भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सत्यकर्मा, स्तोताओं को ऋणमुक्त करने वाले, अनिंदित एवं जलवर्षक मरुद्गण हमारे यज्ञ की रक्षा करते हैं। (४) पितुः प्रत्नस्य जन्मना वदामसि सोमस्य जिह्वा प्र जिगाति चक्षसा. यदिमिन्द्रं शम्यूक्वाण आशतादिन्नामानि यज्ञियानि दधिरे.. (५) हम अपने पिता रहूगण द्वारा बताई हुई बात कहते हैं कि सोमरस की आहुति के साथ की गई स्तुति मरुतों को प्राप्त होती है. इंद्र द्वारा संपन्न वृत्रवध के समय मरुद्गण उपस्थित थे और इंद्र की स्तुति कर रहे थे. इस प्रकार उन्होंने 'यज्ञपात्र' नाम धारण किया. (५) श्रियसे कं भानुभिः सं मिमिक्षिरे ते रश्मिभिस्त ऋक्वभिः सुखादयः. ते वाशीमन्त इष्मिणो अभीरवो विद्ने प्रियस्य मारुतस्य धाम्नः.. (६) मरुद्गण चमकती हुई सूर्य की किरणों के साथ वह जल बरसाना चाहते हैं, जिसकी प्राणियों को आवश्यकता है वे स्तोताओं और ऋत्विजों के साथ हव्य भक्षण करते हैं. शोभन स्तुतिवचन से युक्त, गतिशील एवं भयरहित मरुद्गणों ने विशिष्ट स्थान प्राप्त किए हैं. (६) सूक्त—८८ देवता—मरुद्गण आ विद्युन्मद्भिर्मरुतः स्वर्कै रथेभिर्यात ऋष्टिमद्भिरश्वपर्णैः. आ वर्षिष्ठया न इषा वयो न पप्तता सुमायाः.. (१) हे मरुद्गणो! तुम अपने दीप्तिशाली, शोभन गति वाले, शस्त्रसंपन्न एवं घोड़ों वाले रथ पर चढ़कर हमारे यज्ञ में आओ. हे शोभनकर्मा मरुतो! हमें देने के लिए अन्न लेकर सुंदर पक्षी के समान आओ. (१) तेऽरुणेभिर्वरमा पिशङ्गैः शुभे कं यान्ति रथतूर्भिरश्वैः. रुक्मो न चित्रः स्वधितीवान्पव्या रथस्य जङ्घनन्त भूम.. (२) रथ को खींचने वाले लाल या पीले रंग के घोड़ों की सहायता से मरुद्गण किस स्तुतिकर्त्ता यजमान का कल्याण करने को आते हैं? चमकते हुए सोने के समान सुंदर एवं शत्रुनाशक आयुध से सुशोभित मरुद्गण रथ के पहियों द्वारा धरती को दुःखी करते हैं. (२) श्रिये कं वो अधि तनूषु वाशीर्मेधा वना न कृणवन्त ऊर्ध्वा. युष्मभ्यं कं मरुतः सुजातास्तुविद्युम्नासो धनयन्ते अद्रिम्.. (३) हे मरुद्गणो! तुम्हारे कंधों पर ऐश्वर्य के चिह्न रूप में शत्रुसंहारक आयुध हैं. वे वनों के समान यज्ञों को भी उन्नत करते हैं. हे शोभन जन्म वाले मरुतो! तुम्हें प्रसन्न करने के लिए संपत्तिशाली यजमान सोम कुचलने वाले पत्थर को संपन्न करते हैं. (३)

अहानि गृध्राः पर्या व आगुरीमां धियं वार्कार्यां च देवीम्. ब्रह्म कृण्वन्तो गोतमासो अर्कैरूर्ध्वं नुनुद्र उत्सधिं पिबध्यै.. (४) हे जल के इच्छुक गौतमवंशी ऋषियो! तुम्हारे शोभन दिवसों ने आकर तुम्हारे उदक निष्पादक यज्ञों को सुशोभित किया था. उन्हीं दिनों में गौतमवंशी ऋषियों ने स्तुति उच्चारण के साथ हव्य देते हुए जल पीने के निमित्त कुआं ऊपर उठाया था. (४) एतत्त्यन्न योजनमचेति सस्वर्ह यन्मरुतो गोतमो वः. पश्यन्हिरण्यरथक्रानयोदंष्ट्रान्विधावतो वराहून्.. (५) स्वर्णनिर्मित पहियों वाले रथों पर बैठे हुए, धारों वाले लौहचक्र से युक्त, इधर-उधर धावमान एवं शत्रुसंहारक मरुद्गणों को देखकर गौतम ऋषि ने जो स्तोत्र बोला था, वह यही है. (५) एषा स्या वो मरुतो ऽनुभर्त्री प्रति ष्टोभति वाघतो न वाणी. अस्तोभयदवृथासामनु स्वधां गभस्त्योः.. (६) हे मरुद्गणो! हमारी स्तुति आपके अनुकूल है एवं आपमें से प्रत्येक का गुणगान करती है. इस समय इन स्तोत्रों द्वारा ऋषियों की वाणी ने अनायास ही आपका यशगान किया है, क्योंकि आपने अनेक प्रकार का अन्न हमारे हाथों पर रख दिया है. (६) सूक्त—८९ देवता—विश्वेदेव आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः. देवा नो यथा सदमिद्वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे.. (१) समस्त कल्याणकारक, असुरों द्वारा अहिंसित एवं शत्रुनाश में समर्थ यज्ञ सब ओर से हमें प्राप्त हों. अपने रक्षण कार्य का त्याग न करने वाले एवं प्रतिदिन हमारी रक्षा करने वाले देवगण हमें सदा बढ़ावें. (१) देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम्. देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे.. (२) अपने यजमानों से प्रेम करने वाले देवों का कल्याणकारक अनुग्रह एवं दान हमें प्राप्त हो. हम उनकी मित्रता प्राप्त करें, वे हमारी आयु में वृद्धि करें. (२) तान्पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्. अर्यमणं वरुणं सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्.. (३) हम वेदरूपी पूर्वकालीन वाणी द्वारा भग, मित्र, अदिति, दक्ष, मरुद्गण, अर्यमा, वरुण, ebook converter DEMO Watermarks*

