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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सोम उग्रों में अतिशय उग्र, शूरों में अतिशय शूर एवं अधिक दान करने वालों में महान् हैं. (१७) त्वं सोम सूर एषस्तोकस्य साता तनूनाम्. वृणीमहे सख्याय वृणीमहे युज्याय.. (१८) हे शोभन वीर्य वाले सोम! हमें अन्न एवं पुत्र की संतानें दो. हम मैत्री और सहायता के लिए तुम्हारा वरण करते हैं. (१८) अग्न आयूंषि पवस आ सुवोर्जमिषं च नः. आरे बाधस्व दुच्छुनाम्.. (१९) हे पवमान सोमरूप अग्नि! तुम हमारे जीवनों की रक्षा करते हो. तुम हमें बल तथा अन्न दो एवं शत्रुओं को हमसे दूर रखकर पीड़ा पहुंचाओ. (१९) अग्निर्ऋर्षिः पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः. तमीमहे महागयम्.. (२०) अग्नि पांचों वर्णों के हितैषी, सबके द्रष्टा, पवित्र होते हुए पुरोहित एवं यजमानों द्वारा स्तुत्य हैं. हम अग्नि से याचना करते हैं. (२०) अग्ने पवस्व स्वपा अस्मे वर्चः सुवीर्यम्. दधद्रयिं मयि पोषम्.. (२१) हे शोभन कर्म वाले अग्नि! तुम हमें शोभन शक्ति वाला तेज, धन एवं गाएं प्रदान करो. (२१) पवमानो अति स्रिधोऽभ्यर्षति सुष्टुतिम्. सूरो न विश्वदर्शतः.. (२२) पवमान सोम शत्रुओं को हराते हैं, शोभन स्तुति सामने से स्वीकार करते हैं एवं सूर्य के समान सबको देखते हैं. (२२) स मर्मृजान आयुभिः प्रयस्वान्प्रयसे हितः. इन्दुरत्यो विचक्षणः.. (२३) मनुष्यों द्वारा बार-बार निचोड़े जाते हुए अन्न के स्वामी, यजमान के लिए हितैषी एवं सबके द्रष्टा सोम देवों के समीप सदा जाते हैं. (२३) पवमान ऋतं बृहच्छुक्रं ज्योतिरजीजनत्. कृष्णा तमांसि जङ्घनत्.. (२४) पवमान सोम ने काले अंधकार को समाप्त करते हुए सत्यरूप, व्यापक व दीप्तिशाली तेज उत्पन्न किया था. (२४) पवमानस्य जङ्घ्नतो हरेश्चन्द्रा असृक्षत. जीरा अजिरशोचिषः.. (२५) बार-बार अंधकार का विनाश करते हुए, हरितवर्ण, गतिशील तेज से युक्त एवं शुद्ध होते हुए सोम को आनंदित करने वाली व तेज बहने वाली धाराएं दशापवित्र में गिरती हैं. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*

पवमानो रथीतमः शुभ्रेभिः शुभ्रशस्तमः. हरिश्चन्द्रो मरुद्गणः.. (२६) रथ स्वामियों में श्रेष्ठ, यशस्वी लोगों में परम यशस्वी, हरी धाराओं वाले एवं मरुतों की सहायता से युक्त सोम अपनी दीप्तियों से सबको व्याप्त करते हैं. (२६) पवमानो व्यश्ववद्रश्मिभिर्वाजसातमः. दधत्स्तोत्रे सुवीर्यम्.. (२७) अन्न देने वालों में श्रेष्ठ व पवमान स्तोत्र बोलने वाले को शोभन वीर्य वाला पुत्र देने वाले सोम अपनी दीप्तियों से सारे संसार को व्याप्त कर लें. (२७) प्र सुवान इन्दुरक्षाः पवित्रमत्यव्ययम्. पुनान इन्दुरिन्द्रमा.. (२८) पवित्र होते हुए सोम भेड़ के बालों से बने कंबल को पार करके टपकते हैं अर्थात् पवित्र होते हुए सोम इंद्र के पास पहुंचें. (२८) एष सोमो अधि त्वचि गवां क्रीळत्यद्रिभिः. इन्द्रं मदाय जोहुवत्.. (२९) ये किरणरूपी सोम गाय के चमड़े के ऊपर पत्थरों से क्रीड़ा करते हैं. इंद्र ने मद के निमित्त सोम को बुलाया. (२९) यस्य ते द्युम्नवत्पयः पवमानाभृतं दिवः. तेन नो मृळ जीवसे.. (३०) हे पवित्र होते हुए सोम! बाज पक्षी रूपिणी गायत्री द्वारा द्युलोक से लाया गया व अन्नयुक्त दूध तुम्हारा अपना है. हमें उसके द्वारा चिरजीवन पाने के लिए सुखी बनाओ. (३०) सूक्त—६७ देवता—पवमान सोम त्वं सोमासि धारयुर्मन्द्र ओजिष्ठो अध्वरे. पवस्व मंहयद्रयिः.. (१) हे सोम! तुम अतिशय आनंददाता, परम तेजस्वी एवं हमारे यज्ञ में निचुड़ने वाली धाराओं के अभिलाषी हो. तुम स्तोताओं को धन देते हुए नीचे गिरो. (१) त्वं सुतो नृमादनो दधन्वान्मत्सरिन्तमः. इन्द्राय सूरिरन्धसा.. (२) हे सोम! तुम ऋत्विजों को आनंदित करने वाले, यज्ञ धारण करने वाले, विद्वान् एवं हमारे द्वारा निचोड़े गए हो. तुम हव्यरूप अन्न के साथ इंद्र को अतिशय मद करने वाले बनो. (२) त्वं सुष्वाणो अद्रिभिर्भव्यर्ष कनिक्रदत्. द्युमन्तं शुष्ममुत्तमम्.. (३) हे सोम! तुम पत्थरों की सहायता से निचोड़े जाकर शब्द करते हुए द्रोणकलश में आओ ebook converter DEMO Watermarks*

तथा दीप्तिशाली उत्तम बल प्राप्त करो. (३) इन्दुहिंन्वानो अर्षति तिरो वाराण्यव्यया. हरिर्वाजमचिक़्रदत्.. (४) पत्थरों द्वारा कूटे गए सोम भेड़ के बालों से बने कंबल को पार करके निकलते हैं. हरे रंग के सोम अन्न से कहते हैं कि मैं तुम्हारे साथ मिलकर इंद्र को बुलाता हूं. (४) इन्दो व्यव्यमर्षसि वि श्रवांसि वि सौभगा. वि वाजान्त्सोम गोमतः.. (५) हे सोम! तुम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र से छनते हो तथा हविरूप अन्न, सौभाग्य एवं गायों वाला धन प्राप्त करते हो. (५) आ न इन्दो शतग्विनं रयिं गोमन्तमश्विनम्. भरा सोम सहस्रिणम्.. (६) हे पात्रों से छनते हुए सोम! तुम हमें सौ गायों, उत्तम पशुओं, घोड़ों एवं हजारों संपत्तियों वाला धन दो. (६) पवमानास इन्दवस्तिरः पवित्रमाशवः. इन्द्रं यामेभिराशत.. (७) भेड़ की ऊन से बने दशापवित्र को पार करके धाराओं के रूप में कलश में गिरते हुए एवं शीघ्र नशा करने वाले सोम अपनी गतियों से इंद्र को प्राप्त होते हैं. (७) ककुहः सोम्यो रस इन्दुरिन्द्राय पूर्व्यः. आयुः पवत आयवे.. (८) सर्वश्रेष्ठ, पूर्वजों द्वारा निर्मित, इंद्र को प्राप्त होने वाला एवं पात्रों में छनता हुआ सोमरस सर्वत्र गतिशील इंद्र के लिए कलशों में पवित्र होता है. (८) हिन्वन्ति सूरमूस्रयः पवमानं मधुश्रुतम्. अभि गिरा समस्वरन्.. (९) उंगलियां रस टपकाने वाले एवं यज्ञकर्म के प्रेरक सोम को निचुड़ने के लिए प्रेरित करती हैं तथा स्तोता अपनी स्तुतियों द्वारा उनकी भली-भांति प्रशंसा करते हैं. (९) अविता नो अजाश्वः पूषा यामनियामनि. आ भक्षत्कन्यासु नः.. (१०) बकरे को वाहन बनाने वाले पूषादेव प्रत्येक यात्रा में हमारी रक्षा करें एवं हमें कमनीय नारियों का भागी बनावें. (१०) अयं सोमः कपर्दिने घृतं न पवते मधु. आ भक्षत्कन्यासु नः.. (११) हमारा यह सोम कल्याणकारी मुकुट वाले पूषा को मादक घी के समान प्राप्त होता है. वे कमनीय नारियां दें. (११) अयं त आघृणे सुतो घृतं न पवते शुचि. आ भक्षत्कन्यासु नः.. (१२)

