भारतकोश
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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

लोगों को देखना चाहता हूं जो पूर्वकाल में किए गए यज्ञों के कारण स्वर्ग पा गए हैं. (१) इनोत पृच्छ जनिमा कवीनां मनोधृतः सुकृतस्तक्षत द्याम्. इमा उ ते प्रण्यो३ वर्धमाना मनोवाता अध नु धर्मणि ग्मन्.. (२) हे इंद्र! सुकृत कर्मों द्वारा व भूमि को पाने वालों के जन्म के विषय में गुरुओं से पूछो. वे मन के समय एवं शुभ कर्मों की सहायता से स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं. इस यज्ञ में तुम्हें लक्ष्य करके कही गई स्तुतियां मन की गति के समान बढ़ रही हैं. (२) नि षीमिदत्र गुह्या दधाना उत क्षत्राय रोदसी समञ्जन्. सं मात्राभिर्ममिरे येमुरुर्वी अन्तर्मही समृते धायसे धुः.. (३) इस भूलोक में सर्वत्र गूढ़ कर्म करने वाले कवियों ने बल पाने के लिए धरती एवं आकाश को सुशोभित किया है. उन्होंने धरती एवं आकाश की सीमा निश्चित की है. परस्पर संगत, विस्तीर्ण एवं महान् धरती-आकाश को मध्यवर्ती अंतरिक्ष द्वारा धारण किया है. (३) आतिष्ठन्तं परि विश्वे अभूषञ्छ्रियो वसानश्चरति स्वरोचिः. महत्तद्वृष्णो असुरस्य नामा विश्वरूपो अमृतानि तस्थौ.. (४) समस्त कवियों ने रथ में बैठे हुए इंद्र को सभी प्रकार से अलंकृत किया है. अपनी प्रभा से प्रकाशित इंद्र दीप्ति से ढके हुए स्थित हैं. कामवर्षी एवं प्राणवान् इंद्र के कर्म विचित्र हैं, क्योंकि उन्होंने नाना रूप धारण करके जलों का आश्रय लिया है. (४) असूत् पूर्वो वृषभो ज्यायानिमा अस्य शुरुधः सन्ति पूर्वीः. दिवो नपाता विदथस्य धीभिः क्षत्रं राजाना प्रदिवो दधाथे.. (५) कामवर्षी, चिरंतन एवं सर्वश्रेष्ठ इंद्र ने प्यास को रोकने वाले एवं प्रभूत जल को बनाया था. स्वर्ग के स्वामी एवं पवित्र करने वाले इंद्र एवं वरुण तेजस्वी यज्ञकर्त्ता की स्तुतियों के कारण प्रसन्न होकर धन धारण करते हैं. (५) त्रीणि राजाना विदथे पुरूणि परि विश्वानि भूषथः सदांसि. अपश्यमत्र मनसा जगन्वान्द्रते गन्धर्वां अपि वायुकेशान्.. (६) हे तेजस्वी इंद्र एवं वरुण! इस यज्ञ में विस्तृत एवं सोमरस आदि से पूर्ण तीन सवनों को भली-भांति अलंकृत करो. हे इंद्र! मैंने यज्ञ में वायु के कारण बिखरे हुए बालों वाले गंधर्वों को देखा था. इससे सिद्ध है कि तुम यज्ञ में गए थे. (६) तदिन्वस्य वृषभस्य धेनोरा नामभिर्ममिरे सख्यं गोः. अन्यदन्यदसुर्यं१ वसाना नि मायिनो ममिरे रूपमस्मिन्.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

जो यजमान कामवर्षी इंद्र के निमित्त गौ नाम वाली धेनु से हव्य दूध दुहते हैं, वे स्वर्ग प्राप्त करके कवि बनते हैं. असुरों का नया बल धारण करके उन मायावियों ने अपना-अपना रूप इंद्र को अर्पित किया. (७) तदिन्वस्य सवितुर्नकिर्मे हिरण्ययीममतिं याममतिं यामशिश्रेत्. आ सुष्टुती रोदसी विश्वमिन्वे अपीव योषा जनिमानि वव्रे.. (८) समस्त विश्व के निर्माता इंद्र की सुवर्णमयी दीप्ति को कोई सीमित नहीं कर सकता. इस स्तुति के आश्रय इंद्र इस शोभन स्तुति से प्रसन्न होकर सबको तृप्त करने वाले धरती-आकाश का इस प्रकार आलिंगन करते हैं, जिस तरह माता अपने बच्चे को छाती से लगाती है. (८) युवं प्रत्नस्य साधथो महो यद्दैवी स्वस्तिः परि णः स्यातम्. गोपाजिह्वस्य तस्थुषो विरूपा विश्वे पश्यन्ति मायिनः कृतानि.. (९) हे इंद्र एवं वरुण! तुम दोनों स्तोता का कल्याण करो, उसे दैवी कल्याण दो तथा हमारी सभी प्रकार रक्षा करो. सभी डरे हुए देवों को अभय वाणी सुनाने वाले व स्थिरतर इंद्र नाना रूप कर्मों को देखते हैं. (९) शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ. शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि सञ्जितं धनानाम्.. (१०) धन प्राप्ति वाले संग्राम में उत्साहपूर्ण, धनवान्, सकल विश्व के नेता, स्तुतियां सुनने वाले, शत्रुओं को भयंकर, युद्ध में राक्षसविनाशकारी एवं शत्रुओं के धन के विजेता इंद्र को हम रक्षा के लिए बुलाते हैं. (१०) सूक्त—३९ देवता—इंद्र इन्द्रं मतिर्हृद आ वच्यमानाच्छा पतिं स्तोमतष्टा जिगाति. या जागृविर्विदथे शस्यमानेन्द्र यत्ते जायते विद्धि तस्य.. (१) हे जगत् के स्वामी इंद्र! हृदय से उद्भूत एवं स्तोताओं द्वारा निर्मित स्तुतियां तुम्हारे पास जावें. यज्ञ में मेरी स्तुति तुम्हारे जागरण का कारण बनती है, उसे जानो. (१) दिवश्चिदा पूर्व्या जायमाना वि जागृविर्विदथे शस्यमाना. भद्रा वस्त्राण्यर्जुना वसाना सेयमस्मे सनजा पित्र्या धीः.. (२) हे इंद्र! सूर्योदय से भी पहले यज्ञ में की गई स्तुति तुम्हारा जागरण करती हुई कल्याणकारिणी, शुक्लवस्त्रधारिणी, सनातन एवं हमारे पितरों के पास से आई है. (२) यमा चिदत्र यमसूरसूत जिह्वाया अग्रं पतदा ह्यस्थात्.

