ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—९८ देवता—अनेक
जिसका इलाज करता है, हम उसीको बचाती हैं।” (२२) त्वमुत्तमास्योषधे तव वृक्षा उपस्तयः. उपस्तिरस्तु सोऽस्माकं यो अस्माँ अभिदासति.. (२३) हे ओषधियो! तुम सबसे श्रेष्ठ हो. सभी वृक्ष तुमसे निम्न हैं. जो हमें हानि पहुंचाता है, वह हमसे नीचा बने. (२३) सूक्त—९८ देवता—अनेक बृहस्पते प्रति मे देवतामिहि मित्रो वा यद्वरुणो वासि पूषा. आदित्यैर्वा यद्वसुभिर्मरुत्वान्तस पर्जन्यं शन्तनवे वृषाय.. (१) हे बृहस्पति! तुम मेरे कल्याण के लिए सब देवों के पास जाओ. तुम मित्र, वरुण, पूषा, आदित्यों तथा वसुओं के साथ इंद्र हो. तुम राजा शांतनु के लिए जल बरसाओ. (१) आ देवो दूतो अजिरश्चिकित्वान्त्वद्देवापे अभि मामगच्छत्. प्रतीचीनः प्रति मामा ववृत्स्व दधामि ते द्युमतीं वाचमासन्.. (२) हे देवापि! कोई ज्ञानी एवं गतिशील देवदूत बनकर तुम्हारे पास से मेरे समीप आवे. हे बृहस्पति! तुम मेरी ओर उन्मुख होकर मेरे पास आओ. मैं तुम्हारे लिए दीप्तियुक्त स्तुति अपने मुख में धारण करता हूं. (२) अस्मे धेहि द्युमतीं वाचमासन् बृहस्पते अनमीवामिषिराम्. यया वृष्टिं शन्तनवे वनाव दिवो द्रप्सो मधुमाँ आ विवेश.. (३) हे बृहस्पति! तुम एक दीप्तिशालिनी, दोषरहित एवं गमनशील स्तुति को मेरे मुख में धारण करो. उसी स्तुति द्वारा शांतनु के लिए आकाश से वर्षा आवे तथा मधुयुक्त रस टपके. (३) आ नो द्रप्सा मधुमन्तो विशन्त्विन्द्र देह्यधिरथं सहस्रम्. नि षीद होत्रमृतुथा यजस्व देवान्देवापे हविषा सपर्य.. (४) माधुर्ययुक्त वर्षा हमें भली प्रकार व्याप्त करे. हे इंद्र! अपने रथ पर स्थित हजारों प्रकार का धन हमें दो. हे देवापि! हमारे यज्ञ में बैठो, ऋतु के अनुसार होम करो एवं हवि द्वारा देवों को प्रसन्न करो. (४) आर्ष्टिषेणो होत्रमृषिर्निषीदन् देवापिर्देवसुमतिं चिकित्वान्. स उत्तरस्मादधरं समुद्रमपो दिव्या असृजद्वर्ष्या अभि.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
ऋष्टिषेण के पुत्र देवापि ऋषि देवों के प्रति शोभन वृद्धि से युक्त स्तुति करके यज्ञ करने बैठे. उस समय वे ऊपर वाले समुद्र अर्थात् अंतरिक्ष से नीचे वाले सागर में जल ले आए एवं दिव्य जल चारों ओर बरसा. (५) अस्मिन्त्समुद्रे अध्युत्तरस्मिन्नापो देवेभिर्निवृता अतिष्ठन्. ता अद्रवन्नार्ष्टिषेणेन सृष्टा देवापिना प्रेषिता मृक्षिणीषु.. (६) जिस ऊपर वाले सागर अर्थात् आकाश में देवों ने जल को रोक रखा है, उस जल को ऋष्टिषेण के पुत्र देवापि ने बरसाया. वह जल स्वच्छ स्थानों पर बहने लगा. (६) यद्देवापिः शन्तनवे पुरोहितो होत्राय वृतः कृपयन्नदीधेत्. देवश्रुतं वृष्टिवनिं रराणो बृहस्पतिर्वाचमस्मा अयच्छत्.. (७) जब देवापि ने शांतनु का पुरोहित बनकर एवं अग्निहोत्र के लिए वरण प्राप्त करके मेघों द्वारा सुनने योग्य एवं वर्षायाचक स्तोत्र बोला, तब बृहस्पति ने उन्हें बोलने की शक्ति दी. (७) यं त्वा देवापिः शुशुचानो अग्न आर्ष्टिषेणो मनुष्यः समीधे. विश्वेभिर्देवैरनुमद्यमानः प्र पर्जन्यमीरया वृष्टिमन्तम्.. (८) हे अग्नि! ऋष्टिषेण के पुत्र देवापि मनुष्य ने पवित्र होकर तुम्हें भली प्रकार जलाया. तुम सभी देवों से प्रेरित होकर वर्षा वाले बादल को प्रेरणा दो. (८) त्वां पूर्व ऋषयो गीर्भिरायन्त्वामध्वरेषु पुरुहूत विश्वे. सहस्राण्यधिरथान्यस्मे आ नो यज्ञं रोहिदश्वोप याहि.. (९) हे अग्नि! पूर्ववर्ती ऋषि स्तुतियां बोलते हुए तुम्हारे समीप आए हैं. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए अग्नि! इस समय सब यजमान यज्ञों में तुम्हारे पास जाते हैं. राजा शांतनु ने यज्ञ में मुझे हजारों प्रकार की संपत्ति दक्षिणा के रूप में दी. हे रोहित अश्व वाले अग्नि! तुम यहां आओ. (९) एतान्यग्ने नवतिर्नव त्वे आहुतान्यधिरथा सहस्रा. तेभिर्वर्धस्व तन्वः शूर पूर्वीर्दिवो नो वृष्टिरिषितो रीरिहि.. (१०) हे अग्नि! रथ में स्थित निन्यानवे हजार पदार्थ तुम्हें आहुतिरूप से दिए गए. हे शूर अग्नि! उनसे तुम अपना शरीर बढ़ाओ और आकाश से हमारे लिए वर्षा करो. (१०) एतान्यग्ने नवतिं सहस्रा सं प्र यच्छ वृष्ण इन्द्राय भागम्. विद्वान्पथ ऋतुशो देवयानानप्यौलानं दिवि देवेषु धेहि.. (११) हे अग्नि! इन निन्यानवे हजार प्रकार के पदार्थों में से वर्षा करने वाले इंद्र को हिस्सा दो. ebook converter DEMO Watermarks*
तुम देवों के गमन के सभी मार्ग जानते हो. तुम समयानुसार कौरववंशी शांतनु को स्वर्ग में स्थित करो. (११) अग्ने बाधस्व वि मृधो वि दुर्गाहापामीवामप रक्षांसि सेध. अस्मात्समुद्राद् बृहतो दिवो नोऽपां भूमानमुप नः सृजेह.. (१२) हे अग्नि! तुम शत्रुओं की दुर्गम नगरियों को बाधा पहुंचाओ तथा रोगों व राक्षसों को दूर करो. तुम इस द्युलोकरूपी विशाल सागर से हमारे लिए अधिक जल बरसाओ. (१२) सूक्त—९९ देवता—अग्नि कं नश्चित्रमिषण्यसि चिकित्वाम्पृथुग्मानं वाश्रं वावृधध्यै. कत्तस्य दातु शवसो व्युष्टौ तक्षद्वज्रं वृत्रतुरमपिन्वत्.. (१) हे इंद्र! तुम ठीक से जानबूझकर हमें विचित्र धन देते हो. तुम हमारी वृद्धि के लिए वृद्धिशील एवं प्रशंसनीय संपत्ति देते हो. इंद्र के बल की वृद्धि के लिए हमें क्या देना पड़ेगा? त्वष्टा ने इंद्र के लिए वृत्रनाशक वज्र बनाया और उन्होंने वर्षा की है. (१) स हि द्युता विद्युता वेति साम पृथुं योनिमसुरत्वा ससाद. स सनीळेभिः प्रसहानो अस्य भ्रातुर्न ऋते सप्तथस्य मायाः.. (२) इंद्र दीप्तिशाली आयुध से युक्त होकर यज्ञ में गाए जाते सामगीत सुनने जाते हैं एवं बलपूर्वक अनेक स्थानों पर बैठते हैं. आदित्यों के सातवें भाई एवं सदा साथ रहने वाले मरुतों के सहयोग से शत्रु को हराने वाले इंद्र को छोड़कर कोई कार्य होना संभव नहीं है. (२) स