिः. इन्दो रुचाभि गा इहि.. (१३) ऋत्विजों द्वारा मसले जाते हुए हे सोम! तुम हमें अन्न देने के लिए टपको एवं तेजस्वी अन्न के साथ हमारी गायों के समीप आओ. (१३) पुनानो वरिवस्कृध्यूर्जं जनाय गिर्वणः. हरे सृजान आशिरम्.. (१४) हे स्तुतियों द्वारा प्रशंसनीय, हरे रंग वाले, दूध में डाले जाते हुए एवं पवित्र होते हुए सोम! तुम यजमान को अन्न और धन दो. (१४) पुनानो देववीतय इन्द्रस्य याहि निष्कृतम्. द्युतानो वाजिभिर्यतः.. (१५) हे शक्तिशाली, यजमानों द्वारा गृहीत, यज्ञ के निमित्त शुद्ध होते हुए एवं दीप्तिशाली सोम! तुम इंद्र के स्थान पर जाओ. (१५) प्र हिन्वानास इन्दवोऽच्छा समुद्रमाशवः. धिया जूता असृक्षत.. (१६) वेगशाली एवं अंतरिक्ष की ओर प्रेरित सोम उंगलियों से आकृष्ट होकर निर्मित होते हैं. (१६) मर्मृजानास आयवो वृथा समुद्रमिन्दवः. अगमन्नृतस्य योनिमा.. (१७) मसले जाते हुए एवं गतिशील सोम बिना कारण ही अंतरिक्ष एवं जलपात्र की ओर जाते हैं. (१७) परि णो याह्यस्मयुर्विश्वा वसून्र्योजसा. पाहि नः शर्म वीरवत्.. (१८) हे हमें चाहने वाले सोम! तुम शक्ति द्वारा हमारे सभी धनों की रक्षा के लिए आओ तथा ebook converter DEMO Watermarks*

हमारे संतान वाले घरों की रक्षा करो. (१८) मिमाति वह्निरेतशः पदं युजान ऋक्वभिः. प्र यत्समुद्र आहितः.. (१९) हे सोम! जब तुम ढोने वाले घोड़े के समान हिनहिनाते हो और स्तोताओं द्वारा स्तुतियां सुनने के लिए यज्ञ स्थल में बुलाए जाते हो, तब तुम जल में स्थित होते हो. (१९) आ यद्योनिं हिरण्ययमाशुरृतस्य सीदति. जहात्यप्रचेतसः.. (२०) शीघ्रगति वाले सोम जब यज्ञ के सुनहरे स्थान पर बैठते हैं, तब स्तोत्र न बोलने वालों के यज्ञ को छोड़ देते हैं. (२०) अभि वेना अनूषतेयक्षन्ति प्रचेतसः. मज्जन्त्यविचेतसः.. (२१) सुंदर स्तोता सोम की स्तुति करते हैं, शोभन बुद्धि वाले लोग सोम के लिए यज्ञ करना चाहते हैं एवं बुद्धिहीन लोग नरक में डूबते हैं. (२१) इन्द्रायेन्दो मरुत्वते पवस्व मधुमत्तमः. ऋतस्य योनिमासदम्.. (२२) हे अतिशय मधुर सोम! तुम यज्ञ के स्थान पर बैठने के लिए एवं इंद्र के पीने के हेतु टपको. (२२) तं त्वा विप्रा वचोविदः परिष्कृण्वन्ति वेधसः. सं त्वा मृजन्त्यायवः.. (२३) हे छनते हुए सोम! विद्वान् एवं यज्ञकर्म करने वाले स्तोता तुम्हें अलंकृत करते हैं और मनुष्य तुम्हें भली प्रकार मसलते हैं. (२३) रसं ते मित्रो अर्यमा पिबन्ति वरुणः कवे. पवमानस्य मरुतः.. (२४) हे क्रांतकर्मा एवं टपकने वाले सोम! तुम्हारा रस मित्र, अर्यमा, वरुण और मरुद्गण पीते हैं. (२४) त्वं सोम विपश्चितं पुनानो वाचमिष्यसि. इन्दो सहस्रभर्णसम्.. (२५) हे दीप्तिशाली एवं पवित्र होते हुए सोम! तुम हमें ऐसा वचन दो, जो हजारों का भरण करने वाला एवं बुद्धि द्वारा पवित्र हो. (२५) उतो सहस्रभरणसं वाचं सोम मखस्युवम्. पुनान इन्दवा भर.. (२६) हे दीप्तिशाली एवं छनते हुए सोम! तुम हमें ऐसी वाणी दो, जो हजारों का भरण करने वाली एवं हमें धन देने की अभिलाषा वाली हो. (२६) पुनान इन्द्वेषां पुरुहूत जनानाम्. प्रियः समुद्रमा विश.. (२७) ebook converter DEMO Watermarks*

