ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
इन्द्रा को वां वरुणा सुम्नमआप स्तोमो हविष्माँअमृतो न होता. यो वां हृदि क्रतुमाँ अस्मदुक्तः पस्पर्शदिन्द्रावरुणा नमस्वान्.. (१) हे इंद्र एवं वरुण! अमर होता अग्नि जिस प्रकार तुम्हें प्राप्त होता है, उसी प्रकार कौन सी हव्यसहित स्तुति तुम्हारी कृपा करेगी? हे इंद्र एवं वरुण! हमारे द्वारा कही गई स्तुतियां यज्ञ एवं हव्य से युक्त तुम दोनों को पसंद आवें। (१) इन्द्रा ह यो वरुणा चक्र आपी देवौ मर्तः सख्याय प्रयस्वान्. स हन्ति वृत्रा समिथेषु शत्रूनवोभिर्वा महद्भिः स प्र शृण्वे.. (२) हे इंद्र एवं वरुण! जो व्यक्ति हव्यरूप में अन्न लेकर मित्रता के लिए तुम दोनों को भाई बनाता है, वह अपने पापों का नाश करता है. वह युद्ध में शत्रुओं को नष्ट करके महान् रक्षासाधनों के कारण प्रसिद्ध होता है. (२) इन्द्रा ह रत्नं वरुणा धेष्ठेत्था नृभ्यः शशमानेभ्यस्ता. यदी सखाया सख्याय सोमैः सुतेभिः सुप्रयसा मादयैते.. (३) हे इंद्र एवं वरुण! तुम इस प्रकार स्तुति करने वाले हम मनुष्यों के लिए रमणीय धन देने वाले बनो. यदि तुम दोनों मित्र यजमान के सखा हो एवं उसके द्वारा निचोड़े हुए सोमरस से प्रसन्न हो तो हमें धन दो. (३) इन्द्रा युवं वरुणा दिद्युमस्मिन्नोजिष्ठमुग्रा नि वधिष्टं वज्रम्. यो नो दुरेवो वृकतिर्दभीतिस्तस्मिन्निमाथामभिभूत्योजः.. (४) हे उग्र इंद्र एवं वरुण! तुम अपना तेजस्वी एवं दीप्त वज्र नामक आयुध शत्रुओं पर चलाओ. जो शत्रु हमारे द्वारा दमन नहीं किया जा सकता, दान नहीं देता एवं हिंसा करने वाला है, उसके प्रति तुम अपना शत्रुपराजयकारी बल प्रयोग करो. (४) इन्द्रा युवं वरुणा भूतमस्या धियः प्रेतारा वृषभेव धेनोः. सा नो दुहीयदद्यवसेव गत्वी सहस्रधारा पयसा मही गौः.. (५) हे इंद्र एवं वरुण! बैल जिस प्रकार गाय को प्रसन्न करता है, उसी प्रकार तुम स्तुति को प्रसन्न करो. जिस प्रकार गाय घास खाकर हजारों धारों के रूप में दूध देती हैं, उसी प्रकार स्तुतिरूपी गाय हमारी इच्छा पूरी करे. (५) तोके हिते तनय उर्वरासु सूरो दृशीके वृषणश्च पौंस्ये. इन्द्रा नो अत्र वरुणा स्यातामवोभिर्दस्मा परितक्म्यायाम्.. (६) हे इंद्र एवं वरुण! हमें पुत्र-पौत्र के साथ-साथ उपजाऊ भूमि की प्राप्ति कराने, बहुत समय तक सूर्य के दर्शन कराने एवं संतान उत्पत्ति की शक्ति प्रदान करने के लिए अंधेरी रात ebook converter DEMO Watermarks*
में रक्षासाधन लेकर तुम शत्रुओं के नाश को तैयार हो जाओ. (६) युवामिद्ध्यावसे पूर्व्याय परि प्रभूती गविषः स्वापी. वृणीमहे सख्याय प्रियाय शूरा मंहिष्ठा पितरेव शम्भू.. (७) हे इंद्र एवं वरुण! हम गाय पाने की इच्छा से तुम्हारे पास प्रसिद्ध रक्षा की प्रार्थना लेकर आए हैं. तुम शक्तिशाली, बंधुतुल्य, शूर एवं अतिशय पूज्य देवों से हम उसी प्रकार मित्र एवं प्रेम मांगते हैं, जिस प्रकार पुत्र पिता से याचना करता है. (७) ता वां धियोऽवसे वाजयन्तीराजिं न जग्मुर्युवयूँः सुदानू. श्रिये न गाव उप सोममस्थुरिन्द्रं गिरो वरुणं मे मनीषाः.. (८) हे शोभन फल देने वाले दोनों देवो! रत्न की अभिलाषा करती हुई हमारी स्तुतियां रक्षा के निमित्त उसी प्रकार तुम्हारे पास जाती हैं, जिस प्रकार वीर पुरुष संग्राम की अभिलाषा करता है. जिस प्रकार गाएं सोमरस की शोभा बढ़ाने के हेतु उसके समीप रहती हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां इंद्र और वरुण के समीप जाती हैं. (८) इमा इन्द्रं वरुणं मे मनीषा अगमन्नुप द्रविणमिच्छमानाः. उपेमस्थुर्जोष्टार इव वस्वो रघ्वीरिव श्रवसो भिक्षमाणाः.. (९) जिस प्रकार धन पाने की इच्छा से लोग धनी के पास जाते हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां धन पाने की अभिलाषा से इंद्र और वरुण के पास जाती हैं. लोग भिखारिणी स्त्रियों के समान अन्न को मांगते हुए इंद्र के पास जाते हैं. (९) अश्वस्य त्मना रथस्य पुष्टेर्नित्यस्य रायः पतयः स्याम. ता चक्राणा ऊतिभिर्नव्यसीभिरस्मत्रा रायो नियतः सचन्ताम्.. (१०) हम लोग अपने-आप घोड़ों, रथों, पुष्टि एवं स्थायी संपत्ति के स्वामी बनें. वे दोनों गतिशील देव रक्षा के नवीन साधनों के साथ हमारे सामने घोड़े और धन उपस्थित करें. (१०) आ नो बृहन्ता बृहतीभिरूती इन्द्र यातं वरुण वाजसातौ. यद्विद्यवः पृतनासु प्रक्रीळान्तस्य वां स्याम सनितार आजेः.. (११) हे महान् इंद्र एवं वरुण! तुम दोनों विशाल रक्षा साधनों के साथ आओ. अन्न प्राप्ति के हेतु होने वाले जिस युद्ध में शत्रुओं के आयुध चमकते हैं, हम उस युद्ध में तुम्हारी कृपा से विजयी हों. (११) सूक्त—४२ देवता—त्रसदस्यु आदि मम द्विता राष्ट्रं क्षत्रियस्य विश्वायोर्विश्वे अमृता यथा नः. ebook converter DEMO Watermarks*
