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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

विश्वायुर्यो अमृतो मर्त्येषूद्भूदतिथिर्जातवेदाः.. (२) दिन में प्रकाशकर्त्ता, सूर्य के समान तेजस्वी, जानने योग्य, सबके जीवन हेतु, मरणरहित, सदा चलने वाले, सब प्राणियों के ज्ञाता एवं यजमानों में प्रातःकाल जागने वाले अग्नि हमें वंदनीय अन्न दें. (२) द्यावो न यस्य पनयन्त्यभ्वं भासांसि वस्ते सूर्यो न शुक्रः. वि य इनोत्पजरः पावकोऽश्रस्य चिच्छिथ्रत्पूर्व्याणि.. (३) स्तोता जिस अग्नि के महान् कर्म की स्तुति करते हैं, वे अग्नि सूर्य के समान उज्ज्वल हैं एवं अपने तेज में छिपे रहते हैं. युवा एवं पवित्रकर्त्ता अग्नि अपने प्रकाश से सबको ढकते हैं एवं राक्षसों तथा उनके नगरों को समाप्त करते हैं. (३) वह्ना हि सूनो अस्यद्मसद्वा चक्रे अग्निर्ज॑नुषाज्मान्नम्. स त्वं न ऊर्जसन ऊर्जं धा राजेव जेरवृके क्षेष्यन्तः.. (४) हे बलपुत्र अग्नि! तुम वंदनीय हो. अग्नि हव्यों पर बैठकर स्वभाव से यजमानों को घर एवं अन्न देते हैं. हे अन्नदाता अग्नि! तुम हमें अन्न दो, राजा के समान हमारे शत्रुओं को जीतो एवं हमारी बाधारहित यज्ञशाला में विश्राम करो. (४) नितिक्ति यो वारणमन्नमत्ति वायुर्न राष्ट्रयत्येत्यक्तून्. तुर्याम यस्त आदिशामरातीरत्यो न हुतः पततः परिह्रुत्.. (५) अग्नि अपने अंधकारनाशक तेज को तीखा बनाते हैं, हव्य को खाते हैं, वायु के समान सब पर शासन करते हैं एवं रात का अंधेरा मिटाते हैं. हे अग्नि! हम तुम्हारी कृपा से उसे जीतें, जो तुम्हें हव्य नहीं देता. हम पर आक्रमण करने वाले शत्रुओं के पास तुम अश्व के समान जाकर उन्हें समाप्त करो. (५) आ सूर्यो न भानुमद्भिरर्कैरग्ने ततन्थ रोदसी वि भासा. चित्रो नयत्परि तमांस्यक्तः शोचिषा पत्मन्नौशिजो न दीयन्.. (६) हे अग्नि! तुम सूर्यदेव के समान प्रकाशपूर्ण एवं अर्चनीय किरणों द्वारा धरती-आकाश को भर देते हो. मार्ग में चलने वाला सूर्य जिस प्रकार अंधकार का नाश करता है, उसी प्रकार अग्नि अंधकार को मिटाते हैं. (६) त्वां हि मन्द्रतममर्कशोकैर्ववृमहे महि नः श्रोष्यग्ने. इन्द्रं न त्वा शवसा देवता वायुं पृणन्ति राधसा नृतमाः.. (७) हे परम स्तुति योग्य एवं पूज्यदीप्ति से युक्त अग्नि! तुम हमारी विशाल स्तुति सुनो! स्तुति करने में कुशल ऋत्विज् इंद्र के समान शक्तिसंपन्न एवं गतिशील तुम्हें हव्य द्वारा प्रसन्न ebook converter DEMO Watermarks*

करते हैं। (७) नू नो अग्नेऽवृकेभिः स्वस्ति वेषि रायः पथिभिः पर्ष्यंहः. ता सूरिभ्यो गृणते रासि सुम्नं मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (८) हे अग्नि! तुम बिना चोर वाले मार्ग से हमें शीघ्र कल्याणकारी धन के पास ले जाओ, पाप से छुड़ाओ एवं स्तोताओं को मिलने वाले सुख हमें दो. हम उत्तम संतान पाकर सौ वर्ष तक जीवित रहें. (८) सूक्त—५ देवता—अग्नि हुवे वः सूनुं सहसो युवानमद्रोग्धवाचं मतिभिर्यविष्ठम्. य इन्वति द्रविणानि प्रचेता विश्ववाराणि पुरुवारो अध्रुक्.. (१) हम बल के पुत्र, युवक, प्रशंसनीय वाणी द्वारा स्तुतियोग्य, अतिशय-तरुण, उत्तम ज्ञान वाले, बहुतों द्वारा स्तुत एवं यजमानों से द्रोह न करने वाले अग्नि को स्तुतियों द्वारा बुलाते हैं. वे स्तुतिकर्त्ताओं को सर्वप्रिय धन देते हैं. (१) त्वे वसूनि पुर्वणीक होतर्दोषा वस्तोरेरिरे यज्ञियासः. क्षामेव विश्वा भुवनानि यस्मिन्त्सं सौभगानि दधिरे पावके.. (२) हे अनेक ज्वालाओं वाले एवं देवों को बुलाने वाले अग्नि! यज्ञ करने योग्य यजमान हव्यरूप धन तुम्हें रात-दिन देते रहते हैं. देवों ने धरती के समान अग्नि में भी सब प्राणियों को स्थापित किया है. (२) त्वं विक्षु प्रदिवः सीद आसु क्रत्वा रथीरभवो वार्याणाम्. अत इनोषि विधते चिकित्वो व्यानुषग्जातवेदो वसूनि.. (३) हे अग्नि! तुम प्राचीन तथा अर्वाचीन प्रजाओं में विशिष्ट रूप से स्थित हो एवं यज्ञकार्यों द्वारा लोगों को रमणीय धन देते हो. हे जातवेद एवं ज्ञानसंपन्न अग्नि! तुम इसी हेतु यजमान को धन दो. (३) यो नः सनुत्यो अभिदासदग्ने यो अन्तरो मित्रमहो वनुष्यात्. तमजरेभिर्वृषभिस्तव स्वैस्तपा तपिष्ठ तपसा तपस्वान्.. (४) हे अनुकूल दीप्ति वाले अग्नि! जो छिपे स्थान में रहकर बाधा पहुंचाता है अथवा समीप रहकर हमारी हिंसा करता है, ऐसे शत्रु को अपने जरारहित तेज से समाप्त करो. हे कामवर्षी व अधिक तृप्त अग्नि! तुम तेजस्वी हो. (४) यस्ते यज्ञेन समिधा य उक्थैरर्केभिः सूनो सहसो ददाशत्. ebook converter DEMO Watermarks*

