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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

( ८ )

केवल इस ज्ञान खण्ड के ही पढ़ लेने से कोई पूरा ज्योतिषी नहीं बन सकता, किन्तु यह खण्ड ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान की वृद्धि में सहायक होगा, एवम् ज्योतिष शास्त्र में प्रवेश करने के लिये सच्चे मार्ग दर्शक का काम देगा।

नवीन विद्यार्थी को क्रमानुसार इसके सम्पूर्ण खण्डों का अध्ययन करना होगा। ज्ञान खण्ड अध्ययन कर लेने से ज्योतिष सम्बन्धी बहुत सी महत्त्वपूर्ण मुख्य मुख्य बातें समझ में आने लगेगी। इसमें ज्योतिषियों के लाभार्थ बहुत से उपयोगी बुटकुले भी दिये हैं। जैसे किसी का जन्म सम्बत् मास पक्ष दिन समय आदि न ज्ञात हो तो केवल कुंडली चक्र को देख कर ही ये सब बातें किस प्रकार बताई जा सकती हैं या बिना पंचांग के तिथि नक्षत्र करण वार सूर्य चन्द्र स्पष्ट आदि किस प्रकार बताये जा सकते हैं समझाया है। इनके अतिरिक्त तारीख से तिथि आदि कैसे जानना भी बताया है और अनन्त वर्षों की जन्मी देकर जन्मी बनाने की युक्ति भी बताई गई है। इस ज्ञान खण्ड के अध्ययन करने के उपरान्त आगे अध्ययन करना चाहिए। इस ज्ञान खण्ड के अध्ययन कर लेने से किसी की टिप्पणी ( संक्षिप्त जन्मपत्रिका ) बना लेना आ जाता है। अन्त में फलित सम्बन्धी मुख्य मुख्य बातें संक्षेप में बताई गई हैं जिनको जानना आवश्यक है और जिनके जान लेने पर फलित समझने की योग्यता बढ़ेगी। इसके उपरान्त ज्यों ज्यों आप आगे के और भी खण्ड अध्ययन करते जायेंगे योग्यता बढ़ती जायगी और पूर्ण अध्ययन कर लेने पर आप ज्योतिष के अच्छे जानकार अवश्य बन जायेंगे।

गणित खण्ड के अध्ययन से आप किसी की भी पूरी जन्मपत्री बना सकेंगे, और जन्मपत्र बनाने के सम्बन्ध की सम्पूर्ण बातें आप को आ जावेगी। इसमें समय ज्ञान, इष्ट साधन, ग्रह साधन, लग्न साधन, द्वादश भाव साधन, वर्ग साधन, अष्टक वर्ग साधन, ग्रह षड्वल साधन, भाव षड्वल साधन, आयु साधन, दशा साधन, अर्हण साधन, अर्हण से ग्रह साधन आदि अनेक प्रकार का गणित उदाहरण देकर सरलता पूर्वक समझाया है, जिससे नवीन विद्यार्थी को समझने में अड्डवन न हो। इसके उत्तरार्द्ध में प्रत्येक गणित की क्रिया करने की रीति भी समझाई गई है।

फलित खण्ड— फलित सम्बन्धी शेष सब बातें रहेंगी और महान् पुरुषों की कुंडली से उदाहरण देकर अभ्यास कराया जायगा जिससे फल कथन करने की योग्यता आ जायगी। यह योग्य विद्वानों के अध्यक्षता में तैयार होगा जिन्होंने सारा जीवन इसे अध्ययन कर व इसमें अनुभव प्राप्त कर फलादेश कथन में कीति प्राप्त की है।

वर्षफल खण्ड— वर्षफल बनाने का पूरा गणित उदाहरण देकर समझाया जायगा और वर्ष भर का सम्पूर्ण फल रहेगा जिससे आप अपना या किसी का भी वर्षफल बना सकेंगे।

( १ )

प्रश्न खण्ड—प्रश्न ज्योतिष सम्बन्धी सम्पूर्ण बातें रहेंगी और किसी प्रश्न का उत्तर देने का अभ्यास उदाहरण देकर कराया जायगा।

मुहूर्त खण्ड—मुहूर्त सम्बन्धी सम्पूर्ण बातें इसमें रहेंगी।

संहिता खण्ड—ज्योतिष की शेष बातें भेदनीसंहिता आदि सम्बन्धी बातें इसमें रहेंगी। इसमें वर्षों का विचार देश के फल का विचार वस्तु की महंगाई आदि का विचार इत्यादि बातें रहेंगी।

यह पुस्तक ज्योतिष के नवीन विद्यार्थी को लाभ पहुँचाने की दृष्टि से लिखी गई है। इस कारण यदि इसके प्रकाशन से जनता का कुछ भी लाभ हुआ तो मैं अपना उद्देश्य सफल समझूंगा।

पाठक यदि इस ज्ञान खण्ड को अपना कर यदि मेरा उत्साह बढ़ायेगे तो इसके इतर खण्डों के प्रकाशन में शीघ्रता होगी।

अंत में विशेष प्रार्थना है कि भूल होना मानुषीय है, यदि किसी विषय को समझाने में कोई त्रुटि हुई हो तो या अन्य प्रकार की कोई भूल हुई हो तो सज्जनों से आशा है कि क्षमा प्रदान कर भूल की सूचना देगे या अपनी कठिनाई सूचित करेंगे तो मैं अति अनुगृहीत होऊँगा और भविष्य में भूल मुधार दी जायेगी और कठिनाई दूर कर आवश्यक बातों का समावेश कर दिया जायगा।

