सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १
Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
१२ : सचित्र ज्योतिष विद्या, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
दिखता है। परन्तु ज्योतिष शास्त्र में गणित की सुविधा के लिए पृथ्वी को स्थिर मान कर सूर्य को चलित माना है। चाहे सूर्य को या पृथ्वी को स्थिर मानें परन्तु उनकी स्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ता। सूर्य को चलित मान लेने में गणित में बहुत सरलता प्रतीत होती है। इसी कारण सूर्य को चलित माना है परन्तु वास्तव में सूर्य स्थिर है इसका ध्यान रहे।
पृथ्वी ग्रह के स्थान में सूर्य ग्रह मानकर जो सूर्य का गणित किया जाता है वह पृथ्वी का ही गणित है। पीछे चित्र क्रम संख्या ५ में पृथ्वी को केन्द्र मानकर सूर्य आदि ग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए बताये गए हैं।
राशि-चक्र पूर्व से पश्चिम की ओर घूमता है जिससे पहिले भेष फिर वृष इत्यादि क्रमानुसार राशियाँ आकाश में उदय होती दिखाई देती हैं। परन्तु ग्रह पश्चिम से पूर्व की ओर घूमते हैं जैसा चित्र संख्या ५ में तीर द्वारा समझाया गया है।
इस राशि-चक्र में प्रत्येक राशियों के अंश भी बताये गए हैं जिनमें २ अंश का एक छोटा घर है। सब नक्षत्र और राशियाँ पूर्व (लम्ब = उदय स्थान) से शिरोबिन्दु (आकाश = क्षय स्थान) की ओर जाते दिखते हैं। और शिरोबिन्दु से पूर्व ( लम्ब ) की ओर चलते हैं।
अध्याय ४
राशिचक्र Zodiac
आकाश में सूर्य जिस मार्ग से भ्रमण करते हुए दिखता है उसे क्रान्तिवृत्त Ecliptic कहते हैं। इसे आपामंडल या क्रांतिमंडल भी कहते हैं। देखें चित्र संख्या ६। सब ही ग्रह इसी मार्ग से या इसके समीप होकर सूर्य की परिक्रमा करते हैं। इसे रवि का मार्ग भी कहते हैं क्योंकि सूर्य एक वर्ष में १२ राशियों में प्रायः इसी मार्ग से एक बार परिक्रमा कर लेता है। क्रान्तिवृत्त वास्तव में पृथ्वी का परिक्रमा करने का मार्ग है और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा एक वर्ष में प्रायः १२ राशियों में कर लेती है। परन्तु साधारण प्रकार से यही कहा जाता है कि सूर्य क्रांतिवृत्त की १२ राशियों में एक वर्ष में परिक्रमा कर लेता है, इस बात का ध्यान रहे। यह क्रांतिवृत्त अंडाकार है। देखें चित्र संख्या ७
भचक्र या राशिचक्र—यह क्रान्तिवृत्त के उत्तर दक्षिण ९-९° की चौड़ाई का एक कल्पित पट्टा माना जाता है। इसे भचक्र या राशिचक्र कहते हैं, क्योंकि सब ही ग्रह इस कल्पित पट्टे के भीतर क्रांतिवृत्त पर या उसके उत्तर या दक्षिण होकर घूमा
राशिचक्र : १३
चित्र संख्या ६-विषुववृत्त, कांतिवृत्त, राशिचक्र और ध्रुव
चित्र संख्या ७-पृथ्वी की कक्षा ( परिक्रमा का मार्ग ) Orbit of the Earth
करते हैं देखो चित्र संख्या ६ ।
कांति=कांतिवृत्त है जिसके उत्तर और दक्षिण में ९-९° का चौड़ा पट्टा है। इस पूरे चौड़े पट्टे को राशि चक्र कहते हैं ।
विषुववृत्त=यह आकाशीय विषुववृत्त, पृथ्वी के विषुववृत्त के सीध में आकाश में एक कल्पित रेखा है ।
आकाशीय विषुववृत्त=Celestial Equator इस विषुववृत्त पर कांतिवृत्त २२°-२८' का कोण बनाते हुए एक दूसरे को काटते हैं ।
१४ : सचित्र-ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
इस राशिचक्र का आदि अन्त नहीं हैं किन्तु नापने के लिये जो बिन्दु स्थान नियत किया गया है वह शेष राशि का आदि स्थान है। यह राशिचक्र वृत्त में एक बार पूर्व से पश्चिम को घूमते दिखता है जैसे चित्र ५ में बताया है।
इसे पढ़ते ( राशिचक्र ) के १२ समान विभाग करने से १२ राशियाँ बनी हैं और इसी के २७ समान विभाग किये जायें तो २७ नक्षत्र होते हैं। अधिवनी नक्षत्र से आरम्भ होने वाले और रेवती नक्षत्र के अन्त में पूरे होने वाले २७ नक्षत्र कैहसी चक्र को भी भगण कहते हैं।
जिस प्रकार भारत वर्ष में अनेक ग्राम है परन्तु किसी विशेष ग्राम को जाने में चाहे पक्की सड़क या रेल से जाओ जितने ग्राम उस मार्ग में या उसके आस पास समीप ही मिलते हैं, मार्ग के ग्रामों में केवल उन्हीं ग्रामों की गणना होती है, यद्यपि अन्य ग्राम समुदाय अनेक हैं। इसी प्रकार कोटचनुकोटि तारागणों में से केवल २७ ही नक्षत्रों की गणना की है। राशि चक्र के पढ़ते के भीतर अर्थात् जिस मार्ग से सब ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं, केवल उसी मार्ग में जो-जो तारागणों का समुदाय है, उनमें से २७ तारागणों के समुदाय को ही चुन लिया गया है, जिनके समीप से ग्रह प्रमण करते हैं। मान लो कि ये ही मार्ग के २७ ग्राम हैं। इस कारण केवल उन्हीं तारागणों के समुदाय की गणना ज्योतिष शास्त्र में नक्षत्रों में की गई है, जिससे ग्रहों के स्थान आदि प्रकट करने में सुविधा हो कि अमुक ग्रह अमुक समय पर अमुक स्थान पर है। इन नक्षत्रों के नाम और परिचय आगे दिये हैं।
राशियाँ Sign बुज्
राशिचक्र के १२ समान विभाग करने से १२ राशियाँ बनती हैं। उनके नाम ये हैं। फारसी में इन्हें बुज् कहते हैं।