ऋतुं सचन्ते वरुणस्य देवा राजामि कृष्टेरुपमस्य वव्रेः.. (१) क्षत्रिय जाति में उत्पन्न एवं समस्त प्रजाओं के स्वामी हम लोगों का राज्य दो प्रकार का है. समस्त देव हमारे हैं, जैसे कि सारी प्रजा हमारी है. रूपवान् एवं समस्त प्रजाओं के धारणकर्त्ता हम लोगों के यज्ञ की सेवा देव करते हैं. हम सबसे श्रेष्ठ हैं. (१) अहं राजा वरुणो मह्यं तान्यसुर्याणि प्रथमा धारयन्त. क्रतुं सचन्ते वरुणस्य देवा राजामि कृष्टेरुपमस्य वव्रेः.. (२) हम ही राजा वरुण हैं. देवगण असुरनाशकारी श्रेष्ठ-बल हमारे लिए ही धारण करते हैं. रूपवान् एवं समस्त प्रजाओं के धारणकर्त्ता हम लोगों के यज्ञ की सेवा देव करते हैं. हम सबसे श्रेष्ठ हैं. (२) अहमिन्द्रो वरुणस्ते महित्वोर्वी गभीरे रजसी सुमेके. त्वष्टेव विश्वा भुवनानि विद्वान्तस्मैरयं रोदसी धारयं च.. (३) हम ही इंद्र और वरुण हैं. महत्ता के कारण विस्तृत, गंभीर एवं सुंदर रूप वाले धरती- आकाश भी हम हैं. विद्वान् हम त्वष्टा के समान समस्त प्राणियों को प्रेरणा देते हैं एवं धरती- आकाश को धारण करते हैं. (३) अहमपो अपिन्वमुक्षमाणा धारयं दिवं सदन ऋतस्य. ऋतेन पुत्रो अदितेर्ऋतावोत त्रिधातु प्रथयद्वि भूम.. (४) सींचने वाले जल को हमने ही बरसाया था एवं जल के स्थान आकाश को धारण किया था. जल के कारण ही हम अदिति-पुत्र अर्थात् यज्ञ के स्वामी बने थे. हमने ही व्याप्त आकाश को तीन भागों में बांटा था. (४) मां नरः स्वश्वा वाजयन्तो मां वृताः समरणे हवन्ते. कृणोम्याजिं मघवाहमिन्द्र इयर्मि रेणुमभिभूत्योजाः.. (५) सुंदर घोड़ों के स्वामी एवं युद्ध के अभिलाषी नेता हमारे ही पीछे चलते हैं एवं युद्धस्थल में एकत्र होकर हमें ही पुकारते हैं. हम ही इंद्र बनकर युद्ध करते हैं एवं शत्रुपराभवकारी बल से युक्त होकर धूल उड़ाते हैं. (५) अहं ता विश्वा चकरं नकिर्मा दैव्यं सहो वरते अप्रतीतम्. यन्मा सोमासो ममदन्यदुक्थोभे भयेते रजसी अपारे.. (६) सब प्रसिद्ध काम हमने ही किए हैं. देवों के न हारने वाले बल से युक्त होने के कारण हमें कोई नहीं रोक सकता. जब सोमरस एवं स्तुतियां हमें मतवाला कर देती हैं, तब विस्तृत धरती-आकाश भी डर जाते हैं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
विदुष्टे विश्वा भुवनानि तस्य ता प्र ब्रवीषि वरुणाय वेधः. त्वं वृत्राणि शृण्विषे जघन्वान्त्वं वृताँ अरिणा इन्द्र सिन्धून्.. (७) हे वरुण! तुम्हारे कामों को सारा संसार जानता है. हे स्तोता! वरुण के निमित्त स्तुति बोलो. हे इंद्र! ऐसा सुना जाता है कि तुमने बैरियों का वध किया था. तुमने ढकी हुई नदियों को प्रवाहित किया था. (७) अस्माकमत्र पितरस्त आसन्सप्त ऋषयो दौर्गहे बध्यमाने. त आयजन्त त्रसदस्युमस्या इन्द्रं न वृत्रतुरमर्धदेवम्.. (८) दुर्गह के पुत्र पुरुकुत्स जब कैद कर लिए गए तो सप्तऋषि हमारे इस राज्य के पालनकर्त्ता बने थे. उन्होंने पुरुकुत्स की पत्नी के कल्याण के लिए यज्ञ करके त्रसदस्यु को पाया था. वह इंद्र के समान शत्रुनाशक एवं आधा देव था. (८) पुरुकुत्सानी हि वामदाशद्धव्येभिरिन्द्रावरुणा नमोभिः. अथा राजानं त्रसदस्युमस्या वृत्रहणं दथुरर्धदेवम्.. (९) हे इंद्र एवं वरुण! सप्तऋषियों की प्रेरणा से पुरुकुत्स की पत्नी ने हव्य एवं स्तुतियों द्वारा तुम्हें प्रसन्न किया था. इसके बाद तुमने उसे शत्रुनाशकारी एवं आधे देव त्रसदस्यु को प्रदान किया था. (९) राया वयं ससवांसो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः. तां धेनुमिन्द्रावरुणा युवं नो विश्वाहा धत्तमनपस्फुरन्तीम्.. (१०) हम तुम दोनों की स्तुति करके धन द्वारा प्रसन्न हों. देवगण हव्य द्वारा एवं गाएं घास से संतुष्ट हों. हे इंद्र एवं वरुण! विश्व का नाश करने वाले तुम दोनों हमें हिंसारहित धन दो. (१०) सूक्त—४३ देवता—अश्विनीकुमार क उ श्रवत्कतमो यज्ञियानां वन्दारु देवः कतमो जुषाते. कस्वेमां देवीममृतेषु प्रेष्ठां हृदि श्रेषाम सुष्टुतिं सुहव्याम्.. (१) यज्ञ के योग्य देवों में कौन देव इस स्तुति को सुनेगा? कौन वंदनशील देव इसे स्वीकार करेगा? हम इस अतिशय प्रिय, द्युतियुक्त, शोभन-अन्न से युक्त, इस उत्तम स्तुति को किस देव के हृदय में स्थान दिलाएं? (१) को मृळाति कतम आगमिष्ठो देवानामु कतमः शम्भविष्ठः. रथं कमाहुर्द्रवदश्वमाशुं यं सूर्यस्य दुहितावृणीत.. (२) हमें कौन सा देवता सुखी करेगा? कौन देवता हमारे यज्ञ में सबसे पहले आएगा? देवों ebook converter DEMO Watermarks*
के मध्य कौन सा देव हमारा अधिक कल्याण करेगा? शीघ्र दौड़ने वाला रथ कौन सा है, जिसने सूर्य की पुत्री का वरण पाया है? तात्पर्य यह है कि उक्त गुण केवल अश्विनीकुमारों में ही हैं। (२) मक्षू हि ष्मा गच्छथ ईवतो द्यूनिन्द्रो न शक्तिं परितक्म्यायाम्. दिव आजाता दिव्या सुपर्णा कया शचीनां भवथः शचिष्ठा.. (३) रात्रि बीतने पर इंद्र अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों उसी प्रकार गतिशील होकर सोम निचोड़ने वाले दिवसों में शीघ्र आओ. स्वर्ग से आए हुए, दिव्य गुणयुक्त एवं शोभन गति वाले तुम दोनों के कर्मों में कौन सा कर्म श्रेष्ठ है? (३) का वां भूदुपमातिः कया न आश्विना गमथो हूयमाना. को वां महश्चित्यजसो अभीक उरुष्यतं माध्वी दसा न ऊती.. (४) कौन सी स्तुति तुम दोनों के गुणों की सीमा हो सकती है? हे अश्विनीकुमारो! किस स्तुति द्वारा बुलाए जाने पर तुम दोनों हमारे पास आओगे? तुम्हारे महान् क्रोध को समीप में कौन सह सकता है? हे जल निर्माता एवं शत्रुनाशकारी अश्विनीकुमारो! हमारी रक्षा करो. (४) उरु वां रथः परि नक्षति द्यामा यत्समुद्रादभि वर्तते वाम्. मध्वा माध्वी मधु वां पृषायन्त्सीं वां पृक्षो भुरजन्त पक्वाः.