इस खण्ड के लिखने में श्री उमाप्रसाद जी पोतदार हस्तरेखा शास्त्री और ज्योतिषाचार्य और मेरे भाई नर्मदा प्रसाद ठाकुर ( जो हस्तरेखा और ज्योतिष शास्त्र में दक्ष हैं) ने उचित परामर्श देकर बहुत सहायता की है। इसलिये उनको धन्यवाद है।

भवदीय

वी० एल० ठाकुर ज्योतिषाचार्य

सिंह सदन

नरसिंहपुर म० प्र०

नरसिंहपुर

दिनांक १८-७-१९४५

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ज्योतिष शिक्षा

( ज्ञान खण्ड )

अध्यायानुसार विषय-सूची

अध्याय विषयपृष्ठअध्याय विषयपृष्ठ
समर्पण१९ अंग्रेजी पंचांग१०२
प्राकथन२० कुण्डली विचार१०५
उद्देश्य२१ लग्न निकालना११२
१ ज्योतिष शास्त्र के भेद२२ इष्टकाल और कुण्डली बनाना११९
२ ज्योतिष शास्त्र में विश्वास२३ राशियाँ और कालांग१२४
३ सौर जगत और ग्रह२४ राशि गुण धर्म१२८
४ राशि चक्र१२२५ ग्रह विचार और स्वगृह१३०
५ नक्षत्र विचार१९२६ ग्रह की उच्च नीच
६ ध्रुव की पहिचान२१राशियाँ१३५
७ नक्षत्रों की पहिचान और चित्र२३२७ ग्रहमंजी१३८
८ राशियों के स्वरूप३६२८ ग्रहों की दृष्टि विचार१४५
९ अक्षांश देशान्तर विचार३८२९ ग्रहों का परिचय१५५
१० आकाश की कल्पित रेखाओं का स्पष्टीकरण४५३० ग्रह गुण धर्म१५६
११ ग्रहों की गति५१३१ ग्रहों का प्रभाव१६०
१२ सम्पात विचार५५३२ भाव परिचय नाम आदि१६३
१३ सायन निरयन विचार५९३३ भाव विचार१६९
१४ काल प्रमाण और वर्ष आदि विचार६०३४ धूपघड़ी बनाना१७३
१५ मास और पक्षादि विचार६७३५ बिना पंचांग के तिथि आदि ज्ञान१७६
१६ पंचांग के अंग तिथि आदि का विचार७१३६ सायन सूर्य-चन्द्र साधन१८२
१७ मुहूर्त का संक्षिप्त ज्ञान७९३७ नारीख से तिथि जानना अनन्त वर्षों की जन्मी आदि१९४
१८ पंचांग कैसे देखना और उपयोग९१३८ दिन मान चन्द्रोदय आदि जानना२१८

( १२ )

अध्यायविषयपृष्ठ
३९कुण्डली पर से जन्म सगय
ज्ञान२१६
४०ग्रह वल विचार२२०
४१तन्त्र गुण धर्म२२६
४२जन्म पत्री बनाना२२७
४३फलित सम्बन्धी स्थूल विचार२३८
४४फलित विचार करने के कुछ नियम२४३
अध्यायविषयपृष्ठ
४५गोचर विचार२५०
४६शनि का विशेष विचार२५२
४७आयुर्दाय विचार२५४
४८मारकेश विचार२५७
४९दशा साधन२५८
५०कार्यसिद्धि योग२६५
५१नवांश ज्ञान२६६

चित्रों की सूची

चित्रपृष्ठचित्रपृष्ठ
१ सूर्य के आस-पास ग्रह इस प्रकार घूमते हैं१९ मृगशिर२५
२ ग्रहों के परिक्रमा करने का क्रम२० आर्द्रा२५
३ ग्रहों के आकार का आनुपा-तिक मिलाव२१ पुनर्वसु२६
४ राहु केतु की स्थिति१०२२ पुष्य२६
५ राशि चक्र और ग्रह घूमने की दिशा व पृथ्वी के आस पास ग्रहों का घूमना११२३ आश्लेषा२६
६ राशि चक्र विषुवत वृत्त का ध्रुव१३२४ मघा२७
७ पृथ्वी की कक्षा या परिक्रमा मार्ग१३२५ पूर्वा फाल्गुनी उत्तरा फाल्गुनी२७
८ कोण१५२६ हस्त२७
९ समकोण१५२७ चित्रा२७
१० एक चक्र के समकोण१६२८ स्वाती२७
११ ऊर्ध्व रेखा के दोनों ओर के कोण१६२९ विशाखा२७
१२ कोण नापने का चक्र१७३० अनुराधा२७
१३ आकाश में अशों का अनुमान१८३१ ज्येष्ठा२८
१४ सप्त ऋषि, लघु ऋक्ष, ध्रुव और ग्रहषि२२३२ मूल२८
१५ अश्विनी२४३३ पूर्वाषाढा उत्तराषाढा२८
१६ भरणी२४३४ अभिजित२९
१७ कृत्तिका२४३५ श्रवण२९
१८ रोहिणी२४३६ धनिष्ठा२९
३७ पूर्वा भाद्रपद उत्तरा भाद्र-पद३०
३८ रेवती३०
३९ आकाश के नक्षत्रों का चित्रपट १३३
४० आकाश के नक्षत्रों का चित्रपट २३४
४१ आकाश के नक्षत्रों का चित्रपट ३३५

( १४ )

