ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
ब्राह्मणासः सोमिनो वाचमक्रत ब्रह्म कृण्वन्तः परिवत्सरीणम्. अध्वर्यवो घर्मिणः सिष्विदाना आविर्भवन्ति गुह्या न के चित्.. (८) ये मेंढक उसी प्रकार बोलते हैं, जिस प्रकार सोमरस धारण करने वाले स्तोता वार्षिक स्तुति करते हैं. प्रवर्ग का आचरण करने वाले ऋत्विजों के समान धूप से गीले शरीर वाले एवं बिलों में छिपे हुए मेंढक प्रकट होते हैं. (८) देवहितं जुगुपुर्द्वादशस्य ऋतुं नरो न प्र मिनन्त्येते. संवत्सरे प्रावृष्यागतायां तप्ता घर्मा अश्नुवते विसर्गम्.. (९) नेताओं के समान ये मेंढक देवनिर्मित नियमों का पालन करते हैं तथा बारह महीनों के रूप में आने वाली ऋतुओं को नष्ट नहीं करते. एक वर्ष बीतने पर जब वर्षा आती है तो गरमी के ताप से दुःखी मेंढक गड्ढों से बाहर निकलते हैं. (९) गोमायुरदादजमायुरदात्पृश्निरदाद्धरितो नो वसूनि. गवां मण्डूका ददतः शतानि सहस्रसावे प्र तिरन्त आयुः.. (१०) गाय की तरह बोलने वाला, बकरी की तरह बोलने वाला, भूरे रंग का एवं हरे रंग का मेंढक हमें संपत्ति दे. हजारों ओषधियों को उत्पन्न करने वाली वर्षार्ऋतु में मेंढक सैकड़ों गाएं देते हुए हमारी आयुवृद्धि करें. (१०) सूक्त—१०४ देवता—सोम आदि इन्द्रासोमा तपतं रक्ष उब्जतं न्यर्पयतं वृषणा तमोवृधः. परा शृणीतमचितो न्योषतं हतं नुदेथां नि शिशीतमत्रिणः.. (१) हे इंद्र तथा सोम! तुम राक्षसों को कष्ट दो तथा उनको नष्ट करो. हे अभिलाषापूरको! तुम अंधकार में बढ़ने वाले राक्षसों को नीचे गिराओ. तुम अज्ञानी राक्षसों को परांगमुख करके नष्ट करो, जलाओ, मारो, फेंक दो एवं मनुष्यभक्षी राक्षसों को घायल करो. (१) इन्द्रासोमा समघशंसमभ्य१घं तपुर्ययस्तु चरुरग्निवाँ इव. ब्रह्मद्विषे क्रव्यादे घोरचक्षसे द्वेषो धत्तमनवायं किमीदिने.. (२) हे इंद्र एवं सोम! तुम पाप की प्रशंसा करने वाले राक्षसों को भली प्रकार नष्ट करो. तुम अपने तेज द्वारा संतप्त राक्षसों को इस प्रकार समाप्त कर दो, जिस प्रकार अग्नि में डाला हुआ चरु लुप्त हो जाता है. ब्राह्मणों से द्वेष रखने वाले, मांसभक्षक, डरावने नेत्रों वाले एवं कठोरभाषी राक्षसों के प्रति ऐसा व्यवहार करो, जिससे उनके प्रति तुम्हारा सदा द्वेष रहे. (२) इन्द्रासोमा दुष्कृतो वव्रे अन्तरनारम्भणे तमसि प्र विध्यतम्. ebook converter DEMO Watermarks*
यथा नातः पुनरेकश्चनोदयत्तद्वामस्तु सहसे मन्युमच्छवः.. (३) हे इंद्र एवं सोम! तुम बुरे कर्म करने वाले राक्षसों को वारक मरुस्थल एवं आश्रयहीन अंधकार में फेंक कर मारो, जिससे एक भी राक्षस जीवित न उठ सके. क्रोधयुक्त तुम्हारा वह प्रसिद्ध बल राक्षसों को दबाने में समर्थ हो. (३) इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवो वधं सं पृथिव्या अघशंसाय तर्हणम्. उत्तक्षतं स्वर्यं१ पर्वतेभ्यो येन रक्षो वावृधानं निजूर्वथः.. (४) हे इंद्र एवं सोम! तुम अंतरिक्ष से हननसाधन आयुध उत्पन्न करो. पापों की प्रशंसा करने वाले के लिए तुम धरती से आयुध उत्पन्न करो. तुम बादलों से उस घातक वज्र को उत्पन्न करो जिसने बढ़े हुए राक्षस को नष्ट किया था. (४) इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवस्पर्यग्नितप्तेभिर्युवमश्महन्मभिः. तपुर्वधेभिरजरेभिरत्रिणो नि पर्शने विध्यतं यन्तु निस्वरम्.. (५) हे इंद्र एवं सोम! अंतरिक्ष के चारों ओर आयुधों को भेजो. तुम अग्नि के द्वारा तपाए हुए, संतापदायक, प्रहार वाले, जरारहित एवं पत्थरों से निर्मित हननसाधन आयुधों द्वारा राक्षसों के आसपास के स्थान विदीर्ण करो. इससे वे राक्षस चुपचाप भाग जाएंगे. (५) इन्द्रासोमा परि वां भूतु विश्वत इयं मतिः कक्ष्याश्वेव वाजिना. यां वां होत्रां परिहिनोमि मेधयेमा ब्रह्माणि नृपतीव जिन्वतम्.. (६) हे इंद्र एवं सोम! जिस प्रकार दोनों ओर बंधी हुई रस्सी घोड़े को बांधती है, उसी प्रकार यह स्तुति तुम्हें प्रभावित करे. मैं बुद्धिबल से यह स्तुति तुम्हारे पास भेज रहा हूं. राजा जिस प्रकार धन से मांगने वाले की इच्छा पूरी करता है, उसी प्रकार तुम इस स्तुति को सफल बनाओ. (६) प्रति स्मरेथां तुजयद्भिरैवेर्हतं द्रुहो रक्षसो भङ्गुरावतः. इन्द्रासोमा दुष्कृते मा सुगं भूद्यो नः कदा चिदभिदासति द्रुहा.. (७) हे इंद्र एवं सोम! तुम शीघ्र चलने वाले घोड़ों की सहायता से आओ. तुम द्रोही एवं तोड़फोड़ करने वाले राक्षसों को नष्ट करो. दुष्कर्म वाले राक्षस को सुख प्राप्त न हो. वह द्रोहभावना के कारण हमें कभी न कभी मार सकता है. (७) यो मा पाकेन मनसा चरन्तमभिचष्टे अनृतेभिर्वचोभिः. आपइव काशिना सङ्गृभीता असन्नस्त्वासत इन्द्र वक्ता.. (८) हे इंद्र! जो राक्षस मुझ सच्चे मन एवं आचरण वाले को असत्यवादी कहता है, वह झूठ बोलने वाला राक्षस इस प्रकार नष्ट हो जाए, जिस प्रकार मुट्ठी में बंद पानी समाप्त हो जाता ebook converter DEMO Watermarks*
