ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
परो हि मर्त्यैरसि समो देवैरुत श्रिया. अभि ख्यः पूषन् पृतनासु नस्त्वमवा नूनं यथा पुरा.. (१९) हे पूषा! तुम धन के द्वारा मनुष्यों से ऊंचे एवं देवों के समान हो. युद्धों में हमारी ओर कृपादृष्टि रखना. प्राचीन काल के समान ही तुम इस समय हमारी रक्षा करना. (१९) वामी वामस्य धूतयः प्रणीतिरस्तु सूनृता. देवस्य वा मरुतो मर्त्यस्य वेजानस्य प्रयज्यवः.. (२०) हे कंपाने वालो एवं यज्ञपात्र मरुतो! तुम्हारी जो सत्यरूपी एवं धन की प्रेरणा देने वाली वाणी यजमानों को मनचाहा धन देती है, वही वाणी हमारी मार्ग-दर्शिका बने. (२०) सद्याश्चिद्यस्य चर्कृतिः परि द्यां देवो नैति सूर्यः. त्वेषं शवो दधिरे नाम यज्ञियं मरुतो वृत्रहं शवो ज्येष्ठं वृत्रहं शवः.. (२१) जिन मरुतों के असीमित कार्य सूर्य के समान आकाश में विस्तृत हो जाते हैं, वे दीप्त, यज्ञ के योग्य एवं शत्रुनाशक बल धारण करते हैं. उनका शत्रुनाशक बल सबसे उत्तम है. (२१) सकृद्ध द्यौरजायत सकृद्भूिमरजायत. पृश्न्या दुग्धं सकृत्पयस्तदन्यो नानु जायते.. (२२) एक बार स्वर्ग उत्पन्न हुआ. एक ही बार धरती बनी. मरुतों की माता पृश्नि से एक बार दूध काढ़ा गया. इसके बाद कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ. (२२) सूक्त—४९ देवता—विश्वेदेव स्तुषे जनं सुव्रतं नव्यसीभिर्गीर्भिर्मित्रावरुणा सुम्नयन्ता. त आ गमन्तु त इह श्रुवन्तु सुक्षत्रासो वरुणो मित्रो अग्निः.. (१) मैं नई स्तुतियों द्वारा शोभन-कर्म वाले देवों की प्रशंसा करता हूं. मैं स्तोताओं के सुख की अभिलाषा करने वाले मित्र व वरुण की स्तुति करता हूं. शोभनबलसंपन्न मित्र, वरुण एवं अग्नि यहां आवें और मेरी स्तुतियां सुनें. (१) विशोविश ईड्यमध्वरेष्वदृप्तक्रतुमर्तिं युवत्योः. दिवः शिशुं सहसः सूनुमग्निं यज्ञस्य केतुमरुषं यजध्यै.. (२) मैं समस्त प्रजाओं के यज्ञों में स्तुति के योग्य, दर्परहित कर्म वाले, स्वर्ग एवं धरती के स्वामी, स्वर्ग एवं शक्ति के पुत्र व यज्ञ के केतु अग्नि का यज्ञ करने के लिए यजमान की प्रेरणा देता हूं. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
अरुषस्य दुहितरा विरूपे स्तृभिरन्या पिपिशे सूरो अन्या. मिथस्तुरा विचरन्ती पावके मन्म श्रुतं नक्षत ऋच्यमाने.. (३) चमकते हुए सूर्य की रात-दिनरूपी दो विपरीत रूपवाली कन्याएं हैं. उन में एक तारों से सुशोभित है और दूसरी सूर्य से. एक दूसरी का विरोध करके घूमती हुई एवं पवित्र करने वाली रात-दिन की जोड़ी हमारी स्तुतियां सुनकर प्रसन्न हों. (३) प्र वायुमच्छा बृहती मनीषा बृहद्रयिं विश्ववारं रथप्राम्. द्युतद्यामा नियुतः पत्यमानः कविः कविमियक्षसि प्रयज्यो.. (४) हमारी महान् स्तुति महान् धन के स्वामी, सबके आदरणीय एवं अपने रथ को पूर्ण करने वाले वायु के सामने उपस्थित हो. हे अतिशय यज्ञपात्र, दीप्तिसंपन्न रथ वाले, रथ में जुते हुए घोड़ों को वश में रखने वाले एवं दूरदर्शी वायु! तुम मेधावी स्तोता की धन से पूजा करो. (४) स मे वपुश्छदयदश्विनोर्यो रथो विरुक्मान्मनसा युजानः. येन नरा नासत्येषयध्यै वर्तियाथस्तनयाय त्मने च.. (५) अश्विनीकुमारों का वह रथ मेरे शरीर को अपने तेज से ढक ले, जो विशेष तेजस्वी है एवं सोचने मात्र से जिस में घोड़े जुड़ जाते हैं. हे नेता अश्विनीकुमारो! उसी रथ के द्वारा तुम स्तोता एवं उसके पुत्र-पौत्रों की अभिलाषा पूर्ण करने जाओ. (५) पर्जन्यवाता वृषभा पृथिव्याः पुरीषाणि जिन्वतम्प्यानि. सत्यश्रुतः कवयो यस्य गीर्भिर्जगतः स्थातर्जगदा कृणुध्वम्.. (६) हे वर्षिकारक पर्जन्य एवं वायु! आकाश से प्राप्त करने योग्य एवं पूरक जल बरसाओ. हे स्तोत्र सुनने वाले एवं मेधावी मरुतो! तुम जिसके स्तोत्र सुनकर प्रसन्न बनो, उसको धनसंपन्न करना. (६) पावीरवी कन्या चित्रायुः सरस्वती वीरपत्नी धियं धात्. ग्नाभिरच्छिद्रं शरणं सजोषा दुराधर्षं गृणते शर्म यंसत्.. (७) पवित्र बनाने वाली, विचित्र रूपवाली, विचित्र गतिवाली एवं वीर-पत्नी सरस्वती हमारे यज्ञरूप कर्म को पूरा करे. वह देवपत्नियों के साथ प्रसन्न होकर स्तोता को दोषरहित तथा ठंड एवं हवा की गति से रहित घर एवं सुख दे. (७) पथस्पथः परिपतिं वचस्या कामेन कृतो अभ्यानळर्कम्. स नो रासच्छुरुधश्चन्द्राग्रा धियंधियं सीषधाति प्र पूषा.. (८) अभिलषित फल पाकर वश में होने वाला स्तोता सभी मार्गों के स्वामी एवं पूजनीय सूर्य के सामने स्तुतियों सहित उपस्थित हो. पूषा हमें सोने के सींग वाली गाएं दें एवं हमारे सभी ebook converter DEMO Watermarks*