स मर्त्येष्वमृत प्रचेता राया द्युम्नेन श्रवसा वि भाति.. (५) बलपुत्र एवं अमर अग्नि! यज्ञ, समिधा, स्तोत्र एवं वचनों द्वारा तुम्हारी सेवा करने वाला यजमान मनुष्यों के बीच उत्तम ज्ञानी होकर धन तथा तेजस्वी अन्न से शोभित होता है. (५) स तत्कृधीषितस्तूयमग्ने स्पृधो बाधस्व सहसा सहस्वान्. यच्छस्यसे द्युभिरक्तो वचोभिस्तज्जुषस्व जरितुर्घोषि मन्म.. (६) हे अग्नि! तुम जिस काम के लिए भेजे गए हो, उसे जल्दी पूरा करो. हे बलवान्! तुम बल द्वारा शत्रुओं को समाप्त करो. हे तेजयुक्त अग्नि! तुम स्तोता की स्तुतियां स्वीकार करो. (६) अश्याम तं काममग्ने तवोती अश्याम रयिं रयिवः सुवीरम्. अश्याम वाजमभि वाजयन्तोऽश्याम द्युम्नमजराजं ते.. (७) हे अग्नि! हम तुम्हारी रक्षा पाकर वांछित फल पावें. हे धनस्वामी अग्नि! हम उत्तम संतानयुक्त धन का उपभोग करें तथा अन्न के इच्छुक होकर अन्न प्राप्त करें. हे जरारहित अग्नि! हम तुम्हारे अजर यश को पावें. (७) सूक्त—६ देवता—अग्नि प्र नव्यसा सहसः सूनुमच्छा यज्ञेन गातुमव इच्छमानः. वृश्चद्वनं कृष्णयामं रुशन्तं वीती होतारं दिव्यं जिगाति.. (१) अन्न का इच्छुक स्तोता स्तुति योग्य एवं बलपुत्र अग्नि के समीप नवीन यज्ञ के सहित जाता है. अग्नि वन नष्ट करने वाले, काले मार्ग वाले, श्वेतवर्ण, यज्ञयुक्त, होता एवं दिव्य हैं. (१) स श्वितानस्तन्यतू रोचनस्था अजरेभिर्नानदद्भिर्द्यविष्ठः. यः पावकः पुरुतमः पुरूणि पृथून्यग्निरनुयाति भर्वन्.. (२) जो अग्नि पवित्र करने वाले, अतिशय महान् हैं एवं मोटी लकड़ियों को खाते हुए चलते हैं, वे श्वेतवर्ण, शब्द करने वाले, अंतरिक्ष में स्थित, जरारहित एवं बार-बार गरजने वाले मरुतों से युक्त तथा अतिशय युवा हैं. (२) वि ते विष्वग्वातजूतासो अग्ने भामासः शुचे शुचयश्चरन्ति. तुविम्रक्षासो दिव्या नवग्वा वना वनन्ति धृषता रुजन्तः.. (३) हे पवित्र अग्नि! तुम्हारी पवन प्रेरित दीप्त ज्वालाएं सभी ओर चलती हुई व्याप्त होती हैं तथा बहुत सी लकड़ियों को खाती हैं. नवीन गति वाली अग्नि ज्वालाएं अपनी दीप्ति द्वारा ebook converter DEMO Watermarks*

वनों को जलाती हैं. (३) ये ते शुक्रासः शुचयः शुचिष्मः क्षां वपन्ति विषितासो अश्वाः. अध भ्रमस्त उर्विया वि भाति यातयमानो अधि सानु पृश्नेः.. (४) हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम्हारी तेजपूर्ण ज्वालाएं धरती से घासरूपी बालों को मूंडती हैं एवं स्वच्छंद घोड़ों के समान इधर-उधर जाती हैं. इस समय तुम्हारी भ्रमणशील ज्वालाएं नानारूप वाली धरती के पर्वत पर चढ़ती हुई विशेषरूप से शोभा पाती हैं. (४) अध जिह्वा पापतीति प्र वृष्णो गोषुयुधो नाशनिः सृजाना. शूरस्येव प्रसितिः क्षातिरग्नेर्दुर्वर्तुर्भीमो दयते वनानि.. (५) जैसे चुराई गई गायों के लिए लड़ने वाले इंद्र का वज्र बार-बार चलता था, उसी प्रकार कामवर्षी अग्नि की ज्वालाएं निकलती हैं. वीरों की दृढ़ता के समान असह्य अग्नि की भयानक ज्वालाएं वनों को जलाती हैं. (५) आ भानुना पार्थिवानि ज्रयांसि महस्तोदस्य धृषता ततन्थ. स बाधस्वाप भया सहोभिः स्पृधो वनुष्यन्व्नुषो नि जूर्व.. (६) हे अग्नि! तुम अपनी दीप्त ज्वालाओं से धरती के सब गंतव्य स्थानों पर अधिकार करो, भयंकर आपत्तियों को रोको, अपने तेज से स्पर्धा करने वालों की हिंसा करो एवं शत्रुओं का नाश करो. (६) स चित्र चित्रं चितयन्तमस्मे चित्रक्षत्र चित्रतमं वयोधाम्. चन्द्रं रयिं पुरुवीरं बृहन्तं चन्द्र चन्द्राभिर्गृणते युवस्व.. (७) हे विचित्र एवं आकर्षक शक्ति वाले तथा आनंदकारी अग्नि! हम प्रसन्नताकारक स्तुतियों वालों को तुम विचित्र, अद्वितीय यश देने वाला, अन्न धारण करने वाला एवं संतान से युक्त धन प्रदान करो. (७) सूक्त—७ देवता—वैश्वानर (अग्नि) मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम्. कविं सम्राजमतिथिं जनानामासन्ना पात्रं जनयन्त देवाः.. (१) स्तोताओं ने स्वर्ग के शीश तुल्य, धरती पर चलने वाले, सभी जनों से संबंधित, यज्ञ के निमित्त उत्पन्न, मेधावी, तेजस्वी, यजमानों के यज्ञ के लिए सतत गमनशील, मुख तुल्य एवं रक्षक अग्नि को उत्पन्न किया. (१) नाभिं यज्ञानां सदनं रयीणां महामाहावमभि सं नवन्त. ebook converter DEMO Watermarks*