वपूंषि जाता मिथुना सचेते तमोहना तपुषो बुध्न एता.. (३) यम ने अश्विनीकुमारों को जन्म दिया था. उनकी स्तुति करने के लिए मेरी जीभ का अगला भाग चंचल है. अंधकारनाशक दिवस के प्रारंभ में ही आए हुए वे अश्विनीकुमार प्रातःकाल के यज्ञकर्मों से संगत होते हैं. (३) नकिरेषां निन्दिता मर्त्येषु ये अस्माकं पितरो गोषु योधा:. इन्द्र एषां दृंहिता माहिनावानुद्गोत्राणि ससृजे दंसनावान्.. (४) हे इंद्र! गायों के निमित्त युद्ध करने वाले हमारे पितरों का मनुष्यों में कोई भी निंदक नहीं है. महिमा एवं वृत्रहननादि कर्म वाले इंद्र ने उन अंगिरागोत्रीय ऋषियों को समृद्ध गाएं दी थीं. (४) सखा ह यत्र सखिभिर्नवग्वैरभिज्ञ्वा सत्वभिर्गा अनुग्मन्. सत्यं तदिन्द्रो दशभिर्दशग्वैः सूर्यं विवेद तमसि क्षियन्तम्.. (५) नवग्व अर्थात् अंगिरागोत्रीय ऋषियों के मित्र इंद्र पणियों द्वारा रोकी गईं गायों वाले बिल में जब घुटनों के सहारे गए थे, तब दस अंगिराओं के साथ बिल के अंधकार में सूर्य को देख सके. (५) इन्द्रोमधुसम्भृतममृतमुस्रियायां पद्वद्विवेद शफवन्नमे गोः. गुहा हितं गुह्यं गूहळह्मप्सु हस्ते दधे दक्षिणे दक्षिणावान्.. (६) इंद्र ने सबसे पहले दुधारू गायों में मधुर दूध जाना, फिर दूध के निमित्त चार चरणों वाले गोधन को प्राप्त किया. उदारता वाले इंद्र ने गुफा में छिपे हुए एवं अंतरिक्ष में चलने वाले मायावी असुर को दाहिने हाथ में पकड़ लिया. (६) ज्योतिर्वृणीत तमसो विजानन्नारे स्याम दुरितादभीके. इमा गिरः सोमपाः सोमवृद्ध जुषस्वेन्द्र पुरुतमस्य कारोः.. (७) रात्रि से उत्पन्न होते ही सूर्यरूपी इंद्र ने प्रकाश का वरण किया. हम पाप से दूर एवं भयहीन स्थान में रहेंगे. हे सोम पीने वाले एवं सोम पाने में प्रमुख इंद्र! शत्रुविनाशकारी एवं स्तुति करने वाले ऋत्विज् की इन स्तुतियों को सुनो. (७) ज्योतिर्यज्ञाय रोदसी अनु ष्यादारे स्याम दुरितस्य भूरेः. भूरि चिद्धि तुजतो मर्त्यस्य सुपारासो वसवो बर्हणावत्.. (८) हे इंद्र! जगत्-प्रकाशक सूर्य यज्ञ के लिए धरती और आकाश को प्रकाशित करें. हम विस्तृत पाप से दूर रहें. हे स्तुति द्वारा प्रसन्न किए जाने वाले वसुओ! अधिक दान करने वाले यजमान को पर्याप्त एवं समृद्धिशाली धन दो. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—४० देवता—इंद्र

शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ. शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि सञ्जितं धनानाम्.. (९) धन प्राप्ति वाले संग्राम में उत्साहपूर्ण, धनवान्, सकल विश्व के नेता, स्तुतियां सुनने वाले, शत्रुओं को भयंकर, युद्ध में राक्षसविनाशकारी एवं शत्रुओं के धन के विजेता इंद्र को हम रक्षा के लिए बुलाते हैं. (९) सूक्त—४० देवता—इंद्र इन्द्र त्वा वृषभं वयं सुते सोमे हवामहे. स पाहि मध्वो अन्धसः.. (१) हे कामवर्षी इंद्र! निचोड़े हुए सोम को पीने के लिए हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम मादक एवं अन्नरूपी सोम को पिओ. (१) इन्द्र क्रतुविदं सुतं सोमं हर्य पुरुष्टुत. पिबा वृषस्व तात्पिम.. (२) हे इंद्र! इस बुद्धिवर्धक एवं निचोड़े गए सोम को पीने की अभिलाषा करो. हे बहुतों द्वारा स्तुति किए गए इंद्र! इस तृप्तिदायक सोम को पिओ. (२) इन्द्र प्र णो धितावानं यज्ञं विश्वेभिर्देवेभिः. तिर स्तवान विशपते.. (३) हे स्तुति किए जाते हुए एवं मरुतों के स्वामी इंद्र! यज्ञ के योग्य समस्त देवों के साथ मिलकर तुम हमारा यह हवि वाला यज्ञ विशेषरूप से बढ़ाओ. (३) इन्द्र सोमाः सुता इमे तव प्र यन्ति सत्पते. क्षयं चन्द्रास इन्दवः.. (४) हे सज्जनों के स्वामी इंद्र! प्रसन्नता देने वाला, दीप्त, निचोड़ा गया एवं हमारे द्वारा तुम्हें दिया गया सोम तुम्हारे उदर में जाता है. (४) दधिष्वा जठरे सुतं सोममिन्द्र वरेण्यम्. तव द्युक्षास इन्दवः.. (५) हे इंद्र! सबके द्वारा वरण करने योग्य, निचोड़े गए, दीप्त एवं अपने साथ स्वर्ग में रहने वाले सोम को अपने उदर में धारण करो. (५) गिर्वणः पाहि नः सुतं मधोर्धाराभिरज्यसे. इन्द्र त्वादातमित्यशः.. (६) हे स्तुतियों द्वारा प्रशंसा योग्य इंद्र! तुम मदकारक सोम की धाराओं से तृप्त होते हो. हमारे द्वारा निचोड़े गए सोम को पिओ. तुम्हारे द्वारा बढ़ाया हुआ अन्न ही हमें प्राप्त होता है. (६) अभि द्युम्नानि वनिन इन्द्रं सचन्ते अक्षिता. पीत्वी सोमस्य वावृधे.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

यजमान का द्युतियुक्त व क्षयरहित सोमादि हवि चारों ओर से इंद्र को प्राप्त है. इंद्र सोम को पीकर बढ़ते हैं. (७) अर्वावतो न आ गहि परावतश्च वृत्रहन्. इमा जुषस्व नो गिर:.. (८) हे वृत्रनाशक इंद्र! समीपवर्ती अथवा दूरवर्ती स्थान से हमारे सामने आओ और इन स्तुतियों को स्वीकार करो. (८) यदन्तरा परावतमर्वावतं च हूयसे. इन्द्रेह तत आ गहि.. (९) हे इंद्र! तुम दूरवर्ती, निकटवर्ती अथवा मध्यवर्ती स्थान से बुलाए जाते हो. सोमपान के लिए वहां से इस यज्ञ में आओ. (९) सूक्त—४१ देवता—इंद्र आ तू न इन्द्र मद्र्यग्घुवान: सोमपीतये. हरिभ्यां याह्यद्रिव:.. (१) हे वज्रधारी इंद्र! होताओं द्वारा बुलाए हुए तुम हरि नामक घोड़ों की सहायता से सोम पीने के लिए मेरे यज्ञ में मेरे सामने जल्दी आओ. (१) सत्तो होता न ऋत्वियस्तिस्तिरे बर्हिरानुषक्. अयुजन्प्रातरद्रय:.. (२) हे इंद्र! हमारे यज्ञ में तुम्हें बुलाने के लिए होता ठीक समय पर बैठ चुका है. कुशों को एक-दूसरे से मिलाकर बिछाया गया है एवं प्रातःसवन में सोम निचोड़ने के लिए पत्थर एक- दूसरे से मिल गए हैं. (२) इमा ब्रह्म ब्रह्मवाह: क्रियन्त आ बर्हि: सीद. वीहि शूर पुरोळाशम्.. (३) हे स्तुतियों द्वारा मिलने वाले इंद्र! तुम्हारे लिए ये स्तुतियां की जा रही हैं. तुम इन कुशाओं पर भली प्रकार बैठो. हे शूर! इस पुरोडाश को खाओ. (३) रारन्धि सवनेषु ण एषु स्तोमेषु वृत्रहन्. उक्थेष्विन्द्र गिर्वण:.. (४) हे स्तुतियों द्वारा प्रशंसनीय एवं वृत्रहंता इंद्र! हमारे द्वारा बोले गए तीनों स्तोत्रों एवं उक्थों में रमण करो. (४) मतय: सोमपामुरुं रिहन्ति शवसस्पतिम्. इन्द्रं वत्सं न मातर:.. (५) हे महान्, सोमपानकर्त्ता एवं शक्ति के स्वामी इंद्र! जिस प्रकार गाएं बछड़ों को चाटती हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां तुम्हें चाटती हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