| क्रम | राशि | अंग्रेजी नाम | फारसी नाम | अंग्रेजी चिन्ह | हिन्दी चिन्ह |
|---|---|---|---|---|---|
| १ | मेष | Aries | एरीज | हामल | ♈ मेष |
| २ | वृष | Taurus | टॉरस | सूर | ♉ वृष |
| ३ | मिथुन | Gemini | जेमिनी | जोझा | ♊ मि० |
| ४ | कर्क | Cancer | केन्सर | सर्तान | ♋ क० |
| ५ | सिंह | Leo | लियो | असद | ♌ सि० |
| ६ | कन्या | Virgo | विरगो | सुंवला | ♍ क० |
| ७ | तुला | Libra | लिब्रा | मौझान | ♎ तु० |
| ८ | वृश्चिक | Scorpio | स्कार्पियो | अक्रब | ♏ वृ० |
| ९ | धन | Sagittarius | सगीट्टारस | कौस | ♐ ध० |
| १० | मकर | Capricorn | केप्रीकर्न | जदी | ♑ म० |
| ११ | कुंभ | Aquarius | अक्वारियस | दलु | ♒ कुं० |
| १२ | मीन | Pisces | पिसेस | हूत | ♓ मी० |
राशियन्त्रकः १५
राशियन्त्रक विभाग
प्रत्येक चक्र Circle में ३६० अंश होते हैं। इनके १२ विभाग करने से ३६० ÷ १२ = ३० अंश की प्रत्येक राशि होती है।
इसी प्रकार ३६० अंश के २७ विभाग किये = ३६० ÷ २७ = १३°-२०' तो प्रत्येक विभाग १३ अंश २० कला का हुआ अर्थात् राशियन्त्रक को २७ नक्षत्रों में बाँटने से प्रत्येक १३°-२०' का हुआ। अर्थात् एक राशि में २३ नक्षत्र हुए।
प्रत्येक नक्षत्र के ४ विभाग किये तो प्रत्येक विभाग को चरण कहते हैं। इसकारण १ राशि = ३०° = २३ नक्षत्र = ९ चरण। १ चरण = ३°-२०''
| १ चक्र = ३६० अंश degree ( डिगरी ) | } ये कोणत्मक अंशादि है। |
|---|---|
| १ राशि = ३०° ( कला ) | |
| १ अंश = ६०' ( कला ) minute ( मिनट ) | |
| १ कला = ६०'' ( विकला ) Second ( सेकेण्ड ) |
ये चिन्ह अंश कलादि के अंकों की इकाई वाली संख्या के ऊपर दाहिनी ओर कुछ तिरछे लगाये जाते हैं जैसा ऊपर बताया गया है। जहाँ अंश, कला आदि लिखना हो वहाँ केवल ये चिन्ह लगा देते हैं जिसे समझ लेना चाहिये।
कोणत्मक अंश Angular distance
ऊपर जो कोणत्मक अंशादि बताये गये हैं इनके विषय में अच्छी प्रकार समझ लेना चाहिये, क्योंकि उनका अधिक काम पड़ता है।
कोणत्मक अंश को कुछ उदाहरण देकर समझाते हैं।
कोण Angle
जब दो रेखाएँ किसी एक बिन्दु पर परस्पर मिलती हैं तो बीच में एक कोण बन जाता है। देखें चित्र संख्या ८। यहाँ अ. व. एक लकीर, दूसरी लकीर अ. स. पर अ.
चित्र संख्या ८-कोण Angle
चित्र संख्या ९-समकोण
विन्दु पर मिली है जिससे ब अ स कोण बन गया है। वह कोण चित्र में तीर और विन्दुओं से बताया गया है। इसी कोण का नाप अंश, कला, विकला में होता है।
१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्राथमिक ज्ञान खण्ड
अब चित्र संख्या ९ को देखें। एक वृक्ष भूमि पर बिल्कुल सीधा खड़ा है। इसके कारण वृक्ष और भूमि के बीच में दोनों ओर यहाँ एक-एक समकोण बन गया है। वृक्ष सीधा होने के कारण ९० अंश का समकोण दोनों ओर बनाता है। किसी भी समकोण Right Angle में ९० अंश होते हैं। उसके दूसरी ओर भी ९० अंश का दूसरा समकोण बनाता है। दोनों समकोणों का योग ९० + ९० = १८०° होता है।
वृक्ष की तरह किसी भूमि या रेखा पर जो सीधी खड़ी रेखा होती है उसे लम्ब Perpendicular Line कहते हैं। इस प्रकार किसी आधार (भूमि आदि) पर लम्ब खड़ा करने से दोनों ओर एक-एक समकोण ९०°-९०° होते हैं। पूरे चक्र में ३६०° होते हैं। पूरे चक्र में ४ समकोण होते हैं। अर्द्ध चक्र में २ समकोण और चौथाई चक्र में १ समकोण होता है। जैसा चित्र संख्या १० में बताया गया है। इसी प्रकार एक
चित्र संख्या १० एक चक्र के ४ समकोण
चित्र संख्या ११ उर्द्ध रेखा के दोनों ओर के कोण
राशि चक्र में ३६० अंश होते हैं और इन अंशों को १२ राशियों में विभक्त करने से प्रत्येक राशि ३६० ÷ १२ = ३०° की हुई।
यदि कोई एक वृक्ष एक ओर सीधा झुक जाता है तो उसी मान से झुकाव की ओर के कोण का अंश कम हो जाता है परन्तु दूसरी ओर उसी प्रमाण से कोण बढ़ जाता है, परन्तु दोनों कोणों का योग १८०° ही होता है। क्योंकि दो समकोण का योग १८०° ही होता है। चित्र संख्या ११ देखें। वृक्ष के झुकाव के कारण जहाँ अधिक झुका है उस ओर ४५° का कोण है तो दूसरी ओर (१८०° - ४५°) १३५° का कोण अवश्य होगा। अर्थात् १८०° में से एक ओर का कोण घटाने से दूसरी ओर के कोण का अंश प्रकट हो जाता है।
कोण और कोणालम्बक दूरी का नाप
किसी नाप का कोण बनाने के लिये एक पैमाने की आवश्यकता पड़ती है जैसा चित्र संख्या १२ में बताया है।
राशिचक्र : १७
चित्र संख्या १२—कोण नापने का चक्र
एक अर्द्धवृत्त Semi circle बनाओ ( इसमें २ समकोण और १८०° होते हैं क्योंकि प्रत्येक समकोण में ९०° होते हैं )। अब इस १८०° के अर्द्धवृत्त में एक-एक अंश का चिह्न यहाँ चित्र में बताये अनुसार बनाकर विभाग कर लें तो यह कोण नापने का चक्र या पैमाना बन जायगा। इससे किसी भी नाप का कोण बना सकते हैं।