वैश्वानरं रथ्यमध्वराणां यज्ञस्य केतुं जनयन्त देवाः.. (२) स्तोतागण यज्ञ की नाभि, धन के निवासस्थान एवं महान् हव्य के आश्रय अग्नि की भली-भांति स्तुति करते हैं. देव यज्ञ का नियंत्रण करने वाले एवं झंडे के समान यज्ञ का ज्ञापन करने वाले वैश्वानर अग्नि को उत्पन्न करते हैं. (२) त्वद्विप्रा जायते वाज्यग्ने त्वद्वीरासो अभिमातिषाहः. वैश्वानर त्वमस्मासु धेहि वसूनि राजन्त्स्पृहयाय्याणि.. (३) हे प्रकाशयुक्त वैश्वानर अग्नि! हव्य धारण करने वाला व्यक्ति तुम्हारी कृपा से मेधावी बनता है एवं तुम्हारे वीर सेवक शत्रुओं का पराभव करते हैं. तुम हमें सबका अभिलषित धन दो. (३) त्वां विश्वे अमृत जायमानं शिशुं न देवा अभि सं नवन्ते. तव क्रतुभिरमृतत्वमायन्वैश्वानर यत्पित्रोरदीदेः.. (४) हे दो अरणियों से पुत्र के समान उत्पन्न एवं मरणरहित अग्नि! सभी देव तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे वैश्वानर! जब तुम धरती-आकाश के मध्य प्रकाशित होते हो, तब यजमान तुम्हारे यज्ञों के द्वारा अमर पद पाते हैं. (४) वैश्वानर तव तानि व्रतानि महान्यग्ने नकिरा दधर्ष. यज्जायमानः पित्रोरुपस्थेऽविन्दः केतुं वयुनेष्वह्नाम्.. (५) हे वैश्वानर अग्नि! तुम्हारे प्रसिद्ध महान् कार्यों में कोई बाधा नहीं डाल सकता, क्योंकि तुमने धरती-आकाशरूपी माता-पिता की गोद में जन्म लेकर दिन का ज्ञान कराने वाले सूर्य को स्थापित किया. (५) वैश्वानरस्य विमितानि चक्षसा सानूनि दिवो अमृतस्य केतुना. तस्येदु विश्वा भुवनाधि मूर्धनि वया इव रुरुहुः सप्त विस्रुहः.. (६) वैश्वानर अग्नि के जलसूचक तेज से स्वर्ग के उच्च स्थल बने हैं एवं सागर में समस्त जल स्थित रहता है. उसीसे शाखा के समान सात नदियां निकलती हैं. (६) वि यो रजांस्यमिमीत सुक्रतुर्वैश्वानरो वि दिवो रोचना कविः. परि यो विश्वा भुवनानि पप्रथेऽदब्धो गोपा अमृतस्य रक्षिता.. (७) उत्तम कर्म वाले वैश्वानर अग्नि ने लोकों को बनाया. क्रांतदर्शी अग्नि ने स्वर्ग के तेजस्वी नक्षत्रों को एवं सभी ओर वर्तमान प्राणियों को बनाया. अपराजित एवं पालनकर्त्ता अग्नि जल की रक्षा करते हैं. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—८ देवता—वैश्वानर (अग्नि) पृक्षस्य वृष्णो अरुषस्य नू सहः प्र नु वोचं विदथा जातवेदसः. वैश्वानराय मतिर्नव्यसी शुचिः सोमइव पवते चारुरग्नये.. (१) हम यज्ञ में व्याप्त, कामवर्षी, तेजस्वी एवं जातवेद अग्नि की शक्तियों का वर्णन करते हैं. वैश्वानर अग्नि के लिए नवीन एवं पवित्र स्तुतियां सोमरस के समान उत्पन्न होती हैं. (१) स जायमानः परमे व्योमनि व्रतान्यग्निर्व्रतपा अरक्षत. व्य१न्तरिक्षममितीत सुक्रतुर्वैश्वानरो महिना नाकमस्पृशत्.. (२) यज्ञादि व्रतों का पालन करने वाले वैश्वानर अग्नि उत्तम स्थान में जन्म लेकर व्रतों की रक्षा करते एवं अंतरिक्ष को नापते हैं. शोभनकर्मकर्त्ता वैश्वानर अपने तेज से स्वर्ग को छूते हैं. (२) व्यस्तभ्नाद्रोदसी मित्रो अद्भुतोऽन्तर्वावदकृणोज्ज्योतिषा तमः. वि चर्मणीव धिषणे अवर्तयद्वैश्वानरो विश्वमधत्त वृष्ण्यम्.. (३) सबके सखा एवं अद्भुत वैश्वानर अग्नि ने धरती-आकाश को विशेष रूप से स्थिर किया है तथा तेज द्वारा अंधकार को मिटाया है. उन्होंने अंतरिक्ष को चमड़े के समान फैलाया है. वे समस्त शक्तियों को धारण करते हैं. (३) अपामुपस्थे महिषा अगृभ्णत विशो राजानमुप तस्थुर्ऋग्मियम्. आ दूतो अग्निमभरद्विवस्वतो वैश्वानरं मातरिश्वा परावतः.. (४) अग्नि को महान् मरुतों ने अंतरिक्ष में धारण किया एवं मानवों ने अर्चनीय स्वामी के रूप में उनकी स्तुति की. वायु देवों के दूत के रूप में दूरवर्ती सूर्यमंडल से वैश्वानर को लाए. (४) युगेयुगे विदथ्यं गृणद्भ्योऽग्ने रयिं यशसं धेहि नव्यसीम्. पव्येव राजन्नघशंसमजर नीचा नि वृश्च वनिनं न तेजसा.. (५) हे यज्ञपात्र अग्नि! समय-समय पर नवीन स्तुतियों का उच्चारण करने वालों को तुम धन एवं यशस्वी पुत्र दो. हे तेजस्वी एवं जरारहित अग्नि! वज्र जिस प्रकार वृक्ष को गिरा देता है, उसी प्रकार तुम अपने तेज से शत्रुओं का नाश करो. (५) अस्माकमग्ने मघवत्सु धारयानामि क्षत्रमजरं सुवीर्यम्. वयं जयेम शतिनं सहस्रिणं वैश्वानर वाजमग्ने तवोतिभिः.. (६) हे अग्नि! हम हव्यरूपी धन के स्वामियों को अपहरणरहित, नाशरहित एवं शोभन-वीर्य ebook converter DEMO Watermarks*

से युक्त धन दो. हे वैश्वानर! हम तुम्हारी रक्षा पाकर सैकड़ों एवं हजारों प्रकार का अन्न पावें. (६) अदब्धेभिस्तव गोपाभिरिष्टेऽस्माकं पाहि त्रिषधस्थ सूरीन्. रक्षा च नो ददुषां शर्धो अग्ने वैश्वानर प्र च तारीः स्तवानः.. (७) हे यज्ञपात्र एवं तीनों लोकों में वर्तमान अग्नि! तुम अपने अपराजेय एवं रक्षा करने वाले तेजों द्वारा हम स्तुतिकर्त्ताओं की रक्षा करो. हे वैश्वानर! हम हव्यदाताओं के बल की रक्षा करो तथा स्तुतिकर्त्ताओं को बढ़ाओ. (७) सूक्त—९ देवता—वैश्वानर (अग्नि) अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च वि वर्तेते रजसी वेद्याभिः. वैश्वानरो जायमानो न राजावातिरज्ज्योतिषाग्निस्तमांसि.. (१) काली रात और उजला दिन अपनी प्रवृत्तियों द्वारा धरती व आकाश को पृथक् करते हैं. वैश्वानर अग्नि तेजस्वी के समान उत्पन्न होकर अपने प्रकाश से अंधकार का नाश करते हैं. (१) नाहं तन्तुं न वि जानाम्योतुं न यं वयन्ति समरेऽतमानाः. कस्य स्वित्पुत्र इह वक्त्वानि परो वदात्यवरेण पित्रा.. (२) हम ताना-बाना नहीं जानते. लगातार प्रयत्न करके बुने गए कपड़े से भी हम परिचित नहीं हैं. इस लोक में रहने वाले पिता का उपदेश सुनने वाला पुत्र दूसरे लोक की बात कैसे कह सकता है? (२) स इत्तन्तुं स वि जानात्योतुं स वक्त्वान्यूतुथा वदाति. य ईं चिकेतदमृतस्य गोपा अवश्चरन्परो अन्येन पश्यन्.. (३) वैश्वानर अग्नि ही ताने-बाने को जानते हैं एवं समय-समय पर कहने योग्य बातें कहते हैं. जल के रक्षक एवं भूलोक में विचरण करने वाले अग्नि सूर्यरूप से सबको देखते हुए जगत् को जानते हैं. (३) अयं होता प्रथमः पश्यतेममिदं ज्योतिरमृतं मर्त्येषु. अयं स जज्ञे ध्रुव आ निषत्तोऽमर्त्यस्तन्वा३ वर्धमानः.. (४) हे मनुष्यो! वैश्वानर अग्नि सबसे पहले होता हैं. इन्हें देखो. ये मरणधर्मा मानवों में जठराग्निरूप से मरणरहित हैं. ये अग्नि ध्रुव, व्यापक, अविनाशी, शरीरधारी एवं बढ़ने वाले जाने जाते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