है. (८) ये पाकशंसं विहरन्त एवैर्ये वा भद्रं दूषयन्ति स्वधाभिः. अहये वा तान् प्रददातु सोम आ वा दधातु निरृतेरुपस्थे.. (९) जो राक्षस मुझ सत्यवादी को अपने स्वार्थों के कारण बदनाम करते हैं एवं जो बली राक्षस मुझ भले आदमी को दोषी ठहराते हैं, सोमदेव उन्हें सांप को दे दें अथवा पाप देव की गोद में धारण करें. (९) यो ना रसं दिप्सति पित्वो अग्ने यो अश्वानां यो गवां यस्तनूनाम्. रिपुः स्तेनः स्तेयकृद्ध्रमेतु नि ष हीयतां तन्वा३ तना च.. (१०) हे अग्नि! जो राक्षस हमारे अन्न का रस नष्ट करना चाहता है, जो हमारी गायों, घोड़ों एवं संतानों के सार समाप्त करना चाहता है, वह शत्रु, चोर एवं धन छीनने वाला नाश को प्राप्त हो. वह अपने शरीर एवं संतान दोनों से नाश को प्राप्त हो. (१०) परः सो अस्तु तन्वा३ तना च तिस्रः पृथिवीरधो अस्तु विश्वाः. प्रति शुष्यतु यशो अस्य देवा यो ना दिवा दिप्सति यश्च नक्तम्.. (११) राक्षस शरीर एवं संतान दोनों से हीन हो. वह तीनों लोकों के नीचे चला जाए. हे देवो! जो राक्षस हमें रात-दिन मारना चाहता है, उसका यश सूख जाए. (११) सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय सच्चासच्च वचसी पस्पृधाते. तयोर्यत्सत्यं यतरदृजीयस्तदित्सोमोऽवति हन्त्यासत्.. (१२) विद्वान् यह बात सरलता से जान सकता है कि सत्य एवं असत्य बातों में परस्परविरोध होता है, उन में सोम सत्य एवं सरल बात का पालन करते हैं एवं असत्य बात का नाश करते हैं. (१२) न वा उ सोमो वृजिनं हिनोति न क्षत्रियं मिथुया धारयन्तम्. हन्ति रक्षो हन्त्यासद्वदन्तमुभाविन्द्रस्य प्रसितौ शयाते.. (१३) पापी एवं झूठ बोलने वाला शक्तिशाली हो, तब भी सोम उसे नहीं छोड़ते. वे असत्यवादी एवं राक्षस को मारते हैं. ये दोनों मरकर इंद्र के बंधन में सोते हैं. (१३) यदि वाहमनृतदेव आस मोघं वा देवाँ अप्यूहे अग्ने. किमस्मभ्यं जातवेदो हृणीषे द्रोघवाचस्ते निर्ऋथं सचन्ताम्.. (१४) हे अग्नि! क्या मैं झूठे देवों की भक्ति करता हूं अथवा फल न देने वाले देवों का उपासक हूं? फिर तुम मुझसे क्यों क्रुद्ध हो? झूठ बोलने वाले ही तुम्हारी हिंसा विशेषरूप से प्राप्त करें. ebook converter DEMO Watermarks*
(१४) अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि यदि वायुस्ततप पूरुषस्य. अधा स वीरैर्दशभिर्वि यूया यो मा मोघं यातुधानेत्याह.. (१५) मैं वसिष्ठ यदि राक्षस होऊं अथवा मैं पुरुषों का जीवन नष्ट करता होऊं तो मैं आज ही मर जाऊं. नहीं तो जो मुझे व्यर्थ ही राक्षस कहकर पुकारता है, उसके दस वीर पुत्र मर जावें. (१५) यो मायातुं यातुधानेत्याह यो वा रक्षाः शुचिरस्मीत्याह. इन्द्रस्तं हन्तु महता वधेन विश्वस्य जन्तोरधमस्पदीष्ट.. (१६) जो राक्षस मुझ अराक्षस को राक्षस कहता है एवं स्वयं को पवित्र बतलाता है, उसे इंद्र अपने महान् आयुधों द्वारा नष्ट कर दें. वह सभी प्राणियों की अपेक्षा अधम बनें. (१६) प्र या जिगाति खर्गलेव नक्तमप द्रुहा तन्वं१ गृहमाना. वव्राँ अनन्ताँ अव सा पदीष्ट ग्रावाणो घ्नन्तु रक्षस उपब्दैः.. (१७) जो राक्षस रात के समय उल्लू के समान अपना शरीर छिपाकर चलता है, वह नीचे को मुंह करके गहरे गड्ढे में गिरे. सोमरस कुचलने के पत्थर भी अपने शब्दों से उसे नष्ट करें. (१७) वि तिष्ठध्वं मरुतो विश्वि१च्छत गृभायत रक्षसः सं पिनष्टन. वयो ये भूत्वी पतयन्ति नक्तभिर्ये वा रिपो दधिरे देवे अध्वरे.. (१८) हे मरुतो! तुम प्रजाओं में अनेक प्रकार से स्थित बनो. जो राक्षस रात में पक्षी बनकर नीचे उतरते हैं अथवा जो प्रज्वलित यज्ञ में बाधा डालते हैं, उन्हें अपनी इच्छानुसार पकड़ो एवं पीस डालो. (१८) प्र वर्तय दिवो अश्मानमिन्द्र सोमशितं मघवन्त्सं शिशाधि. प्राक्तादपाक्तादधरादुदक्तादभि जहि रक्षसः पर्वतेन.. (१९) हे इंद्र! अंतरिक्ष से अपना वज्र चलाओ. हे धनस्वामी इंद्र! सोमरस के कारण शीघ्र कार्य करने वाले यजमान को शुद्ध करो. तुम अपने पर्वों वाले वज्र द्वारा पूर्व, पश्चिम, दक्षिण एवं उत्तर में वर्तमान राक्षसों को नष्ट करो. (१९) एत उ त्ये पतयन्ति श्वयातव इन्द्रं दिप्सन्ति दिप्सवोऽदाभ्यम्. शिशीते शक्रः पिशुनेभ्यो वधं नूनं सृजदशनिं यातुमद्भ्यः.. (२०) जो राक्षस कुत्तों के समान झपटते हैं एवं जो अहिंसनीय इंद्र की हिंसा करना चाहते हैं, eBook converter DEMO Watermarks*
इंद्र उन कपटियों को मारने के लिए अपना वज्र तेज करते हैं. इंद्र उन राक्षसों के ऊपर अपना वज्र शीघ्र फेंकें. (२०) इन्द्रो यातूनामभवत् पराशरो हविर्मथीनामभ्या३ विवासताम्. अभीदु शक्रः परशुर्यथा वनं पात्रेव भिन्दन्त्सत एति रक्षसः.. (२१) इंद्र हिंसकों की भी हिंसा करने वाले हैं. जिस प्रकार कुल्हाड़ा वनों को काटता है एवं हथौड़ा बर्तनों को पीटता है, उसी प्रकार राक्षसों को नष्ट करते हुए इंद्र हव्य-मंथन करने वाले एवं अपने सम्मुख उपस्थित भक्तों की रक्षा के लिए आते हैं. (२१) उलूकयातुं शुशुलूकयातुं जहि श्वयातुमुत कोकयातुम्. सुपर्णयातुमुत गृध्रयातुं दृषदेव प्र मृण रक्ष इन्द्र.. (२२) हे इंद्र! जो राक्षस उल्लुओं के समान रात में लोगों की हिंसा करते हैं, जो भेड़िया, कुत्ता, चकवा, बाज