स मन्दस्वा ह्यन्धसो राधसे तन्वा महे. न स्तोतारं निदे करः.. (६) हे इंद्र! हमें अधिक धन देने के लिए सोमरस द्वारा तुम शरीरसहित प्रसन्न रहो एवं मुझ स्तोता को निंदा का विषय मत बनाओ. (६) वयमिन्द्र त्वायवो हविष्मन्तो जरामहे. उत त्वमस्मयुर्वसो.. (७) हे इंद्र! यज्ञ में तुम्हें बुलाने के इच्छुक हम हवि लेकर तुम्हारी स्तुति करते हैं, हे वास देने वाले इंद्र! तुम भी हवि स्वीकार करने वाले के लिए हमारी इच्छा करो. (७) मारे अस्मद्दि मुमुचो हरिप्रियर्वाङ् याहि. इन्द्र स्वधावो मत्स्वेह.. (८) हे हरि नामक घोड़ों को प्यार करने वाले इंद्र! हमसे दूरवर्ती स्थान में घोड़ों को रथ से अलग मत करो एवं हमारे पास आओ. हे सोमयुक्त इंद्र! इस यज्ञ में प्रसन्न रहो. (८) अर्वाञ्चं त्वा सुखे रथे वहतामिन्द्र केशिना. घृतस्नू बर्हिरासदे.. (९) लंबे बालों वाले एवं पसीने से भीगे हुए घोड़े तुम्हें सुखदायक रथ पर बैठाकर बैठने योग्य कुशों के सामने एवं हमारे पास लावें. (९) सूक्त—४२ देवता—इंद्र उप नः सुतमा गहि सोममिन्द्र गवाशिरम्. हरिभ्यां यस्ते अस्मयुः.. (१) हे इंद्र! हमारे द्वारा निचोड़े गए एवं दूध से मिले हुए सोम के समीप आओ. हरि नामक घोड़ों से युक्त तुम्हारा रथ हमारी अभिलाषा करता है. (१) तमिन्द्र मदमा गहि बर्हिःष्ठा ग्रावभिः सुतम्. कुविन्वस्य तृप्णवः.. (२) हे इंद्र! पत्थरों द्वारा निचोड़े गए एवं कुशों पर रखे हुए सोम के समीप आओ व इसको पीकर तृप्त होओ. (२) इन्द्रमित्था गिरो ममाच्छागुरिषिता इतः. आवृते सोमपीतये.. (३) इंद्र के लिए प्रेरित हमारी स्तुतिरूपी वाणी उन्हें सोमपान के लिए बुलाने हेतु इस स्थान से इंद्र के सामने जाए. (३) इन्द्रं सोमस्य पीतये स्तोमैरिह हवामहे. उक्थेभिः कुविदागमत्.. (४) हम स्तोत्रों और उक्थों के द्वारा इंद्र को सोमपान के लिए यज्ञ में बुलाते हैं. अनेक बार बुलाए हुए इंद्र आवें. (४)

इन्द्र सोमाः सुता इमे तान्दधिश्व शतक्रतो. जठरे वाजिनीवसो.. (५) हे शतक्रतु इंद्र एवं अन्नरूपी धन वाले इंद्र! ये सोम निचोड़े गए हैं. इन्हें अपने उदर में धारण करो. (५) विद्या हि त्वा धनञ्जयं वाजेषु दधृषं कवे. अधा ते सुम्नमीमहे.. (६) हे क्रांतदर्शी इंद्र! हम तुम्हें युद्धों में शत्रुओं को हराने वाला एवं धन जीतने वाला जानते हैं, इसलिए तुमसे धन मांगते हैं. (६) इममिन्द्र गवाशिरं यवाशिरं च नः पिब. आगत्या वृषभिः सुतम्.. (७) हे इंद्र! यज्ञस्थल में आकर गोदुग्ध एवं जौ मिले हुए तथा पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए सोम को पिओ. (७) तुभ्येदिन्द्र स्व ओक्ये३ सोमं चोदामि पीतये. एष रारन्तु ते हृदि.. (८) हे इंद्र! तुम्हारे पीने के लिए ही हम इस सोम को अपने उदर की ओर प्रेरित करते हैं. यह सोम तुम्हारे हृदय में रमण करे. (८) त्वां सुतस्य पीतये प्रत्नमिन्द्र हवामहे. कुशिकासो अवस्यवः.. (९) हे पुरातन इंद्र! तुमसे रक्षा की अभिलाषा करते हुए हम कुशिकगोत्रीय ऋषि स्तुति वाक्यों द्वारा तुम्हें सोम पीने के लिए बुलाते हैं. (९) सूक्त—४३ देवता—इंद्र आ याह्यर्वाङुप वन्धुरेष्ठास्तवेदनु प्रदिवः सोमपेयम्. प्रिया सखाया वि मुचोप बर्हिस्त्वामिमे हव्यवाहो हवन्ते.. (१) हे जुए वाले रथ पर बैठे हुए इंद्र! तुम शीघ्र हमारे पास आओ. यह सोमपान प्राचीनकाल से तुम्हारे निमित्त ही चला आ रहा है. तुम अपने प्यारे घोड़ों को कुश के निकट रथ से खोलो. ये ऋत्विज् तुम्हें सोम पीने के लिए बुलाते हैं. (१) आ याहि पूर्वीरति चर्षणीरां अर्य आशिष उप नो हरिभ्याम्. इमा हि त्वा मतयः स्तोमतष्टा इन्द्र हवन्ते सख्यं जुषाणाः.. (२) हे स्वामी इंद्र! तुमसे हमारी यही प्रार्थना है कि सभी पूर्ववर्ती प्रजाओं को छोड़कर हमारे समीप आओ और अपने घोड़ों के साथ यहां सोमरस पिओ. स्तोताओं द्वारा निर्मित एवं तुम्हारी मित्रता चाहने वाली स्तुतियां तुम्हें बुलाती हैं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