ध्रुवं ज्योतिर्निहितं दृशये कं मनो जविष्ठं पतयत्स्वन्तः. विश्वे देवाः समनसः सकेता एकं क्रतुमभि वि यन्ति साधु.. (५) वैश्वानर अग्नि की ध्रुव, मन की अपेक्षा भी तीव्रगामिनी एवं सुखों का मार्ग दिखाने वाली ज्योति चलने वाले प्राणियों के भीतर छिपी है. सभी देव एक अभिलाषा एवं एक मत वाले होकर यज्ञ के प्रधानकर्त्ता वैश्वानर के सामने जाते हैं. (५) वि मे कर्णा पतयतो वि चक्षुर्वी३दं ज्योतिर्हृदय आहितं यत्. वि मे मनश्चरति दूरआधीः किं स्विद्वक्ष्यामि किमु नू मनिष्ये.. (६) वैश्वानर के विविध शब्द सुनने के लिए हमारे कान, रूप देखने के लिए आंखें व ज्योति को समझने के लिए हमारी बुद्धि उत्सुक रहती है. हमारा मन वैश्वानर संबंधी चिंता से चंचल रहता है. हम वैश्वानर के किस रूप को कहें अथवा मानें? (६) विश्वे देवा अनमस्यन्भियानास्त्वामग्ने तमसि तस्थिवांसम्. वैश्वानरोऽवतूतये नोऽमर्त्योऽवतूतये नः.. (७) हे अंधकार में स्थित वैश्वानर अग्नि! अंधकार से डरते हुए सभी देव तुम्हें नमस्कार करते हैं. मरणरहित वैश्वानर अपनी रक्षा द्वारा हमारी रक्षा करें. (७) सूक्त—१० देवता—अग्नि पुरो वो मन्द्रं दिव्यं सुवृक्तिं प्रयति यज्ञे अग्निमध्वरे दधिध्वम्. पुर उक्थेभिः स हि नो विभावा स्वध्वरा करति जातवेदाः.. (१) हे ऋत्विजो! तुम वर्तमान एवं बाधारहित यज्ञ में प्रसन्नताकारक दिव्य एवं दोषरहित अग्नि को स्तोत्रपाठ करते हुए अपने सामने स्थापित करो, क्योंकि विशेष दीप्तिशाली अग्नि हमारे यज्ञों को शोभन बनाते हैं. (१) तमु द्युमः पुर्वणीक होतरग्ने अग्निभिर्मनुष इधानः. स्तोमं यमस्मै ममतेव शूषं घृतं न शुचि मतयः पवन्ते.. (२) हे दीप्तिमान्, देवों को बुलाने वाले एवं अनेक ज्वालाओं वाले अग्नि! तुम अन्य अग्नियों के साथ प्रज्वलित होते हुए मनुष्यों के उस स्तोत्र को सुनो, जिसे स्तोता ममता नारी के समान बोलते हैं एवं घी के समान तुम्हें भेंट करते हैं. (२) पीपाय स श्रवसा मर्त्येषु यो अग्नये ददाश विप्र उक्थैः. चित्राभिरूतिभिश्चित्रशोचिर्व्रजस्य साता गोमतो दधाति.. (३) जो मेधावी यजमान स्तोत्रों के समान अग्नि को हव्य देता है. वह अन्न के द्वारा समृद्धि ebook converter DEMO Watermarks*

प्राप्त करता है. विचित्र किरणों वाले अग्नि अपने अनोखे रक्षासाधनों द्वारा उसे गायों से भरी गोशाला का उपभोग करने वाला बनाते हैं. (३) आ यः पप्रौ जायमान उर्वी दूरेदृशा भासा कृष्णाध्वा. अध बहु चित्तम ऊर्म्यायास्तिरः शोचिषा ददृशे पावकः.. (४) काले मार्ग वाले अग्नि ने उत्पन्न होकर अपनी दूर से दिखने वाली ज्योति द्वारा धरती- आकाश को भर दिया है. पवित्रकर्त्ता अग्नि रात्रि के महान् अंधकार को अपनी किरणों से समाप्त करते हुए दिखाई देते हैं. (४) नू नश्चित्रं पुरुवाजाभिरूती अग्ने रयिं मघवद्भ्यश्च धेहि. ये राधसा श्रवसा चात्यन्यान्त्सुवीर्येभिश्चाभि सन्ति जनान्.. (५) हे अग्नि! हम हव्यरूप अन्नधारियों को रक्षा साधनों एवं विविध अन्नों के साथ विचित्र धन दो. हमें ऐसे पुत्र दो जो धन, अन्न एवं पराक्रम द्वारा दूसरों को पराजित कर सकें. (५) इमं यज्ञं चनो धा अग्न उशन्यं त आसानो जुहुते हविष्मान्. भरद्वाजेषु दधिषे सुवृक्तिमवीर्वाजस्य गध्यस्य सातौ.. (६) हे अग्नि! हव्यधारी यजमान द्वारा बैठकर हवन किए यज्ञसाधन अन्न को स्वीकार करो तथा भरद्वाजवंशीय ऋषियों के निर्दोष स्तोत्र स्वीकार करते हुए उन पर ऐसी कृपा करो, जिससे वे विविध अन्न पा सकें. (६) वि द्वेषांसीनुहि वर्धयेळां मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (७) हे अग्नि! शत्रुओं को विशेष रूप से नष्ट करो एवं हमारा अन्न बढ़ाओ. हम शोभन संतान सहित सौ वर्ष तक प्रसन्न रहें. (७) सूक्त—११ देवता—अग्नि यजस्व होतरिषितो यजीयानग्ने बाधो मरुतां न प्रयुक्ति. आ नो मित्रावरुणा नासत्या द्यावा होत्राय पृथिवी ववृत्याः.. (१) हे देवों को बुलाने वाले एवं उत्तम यज्ञकर्त्ता अग्नि! तुम हमारे द्वारा प्रार्थित होकर इस यज्ञ में शत्रुबाधक मरुतों के उद्देश्य से हवन करो तथा इस यज्ञ में मित्र, वरुण, अश्विनीकुमारों एवं धरती-आकाश को अपने साथ लाओ. (१) त्वं होता मन्द्रतमो नो अध्रुगन्तर्देवो विदथा मर्त्येषु. पावकया जुह्वा३ वह्निरासाग्ने यजस्व तन्वं१ तव स्वाम्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अग्नि देव! तुम मनुष्यों में वर्तमान इस यज्ञ में देवों को बुलाने वाले अतिशय स्तुतिपात्र व हमसे द्रोह न रखने वाले हो। तुम शुद्धि करने वाली एवं देवमुखरूपिणी ज्वाला से अपने ‘स्विष्टकृत’ नामक शरीर का यजन करो. (२) धन्या चिद्धि त्वे धिषणा वष्टि प्र देवाञ्जन्म गृणते यजध्यै. वेपिष्ठो अङ्गिरसां यद्ध विप्रो मधुच्छन्दो भनति रेभ इष्टौ.. (३) हे अग्नि! धन का कारण बनी हुई स्तुति तुम्हारी कामना करती है, क्योंकि तुम्हारे कारण यजमान देवों के निमित्त यज्ञ करने में समर्थ होता है. अंगिरा श्रेष्ठ स्तुतिकर्त्ता हैं एवं मेधावी भरद्वाज यज्ञ में छंद का उच्चारण करते हैं. (३) अदिद्युतत्स्वपाको विभावाग्ने यजस्व रोदसी उरूची. आयुं न यं नमसा रातहव्या अञ्जन्ति सुप्रयसं पञ्च जना:.. (४) बुद्धिमान् एवं तेजस्वी अग्नि भली प्रकार प्रकाशित होते हैं. हे अग्नि! तुम विस्तृत धरती-आकाश की हव्य से पूजा करो. लोग जिस प्रकार अतिथि की पूजा करते हैं, उसी प्रकार यजमान हव्य द्वारा अग्नि को प्रसन्न करते हैं. (४) वृञ्जे ह यन्नमसा बर्हिरग्नावायामि सुघृतवती सुवृक्ति:. अम्यक्षि सद्म सदने पृथिव्या अश्रायि यज्ञ: सूर्ये न चक्षु:.. (५) जब हव्यों के साथ कुश अग्नि के पास लाया जाता है एवं कुश पर घी से भरा निर्दोष स्रुच रखा जाता है, तब धरती पर अग्नि के निवासरूप वेदी को बनाया जाता है एवं यज्ञकार्य सूर्य के प्रकाश के समान विस्तृत होता है. (५) दशस्या न: पूर्वणीक होतर्देवेभिरग्ने अग्निभिरिधान:. राय: सूनो सहसो वावसाना अति स्रसेम वृजनं नांह:.. (६) हे अनेक ज्वालाओं वाले एवं देवों को बुलाने वाले अग्नि! तुम अन्य दीप्ति वाली अग्नियों के साथ प्रज्वलित होकर हमें धन दो. हे बलपुत्र अग्नि! तुम्हें हव्य से ढकने वाले हम पापरूपी शत्रु से दूर हों. (६) सूक्त—१२ देवता—अग्नि मध्ये होता दुरोणे बर्हिषो राळग्निस्तोदस्य रोदसी यजध्यै. अयं स सूनु: सहस ऋतावा दूरात्सूर्यो न शोचिषा ततान.. (१) देवों को बुलाने वाले तथा यज्ञ के स्वामी अग्नि धरती-आकाश के निमित्त यज्ञ करने के लिए यजमान के घर में स्थित होते हैं. बल के पुत्र एवं यज्ञसहित अग्नि दूर रहकर भी सूर्य के ebook converter DEMO Watermarks*