सोम, अश्विनीकुमार आदि देवों को बुलाते हैं. शोभन धन से युक्त सरस्वती हमें सुखी करें. (३) तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः. तद्ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम्.. (४) माता के समान वायु, पिता के तुल्य धरती, आकाश एवं सोम कुचलने के साधन पत्थर हमारे पास सुखकारक ओषधि ले आवें. हे बुद्धिसंपन्न अश्विनीकुमारो! आप लोग हमारी प्रार्थना सुनें. (४) तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्. पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये.. (५) ऐश्वर्यसंपन्न, स्थावर-जंगम के स्वामी एवं यज्ञकर्मों से प्रसन्न होने वाले इंद्र को हम अपनी रक्षा के निमित्त बुला रहे हैं. दूसरों द्वारा अहिंसित पूषा जिस प्रकार हमारा धन बढ़ाने के लिए रक्षा कर रहे हैं, उसी प्रकार हमारे अविनाश के लिए हमारी रक्षा करें. (५) स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः. स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु.. (६) अगणित स्तुतियों के योग्य और सर्वज्ञ पूषा हमारा कल्याण करें. जिनके रथ के पहियों को कोई हानि नहीं पहुंचा सकता है, ऐसे गरुड़ एवं बृहस्पति हमारा कल्याण करें. (६) पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः. अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह.. (७) सफेद बूंदों से युक्त घोड़ों वाले, नाना वर्ण वाली गौओं के पुत्र, शोभन गतिशील, अग्नि की जीभ पर वर्तमान, सब कुछ जानने वाले एवं सूर्य के समान नेत्रज्योतियुक्त मरुद्गण हमारी रक्षा के निमित्त यहां आवें. (७) भंद्र कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः. स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः... (८) हे देवो! हम अपने कानों से कल्याणकारक वचन सुनें. हे यज्ञपात्र देवो! हम अपनी आंखों से शोभन वस्तु देखें एवं दृढ़ हस्तचरणादि वाले शरीर से आपकी स्तुति करते हुए प्रजापति द्वारा स्थापित आयु को प्राप्त करें. (८) शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्. पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः... (९) हे देवो! आप लोगों ने मानवों की आयु सौ वर्ष निश्चित की है. इसी काल में आप हमारे ebook converter DEMO Watermarks*

शरीर में वृद्धावस्था उत्पन्न करते हैं. उस अवस्था में पुत्र हमारे रक्षक बन जाते हैं. हमें उस अवस्था के मध्य में नष्ट मत करना. (९) अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः. विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्.. (१०) आकाश, अंतरिक्ष, माता, पिता, समस्त देव, पंचजन, जन्म और जन्म का कारण—ये सब अखंडनीय अर्थात् अदिति हैं. (१०) सूक्त—९० देवता—विश्वेदेव ऋजुनीती नो वरुणो मित्रो नयतु विद्वान्. अर्यमा देवैः सजोषाः.. (१) उत्तम स्थान को जानने वाले वरुण, मित्र एवं इंद्र आदि देवों के साथ समान प्रेम रखने वाले अर्यमा हमें सरल मार्ग से गंतव्य पर पहुंचावें. (१) ते हि वस्वो वसवानास्ते अप्रमूरा महोभिः. व्रता रक्षन्ते विश्वाहा.. (२) धन देने वाले, मूढ़ताशून्य एवं बुद्धिसंपन्न वे देव अपने तेज द्वारा सदा संसार की रक्षा कर अपना कर्म करते हैं. (२) ते अस्मभ्यं शर्म यंसन्नमृता मर्त्येभ्यः. बाधमाना अप द्विषः.. (३) वे मरणरहित देव हमारे शत्रुओं का नाश करके हम मरणशीलों को सुख दें. (३) वि नः पथः सुविताय चियन्त्विन्द्रो मरुतः. पूषा भगो वन्द्यासः.. (४) स्तुति के योग्य इंद्र, मरुद्गण, पूषा एवं भग हमें स्वर्गलाभ के निमित्त उत्तम मार्ग दिखावें. (४) उत नो धियो गोअग्राः पूषन्विष्णवेवयावः. कर्ता नः स्वस्तिमतः.. (५) हे पूषा, विष्णु और मरुद्गण! हमारे यज्ञों को गाय आदि पशुओं से युक्त एवं हमें विनाशरहित बनाओ. (५) मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः. माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः.. (६) यजमान के लिए हवाएं एवं नदियां मधु की वर्षा करें. हमारे लिए ओषधियां माधुर्ययुक्त हों. (६) मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः. मधु द्यौरस्तु नः पिता.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

हमारी निशाएं एवं उषाएं माधुर्ययुक्त हों. पृथ्वी से संबंध रखने वाले जन एवं सबका पालनकर्त्ता आकाश हमें सुखद हो. (७) मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्य:. माध्वीर्गावो भवन्तु न:.. (८) वनस्पतियां, सूर्य एवं गाएं हमारे लिए मधुयुक्त हों. (८) शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा. शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः.. (९) मित्र, वरुण, अर्यमा, इंद्र, बृहस्पति एवं लंबे डग भरने वाले विष्णु हमारे लिए सुखदाता हों. (९) सूक्त—९१ देवता—सोम त्वं सोम प्र चिकितो मनीषा त्वं रजिष्ठमनु नेषि पन्थाम्. तव प्रणीती पितरो न इन्दो देवेषु रत्नमभजन्त धीरा:.. (१) हे सोम! तुम हमारी बुद्धि द्वारा भली-भांति ज्ञात हो. तुम हमें सरल मार्ग से ले चलो. हे विश्व को अमृतमय करने वाले सोम! तुम्हारे निर्देश के अनुसार चलकर हमारे पितरों ने देवों के मध्य धन प्राप्त किया था. (१) त्वं सोम क्रतुभिः सुक्रतुर्भूस्त्वं दक्षैः सुदक्षो विश्ववेदा:. त्वं वृषा वृषत्वेभिर्महित्वा द्युम्नेभिर्द्युम्न्यभवो नृचक्षा:.. (२) हे सर्वज्ञ सोम! तुम अपने शोभन यज्ञों के कारण यज्ञसंपन्न करने वाले, अपने बल द्वारा शक्तिशाली एवं अभीष्ट वर्षा के महत्त्व से कामवर्धक हो. तुम यजमानों के मनोवांछित फलदाता होकर उनके द्वारा विपुल मात्रा में दिए गए अन्न से संपन्न हो. (२) राज्ञो नु ते वरुणस्य व्रतानि बृहद्गभीरं तव सोम धाम. शुचिष्ट्वमसि प्रियो न मित्रो दक्षाय्यो अर्यमेवासि सोम.. (३) हे सोम! ब्राह्मणों के राजा वरुण से संबंधित यज्ञ तुम्हारे ही हैं, इसलिए तुम्हारा तेज विस्तृत एवं गंभीर है. तुम वरुण के समान सबके सुधारकर्त्ता एवं अर्यमा के समान वृद्धि करने वाले हो. (३) या ते धामानि दिवि या पृथिव्यां या पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु. तेभिर्नो विश्वैः सुमना अहेळन्नराजन्त्सोम प्रति हव्या गृभाय.. (४) हे शोभनयुक्त सोम! आकाश, धरती, पर्वतों, ओषधियों एवं जल में वर्तमान अपने तेज ebook converter DEMO Watermarks*