आ नो यज्ञं नमोवृधं सजोषा इन्द्र देव हरिभिर्याहि तूयम्. अहं हि त्वा मतिभिर्जोहवीमि घृतप्रयाः सधमादे मधूनाम्.. (३) हे देव इंद्र! हमारे अन्न बढ़ाने वाले यज्ञ में तुम प्रसन्न चित्त से घोड़ों के साथ आओ. हम घृतयुक्त अन्न को हविरूप में धारण करके सोम पीने के स्थान पर स्तुतियों द्वारा तुम्हें बार-बार बुलाते हैं. (३) आ च त्वामेता वृषणा वहातो हरी सखाया सुधुरा स्वङ्गा. धानावदिन्द्रः सवनं जुषाणः सखा सख्युः शृणवद्वन्दनानि.. (४) हे इंद्र! प्रसन्न करने में समर्थ, सुंदर जुए में जुड़े हुए, शोभन अंगों वाले एवं मित्ररूप हरि नामक दोनों घोड़े तुम्हें यज्ञ में पहुंचाने के लिए रथ में जुते हैं. भुने हुए जौ वाले यज्ञ का सेवन करते हुए एवं मुझ स्तोता के मित्र इंद्र स्तुतियां सुनें. (४) कुविन्मा गोपां करसे जनस्य कुविद्राजानं मघवन्नृजीषिन्. कुविन्म ऋषिं पपिवांसं सुतस्य कुविन्मे वस्वो अमृतस्य शिक्षाः.. (५) हे इंद्र! मुझे भी लोगों का रक्षक बनाओ. हे मघवा एवं सोमयुक्त इंद्र! मुझे सबका स्वामी, ऋषि तथा सोमपानकर्त्ता बनाओ एवं क्षयरहित धन दो. (५) आ त्वा बृहन्तो हरयो युजाना अर्वागिन्द्र सधमादो वहन्तु. प्र ये द्विता दिव ऋञ्जन्त्याताः सुसम्मृष्टासो वृषभस्य मूराः.. (६) हे इंद्र! विशाल रथ में जुड़े हुए एवं परस्पर प्रसन्न हरि नामक घोड़े तुम्हें हमारे सामने ले आवें. कामवर्षी इंद्र के शत्रुनाशक, भली प्रकार मालिश किए गए एवं आकाश से आते हुए घोड़े दिशाओं को दो भागों में बांट देते हैं. (६) इन्द्र पिब वृषधूतस्य वृष्ण आ यं ते श्येन उशते जभार. यस्य मदे च्यावयसि प्र कृष्टीर्यस्य मदे अप गोत्रा ववर्थ. (७) हे इंद्र! पत्थरों द्वारा निचोड़े गए एवं इच्छित फल देने वाले सोम को पिओ. श्येन नामक पक्षी सोमाभिलाषी तुम्हारे लिए सोम लाया है. इस सोम का नशा हो जाने पर तुम शत्रु मनुष्यों को गिराते एवं मेघों को भेदते हो. (७) शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ. शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि सञ्जितं धनानाम्.. (८) धनप्राप्ति वाले संग्राम में उत्साहपूर्ण, धनवान्, सकल विश्व के नेता, स्तुतियां सुनने वाले, शत्रुओं को भयंकर, युद्ध में राक्षस विनाशकारी एवं शत्रुओं के धन के विजेता इंद्र को हम रक्षा के लिए बुलाते हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—४४ देवता—इंद्र अयं ते अस्तु हर्यतः सोम आ हरिभिः सुतः. जुषाण इन्द्र हरिभिर्न आ गह्या तिष्ठ हरितं रथम्.. (१) हे इंद्र! पत्थरों द्वारा निचोड़ा गया, सुंदर एवं प्रसन्नता का विषय यह सोम तुम्हारे लिए हो. तुम अपने हरे रंग के रथ पर बैठो एवं हरि नामक घोड़ों की सहायता से हमारे सामने आओ. (१) हर्यन्नुषसमर्चयः सूर्यं हर्यन्नरोचयः. विद्वांश्चिकित्वान्हर्यश्व वर्धस इन्द्र विश्वा अभि श्रियः.. (२) हे इंद्र! तुम सोम के अभिलाषी बनकर उषा की पूजा करते एवं सूर्य को प्रकाशित करते हो. हे हरि नामक घोड़ों वाले, विद्वान् एवं हमारी अभिलाषा को जानने वाले इंद्र! तुम हमारी सभी संपत्तियों को बढ़ाते हो. (२) द्यामिन्द्रो हरिधायसं पृथिवीं हरिवर्पसम्. अधारयद्धरितोर्भूरि भोजनं ययोरन्तर्हरिश्चरत्.. (३) इंद्र ने हरे रंग की किरणों वाले स्वर्गलोक तथा ओषधियों के कारण हरे रंग की धरती को धारण किया था. द्यावापृथ्वी इंद्र के हरि नामक घोड़ों को पर्याप्त भोजन देते हैं एवं इंद्र इन्हीं के मध्य विचरण करते हैं. (३) जज्ञानो हरितो वृषा विश्वमा भाति रोचनम्. हर्यश्वो हरितं धत्त आयुधमा वज्रं बाह्वोर्हरिम्.. (४) हरे वर्ण वाले एवं कामवर्षी इंद्र जन्म लेते ही सारे संसार को प्रकाशित कर देते हैं. हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र हाथों में हरे रंग का आयुध एवं शत्रुओं के प्राण हरण करने वाला वज्र रखते हैं. (४) इन्द्रो हर्यन्तमर्जुनं वज्रं शुक्रैरभीवृतम्. अपावृणोद्धरिभिरद्रिभिः सुतमुद्गा हरिभिराजत्.. (५) इंद्र ने कमनीय, श्वेत वर्ण, दूध मिले हुए, वेगवान् एवं पत्थरों द्वारा निचोड़े गए सोम को आवरणरहित किया है एवं घोड़ों के साथ मिलकर पणियों द्वारा चुराई गई गाएं गुफा से बाहर निकाली हैं. (५) सूक्त—४५ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभिः. मा त्वा के चिन्न यमन्विं न पाशिनोऽति धन्वेव ताँ इहि.. (१) हे इंद्र! मद करने वाले एवं मयूरों के समान रोमों वाले घोड़ों के साथ तुम इस यज्ञ में आओ. पाशबंधक जिस प्रकार पक्षी को फांस लेता है, उसी प्रकार तुम्हें कोई प्रतिबंधित न करे. तुम मरुस्थल को पार करने वाले पथिकों के समान उन्हें पार करके यज्ञ में आओ. (१) वृत्रखादो वलंरुजः पुरां दर्भो अपामजः. स्थाता रथस्य हर्योरभिश्वर इन्द्रो दृळ्हा चिदारुजः... (२) हे वृत्रहंता, मेघ-विदारक, जलों को प्रेरित करने वाले, शत्रुनगरों के विमर्दक एवं बलवान् शत्रुओं को भी नष्ट करने वाले इंद्र! दोनों घोड़ों को हांकने के लिए हमारे सामने रथ पर बैठो. (२) गम्भीराँ उदधीरिव क्रतुं पुष्यसि गा इव. प्र सुगोपा यवसं धेनवो यथा ह्रदं कुल्या इवाशत.. (३) हे इंद्र! तुम गहरे सागरों को जैसे जल से भरते हो एवं कुशल ग्वाले जैसे जौ आदि से गायों को पुष्ट बनाते हैं, उसी प्रकार इस यजमान को भी पुष्ट करो. जैसे गाएं जौ को प्राप्त करती हैं अथवा नालियां बड़े तालाब में पहुंचती हैं, उसी प्रकार सोम तुम्हें प्राप्त होते हैं. (३) आ नस्तुजं रयिं भरांशं न प्रतिजानते. वृक्षं पक्वं फलमङ्कीव धूनूहीन्द्र सम्पारणं वसु.. (४) हे इंद्र! पिता जिस प्रकार समझदार पुत्र को अपनी संपत्ति का एक भाग दे देता है, उसी प्रकार हमें शत्रुपराभवकारी पुत्र दो. जैसे पके फल तोड़ने के लिए अंकुश पेड़ को कंपा देता है, उसी प्रकार तुम हमें अभिलाषा पूर्ण करने वाला धन दो. (४) स्वयुरिन्द्र स्वराळसि स्मदिष्टिः स्वयशस्तरः. स वावृधान ओजसा पुरुष्टुत भवा नः सुश्रवस्तमः... (५) हे इंद्र! तुम धनवान्, स्वर्ग के राजा, भले वाक्य बोलने वाले एवं महान् कीर्तिशाली हो. हे बहुतों द्वारा स्तुति किए गए इंद्र! तुम अपनी शक्ति से बढ़ते हुए हमारे अतिशयशोभन अन्न वाले बनो. (५) सूक्त—४६ देवता—इंद्र युध्मस्य ते वृषभस्य स्वराज उग्रस्य यूनः स्थविरस्य घृष्वेः. अजूर्यतो वज्रिणो वीर्या३णीन्द्र श्रुतस्य महतो महानि.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