एवं गिद्ध के समान लोगों की हिंसा करते हैं, उन्हें अपने पाषाणरूपी वज्र द्वारा नष्ट कर दो. (२२) मा नो रक्षो अभि नड्यातुमावतामपोच्छतु मिथुना या किमीदिना. पृथिवी नः पार्थिवात् पात्वंहसोऽन्तरिक्षं दिव्यात्पात्वस्मान्. (२३) हमें राक्षस न घेरें. कष्ट देने वाले राक्षसों के जोड़े हमसे दूर हों. ये राक्षस क्या शब्द कहते हुए चक्कर लगाते हैं? पृथ्वी पार्थिव पाप से हमारी रक्षा करे एवं अंतरिक्ष दिव्य पाप से हमें बचाए. (२३) इन्द्र जहि पुमांसं यातुधानमुत स्त्रियं मायया शाशदानाम्. विग्रीवासो मूरदेवा ऋदन्तु मा ते दृशन्त्सूर्यमुच्चरन्तम्.. (२४) हे इंद्र! नर राक्षस का नाश करो एवं माया द्वारा दूसरों की हिंसा करने वाली मादा राक्षसी को भी नष्ट करो. विनाशरूपी क्रीड़ा करने वाले राक्षस धड़ के रूप में पड़े हों एवं उगते हुए सूर्य को न देख सकें. (२४) प्रति चक्ष्व वि चक्ष्वेन्द्रश्च सोम जागृतम्. रक्षोभ्यो वधमस्यतमशनिं यातुमद्द्वयः.. (२५) हे सोम! तुम एवं इंद्र प्रत्येक को भांति-भांति से देखो एवं जागो. तुम राक्षसों के ऊपर अपना वज्ररूप आयुध फेंको. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*
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अष्टम मंडल
सूक्त—१ देवता—इंद्र मा चिदन्यद्वि शंसत सखायो मा रिषण्यत. इन्द्रमित्स्तोता वृषणं सचा सेतु मुहुरुक्था च शंसत.. (१) हे मित्र स्तोताओ! तुम इंद्र के अतिरिक्त किसी की स्तुति मत करो. तुम क्षीण मत बनो. सोमरस निचुड़ जाने पर एकत्र होकर अभिलाषापूरक इंद्र की स्तुति करते हुए बार-बार स्तोत्र बोलो. (१) अवक्रक्षिणं वृषभं यथाजुरं गां न चर्षणीसहम्. विद्वेषणं संवननोभयङ्करं मंहिष्ठमुभयाविनम्.. (२) हे स्तोताओ! बैल के समान शत्रुनाशक, युवा बैल के समान शत्रुमानवों को जीतने वाले, शत्रुओं से द्वेष रखने वाले, स्तोताओं द्वारा सेवायोग्य, कृपा द्वारा दिव्य एवं पार्थिव दोनों प्रकार का धन देने वाले, दाताओं में श्रेष्ठ एवं दोनों प्रकार के धन से युक्त इंद्र की स्तुति करो. (२) यच्चिद्धि त्वा जना इमे नाना हवन्त ऊतये. अस्माकं ब्रह्मेदमिन्द्र भूतु तेऽहा विश्वा च वर्धनम्.. (३) हे इंद्र! ये लोग यद्यपि अपनी रक्षा के लिए तुम्हारी भांति-भांति से स्तुतियां करते हैं परंतु हमारा यह स्तोत्र तुम्हारा सदैव वृद्धिकारक हो. (३) वि तर्तूर्यन्ते मघवन् विपश्चितोऽर्यो विपो जनानाम्. उप क्रमस्व पुरुरूपमा भर वाजं नेदिष्ठमूतये.. (४) हे धनस्वामी इंद्र! तुम्हारे विद्वान् स्तोता तुम्हारे शत्रु लोगों को भय के कारण कंपन उत्पन्न करते हैं एवं बार-बार विपत्तियों को पार कर जाते हैं. तुम हमारे पास आओ एवं हमारी रक्षा के लिए हमें अनेक रूप वाला एवं समीपवर्ती अन्न दो. (४) महे चन त्वामद्रिवः परा शुल्काय देयाम्. न सहस्राय नायुताय वज्रिवो न शताय शतामघ.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे वज्रधारी इंद्र! मैं तुम्हें अधिकतम मूल्य में भी नहीं बेचूंगा. हे हाथ में वज्र रखने वाले इंद्र! मैं हजार, दस हजार अथवा असीमित धन के बदले भी नहीं बेच सकता. (५) वस्याँ इन्द्रासि मे पितुरुत भ्रातुर्भुज्जतः. माता च मे छदयथः समा वसो वसुत्वनाय राधसे.. (६) हे इंद्र! तुम मेरे पिता की अपेक्षा भी अधिक संपत्तिशाली हो. तुम मेरे न भागने वाले भाई से भी महान् हो. हे निवासयुक्त इंद्र! तुम एवं मेरी माता मिलकर मुझे व्यापक धन के लिए पूजित करो. (६) क्वेयथ क्वेदसि पुरुत्रा चिद्धि ते मनः. अलर्षि युध्म खजकृत् पुरन्दर प्र गायत्रा अगासिषुः.. (७) हे इंद्र! तुम कहां गए? तुम कहां हो? तुम्हारा मन विभिन्न दिशाओं में रहता है. हे युद्धकुशल, युद्धकर्त्ता एवं शत्रुनगरी को भेदने वाले इंद्र! आओ. स्तोता तुम्हारी स्तुतियां गाते हैं. (७) प्रास्मै गायत्रमर्चत वावातुर्यः पुरन्दरः. याभिः काण्वस्योप बर्हिरासदं यासद्वज्री भिनत्पुरः.. (८) हे स्तोताओ! इस इंद्र के लिए गाने योग्य स्तुतियां गाओ. शत्रुनगरी का भेदन करने वाले इंद्र सबके लिए सेवा करने योग्य हैं. जिन ऋचाओं को सुनकर इंद्र वज्र धारण करके कण्वपुत्रों के यज्ञ में बिछे कुशों पर बैठे थे एवं शत्रुओं की नगरियों को तोड़ा था, उन्हीं ऋचाओं द्वारा गाने योग्य स्तुति गाओ. (८) ये ते सन्ति दशग्विनः शतिनो ये सहस्रिणः. अश्वासो ये ते वृषणो रघुद्रुवस्तेभिर्नस्तूम्या गहि.. (९) हे इंद्र! तुम्हारे जो दश योजन चलने वाले सौ एवं एक हजार घोड़े हैं, वे अभिलाषापूरक एवं शीघ्रगामी हैं. उन घोड़ों की सहायता से यहां शीघ्र आओ. (९) आ त्वाद्य सबर्दुघां हुवे गायत्रवेपसम्. इन्द्रं धेनुं सुदुघामन्यामिषमुरुधारामरङ्कृतम्.. (१०) आज मैं दूध देने वाली, प्रशंसनीय चाल वाली एवं सरलता से दुहने योग्य इंद्ररूपी गाय की स्तुति करता हूं. इसके अतिरिक्त वह गाय उदकरूपी अनेक धाराओं वाली एवं मनचाही वर्षा करने वाली है. (१०) यत्तुदत् सूर एतशं वङ्कू वातस्य पर्णिना. वहत् कुत्समार्जुनयं शतक्रतुस्त्सरद् गन्धर्वमस्तृतम्.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