हे बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं छनते हुए सोम! तुम इस यज्ञ में स्तोत्र बोलने वाले लोगों के प्यारे बनकर द्रोणकलश में घुसो. (२७) दविद्युतत्या रुचा परिष्टोभन्त्या कृपा. सोमाः शुक्रा गवाशिरः.. (२८) उज्ज्वल, चमकती हुई दीप्ति से युक्त एवं चारों ओर शब्द करने वाली धारा वाले सोम गाय के दूध में मिलते हैं. (२८) हिन्वानो हेतृभिर्यत आ वाजं वाज्यक्रमीत्. सीदन्तो वनुषो यथा.. (२९) जैसे युद्धस्थल में प्रवेश करने वाले योद्धा आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार शक्तिशाली सोम स्तोताओं द्वारा प्रेरित एवं संयत होकर यज्ञभूमि पर चलते हैं. (२९) ऋधक्सोम स्वस्तये सज्जग्मानो दिवः कविः. पवस्व सूर्यो दृशे.. (३०) हे बुद्धिमान् एवं शोभन शक्ति वाले सोम! तुम सबसे मिलकर सबके कल्याण और दर्शन के लिए स्वर्ग से बरसो. (३०) सूक्त—६५ देवता—पवमान सोम हिन्वन्ति सूरमुस्रयः स्वसारो जामयस्पतिम्. महामिन्दुं महीयुवः.. (१) हे सोम! कार्यकुशल एवं परस्पर मित्रता रखने वाली मेरी उंगलियां रूपी स्त्रियां तुम्हारा रस निचोड़ने की अभिलाषा से तुम्हारे क्षरण को प्रेरित करती हैं. तुम शोभन-वीर्य वाले, सबके पालनकर्त्ता, महान् एवं दीप्तिशाली हो. (१) पवमान रुचारुचा देवो देवेभ्यस्परि. विश्वा वसून्या विश.. (२) हे दशापवित्र से छनते हुए सोम! तुम अपने संपूर्ण तेज के द्वारा दीप्त होकर देवों के पास से सब धन हमें दो. (२) आ पवमान सुष्टुतिं वृष्टिं देवेभ्यो दुवः. इषे पवस्व संयतम्.. (३) हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम देवों की शोभा के लिए शोभन स्तुति वाली वर्षा करो एवं अन्न के लिए हमारे पास वर्षा को भेजो. (३) वृषा ह्यसि भानुना द्युमन्तं त्वा हवामहे. पवमान स्वाध्यः.. (४) हे सोम! तुम अभिमत फल देने वाले हो. हे शुद्ध होते हुए सोम! हम शोभन कर्म वाले लोग तेजोदीप्त तुमको अपने यज्ञों में बुलाते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