मान लो २३° का कोण बनाना है तो १५° के आगे ८° और लो। जहाँ चित्र में तीर का निशान बनाया है वहाँ २३° हो जाते हैं। फिर जिस कागज में कोण बनाना है एक सीधी लकीर खींचकर उसमें किसी एक बिन्दु पर ( को. ) स्थान मान कर चिन्ह लगा दो। फिर उस सीधी लकीर पर इस पैमाने को इस प्रकार जमा दो जिससे पैमाने के नीचे की लकीर कागज की लकीर के ठीक ऊपर रहे और उसका ( को. ) चिन्ह पैमाने के ( को. ) बिन्दु के ठीक नीचे रहे। फिर पैमाने में जहाँ २३° पूरे हुए थे ( ण. ) स्थान के ठीक नीचे एक बिन्दु का चिह्न कागज में बनाकर उस ( ण. ) स्थान के बिन्दु से और ( को. ) बिन्दु से मिलती हुई रेखा खींचो तो ( ति. को. ण. ) से जो कोण बनेगा वह २३° का होगा।
इसी प्रकार किसी भी इच्छित अंश का कोण बना सकते हैं और किसी भी कोण को नापकर जान सकते हैं कि वह कितने अंश का है। कोण नापने का पैमाना धातु आदि का बना हुआ वाज़ार में डाईंग का सामान बेचने वाले के यहाँ मिल सकता है।
अंश के विभाग
जिस प्रकार घड़ी में १२ बजे तक के सब अंक अंकित रहते हैं और प्रत्येक खण्ड १ घण्टे का होता है; एक घण्टे के ६० विभाग करने से प्रत्येक विभाग एक मिनट का और १ मिनट के ६० विभाग करने से प्रत्येक विभाग एक सेकेण्ड का माना जाता है, इसी प्रकार राशि-चक्र के भी विभाग हैं। जहाँ राशि अंश आदि का उपयोग हुआ है।
२
१८ : सचित्र ज्योतिष शास्त्रा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
जिस प्रकार सूर्य के अनुसार घड़ी का समय होता है और कोई पूछता है कि क्या बजा है तो घड़ी देखकर ठीक बतला सकते हैं कि ४ बजकर ४१ मिनट १० सेकेण्ड हुआ है अर्थात् सूर्य आकाश में इतना चढ़ा है। इसी प्रकार ज्योतिष गणना में प्रत्येक ग्रह की स्थिति बताई जाती है। जैसे सूर्य की स्थिति २ राशि ४ अंश ४१ कला १० विकला पर है। उसको लिखने में इस प्रकार लिखेंगे सूर्य स्पष्ट २-४°-४१'।
आकाश में अंशों का अनुमान करना
किसी मैदान में खड़े होकर देखें तो चारों ओर पृथ्वी से आकाश लगा हुआ दिखेगा और चारों ओर आकाश की गोलाई दृष्टि गोचर होगी। जहाँ आकाश पृथ्वी से मिला हुआ दिखाता है उसे क्षितिज Horizon कहते हैं।
जिस स्थान पर खड़े हैं वह उस स्थान का केन्द्र हुआ। उससे ठीक सिर के ऊपर जो आकाश का बिन्दु है उसे ख स्वस्तिक या शिरोबिन्दु Zenith कहते हैं। इसी का नाम 'ख' भी है।
क्षितिज से शिरोबिन्दु तक एक गोलाई ( वृत्त ) का चतुर्थांश हुआ, जिसमें ९०° होते हैं। इस प्रकार यदि क्षितिज से अंश गिनना आरम्भ करें तो शिर पर ९०° होते हैं।
शिरोबिन्दु को सदा दशम स्थान समझें। जैसा चित्र संख्या १३ में बताया है। क्षितिज में पूर्व की ओर लग्न का स्थान होता है। उसके विषय में और भी अधिक बातें भाव के वर्णन क्रम में मिलेंगी।
लग्न ( क्षितिज ) और दशम ( शिरोबिन्दु ) के बीच के स्थान के ३ भाग करें १० ÷ ३ = ३.३३° हुए। यही एक-एक भाग की १-१ राशि हुई। प्रत्येक राशि ३०° की
चित्र संख्या १३—आकाश में अंशों का अनुमान
नक्षत्र : १९
होगी। प्रत्येक विभाग (१ राशि) ३०° का होगा। देखें चित्र संख्या १३। इसका अभ्यास आकाश की ओर देखकर प्रत्येक दिशा में करें।
उत्तर की ओर ध्रुव तारे को देखें। वह जितने अंश ऊँचा है वही ऊँचाई उस स्थान का अक्षांश होगा। इसी प्रकार सब दिशाओं में आकाश के विभाग कर १ राशि=३०° कितना होगा, अनुमान करें तो १° कितना होगा इसका भी अनुमान हो जायगा।
अध्याय ५
नक्षत्र Constallations या Asterisms
पहिले बता चुके हैं कि राशि-चक्र के २७ सम विभाग करने से २७ नक्षत्र होते हैं। प्रत्येक नक्षत्र १३°—२०' का होता है और १ राशि में सवा दो नक्षत्र होते हैं। नक्षत्र का प्रत्येक चरण (चतुर्थ भाग) ३°—२०' का होता है।
नक्षत्रों के नाम ये हैं—
| क्रम | नक्षत्र | अंग्रेजी नाम | फारसी नाम | हिन्दी चिन्ह |
|---|---|---|---|---|
| १ | अश्विनी | Beta Arietis | बीटा अरायटिस | शरती |
| २ | भरणी | 41 arietis | ४१ अरायटिस | वर्तान |
| ३ | कृतिका | Eta Tauri | ईटा टाउरी | सुरैया |
| ४ | रोहिणी | Aldebaran | अल्डे बरान | द्वारा |
| ५ | मृगशिर | Lambda Orionis | लामडा ओरियोनिस | हकुआ |
| ६ | आर्द्रा | Gamma Geminorum | गामा जेमिनोरम | हनसा |
| ७ | पुनर्वसु | Pollux | पोल्लक्स | क्षिरा |
| ८ | पुष्य | Delta Cancri | डेल्टा कंकरी | नसरा |
| ९ | आश्लेषा | Zeta Hydrac | झीटा हायड्राई | तुर्फा |
| १० | मघा | Regulus | रेगुलस | जवहा |
| ११ | पूर्वाफाल्गुनी | Theta leonis | थीटा लियोनिस | झाहेरा |
| १२ | उत्तराफाल्गुनी | Denebola | डेनेबोला | सफा |
| १३ | हस्त | Delta Corvi | डेल्टा कोरवी | अवा |
| १४ | चित्रा | Spica | स्पीका | समाक |
| १५ | स्वाती | arcturus | आर्कटयूरस | गफरा |
२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
| १६ | विशाखा | Alpha Librae | अल्फा लिब्राई | झवा | वि. |
|---|---|---|---|---|---|
| १७ | अनुराधा | Delta Scorpii | डेल्टा स्कारपी | अकली | अनु. |
| १८ | ज्येष्ठा | Antares | अंटारेस | कलब | ज्ये. |
| १९ | मूल | Lambda Scorpii | लामडा स्कार्पी | सोला | मू. |
| २० | पूर्वाषाढा | Delta Sagittarii | डेल्टा सागिट्टारी | नवा | पूषा. |