से तेजस्वी होकर क्रोध न करते हुए हमारा हव्य स्वीकार करो. (४) त्वं सोमासि सत्पतिस्त्वं राजोत वृत्रहा. त्वं भद्रो असि क्रतुः.. (५) हे सोम! तुम सत्कर्मों में ब्राह्मणों के स्वामी, तेजस्वी एवं शोभन यज्ञों वाले हो. (५) त्वं च सोम नो वशो जीवातुं न मरामहे. प्रियस्तोत्रो वनस्पतिः.. (६) हे स्तुतिप्रिय एवं वनस्पतिपालक सोम! यदि तुम हम यजमानों के लिए जीवनदायिनी ओषधि की अभिलाषा करो तो हम मृत्युरहित हो सकते हैं. (६) त्वं सोम महे भगं त्वं यून ऋतायते. दक्षं दधासि जीवसे.. (७) हे सोम! तुम वृद्ध एवं युवा यजमान को जीवनोपयोगी धन देते हो. (७) त्वं नः सोम विश्वतो रक्षा राजनघायतः. न रिष्येत्त्वावतः सखा.. (८) हे तेजस्वी सोम! जो लोग हमें दुःख देना चाहते हैं, उनसे हमें बचाओ, क्योंकि तुम जैसे देव का मित्र कभी विनष्ट नहीं होता. (८) सोम यास्ते मयोभुव ऊतयः सन्ति दाशुषे. ताभिर्नोऽविता भव.. (९) हे सोम! यजमानों को देने के लिए तुम्हारे पास सुखद रक्षासाधन हैं, उन्हीं के द्वारा हमारे रक्षक बनो. (९) इमं यज्ञमिदं वचो जुजुषाण उपागहि. सोम त्वं नो वृधे भव.. (१०) हे सोम! हमारे इस यज्ञ और स्तुतिवचन को स्वीकार करके हमारे समीप आओ और हमारे यज्ञ की वृद्धि करो. (१०) सोम गीर्भिष्ट्वा वयं वर्धयामो वचोविदः. सुमृळीको न आ विश.. (११) हे सोम! स्तुतियों के जानने वाले हम लोग स्तुतिवचनों से तुम्हें बढ़ाते हैं. तुम हमें सुखी करते हुए आओ. (११) गयस्फानो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्धनः. सुमित्रः सोम नो भव.. (१२) हे सोम! तुम हमारे धनवर्द्धक, रोगनाशक, संपत्तिदाता, संपत्ति बढ़ाने वाले एवं सुमित्र बनो. (१२) सोम रारन्धि नो हृदि गावो न यवसेष्वा. मर्य इव स्व ओक्ये.. (१३) हे सोम! जिस प्रकार गाएं सुंदर घास से एवं मनुष्य अपने घर में रहने से प्रसन्न होते हैं, ebook converter DEMO Watermarks*

उसी प्रकार तुम हमारे द्वारा दिए गए हव्य से तृप्त होकर हमारे हृदय में निवास करो. (१३) यः सोमः सख्ये तव रारणद्देव मर्त्यः. तं दक्षः सचते कविः.. (१४) हे सर्वदर्शी एवं सर्वकार्य समर्थ सोम! तुम्हारी मित्रता के कारण जो यजमान तुम्हारी स्तुति करता है, तुम उस पर अनुग्रह करते हो. (१४) उरुष्या णो अभिशस्तेः सोम नि पाह्यंहसः. सखा सुशेव एधि नः.. (१५) हे सोम! हमें निंदा एवं पाप से बचाओ तथा शोभन सुख देकर हमारे हितकारी बनो. (१५) आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम्. भवा वाजस्य सङ्गथे.. (१६) हे सोम! तुम वृद्धि प्राप्त करो एवं तुम्हें चारों ओर अपनी शक्ति प्राप्त हो. तुम हमें अन्न देने वाले बनो. (१६) आ प्यायस्व मदिन्तम सोम विश्वेभिरंशुभिः. भवा नः सुश्रवस्तमः सखा वृधे.. (१७) हे अतिशय मदयुक्त सोम! तुम समस्त लताओं के भागों से वृद्धि प्राप्त करो एवं शोभन अन्न से युक्त होकर हमारे मित्र बनो. (१७) सं ते पयांसि समु यन्तु वाजाः सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाहः. आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवांस्युत्तमानि धिष्व.. (१८) हे शत्रुनाशक सोम! तुम में दूध, अन्न एवं वीर्य सम्मिलित हो. तुम हमारी अमरता के लिए बढ़ते हुए स्वर्ग में उत्कृष्ट अन्न धारण करो. (१८) या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वा परिभूरस्तु यज्ञम्. गयस्फानः प्रतरणः सुवीरोऽवीरहा प्र चरा सोम दुर्यान्.. (१९) हे सोम! यजमान हव्य के द्वारा तुम्हारे जिन तेजों की पूजा करते हैं, वे ही हमारे यज्ञ को चारों ओर प्राप्त हों. हे धनवर्द्धक! पाप से रक्षा करने वाले, शोभन वीरों से युक्त एवं पुत्रों के रक्षक सोम! तुम हमारे घरों में आओ. (१९) सोमो धेनुं सोमो अर्वन्तमाशुं सोमो वीरं कर्मण्यं ददाति. सादन्यं विदथ्यं सभेयं पितृश्रवणं यो ददाशदस्मै.. (२०) जो यजमान सोमदेव को हवि रूप अन्न देता है, उसे वे दुधारू गाय, शीघ्रगामी अश्व एवं लौकिक कर्म करने में कुशल, गृहकार्य में दक्ष, यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला, सकल ebook converter DEMO Watermarks*

शास्त्रज्ञाता तथा पिता का नाम प्रसिद्ध करने वाला पुत्र देते हैं. (२०) अषाळ्हं युत्सु पृतनासु पप्रिं स्वर्षामप्सां वृजनस्य गोपाम्. भरेषुजां सुक्षितिं सुश्रवसं जयन्तं त्वामनु मदेम सोम.. (२१) हे सोम! हम युद्ध में नित्य विजयी, सेनाओं को विजयी बनाने वाले, स्वर्ग के दाता, जलवर्षक, बल के रक्षक, यज्ञ में प्रादुर्भूत, सुंदर निवास वाले, उत्तम यश वाले एवं शत्रुपराभवकारी तुम्हें लक्ष्य करके प्रसन्न हों. (२१) त्वमिमा ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गाः. त्वमा ततन्थोर्व१न्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ.. (२२) हे सोम! तुमने धरती पर वर्तमान समस्त ओषधियां, वर्षा का जल एवं गाएं बनाई हैं. तुमने विस्तीर्ण आकाश को फैलाया एवं प्रकाश द्वारा उसका अंधकार मिटाया है. (२२) देवेन नो मनसा देव सोम रायो भागं सहसावन्नभि युध्य. मा त्वा तनदीशिशे वीर्यस्योभयेभ्यः प्र चिकित्सा गविष्टौ.. (२३) हे बलवान् सोमदेव! हमारे धन का अपहरण करने वाले शत्रुओं से युद्ध करो. कोई भी शत्रु तुम्हें नष्ट न करे. युद्धरत दोनों पक्षों के बल के स्वामी तुम्हीं हो. युद्ध में हमारे उपद्रवों का नाश करो. (२३) सूक्त—९२ देवता—उषा एवं अश्विनीकुमार एता उ त्या उषसः केतुमक्रत पूर्वे अर्धे रजसो भानुमञ्जते. निष्कृण्वाना आयुधानीव धृष्णवः प्रति गावोऽरुषीर्यन्ति मातरः.. (१) उषाओं ने अंधकार से ढके संसार का ज्ञान कराने वाला प्रकाश किया है. ये आकाश के पूर्व भाग में सूर्य का प्रकाश करती हैं. जैसे आक्रमणशील योद्धा अपने आयुधों का संस्कार करते हैं, उसी प्रकार गतिशील, चमकीली एवं सूर्यप्रकाश का निर्माण करने वाली उषाएं अपने प्रकाश से संसार का सुधार करती हुई प्रतिदिन आती हैं. (१) उदपप्तन्नरुणा भानवो वृथा स्वायुजो अरुषीर्गा अयुक्त. अक्रन्नुषासो वयुनानि पूर्वथा रुशन्तं भानुमरुषीरशिश्रयुः.. (२) चमकती हुई सूर्यरश्मियां अनायास उदित हुईं. उषाओं ने रथ में जोतने योग्य शुभ्र किरणों को रथ में जोता एवं पूर्वकाल के समान समस्त प्राणियों को ज्ञानशील बनाया. इसके पश्चात् चमकीली उषाओं ने शुभ्र वर्ण वाले सूर्य का आश्रय लिया. (२) अर्चन्ति नारीरपसो न विष्टिभिः समानेन योजनेना परावतः. ebook converter DEMO Watermarks*