हे युद्ध करने वाले, कामवर्षी, धनाधिपति, समर्थ, नित्य-तरुण, शत्रुपराभवकारी, जरारहित, वज्रधारी, तीनों लोकों में प्रसिद्ध एवं महान् इंद्र! तुम्हारे वीरकर्म महान् हैं. (१) महाँ असि महिष वृष्ण्येभिर्धनस्पृदुग्र सहमानो अन्यान्. एको विश्वस्य भुवनस्य राजा स योधया क्षयया च जनान्.. (२) हे पूज्य एवं उग्र इंद्र! तुम महान्, अपने धन को पार ले जाने वाले, शक्ति द्वारा शत्रुओं को हराने वाले एवं समस्त संसार के अकेले राजा हो. तुम शत्रुओं का नाश करो एवं अपने भक्तों को अपने स्थान पर दृढ़ करो. (२) प्र मात्राभी रिरिचे रोचमानः प्र देवेभिर्विश्वतो अप्रतीतः. प्र मज्मना दिव इन्द्रः पृथिव्याः प्रोरुर्महो अन्तरिक्षादृजीषी.. (३) तेजस्वी, सभी के द्वारा अज्ञेय एवं सोम के स्वामी इंद्र पर्वतों से महान् बल में देवों से विशिष्ट, धरती, आकाश एवं विशाल अंतरिक्ष से भी विस्तृत हैं. (३) उरुं गभीरं जनुषाभ्यु१ग्रं विश्वव्यचसमवतं मतीनाम्. इन्द्रं सोमासः प्रदिवि सुतासः समुद्रं न स्रवत आ विशन्ति.. (४) हे महान्, गंभीर, स्वभाव से ही उग्र, सभी जगह व्याप्त व स्तुतिकर्त्ताओं के रक्षक इंद्र! एक दिन पहले निचोड़ा गया सोम तुम्हारे पास उसी प्रकार जाता है, जिस प्रकार सरिताएं सागर में समा जाती हैं. (४) यं सोममिन्द्र पृथिवीद्यावा गर्भं न माता बिभृतस्त्वाया. तं ते हिन्वन्ति तमु ते मृजन्त्यध्वर्यवो वृषभ पातवा उ.. (५) हे इंद्र! धरती और आकाश तुम्हारी कामना से गर्भ धारण करने वाली माता के समान सोम को धारण करते हैं. हे कामवर्षी इंद्र! अध्वर्युगण उसी सोम को तुम्हारे लिए प्रेषित करते हैं एवं तुम्हारे पीने के लिए उसे शुद्ध करते हैं. (५) सूक्त—४७ देवता—इंद्र मरुत्वाँ इन्द्र वृषभो रणाय पिबा सोममनुष्वधं मदाय. आ सिञ्चस्व जठरे मध्व ऊर्मिं त्वं राजासि प्रदिवः सुतानाम्.. (१) हे जलवर्षक एवं मरुतों के स्वामी इंद्र! तुम पुरोडाशादि के साथ सोमरस को संग्राम एवं प्रसन्नता के लिए पिओ. तुम मद करने वाले सोम को अधिक मात्रा में अपने पेट में भरो. तुम एक दिन पहले निचोड़े गए सोम के स्वामी हो. (१) सजोषा इन्द्र सगणो मरुद्भिः सोमं पिब वृत्रहा शूर विद्वान्.

जहि शत्रूँरप मृधो नुदस्वाथाभयं कृणुहि विश्वतो नः.. (२) हे शूर, देवों से मिले हुए, मरुतों से युक्त, वृत्रहंता एवं यज्ञकर्म जानने वाले इंद्र! तुम सोमरस पिओ, हमारे शत्रुओं का नाश करो, हिंसकों का हनन करो एवं हमारे लिए सभी प्रकार के अभय दो. (२) उत ऋतुभिर्ऋतुपाः पाहि सोममिन्द्र देवेभिः सखिभिः सुतं नः. याँ आभजो मरुतो ये त्वान्वहन्वृतमदधुस्तुभ्यमोजः.. (३) हे ऋतुपालक इंद्र! अपने मित्र मरुतों एवं देवों के साथ हमारे द्वारा निचोड़े हुए सोम को पिओ. युद्ध में सहायता पाने के लिए तुमने जिन मरुतों की सेवा की, जिन मरुतों ने तुम्हें युद्ध में स्वामी मानकर सहायता की, उन्हीं मरुतों ने तुम्हें पराक्रमी बनाया. तभी तुमने वृत्र का वध किया. (३) ये त्वाहिकत्ये मघवन्नवर्धन््ये शाम्बरे हरिवो ये गविष्टौ. ये त्वा नूनमनुमदन्ति विप्राः पिबेन्द्र सोमं सगणो मरुद्भिः.. (४) हे मघवा एवं अश्वों के स्वामी इंद्र! जिन मरुतों ने वृत्र को मारते समय तुम्हें बढ़ाया, शंबर वध में तुम्हारी सहायता की, गायों के लिए पणियों से होने वाले युद्ध में साथ दिया और जो विद्वान् मरुद्गण आज भी तुम्हें प्रसन्न करते हैं, उन्हीं मरुतों के साथ मिलकर तुम सोम पिओ. (४) मरुत्वन्तं वृषभं वावृधानमकवारिं दिव्यं शासमिन्द्रम्. विश्वासाहमवसे नूतनायोग्रं सहोदामिह तं हुवेम.. (५) हम मरुतों से युक्त, जलवर्षक, बढ़ने वाले, शत्रुरहित, दिव्य-गुणसंपन्न, शासनकर्त्ता, सभी शत्रुओं को पराजित करने वाले, उग्र तथा मरुतों को शक्ति देने वाले इंद्र को नवीन रक्षा के लिए बुलाते हैं. (५) सूक्त—४८ देवता—इंद्र सद्यो ह जातो वृषभः कनीनः प्रभर्तुमावदन्धसः सुतस्य. साधोः पिब प्रतिकामं यथा ते रसाशिरः प्रथमं सोम्यस्य.. (१) जलवर्षक, तुरंत उत्पन्न एवं कमनीय इंद्र हवि-सहित सोमरस धारण करने वाले यजमान की रक्षा करें. हे इंद्र! समय-समय पर सोमपान की इच्छा होने पर तुम सब देवों से पहले ही गोदुग्ध-मिश्रित सोम पिओ. (१) यज्जायथास्तदहरस्य कामेऽशोः पीयूषमपिबो गिरिष्टाम्. ebook converter DEMO Watermarks*

तं ते माता परि योषा जनित्री महः पितुर्दर्म आसिञ्चदग्रे.. (२) हे इंद्र! जिस दिन तुमने जन्म लिया, उसी दिन तुमने प्यास लगने पर पर्वतों पर उत्पन्न होने वाली सोमलता का ताजा रस पिया था. तुम्हारे महान् पिता के घर में तुम्हें जन्म देने वाली युवती माता ने दूध पिलाने से पहले तुम्हें सोमरस पिलाया था. (२) उपस्थाय मातरमन्नमैट्ट तिग्ममपश्यदभि सोममूहः. प्रयावयन्नचरद् गृत्सो अन्यान्महानि चक्रे पुरुधप्रतीकः.. (३) इंद्र ने माता के समीप जाकर अन्न मांगा. इंद्र ने माता के स्तनों में दूध के रूप में वर्तमान तेजस्वी सोम को देखा. इंद्र शत्रुओं को अपने-अपने स्थानों से गिराते हुए घूमने लगे एवं अनेक प्रकार से अंग संचालन करके वृत्रहनन आदि महान् कर्म किए. (३) उग्रस्तुराषाळभिभूत्योजा यथावशं तन्वं चक्र एषः. त्वष्टारमिन्द्रो जनुषाभिभूयामुष्या सोममपिबच्चमूषु.. (४) शत्रुओं को भयप्रद, शीघ्रतापूर्वक शत्रुओं को हराने वाले एवं शत्रुओं को हराने वाले पराक्रम से युक्त इंद्र ने अपने शरीर को इच्छानुसार विविध प्रकार का बनाया, अपनी शक्ति से त्वष्टा नामक असुर को हराया एवं चमसों में रखे हुए सोम को चुरा कर पिया. (४) शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ. शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि सञ्जितं धनानाम्.. (५) धन-प्राप्ति वाले संग्राम में उत्साहपूर्ण, धनवान्, सकल विश्व के नेता, स्तुतियां सुनने वाले, शत्रुओं को भयंकर, युद्ध में राक्षसविनाशकारी एवं शत्रुओं के धन के विजेता इंद्र को हम रक्षा के लिए बुलाते हैं. (५) सूक्त—४९ देवता—इंद्र शंसा महामिन्द्रं यस्मिन्विश्वा आ कृष्टयः सोमपाः काममव्यन्. यं सुक्रतुं धिषणे विभ्वतष्टं घनं वृत्राणां जनयन्त देवाः.. (१) हे होता! महान् इंद्र की स्तुति करो. उनकी रक्षा पाकर सभी मनुष्य यज्ञों में सोम पीकर मनोवांछित फल पाते हैं. धरती, आकाश एवं समस्त देवों ने शोभन कर्म एवं पापनाशक इंद्र को जन्म दिया. ब्रह्मा ने इंद्र को संसार का अधिपति बनाया. (१) यं नु नकिः पृतनासु स्वराजं द्विता तरति नृतमं हरिष्ठाम्. इनतमः सत्वभिर्यो ह शूषैः पृथुज्रया अमिनादायुरद्स्योः.. (२) युद्ध में अपने तेज से सुशोभित, हरि नामक घोड़ों वाले रथ में बैठे हुए, सर्वोत्तम नेता