| २१ | उत्तराषाढा | Phi Sagittari | फी सागिट्टारी | वरुवा | उषा. |
| २१अ | अभिजित् | Vega | व्हेगा | झावे | अभि. |
| २२ | अवण | Altair | आल्टायर | वला | अ. |
| २३ | धनिष्ठा | Alpha Delphini | अल्फा डेल्फिनी | सोळव | ध. |
| २४ | शतभिषक् | Lambda Aquarii | लामडा अक्वेरी | अखवा | श. |
| २५ | पूर्वाभाद्रपद | Markab | मर्काब | मुकड़ | पूषा. |
| २६ | उत्तराभाद्रपद | Algenib | अल्गेनिब | मुगख | उषा. |
| २७ | रेवती | Zeta Piscium | झीटा पीशियम | रिशा | रे. |
२७ नक्षत्रों में अभिजित् नक्षत्र ( २१ अ ) की गणना नहीं होती। क्योंकि यह नक्षत्र क्रान्ति प्रवेश के बाहर है। इसका उपयोग मुहूर्त विषय में होता है। यह नक्षत्र आकाश में उत्तराषाढा और अवण के बीच में कुछ दृष्ट कर है।
उत्तराषाढा नक्षत्र का चतुर्थ चरण अर्थात् अन्तिम चतुर्थ भाग और अवण नक्षत्र के आदि का एक भाग जो ४ घड़ी का है अर्थात् अवण नक्षत्र के आदि का पन्द्रहवाँ भाग इतना सब मिलकर अभिजित् नक्षत्र का भोग माना जाता है। अर्थात् इतना अभिजित् नक्षत्र होता है।
प्रत्येक राशि में २३ नक्षत्र=९ चरण होते हैं। प्रत्येक राशि में किस नक्षत्र का कौन-कौन चरण आता है नीचे के चक्र से समझ में आ जायेगा।
| क्रम | राशि | नक्षत्र | चरण | क्रम | राशि | नक्षत्र | चरण |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | मेष ( १ ) | अश्विनी | |||||
| ( २ ) | भरणी | ५ | |||||
| ( ३ ) | कृतिका | ०० | ( ११ ) | पू. फा. | |||
| २ | वृष ( ३ ) | कृतिका | ० | ||||
| ( ४ ) | रोहिणी | ६ | |||||
| ( ५ ) | मृगशिर | ०० | ( १३ ) | हस्त | |||
| ३ | मिथुन ( ५ ) | मृगशिर | ०० | ( १४ ) | |||
| ( ६ ) | आर्द्रा | ७ | |||||
| ( ७ ) | पुनर्वसु | ० | ( १५ ) | ||||
| ४ | कर्क ( ७ ) | पुनर्वसु | ००० | ( १६ ) | विशाखा | ||
| ( ८ ) | पुष्य | ८ |
नक्षत्र : २१
( १७ ) अनुराधा | |||| | ( २३ ) धनिष्ठा | ||०० ---|---|---|--- ( १८ ) ज्येष्ठा | |||| | ११ कुम्भ ( २३ ) धनिष्ठा | ००|| ९ धन ( १९ ) मूल | |||| | ( २४ ) शतभि० | |||| ( २० ) पू. वा. | |||| | ( २५ ) पू. भा. | |||० ( २१ ) उ. वा. | ||००० | १२ मीन ( २५ ) पू. भा. | ०००| १० मकर ( २१ ) उ. वा. | ०||| | ( २६ ) उ. भा. | |||| ( २२ ) श्रवण | |||| | ( २७ ) रेवती | ||||
प्रत्येक नक्षत्र के ४ चरण होते हैं। इन चरणों में से जो चरण लिए गए हैं उनके लिए खड़ी लकीर और जो नहीं लिए गए उनके लिए ० बताया गया है। एक खड़ी लकीर को १ चरण समझना चाहिए।
| ऊपर बताये १ चरण का चिन्ह। | } | जैसे अश्विनी के ४ चरण, भरणी के |
|---|---|---|
| २ " " " | ||
| ३ " " " | ||
| ४ " " " |
ये कृतिका के अन्तिम ३ चरण, रोहिणी के ४ चरण और मृगशिर के आदि के २ चरण मिल कर वृष राशि बनती है। मृगशिर के अन्तिम २ चरण मिथुन राशि में चले जाते हैं। इसी प्रकार चक्र देखकर समझ लेना चाहिए। प्रत्येक राशि में इस प्रकार ९ चरण होते हैं। ये ९ चरण मिलकर २७ नक्षत्र पूरे हो जाते हैं।
प्रत्येक चरण के लिए एक अक्षर होता है। जिस चरण में किसी बालक का जन्म होता है उसी चरण के अक्षर पर बालक का नाम रखा जाता है। चरण के अनुसार अक्षर बताने वाले चक्र को होड़ाचक्र कहते हैं। प्रत्येक पंचांग में यह चक्र दिया रहता है। यह विषय आगे समझाया जायेगा।
अध्याय ६
ध्रुव की पहिचान
आकाश में नक्षत्रों को पहिचानने के पहिले ध्रुव को पहिचान लेना आवश्यक है। क्योंकि सब ग्रह आदिक एवं नक्षत्र-समुदाय ध्रुव के आस पास घूमते हुए प्रतीत होते हैं। ध्रुव की पहिचान हो जाने पर नक्षत्रों का उदय अस्त और क्रान्तिवृत्त की गोलाई आदि समझ में आ जायेगी।
२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
जिस प्रकार पृथ्वी का उत्तर और दक्षिण ध्रुव है और जिस प्रकार पृथ्वी का भूकाव ध्रुव की ओर जमीन के घरातल से २३°-१७' पर है उसी प्रकार आकाशीय उत्तर ध्रुव भी नीचे के घरातल से ऊपर उठा हुआ दिखता है। घरातल से यह ध्रुव का भूकाव वहाँ के स्थानिक अक्षांश के अनुसार ही होता है। इस विषय का वर्णन आगे होगा।
ध्रुव तारा Pole Star के आस पास सप्तश्वषि Great Bear के ७ तारे हैं। वे ध्रुव की परिक्रमा करते रहते हैं जिससे ध्रुव तारों की पहिचान सरलता से हो सकती है। इस लिए इन सप्तश्वषि तारों को पहिचानना आवश्यक है। सप्तश्वषियों के पास ही लघुश्वष little Bear के तारे भी हैं जिन्हें लघु सप्तश्वषि भी कहते हैं। कभी-कभी सप्तश्वषि तारागण नीचे की ओर रहने से नहीं दिखते उस समय उसके विरुद्ध दिशा में और सीध में एक तारागणों का समुदाय दिखता है, जो अंग्रेजी के 'एम' M के आकार के हैं जिन्हें महषि या कश्यप मंडल Cassiopez
चित्र संख्या १४—सप्तश्वषि लघुश्वष ध्रुव और महाष
नक्षत्रों की पहिचान : २३
कहते हैं। इनसे भी ध्रुव तारे की पहिचान हो सकती है। चित्र संख्या १४ देखने से ये तारागण और ध्रुव पहिचाने जा सकते हैं।
सप्तश्रृणि