समान अपनी किरणों का विस्तार करते हैं. (१) आ यस्मिन्त्वे स्वपाके यजत्र यक्षद्राजन्त्सर्वतातेव नु द्यौः. त्रिषधस्थस्ततरुषो न जंहो हव्या मघानि मानुषा यजध्यै.. (२) हे यज्ञ के योग्य एवं राजमान अग्नि! सभी स्तोता तुझ बुद्धिमान् अग्नि में शीघ्र यज्ञ करते हैं. तुम तीनों लोकों में स्थित होने के कारण मनुष्यों के श्रेष्ठ हव्य को देवों के पास सूर्य की तीव्र गति से ले जाओ. (२) तेजिष्ठा यस्यारतिर्वनेराट् तोदो अध्वन्न वृधसानो अद्यौत्. अद्रोग्धो न द्रविता चेतति त्मन्नमर्त्योऽवत्रं ओषधीषु.. (३) जिन अग्नि की ज्वाला परम तेजस्विनी होकर वन में प्रकाशित होती है, वे बढ़कर अपने मार्ग में सूर्य के समान प्रकाशित होते हैं एवं वायु के समान सबसे द्रोहरहित एवं अमर बनकर ओषधियों के प्रति द्रवित होते हुए सारे संसार का ज्ञान कराते हैं. (३) सास्माकेभिरेतरी न शूषैरग्निः ष्टवे दम आ जातवेदाः. द्रुवन्नो वन्वन् क्रत्वा नार्वोसः पितेव जारयायि यज्ञैः.. (४) हमारे यज्ञगृह में जातवेद अग्नि की स्तुति उसी प्रकार की जाती है, जिस प्रकार यज्ञकर्त्ता उन्हें सुख देने वाली स्तुतियां बोलते हैं. यजमान अग्नि की सेवा करते हैं. अग्नि वृक्षों को खाने वाले, वन का सहारा लेने वाले तथा बैल के समान शीघ्र आने वाले हैं. (४) अध स्मास्य पनयन्ति भासो वृथा यत्तक्षदनुयाति पृथ्वीम्. सद्यो यः स्पन्द्रो विषितो धवीयान्नृणो न तायुरति धन्वा राट्.. (५) अग्नि जब बिना प्रयत्न के ही वनों को जलाते हुए वहां की धरती पर चलते हैं तो स्तोता मर्त्यलोक में अग्नि की ज्वालाओं की स्तुति करते हैं. चोर के समान तेज और निर्बाधरूप में चलने वाले अग्नि मरुभूमि में सुशोभित होते हैं. (५) स त्वं नो अर्वन्निदाया विश्वेभिरग्ने अग्निभिरिधानः. वेषि रायो वि यासि दुच्छुना मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (६) हे गमनशील अग्नि! तुम सभी प्रकार की अग्नियों के साथ प्रज्वलित होकर निंदा से हमारी रक्षा करो व हमें धन देकर शत्रुओं का नाश करो. हम शोभन संतान को पाकर सौ वर्ष तक प्रसन्न रहें. (६) सूक्त—१३ देवता—अग्नि त्वद्विश्वा सुभग सौभगान्यग्ने वि यन्ति वनिनो न वयाः. ebook converter DEMO Watermarks*

श्रुष्टी रयिर्वाजो वृत्रतूर्ये दिवो वृष्टिरीड्यो रीतिरपाम्.. (१) हे शोभन धन वाले अग्नि! सभी उत्तम धन तुमसे उत्पन्न हुए हैं. जिस प्रकार वृक्षों से शाखाएं उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार तुमसे पशुसमूह, युद्ध में शत्रुओं को जीतने वाली शक्ति एवं आकाश से वर्षा शीघ्र उत्पन्न होती है. तुम सबके स्तुतियोग्य बनकर जल को उत्पन्न करते हो. (१) त्वं भगो न आ हि रत्नमिषे परिज्मेव क्षयसि दस्मवर्चाः. अग्ने मित्रो न बृहत ऋतस्यासि क्षत्ता वामस्य देव भूरेः.. (२) हे सेवा करने योग्य अग्नि! हमें रमणीय धन दो. हे दर्शनीय प्रकाश वाले अग्नि! तुम वायु के समान सब जगह फैलो. अग्नि देव! तुम मित्र के समान विशाल यज्ञसाधनों एवं पर्याप्त धन के दाता बनो. (२) स सत्पतिः शवसा हन्ति वृत्रमग्ने विप्रो वि पणेर्भर्ति वाजम्. यं त्वं प्रचेत ऋतजात राया सजोषा नप्त्रापां हिनोषि.. (३) हे उत्तम ज्ञानसंपन्न व यज्ञ के निमित्त उत्पन्न अग्नि! तुम जल के पुत्र विद्युत् से मिलकर जिस व्यक्ति को धन देना चाहते हो, वह सज्जनों का रक्षक व बुद्धिमान् होकर शक्ति द्वारा शत्रुओं का नाश करता है तथा पणि लोगों की शक्ति छीन लेता है. (३) यस्ते सूनो सहसो गीर्भिरुक्थैर्यज्ञैर्मर्तो निशितिं वेद्यानट्. विश्वं स देव प्रति वारमग्ने धत्ते धान्यं१ पत्यते वस्वयैः.. (४) हे बलपुत्र अग्नि देव! जो यजमान स्तुति वचनों, स्तोत्रों एवं यज्ञसाधनों द्वारा यज्ञवेदी में तुम्हारा तीक्ष्ण प्रकाश पहुंचाता है, वह पर्याप्त अन्न धारण करता है तथा संपत्तियों को पाता है. (४) ता नृभ्य आ सौश्रवसा सुवीराग्ने सूनो सहसः पुष्यसे धाः. कृणोषि यच्छवसा भूति पश्वो वयो वृकायारये जसुरये.. (५) हे बलपुत्र अग्नि! हमारे पोषण के निमित्त तुम शत्रुओं से लाया हुआ शोभन अन्न हमें संतान सहित दो. तुम पशुओं व दूधदहीरूप जो अन्न दानहीन असुरों से प्राप्त करते हो वह अधिक मात्रा में हमें दो. (५) वद्मा सूनो सहसो नो विहाया अग्ने तोकं तनयं वाजि नो दाः. विश्वाभिर्गीर्भिरभि पूर्तिमश्यां मदेम शतहिमाः सुवीराः.. (६) हे बलपुत्र एवं महान् अग्नि! तुम हमारे हितोपदेशक बनो तथा हमें अन्न के साथ-साथ पुत्र-पौत्र दो. हम समस्त स्तुतियों द्वारा अपनी कामनाओं को प्राप्त करें तथा सौ वर्ष तक ebook converter DEMO Watermarks*