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों का रथ स्वर्गलोक के चारों ओर भली प्रकार चलता है एवं समुद्र से तुम्हारे पास आता है. हे जल-निर्माता एवं शत्रुविनाशक अश्विनीकुमारो! अध्वर्यु लोग मधुर दूध के साथ सोमरस मिलाते हुए भुने हुए जौ लेकर उपस्थित हैं. (५) सिन्धुर्ह वां रसया सिञ्चदश्वान्घृणा वयोऽरुषासः परि ग्मन्. तदू षु वामजिरं चेति यानं येन पती भवथः सूर्यायाः.. (६) बादल ने अपने जल से तुम दोनों के घोड़ों को भिगोया था. तुम्हारे दीप्तियुक्त घोड़े पक्षियों के समान तेज चलते हैं. तुम्हारा वह रथ भली प्रकार प्रसिद्ध है, जिस पर तुम सूर्यपुत्री को बैठाकर लाए थे. (६) इहेह यद्वां समना पपृक्षे सेयमस्मे सुमतिर्वाजरत्ना. उरुष्यतं जरितारं युवं ह श्रितः कामो नासत्या युवद्रिक्.. (७) हे समान मन वाले अश्विनीकुमारो! हम जो स्तुति तुम्हारे समीप भेजते हैं, वह हमारे लिए फल देने वाली हो. हे सुंदर अन्न वाले अश्विनीकुमारो! तुम स्तुति करने वाले की रक्षा करो. हे नासत्यो! हमारी कामना तुम्हारे ही आश्रित है. (७) सूक्त—४४ देवता—अश्विनीकुमार ebook converter DEMO Watermarks*
तं वां रथं वयमद्या हुवेम पृथुज्रयम्श्विना सङ्गतिं गोः. यः सूर्या वहति वन्धुरायुर्र्गिर्वाहसं पुरुतमं वसूयुम्.. (१) हे अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारे शीघ्र चलने वाले एवं गायों से मिलाने वाले रथ को पुकारते हैं. वह रथ सूर्यकन्या को धारण करने वाला, बैठने के निमित्त काष्ठ आसन से युक्त, स्तुतियां प्राप्त करने वाला एवं अधिक संपत्ति युक्त है. (१) युवं श्रियमश्विना देवता तां दिवो नपाता वनथः शचीभिः. युवोर्र्वपुरभि पृक्षः सचन्ते वहन्ति यत्ककुहासो रथे वाम्.. (२) हे स्वर्गपुत्र अश्विनीकुमारो! तुम दोनों देव अपने कर्मों द्वारा प्रसिद्ध शोभा प्राप्त करते हो. जब महान् अश्व तुम्हें रथ में ढोते हैं, तब सोमरस तुम्हारे शरीर को प्राप्त करता है. (२) को वामद्या करते रातहव्य ऊतये वा सुतपेयाय वार्कैः. ऋतस्य वा वनुषे पूर्य्याय नमो येमानो अश्विना ववर्त्तत्.. (३) आज सोम देने वाला कौन सा यजमान अपनी रक्षा, सोमरसपान अथवा यज्ञ की पूर्ति के लिए स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करता है? हे अश्विनीकुमारो! नमस्कार करने वाला कौन व्यक्ति तुम्हें अपने यज्ञ की ओर खींचता है? (३) हिरण्ययेन पुरुभू रथेनेमं यज्ञं नासत्योप यातम्. पिबाथ इन्मधुनः सोम्यस्य दधथो रत्नं विधते जनाय.. (४) हे अनेक रूपधारी अश्विनीकुमारो! तुम दोनों अपने स्वर्णनिर्मित रथ द्वारा इस यज्ञ में आओ, मधुर सोमरस पिओ एवं सेवा करने वाले यजमान को रमणीय धन दो. (४) आ नो यातं दिवो अच्छा पृथिव्या हिरण्ययेन सुवृता रथेन. मा वामन्ये नि यमन्देवयन्तः सं यद्ददे नाभिः पूर्व्या वाम्.. (५) तुम दोनों स्वर्णनिर्मित एवं भलीप्रकार घूमने वाले रथ द्वारा स्वर्ग से हमारे पास आते हो. तुम्हारी अभिलाषा करने वाले अन्य यजमान तुम्हें रोक न लें, इसीलिए हमने पहले तुम्हारी स्तुति कर ली है. (५) नू नो रयिं पुरुवीरं बृहन्तं दसा मिमाथामुभयेष्वस्मे. नरो यद्वामश्विना स्तोममावन्सधस्तुतिमाजमीळहासो अगमन्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम अनेक पुत्र-पौत्रों से युक्त महान् धन शीघ्र दो. पुरुमीढ के ऋत्विजों ने तुम्हारी स्तुति की है और अजमीढ के ऋत्विजों ने उसका साथ दिया है. (६) इहेह यद्वां समना पपृक्षे सेयमस्मे सुमतिर्वाजरत्ना. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—४५ देवता—अश्विनीकुमार
उरुष्यतं जरितारं युवं ह श्रितः कामो नासत्या युवद्रिक्.. (७) हे समान मन वाले अश्विनीकुमारो! हम जो स्तुति तुम्हारे समीप भेजते हैं, वह हमारे लिए फल देने वाली हो. हे सुंदर अन्न वाले अश्विनीकुमारो! तुम स्तुति करने वाले की रक्षा करो. हे नासत्यो! हमारी कामना तुम्हारे ही आश्रित है. (७) सूक्त—४५ देवता—अश्विनीकुमार एष स्य भानुरुदियर्ति युज्यते रथः परिज्मा दिवो अस्य सानवि. पृक्षासो अस्मिन्मिथुना अधि त्रयो दृतिस्तुरीयो मधुनो वि रपशते.. (१) यह सूर्य उदय होता है. तुम दोनों का रथ सभी ओर चलता है एवं चमकते हुए सूर्य के साथ ऊंचे स्थान में पहुंचता है. इस रथ के ऊपरी भाग में तीन प्रकार का अन्न मिला हुआ है तथा चौथी संख्या सोमरस से भरे हुए चमड़े के पात्र की है. (१) उद्वां पृक्षासो मधुमन्त ईरते रथा अश्वास उषसो व्युष्टिषु. अपोर्णुवन्तस्तम आ परीवृतं स्वर्णा शुक्लं तन्वन्त आ रजः.. (२) तीन प्रकार के अन्न से युक्त, सोमरस-सहित एवं घोड़ों वाला तुम्हारा रथ उषा के आरंभकाल में ही चारों ओर फैले हुए अंधकार को नष्ट करता हुआ एवं सूर्य के समान तेज को फैलाता हुआ सामने की ओर जाता है. (२) मध्वः पिबतं मधुपेभिरासभिरुत प्रियं मधुने युञ्जाथां रथम्. आ वर्तनिं मधुना जिन्वथस्पथो दृतिं वहेथे मधुमन्तमश्विना.. (३) तुम सोम पीने वाले मुखों से सोम पिओ. सोम पाने के लिए तुम अपना प्रिय रथ अश्वयुक्त करके यजमान के घर तक लाओ. हे अश्विनीकुमारो! तुम सोमरसपूर्ण चमड़े का पात्र धारण करके अपने मार्ग सोमरस द्वारा प्रसन्नतापूर्ण बनाओ. (३) हंसासो ये वां मधुमन्तो अस्रिधो हिरण्यपर्णा उहुव उषर्बुधः. उदप्रुतो मन्दिनो मन्दिनिस्पृशो मध्वो न मक्षः सवनानि गच्छथः.. (४) तुम्हारे पास मार्ग में शीघ्र चलने वाले, माधुर्ययुक्त, द्रोह न करने वाले, सुनहरे रंग के पंखों से युक्त, ढोने वाले, प्रातःकाल में जागने वाले, जल फैलाने वाले, प्रसन्नतादाता एवं सोम का स्पर्श करने वाले घोड़े हैं. उन घोड़ों द्वारा तुम हमारे यज्ञों में उसी प्रकार आओ, जिस प्रकार शहद की मक्खी शहद के पास जाती है. (४) स्वध्वरासो मधुमन्तो अग्नय उस्रा जरन्ते प्रति वस्तोरश्विना. यन्निहस्तस्तरणिर्विचक्षणः सोमं सुषाव मधुमन्तमद्रिभिः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