वाजं यातापदुष्पदा यन्त्स्वर्षता परि षदत्सनिष्यन्. अनर्वा यच्छतदुरस्य वेदी घञ्जिञ्छ्रदेवाँ अभि वर्पसा भूत्.. (३) संग्राम में जाने वाले के लिए इंद्र स्खलनरहित गति से जाते हैं एवं शत्रुओं का धन अपने भक्तों में बांटने की इच्छा से संग्राम में स्थित होते हैं. युद्ध में स्थिर इंद्र शत्रु की सौ द्वारों वाली नगरी में स्थित धन को जानकर अपने बल से लाते हैं एवं इंद्रियपरायण दुरात्माओं को हराते हैं. (३) स यह्व्योऽवनीर्गोष्वर्वा जुहोति प्रधन्यासु ससिः. अपादो यत्र युज्यासोऽरथा द्रोण्यश्वास ईरते घृतं वाः.. (४) मेघों में गतिशील एवं चलने में कुशल इंद्र उत्तम धन वाली धरती में महान् जलों को बिखेरते हैं. वहां चरणरहित एवं रथविहीन अर्थात् छोटी-छोटी नदियां एकत्र होकर बिना नावों के घृत के समान जल बहाती हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
स रुद्रेभिरशस्तवार ऋभ्वा हित्वी गयमारॆअवद्य आगात्. वम्रस्य मन्ये मिथुना विवव्री अन्नमभीत्यारोदयन्मुषायन्.. (५) स्तोताओं के बिना मांगे ही धन देने वाले एवं महान् इंद्र मरुतों के साथ अपना स्थान छोड़ कर आवें. मैं समझता हूं कि मुझ वम्र ऋषि के माता-पिता रोगरहित हो गए हैं. मैं शत्रुओं का धन छीनकर उन्हें रुलाता हूं. (५) स इद्वासं तुवीरवं पतिर्दन्-ष्ळक्षं त्रिशीर्षाणं दमन्यत्. अस्य त्रितो न्वोजसा वृधानो विपा वराहमयोअग्रया हन्.. (६) स्वामी इंद्र ने हल्ला मचाने वाले दासों का दमन किया था तथा तीन सिर वाले एवं छः आंखों वाले विश्वरूप को मारा था. त्रित ने इंद्र की शक्ति से बढ़कर लोहे के समान उंगलियों से वराह का नाश किया था. (६) स द्रुह्वणे मनुष ऊर्ध्वसान आ साविषदर्शसानाय शरुम्. स नृतमो नहुषोऽस्मत्सुजातः पुरोऽभिनदर्हन्दस्युहत्ये.. (७) इंद्र शत्रुओं द्वारा युद्ध के लिए ललकारे गए अपने भक्त को शौर्य आदि गुणों से युक्त करके शत्रुनाश में समर्थ बना देते हैं एवं उसे मारने के लिए शस्त्र प्रदान करते हैं. मनुष्यों के सर्वश्रेष्ठ नेता एवं हमारे लिए उत्पन्न इंद्र पूज्य बनकर युद्ध में शत्रुनगरियों को भेदते हैं. (७) सो अभ्रियो न यवस उदन्यन्क्षयाय गातुं विद्नन्नो अस्मे. उप यत्सीददिन्दुं शरीरैः श्येनोऽयोपाष्टिर्हन्ति दस्यून्.. (८) वे इंद्र मेघ समूह के समान घास पैदा होने के लिए जल गिराना चाहते हैं तथा हमारे निवासस्थान के लिए हमें मार्ग बताते हैं. वे जब अपने शरीर के सभी अंगों से सोम प्राप्त करते हैं, तब बाज पक्षी के समान लोहमय पीठ वाले बनकर शत्रुओं को मारते हैं (८) स व्राधतः शवसानेभिरस्य कुत्साय शुष्णं कृपणे परादात्. अयं कविमनयच्छस्यमानमत्कं यो अस्य सनितोत नृणाम्.. (९) इंद्र महान् शत्रुओं को आयुधों द्वारा भगा देते हैं. उन्होंने कुत्स के स्तोत्र के कारण शुष्ण असुर को मारा था. इंद्र ने स्तुति करने वाले उशना कवि के विरोधियों को वश में किया था. वे उशना एवं अन्य मानवों को दान देने वाले हैं. (९) अयं दशस्यन्नर्योभिरस्य दस्मो देवेभिर्वरुणो न मायी. अयं कनीन ऋतुपा अवेद्यामिमीतारुं यश्चतुष्पात्.. (१०) इंद्र ने स्तोताओं को धन देने की इच्छा से मरुतों के साथ धन भेजा. इंद्र अपने तेज के कारण वरुण के समान शक्तिशाली हैं. सुंदर इंद्र समय पर रक्षा करने वाले जाने जाते हैं. ebook converter DEMO Watermarks*
उन्होंने चार पैरों वाले अररू नामक असुर को मारा. (१०) अस्य स्तोमेभिरौशिज ऋजिश्व्रा व्रजं दरयद्वृषभेण पिप्रोः. सुत्वा यद्यजतो दीदयद्गीः पुर इयानो अभि वर्पसा भूत्.. (११) उशिज के पुत्र ऋजिश्व्रा ने इंद्र की स्तुतियों की सहायता से वज्र द्वारा विप्रु की गोशाला तुड़वाई थी. जब सोमरस निचोड़ने वाले तथा यज्ञकर्त्ता उशिज ने स्तुतियां कीं, तब इंद्र ने आगे बढ़ते अपने रूप द्वारा शत्रुनगरों को पराजित किया. (११) एवा महो असुर वक्षथाय वम्रकः पद्भिरुप सर्पदिन्द्रम्. स इयानः करति स्वस्तिमस्मा इषमूर्जं सुक्षितिं विश्वमाभाः.. (१२) हे शक्तिशाली इंद्र! मैं वज्र ऋषि तुम्हें महान् हवि देने की इच्छा से पैदल चलकर तुम्हारे पास आया हूं. तुम मेरे समीप आकर मेरा कल्याण करो तथा मुझे अन्न, रस, शोभन-निवास आदि सभी वस्तुएं दो. (१२) सूक्त—१०० देवता—विश्वेदेव इन्द्र दृह्य मघवन्त्वावदिद्ध्रुज इह स्तुतः सुतपा बोधि नो वृधे. देवेभिर्नः सविता प्रावतु श्रुतमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (१) हे धनस्वामी इंद्र! तुम हमारी भोगप्राप्ति के लिए अपने समान बली शत्रु को मारो. तुम इस यज्ञ में स्तुतियां सुनकर एवं सोमरस पीकर हमारी उन्नति का निश्चय करो. प्रेरक इंद्र अन्य देवों के साथ हमारे यज्ञ की रक्षा करें. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (१) भराय सु भरत भागमृत्वियं प्र वायवे शुचिपे क्रन्ददिष्टये. गौरस्य यः पयसः पीतिमानश आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (२) हे ऋत्विजो! तुम समय-समय पर सबके पोषक इंद्र का भोग भली प्रकार पूरा करो. तुम सोमरस पीने वाले एवं शब्दसहित गमन वाले वायु के लिए भाग दो. वायु देव गौरवर्ण वाले पशु का दूध पीते हैं. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (२) आ नो देवः सविता साविषद्ध्वय ऋजूयते यजमानाय सुन्वते. यथा देवान्प्रतिभूषेम पाकवदा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (३) सविता देव हमारे ऋजुकामी एवं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को पका हुआ अन्न सामने से प्रस्तुत करें. उससे हम देवों को भूषित करें. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्रो अस्मे सुमना अस्तु विश्वहा राजा सोमः सुवितस्याध्येतु नः. यथायथा मित्रधितानि संदधुरा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (४) इंद्र हमारे प्रति अनुग्रहपूर्ण चित्त वाले बनें. सब दिनों में दीप्तिशाली सोम हमारे स्तोत्र को प्राप्त करें. इंद्र ऐसी कृपा करें कि हम मित्रों में निहित धन पा सकें. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (४) इन्द्र उक्थेन शवसा परुर्दधे बृहस्पते प्रतरीतास्यायुषः. यज्ञो मनुः प्रमतिर्नः पिता हि कमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (५) ये इंद्र प्रशंसनीय बल द्वारा हमारे यज्ञ को धारण करते हैं. हे बृहस्पति! तुम मेरी आयु बढ़ाने वाले बनो. मानयुक्त एवं उत्तम बुद्धिवाला यज्ञ हमारा पालक बनकर हमें सुख प्रदान करे. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (५) इन्द्रस्य नु सुकृतं दैव्यं सहोऽग्निर्गृहे जरिता मेधिरः कविः. यज्ञश्च भूद्धिदथे चारुरन्तम आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (६) देवों का बल इंद्र भली प्रकार संपादित करके एवं हमारी यज्ञशाला में वर्तमान है. अग्नि देवों को बुलाने वाले बुद्धिमान्, विद्वान् व यज्ञ के पात्र एवं यज्ञ में हमारे सेव्य हैं. (६) न वो गुहा चकृम भूरि दुष्कृतं नाविष्यं वसवो देवहेळनम्. माकिर्नो देवा अनृतस्य वर्पस आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (७) हे देवो! हम तुम्हारे प्रच्छन्न स्थान में पाप न करें. हे वासदाता देवो! हम तुम्हारे क्रोध के निमित्त द्रोह न करें. हमें झूठे रूप की प्राप्ति न हो. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (७) अपामीवां सविता साविषन्य१ग्वरीय इदप सेधन्त्वद्रयः. ग्रावा यत्र मधुषुदुच्यते बृहदा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (८) सविता देव हमारे रोगों को दूर करें तथा शक्तिशाली पाप को नीचे गिरावें. जिस स्थान पर सोमरस निचोड़ा जाता है, उस स्थान पर पाप नष्ट हो. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (८) ऊर्ध्वो ग्रावा वसवोऽस्तु सोतरि विश्वा द्वेषांसि सनुतर्युयोत. स नो देवः सविता पायुरुीड्य आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (९) हे देवो! मुझ सोमरस निचोड़ने वाले का पत्थर ऊंचा हो. तुम उसी पत्थर से सब छिपे हुए शत्रुओं को हमसे अलग करो. वे सविता देव हमारे पालक एवं प्रशंसनीय हैं. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
ऊर्जां गावो यवसे पीवो अत्तन ऋतस्य याः सदने कोशे अङ्ध्वे. त्नूरेव तन्वो अस्तु भेषजमा सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (१०) हे गायो! तुम घास वाले स्थान में बढ़ा हुआ रस भक्षण करो. जो घास यज्ञशाला अथवा दुहने के स्थान में उगी हुई हो, उसे तुम खाओ. तुम्हारा दूध ही हमारे शरीर की ओषधि हो. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (१०) ऋतुप्रावा जरिता शश्वतामव इन्द्र इद्ध्रद्रा प्रमतिः सुतावताम्. पूर्णमूर्धदिव्यं यस्य सिक्तय आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे.. (११) यज्ञकर्मों के पूरक, स्तोता एवं सबको बूढ़ा बनाने वाले इंद्र ही सोमरस निचोड़ने वाले यजमानों के रक्षक हैं. उनकी बुद्धि प्रशंसनीय है. इंद्र के पीने के लिए ऊंचा द्रोणकलश सोमरस से भरा जाता है. मैं सबकी रक्षा करने वाली देवमाता अदिति का वरण करता हूं. (११) चित्रस्ते भानुः ऋतुप्रा अभिष्टिः सन्ति स्पृधो जरणिप्रा अधृष्टाः. रजिष्या रज्या पश्व आ गोस्तूतूर्षति पर्यग्रं दुवस्युः.. (१२) हे इंद्र! तुम्हारा प्रकाश विचित्र यज्ञों को पूर्ण करने वाला एवं चाहने योग्य है. तुम्हारी स्तुतियां स्तोताओं को धन देने वाली एवं अपराजेय हैं. ऋतु के अनुकूल बनी रस्सी से दुवस्यु ऋषि गाय की गर्दन को खींचते हैं. (१२) सूक्त—१०१ देवता—विश्वेदेव उद्बुध्यध्वं समनसः सखायः समग्निमिन्ध्वं बहवः सनीळाः. दधिक्रामग्निमुषसं च देवीमिन्द्रावतोऽवसे नि ह्वये वः.. (१) हे सखा ऋत्विजो! समान मन वाले बनकर जागो. तुम अनेक होकर भी एक स्थान में रहने वालों के समान अग्नि को प्रज्वलित करो. मैं अपनी रक्षा के लिए दधिका, उषा, अग्नि एवं इंद्र को बुलाता हूं. (१) मन्द्रा कृणुध्वं धिय आ तनुध्वं नावमरित्रपरणीं कृणुध्वम्. इष्कृणुध्वमायुधारं कृणुध्वं प्राञ्चं यज्ञं प्र णयता सखायः.. (२) हे मित्र स्तोताओ! तुम मादक स्तुतियां करो, कृषि आदि कर्मों का विस्तार करो, डांड के द्वारा पार लगाने वाली नाव बनाओ, हल एवं जुए आदि उपकरणों को सजाओ तथा यज्ञपात्र अग्नि को भली प्रकार लाओ. (२) युनक्त सीरा वि युगा तनुध्वं कृते योनौ वपतेह बीजम्. ebook converter DEMO Watermarks*
गिरा च श्रुष्टिः सभरा असन्नो नेदीय इत्सृण्यः पक्वमेयात्.. (३) हे मित्र ऋत्विजो! हलों में बैल जोड़ो, जुओं को विस्तृत करो व यहां प्रस्तुत खेत में बीज बोओ. हमारी स्तुतियों के साथ अन्न पर्याप्त मात्रा में हो. हमारा हंसिया समीप की पकी हुई फसल पर गिरे. (३) सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वि तन्वते पृथक्. धीरा देवेषु सुम्नया.. (४) बुद्धिमान् ऋत्विज् हल जोड़ते हैं एवं जुआ हल से अलग करते हैं. धीर पुरुष देवों का स्तोत्र बोलते हैं. (४) निराहावान्कृणोतन सं वरत्रा दधातन. सिञ्चामहा अवतमुद्रिणं वयं सुषेकमनुपक्षितम्.. (५) हे मित्रो! पशुओं के लिए प्याऊ एवं चमड़े की रस्सी बनाओ. हम जलयुक्त सींचने में समर्थ एवं क्षीण न होने वाले गड्ढे से पानी लेकर सींचते हैं. (५) इष्कृताहावमवतं सुवरत्रं सुषेचनम्. उद्रिणं सिञ्चे अक्षितम्.. (६) हम चमड़े की शोभन रस्सियों से युक्त भली प्रकार सिंचित, जल से भरे हुए एवं न सूखने वाले गड्ढे से जल लेकर सींचते हैं. (६) प्रीणीताश्वान्हितं जयाथ स्वस्तिवाहं रथमित्कृणुध्वम्. द्रोणाहावमवतमश्मचक्रमंसत्रकोशं सिञ्चता नृपाणम्.. (७) हे ऋत्विजो! बैलों को घास आदि खिलाकर