कामों को पूरा करें. (८) प्रथमभाजं यशसं वयोधां सुपाणिं देवं सुगभस्तिमृभ्वम्. होता यक्ष्यजतं पस्त्यानामग्निस्त्वष्टारं सुहवं विभावा.. (९) देवों को बुलाने वाले एवं दीप्तिसंपन्न अग्नि सबके प्रथम विभागकर्त्ता, प्रसिद्धि एवं अन्न- धारण करने वाले, सुंदर हाथों वाले, दानशील, शोभन-बाहुओं वाले, भासमान, गृहस्थों द्वारा यजनीय एवं सुखपूर्वक बुलाने योग्य त्वष्टा का यज्ञ करें. (९) भुवनस्य पितरं गीर्भिराभी रुद्रं दिवा वर्धया रुद्रमक्तौ. बृहन्तमृष्वमजरं सुषुम्नमृधग्घुवेम कविनेषितासः.. (१०) हे स्तोता! इन स्तोत्रों द्वारा रात-दिन लोकपालक रुद्र की वृद्धि करो. हम बुद्धिमान् रुद्र द्वारा प्रेरित होकर महान्, दर्शनीय, जरारहित एवं शोभन-सुख वाले रुद्र का हवन समृद्धि के साथ करें. (१०) आ युवानः कवयो यज्ञियासो मरुतो गन्त गृणतो वरस्याम्. अचित्रं चिद्धि जिन्वथा वृधन्त इत्था नक्षन्तो नरो अङ्गिरस्वत्.. (११) हे अतिशय युवा, ज्ञानसंपन्न एवं यज्ञपात्र मरुतो! तुम यजमान की सुंदर स्तुति के समीप आओ. हे नेताओ! तुम इस प्रकार वृद्धि पाकर एवं गतिशील किरणों के समान व्याप्त होकर विलक्षण वृक्षों वाले स्थान को वर्षा द्वारा सींचो. (११) प्र वीराय प्र तवसे तुरायाजा यूथेव पशुरक्षिरस्तम्. स पिस्पृशति तन्वि श्रुतस्य स्तृभिर्न नाकं वचनस्य विपः.. (१२) हे स्तोता! अतिशय वीर, शक्तिशाली एवं गतिशील मरुतों के लिए इस प्रकार स्तुति करो, जिस प्रकार ग्वाला पशुओं को हांकता है. आकाश में जिस प्रकार तारे होते हैं, उसी प्रकार मरुद्गण बुद्धिमान् स्तोता की सुनने योग्य स्तुतियों को अपने शरीर पर धारण करें. (१२) यो रजांसि विममे पार्थिवानि त्रिश्चिद्विष्णुर्मनवे बाधिताय. तस्य ते शर्मन्नुपदद्यमाने राया मदेम तन्वा३ तना च.. (१३) हे स्तोता! जिन विष्णु ने कष्ट में पड़े मनु के कल्याण के निमित्त तीनों लोकों को तीन चरणों के द्वारा नाप लिया था, वह ही तुम्हारी यज्ञशाला में दिव्यस्थान में निवास करें एवं हम पुत्र-पौत्रों सहित धन से प्रसन्न हों. (१३) तन्नोऽहिर्बुध्न्यो अद्भिर्कैस्तत्पर्वतस्तत्सविता चनो धात्. तदोषधीभिरभि रातिषाचो भगः पुरन्धिर्जिन्वतु प्र राये.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*
हमारे स्तुतियां सुनकर प्रातः जागने वाले अग्नि, पर्वत एवं सविता हमें जल के साथ अन्न दें. विश्वेदेव ओषधियों के साथ हमें वही अन्न दें. अधिक बुद्धि वाले भग नामक देव हमें धन की प्रेरणा दें. (१४) नू नो रयिं रथ्यं चर्षणिप्रां पुरुवीरं मह ऋतस्य गोपाम्. क्षयं दाताजरं येन जनान्त्स्पृधो अदेवीरभि च क्रमाम विश आदेवीर्ऋभ्य१ श्रवाम.. (१५) हे विश्वेदेव! तुम हमें रथयुक्त अनेक प्रजाओं को पूर्ण करने वाला अनेक पुत्रों सहित क्षयरहित एवं महान् यज्ञ का साधन धन अन्न एवं घर दो. इसके द्वारा हम देवयज्ञ न करने वाले शत्रुओं को पराजित करें एवं देवयज्ञ करने वालों को सहारा दें. (१५) सूक्त—५० देवता—विश्वेदेव हुवे वो देवीमदितिं नमोभिर्मृळीकाय वरुणं मित्रमग्निम्. अभिक्षदामर्यमणं सुशेवं त्रातृन्देवान्त्सवितारं भगं च.. (१) हे देवो! मैं सुख पाने की इच्छा से स्तुतियों के द्वारा अदिति, वरुण, मित्र, अग्नि, शत्रुहंता एवं सेवायोग्य अर्यमा, सविता, भग एवं रक्षा करने वाले सभी देवों को बुलाता हूं. (१) सुज्योतिषः सूर्य दक्षपितॄननागास्त्वे सुमहो वीहि देवान्. द्विजन्मानो य ऋतसापः सत्याः स्वर्वन्तो यजता अग्निजिह्वाः.. (२) हे शोभनदीप्ति वाले सूर्य! दक्ष से उत्पन्न एवं सुंदर प्रकाश वाले देवों को हमारे अनुकूल बनाओ. वे देव दो जन्म वाले, यज्ञ को प्यार करने वाले, सत्य बोलने वाले, धनसंपन्न, यज्ञ के पात्र एवं अग्निजिह्व हैं. (२) उत द्यावापृथिवी क्षत्रमुरु बृहद्रोदसी शरणं सुषुम्ने. महस्करथो वरिवो यथा नोऽस्मे क्षयाय धिषणे अनेहः.. (३) हे स्वर्ग और धरती! तुम हमें अधिक बल दो. हे स्वर्ग एवं धरती! हमारे उत्तम सुख के लिए हमें बड़ा घर दो. ऐसा प्रयत्न करो, जिससे हमारे पास विशाल संपत्ति हो जाए. हे धारणशील धरतीस्वर्ग! हमें पापरहित बनाने के लिए घर दो. (३) आ नो रुद्रस्य सूनवो नमन्तामद्या हूतासो वसवोऽधृष्टाः. यदीमर्भे महति वा हितासो बाधे मरुतो अह्वाम देवान्.. (४) हे निवासस्थान देने वाले एवं पराजित न होने वाले रुद्रपुत्र मरुद्गण! इस समय बुलाने पर तुम हमारे पास आओ. वे युद्ध में महान् सुख देने वाले हैं. इस कारण हम उन्हें बुलाते हैं. ebook converter DEMO Watermarks*
(४) मिम्यक्ष येषु रोदसी नु देवी सिषक्ति पूषा अभ्यर्धयज्वा. श्रुत्वा हवं मरुतो यद्ध याथ भूमा रेजन्ते अध्वनि प्रविक्ते.. (५) प्रकाशयुक्त स्वर्ग एवं धरती जिन मरुतों के साथ संयुक्त हैं, स्तोताओं को धनसंपन्न करने वाले पूषा जिनकी सेवा करते हैं, ऐसे मरुद्गण हमारी पुकार सुनकर जब आते हैं, उस समय विस्तृत मार्ग में पड़ने वाले प्राणी कांप उठते हैं. (५) अभि त्यं वीरं गिर्वणसमर्चेन्द्रं ब्रह्मणा जरितर्नवेन. श्रवदिद्धवमुप च स्तवानो रासद्वाजाँ उप महो गृणान:.. (६) हे स्तोता! नवीन स्तुतियों द्वारा स्तुतियोग्य एवं वीर इंद्र की स्तुति करो. इंद्र इस प्रकार बुलाए जाते हुए हमारी पुकार सुनें एवं हमें अधिक अन्न दें. (६) ओमानमापो मानुषीरमृतं धात तोकाय तनयाय शं यो:. यूयं हि ष्ठा भिषजो मातृतमा विश्वस्य स्थातुर्जगतो जनित्री:.. (७) हे मनुष्य हितकारी जल! हमारे पुत्रों एवं पौत्रों को कष्टनाशक एवं सुखसाधन अन्न दो. तुम चर एवं अचर प्राणियों को उत्पन्न करने वाले एवं माता से भी बढ़कर चिकित्साकर्त्ता हो. (७) आ नो देव: सविता त्रायमाणो हिरण्यपाणिर्यजतो जगम्यात्. यो दत्रवाँ उषसो न प्रतीकं व्यूर्णुते दाशुषे वार्याणि.. (८) रक्षा करने वाले, हाथ में सोना