मंत्रयुक्त जल से हाथ धोने वाले, यज्ञकर्म के पूरक एवं सभी बातों को देखने वाले अध्वर्यु पत्थरों की सहायता से जब सोमरस निचोड़ते हैं, तब उत्तम यज्ञ के साधन एवं सोमयुक्त गार्हपत्य आदि अग्नि एक साथ रहने वाले अश्विनीकुमारों की प्रतिदिन स्तुति करते हैं. (५) आकेनिपासो अहभिर्द्विध्वतः स्वर्ष्ण शुक्रं तन्वतः आ रजः. सूरश्चिदश्वान्युयुजान ईयते विश्वाँ अनु स्वधया चेतथस्पथः.. (६) किरणें दिवस के द्वारा अंधकार को नष्ट करती हुई सूर्य के समान उज्ज्वल तेज का विस्तार करती हैं. हे अश्विनीकुमारो! सूर्य अपने रथ में घोड़े जोड़कर चलते हैं. तुम दोनों सोमरस लेकर चलते हुए उनका रास्ता बताओ. (६) प्र वामवोचमश्विना धियन्धा रथः स्वश्वो अजरो यो अस्ति. येन सद्यः परि रजांसि याथो हविष्मन्तं तरिणं भोजमच्छ.. (७) हे अश्विनीकुमारो! यज्ञकर्म करने वाले हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम्हारा रथ शोभन अश्वों वाला एवं नित्य तरुण है. उसके द्वारा तुम तुरंत तीनों लोकों में घूम आते हो. उसीसे तुम हमारे हव्ययुक्त, शीघ्रगामी एवं भोजयुक्त यज्ञ में आओ. (७) सूक्त—४६ देवता—वायु एवं इंद्र अग्रं पिबा मधूनां सुतं वायो दिविष्टिषु. त्वं हि पूर्वपा असि.. (१) हे वायु! स्वर्ग प्राप्त कराने वाले यज्ञों में तुम सबसे पहले निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. तुम सबसे पहले सोम पीने वाले हो. (१) शतेना नो अभिष्टिभिर्नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः. वायो सुतस्य तृम्पतम्.. (२) हे वायु! तुम नियुत अर्थात् लोककल्याण वाले हो एवं इंद्र तुम्हारे सारथि हैं. तुम अगणित अभिलाषाएं पूर्ण करने हेतु आओ एवं निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (२) आ वां सहस्रं हरय इन्द्रवायू अभि प्रयः. वहन्तु सोमपीतये.. (३) हे इंद्र एवं वायु! सोमरस पीने के लिए हजारों घोड़े तुम्हें यहां लावें. (३) रथं हिरण्यवन्धुरमिन्द्रवायू स्वध्वरम्. आ हि स्थाथो दिविस्पृशम्.. (४) हे इंद्र एवं वायु! तुम स्वर्णनिर्मित आसन वाले, शोभन-यज्ञ-युक्त एवं स्वर्ग को छूने वाले रथ पर बैठो. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
रथेन पृथुपाजसा दाश्वांसमुप गच्छतम्. इन्द्रवायू इहा गतम्.. (५) हे इंद्र एवं वायु! तुम अधिक शक्तिशाली रथ द्वारा हव्य देने वाले यजमान के समीप पहुंचने के लिए इस यज्ञ में आओ. (५) इन्द्रवायू अयं सुतस्तं देवेभिः सजोषासा. पिबतं दाशुषो गृहे.. (६) हे इंद्र और वायु! तुम दोनों अन्य देवों के साथ मैत्रीपूर्ण बनकर हव्य देने वाले यजमान के घर में इस सोम को पिओ. (६) इह प्रयाणमस्तु वामिन्द्रवायू विमोचनम्. इह वां सोमपीतये.. (७) हे इंद्र और वायु! तुम यहां आओ और सोमरस पीने के लिए यहां अपने घोड़े रथ से अलग करो. (७) सूक्त—४७ देवता—इंद्र, वायु वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु. आ याहि सोमपीतये स्पार्हो देव नियुत्वता.. (१) हे वायु! मैं व्रतचर्यादि द्वारा पवित्र होकर सबसे पहले तुम्हारे निमित्त मधुर सोमरस लाता हूं, क्योंकि मैं स्वर्ग में जाना चाहता हूं. हे अभिषवणीय देव! तुम अपने अश्वों द्वारा सोमपान के लिए यहां आओ. (१) इन्द्रश्च वायवेषां सोमानां पीतिमर्हथः. युवां हि यन्तीन्दवो निम्नमापो न सध्र्यक्.. (२) हे वायु! तुम और इंद्र इन सोमों को पीने की योग्यता रखते हो. इस तरह सोम तुम दोनों के पास जाते हैं, जैसे जल नीचे स्थान की ओर चलता है. (२) वायविन्द्रश्च शुष्मिणा सरथं शवसस्पती. नियुत्वन्ता न ऊतय आ यातं सोमपीतये.. (३) हे वायु! तुम और इंद्र बल के स्वामी हो एवं घोड़ों से युक्त एक ही रथ पर चढ़ते हो. हम लोगों की रक्षा एवं सोमपान करने के लिए यहां आओ. (३) या वां सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा. अस्मे ता यज्ञवाहसेन्द्रवायू नि यच्छतम्.. (४) हे नेता एवं यज्ञपूर्णकर्त्ता इंद्र व वायु! तुम्हारे पास बहुतों द्वारा अभिलषित अश्व हैं, उन्हें ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—४८ देवता—वायु