चित्रपृष्ठ
बारह राशियों के कल्पित स्वरूप
४२ मेष३७
४३ वृष३७
४४ मिथुन३७
४५ कर्क३७
४६ सिंह३७
४७ कन्या३७
४८ तुला३८
४९ वृश्चिक३८
५० धन३८
५१ मकर३८
५२ कुंभ३८
५३ मीन३८
५४ अक्षांश और देशान्तर३९
५५ ध्रुव की ऊँचाई का नाप४२
५६ इलाहाबाद में मध्याह्न में
सूर्य की ऊँचाई४३
५७ नरासिंह पुर में मध्याह्न में
सूर्य की ऊँचाई४३
५८ नाड़ीवृत्त, क्रांतिवृत्त, भोग
और शर४८
५९ दूसरा उदाहरण शर भोग
आदि का४९
६० क्षितिज, क्रांतिवृत्त,
नाड़ीवृत्त ध्रुव५०
६१ सम्पात बिन्दु५५
६२ क्रांति सीमा नाड़ी वृत्त
आदि५६
६३ आकाश में पूर्व दशम अस्त
पाताल१०६
६४ आकाश की दिशाओं दर्शक
चित्र१०६
चित्रपृष्ठ
६५ आकाश का चौकोर चित्र१०८
६६ लग्न दशम अस्त पाताल
दर्शक चौकोर चित्र१०९
६७ आकाश में द्वादश भाव११०
६८ लग्न कुंडली११०
६९ भाव सूचक लग्न कुंडली१११
७० आकाश में लग्न से अस्त
तक भाव११६
७१ राशियों के घूमने का क्रम
और स्वराशि१३२
७२ स्वराशि दर्शक चित्र१३३
७३ ग्रह की दृष्टि सूचक चित्र
ग्रहों के कल्पित स्वरूप के चित्र१४६
७४ रवि१५९
७५ चन्द्र"
७६ मंगल"
७७ बुध"
७८ शुक्र"
७९ शुक"
८० शनि"
८१ राहु"
८२ केतु"
८३ ध्रूपघड़ी बनाना१७४
८४ ध्रूपघड़ी का चक्र बनाना१७५
८५ समय सूचक चक्र और ध्रुव
का अक्षांश१७५
८६ सू्मि पर ध्रूपघड़ी बनाना
८७ कुण्डली के भिन्न-भिन्न प्रकार
और पाश्चात्य पद्धति से कुंडली२३३-२३६
८८ दिशाओं की राशियाँ
और भाव२६७

३३

ज्योतिष-शिखा

[ प्रारम्भिक ज्ञानखण्ड ]

बुद्धि विनायक विघ्न हर, बिनवों बारम्बार । विनय करू वागीश की, विमल बुद्धि दातार ॥ १ ॥ जय महेश जिन तन लसै, वर नक्षत्र की माल । जाकी आज्ञा से भ्रमत, ग्रह आदिक अरु काल ॥ २ ॥ ग्रह प्रभाव से प्रगट हो, पूर्व जन्म का कर्म । कष्ट कटै प्रभु ध्यान से, अरु प्रगटै शुभ धर्म ॥ ३ ॥ धरू ध्यान कल्याण हित, किरपा करहु कृपाल । शीघ्र पूर्ण हो ग्रन्थ यह, दो शस्ती तत्काल ॥ ४ ॥

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अध्याय १

ज्योतिष शास्त्र के भेद

ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन करने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि ज्योतिष शास्त्र के कितने भेद हैं। इसके मुख्य दो भेद हैं—

( १ ) गणित ज्योतिष Astra-Nomy ( एस्ट्रा नमी ) = जिससे पंचाङ्ग आदि बनाये जाते हैं।

( २ ) फलित ज्योतिष Astra-logy ( एस्ट्रा लजी ) = जिससे ग्रहों के फल का विचार होता है।

इनके भी कई भेद हो गये हैं जो नीचे समझाये जाते हैं:—

१ गणित ज्योतिष—इससे ग्रहों का स्वरूप अवस्था गति आदि का निश्चय किया जाता है। इसके तीन भेद हैं—

( १ ) सिद्धान्त—जिसमें कल्प ( सूक्ति के आदि ) से ग्रह आदि स्पष्ट करने के लिए गणित करने की रीति दी है।

( २ ) तन्त्र—जिसमें युग ( वर्तमान कलियुग ) से गणित करने की रीति दी है।

( ३ ) करण—जिसमें इष्ट शाका से गणित करने की रीति दी है।

गणित ज्योतिष के अन्तर्गत वह गणित भी है जिसमें जोडना, घटाना, गुणा, भाग वर्गमूल आदि निकालना तथा भूमि, आकाश आदि के नापने की विधि बतलाई गई है। इसी गणित द्वारा ग्रहों की स्थिति आदि निकाली जाती है।

२ फलित ज्योतिष ( नजूम )—ग्रहों की स्थिति पर से शुभाशुभ फलों का विचार इससे होता है। इसके भेद इस प्रकार हैं—

( १ ) होरा अर्थात् जातक—आधान कुंडली से दुःख सुख का विचार।

( २ ) ग्रहूत—कार्य आरम्भ करने में ग्रह, तिथि, नक्षत्र, वार आदि के प्रमाण से शुभाशुभ फल का विचार।

( ३ ) ताजिक—वर्ष प्रवेश, मास प्रवेश, दिन प्रवेश आदि बनाकर वर्ष भर के शुभाशुभ फल का विचार।

( ४ ) प्रश्न ज्योतिष—किसी भी समय इष्टकाल पर से किसी भी प्रश्न का तत्सम्बन्धी दुःख सुख आदि के परिणाम का विचार।

( ५ ) मेदनीय किंवा राष्ट्र ज्योतिष—किसी देश या राष्ट्र की उन्नति-अवन्ति दुःख सुख आदि का विचार।