लिए हुए एवं यज्ञपात्र सविता हमारे यज्ञ में भली-भांति आवें. वे हव्यदाता यजमान को उषा के समान उज्ज्वल धन देते हैं. (८) उत त्वं सूनो सहसो नो अद्या देवाँ अस्मिन्नध्वरे ववृत्त्या:. स्यामहं ते सद्मिद्रातौ तव स्यामग्नेऽवसा सुवीर:.. (९) हे शक्तिपुत्र अग्नि! आज देवों को इस यज्ञ में बार-बार लाओ. मैं तुम्हारे धनदान में सदा वर्तमान रहूं. हे अग्नि! मैं तुम्हारी रक्षा के कारण शोभन पुत्र-पौत्रों वाला बनूं. (९) उत त्या मे हवमा जगम्यातं नासत्या धीभिर्युवमङ्ग विप्रा. अत्रिं न महस्तमसोऽमुमुक्तं तूर्वतं नरा दुरितादभीके.. (१०) हे विद्वान् अश्विनीकुमारो! तुम सेवा से युक्त मेरे स्तोत्रों के समीप आओ एवं अत्रि के समान हमें भी अंधकार से छुड़ाओ. हे नेताओ! हमें दुःख देने वाले युद्ध से बचाओ. (१०) ते नो रायो द्युमतो वाजवतो दातारो भूत नृवत: पुरुक्षो:. ebook converter DEMO Watermarks*
दशस्यन्तो दिव्याः पार्थिवासो गोजाता अप्या मृळता च देवाः.. (११) हे देवो! हमें दीप्तिसंपन्न, बलयुक्त एवं संतानसहित तथा बहुतों के द्वारा प्रशंसा के योग्य धन दो. स्वर्ग में रहने वाले, धरती पर रहने वाले, गाय से उत्पन्न एवं जल से उत्पन्न देवगण हमारी इच्छा पूरी करें. (११) ते नो रुद्रः सरस्वती सजोषा मीळ्हुष्मन्तो विष्णुर्मूळन्तु वायुः. ऋभुक्षा वाजो दैव्यो विधाता पर्जन्यावाता पिप्यतामिषं नः.. (१२) वर्षा करने वाले रुद्र, सरस्वती, विष्णु, वायु, ऋभुक्षा, वाज और विधाता देव परस्पर प्रेम रखते हुए हमें सुखी करें. पर्जन्य एवं वायु हमारे अन्न को बढ़ावें. (१२) उत स्य देवः सविता भगो नोऽपां नपादवतु दानु पप्रिः. त्वष्टा देवेभिर्जन्निभिः सजोषा द्यौर्देवेभिः पृथिवी समुद्रैः.. (१३) प्रसिद्ध सविता देव, भग, जल के पौत्र एवं दान देने वाले अग्नि हमारी रक्षा करें. देवों एवं देवपत्नियों के साथ प्रसन्न त्वष्टा, देवों के साथ प्रसन्न स्वर्ग एवं सागरों के साथ प्रसन्न धरती हमारी रक्षा करें. (१३) उत नोऽहिर्बुध्न्यः शृणोत्वज एकपात्पृथिवी समुद्रः. विश्वे देवा ऋतावृधो हुवानाः स्तुता मन्त्राः कविशस्ता अवन्तु.. (१४) अहिर्बुध्न्य, अजएकपाद, पृथ्वी एवं समुद्र हमारी स्तुतियां सुनें. यज्ञ को बढ़ाने वाले, बुलाए हुए एवं स्तुति किए हुए मंत्रों के विषय तथा मेधावी ऋषियों के द्वारा प्रशंसित विश्वेदेव हमारी रक्षा करें. (१४) एवा नपातो मम तस्य धीभिर्भरद्वाजा अभ्यर्चन्त्यर्कैः. ग्ना हुतासो वसवोऽधृष्टा विश्वे स्तुतासो भूता यजत्राः.. (१५) मेरे पुत्र अर्थात् भरद्वाजगोत्रीय ऋषि पूजायोग्य मंत्रों के द्वारा देवों की स्तुति करते हैं. हे यज्ञपात्र देवो! तुम हव्य द्वारा आहूत, निवासस्थान देने वाले, अपराजेय एवं देवपत्नियों के साथ पूजे जाते हो. (१५) सूक्त—५१ देवता—विश्वेदेव उदु त्यच्चक्षुर्महि मित्रयोराँ एति प्रियं वरुणयोरदब्धम्. ऋतस्य शुचि दर्शतमनीकं रुक्मो न दिव उदिता व्यद्यौत्.. (१) सूर्य, मित्र एवं वरुण का प्रसिद्ध, प्रकाश करने वाला, विस्तृत, प्रिय, अहिंसित, शुद्ध एवं दर्शनीय तेज सबके सामने ऊपर उठता है एवं आकाश के आभूषण के समान प्रकाशित होता ebook converter DEMO Watermarks*
है. (१) वेद यस्त्रीणि विदथान्येषां देवानां जन्म सनुतरा च विप्रः. ऋजु मर्तेषु वृजिना च पश्यन्नभि चष्टे सूरो अर्य एवान्.. (२) जो सूर्य तीन जानने योग्य स्थानों को जानते हैं, जो मेधावी—सूर्य इन तीनों लोकों में छिपे देवों के जन्मस्थान को जानते हैं, वे ही मानवों की भलाई-बुराई को देखते हैं एवं मानवों के स्वामी बनकर अभिलाषाएं पूरी करते हैं. (२) स्तुष उ वो मह ऋतस्य गोपानदितिं मित्रं वरुणं सुजातान्. अर्यमणं भगमदब्धधीतीनच्छा वोचे सधन्यः पावकान्.. (३) हम महान् यज्ञ के रक्षक एवं शोभन जन्म वाले अदिति, मित्र, वरुण, अर्यमा एवं भग की स्तुति करते हैं. मैं अहिंसित कर्मों वाले, धनसंपन्न एवं पवित्र करने वाले देवों का यश वर्णन करता हूं. (३) रिशादसः सत्पतीँ रदब्धान्महो राज्ञः सुवसनस्य दातॄन्. यूनः सुक्षत्रान्क्षयतो दिवो नॄनादित्यान्याम्वदितिं दुवोयु.. (४) हे हिंसकों को दूर भगाने वाले, सज्जनों का पालन करने वाले, अपराजेय, महान् स्वामी, शोभन-निवासस्थान देने वाले, युवा शोभन-बल वाले, सर्वव्यापक एवं स्वर्ग के नेता आदित्यो! मैं अपनी परिचर्या करने वाली अदिति की शरण जाता हूं. (४) द्यौ३ष्पितः पृथिवि मातरध्रुगग्ने भ्रातर्वसवो मृळता नः. विश्व आदित्या अदिते सजोषा अस्मभ्यं शर्म बहुलं वि यन्त.. (५) हे पिता रूप स्वर्ग, माता रूप धरती एवं भ्राता रूप अग्नि तथा वसुओ! तुम सब हमें सुखी करो. हे सब आदित्यो एवं अदिति! तुम समान प्रेम वाले होकर हमें अधिक सुख दो. (५) मा नो वृकाय वृक्ये समस्मा अघायते रीरधता यजत्राः. यूयं हि ष्ठा रथ्यो नस्तनूनां यूयं दक्षस्य वचसो बभूव.. (६) हे यज्ञपात्र देवो! हमारा अनिष्ट चाहने वाले वृक एवं वृकी को हमे मत सौंपना. तुम ही हमारे शरीर, बल और वाणी के रक्षक रहे हो. (६) मा व एनो अन्यकृतं भुजेम मा तत्कर्म वसवो यच्चयध्वे. विश्वस्य हि क्षयथ विश्वदेवाः स्वयं रिपुस्तन्वं रीरिषीष्ट.. (७) हे देवो! तुम्हारे कृपापात्र हम दूसरों के द्वारा किए गए पाप का कष्ट न भोगें. हे वसुओ! ebook converter DEMO Watermarks*