हे सर्वत्र चमकने वाले पूषा! तुम्हारे लिए निचोड़ा गया यह सोम तुम्हें शुद्ध घी के समान प्राप्त होता है. तुम हमें कमनीय नारियां दो. (१२) वाचो जन्तुः कवीनां पवस्व सोम धारया. देवेषु रत्नधा असि.. (१३) हे स्तोताओं के वचनों के जन्मदाता सोम! तुम धारा के रूप में द्रोणकलश में गिरो. तुम यज्ञकर्ताओं को रत्न देने वाले हो. (१३) आ कलशेषु धावति श्येनो वर्म वि गाहते. अभि द्रोणा कनिक्रदत्.. (१४) जैसे बाज पक्षी शब्द करता हुआ अपने घोंसले में जाता है, उसी प्रकार छनते हुए सोम शब्द करके द्रोणकलश में जाते हैं. (१४) परि प्र सोम ते रसोऽसर्चि कलशे सुतः. श्येनो न तक्तो अर्षति.. (१५) हे सोम! तुम्हारा रस द्रोणकलश में छनकर चमस आदि पात्रों में विभक्त होता है तथा बाज पक्षी के समान शीघ्रता से इंद्र के पास जाता है. (१५) पवस्व सोम मन्दयन्निन्द्राय मधुमत्तमः.. (१६) हे अतिशय मधुर रस वाले एवं मादक सोम! तुम इंद्र के लिए आओ. (१६) असृग्रन्देववीतये वाजयन्तो रथा इव.. (१७) जिस प्रकार शत्रुधनों के इच्छुक लोग रथ भेजते हैं, उसी प्रकार ऋत्विजों ने अन्न वाले सोम को देवों के लिए दिया है. (१७) ते सुतासो मदिन्तमाः शुक्रा वायुमसृक्षत.. (१८) अत्यंत मादक एवं दीप्तिशाली सोम ने वायु को बनाया है. (१८) ग्राव्णा तुन्नो अभिष्टुतः पवित्रं सोम गच्छसि. दधत्स्तोत्रे सुवीर्यम्.. (१९) हे सोम! तुम पत्थरों से मर्दित होकर एवं स्तोता को शोभन धनादि देकर दशापवित्र की ओर प्रयाण करते हो. (१९) एष तुन्नो अभिष्टुतः पवित्रमति गाहते. रक्षोहा वारमव्ययम्.. (२०) हे सोम! तुम पत्थरों से कुचले हुए एवं स्तोताओं द्वारा प्रशंसित होकर राक्षसों का हनन कर दो एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को लांघकर द्रोणकलश में आओ. (२०) यदन्ति यच्च दूरके भयं विन्दति मामिह. पवमान वि तज्जहि.. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*

हे पवमान सोम! जो भय समीप, दूर अथवा इस स्थान में है, उसे भली प्रकार नष्ट करो. (२१) पवमानः सो अद्य नः पवित्रेण विचर्षणिः. यः पोता स पुनातु नः.. (२२) वे सबके द्रष्टा, पवित्र होते हुए एवं दशापवित्र से छने हुए सोम हमें पापरहित करें. (२२) यत्ते पवित्रमर्चिष्यग्ने विततमन्तरा. ब्रह्म तेन पुनीहि नः.. (२३) हे पवित्र करने वाले अग्नि! तुम्हारा जो शुद्ध करने वाला तेज किरणों के बीच वर्तमान है, उसके द्वारा हमारे पुत्रादि बढ़ाने वाले शरीर को पापरहित करो. (२३) यत्ते पवित्रमर्चिवदग्ने तेन पुनीहि नः. ब्रह्मसवैः पुनीहि नः.. (२४) हे अग्नि! तुम्हारा जो शोभनकिरणों वाला तेज है, अपने उसी तेज से हमें पापरहित करो तथा सोमरस निचोड़ने की क्रियाओं से हमें पवित्र करो. (२४) उभाभ्यां देव सवितः पवित्रेण सवेन च. मां पुनीहि विश्वतः.. (२५) हे सबके प्रेरक एवं दीप्तिशाली सोम! तुम अपने पवित्र तेज एवं निचुड़ने की क्रिया— इन दोनों से मुझे सभी प्रकार पापरहित करो. (२५) त्रिभिष्ट्वं देव सवितर्वर्षिष्ठैः सोम धामभिः. अग्ने दक्षैः पुनीहि नः.. (२६) हे सबके प्रेरक, दीप्तिशाली एवं पवित्र करने के गुण से युक्त अग्नि! तुम अपने बढ़े हुए एवं सामर्थ्य वाले तीन तेजों द्वारा हमें पापरहित करो. (२६) पुनन्तु मां देवजनाः पुनन्तु वसवो धिया. विश्वे देवाः पुनीत मा जातवेदः पुनीहि मा.. (२७) यजमान मुझे पापरहित करें. वसुदाता, जातवेद, दिव्यजन और समस्त देव अपने कर्मों से मुझे पापरहित करें. (२७) प्र प्यायस्व प्र स्यन्दस्व सोम विश्वेभिरंशुभिः. देवेभ्य उत्तमं हविः.. (२८) हे सोम! हमें भली प्रकार बढ़ाओ एवं अपनी सभी किरणों द्वारा देवों के निमित्त अति प्रशंसनीय द्रव कलशों में डालो. (२८) उप प्रियं पनिप्रतं युवानमाहुतीवृधम्. अगन्म बिभ्रतो नमः.. (२९) हम सबको प्रसन्न करने वाले, अधिक शब्दकारी, तरुण, आहुतियों द्वारा बढ़ने वाले सोम के समीप नमस्कार करते हुए जाते हैं. (२९) ebook converter DEMO Watermarks*

अलाय्यस्य परशुर्नाश तमा पवस्व देव सोम. आखुं चिदेव देव सोम.. (३०) आक्रमणकारी शत्रु का फरसा उसी का नाश करे. हे दीप्तिशाली सोम! तुम हमारे सामने आओ एवं सबका हनन करने वाले शत्रु को मारो. (३०) यः पावमानीरध्येत्यृषिभिः सम्भृतं रसम्. सर्वं स पूतमश्नाति स्वदितं मातरिश्वना.. (३१) जो व्यक्ति ऋषियों द्वारा पवमान सोमदेव के विषय में निर्मित वेदमंत्ररूपी रस को पढ़ता है, वह वायु द्वारा पवित्र सभी प्रकार का अन्न खाता है. (३१) पावमानीर्यो अध्येत्यृषिभिः सम्भृतं रसम्. तस्मै सरस्वती दुहे क्षीरं सर्पिर्मधूदकम्.. (३२) जो ब्राह्मण ऋषियों द्वारा पवमान सोमदेव के विषय में निर्मित वेदमंत्ररूपी रस का अध्ययन करता है, उसके लिए सरस्वती दूध एवं मादक सोम दुहती हैं. (३२) सूक्त—६८ देवता—पवमान सोम प्र देवमच्छा मधुमन्त इन्दवोऽसिष्यदन्त गाव आ न धेनवः. बर्हिषदो वचनावन्त ऊधभिः परिस्रुतमुसिया निर्णिजं धिरे.. (१) नशीले सोम दुधारू गायों के समान इंद्र के लिए रस टपकाते हैं. रंभाती हुई एवं कुशों पर बैठी हुई दुधारू गाएं अपने थनों से टपकने वाले सोमरस को दूध के रूप में धारण करती हैं. (१) स रोरुवदभि पूर्वा अचिक्रददुपारुहः श्रथयन्त्स्वादते हरिः. तिरः पवित्रं परियन्नुरु ज्ययो नि शर्याणि दधते देव आ वरम्.. (२) शब्द करके कलश की ओर जाते हुए, स्तोताओं की स्तुतियों को सामने सुनते हुए हरे रंग के सोम ओषधियों को फलयुक्त बनाते हैं, दशापवित्र को पार करके तेजी से बहते हैं, राक्षसों को मारते और यजमानों को वरण करने योग्य धन देते हैं. (२) वि यो ममे यम्या संयती मदः साकंवृधा पयसा पिन्वदक्षिता. मही अपारे रजसी विवेविद्ददभिव्रजन्नक्षितं पाज आ ददे.. (३) नशीले सोम ने परस्पर मिली हुई द्यावा-पृथिवी को बनाया है. उन एक साथ बढ़ने वाली एवं नाशरहित द्यावा-पृथिवी को सोम ने अपने रस से सींचा है. सोम ने विशाल एवं सीमारहित द्यावा-पृथिवी को सबको ज्ञात कराके सब ओर गति वाला एवं नाशरहित बल प्राप्त किया. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