( ६ ) संहिता खण्ड—किसी सम्बत का शुभाशुभ, भूकम्प, इन्द्र धनुष, केतु उदय आदि का फल, शुभाशुभ शकुन, शरीर बिल्ह द्वारा मरण होने का ज्ञान, स्वरोदय, पल्लीपतन, सामुद्रिक, अङ्ग स्फुरण आदि का विचार।

अध्याय २

ज्योतिष शास्त्र में विश्वास

इस ग्रन्थ में फलित ज्योतिष का अध्ययन करने के लिए ही प्रारम्भिक बातें बताई गई हैं। फलित ज्योतिष में कई मनुष्य विश्वास करते हैं कई नहीं करते और कहते हैं कि यह इतने दूर होते हुए पृथ्वी पर किस प्रकार प्रभाव पहुँचा सकते हैं। इस कारण प्रारम्भ में ही संक्षेप में ग्रहों के प्रभाव के विषय में थोड़ा बता देना अनावश्यक न होगा।

यह निर्विवाद सिद्ध है कि सूर्य के आस-पास पृथ्वी आदि कई ग्रह परिक्रमा करते हैं और समस्त ग्रह आदि एवं सूर्य अन्ततः विश्व के अन्तरिक्ष में निराधार लटके हुए निरन्तर नियमित रूप से गतिशील रहते हैं। सूर्य के आस पास चन्द्र सहित पृथ्वी एवं बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि आदि ग्रह घूम रहे हैं। इन सबों के समुदाय को सौर जगत् या सूर्य का परिवार कहते हैं।

ये सब ग्रह सूर्य की आकर्षण शक्ति के वशीभूत होकर विशेष नियम के अनुसार सूर्य के आस पास घूम रहे हैं। इनमें प्रत्येक ग्रहों की भी पृथक-पृथक आकर्षण शक्ति है जिसे पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा, पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से खिंचा हुआ पृथ्वी के आस पास घूम रहा है और सूर्य की आकर्षण शक्ति से खिंचे हुए चन्द्र और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। इसी प्रकार शनि आदि ग्रहों के भी उपग्रह हैं जो उन ग्रहों के आकर्षण के प्रभाव से इन ग्रहों की परिक्रमा करते हुए सूर्य के आकर्षण से प्रभावित होकर सूर्य की भी परिक्रमा कर रहे हैं।

पृथ्वी से १.३६ लाख मील दूर होते हुए भी जब समस्त पृथ्वी पर सूर्य की आकर्षण शक्ति का प्रभाव पड़ता है तो पृथ्वी में रहने वाले जड़ एवं चैतन्य पशु-पक्षी, मनुष्य आदि भी सूर्य के प्रभाव से प्रभावित होने से कैसे बच सकते हैं।

प्रत्यक्ष देखने में आता है कि जब सूर्य विशेष राशियों में आता है तो किस प्रकार जाड़ा, गर्मी, बरसात आदि ऋतुओं में परिवर्तन होता है जिसका प्राणी मात्र पर प्रभाव पड़ता है। सूर्य के ही कारण प्रकाश, उष्णता, ग्रह गति होती है। सूर्य न हो तो प्राणी मात्र का जीना असम्भव हो जाय। आज कल सूर्य की किरणों से चिकित्सा भी होने लगी है।

प्रातः काल सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं। मध्याह्न में सीधी पड़ती है और रात्रि में किरणों का अभाव रहता है। इस प्रकार जैसे समय में जिस बालक का जन्म हो उस समय का प्रभाव उसके स्वभाव में परिणत हो जाता है। अर्थात् समय के अनुसार ही स्वभाव पड़ जाता है। भीष्म में ( वृष और मिथुन के सूर्य में ) सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं। हेमन्त ऋतु में ( वृश्चिक-धनु के सूर्य में ) तिरछी पड़ती

ज्योतिष शास्त्र में विश्वास : ३

है। इस लिए इन सूर्य की राशियों में जिस बालक का जन्म होगा उसी के अनुसार शरीर में प्रभाव बढ़ेगा।

सूर्य का प्रभाव पौधों और वृक्षों पर भी पड़ता है। वर्षा ऋतु में इस्लिया अधिक उत्पन्न होती है और कृषि को हानि पहुँचाती है। बुखार का प्रकोप भी समयानुसार बढ़ता है। इस प्रकार समस्त जड़ चैतन्य पर सूर्य का प्रभाव पड़ता है। सब ग्रहों में सूर्य बड़ा बलवान् है इसी कारण सूर्य को मनुष्य की आत्मा कहा है।

जहाँ जो जिस परिस्थिति में उत्पन्न हुआ है वही उसका प्राकृतिक स्वभाव बन जाता है। इसी प्रकार विशेष ग्रह स्थिति और समय से उत्पन्न बालक का विशेष स्वभाव बन जाता है। जैसे ठंडी प्रकृति में उत्पन्न हुए वृक्ष को यदि उष्ण प्रकृति के स्थान में लगाओ तो नहीं होगा, यदि हुआ भी तो शक्ति हीन, रोगी होगा। कारण कि ठंडे वातावरण में उत्पन्न होने से उसका जीवन भी जन्म समय के वातावरण से प्रभावित होकर वहाँ की प्रकृति का स्वभाव ग्रहण करता है। इसी कारण भिन्न-भिन्न स्थिति में उत्पन्न हुए बालकों की प्रकृति भी भिन्न-भिन्न हो जाती है। किसी विशेष ग्रह का प्रभाव भिन्न-भिन्न मनुष्यों पर भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है।