हम हव्यदाताओं को दे दो. (४) सूक्त—४८ देवता—वायु विहि होत्रा अवीता विपो न रायो अर्यः. वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (१) हे वायु! तुम शत्रुओं को भयकंपित करने वाले राजाओं के समान दूसरों द्वारा बिना पिया हुआ सोम सबसे पहले पिओ एवं स्तुतिकर्त्ता को धनसंपन्न करो. हे वायु! तुम सोमरस पीने के लिए प्रसन्नतादायक रथ द्वारा आओ. (१) निर्यूवाणो अशस्तीर्नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः. वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (२) हे वायु! तुम सभी प्रशंसाओं से युक्त, घोड़ों के स्वामी एवं इंद्र के सहायक बनकर अपने अन्नदाता रथ द्वारा सोम पीने हेतु आओ. (२) अनु कृष्णे वसुधिती येमाते विश्वपेशसा. वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (३) हे वायु! काले रंग वाले, धनों को धारण करने वाले एवं विश्वयुक्त धरती-आकाश तुम्हारे पीछे चलते हैं. तुम आनंददायक रथ द्वारा सोम पीने हेतु आओ. (३) वहन्तु त्वा मनोजुजो युक्तासो नवतिर्नव. वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (४) हे वायु! मन के समान तीव्र गति वाले एवं एक-दूसरे से मिलकर चलने वाले निन्यानवे घोड़े तुम्हें लाते हैं. हे वायु! तुम अपने आनंदप्रद रथ द्वारा सोम पीने के लिए आओ. (४) वायो शतं हरीणां युवस्व पोष्याणाम्. उत वा ते सहस्रिणो रथ आ यातु पाजसा.. (५) हे वायु! तुम सौ स्वस्थ अश्वों को अपने रथ में जोड़ो अथवा हजार को. उनसे युक्त तुम्हारा रथ शीघ्रता से आवे. (५) सूक्त—४९ देवता—इंद्र, बृहस्पति इदं वामास्ये हविः प्रियमिन्द्राबृहस्पती. उक्थं मदश्च शस्यते.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र एवं बृहस्पति! तुम दोनों के मुख में सोम रूप हवि डालने के साथ-साथ तुम्हें आनंद देने वाली स्तुतियां भी बोली जा रही हैं. (१) अयं वां परि षिच्यते सोम इन्द्राबृहस्पती. चारुर्मदाय पीतये.. (२) हे इंद्र एवं बृहस्पति! यह सोमरस पीने के निमित्त एवं तुम्हें प्रसन्नता देने के लक्ष्य से तुम्हारे मुंह में डाला जाता है. (२) आ न इन्द्राबृहस्पती गृहमिन्द्रश्च गच्छतम्. सोमपा सोमपीतये.. (३) हे सोमपानकर्त्ता इंद्र एवं बृहस्पति! तुम दोनों सोमरस पीने के लिए हमारे घर आओ. (३) अस्मे इन्द्राबृहस्पती रयिं धत्तं शतग्विनम्. अश्वावन्तं सहस्रिणम्.. (४) हे इंद्र एवं बृहस्पति! हमें सौ गायों एवं हजार घोड़ों से युक्त धन दान करो. (४) इन्द्राबृहस्पती वयं सुते गीर्भिर्हवामहे. अस्य सोमस्य पीतये.. (५) हे इंद्र एवं बृहस्पति! हम सोम निचूड़ जाने पर सोमरस पीने के लिए स्तुतियों द्वारा तुम दोनों को बुलाते हैं. (५) सोममिन्द्राबृहस्पती पिबतं दाशुषो गृहे. मादयेथां तदोकसा.. (६) हे इंद्र एवं बृहस्पति! तुम हव्य देने वाले यजमान के घर में सोम पिओ एवं वहीं निवास करके प्रसन्न बनो. (६) सूक्त—५० देवता—बृहस्पति आदि यस्तस्तम्भ सहसा वि ज्मो अन्तान्बृहस्पतिस्त्रिषधस्थो रवेण. तं प्रत्नास ऋषयो दीध्यानाः पुरो विप्रा दधिरे मन्द्रजिह्वम्.. (१) यज्ञ का पालन करने वाले एवं शब्द के द्वारा तीनों स्थानों में वर्तमान बृहस्पति ने अपनी शक्ति द्वारा दसों दिशाओं को स्थिर किया है. प्रसन्नतादायक जीभ वाले बृहस्पतियों को प्राचीन ऋषियों एवं मेधावियों ने सबसे आगे स्थापित किया था. (१) धुनेतयः सुप्रकेतं मदन्तो बृहस्पते अभि ये नस्ततस्रे. पृषन्तं सृप्रमदब्धमूर्वं बृहस्पते रक्षतादस्य योनिम्.. (२) हे शोभन बुद्धि वाले बृहस्पति! तुम उन ऋत्विजों के लिए फलदाता, उन्नति करने वाले एवं अहिंसक बनकर उनके विशाल यज्ञ की रक्षा करते हो जो तुम्हें प्रसन्न करते हैं, तुम्हारी ebook converter DEMO Watermarks*
स्तुति करते हैं एवं जिनके चलने से शत्रु कांप उठते हैं. (२) बृहस्पते या परमा परावदत आ ऋतस्पृशो नि षेदुः. तुभ्यं खाता अवता अद्रिदुग्धा मध्वः श्चोतन्त्यभितो विरप्शम्.. (३) हे बृहस्पति! तुम्हारे यज्ञ में आने वाले अश्व परम उच्च स्थान स्वर्ग से आते हैं. जिस प्रकार खोदे हुए कुएं में चारों ओर से धाराएं निकलती हैं, उसी प्रकार पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए सोमरस स्तुतियों के साथ तुम्हें गीला बनावें. (३) बृहस्पतिः प्रथमं जायमानो महो ज्योतिषः परमे व्योमन्. सप्तास्यस्तुविजातो रवेण वि सप्तरश्मिरधमत्तमांसि.. (४) बृहस्पति महान् दीप्तिशाली सूर्य के विशाल आकाश में जब पहली बार उत्पन्न हुए थे, तब उन्होंने सात मुख वाला, अनेक प्रकार का रूप धारण करके, शब्दयुक्त एवं गतिशील तेज से एकाकार होकर अंधकार का नाश किया था. (४) स सुष्टुभा स ऋक्वता गणेन वलं रुरोज फलिगं रवेण. बृहस्पतिरुस्रिया हव्यसूदः कनिक्रदद्वावशतीरुदाजत्.. (५) बृहस्पति ने शोभन स्तुति करने वाले एवं दीप्तिसंपन्न अंगिराओं के साथ मिलकर शब्द करते हुए बल नामक असुर को नष्ट किया था एवं शब्द करते हुए ही हव्य की प्रेरणा करने वाली रंभाती हुई गायों को बाहर निकाला था. (५) एवा पित्रे विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः. बृहस्पते सुप्राजा वीरवन्तो यं स्याम पतयो रयीणाम्.. (६) हम लोग इसी तरह पालक, सब देवों के प्रतिनिधि एवं कामवर्षी बृहस्पति की सेवा हव्य, यज्ञों एवं स्तुतियों द्वारा करेंगे. हे बृहस्पति! इस प्रकार हम उत्तम संतान एवं वीर सैनिकों सहित धन के स्वामी हो सकेंगे. (६) स इद्राजा प्रतिजन्यानि विश्वा शुष्मेण तस्थावभि वीर्येण. बृहस्पतिं यः सुभृतं बिभर्ति वल्गूयति वन्दते पूर्वभाजम्.. (७) वही राजा अपनी शक्ति के द्वारा सभी शत्रुओं के बल को हराता है जो बृहस्पति का भली प्रकार भरण-पोषण करता है और सर्वप्रथम भाग पाने वाले के रूप में उनकी स्तुति करता है. (७) स इत्क्षेति सुधित ओकसि स्वे तस्मा इळा पिन्वते विश्वदानीम्. तस्मै विशः स्वयमेवा नमन्ते यस्मिन्ब्रह्मा राजनि पूर्व एति.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