एवं युद्ध में सेनाओं के दो भाग करने वाले इंद्र को कोई हरा नहीं सकता. सेना के सर्वोत्तम स्वामी वह इंद्र शत्रुओं की शक्ति सोख लेने वाले मरुतों के साथ तीव्र वेग धारण करके शत्रु के प्राण को नष्ट करते हैं. (२) सहावा पृत्सुतरणिर्नार्वा व्यानशी रोदसी मेहनावान्. भगो न कारे हव्यो मतीनां पितेव चारुः सुहवो वयोधाः.. (३) बलवान् इंद्र शक्तिशाली घोड़े के समान संग्रामों में शत्रु सेना को पारकर वहां जाते हैं एवं धरती-आकाश को व्याप्त करके धनवान् बनते हैं. यज्ञ में सूर्य देव के समान हवनीय एवं कमनीय इंद्र स्तोताओं के पिता तथा भली प्रकार बुलाए जाने पर अन्न देने वाले बनते हैं. (३) धर्ता दिवो रजसस्पृष्ट ऊर्ध्वो रथो न वायुर्वसुभिर्नियुत्वान्. क्षपां वस्ता जनिता सूर्यस्य विभक्ता भागं धिषणेव वाजम्.. (४) इंद्र स्वर्ग तथा आकाश के धारणकर्त्ता, सर्वत्र वर्तमान, अपने रथ के समान ऊपर चलने वाले, मरुतों की सहायता प्राप्त करने वाले, रात्रि के आच्छादक, सूर्य के जन्मदाता एवं पूर्वजों की वाणी के समान उपभोग योग्य कर्मफल के रूप में प्राप्त अन्न का विभाग करने वाले हैं. (४) शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ. शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि सञ्जितं धनानाम्.. (५) धन-प्राप्ति वाले संग्राम में उत्साहपूर्ण, धनवान्, सकल विश्व के नेता, स्तुतियां सुनने वाले, शत्रुओं को भयंकर, युद्ध में राक्षसविनाशकारी एवं शत्रुओं के धन के विजेता इंद्र को हम रक्षा के लिए बुलाते हैं. (५) सूक्त—५० देवता—इंद्र इन्द्रः स्वाहा पिबतु यस्य सोम आगत्या तुम्रो वृषभो मरुत्वान्. ओरुव्यचाः पृणतामेभिरन्नैरास्य हविस्तन्व१ः काममृध्याः.. (१) इंद्र स्वाहा शब्द द्वारा दिए गए सोम को पिएं. जिन इंद्र का यह सोमरस है, वे यज्ञ में आकर विघ्नकर्त्ताओं की हिंसा करने वाले, कामवर्षी एवं मरुतों से युक्त हैं. परम व्यापक इंद्र हमारे द्वारा दिए गए सोम आदि से संतुष्ट हों एवं हमारा दिया हुआ हव्य इंद्र के शरीर की इच्छाएं पूरी करे. (१) आ ते सपर्यु जवसे युनज्मि ययोरनु प्रदिवः श्रुष्टिमावः. इह त्वा धेयुर्हरयः सुशिप्र पिबा त्व१स्य सुषुतस्य चारोः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! तुम यज्ञ में शीघ्र पहुंच सको, इसलिए हम तुम्हारे रथ में परिचारक रूप घोड़े जोड़ते हैं. पुरातन तुम उन घोड़ों की गति के अनुसार चलते हो. हे सुंदर ठोड़ी वाले इंद्र! घोड़े तुम्हें यज्ञ में लावें. तुम आकर सुंदर एवं भली-भांति निचोड़ा गया सोम पिओ. (२) गोभिर्मिमिक्षुं दधिरे सुपारमिन्द्रं ज्यैष्ठ्याय धायसे गृणानाः. मन्दानः सोमं पपिवाँ ऋजीषिन्त्सस्मभ्यं पुरुधा गा इषण्य.. (३) ऋत्विज् अभिलषित फल देने वाले एवं स्तुतियों द्वारा प्रसन्न किए जाने योग्य इंद्र को श्रेष्ठता और चिरायु प्राप्ति के निमित्त गोदुग्ध मिले सोम से प्रसन्न करते हैं. हे सोम के स्वामी इंद्र! तुम प्रसन्न होते हुए सोमपान करो एवं हम स्तोताओं को यज्ञकर्म के निमित्त बहुत सी गाएं दो. (३) इमं कामं मन्दया गोभिरश्वैश्चन्द्रवता राधसा पप्रथश्च. स्वर्यवो मतिभिस्तुभ्यं विप्रा इन्द्राय वाहः कुशिकासो अक्रन्.. (४) हे इंद्र! हमारी इस धनाभिलाषा को गायों, घोड़ों एवं दीप्तियुक्त धन से पूरा करो. इन संपत्तियों द्वारा हमें प्रसिद्ध बनाओ. स्वर्गादि सुख के अभिलाषी एवं यज्ञकर्म में कुशल कौशिकगोत्रीय ऋषियों ने मंत्रों द्वारा यह स्तुति की है. (४) शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ. शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि संज्जितं धनानाम्.. (५) धनप्राप्ति वाले संग्राम में उत्साहपूर्ण, धनवान्, सकल विश्व के नेता, स्तुतियां सुनने वाले, शत्रुओं को भयंकर, युद्ध में राक्षसविनाशकारी एवं शत्रुओं के धन के विजेता इंद्र को हम रक्षा के लिए बुलाते हैं. (५) सूक्त—५१ देवता—इंद्र चर्षणीधृतं मघवानमुक्थ्य१मिन्द्रं गिरो बृहतीरभ्यनूषत. वावृधानं पुरुहूतं सुवृक्तिभिरमर्त्यं जरमाणं दिवेदिवे.. (१) मानवों के धारणकर्त्ता, धनयुक्त, स्तुति-समूहों द्वारा प्रशंसनीय, प्रतिक्षण बढ़ते हुए स्तोताओं द्वारा अनेक बार बुलाए गए, मरणरहित एवं शोभनस्तुतियों द्वारा प्रतिदिन स्तूयमान इंद्र को हमारे विशाल स्तुति-वचन संतुष्ट करें. (१) शतक्रतुमर्णवं शाकिनं नरं गिरो म इन्द्रमुप यन्ति विश्वतः. वाजसनिं पूर्भिदं तूर्णिमप्तुरं धामसाचमभिषाचं स्वर्विदम्.. (२) शतक्रतु, जल के स्वामी, मरुतों सहित सर्वजगत् के नेता, अन्नदाता, शत्रु नगरों के ebook converter DEMO Watermarks*