उत्तम संतान के साथ जिएं. (६) सूक्त—१४ देवता—अग्नि अग्ना यो मर्त्यो दुवो धियं जुजोष धीतिभिः. भसन्नु ष प्र पूर्व्य इषं वुरीतावसे.. (१) जो मनुष्य स्तुतियों के साथ अग्नि की यज्ञकर्म से सेवा करता है, वह अन्य लोगों की अपेक्षा प्रतापी बनकर अपनी संतान की रक्षा के लिए शत्रुओं का धन प्राप्त करता है. (१) अग्निरिद्धि प्रचेता अग्निर्वेधस्तम ऋषिः. अग्निं होतारमीळते यज्ञेषु मनुषो विशः.. (२) अग्नि ही उत्तम ज्ञानसंपन्न हैं, वे यज्ञकर्मों की रक्षा के कुशलतम कर्त्ता एवं सबके द्रष्टा हैं. यजमानों के ऋत्विज् यज्ञों में अग्नि को देवों का बुलाने वाला बताकर स्तुति करते हैं. (२) नाना ह्यग्नेऽवसे स्पर्धन्ते रायो अर्यः. तूर्वन्तो दस्युमायवो व्रतैः सीक्षन्तो अव्रतम्.. (३) हे अग्नि! शत्रुओं के धन तुम्हारे स्तोताओं की रक्षा के लिए एक-दूसरे से पहले जाने की इच्छा करते हैं. शत्रुओं की हिंसा करते हुए तुम्हारे स्तोता यज्ञों द्वारा यज्ञहीनों को हराना चाहते हैं. (३) अग्निरप्सामृतीषहं वीरं ददाति सत्पतिम्. यस्य त्रसन्ति शवसः सञ्चक्षि शत्रवो भिया.. (४) अग्नि स्तोताओं को करने योग्य कर्मों को करने वाला, शत्रुओं का सामना करने वाला तथा उत्तम कर्मों को पूर्ण करने वाला पुत्र देते हैं. उसे देखकर उसकी शक्ति से डरे हुए शत्रु कांपने लगते हैं. (४) अग्निर्हि विद्मना निदो देवो मर्तमुरुष्यति. सहावा यस्यावृतो रयिर्वाजेष्ववृतः.. (५) शक्तिशाली एवं ज्ञानसंपन्न अग्नि उस यजमान की निंदकों से रक्षा करते हैं, जिसका हव्य यज्ञों में राक्षसों आदि से अछूता होता है एवं जो अन्य देवों के यजमानों से पृथक् होता है. (५) अच्छा नो मित्रमहो देव देवानग्ने वोचः सुमतिं रोदस्योः. वीहि स्वस्तिं सुक्षितिं दिवो नॄन्द्धिषो अंहांसि दुरिता तरेम ता तरेम तवावसा तरेम.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अनुकूल दीप्ति वाले एवं धरती-आकाश में वर्तमान अग्नि देव! तुम हमारी स्तुति देवों को भली प्रकार बताओ एवं हम स्तोताओं को शोभनगृह के साथ सुख दो. हम शत्रुओं को नष्ट करके पापों के पार जावें, तुम्हारी कृपा से हम शत्रु से छुटकारा पावें. (६) सूक्त—१५ देवता—अग्नि इमम् षु वो अतिथिमुषर्बुधं विश्वासां विशां पतिमृञ्जसे गिरा. वेतीद्दिवो जनुषा कच्चिदा शुचिर्ज्योक्चिदत्ति गर्भो यदच्युतम्.. (१) हे भरद्वाज! तुम प्रातःकाल जागने वाले, प्रजाओं के रक्षक, सदा गतिशील एवं स्वतः पवित्र अग्नि को स्तुतियों द्वारा भली-भांति प्रसन्न करो. अग्नि सदा द्युलोक से यज्ञ में आते हैं एवं दोषरहित हव्य को खाते हैं. (१) मित्रं न यं सुधितं भृगवो दधुर्वनेष्वातावीड्यमूर्ध्वशोचिषम्. स त्वं सुप्रीतो वीतहव्ये अद्भुत प्रशस्तिभिर्महयसे दिवेदिवे.. (२) हे अरणिरूप काष्ठ में सुरक्षित, स्तुतियोग्य, ऊर्ध्वगामी ज्वालाओं वाले एवं विचित्र अग्नि! भृगु ने तुम्हें मित्र के समान अपने घर में स्थापित किया. उत्तम स्तुतियों द्वारा प्रतिदिन पूजा करने वाले भरद्वाज के प्रति तुम भली प्रकार प्रसन्न बनो. (२) स त्वं दक्षस्यावृको वृधो भूर्यः परस्यान्तरस्य तरुषः. रायः सूनो सहसो मर्त्येष्वा छर्दैर्यच्छ वीतहव्याय सप्रथो भरद्वाजाय सप्रथः.. (३) हे बाधकरहित अग्नि! तुम यज्ञकर्त्ता यजमान को बढ़ाने वाले तथा दूरवर्ती एवं समीपवर्ती शत्रु से रक्षा करने वाले हो. हे बलपुत्र अग्नि! तुम सर्वथा बढ़कर मनुष्यों में भरद्वाज को धन एवं गृह दो. (३) द्युतानं वो अतिथिं स्वर्णरम्ग्निं होतारं मनुषः स्वध्वरम्. विप्रं न द्युक्षवचसं सुवृक्तिभिर्हव्यवाहमरतिं देवमृञ्जसे.. (४) हे भरद्वाज! तुम हव्य वहन करने वाले, दीप्तिसंपन्न, अपने अतिथि, स्वर्ग के नेता, मनु के यज्ञ में देवों को बुलाने वाले, शोभनयज्ञ वाले, मेधावी, तेजपूर्णवाणी वाले एवं सबके स्वामी अग्नि देव को उत्तम स्तुतियों से प्रसन्न करो. (४) पावकया यश्चितयन्त्या कृपा क्षामन्नुरुच उषसो न भानुना. तूर्वन्न यामन्नेतशस्य नू रण आ यो घृणे न ततृषाणो अजरः.. (५) जो अग्नि उषा के प्रकाश के समान पावक एवं ज्ञान कराने वाली दीप्ति से धरती पर विराजमान होते हैं एवं सूर्य के विरुद्ध संग्राम में एतश ऋषि की रक्षा जिन्होंने शत्रुहिंसक वीर ebook converter DEMO Watermarks*