इषं वहन्तीः सुकृते सुदानवे विश्वेदह यजमानाय सुन्वते.. (३) नेतृत्व करने वाली उषाएं, शोभन कर्म करने वाले, सोमरस निचोड़ने एवं ऋत्विजों को दक्षिणा देने वाले यजमान के लिए समस्त अन्न प्रदान करती हुईं अस्त्रधारी योद्धाओं के समान अपने उपयोग द्वारा दूर तक के देशों को भी तेज से पूरित करती हैं. (३) अधि पेशांसि वपते नृतूरिवापोर्णुते वक्ष उस्रेव बर्जहम्. ज्योतिर्विश्वस्मै भुवनाय कृण्वती गावो न व्रजं व्युषा आवर्तमः.. (४) जिस प्रकार नाई बालों को काट देता है, उसी प्रकार उषाएं संसार से लिपटे हुए काले अंधकार को पूरी तरह नष्ट कर देती हैं. जिस प्रकार गौ दूध काढ़ने के समय अपना थन प्रकट करती है, उसी प्रकार उषाएं अपने सीने को प्रकट करती हैं. वे गोशाला में जाने वाली गायों के समान पूर्व दिशा में जाती हैं. (४) प्रत्यर्ची रुशदस्या अदर्शि वि तिष्ठते बाधते कृष्णमभ्वम्. स्वरुं न पेशो विदथेष्वञ्जञ्चित्रं दिवो दुहिता भानुमश्रेत्.. (५) उषा का दीप्यमान तेज पहले पूर्व दिशा में दिखाई देता है, इसके बाद सभी दिशाओं में फैल जाता है एवं काले रंग के अंधकार को दूर भगा देता है. जैसे अध्वर्यु यज्ञों में यूप को आज्य द्वारा प्रकट करते हैं, वैसे ही उषाएं आकाश में अपना रूप दिखाती है एवं स्वर्गपुत्री बनकर तेजस्वी सूर्य की सेवा करती हैं. (५) अतारिष्म तमसस्पारमस्योषा उच्छन्ती वयुना कृणोति. श्रिये छन्दो न स्मयते विभाती सुप्रतीका सौमनसायाजीगः.. (६) हम रात्रि के अंधकार के पार आ गए हैं. निशा के अंधकार का नाश करती हुई उषा समस्त प्राणियों को ज्ञान देती है. जिस प्रकार वशीकरण में समर्थ पुरुष धनी के समीप जाकर उसे प्रसन्न करने के लिए हंसता है, उसी प्रकार प्रकाश फैलाती हुईं उषाएं हंसती सी जान पड़ती हैं. सुंदर शरीर वाली उषाओं ने सबकी प्रसन्नता के लिए अंधकार का भक्षण किया है. (६) भास्वती नेत्री सूनृतानां दिवः स्तवे दुहिता गोतमेभिः. प्रजावतो नृवतो अश्वबुध्यानुषो गोअग्राँ उप मासि वाजान्.. (७) हम गौतमवंशी तेजस्विनी एवं सत्य भाषण प्रेमियों का नेतृत्व करने वाली आकाशपुत्री उषा की स्तुति करते हैं. हे उषा! हमें पुत्र, पौत्र, दास, अश्व एवं गायों से युक्त अन्न प्रदान करो. (७) उषस्तमश्यां यशसं सुवीरं दासप्रवर्गं रयिमश्वबुध्यम्. सुदंससा श्रवसा या विभासि वाजप्रसूता सुभगे बृहन्तम्.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

हे उषा! हम यश, वीर पुरुषों, दासों एवं अश्वों से युक्त अन्न प्राप्त करें. हे शोभन धन वाली उषा! शोभनयज्ञ युक्त स्तोत्र से प्रसन्न होकर हमारे लिए अन्न एवं पर्याप्त धन प्रकट करो. (८) विश्वानि देवी भुवनाभिचक्ष्या प्रतीची चक्षुरुर्विया वि भाति. विश्वं जीवं चरसे बोधयन्ती विश्वस्य वाचमविद्वन्मनायो:.. (९) चमकती हुई उषाएं समस्त प्राणियों को प्रकाशित करने के पश्चात् पश्चिम दिशा में अपने तेज से विस्तृत होती हुई उद्दीप्त हो रही हैं. वे समस्त जीवों को अपने-अपने काम में प्रवृत्त होने के लिए जगाती हैं एवं भाषणकुशल लोगों की बातें सुनती हैं. (९) पुनः पुनर्जायमाना पुराणी समानं वर्णमभि शुम्भमाना. श्वघ्नीव कृत्नुर्विज आमिनाना मर्तस्य देवी जरयन्त्यायु:.. (१०) प्रतिदिन बार-बार उत्पन्न, नित्य एवं समान रूप धारण करने वाली उषाएं समस्त मरणधर्मा प्राणियों के जीवन का दिन-दिन उसी प्रकार ह्रास करती हैं, जिस प्रकार भीलनी उड़ते हुए पक्षियों के पंख काटकर उनकी हिंसा करती है. (१०) व्यूर्णवती दिवो अन्ताँ अबोध्यप स्वसारं सनुतर्युयोति. प्रमिनती मनुष्या युगानि योषा जारस्य चक्षसा वि भाति.. (११) आकाश को अंधकार से मुक्त करती हुई उषाओं को लोग जानते हैं. वे अपने आप चलती हुई रात को छिपाती हैं. अपने गमनागमन से प्रतिदिन मानवों के युगों को समाप्त करती हुई प्रेमी सूर्य की पत्नियां उषाएं प्रकाशित होती हैं. (११) पशून्न चित्रा सुभगा प्रथाना सिन्धुर्न क्षोद उर्विया व्यश्वैत्. अमिनती दैव्यानि व्रतानि सूर्यस्य चेति रश्मिभिर्दृशाना.. (१२) जैसे ग्वाला वन में पशुओं को चरने के लिए फैला देता है, उसी प्रकार सुभगा एवं पूजनीया उषाएं तेज का विस्तार करती हैं. जैसे बहता हुआ पानी नीची जगह पर शीघ्र फैल जाता है, वैसे ही महती उषाएं सारे विश्व को घेर लेती हैं एवं देवयज्ञों में विघ्न न डालती हुईं सूर्य की किरणों के साथ दिखाई देती हैं. (१२) उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति. येन तोकं च तनयं च धामहे.. (१३) हे अन्न की स्वामिनी उषाओ! हमें ऐसा विचित्र धन दो, जिससे हम पुत्रों और पौत्रों का पालन कर सकें. (१३) उषो अद्येह गोमत्यश्वावति विभावरि. रेवदस्मे व्युच्छ सूनृतावति.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*