तैयार करो, खेतों को जोतो एवं सरलता से धान्य ढोने वाला रथ तैयार करो. पशुओं की प्याऊ में एक द्रोण जल आता है. पत्थरों के घेरे से घिरे हुए दुर्भिक्ष के समय जल की रक्षा करने वाले तथा मानवों के जलपान के आधार अर्थात् कुएं को पानी से भरो. (७) व्रजं कृणुध्वं स हि वो नृपाणो वर्म सीव्यध्वं बहुला पृथूनि. पुरः कृणुध्वमायसीरधृष्टा मा वः सुस्रोच्चमसो दृंहता तम्.. (८) हे ऋत्विजो! गोशाला बनाओ. वही मानवों के जल पीने का स्थान है. तुम मानवों के कवचों को सिओ, जो अनेक एवं विस्तृत हों. तुम लोहे के मजबूत बरतन बनाओ तथा चमस को दृढ़ करो, जिससे पानी न टपके. (८) आ वो धियं यज्ञियां वर्त ऊतये देवा देवीं यजतां यज्ञियामिह. सा नो दुहीयद्यवसेव गत्वी सहस्रधारा पयसा मही गौः.. (९) हे ऋत्विजो! मैं अपनी रक्षा के निमित्त तुम्हारा ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करता हूं. ebook converter DEMO Watermarks*
तुम्हारा ध्यान यज्ञयोग्य, दीप्त एवं पूज्य है. जिस प्रकार गाएं घास खाकर हजार धारों वाला दूध देती हैं, उसी प्रकार यह ध्यान हमारी इच्छा पूरी करे. (९) आ तू षिञ्च हरिमीं द्रोरुपस्थे वाशीभिस्तक्षताश्मन्मयीभिः. परि ष्वजध्वं दश कक्ष्याभिरुभे धुरौ प्रति वह्निं युनक्त.. (१०) हे अध्वर्युजनो! तुम काठ के बरतन में रखे हुए हरे रंग के सोमरस को सींचो. पत्थर की टंकियों से यह पात्र बनाओ. दस उंगलियां लपेटकर इस पात्र को पकड़ो तथा रथ के दोनों धुरों में बैल जोड़ो (१०) उभे धुरौ वह्निरापिब्दमानोऽन्तर्योनेव चरति द्विजानिः. वनस्पतिं वन आस्थापयध्वं नि षू दधिध्वमखनन्त उत्सम्.. (११) रथ को ढोने वाला बैल रथ की दोनों धुरों को शब्दपूर्ण करता हुआ इस प्रकार चलता है, जिस प्रकार दो पत्नियों का पति उनके साथ क्रम से क्रीड़ा करता है. लकड़ी के बने ढांचे को लकड़ी के पहियों पर इस प्रकार रखो कि रथ का ढांचा निराधार न रहे. (११) कपुन्नरः कपथमुद्दधातन चोदयत खुदत वाजसातये. निष्टिग्र्यः पुत्रमा च्यावयोतय इन्द्रं सबाध इह सोमपीतये.. (१२) हे ऋत्विजो! ये इंद्र सुख को पूरा करने वाले हैं. उन्हें प्रेरित करो, उनके साथ क्रीड़ा करो एवं सुख उठाओ. तुम अन्न पाने के लिए ऐसा करो. हे बाधा वाले ऋत्विजो! अदितिपुत्र इंद्र को अपनी रक्षा के उद्देश्य से सोमरस पीने के लिए बुलाओ. (१२) सूक्त—१०२ देवता—इंद्र प्र ते रथं मिथूकृतमिन्द्रोऽवतु धृष्णुया. अस्मिन्नाजौ पुरुहूत श्रवाय्ये धनभक्षेषु नोऽव.. (१) हे मुद्गल! युद्ध में असहाय बने हुए तुम्हारे रथ की शक्तिशाली इंद्र रक्षा करें. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! इस प्रसिद्ध युद्ध में धन की कामना करने वाले हम लोगों की रक्षा करो. (१) उत्स्म वातो वहति वासो अस्या अधिरथं यदजयत्सहस्रम्. रथीरभून्मुद्गलानी गविष्टौ भरे कृतं व्यचेदिन्द्रसेना.. (२) मुद्गलानी ने जिस समय रथ पर बैठकर हमारी गायों को जीता, उसी समय वायु ने उसका वस्त्र हिलाया. गायों के जीतने वाले इस युद्ध में वह रथ पर बैठी थी. इंद्रसेना नाम की वह मुद्गलपत्नी युद्ध में शत्रुओं से गाएं छीन लाई. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
अन्तर्यच्छ जिघांसतो वज्रमिन्द्राभिदासतः. दासस्य वा मघवन्नार्यस्य वा सनुतर्यवया वधम्.. (३) हे इंद्र! हमें मारने के इच्छुक शत्रुओं पर वज्र चलाओ. हे धनस्वामी! हमारा शत्रु दास हो या आर्य तुम गुप्त रूप से उसे मारो. (३) उद्नो हदमपिबज्जर्हृषाणः कूटं स्म तृंहदभिमातिमेति. प्र मुष्कभारः श्रव इच्छमानोऽजिरं बाहू अभरत्सिषासन्.. (४) इस बैल ने अत्यंत प्रसन्न होकर जल पिया है. यह अपने सींगों से मिट्टी के ढेर को खोदता हुआ शत्रु की ओर जाता है. लटकते हुए भारी अंडकोशों वाला यह बैल अन्न की इच्छा करता हुआ गमनशील शत्रु की बांहों पर प्रहार करता है. (४) न्यक्रन्दयन्नुपयन्त एनममेयन्व्ऋषभं मध्य आजेः. तेन सूभर्वं शतवत्सहस्रं गवां मुद्गलः प्रधने जिगाय.. (५) इस बैल के समीप जाते हुए मनुष्यों ने इसे गर्जन करने के लिए प्रेरित किया तथा युद्ध के बीच में इससे पेशाब कराया. इस बैल की सहायता से मुद्गल ने उत्तम आहार करने वाली सैकड़ों एवं हजारों गायों को जीता. (५) ककर्दवे वृषभो युक्त आसीदवावचीत्सारथिरस्य केशी. दुधेर्युक्तस्य द्रवतः सहानस ऋच्छन्ति ष्मा निष्पदो मुद्गलानीम्.. (६) बैल को शत्रुनाश के काम में लगाया गया. इसकी रस्सी थामने वाली मुद्गलानी गरजने लगी. न रुकने वाले रथ में जुड़े हुए एवं रथ के साथ दौड़ने वाले उस बैल के पीछे चलने वाले सैनिक मुद्गलानी के पीछे चले. (६) उत प्रधिमुदहन्नस्य विद्वानुपायुन्गवंसगमात्र शिक्षन्. इन्द्र उदावत्पतिमघ्न्यानामंरहत पद्याभिः ककुद्मान्.. (७) जानने वाले मुद्गल ने रथ के पहिए को बांध दिया तथा बैल को इस रथ के जुए में स्थापित किया. इंद्र ने गायों के पति उस बैल को बचाया. बैल तेजी से मार्ग पर चला. (७) शुनमष्ट्राव्यचरत्कपर्दी वरत्रायां दार्वानिह्यमानः. नृम्णानि कृण्वन्बहवे जनाय गाः पस्पशानस्तविषीरधत्त.. (८) चाबुक और कोड़े वाला व्यक्ति चमड़े की रस्सी से रथ के भागों को बांधकर सुखपूर्वक घूमने लगा. उसने अनेक लोगों का उद्धार किया तथा अनेक गायों की रक्षा की. (८) इमं तं पश्य वृषभस्य युञ्जं काष्ठाया मध्ये द्रुघणं शयानम्. ebook converter DEMO Watermarks*