जिस समय सूर्य ने एतश नामक राजर्षि को दुःख दिया, उस समय टेढ़े चलने वाले एवं वायु के समान तेज दौड़ने वाले घोड़ों ने अर्जुन के पुत्र कुत्स ऋषि को वहन किया था. विविध कर्म करने वाले इंद्र किरणों वाले एवं अपराजित सूर्य पर छिपकर आक्रमण करने गए थे. (११) य ऋते चिदभिश्रिषः पुरा जत्रुभ्य आतृदः. सन्धाता सन्धिं मघवा पुरूवसुरिष्कर्ता विहुतं पुनः.. (१२) इंद्र शीश कटने पर रक्त निकलने के पहले ही जोड़ने वाले द्रव्य के अभाव में भी शीश और धड़ को जोड़ देते हैं. धनवान् एवं अनेक धनों के स्वामी इंद्र अलग-अलग भागों को सुधार देते हैं. (१२) मा भूम निष्ष्ट्याइवेन्द्र त्वदरणा इव. वनानि न प्रजहितान्यद्रिवो दुरोषासो अमन्महि.. (१३) हे इंद्र! तुम्हारी कृपा से हम क्षीण, दुःखी एवं शाखाहीन वनों के समान संतानहीन न हों. हे वज्रधारी इंद्र! हम घरों में रहते हुए तुम्हारी स्तुति करें. (१३) अमन्महीदनाशवोऽनुग्रासश्च वृत्रहन्. सकृत्सु ते महता शूर राधसानु स्तोमं मुदीमहि.. (१४) हे वृत्रहंता इंद्र! हम धीरे-धीरे, उग्रतारहित एवं भक्ति व श्रद्धापूर्वक हविरूप महान् धन के साथ तुम्हारी स्तुति बोलेंगे. (१४) यदि स्तोमं मम श्रवदस्माकमिन्द्रमिन्दवः. तिरः पवित्रं ससृवांस आशवो मन्दन्तु तुग्र्यावृधः.. (१५) इंद्र यदि हमारी स्तुति सुन लें तो हमारे वक्रभाव से रखे हुए, दशापवित्र भाव द्वारा शुद्ध, एकधन नामक जल से वृद्धि को प्राप्त एवं नशीले सोमरस उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं. (१५) आ त्वाद्य सधस्तुतिं वावातुः सख्युरा गहि. उपस्तुतिर्मघोनां प्र त्वावतधा ते वश्मि सुष्टुतिम्.. (१६) हे इंद्र! अन्य लोगों के साथ की जाती हुई अपने सेवक स्तोता की स्तुति सुनकर शीघ्र उसके पास आओ. हवि धारण करने वाले अन्य स्तोताओं की स्तुतियां भी तुम्हारे पास पहुंचें. इस समय मैं तुम्हारी शोभनस्तुति की कामना करता हूं. (१६) सोता हि सोममद्रिभिरेमेनम्प्सु धावत. गव्या वस्त्रेव वासयन्त इन्जरो निर्धुक्षन्वक्षणाभ्यः.. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अध्वर्यु लोगो! पत्थरों की सहायता से सोमलता का रस निचोड़ो तथा उसे पानी में धोओ. लोग गोदुग्ध मिले सोमरस को कपड़े से ढककर नदियों से जल दुहते हैं. (१७) अध् ज्मो अध वा दिवो बृहतो रोचनादधि. अया वर्धस्व तन्वा गिरा ममा जाता सुक्रतो पृण.. (१८) हे इंद्र! तुम धरती अथवा विशाल प्रकाशपूर्ण अंतरिक्ष से आकर मेरी विशाल स्तुति सुनो और वृद्धि प्राप्त करो. हे शोभनरूप वाले इंद्र! मेरी इस विस्तृत स्तुति को सुनकर मनुष्यों की अभिलाषा पूरी करो. (१८) इन्द्राय सु मदिन्तमं सोमं सोता वरेण्यम्. शक्र एणं पीपयद्विश्वया धिया हिन्वानं न वाजयम्.. (१९) हे अध्वर्यु लोगो! इंद्र के लिए सबसे अधिक नशीला एवं वरण करने योग्य सोमरस भेंट करो. हे इंद्र! तुम समस्त यज्ञकार्यों द्वारा प्रसन्न करने वाले एवं अन्न चाहने वाले यजमान को उन्नतिशील बनाओ. (१९) मा त्वा सोमस्य गल्दया सदा याचन्नहं गिरा. भूर्णिं मृगं न सवनेषु चुक्रुधं क ईशानं न याचिषत्.. (२०) हे इंद्र! यज्ञ में मैं सोमरस निचोड़कर एवं स्तुति द्वारा सदा तुमसे याचना करके तुम्हें क्रोधित न बनाऊं. तुम सबके भरणपोषण करने वाले एवं सिंह के समान भयानक हो. ऐसा कौन है जो सबके स्वामी तुमसे याचना नहीं करता. (२०) मदेनेषितं मदमुग्रमुग्रेण शवसा. विश्वेषां तरुतारं मदच्युतं मदे हि ष्मा ददाति नः.. (२१) अधिक बल से युक्त इंद्र मादक स्तोता द्वारा दिया गया नशीला सोमरस पिएं. सोमरस का नशा होने पर इंद्र हमें शत्रुओं को जीतने वाला एवं उनका गर्व नष्ट करने वाला पुत्र दें. (२१) शेवारे वार्या पुरु देवो मर्ताय दाशुषे. स सुन्वते च स्तुवते च रासते विश्वगूर्तो अरिष्टतः.. (२२) इंद्र देव यज्ञ में हव्य देने वाले मनुष्य को बहुतों द्वारा वरण करने योग्य धन देते हैं. सब कामों में तत्पर एवं प्रेरकों द्वारा प्रशंसित इंद्र सोमरस निचोड़ने वाले एवं स्तुति करने वाले को धन देते हैं. (२२) एन्द्र याहि मत्स्व चित्रेण देव राधसा. सरो न प्रास्युदरं सपीतिभिरा सोमेभिरुरु स्फिरम्.. (२३) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र देव! तुम आओ और दर्शनीय धन द्वारा प्रसन्न बनो. तुम मरुतों के साथ पिए जाते हुए सोमरस से अपने तालाब के समान विशाल उदर को भर लो. (२३) आ त्वा सहस्रमा शतं युक्ता रथे हिरण्यये. ब्रह्मयुजो हरय इन्द्र केशिनो वहन्तु सोमपीतये.. (२४) हे इंद्र! ब्रह्म से युक्त सैकड़ों और हजारों घोड़े सोमरस पीने के लिए तुम्हें सोने के बने रथ पर ढोवें. (२४) आ त्वा रथे हिरण्यये हरी मयूरशेप्या. शितिपृष्ठा वहतां मध्वो अन्धसो विवक्षणस्य पीतये.. (२५) मोर के रंग वाले एवं सफेद पीठ वाले घोड़े स्तुतियोग्य मधुर सोमरस पीने के लिए इंद्र को सोने के बने रथ में बैठा कर ढोवें. (२५) पिबा त्व१स्य गिर्वणः सुतस्य पूर्वपा इव. परिष्कृतस्य रसिन इयमासुतिश्चारुर्मदाय पत्यते.. (२६) हे स्तुतियों