हे उषा! तुम गौ, अश्व, सत्यभाषण एवं तेज से युक्त हो. आज हमारे यज्ञ को प्रकाशित करके धन से युक्त करो. (१४) युक्ष्वा हि वाजिनीवत्यश्वाँ अद्यारुणाँ उषः. अथा नो विश्वा सौभाग्यान्या वह.. (१५) हे अन्नयुक्त उषा! आज लाल रंग के घोड़े रथ में जोड़ो एवं समस्त सौभाग्य हमारे लिए लाओ. (१५) अश्विना वर्तिरस्मदा गोमद्दस्रा हिरण्यवत्. अर्वाग्रथं समनसा नि यच्छतम्.. (१६) हे शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो! तुम दोनों समान विचार बनाकर हमारे घर को गायों एवं रमणीय धन से युक्त करने के लिए अपने रथ पर बैठकर हमारे घर को आओ. (१६) यावित्था श्लोकमा दिवो ज्योतिर्जनाय चक्रथुः. आ न ऊर्जं वहतमश्विना युवम्.. (१७) हे अश्विनीकुमारो! तुमने आकाश से प्रशंसनीय ज्योति नीचे भेजी है. तुम हमारे लिए बल देने वाला अन्न लाओ. (१७) एह देवा मयोभुवा दस्रा हिरण्यवर्तनी. उषर्बुधो वहन्तु सोमपीतये.. (१८) अश्विनीकुमार दानादिगुणयुक्त, आरोग्य एवं सुख देने वाले, स्वर्णनिर्मित रथ के स्वामी एवं शत्रुविध्वंसकारी हैं. उनके घोड़े सोमरस पीने के लिए उन्हें इस यज्ञ में लावें. (१८) सूक्त—९३ देवता—अग्नि एवं सोम अग्नीषोमाविमं सु मे शृणुतं वृषणा हवम्. प्रति सूक्तानि हर्यतं भवतं दाशुषे मयः.. (१) हे कामवर्षक अग्नि एवं सोम! इस आह्वान को सुनो, हमारी स्तुतियों को स्वीकार करो एवं हव्य देने वाले यजमान को सुख देने वाले बनो. (१) अग्नीषोमा यो अद्य वामिदं वचः सपर्यति. तस्मै धत्तं सुवीर्यं गवां पोषं स्वश्व्यम्.. (२) हे अग्नि और सोम! जो यजमान आज तुम्हें स्तुति वचनों से पूजित करता है, उसे शक्तिशाली गाएं एवं पुष्ट अश्व दो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

अग्नीषोमा य आहुतिं यो वां दाशाद्धविष्कृतिम्. स प्रजया सुवीर्यं विश्वमायुर्व्यश्नवत्.. (३) हे अग्नि और सोम! जो यजमान तुम्हें आज्य की आहुति और हव्य प्रदान करता है, उसे पुत्र-पौत्र आदि से युक्त शक्तिसंपन्न पूर्णजीवन प्राप्त हो. (३) अग्नीषोमा चेति तद्वीर्यं वां यदमुष्णीतमवसं पणिं गा:. अवातिरतं बृसयस्य शेषोऽविन्दतं ज्योतिरेकं बहुभ्य:.. (४) हे अग्नि और सोम! हम तुम्हारे उस पौरुष को जानते हैं, जिससे तुमने पणियों के पास से गायों को छीना था एवं वृषय अर्थात् त्वष्टा के पुत्र वृत्र को मारकर आकाश में चलते हुए सूर्य को सबके उपकारार्थ पाया था. (४) युवमेतानि दिवि रोचनान्यग्निश्च सोम सक्रतू अधत्तम्. युवं सिन्धूँरभिशस्तेरवद्यादग्नीषोमावमुञ्चतं गृभीतान्.. (५) हे अग्नि और सोम! तुम दोनों ने समानकर्त्ता बनकर इन चमकते हुए नक्षत्रों को आकाश में धारण किया है एवं इंद्र की ब्रह्महत्या के पाप अंश से युक्त नदियों को प्रकट दोष से छुड़ाया है. (५) आन्यं दिवो मातरिश्वा जभारामथ्नादन्यं परि श्येनो अद्रे:. अग्नीषोमा ब्रह्मणा वावृधानोरुं यज्ञाय चक्रथुरु लोकम्.. (६) हे अग्नि और सोम! तुम दोनों में से अग्नि को मातरिश्वा आकाश से तथा सोम को बाज पक्षी पर्वत से यजमान के निमित्त बलपूर्वक लाया है. तुम दोनों ने स्तोत्रों द्वारा वृद्धि प्राप्त करके देवयज्ञों के निमित्त धरती का विस्तार किया है. (६) अग्नीषोमा हविष: प्रस्थितस्य वीतं हर्यतं वृषणा जुषेथाम्. सुशर्माणो स्ववसा हि भूतमथा धत्तं यजमानाय शं यो:.. (७) हे अग्नि और सोम! यज्ञ के निमित्त दिए अन्न का भक्षण करो एवं उसके बाद हमारी अभिलाषा पूरी करो. हे कामवर्षको! हमारी सेवा स्वीकार करो, हमारे लिए सुखदाता एवं रक्षणकर्त्ता बनो तथा यजमान के रोग और भय दूर करो. (७) यो अग्नीषोमा हविषा सपर्याद्देवद्रीचा मनसा यो घृतेन. तस्य व्रतं रक्षतं पातमंहसो विशे जनाय महि शर्म यच्छतम्.. (८) हे अग्नि और सोम! जो यजमान देवों के प्रति भक्तियुक्त मन से तुम दोनों की सेवा करता है, उसके यज्ञकर्म की रक्षा करो, यजमान को पाप से बचाओ तथा यज्ञकार्य में संलग्न उस व्यक्ति को पर्याप्त सुख दो. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

अग्नीषोमा सवेदसा सहूती वनतं गिरः. सं देवत्रा बभूवथुः.. (९) हे अग्नि और सोम! तुम समान धन वाले एवं एक साथ आह्वान करने योग्य हो. तुम हमारी स्तुति सुनो. तुम सभी देवों से अधिक प्रसिद्ध हो. (९) अग्नीषोमावनेन वां यो वां घृतेन दाशति. तस्मै दीदयतं बृहत्.. (१०) हे अग्नि एवं सोम! जो यजमान तुम्हें घृत से युक्त हवि प्रदान करता है, उसे पर्याप्त धन दो. (१०) अग्नीषोमाविमानि नो युवं हव्या जुजोषतम्. आ यातमुप नः सचा.. (११) हे अग्नि और सोम! हमारा यह हव्य स्वीकार करो एवं इस कार्य के लिए एक साथ आओ. (११) अग्नीषोमा पिपृतमर्वतो न आ प्यायन्तामुस्रिया हव्यसूदः. अस्मे बलानि मघवत्सु धत्तं कृणुतं नो अध्वरं श्रुष्टिमन्तम्.. (१२) हे अग्नि और सोम! हमारे अश्वों का पालन करो. क्षीर आदि हव्य को उत्पन्न करने वाली हमारी गाएं बढ़ें. तुम धनयुक्त हम लोगों को बल दो एवं हमारे यज्ञ को धनसंपन्न करो. (१२) सूक्त—९४ देवता—अग्नि इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया. भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसद्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (१) जिस प्रकार बढ़ई रथ का निर्माण करता है, उसी प्रकार हम पूज्य एवं सब प्राणियों को जानने वाले अग्नि के प्रति बुद्धि निर्मित यह स्तुति समर्पित करते हैं. इस अग्नि की सेवा से हमारी बुद्धि कल्याणी बनती है. हे अग्नि! तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेने पर हम हिंसा को प्राप्त न हों. (१) यस्मै त्वमायजसे स साधत्यन्वर्वा क्षेति दधते सुवीर्यम्. स तूताव नैनमश्नोत्यंहतिरग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (२) हे अग्नि! तुम जिस यजमान के निमित्त यज्ञ करते हो, वह अभीष्ट प्राप्त कर लेता है, शत्रुओं की पीड़ा से रहित होकर निवास करता है, उत्तम शक्ति धारण करता है एवं वृद्धि पाता है. उसे कभी दरिद्रता नहीं मिलती. हम तुम्हारी मित्रता को पाकर किसी के द्वारा सताए न जावें. (२) शकेम त्वा समिधं साधया धियस्त्वे देवा हविरदन्त्याहुतम्. ebook converter DEMO Watermarks*