येन जिगाय शतवत्सहस्रं गवां मुद्गलः पृतनाज्येषु.. (९) बैल का साथ देने वाले एवं युद्ध की सीमा में पड़े हुए द्रुघण को देखो. मुद्गल ने द्रुघण की सहायता से युद्ध में सैकड़ों-हजारों गायों को जीता. (९) आरे अघा को न्वित्था ददर्श यं युञ्जन्ति तंम्वा स्थापयन्ति. नास्मै तृणं नोदकमा भरन्त्युत्तरो धुरो वहति प्रदेशित्.. (१०) किसी ने पास या दूर के स्थान में ऐसा देखा है कि जिसको रथों में जोतते हैं, उसीको ऊपर स्थापित करते हैं. इसे जल एवं घास नहीं दी जाती. यह धुरा धारण करता है एवं स्वामी को विजयी बनाता है. (१०) परिवृक्तेव पतिविद्यमानट् पीप्याना कूचक्रेणेव सिञ्चन्. एषैष्या चिद्रथ्या जयेम सुमङ्गलं सिनवदस्तु सातम्.. (११) मुद्गलानी ने परित्यक्ता स्त्री के समान शक्ति दिखाकर पति का धन प्राप्त किया. जिस प्रकार बादल धरती पर जल बरसाता है, उसी तरह मुद्गलानी ने बाण बरसाए. हम भी इसी प्रकार के सारथि द्वारा विजय प्राप्त करें. यह विजय हमें अन्न दे. (११) त्वं विश्वस्य जगतश्चक्षुरिन्द्रासि चक्षुषः. वृषा यदाजिं वृषणा सिषाससि चोदयन्वध्रिणा युजा.. (१२) हे इंद्र! तुम सारे संसार के नेत्र के समान हों. तुम नेत्र वालों के भी नेत्र हो. हे जलवर्षक इंद्र! तुम रस्सी द्वारा दो घोड़ों को रथ में बांधकर चलते हो एवं धन देते हो. (१२) सूक्त—१०३ देवता—इंद्र आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्. सङ्क्रन्दनोऽनिमिष एकवीरः शतं सेना अजयत्साकमिन्द्रः.. (१) इंद्र व्यापक शत्रुनाशक बैल के समान भयानक शत्रुघातक एवं मानवों को क्षुब्ध करने वाले हैं. वे शत्रुओं को रुलाने वाले व निमेषरहित चक्षु वाले हैं. उन्होंने अकेले ही सैकड़ों सेनाओं को जीता है. (१) सङ्क्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना युत्कारेण दुश्च्यवनेन धृष्णुना. तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर इषुहस्तेन वृष्णा.. (२) हे योद्धा लोगो! शत्रुओं को रुलाने वाले, निमेषरहित युद्ध में जय पाने वाले युद्धकर्त्ता, अन्यों द्वारा विचलित न होने वाले, पराभवकारी, हाथ में बाण रखने वाले एवं जलवर्षक इंद्र की सहायता पाकर विजय पाओ एवं शत्रुओं के साथ युद्ध करो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
स इषुहस्तैः स निषङ्गिभिर्वशी संस्रष्टा स युध इन्द्रो गणेन. संसृष्टजित्सोमपा बाहुशर्द्ध्यु१ग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता.. (३) सबको वश में करने वाले इंद्र हाथ में बाण धारण करने वाले तथा तूणीरधारी लोगों से युक्त होकर युद्ध करते हैं एवं शत्रुसमूह से भिड़ जाते हैं. युद्ध में भिड़ने वालों को जीतने वाले, सोमपानकर्त्ता, भुजबल युक्त एवं उद्यत धनुष वाले इंद्र अपने बाणों से शत्रुओं का नाश करते हैं. (३) बृहस्पते परि दीया रथेन रक्षोहामित्राँ अपबाधमानः. प्रभञ्जन्त्सेनाः प्रमृणो युधा जयन्नस्माकमेध्यविता रथानाम्.. (४) हे राक्षसहंता बृहस्पति! तुम शत्रुओं को जीतते हुए रथ पर बैठकर हमारे पास आओ. तुम शत्रुसेनाओं का नाश करो, विपक्षी योद्धाओं को मारो एवं हमारे रथों की रक्षा करके वृद्धि पाओ. (४) बलविज्ञाय स्थविरः प्रवीरः सहस्वान्वाजी सहमान उग्रः. अभिवीरो अभिसत्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित्.. (५) हे सब प्राणियों का बल जानने वाले, महान् उत्तम वीर, सामर्थ्यशाली, शीघ्र गति वाले, शत्रुपराभवकारी, उग्र, शक्तिशाली वीर पुत्रों वाले, बल प्राप्तकर्त्ता एवं शक्ति से उत्पन्न गायों को प्राप्त करने वाले इंद्र! तुम विजय प्राप्त करने वाले रथ पर चढ़ो. (५) गोत्रभिदं गोविदं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा. इमं सजाता अनु वीरयध्वमिन्द्रं सखायो अनु सं रभध्वम्.. (६) हे एक साथ उत्पन्न योद्धाओं एवं मित्रो! तुम मेघभेदनकारी, जल प्राप्त करने वाले, हाथ में वज्रधारणकर्त्ता, जयशील व गतिशील शत्रुसेना को शक्ति से पराजित करने वाले इंद्र को आगे करके युद्ध करो एवं प्रसन्नता प्राप्त करो. (६) अभि गोत्राणि सहसा गाहमानोऽदयो वीरः शतमन्युरिन्द्रः. दुश्च्यवनः पृतनाषाळयुध्योऽस्माकं सेना अवतु प्र युत्सु.. (७) दयाहीन वीर अनेक यज्ञों के स्वामी, अन्यों द्वारा विचलित न होने वाले शत्रुसेना को हराने वाले दूसरों द्वारा प्रहार न करने योग्य एवं शक्ति द्वारा मेघों में प्रवेश करने वाले इंद्र युद्धों में हमारी सेनाओं की रक्षा करें. (७) इन्द्र आसां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः. देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम्.. (८) इंद्र इन सेनाओं के स्वामी हैं. बृहस्पति इनके दक्षिण भाग में एवं यज्ञोपयोगी सोम इनके ebook converter DEMO Watermarks*
आगे रहें. मरुद्गण शत्रुनाशक एवं जयशील देवसेनाओं के आगे-आगे चलें. (८) इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज्ञ आदित्यानां मरुतां शर्ध उग्रम्. महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्.. (९) जलवर्षक इंद्र, राजा वरुण, आदित्यों एवं मरुद्गणों का बल भयानक है. महामनस्वी, भुवन को कंपित करने वाले एवं विजयी देवों का जयजयकार उत्पन्न हुआ. (९) उद्धर्षय मघवन्नायुधान्युत्सत्त्वनां मामकानां मनांसि. उद्वृत्रहन्वाजिनां वाजिनान्युद्रथानां जयतां यन्तु घोषा:.. (१०) हे इंद्र! हमारे आयुधों को तेज एवं हमारे सैनिकों का मन प्रसन्न करो. हमारे घोड़ों की शक्ति तथा हमारे विजयी रथ का शब्द बढ़े. (१०) अस्माकमिन्द्र: समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु. अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्माँ उ देवा अवता हवेषु.. (११) हमारी ध्वजाओं के फहराए जाने के समय इंद्र रक्षा करें. हमारे बाण विजय प्राप्त करें. हमारे वीर उत्तम हों. हे देवो! युद्धों में हमारी रक्षा करो. (११) अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्यप्वे परेहि. अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैरन्धेनामित्रस्तमसा सचन्ताम्.. (१२) हे अप्वा नामक पाप-देवता! तुम हमारे शत्रुओं का मन लुभाते हुए उनके अंगों को स्वीकार करो. उनके समीप जाओ और शोकों द्वारा उनके हृदयों को जलाओ. हमारे शत्रु अंधे तम से युक्त हों. (१२) प्रेता जयता नर इन्द्रो व: शर्म यच्छतु. उग्रा व: सन्तु बाहवोऽनाधृष्या यथासथ.. (१३) हे मानवो! आगे बढ़ो और विजयी बनो. इंद्र तुम्हें कल्याण प्रदान करें. तुम लोग जैसे अधृष्य हो, वैसी ही शक्तिशालीनी तुम्हारी भुजाएं हों. (१३) सूक्त—१०४ देवता—इन्द्र असावि सोम: पुरुहूत तुभ्यं हरिभ्यां यज्ञमुप याहि तूयम्. तुभ्यं गिरो विप्रवीरा इयाना दधन्विरे इन्द्र पिबा सुतस्य.. (१) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम्हारे लिए सोमरस निचोड़ा गया है. तुम अपने घोड़ों द्वारा जल्दी यज्ञ में आओ. श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने स्तुतियां करते हुए तुम्हारे लिए यह सोमरस दिया है. तुम इसे पिओ. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