यह ७ तारों का झुण्ड है जो सदा उत्तर में ध्रुव की परिक्रमा करते रहते हैं। ये ७ तारे ७ श्रृणि माने गये हैं। इनमें से ४ तारे खाट के पाये सदृश हैं जिनसे कुछ लम्बाई लिए एक चौकोन बनता है। इनके नीचे की ओर से एक तिरछी, छोर में कुछ उठी हुई पूछ सरीखी गई है जिसमें ३ तारे हैं। इस चौखेटे के सबसे आगे के दो पाये एक ऊपर एक नीचे हैं जिनको क्रतु और अत्रि कहते हैं। इन दोनों की सीध में यदि एक लकौर आगे उसी सीध की ओर बढ़ती हुई खींची जाये तो उसी सीध में एक तारा साधारण प्रकाश का दिखेगा। उसी तारे की ओर प्रतिदिन ध्यान दें तो वह कभी चलता नहीं दिखेगा और उसी तारे के आस पास सप्तश्रृणि घूमते दिखेंगे। दो चार बार ध्यान पूर्वक उत्तर की ओर देखने से यह ध्रुव तारा पहिचान में आ जायेगा।
कश्यप मण्डल में बाईं ओर ऊपर जो तारा है उससे एक लम्बी रेखा लम्ब स्वरूप खींची जावे तो वह भी ध्रुव में आकर मिलेगी। चित्र संख्या १४ के देखने से यह समझ में आ जायेगा। सप्तश्रृणि और महर्षि के बीचों बीच यह ध्रुव तारा है। इस ध्रुव के आस पास सप्तश्रृणि आदि पूर्व से पश्चिम को घूमते दिखते हैं।
अध्याय ७
नक्षत्रों की पहिचान
क्रान्ति प्रदेश में २७ तारागणों का समुदाय या नक्षत्र हैं और अश्विजत् नक्षत्र क्रान्ति मण्डल के बाहर है। इन सबको पहिचान लेना चाहिए। इन सब नक्षत्रों को पहिचान लेने से ज्योतिष की कई बातें शीघ्र समझ में आने लगेंगी। इस कारण इन सबकी पहिचान यहाँ देते हैं। आगे इनके नक्शे भी दिए हैं, जिनके सहारे आकाश में नक्षत्रों को पहिचानने का प्रयत्न करते रहना चाहिए। देखें चित्र संख्या ३९,४०,४१ (आकाश के तीन चित्र परट)। इनके अतिरिक्त पृथक्-पृथक् नक्षत्रों को पहिचानने के लिए अलग चित्र दिये हैं। उनकी पहिचान यहाँ बताई जाती है।
१ अश्विनी—के ३ तारे हैं परन्तु उनकी पहिचान के लिए एक ओर आगे का तारा मिला देने से शीघ्र पहिचाने जा सकते हैं। २ तारे बीच में पास-पास कुछ तिरछे एक से दूसरा कुछ नीचा परन्तु बराबरी से हैं और ऊपर छोर पर १ तारा और नीचे १ तारा है। ये दोनों तारे चमकदार हैं परन्तु उत्तर का तारा अधिक
२४ : सचित्र ज्योतिष शास्त्रा; प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
चमकदार है और तीसरा तारा जो पूर्व में है वह सबसे तेजस्वी है। इसके पश्चिम में भी एक तारा है। देखें चित्र संख्या १५। यह नक्षत्र कुंभार के महीने में ८-९ बजे रात को पूर्व बिन्दु से कुछ उत्तर की ओर हट कर उदय होने के ६ ३/४ घण्टा के उपरान्त सिर पर आता है और ६ ३/४ घण्टा के उपरान्त पश्चिम बिन्दु से कुछ उत्तर की ओर अस्त होता है।
यह नक्षत्र जनवरी के आरम्भ में म्यालू के समय सिर पर आता है और शिरो-बिन्दु से कुछ उत्तर की ओर दिखता है। इसके ३ तारों का आकार घोड़े के मुख सदृश होने से अभिवनी कहते हैं। कुंभार की पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर रहता है।
२ भरणी—इसके ३ छोटे-छोटे तारे हैं जिनसे छोटा सा त्रिकोण बनता है। अभिवनी और भरणी के बीच में रेखा खींचने पर उस रेखा के उत्तर में यह त्रिकोण पड़ता है। यह अभिवनी के आगे पूर्व की ओर है इसका आकार योनि सरीखा बताया है परन्तु यह त्रिकोणाकार है। देखें चित्र संख्या १६।
३ कृतिका—यह तारागणों का गुच्छा सा दिखता है किसान लोग इसे अच्छी तरह पहिचानते हैं। वे लोग इसे घोड़ी का मांगरा कहते हैं। कालिक के महीने में म्यालू के समय यह पूर्व में दिखता है और इसी को देखकर कार्तिक स्नान करने वाले समय
चित्र संख्या-१५ चित्र संख्या-१६ चित्र संख्या-१७ चित्र संख्या-१८
१ अभिवनी २ भरणी ३ कृतिका ४ रोहिणी
का अनुमान करते हैं। इसके ६ तारे माने जाते हैं और इसका आकार खुरा सदृश कहा है। फरवरी में यह म्यालू के समय सिर पर आता है। कार्तिक की पूर्णिमा के लगभग चन्द्र इस नक्षत्र पर रहता है। देखें चित्र संख्या १७।
४ रोहिणी—इसमें ५ तारे माने जाते हैं और आकार गाड़ी सदृश बताया गया है। परन्तु देखने में यह एक कोण सा दिखता है। यह कृतिका के कुछ बाजू से नीचे की ओर दिखता है। इसमें नीचे का तारा अधिक प्रकाशवान् है। ये तारे कृतिका से कुछ दक्षिण की ओर हैं। फरवरी में म्यालू के समय ये सिर पर आते हैं और कुछ दक्षिण की ओर रहते हैं। इनका आकार चित्र संख्या १८ देखने से समझ पड़ेगा।
कहते हैं शनि और मंगल जब इस शकट (गाड़ी) का भेदन करते हैं (इस त्रिकोण में से होकर जाते हैं) तब प्रलय होता है। इसलिए ये ग्रह शकट भेदन नहीं करते। केवल चन्द्र ही यहाँ से जाता है। इसी कारण रोहिणी को चन्द्र की स्त्री कहा है।
नक्षत्रों की पहिचान : २५