वही राजा भली प्रकार तृप्त होकर अपने घर में रहता है, धरती उसे सभी कालों में फलों से बढ़ाती है एवं प्रजाएं अपने आप उसके सामने झुकी रहती हैं, जिस राजा के समीप ब्रह्मा सबसे पहले जाते हैं. (८) अप्रतीतो जयति सं धनानि प्रतिजन्यान्युत या सजन्या. अवस्यवे यो वरिवः कृणोति ब्रह्मणे राजा तमवन्ति देवाः.. (९) वह राजा बाधा के बिना शत्रुओं एवं अपनी प्रजाओं के धन पर अधिकार करके महान् बनता है एवं देव उसी की रक्षा करते हैं, जो धनहीन एवं रक्षा के इच्छुक ब्राह्मण को धन देता है. (९) इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पतेऽस्मिन्यज्ञे मन्दसाना वृषण्वसू. आ वां विशन्त्विन्दवः स्वाभुवोऽस्मे रयिं सर्ववीरं नि यच्छतम्.. (१०) हे बृहस्पति! तुम और इंद्र इस यज्ञ में प्रसन्न होकर यजमानों को धन दो एवं सोमरस पिओ. संपूर्ण शरीर को व्याप्त करने में समर्थ सोम तुम्हारे शरीर में प्रवेश करे. तुम हमें पुत्र- पौत्र युक्त धन प्रदान करो. (१०) बृहस्पत इन्द्र वर्धतं नः सचा सा वां सुमतिर्भूत्वस्मे. अविष्टं धियो जिगृतं पुरन्धीर्जस्तमर्यो वनुषामरातीः.. (११) हे बृहस्पति और इंद्र! तुम हमें बढ़ाओ. हमारे प्रति तुम्हारी दया भावना एक ही साथ हो. तुम हमारे यज्ञकर्म की रक्षा करो, हमारी बुद्धियों को जगाओ एवं हम यजमानों के शत्रुओं से युद्ध करो. (११) सूक्त—५१ देवता—उषा इदमु त्यत्पुरुतमं पुरस्ताज्ज्योतिस्तमसो वयुनावदस्थात्. नूनं दिवो दुहितरो विभातीर्गातुं कृणवन्नुषसो जनाय.. (१) यह हमारे द्वारा स्तुति किया गया, सर्वप्रसिद्ध, परम विस्तृत एवं कांतियुक्त तेज पूर्व दिशा में अंधकार से उदित हुआ था. निश्चय ही सूर्य की पुत्रीरूप एवं दीप्तिशालिनी उषाएं यजमानों को गतिशील बनाने की सामर्थ्य रखती थीं. (१) अस्थुरु चित्रा उषसः पुरस्तान्मिता इव स्वरवोऽध्वरेषु. व्यु व्रजस्य तमसो द्वारोच्छन्तीरव्रञ्छुचयः पावकाः.. (२) यज्ञों में गाड़े गए खंभों के समान सुंदर एवं रंग-बिरंगी उषाएं पूर्व दिशा को घेरकर स्थित होती हैं. उषाएं बाधा डालने वाले अंधकार का द्वार खोलती हुई दीप्तियुक्त एवं पवित्र बनकर ebook converter DEMO Watermarks*
चमकती हैं. (३) उच्चन्तीरद्य चितयन्त भोजानाधोदेयायोषसो मघोनीः. अचित्रे अन्तः पणयः ससन्त्वबुध्यमानास्तमसो विमध्ये.. (३) आज अंधकार का नाश करती हुईं एवं धन की स्वामिनी उषाएं भोजन देने वाले यजमानों को सोमरस आदि दान करने के हेतु उत्साहित करती हैं. चेतनारहित गाढ़े अंधकार में दान न देने वाले पणि लोग चेतनारहित होकर पड़े रहे. (३) कुवित्स देवीः सनयो नवो वा यामो बभूयादुषसो वो अद्य. येना नवग्वे अङ्गिरे दशग्वे सप्तास्ये रेवती रेवदूष.. (४) हे प्रकाशयुक्त एवं धनशालिनी उषाओ! तुम्हारा वही पुराना या नया रथ आज यज्ञ में अनेक बार आवे, जिस रथ के द्वारा तुमने सात छंदरूप मुख वाले, नौ गायों अथवा दस गायों वाले अंगिरावंशीय ऋषियों को दीप्त किया था. (४) यूयं हि देवीर्ऋतयुग्भिरश्वैः परिप्रयाथ भुवनानि सद्यः. प्रबोधयन्तीरुषसः ससन्तं द्विपाच्चतुष्पाच्चरथाय जीवम्.. (५) दे दीप्तियुक्त उषाओ! तुम सोते हुए मनुष्य एवं पशुरूप जीवों को गमन के लिए जगाती हुई यज्ञ में जाने वाले घोड़ों की सहायता से सारे विश्व का तुरंत भ्रमण कर लो. (५) क्व स्विदासाम् कतमा पुराणी यया विधाना विदधुर्ऋभूणाम्. शुभं यच्छुभ्रा उषसश्चरन्ति न वि ज्ञायन्ते सदृशीरजुर्याः.. (६) वे प्राचीन उषाएं कहां हैं, जिनके लिए ऋभुओं ने चमस बनाने का काम किया था? जब तेजोविशिष्ट उषाएं प्रकाश फैलाती हैं, तब एक समान होने के कारण वे नई या पुरानी नहीं जान पड़तीं. (६) ता घा ता भद्रा उषसः पुरासुरभिष्टिद्युम्ना ऋतजातसत्याः. यास्वीजानः शशमान उक्थैः स्तुवञ्छंसन्द्रविणं सद्य आप.. (७) अपने आगमन मात्र से धन देने वाली, यज्ञ के निमित्त एवं सत्व फल देने वाली उषाएं कल्याणकारीरूप में पहले उत्पन्न हुई थीं। यज्ञ करने वाले मंत्रों द्वारा उन उषाओं की स्तुतियां करके एवं छंदों द्वारा प्रशंसा करके तुरंत धन लाभ करते थे. (७) ता आ चरन्ति समना पुरस्तात्समानतः समना पप्रथानाः. ऋतस्य देवीः सदसो बुधाना गवां न सर्गा उषसो जरन्ते.. (८) सर्वत्र समान एवं प्रसिद्ध उषाएं पूर्व दिशा में केवल आकाश से सब जगह घूमती हैं एवं ebook converter DEMO Watermarks*
यज्ञशाला को ज्ञान का विषय बनाती हुईं जल उत्पन्न करने वाली किरणों के सामन प्रशंसापात्र बनती हैं. (८) ता इन्न्वे३व समना समानीरमीतवर्णा उषसश्चरन्ति. गूहन्तीरभ्वमसितं रुशद्भिः शुक्लास्तनूभिः शुचयो रुचानाः.. (९) वे एक रूप वाली, समान व अनगिनत रंगों से युक्त उषाएं अपने दीप्तिशाली शरीर द्वारा प्रकाश फैलाती हुई एवं अपनी किरणों से महान् अंधकार का नाश करती हुई विचरण करती हैं. (९) रयिं दिवो दुहितरो विभातीः प्रजावन्तं यच्छतास्मासु देवीः. स्योनादा वः प्रतिबुध्यमानाः सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (१०) हे तेजस्वी सूर्य की पुत्रियो एवं दीप्तिशाली उषाओ! तुम हमें पुत्र-पौत्रादि से युक्त धन दो. हम सुख प्राप्ति के कारण तुम्हें जगा रहे हैं. इस प्रकार हम पुत्र-पौत्र युक्त धन के स्वामी होंगे. (१०) तद्वो दिवो दुहितरो विभातीरुप ब्रुव उषसो यज्ञकेतुः. वयं स्याम यशसो जनेषु तद्द्यौश्च धत्तां पृथिवी च देवी.. (११) हे