हम वह काम न करें, जिसके लिए तुम मना करो. हे विश्वेदेव! तुम सबके स्वामी हो. हमारा शत्रु अपने शरीर का स्वयं नाश करे. (७) नम इदुग्रं नम आ विवासे नमो दाधार पृथिवीमुत द्याम्. नमो देवेभ्यो नम ईश एषां कृतं चिदेनो नमसा विवासे.. (८) नमस्कार सबसे बढ़कर है. इसी कारण मैं नमस्कार करता हूं. नमस्कार ने ही धरती और स्वर्ग को धारण किया है. देवों को नमस्कार है. नमस्कार इन देवों का स्वामी है. मैं नमस्कार द्वारा पापों को दूर करता हूं. (८) ऋतस्य वो रथ्यः पूतदक्षानृतस्य पस्त्यसदो अदब्धान्. ताँ आ नमोभिरुरुचक्षसो नॄन्विश्वान्व आ नमे महो यजत्राः.. (९) हे यज्ञपात्र देवो! तुम यज्ञ के नेता, शुद्ध शक्ति वाले यज्ञशाला में निवास करने वाले, अपराजेय, दूरदर्शी, नेता एवं महान् हो. मैं तुम्हारे सामने नमस्कार-वचन के साथ झुकता हूं. (९) ते हि श्रेष्ठवर्चसस्त उ नस्तिरो विश्वानि दुरिता नयन्ति. सुक्षत्रासो वरुणो मित्रो अग्निॠतधीतयो वक्मराजसत्याः.. (१०) वरुण, मित्र और अग्नि उत्तम-शक्तिसंपन्न, सत्य-कर्म वाले एवं स्तोताओं के प्रति सच्चे हैं. वे श्रेष्ठ तेज वाले हैं. वे हमारे सभी दुर्गुणों का नाश करें. (१०) ते न इन्द्रः पृथिवी क्षाम वर्धन् पूषा भगो अदितिः पञ्च जनाः. सुशर्माणः स्ववसः सुनीथा भवन्तु नः सुत्रात्रासः सुगोपाः.. (११) इंद्र, पृथ्वी, पूषा, भग, अदिति और पंचजन हमारे पृथ्वी के निवासस्थान को बढ़ावें. ये देवगण हमारे प्रति उत्तमसुख देने वाले, शोभन-अन्नदाता, सफलतापूर्वक मार्गदर्शक, शोभनरक्षक एवं त्राणदाता बनें. (११) नू सद्मानं दिव्यं नंशि देवा भारद्वाजः सुमतिं याति होता. आसानेभिर्यजमानो मियेधैर्देवानां जन्म वस्युर्ववन्द.. (१२) हे देवो! भरद्वाजगोत्रीय होता अर्थात् मुझको एक दिव्य-भवन प्रदान करो. मैं तुम्हारी कृपादृष्टि चाहता हूं. यजमान अन्य मेधावी-स्तोताओं के साथ बैठकर धन की अभिलाषा से देवों के समूह की वंदना करता है. (१२) अप त्यं वृजिनं रिपुं स्तेनमग्ने दुराध्यम्. दविष्ठमस्य सत्पते कृधी सुगम्.. (१३) हे सज्जनों के रक्षक अग्नि! तुम कुटिल, पापकारी, दुःखदायी एवं कष्ट से वश में आने ebook converter DEMO Watermarks*
वाले शत्रु को हमसे दूर करो एवं हमें सुख दो. (१३) ग्रावाणः सोम नो हि कं सखित्वनाय वावशुः. जही न्यत्रिणं पणिं वृको हि षः.. (१४) हे सोम! हमारे पत्थर तुम्हारी मित्रता की अभिलाषा करते हैं. तुम अधिक खाने वाले पणि को मारो. वह निश्चय ही बुरा है. (१४) यूयं हि ष्ठा सुदानव इन्द्रज्येष्ठा अभिद्यवः. कर्ता नो अध्वन्ना सुगं गोपा अमा.. (१५) हे इंद्र-प्रमुख देवो! तुम शोभन-दान वाले एवं दीप्तिसंपन्न हो. हमारे मार्गों को सुरक्षित बनाओ एवं सुख दो. (१५) अपि पन्थामगन्महि स्वस्तिगामनेहसम्. येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वसु.. (१६) हम उस सुगम एवं पापरहित मार्ग को पा गए हैं, जिस पर चलने से सभी शत्रु नष्ट होते हैं और धन प्राप्त होता है. (१६) सूक्त—५२ देवता—विश्वेदेव न तद्दिवा न पृथिव्यानु मन्ये न यज्ञेन नोत शमीभिरभिः. उब्जन्तु तं सुभ्व१ः पर्वतासो नि हीयतामतियाजस्य यष्टा.. (१) मैं इस यज्ञ को स्वर्ग एवं धरती के देवों के योग्य नहीं मानता. मैं इसे अपने द्वारा अथवा अन्यों द्वारा संपादित यज्ञों के समान भी नहीं समझता. अतियाज के ऋत्विज् अत्यंतहीन बनें एवं सब पर्वत उसे पीड़ा पहुंचावें. (१) अति वा यो मरुतो मन्यते नो ब्रह्म वा यः क्रियमाणं निनित्सात्. तपूंषि तस्मै वृजिनानि सन्तु ब्रह्माद्विषमभि तं शोचतु द्यौः.. (२) हे मरुतो! जो व्यक्ति स्वयं को हमसे श्रेष्ठ मानता है अथवा हमारे द्वारा की हुई स्तुति की निंदा करता है, सारे तेज उसके बाधक हों तथा स्वर्ग उस यज्ञविरोधी को जलावे. (२) किमङ्ग त्वा ब्रह्मणः सोम गोपां किमङ्ग त्वाहुरभिशस्तिपां नः. किमङ्ग नः पश्यसि निद्यमानान् ब्रह्मद्विषे तपूंषि हेतिमस्य.. (३) हे सोम! ऋषिगण तुम्हें मंत्ररक्षक एवं निंदा से उद्धार करने वाला क्यों कहते हैं? तुम शत्रुओं द्वारा हमारी निंदा क्यों देखते रहते हो? उन ब्राह्मण विरोधियों के ऊपर तुम अपना ebook converter DEMO Watermarks*
अवन्तु मा पर्वतासो ध्रुवासोऽवन्तु मा पितरो देवहूतौ.. (४)
तापकारी आयुध चलाओ. (३) अवन्तु मामुषसो जायमाना अवन्तु मा सिन्धवः पिन्वमानाः. अवन्तु मा पर्वतासो ध्रुवासोऽवन्तु मा पितरो देवहूतौ.. (४) उत्पन्न होने वाली उषाएं मेरी रक्षा करें. विस्तृत नदियां मेरी रक्षा करें. स्थिर पर्वत मेरी रक्षा करें. यज्ञ में उपस्थित पितर मेरी रक्षा करें. (४) विश्वदानीं सुमनसः स्याम पश्येम नु सूर्यमुच्चरन्तम्. तथा करद्धसुपतिर्वसूनां देवाँ ओहानोऽवसागमिष्ठः.. (५) हम सदा शोभन-मन वाले हों. हम उदय होते हुए सूर्य को देखें. उत्तम धन के स्वामी अग्नि हमारे दिए हव्य द्वारा देवों को धारण करते हुए हमें उक्त प्रकार का बनावें. (५) इन्द्रो नेदिष्ठमवसागमिष्ठः सरस्वती सिन्धुभिः पिन्वमाना. पर्जन्यो न ओषधीभिर्मयोभूरग्निः सुशंसः सुहवः पितेव.. (६) जल से विस्तृत सरस्वती नदी एवं इंद्र रक्षा के उद्देश्य