स मातरा विचरन्वाजयन्नपः प्र मेधिरः स्वधया पिन्वते पदम्. अंशुर्यवेन पिपिशे यतो नृभिः सं जामिभिर्नसते रक्षते शिरः.. (४) मेधावी सोम द्यावा-पृथिवी के बीच घूमते हुए एवं अंतरिक्ष के जल को बरसने की प्रेरणा देते हुए शत्रुओं के साथ उत्तरवेदी को सींचते हैं. सोम ऋत्विजों द्वारा जौ के सत्तू में मिलाए जाते हैं, उंगलियों से मिलते हैं एवं प्राणियों की रक्षा करते हैं. (४) सं दक्षेण मनसा जायते कविर्ऋतस्य गर्भो निहितो यमा परः. यूना ह सन्ता प्रथमं वि जज्ञतुर्गुहा हितं जनिम नेममुद्यतम्.. (५) जल के गर्भ, देवों द्वारा नियंत्रित एवं क्रांत कर्म वाले सोम बढ़े हुए मन से धरती पर जन्म लेते हैं. युवा सूर्य एवं सोम जन्म के समय से ही अलग-अलग जाने जाते हैं. उनका आधा जन्म प्रकाशित एवं आधा छिपा रहता है. (५) मन्द्रस्य रूपं विविदुर्मनीषिणः श्येनो यदन्धो अभरत्परावतः. तं मर्जयन्त सुवृधं नदीष्वाँ उशन्तमंशुं परियन्तमृग्मियम्.. (६) विद्वान् लोग नशीले सोम का रूप जानते हैं. बाज रूपी सोमरूप अन्न को दूर से लाई थी. भली प्रकार बढ़ने वाले, देवाभिलाषी, सभी ओर गतिशील एवं स्तुतियोग्य सोम को ऋत्विज् जल में मसलते हैं. (६) त्वां मृजन्ति दश योषणः सुतं सोम ऋषिभिर्मतिभिर्धीतिभिर्हितम्. अव्यो वारेभिरुत देवहूतिभिर्नृभिर्यतो वाजमा दर्षि सातये.. (७) हे ऋषियों द्वारा निचोड़े गए एवं पात्रों में रखे सोम! दोनों हाथों से उत्पन्न दस उंगलियां स्तुतियों एवं यज्ञकर्मों के साथ तुम्हें भेड़ के बालों से बने दशापवित्र में छानती हैं. यज्ञकर्म के नेता ऋत्विजों से गृहीत सोम स्तोताओं के लिए अन्न देते हैं. (७) परिप्रयन्तं वव्यं सुषंसदं सोमं मनीषा अभ्यनूषत स्तुभः. यो धारया मधुमाँ ऊर्मिणा दिव इयर्ति वाचं रयिषाळमर्त्यः.. (८) मन से निकली हुई स्तुतियां पात्रों में सभी ओर जाते हुए, देवों द्वारा अभिलषित एवं शोभन स्थान वाले सोम की प्रशंसा करती हैं. नशीले रस वाले सोम जल के साथ आकाश से द्रोणकलश में गिरते हैं. शत्रुओं का धन छीनने वाले एवं मरणरहित सोम वाणी को प्रेरित करते हैं. (८) अयं दिव इयर्ति विश्वमा रजः सोमः पुनानः कलशेषु सीदति. अद्भिर्गोभिर्मृज्यते अद्रिभिः सुतः पुनान इन्दुर्वरिवो विदत्प्रियम्.. (९) सोम द्युलोक के सभी जलों को बरसने के लिए प्रेरित करते हैं, दशापवित्र से शुद्ध होकर ebook converter DEMO Watermarks*

द्रोणकलश में जाते हैं व जलों, पत्थरों एवं दूध से सुशोभित होते हैं. निचुड़े हुए एवं छने हुए सोम स्तोताओं को प्रिय एवं वरण करने योग्य धन देते हैं. (९) एवा नः सोम परिषिच्यमानो वयो दधच्चित्रतमं पवस्व. अद्वेषे द्यावापृथिवी हुवेम देवा धत्त रयिमस्मे सुवीरम्.. (१०) हे दान करते हुए एवं जलों द्वारा चारों ओर से सींचे जाते हुए सोम! तुम हमें अतिशय विचित्र अन्न दो. हम द्वेषरहित द्यावा-पृथिवी को पुकारते हैं. हे देवो! हमें वीर संतान के साथ धन दो. (१०) सूक्त—६९ देवता—पवमान सोम इषुर्न धन्वन् प्रति धीयते मतिर्वत्सो न मातुरुप सर्ज्यूधनि. उरुधारेव दुहे अग्र आयत्यस्य व्रतेष्वपि सोम इष्यते.. (१) पवमान सोमरूपी इंद्र के प्रति हम अपनी स्तुति इस प्रकार अर्पित करते हैं, जिस प्रकार धनुष पर बाण रखा जाता है. जिस प्रकार बछड़ा गाय के थन का दूध पीने के लिए जन्म लेता है, उसी प्रकार इंद्र के नशे के लिए सोम की उत्पत्ति हुई है. जिस प्रकार दुधारू गाय बछड़े के सामने आकर दूध देती है, उसी प्रकार इंद्र स्तोताओं के सामने आकर विविध अभिलाषाएं पूरी करते हैं. इंद्र के यज्ञों में सोम की आवश्यकता पड़ती है. (१) उपो मतिः पृच्यते सिच्यते मधु मन्द्राजनी चोदते अन्तरासनि. पवमानः संतनिः प्रघ्नतामिव मधुमान्द्रप्सः परि वारमर्षति.. (२) स्तोताओं द्वारा सोमरूप इंद्र की स्तुति की जाती है एवं इंद्र के निमित्त सोमरस में जल मिलाया जाता है. नशीले सोमरस की धारा इंद्र के मुख में पहुंचती है. जिस तरह मारने में कुशल योद्धाओं का बाण शीघ्र ही निशाने पर पहुंच जाता है, उसी प्रकार विस्तृत, मादक रस वाले, छनने वाले एवं शीघ्र गतिशील सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर आते हैं. (२) अव्ये वधूयुः पवते परि त्वचि श्रथ्नीते नप्तीरदितेर्ऋतं यते. हरिरक्रान्यजतः संयतो मदो नृम्णा शिशानो महिषो न शोभते.. (३) जलरूपी वधू से मिलने के लिए सोम भेड़ के चमड़े पर आते हैं. सोम यज्ञ में आकर धरती पर उत्पन्न ओषधियों को यजमानों के लिए फूल वाली बनाते हैं. हरे रंग वाले, सबके यज्ञ-योग्य एवं संगृहीत सोम शत्रुओं को पराजित करते हैं. महान् के समान सर्वत्र व्यापक सोम शत्रुओं के बलों को क्षीण करते हुए अपने तेज से चमकते हैं. (३) उक्षा मिमाति प्रति यन्ति धेनवो देवस्य देवीरुपयन्ति निष्कृतम्. अत्यक्रमीदर्जुनं वारमव्ययमतकं न निक्तं परि सोमो अव्यत.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