भरामेध्मं कृणवामा हवींषि ते चितयन्तः पर्वणापर्वणा वयम्.

त्वमादित्याँ आ वह तान्ह्यु१ श्मस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (३) हे अग्नि! हम तुम्हें भली प्रकार ज्वलित कर सकें एवं तुम हमारे यज्ञों को पूरा करो, क्योंकि ऋत्विजों द्वारा तुम में डाला गया हव्य देवगण भक्षण करते हैं. तुम अदितिपुत्रों अर्थात् देवों को यहां ले आओ, क्योंकि हम उनकी कामना करते हैं. तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेने पर कोई हमारी हिंसा न करे. (३) भरामेध्मं कृणवामा हवींषि ते चितयन्तः पर्वणापर्वणा वयम्. जीवातवे प्रतरं साधया धियोऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (४) हे अग्नि! हम तुम्हारे यज्ञ के लिए ईंधन एकत्र करते हैं एवं प्रति पर्व पर दर्शपौर्णमास यज्ञ करते हुए तुम्हें ज्ञान कराकर हव्य देते हैं. तुम हमारे जीवनकाल को बढ़ाने के लिए यज्ञ पूर्ण कराओ. तुम हमारे मित्र बन गए हो, अब कोई हमारी हिंसा न करे. (४) विशां गोपा अस्य चरन्ति जन्तवो द्विपच्च यदुत चतुष्पदक्तुभिः. चित्रः प्रकेत उषसो महाँ अस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (५) इसकी किरणें समस्त प्राणियों की रक्षा करती हुईं विचरण करती हैं. दो पैरों और चार पैरों वाले जंतु इसकी किरणों से युक्त हो जाते हैं. हे अग्नि, तुम विचित्र दीप्तिसंपन्न, सबका ज्ञान कराने वाले एवं उषा से भी महान् हो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (५) त्वमध्वर्युस्त होतासि पूर्व्यः प्रशास्ता पोता जनुषा पुरोहितः. विश्वा विद्वाँ आर्त्विज्या धीर पुष्यस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (६) हे अग्नि! तुम यज्ञों को देवों के प्रति पहुंचाने वाले, अध्वर्यु, होता, प्रशास्ता, यज्ञ के शोधक अर्थात् पोता एवं जन्म से ही पुरोहित हो. तुम ऋत्विज् के समस्त कर्मों को जानते हो, इसलिए हमारा यज्ञ पूरा करो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (६) यो विश्वतः सुप्रतीकः सद्ङ्डसि दूरे चित्सन्तळिदिवाति रोचसे. रात्र्याश्चिदन्धो अति देव पश्यस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (७) हे अग्नि! तुम शोभन-अंग वाले होते हुए भी सबके समान हो एवं दूर रहकर भी समीप दिखाई देते हो. हे देव! तुम रात के अंधकार का नाश करके चमकते हो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (७) पूर्वो देवा भवतु सुन्वतो रथोऽस्माकं शंसो अभ्यस्तु दूढ्यः. तदा जानीतोत पुष्यता वचोऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

हे देवो! सोम निचोड़ने वाले यजमान का रथ अन्य यजमानों के रथ से आगे हो. हमारा पाप हमारे शत्रुओं को बाधा पहुंचावे. तुम हमारी स्तुति पर ध्यान दो और उसके अनुकूल चलकर हमें पुष्ट करो. हे अग्नि! तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेने पर हमारी कोई हिंसा न कर सके. (८) वधैर्दुःशंसाँ अप दूढ्यो जहि दूरे वा ये अन्ति वा के चिदत्रिण. अथा यज्ञाय गृणते सुगं कृध्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (९) हे अग्नि! तुम हननसाधन आयुधों से अपवाद के पात्र एवं दुर्बुद्धि लोगों का वध करो. जो शत्रु हमारे समीप या दूर हैं, उनका नाश करो. इस प्रकार तुम अपनी स्तुति करने वाले यजमान का मार्ग शोभन बनाओ. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (९) यदयुक्तथा अरुषा रोहिता रथे वातजूता वृषभस्येव ते रवः. आदिन्वसि वनिनो धूमकेतुनाग्ने सख्ये मा रिषाम वयं तव.. (१०) हे अग्नि! तुम तेजस्वी, लाल रंग वाले एवं वायु वेग वाले दोनों घोड़ों को रथ में जोतते समय बैल के समान शब्द करते हो एवं अपने झंडे रूपी धूम से वन को घेर लेते हो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (१०) अध स्वनादुत बिभ्युः पतत्रिणो द्रप्सा यत्ते यवसादो व्यस्थिरन्. सुगं तत्ते तावकेभ्यो रथेभ्योऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (११) हे अग्नि! वन प्रदेश को जलाने वाला तुम्हारा शब्द सुनकर पक्षी डर जाते हैं. जब तुम्हारी ज्वालाएं वन में वर्तमान तिनकों को भक्षण करके सभी ओर फैलती हैं, तब तुम्हारे लिए एवं तुम्हारे रथ के लिए समस्त अरण्य सुगम बन जाता है. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (११) अयं मित्रस्य वरुणस्य धायसे ऽवयातां मरुतां हेळो अद्भुत:. मृळा सु नो भूत्वेषां मनः पुनरग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (१२) अग्नि के स्तोता को मित्र और वरुण धारण करें. अंतरिक्ष में वर्तमान मरुतों का क्रोध महान् होता है. हे अग्नि! हमारी रक्षा करो. इन मरुतों का मन हमारे प्रति प्रसन्न हो. हे अग्नि! तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (१२) देवो देवानामासि मित्रो अद्भुतो वसुर्वसूनामसि चारुरध्वरे. शर्मन्त्स्याम तव सप्रथस्तमेऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (१३) हे तेजस्वी अग्नि! तुम सब देवों के परम मित्र, सुंदर एवं यज्ञों की समस्त संपत्तियों के निवास हो. हम तुम्हारे अति विस्तृत यज्ञगृह में वर्तमान हों. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम ebook converter DEMO Watermarks*