से हमारे पास आवें. पर्जन्य ओषधियों के साथ मिलकर हमारे लिए सुखदाता बनें एवं अग्नि हमारे लिए पिता के समान सुखपूर्वक, स्तुत्य एवं सुख से बुलाने योग्य हों. (६) विश्वे देवास आ गत शृणुता म इमं हवम्. एदं बर्हिर्नि षीदत.. (७) हे विश्वेदेव! आओ, मेरी पुकार सुनो और इन कुशों पर बैठो. (७) यो वो देवा घृतस्नुना हव्येन प्रतिभूषति. तं विश्व उप गच्छथ.. (८) हे देवो! जो घी के मिले हुए हव्य द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं, तुम सब उसके पास जाओ. (८) उप नः सूनवो गिरः शृण्वन्त्वमृतस्य ये. सुमृळीका भवन्तु नः.. (९) अमृत के पुत्र विश्वेदेवगण हमारी स्तुतियां सुनें और हमें शोभन सुख देने वाले हों. (९) विश्वे देवा ऋतावृध ऋतुभिर्हवनश्रुतः. जुषन्तां युज्यं पयः.. (१०) यज्ञ को बढ़ाने वाले एवं विशेषविशेष कालों पर स्तोत्र सुनने वाले विश्वेदेव अपने योग्य दूध स्वीकार करें. (१०) स्तोत्रमिन्द्रो मरुद्गणस्त्वष्ट्मान् मित्रो अर्यमा. इमा हव्या जुषन्त नः.. (११) इंद्र, मरुद्गण, त्वष्टा, मित्र और अर्यमा हमारे स्तोत्रों और हव्यों को स्वीकार करें. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
इमं नो अग्ने अध्वरं होतर्वयुनशो यज. चिकित्वान्दैव्यं जनम्.. (१२) हे देवों को बुलाने वाले अग्नि! देवसमूह में उत्तम देव को जानकर हमारा यज्ञकर्म उन्हीं की मर्यादा के अनुसार पूरा करो. (१२) विश्वे देवाः शृणुतेमं हवं मे ये अन्तरिक्षे य उप द्यवि ष्ठ. ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयध्वम्.. (१३) विश्वेदेव मेरी इस पुकार को सुनें, चाहे वे अंतरिक्ष में रहते हों अथवा स्वर्ग के समीप. अग्निरूपी जिह्वा द्वारा अथवा किसी साधन से यज्ञ का भोग करने वाले इन कुशों पर बैठकर सोमरस द्वारा प्रसन्न बनें. (१३) विश्वे देवा मम शृण्वन्तु यज्ञिया उभे रोदसी अपां नपाच्च मन्म. मा वो वचांसि परिचक्ष्याणि वोचं सुम्नेष्विद्धो अन्तमा मदेम.. (१४) विश्वेदेव, यज्ञपात्र, स्वर्ग, पृथ्वी एवं अग्नि हमारी इन स्तुतियों को सुनें. हम तुम्हें पंसद न आने वाले स्तुति-वचन न कहें. हम तुम्हारे समीप सुख पाते हुए प्रसन्न हों. (१४) ये के च ज्मा महिनो अहिमाया दिवो जज्ञिरे अपां सधस्थे. ते अस्मभ्यमिषये विश्वमायुः क्षप उस्रा वरिवस्यन्तु देवाः.. (१५) महान् व संहारक बुद्धि वाले जो देवगण धरती, स्वर्ग एवं अंतरिक्ष में उत्पन्न हुए हैं, वे हमें और हमारी संतान को रात-दिन जीवन भर अन्न दें. (१५) अग्नीपर्जन्याववतं धियं मेऽस्मिन्हवे सुहवा सुष्टुतिं नः. इळामन्यो जनयद् गर्भमन्यः प्रजावतीरिष आ धत्तमस्मे.. (१६) हे अग्नि और पर्जन्य! तुम हमारे यज्ञकार्य की रक्षा करो. हे शोभन आह्वान वाले देवो! हमारी सुंदर स्तुति को सुनो. तुम में से पर्जन्य अन्न उत्पन्न करता है एवं अग्नि गर्भ उत्पन्न करते हैं. तुम हमें संतान-युक्त अन्न दो. (१६) स्तीर्ण बर्हिषि समिधाने अग्नौ सूक्तेन महा नमसा विवासे. अस्मिन्नो अद्य विदथे यजत्रा विश्वे देवा हविषि मादयध्वम्.. (१७) हे यज्ञपात्र विश्वेदेव! हमारे इस यज्ञ में कुश बिछ जाने पर, अग्नि प्रज्वलित हो जाने पर एवं मेरे द्वारा स्तोत्र उच्चारण-पूर्वक तुम्हारी सेवा करने पर, तुम हव्य द्वारा तृप्त बनो. (१७) सूक्त—५३ देवता—पूषा वयमु त्वा पथस्पते रथं न वाजसातये. धिये पूषन्नयुज्महि.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे मार्गपालक पूषा! हम अन्नलाभ एवं यज्ञपूर्ति के लिए तुम्हें युद्ध में रथ के समान अपने सामने करते हैं. (१) अभि नो नर्यं वसु वीरं प्रयतदक्षिणम्. वामं गृहपतिं नय.. (२) हे पूषा! मानव हितकारी, धन के द्वारा दरिद्रता नष्ट करने वाला, प्राचीन काल में धनदानकर्त्ता एक गृहस्वामी हमें दो. (२) अदित्सन्तं चिदाघृणे पूषन्दानाय चोदय. पणेश्चिद्धि म्रदा मनः.. (३) हे दीप्तिसंपन्न पूषा! दान न देने वाले को दान करने की प्रेरणा दो एवं पणि का मन भी मृदु बनाओ. (३) वि पथो वाजसातये चिनुहि वि मृधो जहि. साधन्तामुग्र नो धियः.. (४) हे उग्र पूषा! अन्नलाभ के लिए सब रास्ते साफ करो, बाधकों को नष्ट करो एवं हमारा यज्ञकार्य पूरा करो. (४) परि तृन्धि पणीनामारया हृदया कवे. अथेमस्मभ्यं रन्धय.. (५) हे ज्ञानसंपन्न पूषा! लौहदंड द्वारा पणियों के हृदय घायल करो एवं उन्हें हमारे वश में करो. (५) वि पूषन्नारया तुद पणेरिच्छ हृदि प्रियम्. अथेमस्मभ्यं रन्धय.. (६) हे पूषा! लौहदंड से पणि का हृदय घायल करो. उसके मन में दान की प्रिय इच्छा उत्पन्न करो एवं उसे हमारे वश में लाओ. (६) आ रिख किकिरा कृणु पणीनां हृदया कवे. अथेमस्मभ्यं रन्धय.. (७) हे ज्ञानसंपन्न पूषा! पणियों के हृदयों पर चिह्न बनाओ, उनके मन कोमल करो तथा उन्हें हमारे वश में लाओ. (७) यां पूषन्ब्रह्माचोदनीमाराम् बिभर्प्याघृणे. तया समस्य हृदयमा रिख किकिरा कृणु.. (८) हे दीप्तिशाली पूषा! तुम अन्न की प्रेरणा करने वाला लौहदंड धारण करते हो. उससे सभी लोभियों के हृदयों पर निशान बनाओ एवं उन्हें कोमल करो. (८) या ते अष्ट्रा गोओपशाघृणे पशुसाधनी. तस्यास्ते सुम्नमीमहे.. (९) हे दीप्तिशाली पूषा! तुम्हारा जो लौहदंड गायों एवं पशुओं को चलाने वाला है, उसीसे हम सुख चाहते हैं. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