जिस प्रकार वीर्यसेचन करने वाला बैल गरजता है तथा गाएं उसकी ओर जाती हैं, उसी प्रकार शब्द करके द्रोणकलश में जाने वाले सोम का अनुगमन धाराएं करती हैं. सोम सफेद रंग वाले एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करते हैं एवं अपने कवच के समान दूध से अपने को ढकते हैं. (४) अमृक्तेन रुशता वाससा हरिरमर्त्यो निर्णिजानः परि व्यत. दिवस्पृष्ठं बर्हणा निर्णिजे कृतोपस्तरणं चम्वोर्नभस्मयम्.. (५) हरितवर्ण एवं मरणरहित सोम मसले जाते समय स्वतः श्वेत दुग्धरूपी वस्त्र से चारों ओर से ढक जाते हैं. सोम ने सूर्य को द्युलोक के ऊपर पापनाशी शोधन के लिए स्थापित किया था तथा द्यावा-पृथिवी के ऊपर आदित्य का तेज इसलिए स्थापित किया था, जिससे सब शुद्ध हो सकें. (५) सूर्यस्येव रश्मयो द्रावयित्नवो मत्सरासः प्रसुपः साकमीरते. तन्तुं ततं परि सर्गास आशवो नेन्द्रादृते पवते धाम किं चन.. (६) सूर्य की किरणों के समान सब जगह बहने वाले, नशीले, शत्रुओं को मारने वाले, चमसों में फैले हुए एवं निर्मित सोम विस्तृत एवं धागों से बने वस्त्र के चारों ओर जाते हैं. सोम इंद्र के अतिरिक्त किसी के लिए नहीं छनते. (६) सिन्धोरिव प्रवणे निम्न आशवो वृषच्युता मदासो गातुमाशत. शं नो निवेशे द्विपदे चतुष्पदेऽस्मे वाजाः सोम निष्ठन्तु कृष्टयः.. (७) जिस प्रकार नदियां सागर में मिलती हैं, उसी प्रकार ऋत्विजों द्वारा निचोड़े गए नशीले सोम इंद्र के पास पहुंचते हैं. हे सोम! हमारे घर में पशुओं एवं परिवारीजनों को सुख दो तथा हमें अन्न और संतान दो. (७) आ नः पवस्व वसुमध्दिरण्यवदश्वावद् गोमद्यवमत्सुवीर्यम्. यूयं हि सोम पितरो मम स्थन दिवो मूर्धानः प्रस्थिता वयस्कृतः.. (८) हे सोम! तुम हमें वसु, स्वर्ण, अश्व, गाय व जौ से युक्त एवं शोभन वीर्य वाला धन दो. हे सोम! तुम मेरे पिता अंगिरा ऋषि के भी पिता हो. तुम स्वर्ग के शीश पर स्थित एवं अन्नकर्त्ता हो. (८) एते सोमाः पवमानास इन्द्रं रथााइव प्र ययुः सातिमच्छ. सुताः पवित्रमति यन्त्यव्यं हित्वी वव्रिं हरितो वृष्टिमच्छ.. (९) जिस प्रकार इंद्र के रथ संग्राम की ओर जाते हैं, उसी प्रकार हमारे द्वारा निचोड़े गए एवं छनते हुए सोम इंद्र के समीप जाते हैं. पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करते हैं. हरे रंग के सोम बुढ़ापे को छोड़कर वर्षा को प्रेरित करते ebook converter DEMO Watermarks*

हैं. (९) इन्दविन्द्राय बृहते पवस्व सुमृळीको अनवद्यो रिशादा:. भरा चन्द्राणि गृणते वसूनि देवैर्द्यावापृथिवी प्रावतं नः.. (१०) हे सोम! तुम महान् इंद्र के लिए पवित्र बनो. तुम इंद्र को भली-भांति सुख देने वाले, निंदारहित एवं बाधकों को हराने वाले हो. तुम मुझ स्तोता को आह्लादक धन दो. द्यावा- पृथिवी उत्तम धन देकर हमारी रक्षा करें. (१०) सूक्त—७० देवता—पवमान सोम त्रिरस्मै सप्त धेनवो दुदुहे सत्यामाशिरं पूर्व्ये व्योमनि. चत्वार्यन्या भुवनानि निर्णिजे चारूणि चक्रे यदृतैरवर्धत.. (१) शुद्ध होते हुए सोम के लिए प्राचीन लोगों द्वारा किए गए यज्ञ में इक्कीस गाएं दूध देती हैं. सोम जब यज्ञों द्वारा बढ़े, तब उन्होंने अपनी शुद्धि के लिए चार शोभन जल बनाए. (१) स भिक्षमाणो अमृतस्य चारुण उभे द्यावा काव्येना वि शश्रथे. तेजिष्ठा अपो मंहना परि व्यत यदी देवस्य श्रवसा सदो विदुः.. (२) जब यजमान यज्ञ करते हुए शोभन जल मांगते हैं, तब सोम धरती-आकाश को जलों से भर देते हैं. सोम अपनी महिमा द्वारा अतिशय तेजस्वी जलों को ढकते हैं. ऋत्विज् हव्य धारण करके दीप्तिशाली सोम का स्थान जान गए. (२) ते अस्य सन्तु केतवोऽमृत्यवोऽदाभ्यासो जनुषी उभे अनु. येभिर्नृम्णा च देव्या च पुनत आदिद्राजानं मनना अगृभ्णत.. (३) सोम का ज्ञान कराने वाली, मरणरहित एवं हिंसित न होने वाली किरणें स्थावर-जंगम दोनों की रक्षा करें. इन्हीं ज्ञापक किरणों द्वारा सोम बल एवं देवयोग्य अन्न देते हैं. निचोड़ने की क्रिया के बाद ही दीप्तिशाली सोम को उत्तम स्तुतियां मिलती हैं. (३) स मृज्यमानो दशभिः सुकर्मभिः प्र मध्यमासु मातृषु प्रमे सचा. व्रतानि पानो अमृतस्य चारुण उभे नृचक्षा अनु पश्यते विशौ.. (४) सोम शोभन-कर्मों वाली दस उंगलियों द्वारा मसले जाकर लोकों को देखने के लिए अंतरिक्षस्थित मध्यमा वाक् में रहते हैं. मनुष्यों को देखने वाले सोम कल्याणकारी जल की वर्षा के लिए यज्ञकर्मों की रक्षा करते हुए अंतरिक्ष से मानवों और देवों दोनों को देखते हैं. (४) स मर्मृजान इन्द्रियाय धायस ओभे अन्ता रोदसी हर्षते हितः. वृषा शुष्मेण बाधते वि दुर्मतीरादेदिशानः शर्यहेव शुरुधः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