तेजस्वी सूर्य की पुत्री रूपी उषाओ! हम यज्ञ के ज्ञापक रूप में तुमसे प्रार्थना कर रहे हैं कि हम सब लोगों के मध्य में यश और अन्न के स्वामी बनें. स्वर्ग एवं दीप्तिपूर्ण धरती हमारा वह यश धारण करे. (११) सूक्त—५२ देवता—उषा प्रति ष्या सूनरी जनी व्युच्छन्ती परि स्वसुः. दिवो अदर्शि दुहिता.. (१) भली प्रकार स्तुत, प्राणियों की कुशल नेत्री एवं उत्तम फलों को जन्म देने वाली सूर्यपुत्री उषा दिखाई देती है एवं रात बीतने पर अंधेरे का नाश करती है. (१) अश्वेव चित्रारुषी माता गवामृतावरी. सखाभूदश्विनोरुषाः.. (२) घोड़े के समान सुंदर, दीप्तिशालिनी, किरणों की माता एवं यज्ञ की स्वामिनी उषा अश्विनीकुमारों के साथ स्तुत हो. (२) उत सखास्यश्विनोरुत माता गवामसि. उतोषो वस्व ईशिषे.. (३) हे उषा! तुम अश्विनीकुमारों की सखा, किरणों की माता एवं धन की स्वामिनी हो. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
यावयद् द्वेषसं त्वा चिकित्त्वत्सूनृतावरि. प्रति स्तोमैरभुत्स्महि.. (४) हे सत्य वचन वाली एवं शत्रुओं को दूर भगाने वाली उषा! हम स्तुतियों द्वारा तुझ ज्ञान कराने वाली को जगाते हैं. (४) प्रति भद्रा अदृक्षत गवां सर्गा न रश्मय:. ओषा अप्रा उरु ज्रय:.. (५) प्रशंसा के योग्य किरणें दिखाई देती हैं. उषा ने संसार को वर्षा की धारा के समान तेज से भर दिया है. (५) आपप्रुषी विभावरि व्यावर्ज्योतिषा तम:. उषो अनु स्वधामव.. (६) हे कांतिशालिनी उषा! तुम जगत् को तेज से पूर्ण करती हुई अंधकार को दूर भगाओ. इसके पश्चात् हविरूपी अन्न की रक्षा करो. (६) आ द्यां तनोषि रश्मिभिरान्तरिक्षनमुरु प्रियम्. उष: शुक्रेण शोचिषा.. (७) हे उषा! तुम दीप्त आकाश से युक्त होकर किरणों द्वारा स्वर्ग एवं प्रिय अंतरिक्ष को व्याप्त करो. (७) सूक्त—५३ देवता—सविता तद्देवस्य सवितुर्वार्थ महद्वृणीमहे असुरस्य प्रचेतस:. छर्दिर्येन दाशुषे यच्छति त्मना तन्नो महाँ उदयान्देवो अक्तुभि:.. (१) हम बलशाली एवं उत्तम बुद्धि वाले सविता देव के उस वरणीय एवं पूज्य धन की प्रार्थना करते हैं, जिस धन को वे हव्य देने वाले यजमान को अपने आप देते हैं. महान् सविता वह धन हमें प्रदान करें. (१) दिवो धर्त्ता भुवनस्य प्रजापति: पिशङ्गं द्रापिं प्रति मुञ्चते कवि:. विचक्षण: प्रथयन्नापृणन्वूर्वजीजनत्सविता सुन्ममुक्थ्यम्.. (२) स्वर्ग एवं अन्य सब लोकों को धारण करने वाले, प्रजाओं का पालन करने वाले एवं कवि सविता देव पीले रंग का कवच पहनते हैं. अनेक प्रकार से देखने वाले सविता प्रसिद्ध होकर भी जगत् को तेज से भरते हुए चलते हैं एवं प्रशंसा के योग्य सुख उत्पन्न करते हैं. (२) आप्रा रजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्लोकं देव: कृणुते स्वाय धर्मणे. प्र बाहू अस्स्राक्सविता सवीमनि निवेशयन्प्रसुवन्नक्तुभिर्जगत्.. (३) सविता देव अपने तेज द्वारा पृथ्वीलोक एवं स्वर्गलोक को पूर्ण करते हुए अपने धारण eBook converter DEMO Watermarks*
कर्म की प्रशंसा करते हैं. वे अनुज्ञा रूप में भुजाएं फैलाते हैं एवं अपने प्रकाश से प्रतिदिन जगत् को अपने काम में लगाते हैं. (३) अदाभ्यो भुवनानि प्रचाकशद् व्रतानि देवः सविताभि रक्षते. प्रास्राग्बाहू भुवनस्य प्रजाभ्यो धृतव्रतो महो अज्मस्य राजति.. (४) सविता देव अन्य प्राणियों से पराजित न होते हुए सब लोकों को प्रकाशित करते हैं एवं सभी प्राणियों के व्रत की रक्षा करते हैं. वे विश्व की प्रजाओं के कल्याण के निमित्त अपनी भुजाओं को फैलाते हैं एवं व्रत धारण करने वाले इस महान् विश्व के स्वामी हैं. (४) त्रिरन्तरिक्षं सविता महित्वना त्री रजांसि परिभूस्त्रीणि रोचना. तिस्रो दिवः पृथिवीस्तिस्र इन्वति त्रिभिर्व्रतैरभि नो रक्षति त्मना.. (५) सविता देव अपने महत्त्व द्वारा सबको पराजित करते हुए तीनों अंतरिक्षों, तीनों लोकों एवं तीन तेजस्वी तत्त्वों—अग्नि, वायु और आदित्य, तीन स्वर्गों एवं तीन पृथ्वियों को व्याप्त करते हैं. वे तीन व्रतों द्वारा स्वयं हम सबका पालन करें. (५) बृहत्सुम्नः प्रसवीता निवेशनो जगतः स्थातुरुभयस्य यो वशी. स नो देवः सविता शर्म यच्छत्वस्मे क्षयाय त्रिवरूथमंहसः.. (६) पर्याप्त धन के स्वामी, कर्मों की अनुज्ञा देने वाले, सबके द्वारा गंतव्य एवं स्थावर जंगम दोनों को वश में रखने वाले सविता देव हमारे तीनों लोकों में स्थित पाप के नाश के हेतु हमें कल्याण प्रदान करें. (६) आगन्देव ऋतुभिर्वर्धतु क्षयं दधातु नः सविता सुप्रजामिषम्. स नः क्षपाभिरहभिश्च जिन्वतु प्रजावन्तं रयिमस्मे समिन्वतु.. (७) सविता देव ऋतुओं के साथ आवें, हमारे घरों की वृद्धि करें एवं हमें पुत्र-पौत्र से युक्त अन्न दें. वे रात और दिन हमारे प्रति प्रसन्न रहें एवं हमें पुत्र-पौत्र वाला धन प्रदान करें. (७) सूक्त—५४ देवता—सविता अभूद्देवः सविता वन्द्यो नु न इदानीमह उपवाच्यो नृभिः. वि यो रत्ना भजति मानवेभ्यः श्रेष्ठं नो अत्र द्रविणं यथा दधत्.. (१) उदित हुए सविता देव की हम शीघ्र ही वंदना करेंगे. मनुष्य इस समय अर्थात् प्रातः एवं तृतीय सवन में होतागण सूर्य की स्तुति करें. जो सविता मानवों को रक्त प्रदान करते हैं, वे हमें इस यज्ञ में उत्तम धन दें. (१) देवेभ्यो हि प्रथमं यज्ञियेभ्योऽमृतत्वं सुवसि भागमुत्तमम्.