Dr. Maurice Faure (डाक्टर मारिस फाउर) ने सन् १९२७ में फ्रेंच अकादमी के समक्ष डाक्टरी और ज्योतिष सम्बन्धी रिकार्ड उपस्थित कर बताया था कि सूर्य के धब्बे भी सूर्य के आस पास एक ही दिशा में परिक्रमा करते हैं। २५६ दिन में उनकी एक परिक्रमा होती है। जब धब्बे दिखाई देते हैं तो उस समय साधारण मृत्यु संख्या से दुगुनी मृत्यु संख्या हो जाती है। इसका पूरा प्रमाण भी उपस्थित किया गया था।

चन्द्र का प्रभाव सूर्य से दूसरे नम्बर का है। इसका महत्तम पृथ्वी से अन्तर २५२९४८ मील है। यह पृथ्वी के सब ग्रहों से समीप होने के कारण अधिक प्रभावित करता है। चन्द्र की भी आकर्षण शक्ति समुची पृथ्वी पर पड़ती है, जिससे जड़ चैतन्य सभी प्रभावित हो रहे हैं। प्रत्यक्ष में देखा जाता है कि चन्द्र की घटावृद्धी के कारण समुद्र की लहरों पर प्रभाव पड़ता है। पूर्णिमा को ज्वारभाटे का पूर्ण प्रभाव देखने में आता है। जब समुद्र सरीखे जड़ पदार्थ पर भी इतना प्रभाव पड़ता है कि जल राशि को अपनी ओर आकर्षित कर बड़ी-बड़ी लहरों का उत्पादक होता है तो यह इतर प्राणियों पर क्यों न प्रभाव करेगा ?

मनुष्य के चित्त पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ता है, इसी कारण चन्द्रमा को मनुष्य का मन कहते हैं। बहुधा देखा जाता है कि चन्द्र के घटाव वृद्धाव का प्रभाव पागल पर अधिक पड़ता है। इसी कारण पागलपन को चन्द्र के नाम से अंग्रेजी में लूनेसी Lunecy कहते हैं। सर इसाक न्यूटन Isaac Neutan ने सिद्ध कर बताया है कि पागलपन चन्द्र से सम्बन्धित है और मानसिक दशा पर चन्द्र का बहुत प्रभाव पड़ता है।

४ : सचिन ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

केवल जीवों पर ही नहीं वनस्पतियों आदि पर भी इसका पूरा प्रभाव पड़ता है। जंगल में जो दास आदि उजले पक्ष में काटे जाते हैं, वे शीघ्र घुन जाते हैं क्योंकि शुक्ल पक्ष का अधिक प्रभाव वृक्ष आदि की उत्पादक शक्ति पर पड़ता है। इससे उनमें कीड़े शीघ्र उत्पन्न हो जाते हैं।

अभी ब्रिटिश कालोनीयल (उपनिवेश) आफिस के विशेषज्ञ ने खोजकर प्रगट किया है कि मछलियों पर चन्द्र का विशेष प्रभाव पड़ता है। पूर्णमासी के समय मछलियों अधिक पकड़ी जाती है, कृष्ण पक्ष में इस सम्बन्ध से लाभजनक स्थिति नहीं रहती।

खोज से यह भी पता लगा है कि अपनी मध्यान्ह रेखा के अनुसार चन्द्र की विशेष तिथियों को ही ओस्टर और मुसेल (घोंघा मछलियों की जाति) अपने घोंघे खोलते और अपना पालन करते हैं।

इसी प्रकार इतर ग्रहों को भी आकर्षण शक्ति सूर्य की आकर्षण शक्ति से प्रभावित होकर पृथ्वी आदि समस्त ग्रहों पर प्रभाव उत्पन्न करती है और वे ग्रह भी अपने डीलडोल के अनुसार सम्पूर्ण सूर्य सम्प्रदाय पर प्रकाश डालते हैं तो फिर जीव जन्तु वनस्पति आदि प्रभावित होने से कैसे बच सकते हैं?

ग्रह के प्रभाव से हीरा आदि अमूल्य रत्न भी अपना विचित्र प्रभाव धारण करते हैं।

अभी हाल में एक होप (आशा) नाम के प्रसिद्ध हीरे के विचित्र प्रभाव की कथा प्रकाशित हुई थी। यह हीरा जिसके-जिसके पास गया उसका नाश हुआ। यह हीरा भारतवर्ष के किसी मन्दिर की मूर्ति की आँख में लगा था। वह किसी प्रकार वेलजियम के निवासी के हाथ लगा। उसने फ्रांस के बादशाह लुइस-१४ को बेचा। पश्चात् मेरी एण्टोनिटी ने उसे पहिला, उसकी बपबाद से मृत्यु हुई। अमस्टरडम के विलियम फेल्स ने उस हीरे को काटा, उसका सर्वनाश हुआ। फ्रांसिस बिकलिङ्ग ने उसे प्राप्त किया, उसकी मृत्यु क्षुधा पीड़ा से हुई। सन् १९०१ में इसका कोलोट ने उसे मोल लिया, उपघात से उसकी मृत्यु हुई। उपरान्त वह होरा रूस के राजकुमार कन्टोस्की के पास पहुँचा जिसने अभिनय के समय एक सुन्दर नर्तकी को पहिनने को दिया था, वह अभिनय करते समय गोली से मारी गई। उपरान्त राजकुमार भी शस्त्राघात से मारा गया। इसके बाद वह हीरा किसी यूनान निवासी के पास पहुँचा, उसकी अपनी स्त्री और बच्चे सहित फिसलने से मृत्यु हुई। पूर्व सुल्तान अब्दुल हमीद ने वह हीरा कान्स्टेननोपल में अपनी प्रेमिका को पहिनने को दिया वह गोली से मारी गई। बाद में हवीब नाम के अरबीनियन के पास पहुँचा। वह सिंघापुर में डूब कर मर गया। सन् १९११ में एवलिन मेकलीन ने उसे मोल लिया, उसका लड़का विन्सेन्ट मोटर से दब कर मर गया; स्त्री भिसेस एवलिन मेकनील रेनोल्ड ने उसे पहिला तो उसकी अचानक मृत्यु हो गई।