दशापवित्र के द्वारा छाने जाते हुए सोम विश्वधारणकर्त्ता इंद्र के बल के निमित्त द्यावा- पृथिवी के बीच वर्तमान रहते हैं एवं सब ओर जाते हैं. जिस प्रकार वीर अपने विरोधी भटों को आयुधों द्वारा मारते हैं, उसी प्रकार अभिलाषापूरक सोम दुर्बुद्धि तथा दुःखद असुरों को अपने बल द्वारा बार-बार बाधा पहुंचाते हैं. (५) स मातरा न ददृशान उस्रियो नानददेति मरुतामिव स्वनः. जानन्नृतं प्रथमं यत्स्वर्णरं प्रशस्तये कमवृणीत सुक्रतुः.. (६) जैसे गाय का बछड़ा रंभाता हुआ जाता है, उसी प्रकार पवमान सोम अपने माता-पिता द्यावा-पृथिवी को देखते हुए एवं शब्द करते हुए सब जगह जाते हैं. मरुद्गण भी इसी प्रकार शब्द करते हुए चलते हैं. शोभन कर्म वाले सोम उत्तम जल को जानते हुए प्रशंसा के लिए मेरे अतिरिक्त किस शोभन मानव को वरण करेंगे? (६) रुवति भीमो वृषभस्तविष्या शृङ्गे शिशानो हरिणी विचक्षणः. आ योनिं सोमः सुकृतं नि षीदति गव्ययी त्वग्भवति निर्णिगव्ययी.. (७) शत्रुओं को भयंकर, भक्तों के अभिलाषापूरक एवं सबको देखने वाले सोम अपना बल दिखाने की इच्छा से अपने हरे रंग के दो सींगों को तेज करते हुए शब्द करते हैं. सोम अपने ठीक से बनाए हुए स्थान पर बैठते हैं. भेड़ का चमड़ा और गाय का चमड़ा सोम को शुद्ध करते हैं. (७) शुचिः पुनानस्तन्वमरेपसमव्ये हरिर्न्यधाविष्ट सानवि. जुष्टो मित्राय वरुणाय वायवे त्रिधातु मधु क्रियते सुकर्मभिः.. (८) दीप्तिशाली व हरे रंग के सोम अपने पापरहित शरीर को शुद्ध करते हुए भेड़ के बालों के दशापवित्ररूपी ऊंचे स्थान पर जाते हैं. शोभन कर्म वाले ऋत्विज् पर्याप्त जल, दूध तथा दही मिले हुए सोम को मित्र, वरुण एवं वायु के लिए देते हैं. (८) पवस्व सोम देववीतये वृषेन्द्रस्य हार्दि सोमधानमा विश. पुरा नो बाधाद् दुरिताति पारय क्षेत्रविद्धि दिशा आहा विपृच्छते.. (९) हे जलवर्षक सोम! तुम देवों के पीने के निमित्त टपको. हे सोम! इंद्र के प्रिय पात्र में प्रवेश करो. राक्षस हमें दुःखी करें, इससे पहले ही हमें उनसे बचाओ. रास्ता जानने वाला जिस प्रकार रास्ता पूछने वाले को मार्ग बताता है, उसी प्रकार सोम हमें यज्ञमार्ग बताकर रक्षा करें. (९) हितो न सप्तिरभि वाजमर्षेन्द्रस्येन्दो जठरमा पवस्व. नावा न सिन्धुमति पर्षि विद्वाञ्छूरो न युध्यन्नव नो निदः स्पः.. (१०) हे सोम! जिस प्रकार घोड़ा प्रेरणा पाकर युद्ध में जाता है, उसी प्रकार तुम द्रोणकलश में ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—७१ देवता—पवमान सोम

जाओ तथा ऋत्विजों की प्रेरणा से इंद्र के पेट में पहुंचो. हे विद्वान् सोम! नाविक जैसे नाव द्वारा लोगों को नदी के पार पहुंचाता है, उसी प्रकार तुम हमें पापों के पार भेजो. तुम शूर के समान हमारे शत्रुओं को मारो और हमें निंदकों से बचाओ. (१०) सूक्त—७१ देवता—पवमान सोम आ दक्षिणा सृज्यते शुष्म्या३सदं वेति द्रुहो रक्षसः पाति जागृविः. हरिरोपशं कृणुते नभस्पय उपस्तिरे चम्वो ३र्ब्रह्म निर्णिजे.. (१) सोम-संबंधी यज्ञ में ऋत्विजों को दक्षिणा दी जाती है. शक्तिशाली सोम द्रोणकलश में प्रवेश करते हैं. जागरणशील सोम अपने स्तोताओं को द्रोही राक्षसों से बचाते हैं. हरे रंग वाले सोम सबके धारण करने वाले एवं आकाश के तल-जल को बनाते हैं तथा द्यावा-पृथिवी को ढकने के लिए तथा अंधकार मिटाने के लिए सूर्य को स्थिर करते हैं. (१) प्र कृष्टिव शूष एति रोरुवदसूर्य१ वर्णं नि रिणीते अस्य तम्. जहाति वव्रिं पितुरेति निष्कृतमुपप्रुतं कृणुते निर्णिजं तना.. (२) शब्द करते हुए सोम शत्रुहननकर्त्ता योद्धा के समान जाते हैं एवं अपने असुर बाधक बल को प्रकट करते हैं. सोम बुढ़ापे का त्याग करते हैं तथा पीने योग्य द्रव्य के रूप में द्रोणकलश में जाते हैं. सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर अपने गतिशील रूप को ठहराते हैं. (२) अद्रिभिः सुतः पवते गभस्त्योर्वृषायते नभसा वेपते मती. स मोदते नसते साधते गिरा नेनिक्ते अप्सु यजते परीमणि.. (३) पत्थरों और भुजाओं की सहायता से निचोड़े गए सोम पात्रों में जाते हैं एवं बैल के समान आचरण करते हैं. स्तुतियों से प्रशंसित सोम अंतरिक्ष के साथ सब जगह जाते हैं एवं प्रसन्न होते हैं. सोम पात्रों में मिलते हैं, स्तुतियां सुनकर स्तोताओं को धन देते हैं, जल में शुद्ध होते हैं एवं यज्ञ में पूजे जाते हैं. (३) परि द्युक्षं सहसः पर्वतावृधं मध्वः सिञ्चन्ति हर्म्यस्य सक्षणिम्. आ यस्मिन्गावः सुहुताद ऊधनि मूर्धञ्छ्रीणन्त्यग्रियं वरीमभिः.. (४) शक्तिशाली एवं मादक सोम दीप्तिशाली द्युलोक में निवास करने वाले, पर्वतों को बढ़ाने वाले एवं शत्रुनागरियों को नष्ट करने वाले इंद्र को सींचते हैं. हव्यभक्षण करने वाली गाएं अपने उठे हुए स्तनों में भरे उत्तम दूध को अपनी महिमा से इंद्र को देती हैं. (४) समी रथं न भुरिजोरहेषत दश स्वसारो अदितेरुपस्थ आ. जिगादुप ज्रयति गोरपीच्यं पदं यदस्य मतुथा अजीजनन्.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

जिस प्रकार रथ को युद्ध में भेजा जाता है, उसी प्रकार दोनों हाथों की दस उंगलियां सोम को यज्ञस्थल में भेजती हैं. स्तोता जिस समय सोम का स्थान बनाते हैं, उसी समय गाय का दूध सोम के पास जाता है. (५) श्येनो न योनिं सदनं धिया कृतं हिरण्ययमसदं देव एषति. ए रिणन्ति बर्हिषि प्रियं गिराश्वो न देवाँ अप्येति यज्ञियः.. (६) जिस प्रकार बाज पक्षी अपने निवास-स्थान को जाता है, उसी प्रकार दीप्तिशाली सोम यज्ञकर्मों द्वारा निर्मित एवं स्वर्णमय स्थान को जाते हैं. स्तोता यज्ञ में प्यारे सोम की स्तुति करते हैं. यज्ञ के योग्य सोम घोड़े के समान शीघ्रता से देवों के पास पहुंच जाते हैं. (६) परा व्यक्तो अरुषा दिवः कविर्वृषा त्रिपृष्ठो अनविष्ट गा अभि. सहस्रणीतिर्यतिः परायती रेभो न पूर्वीरुषसो वि राजति.. (७) दीप्तिशाली, बुद्धिमान् एवं स्पष्ट धाराओं वाले सोम दशापवित्र से द्रोणकलश में आते हैं. सोम अभिलाषापूरक, तीनों सवनों में रहने वाले, स्तुतियों के अनुकूल शब्द करने वाले, हजार आंखों वाले, पात्रों व कलशों में आने-जाने वाले एवं अनेक उषाओं में शब्द करते हुए सुशोभित होने वाले हैं. (७) त्वेषं रूपं कृणुते वर्णो अस्य स यत्राशयत्समृता सेधति स्रिधः. अप्सा याति स्वधया दैव्यं जनं सं सुष्टुती नसते सं गोअग्रया.. (८) सोम की शत्रुनिवारक किरण अपने रूप को दीप्तिशाली करती है. वह युद्ध में सोती है, शत्रुओं को रोकती है, जल देती हुई हव्य अन्न के साथ देवभक्त मनुष्य के पास आती है एवं शोभनस्तुतियों से मिलती है. सोम उन वाक्यों से मिलते हैं, जिनके द्वारा स्तोता गायों को पाने की प्रार्थना करता है. (८) उक्षेव यूथा परियन्नरावीदधि त्विषीरधित सूर्यस्य. दिव्यः सुपर्णोऽव चक्षत क्षां सोमः परि क्रतुना पश्यते जाः.. (९) जैसे गायों को देखकर सांड़ गरजता है, उसी प्रकार स्तुतियां सुनकर सोम शब्द करते हैं. सोम सूर्यकिरणों के रूप में द्युलोक में रहते हैं, द्युलोक में उत्पन्न एवं शोभन गति वाले हैं, धरती को देखते हैं एवं यज्ञ के द्वारा प्रजाओं को ज्ञान कराते हैं. (९) सूक्त—७२ देवता—पवमान सोम हरिं मृजन्त्यरुषो न युज्यते सं धेनुभिः कलशे सोमो अज्यते. उद्वाचमीरयति हिन्वते मती पुरुष्टुतस्य कति चित्परिप्रियः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