आ पवस्व सुवीर्यं मन्दमानः स्वायुध. इहो ष्विन्दवा गहि.. (५) हे शोभन-आयुधों वाले सोम! तुम देवों को प्रसन्न करते हुए हमें शोभन वीर्य वाला पुत्र दो एवं इस यज्ञ में आओ. (५) यदद्भिः परिषिच्यसे मृज्यमानो गभस्त्योः. द्रोणा सधस्थमश्रुषे.. (६) हे सोम! तुम दोनों हाथों से मसले एवं जल से भिगोए जाते हो. तुम द्रोणपात्र में ठहरकर चमस आदि पात्रों में भरे जाते हो. (६) प्र सोमाय व्यश्ववत्पवमानाय गायत. महे सहस्रचक्षसे.. (७) हे स्तोताओ! तुम दशापवित्र से छनते हुए महान् एवं हजारों स्तुतियों वाले सोम की प्रशंसा में व्यश्व ऋषि के समान गीत गाओ. (७) यस्य वर्णं मधुश्चतं हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः. इन्दुमिन्द्राय पीतये.. (८) हे अध्वर्युगण! तुम शत्रुओं को रोकने वाले, रस टपकाने वाले, हरे रंग से युक्त एवं दीप्तिशाली सोम को इंद्र के पीने के निमित्त पत्थरों की सहायता से निचोड़ो. (८) तस्य ते वाजिनो वयं विश्वा धनानि जिग्युषः. सखित्वमा वृणीमहे.. (९) हे सोम! तुम शक्तिशाली एवं शत्रुओं का धन जीतने वाले हो. हम तुम्हारी मित्रता का वरण करते हैं. (९) वृषा पवस्व धारया मरुत्वते च मत्सरः. विश्वा दधान ओजसा.. (१०) हे अभिलाषापूरक सोम! तुम धारा के रूप में द्रोणकलश तक आओ एवं इंद्र के लिए प्रसन्नतादायक बनो. तुम अपनी शक्ति से सभी धन स्तोताओं को देते हो. (१०) तं त्वा धर्तारमोण्यो३ः पवमान स्वर्दृशम्. हिन्वे वाजेषु वाजिनम्.. (११) हे छनते हुए सोम! तुम द्यावा-पृथिवी के धारणकर्त्ता, सबके द्रष्टा व शक्तिशाली हो. मैं तुम्हें युद्धों में भेजता हूं. (११) अया चित्तो विपानया हरिः पवस्व धारया. युजं वाजेषु चोदय.. (१२) हे मेरी उंगलियों से निचुड़े हुए एवं हरे रंग वाले सोम! तुम द्रोणकलश में जाओ एवं अपने मित्र इंद्र को संग्रामों में भेजो. (१२) आ न इन्दो महीमिषं पवस्व विश्वदर्शतः. अस्मभ्यं सोम गातुवित्.. (१३) हे सर्वद्रष्टा एवं दीप्तिशाली सोम! तुम हमें बहुत सा अन्न दो. हे सोम! हमारे लिए स्वर्ग ebook converter DEMO Watermarks*

का मार्ग बताओ. (१३) आ कलशा अनूषतेन्दो धाराभिरोजसा. एन्द्रस्य पीतये विश.. (१४) हे टपकने वाले सोम! तुझ ओजस्वी की निरंतर धाराओं से युक्त द्रोणकलश की स्तोता स्तुति करते हैं. तुम इंद्र के पीने के लिए द्रोणकलश में प्रवेश करो. (१४) यस्य ते मद्यं रसं तीव्रं दुहन्त्यद्रिभिः. स पवस्वाभिमातिहा.. (१५) हे सोम! तुम्हारे जल्दी नशा करने वाले जिस रस को अध्वर्यु पत्थरों की सहायता से दुहते हैं, तुम शत्रुओं का हनन करते हुए उसी रस को बरसाओ. (१५) राजा मेधाभिरीयते पवमानो मनावधि. अन्तरिक्षेण यातवे.. (१६) जिस समय मनुष्य यज्ञ करते हैं, उस समय राजा सोम अंतरिक्ष मार्ग से द्रोणकलश में जाते हुए प्रशंसित होते हैं. (१६) आ न इन्दो शतग्विनं गवां पोषं स्वश्व्यम्. वहा भगत्तिमूतये.. (१७) हे दीप्तिशाली सोम! तुम सौ गायों वाला, गायों को पुष्ट करने वाला व शोभन अश्वों से युक्त धन हमारी रक्षा के लिए दो. (१७) आ नः सोम सहो जुवो रूपं न वर्चसे भर. सुष्वाणो देववीतये.. (१८) हे देवों की प्रसन्नता के लिए