इन्हीं सब सिद्धान्तों पर पाश्चात्य देशों में भी ग्रहों के प्रभाव को मान कर फलित ज्योतिष पर विश्वास करने लगे हैं। यहाँ तक कि भविष्य कथन करते हैं। उनके

ज्योतिष शास्त्र में विश्वास : ५

सम्बन्ध की बातें भी प्रमाणित की जाती हैं कि कहाँ तक भविष्य कथन सत्य निकला जिन पर विचार करने से भविष्य कथन की सत्यता पर लोगों का विश्वास होने लगा है।

प्रायः यह भी देखा जाता है कि कई लोगों की भविष्यवाणी असत्य भी निकल जाती है। इसका मुख्य कारण कल्पना शक्ति है। क्योंकि यह तो कल्पना और तर्क शास्त्र है, जिसमें कल्पना और तर्क करने के सिद्धान्त दिये हैं, उनमें वे प्रभाव घटित होने का संकेत मिलता है। यदि कल्पना में भूल हुई तो भविष्य कथन में अवश्य अन्तर पड़ेगा। डाक्टर जो कई वर्षों तक अंग्रेजी पढ़ कर डाक्टरी विद्या अध्ययन कर पद प्राप्त करता है, जब डाक्टर होकर किसी रोग का निदान करता है तो उस रोग के विषय में भिन्न-भिन्न डाक्टरों की भिन्न-भिन्न राय हो जाती है। जब असली रोग की जड़ पा जाते हैं तो निदान पक्का हो जाता है।

इस विषय में श्री स्टेनली लीफ इंग्लैण्ड के प्रमुख प्राकृतिक चिकित्सक एवं “हैलथ फार आल” मासिक पत्रिका के सम्पादक ने लिखा है। सर डेविड ब्रुमंड ने ग्लासगो की रायल फेकल्टी आफ सर्जरी के सभापति की हैसियत से अपने भाषण में कहा था कि ‘शव परीक्षा से यह बात अलीसांति प्रमाणित हो चुकी है कि औसत दर्जे के चिकित्सकों का निदान ८० प्रतिशत गलत हुआ करता है’।

बोस्टन के सुप्रसिद्ध चिकित्सक और निदान शास्त्री डाक्टर रिचर्ड केवट ने, जिन्होंने निदान पर एक शास्त्रीय पुस्तक लिखी और हार्वर्ड विश्वविद्यालय में सम्मानित अध्यापक है, अमेरिकन मेडिकल असोसियेशन के वार्षिक अधिवेशन में अपने विस्तृत अनुभव के आधार पर लिखित एक निबन्ध प्रस्तुत किया था। जिसमें उन्होंने एक हजार रोगियों का विवरण देकर विश्लेषण कर यह परिणाम निकाला था कि सब मिलाकर ५० प्रतिशत निदान सही और ५० प्रतिशत बिल्कुल गलत थे।

हृदय रोग के प्रसिद्ध चिकित्सक सर जेम्स मैकेंजी ने अपनी मृत्यु के कुछ समय पूर्व एक भाषण में यह धारणा व्यक्त की थी कि जीवन पर्यन्त अनुसंधान और शव-परीक्षण करने के उपरान्त मैं इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि चिकित्सक लोग साधारण रोगों में ७० प्रतिशत गलत निदान करते हैं। असाधारण रोगों में यह संख्या और अधिक होगी। जब उन्नति के शिक्षर पर पहुँची डाक्टरी विद्या का यह हाल है तो फिर ज्योतिष शास्त्र को क्यों बदनाम किया जाता है ?

इसी प्रकार बड़े-बड़े जज जो अनेक वर्षों तक विद्या अध्ययन कर कानूनों पुस्तकों का पूरा ज्ञान प्राप्त कर चुकते हैं किसी अभियोग का निर्णय कर अपराधी को प्राण दण्ड की सजा देते हैं। परन्तु अपील करने पर ऊँची अदालत उस जज के निर्णय को पलट कर अपराधी को उन्हीं साक्षियों के आधार पर निर्दोष पाकर छोड़ देती है। इसी को कहते हैं विचार शक्तियों में अन्तर। विचार करने में असावधानी या कोई विशेष बात की सूझ का अभाव या समझ की भूल वहाँ पर होने के कारण फल कथन में अन्तर पड़ सकता है।

६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इस कारण बड़ी सावधानी से ज्योतिष के एक-एक विषय का क्रम पूर्वक अध्ययन और मनन करने की आवश्यकता है। अनुभव होने पर उसका परिणाम प्रत्यक्ष गोचर होने लगेगा।

अध्याय ३

सौर जगत् और ग्रह Solar System and Planets

उस सर्वव्यापी जगन्निर्मिता परमेश्वर की लीला कितनी विचित्र है। आप आकाश की ओर ध्यान दें तो विदित होगा कि आकाश में अनेक तारागण अक्षर में लटके हुए हैं। आकाश में करोड़ों तारागण हैं जो साधारण दृष्टि से गोचर नहीं होते। उनमें कई तारागण तो केवल बड़ी-बड़ी दूरबीनों के सहारे ही देखे जा सकते हैं।