ऋत्विज् हरे रंग वाले सोम को मसलते हैं, सोम की सेवा घोड़े के समान की जाती है. द्रोण में स्थित सोम गाय के दूध, दही से मिलाए जाते हैं. जब सोम शब्द करते हैं, तब स्तोता स्तुतियां करते हैं. इसके बाद सोम बहुत सी स्तुतियां करने वाले स्तोता को धन से प्रसन्न करते हैं. (१) साकं वदन्ति बहवो मनीषिण इन्द्रस्य सोमं जठरे यदादुहुः. यदी मृजन्ति सुगभस्तयो नरः सनीळाभिर्दशभिः काम्यं मधु.. (२) ऋत्विज् जब द्रोणकलशरूपी इंद्रजठर में सोम को दुहते हैं एवं शोभन बाहुओं वाले यज्ञकर्म के नेता अपनी दस उंगलियों से अभिलषणीय एवं नशीले सोम को मसलते हैं, उस समय बहुत से बुद्धिमान् स्तोता एक साथ स्तुतियां बोलते हैं. (२) अरममाणो अत्येति गा अभि सूर्यस्य प्रियं दुहितुस्तिरो रवम्. अन्वस्मै जोषमभरद्विनंगृसः सं द्वयीभिः स्वसृभिः क्षेति जामिभिः.. (३) देवों को प्रसन्न करने के लिए पात्रों में प्रवेश करने वाले सोम गोदुग्ध आदि को लक्ष्य करते हैं. वे सूर्य की प्रिय पुत्री उषा के स्वर का तिरस्कार करते हैं. स्तोता सोम की पर्याप्त स्तुति करता है. सोम दोनों भुजाओं से उत्पन्न एवं परस्पर मिली हुई गतिशील उंगलियों से मिलते हैं. (३) नृधूतो अद्रिषुतो बर्हिषि प्रियः पतिर्गवां प्रदिव इन्दुरृत्वियः. पुरन्धिवान्मनुषो यज्ञसाधनः शुचिर्धिया पवते सोम इन्द्र ते.. (४) हे इंद्र! यज्ञकर्म करने वाले मनुष्यों द्वारा शोभित, पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए, देवों को प्रसन्न करने वाले, गायों के स्वामी, पुराने पात्रों में गिरने वाले, ऋतु में उत्पन्न, अनेक यज्ञकर्मों वाले, मानवों के यज्ञ के साधन एवं दशापवित्र से शुद्ध सोम तुम्हारे लिए धारारूप में यज्ञ के पात्रों में गिरते हैं. (४) नृबाहुभ्यां चोदितो धारया सुतोऽनुष्वधं पवते सोम इन्द्र ते. आप्राः क्रतून्त्समजैरध्वरे मतीर्वेर्न दृषच्चम्वो३रासदद्धरिः.. (५) हे इंद्र! यज्ञकर्म के नेता मनुष्यों द्वारा प्रेरित एवं धारा के रूप में निचुड़ने वाले सोम तुम्हारा बल बढ़ाने के लिए आते हैं. तुम सोमरस पीकर यज्ञकर्मों को पूरा करते हो. तुमने यज्ञ में शत्रुओं को भली-भांति जीता है. हरे रंग वाले सोम चमू नामक पात्रों में इस प्रकार बैठते हैं, जिस प्रकार पक्षी वृक्ष पर बैठते हैं. (५) अंशुं दुहन्ति स्तनयन्तमक्षितं कविं कवयोऽपसो मनीषिणः. समी गावो मतयो यन्ति संयत ऋतस्य योना सदने पुनर्भुवः.. (६) कवि, कर्मवाले एवं बुद्धिमान् ऋत्विज् शब्द करते हुए, क्षीणतारहित एवं क्रांतकर्म वाले

सोम को निचोड़ते हैं. इसके बाद बार-बार उत्पन्न होने वाली गाएं एवं स्तुतियां परस्पर मिलकर यज्ञस्थान अर्थात् उत्तरवेदी सोम से मिलती हैं. (६) नाभा पृथिव्या धरुणो महो दिवोऽपामूर्मौ सिन्धुष्वन्तरुक्षितः. इन्द्रस्य वज्रो वृषभो विभूवसुः सोमो हृदे पवते चारु मत्सरः.. (७) महान् द्युलोक को धारण करने वाले, धरती के नाभिरूप उत्तरवेदी पर स्थित, नदियों के जलों के भीतर छिपे हुए, इंद्र के वज्र के समान, अभिलाषा-पूरक व विस्तृत धन वाले सोम इंद्र के हित सुंदर मदकारक बनकर सुख के लिए जाते हैं. (७) स तू पवस्व परि पार्थिवं रजः स्तोत्रे शिक्षन्नाधून्वते च सुक्रतो. मा नो निर्भाग्वसुनः सादनस्पृशो रयिं पिशङ्गं बहुलं वसीमहि.. (८) हे शोभन-कर्म वाले सोम! तीनों सवनों में स्तुति करने वाले को धन देते हुए धरा लोक को लक्ष्य करके शीघ्र बरसो. तुम हमें घर, पुत्र आदि देने वाले धन से अलग मत करो. हम पीले रंग का विविध स्वर्णरूप धन प्राप्त करें. (८) आ तू न इन्दो शतदात्वश्व्यं सहस्रदातु पशुमद्धिरण्यवत्. उप मास्व बृहती रेवतीरिषोऽधि स्तोत्रस्य पवमान नो गहि.. (९) हे पवमान सोम! हमें अनेक दान वाला, अश्वसहित, हजारों दानों से युक्त, पशुओं सहित व स्वर्णयुक्त धन शीघ्र दो. तुम हमें पशुओं से युक्त अन्न दो. तुम हमारा स्तोत्र सुनने के लिए आओ. (९) सूक्त—७३ देवता—पवमान सोम स्रक्वे द्रप्सस्य धमतः समस्वरन्नृतस्य योना समरन्त नाभयः. त्रीन्त्स मूर्ध्नो असुरश्चक्र आरभे सत्यस्य नावः सुकृतमपीपरन्.. (१) निचोड़े जाते हुए सोम की किरणें यज्ञ की ठोड़ी अर्थात् उत्तरवेदी पर मिलती हैं. सोमरस यज्ञ के उत्पत्ति स्थान में मिलते हैं. शक्तिशाली सोम उठे हुए तीनों लोकों को मानवों व देवों के चलने के लिए बनाते हैं. सत्यरूप सोम की नाव के समान स्थित चार थालियां शोभन कर्म वाले यजमान को मनचाहा सुख देकर पूजती हैं. (१) सम्यक् सम्यञ्चो महिषा अहेषत सिन्धोरूर्मोवधि वेना अवीविपन्. मधोर्धाराभिर्जनयन्तो अर्कमित्रियामिन्द्रस्य तन्वमवीवृधन्.. (२) पूजा के योग्य ऋत्विज् परस्पर मिलकर सोमरस को अच्छी तरह निचोड़ते हैं. इसके स्वर्ग आदि कर्मफल चाहने वाले ऋत्विज् सरिता के जल में सोम को कंपित करते हैं. ebook converter DEMO Watermarks*