निचुड़ते हुए सोम! हमें सर्वत्र गमनयोग्य बल एवं सर्वत्र प्रकाश के नए रूप दो. (१८) अर्षा सोम द्युमत्तमोऽभि द्रोणानि रोरुवत्. सीदञ्छ्येनो न योनिमा.. (१९) हे सोम! जिस प्रकार बाज पक्षी शब्द करता हुआ अपने घोंसले में आता है, उसी प्रकार तुम दीप्तिशाली बनकर द्रोणकलश में जाते हो. (१९) अप्सा इन्द्राय वायवे वरुणाय मरुद्भ्यः. सोमो अर्षति विष्णवे.. (२०) जल में मिलने वाले सोम इंद्र, वायु, वरुण, विष्णु एवं मरुद्गणों के लिए बहते हैं. (२०) इषं तोकाय नो दधदस्मभ्यं सोम विश्वतः. आ पवस्व सहस्रिणम्.. (२१) हे सोम! तुम हमारे पुत्र के लिए अन्न देते हुए हमारे लिए सब ओर से हजारों तरह का धन बरसाओ. (२१) ये सोमासः परावति ये अर्वावति सुन्विरे. ये वादः शर्यणावति.. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*

इन्द्र के निमित्त दूरवर्ती अथवा परवर्ती स्थान में तथा शर्यणावत नामक तालाब में निचुड़ने वाले सोम हमें अभिमत फल दें. (२२) य आर्जीकेषु कृत्वसु ये मध्ये पस्त्यानाम्. ये वा जनेषु पञ्चसु.. (२३) आर्जीक एवं कृत्व नामक देशों में निचुड़ने वाले तथा सरस्वती और पांच नदियों के समीप निचुड़ने वाले सोम हमें अभिमत फल दें. (२३) ते नो वृष्टिं दिवस्परि पवन्तामा सुवीर्यम्. सुवाना देवास इन्दवः.. (२४) वे निचोड़े गए, दीप्तिशाली एवं चमस आदि पात्रों में टपकते हुए सोम हमें आकाश से होने वाली वर्षा एवं शोभन बलयुक्त पुत्र दें. (२४) पवते हर्यतो हरिर्गृणानो जमदग्निना. हिन्वानो गोरधि त्वचि.. (२५) देवों की अभिलाषा करते हुए, हरितवर्ण, गाय के चमड़े पर रखे हुए एवं जमदग्नि ऋषि द्वारा स्तुत सोम दशापवित्र के द्वारा शुद्ध होते हैं. (२५) प्र शुक्रासो वयोजुवो हिन्वानासो न सप्तयः. श्रीणाना अप्सु मृञ्जत.. (२६) ऋत्विजों द्वारा दीप्तिशाली, अन्न देते हुए एवं गाय के दूध से मिश्रित सोम जल में इस प्रकार मसले जाते हैं, जैसे घोड़े को स्नान कराया जाता है. (२६) तं त्वा सुतेष्वाभुवो हिन्विरे देवतातये. स पवस्वानया रुचा.. (२७) हे सोम! यज्ञ में ऋत्विज् तुम्हें पत्थरों की सहायता से इंद्रादि देवों के लिए निचोड़ते हैं. तुम दीप्ति वाली धारा के साथ द्रोणकलश में गिरो. (२७) आ ते दक्षं मयोभुवं वह्निमद्या वृणीमहे. पान्तमा पुरुस्पृहम्.. (२८) हे सोम! हम स्तोता आज तुम्हारे सुखदाता, धनादि के वहन करने वाले, शत्रुओं से रक्षा करने वाले एवं बहुतों द्वारा अभिलषित बल को वरण करते हैं. (२८) आ मन्द्रमा वरेण्यमा विप्रमा मनीषिणम्. पान्तमा पुरुस्पृहम्.. (२९) हे मदकारक व सबके द्वारा वरण करने योग्य सोम! बुद्धिमान्, मनीषी, सबके रक्षक तथा बहुतों द्वारा अभिलाषा के योग्य तुमको हम वरण करते हैं. (२९) आ रयिमा सुचेतुनमा सुक्रतो तनूष्वा. पान्तमा पुरुस्पृहम्.. (३०) हे शोभन-कर्म वाले सोम! हम तुम्हारे धन का वरण करते हैं. तुम हमारे पुत्रों को धन दो. हे सबके रक्षक एवं बहुतों द्वारा अभिलषित सोम! हम तुम्हारी सेवा करते हैं. (३०) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—६६ देवता—अग्नि व पवमान सोम