उत नो गोषणिं धियमश्वसां वाजसामुत. नृवत् कृणुहि वीतये.. (१०) हे पूषा! हमारे उपभोग के निमित्त हमारे यज्ञ को गाय, घोड़ा, अन्न एवं सेवक देने वाला बनाओ. (१०) सूक्त—५४ देवता—पूषा सं पूषन् विदुषा नय यो अञ्जसानुशासति. य एवेदमिति ब्रवत्.. (१) हे पूषा! हमें ऐसे विद्वान् से मिलाओ जो हमें सरल मार्ग की शिक्षा दे एवं नष्ट धन को बतावे. (१) समु पूष्णा गमेमहि यो गृहाँ अभिशासति. इम एवेति च ब्रवत्.. (२) हम पूषा की कृपा से ऐसे व्यक्ति से संगत हों, जो हमारे खोए हुए पशुओं से युक्त घर को दिखावे एवं कहे कि ये ही तुम्हारे पशु हैं. (२) पूष्णश्चक्रं न रिष्यति न कोशोऽव पद्यते. नो अस्य व्यथते पविः.. (३) पूषा का चक्ररूप आयुध कभी समाप्त नहीं होता. इसका कोश कभी खाली नहीं होता. इसकी धार भोथरी नहीं होती. (३) यो अस्मै हविषाविधन्न तं पूषापि मृष्यते. प्रथमो विन्दते वसु.. (४) जो यजमान हव्य द्वारा पूषा की सेवा करता है, उसे पूषा थोड़ी भी हानि नहीं पहुंचाते. वही सबसे धन पाता है. (४) पूषा गा अन्वेतु नः पूषा रक्षत्वर्वतः. पूषा वाजं सनोतु नः.. (५) पूषा रक्षा के लिए हमारी गायों के पीछे चलें. वे हमारे घोड़ों की रक्षा करें एवं हमें अन्न दें. (५) पूषन्ननु प्र गा इहि यजमानस्य सुन्वतः. अस्माकं स्तुवतामुत.. (६) हे पूषा! रक्षा करने के निमित्त सोमरस निचोड़ने वाले यजमान की अथवा स्तुतियां करते हुए हम लोगों की गायों के पीछे चलो. (६) माकिर्नेशन्माकीं रिषन्माकीं सं शारि केवटे. अथारिष्टाभिरा गहि.. (७) हे पूषा! हमारी गाएं नष्ट न हों, बाघ आदि उनको मारें नहीं एवं न वे कुएं में ही गिरें. तुम सुरक्षित गायों के साथ आओ. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
शृण्वन्तं पूषणं वयमिर्र्यमनष्टवेदसम्. ईशानं राय ईमहे.. (८) स्तोत्र सुनने वाले, दरिद्रता नष्ट करने वाले एवं सबके स्वामी पूषा से हम धन मांगते हैं. (८) पूषन्तव व्रते वयं न रिष्येम कदा चन. स्तोतारस्त इह स्मसि.. (९) हे पूषा! हम तुम्हारे यज्ञकर्म में लगकर कभी मारे न जावें. इस समय हम तुम्हारी स्तुति करने वाले हों. (९) परि पूषा परस्ताद्धस्तं दधातु दक्षिणम्. पुनर्नो नष्टमाजतु.. (१०) पूषा अपने दाहिने हाथ से हमारी गायों को सरल मार्ग पर चलावें एवं खोई हुई गायों को वापस लावें. (१०) सूक्त—५५ देवता—पूषा एहि वां विमुचो नपादाघृणे सं सचावहै. रथीर्ऋतस्य नो भव.. (१) हे दीप्तिशाली एवं प्रजापतिपुत्र पूषा! तुम्हारा स्तोता मेरे पास आवे. हम दोनों मिलें. तुम हमारे यज्ञ के रक्षक बनो. (१) रथीतमं कपर्द्दिनमीशानं राधसो महः. रायः सखायमीमहे.. (२) हम अतिशय रक्षक, कपर्द वाले, महान् धन के स्वामी एवं मित्र पूषा से धन मांगते हैं. (२) रायो धारास्याघृणे वसो राशिरजाश्व. धीवतोधीवतः सखा.. (३) हे दीप्तिशाली पूषा! तुम धन की धारा हो, धन का ढेर हो एवं बकरे ही तुम्हारे घोड़े हैं. तुम सभी स्तोताओं के मित्र हों. (३) पूषणं न्व१जाश्वमुप स्तोषाम वाजिनम्. स्वसुर्यो जार उच्यते.. (४) हम बकरेरूपी घोड़ों वाले एवं अन्नस्वामी पूषा की स्तुति करते हैं. वे अपनी बहिन उषा के प्रेमी कहलाते हैं. (४) मातुर्दिधिषुमब्रवं स्वसुर्जारः शृणोतु नः. भ्रातेन्द्रस्य सखा मम.. (५) हम मातारूप रात्रि के पति पूषा की स्तुति करते हैं. वे अपनी बहिन उषा के प्रेमी सूर्य से हमारी स्तुति सुनें. इंद्र के भाई पूषा हमारे मित्र हों. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—५६ देवता—पूषा
आजासः पूषणं रथे निशृम्भास्ते जनश्रियम्. देवं वहन्तु बिभ्रतः.. (६) रथ में जुड़े हुए बकरे स्तोताओं के आधार पूषा को रथ में धारण करते हुए यहां लावें. (६) सूक्त—५६ देवता—पूषा य एनमादिदेशति करम्भादिति पूषणम्. न तेन देव आदिशे.. (१) जो पूषा को घी मिले हुए जौ के सत्तू खाने वाला कहकर स्तुति करता है, उसे अन्य देवता की स्तुति नहीं करनी पड़ती. (१) उत घा स रथीतमः सख्या सत्पतिर्युजा. इन्द्रो वृत्राणि जिघ्नते.. (२) रथस्वामियों में श्रेष्ठ एवं सज्जनों के पालक पूषा देव से मिलकर इंद्र शत्रुओं को मारते हैं. (२) उतादः परुषे गवि सूरश्चक्रं हिरण्ययम्. न्यैरयद्रथीतमः.. (३) प्रेरक एवं रथस्वामियों में श्रेष्ठ पूषा सूर्य के सोने से बने रथ का पहिया भली प्रकार चलाते हैं. (३) यदद्य त्वा पुरुष्टुत ब्रवाम दस्र मन्तुमः. तत्सु मो मन्म साधय.. (४) हे बहुतों द्वारा स्तुत, दर्शनीय एवं ज्ञानसंपन्न पूषा! जिस धन-प्राप्ति के उद्देश्य से हम तुम्हारी स्तुति करते हैं, उसी धन को हमें दो. तुम प्रसिद्ध हो. (४) इमं च नो गवेषणं सातये सीषधो गणम्. आरात् पूषन्नसि श्रुतः.. (५) हे पूषा! इन गायों के अभिलाषी लोगों को गायों का समूह प्राप्त कराओ. तुम दूर देश में प्रसिद्ध हो. (५) आ ते स्वस्तिमीमह आरे अघामुपावसुम्. अद्या च सर्वतातये श्वश्च सर्वतातये.. (६) हे पूषा! हम आज और कल के यज्ञों की पूर्ति के लिए तुम्हारी रक्षा चाहते हैं. तुम्हारी रक्षा पापरहित एवं धनयुक्त होती है. (६) सूक्त—५७ देवता—इंद्र व पूषा इन्द्रा नु पूषणा वयं सख्याय स्वस्तये. हुवेम वाजसातये.