५ मृगशिर या मृगशिरा—इसे बहुधा सब किसान पहिचानते हैं। इसे वे हिरनी या खटोला कहते हैं। इसके चारों ओर चौकोन बनाते हुए ४ प्रकाशवान् तारे हैं। इनके बीच में ३ तारे एक दूसरे की सीध में हैं। इसे व्याघ्र का तीर कहते हैं। व्याघ्र का तारा बहुत नीचे हटकर अतिप्रकाशवान् है और शीघ्र पहिचाना जा सकता है। मृगशिर के अन्त में ३ तारे पास-पास एक सीध में हैं। इसे हिरन की पूँछ कहते हैं और सामने की ओर ३ तारों का एक छोटा त्रिकोण है उसे हिरन का मुख कहते हैं। अगहन के महीने में ब्यालू के समय यह पूर्व में दिखता है। अगहन की पूर्णिमा के लगभग चन्द्र इस नक्षत्र पर रहता है। इन तारों में मृगशिर के ३ ही तारे माने जाते हैं। और आकार हिरन सदृश माना जाता है। ये तारे आकाश गंगा के किनारे हैं और जब सिर पर आते हैं तब दिखते हैं। ये रोहिणी से कुछ दूर हट कर दक्षिण की ओर हैं। मार्च के महीने में ब्यालू के समय ये सिर पर आते हैं। उदय के ६ घण्टा बाद सिर पर आते हैं। देखें चित्र संख्या १९।
चित्र संख्या-१९
५ मृगशिर
चित्र संख्या-२०
६ आर्द्रा
६ आर्द्रा—इसका एक तारा है। यह प्रायः भरणी के सीध में है और मृगशिर तथा पुनर्वसु के बीच में दिखता है। मार्च के महीने में लगभग ब्यालू के समय सिर पर आता है और सिर से कुछ दक्षिण की ओर दिखता है। इसका आकार मणि सदृश माना है। इसका प्रकार साधारण है। यह भी आकाश गंगा के बाहरी किनारे पर है। इसकी पहिचान के लिए और तारों को पहिचान कर इसे खोजें। देखें चित्र सं० २०।
७ पुनर्वसु—इसके ४ तारे हैं। घर सदृश इसका आकार बताया है। २ तारे इसके पहिली श्रेणी के ( अधिक प्रकाशवान् ) और तीसरा तारा भी पहिली श्रेणी का है। इस प्रकार उत्तर की ओर २ तारे हैं और दक्षिण की ओर २ तारे हैं। उत्तर की ओर के २ तारे सबसे पहिले उगते हैं। देखें चित्र संख्या २१। तारे किनरी श्रेणियों के हैं उनकी श्रेणी का क्रम चित्रपट ३९-४०-४१ देखने से प्रगट होगा।
८ पुष्य—इसके ३ तारे लिये जाते हैं और बाण सदृश इसका आकार माना जाता है। देखें चित्र संख्या २२। ये बारीक-बारीक तारे हैं जिनका छोटा त्रिकोण बनता है।
२६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
है। जो देखने में एक ही तारा सदृश दिखता है। अप्रेल के महीने में म्यालू के समय यह सिर पर आता है। पूष के महीने में पूर्णिमा के लगभग चन्द्रमा इस नक्षत्र पर रहता है।
चित्र संख्या २१ ७ पुनर्वसु
चित्र संख्या २२ ८ पुष्य
चित्र संख्या २३ ९ आश्लेषा
६ आश्लेषा या अश्लेषा—इसके ५ तारे और चक्र सरीखा आकार बताया है। यह पुष्य के दक्षिण में है और उसी की बराबरी से सिर पर आता है। चन्द्र पुष्य से आश्लेषा पर शीघ्र आ जाता है। इसके बारीक तारे हैं जिनमें एक प्रकाशवान् तारा है। देखें चित्र संख्या २३।
१० मघा—इसके ६ तारे माने जाते हैं और आकार भवन सदृश बताया गया है। परन्तु इन ६ तारों पर विचार करने से हंसिया सरीखा आकार दिखाई देता है। ध्यान में आते ही यह शीघ्र पहिचाना जा सकता है। इसके ४ बड़े तारे हैं। इनका आकार एक समानान्तर भुज चौकोन सा बनता है, जिस प्रकार दियासलाई की डिव्वी के ऊपर के ढक्कन को दवा देने से कुछ तिरछा चौकोन बनता है। इसके पश्चिम की ओर दक्षिण कोण का तारा तेजस्वी है और पहली श्रेणी का है। इसके दक्षिण में एक बारीक तारा है जो पाँचवाँ तारा है। पूर्व बाजू से दोनों दक्षिण के तारे अधिक तेजस्वी हैं। मई महीने के आरम्भ में म्यालू के समय यह सिर पर कुछ दक्षिण की ओर हटा हुआ दिखता है। माघ की पूर्णिमा को चन्द्रमा इसके समीप रहता है। कोई इसके ५ तारे मानते हैं। देखें चित्र संख्या २४।
११ पूर्वा फाल्गुनी } मघा के पूर्व में कुछ उत्तर को दोनों फाल्गुनी के ४ १२ उत्तरा फाल्गुनी } गरे हैं जो चौकोन सरीखे दिखते हैं। उसके पूर्व-पश्चिम बाजू का उत्तर-दक्षिण बाजू से अन्तर दुगने से कुछ कम है। पश्चिम की ओर के २ तारे पूर्वा फाल्गुनी हैं। इसके उत्तर की ओर का अधिक तेजस्वी है। पूर्व बाजू के दोनों तारों को उत्तरा फाल्गुनी कहते हैं। इसके नीचे दक्षिण का तारा अधिक तेजस्वी है। उत्तर का बारीक है। फाल्गुन में इस नक्षत्र पर पूर्णिमा को चन्द्र आता है फाल्गुन में ये दो नक्षत्र म्यालू के समय पूर्व में दिखते हैं। कोई जून में म्यालू के समय सिर पर दिखते हैं। और ठीक सिर पर आते हैं। देखें चित्र संख्या २५।
नक्षत्रों की पहिचान : २७
चित्र संख्या २४
१० मघा
चित्र संख्या २५
११ पूर्वा फाल्गुनी
चित्र संख्या २६
१३ हस्त
१२ उत्तरा फाल्गुनी
१३ हस्त—इसके ५ तारे हैं। आकार हाथ सदृश है। यह मघा के दक्षिण ओर है। यीघ्र पहिचाना जा सकता है। हाथ की अंगुलियों की ५ नोक सदृश ये पाँचों तारे दिखते हैं। जून के महीने में ये ब्यालू समय सिर पर दिखते हैं और शिरोविन्दु से ३०-४० अंश दक्षिण की ओर रहते हैं। देखें चित्र संख्या २६।
१४ चित्रा—हस्त के बाजू पूर्व को कुछ उत्तर की ओर यह एक ही तारा है जो बड़ा प्रकाशवान् है। आकार इसका मोती सदृश बताया है। जून के अन्तिम भाग में यह ब्यालू के समय सिर पर आता है। चैत्र की पूर्णिमा को चन्द्र इस पर आता है। यह तारा प्रायः आतिवृत्त पर है। देखें चित्र संख्या २७।
१५ स्वाती—यह अकेला और बहुत बड़ा तारा है। सरलता से पहिचाना जा सकता है। चित्रा से बहुत उत्तर को यह चमकता हुआ दिखता है। यह तारा चित्रा से भी अधिक प्रकाशवान् है। चित्रा के प्रायः ५० मिनट बाद यह शिरोविन्दु पर आता है और उसके १॥ घंटा बाद दूबता है। यह चित्रा से प्रायः ३०° दक्षिण को है। इसका एक ही तारा है और आकार मूंगा सदृश बताया है। यह कुछ लाल रंग का है। देखें चित्र संख्या २८।