स्तोताओं ने पवित्र स्तुतियां बोलते हुए इंद्र के अतिशय प्रिय तेज को नशीले सोमरस की धाराओं से बढ़ाया है. (२) पवित्रवन्तः परि वाचमासते पितैषां प्रत्नो अभि रक्षति व्रतम्. महः समुद्रं वरुणस्तिरो दधे धीरा इच्छेकुर्धरणेष्वारभम्.. (३) शुद्ध करने की शक्ति से युक्त सोमरस की किरणें माध्यमिका वाक् के चारों ओर बैठती हैं. इन किरणों के प्राचीन पिता सोम प्रकाशनरूप कर्म की रक्षा करते हैं. अपने तेज से सबको ढकने वाले सोम अपनी किरणों से अंतरिक्ष को ढकते हैं. धीर ऋत्विज् सबको धारण करने वाले जल में सोम को मिलाना आरंभ करते हैं. (३) सहस्रधारेऽव ते समस्वरन्दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतः. अस्य स्पशो न नि मिषन्ति भूर्णयः पदेपदे पाशिनः सन्ति सेतवः.. (४) हजार धाराएं बरसाने वाले अंतरिक्ष में वर्तमान सोमरस की किरणें नीचे स्थित धरती को वृष्टियुक्त करती हैं. द्युलोक के ऊंचे स्थान में स्थित, मधुपूर्ण जीभ वाली एक-दूसरे से अलग सोमरस की अपनी किरणें तेज चलती हुई कभी पलक नहीं गिरातीं. इस प्रकार सोम की किरणें स्थान-स्थान पर पापियों को बाधा पहुंचाती हैं. (४) पितुर्मातुरध्या ये समस्वरन्नृचा शोचन्तः संदहन्तो अव्रतान्. इन्द्रद्विष्टामप धमन्ति मायया त्वचमसिक्नीं भूमनो दिवस्परि.. (५) द्यावा-पृथिवीरूपी माता-पिता से अधिक मात्रा में उत्पन्न होने वाली सोम की किरणें ऋत्विजों की स्तुतियों से दीप्ति होती हुई यज्ञकर्म न करने वालों को नष्ट करती हैं एवं इंद्र से द्वेष करने वाले व काले चमड़े वाले राक्षसों को अपनी बुद्धि द्वारा धरती एवं आकाश से दूर भगाती हैं. (५) प्रत्नान्मानादध्या ये समस्वरञ्छ्लोकयन्त्रासो रभसस्य मन्तवः. अपानक्षासो बधिरा अहासत ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः.. (६) स्तुति के अनुसार चलने वाली एवं शीघ्रगति का अभिमान करने वाली सोम की किरणें प्राचीन अंतरिक्ष से एक साथ उत्पन्न हुई थीं. ज्ञान-दृष्टि से शून्य एवं देवों की स्तुतियां न सुनने वाले पापी लोग उन किरणों का त्याग कर देते हैं. पापी लोग सत्य के मार्ग से चलकर पार नहीं पहुंचते. (६) सहस्रधारे वितते पवित्र आ वाचं पुनन्ति कवयो मनीषिणः. रुद्रास एषामिषिरासो अद्रुहः स्पशः स्वञ्च सुदृशो नृचक्षसः.. (७) यज्ञ पूर्ण करने वाले एवं बुद्धिमान् ऋत्विज् अनेक धाराओं वाले, विस्तृत एवं शुद्ध सोम में स्थित माध्यमिका वाणी की स्तुति करते हैं. गतिशील, स्तोताओं से द्रोह न करने वाले, ebook converter DEMO Watermarks*

शोभन गति वाले, नेता एवं देखने में सुंदर मरुद्गण माध्यमिका वाणी की स्तुति करने वालों के वश में हो जाते हैं। (७) ऋतस्य गोपा न दभाय सुक्रतुस्त्री ष पवित्रा हृद्य१न्तरा दधे. विद्वान्तस विश्वा भुवनाभि पश्यत्यवाजुष्टान्विध्यति कर्ते अव्रतान्.. (८) यज्ञ के रक्षक एवं शोभन कर्म वाले सोम को कोई रोकता नहीं. सोम अपने हृदय में तीन पवित्रों—अग्नि, वायु एवं सूर्य को धारण करते हैं. सब कुछ जानने वाले सोम सब लोकों को देखते हैं एवं यज्ञकर्म न करने वाले अप्रिय लोगों को नीचे की ओर मुंह करके पीड़ित करते हैं. (८) ऋतस्य तन्तुर्विततः पवित्र आ जिह्वाया अग्रे वरुणस्य मायया. धीराश्चित्तत्समिनक्षन्त आशतात्रा कर्तमव पदात्यप्रभुः.. (९) सत्यरूप यज्ञ का विस्तार करने वाले, दशापवित्र में फैले सोम वरुण की जीभ के अग्रभाग के समान जल में रहते हैं. यज्ञकर्म करने वाले उन सोम को पाते हैं. जो यज्ञकर्म करने में असमर्थ हैं, वे नरक में जाते हैं. (९) सूक्त—७४ देवता—पवमान सोम शिशुर्न जातोऽव चक्रदद्धने स्व१र्यद्द्वाज्यरुषः सिषासति. दिवो रेतसा सचते पयोवृधा तमीमहे सुमती शर्म सप्रथः.. (१) जल में उत्पन्न पवमान सोम नीचे की ओर मुंह करके बालक के समान रोते हैं. शक्तिशाली घोड़े के समान चलने वाले सोम स्वर्गलोक का सहारा लेना चाहते हैं. वे गायों एवं ओषधियों के रस के साथ स्वर्ग से धरती पर आते हैं. हम शोभन स्तुतियों के द्वारा उन सोम से धनसंपन्न घर मांगते हैं. (१) दिवो यः स्कम्भो धरुणः स्वातत आपूर्णो अंशुः पर्यैति विश्वतः. सेमे मही रोदसी यक्षदावृता समीचीने दाधार समिषः कविः.. (२) स्वर्गलोक को स्तंभित करने वाले, धरती के धारणकर्त्ता, सब जगह विस्तृत एवं पात्रों में भरे हुए सोम की किरणें चारों ओर जाती हैं. सोम ने विस्तृत द्यावा-पृथिवी को धारण किया था. यज्ञकर्म करने वाले सोम स्तोताओं को अन्न दें. (२) महि प्सरः सुकृतं सोम्यं मध्वीं गव्यूतिरदितेर्ऋतं यते. इशे यो वृष्टेरित उसियो वृषापां नेता य इतऊतिर्ऋग्मियः.. (३) यज्ञ में जाने वाले इंद्र के लिए भली-भांति संस्कृत एवं सोम मिला हुआ मधुर रस पीने ebook converter DEMO Watermarks*

योग्य होता है. हमारे यज्ञ में आने वाले इंद्र का मार्ग विस्तृत होता है. वे धरती पर गिरने वाली वर्षा के स्वामी हैं. दुधारू गायों के हितकारक, जल बरसाने वाले एवं यज्ञ के नेता इंद्र हमारे यज्ञ में जाने से स्तुतियोग्य होते हैं. (३) आत्मन्वन्नभो दुह्यते घृतं पय ऋतस्य नाभिरमृतं वि जायते. समीचीनाः सुदानवः प्रीणन्ति तं नरो हितमव मेहन्ति पेरवः.. (४) सोम आदित्यरूप आकाश से सारपूर्ण घी व दूध दुहते हैं. यज्ञ की नाभिरूप सोम से अमृत उत्पन्न होता है. शोभनदान वाले यजमान मिलकर सोम को प्रसन्न करते हैं. यज्ञ का नेतृत्व करने वाली एवं सबकी रक्षक सोमकिरणें धरती पर जल बरसाती हैं. (४) अरावीदंशुः सचमान ऊर्मिणा देवाव्यं१ मनुषे पिन्वति त्वचम्. दधाति गर्भमदितेरुपस्थ आ येन तोकं च तनयं च धामहे.. (५) जलसमूह में मिलाए जाते हुए सोम शब्द करते हैं एवं देवों का पालन करने वाले अपने शरीर को यजमान के कल्याण के लिए पात्रों में गिराते हैं. सोम अपनी किरणों द्वारा धरती पर उत्पन्न ओषधियों में गर्भधारण करते हैं. उसी गर्भ की सहायता से हम पुत्र और पौत्र पाते हैं. (५) सहस्रधारेऽव ता असश्चतस्तृतीये सन्तु रजसि प्रजावतीः. चतस्रो नाभो निहिता अवो दिवो हविर्भरन्तमृतं घृतश्चुतः.. (६) जल की अनेक धाराओं वाले स्वर्गलोक में वर्तमान, एक-दूसरे से मिली हुई एवं प्रजाओं को उत्पन्न करने वाली सोमकिरणें धरती पर गिरें. सोम ने उन चार किरणों को स्वर्ग के नीचे स्थापित किया है. जल बरसाने वाली वे किरणें देवों को हवि देती हैं एवं ओषधियों में अमृत भरती हैं. (६) श्वेतं रूपं कृणुते यत्सिषासति सोमो मीढवाँ असुरो वेद भूमनः. धिया शमी सचते सेमभि प्रवद्विवस्कवन्धमव दर्षदद्रिणम्.. (७) पात्र में पहुंचकर सोम पात्र का रूप उज्ज्वल कर देते हैं. अभिलाषापूरक एवं शक्तिशाली सोम स्तोताओं को बहुत धन देना जानते हैं, अपनी बुद्धि की सहायता से उत्तम कर्मों को प्राप्त करते हैं एवं आकाश में घिरे हुए जलपूर्ण मेघ को फाड़ते हैं. (७) अध श्वेतं कलशं गोभिरक्तं कार्ष्मन्ना वाज्यक्रमीतसस्वान्. आ हिन्विरे मनसा देवयन्तः कक्षीवते शतहिमाय गोनाम्.. (८) जिस प्रकार युद्ध में योद्धा से प्रेरित घोड़ा मनचाही दिशा को लांघ जाता है, उसी प्रकार सोम सफेद रंग वाले एवं जलपूर्ण कलश को लांघते हैं. देवों की कामना करने वाले ऋत्विज् सोम की स्तुतियां करते हैं. सोम ने अधिक चलने वाले कक्षीवान् ऋषि को पशु दिए थे. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—७५ देवता—पवमान सोम