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र और पूषा! आज हम अपनी भलाई के लिए, तुम्हारी मित्रता एवं अन्न पाने के लिए तुम्हें बुलाते हैं. (१) सोममन्य उपासदत्पातवे चम्वोः सुतम्. करम्भमन्य इच्छति.. (२) हे इंद्र व पूषा! तुम में से एक अर्थात् इंद्र चमस में निचुड़े हुए सोमरस पीने के लिए जाते हैं तथा दूसरे अर्थात् पूषा जौ का सत्तू खाना चाहते हैं. (२) अजा अन्यस्य वह्नयो हरी अन्यस्य सम्भृता. ताभ्यां वृत्राणि जिघ्नते.. (३) हे पूषा एवं इंद्र! तुम में से पहले को बकरे खींचते हैं एवं दूसरे को दो मोटेताजे घोड़े. इंद्र उन्हीं घोड़ों की सहायता से वृत्र को मारते हैं. (३) यदिन्द्रो अनयद्रितो महीरपो वृषन्तमः. तत्रा पूषाभवत्सचा.. (४) जब अधिक वर्षा करने वाले इंद्र गतिशील महाजल बरसाते हैं, तब पूषा उनके सहायक बनते हैं. (४) तां पूष्णः सुमतिं वयं वृक्षस्य प्र वयामिव. इन्द्रस्य चा रभामहे.. (५) जैसे कोई पेड़ की मजबूत डाल पर बैठता है, उसी प्रकार हम इंद्र एवं पूषा की कृपा का सहारा लेते हैं. (५) उत्पूषणं युवामहेऽभीशूँरिव सारथिः. मह्या इन्द्रं स्वस्तये.. (६) हम पूषा एवं इंद्र को अपने महान् कल्याण के लिए उसी प्रकार अपने पास बुलाते हैं, जैसे सारथि लगाम खींचता है. (६) सूक्त—५८ देवता—पूषा शुक्रं ते अन्यद्यजतं ते अन्यद्विषुरूपे अहनी द्यौरिवासि. विश्वा हि माया अवसि स्वधावो भद्रा ते पूषन्निह रातिरस्तु.. (१) हे पूषा! तुम्हारा शुक्लवर्णरूप अर्थात् दिन अलग है एवं कृष्णवर्णरूप अर्थात् रात अलग है. रात-दिन परस्पर भिन्न रूप वाले हैं. तुम सूर्य के समान तेजस्वी हो. हे अन्नस्वामी पूषा! तुम सब ज्ञानों को धारण करते हो. तुम्हारा दान कल्याणकारी हो. (१) अजाश्वः पशुप्रा वाजपस्त्यो धियञ्जिन्वो भुवने विश्वे अर्पितः. अष्ट्रां पूषा शिथिरामुद्धरीवृजत् सञ्चक्षाणो भुवना देव ईयते.. (२) बकरेरूप घोड़ों वाले, पशुपालक, अन्नपूर्ण घर वाले, स्तोताओं को प्रसन्न करने वाले एवं ebook converter DEMO Watermarks*
सारे संसार के ऊपर स्थापित पूषा देव सब प्राणियों को प्रकाशित करते हैं एवं लौहदंड उठाकर आकाश में घूमते हैं (२) यास्ते पूषन्नावो अन्तः समुद्रे हिरण्ययीरन्तरिक्षे चरन्ति. ताभिर्यासि दूत्यां सूर्यस्य कामेन कृत श्रव इच्छमानः.. (३) हे पूषा! तुम्हारी जो सोने से बनी हुई नावें समुद्र के बीच में चलती हैं, उनके द्वारा तुम सूर्य के दूत बनकर चलते हो. तुम अन्न की अभिलाषा करते हुए स्तोताओं द्वारा पशु भेंट करके वश में कर लिए जाते हो. (३) पूषा सुबन्धुर्दिव आ पृथिव्या इळस्पतिर्मघवा दस्मवर्चाः. यं देवासो अददः सूर्यायै कामेन कृतं तवसं स्वज्वम्.. (४) पूषा स्वर्ग एवं धरती के शोभनबंधु, अन्न के स्वामी, धनसंपन्न, दर्शनीय रूप वाले, शक्तिशाली, स्वेच्छा से भेंट किए गए पशु के कारण प्रसन्न होने वाले एवं शोभनगति हैं. देवों ने उन्हें सूर्यपत्नी को दे दिया था. (४) सूक्त—५९ देवता—इंद्र व अग्नि प्र नु वोचा सुतेषु वां वीर्या३ यानि चक्रथुः. हतासो वां पितरो देवशत्रव इन्द्राग्नी जीवथो युवम्.. (१) हे इंद्र एवं अग्नि! सोमरस निचुड़ जाने पर हम तुम्हारे उन वीरतापूर्ण कार्यों का वर्णन करते हैं, जो तुमने समय-समय पर किए हैं. देवों के शत्रु मारे गए और तुम दोनों जीवित हो. (१) बळित्था महिमा वामिन्द्राग्नी पनिष्ठ आ. समानो वां जनिता भ्रातरा युवं यमाविहेहमातरा.. (२) हे इंद्र एवं अग्नि! तुम्हारे जन्म की महिमा सच्ची एवं प्रशंसनीय है. तुम दोनों के एक पिता हैं. तुम दोनों जुड़वां भाई हो. विस्तीर्ण धरती तुम्हारी माता है. (२) ओकिवांसा सुते सचाँ अश्वा सप्ती इवादने. इन्द्रान्व१ग्नी अवसेह वज्रिणा वयं देवा हवामहे.. (३) हे इंद्र एवं अग्नि! जैसे घोड़ों का जोड़ा एक साथ घास की ओर जाता है, उसी प्रकार तुम दोनों निचुड़े हुए सोमरस की ओर गमन करते हो. हम अपनी रक्षा के निमित्त वज्रधारी एवं दानादि गुणों वाले तुम दोनों को बुलाते हैं. (३) य इन्द्राग्नी सुतेषु वां स्तवत्तेष्वृतावृधा. ebook converter DEMO Watermarks*
जोषवाकं वदतः पज्रहोषिणा न देवा भसथश्चन.. (४) हे यज्ञ की वृद्धि करने वाले इंद्र एवं अग्नि! तुम्हारा स्तोत्र प्रसिद्ध है. जो यजमान सोमरस निचोड़ जाने पर प्रीतिरहित शब्दों से तुम्हारी बुरी स्तुति करता है उसका सोमरस तुम कभी नहीं स्वीकार करते. (४) इन्द्राग्नी को अस्य वां देवौ मर्त्यश्चिकेतति. विषूचो अश्वान्युयुजान ईयत एकः समान आ रथे.. (५) हे इंद्र! एवं अग्नि! जब तुम में से एक इंद्र भांति-भांति से चलने वाले घोड़ों को रथ में जोड़कर अग्नि के साथ एक रथ में बैठकर जाता है तो कौन मनुष्य इस कार्य को जान सकता है? अर्थात् कोई नहीं. (५) इन्द्राग्नी अपादियं पूर्वागात्पद्वतीभ्यः. हित्वी शिरो जिह्वया वावदच्चरत्त्रिंशत्पदा न्यक्रमीत्.. (६) हे इंद्र एवं अग्नि! यह बिना चरणों वाली उषा चरणों वाली प्रजाओं से पहले धरती पर आती है. यह बिना शीश की होकर भी प्राणियों की वाणी से बहुत से शब्द करती हुई घूमती है. इस प्रकार यह तीस कदम आगे बढ़ गई है. (६) इन्द्राग्नी आ हि तन्वते