अप्सु धूतस्य हरिवः पिबेह नृभिः सुतस्य जठरं पृणस्व. मिमिक्षुर्यमद्रय इन्द्र तुभ्यं तेभिर्वर्धस्व मदमुक्थवाहः.. (२) हे हरि नाम के घोड़ों वाले इंद्र! यज्ञकर्म करने वाले मनुष्यों द्वारा निचोड़े गए और जलों में स्वच्छ किए गए सोमरस को पिओ तथा अपना पेट भरो. पत्थरों ने तुम्हारे लिए जो सोम सींचा है, उससे अपना मद बढ़ाओ तथा स्तुतियों को स्वीकार करो. (२) प्रोग्रां पीतिं वृष्ण इयर्मि सत्यां प्रयै सुतस्य हर्यश्व तुभ्यम्. इन्द्र धेनाभिरिह मादयस्व धीभिर्विश्वाभिः शच्या गृणानः.. (३) हे हरि नामक घोड़ों वाले एवं वर्षार्कर्त्ता इंद्र! तुम्हारे पीने के लिए निचोड़े गए सोम को यज्ञ में तुम्हारे आने का निश्चय जानकर तुम्हें भेंट करता हूं. तुम शक्ति से युक्त एवं प्रशंसित होकर इस यज्ञ में समस्त स्तुतियों एवं कर्मों से प्रसन्न बनो. (३) ऊती शचीवस्तव वीर्येण वयो दधाना उशिज ऋतज्ञाः. प्रजावदिन्द्र मनुषो दुरोणे तस्थुर्गृणन्तः सधमाद्यासः.. (४) हे शक्तिशाली इंद्र! तुम्हारी रक्षा से अन्न धारण करने वाले एवं प्रजाओं को धारण करने वाले उशिजवंशी यज्ञ करने की अभिलाषा से यजमानों के घरों में स्थित हुए. वे तुम्हारी स्तुति के साथ-साथ प्रसन्न हो रहे थे. (४) प्रणीतिभिषे हर्यश्व सुष्टोः सुषुम्नस्य पुरुरुचो जनासः. मंहिष्ठामूर्तिं वितिरे दधानाः स्तोतार इन्द्र तव सूनृताभिः.. (५) हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी, शोभन स्तोत्र वाले, सुंदर धन वाले व विशाल दीप्ति वाले इंद्र! तुम्हारी शोभन स्तुतियों द्वारा स्तोताओं ने अपनी तथा दूसरों की रक्षा की है. (५) उप ब्रह्माणि हरिवो हरिभ्यां सोमस्य याहि पीतये सुतस्य. इन्द्र त्वा यज्ञः क्षममाणमानड् दाश्वाँ अस्यध्वरस्य प्रकेतः.. (६) हे हरि नाम के घोड़ों वाले इंद्र! तुम अपने घोड़ों द्वारा यज्ञों में निचोड़े हुए सोमरस को पीने जाओ. शक्तिशाली इंद्र को ही यज्ञ प्राप्त करते हैं. तुम यज्ञ का विषय समझकर दान करते हो. (६) सहस्रवाजमभिमातिषाहं सुतेरणं मघवानं सुवृक्तिम्. उप भूषन्ति गिरो अप्रतीतमिन्द्रं नमस्या जरितुः पनन्त.. (७) हे असीम अन्न वाले, शत्रुपराजयकारी, सोमरस में रमण करने वाले, धनयुक्त, शोभन स्तुति वाले एवं युद्ध में अन्यों द्वारा न ललकारे गए इंद्र को सुशोभित करते हैं. स्तोता नमस्कार पूर्वक इंद्र की स्तुति करते हैं. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
सप्तापो देवीः सुरणा अमृक्ता याभिः सिन्धुमतरा इन्द्र पूर्षित्. नवतिं स्रोत्या नव च स्रवन्तीर्देवेभ्यो गातुं मनुषे च विन्दः.. (८) हे शत्रुनगरियों का भेदन करने वाले इंद्र! तुमने शोभन-शब्द वाली एवं बाधारहित गंगा आदि सात नदियों द्वारा सागर को बढ़ाया, तुमने देवों और मानवों के कल्याण के लिए निन्यानवे नदियों को मार्ग प्राप्त कराया. (८) अपो महीरभिशस्तेरमुञ्चोऽजागरास्वधि देव एकः. इन्द्र यास्त्वं वृत्रतूर्ये चकर्थ ताभिर्विश्वायुस्तन्वं पुपुष्याः.. (९) हे इंद्र! तुमने वृत्र के पास से बहुत जल गिराया. इन मुक्त जलों के प्रति एकमात्र तुम्हीं सावधान थे. तुमने वृत्र को मारकर प्राप्त किए गए जलों से सारे संसार के प्राणियों का शरीर पुष्ट किया था. (९) वीरेण्यः क्रतुरिन्द्रः सुशस्तिरुतापि धेना पुरुहूतमीट्टे. आर्दयद्वृत्रमकृणोदु लोकं ससाहे शक्रः पृतना अभिष्टिः.. (१०) इंद्र अतिशय वीर, यज्ञकर्मों वाले एवं शोभन स्तुतियुक्त हैं. मेरी वाणी इंद्र की स्तुति करती है. इंद्र ने वृत्र को मारा, प्रकाश किया, शक्तिशाली बनकर शत्रु को हराया एवं शत्रुओं की सेनाओं को समाप्त किया. (१०) शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ. शृण्वन्तमूग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि सञ्जितं धनानाम्.. (११) हे इंद्र! अन्नप्राप्ति वाले युद्ध में मैं उत्साह से बढ़े हुए एवं धनस्वामी तुम्हें बुलाता हूं. तुम यज्ञ के कुशल नेता हो. तुम युद्धों में अपने सेवकों की रक्षा के लिए भयानक रूप धारण करते हो, शत्रुओं को मारते एवं उनका धन जीतते हो. (११) सूक्त—१०५ देवता—इंद्र कदा वसो स्तोत्रं हर्यत आव श्मशा रुधद्द्वाः. दीर्घं सुतं वाताप्याय.. (१) हे निवासस्थान देने वाले इंद्र! हमारा स्तोत्र तुझ कामना करने वाले को कब रोकेगा? जिस प्रकार खेत की नालियां जलपूर्ण होती हैं. उसी प्रकार जल प्राप्त करने के लिए अधिक सोमरस निचोड़ा गया है. (१) हरी यस्य सुयुजा विव्रता वेरर्वन्तानु शेपा. उभा रजी न केशिना पतिर्दन्.. (२) हरि नामक दो घोड़े दौड़ने में कुशल ठीक-ठीक से सिखाए गए एवं श्वेत केशों वाले हैं. इन घोड़ों के स्वामी इंद्र दान करने आवें. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