द्वारा प्रशंसनीय इंद्र! तुम सर्वप्रथम सोमरस पीने वाले की तरह निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. यह शुद्ध, रसीला, नशीला एवं सुंदर सोमरस नशा उत्पन्न करने के लिए ही बनाया गया है. (२६) य एको अस्ति दंसना महाँ उग्रो अभि व्रतैः. गमत्स शिप्री न स योषदा गमद्धवं न परि वर्जति.. (२७) जो इंद्र अपने कार्यों द्वारा एकमात्र महान् एवं शूर हैं, जो सबको पराजित करने वाले एवं सिर पर टोप धारण करने वाले हैं, केवल वे ही आवें एवं हमसे अलग न हों. वे हमारे स्तोत्र को सुनकर हमारे सामने आवें एवं हमारा त्याग न करें. (२७) त्वं पुरं चरिष्ण्वं वधैः शुष्णस्य सं पिणक्. त्वं भा अनु चरो अध द्विता यदिन्द्र हव्यो भुवः.. (२८) हे इंद्र! तुमने शुष्ण असुर के चलतेफिरते निवासस्थान को अपने वज्र से पीस डाला था. हे स्तोता एवं यज्ञकर्त्ता—दोनों के द्वारा बुलाने योग्य इंद्र! तुमने तेजस्वी होकर शुष्ण असुर का पीछा किया था. (२८) मम त्वा सूर उदिते मम मध्यन्दिने दिवः. मम प्रपित्वे अपिशर्वरे वसवा स्तोमासो अवृत्सत.. (२९) हे निवासस्थान देने वाले इंद्र! तुम सूर्योदय के समय, दोपहर होने पर, दिन की समाप्ति ebook converter DEMO Watermarks*
पर एवं रात के समय मेरी स्तुतियों को मुझे लौटाओ. (२९) स्तुहि स्तुहोदेते घा ते मंहिष्ठासो मघोनाम्. निन्दिताश्वः प्रपथी परमज्या मघस्य मेध्यातिथे.. (३०) हे मेधातिथि ऋषि! तुम मुझ राजा आसंग की बार-बार स्तुति एवं प्रार्थना करो. मैं धन वालों में सबसे अधिक धन देने वाला हूं. मुझ उन्नत मार्ग एवं श्रेष्ठ आयुध वाले के बल के सामने दूसरों के घोड़े हार जाते हैं. (३०) आ यदश्वान्वनवन्वतः श्रद्धयाहं रथे रुहम्. उत वामस्य वसुनश्चिकेतति यो अस्ति याह्वः पशुः.. (३१) हे मेधातिथि! जब घोड़े घास आदि आहार ले चुके, तब मैंने श्रद्धासहित उन्हें तुम्हारे रथ में जोड़ा था. यदुवंश में उत्पन्न एवं पशुओं का स्वामी मैं सुंदर धन का दान करना जानता हूं. (३१) य ऋञ्जा मह्यं मामहे सह त्वचा हिरण्यया. एष विश्वान्यभ्यस्तु सौभागासङ्गस्य स्वनद्रथः.. (३२) जिस आसंग राजा ने मुझ मेधातिथि को स्वर्णजटित चर्मास्तरण के सहित गतिशील धन दिया था, उस आसंग का शब्द करने वाला रथ शत्रुओं की सभी संपत्तियों को जीत ले. (३२) अध प्लायोगिरति दासदन्यानासङ्गो अग्ने दशभिः सहस्रैः. अधोक्षणो दश मह्यं रुशन्तो नळाइव सरसो निरतिष्ठन्.. (३३) हे अग्नि! प्लयॊग राजा के पुत्र आसंग मुझे दस हजार गाएं दान करके सभी दान करने वालों से आगे निकल गए. जिस प्रकार तालाब से कमल नाल निकलते हैं, उसी प्रकार आसंग की गोशाला से अभिलाषापूरक एवं दीप्तिशाली पशु बाहर निकले. (३३) अन्वस्य स्थूरं ददृशे पुरस्तादनस्थ ऊरुरवरम्बमाणः. शश्वती नार्यभिचक्ष्याह सुभद्रमर्य भोजनं बिभर्षि.. (३४) आसंग राजा के सामने की ओर बिना हड्डी वाला, लंबा एवं नीचे की ओर लटकता हुआ स्थूल अर्थात् पुरुषेंद्रिय देखकर उसकी पत्नी ने कहा—हे आर्य! भोग का उत्तम साधन धारण करते हो. (३४) सूक्त—२ देवता—इंद्र इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम्. अनाभयिन्नरिमा ते.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे निवासस्थान देने वाले इंद्र! इस निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. हे सर्वथा भयरहित इंद्र! तुम्हारे पेट भली प्रकार भर जावें. हम तुम्हें सोमरस देते हैं. (१) नृभिर्धूतः सुतो अश्नैरव्यो वारैः परिपूतः. अश्वो न निक्तो नदीषु.. (२) नेताओं द्वारा धोया गया, कपड़ों की सहायता से निचोड़ा गया एवं मेष के बालों से पवित्र किया गया सोमरस नदी में स्नान किए हुए घोड़े के समान शोभित है. (२) तं ते यवं यथा गोभिः स्वादुमकर्म श्रीणन्तः. इन्द्र त्वास्मिन्त्सधमादे.. (३) हे इंद्र! जिस प्रकार जौ को गाय के दूध में मिलाकर स्वादिष्ट बनाया जाता है, उसी प्रकार हमने गोदुग्ध मिलाकर सोमरस को स्वादिष्ट किया है. मैं वह सोमरस पीने के लिए तुम्हें यज्ञ से बुलाता हूं. (३) इन्द्र इत्सोमपा एक इन्द्रः सुतपा विश्वायुः. अन्तर्देवान् मर्त्यांश्च.. (४) देवों एवं मानवों के बीच में एकमात्र इंद्र ही सोमरस पीने वाले हैं. वे सोम पीने के लिए सब अन्नों से युक्त हैं. (४) न यं शुक्नो न दुराशीर्न तृप्रा उरुव्यचसम्. अपस्पृण्वते सुहार्दम्.. (५) जिस कोमल हृदय वाले इंद्र को दीप्तिवाला सोम, दूध आदि से मिला सोम तथा तृप्ति देने वाला पुरोडाश अप्रसन्न नहीं करता, उसी इंद्र की हम स्तुति करते हैं. (५) गोभिर्यदीमन्ये अस्मन्मृगं न व्रा मृगयन्ते. अभित्सरन्ति धेनुभिः.. (६) बहेलिए जिस प्रकार हरिणों को खोजते हैं, उसी प्रकार हमारे अतिरिक्त लोग गोदुग्ध आदि से मिले सोमरस की सहायता से इंद्र को खोजते हैं. वे लोग स्तुतियां बोलते हुए गलत ढंग से इंद्र के सामने जाते हैं, इसलिए उन्हें प्राप्त नहीं करते. (६) त्रय इन्द्रस्य सोमाः सुतासः सन्तु देवस्य. स्वे क्षये सुतपाव्नः.. (७) निचोड़े हुए सोमरस को पीने वाले इंद्र देव के लिए यज्ञशाला में तीन प्रकार का सोमरस बनाया जावे. (७) त्रयः कोशासः श्चोतन्ति तिस्रश्चम्व१: सुपूर्णाः. समाने अधि भार्मन्.. (८) एक ही यज्ञ में तीन प्रकार के कलश सोमरस को धारण करते हैं एवं तीनों चमस भी सोने से पूर्ण हैं. (८) शुचिरसि पुरुनिः ष्ठाः क्षीरैर्मध्यत आशीर्तः. दध्ना मन्दिष्ठः शूरस्य.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