किसी के द्वारा हिंसित न हों. (१३) तत्ते भद्रं यत्समिद्धः स्वे दमे सोमाहुतो जरसे मृळयत्तमः. दधासि रत्नं द्रविणं च दाशुषेऽग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (१४) हे अग्नि! जिस समय तुम अपने स्थान पर प्रज्वलित एवं सोम द्वारा आहूत होकर ऋत्विजों की स्तुति का विषय बनते हो, उस समय अत्यंत भद्र प्राप्त करते हो. तुम हमारे लिए परम सुखकारक एवं यजमान के लिए रमणीय यज्ञफल एवं धन देने वाले बनो, तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों. (१४) यस्मै त्वं सुद्रविणो ददाशोऽनागास्त्वमदिते सर्वताता. यं भद्रेण शवसा चोदयासि प्रजावता राधसा ते स्याम.. (१५) हे शोभनधनसंपन्न एवं अखंडनीय अग्नि! समस्त यज्ञों में वर्तमान जिस यजमान को तुम पाप से रहित करके कल्याणकारी बल से युक्त करते हो, वह समृद्ध होता है. तुम्हारी स्तुति करने वाले हम पुत्र-पौत्रादि वाले धन से युक्त हों. (१५) स त्वमग्ने सौभगत्वस्य विद्वानस्माकमायुः प्र तिरेह देव. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (१६) हे अग्नि! तुम सौभाग्य को जानते हुए इस यज्ञकर्म में हमारी आयुवृद्धि करो. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी एवं आकाश हमारी उस आयु की रक्षा करें. (१६) सूक्त—९५ देवता—अग्नि द्वे विरूपे चरतः स्वर्धे अन्यान्या वत्समुप धापयेते. हरिरन्यस्यां भवति स्वधावाञ्छुक्रो अन्यस्यां ददृशे सुवर्चाः.. (१) हे दिवस और रात्रि! तुम सुंदर प्रयोजन वाले एवं परस्पर विरुद्ध रूप से युक्त होकर चलते हो. रात और दिन दोनों, दोनों के पुत्रों—अग्नि और सूर्य की रक्षा करते हैं. रात्रि के पास से सूर्य हवि रूप अन्न प्राप्त करता है एवं दूसरा दिन के पास से शोभन प्रकाश वाला दिखाई देता है. (१) दशमं त्वष्टुर्जनयन्त गर्भमतन्द्रासो युवतयो विभृत्रम्. तिग्मानीकं स्वयशसं जनेषु विरोचमानं परि षीं नयन्ति.. (२) अपने जगत्पोषण रूप कार्य में आलस्यरहित, नित्य युवा, दशों दिशाओं व मेघों में गर्भ रूप से वर्तमान वायु सब पदार्थों में वर्तमान, तीक्ष्ण तेजयुक्त एवं अतिशय यशस्वी अग्नि को उत्पन्न करती है. इसी अग्नि को सब जगह ले जाया जाता है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

त्रीणि जाना परि भूषन्त्यस्य समुद्र एकं दिव्येकमप्सु. पूर्वामनु प्र दिशं पार्थिवानामृतून्प्रशासद्वि दधावनुष्ठु.. (३) समुद्र, आकाश और अंतरिक्ष—ये अग्नि के तीन जन्मस्थान हैं. सूर्यरूप अग्नि ने ऋतुओं को विभक्त करके बताते हुए पृथ्वी पर रहने वाले समस्त प्राणियों के निमित्त पूर्व दिशा को अनुक्रम से बनाया. (३) क इमं वो निण्यमा चिकेत वत्सो मातॄर्जनयत स्वधाभिः. बह्वीनां गर्भो अपसामुपस्थान्महान्कविर्निश्नरति स्वधावान्.. (४) हे यजमानो! जल, वन आदि में गर्भरूप से स्थित अग्नि को तुम में से कौन जानता है? अर्थात् कोई नहीं. यह पुत्र होकर भी अपनी जलरूपी माताओं को हव्य द्वारा जन्म देता है. यह प्रौढ़ तेज वाला, क्रांतदर्शी एवं हवि रूप अन्न से युक्त अग्नि अनेक प्रकार के जलों को उत्पन्न करने का कारण बनकर समुद्र से सूर्य रूप में निकलता है. (४) आविष्ट्यो वर्धते चारुरासु जिह्मानासूर्ध्वः स्वयशा उपस्थे. उभे त्वष्टुर्बिभ्यतुर्जायमानात्प्रतीची सिंहं प्रति जोषयेते.. (५) मेघों में तिरछे रहने वाले जल की गोद में रहकर भी ऊपर की ओर जलता हुआ अग्नि शोभन दीप्ति वाला बनकर चमकता एवं बढ़ता है. त्वष्टा से उत्पन्न अग्नि से धरती और आकाश दोनों डरते हैं एवं सहनशील अग्नि के समीप आकर सेवा करते हैं. (५) उभे भद्रे जोषयेते न मेने गावो न वाश्रा उप तस्थुरैवैः. स दक्षाणां दक्षपतिर्बभूवाज्‍जन्ति यं दक्षिणतो हविर्भिः.. (६) रात और दिन दोनों शोभन स्त्रियों के समान अग्नि की सेवा करते एवं रंभाती हुई गायों के समान पास में आकर ठहरते हैं. आह्वानीय अग्नि के दक्षिण भाग में स्थित होकर ऋत्विज् हव्य द्वारा जिस अग्नि को तृप्त करते हैं, वह समस्त बलों का स्वामी बनता है. (६) उद्यंयमीति सवितेव बाहू उभे सिचौ यतते भीम ऋञ्जन्. उच्छुक्रमत्कमजते सिमस्मान्नवा मातृभ्यो वसना जहाति.. (७) भयंकर अग्नि सूर्य की भुजा रूपी किरणों के समान अपने तेज को विस्तृत करते एवं धरती-आकाश दोनों को अलंकृत करके उनके काम में लगाते हैं तथा समस्त पदार्थों से तेजस्वी एवं साररूप रस ग्रहण करते हैं. वे अपनी माता रूप जल से सारे संसार को ढकने वाला नवीन तेज बनाते हैं. (७) त्वेषं रूपं कृणुत उत्तरं यत्संपृञ्चानः सदने गोभिरद्भिः. कविर्बुध्नं परि मर्मृज्यते धीः सा देवताता समितिर्बभूव.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