सूक्त—६६ देवता—अग्नि व पवमान सोम पवस्व विश्वचर्षणेऽभि विश्वानि काव्या. सखा सखिभ्य ईड्यः.. (१) हे सबके देखने वाले, सखा एवं स्तुति योग्य सोम! हम सखाओं के सभी अभिलषणीय कर्मों एवं स्तुतियों को देखकर हमारे कल्याण के लिए बरसो. (१) ताभ्यां विश्वस्य राजसि ये पवमान धामनी. प्रतीची सोम तस्थतुः.. (२) हे शुद्ध होते सोम! तुम्हारे जो दो टेढ़े पत्ते हैं, उनसे तुम सारे संसार के राजा बनते हो. (२) परि धामानि यानि ते त्वं सोमासि विश्वतः. पवमान ऋतुभिः कवे.. (३) हे शुद्ध होते हुए एवं क्रांतकर्म वाले सोम! तुम्हारा तेज चारों ओर फैला है. तुम ऋतुओं के साथ सुशोभित हो. (३) पवस्व जनयन्निषोऽभि विश्वानि वार्या. सखा सखिभ्य ऊतये.. (४) हे सखा सोम! हम मित्रों की स्तुतियों पर ध्यान देकर हमारी रक्षा के लिए हमें अन्न देते हुए आओ. (४) तव शुक्रासो अर्चयो दिवस्पृष्ठे वि तन्वते. पवित्रं सोम धामभिः.. (५) हे सोम! तुम्हारी ज्वलनशील एवं तेजपूर्ण रश्मियां द्युलोक के ऊपर वाले भाग पर जल का विस्तार करती हैं. (५) तवेमे सप्त सिन्धवः प्रशिषं सोम सिस्रते. तुभ्यं धावन्ति धेनवः.. (६) हे सोम! ये सात नदियां तुम्हारा शासन मानती हैं एवं गाएं तुम्हारे लिए ही दूध देने के हेतु दौड़कर आती हैं. (६) प्र सोम याहि धारया सुत इन्द्राय मत्सरः. दधानो अक्षिति श्रवः.. (७) हे हमारे द्वारा निचोड़े गए एवं इंद्र को नशा कराने वाले सोम! तुम हमारे लिए अक्षय धन देते हुए दशापवित्र से निकलकर द्रोणकलश में जाओ. (७) समु त्वा धीभिरस्वरन्हिन्वतीः सप्त जामयः. विप्रमाजा विवस्वतः.. (८) हे मेधावी सोम! यजमान के यज्ञ में स्तुति करते हुए सात होता तुम्हारी प्रशंसा करते हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

मृजन्ति त्वा समग्रुवोऽव्ये जीरावधि ष्वणि. रेभो यदज्यसे वने.. (९) हे सोम! जब तुम शब्द करते हुए जल में मिलते हो, तब हम अधिक शब्द करते हुए एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर तुम्हें निचोड़ते हैं. (९) पवमानस्य ते कवे वाजिन्सर्गा असृक्षत. अर्वन्तो न श्रवस्यवः.. (१०) हे क्रांत बुद्धि वाले एवं अन्नयुक्त सोम! जब तुम दशापवित्र से छनते हो, तब यजमानों के लिए अन्न लाने की इच्छुक तुम्हारी धाराएं घोड़ों के समान दौड़ती हैं. (१०) अच्छा कोशं मधुश्रुतमसृग्रं वारे अव्यये. अवावशन्त धीतयः.. (११) ऋत्विजों द्वारा मधुर रस टपकाने वाले सोम द्रोणकलश में जाने के लिए सदा