अप योरिन्द्रः पापज आ मर्तो न शश्रमाणो बिभीवान्. शुभे यद्युयुजे तविषीवान्.. (३) इंद्र पापी वृत्र के साथ युद्ध में मनुष्य के समान थककर एवं भयभीत होकर मरुतों के समान गतिशील घोड़े रथ में जोड़ें. उस समय वे शोभा प्राप्त करें. (३) सचायोरिन्द्रश्चर्कृष आँ उपानसः सपर्यन्. नदयोर्विव्रतयोः शूर इन्द्रः.. (४) मानवों की सेवा पाकर इंद्र ने सभी संपत्तियों को एकत्र किया. शूर इंद्र ने शब्द करने वाले एवं विशेषकर्म वाले घोड़ों को वश में किया. (४) अधि यस्तस्थौ केशवन्ता व्यचस्वन्ता न पुष्ट्यै. वनोति शिप्राभ्यां शिप्रिणीवान्.. (५) इंद्र शरीर पुष्ट करने के लिए केश वाले एवं विशाल घोड़ों पर चढ़े. इंद्र ने अपने दोनों जबड़ों को चलाकर भोजन मांगा. (५) प्रास्तौदृष्वौजा ऋष्वेभिस्ततक्ष शूरः शवसा. ऋभुर्न क्रतुभिर्मातरिश्वा.. (६) दर्शनीय शक्ति वाले एवं शूर इंद्र शक्ति के द्वारा मरुतों के साथ यजमान की प्रशंसा करते हैं. ऋभु के रथनिर्माण के समान इंद्र ने अनेक वीरकर्म किए हैं. (६) वज्रं यश्चक्रे सुहनाय दस्यवे हिरीमशो हिरीमान्. अरुतहनुरद्भुतं न रजः.. (७) हरी दाढ़ी वाले एवं हरे रंग के घोड़ों वाले इंद्र ने दस्यु को मारने के लिए वज्र तैयार किया. सुंदर जबड़ों वाले इंद्र आकाश के समान विचित्र हैं. (७) अव नो वृजिना शिशीह्यचा वनेमानृचः. नाब्रह्मा यज्ञ ऋधग्जोषति त्वे.. (८) हे इंद्र! हमारे पापों को समाप्त करो, जिससे हम तुम्हारी स्तुतियों द्वारा स्तुतिहीन लोगों को मार सकें. स्तुतिरहित यज्ञ तुम्हें स्तुति वाले यज्ञ के समान प्यारा नहीं होता. (८) ऊर्ध्वा यत्ते त्रेतिनी भूद्यज्ञस्य धूर्षु सद्मन्. सजूर्नावं स्वयशसं सचायोः.. (९) हे इंद्र! तुम्हारे ऋत्विजों ने यज्ञशाला में जिस समय तुमसे संबंधित यज्ञक्रिया आरंभ की, उस समय तुमने यजमान के साथ एक नाव पर सवार होकर उसका उद्धार किया. (९) श्रिये ते पृश्निरुपसेचनी भूच्छ्रिये दर्विररेपाः. यया स्वे पात्रे सिञ्चस उत्.. (१०) हे इंद्र! दूध देने वाली गाय तुम्हारे सोम हेतु दूध दे. तुम करछुली के द्वारा अपने पात्र में मधु लेते हो. वह स्वच्छ एवं कल्याणकर हो. (१०) शतं वा यदसुर्य प्रति त्वा सुमित्र इत्थास्तौद्दुर्मित्र इत्थास्तौत्. ebook converter DEMO Watermarks*
आवो यद्दस्युहत्ये कुत्सपुत्रं प्रावो यद्दस्युहत्ये कुत्सवत्सम्.. (११) हे शक्तिशाली इंद्र! सुमित्र ने तुम्हारे निमित्त इस प्रकार की सौ स्तुतियां बनाईं तथा दुर्मित्र ने भी सौ स्तुतियां बनाईं. तुमने दस्युहत्या के समय कुत्स के पुत्र की रक्षा की थी. (११) सूक्त—१०६ देवता—अश्विनीकुमार उभा उ नूनं तदिदर्थयेथे वि तन्वाथे धियो वस्त्रापसेव. सध्रीचीना यातवे प्रेमजीगः सुदिनेव पृक्ष आ तंसयेथे.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे हव्य की कामना करते हो. जुलाहा जिस प्रकार कपड़ा बुनता है, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों को बढ़ाते हो. यजमान तुम दोनों के एक साथ आने के लिए स्तुति करता है. तुम सूर्य एवं चंद्रमा के समान अन्न को अलंकृत करो. (१) उष्टारेव फर्वरेषु श्रयेथे प्रायोगेव श्वात्र्या शासुरेथः. दूतेव हि ष्ठो यशसा जनेषु माप स्थातं महिषेवावपानात्.. (२) बैल जिस प्रकार घास के मैदान में चरते हैं, उसी प्रकार तुम यज्ञकर्त्ता लोगों के पास आते हो. रथ को चलाने वाले शीघ्रगामी अश्व के समान तुम धन देने के लिए स्तोता के पास आते हो. तुम दूत के समान यशस्वी बनो. जैसे भैंसे तालाब को नहीं छोड़ते, उसी प्रकार तुम भी सोमपान को मत छोड़ना. (२) साकंद्युजा शकुनस्येव पक्षा पश्वेव चित्रा यजुरा गमिष्टम्. अग्निरिव देवयोर्दीदिवांसा परिज्मानेव यजथः पुरुत्रा.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम चिड़ियों के पंखों के समान एक-दूसरे से मिले रहते हो. तुम इस यज्ञ में दो विचित्र पशुओं के समान आए हो. तुम यजमान के यज्ञ में अग्नि के समान दीप्तिशाली हो तथा पुरोहितों के समान स्थानों में देवों की पूजा करते हो. (३) आपी वो अस्मे पितरेव पुत्रोग्रेव रुचा नृपतीव तुर्ये. इर्येव पृष्ट्यै किरणेव भुज्यै शृष्टीवानेव हवमा गमिष्टम्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे प्रति वही प्रेम रखो, जो माता-पिता पुत्र के प्रति रखते हैं. तुम अग्नि एवं सूर्य के समान तेजस्वी एवं राजा के समान शीघ्र काम करने वाले बनो. तुम धनी व्यक्ति के समान दूसरों का भला करने वाले व सूर्यकिरणों के समान योग देने वाले बनो तथा सुखी व्यक्ति के समान इस यज्ञ में आओ. (४) वंसगेव पूषर्या शिम्बाता मित्रेव ऋता शतरा शातपन्ता. वाजेवोच्चा वयसा घर्म्येष्ठा मेषेवेषा सपर्या३ पुरीषा.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अश्विनीकुमारो! तुम बैलों के समान स्वस्थ एवं सुखदाता तथा मित्र वरुण के समान यथार्थ-दर्शी, सैकड़ों सुख देने एवं शीघ्र स्तुति पाने वाले हो. तुम घोड़ों के समान हव्य से पुष्ट एवं सूर्यचंद्रमा के रूप में स्थित हो और मेढ़ों के समान भोज्य पदार्थ से पुष्ट अंग वाले बने हो. (५) सृण्येव जर्भरी तुर्फरीतू नैतोशेव तुर्फरी पर्फरीका. उदन्यजेव जेमना मदेरू ता मे जराय्वजरं मरायु.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम हाथी के अंकुश के समान लोगों को रोकने वाले एवं हनन करने वाले हो. तुम वधिक के समान शत्रुहंता एवं असुरविनाशक हो. तुम जल में उत्पन्न पदार्थ के समान उज्ज्वल व शक्तिशाली हो. तुम मरणधर्मा शरीर को यौवन दो. (६) पज्रेव चर्चंरं जारं मरायु क्षद्मेवार्थेषु तर्तरीथ उग्रा. ऋभू नापत्वखरमज्रा खरज्रुर्वायुर्न पर्फरत्क्षयद्रीयीणाम्.. (७) हे शक्तिशाली अश्विनीकुमारो! तुम वीर पुरुषों के समान मेरे घूमने वाले वृद्धावस्था से युक्त एवं मरणशील शरीर को विपत्तियों से उसी प्रकार पार करके अनुकूल स्थिति में पहुंचाओ, जिस प्रकार जल नीचे स्थान की ओर बहता है. तुम्हें ऋभु के समान शीघ्रगामी रथ मिला है. वायु के समान तेज चलने वाला तुम्हारा रथ उड़कर शत्रुओं का धन छीन लाया है. (७) घर्मेव मधु जठरे सनेरू भगेविता तुर्फरी फारिवारम्. पतरेव चचरा चन्द्रनिर्णिङ्मनऋङ्गा मनन्या३ न जग्मी.