अन्य तारागणों के मध्य तारागणों का एक मंडल है जिसे सौर जगत् या सौर परिवार या सूर्य सम्प्रदाय कहते हैं। उनके मध्य में अपना एक ही सूर्य है जिसके आस पास अपनी पृथ्वी और इतर ग्रह बुध, शुक्र, गुरु आदि परिक्रमा करते हैं, जिन सबका सूर्य से सम्बन्ध है और जो सब, सूर्य की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से सूर्य को छोड़ कर कहीं दूसरी जगह भटक कर नहीं जा सकते। इसी कारण इन सब ग्रहों के समुदाय को और उन तारागणों को जो इन ग्रहों की परिक्रमा के मार्ग के आस पास पड़ते हैं, सौर जगत् कहते हैं।

आकाश में कई प्रकाशवान् तारागण दिखते हैं। उनमें कई तो अपने सूर्य से भी कई गुने बड़े हैं। बहुत बूरी के कारण यहाँ से छोटे दिखते हैं। इसी प्रकार जो ग्रह शुक्र, गुरु आदि देखने में छोटे दिखते हैं बड़े भीमकाय ग्रह हैं, जो अक्षर में लटके हुए हैं। इन सबके आकार आदि का वर्णन आगे होगा।

एक विचित्र तारे का पता लगा है जो सूर्य से १६० गुना बड़ा है। १० हजार वर्ष में उसका प्रकाश पृथ्वी पर पहुँचता है और वह पृथ्वी से ५२५६० लाख मील की दूरी पर है। ऐसे कई तारे हैं जो सूर्य से करोड़ गुना तेजस्वी हैं। इस प्रकार आकाश में अनेक सूर्य हैं। उनमें से अपना सूर्य एक हैं और इस अपने सूर्य का परिवार अलग है और इस परिवार के ग्रह इसी सूर्य की परिक्रमा करते हैं।

खोज से पता लगा है कि अपना सौर जगत् किसी और शक्तिशाली सूर्य के आस पास अपने परिवार सहित घूम रहा है। कृतिका नक्षत्र को केन्द्र मान कर अपना सौर जगत् घूम रहा है। अमेरिकन साइन्टिस्ट्स असोसियेशन ने कई वर्षों की जाँच के उपरान्त बताया है कि अपना सूर्य एक सेकेन्ड में १३० मील के हिसाब से Dragon बूँगो (बजगर) नक्षत्र की ओर अपने परिवार सहित घूम रहा है। यह नक्षत्र उत्तर ध्रुव तारे के पास है।

सौर जगत् और ग्रह : ७

ग्रहों के ज्योतिष शास्त्र का सम्बन्ध केवल अपने सौर जगत् से है। महर्षियों ने सूर्यादि सब ग्रहों की गति प्रभाव आदि का पूर्ण अध्ययन कर और अनुभव कर जिस शास्त्र का निर्माण किया है उसे ज्योतिष शास्त्र कहते हैं।

ग्रह ( Planets )

अपने सौर जगत् में सूर्य सब ग्रहों का प्रधान और केन्द्र है। उसके आस पास ग्रह घूमते हैं। चित्र संख्या १ और २ से, सूर्य से ग्रहों की दूरी का और ग्रहों की परिक्रमा का क्रम समझ पड़ेगा।

सूर्य की परिक्रमा करने वाले ग्रहों में पृथ्वी को छोड़ कर शेष ग्रहों के नाम नीचे दिये हैं।

क्रम ग्रहअंग्रेजी नामफारसी नामअंग्रेजी चिन्हहिन्दी चिन्ह
१ सूर्यSunसनआफताब
२ चंद्रमाMoonमूनमाहताव
(कमर)चं.
३ मंगलMarsमार्समिर्रिख
४ बुधMercuryमरकरीउताखद
५ गुरु
(बृहस्पति)Jupiterजुपीटरमुश्तरी
६ शुक्रVenusवीनसजुहरा
७ शनिSaturnसेटर्नजुहल
८ राहुCaputकेपुटरास
या Dragon's Headडेगोन्स हैड
या Ascending Nodeअसेन्डिंग नोड
९ केतुCaudaकअडाजनव
या Dragon's Tailड्रैगोन्स टेल
या Descending Nodeडिसेन्डिंग नोड
१० वरुणNaptuneनेपच्यून
या
११ प्रजापतिHerschelहरशल
या Uranus

८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

चित्र संख्या १—सूर्य के आसपास ग्रह इस प्रकार घूमते हैं ।

ग्रह और तारे में अन्तर

किसी निर्मल रात्रि को आकाश की ओर देखें तो अनेक तारागण दृष्टि गोचर होंगे; उनमें मुख्य दो प्रकार के तारागण हैं । एक साधारण तारे और दूसरे ग्रह ।

इनमें से ग्रह और तारे इस प्रकार पहिचाने जा सकते हैं—

सौर जगत् और ग्रह : ९

(१) तारे Stars : आकाश में कई तारे ऐसे हैं जो स्वयं प्रकाशवान् हैं। ऐसे तारागण रात्रि को दीपक की लंब सदृश जुग जुगाते दिखाई देते हैं अर्थात् उनके प्रकाश की लंब या किरणें छोटी बड़ी होती दिखाती हैं। इन्हें तारागण कहते हैं।

(२) ग्रह Planets : दूसरे प्रकार के ऐसे तारे दिखेंगे जिनका प्रकाश एक-सा रहता है अर्थात् जुग जुगाते नहीं दिखते। ऐसे दिखते हैं जैसे बिना लंब की अंगार हो जिनका एक सरीखा प्रकाश दिखाता है। ये ग्रह सूर्य के प्रकाश पड़ने से प्रकाशित होते हैं। वे स्वतः प्रकाशवान् नहीं हैं। ये ही ग्रह कहलाते हैं।