आदिद्दामानं सवितर्व्यूर्णुषेऽनूचीना जीविता मानुषेभ्यः.. (२) हे सविता देव! तुम सर्वप्रथम यज्ञ के योग्य देवों के लिए अमरता का साधन सोम उत्पन्न करते हो. इसके बाद हव्यदाता यजमान को प्रकाशित करते हो तथा मनुष्यों को पिता, पुत्र व पौत्र के क्रम से जीवन देते हो. (२) अचित्ती यच्चकृमा दैव्ये जने दीनैर्दक्षैः प्रभूती पूरुषत्वता. देवेषु च सविर्तर्मानुषेषु च त्वं नो अत्र सुवतादनागसः.. (३) हे सविता देव! अज्ञान के कारण, दुर्बल अथवा शक्तिशाली लोगों के प्रमाद के कारण, ऐश्वर्य अथवा सेवा संबंधी गर्व के कारण तुम्हारे प्रति ही नहीं, देवों अथवा मनुष्यों के प्रति जो पाप हमने किया है, तुम हमें उस सब पाप से रहित बनाओ. (३) न प्रमिये सवितुर्देव्यस्य तद्यथा विश्वं भुवनं धारयिष्यति. यत्पृथिव्या वरिमन्ना स्वङ्गुरिर्वर्ष्मन्दिवः सुवति सत्यमस्य तत्.. (४) सविता देव का यह काम विरोध के योग्य नहीं है, क्योंकि वे सारे विश्व को धारण करते हैं. सुंदर उंगलियों वाले सविता धरती और आकाश को विस्तृत होने की प्रेरणा देते हैं. (४) इन्द्रज्येष्ठान्बृहद्द्रयः पर्वतेभ्यः क्षयाँ एभ्यः सुवसि पस्त्यावतः. यथायथा पतयन्तो वियेमिर एवैव तस्थुः सवितः सवाय ते.. (५) हे सविता देव! हम लोगों में इंद्र ही पूज्य हैं. तुम हमें पर्वतों से भी अधिक ऊंचा बनाओ एवं इन सब यजमानों को घर वाले निवासस्थान दो. इस प्रकार वे चलते समय तुम्हारे शासन में रहेंगे एवं तुम्हारी आज्ञा मानेंगे. (५) ये ते त्रिरहन्त्सवतः सवासो दिवेदिवे सौभगमासुवन्ति. इन्द्रो द्यावापृथिवी सिन्धुरद्भिरादित्यैर्नो अदितिः शर्म यंसत्.. (६) हे सविता! जो यजमान तुम्हारे निमित्त प्रतिदिन तीन बार सौभाग्यजनक सोमरस निचोड़ते हैं, इंद्र, धरती, आकाश, जलपूर्ण सिंधु एवं आदित्यों के साथ अदिति उस यजमान के साथ-साथ हमें भी धन दें. (६) सूक्त—५५ देवता—विश्वेदेव को वस्त्राता वसवः को वरूता द्यावाभूमी अदिते त्रासीथां नः. सहीयसो वरुण मित्र मर्तात्को वोऽध्वरे वरिवो धाति देवाः.. (१) हे वसुओ! तुम में रक्षा करने वाला कौन है एवं कौन दुःख दूर करने वाला है? हे अखंडनीय धरती आकाश! तुम हमारी रक्षा करो. हे इंद्र एवं ब्रह्म! तुम पराभवकारी लोगों से ebook converter DEMO Watermarks*
हमें बचाओ. हे देवो! तुम में से कौन धन का दान करता है? (१) प्र ये धामानि पूर्व्याण्यर्चान्वि यदुच्छान्वियोतारो अमूराः. विधातारो वि ते दधुरजस्रा ऋतधीतयो रुरुचन्त दस्माः.. (२) जो देव स्तुतिकर्त्ताओं को प्राचीन स्थान देते हैं, जो दुःखों को पृथक् करते हैं, जो मूढ़ताहीन हैं एवं अंधकार का नाश करते हैं, वे ही देव विधाता हैं एवं नित्य हमारी इच्छाएं पूरी करते हैं. सत्यकर्म वाले एवं दर्शनीय वे देव शोभित होते हैं. (२) प्र पस्त्या३मदितिं सिन्धुमर्कैः स्वस्तिमीळे सख्याय देवीम्. उभे यथा नो अहनी निपात उषासानक्ता करतामदब्धे.. (३) हम मित्रता प्राप्त करने के निमित्त सबके द्वारा गंतव्य देवमाता अदिति, सिंधु एवं स्वस्तिदेवी की मंत्रों द्वारा स्तुति करते हैं. धरती-आकाश हमारी भली-भांति रक्षा करें. रात एवं दिन के देव हमारी अभिलाषा पूर्ण करें. (३) व्यर्यमा वरुणश्चेति पन्थामिषस्पतिः सुवितं गातुमग्निः. इन्द्राविष्णू नृवदु षु स्तवाना शर्म नो यन्तममवद्वरूथम्.. (४) अर्यमा एवं वरुण हमारे लिए यज्ञ का मार्ग बताते हैं. हविरूप अन्न के स्वामी अग्नि हमें सुखकर गमन मार्ग दिखाते हैं. इंद्र एवं विष्णु भली प्रकार स्तुतियां सुनकर हमें पुत्र-पौत्रादि युक्त धन एवं शक्तिसंपन्न रमणीय सुख प्रदान करें. (४) आ पर्वतस्य मरुतामवांसि देवस्य त्रातुरव्रि भगस्य. पातपतिर्जन्यादंहसो नो मित्रो मित्रियादुत न उरुष्येत्.. (५) पर्वत, मरुद्गण तथा भग नामक देव से हम रक्षा की प्रार्थना करते हैं. स्वामी वरुण मानव संबंधी पाप से हमारी रक्षा करें. मित्र हमारी रक्षा हमको मित्र समझकर करें. (५) नू रोदसी अहिना बुध्य्नेन स्तुवीत देवी अप्येभिरिष्टैः. समुद्रं न संचरणे सनिष्यवो घर्मस्वरसो नद्यो३ अप व्रन्.. (६) हे द्यावा-पृथ्वी! जिस प्रकार धन चाहने वाला व्यक्ति सागर से उसके मध्य में जाने के लिए प्रार्थना करता है, उसी प्रकार हम भी इष्ट कार्य पूरा करने हेतु अहिर्बुध्न्य के साथ तुम्हारी स्तुति करते हैं. वे देव शब्द करती हुई नदियों को बहने योग्य बनावें. (६) देवैर्नो देव्यदितिर्नि पातु देवस्त्राता त्रायतामप्रयुच्छन्. नहि मित्रस्य वरुणस्य धासिमर्हामसि प्रमियं सान्वग्नेः.. (७) देवमाता अदिति अन्य देवों के साथ हमारी रक्षा करें. इंद्र प्रमादहीन होकर हमारा पालन ebook converter DEMO Watermarks*
करें. मित्र, वरुण एवं अग्नि के सोमरूप अन्न की हम हिंसा नहीं कर सकते. हम उन्हें अनुष्ठानों द्वारा बढ़ावेंगे. (७) अग्निरीशे वस्व्वस्याग्निर्महः सौभगस्य. तान्यस्मभ्यं रासते.. (८) अग्नि धन एवं महान् सौभाग्य के स्वामी हैं. वे हमें धन एवं सौभाग्य प्रदान करें. (८) उषो मघोन्या वह सूनृते वार्या पुरु. अस्मभ्यं वाजिनीवति.. (९) हे धनस्वामिनी, प्रिय-सत्य-रूप वाली एवं अन्नवती उषा! तुम हमें अधिक मात्रा में शोभन धन दो. (९) तत्सु नः सविता भगो वरुणो मित्रो अर्यमा. इन्द्रो नो राधसा गमत्.. (१०) सविता, भग, वरुण, मित्र, अर्यमा एवं इंद्र जिस धन के साथ आते हैं, वह धन वे सब हमें दें. (१०) सूक्त—५६ देवता—द्यावा-पृथ्वी मही द्यावापृथिवी इह ज्येष्ठे रुचा भवतां शुचयद्भिरर्कैः. यत्सीं वरिष्ठे बृहती विमिन्वन्नुवद्भोक्षा पप्रथानेभिरेवैः.. (१) हे महान् एवं विशाल द्यावा-पृथ्वी! इस यज्ञ में दीप्तियुक्त मंत्रों से तेजस्वी बनो, क्योंकि जल बरसाने वाले बादल विस्तृत एवं महान् धरती-आकाश को स्थापित करते हैं तथा गमनशील व प्रसिद्ध मरुतों के साथ सभी जगह गरजते हैं. (१) देवी देवेभिर्यजते यजत्रैरमिनती तस्थतुरुक्षमाणे. ऋतावरी अद्रुहा देवपुत्रे यज्ञस्य नेत्री शुचयद्भिरर्कैः.. (२) यज्ञ के योग्य, प्रजा की हिंसा न करने वाले, अभीष्ट वर्षा करने वाले, सत्यशील, द्रोहहीन, देवों को उत्पन्न करने वाले एवं यज्ञों के नेता धरती-आकाश यज्ञपात्र देवों के साथ मिलकर दीप्तिशाली मंत्रों को प्राप्त करें. (२) स इत्स्वपा भुवनेष्वास य इमे द्यावापृथिवी जजान. उर्वी गभीरे रजसी सुमेके अवंशे धीरः शच्या समैरत्.. (३) संसार में वही उत्तम कर्म वाला है, जिसने इस धरती-आकाश को उत्पन्न किया है एवं जिस धैर्यशाली ने विस्तृत, अचंचल, शोभन-रूप-युक्त एवं बिना आधार वाले धरती-आकाश को अपने कुशलतापूर्ण कार्यों द्वारा भली-भांति प्रेरित किया है. (३) ebook converter DEMO Watermarks*