जब अग्नि अंतरिक्ष में चलने वाले जलों से संयुक्त, तेजस्वी एवं सर्वोत्तम प्रकाश धारण करते हैं, तब क्रांतदर्शी एवं सर्वाधार अग्नि समस्त जल के मूलभूत आकाश को अपने तेज के द्वारा ढक लेते हैं. तेजस्वी अग्नि द्वारा फैलाई हुई चमक तेजसमूह बन गई थी. (८) उरु ते ज्रयः पर्येति बुध्नं विरोचमानं महिषस्य धाम. विश्वेभिरग्ने स्वयशोभिरिद्धोऽदब्धेभिः पायुभिः पाह्यस्मान्.. (९) हे महान् अग्नि! तुम्हारा सबको पराभूत करने वाला एवं चमकता हुआ तेज जल के मूल कारण आकाश को सब ओर से घेरे हुए है. तुम्हारा तेज अदृश्य एवं पालक है. तुम हमारे द्वारा प्रज्वलित होकर अपने तेजों के साथ यहां आओ. (९) धन्वन्त्स्रोतः कृणुते गातुमूर्मिं शुक्रैरूर्मिभिरभि नक्षति क्षाम्. विश्वा सनानि जठरेषु धत्तेऽन्तर्नवासु चरति प्रसूषु.. (१०) अग्नि आकाश में गमनशील जलसमूह को प्रवाह का रूप देते एवं उसी निर्मल किरणों वाले जलसमूह से धरती को भिगोते हैं. वे जठर में संपूर्ण अन्नों को धारण करते हैं, इसीलिए वर्षा के पश्चात् उत्पन्न नवीन फसलों के भीतर रहते हैं. (१०) एवा नो अग्ने समिधा वृधानो रेवत्पावक श्रवसे वि भाहि. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (११) हे शोधक अग्नि! समिधाओं के कारण प्रज्वलित होकर हमें धनयुक्त अन्न देने के लिए विशेष रूप से चमको. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती और आकाश उस अन्न की पूजा करें. (११) सूक्त—९६ देवता—अग्नि स प्रत्नथा सहसा जायमानः सद्यः काव्यानि बळधत्त विश्वा. आपश्च मित्रं धिषणा च साधन्देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (१) बलपूर्वक काष्ठ घर्षण से उत्पन्न अग्नि शीघ्र ही चिरंतन के समान क्रांतदर्शियों के समस्त यज्ञकर्मों को धारण करते हैं. उस विद्युत्रूप अग्नि को वायु और जल मित्र बना लेते हैं. ऋत्विजों ने धनदाता अग्नि को धारण किया है. (१) स पूर्वया निविदा कव्यतायोरिमाः प्रजा अजनयन्मनूनाम्. विवस्वता चक्षसा द्यामपश्च देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (२) अग्नि ने आयु की पूर्वकाल कृत एवं गुणनिष्ठ स्तुति को सुनकर इस मानवी प्रजा को उत्पन्न किया है एवं आच्छादक तेज के आकाश को व्याप्त किया है. ऋत्विजों ने धनदाता ebook converter DEMO Watermarks*

अग्नि को धारण किया है. (२) तमीळत प्रथमं यज्ञसाधं विश आरीराहुतमृञ्जसानम्. ऊर्जः पुत्रं भरतं सृप्रदानुं देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (३) हे मनुष्यो! देवों में प्रमुखतया यज्ञसाधक, हव्य द्वारा आहूत, स्तोत्रों द्वारा प्रसन्न, अन्न के पुत्र, प्रजाओं के पोषक एवं दानशील स्वामी अग्नि के समीप जाकर उनकी स्तुति करो. ऋत्विजों ने धनदाता अग्नि को धारण किया है. (३) स मातरिश्वा पुरुवारपुष्टिर्विदद्गातुं तनयाय स्वर्वित्. विशां गोपा जनिता रोदस्योर्देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (४) अंतरिक्ष में वर्तमान अग्नि हमारे पुत्रों के लिए अनेक अनुष्ठान मार्ग प्राप्त करावें. वे वरणीय पुष्टि वाले, स्वर्गदाता, प्रजाओं के रक्षक, देव, धरती और आकाश के उत्पन्नकर्त्ता हैं. ऋत्विजों ने धनदाता अग्नि को धारण किया है. (४) नक्तोषासा वर्णमामेम्याने धापयेते शिशुमेकं समीची. द्यावाक्षामा रुक्मो अन्तर्वि भाति देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (५) दिन और रात बार-बार एक-दूसरे का रूप नष्ट करके मिलते हुए अग्नि रूपी एक ही बालक का पालन करते हैं. वे तेजस्वी अग्नि, धरती और आकाश के मध्य में विशेष रूप से प्रकाशित होते हैं. ऋत्विजों ने धनदाता अग्नि को धारण किया है. (५) रायो बुध्नः संगमनो वसूनां यज्ञस्य केतुर्मन्मसाधनो वेः. अमृतत्वं रक्षमाणास एनं देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (६) अपने अमृतत्व की रक्षा करने वाले देवों ने धन के मूल निवास हेतु, धनों को मिलाने वाले, स्तोताओं की अभिलाषा के पूरक तथा यज्ञ के केतुरूप धनदाता अग्नि को धारण किया था. (६) नू च पुरा च सदनं रयीणां जातस्य च जायमानस्य च क्षाम्. सतश्च गोपां भवतश्च भूरेर्देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम्.. (७) प्राचीनकाल में एवं आजकल होने वाले समस्त धनों के निवासस्थान, उत्पन्न एवं भविष्य में होने वाले कार्यसमूह के निवासभूत तथा इस समय उपस्थित एवं भविष्य में जन्म लेने वाले पदार्थों के रक्षक तथा धनदाता अग्नि को देवों ने धारण किया. (७) द्रविणोदा द्रविणसस्तुरस्य द्रविणोदाः सनरस्य प्र यंसत्. द्रविणोदा वीरवतीमिषं नो द्रविणोदा रासते दीर्घमायुः.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

धन देने वाले अग्नि हमें स्थावर एवं जंगम संपत्ति का एक अंश दें. वे हमें वीर पुरुषों से युक्त अन्न एवं दीर्घ आयु दें. (८) एवा नो अग्ने समिधा वृधानो रेवत्पावक श्रवसे वि भाहि. तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (९) हे पवित्र करने वाले अग्नि! समिधाओं के कारण प्रज्वलित होकर हमें धनयुक्त अन्न देने के लिए विशेष रूप से प्रकाशित बनो. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती और आकाश उस अन्न की पूजा करें. (९) सूक्त—९७ देवता—अग्नि अप नः शोशुचदघमग्ने शुशुग्ध्या रयिम्. अप नः शोशुचदघम्.. (१) हे अग्नि! हमारा पाप नष्ट हो. तुम हमारे धन को सब ओर से प्रकाशित करो. हमारा पाप नष्ट हो. (१) सुक्षेत्रिया सुगातुया वसूया च यजामहे. अप नः शोशुचदघम्.. (२) हे अग्नि! हम शोभन क्षेत्र, शोभन मार्ग और धन की इच्छा से हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं. हमारा पाप नष्ट हो. (२) प्र यद्भन्दिष्ठ एषां प्रास्माकासश्च सूरयः. अप नः शोशुचदघम्.. (३) हे अग्नि! हमारे स्तोता कुत्स के समान श्रेष्ठ हों. वे सभी स्तोताओं में उत्तम हैं. हमारा पाप नष्ट हो. (३) प्र यत्ते अग्ने सूरयो जायेमहि प्र ते वयम्. अप नः शोशुचदघम्.. (४) हे अग्नि! तुम्हारी स्तुति करने वाले पुत्र-पौत्रादि पाकर बढ़ते हैं, इसीलिए हम भी तुम्हारी स्तुति करके बढ़ें. हमारे पाप नष्ट हों. (४) प्र यदग्नेः सहस्वतो विश्वतो यन्ति भानवः. अप नः शोशुचदघम्.. (५) शत्रुओं को पराजित करने वाली अग्नि की किरणें सभी जगह जाती हैं, इसलिए हमारे पाप नष्ट हों. (५) त्वं हि विश्वतोमुख विश्वतः परिभूरसि. अप नः शोशुचदघम्.. (६) हे अग्नि! तुम्हारे मुख चारों ओर हैं, इसलिए तुम चारों ओर से हमारी रक्षा करो. हमारा पाप नष्ट हो. (६) ebook converter DEMO Watermarks*