नरो धन्वानि बाह्वोः. मा नो अस्मिन्महाधने परा वर्क्तं गविष्टिषु.. (७) हे इंद्र एवं अग्नि! युद्ध करने वाले लोग हाथों में धनुष फैलाते हैं. गायों को ढूंढने से संबंधित महान् युद्ध में तुम दोनों हमें छोड़ना नहीं. (७) इन्द्राग्नी तपन्ति माघा अर्यो अरातयः. अप द्वेषांस्या कृतं युयुतं सूर्यादधि.. (८) हे इंद्र एवं अग्नि! वार करने को तैयार एवं आक्रमणकारी शत्रुसेना हमें दुःखी कर रही है. उन्हें तुम दूर भगाओ एवं सूर्य का दर्शन भी मत करने दो. (८) इन्द्राग्नी युवोरपि वसु दिव्यानि पार्थिवा. आ न इह प्र यच्छतं रयिं विश्वायुपोषसम्.. (९) हे इंद्र एवं अग्नि! दिव्य और पार्थिव दोनों प्रकार के धन तुम्हारे ही हैं. इस यज्ञ में हमें संपूर्ण आयु को पुष्ट करने वाला धन दो. (९) इन्द्राग्नी उक्थवाहसा स्तोमेभिर्हवनश्रुता. विश्वाभिर्गीर्भिण गतमस्य सोमस्य पीतये.. (१०) हे स्तुतियां सुनकर आने वाले एवं स्तुतिमंत्रों से युक्त सुनने वाले इंद्र एवं अग्नि! हमारी ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—६० देवता—इंद्र व अग्नि
स्तुतियों से प्रसन्न होकर इस सोमरस को पीने के लिए आओ. (१०) सूक्त—६० देवता—इंद्र व अग्नि श्रथद्वृत्रमुत सनोति वाजमिन्द्रा यो अग्नी सहुरी सपर्यात्. इरज्यन्ता वसव्यस्य भूरेः सहस्तमा सहसा वाजयन्ता.. (१) वे लोग शत्रु को मारते हैं एवं अन्न प्राप्त करते हैं जो लोग शत्रुपराभवकर्त्ता इंद्र एवं अग्नि की सेवा करते हैं, वे विशाल धन के स्वामी एवं बल से शत्रुओं को बुरी तरह हराने वाले हैं. (१) ता योधिष्टमभि गा इन्द्र नूनमपः स्वरुषसो अग्न ऊळ्हाः. दिशः स्वरुषस इन्द्र चित्रा अपो आ अग्ने युवसे नियुत्वान्.. (२) हे इंद्र एवं अग्नि! यह बात सत्य है कि तुमने खोई हुई गायों, जलों, सूर्य एवं उषा के निमित्त युद्ध किया था. हे इंद्र एवं अश्वस्वामी अग्नि! तुम दोनों ने संसार को दिशाओं, सूर्य, उषाओं, विचित्र जलों एवं गायों से युक्त किया था. (२) आ वृत्रहणा वृत्रहभिः शुष्मैरिन्द्र यातं नमोभिरग्ने अर्वाक्. युवं राधोभिरकवेभिरिन्द्राग्ने अस्मे भवतमुत्तमेभिः.. (३) हे वृत्रहंता इंद्र एवं अग्नि! तुम शत्रुओं को नष्ट करने वाली शक्तियों एवं हमारे दिव्य हव्यान्नों के साथ हमारे सामने आओ. हे इंद्र एवं अग्नि! तुम दोषरहित एवं उत्तम धन लेकर हमारे सामने आओ. (३) ता हुवे ययोरिदं पप्रे विश्वं पुरा कृतम्. इन्द्राग्नी न मर्षतः.. (४) मैं उन्हीं इंद्र एवं अग्नि को बुलाता हूं, जिनके वीरतापूर्ण कर्मों का ऋषियों ने वर्णन किया है, एवं जो अपने स्तोताओं की हिंसा नहीं करते. (४) उग्रा विघनिना मृध इन्द्राग्नी हवामहे. ता नो मृळात ईदृशे.. (५) हम उग्र एवं विशेषरूप से शत्रुहंता इंद्र एवं अग्नि को बुलाते हैं. वे इस संग्राम में हमें सुखी बनावें. (५) हतो वृत्राण्यार्या हतो दासानि सत्पती. हतो विश्वा अप द्विषः.. (६) सज्जनों का पालन करने वाले इंद्र एवं अग्नि यज्ञकर्त्ताओं एवं यज्ञकर्महीन लोगों द्वारा किए हुए उपद्रव शांत करते हैं एवं सारे शत्रुओं को मारते हैं. (६) eBook converter DEMO Watermarks*
इन्द्राग्नी युवामिमे३भि स्तोमा अनूषत:. पिबतं शम्भुवा सुतम्.. (७) हे इंद्र एवं अग्नि! ये स्तोता तुम्हारी प्रशंसा करते हैं. हे सुख देने वाले इंद्र एवं अग्नि! इस सोमरस को पिओ. (७) या वां सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा. इन्द्राग्नी ताभिरा गतम्.. (८) हे इंद्र एवं अग्नि! तुम अपने उन घोड़ों पर सवार होकर आओ, जो बहुत लोगों द्वारा अभिलषित हैं एवं हव्य देने वाले यजमानों के लिए जन्मे हैं. (८) ताभिरा गच्छतं नरोपेदं सवनं सुतम्. इन्द्राग्नी सोमपीतये.. (९) हे इंद्र एवं अग्नि! इस यज्ञ में निचोड़े गए सोमरस को पीने के लिए तुम नियुतों के साथ आओ. (९) तमीळिष्व यो अर्चिषा वना विश्वा परिष्वजत्. कृष्णा कृणोति जिह्वया.. (१०) हे स्तोता! उन अग्नि की स्तुति करो जो अपनी लपटों से सभी वनों को घेर लेते हैं एवं अपनी जीभ से उन्हें काला कर देते हैं. (१०) य इच्छ आविवासति सुम्नमिन्द्रस्य मर्त्य:. द्युम्नाय सुतरा अप:.. (११) जो मनुष्य प्रज्वलित अग्नि में इंद्र के लक्ष्य से सुखदायक हवि देता है, इंद्र उसके अन्नोत्पादन के लिए शोभन जल बरसाते हैं. (११) ता नो वाजवतीरिष आशून्निपृतमर्वतः. इन्द्रमग्निं च वोळ्हवे.. (१२) हे इंद्र एवं अग्नि! हमें शक्तिशाली अन्न एवं तेज चलने वाले घोड़े दो, जिससे हम तुम्हें हव्य पहुंचा सकें. (१२) उभा वामिन्द्राग्नी आहुवध्या उभा राधसः सह मादयध्यै. उभा दाताराविषां रयीणामुभा वाजस्य सातये हुवे वाम्.. (१३) हे इंद्र एवं अग्नि! मैं विशेषरूप से तुम्हारा हवन करने के लिए, हव्य द्वारा प्रसन्न करने के लिए एवं अन्न पाने के लिए तुम्हें बुलाता हूं. तुम अन्न एवं धन देने वाले हो. (१३) आ नो गव्येभिरश्व्यैर्वसव्यै३ रुप गच्छतम्. सखायौ देवौ सख्याय शम्भुवेन्द्राग्नी ता हवामहे.. (१४) हे इंद्र एवं अग्नि! तुम गायों, घोड़ों एवं धनों के साथ हमारे पास आओ. हम इंद्र एवं अग्नि देवों को मित्रता तथा सुख के लिए बुलाते हैं. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*