हे सोम! तुम पवित्र, अनेक पात्रों में भरे हुए एवं दूध-दही से मिश्रित हो. तुम शूर इंद्र को सबसे अधिक प्रसन्न करते हो. (९) इमे त इन्द्र सोमास्तीव्रा अस्मे सुतासः. शुक्रा आशिरं याचन्ते.. (१०) हे इंद्र! ये तीखे सोम तुम्हारे लिए हैं. हमारे द्वारा निचोड़े हुए एवं दीप्तिशाली दूध-दही से मिले हुए सोम तुम्हारी अभिलाषा करते हैं. (१०) ताँ आशिरं पुरोळाशमिन्द्रेमं सोमं श्रीणीहि. रेवन्तं हि त्वा शृणोमि.. (११) हे इंद्र! तुम सोमों तथा दूध-दही आदि को मिलाओ. इस प्रकार मैं तुम्हें धन वाले के रूप में समझूं. (११) हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्. ऊधर्न नग्ना जरन्ते.. (१२) हे इंद्र! जिस प्रकार पी हुई शराब अतःकरण में परस्परविरोधी भाव उठाकर युद्ध कराती है, उसी प्रकार पिया हुआ सोम भी हृदय में युद्ध करता है. स्तोता सोमपूर्ण इंद्र की रक्षा गाय के थन के समान करते हैं. (१२) रेवाँ इद्रेवतः स्तोता स्यात्त्वावतो मघोनः. प्रेदु हरिवः श्रुतस्य.. (१३) हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! तुम धनवान् हो. तुम्हारा स्तोता भी धनवान् हो, तुम्हारे समान धनी एवं प्रसिद्ध व्यक्ति का स्तोता भी धन वाला ही होता है. (१३) उक्थं चन शस्यमानमगोररिरा चिकेत. न गायत्रं गीयमानम्.. (१४) स्तुति न करने वाले के शत्रु इंद्र गाए जाते हुए उक्थ को जान लेते हैं. उस समय गाने योग्य गान गाया जाता है. (१४) मा न इन्द्र पीयत्नवे मा शर्धते परा दाः. शिक्षा शचीवः शचीभिः.. (१५) हे इंद्र! तुम मुझे हिंसा करने वाले शत्रु के हाथ में मत सौंपना. तुम मुझे पराजित करने वाले के अधिकार में भी मत सौंपना. हे शक्तिशाली इंद्र! तुम अपने कर्मों द्वारा हमें शक्तिशाली बनाओ. (१५) वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः. कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते.. (१६) हे इंद्र! हम तुम्हारे मित्र एवं तुम्हारी कामना करने वाले हैं. हम स्तोताओं का प्रयोजन तुम्हारी स्तुति करना है. हम कण्वगोत्रीय उक्थ मंत्रों द्वारा तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१६) न घेमन्यदा पपन वज्रिन्नपसो नविष्ठौ. तवेदु स्तोमं चिकेत.. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*
हे वज्रधारी एवं कर्मयुक्त इंद्र! तुम्हारे इस अभिनव यज्ञ में मैं किसी अन्य का स्तोत्र नहीं बोलता. मैं केवल तुम्हारी स्तुतियां ही जानता हूं. (१७) इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं न स्वप्नाय स्पृहयन्ति. यन्ति प्रमादममन्द्राः.. (१८) देवता सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को चाहते हैं. सोए हुए व्यक्ति को कोई नहीं चाहता. देव तंद्राहीन होकर नशीला सोम प्राप्त करते हैं. (१८) ओ षु प्र याहि वाजेभिर्मा हृणीथा अभ्य१ स्मान्. महाँ इव युवजानिः.. (१९) हे इंद्र! तुम अन्नसहित हमारे सामने भली-भांति आओ. जिस प्रकार गुणी व्यक्ति युवति पत्नी पर क्रोध नहीं करता, उसी प्रकार तुम हम पर क्रोध मत करो. (१९) मो ष्व१द्य दुर्हणावान्त्सायं करदारे अस्मत्. अश्रीरइव जामाता.. (२०) हे शत्रुओं द्वारा असह्य इंद्र! आज बुलाने पर हमारे पास आना. जैसे बुरा जमाई बुलाए जाने पर शाम को पहुंचता है, ऐसा तुम मत करना. (२०) विद्मा ह्यस्य वीरस्य भूरिदावरीं सुमतिम्. त्रिषु जातस्य मनांसि. (२१) हम इस वीर इंद्र की अधिक धन देने वाली कल्याणबुद्धि को जानते हैं. हम तीनों लोकों में उत्पन्न इंद्र को जानते हैं. (२१) आ तू षिञ्च कण्वमन्तं न घा विद्म शवसानात्. यशस्तरं शतमूतेः.. (२२) हे अध्वर्यु! कण्वगोत्रीय ऋषियों से युक्त इंद्र के लिए सोमरस अर्पित करो. हम अतिशय शक्तिशाली एवं सैकड़ों रक्षासाधनों से युक्त इंद्र की अपेक्षा यशस्वी किसी अन्य को नहीं जानते. (२२) ज्येष्ठेन सोतरिन्द्राय सोमं वीराय शक्राय. भरा पिबन्नर्याय. (२३) हे सोमरस निचोड़ने वाले अध्वर्यु! मानवहितकारी, वीर एवं बलशाली इंद्र के लिए प्रमुख रूप में सोमरस दो. इंद्र सोमरस पिएं. (२३) यो वेदिष्ठो अव्यथिष्वश्वावन्तं जरितृभ्यः. वाजं स्तोतृभ्यो गोमन्तम्.. (२४) जो इंद्र सुखकारक स्तोताओं को भली प्रकार जानते हैं, वे यज्ञों और स्तोताओं को घोड़ों और गायों से युक्त अन्न दें. (२४) पन्यंपन्यमित्सोतार आ धावत मद्याय. सोमं वीराय शूराय.. (२४) हे सोमरस निचोड़ने वालो! तुम प्रमत्त करने योग्य, वीर एवं शूर इंद्र के लिए सब जगह ebook converter DEMO Watermarks*