भेदनकर्त्ता, युद्ध में शीघ्र जाने वाले, जल को प्रेरित करने वाले, तेज धारण करने वाले, शत्रुपराभवकारी एवं स्वर्ग प्राप्त कराने वाले इंद्र के पास हमारी स्तुतियां सभी प्रकार से पहुंचें. (२) आकरे वसोर्जरिता पनस्यतेऽनेहसः स्तुभ इन्द्रो दुवस्यति. विवस्वतः सदन आ हि पिप्रिये सत्रासामभिमातिहनं स्तुहि.. (३) शत्रुओं का बल नष्ट करने वाले इंद्र की धन के साधन युद्ध में सब स्तुति करते हैं. वह पापरहित इंद्र स्तुतियों को स्वीकार करते हैं एवं यजमान के घर में सोमपान से परम प्रसन्न होते हैं. हे विश्वामित्र! शत्रुओं का पराभव एवं संहार करने वाले इंद्र की स्तुति करो. (३) नृणामु त्वा नृतमं गीर्भिरुक्थैर्भि प्र वीरमर्चता सबाधः. सं सहसे पुरुमायो जिहीते नमो अस्य प्रदिव एक ईशे.. (४) हे मनुष्यों के उत्तम नेता एवं परमवीर इंद्र! राक्षसों द्वारा बाधित ऋत्विज् स्तुतियों एवं उक्थों से प्रमुख रूप से तुम्हारी पूजा करते हैं. वृत्रहनन आदि प्रसिद्ध कर्म करने वाले इंद्र शक्ति पाने के लिए गमन करते हैं. एकमात्र पुरातन एवं सर्व जगत् के स्वामी इंद्र को नमस्कार है. (४) पूर्वीरस्य निष्षिधो मर्त्येषु पुरू वसूनि पृथिवी बिभर्ति. इन्द्राय द्याव ओषधीरुतापो रयिं रक्षन्ति जीरयो वनानि.. (५) मनुष्यों पर इंद्र अनेक प्रकार से अनुशासन करते हैं. इंद्र के लिए धरती नाना प्रकार के धन धारण करती है. स्वर्ग, ओषधियां, जल, मनुष्य एवं वन इंद्र के निमित्त धनों की रक्षा करते हैं. (५) तुभ्यं ब्रह्माणि गिर इन्द्र तुभ्यं सत्रा दधिरे हरिवो जुषस्व. बोध्या३पिरवसो नूतनस्य सखे वसो जरितृभ्यो वयो धाः.. (६) हे अश्वों के स्वामी इंद्र! ऋत्विज् तुम्हारे निमित्त स्तोत्र एवं स्तुति मंत्र वास्तव में धारण करते हैं. तुम उनका सेवन करो. हे सबको निवास देने वाले, सखा एवं व्याप्त इंद्र! तुम्हारे निमित्त दिए गए अभिनव हवि को जानो तथा स्तुतिकर्त्ताओं को अन्न दो. (६) इन्द्र मरुत्व इह पाहि सोमं यथा शार्याते अपिबः सुतस्य. तव प्रणीती तव शूर शर्मन्ना विवसन्ति कवयः सुयज्ञाः.. (७) हे मरुतों से युक्त इंद्र! तुमने राजा शार्यात के यज्ञ में जिस प्रकार सोमरस पिआ था, उसी प्रकार इस यज्ञ में भी पिओ. हे शूर! तुम्हारे बाधाहीन निवास में स्थित शोभन यज्ञ करने वाले बुद्धिमान् तुम्हें हव्य देकर तुम्हारी सेवा करते हैं. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

स वावशान इह पाहि सोमं मरुद्द्भिरिन्द्र सखिभिः सुतं नः. जातं यत्त्वा परि देवा अभूषन्महे भराय पुरुहूत विश्वे.. (८) हे इंद्र! सोमरस पीने की अभिलाषा करते हुए तुम अपने मित्र मरुतों के साथ इस यज्ञ में आओ एवं हमारे द्वारा निचोड़ा गया सोम पिओ. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम्हारे जन्म लेते ही सब देवों ने तुम्हें महान् युद्ध के लिए विभूषित किया. (८) अप्तूर्ये मरुत आपिरेषोऽमन्दन्निन्द्रमनु दातिवाराः. तेभिः साकं पिबतु वृत्रखादः सुतं सोमं दाशुषः स्वे सधस्थे.. (९) हे मरुतो! जलवर्षण की प्रेरणा के कारण इंद्र तुम्हारे मित्र हैं. मरुतों ने इंद्र को प्रसन्न किया था. वृत्रहंता इंद्र उनके साथ यजमान के अपने घर में निचोड़े गए सोम को पिएं. (९) इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधानां पते. पिबा त्व१स्य गिर्वणः.. (१०) हे धन के स्वामी एवं स्तुतियों द्वारा पूजनीय इंद्र! तुम्हारे उद्देश्य से शक्ति द्वारा निचोड़े गए सोम को जल्दी पिओ. (१०) यस्ते अनु स्वधामसत्सुते नि यच्छ तन्वम्. स त्वा ममत्तु सोम्यम्.. (११) हे इंद्र! हव्य अन्न के पश्चात् तुम्हारे लिए जो सोम निचोड़ा गया है, उस में अपने शरीर को डुबो दो. सोमपान के योग्य तुमको वह सोमरस प्रसन्न करे. (११) प्र ते अश्रोतु कुक्ष्योः प्रेन्द्र ब्रह्मणा शिरः. प्र बाहु शूर राधसे.. (१२) हे इंद्र! वह सोमरस तुम्हारी दोनों कोखों को भर दे. स्तोत्रों के साथ निचोड़ा गया वह सोम तुम्हारे शरीर को व्याप्त करे. हे शूर! यह सोम धन के लिए तुम्हारी भुजाओं को व्याप्त करे. (१२) सूक्त—५२ देवता—इंद्र धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम्. इन्द्र प्रातर्जुषस्व नः.. (१) हे इंद्र! भुने हुए जौ वाले, दही से मिले सत्तूओं से युक्त, पुरोडाश सहित एवं उक्थ मंत्रों के उच्चारणपूर्वक प्रातःकाल के यज्ञ में दिए गए सोम का तुम सेवन करो. (१) पुरोळाशं पचत्यं जुषस्वेन्द्रा गुरस्व च. तुभ्यं हव्यानि सिस्रते.. (२) हे इंद्र! तुम पके हुए पुरोडाश का भक्षण करो एवं उसे भक्षण करने के लिए प्रयत्न करो. हवन योग्य पुराडोश तुम्हारे लिए जाता है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

पुरोळाशं च नो घसो जोषायासे गिरश्च नः. वध्यूरिव योषणाम्.. (३) हे इंद्र! हमारे पुरोडाश को खाओ तथा हमारी स्तुतियों का उसी प्रकार सेवन करो, जिस प्रकार कामी पुरुष सुंदर नारी की सेवा करता है. (३) पुरोळाशं सनश्रुत प्रातःसावे जुषस्व नः. इन्द्र क्रतुर्हि ते बृहन्.. (४) हे पुराण होने के नाते प्रसिद्ध इंद्र! इस प्रातःकालीन यज्ञ में हमारे पुरोडाश का भक्षण करो. इससे तुम्हारा कर्म महान् होगा. (४) माध्यन्दिनस्य सवनस्य धानाः पुरोळाशमिन्द्र कृष्वेह चारुम्. प्र यत्स्तोता जरिता तूर्ण्यर्थो वृषायमाण उप गीर्भिरीट्टे.. (५) हे इंद्र! दोपहर के यज्ञ में भुने हुए जौ के शोभन पुरोडाश का यहां आकर भक्षण करो. तुम्हारी सेवा में तत्पर, तुम्हारी स्तुति करने के लिए बैल के समान इधर-उधर शीघ्रता से घूमने वाला स्तोता तुम्हारी उत्तम स्तुति जब करता है, तब तुम पुरोडाश खाते हो. (५) तृतीये धानाः सवने पुरुष्टुत पुरोळाशमाहुतं मामहस्व नः. ऋभुमन्तं वाजवन्तं त्वा कवे प्रयस्वन्त उप शिक्षेम धीतिभिः.. (६) हे बहुतों द्वारा स्तुति किए गए इंद्र! तृतीय सवन अर्थात् संध्याकालीन यज्ञ में हमारे भुने हुए जौ एवं हवन किए गए पुरोडाश को भक्षण द्वारा महान् बनाओ. हे ऋभुओं से युक्त, धनयुक्त पुत्रों वाले तथा कवि इंद्र! हम हव्य हाथ में लेकर स्तुतियों द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं. (६) पूषण्वते ते चक्रमा करम्भं हरिवते हर्यश्वाय धानाः. अपूपमद्धि सगणो मरुद्भिः सोमं पिब वृत्रहा शूर विद्वान्.. (७) हे सूर्य सहित इंद्र! हम तुम्हारे लिए दही मिला सत्तू तैयार करते हैं. हे हरि नामक एवं हरे रंग के घोड़ों वाले इंद्र! तुम्हारे लिए हम जौ भूनते हैं. तुम मरुतों के साथ आकर पुरोडाश खाओ. हे वृत्रनाशक, शूर एवं विद्वान् इंद्र! तुम सोम पिओ. (७) प्रति धाना भरत तूयमस्मै पुरोळाशं वीरतमाय नृणाम्. दिवेदिवे सदृशीरिन्द्र तुभ्यं वर्धन्तु त्वा सोमपेयाय धृष्णो.. (८) हे अध्वर्युगण! मनुष्यों में वीरतम इंद्र के लिए शीघ्र भुने जौ तथा पुरोडाश दो. हे शत्रुपराभवकारी इंद्र! तुम्हीं को लक्ष्य करके प्रतिदिन की गई एक सौ स्तुतियां तुम्हें सोमपान के लिए उत्साहपूर्ण करें. (८) सूक्त—५३ देवता—इंद्र, पर्वत आदि ebook converter DEMO Watermarks*

इन्द्रापर्वता बृहता रथेन वामीरिष आ वहतं सुवीराः.