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुम महान् वीरों के समान सोमरस अपने पेट में भरते हो. तुम धन के रक्षक तथा शत्रुविदीर्णकारी आयुधों वाले हो. तुम पक्षियों के समान विचरण करने वाले, चंद्रमा के समान सुंदर, इच्छा मात्र से सुशोभित होने वाले एवं प्रशंसनीय व्यक्तियों के समान यज्ञ में जाने वाले हो. (८) बृहन्तेव गम्भरेषु प्रतिष्ठां पादेव गाधं तरते विदाथ:. कर्णेव शासुरनु हि स्मराथोंऽशेव नो भजतं चित्रमप्र:.. (९) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार लंबे पैर गहरे जल को पार करने में सहायता देते हैं, उसी प्रकार तुम विपत्ति से पार होने में मुझे सहारा दो. तुम कानों के समान स्तोता की स्तुति सुनते हो एवं यज्ञ के भागों के समान सुंदर यज्ञ में सम्मिलित होते हो. (९) आरङ्गरेव मध्वेरयेथे सारघेव गवि नीचीनबारे. कीनारेव स्वेदमासिष्विदाना क्षामेवोजां सूयवसात्सचेथे.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! गूंजती हुई मधुमक्खियां जिस प्रकार छत्ते में शहद भरती हैं, उसी ebook converter DEMO Watermarks*
प्रकार तुम गायों के थनों में दूध भरो. तुम मजदूरों के समान पसीने से भीग जाओ तथा चरागाह में आहार पाने वाली दुबली गाय के समान यज्ञ में अपना आहार प्राप्त करो. (१०) ऋध्याम स्तोमं सनुयाम वाजमा नो मन्त्रं सरथेहोप यातम्. यशो न पक्वं मधु गोष्वन्तरा भूतांशो अश्विनोः काममप्राः.. (११) हे अश्विनीकुमारो! हम स्तुतियों का विस्तार करते हैं एवं अन्न बांटते हैं. तुम रथ पर सवार होकर हमारे यज्ञ में आओ. गायों के थनों में विस्तृत यज्ञ के समान दूध है. भूतांश ऋषि ने अश्विनीकुमारों का यह स्तोत्र बनाकर अपनी अभिलाषा प्राप्त की. (११) सूक्त—१०७ देवता—प्रजापति की पुत्री दक्षिणा आविर्भून्महि माघोनमेषां विश्वं जीवं तमसो निरमोचि. महि ज्योतिः पितृभिर्दत्तमागादुरुः पन्था दक्षिणाया अदर्शि.. (१) इन यजमानों का यज्ञ पूरा करने के लिए इंद्र का महान् तेज प्रकट हुआ. उसके बाद सभी जीव अंधकार से मुक्त हुए. पितरों द्वारा दी हुई महान् ज्योति हमारे सामने आई. उसी ने दक्षिणा का विस्तृत मार्ग दिखाया. (१) उच्चा दिवि दक्षिणावन्तो अस्थुर्ये अश्वदाः सह ते सूर्येण. हिरण्यदा अमृतत्वं भजन्ते वासोदाः सोम प्र तिरन्त आयुः.. (२) दक्षिणा देने वाले स्वर्ग में ऊंचे स्थान पर बैठते हैं. घोड़ा दान करने वाले सूर्य के साथ स्थित होते हैं. सोम देने वाले अमरता पाते हैं तथा वस्त्र दान करने वाले सोम प्राप्त करके पूर्ण आयु पार करते हैं. (२) दैवी पूर्तिर्दक्षिणा देवयज्या न कवारिभ्यो नहि ते पृणन्ति. अथा नरः प्रयतदक्षिणासोऽवद्यभिया बहवः पृणन्ति.. (३) दक्षिणा यज्ञादि दिव्य कर्मों को पूर्ण करती है एवं देवपूजा का अंग है. देवगण यज्ञ न करने वालों के काम पूरे नहीं करते. जो लोग पवित्र दक्षिणा देते हैं व बदनामी से डरते हैं, वे अपने सभी काम पूरे करते हैं. (३) शतधारं वायुमर्कं स्वर्विदं नृचक्षसस्ते अभि चक्षते हविः. ये पृणन्ति प्र च यच्छन्ति सङ्गमे ते दक्षिणां दुहते सप्तमातरम्.. (४) सैकड़ों धाराओं में बहने वाले वायु, सूर्य, आकाश तथा अन्य मानवहितकारी देवों के लिए हव्य दिया जाता है. जो लोग सात अधिकारी पुरोहितों को प्रसन्न करते हैं, वे अपनी ebook converter DEMO Watermarks*
अभिलाषाएं पूरी करते हैं. (४) दक्षिणावान्प्रथमो हूत एति दक्षिणावान्ग्रामणीरग्रमेति. तमेव मन्ये नृपतिं जनानां यः प्रथमो दक्षिणामाविवाय.. (५) ऋत्विजों द्वारा बुलाया गया यजमान सबसे प्रमुख होता है एवं गांव का मुखिया होकर आगे चलता है. जो सबसे पहले दक्षिणा देता है, उसीको हम मानवों का पालक मानते हैं. (५) तमेव ऋषिं तमु ब्रह्माणमाहुर्यज्ञन्यं सामगामुक्थशासम्. स शुक्रस्य तन्वो वेद तिस्रो यः प्रथमो दक्षिणया रराध.. (६) जो सबसे पहले दक्षिणा देता है, उसीको ऋषि, ब्रह्मा, यज्ञ के नेता सामगानकर्त्ता एवं स्तोता जानते हैं. वे अग्नि की तीनों मूर्तियों को जानते हैं. (६) दक्षिणाश्वं दक्षिणा गां ददाति दक्षिणा चन्द्रमुत यद्धिरणयम्. दक्षिणात्नं वनुते यो न आत्मा दक्षिणां वर्म कृणुते विजानन्.. (७) दक्षिणा घोड़े, गाएं एवं मन को प्रसन्न करने वाला सोना देती है. दक्षिणा ही आत्मारूपी अन्न को देती है. विद्वान् व्यक्ति दक्षिणा को कवच के समान रक्षा का साधन बनाते हैं. (७) न भोजा ममुर्न न्यर्थमीयुर्न रिष्यन्ति न व्यथन्ते ह भोजा:. इदं यद्विश्वं भुवनं स्वश्चैतत्सर्वं दक्षिणेभ्यो ददाति.. (८) दक्षिणा देने वाले मरते नहीं, अपितु देव बनकर अमरता पा लेते हैं. वे न दरिद्र बनते हैं और न व्यथा अथवा क्लेश भोगते हैं. यह सारा विश्व एवं स्वर्ग जो है, वह सब दक्षिणा हमें देती हैं. (८) भोजा जिग्युः सुरभिं योनिमग्रे भोजा जिग्युर्वध्वं१ या सुवासा:. भोजा जिग्युरन्तः पेयं सुराया भोजा जिग्युर्ये अह्रुताः प्रयन्ति.. (९) दक्षिणा देने वाले लोग दूध देने वाली गाय सबसे पहले प्राप्त करते हैं तथा वे ही शोभन वस्त्रों वाली वधू प्राप्त करते हैं. दाता लोग पेय के रूप में शराब पाते हैं एवं चढ़ाई करने वाले शत्रु को जीतते हैं. (९) भोजायाश्वं सं मृजन्त्याशुं भोजायास्ते कन्या३ शुम्भमाना. भोजस्येदं पुष्करिणीव वेश्म परिष्कृतं देवमानेव चित्रम्.. (१०) दक्षिणा देने वाले को शीघ्र ही घोड़ा दिया जाता है. उसीको वस्त्र अलंकार से शोभित कन्या मिलती है. उसे पुष्करिणी के समान साफ और देवालय के समान विचित्र घर दिया जाता है. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*