स्तुतियोग्य सोमरस दो. (२५) पाता वृत्रहा सुतमा घा गमन्नारे अस्मत्. नि यमते शतमूतिः.. (२६) सोमरस पीने वाले एवं वृत्रनाशक इंद्र आवें. वे हमसे दूर न जावें. सैकड़ों रक्षासाधनों वाले इंद्र शत्रुओं को वश में करें. (२६) एह हरी ब्रह्मयुजा शग्मा वक्षतः सखायम्. गीर्भिः श्रुतं गिर्वणसम्.. (२७) हव्य अन्न से युक्त एवं सुखकारक घोड़े स्तुतियों द्वारा प्रसिद्ध एवं सेवा करने योग्य मित्र इंद्र को यहां ले आवें. (२७) स्वादवः सोमा आ याहि श्रीताः सोमा आ याहि. शिप्रिन्नृषीवः शचीवो नायमच्छा सधमादम्.. (२८) हे शिरस्त्राण वाले, ऋषियों से युक्त एवं शक्तिशाली इंद्र! यह सोम स्वादिष्ट है. तुम आओ. सोम में दूध-दही को मिला दिया गया है. तुम आओ. ये स्तोता इस समय तुम्हें अपने सामने बुलाते हैं. (२८) स्तुतश्च यास्त्वा वर्धन्ति महे राधसे नृम्णाय. इन्द्र कारिणं वृधन्तः.. (२९) हे इंद्र! यज्ञकर्म करने वालों को बढ़ाते हुए स्तोता एवं स्तोत्र धन एवं बल पाने के लिए तुम्हारी वृद्धि करते हैं. (२९) गिरश्च यास्ते गिर्वाह उक्था च तुभ्यं तानि. सत्रा दधिरे शवांसि.. (३०) हे स्तुतियों द्वारा वहन करने योग्य इंद्र! तुम्हारे निमित्त जो स्तुतियां एवं उक्थ हैं, वे सब एकत्र होकर तुम्हारी शक्ति को धारण करते हैं. (३०) एवेदेष तुविकूर्मिर्वाजाँ एको वज्रहस्तः. सनादमृक्तो दयते.. (३१) इंद्र अनेक कर्म करने वाले, अद्वितीय एवं वज्रधारी हैं. शत्रुओं द्वारा सदा अपराजेय इंद्र स्तोता को अन्न देते हैं. (३१) हन्ता वृत्रं दक्षिणेनेन्द्रः पुरू पुरुहूतः. महान्महीभिः शचीभिः.. (३२) बहुत से लोगों द्वारा अनेक बार बुलाए गए एवं महान् कर्मों द्वारा महान् इंद्र अपने दाहिने हाथ से वृत्र का नाश करते हैं. (३२) यस्मिन् विश्वाश्चर्षर्णय उत च्यौत्ना ज्ययांसि च. अनु घेन्मन्दी मघोनः.. (३३) सभी प्रजाएं जिनके अधीन हैं, जिन में च्युत न होने वाली शक्ति एवं जो शत्रु को हराने ebook converter DEMO Watermarks*
वाले हैं, वे ही इंद्र अपने यजमानों के अनुकूल बनते हैं. (३३) एष एतानि चकारेन्द्रो विश्वा योऽति शृण्वे. वाजदावा मघोनाम्.. (३४) सर्वत्र प्रसिद्ध एवं हव्य धारणकर्त्ताओं को अन्न देने वाले इंद्र ने ये सारे काम किए हैं. (३४) प्रभर्ता रथं गव्यन्तमपाकाच्चिद्यमवति. इनो वसु स हि वोळ्हा.. (३५) प्रहार करने वाले इंद्र जिस गतिशील एवं गाय की कामना करने वाले स्तोता को अपक्वबुद्धि वाले स्तोता के चक्कर से बचाते हैं, वह स्तोता धन का स्वामी बनकर हव्य वहन करता है. (३५) सनिता विप्रो अर्वद्भिर्हन्ता वृत्रं नृभिः शूरः. सत्योऽविता विधन्तम्.. (३६) बुद्धिमान् इंद्र घोड़ों की सहायता से इच्छित स्थान पर जाते हैं. शूर इंद्र नेता मरुतों की सहायता से वृत्र को मारते हैं. वे अपने यजमान के सच्चे रक्षक हैं. (३६) यजध्वैनं प्रियमेधा इन्द्रं सत्राचा मनसा. यो भूत्सोमैः सत्यमद्धा.. (३७) हे प्रियमैध ऋषि! इंद्र के प्रति श्रद्धा रख कर यज्ञ करो. सफल कृपा वाले इंद्र सोमरस पीकर प्रसन्न होते हैं. (३७) गाथश्रवसं सत्पतिं श्रवस्कामं पुरुत्मानम्. कणवासो गात वाजिनम्.. (३८) हे कण्वगोत्रीय ऋषियो! तुम गाने योग्य यश वाले, सज्जनों के पालक, अन्न के इच्छुक, अनेक प्रदेशों में जाने वाले एवं गतिशील इंद्र की स्तुति करो. (३८) य ऋते चिद्गास्पदेभ्यो दात् सखा नृभ्यः शचीवान्. ये अस्मिन्कामश्रियन्.. (३९) मित्र व शोभनकर्म वाले इंद्र ने गायों के पैरों के निशान न होने पर भी गाएं खोजकर देवों को दी थीं. देवों ने इंद्र के द्वारा अपनी अभिलाषा पूर्ण की. (३९) इत्था धीवन्तमद्रिवः काण्वं मेध्यातिथिम्. मेषो भूतोऽभि यन्नयः.. (४०) हे वज्रधारी इंद्र! तुमने बादल के रूप में गति करते हुए सामने जाकर कण्व के पुत्र मेधातिथि ऋषि को प्राप्त किया था. (४०) शिक्षा विभिन्दो अस्मै चत्वार्ययुता ददत्. अष्टा परः सहस्रा.. (४१) हे राजा विभिंदु! तुमने दाता बनकर मुझे चालीस हजार गाएं दी हैं. तुमने मुझे बाद में आठ हजार और दी हैं. (४१) ebook converter DEMO Watermarks*
उत सु त्ये पयोवृधा माकी रणस्य नप्त्या. जनित्वनाय मामहे.. (४२) मैंने धन उत्पत्ति के लिए सर्वत्र प्रसिद्ध, जल बढ़ाने वाले, प्राणियों के निर्माता एवं स्तुतिकर्त्ता के प्रति दयालु द्यावा-पृथिवी की स्तुति की थी. (४२) सूक्त—३ देवता—राजा पाकस्थामा व इंद्र पिबा सुतस्य रसिनो मत्स्वा न इन्द्र गोमत:. आपिर्नो बोधि सधमाद्यो वृधे३स्माँ अवन्तु ते धिय:.. (१) हे इंद्र! हमारे निचोड़े हुए सरस एवं गोदुग्धयुक्त सोमरस को पीकर प्रसन्न बनो. हे हमारे साथ प्रसन्न होने योग्य इंद्र! तुम हमारे मित्र के रूप में हमें उन्नत बनाने के लिए बढ़ो. तुम्हारी कृपा हमारी रक्षा करे. (१) भूयाम ते सुमतौ वाजिनो वयं मा न: स्तरभिमातये. अस्माञ्चित्राभिरवतादभीष्टिभिरा न: सुम्नेषु यामय.. (२) हम तुम्हारी कृपा के कारण अन्नों के स्वामी बनें. तुम शत्रु का पक्ष लेकर हमें मत मारना. अपने विविध रक्षासाधनों द्वारा हमें बचाओ एवं सदा सुखी बनाओ. (२) इमा उ त्वा पुरुवसो गिरो वर्धन्तु या मम. पावकवर्णा: शुचयो विपश्चितोऽभि स्तोमैरनूषत.. (३) हे अनेक संपत्तियों के