इन्द्रापर्वता बृहता रथेन वामीरिष आ वहतं सुवीराः. वीतं हव्यान्यध्वरेषु देवा वर्धेथां गीर्भिरिळया मदन्ता.. (१) हे इंद्र एवं पर्वत! तुम बड़े रथ द्वारा शोभन एवं पुत्र-सहित अन्न लाओ. हे देव! हमारे यज्ञ में हव्य का भक्षण करो एवं उससे प्रसन्न होकर हमारे स्तुति वचनों द्वारा वृद्धि प्राप्त करो. (१) तिष्ठा सु कं मघवन्मा परा गाः सोमस्य नु त्वा सुषुतस्य यक्षि. पितुर्न पुत्रः सिचमा रभे त इन्द्र स्वादिष्ठया गिरा शचीवः.. (२) हे मघवा! इस यज्ञ में तुम कुछ समय सुखपूर्वक रहो. यहां से जाओ मत. हम भली प्रकार निचोड़े गए सोम से शीघ्र ही तुम्हारा यज्ञ करते हैं. हे शक्तिशाली इंद्र! पुत्र जिस प्रकार पिता के वस्त्र का छोर पकड़ लेता है, उसी प्रकार हम मधुर स्तुतियां बोलते हुए तुम्हारा वस्त्र पकड़ते हैं. (२) शंसावाध्वर्यो प्रति मे गृणीहीन्द्राय वाहः कृणवाव जुष्टम्. एदं बर्हिर्यजमानस्य सीदाथा च भूदूक्थमिन्द्राय शस्तम्.. (३) हे अध्वर्यु! हम दोनों स्तुति करेंगे. तुम मुझे उत्तर दो. हम दोनों इंद्र के लिए प्रिय स्तुतियां करेंगे. तुम यजमान के कुशों पर बैठो. हम दोनों द्वारा इंद्र के लिए किया गया उक्थ प्रशंसनीय हो. (३) जायेदस्तं मघवन्त्सेदु योनिसदित्त्वा युक्ता हरयो वहन्तु. यदा कदा च सुनवाम सोममग्निष्ट्वा दूतो धन्वात्यच्छ.. (४) हे मघवा! पत्नी ही घर है एवं वही पुरुष की योनि है. हरि नामक घोड़े तुम्हें उसी पत्नीयुक्त घर में ले जावें. हम जब कभी सोमरस निचोड़ें, तब तुम्हारा दूत अग्नि तुम्हारे सामने आ जाए. (४) परा याहि मघवन्ना च याहीन्द्र भ्रातृभ्यत्रा ते अर्थम्. यत्रा रथस्य बृहतो निधानं विमोचनं वाजिनो रासभस्य.. (५) हे धन के स्वामी इंद्र! तुम या तो इस यज्ञ से अपने निवासस्थान पर जाओ अथवा इस यज्ञ में आओ. हे भरणकर्त्ता इंद्र! दोनों स्थानों पर तुम्हारा प्रयोजन है. वहां जाने के लिए अपने विशाल रथ पर बैठो तथा यहां रहने के लिए हिनहिनाते हुए घोड़ों को रथ से अलग कर दो. (५) अपाः सोममस्तमिन्द्र प्र याहि कल्याणीर्जाया सुरणं गृहे ते. यत्रा रथस्य बृहतो निधानं विमोचनं वाजिनो दक्षिणावत्.. (६) हे इंद्र! यहीं ठहर कर सोम पिओ और अपने घर जाओ. तुम्हारे घर में सुंदरी एवं ebook converter DEMO Watermarks*

कल्याणी पत्नी है. घर जाने के लिए तुम अपने विशाल रथ पर बैठो अथवा यहां ठहरने के लिए घोड़ों को खोलकर खाने-पीने दो. (६) इमे भोजा अङ्गिरसो विरूपा दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीराः. विश्वामित्राय ददतो मघानि सहस्रसावे प्र तिरन्त आयुः.. (७) हे इंद्र! यज्ञ करने वाले ये सुदासवंशी भोज नामक क्षत्रिय, उनके याजक अनेक अंगिरागोत्रीय ऋषि एवं देवों से बलवान् रुद्र के पुत्र मरुत् इस अश्वमेध यज्ञ में गुरु विश्वामित्र को महान् धन देते हुए मेरे धन को बढ़ावें. (७) रूपंरूपं मघवा बोभवीति मायाः कृण्वानस्तन्वं१ परि स्वाम्. त्रिय॑द्दिवः परि मुहूर्तमागात्स्वैर्मन्त्रैरनृतुपा ऋतावा.. (८) इंद्र इच्छानुसार रूप बदल लेते हैं. माया करते हुए इंद्र अपने शरीर को नाना प्रकार का बनाते हैं. सत्ययुक्त होकर भी बिना ऋतु के सोमपान करने वाले इंद्र अपने स्तुति-मंत्रों से बुलाए जाने पर एक मुहूर्त में स्वर्गलोक से तीनों सवनों के यज्ञों में पहुंच जाते हैं. (८) महाँ ऋषिर्देवजा देवजूतोऽस्तभ्नात्सिन्धुमर्णवं नृचक्षाः. विश्वामित्रो यदवहत्सुदाससप्रियायत कुशिकेभिरिन्द्रः.. (९) महान्, इंद्रियों से परवर्ती अर्थ देखने वाले, उज्ज्वल तेज उत्पन्न करने वाले, तेजों द्वारा आकृष्ट व मनुष्यों के उपदेशक विश्वामित्र ने जलपूर्ण सरिता को रोक दिया था. जब विश्वामित्र ने सुदास का यज्ञ कराया, तब इंद्र ने कुशिकगोत्रीय ऋषियों के साथ प्रेम का आचरण किया. (९) हंसाइव कृणुथ श्लोकमद्रिभिर्मदन्तो गीर्भिरध्वरे सुते सचा. देवेभिर्विप्रा ऋषयो नृचक्षसो वि पिबध्वं कुशिकाः सोम्यं मधु.. (१०) हे विप्रो, ऋषियों व नेताओं को उपदेश देने वालो एवं कुशिक गोत्र में उत्पन्न पुत्रो! यज्ञ में पत्थरों द्वारा सोम निचोड़े जाने पर तुम स्तुतियों द्वारा देवों को प्रसन्न करते हुए हंसों के समान मंत्रों का उच्चारण करो तथा देवों के साथ सोम पिओ. (१०) उप प्रेत कुशिकाश्चेतयध्वमश्वं राये प्र मुञ्चता सुदासः. राजा वृत्रं जङ्घनत्प्रागपागुदगथा यजाते वर आ पृथिव्याः.. (११) हे कुशिकगोत्रीय पुत्रो! अश्व के पास जाओ एवं सावधान रहो. राजा सुदास का अश्व दिग्विजय द्वारा धन पाने के लिए छोड़ दो. राजा इंद्र ने वृत्र को पूर्व, पश्चिम एवं उत्तर दिशाओं में मारा था. राजा सुदास पृथ्वी के उत्तम भाग में यज्ञ करें. (११) य इमे रोदसी उभे अहमिन्द्रमतुष्टवम्. विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम्.. (१२)