के समान की थी, हे भरद्वाज! ऐसे सर्वभक्षक तथा सदायूवा अग्नि को तुम प्रसन्न करो. (५) अग्निमग्निं वः समिधा दुवस्यत प्रियंप्रियं वो अतिथिं गृणीषणि. उप वो गीर्भिरमृतं विवासत देवो देवेषु वनते हि वार्यं देवो देवेषु वनते हि नो दुवः.. (६) हे स्तोताओ! तुम अतिशय तेजस्वी, अतिथि के समान पूज्य एवं स्तुतियोग्य अग्नि का अग्नि के ही समान समिधाओं से स्वागत करो तथा मरणरहित अग्नि देव के समीप जाकर सेवा करो. वे समिधाएं एवं हमारी सेवा स्वीकार कर लेते हैं. (६) समिद्धमग्निं समिधा गिरा गृणे शुचिं पावकं पुरो अध्वरे ध्रुवम्. विप्रं होतारं पुरुवारमद्भुहं कविं सुम्नैरीमहे जातवेदसम्.. (७) हम समिधाओं द्वारा प्रदीप्त अग्नि की स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करते हैं, सबको पवित्र करने वाले एवं ध्रुव अग्नि को हम अपने यज्ञ में धारण करते हैं तथा मेधावी देवों को बुलाने वाले, अनेक जनों द्वारा वरण करने योग्य, सबके अनुकूल क्रांतदर्शी एवं सब प्राणियों को जानने वाले अग्नि की सुखकर स्तुतियों द्वारा सेवा करते हैं. (७) त्वां दूतमग्ने अमृतं युगेयुगे हव्यवाहं दधिरे पायुमीड्यम्. देवासश्च मर्तासश्च जागृविं विभुं विशपतिं नमसा नि षेदिरे.. (८) हे मरणरहित, प्रत्येक काल में हव्यवहन करने वाले, पालक एवं स्तुतियोग्य अग्नि! देवों एवं मानवों ने तुम्हें दूत बनाया था. उन्होंने जागरणशील व्याप्त एवं प्रजापालक अग्नि को नमस्कार द्वारा यज्ञ में स्थापित किया था. (८) विभूषन्नग्न उभयाँ अनु व्रता दूतो देवानां रजसी समीयसे. यत्ते धीतिं सुमतिमावृणीमहेऽध स्मा नस्त्रिवरूथः शिवो भव.. (९) हे अग्नि! तुम देवों और मानवों को अलंकृत करते हुए एवं यज्ञकर्मों में देवों के दूत बनते हुए धरती-आकाश में विचरण करते हो. हम यज्ञकर्मों एवं शोभन स्तुतियों से तुम्हारी सेवा करते हैं, इसलिए तुम तीनों लोकों में रहकर हमें सुख दो. (९) तं सुप्रतीकं सुदृशं स्वञ्चमविद्वांसो विदुष्टरं सपेम. स यक्षद्विश्वा वयुनानि विद्वान्प्र हव्यमग्निरमृतेषु वोचत्.. (१०) हम अल्प बुद्धि वाले लोग तुझ अतिशय विद्वान्, शोभन अंग वाले, देखने में सुंदर एवं उत्तम गति वाले अग्नि की सेवा करते हैं. सबको जानने वाले अग्नि अमर देवों को हमारा हव्य बतावें एवं देवों का यजन करें. (१०) तमग्ने पास्युत तं पिपर्षि यस्त आनट् कवये शूर धीतिम्. ebook converter DEMO Watermarks*

यज्ञस्य वा निशितिं वोदितिं वा तमित्पृणक्षि शवसोत राया.. (११) हे शूर एवं क्रांतदर्शी अग्नि! तुम उस व्यक्ति की रक्षा करते हो एवं अभिलाषाएं पूर्ण करते हो, जो तुम्हारी स्तुति करता है. जो यज्ञसाधन हव्य का संस्कार करता है अथवा उसे उत्तम बनाता है, तुम उस व्यक्ति को बल संपन्न करके धनों से पूर्ण करते हो. (११) त्वमग्ने वनुष्यतो नि पाहि त्वमु नः सहसावन्नवद्यात्. सं त्वा ध्वस्मन्वदभ्येतु पाथः सं रयिः स्पृहयाय्यः सहस्री.. (१२) हे अग्नि! शत्रु से हमारी रक्षा करो. हे शक्तिशाली अग्नि! पाप से हमारी रक्षा करो. हमारा दोषरहित हव्यान्र तुम्हारे समीप पहुंचे एवं तुम्हारा दिया हुआ हजारों प्रकार का धन हमें मिले. (१२) अग्निहौता गृहपतिः स राजा विश्वा वेद जनिमा जातवेदाः. देवानामृत यौ मर्त्यानां यजिष्ठः स प्र यजतामृतावा.. (१३) देवों को बुलाने वाले, गृह के स्वामी, दीप्तिशाली एवं सबको जानने वाले अग्नि सभी जन्मधारियों को जानते हैं. देवों एवं मानवों में अतिशय यज्ञकर्त्ता एवं सत्यशील अग्नि उत्तमरूप से देवों का यजन करें. (१३) अग्ने यदद्य विशो अध्वरस्य होत: पावकशोचे वेष्ट्वं हि यज्वा. ऋता यजासि महिना वि यद्भूईर्व्या वह यविष्ठ या ते अद्य.. (१४) हे यज्ञ संपन्न करने वाले एवं पवित्रप्रकाश वाले अग्नि! इस समय तुम यजमान के कर्त्तव्य की कामना करो. तुम देवों के यज्ञकर्त्ता हो, इसलिए देवयजन करो. हे अतिशय युवा अग्नि! तुम अपने महत्त्व से सर्वव्यापक हुए हो. आज तुम्हें जो भी हव्य दिया जावे, उसे वहन करो. (१४) अभि प्रयांसि सुधितानि हि ख्यो नि त्वा दधीत रोदसी यजध्यै. अवा नो मघवन्वाजसातावग्ने विश्वानि दुरिता तरेम ता तरेम तवावसा तरेम.. (१५) हे अग्नि! वेदी पर भली-भांति रखे हविरूप अन्नों को देखो. धरती-आकाश में यज्ञ करने के निमित्त तुम्हारी स्थापना की गई है. हे धनस्वामी अग्नि! अन्न निमित्तक युद्ध में हमारी रक्षा करो. तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर हम सभी पापों से छूट जावें. (१५) अग्ने विश्वेभिः स्वनीक देवैरूर्णावन्तं प्रथमः सीद योनिम्. कुलायिनं घृतवन्तं सवित्रे यज्ञं नय यजमानाय साधु.. (१६) हे शोभन ज्वालाओं वाले एवं देवप्रमुख अग्नि! कंबलों से युक्त घोंसले के समान एवं घृतसंपन्न वेदी पर सभी देवों के साथ बैठो तथा यज्ञकर्त्ता यजमान के कल्याण के निमित्त ebook converter DEMO Watermarks*

उसका यज्ञ देवों के समीप ले जाओ. (१६) इममु त्यमथर्ववदग्निं मन्थन्ति वेधसः. यमङ् कूरयन्तमानयन्नमूरं श्याव्याभ्यः.. (१७) ऋत्विज् अथवा ऋषि के समान इस अग्नि का मंथन करते हैं एवं देवों के मध्य से निकलकर इधर-उधर भागते हुए बुद्धिसंपन्न अग्नि को अंधकार के मध्य से लाते हैं. (१७) जनिष्वा देववीतये सर्वताता स्वस्तये. आ देवान् वक्ष्यमृताँ ऋतावृधो यज्ञं देवेषु पिस्पृशः.. (१८) हे अग्नि! तुम देवों की कामना करने वाले यजमान के कल्याण के निमित्त यज्ञ में उत्पन्न होओ, यज्ञ बढ़ाने वाले देवों का यजन करो एवं हमारे यज्ञ को देवों के पास ले जाओ. (१८) वयमु त्वा गृहपते जनानामग्ने अकर्म समिध बृहन्तम्. अस्थूरि नो गार्हपत्यानि सन्तु तिग्मेन नस्तेजसा सं शिशाधि.. (१९) हे यज्ञपालनकर्त्ता अग्नि! मनुष्यों में हम ही तुमको समिधाओं द्वारा बढ़ाते हैं. हमारे गार्हपत्य-यज्ञ, पुत्र, पशुधन आदि से संपन्न हों. तुम हमें तीखे तेज से मिलाओ. (१९) सूक्त—१६ देवता—अग्नि त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः. देवेभिर्मानुषे जने.. (१) हे अग्नि! तुम समस्त यज्ञों को पूर्ण करने वाले हो. देवों ने मानवी प्रजाओं में तुम्हें होता बनाया है. (१) स नो मन्द्राभिरध्वरे जिह्वाभिर्यजा महः. आ देवान्वक्षि यक्षि च.. (२) हे अग्नि! तुम प्रसन्नता देने वाली ज्वालाओं द्वारा हमारे यज्ञ में देवों का यजन करो. तुम देवों को यहां लाओ एवं उन्हें हव्य दो. (२) वेत्था हि वेधो अध्वनः पथश्च देवाञ्जसा. अग्ने यज्ञेषु सुक्रतो.. (३) हे यज्ञविधाता एवं शोभनयज्ञकर्मयुक्त अग्नि! तुम यज्ञ में देवों के छोटे एवं बड़े मार्गों को शीघ्रता से जानते हो. (३) त्वामीळे अध द्विता भरतो वाजिभिः शुनम्. ebook converter DEMO Watermarks*