१६ विशाखा—इसके २ तारे हैं। चित्रा के सामने ही नीचे की ओर २ तारे चमकते हुए दिखते हैं, परन्तु चित्रा से उनका तेज कम है। फरवरी में ५ बजे प्रातः के लगभग ये सिर पर दिखते हैं। पहिले तारे के उपरान्त दूसरा तारा २६ मिनट के अन्तर से उगता है। उसकी बराबरी से २ और छोटे तारे हैं जिनको मिला कर देखने से एक चौकोन सा बन जाता है। इसके ४ तारे और आकार तोरण सदृश
चित्र संख्या २७
१४ चित्रा
चित्र संख्या २८
१५ स्वाती
चित्र संख्या २९
१६ विशाखा
चित्र संख्या ३०
१७ अश्विनी
२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
मानते हैं। वैशाख में चन्द्रमा पूर्णिमा को इस नक्षत्र पर आता है। मई महीने में ब्यालू समय यह उदय होता है और उदय होने के समय पूर्व और आग्नेय कोण के बीच दिखता है। दोनों बड़े तारों में एक चित्रा के तारे के सामने नीचे की ओर दिखता है और दूसरा उसके बाईं ओर दिखता है। दोनों तारे एक से तेजस्वी हैं, परन्तु चित्रा से तेज कम है। कभी चन्द्र दोनों बड़े तारों के बीच से होकर जाता है। देखें चित्र संख्या २९।
१७ अनुराधा—इसके ४ तारे हैं, जो प्रायः एक सीध में उत्तर दक्षिण को हैं और विशाखा के नीचे पूर्व को हैं। विशाखा के बड़े तारों से एक सीधी रेखा अनुराधा के तारों की सरल रेखा के छोरों से मिलाई जावे तो उत्तर की अपेक्षा दक्षिण का अन्तर अधिक प्रगट होगा। इन तारों का आकार भात की बलि ( पिंड ) सदृश बताया है अर्थात् किसी ने भात की बलि के ४ कोर उठाकर ४ जगह में एक रेखा में एक के नीचे एक रख दिये हों। देखें चित्र संख्या ३०।
१८ ज्येष्ठा—इसके ३ तारे प्रायः एक सीध में पूर्व पश्चिम को हैं। अनुराधा से सीधी रेखा में बीच से पूर्व को एक लम्ब बाँचा जावे तो उसकी सीध में ३ अनुराधा के तारे खड़े एक के नीचे एक हों तो ज्येष्ठा के तारे आड़े एक के बाद एक हों। ज्येष्ठा के बीच का एक तारा पहिली-श्रेणी का है। ज्येष्ठ मास में पूर्णमासी को चन्द्र इस नक्षत्र पर रहता है। इसका आकार कुण्डली सरीखा बताया है देखें चित्र संख्या ३१।
१९ मूल—ज्येष्ठा के पूर्व में ११ तारे हैं, जो सिंह की पूँछ सरीखा या बिच्छू के डंक सरीखा आकार गोलाई लिये बनाते हैं। यह शीघ्र पहिचाना जा सकता है। आकाश गंगा में यह कांतिवृत्त के दक्षिण को है। देखें चित्र संख्या ३२। इसका आकार सिंह पुच्छ सरीखा माना है। यह जून के उत्तरार्द्ध में ब्यालू के समय उदय होता है। सितम्बर में ५ बजे संघा को और अप्रैल में प्रातः के समीप सिर पर दिखता है। अनुराधा आदि के तारों को मिला कर देखने से आकाश में एक बड़ा बिच्छू सरीखा आकार सिर से ५०-६० अंश दक्षिण की ओर लटकता हुआ दिखता है।
२० पूर्वाषाढ़ा } इनमें प्रत्येक के २-२ तारे हैं। इनके २-२ तारे मिल कर २१ उत्तराषाढ़ा } एक समकोण सरीखा बन जाता है। २ तारे पूर्वाषाढ़ा के आकाश गंगा के बाहर हैं। उत्तराषाढ़ा की उत्तर-दक्षिण लम्बाई से पूर्व-पश्चिम लम्बाई
नक्षत्रों की पहिचान : २९
का प्रमाण प्रायः कुमुना है । अत्रैल के प्रातः के लगभग यह चौकोन सिर पर आता है । देखें चित्र संख्या ३३ । पूर्वाषाढ़ा का आकार हाथी दांत और उत्तराषाढ़ा का आकार मंच ( मर्चैया ) सरीखा माना है ।
३३ अभिजित्—दोनों आषाढ़ा के बाद अभिजित् का तारा लिया जाता है । परन्तु यह क्रांतिबुत प्रवेश से दूर और बाहर है इस कारण इसे नक्षत्र की गणना करते समय छोड़ देते हैं । यह तारा उत्तर की ओर आकाश गंगा के किनारे है और बड़ा प्रकाशवान् है । इसके पास दो छोटे-छोटे तारे हैं जिनसे एक त्रिकोण सरीखा दिखता है । इस नक्षत्र को मिलाने से २८ नक्षत्र हो जाते हैं परन्तु इसे छोड़कर केवल क्रांति प्रवेश के ही २७ नक्षत्र लिये जाते हैं । यह प्रायः प्रथम श्रेणी का है । देखें चित्र संख्या ३४ ।
२२ श्रवण—इसके ३ तारे हैं जिनमें बीच का तारा पहिली श्रेणी का और बहुत चमकीला है । ये तारे आकाश गंगा में उत्तराषाढ़ा से बहुत उत्तर की कुछ पूर्व कोने में हैं । श्रावण मास की पूर्णमासी को चंद्र इस नक्षत्र के समीप आता है । ये तारे शीघ्र
चित्र संख्या ३३
चित्र संख्या ३५
चित्र संख्या ३६
३३ अभिजित्
२२ श्रवण
२३ धनिष्ठा
पहिलाने जा सकते हैं । एक सीध में ये तीनों तारे हैं और प्रायः उत्तर दक्षिण कुछ तिरछे हैं । इन तीन तारों का आकार वामन औरार के चरण सदृश माना जाता है परन्तु देखने में ये बाण सरीखे दिखते हैं । देखें चित्र संख्या ३५ ।
२३ धनिष्ठा—इसके ५ तारे हैं जो पास-पास हैं । श्रवण के पूर्व कुछ उत्तर बाजू इसका झुमका दिखता है । इसका आकार मूर्दंग सरीखा कहा गया है । नीचे का छोटा तारा छोड़ कर ४ तारों को देखें तो चपटा चौकोन सरीखा दिखता है । यह आकाश गंगा के बाहर है । ये ४ तारे पास-पास और संद ज्योति के हैं । देखें चित्र संख्या ३६ ।