दशापवित्र पर गिराए जाते हैं. हमारी उंगलियां सोम को बार-बार मसलना चाहती हैं. (११) अच्छा समुद्रमिन्दवोऽस्तं गावो न धेनवः. अग्मन्नृतस्य योनिमा.. (१२) जिस प्रकार नई ब्याई हुई गाएं दूध देकर गोशाला की ओर जाती हैं, उसी प्रकार सोम द्रोणकलश एवं यज्ञशाला की ओर जाते हैं. (१२) प्र ण इन्दो महे रण आपो अर्षन्ति सिन्धवः. यद् गोभिर्वासयिष्यसे.. (१३) हे सोम! जब तुम्हें गाय के दूध, दही आदि में मिलाया जाता है तब जल हमारे विशाल यज्ञ की ओर आते हैं. (१३) अस्य ते सख्ये वयमियक्षन्तस्त्वोतयः. इन्दो सखित्वमुश्मसि.. (१४) हे सोम! तुम्हारी पूजा के अभिलाषी एवं तुम्हारे मैत्रीकर्म में स्थित हम लोग तुम्हारा सख्य चाहते हैं. (१४) आ पवस्व गविष्टये महे सोम नृचक्षसे. इन्द्रस्य जठरे विश.. (१५) हे सोम! तुम अंगिरागोत्रीय ऋषियों की गाएं खोजने वाले, महान् तथा मानवों का कर्मफल देखने वाले इंद्र के लिए शुद्ध बनो एवं इंद्र के उदर में प्रवेश करो. (१५) महाँ असि सोम ज्येष्ठ उग्राणामिन्द ओजिष्ठः. युध्वा सञ्छश्वज्जगेथ.. (१६) हे सोम! तुम महान्, देवों को प्रसन्न करने वाले एवं परम प्रशंसनीय हो. हे पवमान सोम! तुम उग्र बल वाले लोगों में अतिशय ओजस्वी हो. तुमने शत्रुओं के साथ युद्ध करते हुए उनका धन जीत लिया था. (१६) य उग्रेभ्यश्चिदोजियाञ्छूरेभ्यश्चिच्छूरतरः. भूरिदाभ्यश्चिन्मंहीयान्.. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*

सोम उग्रों में अतिशय उग्र, शूरों में अतिशय शूर एवं अधिक दान करने वालों में महान् हैं. (१७) त्वं सोम सूर एषस्तोकस्य साता तनूनाम्. वृणीमहे सख्याय वृणीमहे युज्याय.. (१८) हे शोभन वीर्य वाले सोम! हमें अन्न एवं पुत्र की संतानें दो. हम मैत्री और सहायता के लिए तुम्हारा वरण करते हैं. (१८) अग्न आयूंषि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः. आरे बाधस्व दुच्छुनाम्.. (१९) हे पवमान सोमरूप अग्नि! तुम हमारे जीवनों की रक्षा करते हो. तुम हमें बल तथा अन्न दो एवं शत्रुओं को हमसे दूर रखकर पीड़ा पहुंचाओ. (१९) अग्निर्ऋर्षिः पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः. तमीमहे महागयम्.. (२०) अग्नि पांचों वर्णों के हितैषी, सबके द्रष्टा, पवित्र होते हुए पुरोहित एवं यजमानों द्वारा स्तुत्य हैं. हम अग्नि से याचना करते हैं. (२०) अग्ने पवस्व स्वपा अस्मे वर्चः सुवीर्यम्. दधद्रयिं मयि पोषम्.. (२१) हे शोभन कर्म वाले अग्नि! तुम हमें शोभन शक्ति वाला तेज, धन एवं गाएं प्रदान करो. (२१) पवमानो अति स्रिधोऽभ्यर्षति सुष्टुतिम्. सूरो न विश्वदर्शतः.. (२२) पवमान सोम शत्रुओं को हराते हैं, शोभन स्तुति सामने से स्वीकार करते हैं एवं सूर्य के समान सबको देखते हैं. (२२) स मर्मृजान आयुभिः