स्वामी इंद्र! मेरे ये स्तुतिवचन तुम्हारी वृद्धि करें. अग्नि के समान तेजस्वी एवं पवित्र विद्वान् लोग तुम्हारी स्तुति करते हैं. (३) अयं सहस्रमृषिभि: सहस्कृत: समुद्र इव पप्रथे. सत्य: सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये.. (४) ये इंद्र हजारों ऋषियों की शक्ति के सहारे उन्नति को प्राप्त हुए हैं. इंद्र की वास्तविक महिमा का वर्णन ब्राह्मणों के राज्यरूप यज्ञ में किया जाता है. (४) इन्द्रमिद्देवतातय इन्द्रं प्रयतध्वरे. इन्द्रं समीके वनिनो हवामह इन्द्रं धनस्य सातये.. (५) हम इंद्र को यज्ञ के प्रारंभ में एवं समाप्ति पर बुलाते हैं. हम सेवा करते हुए इंद्र को बुलाते हैं. (५) इन्द्रो मह्ना रोदसी पप्रथच्छव इन्द्रः सूर्यमरोचयत्. ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्रे ह विश्वा भुवनानि येमिर इन्द्रे सुवानास इन्दवः.. (६) इंद्र ने अपनी शक्ति की महत्ता से द्यावा-पृथिवी का विस्तार किया है एवं सूर्य को चमकीला बनाया है. समस्त भुवन इंद्र के नियमों में बंधे हैं. सोमरस इंद्र के अधिकार में है. (६) अभि त्वा पूर्वपीतय इन्द्र स्तोमेभिरायवः. समीचीनास ऋभवः समस्वरन् रुद्रा गृणन्त पूर्व्यम्.. (७) हे इंद्र! स्तोता लोग सबसे पहले सोमरस पीने को स्तुतियों द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. ऋभुगण परस्पर मिलकर तुम्हारी स्तुति करते हैं. रुद्रों ने भी तुझ प्राचीन की स्तुति की थी. (७) अस्येदिन्द्रो वावृधे वृष्ण्यं शवो मदे सुतस्य विष्णवि. अद्या तमस्य महिमानमायवोऽनु ष्टुवन्ति पूर्वथा.. (८) सोमरस पीने के बाद जब सारे शरीर में नशा चढ़ता है तब इंद्र इसी यजमान की शक्ति और ओज बढ़ाते हैं. स्तोता जिस प्रकार पहले इंद्र की महिमा की स्तुति करते थे, उसी प्रकार आज भी करते हैं. (८) तत्त्वा यामि सुवीर्यं तद् ब्रह्म पूर्वचित्तये. येना यतिभ्यो भृगवे धने हिते येन प्रस्कण्वमाविथ.. (९) हे शोभनशक्ति वाले इंद्र! मैं सबसे पहले उत्तम अन्न पाने के लिए तुमसे याचना करता हूं. मैं तुमसे वह शक्ति एवं अन्न मांगता हूं, जिसके द्वारा तुमने यज्ञहीन लोगों का हितकारी धन भृगु को दिया एवं प्रस्कण्व की रक्षा की. (९) येना समुद्रमसृजो महीरपस्तदिन्द्र वृष्णि ते शवः. सद्यः सो अस्य महिमा न सन्नशे यं क्षोणीरनुचक्रदे.. (१०) हे इंद्र! तुम्हारा वह बल अभिलाषापूरक है, जिसने सागर का पर्याप्त जल बनाया. तुम्हारी महिमा की सीमा नहीं है. धरती उसी महिमा के पीछे चलती है. (१०) शग्धी न इन्द्र यत्त्वा रयिं यामि सुवीर्यम्. शग्धि वाजाय प्रथमं सिषासते शग्धि स्तोमाय पूर्व्य.. (११) हे इंद्र! मैं तुमसे जो शोभनबल वाला धन मांगता हूं, मुझे वह धन प्रदान करो. सेवा करने को इच्छुक एवं हव्य धारण करने वाले यजमान को सबसे पहले धन दो. हे प्राचीन इंद्र! स्तोता को इसके बाद धन देना. (११) शग्धी नो अस्य यद्भू पौरमाविथ धिय इन्द्र सिषासतः. ebook converter DEMO Watermarks*
शग्धि यथा रुशमं श्यावकं कृपमिन्द्र प्रावः स्वर्णरम्.. (१२) हे इंद्र! स्तोत्रों के द्वारा सेवा करने वाले हमारे यजमान को वह धन दो, जिस धन के द्वारा तुमने राजा पुरु की रक्षा की थी. तुमने जिस प्रकार रुशम, श्यावक एवं कृप की रक्षा की थी, वैसे ही शोभन हवि वाले यजमान की रक्षा करो. (१२) कन्नव्यो अतसीनां तुरी गृणीत मर्त्यः. न ही न्वस्य महिमानमिन्द्रियं स्वर्गुणन्त आनशुः.. (१३) वह कौन नया व्यक्ति है जो सदा गतिशील एवं प्रेरणाप्रद स्तुतियों द्वारा इंद्र की स्तुति करे. इंद्र की स्तुति करने वाले स्तोता इंद्र की महिमा एवं पहचान को नहीं पा सकते. (१३) कदु स्तुवन्त ऋतयन्त देवत ऋषिः को विप्र ओहते. कदा हवं मघवन्निन्द्र सुन्वतः कदु स्तुवत आ गमः.. (१४) हे इंद्र देव! कौन स्तुति करने वाला तुम्हारे लिए यज्ञ पूर्ण करने की अभिलाषा करता है? कौन बुद्धिमान् ऋषि तुम्हारी स्तुति करने की सामर्थ्य रखता है? हे धनस्वामी इंद्र! तुम सोमरस निचोड़ने वाले की पुकार पर कब आते हो? तुम स्तोता के बुलाने पर कब आते हो? (१४) उदु त्ये मधुमत्तमा गिरः स्तोमास ईरते. सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव.. (१५) प्रसिद्ध एवं अतिशय मधुर स्तुतिवचन एवं स्तोत्र शत्रुविजयी, धनस्वामी, विनाशहीन- रक्षासाधन वाले एवं अन्नाभिलाषी रथ के समान बोले जाते हैं. (१५) कण्वाइव भृगवः सूर्या इव विश्वमिद्धीत्मानशुः. इन्द्रं स्तोमेभिर्महयन्त आयवः प्रियमेधासो अस्वरन्.. (१६) कण्वगोत्रीय ऋषियों के समान भृगुगोत्रीय ऋषियों ने भी प्रसिद्ध एवं सर्वत्र व्याप्त इंद्र को पाया है. प्रियमेध नामक लोगों ने इंद्र की महिमा बढ़ाते हुए स्तुतियों द्वारा पूजा की थी. (१६) युक्ष्वा हि वृत्रहन्तम हरी इन्द्र परावतः. अर्वाचीनो मघवन्सोमपीतय उग्र ऋष्वेभिरा गहि.. (१७) हे वृत्रहनन में परमकुशल इंद्र! तुम अपने दोनों घोड़ों को रथ में जोतो. हे धनस्वामी एवं शक्तिशाली इंद्र! तुम सोमरस पीने के लिए दर्शनीय मरुतों के साथ दूर के स्थान से हमारे सामने आओ. (१७)