२४ शतभिषक या शतभिषा—इसे शततारक भी कहते हैं । कहा जाता है कि इसमें १०० तारों का झुण्ड है । इसका आकार वृत्त Circle सरीखा बताया गया है परन्तु कोई इसमें से १० तारा को कोई १ ही तारा को ही शतभिषक मानते हैं । यह नवम्बर में व्यालू के समय सिर पर आता है और प्रायः २८ अंश सिर से दक्षिण की ओर दिखता है । इसीके सीध में बहुत नीचे दक्षिण में १ बहुत ही प्रकाशवान् तारा है जिसे याममत्य कहते हैं । दोनों का अन्तर ८ अंश का है । १०० तारे होने से इसका नाम शततार पड़ा है । वहाँ बहुत से तारेगण पास-पास हैं ।
३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड
२५ पूर्व भाद्रपद } याममत्स्य और शतभिषक् के प्रकाशवान् तारा को सरल २६ उत्तर भाद्रपद } रेखा से मिलाओ और इस रेखा को उत्तर की ओर बढ़ाते जाओ तो इस रेखा के कुछ पश्चिम की ओर पूर्व भाद्रपद के २ तारे आते हैं। याममत्स्य से जितने अंश पर उत्तर में शतभिषक् है उतने ही अन्तर पर शतभिषक् से उत्तर में पूर्व भाद्रपद का १ तारा है और उसके बाजू ठीक उत्तर में १३° पर पूर्व भाद्रपद का दूसरा तारा है। ये दोनों तारे एक से तेजस्वी हैं। नवम्बर में व्यालू के समय सिर पर आते हैं इस समय शिरोबिन्दु के दक्षिण ५-६ अंश पर रहते हैं और दूसरा उतने पर ही उत्तर को रहता है। इन दोनों तारों के बीच जितना अन्तर है उससे भी अधिक अन्तर पर प्रत्येक के पूर्व में एक-एक तारा है इस प्रकार २ तारे हैं। इन दोनों को उत्तर भाद्रपद कहते हैं। इन दोनों में उत्तर का अधिक तेजस्वी है यह दूसरी श्रेणी का तारा है।
पूर्व भाद्रपद के २ तारे और उत्तर भाद्रपद के २ तारे मिलकर एक चौकोन सरीखा बनता है। देखें चित्र संख्या ३७। भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चन्द्रमा इस नक्षत्र के
चित्र संख्या ३७
२५ पूर्वा भाद्रपद, २६ उत्तरा भाद्रपद
चित्र संख्या ३८
२७ रेवती
समीप आता है। पूर्व भाद्रपद का आकार मच्छ सरीखा और उत्तर भाद्रपद का आकार यमल ( जोड़ा ) सरीखा बताया है।
२७ रेवती—इनमें ३२ तारे हैं। आकार मूदङ्ग सरीखा है और वैसा ही दिखता है। ये छोटे-छोटे तारे हैं। उत्तर भाद्रपद के दोनों तारों में से दक्षिण के तारे के आग्नेय कोण के लगभग १०-१० अंश पर तारों की १ कतार है जो पूर्व-पश्चिम गई है। इसमें ६-७ तारे तेजस्वी हैं और प्रायः एक दूसरे के समानांतर पर हैं। इनके दक्षिण में अग्वनी है। देखें चित्र संख्या ३८।
इन नक्षत्रों के अतिरिक्त आकाश गंगा याममत्स्य आदि चित्र में दिये हैं जिनको देखकर आकाश में पहिचानने का प्रयत्न करें।
आकाश गंगा Milk way
यह आकाश में उत्तर से दक्षिण की ओर तिरछी गई है। इससे बहुत से तारों का घना समुदाय होता है, जिसके कारण आकाश का वह भाग श्वेत सरीखा दिखता है जैसे बापल के टुकड़े छाये हों।
नक्षत्रों की पहिचान : ३१
क्रांति प्रदेश का वर्णन आगे मिलेगा ।
अश्विनी से १२ नक्षत्र तक सब तारे विषुवत्बृत्त के उत्तर में हैं और स्वाती अभिजित श्रवण धनिष्ठा पूरवाभाद्रपद उत्तराभाद्रपद रेवती इनके तारे भी विषुवत् बृत्त के उत्तर में हैं । शेष तारे दक्षिण में हैं ।
चन्द्र का भ्रमण मार्ग—चन्द्रमा इस प्रकार नक्षत्रों में से होकर जाता है ।
१—इन १० नक्षत्रों के दक्षिण की ओर से चन्द्रमा जाता है । नक्षत्रों के नाम के आगे उनकी क्रम संख्या दी है ।
( १ ) अश्विनी १, ( २ ) भरणी २, ( ३ ) पुनर्वसु ७, ( ४ ) पू० फा० ११, ( ५ ) उ० फा० १२, ( ६ ) स्वाती १५, ( ७ ) श्रवण २२, ( ८ ) धनिष्ठा २३, ( ९ ) पू० भा० २५, ( १० ) उ० भा० २६ ।
२—इन ५ नक्षत्रों के उत्तर से चन्द्रमा जाता है ।
( १ ) मृग० ५, ( २ ) आर्द्रा ६, ( ३ ) आश्लेषा ९, ( ४ ) हस्त १३, ( ५ ) मूल १९ ।
३—शेष १२ नक्षत्रों के दोनों ओर से, कभी पास से कभी उन को डाकते हुए, चन्द्रमा जाता है ।
( १ ) कृतिका ३, ( २ ) रोहिणी ४, ( ३ ) पुष्य ८, ( ४ ) मघा १०, ( ५ ) चित्रा १४, ( ६ ) विशाखा १६, ( ७ ) अनुराधा १७, ( ८ ) ज्येष्ठा १८, ( ९ ) शतभिषक् २४, ( १० ) पू० वा० २०, ( ११ ) उ० वा० २१, ( १२ ) रेवती २७ ।
आकाश के नकशे को देखने की रीति
नकशे में जो दिखाएँ दी हैं उनके सम्बन्ध में कुछ प्रश्न हो सकता है । कारण यह है कि उत्तर के उपरान्त बाईं ओर पूर्व फिर दक्षिण फिर पश्चिम दिया है । पूर्व के स्थान में पश्चिम होने का कारण नीचे समझाया गया है ।
नकशे को आकाश से मिलान करने के लिये खुले मैदान में बैठें जहाँ से आकाश अच्छी तरह दिखे । मुँह ऊपर की ओर कर आकाश को देखें फिर नकशे को लोटाकर सिर के ऊपर रखें जिससे नकशे की पीठ आकाश की ओर रहे और नकशा पढ़ने में आ सके । नकशे में उत्तर दिया है वह उत्तर ध्रुव की ओर करे और नकशे के पूर्व को पूर्व की ओर रखें तो नकशे की शेष दिखाएँ ठीक स्थिति पर आ जायेंगी । इसके उपरान्त तारा देखने का जो समय बताया है उन्हीं यहीनों की उन्हीं तारीखों को जैसा आगे बताया है उस नकशे के अनुसार ताराओं को खोजें तो अवश्य मिलेगा ।
इसी प्रकार आकाश में देखते-देखते और पहिचानने का प्रयत्न करते रहने से मुख्य-मुख्य नक्षत्रों की अवश्य पहिचान होने लगेगी । जब आकाश खुला रहे और अंधेरी रात हो, तारा गणों का अवलोकन कर नक्षत्र पहिचानने का प्रयत्न करते हैं ।