प्रयस्वान्प्रयसे हितः. इन्दुरत्यो विचक्षणः.. (२३) मनुष्यों द्वारा बार-बार निचोड़े जाते हुए अन्न के स्वामी, यजमान के लिए हितैषी एवं सबके द्रष्टा सोम देवों के समीप सदा जाते हैं. (२३) पवमान ऋतं बृहच्छुक्रं ज्योतिरजीजनत्. कृष्णा तमांसि जङ्घनत्.. (२४) पवमान सोम ने काले अंधकार को समाप्त करते हुए सत्यरूप, व्यापक व दीप्तिशाली तेज उत्पन्न किया था. (२४) पवमानस्य जङ्घ्नतो हरेश्चन्द्रा असृक्षत. जीरा अजिरशोचिषः.. (२५) बार-बार अंधकार का विनाश करते हुए, हरितवर्ण, गतिशील तेज से युक्त एवं शुद्ध होते हुए सोम को आनंदित करने वाली व तेज बहने वाली धाराएं दशापवित्र में गिरती हैं. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*

पवमानो रथीतमः शुभ्रेभिः शुभ्रशस्तमः. हरिश्चन्द्रो मरुद्गणः.. (२६) रथ स्वामियों में श्रेष्ठ, यशस्वी लोगों में परम यशस्वी, हरी धाराओं वाले एवं मरुतों की सहायता से युक्त सोम अपनी दीप्तियों से सबको व्याप्त करते हैं. (२६) पवमानो व्यश्ववद्रश्मिभिर्वाजसातमः. दधत्स्तोत्रे सुवीर्यम्.. (२७) अन्न देने वालों में श्रेष्ठ व पवमान स्तोत्र बोलने वाले को शोभन वीर्य वाला पुत्र देने वाले सोम अपनी दीप्तियों से सारे संसार को व्याप्त कर लें. (२७) प्र सुवान इन्दुरक्षाः पवित्रमत्यव्ययम्. पुनान इन्दुरिन्द्रमा.. (२८) पवित्र होते हुए सोम भेड़ के बालों से बने कंबल को पार करके टपकते हैं अर्थात् पवित्र होते हुए सोम इंद्र के पास पहुंचें. (२८) एष सोमो अधि त्वचि गवां क्रीळत्यद्रिभिः. इन्द्रं मदाय जोहुवत्.. (२९) ये किरणरूपी सोम गाय के चमड़े के ऊपर पत्थरों से क्रीड़ा करते हैं. इंद्र ने मद के निमित्त सोम को बुलाया. (२९) यस्य ते द्युम्नवत्पयः पवमानाभृतं दिवः. तेन नो मृळ जीवसे.. (३०) हे पवित्र होते हुए सोम! बाज पक्षी रूपिणी गायत्री द्वारा द्युलोक से लाया गया व अन्नयुक्त दूध तुम्हारा अपना है. हमें उसके द्वारा चिरजीवन पाने के लिए सुखी बनाओ. (३०) सूक्त—६७ देवता—पवमान सोम त्वं सोमासि धारयुर्मन्द्र ओजिष्ठो अध्वरे. पवस्व मंहयद्रयिः.. (१) हे सोम! तुम अतिशय आनंददाता, परम तेजस्वी एवं हमारे यज्ञ में निचुड़ने वाली धाराओं के अभिलाषी हो. तुम स्तोताओं को धन देते हुए नीचे गिरो. (१) त्वं सुतो नृमादनो दधन्वान्मत्सरिन्तमः. इन्द्राय सूरिरन्धसा.. (२) हे सोम! तुम ऋत्विजों को आनंदित करने वाले, यज्ञ धारण करने वाले, विद्वान् एवं हमारे द्वारा निचोड़े गए हो. तुम हव्यरूप अन्न के साथ इंद्र को अतिशय मद करने वाले बनो. (२) त्वं सुष्वाणो अद्रिभिर्भव्यर्ष कनिक्रदत्. द्युमन्तं शुष्ममुत्तमम्.. (३) हे सोम! तुम पत्थरों की सहायता से निचोड़े जाकर शब्द करते हुए द्रोणकलश में आओ ebook converter DEMO Watermarks*