शुक्र ग्रह सूर्य के उदय होने के बहुत पहिले आकाश में देखा जाता है। इसे लोग 'भुन सरिया' तारा भी कहते हैं और उसे अधिकतर लोग इसे पहिचानते हैं। इसको ध्यान से देखो तो समझ पड़ेगा कि यह तारा है या ग्रह। कभी यह शुक्र ग्रह सूर्यास्त के बाद दिखाता है तब भी इसे पहिचान सकते हैं।

प्रतिदिन शुक्र, गुरु आदि ग्रहों और इतर तारागणों को अवलोकन करते रहने से ग्रह और तारागण में अन्तर समझ पड़ेगा।

अंग्रेजी के ज्योतिष ग्रन्थों में ग्रहों के स्थान में उपरोक्त चिन्हों का उपयोग हुआ

चित्र संख्या ३-ग्रहों के आकार का अनुपातिक मिलाप

है उस कारण उन चिन्हों को ध्यान में रखना चाहिए। इनमें से केवल ९ मुख्य ग्रह हैं। हर्शल और नेपच्यून ग्रह नवीन खोज किये हुए हैं और पाश्चात्य पद्धति में उनका भी वर्णन रहता है इस कारण उनको भी बता दिया है, जिनको मिलकर ११ ग्रह हो जाते हैं। इस प्रकार हर्शल और नेपच्यून के निकालने से बचे हुए ९ ग्रहों में से ७ ग्रह आकाश में दिखते हैं। दो ग्रह राहु और केतु अवश्य ग्रह हैं।

राहु-केतु

यद्यपि राहु और केतु की गणना ग्रहों में की गई है परन्तु वास्तव में ये ग्रह नहीं हैं। इनको अप्रकाश ग्रह Shadow Planets कहते हैं। अर्थात् आकाश में ये ग्रह नहीं दिखते और न इनका कोई आकार ही है। पृथ्वी के आस-पास चन्द्रमा परिक्रमा

१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

करता है और चन्द्रमा सहित पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। इस प्रकार पृथ्वी की परिक्रमा की परिधि को चन्द्र अपनी परिक्रमा में दो जगह काटता है। अर्थात् पृथ्वी और चन्द्र की परिक्रमा की परिधि एक दूसरे को दो जगह काटती है, उनमें से एक बिन्दु को राहु कहते हैं जो नीचे से ऊपर की ओर जाने वाला बिन्दु है। और दूसरे बिन्दु को जो उसके ठीक विपक्ष है, केतु कहते हैं। यह ऊपर से नीचे जाने वाला बिन्दु है इसीसे राहु को Ascending Node (असेन्डिंग नोड) और केतु को Descending Node (डिसेन्डिंग नोड) भी कहते हैं।

ये दोनों ग्रह बिन्दु मात्र हैं। एक दूसरे से सदा ६ राशि के अन्तर पर रहते हैं और सदा दूसरे ग्रहों की दिशा से विरुद्ध क्रम से चलते हैं। जब चन्द्रमा पूर्णमासी के समय या सूर्य अमावस्या के समय इन्हीं पातों के पास पहुँचता है तो चन्द्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण होता है। इस कारण राहु और केतु को भी ग्रह माना गया है।

जिस प्रकार चन्द्र और सूर्य ग्रहण के समय संसार के वातावरण में विचित्र प्रभाव

चित्र संख्या ४—राहु केतु की स्थिति

होता है इसी प्रकार राहु केतु की स्थिति के कारण भी अनुष्ठ पर प्रभाव पड़ता है। चित्र संख्या ४ से राहु केतु की स्थिति समझ में आवेगी।

पृथ्वी का प्रमण-मार्ग ही सूर्य का प्रमण-मार्ग कहा जाता है। इसे ही क्रान्ति वृत्त कहते हैं। इसी प्रकार चन्द्र पृथ्वी की परिक्रमा करते समय क्रान्ति वृत्त को २ स्थानों में काटता है जो चित्र संख्या ४ में तीर की नोक से बताये गये हैं इन्हीं स्थानों को चन्द्र के पात भी कहते हैं।

देखें चित्र संख्या ४। चन्द्रमा अ बिन्दु में पहुँचकर आ होते हुए अ बिन्दु पर जाता है इसलिए इस बदाव के बिन्दु अ को उत्तर पात या राहु कहते हैं। चन्द्रमा

सीर जगत् और ग्रह : ११

व बिन्दु से बा होते हुए अ बिन्दु पर जाता है इस व बिन्दु को दक्षिण पात या केतु कहते हैं।

चित्र संख्या ५

राशिचक्र और ग्रहों के घूमने की दिशा सूचक चित्र, इसमें पृथ्वी के आस-पास ग्रह घूमते हुए बताये हैं।

चन्द्रमा जिस मार्ग में परिक्रमा करता है उसे चन्द्रकक्षा कहते हैं। चन्द्रकक्षा क्रान्ति वृत्त को लगभग ५ अंश कोण बनाये हुए काटती है। अर्थात् जहाँ चन्द्र का मार्ग पृथ्वी के मार्ग को काटता है वहाँ लगभग ५ अंश का कोण बनता है इसी कोण को चन्द्र का विशेषण कहते हैं। विशेषण = शर = Celestial Latitue

सूर्य स्थिर है

सूर्य बाकाय में पूर्व दिशा में उदय होता है और पश्चिम में अस्त होते दिखता है, परन्तु वास्तव में सूर्य स्थिर है। पृथ्वी इतर ग्रहों के सदृश पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है इस कारण पृथ्वी लोक के रहने वालों को सूर्य प्रमण करता हुआ