ईजे यज्ञेषु यज्ञियम्.. (४) हे अग्नि! भरत ने सुख पाने के लिए ऋत्विजों के साथ मिलकर तुम्हारी स्तुति की थी एवं तुझ यज्ञयोग्य अग्नि का हव्यान्नों द्वारा यजन किया था. (४) त्वमिमा वार्या पुरु दिवोदासाय सुन्वते. भरद्वाजाय दाशुषे.. (५) हे अग्नि! तुमने सोमरस निचोड़ने वाले दिवोदास को जिस प्रकार उत्तम धन अधिक मात्रा में दिए थे, उसी प्रकार हव्य देने वाले मुझ भरद्वाज को दो. (५) त्वं दूतो अमर्त्य आ वहा दैव्यं जनम्. शृण्वन्विप्रस्य सुष्टुतिम्.. (६) हे मरणरहित एवं देवदूत अग्नि! तुम मेधावी भरद्वाज की शोभन स्तुति को सुनते हुए इस यज्ञ में देवों को लाओ. (६) त्वामग्ने स्वाध्यो३ मर्तासो देववीतये. यज्ञेषु देवमीळते.. (७) हे अग्नि देव! शोभन चिंतन वाले मनुष्य देवों को प्रसन्न करने के हेतु यज्ञों में तुम्हारी स्तुति करते हैं. (७) तव प्र यक्षि सन्दृशमुत क्रतुं सुदानव:. विश्वे जुषन्त कामिन:.. (८) हे अग्नि! हम सब दानशील यजमान तुम्हारे दर्शनीय तेज की पूजा तथा सेवा करते हैं. (८) त्वं होता मनुर्हितो वह्निरासा विदुष्टर:. अग्ने यक्षि दिवो विश:.. (९) हे ज्वालाओं द्वारा हव्य वहन करने वाले एवं उत्तम विद्वान् अग्नि! मनु ने तुम्हें यज्ञ का होता नियुक्त किया है. तुम देवों का यजन करो. (९) अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये. नि होता सत्सि बर्हिषि.. (१०) हे अग्नि! देवों को हव्य देने के लिए तुम्हारी स्तुति की जा रही है. तुम हव्य भक्षण के लिए आओ एवं बिछे हुए कुशों पर बैठो. (१०) तं त्वा समिद्भीरङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि. बृहच्छोचा यविष्ठ्य.. (११) हे अगांररूप अग्नि! हम समिधाओं एवं घृत द्वारा तुम्हें बढ़ाते हैं. हे अतिशय युवा अग्नि! तुम अधिक दीप्त बनो. (११) स नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि. बृहदग्ने सुवीर्यम्.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अग्नि देव! तुम हमें विस्तीर्ण प्रशंसनीय महान् शोभन व शक्ति से युक्त धन दो. (१२) त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत. मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः.. (१३) हे अग्नि! शीश के समान सारे जगत् को धारण करने वाले कमल पत्र पर अथर्वा ऋषि ने तुम्हारा मंथन किया था. (१३) तमु त्वा दध्यङ्ङृषिः पुत्र ईधे अथर्वणः. वृत्रहणं पुरन्दरम्.. (१४) हे शत्रुहंता एवं असुर-नगरनाशक अग्नि! अथर्वा ऋषि के पुत्र दध्यङ् ने तुम्हें प्रज्वलित किया था. (१४) तमु त्वा पाथ्यो वृषा समीधे दस्युहन्तमम्. धनञ्जयं रणेरणे.. (१५) हे शत्रुहंता एवं प्रत्येक युद्ध में धन जीतने वाले अग्नि! पाथ्यवृषा नामक ऋषि ने तुम्हें भली प्रकार प्रज्वलित किया था. (१५) एह्यू षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्थेतरा गिरः. एभिर्वर्धास इन्दुभिः.. (१६) हे अग्नि! यहां आओ. हम तुम्हारे निमित्त उत्तम स्तुतियां बोलते हैं, उन्हें एवं इसी प्रकार की अन्य बातों को सुनो. तुम इस सोमरस द्वारा बढ़ो. (१६) यत्र क्व च ते मनो दक्षं दधस उत्तरम्. तत्रा सदः कृणवसे.. (१७) हे अग्नि! जिस किसी यजमान के प्रति तुम्हारा मन अनुग्रहपूर्ण है, उसे तुम शक्तिदायक उत्तम अन्न देते हो एवं वहीं निवास करते हो. (१७) नहि ते पूर्तमक्षिपद्भुवन्नेमानां वसो. अथा दुवो वनवसे.. (१८) हे अग्नि! तुम्हारा तेज हमारी दृष्टि को नष्ट करने वाला न हो. तुम थोड़े यजमानों को ही गृह देते हो. तुम हमारी सेवा स्वीकार करो. (१८) आग्निरगामि भारतो वृत्रहा पुरुचेतनः. दिवोदासस्य सत्पतिः.. (१९)

हम हव्य के स्वामी, दिवोदास राजा के शत्रुओं का नाश करने वाले अधिक ज्ञान वाले एवं यजमानों के पालक अग्नि से स्तुतियों के सहित मिलते हैं. (१९) स हि विश्वाति पार्थिवा रयिं दाशन्महित्वना. वन्वन्नवातो अस्तृतः.. (२०) काष्ठों को जलाने वाले, शत्रुओं के आक्रमण से रहित एवं अपराजित अग्नि अपनी महिमा से सभी सांसारिक संपत्तियां हमें दें. (२०) स प्रत्नवन्नवीयसाग्ने द्युम्नेन संयता. बृहत्ततन्थ भानुना.. (२१) हे अग्नि! तुम प्राचीन के समान ही नवीन तेज से युक्त होकर अपनी किरणों द्वारा आकाश का विस्तार करते हो. (२१) प्र वः सखायो अग्नये स्तोमं यज्ञं च धृष्णुया. अर्च गाय च वेधसे.. (२२) हे मित्र ऋत्विजो! तुम यज्ञविधाता एवं शत्रुविनाशक अग्नि के प्रति यह स्तोत्र गाओ तथा हव्य दो. (२२) स हि यो मानुषा युगा सीदद्धोता कविक्रतुः. दूतश्च हव्यवाहनः.. (२३) देवों को बुलाने वाले, परम मेधावी, मानवों के यज्ञों के समय देवदूत एवं हव्य वहन करने वाले अग्नि हमारे यज्ञ में बिछाये हुए कुशों पर बैठें. (२३) ता राजाना शुचिव्रतादित्यान्मारुतं गणम्. वसो यक्षीह रोदसी.. (२४) हे निवास स्थान देने वाले अग्नि! तुम इस यज्ञ में दीप्तिसंपन्न एवं पवित्रकर्मा मित्र, वरुण, आदित्य मरुद्गण तथा धरती-आकाश का यजन करो. (२४) वस्वी ते अग्ने सन्दृष्टिरिषयते मत्र्याय. ऊर्जो नपादमृतस्य.. (२५) हे बलपुत्र एवं मरणरहित अग्नि! तुम्हारा प्रशंसायोग्य तेज यजमान को अन्न देता है. (२५) क्रत्वा दा अस्तु श्रेष्ठोऽद्य त्वा वन्वन्तसुरेक्णाः. मर्त आनाश सुवृक्तिम्.. (२६) ebook converter DEMO Watermarks*