अद्भिः सोम पपृचानस्य ते रसोऽव्यो वारं वि पवमान धावति. स मृज्यमानः कविभिर्मदिन्तम स्वदस्वेन्द्राय पवमान पीतये.. (९) हे पवमान सोम! जल में मिलने वाला तुम्हारा रस भेड़ के बालों से बने दशापवित्र की ओर अनेक प्रकार से दौड़ता है. हे अतिशय नशीले सोम! तुम बुद्धिमान् ऋत्विजों द्वारा पवित्र होकर इंद्र के पीने हेतु स्वादिष्ट बनो. (९) सूक्त—७५ देवता—पवमान सोम अभि प्रियाणि पवते चनोहितो नामानि यह्वो अधि येषु वर्धते. आ सूर्यस्य बृहतो बृहन्नधि रथं विश्वञ्चमरुहद्विचक्षणः.. (१) अन्न के लिए हितकारी सोम संसार के प्रिय एवं नीचे बहने वाले जलों के चारों ओर टपकते हैं. महान् सोम जलों के भीतर बढ़ते हैं. सबको देखने वाले सोम महान् सूर्य के विशाल एवं सब ओर चलने वाले रथ पर चढ़ते हैं. (१) ऋतस्य जिह्वा पवते मधु प्रियं वक्ता पतिर्धियो अस्या अदाभ्यः. दधाति पुत्रः पित्रोरपीच्यं१ नाम तृतीयमधि रोचने दिवः.. (२) सत्यरूप यज्ञ की जिह्वा के समान सोम प्यारा एवं मादक रस टपकाते हैं. सोम शब्द करने वाले, इस यज्ञकर्म के पालक एवं राक्षसों द्वारा अपराजेय हैं. द्युलोक को दीप्त करने वाला सोम जब निचोड़ा जाता है, तब यजमान ऐसा नाम धारण करता है जिसे उसके माता- पिता भी नहीं जानते. (२) अव द्युतानः कलशाँ अचिक्रदन्नृभिर्येमानः कोश आ हिरण्यये. अभीमृतस्य दोहना अनूषताधि त्रिपृष्ठ उषसो वि राजति.. (३) यज्ञ का दोहन करने वाले ऋत्विज् दीप्तिशाली एवं नेताओं द्वारा स्वर्णमय चमड़े पर रखे गए सोम को निचोड़ते हैं. सोम शब्द करते हुए द्रोणकलश की ओर जाते हैं. तीनों सवनों में वर्तमान सोम यज्ञ के दिन प्रातःकाल सुशोभित होते हैं. (३) अद्रिभिः सुतो मतिभिश्चनोहितः प्ररोचयन्नोदसी मातरा शुचिः. रोमाण्यव्या समया वि धावति मधोर्धारा पिन्वमाना दिवेदिवे.. (४) पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए, अन्न के लिए हितकारक एवं शुद्ध सोम जगत् का निर्माण करने वाली द्यावा-पृथिवी को प्रकाशित करके भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर जाते हैं एवं जल से मिली हुई मादक सोम की धार प्रतिदिन दशापवित्र पर गिरती है. (४) परि सोम प्र धन्वा स्वस्तये नृभिः पुनानो अभि वासयाशिरम्. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—७६ देवता—पवमान सोम

ये ते मदा आहनसो विहायसस्तेभिरिन्द्रं चोदय दातवे मघम्.. (५) हे सोम! हमारे कल्याण के लिए चारों ओर दौड़ो. तुम यज्ञकर्म के नेताओं द्वारा पवित्र होकर दूध, दही को ढको. तुम्हारे जो शब्दयुक्त, शत्रुघातक एवं महान् रस हैं, उनके कारण इंद्र को प्रेरित करो कि वे हमें महान् धन दें. (५) सूक्त—७६ देवता—पवमान सोम धर्ता दिवः पवते कृत्व्यो रसो दक्षो देवानामनुमाद्यो नृभिः. हरिः सृजानो अत्यो न सत्वभिर्वृथा पाजांसि कृणुते नदीष्वा.. (१) सबको धारण करने वाले, शोधन के योग्य, रसात्मक देवों के बल, ऋत्विजों द्वारा स्तुति योग्य, हरे रंग वाले, प्राणियों द्वारा उत्पन्न एवं सीखे हुए घोड़े के समान वेग वाले सोम स्वर्ग से टपकते हैं. (१) शूरो न धत्त आयुधा गभस्त्योः स्व१ः सिषासन्नथिरो गविष्टिषु. इन्द्रस्य शुष्ममीरयन्नपस्युभिरिन्दुहिन्वानो अज्यते मनीषिभिः.. (२) सोम वीर पुरुष के समान अपने दोनों हाथों में आयुध धारण करते हैं. सोम गायों को खोजने के संबंध में स्वर्ग में जाने की इच्छा से रथ वाले बने थे. इंद्र के बल को प्रेरित करते हुए सोम यज्ञकर्म के इच्छुक बुद्धिमानों द्वारा भेजे जाकर गाय के दूध में मिलाए जाते हैं. (२) इन्द्रस्य सोम पवमान ऊर्मिणा तविष्यमाणो जठरेष्वा विश. प्र णः पिन्व विद्युदभ्रेव रोदसी धिया न वाजाँ उप मासि शश्वतः.. (३) हे पवमान सोम! तुम बढ़ते हुए अपनी बहुत सी धाराओं द्वारा इंद्र के पेट में घुसो. बिजली जिस प्रकार बादलों का दोहन करती है, उसी प्रकार तुम अपने कर्मों द्वारा द्यावा- पृथिवी का दोहन करके हमें अधिक अन्न देते हो. (३) विश्वस्य राजा पवते स्वर्दृश ऋतस्य धीतिमृषिषाळवीवशत्. यः सूर्यस्यासिरेण मृज्यते पिता मतीनामसमष्टकाव्यः.. (४) जगत् के राजा सोम निचोड़ते हैं. स्वर्ग को देखने वाले इंद्र के कर्म ऋषियों से भी उत्तम है. सोम ने इंद्र के यज्ञकर्म की कामना की. सोम सूर्य की किरणों द्वारा शुद्ध होते हैं. हमारी स्तुतियों के पालनकर्त्ता सोम का कर्म कवियों से उत्कृष्ट है. (४) वृषेव यूथा परि कोशमर्षस्यपामुपस्थे वृषभः कनिक्रदत्. स इन्द्राय पवसे मत्सरिन्तमो यथा जेषाम समिथे त्वोतयः.. (५) हे अभिलाषापूरक सोम! जिस प्रकार बैल गायों के समूह में जाता है, उसी प्रकार तुम ebook converter DEMO Watermarks*